दुख-सुख में समता पान करो, समता से दुख सभी मिटते।
रोने से दुख नहीं कम होता, क्यों व्यर्थ नया बन्धन करते ।। टेक ।।
करते समय विचारा ना, इसका फल मुझको क्या होगा।
झूठे सुख में ही मग्न रात-दिन, सोचा नहीं कि क्या होगा ?
गर कर्म नहीं करते खोटे तो फिर कैसे ये दुख होते ।। 1।।
आत्मन् ये तो स्थूल बात, बाहर से द्वेष मिटाने की।
अब सावधान हो सुनो सीख, कर्मों से दृष्टि हटाने की ।।
कर्मोदय तो हैं भिन्न अरे, वे कैसे तुझको दुःख देते ।। 2।।
हो घोर पाप का उदय तभी, ज्ञानीजन निज से सुख पावें।
पुण्योदय में भी अज्ञानी, निज मोहभाव से अकुलावें।।
अतएव भव्य अब निर्णय कर, नहीं कर्म भी तुझको दुख देते।।3।।
खुद ही निज रूप को भूल अरे पर में अपनापन धरते हो।
झूठे संकल्प-विकल्पों से तुम, व्यर्थ आकुलित होते हो।।
भवि तत्त्वज्ञान अरु भेदज्ञान से, निज में सच्चा सुख पाते।।4।।
आत्मतत्त्व शाश्वत सुखमय, सुख से रीता है कभी नहीं।
दुख तो केवल बाहर में है, तुझमें दुख का अस्तित्व नहीं।।
आत्मा दुख रूप नहीं होता, क्यों सिद्धांत भूल जाते।।5।।
अब खेद तजो भूलो सब ही केवल अपने को पहिचानो।
पर द्रव्यों की क्या बात कहूँ पर्यय भी पार्श्ववर्ती जानो।।
अन्तर्दृष्टि करके देखो, निज में सुख सागर लहराते।।6।।
तू तो शाश्वत सुखमय प्रभु है, केवल निज प्रभुता भूल गया।
निज प्रभुता को स्वीकार करो, फिर तो समझो सब दुःख गया।।
निज श्रद्धा अनुभूति थिरता से, आत्मन् मुक्ति पद पाते।।7।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह