समयसार नाटक (कविवर पण्डित बनारसीदास) | Samaysar Natak (Kavivar Pt. Banarsidas)

समयसार नाटक

[ भाषाटीका सहित ]

रचयिता : कविवर पण्डित बनारसीदास

टीकाकार : पण्डित बुद्धिलाल श्रावक

प्रस्तावना : पण्डित रतनचन्द भारिल्ल

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन एवं प्रचार विभाग, श्री कुन्दकुन्द कहान दिगम्बर जैन तीर्थसुरक्षा ट्रस्ट, ए-४, बापूनगर, जयपुर

अनुक्रमणिका

प्रस्तावना

  • पण्डित रतनचन्द भारिल्ल

पंडित रतनचंद भारिल्ल प्रस्तावना । शास्त्री, न्यायतीर्थ,साहित्यरत्न, एम ए., बी एड. महाकवि पंडित बनारसीदास ने अपने जीवन में जितने उतार-चढाव देखे उतने शायद ही किसी महापुरुष के जीवन में आये हो । पुण्य और पाप का ऐसा सहज सयोग अन्यत्र विरल है। जहाँ एक ओर उनके पास उधार खाई चाट के पैसे चुकाने के लिए पैसे नही रहे, वहाँ दूसरी ओर वे कई बार लखपति भी बने । जहाँ एक ओर वे थध्यूगार मे सरावोर एवं आशिखी में रस-मग्न दिखाई देते है, वहाँ दूसरी ओर वे पावन अध्यात्म गंगा में स्तान करते दृष्टिगत होते है। एक ओर स्वय रूढियो मे जकडे मंत्र-तत्र के घटाटोप में आकण्ठ डूबे दिखते है, तो दूसरी ओर उन्ही का जोरदार खण्डन्न करते दिखाई देते है । उन्होंने अपने जीवन में तीन बार ग्रृहस्थी बसाई, पर तीनों बार उजड गई । ऐसी बात नही थी कि वे सनन्‍्तान का मुंह देखने को तरसे हों, पर उन्हे सन्‍्तान सुख न मिल सका । तीन-तीन शादियाँ, नौ-नौ सनन्‍्तान का सोभाग्य किस-किस को मिलता है? पर दुर्भाग्य कीकल्पना भी तो कीजिए कि उनकी आँखो के सामने ही सब चल बसे और वे कुछ न कर सके । उस समय उन पर कंसी गुजरी होगी, यह कोई भुक्त-भोगी ही जान सकता है । कविवर ने स्वय अपनी अन्तर्वेदना निम्न शब्दों मे व्यक्त की है :-

तीनि विवाही भारजा, सुता दोइ सुत सात ॥ ६४२॥
नौ बालक हुए मुए, रहे नारि नर दोइ।

ज्यौं तरवर पतमार ह्वं, रहैं ठंठसे होइ॥ ६४३ ॥*१ कविबर अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे । उनके माता-पिता ने उन्हे बहुत प्रतीक्षा और प्रयत्नों के पश्चात्‌ प्राप्त किया था। विक्रम सवत्‌ १६३७ में उनके पिता खरगसेन पुत्रलाभ की अभिलाषा से रोहतकप्र ) अद्ध कथानक, पृष्ठ ७१ की सती की यात्रा करने गये थे और मार्ग में चोरों द्वारा उनका सब कुछ लूट लिया गया था । कवि ने अपने माता-पिता की अज्ञानता पर खेद व्यक्त करते हुए स्पष्ट लिखा है:- सेतीसे संबतकी बात । रुहतग गए सतीकोी जात ।

चोरन्ह लूटि लियो पथमांहि। सर्वंस गयो रह्मौ कछु नांहि ॥ ७८ ॥
गए हुते मांगनकों पुत। यहू फल दीनों सती अऊत ॥ ७६॥।
तऊ न समुभे मिथ्या बात । फिरि सानो उनहीकी जात ।

प्रगट रूप वेखे सब फोक । तऊ न समुझ्क म्रख लोक ॥ ८० ॥"१ बनारसीदासजी स्वय भी अपने प्रारभिक जीवन में अनेक बार अंधविश्वासों के शिकार हुए थे । १८ वर्ष की उम्र में वे एक साधु के चक्कर में आ गये थे । प्रतिदिन एक दीनार पाने के लोभ में उसी सनन्‍्यासी के बताए मत्र को वे एक वर्ष तक जपते रहे, किन्तु उनके हाथ कुछ भी न लगा । इसकी चर्चा उन्होने इस प्रकार की है:- समै उनसठे सावन बीच । कोऊ संनन्‍्यासी नर नीच ॥ २०६ ॥ आई मिल्यो सो आकस मात । कही बनारसिसौ तिन बात ।। एक मत्र है मेरे पास। सो बिघधिरूप जपे जो दास ॥ २१० ॥। बरस एक लोौ साध॑ नित्त । दिढ प्रतीतति आने निज चित्त ।।

जपे बेठि छरछोभी मांहि । भेद न भाखे किस ही पांहि ॥ २११ ॥
पूरन होइ मत्र जिस बार । तिसके फलका कहूं विचार ।।
प्रात समय आवे ग्रूहद्वधार । पावे एक पडा दीनार ॥ २१२॥।
बरस एक जब पूरा भया। तब बनारसी द्वारे गया।॥।
नीची दिष्टि बिलोके धरा। कहु दीनार न पाव परा ॥ २१६॥।
फिरि दूजे दिन आयोौ द्वार । सुपने नहि देखें दीनार।।

व्याकुल भयौ लोभके काज । चिता बढ़ी न भाव नाज ॥ २१७॥।* कविवर बनारसीदास का जन्म वि० संवत्‌ १६४३ की माघ शुक्ला एकादशी, रविवार के दिन जौनपुर मे हुआ था । जन्म के समय उनका नाम विक्रमाजीत रखा गया था, किन्तु एक बनारसी पुजारी की चतुराई से वे

अर्द्ध कथानक, पृष्ठ १०

३ यही, पृष्ठ २४-२३, बनारसीदास हो गये । घटना इस प्रकार है- जब बालक विक्रमाजीत छ- सात माह का हुआ तो उनके पिता सकुटुम्ब बनारस की यात्रा को गये । वहाँ के पुजारी ने स्वप्न कीबात कहकर बालक का नाम बतारसीदास रखने को कहा और विक्रमाजीत बनारसीदास कहे जाने लगे । उन्होंने आठ वर्ष की अवस्था में पढ़ना आरंभ किया । नौ वर्ष की उम्र में सगाई तथा ग्यारह वर्ष के होते-होते शादी कर दी गई । पुण्य-पाप के विचित्र संयोग ने कवि को यहाँ भीनही छोडा । जिस दिन शादी कर घर लौटे, उसी दिन उनकी बहिन का जन्म और नानी का मरण उसी घर में एक साथ हुआ ।

नानो मरन सुता जनम, पृत्रबधू आगोौन।
तीनों कारज एक दिन, समए एक ही भौन ॥ १०७॥।
यह संसार बिडस्बना, देखि प्रगट दुख खेद ।

चतुर चित्त त्यागी भए, मृढ़ न जानहि भेद ॥ १०८॥।* विविध विध्नो से बीच मे ही छूटी हुई पढाई को उन्होंने चौदह वर्ष की उम्र मे प० देवदत्तजी के पास आरभ की, किन्तु शीघ्र हीआसिख बन गये और उनका जीवन इस प्रकार का हो गया :-

के पढ़ना क॑ आसिखो, मगन दुह॒ रस माहि ।

खान-पान की सुध नही, रोजगार किछू नाहि ॥ १८० ॥।९ ऐसी हालत कवि की करीब दो वर्ष तक रही? । इसी समय कवि ने एक श्यूगार रस प्रधान रचना भी की* जिसे कवि ने स्वयं बाद में गोमती में डुबो दिया । इसी बीच जब वे अपनी पत्नी को लेने ससुराल गये हुए थे, वहीं अशुभोदय से उनको भयंकर कुष्ठ रोग हो गया। मनोहर शरीर महा अद्ध कथानक, पृष्ठ १३

बही, पृष्ठ २१

3 ऐसी दसा बरस द्वू रही । मात पिता को सीख न गही । करि आसिखी पाठ सब पठे । सबत सोलह से उनसठे ॥ १८१॥। - अर््ध कथानक, पृष्ठ २१ ब्र्‌

पोथी एक बनाई नई। मित हजार दोहा चौपई ॥ १७८ ॥
तामें नवरस-रचना लिखी । पे बिसेस बरनन आसिखी ॥।
ऐसे कुकवि बनारसि भए । मिथ्या ग्रथ’ बनाए नए ॥ १७६ ।।

अर्ड्ध कधानक, पृष्ठ २० दुर्गंध से भर गया, अंग-प्रत्यंग में अअणित विस्फोट हो गये । सभी नाक-भौ सिकोडने लगे, केवल पत्नी और सास ने सेवा की । इसका स्पष्ट उल्लेख कवि ने इस प्रकार किया है

भयौ बनारसिदास-तनु, कुष्ठरूप सरबंग।
हाड हाड उपजी बिथा, केस रोम भुव-भग ॥ १८५ ॥
बिस्फोटक अगनित भए, हस्त चरन चौरग।
कोऊ नर साला ससुर, भोजन करे न सग ॥ १८६ ॥
ऐसी असुभ दसा भई, निकट न आवे कोइ ।

सासू और बिवाहिता, करहि सेव तिय दोइ ॥ १८७ ॥* समय पाकर कवि कुष्ठरोग और आसिखी दोनो से मुक्त हुए और उन्होंने इस बात को स्वीकार भी किया है -

कहैं दोष कोउ न तज॑, तजे अवस्था पाइ।

जैसे बालक की दसा, तरुन भए मिटि जाइ ॥ २७२ ॥।*

विक्रम सवत्‌ १६६७ से कबि का व्यापारिक जीवन प्रारंभ हुआ ।

लक्ष्मी वसति व्यापारे’ इस लोकोक्ति के अनुसार कवि को पूजीपति होना चाहिए था। उनके यहाँ तीन पीढियों से व्यापार चलता था। उनके पितामह मूलदासजी, पिता खरगसेनजी एवं स्वय ने भी कभी जवाहरात का, कभी कपडे का, कभी घी-तेल आदि का क्रय-विक्रय किया; किन्तु कृवि को व्यापार मे सफलता नही मिली । उन्हें अनेक विपत्तियाँ उठानी पडी, फिर भी उन्होने अपना संतुलन नही खोया और वे सघर्षो से जूभते रहे । उनका व्यापारिक जीवन चौबीस वर्ष की उम्र मे प्रारभ हुआ, तब उन्होंने आसिखो करना छोड दिया था । अत पिता ने प्रसन्न होकर इन्हे व्यापार के लिए जौनपुर से आगरा भेजा था। साथ ही बहुत से जवाहरात, बीस मन घी, दो कुप्पे तेल और बहुत सा कपडा व्यापार के लिए दे दिया। दुर्भाग्यवश सारा सामान बर्बाद हो गया - कुछ चोरी मे गया, कुछ खो गया और कुछ मे हानि उठानी पडी । विक्रम सवत्‌ १६७३ मे पिता का देहान्त हो जाने से इन्ही पर पूरे परिवार का भार आ पडा । जो भी व्यापार किया - किसी मे भी सफलता नही मिली और इसी उतार-चढाव में पूरा जीवन व्यतीत हुआ, किन्तु जीवन के अन्तिम समय मे उन्हे आथिक स्थिरता प्राप्त हो गई थी । $ अर कथानक, पृष्ठ२१ २ वही, पृष्ठ ३१ कवि के जीवन में आये आ्थिक उतार-चढ़ाव और सकट कुछ तो कवि के व्यक्तिगत जीवन के परिणाम हैं, पर अधिकाश तत्कालीन राज- नीतिक और सामाजिक परिस्थितियों कीविषमता के परिणाम लगते है । यातायात की परेशानियाँ, चोरों-डाकुओं-ठगो का निराबाध विचरण, नवाबों की लूट-पाट, बीमारियों का प्रकोप आदि ऐसी स्थितियाँ थीं- जियके दुखद परिणाम कवि को ही नही, उस समय के सभी नागरिकों को उठाने पड़ते होंगे । अद्धं कथानक मे वणित जौनपुर के नवाब किलीच का जौहरियों पर अत्याचार इसका प्रमाण है, जिसके शिकार कवि के पिता खरगसेन भी हुए थे* । ऐसी आशका होते ही लोग गाव छोडकर भाग जाते थे । कवि का परिवार कई बार इस प्रकार भागा ! कवि को विभिन्न यात्राओं में जो कष्ट उठाने पड़े, वे सभी यात्रियों के कष्ट थे। वे सब उस समय की सामाजिक स्थिति को व्यक्त करते है । कवि को पर्याप्त शिक्षा प्राप्त न हो पाने केकारण भी तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों मे खोजे जा सकते है। कवि का जन्म वणिक्‌ कुल में हुआ था और उस समय वणिक्‌-पुत्र का पढना-लिखना अच्छा नहीं माना जाता था । कवि का अध्ययन-प्रिय होना एक दुर्गग समझा गया था और इसके लिए उन्हे सीख दी जाती थी :-

आए नगर जौनपुर फेरि । कुल कुटब सब बंठे घेरि ।
गुरुजन लोग देहि उपदेस । आसिखबाज सुने दरबेस ॥ १६६ ॥
बहुत पढे बांभन अरु भाट । बनिकपुत्र तो बंढे हाट ।
बहुत पढ़े सो माँगे भोख ५ मानहु पुत बड़ेकी सीख ॥ २०० ॥

$ बिपदा उदे भई इसबीच ॥ पुरहाकिम नौवाब किलीच ॥ ११० ॥ तिन पकरे सब जौहरी, दिए कोठरी माहि । बडी वस्तु माँग कछू, सो तो इनपे नांहि ॥१११॥। एक दिवस तिनि कोप करि, कियौो हुकम उठि भोर । बाधि-बाधि सब जोहरी, खड़े किए ज्यों चोर ॥११२।॥ हने कटीले कोररे, कीने मृतक समान । दिए छोड तिस बार तिन, आए निज-निज थान ॥ ११३ ॥ आईइ सबनि कीनौ मतौ, भागि जाहु तजि भौन । तिज निज परिगह साथ ले, पर काल-मुख कौन ॥ ११४ ॥ यहु कहि भिन्न-भिन्न सब भए । फ़ूटि फाटिक चहुदिसि गए । खरगसेन ले निज परिवार ।आए पच्छिम गगापार ॥ ११५ ॥ -अद्धं कथानक, पृष्ठ १३-१४

ग्रद्ध कथानक, पृष्ठ २३

अद्धं शिक्षित होने कादूसरा कारण छोटी उम्र की शादियाँ थी ।

कवि ग्यारह वर्ष की उम्र में ही ग्रहस्थ बन गये थे ।

कवि का धामिक जीवन प्रारभ में परंपरागत रूढ़िग्रस्त ही रहा ।

यद्यपि वे जन्म से श्र ताम्बर थे, तथापि आ्थिक स्थिति सुधारने के लिए वे भीख माँगने मे किसी देव विशेष से बध कर नहीं चले । जहाँ भी काल्पनिक संभावना दिखी, वही हाथ पसारे बिना न रहे; पर कही भी सफलता नही मिली । विक्रम सवतु १६८० में ३७ वर्ष की अवस्था में उनके धामिक जीवन परे नई क्राति हुई। उन्हे अरथमलजी ढोर का सयोग मिला और उन्होने उनको पाडे राजमलजी द्वारा लिखित समयसार की टीका पढने की प्रेरणा ही नही की, ग्रथ भी सामने रख दिया । बनारसीदास उसको पढ़कर बहुत प्रभावित हुए, किन्तु उसका मर्म तो जान नही पाये और स्वच्छन्द हो गये । जिसका कवि ने यो स्पष्ट उल्लेख किया है :-

तब तहा मिले अरथमल ढोर । करे अध्यात्म बाते जोर ।
तिलि बनारसीसौ हित कियौ । समैसःर नाटक लिखि दियौ ॥ ५६२ ॥
राजमल्लने टीका करी । सो पोथी तिनि आगे घरी।
कहै बनारसीसौ तृ बाचु । तेरे मन आवेगा सांचु ॥५6३॥।
तब बनारस बाचे नित्त । भाषा अरथ बिचारे चित्त ।
पावे नहीं अध्यातम पेच । माने बाहिज किरिआ हेच ॥ ५६४ ॥
करनीकौ रस मिटि गयो, भयोौ ने आतमस्वाद ।
भई बनारसिकी दसा, जथा ऊठकौ. पाद ॥५६५॥
ऐसी दसा भई एकत । कहो कहा लौ सो बिरतत ॥ ५६६ ॥
नगन होहि चारो जनें, फिरहि कोठरी भाहि।

कहहि भए भुनिराज हम, कछू परियग्रह नांहि ॥६०३॥*१ उक्त स्थिति के कारण कवि की बहुत आलोचना हुई। लोग उन्हे खोसरामती’ कहने लगे । यद्यपि इसमे उनके साथी और भी थे, पर बदनामी बनारसीदासजी की विशेष हुई - क्‍योंकि वे पंडित नाम से विख्यात थे ।समाज पडितो के आचरण के प्रति सदा से ही विशेष सजग रहा है। _$ अर्द्ध कथानक, पृष्ठ६६

वही, पृष्ठ ६७

बात उतनी नहीं थी, जितनी बदनामी कवि को उठानी पड़ी । इसकी चर्चा कवि ने इस प्रकार की है:-

कहहि लोग श्रावक अरु जतो, बानारसी खोसरामती।
तीनि पुरुषकी चले न बात । यह पडित ताते विख्यात ।६०५॥।
सुनी कहै देखी कहै, कलपित कहै बनाइ।

'. दुराराधि एजगत् जन, इन्हसौं कछु न बसाइ ॥६१०॥।" यह दशा कवि की बारह वर्ष तक रही । इस बीच कवि ने बहुत सी कविताएँ लिखी जो बनारसी विलास मे संग्रहीत हैं। कवि ने उनकी प्रामाणिकता के बारे में लिखा है कि यद्यपि मेरी दशा उस समय निश्चयाभासी, स्वच्छन्दी, एकाती जैसी थी; तथापि जो कुछ उस समय लिखा गया वह स्यादुवाद वाणी के अनुसार ही था ।

सोलह से बानवे लौ, कियौ नियत-रस-पान ।
पे कबीसुरी सब भई, स्थादवाद-परवांन ॥ ६२६।।

इसके बाद अनायास ही आगरा में पंडित रूपचदजी पांडे काआगमन हुआ और उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर बनारसीदासजी सहित उनके सभी अध्यात्मी साथी उनका प्रवचन सुनने गये, जिसमें उन्होंने गोम्मटसार ग्रंथ कावाचन करते हुए ग्रुणस्थान अनुसार क्रिया का विवेचन किया । निश्चय-व्यवहार का स्वरूप भी सही-सही समभाया और कवि को उनके ही द्वारा स्यादुवाद का सच्चा ज्ञान हुआ, सत्य की प्राप्ति और आत्मा का अनुभव हुआ । जिसका वर्णन कवि ने बडी ही श्रद्धा केसाथ किया है:- अनायास इस ही समय, नगर आगरे थान । रूपचंद पंडित ग्रुनी, आयो आगम-जान ॥ ६३० ॥ तिहुना साहु देहुरा किया। तहां आइ तिनि डैरा लिया ।। सब अध्यातमी कियौ बिचार । ग्रंथ बंचायौ गोमटसार ॥ ६३१॥ तार्म गुनथानक परवान । कह्मौ ग्यान अरु क्रिया-बिधान । जो जिय जिस गुन-थानक होइ । तेसी क्रिया करे सब कोइ ॥ ६३२ ॥ भिन्न भिन्न बिबरन बिस्तार । अंतर नियत बहिर बिबहार ।। सबकी कथा सब बिधि कही । सुनिके ससे कछुव न रही ॥ ६३३ ।॥ तब बनारसी औरे भयौ। स्यादवाद परिनति परिनयौ ।। पाडे रूपचंद गुर पास । सुन्यौ ग्रंथ मन भयौ हुलास ॥ ६३४ ॥ ) शरद्ध कथानक, पृष्ठ ६७-६८

फिरि तिस समै बरस द्वेबीच । रूपचदकौ आई मीच ॥।

सुनि सुनि रूपचंदके बेन । बानारसी भयौ दिढ़ जेन ॥ ६३५।॥।’ उसके बाद भी कवि ने अनेक कविताएँ लिखी - नाटक समयसार और अद्धं कथानक उसके बाद की ही रचनाएं है, किन्तु प्रामाणिकता की दृष्टि से कविवर पहले की व बाद की रचनाओ को एक सी मानते हैं:-

तब फिरि और कबीसुरी, करी अध्यातम माहि।
यह वह कथनी एकसी, कहु बिरोध किछु नांहि ॥ ६३६ ॥
हृदेमाहि कछू कालिमा, हुती सरदहन बीच।

सोऊ मिटि समता भई, रही न ऊच न नीच ॥ ६३७ ॥* इसके बाद कविराज का चित्त स्थिर और शान्‍्त हो गया । वे जो पाना चाहते थे, उन्हे वह मिल गया था । उन्होने यह हृढतापूर्वक स्वीकार कर लिया था कि सत्यपथ “निर््रथ दिगम्बर’ ही है। अध्यात्म चितन-मनन के साथ-साथ उन्होने साहित्य निर्माण एव शिथिलाचार के विरुद्ध शुद्ध अध्यात्म मार्ग का प्रचार व प्रसार भी तेजी से आरभ कर दिया था । नाटक समयसार की चर्चा घर-घर में होने लगी थी । गली-गली मे लोग बनारसीदासजी द्वारा रचित समयसार नाटक के छन्द गुनगुनाया करते थे । कवि ने नाटक समयसार की प्रशस्ति मे इसका वर्णन इस प्रकार किया है.-

इहि विधि बोध-वचनिका फंली ।
समै पाय अध्यातम सेली ।।

प्रगगी जगमाही जिनवानी । घर-घर नाटक कथा बखानी ॥ २४ ॥॥३ सहज बुद्धि वालों ने तो इस परम सत्य को शीघ्रता से स्वीकार कर लिया था, किन्तु कुछ लोगों के पल्‍ले यह बात नही पड़ी थी .-

जहाँ तहाँ जिनवानी फंली ।
लखे न सो जाकी मति मैली ।।
जाक॑ सहज बोध उतपाता ।

सो ततकाल लखे यह बाता ॥ ३०।॥।४ १ अरद्ध कथानक, पृष्ठ ७०

बही, पृष्ठ ७१

४ बही, पृष्ठ ४१८ पंडित बनारसीदासजी का बढता प्रभाव न तो श्रताम्बरों को ही सुहाया और न ॒भट्ठारकपंथी शिथिलाचारी दिगम्बरों को ।अतः दोनों ओर से बनारसोदास द्वारा सचालित आध्यात्मिक क्रान्ति का विरोध हुआ, पर ज्यो-ज्यों विरोध ने तेजी पकडो त्यों-त्यों यह आध्यात्मिक पंथ, जिसे बाद में तेरापंथ भी कहा गया, फलता-फूलता गया और आगे चलकर महा- पडिल टोडरमलजी का सहारा पाकर देशव्यापी हो गया । श्रताम्बराचायय महामहोपाध्याय मेघविजय ने वि० सं० १७५७ के लगभग आगरा मे रहकर एक .युक्तिप्रबोध” नामक प्राकृत ग्रथ स्वोपज्ञ संस्कृत टीका सहित बनाया था । उसका उद्देश्य बनारसी मत खण्डन ही था । उसका दूसरा नाम भी “बनारसी मत खण्डन’ रखा है। उसमें लिखा है :-

तम्हा दिगम्बरण एए भट्ठटारगा वि णो पुज्जा।
तिलतुसमेत्तो जेसि परिग्गहो णेव ते गुरुणो ॥ १६ ॥

बनारसी मत वालो की दृष्टि में दिगंबरों के भट्टारक भी पूज्य नही है। जिनके तिल-तुष मात्र भी परिग्रह है, वे गुरु नही हैं! । महाकवि बनारसीदास का प्रभाव इतना बढ गया था कि जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क मे आता, उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता । व्यापारी लोग व्यापार के लिए आगरा आते थे और वहाँ से आध्यात्मिक रुचि लेकर वापिस जाते थे । इन आध्यात्मिक लोगों की प्रवृत्ति निरन्तर अध्ययन-मनन-चिन्तन और तत्त्वचर्चा करने की रहती थी। इस संदर्भ में पडित बखतराम साह अपने ‘मिथ्यात्व खण्डन’ नामक ग्रंथ में लिखते हैं.-

किते महाजन आगरे, जात करण व्यौपार।
बनि आवे अध्यातमी, लखि नूतन आचार ॥ २६ ॥

ते मिलिके दिन रात बाचे चरचा करत नित॥ २७॥।*

कुन्दकुन्दाचार्य देव का’समयसार’ महान् क्रातिकारी ग्रंथराज है।

उसने लाखों लोगों कोसमय-समय पर सत्पथ मे लगाया है। महाकवि बनारसीदास के ठीक तीनसौ वर्ष बाद एक और श्र ताम्बर साधु श्री कानजी स्वामी को इसने दिगम्बर धर्म कीओर आकर्षित ही नही किया, वरन्‌ उनके माध्यम से अध्यात्म के क्षेत्र मेंआज एक महान् क्रांति उपस्थित कर दी है। आध्यात्मिक सतृपुरुष श्री कानजी स्वामी के माध्यम सेआज फिर समयसार जन-जन की वस्तु बन गया है और घर-घर में पहुँच गया है । $ पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कत्तु त्व, डॉ० हुकमचंद भारिल्ल, पृष्ठ १६

बही, पृष्ठ २१

उन्होंने तोसमयसार और कुन्दकुन्दाचाय के प्रवचनसार आदि पंचग्रंथ- राजों को संगमरमर के पाटियों पर उत्कीर्णं कराकर परमागम मंदिर में प्रतिष्ठित कर, उन्हे भौतिक दृष्टि सेभीअमर कर दिया है। आध्यात्मिक दृष्टि सेतो जैनधारा में महाकवि बनारसीदास का क्रांतिकारी आध्यात्मिक सतृपुरुष के रूप में महत्त्वपूर्ण स्थान हैही, किन्तु साहित्य के क्षैत्र मेंभोउनका अभूतपूर्व योगदान है। उनका अद्धं कथानक हिन्दी आत्मकथा साहित्य का आद्य ग्रथ है, जिसमें उनका स्वय का चरित्र समस्त विशेषताओ और कमजोरियो के साथ दर्पण की भांति चित्रित है। सम्पूर्ण साहित्यिक गरिमाओं से युक्त समयसार नाटक हिन्दी-साहित्य की बेजोड़ कृति है,जिसने उन्हे महाकवि तुलसीदास के समकक्ष प्रतिष्ठापित किया और जिसके छुंद रामचरितमानस की भाँति ही जन-जन के गेय बन गये थे । कहा जाता है कि उनका महाकवि तुलसीदासजी से भी एक बार मिलान हुआ था । तुलसीदासजी ने उनको रामायण की एक प्रति भेंट की थी, जिस पर बनारसीदासजी ने भी निम्न छन्द लिख कर उन्हें भेंट किया था :- बिराज रामायण घट माहि। मरमी होय मरम सो जाने, मूरख माने नाहि । विराजे रामायण ० ॥१॥। आतम राम ज्ञान गुन लछमन, सीता सुमति समेत । शुभोपयोग बानरदल मडित, वर विवेक रन खेत ।। विराजे० ॥२।। ध्यान धनुष टकार शोर सुनि, गई विषयदिति भाग । भई भस्म मिथ्यातम लका, उठी धारणा आग ॥ विराजे० ॥ ३ ॥ जरे अज्ञान भाव राक्षसकुल, लरे निकाछित सूर। जूमे राग-द्ेष सेनापति, ससे गढ़ चकचूर ।। विराजे० ॥ ४ ॥ विलखत कुभकरण भव विश्रम, पुलकित मन दरयाव । थकित उदार वोर महिरावण, सेतुबंध. समभाव ॥ विराजै० ॥५॥ मूछित मदोदरी दुराशा, सजग चरन हनुमान् । घटी चतुर्गेति परणति सेना, छुटे छपकगुण बान ।। विराजे० ॥ ६ ॥ निरखि सकति गुन चक्र सुदर्शन, उदय विभीषण दीन । फिरे कबंध मही रावण की, प्राणभाव शिरहीन ।। विराजै० ॥ ७ ॥ इह विधि सकल साधु घट अंतर, होय सहज सग्राम । यह ॒विवहारहृष्टि. रामायण, केवल निश्चय राम ।॥। विराजै० ॥ 5 ॥१ महाकवि तुलसीदासजी ने भी भगवान् पाश्च नाथ की स्तुति में कुछ छन्‍्द लिखे थे जो कविवर को सुनाये और भेट किये थे । १ अनारसी विलास, पृष्ठ २३३ कविवर का देहोत्सगंकाल अविदित है, किन्तु तत्सम्बन्ध में एक किव- दंती प्रसिद्ध हैकि अन्तकाल में उनका कंठ रुघध गया था, जिस कारण वे बोल नही सकते थे, पर वे ध्यानमग्न और चितनरत थे । जब वे संभावित जीवनकाल को भी पार करते जा रहे थे तो समीपस्थ लोगों में इस प्रकार चर्चा होने लगी कि कवि के प्राण माया-कुदुम्बियों में अटके हैं। उनकी आशका के निवारण हेतु उन्होंने अपने जीवन का अंतिम छुंद इस प्रकार लिखा था :-

ज्ञान कुतकका हाथ, मारि अरि मोहना ।
प्रगटयौ रूप स्वरूप, अनंत सु सोहना ॥।
जा परजेको अंत, सत्य कर मानना।
चले बनारसिदास, फेर नहि आवना ॥।

कविवर बनारसीदास की उपलब्ध पद्म रचनाएँ चार हैं। बनारसी विलास, नाममाला, अद्धं कथानक और समयसार नाटक । इसके अतिरिक्त उनकी एक रचना नवरस नामक भी थी जिसे कवि ने गोमती में बहा दिया था । यदि वह आज उपलब्ध होती तो हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती । यह रचना भी कोई छोटी-मोटी रचना नहीं थी, एक हजार दोहा-चौपाइयो मे लिखी गई थी ।

पोथी एक बनाई नई। मित हजार दोहा चौपई ।।

तामैं नवरस-रचना लिखी । पे बिसेस बरनन आसिखी ।॥।१ बनारसी विलास :- इस कृति में कवि की छोटी-मोटी अडतालीस रचनाओं का सग्रह है । इसमे कवि के द्वारा अनूदिता कल्याण मंदिर स्तोत्र आदि रचनाएँ भी आ जाती है । ये रचनाएँ धामिक, सैद्धान्तिक, आध्यात्मिक एवं नीत्यात्मक हैं। इनमे कविवर की बहुमुखी प्रतिभा, काव्यकुशलता एवं अगाध विद्धत्ता प्रतिफलित हुई है । नाममाला :- यह हिन्दी का एक पद्य-बद्ध कोश है । कोशों की दृष्टि से यह एक असाधारण रचना है। यह कविवर की प्राप्त रचनाओं में सर्वे प्रथम कृति है जोआश्विन सुदी दशवी वि० स० १६७० को लिखी जा चुकी थी । इसका आधार प्रसिद्ध कवि घनञ्जय की संस्कृत नाममाला है, किन्तु यह उसका अविकल अनुवाद नही - इसमे भी कवि की मौलिकता के दर्शन किये जा सकते हैं। ॥ अर्द्धों कथानक, पृष्ठ २० श्र अद्धं कथानक :- इसमें कवि का पचपन व का निजी जीवन प्रस्तुत किया गया है। कवि ने इसका नाम अद्धं कथानक रखने का कारण स्पष्ट करते हुए लिखा हैकि वर्तमान में मनुष्य की आयु ११० वर्ष मानी गयी है और यह पचपन वर्ष की कहानी है, अतः इसका नाम अद्धं कथानक सार्थक है" । इसके सम्बन्ध में हिन्दी साहित्य केअधिकारी विद्वान् श्री बनारसीदास चतुर्वेदी लिखते हैं:- “हिन्दी साहित्य केइतिहास में इस ग्रथ का एक विशेष स्थान तो होगा ही, साथ ही इसमें वह संजीवनी शक्ति विद्यमान है जो इसे अभी तक कई सौ वर्षों तक जीवित रखने मे स्वेथा समर्थ होगी । सत्यप्रियता, स्पष्ट- वादिता, निरभिमानता और स्वाभाविकता का ऐसा जबरदस्त पुट इसमे विद्यमान है कि साहित्य की चिरस्थायी सम्पत्ति मे इसकी गणना अवश्यमेव होगी । हिन्दी का तो यह सर्वप्रथम आत्मचरित हैही, पर अन्य भारतीय भाषाओ में इस प्रकार की और इतनी पुरानी पुस्तक का मिलना आसान नही है’ । आत्मकथा साहित्य की सबसे बडी विशेषता होती है - लेखक की ईमानदारी और अपनी कमजोरियो को खुले दिल से स्वीकार करने का साहस । उक्त कसौटी पर जब हम अद्ध कथानक को कसते हैतो वह पूरा खरा उतरता है। कवि ने कोई भी बात चाहे वह अच्छी हो या बुरी, उसे छिपाने का प्रयत्न कही भी नहीं किया है, जो कुछ अनुभव किया और याद रहा, सब कुछ बिना किसी सकोच के लिख दिया है। कवि अपनी इस कहानी को स्थूल घटनाओ का स्थूल दिग्दशेन मानता है । उसका विचार है कि प्रतिदिन की घटने वाली अनेक छोटी-मोटी घटनाएँ और आत्मा में निरन्तर उत्पन्न होने वाले विकारी-अविकारी भावों का उतार-चढाव तो मात्र स्वंज्ञ हीजान सकते हैऔर यह बात कवि की शत-प्रतिशत सत्य भी है । कवि के ही शब्दों मे :-

एक जीवको एक दिन, दसा होहि जेतीक ।
सो कहि सके न केवली, जाने जद्यपि ठीक ॥ ६६० ॥
मनपरजंधर अवधिधर, कराहि अलप चितौन ।
हमसे कीट पतगकी, बात चलावे कौन ॥ ६६१ ॥

अद्धं कथानक, पृष्ठ ७५

बोरवाणी : कविवर बनारसीदास विशेषाक, वर्ष १५, अक ८-६, पृष्ठ २२

तातें कहत बनारसी, जी की दसा अपार।

कछू थूलमे थूलसी, कही बहिर बिबहार ॥६६२।॥।" अद्धंकथानक में तत्कालीन सामाजिक, राजनंतिक और धामिक स्थितियों का चित्रण बड़ी खूबी से हुआ है, जो तत्कालीन सामाजिक चित्र पाठकों के सामने स्पष्ट रख देता है । समयसार नाटक :- प्रस्तुत ग्रंथ कवि की सर्वोत्कृष्ट रचना है, जिसने उसे आध्यात्मिक जिज्ञासुओं की दृष्टि में आचाय॑े कुन्दकुन्द और अमृत्ंद्र की श्रेणी में लाखड़ा किया है। समयसार ग्रंथराज लगभग २००० वर्ष पुरानी आचार्य कुन्दकुन्द की कृति है। आचार्य कुन्दकुन्द का स्थान भगवान् महावीर और गौतम गणधर के तत्काल बाद आता है, जेंसा कि प्रत्येक जैन द्वारा स्वाध्याय के आरंभ में प्रतिदिन बोले जाने वाले निम्न इलोक से स्पष्ट है:-

मंगल भगवान्‌ बीरो, मंगलं गौतमों गणी ।
मगन कुन्दकुन्दाद्यो, जेनधर्मोषस्तु मद्भलम्‌ ।।

आचाय॑ कुन्दकुन्द के ग्रंथों में ग्रथराज समयसार का स्थान सर्वोच्च है । इस ग्रथ पर सस्कृत भाषा मे अनेक टीकाएँ लिखी गयी, जिनमें आचाये अमृतचद्र द्वारा लिखित आत्मख्याति टीका’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है । आत्मख्याति के बीच-बीच मे आचाये अमृतचद्र नेयथास्थान २७५ काव्य संसक्ृत भाषा के विभिन्न छन्दो में लिखे है, जो’समयसार कलश’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। येकलश आध्यात्मिक अमृत-रस से भरे हुए है, जिन्हे पढ़कर पाठक रसमग्न और आनन्द विभोर हुए बिना नही रहता । उक्त कलशो पर आज से लगभग ४०० वर्ष पूर्व पांडे राजममलजी ने एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण ‘बालबोधनी टीका’ लिखी । उक्त टीका के आधार पर ही कविवर बनारसीदास ने अपने मित्रो की प्रेरणा से प्रस्तुत समयसार नाटक की रचना की है, जिसका उल्लेख कविवर ने इस प्रकार किया है :-

अब यह बात कहें है जैसे, नाटक भाषा भयौ सु ऐसे ।
कुदक्‌दमुनि मूल उधरता, अमृृतचद्र टीकाके करता ॥२१।॥
समेंसार नाटक सुखदानी, टीका सहित संस्कृत बानी ।
पडित पढ़ें सुदिढमति बुक्के, अलपमतीकौ अरथ न सूम ॥ २२ ॥
पांडे राजमल्ल जिनधर्मी, समेसार नाटकके मर्मी।
तिन गिरथकी टीका कीनी, बालबोघ सुगम कर दीनी ॥२३॥।

अद्धं कथानक, पृष्ठ ७३

श्ड नगर आगरे भांहि विख्याता, कारन पाइ भए बहु ग्याता। पच पुरुष अति निपुन प्रवीने, निसिदिन ग्यान-कथा रस-भीने ॥ २५ ॥ रूपचंद. पंडित प्रथम, दुतिय चतुर्मज नाम । तृतिय भगोतीदास नर, कौररपाल गुन धाम ॥ २६ ॥ घमंदास ये पंचजन, मिलि बठे. इक ठौर । प्रमारथ-चरचा करे, इनके कथा न और ॥ २७ ॥ बहुत बढाई कहांलौ कीजे, कारिजरूप बात कहि लीजे। नगर आगरे मांहि विख्याता, बानारसी नाम लघु ग्याता ॥३२॥। तामैं कवितकला चतुराई, कृपा करें ये पाचों भाई। पच प्रपंच रहित हिय खोले, ते बनारसी सौ हँसि बोले ॥३३॥।॥ नाटक समेसार हित जीका, सुगमरूप राजमली टीका। कवितबद्ध रचना जो होई, भाषा ग्रथ पढें सब कोई ॥ ३४ ॥ तब बनारसी मनमहिं आनी, कीज तो प्रगटे जिनवानी । पच पुरुष की आज्ञा लीनी, कवितबद्ध की रचना कीनी ॥ ३५ ॥" यद्यपि यह ग्रंथ मूल-ग्रंथ समयसार, आत्मख्याति टीका, कलश और बालबोधनी टीका के आधार पर लिखा गया है, तथापि यह मात्र पद्यानुबाद नहीं है, इसमें मौलिकता एवं स्वतंत्र प्रवाह विद्यमान है। मूल रूप से पढने पर यह किन्ही ग्रंथों का पद्मयानुवाद सा प्रतीत न होकर एक मौलिक कृति का आनन्द देता है। मूल ग्रंथो में जोविषय नही आये है, ऐसे विषय भी इसमें प्रतिपादित हैं, बीच-बीच में भी और ग्रंथ के अन्त में स्वतंत्र अधिकार के रूप में भी। इसमें गुणस्थान अधिकार एक ऐसी ही रचना है, जिसे कवि ने इस ग्रंथ के अन्त में जोडना अत्यन्त आवश्यक समझा, क्योकि कवि इस मामले मे भुक्तभोगी था । गुणस्थानों का समुचित ज्ञान न होने से इस ग्रंथ को पढकर भी वह बारह वर्ष तक अंधकार में रह चुका था । अत’ इसमें कवि ने विस्तार से गुणस्थानों का वर्णन करते हुए तदनुसार आचरण की दृष्टि से ग्यारह प्रतिमाओं के स्वरूप आदि विषयों को विस्तार से स्पष्ट किया है।

समयसार नाटक अकथ, अनुमव-रस-भंडार ।

याको रस जो जानहीं, सो पावें भव-पार ॥१॥।* २ वही, पृष्ठ ४२३ श्५्‌ प्रस्तुत ग्रंथ क्या भाषा, क्या भाव, कया प्रतिपाद्य और क्या शैली ; सभी दृष्टि से अत्यन्त प्रोढ रचना है। कवि की यह आध्यात्मिक अनुपम कृति उसे अमर बनाने में पूर्ण समर्थ है और कवि का ऐसा विश्वास भी हैं। प्रस्तुत ग्रंथ कीविषयवस्तु के सम्बन्ध में विस्तार भय से यहाँ कुछ लिखना उचित नही लगता, क्योकि वह मूलरूप से पठनीय है । मेरा पाठकों से विनम्र अनुरोध हैकि वे इसे मूलरूप से आद्योपान्त पढ़े । यद्याप बनारसीदास मूलरूप से कवि हैं,तथापि गद्य का क्षेत्र भी उनसे अछूता नही रहा है। यद्यपि उन्होंने बहुत कम गद्य लिखा है- गद्य में उनकी छोटी-छोटी सी दो रचनाएँ प्राप्त हैं- परमाथे वचनिका और उपादान- निमित्त की चिट्ठी, पर गद्य के प्रारंभिक काल की दृष्टि से गद्य साहित्य के इतिहास में उनका अपना एक स्थान है, जिसकी उपेक्षा सं भव नही है; क्योंकि उस समय गद्य अपनी प्रारंभिक अवस्था में था। समकालीन गद्य की तुलना में उनका गद्य बहुत अधिक परिमाजित और सशक्त है । बनारसीदास मूलतः भ्राध्यात्मिक कवि है। वे भक्ति को मुक्ति का कारण नही मानते हैं। उनकी दृष्टि में सर्वाधिक महत्त्व आत्मानुभव का है, अनुभव कोवे मुक्ति का मार्ग ही नही, मोक्षस्वरूप मानते हैं। वे लिखते हैं -

अनुभव चिन्तामरिंग रतन, अनुभव है रस कूप ।

अनुभव मारग मोखको, अनुभव मोख सरूप ।।*

ग्रनुभव से उनका तात्पर्य आत्मानुभव से है, लौकिक अनुभव से नही ।

उन्होने अनुभव की परिभाषा इस प्रकार स्पष्ट की है:-

वस्तु विचारत घ्यावतें, मन पावे विश्राम ।

रस स्वादत सुख ऊपजे, अनुभो याफों नाम ॥।* वस्तु से आशय निजात्मवस्तु से हैऔर रसस्वादत का भाव ग्रात्मा- ननन्‍्द के भ्रनुभव से है । बनारसीदास को मात्र भक्त कवि मानने वालों को उनके निम्न- लिखित विचारों पर ध्यान देना चाहिए :-

लीन भयो बिवहारमें, उकति न उपजे कोइ ।
दोन भयौ प्रभुषद जपे, मुकति कहांसों होइ ?।।
प्रभु सुमरो पूजो पढ़ो, करो विविध बियहार ।

सोख सरूपी झातमा, ग्यानगम्य निरधार ॥।* वही, पृष्ठ १३

तक वही, पृष्ठ १४४

वे भक्ति की श्रपेक्षा ज्ञान को मुख्यता देते हैं। उनकी मान्यता है- वयान बिता सिव पंथ न सूके ।।" बाह्यक्रियाकाण्ड को भी वे महत्त्व नहीं देते हैं। उनका पूरा बल ज्ञान पर है -

बहुविधि क्रिया कलेससों, सिब पद लहै न कोइ ।
ग्यान कला परकाशसों, सहज मोख पद होइ ॥।
ग्यान कला घट घट बसे, जोग ज्ञुगति के पार।

निज निज कला उदोत करि, मुकत होइ संसार ॥।* ज्ञान से आशय उनका भेदज्ञान से है और श्रात्मा की शुद्धता के लिए वे इसे प्रावश्यक मानते है :-

भेदग्यान साबू भयौ, समरस निरमल नीर ।

धोबी ग्रतर झ्रातमा, घोवे निजगुगग चीर ॥8॥3

भेद ग्यान सवर जिन्हे पायौ । सो चेतन सिवरूप कहायो ।।

भेदग्यान जिन्हके घट नाही । ते जड जीव बर्ध घट मांही ।5॥४ भेदज्ञान कीआवश्यकता वे तव तक स्वीकार करते हैं, जबतक कि मुक्ति प्राप्त न हो जाय :-

भेदग्यान तबलौ भलौ, जबलौं मुकति न होइ ।

परम जोति परगट जहाँ, तहाँ न विकलप होइ ॥ ७ ॥* यद्यपि उन्होंने भगवान् की भक्ति में अनेक पद लिखे, तथापि वे भक्ति को मुक्ति का कारगा नही मानते । भक्ति के सम्बन्ध मे उनका आदर्श झ्राचाय ग्रमृतचद्र की परचास्तिकाय की ‘समयव्याख्या’ नामक टीका में व्यक्त निम्नलिखित विचार हैं.-

ग्रय हि स्थुललक्षतया केवलभक्तिप्राधानस्याज्ञानिनो भवति ।

उपरितनभूमिकायामलब्धास्पदस्यास्थान राग निषधार्थ तीम्नरागज्वर

विनोदार्थ वा कदाचिज्ज्ञानिनो5षपि भवतीति ॥।

वही, पृष्ठ १४६

3 बही, पृष्ठ १२७ वही, पृष्ठ १२६ वही, पृष्ठ १२६

पचास्तिकाय, गाथा १३६ की टीक।

मंगलाचरण

श्रीपरमात्मने नमः
पंडित बनारसीदासविरचित
भाषाटोका सहित

हिन्दो टीकाकारको ओरसे मंगलाचरण ( दोहा )

निज स्वरूपको परम रस, जामें भरो अपार ।
बन्दों परमानन्दसय, समयसार अविकार ॥ १ ॥
कुन्दकुन्द मुनि-चन्दवर, अमृतचन्द मुनि-हन्द ।
आत्मरसो बानारसी, सन्दों पद अरविन्द ॥ २ ॥
ग्रन्थका
रकी ओ रसे मंगलाचरण
श्री पाश्व नाथजीकी स्तुति

( वर्ण ३१, छन्द मनहर, चाल भंभराकी )

करम-भरम जग-तिमिर-हरन खग,
उरग-लखन-पग सिवमगदरसी’ ।
निरखत नयन भविक जल बरखत,
हरखत अमित भविकजन-सरसी ॥
मदन-कदन-जित परम-धरमहित,
सुमिरत भगति भ्रगति सब डरसी ।
सजल-जलद-तन मुकुट सपत-फन,
कमठ-दलन जिन नमत बनरसी ॥ १ ॥
शबदार्थ:–खग (ख 5 आकाश, ग 5 गमन ) > सूर्य । कदनन्युद्ध ।
सजल & पानी सहित । जलद (जल & पानी, द < देनेवाले) > मेघ ।
सपत 5 सात ।

अर्थ :- जो संसार में करके श्रमरूप अंधकारकों दूर करनेके लिये सूर्यके समान हैं, जिनके चरणमें सांपका चिह्न है, जो मोक्षका मार्ग दिखानेवाले हैं, जिनके दर्शन करनेसे भव्य जीवोंके नेत्नोंसे आनंदके आँसू बह निकलते हैं ओर अनेक भव्यरूपोी सरोवर प्रसन्न हो जाते हैं, जिन्होंने कामदेवको युद्धमें हरा दिया है, जो उत्कृष्ट जेनधघर्मके हितकारो हैं, जिनका स्मरण करनेसे भक्तजनोंके सब डर दूर भागते हैं,जिनका शरीर पानोसे भरे हुए मेघके समान नीला है, जिनका मुकुट सात फणका है, १ इस छुन्दमे अन्त वर्णको छोड़कर सब वर्ण लघु है, मनहर छन्दमे “अंत इक गुरु पद अवशहि धरिकें’ ऐसा छन्दशास्त्रका नियम है । २ जब भगवान् पाश्च नाथ स्वामीकी मुनि अवस्थामे कमठके जीवने उपसर्ग किया था तब प्रभुकी राज्य-अवस्थामे उपदेश पाये हुए नाग-नागनीके जीवने धरणेन्द्र-पद्मावतीकी पर्यायमे उपसर्ग निवारण किया था और सात फनका सपं बनकर प्रमुके ऊपर छाया करके अखड जलवृष्टिसे रक्षा की थी, उसी प्रयोजनसे इन भगवानकी प्रतिमा पर सात फनका चिह्न प्रचलित है और इसीलिये कविने मुकुटकी उपमा दी है । जो कमठके जोवको असुर पर्यायमें परास्त करनेवाले हैं; ऐसे पाश्व नाथ जिनराजको (पंडित) बनारसोदासजी नमस्कार करते हैं ॥१॥॥

( छन्द छप्पय, इस छन्दमें सब वर्ण लघु हैं)

सकल-करम-खल-दलन,
कमठ-सठ-पवन कंनक-नग ।
घवल परम-पद-रमनत,
जगत्-जन-अमल-कमल-खग ।।
परमत-जलधर-पवन,
सजल-घन-सम-तन समकर ।
पर-अघ-रजहर जलद,
सकल जन-नत भव-भय-हर ॥
जमदलन नरकपद-छपकरन,
अगम अतट भवजलतरन ।
वर-सबल-मदन-वन-हरदहन,
जय जय परम अभयकरन ।१२१।
शबदार्थ :- कनक-नग (कनक सोना, नगन्‍्पहाड़) 5 सुमेरु।
परमत>जनमतके सिवाय दूसरे सब मिथ्यामत । नतल्वंदनीय । हरदहन
रुद्रकी अग्नि ।

अर्थ :- जो संपूर्ण दुष्टकर्मोंकी नष्ट करनेवाले हैं, कमठकी वायुके समक्ष मेरुके समान हैं, अर्थात्‌ कमठके जीवकी चलाई हुई तेज आंधीके उपसगंसे जो नहों हिलनेवाले हैं,निविकार सिद्धपदमें रमण करते हैं,संसारो जीवोंरूप कमलोंको प्रफुल्लित करनेके लिये सूर्यके समान हैं, मिथ्यामतरूपी मेघोंको उड़ा देनेके लिये प्रचण्ड वायुरुप हैं, जिनका शरीर पानीसे भरे हुए मेघके समान नोलवर्ण हे, जो जीवोंको समता देनेवाले हें, अशुभ कर्मोंकी धूल धोनेके लिये मेघके समान हैं, सम्पूर्ण जीबोंके द्वारा बन्दनोय हैं, जन्म-सरणका भय हरनेवाले हैं, जिन्होंने मृत्युकों जीता है, जो तरक गतिसे बचानेवाले हैं, जोबड़े ओर गम्भीर संसार सागरसे तारनेवाले हैं, अत्यन्त बलवान कामदेवके वनकों जलानेके लिये रुद्रकी’ अग्निके समान हैं, जोजीबोंको बिलकुल निडर बनानेवाले हैं; उन (पाश्व नाथभगवान् ) की जय हो ! !॥ २ ॥

(सवेया इकतीसा )

जिन्हिके वचन उर धारत जुगल नाग,
भए धरनिद पदुमावति पलकमें ।
जाकी नाममहिमासों कुधातु कनक करे,
पारस पान नामी भयो हैखलकमें ।।
जिन्हकी जनमपुरी-नामके प्रभाव हम,
अपनो स्वरूप लख्यो भानुसो भलकमें ।
तेई प्रभु पारस महारसके दाता अब,
दीज मोहि साता हगलीलाकी ललकमें ॥ ३ ॥

शब्दार्थ :- कुधातुलोहा । पारस पखान-पारस पत्थर । खलक जगत् । भलक>प्रभा ।महारस-अनुभवका स्वाद । साता-शान्ति ।

अर्थ :- जिनकी वाणी हृदयमें धारण करके सांपका जोड़ा क्षणभरमें धरणेन्द्र-पद्मावती हुआ, जिनके नामके प्रतापसे जगतमें पत्थर भी पारसके नामसे प्रसिद्ध हैजोलोहेकी सोना बना देता है, जिनको जन्मभूमिके नामके प्रभावसे हमने अपना आत्मस्वरूप देखा है–मानों सूर्यकी ज्योति ही प्रगट हुई है; वे अनुभव-रसका स्वाद देनेवाले पाश्व नाथजिनराज अपनो प्यारी खितवनसे (हृष्टिसे )हमें शान्ति देवें (॥३॥। ) यह वेष्णवमतका हृष्टात है । उनके मतमे कथन है कि महादेवजीने तीसरा नेत्र निकाला और कामदेवकों भस्म कर दिया । यद्यपि जैनमतमे यह वार्ता अप्रमाण है तथापि हृष्टान्त मात्र प्रमाण है ।

श्रो सिद्धस्तुति (अडिल्ल छन्द )

अविनासी अविकार परमरसधाम हैं ।
समाधान सरबवंग सहज अभिराम हैं।
सुद्ध बुद्ध अविरुद्ध अनादि अनंत हैं ।
जगत् शिरोमनि सिद्ध सदा जयवंत हैं ॥४।॥।

शब्दार्थ :- सरवग (सर्वांग)-सब आत्मप्रदेश । परमसुख-आत्मीय सुख । अभिराम-प्रिय ।

अर्थ :-जो नित्य ओर निविकार हैं, उत्कृष्ट सुखके स्थान हैं, साहजिक शान्तिसे सर्वाँग सुन्दर हैं,निर्दोष हैं,पूर्ण ज्ञानी हैं, विरोधरहित हैं, अनादि-अनन्त हैं; वे लोकके शिरोमणि सिद्ध भगवान् सदा जयवन्त होवें ॥ ४ ॥

श्री साधुस्तुति (सवेया इकतीसा )

ग्यानको उजागर सहज-सुखसागर,
सुगुन-रतनागर विराग-रस भन्यो है ।
सरनको रीति हरे मरनको न भे करे,
करनसों पीठि दे चरन अनुसच्यों है
धरमकोौ मंडन भरमको विहंडन है,
परम नरम हूँकेकरमसों लच्यो है ।
ऐसो मुनिराज भुवलोकमें विराजमान,
निरखि बनारसी नमसकार कच्यों है ॥ ५ ॥

शब्दार्थ :- उजाग रज-प्रकाशक । रतनागर (रत्नाकर) >“मणियोकी खानि। भें (भय )>डर। करन (करण )-इन्द्रिय ।चरन (चरण )-चारित्र । विहंडन - विनाश करनेवाला । नरम ८ कोमल अर्थात्‌ निष्कषाय । भुव (भू)-पृथ्वी । ) जिनका प्रत्येक आत्मप्रदेश विलक्षण शान्तिसे भरपूर है ।

अर्थ :- जो ज्ञानके प्रकाशक हैं,साहजिक *आत्मसुखके समुद्र हैं, सम्यक्त्वादि गुणरत्नोंकी खानि हैं, बेराग्य-रससे परिपूर्ण हैं, किसीका आश्रय नहों चाहते, मुत्युसे नहीं डरते, इन्द्रिय-विषयोंस विरक्त होकर चारित्र पालन करते हैं, जिनसे धर्मको शोभा है, जो मिथ्यात्वका नाश करनेवाले हैं, जो कर्मोके साथ अत्यन्त शान्तिपूर्वक’ लड़ते हैं; ऐसे साधु महात्मा जो पृथ्वोतलपर शोभायमान हैं उनके वर्शनः करके पंडित बनारसीदासजी नमस्कार करते हैं ॥ ५ ॥

सम्यग्दृष्टिकी स्तुति (सबेया छन्द, ८ भगण )

भेदविज्ञान जग्यौ जिन्हके घट,
सीतल चित्त भयो जिम चंदन ।
केलि करें सिव मारगमें,
जग माहि जिनेसुरके लघु नंदन ।।
सत्यसरूप. सदा जिन्हकं,
प्रगत्यो अवदात मिथ्यात-निकंदन ।
सांतरसा तिन्‍्हकी पहिचानि,
करे कर जोरि बनारसि बंदन ॥ ६ ॥

शब्दार्थ :- भेदविज्ञान-निंज और परका विवेक । केलिज्मौज । लघुनदन-छोटे पुत्र । अवदात-स्वच्छ । मिथ्यात-निर्कदन >मिथ्यात्वको नष्ट करनेवाला ।

अर्थ :- जिनके हृदयमें निज-परका विवेक प्रगट हुआ है,जिनका चित्त चन्दनके समान शीतल हैअर्थात्‌ कषायोंका आताप नहों है, जो निज-पर विवेक होनेसे सोक्षमार्गमें मोज करते हैं, जो संसारमें अरहंतदेवके लघु पुत्र हैं अर्थात्‌ थोड़े हीकालमें अरहंत पद प्राप्त करनेवाले हैं, जिन्हें मिथ्यादशनको नष्ट करनेवाला निर्मेल सम्यर्दशेन प्रकट हुआ है; उन सम्यग्टृष्टि जीबवोंकी आनंदसय अवस्था का निश्चय करके पं० बनारसोदासजी हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं ॥ ६ ॥

१ जो आत्मजनित है, किसीके द्वारा उत्पन्न नही होता ।

यह कर्मोकी लडाई क्रोध आदि कषायोके उद्वंग रहित होती है ।

3 हृदयमे दर्शन करनेका अभिप्राय है (सवेया इकतीसा )

स्वारथके साचे परमारथके साचे खचित्त,
साचे साचे बेन कहें साये जेनमतो हैं ।
काहूके विरुद्धि नाहि परजाय-बुद्धि नाहि,
आतमगवेषी न गृहस्थ हैं न जतो हैं ।।
सिद्धि रिद्धि वृद्धि दीसे घटमें प्रगट सदा,
अंतरकी लच्छिसों अजाची लच्छपती हैं ।
दास भगवन्तके उदास रहें जगतसों,
सुखिया सदेव ऐसे जीव समकिती हैं ॥ ७ ॥

शब्दार्थ :- स्वारथ (स्वार्थ स्व-आत्मा, अर्थ॑न-पदार्थ )-- आत्मपदार्थ । परमारथ (परमार्थ*)-परम अर्थ अर्थात्‌ मोक्ष । परजाय (पर्याय )-शरीर। लच्छि-लक्ष्मी ।अजाची-नहीं माँगनेवाले ।

अर्थ :- जिन्हें निज आत्माका सच्चा शान है और मोक्ष पदार्थसे सच्चा प्रेम है, जो हृदयके सच्चे हैं ओर सत्य वचन बोलते हैं तथा सच्चे जनी’ हैं, किसीसे भोजिनका विरोध? नहीं है, शरोरमें जिनको अहंब॒दि नहीं है, आत्मस्वरूपके खोजक हैं, न अणुव्तो हैं न महात्नती हैं*, जिन्हें सदेव अपने हो हृदयमें आत्महितकोी सिद्धि, आत्मशक्तिकी रिद्धि और आत्मगुणोंकी बृद्धि प्रगटट दिखतो है, जो अंतरड्रः लक्ष्मीसे अजाची लक्षपति अर्थात्‌ सम्पन्न हैं, जोजिनराजके सेवक हैं,संसारसे उदासीन रहते हैं, जो आत्मीय सुखसे सदा आनन्दरूप रहते हैं; ऐसे गुणोंके धारक सम्यग्हृष्टि जोब होते हैं ॥ ७ ॥

) जेनधर्ममें घम, अर्थ, काम, और मोक्ष ये चार पदार्थ कहे हैं,उनमें मोक्ष परम पदार्थ है।

जिनराजके वचनो पर जिनका अटल विश्वास है । 3 समस्त नयोंके ज्ञाता होनेसे इनके ज्ञानमें किसी भी सम्यक्‌ विवक्षाका विरोध नहीं भासता ।

यहाँ असंयत सम्यग्दष्टिको ध्यानमे रखके कहा है जिन्हें “अरितमोहवश लेश त संघभ, पे सुरनाथ अर्ज हैं।” छः खसम्यसार वाटक

(सर्वेया इकतीसा )

जाक॑ घट प्रगट विवेक गणधरकोौसो,
हिरदे हरलि महामोहकों हरतु है।
साचो सुख साने निजमहिसा अडोल जाने,
आपुहीमें आपनो सुभाउ ले धरतु है॥।
जेसे जल-कर्दंभ कतकफल भिन्न करे,
तेसे जीव अजीव विलछनु करतु है।
आतम सकति साथ ग्यानकौ उदौ आराघे,
सोई समकिती भवसागर तरतु है ॥ ८१ ॥

शब्दार्थ :- कर्दम>कीचड़ । कतकफल-निर्मेली । बिलछनु-प्रथक्‌- करण । सकतिच्शक्ति ।

अर्थ :- जिसके हृदयमें गणधर जैसा निज-परका विवेक प्रगट हुआ है,जो आत्मानुभवसे आनन्दित होकर मिश्यात्वको नष्ट करता है, जो सच्चे स्वाधोन सुखको सुख मानता है, जो अपने ज्ञानादि गुणोंका अविचचल भ्रद्धान करंता है,जो अपने सम्यग्दर्शनादि स्वभाव को आपहोमें धारण करता है, जो अनादिके मिले हुए जोब और अजीवका पृथककरण जल-कर्दमसे ’ कतकफलके समान करता है, जो आत्मबल बढ़ानेमें उद्योग करता है और ज्ञानका प्रकाश करता है; वही सम्यग्टृष्टि संसार-समुद्रसे पार होता है ॥ ८ ॥)

मिथ्याहृष्टिका लक्षण (सर्वया इकतीसा )

धरम न जानत बखानत भरमरूप,
ठौर ठोर ठानत लराई पच्छपातकी ।
भूल्यों अभिमानमें न पाउ धरे धरनी में,
हिरदेमें करनो विचारे उतपातको ।।
$ गदेपानौमे निर्मेली डालनेसे कीचड़ नीचे बंठ जाता है भौर पानी साफ हो जाता है।
संगलायरण है
फिर डांवाडोलसो करमके कलोलिनिनमें,
हू रही अवस्था सु बघूलेकंसे पातकी ।
जाको छाती ताती कारी कुटिल कुवाती भारी,
ऐसोौ ब्रह्मघाती है मिथ्याती महापातकी ॥ ६ ॥
शब्वार्थ :- धरम (धर्म )-वस्तुस्वभाव । उतपात>उपद्रव ।

अर्थ :- जो वस्तुस्वमावसे अनभिज्ञ है, जिसका कथन मिथ्यात्वमय हैऔर एकान्तका पक्ष लेकर जगह-जगह लड़ाई करता है, अपने मिथ्याज्ञानके अहूंकारमें भुलकर धरती पर पाँव नहीं टिकाता और चित्तमें उपद्रव हो सोचता है, करके भकोरोंसे संसारमें डांवाडोल हुआ फिरता है अर्थात्‌ विश्राम नहीं पाता सो ऐसी दशा हो रही है जैसे बघरूड़ेमें पत्ता उड़ता फिरता है, जो हृदयमें (क्रोधसे) तप्त रहता है, (लोमसे )मलिन रहता है, (मायासे ) कुटिल रहता है, (मानसे) बड़े कुबोल बोलता) है; ऐसा आत्मघाती और महापापो मिथ्यात्वी होता है ॥ ६ ॥

( दोहा )

बंदों सिबर अवगाहना, अरु बंदों सिव पंथ ।
जसु प्रसाद भाषा करों, नाटकनाम गरंथ ॥ १० ॥
शब्बार्थ :- अवगाहनाज"-आकृति !

अर्थ :- मैं सिद्ध मगवानको और मोक्षमार्ग (रत्नत्रय) को नमस्कार करत! हूं,जिनके प्रसादसे देशभाषामें नाटक समयसार ग्रन्थ रचता हूँ )।१०१।

क्विस्वरूप वर्णन (सवेया मत्तगयन्द, वर्ण २३)

चेतनरूप अनूप अमरति,
सिद्धससमान सदा पद सेरो’ ।
मोह महातम आतम अंग,
कियौ परसंग महा तम घेरो’ ॥।
१ यहाँ निश्चय नयकी अपेक्षा कथन है !

ग्रहाँ व्यवहार नयकी अपेक्षा कथन है । ग्यानकला उपजी अब मोहि, कहाँ गुन नाटक आगमकेरों । जासु प्रसाद सधे सिवमारग, वेगि मिटे भववास बसेरो (। ११॥।

शब्दार्थ :- अमूरति (अमूरति)->निराकार । परसंग (प्रसंग)- सम्बन्ध ।

अर्थ :- मेरा स्वरूप सेव चेतन्यस्वरूप उपभा रहित और निराकार सिद्ध सहश है। परन्तु सोहके महा अन्धकारका संग करनेसे अन्धा बन रहा था। अब मुझे श्ञानको ज्योति प्रगट हुई हैइसलिये नाटक समयसार प्रन्थको कहता हूँ,जिसके प्रसादसे मोक्षमागंकोी लिद्धि होती हैओर जल्दी संसारका निवास अर्थात्‌ जन्म-मरण छूट जाता है ॥ ११ ॥

कविलघुता वर्णन (छन्द मनहर, वर्ण ३१)

जेसें कोऊ म्रख महा समुद्र तिरिबेकों,
भुजानिसों उद्चत भयौ है तजि नावरो ।
जेसे गिरि ऊपर विरखफल तोरिवेकों,
बावनु पुरुष कोऊ उमरग उतावरों॥
जेसे जलकुंडमें निरखि ससि-प्रतिबिम्ब,
ताके गहिबेकों कर नीचों करें टाबरो।
तेसे में अलपबुद्धि नाटक आरंभ कीनो,
गुनी मोहि हसेगे कहेंगे कोफऊ बाबरों । १२॥।

शब्दार्थ :- विरख (वृक्ष ) >पेड़ ।बावनु (बौना )>बहुत छोटे कदका मनुष्य ।टाबरौ*>बालक । बाबरोजपागल ।

अर्थ :- जिस प्रकार कोई मूर्स अपने आहुबलसे बड़ा भारी समुद्र तेरनेका प्रयत्न करे, अथवा कोई बोना मनुष्य पहाड़के वृक्षमें लगे हुए

यहू शब्द मारवाड़ी भाषाका है। अत्यानिकों ११ फलको तोड़नेके लिये जल्दीसे उछले, जिस प्रकार कोई बालक पानोमें पड़े हुए चन्द्रविम्वकों हाथसे पकड़ता है, उसी प्रकार मुझ मन्दब॒द्धिने नाटक समयसार (भहाकाये) प्रारम्भ किया है,विद्वान् लोग हँसी करेंगे और कहेंगे कि कोई पागल होगा॥ १२ ॥

। (सर्वेया इकतीसा )

जेसे काहू रतनसों बींध्यों हैरतन कोऊ,
तामें सृत रेसमकी डोरो पोई गई है।
तेसे बुध टोकाकरि नाटक सुगम कोनो,
तापरि अलपबुधि सुधी परिनई है॥
जैसे काहू देसके पुरुष जेसी भाषा कहें,
तेसी तिनिहेंके बालकनि सीख लई है ।
तेसे ज्यों गरंथकौ अरथ कह्मो गुरु त्योंहि,
हमारी भमति कहिवेकों सावधान भई है ॥ १३ ॥

शब्दार्थ :- बुध-विद्वान्‌ू ।परिनई (परणई )>हुई है ।

अर्थ :- जिस प्रकार होराकी कनोसे किसी रत्नमें छेद कर रक्खा होतो उसमें रेशमका धागा डाल देते हैं,उसी प्रकार विद्वान् स्वामी अमृतचन्द् आखचायंने टीका करके समयसारकों सरल कर दिया है, इससे मुझ अल्प- बुद्धिको समभमें आ गया। अथवा जिस प्रकार किसी देशके निवासी जेसी भाषा बोलते हैंबेसी उनके बालक सीख लेते हैं; उसी प्रकार मुझको गुरु - परम्परासे जैसा अर्थशान हुआ है बसा ही कहनेको मेरी बुद्धि तत्पर हुई है ॥ १२ ॥ है

अब कवि कहते हैकि भगवानकी भत्तिसे हमें बुद्धिबल प्राप्त हुआ है:- (स्वेया इकतीसा )

कबहू सुमति हूं कुमतिकां विनास करे,
कबहू विमल जोति अंतर जगति है ।
कबहू दया ह्वू चित्त करत दयालरूप,
कबहू सुलालसा छू लोचन लगति है ।।
कबहू आरती हूं क॑ प्रभु सनमुख आये,
कबहू सुभारती छल बाहरि बगति है ।
धर दसा जंसी तब कर रीति तंसी ऐसी,
हिरदे हमारे भगवंतकी भगति है ॥ १४ ॥

शब्दार्थ :- सुभा रती-सुन्दर वाणी ।लालसा >अभिलाषा । लोचन5 नेत्र ।

अर्थ :- हमारे हृदयसें भगवानको ऐसी भक्ति है जोकभी तो सुबद्धि- रूप होकर कुब॒द्धिकों हूटाती है, कमी निर्मेल ज्योति होकर हृदयमें प्रकाश डालतो है, कभी दयालु होकर चित्तको दयालु बनातो है, कभी अनुभवकी पिपासारूप होकर नेत्रोंको थिर करतो है, कभी आरतीरूप होकर प्रभुके सन्मुख आती है, कभी सुन्दर बचनोंमें स्तोत्र बोलतो है, जब जेसी अवस्था होतो हैतब तेसी क्रिया करतो हे ॥ १४ ॥

अब नाटक समयसारकी महिमा वर्णन करते हैं:-

(सर्वेया इकतीसा )

मोख चलिवेको सौन करमकौ करे बोन,
जाके रस-भोन बुध लौन ज्यों घलत है ।
गुनको गरन्थ निरगुनकौ सुगम पंथ,
जाकौ जसु कहत सुरेश अकुलत है ।॥।
याहीके जु पच्छी ते उड़त ग्यानगगनमें,
याहीके विपच्छी जगजालमें रुलत है।
हाटकसों विमल विराटकसो विसतार,
नाटक सुनत हिये फाटक खुलत है॥ १५ ॥

शब्दार्थ :- सोन-सीढी । बौनज्वमन । हाटक>सुवर्ण । भौन (भवन )->जल ।

अर्थ :- यह नाटक भोक्षको चलनेके लिये सोढ़ी स्वरूप है, कर्मरूपी विकारका बसन करता है, इसके रसरूप जलमें विद्वान् लोग नम्कके समान उत्थानका श्र लीन हो जाते हैं,यह सम्यग्दर्शनादि गुणोंका पिण्ड है, मुक्तिका सरल रास्ता है, इसको महिमा वर्णन करते हुए इन्द्र भो लज्जित होते हैं, जिन्हें इस प्रन्थकी पक्षरूप पंखे प्राप्त हैं वेशानरूपोी आकाशमें विहार करते हैंऔर जिसको इस प्रन्थकी पक्षरूप पंख प्राप्त नहों हैं बहूजगतके जंजालमें फेंसता है, यह प्रन्थ शुद्ध सुबर्णके समान निर्मल है, विष्णुके बिराटरूपके सहश विस्तृत है, इस ग्रन्थके सुननेसे हृदयके कपाट खुल जाते हैं ॥ १५ ॥

अनुभवका वर्णन (दोहा )

कहों सुद्ध निह्चेकथा, कहां सुद्ध विवहार ।
मुकतिपंथकारन कहाँ, अनुभौफो अधिकार ॥ १६ ॥

अर्थ :-शुद्ध निश्चय नय, शुद्ध व्यबहार नय और मुक्तिमागमें कारणमूत आत्मानुभवकी त्तर्चा वर्णन करता हूँ । १६॥।

अनुभवका लक्षण (दोहा)

वस्तु विचारत ध्यावते, मन पावे विश्राम ।
रस स्वादत सुख ऊपज, अनुभो याको नाम ॥ १७ ॥

अर्थ :- आत्मपदार्थका विचार और ध्यान करनेसे चित्तको जो शान्ति मिलती हैतथा आत्मिकरसका आस्वादन करनेसे जो आनन्द मिलता है, उसीको अनुभव कहते है ॥ १७ ॥

अनुभवकी महिमा (दोहा)

अनुभव चितामनि रतन, अनुभव है रसकप ।
अनुभव सारग मोखको, अनुभव सोख सरूप ॥ १८ ॥

शब्दार्थ :- चितामणि>मनोवांछित पदार्थोका देनेवाला ।

अर्थ :- अनुभव चितामणि रत्न है, शान्तिरसका कुआं है, मुक्तिका मार्ग है और मुक्तिस्वरूप है ॥ १८ ॥

श्ढ समयसार ताटक (सवेया मनहर)

अनुभोके रसकों रसायन कहत जग,
अनुभो अभ्यास यहु तोरथकोी ठोर है ।
अनुभोकी जो रसा कहावे सोई पोरसा सु,
अनुभी अधोरसासाँ ऊरधकी दौर है।॥।
अनुभोकी केलि यहे कामथेनु चित्रावेलि,
अनुभोको स्वाद पंच अमृतको कोर है ।
अनुभौ करम तोरे परमसों प्रीति जोर,
अनुभो समान न धरमकोऊ और है ॥ १६ ॥

शब्दार्थ :- रसा>पृथ्वी ।अधोरसा+नरक । पोरसा-उपजाऊ भूमि । चित्रावेलि-एक तरहकी जड़ीका नाम ।

अर्थ :- अनुमवके रसको जगतके शानों लोग रसायन कहते हैं, अनुमबका अभ्यास एक तो्ंभूमसि है, अनुभवकी मूसि सकल पदार्थोंकी उप- जानेवाली है, अनुमव नकंसे निकालकर स्वरग-मोक्षमें लेजाता है, इसका आनन्द कामधेनु और चित्रावेलिके समान है,इसका स्वाद पंचामृत भोजनके समान है। यह कर्मोंको क्षय करता हैऔर परम पदसे प्रेम जोड़ता है, इसके समान अन्य कोई धर्म नहों है ॥ १६ ॥

नोट :- संसारमें पच्ामृत, रसायन, कामधेनु, चित्रावेलि आदि सुखदायक पदार्थ प्रसिद्ध हैं, सोइनका दृष्टान्त दिया है परन्तु अनुभव इन सबसे निराला और अनुपम है । छह द्रव्योंका ज्ञान अनुभवके लिये कारण है, अत: उनका विवेचन किया जाता है :-

जीव द्रव्यका स्वरूप (दोहा)

चेतनवबंत अनंत गुन, परज सकति अनंत ।
अलख अखंडित सर्वंगत, जीव दरब विरतंत ॥ २० ॥

उत्थानिका

शब्दार्थ :- अलख-इन्द्रियगोचर नहीं है । सर्वंगत८सब लोकमें ।

अर्थ :- चेतन्यरूप है, अनन्त गुण, अनन्त पर्याय और अनन्त शक्ति सहित है, अमुर्तोक है, अलण्डित है, सर्वव्यापी’ है । यह जीवद्रव्यका स्वरूप कहा है॥ २० ॥

पुदुगल द्रव्यका लक्षण (दोहा)

फरस-वरन-रस-गन्ध मय, नरद-पास-संठान ।
अनुरूपी पुदगल दरब, नभ-प्रदेश-परवान ॥ २१ ॥

शब्दार्थ :- फरस-स्पर्श । मरद-पास>चौपड़का पासा। संठान८ आकार । परवान (प्रमाण) -बराबर ।

अर्थ :- पुद्गल द्रव्य परमाणुरूप, आकाशके प्रदेशके वराबर, चोपड़के पासेके आकारका * स्पशं, रस, गन्ध, वर्णवन्त है ॥ २१ ॥

धर्म द्रव्यका लक्षण (दोहा)

जसें सलिल समूहमें, करे मौन गति-कर्म ।
तेसे पुद्गल जीवकों, चलनसहाई धर्म ॥ २२ ॥

शब्दार्थ :- सलिल-पानी । मीन>मछली । गति-कमें >गमनक्रिया ।

अर्थ :- जिस प्रकार मछलीकी गमनक्रियामें पानो सहायक होता है, उसी प्रकार जोव पुद्गलकी गतिमें सहकारी? धर्म द्रव्य है॥ २२ ॥

अधर्म द्रव्यका लक्षण (दोहा)

ज्यों पंथी ग्रीषमसमं, बंठे छायामाँहि ।
त्यों अधर्मकी मूमिमें, जड़ चेतन ठहराँहि ॥ २३ ॥

शब्दार्थ :- पथी-पथिक । ग्रीषमसमे>-ग्रीष्मकालमें ।

अर्थ :- जिस प्रकार ग्रोष्मकासमें परथिक छायाका निभित्त पाकर बेठते हैं उसो प्रकार अधर्म द्रव्य जीव - पुदगलको स्थितिमें निमित्त- कारण है ॥ २३ ॥

$ लोक-अलोक प्रतिबिम्बित होनेसे पूर्ण ज्ञानकी अपेक्षा सर्वव्यापी है ।
३ छह पहलूका जैसे चपेटा होता है ।
3 उदासीन निमित्तकारण है, प्रेरक नही है ।

आकाश द्रग्यका लक्षण (दोहा)

संतत जाके उदरमें, सकल पदारथवास ।
जो भाजन सब जगतको, सोई दरब अकास ॥ २४ ॥

शब्दार्थ :- संतत-सदाकाल । भाजन>बतेंन, पात्र ।

अर्थ :- जिसके पेटमें सेव सम्पूर्ण पदार्थ निवास करते हैं,जो सम्पूर्ण व्रव्योंको पात्रके समान आधारभूत है; वही आकाश द्रव्य है॥ २४ ॥ नोठ—अवगाहना आकाशका परम घर्म है, सो आकाशद्रव्य क्षन्य द्रब्योको अवकाश दिये हुए है और अपनेको भी अवकाश दिये हुए है। जैसे :- ज्ञान जीवका परम घर है, सोजीव अन्य द्रव्योफको जानता है और अपनेको भी जानता है ।

कान द्रव्यका लक्षण (दोहा)

जो नवकरि जीरन करे, सकल वस्तुथिति ठांनि ।
परावर्त बर्तेन धरे, काल दरब सो जांनि॥ २५॥।

शब्दार्थ:- नव-नवीन । जीरन (जीणं)>पुराना ।

अर्थ :- जो वस्तुका नाश न करके सम्पूर्ण पदार्थोकी नवीन हालतोंके प्रगट होने और पूर्व पर्यायोंके लय होनेमें निमित्तकारण है, ऐसा बतेना लक्षणका धारक काल द्रव्य है॥ २५ ॥

नोट–काल द्रव्यका परम धर्म वर्तना है, सो वह अन्य द्रव्योकी पर्यायोंका वर्तन करता है और अपनी भी पर्यायें पलटता है । नव पदार्थोका ज्ञान अनुभवके लिये कारण है, अत. उनका विवेचन किया जाता है :-

जीवका वर्णन (दोहा)

समता - रसमता उरघता, ग्यायकता सुखभास।
वेदकता चेतन्यता, ए सब जीवविलास ॥ २६ ॥

शब्दार्थ :- समता>राग-द्वेष रहित बीतरागभाव । रमता-लीन रहना । उरधता ( ऊध्वेता )>ऊपरको चलनेका स्वभाव । ग्यायकता- जानपना । वेदकता-स्वाद लेना ।

अर्थ :- बोतराग भावसें लोन होना, ऊध्वेगमन, शायकस्वभाव, साहजिक सुखका सम्भोग, सुख-दुःखका स्वाद और चंतन्यता-ये सब जीवके निजगुण हैं ।’ २६।।

अजीवका वर्णन (दोहा)

तनता मनता वचनता, जड़ता जड़सम्मेल ।
लघुता गुरुता गमनता, ये अजोवके खेल ॥ २७ ॥

शब्दार्थ :- सम्मेल-बध । लघुता-हलकापन । गुरुता-भारीपना । गमनताज-गति करना ।

अर्थ :- तन, सन, वचन, अचेतनता, एक-दूसरेसे मिलना, हलका और भारीपन तथा गति करना - यह सब पुद्गल नामक अजीब द्रव्यको परिणति है ॥ २७ ॥

पुण्यका वर्णन (दोहा)

जो विशुद्धभावनि बंधे, अर ऊरधमुख होइ ।
जो सुखदायक ज़गतमै, पुन्य पदारथ सोइई ॥ २८ ॥

अर्थ :- जो शुभभावोसे बंधता है, स्वर्गादिकि सम्मुख होता है ओर लौकिक सुखका देनेवाला है, बह पुण्य पदार्थ है ॥ २८ ॥

पापका वर्णन (दोहा)

संकलेश भावनि बंध, सहज अधोमुख होइ ।
दुखदायक संसारमे, पाप पदारथ सोइ ॥ २६॥।
अथे :- जो अशुभ भावोंसे बंधता हैतथा अपने आप नोच गतिमें
गिरता है ओर संसारमें दुःखका देनेवाला है, वह पाप पदार्थ है ॥ २६ ॥

आखवका वर्णन (दोहा)

जोई करमउदोत धरि, होइ क्रिया रसरत्त ।
करषे तृतन करमकौ, सोई आख््रव तत्त ॥ ३० ॥
श्ष सम्रपसार नाटक

शब्दार्थ :- करमउदोत- कमंका उदय होना । क्ियान्योगोंकी प्रवत्ति ।रसरत्त-राग सहित । रत्त-मग्न होना । तत्त–तत्त्व ।

अर्थ :- कम केउदयमें योगोंकी जो राग’ सहित प्रवृत्ति होती हैवह नवीन कर्मोंकों खोंचतो है, उसे आख्रव पदार्थ कहते हैं ॥ ३० ॥

संवरका वर्णन (दोहा)

जो उपयोग स्वरूप धरि, बरतें जोग विरत्त ।
रोक आवत करमको, सो है संबर तत्त ॥ ३१॥।

शब्दार्थ :- विरत्त-अलहदा होना ।

अर्थ :- जो ज्ञान-दर्शन उपयोगको प्राप्त करके योगोंकी क्रियासे विरक्त होता है औरआखबको रोक देता हैवह संबर पदार्थ है ॥ ३१ ॥

निजेरा वर्णन (दोहा)

जो प्रव सत्ता करम, करि थिति पूरन आउ ।
खिरबेकौ उद्यत भयो, सो निर्जरा लखाउ ॥ ३२ ॥
शंब्दार्थ :- थिति-स्थिति । सत्ता-अस्तित्व । खिरबेकौ>भडनेके
लिये । उद्यत-तेयार, तत्पर ।

अर्थ :- जो पृर्वस्थित कर्म अपनो अवधि पुण करके भड़नेको तत्पर होता है उसे निजरा पदार्थ जानो ॥ ३२ ॥

बंधका’ वर्णन (दोहा)

जो नवकरम पुरानसों, मिले गांठि विढ़ होड़ ।
सकति बढ़ावें बंसको, बंध पदारथ सोइ ॥ ३३ ॥
) यहाँ सापरायिक आस्रवक्री मुख्यता और ऐयपिथिक आख्रवकी गौणता पू्वक
कथन है ।

बधके नष्ट होनेसे मोक्ष अवस्था प्राप्त होती है। इससे यहाँ मोक्षके पूर्व बंध तत्त्वका कथन किया है और आलज़वके निरोध प्‌्वंक सवर होता है इसलिये संवरसे पहिले आखव तत्त्वका कथन किया है। शब्बार्थ :- गांठिन्गगांठ । दिढ़ (हृढ़) >पक्‍की । सकति-शक्ति ।

अर्थ :- जो नवीन कर्म पुराने कमंसे परस्पर सिलकर सजबूत बंध जाता हैऔर कमंशक्तिकी परम्पराको बढ़ाता है,वह बन्ध पदार्थ है॥ ३३ ॥

मोक्षका वर्णन (दोहा)

थिति पुरन करि जो करम, खिरे बंधपद भानि ।
हँस अंस उज्जल करे, मोक्ष तत्त्व सो जानि ॥ ३४॥।

शब्दार्थ :- भानि-नष्ट करके । हस अंस–आत्माके गुण । अथ :- जो कर्म अपनो स्थिति पूर्ण करके बन्ध दशाको नष्ट कर लेता हैऔर आत्मगुणोंको निर्मल करता है,उसे मोक्ष पदार्थ जानो ॥ ३४ ॥

वस्तुके नाम (दोहा)

भाव पदारथ समय धन, तत्त्व वित्त वसु द्व ।
द्रविन अरथ इत्यादि बहु, वस्तु नाम ये सर्वे ॥ ३५ ॥

अर्थ :- भाव, पदार्थ, समय, धन, तत्त्व, वित्त, बसु, द्रव्य, द्रविण, अर्थ आदि सब बस्तुके नाम हैं ॥ ३५ ॥

शुद्ध जीवद्रव्यके नाम (सवेया इकतीसा )

परमपुरुष परभेसुर परमज्योति,
परब्रह्य पूरन परम परधान हे।
अनादि अनंत अविगत अविनाशी अज,
निरदुद मुकत मुकुद अमलान है।॥।
निराबाध निगस निरंजन निरबिकार,
निराकार संसारसिरोमनि सुजान है ।
सरवदरसी सरवज्न सिद्ध स्वामी सिव,
धनी नाथ ईस जगदीस भगवान् है ॥ ३६॥।

अर्थ :- परमपुरुष, परमेश्वर, परमज्योति, परब्रह्म, पूर्ण, परम, प्रधान, अनादि, अनन्त, अव्यक्त, अविनाशी, अज, निदद्व, मुक्त, मुकुन्द, अमलान, निराबाध, निगम, निरंजन, निविकार, निराकार, संसार- शिरोमणि, सुज्ञान, स्वदर्शो, सर्वज्ञ, सिद्ध, स्वामी, शिव, धनी, नाथ, ईश, जगदीश, भगवान् - ये सब शुद्ध जोवद्रव्यके नाम हैं ॥ २६ ॥

सामान्यत. जीवद्रव्यके नाम
चिदानंद चेतन अलख जीव समंसार,
बुद्धरप अबुद्ध असुद्ध उपजोगोी है ।
चिद्रूप स्वयंभू चिनम्रति धरमवत,
प्रानवंत प्रानी जंतु भूत भवभोगी है ॥।
गुनधारी कलाधारी भेषधारी विद्याधारी,
अंगधारी संगधारी जोगधारी जोगी है ।
चिन्मथ अखंड हंस अक्षर आतमराम,
करमको करतार परम विजोगी है ॥ ३७ ॥

अर्थ :- चिदानन्द, चेतन, अलक्ष, जोब. समयसार, बुद्धरूप, अबुद्ध, अशुद्ध, उपयोगी, चिद्रप,स्वयंभू, चिन्मूति, धर्मबन्त, प्राणवन्त, प्राणी, जन्तु, भूत, मबभोगी, गुणघधारी, कलाधारी, भेषधारो, अंगधारी, संगधारो, योगधारी, योगी, चिन्मथ, अखण्ड, हुंस, अक्षर, आत्माराम, करमं-कर्ता, परमवियोगो - ये सब जोवद्रव्यके नाम है ॥ २७ ॥

आकाणशके नाम (दोहा)

ख॑ विहाय अंबर गगन, अंतरिच्छ जगधाम ।
व्योम वियत नभ सेघपथ, ये अकाशके नाम ॥ ३८ ॥
अर्थ .- खं, विहाय, अम्बर, गगन, अन्तरिक्ष, जगधाम, व्योभ, वियत,
नभ, मेघपथ - प्रे आकाशके नाम है ॥ ३८ ॥

धत्यानिका २१ कालके नाम (दोहा)

जम कृतांत अंतक त्रिदस, आवर्ती मृतथान।
प्रानहरतन आदिततनय, काल नाम परवान ॥ ३६।॥

अर्थ :- यम, कृतांत, अन्तक, त्रिदश, आवर्तो, मृत्युस्थान, प्राणहरण, आदित्यतनय - ये कालके नाम हैं ॥ ३६ ॥

पृण्यके नाम (दोहा)

पुन्य सुकृत ऊरधवदन, अकररोग शुभकर्म ।
सुखदायक संसारफल, भाग बहिमुंख धर्म ॥ ४० ॥

अर्थ :- पुण्प, सुकृत, ऊध्वेबदन, अकररोग, शुमकर्म, सुखदायक, संसारफल, भा ग्य, बहिमुख,धर्म - ये पुण्यके नाम हैं ॥ ४० ॥

पापके नाम (दोहा)

पाप अधोमुख एन अघ, कंप रोग दुखधाम ।
कलिल कलुस किल्विस दुरित, असुभ करमके नाम ॥ ४१ ॥

अर्थ :- पाप, अधोमुख, एन, अधघ, कंप, रोग, वृखधास, कलिल, कलुष, किल्विष और दुरित - ये अशुभ कर्मके नाम हैं ॥ ४१ ॥

मोक्षके नाम (दोहा)

सिद्धक्षेत्र जिभुवनमुकुट, शिवथल अविचलथान ।
मोख मुकति वेकुठ सित्र, पंचमगति निरवान ॥ ४२ ॥

अर्थ :- सिद्धक्षेत्र, त्रिभुवनमुकुट, शिवथल, अविचलस्थान, मोक्ष, मुक्षित, बकुठ,शिव, पंचमगति, निर्वाण -ये सोक्षके नाम हैं ॥ ४२ ॥

बुद्धिके नाम (दोहा)

प्रज्ञा धिसना सेमुसी, धी सेधा समति बुद्धि ।
सुरति मनीषा चेतना, आसय अंश बविसुद्धि ॥ ४३ ॥

अर्थ :- प्रज्ञा, धिषणा, सेमुबी, धी, मेधा, मति, बुद्धि, सुरतो, मनीषा, चेतना, आशय, अंश, ओर विशुद्धि - ये बुद्धिके नाम है ॥ ४३ ॥

विनक्षण पुरुषके नाम (दोहा)

निपुन विचच्छन विबुध बुध, विद्याधर विद्वान् ।
पटु प्रवोन पंडित चतुर, सुधी सुजन मतिमान ॥ ४४ ॥
कलाबंत कोविद कुसल, सुमन दच्छ धीमंत ।
ज्ञाता सज्जन ब्रह्मविद, तज्ञ ग्रुनीजन संत ॥ ४५ ॥

अर्थ :- निपुण, विचक्षण, विब्र॒ध, बुद्ध, विद्याधर, विद्वान्, पढ़, प्रवीण, पंडित, चतुर, सुधी, सुजन, मतिमान, कलावन्त, कोबिद, कुशल, सुमन, दक्ष, धोमन्त, ज्ञाता, सज्जन, ब्रह्मचितू, तज्ञ, गुणीजन और सन्त, ये विद्वान्‌ पुरुषके नाम है ।॥। ४४, ४५॥।

मुनीश्वरके नाम (दोहा)

मुनि महंत तापस तपी, भिच्छुक चारितधाम ।
जतो तपोधन संयमी, ब्रती साधु ऋषि नाम ॥ ४६ ॥

अर्थ :- मुनि, महंत, तापस, तपी, मिक्षुक, चारित्रधाम, यती, तपोधन, सयमी, ब्रती, साधु औरऋषि - ये मुनिके नाम हैं ॥ ४६ ॥

दर्शनके नाम (दोहा)

दरस बिलोकनि देखनो, अवलोकनि हगचाल ।
लखन हृष्टि निरखनि जुबनि, चितवनि चाहनि भाल ॥ ४७ ॥

अर्थ :- दर्शन, विलोकन, देखना, अवलोकन, हगचाल, लखन, दृष्टि, निरीक्षण, जोवना, चितवन, घाहुन और भाल - ये दर्शनके नाम हैं ॥ ४७ ॥

उत्यथानिका श्र

ज्ञान और चारित्रके नाम (दोहा)

ग्यान बोध अवगरस मनन, जगतभान जगजान ।
संजम चारित आचरन, चरन वृत्ति थिरवान ॥ ४८ ॥

अर्थ :- ज्ञान, बोध, अवगम, मनन, जगतुभानु, जगतृज्ञान - ये ज्ञानके नाम हैं। संयम, चारित्र आचरण, चरण, वृत्त, थिरवान-ये चारित्रके ताम हैं ॥ ४८ ॥

सत्यके नाम (दोहा)

सम्यक् सत्य अमोध सत, निसंदेह निरधार ।
ठीक जथारथ उचित तथ, मिथ्या आदि अकार ॥ ४६ ॥

अर्थ :- सम्यक्‌, सत्य, अमोध, सत्‌, निःसंदेह, निरधार, ठीक, यथार्थ, उचित, तथ्य - ये सत्यके नाम है। इन शब्दोंके आदिमें अकार लगानेसे झूठके नाम होते हैं ॥ ४६ ॥

भूठके नाम (दोहा)

अजथारथ भिथ्या मृषा, बृथा असत्त अलीक ।
मुधा मोघ निः:फल बितथ, अनुचित असत अठीक ॥ ५० ॥

अर्थ :- अयथार्थे, मिथ्या, मृषा, बुथा, असत्य, अलीक, मुधा, मोघ, नि:फल, वितथ, अनुचित, असत्‌, अठीक - ये झठके नाम हैं ।। ५० ४

नाटक समयसारके बारह अधिकार (स्ेया इकतीसा)

जीव निरजीव करता करम पुश्न पाप,
आरूव संवर निरजरा बंध मोष है।
सरव विसुद्धि स्थादवाद साध्य साधक,
दुवादस दुबार धर समैसार कोष है॥
दरवानुयोग दरवानुजोग दूरि करें,
निगसमकोौ नाटक परमरसपोष है।
सो परमागम बनारसी बखाने जामें,
ग्यानको निदान सुद्ध चारितकी चोष है ॥ ५१ ॥

शब्दार्थ :- निरजीव-अजीव । करता>कर्त्ता । दुवादस>द्वादश (वारह ) । दुवार-अधिकार । कोष>भडार । दरवानुजोगनदद्रव्योका सयोग । निगमकोज्आत्माका ।

अर्थ :- समयसारजीके भंडारमें जीव, अजीव, कर्ता-कर्म, पृण्य-पाप, आज्व, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष, सर्वविशुद्धि, स्थाह्राद और साध्यसाधक परे बारह अधिकार है । यह उत्कृष्ट ग्रन्थ द्रव्यानुयोगरूप है, आत्माको पर- द्रव्योंके संयोगसे पृथक करता है अर्थात्‌ मोक्षमा्गमें लगाता है । यह आत्माका नाटक परमशान्तिरसको पुष्ट करनेवाला है, सम्यस्ज्ञान और शुद्धचारित्रका कारण है, इसे पण्डित बनारसीदासजो पद्च-रचनामें वर्णन करते है ॥ ५१ ॥

ल्प>

जीव द्वार (१)

चिदानन्द भगवानकी स्तुति (दोहा)

शोभित निज अनुभूति जुत चिदानंद भगवान् ।
सार पदारथ आतमा, सकल पदारथ जान ॥ १ ॥

शब्दार्थ :- निज अनुभूति-अपनी आत्माका स्वसंवेदित ज्ञान। चिदानंद (चित्‌ृ+आनंद )>जिसे आत्मीय आनंद हो ।

अर्थ :- वह चिदानन्द प्रभु अपने स्वानुभवसे सुशोमित है। सब पदार्थों सारभूत आत्मपदार्थ हैऔर सम्पूर्ण पदार्थोंका ज्ञाता है ॥ १ ॥

सिद्ध भगवानकी स्तुति, जिसमें शुद्ध आत्माका वर्णन है (स्वेया तेईसा )

जो अपनी दुृति आप विराजत,
है. परधान पदारथ नामी ।
चेतन अंक सरूदा निकलंक,
महा सुख सागरकों विसरामी ।

नीचे टिप्पणीमे जो श्लोक दिये गये है वेश्रीमद्‌ अम्ृतचम्व्सूरि विरचित नाटक समयसार कलसके श्लोक हैं। जिन श्ोकोका प० बसारसीदासजीने पद्मानुवाद किया है । नसः समयसाराय स्वानुमृत्यः चकासते । विस्स्वभावय भावाय सर्वंभावान्तरच्छिदे ॥ १ ॥

जीव अजीव जिते जगमें,
तिनको गुन ज्ञायक अंतरजामी ।
सो सिवरूप बसे सिव थानक,
ताहि विलोकि नर्में सिवगासी ॥ २ ॥॥

शब्दार्थ :- दुति (द्युति )>ज्योति । विराजत-प्रकाशित । परधान> प्रधान । विसरामी (विश्वामी )-शान्तिरसका भोक्ता । शिवगामी-मोक्षको जानेवाले सम्यग्दृष्टि, श्रावक, साधु, तीर्थंकर आदि ।

अर्थ :- जो अपने आत्मजश्ञानकी ज्योतिसे प्रकाशित हैं, सब पदाथोंमें मुख्य हैं,जिनका चेतन्य चिह्न है, जोनिविकार हैं, बड़े भारी सुखसमुद्रमें आनन्द करते हैं,संसारमें जितने चेतन-अचेतन पदार्थ हैंउनके गुणोंके ज्ञाता घटघटकी जानने वाले हैं, वेसिद्ध भगवान् मोक्षरूप हैं, मोक्षपुरीके निवासी है; उन्हें मोक्षयामी जीव शानहृष्टिसे देखकर नमस्कार करते हैं ॥ २ ॥

जिनवाणीकी स्तुति (स्वेया तेईसा )

जोग धरे रहै जोगसों भिन्न,
अनंत ग्रुनातम केवलज्ञानी ।
तासु हदें-दहसों निकसी,
सरितासम हूं श्रुत-सिधु समानी ॥।
पाले अनंत नयातम लच्छुन,
सत्य. स्वरूप सिघंत बखानो।
बुद्ध लखे न लख वृरबुद्ध,
सदा जगमाँहि जगे जिनवानी ॥ ३ +।
अनन्तधमंणस्तत्त्व॑ पश्यन्तो प्रत्यगात्मनः ।
अनेकास्तमयी मूर्तिनिस्पसिेव प्रकाशताभ ॥ २ !।

शब्दार्थ :- ह॒दे-द्रहसों-हृदयरूपी सरोवरसे । बुद्ध–्पवित्र जैनधर्मके विद्वान्‌ । दुरबुद्ध-मिथ्याहृष्टि, कोरे व्याकरण कोष आदिके ज्ञाता परन्तु नयज्ञानसे शुन्य" । अरथे :- अनंत गुणोंके घारक केवलज्ञानो मगवान यद्यपि सयोगी’ हैं तथापि योगोंसे पृथक हैं ।उनके हृदयरूप व्रहसे नदोरूप जिनवाणी निकलकर शास्त्रूप समुद्रमें प्रवेश कर गई है, इससे सिद्धान्तसें इसे सत्यस्वरूप और अनंतनयात्मक कहा है। इसे जनघमंके मर्मो सम्यग्हष्टि जीव पहचानते हैं, मूर्ख मिथ्याहष्टि लोग नहों समभते । ऐसी जिनवाणों जगतमें सदा जयबंत होवे॥ ३ ॥

कवि व्यवस्था (छुन्द छप्पय )

हों निहचे तिहुंकाल, सुद्ध चेतनमय मूरति ।
पर परनति संजोग, भई जड़ता विसफ्रति ॥।
समोहकर्स पर हेतु पाद, चेतन पर रच्चह ।
ज्यों धतुर-रस पान करत, नर बहुविध नज्चइ ।।
अब समयसार वरनन करत,
परम सुद्धता होहु मुरू।
अनयास बनारसिदास कहि,
सिट॒हु सहज अमकी अरुभ ॥ ४ ॥

शब्दार्थ :- पर परणति-निज आत्माके सिवाय अन्य चेतन-अचेतन पदार्थमे अहबुद्धि और राम-द्वेष । विसफूरति (विस्फूर्ति)>जाग्रत । तिहुं- कालनतीनकाल (भूत, वर्तमान, भविष्यतु ) । रच्चइ-राग करना । नंश्च्‌इ- नाचना । अनयास- ग्रन्थ पढ़ने आदिका प्रयत्न किये बिना, अकस्मात्‌ । अरुभ-उलभत । १ ऐसे लोगोंको आदिपुराणप्रे अक्षर-स्लेक्ष कहा है । २ तेरहवें गुणस्थानमे मन, वचन, कायके सात योग कहे हैंपरन्तु योगो द्वारा ज्ञानका अनुभव नही करते । परपरिणतिहेतोर्मोहनास्नोइनु भावा- दविरतमनुभाव्यव्याप्तिकल्माथिताया: । मस परमविशुद्धि: शुद्धचिस्मात्रमुर्ते- भंबतु समयसारब्याल्ययेबानुमूलेः ॥ ३ ॥।

अर्थ :- मैं निश्चयनयसे सदाकाल’ शुद्ध चेतन्यमृर्ति हें, परन्तु पर- परणतिके समागमसे अज्ञानदशा प्राप्त हुई है। मोहकसंका पर निमित्त पाकर आत्मा पर पदार्थोमें अनुराग करता है, इससे धत्रेका रस पीकर नाचनेवाले मनुष्य जसो दशा हो रही है। पं० बनारसोदासजी कहते हैंकि अब समयसारका वर्णन करनेसे मुझे परम विशुद्धता प्राप्त होवे और बिना प्रयत्न ही म्िथ्यात्की उलझन अपने आप सिट जावे ॥ ४ ॥

शास्त्रका माहात्म्य (सवेया इकतीसा )

निहचमें रूप एक विवहारमें अनेक,
यही ने-विरोधमें जगत् भरमायों है ।
जगके विवाद नासिबेकों जिन आगम हे,
जामें स्याह्रादनाम लच्छन सुहायो हे ।।
दरसनमोह जाको गयौ है सहजरूप,
आगम प्रमान ताके हिरदेमें आयो है ।
अनेसों अखंडित अनूतन अनंत तेज,
ऐसो पद पूरन तुरंत तिनि पायो है ॥ ५ ॥।

शब्दार्थ :- ने-नय । दरसनमोह (दर्शनमोह )-जिसके उदयमे जोब तत्त्वश्रद्धानसे गिर जाता है । पद पूरन (पूर्णपद )–मोक्ष ।

अर्थ :- निश्चयनयमें पदार्थ एकरूप है और व्यवहारमें अनेकरूप है । इस नय-विरोधसें संसार भूल रहा है, सोइस विवादकों नष्ट करनेवाला जिनागम हैजिसमें स्थाद्ादका शुम चिह्न’ है। जिस जोवको दर्शनमोहनीय उदय नहों होता उसके हृदयमें स्वत:स्वभाव यह प्रामाणिक जिनागम प्रवेश करता हैऔर उसे तत्काल ही नित्य, अनादि ओर अनंत प्रकाशवान मोक्षपद प्राप्त होता है ॥ ५ ॥

) था, हूँऔर रहेगा ।

महर-छाप लगी हुई है- स्याद्वादसे ही पहिचाना जाता है कि यह जिनागम है । उभवनयविरोधध्य॑तिमि स्यात्पदाऊु जिनवचसि रसम्ते ये स्वयं वान्तभोहा । सपदि समयसार ते परं ज्योतिरच्चे- रनवमतयपक्षाशुण्णमी क्षन्सएव ॥ ४ ॥

निश्चयनयकी प्रधानता (सर्वया तेईसा )

ज्यों नरकोउ गिरे गिरिसों तिहि,
सोइ हितू जो गहे दिढ़बाहों।
त्यों बुधकों विवहार भलो,
तबलों जबलों शिव प्रापति नाहीं ।।
यहापि यों. परवान तथापि,
सधे परमारथ चेतनमाहों ।
जीव अव्यापक है परसों,
विवहारसों तो परकी परछाहों ॥ ६ ॥

शब्दार्थ - गिरिसो>पर्व॑तसे । बाही>भुजा । बुधज-ज्ञानी । प्रापति- प्राप्ति ।

अर्थ :- जसे कोई मनुष्य पहाड़ परसे फिसल पड़े और कोई हितकारी बनकर उसकी भुजा सजबूतीसे पकड़ लेवे उसी प्रकार ज्ञानियोंको जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ है तब तक व्यवहारका अवलम्ब है, यद्यपि यह बात सत्य हैतो भी निश्चयनय चेतन्यको सिद्ध करता हैतथा जोवको परसे मिन्न दर्शाता हैऔर व्यवहारनय तो जोवको परके आश्रित करता है । भावाय .- यद्यपि चोथे गुणस्थानसे चौदह॒वें गुणस्थान तक व्यवहारका हो अवलम्बन हे, परन्तु व्यवहारनयकी अपेक्षा निश्चयनय उपादेय है, क्योंकि उससे पदार्थका असलो स्वरूप जाना जाता है और व्यवहारनय अभृतार्थ होनेसे परमाथमें प्रयोजनमृत नहीं है ॥ ६ ॥

व्यवहरणनय’ स्पाश्यद्यपि प्राक्पदवब्या-
मिह निहितपदानां हनत हस्तावलस्थ, ।
तदपषि परमभर्थ चिच्चमत्का रमात्र
परविरहितमन्त: पश्यतां नेष किड्चित्‌ ॥ ५॥।

सम्यग्दर्शनका स्वरूप (सवैया इकतीसा )

शुद्धनय निहचे अकेलो आपु चिदानंद,
अपनेही गुन परजायको गहतु है ।
प्रन विग्यानधन सो है विवहारमाहि,
नव॒तत्त्वरूपी पंच वर्बमं रहतु है ।।
पंच दर्व नव तत्त्व न्यारे जीव न्यारो लख,
सम्यकदरस यहै और न गहतु है ।
सम्यकदरस जोई आतम सरूप सोई,
मेरे घट प्रगटो बनारसी कहतु है ॥ ७ ॥

शब्दार्थ :- लखे’-श्रद्धान करे । घट-हृदय । गहतु है-धारण करता है।

अर्थ :- शुद्ध निश्चयनयसे चिदानन्द अकेला ही हैओर अपने गुण- पर्यायोंमें परिणमन करता है । व्यवहा रनयमें बह पूर्णतानका पिण्ड वा पांच द्रव्य ’ नव तसस्‍वमें एकसा हो रहा है। पांच व्रब्य ओर नव तत्त्वोंसे चेतियता चेतन निराला है,ऐसा श्रद्धान करना ओर इसके सिवाय अन्य भांति भ्रद्धान नहों करना सो सम्यक्दशन हे; ओर सम्यकवशंन हो आत्साका स्वरूप हें। पं० बनारसीदासजो कहते हैं कि वह सम्यकदर्शन अर्थात्‌ आत्माका स्वरूप मेरे हृदयमें प्रगट होवे ॥ ७ ॥

लखन, दशेन, अवलोकन आदि शब्दोका अर्थ जैनागममें कही तो ‘देखना’ होता है
जो दर्शनावरणीय कमंके क्षयोपशमकी अपेक्षा रखता है और कहीं इन शब्दोंका
अधे “‘श्रद्धात करना’ लिया जाता है जो दर्शनमोहनीयके अनुदयकी अपेक्षासे है,
सो यहाँ दर्शनमोहनीयके अनुदयका ही प्रयोजन है ।
३ जुनागम्मे छह द्रब्य कहे हैं; पर यहाँ काल द्रब्यको गौण करके पंचास्तिकायकों
ही द्रव्य कहा है ।
एकत्वे नियतस्य शुद्धनयतो व्याप्लुयंदस्थात्मन:
पूर्णशानधनस्य दर्शनमिह व्रव्याग्तरेभ्य: पृथक ।
सम्यग्वर्शनमेतदेव नियमादात्मा स तावालयम
तन्मुक्ल्या नथतस्वसम्ततिमिसासात्मायमेको5स्सु न: ॥ ६ ॥

जीवकी दशापर अग्निका हृष्टान्त (स्वेया इकत्तीसा)

जसे तृण काठ बांस आरने इत्यादि और,
इंघन अनेक विधि पावकर् दहिये।
आकृति बिलोकित कहावे आग नानारूप,
द दीसे एक दाहक सुभाव जब गहिये।।
तेसे नव तत्त्वमें भयो हे बहु भेषी जीव,
सुद्धच्प मिश्रि असुद्ध रूप कहिये।
जाही छिन चेतना सकतिकों विचार कीज,
ताही छिन अलख अभेदरूप लहिये ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :- आरने>जं गलके ।दाहक-जलानेवाला ।अलख-अरूपी । अभेद-मभेदव्यवहारसेरहित ।

अर्थ :- जेसे कि घास, काठ, बांस वा जंगलके अनेक इंधन आदि अग्निमें जलते हैं, उनकी आक्ृतिपर ध्यान देनेसे अग्नि अनेकरूप दिखती है, परन्तु यदि मात्र दाहक स्वभावपर दृष्टि डाली जाये तो सब अग्नि एकरूप ही है; उसी प्रकार जीव (व्यवहारनयसे) नव तत्त्वोंमें शुद्ध, अशुद्ध, मिश्र आदि अनेक रूप हो रहा है,परन्तु जब उसकी चेतन्यशक्तिपर विचार किया जाता है तब वह (शुद्धनयसे) अरूपी और अभेदरूप ग्रहण होता है ॥ ८ ॥

जीवकी दशापर स्वर्णका दृष्टान्त (सवैया इकतीसा )

जैसे बनवारीमैं कुधातके मिलाप हेम,
नानाभांति भयौ पे तथापि एक नाम है ।
अत. शुद्धनयायत्त प्रत्यग्ज्योतिश्वकास्ति तत ।
नवतस्वगतत्वेषषि यवदेकत्व॑ न मुज्चति ॥ ७॥।
कसिक॑ कसौटो लोकु निरखे सराफ ताहि,
बानके प्रवान करि लेतु देतु दाम है।।
तेसे हो अनादि पुदगलसों संजोगी जोब,
नव॒तत्त्वरूप में अरूपी महा धाम है ।
दीसे उनमानसों उदोतवान ठौर ठोर,
दूसरो न और एक आतमा हो राम है ॥ ६ ॥।

शब्दार्थ :- बनवारी-घरिया । लीकुल्‍रेखा । निरखे-देखता है । बान-चमक । प्रवान-अनुसार । उनमान (अनुमान) -साधनमे साध्यके ज्ञानको अनुमान कहते है, जैसे धूम्रको देखकर अग्निका ज्ञान करना ।

अर्थ - जिस प्रकार सुवर्ण कुधातुक्रे संयोगसे अग्निके तावमें अनेक- रूप होता है, परन्तु तो मीउसका नाम एक सोना ही रहता है तभा सर्राफ कसोटोपर कसकर उसको रेखा देखता हें औरउसकी च्रमकके अनुसार दाम देता-लेता है; उसी प्रकार अरूपी महा दीप्तवान जीव अनादिकालसे पुदूगलके समागममें नवतत्त्वरूप दिखता है, परन्तु अनुमान प्रभाणसे सब हालतोंमें ज्ञानस्वरूप एक आत्मरामके सिवाय और दूसरा कुछ नहीं है ।

भावार्थ :- जब आत्मा अशुम भावमें वर्तता हैतब पापतत्वरूप होता है, जब शुम भावमें वरतंता हैतब पुण्यतत्त्वरूप होता है, और जब शम्र, दस, संयममावसें बतेता हैतब संवररूप होता है,इसी प्रकार मावाखब भावबंध आवियें बतंता हुआ आखव-बंधादिर्प होता है, तथा जब शरोरादि जड़ पदार्थो्में अहंब॒ुद्धि करता हैतब जड़स्वरूप होता है; परन्तु वास्तवमें इन सब अवस्थाओंमें वह शुद्ध सुवर्ण समान निविकार है ॥ ६ ।।

चिरसिति नवतस्‍्त्वच्छन्नमुन्नीयमान
कनकमिय निमरन वर्णमालाकलावे ।
अथ सततविविक्त दृश्यतामेकरूप॑
प्रतिषदर्मिदमात्मज्यो तिरुद्योतमानम्‌ ॥ ८ ॥

अनुभवकी दशामें सू्येका हृष्टान्त (सवैया इकतीसा )

जेसे रवि-मंडलके उदे महिनमंडलमैं,
आतप अटल तम पटल बिलातु है।
तंसे परमातमाकौ अनुभो रहत जोलों.
तौलों कहूँ दुविधा न कहूं पच्छपातु है ।॥
नयकौ न लेस परवानकों न परवेस,
निच्छेपके वंसकौ विधुस होत जातु है।
जे जे वस्तु साधक हैं तेऊ तहां बाधक हें,
बाकी राग दोषकी दसाकी कोन बातु है ॥ १० ॥
शब्वार्थ :- महि-मंडल-प्रथ्वीतल । विलातु हैजलुप्त हो जाता है ।
परवान>प्रमाण । वसकौ>समुदायका । परवेस (प्रवेश )>पहुंच ।

अर्थ :- जिसप्रकार सुर्यके उदयमें भूमंडल पर धृषप फल जाती है और अंधकारका लोप हो जाता है, उसी प्रकार जब तक शुद्ध आत्माक अनुभव रहता हैतब तक कोई विकल्प व नय आदिका पक्ष नहीं रहता । वहां नय- विचारका लेश नहों है, प्रमाणकी पहुंच नहों हैऔर निषक्षेपोंका समुदाय नष्ट हो जाता है । पू्वकी दशामें जो जो बातें सहायक थीं वे होअनुमवकी दशामें बाधक होती हैंऔर राग-द्व षतो बाधक हैंही ।

भावार्थ :- नय तो बस्तुका गुण सिद्ध करता है और अनुभव सिद्ध वस्तुका होता है, इससे अनुभव्त नयका काम हों है, प्रत्यक्ष-परोक्ष आदि प्रमाण असिद्ध वस्तुकों सिद्ध करते हैं सो अनुभवसें वस्त्र सिद्ध ही है अतः प्रमाण भो अनावश्यक है, निक्षेपसे वस्तुकी स्थिति समभमें आती हैसो अनुभवमें शुद्ध आत्म-पदार्थका भान रहता है अतः नितीप भी निष्प्रयोजन उदयति न नयश्रीरस्तमेति प्रमाण क्वजिदपि लञ्व न विद्यो याति निरक्षेपचक्रम्‌ किमप्रमभिदध्मी धाम्नि सर्वकर्षोदस्मि- झनुभवधुषयाते भाति न हूँसमेव ॥ ६ ॥ है, इतना ही नहों ये तीनों अनुभवकों दशामें बाधाकारक हैं परन्तु इन्हें हानिकर समभकर प्रथम अवस्थामें छोड़नेका उपदेश नहीं है, क्योंकि इनके बिना पदार्थंका ज्ञान नहीं होसकता । ये नय आदि साधक हैंऔर अनुभव साध्य है, जेसे कि दंड चक्र आदि साधनोंके बिना घटकी सृष्टि नहीं होती । परन्तु जिसप्रकार घट पदार्थ सिद्ध हुए पीछे दंड चक्र आदि विडंबनारूप ही होते हैं,उसी प्रकार अनुमव प्राप्त होनेके उपरान्त नय निकषेप आवदिके विकल्प हानिकारक हैं॥ १० ॥

शुद्धनयकी अपेक्षा जीवका स्वरूप (अडिल्ल)

आदि अंत प्रन-सुभाव-संयुक्त है ।
पर-सरूप-पर-जोग-कल्पनामुक्त है ।।
सदा एकरस प्रगट कही है जनमें ।
सुद्धनयातम वस्तु विराजे बेनमें ॥ ११ ॥

शब्दार्थ :- आदि अत >सर्देव ।जोग-मयोग । कल्पनामुक्त-कल्पनासे रहित ।

अर्थ :- जीव, आदि अवस्था निगोदसे लगाकर अंत अवस्था सिद्ध पर्यायपर्यन्त अपने परिपूर्ण स्वमावसे संयुक्त हैऔर परद्रव्योंकी कल्पनासे रहित है,सदेव एक चेतन्यरससे सम्पन्न है,ऐसा शुद्धनयकी अपेक्षा जिनवाणी- में कहा है ॥ ११ ॥

हितोपदेश (कवित्त ३१ मात्रा)

सदगुरु कहे भव्यजीवनिर्सों,
तोरहु तुरित मोहकी जेल ।
समकितरूप गही अपनो गुन,
करहु सुद्ध अनुभवको खेल।
आऑस्मस्वभाव॑ परभावभिश्नमापूर्णणाचन्तविमुक्तमेकम्‌ ।
बिलोनसडूल्पविकल्पजालं प्रकाशयन्‌ शुद्ध नयो5्भ्युवेति । १० ॥।
न हि विदधति बद्धस्पृष्टभावादयो5पी
स्फुटमुपरि तरन्तोध्प्येत्य यत्र प्रतिष्ठाम।
अनुभवतु तमेव दोतसानं समन्‍्तात्‌
जगदपग्रतमोहोमूय. सम्यक्स्वभावम ॥ ११ ॥
पुदगलपिड भाव रागादिक,
इनसों नहीं तुम्हारा मेल ।
ए जड़ प्रगट गुपत तुम चेतन,
जैसे भिन्न तोय अरु तेल १२॥॥

शब्दार्थ :- तोरहु–तोड दो । गहौ>ग्रहण करो। गुपत (गुप्त)- अरूपी । तोयच-पानी ।

अर्थ :- भव्य जोबोंको श्रोगुरु उपदेश करते हैं किशीघ्र ही मोहका बन्धन तोड़ दो, अपना सम्यक्‍त्वगुण ग्रहण करो और शुद्ध अनुभवमें मस्त हो जाओ । पुद्गल द्रव्य और रागादिक भावोंसे तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं है । ये स्पष्ट अचेतन हैंऔर तुम अरूपी चेतन्य हो तथा पानीसे भिन्न तेलके समान उनसे न्यारे हो ॥ १२ ॥

सम्यस्टप्टिका विलास वर्णन (सवेया इकतीसा )

कोऊ बुद्धिवंत नर निरखे सरीर-घर,
भेदग्यानहृष्टिसों विचार वस्तु-वासतो ।
अतीत अनागत वरतमान मोहरस,
भीोग्यो चिदानंद लखे बंधमें बिलासतों ॥॥
बंधको विदारि महा मोहको सुभाउ डारि,
आतमाकौ ध्यान कर देखे परगासतों।
करम-कलंक-पंकरहित प्रगटरूप,
अचल अबाधित बिलोक॑ देव सासतो (॥ १३ ॥।
भूत भान्तमभृतमेव रभसा निर्मिद्य बन्धघं सुधो-
येद्चन्त. किल को5्प्यहो कलयति व्याहृत्य मोह हठात्‌ ।
आत्मात्मानुभवेकगस्यमहिमा व्यक्तो5यमास्ते ध्रुवस
नित्य कर्मकलड्डूविकलो देव: स्वयं शाखश्व तः ॥ १२ ॥

शब्दार्थ :- विदारि>नष्ट करके । पंक-कीचड । भेदज्ञान-आ त्माको शरीर आदिसे पृथक जानना । अर्थ .- कोई विद्वान् मनुष्य शरी ररूपी घरको देखे और भेदशानको हृष्टिसे शरोररूपो घरमें बसनेवाली आत्मवस्तुका विचार करे तो पहिले भूत, वर्तमान, मविष्यत्‌ तोनों कालमें मोहसे अनुरंजित और कमंबंधमें क्रीड़ा करते हुए आत्माका निश्चय करे, इसके पश्चात्‌ मोहके बन्धनको नष्ट करे और मोहो स्वमावकों छोड़कर आत्मध्यानमें अनुभवका प्रकाश करे; तथा कर्म-कलंककी कीचड़से रहित अचल, अबाधित, शाश्वत अपने आत्मदेवको प्रत्यक्ष देखे ॥ १३ ॥

गुणगुणी अभेद हैं, यहविचारनेका उपदेश करते है। (सवेया तेईसा)

सुद्धनयातम आतमकीो,
अनुभूति विज्ञान-विभूति है सोई ।
वस्तु विचारत एक पदारथ,
नामके भेद कहावत दोई॥॥।
याँ सरवंग सदा लखि आपुहि,
आतम-ध्यान करें जब कोई।
मेटि असुद्ध विभावदसा तब,
सुद्ध सरूपकी प्रापति होई॥ १४॥
शब्वार्थ :- विभाव-पर वस्तुके सयोगसे जो विकार हों । विभूति-
सम्पदा ।

अर्थ :- शुद्ध नयके विषयभूत आत्माका अनुभव हो ज्ञानसम्पदा है, आत्मा और ज्ञानमें नाममेद हैवस्तुमेव नहों है। आत्मा गुणी है शान गुण है, सोगुण और गुणीकों पहिचानकर जब कोई आत्म-ध्यान करता हैतब उसको रागादि अशुद्ध दशा नष्ट होकर शुद्ध अवस्था प्राप्त होती है । आत्मानुमृतिरिति शुद्धनयात्मिका या ज्ञानानुमृतिरियमेव कलिति बुद्धवा। आत्मानभात्मनि लिवेश्य सुनिष्प्रकस्प- मेको$ह्ति नित्यमवथो धन: समन्‍्तात्‌ ॥ १३ ॥ जीवहार ३७ मावार्थ :- आत्मा गुणी है ओर जान उसका गुण है, इनमें वस्तुभेद नहों है । जैसे अग्निका गुण उष्णता है, यवि कोई अग्नि और उष्णताको पृथक करना चाहे तो नहीं हो सकते । उसी प्रकार ज्ञान और आत्माका सहभावी सम्बन्ध हैपर नामभेद अवश्य हैकि यह गुणी हैऔर यह उसका गुण है॥॥ १४४

ज्ञानियोंका चितवन (सवेया इकतीसा )

अपनेही गुन परजायसों प्रवाहरूप,
परिनयोौ तिहूं काल अपने अधारसों ।
अन्तर-बाहर-परकासवान एकरस,
खिन्नता न गहे भिन्न रहै भो-विकारसों ।।
चेतनाके रस सरवंग भरि रह्यौ जीव,
जसे लॉन-कांकर भरचो हैरस खारसों ।
पुरन-सुरूप अति उज्जल विग्यानघन,
मोकों होहू प्रगट विसेस निरवारसों ॥ १५ ॥

शब्दार्थ :- खिन्नतानन्यूनता । भा (भव )८”संसार । लौंन-कांक नमककी डली । निरवारसौ-८क्षयसे ।

अर्थ - जोब पदार्थ सदेव अपने ही आधार रहता है और अपने ही घाराप्रवाह गुण-पर्यायोंमें परिणमन करता है, बाह्य और अम्यन्तर एकसा प्रकाशवान रहता हैकमी कमतो नहों होता, वह संसारके विकारोंसे पृथक है, उसमें चतन्यरस ऐसा ठसाठस मर रहा है, जेसे किनमकको डली खारेपनसे भरपूर रहती है। ऐसा परिपूर्ण स्वरूप, अत्यन्त निविकार, विज्ञानघन आत्सा मोहके अत्यन्त क्षयसे मुझे प्रगट होवे ॥ १५ ॥

अखब्डितमनाकुल॑ ज्वलबनम्तमन्तर्व हि-
मंह: परममस्तु नः सहजमुद्विलासं सदा ।
जिदुरछलननिर्भर सकलकालमालस्यसे
यदेकरसमुल्लसल्लब राखिल्यलीलायितम्‌ ।! १४ ॥।

साध्य-साधकका स्वरूप व द्रव्य और गृण-पर्यायोकी अभेद-विवक्षा (कवित्त)

जह प्र बध्म कर्मेछझथ लच्छन,
सिद्धि समाधि साधिपद सोई।
सुद्धपोग जोग. महिमंडित,
साधक ताहि कहे सब कोई ॥।
पाौं परतच्छ परोच्छ रूपसों,
साधक साधि अवस्था दोई।
दुहुको एक ग्यान संचय करि,
सेव सिवबंछक थिर होई ॥ १६ ॥
शब्दार्थ .- ध्रुवधर्म>अविनाशी स्वभाव । साध्य-जो इष्ट अबाधित
और असिद्ध हो । सुद्धपयोग-वीतराग परिणति । सिववछक–मोक्षका
अभिलाषी । धिर>स्थिर ।
अथ :- सम्पूर्ण कर्म-समुदायसे रहित और अविनाशी स्वभाव सहित
सिद्धपद साध्य और मन, बचन, कायके योगों सहित शुद्धोपयों गरूपअवस्था
साधक है। उनमें एक प्रत्यक्ष और एक परोक्ष है, ये दोनों अवस्थाएँ एक
जीवकी हैं,ऐसा जो प्रहण करता हैवही मोक्षका अभिलाषो स्थिर-चित्त
होता है ।

भावार्थ :- सिद्ध अवस्था साध्य है और अरहंत, साधु, श्रावक, सम्यवत्वी आदि अवस्थाएँ साधक हैं; इनमें प्रत्यक्ष-परोक्षका भेद है। ये सब अवस्थाएं एक जीवकी है ऐसा जाननेबाला हो सम्यग्हृष्टि होता है ॥ १६ ॥

द्रव्य और गुण-पर्यायोंकी भेद-विवक्षा (कवित्त )

दरसन-ग्यान-चरन त्रिगुनातम,
समलरूप कहिये. विवहार ।
१ पूर्व अवस्था साधक और उत्तर अवस्था साध्य होती है ।
एप ज्ञानधनो नित्यमात्मा सिद्धिमभीप्सुसि ।
साध्य-साधकभावेन द्विधेक: समुपास्यताम ॥ १५ ॥
दर्शनज्ञानचा रित्रेस्त्रित्वादेकत्वत:. स्वथम ।
सेचको3मेचकश्राप सममात्मा प्रमाणत: ॥ १६॥
निह्च-टष्टि. एकरस चेतन,
भेदरहित अविचल अविकार ।
सम्यकदसा प्रसान उभे नय,
निर्मल समल एक ही बार।
यों समकाल जीवकी परिनति,
कहें जिनेंद गहे गनधार ॥ १७ ॥

शब्दार्थ :- समल->यहाँ समल शब्दसे असत्यार्थ, अभूतार्थका प्रयोजन है । निमेल-इस शब्दसे यहाँ सत्यार्थ, भूतार्थका प्रयोजन है। उसमें तय> दोनों नय (निश्चय और व्यवहार नय) । गनधारज्गणधर (समवशरणके प्रधान आचाये ) । अथ .- व्यवहार नयसे आत्मा दर्शन, ज्ञान, चारित्र तोन गुणरूप है; यह व्यवहार नय निश्चयको अपेक्षा अभतार्थ है, निश्चय नयसे आत्मा एक चेतन्यरससम्पन्न, अभेद, नित्य और निविकार है। ये दोनों निश्चय और व्यवहार नय सम्यग्टष्टिको एक हो कालमें प्रमाण हैं; ऐसी एक हो समयमें जीवकी निर्मेल समल परिणति जिनराजने कही हैऔर गणधर स्वामीने धारण को है ॥ १७ ॥

व्यवहार नयसे जीवका स्वरूप (दोहा)

एकरूप आतम दरब, ग्यान चरन हग तीन ।
भेदभाव परिनामसों, वियहारं सुमलीन ॥ १८ ॥

अर्थ :- आत्मद्रव्य एकरूप है, उसको दर्शन, ज्ञान, चारित्र तोन भेद- रूप कहना सो व्यवहार" नय है- असत्याथ है ॥ १८ ॥

" दोहा -जेते भेद विकल्प हैं, ते तेसब विवहार।
निराबाध निरकल्प सो, निश्चय नय निरधार ।।
व्शनज्ञानचा रित्रेस्त्रिभिः परिणतत्वव: ।
एकोइपि त्रिस्वभावत्थाहयबहारेण मेचक: ॥ १७ ॥

निश्चय नयसे जीवका स्वरूप (दोहा)

जदपि समल विवहारसों, पर्येय-सकति अनेक ।
तदपि नियत-नय देखिये, सुद्ध निरंजन एक ॥ १६ ॥

शब्दार्थ :- नियत-निश्चय । निरजन>कमंमल रहित ।

अर्थ :- यद्यपि व्यवहार नयकी अपेक्षा आत्मा अनेक गुण और पर्यायवान है तो भी निश्चय नयसे देखा जाये तो एक, शुद्ध, निरंजन ही है ॥ १६ ॥

शुद्ध निश्चय नयसे जीवका स्वरूप (दोहा)

एक देखिये जानिये, रमि रहिये इक ठौर ।
समल विमल न विचारिये, यहै सिद्धि नहि और ॥ २० ॥

शब्दार्थ :- रमि रहना-विश्राम लेता । ठौर-स्थान ।

अर्थ :- आत्माको एकरूप श्रद्धान करना या एकरूप ही जानना चाहिये, तथा एकमें ही विश्राम लेना चाहिये, निमेल समलका विकल्प मे अरना चाहिये । इसोमें सर्बंसिद्धि है,दूसरा उपाय नहीं है । भावाथ :- आत्माको निर्मेल समलके विकल्प रहित एकरूप भ्रद्धान करना सम्यग्दशन है, एकरूप जानना सम्यकज्ञान हैओर एकरूपमें ही स्थिर हीना सम्यकचारित्र है, यही मोक्षका उपाय है ॥ २० ॥

शुद्ध अनुभवकी प्रशसा (सवेया इकतीसा )

जाक पद सोहत सुलच्छुन अनंत ग्यान
विमल विकासबंत ज्योति लहलही है ।
परमार्थेन तु॒ व्यक्तज्ञातृत्वज्यो तिषंकक: ।
सर्वभावान्तरध्वसिस्वभावत्वाबभसेचकः. ॥। (८ ॥।
आत्मनश्रिन्तयवाल॑ सेचकामेचकत्वयो: ।
दशनशानघारिधत्रे: साध्यसिद्धिन चान्यथा ॥ १६ ॥
कथमपि समुपात्तत्रि
स्वभ्रप्पेकताया:
अपतितमिदमात्मज्योतिरद्गरछदच्छम ।
सततमनुभवामोध्नस्तचेतन्यचिह_न॑
न खलु न खलु यस्मादन्यथा साध्यसिद्धि: ॥ २० ॥
यद्यपि त्रिविधरूप विवहारमें तथापि
एकता न तज्ज यों नियत अंग कही है ।।
सो है जीव कंसीहूं जुगतिक सदीव ताके,
ध्यान करिबंकों मेरी मनसा उनही है ।
जाते अविचल रिद्धि होत और भांति सिद्धि,
नाहों नाहीं नाहीं यामें धोखो नाहीं सही है ॥ २१ ॥
शबदार्थ :- जुगति-युक्ति ।मनसा-अभिलापा । उनही हैज"तत्पर हुई
है। अविचल रिद्धिन्मोक्ष । धोखोन्सन्देह ।
अथे :- आत्मा अनंत ज्ञानरूप लक्षणसे लक्षित हे, उसके ज्ञानको
निर्मल प्रकाशवान ज्योति जग रही है, यद्यपि वह व्यवहारनयसे तीनरूप*
हैतो भी निश्चय नयसे एक ही रूप हे, उसका किसी भी युक्तिसे सदा ध्यान
करनेको मेरा चित्त उत्साहित हुआ है,इसीसे मोक्ष प्राप्त होती हैं औरकोई
दूसरा तरीका कार्य सिद्ध होनेका नहों है ! नहीं है !! नहीों’ हे !!!
इसमें कोई सन्देह नहों हैबिलकुल सच है ॥ २१ ॥

ज्ञाताकी अवस्था (सववेया तेईसा)

क॑ अपनों पद आप संभारत,
के गुरुक मुखकी सुनि बानी ।
भेदविग्यान जग्यो जिन्हिकं,
प्रगटो सुविवेक-कला-रसधानो ॥।
भाव अनंत भए प्रतिबिबित,
जीवन मोख दसा ठहरानी।
) दर्शन, ज्ञान, चारित्र ।
२ यहा बार बार 'नही है! कहके कथनका समर्थन किया है ।
कथमसपि हि लभस्ते मेदबिशानपमूला-
सचलितमनुभृति ये स्वतो वान्यतों वा ।
प्रतिफलननिमग्नाइनन्तभावस्वभावे-
मुंकुरवदविकारा संतत स्युस्त एब॥ २१ ॥
ते नर दर्षन ज्यों अविकार,
रहें थिररूप सदा सूखदानो ॥। २२१)

शब्दार्थ :- रजधानीज"शक्ति । जीवन मोक्षदशा-मानों यहाँ ही मोक्ष प्राप्त कर चुके ।

अर्थ :- अपने आप अपना स्वरूप सम्हालनेसे’ अथवा शभ्ोगुरुके सुखारादिद द्वारा उपदेश सुननेसे* जिनको भेदज्ञान जाप्रत हुआ हैं अर्थात्‌ स्वपर विवेककी ज्ञान शबित प्रगट हुई है, उन सहात्माओंको जीवनमुक्त अवस्था प्राप्त हो जाती हे । उनके निर्मल द्पणवत्‌ स्वच्छ आत्मामें अनंत भाव भलकते हैपरन्तु उनसे कुछ विकार नहीं होता । वे सदा आनंदमें मस्त रहते हैं॥ २२ ॥

भेदविज्ञानकी महिमा (सर्वेया इकतीसा )

याही वर्तमानसमं भव्यनिकोौ मिटों मोह,
लग्यौं हैअनादिको पग्यों है कमंमलसों ।
उदे करे भेदज्ञान महा रुचिकौ निधान,
उरकौ उजारों भारो न्यारो दुद-दलसो।।
जाते थिर रहे अनुभो विलास गहे फिरि,
कबहूं अपनपोा न कहे पुदगलसों ।
यहै करतृति यों जुदाई करं जगतसों,
पावक ज्यों भिन्न करे कंचन उपलसों ॥ २३ ॥

शब्दार्थ :- निधान-खजाना । दुद (द्वढ्व )>सशय । उपलब्पत्थर । महारुचि-हृढ श्रद्धान ।जगत्"-जन्म-मरण रूप ससार । १ यह नैसगिक सम्यग्दशेन है।. २ यह अधिगमज सम्यग्दर्शन है। त्पजतु जगदिदानों भोहमाजन्मलोड़म्‌ रसयतु रसिकानां रोचन ज्ञानसुद्यत्‌ । इह कथमपि नात्माइ्तात्मना साकसेक: किल कलयति काले क्‍्यापि तावात्म्यवक्तिम्‌ ॥ २२ ॥।

जोवदार है है

अर्थ :- इस समय भव्य जीवोंका अनादिकालसे लगा हुआ और कर्स मलसे मिला हुआ मोह नष्ट हो जावे । इसके नष्ट हो जानेसे हुृदयमें महा- प्रकाश करनेवाला, संशय समूहको मिटानेवाला, हृढ श्रद्धानकों रुचि-स्वरूप भेदविज्ञान प्रगट होता है। इससे स्वरूपमें विश्राम और अनुभवका आनन्द मिलता हेतथा शरोरादि पुद्गल पदार्थोमें कभी अहंबुद्धि नहीं रहती । यह क्रिया उन्हें संसारसे ऐसे पृथक बना देती हेंजिस प्रकार अग्नि स्वर्णको किट्टिकासे भिन्न कर देती हे ॥ २३ ॥

परमार्थकी शिक्षा (सवैया इकतीसा )

बानारसी कहे भेया भव्य सुनो मेरी सीख,
कहूं भांति कंसहूंक ऐसो काज्ु कीजिए ।
एकहू मुहरत सिथ्यातकौ विधुस होइ,
ग्यानकों जगाइ अंस हंस खोजि लोजिए ।
बाहीकोौ विचार वाकों ध्यान यहै कौतृहल,
योंही भरि जनम परम रस पीजिए।
तजि भव-वासकौ विलास सविकाररूप,
अंतकरिं मोहकौ अनंतकाल जीजिए ॥ २४ ॥।

शब्दार्थ :- कहूंभांति-किसी भी तरीकेसे। कैसेहुंके-आप किसी प्रकारके बनकर । हस"आ त्मा । कौतृहलज-क्रीडा ।भव-वासकौ विलास>जन्म- मरणकी भटकना । अनतकाल जीजिए>अमर हो जाओ अर्थात्‌ सिद्ध पद प्राप्त करो ।

अर्थ :- पं० बनारसीदासजोी कहते हैं- हेभाई भव्य ! मेरा उपदेश सुनो कि किसी प्रयत्नसे और कंसे ही बनकर ऐसा काम करो जिससे मात्र अंतम्‌हतंके लिये सिथ्यात्वका उदय न रहे, ज्ञानका अंश जाग्रत हो आत्म- १ दो घडी अर्थात्‌ ४५ मिनिठमेसे एक समय कम । अधि कथमपि मृत्या तत्त्वकौतृूहलो स- झनुभव भव मूत्तें: पाश्च वर्त्तोमुहसम । पृथगथ विलसंतं स्व॑ समालोक्य येन त्यजसि ऋषिति मुरतत्या साकमेकत्वभोह्य॥ २३ ॥

स्वरूपको पहिचान होवे । यावज्जीव उसहीका विचार, उसहोका ध्यान,
उसहीकी लोलामें परम रसका पान करो और राग-ह षघमय संसारकी भटकना
छोड़कर तथा मोहका नाश करके सिद्धपद प्राप्त करो ॥ २४॥।

तीर्थंकर भगवानके शरीरकी स्तुति (सवैया इकतीसा )

जाके देह-द्यतिसों दर्सों दिसा पवित्र भई,
जाके तेज आगे सब तेजवंत रुके हैं ।
जाको रूप निरखि थकित महा रूपवंत,
जाकी वपु-बाससों सुवास और लूुके हैं ।।
जाको दिव्यधुनि सुनि श्रवणकों सुख होत,
जाके तन लच्छुन अनेक आइ ढूुके हे ।
तेई जिनराज जाके कहे विवहार गुन,
निहचे निरखि सुद्ध चेतनसों चुके है।। २५१!

शब्दार्थ :- वपु-वाससौ-शरी रकी गधसे । लुके-छूप गये । ढुके-प्रवेश किये । चुके >न्यारे ।

अर्थ :- जिसके शरीरकी आमभासे दशों दिशाएँ पविश्र होती हैंजिसके तेजके आगे सब तेजवान’ लज्जित होते हैं,जिसका रूप देखकर महारूप- वान’ हार मानते हैं, जिसके शरोरकी सुगंधसे सर्व सुगन्धः छिप जाती हैं, जिसकी दिव्यवाणी सुननेसे कानोंको सुख होता हे, जिसके शरीरमें अनेक शुभ लक्षण” आ बसे है; ऐसे तीर्थंकर मगवान है । उनके ये गुण व्यवहार नयसे कहे हैं,निश्चय नयसे देखो तो शुद्ध आत्माके गुणोसे ये देहाथित गुण भिन्न है (१ २५१ ) सूर्य, चन्द्रमा आदि ।

इन्द्र कामदेव आदि। मदार, सुपारिजात आदि पुष्पोकी । कमल, चक्र, ध्वजा, कल्पवृक्ष, सिहासन, समुद्र, आदि १००८ । कान्त्येब स्‍्नपयन्ति ये दशदिशों धाम्ना निरन्धन्ति ये धामोद्याममहस्विनां जनमनो सुथ्णन्ति रूपेण च । दिव्येन ध्वनिना सुख श्रवणयो: साक्षात्क्षरन्तोह्मृुतम्‌ वन्द्यास्तेषष्टसह्सलक्षणधरास्तीरथेश्वरा,. सुरयः ॥ २४ ॥

जामें बालपनों तरुनापो बृद्धपनाँ नाहि,
आयु-परजंत महारूुप महाबल है।
बिना ही जतन जाके तनमें अनेक गुन,
अतिसे-विराजमान काया निर्मल है।।
जेसे बिनु पवन समुद्र अविचलरूप,
तेसे जाको मन अरु आसन अचल है।
ऐसी जिनराज जयवंत होउ जगतमें,
जाकी सुभगति महा सुकृतको फल है ॥ २६ ॥

शब्दार्थ :- तरुनापौ-जवानी ) काया>शरीर । अविचल<स्थिर । सुभगतिशुभभक्ति ।

अर्थ :- जिनके बालक, तरुण और वृद्धपना’ नहीं है, जिनका जन्मभर अत्यन्त सुन्दर रूप और अतुल्य बल रहता है,जिनके शरीरमें स्वत: स्वभाव ही अनेक गुण व अतिशय’ विराजते हैं, तथा शरीर अत्यन्त उज्ज्बल) हैं, जिनका मन और आसन पवनके भोकोंसे रहित समुद्रके समान स्थिर है, वे तीर्थंकर भगवान संसारमें जयवन्त होवें, जिनकी शुमभक्ति बड़े भारी पुण्यके उदयसे प्राप्त होती हैं ॥ २६ ॥

जिनराजका यथार्थ स्वरूप (दोहा)

जिनपद नांहि शरीरको, जिनपद चेतनमाँहि ।
जिनवनेन कछु और है, यह जिनवनंन नांहि ॥। २७४

शब्दार्थ :- और-दूसरा । जिन: जीते सो जिन अर्थात्‌ जिन्होंने काम- क्रोधादि शत्रुओको जीता है । ) बालकवत्‌ अज्ञानता, युवावत्‌ मदान्धपना और बुद्धवत्‌ देह जीर्ण नही होती । २ चौतीस अतिशय । 3 पस्तीता, नाक, राल आदि मल रहित है । नित्यसविका रसुस्थितस्वागमपुर्व सहजलावण्यम्‌ । अक्षोभमिव॒समुव्र जिनेन्द्ररूपं पर॑ं जयति ॥ २५॥

अर्थ :- यह (ऊपर कहा हुआ ) जिन वर्णन नहीं हे, जिन बर्णन इससे निराला है; क्योंकि जिनपद शरीरमें तहीं है, चेतियता चेतनमें है !! २७ ॥।

पुदूगल और चेतन्यके भिन्न स्वभावपर हृष्टान्त (सवेया इकतीसा )

ऊंचे ऊंचे गठ़के कंगूरे यों विराजत हैं,
मानों नभलोक गीलिवेकों दांत दीयो है ।
सोहै चहँँओर उपबनकी सघनताई,
घेरा करि मानौ भूसिलोक घेरि लीयो है ।।
गहिरी गंभीर खाई ताकी उपमा बनाई,
नोचो करि आनन पताल जल पीयो है ।
ऐसो है नगर यामें नुपको न अंग कोऊ,
योंही चिदानंदसों सरोर भिन्न कोयो है ॥ २८ ॥
शड्दाथे:- गढजकिला । नभलोक>स्वगं । आनन->मुंह ।

अर्थ :- जिस नगरसें बड़े-बड़े ऊंचे किले हैंजिनके कंग्रे ऐसे शोभाय- मान होते हैंमानो स्वगंलोक निगल जानेके लिये दांत हो फंलाये हैं,उस नंगरके चारों ओर सघन बगीचे इस प्रकार सुशोभित होते हैं मानो सध्य- लोक हो घेर रकखा हेऔर उस नगरको ऐसी बड़ी गहरी खाइयाँ हैं मानो उन्होंने नीचा मु हू करके पाताल लोकका जल पो लिया हैं, परन्तु उस नगरसे राजा भिन्न ही हैउसी प्रकार शरोरसे आत्मा भिन्न हैं

भावार्थ :- आत्माको शरीरसे सर्वंथा निराला गिनना चाहिये। शरोरके कथनको आत्माका कथन नहों समझ जाना चाहिये ॥ २८ ॥

तीर्थंकरके निश्चय स्वरूपकी स्तुति (सवेया इकतीसा )

जाम लोकालोकके सुभाव प्रतिभासे सब,
जगी ग्यान सकति विमल जेसी आरसी ।
… प्राकारकवलितांबरघुपबनराजोनिगीणभूमितलं ।
पिवतीय हि नगरसिद परिखावलयेन पातालस्‌ ॥ २६ ॥
दर्सन उद्योत लीयौ अंतराय अंत कीयो,
गयो महा मोह भयों परम मसहारसो ।।
संन्यासो सहज जोगी जोगसों उदासी जामें,
प्रकृति पचासो लगि रही जरि छारसी ।
सोहै घट मंविरमें चेतन प्रगटरूप,
। ऐसो जिनराज ताहि बंदत बनारसो ॥ २६ ॥

शब्दार्थ :- प्रतिभासे-प्रतिबिबित होता है । वर्शन-यहाँ केवल दर्शनका प्रयोजन है । छारसीझराखके समान ।

अर्थ :- जिन्हें ऐसा ज्ञान जाग्रत हुआ हे कि जिसमें दर्षणके समान लोक-अलोकके भाव प्रतिबिबित होते हैं, जिन्हें केवलदशन प्रगट हुआ है, जिनका अंतरायकर्म नष्ट हुआ है, जिन्हें महामोह कर्मके नष्ट होनेसे परम साधु व भहासंन्यासो अवस्था प्राप्त हुई हे, जो स्वाभाविक योगोंको धारण किये हैं तोभी योगोंसे विरकक्‍त हैं, जिन्हें मात्र पचासो" प्रकृतियां जरी जेबरोफी भस्मके समान लगी हुई हैं; ऐसे तीर्थंकर देव देहरूप वेवालयमें स्पष्ट चेतन्य मूति शोमायमान होते हैं,उन्हें पं>० बनारसीदासजी नमस्कार करते हैं ॥ २६ ॥ १ १ अस्ाता वेदनीय २ देवगति । पांच शरोर- ३. औदारिक ४. वेक्तियक ५ भाहारक ६ तंजपत, ७ कार्माण। पांच बंधन - ८५.औदारिक €. वेक्रियक १०. आहारक ११. तेजस १२. फार्माण । पांच संघात- १३. ओऔदारिक १४. वेक्रियक १५. आहारक १६ तेजस १७. कार्माण। छह संस्थान - १८ सम- चतुरस्र संस्थान १६ न्यग्रोधपरिमंडल २० स्वातिक २१. वामन २२. कुब्जक २३. हुंडक । तीन आंगोपांग -२४ ओऔदारिक २४ वेक्रियक २६, आहारक । छह संहूनन -२७. वज्यवषभनाराच २८. वद्धनाराच २६. नाराच ३० बढ़ नाराच ३१. कीलक ३२ स्फाटिक । पांच वर्ण - ३३. काला ३४. नीला ३५ पीला ३६ सफेद ३७. लाल । दो ग्रंघ- ३८. सुगंध ३६. दुगगन्ध । पांच रस - ४० तिक्त (तीखा) ४१. अम्ल (खट्टा) ४२. कड॒वा ४३ मीठा ४४ कषायला । आठ स्पश -४५ कोमल ४६ कठोर (कड़ा) ४७. शीत ४८ उष्ण ४६९. हलका ५०. भारी ५१. स्निग्ध ५२. रूक्ष ५३. देवगति प्रायोग्यानुपृ्वं ५४. अगुरुलधु ५५ उपचघात ५६. परघात ५७ उच्छवास ५८. प्रशस्तविहायोगति ५६ अप्रश स्तविहायोगति ६० अपर्याष्तक ६१. प्रत्येक शरीर ६२ स्थिर ६३ अस्थिर ६४. शुभ ६५. अशुभ ६६ दुर्मम ६७ सुस्वर ६८५. दुस्वर ६६. अनादेय ७० अयश कोति ७१ निर्माण ७२ नीच गोत्र ७३ साता वेदनीय ७४. मनुष्यगति ७५ मनुष्यायु ७६ पचेन्द्रिय जाति ७७. मनुष्यगति प्रायोग्यानुपृर्व ७८ त्रस ७६. बादर ८०. पर्याप्तक ८९ सभग ८२. आदेय ८३ यश: कीति ८४. तीथंकर ८५ उच्च गोत्र ।

निश्चय और व्यवहार नयकी अपेक्षा शरीर और जिनवरका भेद (कवित्त )

तन चेतन विवहार एकसे,
निहय भिन्न भिन्न हैं दोइ।
तनकी थुति विवहार जीबथुति,
नियतदृष्टि मिथ्या थ्रुतिसोइ ।।
जिन सो जीव जीव सो जिनवर,
तन जिन एक न माने कोइ ।
ता कारन तनकी संस्तुतिसों,
जिनवरको संस्तुति नाहि होइ ॥ ३० ॥)

शब्दार्थ :- सस्तुति>स्तुति ।

अर्थ :- व्यवहारनयसे शरीर और आत्माकी एकता है, परन्तु निश्चयनयमें दोनों जुदे-जुदे हैं। व्यवहारनयमें शरीरकी स्तुति जीवकी स्तुति गिनी जाती हैपरन्तु निश्चयनयकी हृष्टिसे वह स्तुति मिथ्या है । निश्चयनय सें जोजिनराज हैवहो जीव हैऔर जो जीव हैबही जिनराज हे, यह नय शरोर और आत्माको एक नहीं मानता इस कारण निश्चयनयसे शरीरकी स्तुति जिनराजकी स्तुति नहों होसकती ॥ ३० ॥

वस्तु स्वरूपकी प्राप्तिमे गुप्त लक्ष्मीका हृ्टान्त (सबेया तेईसा)

ज्यों चिरकाल गड़ी वसुधामहि,
मूरि महानिधि अंतर गूझो।
कोउ उखारि धरे महि ऊपरि,
जे हगवंत तिन्‍्हें सब सूकी ॥।
एकत्वं ब्यवहारतो नतु पुन कायात्मनोनिश्चया-
ल्नुः स्तोत्र ब्यवहारतो5स्ति बपुष:ः स्तुत्या न तत्तत्त्वतः ।
स्तोत्र निश्वयतश्चितो भवति चित्स्तुत्पेव संबं भबे-
प्ातस्तोर्थयकरस्तवोत्तरबलादेकत्वमात्माजूयो: ॥ २७ ॥
त्यां यह आतम्की अनुभूति,
पड़ी जड़भाउ अनादि अरूझी ।
ने जुगतागम साथि कही गुरु,
लच्छन-वेदि विचच्छन बृकी ॥ ३१ ॥

शब्दार्थ :- चिरकाल-बहुत समय । वसुधा->पृथ्वी । भूरि-बहुतसी । गूभी-छुपी हुई । महि-पृथ्वी । अरूकी >उलझी । विचच्छन (विचक्षण )5 चतुर । लच्छन-वेदि>लक्षणोके ज्ञाता । बुभीजसमभी ।

अर्थ :- जिस प्रकार बहुत समयसे पृथ्वीके अंदर गड़े हुए बहुतसे घनको उखाड़कर कोई बाहर रख देवे तो नेत्रवानोंको वह सब दिखने लगता हैउसी प्रकार अनादि कालसे अज्ञानभावमें दबोी हुई आत्मज्ञानकी सम्पदाको श्रीगुरुने नय, युक्ति औरआगमसे सिद्ध कर समभाया है, उसे बिद्वान लोग लक्षणसे पहिचानकर ग्रहण करते हैं। विशेष :- इस छन्दमें ‘हगवंत’ पद दिया है, सो जिस प्रकार बाहर निकाला हुआ धन भी नेत्रवालोंको होदिखता है- अंधोंको नहों दिखता, उसी प्रकार भ्रीगुरु द्वारा बताया हुआ त्त्वज्ञान अंतहषिट भव्योंको हो प्राप्त होता है, दीघ॑ संसारी और अभव्योंकी बुद्धिमें नहीं आता ॥ ३१ ॥

भेदविज्ञानको प्राप्तिमें धोबीके वस्त्रका हृष्टान्त (सवेया इकतीसा )

जेसे कोऊ जन गयौ धोबीक॑ सदन तिन,
पहिरधौ परायो वस्त्र मेरो मानि रह्मो है ।
धनो देखि कह्मौँ भया यह तो हमारों वस्त्र,
चोन्हें पहिचानत ही त्यागभाव लक्यों है।।
इति पॉरिचिततत्त्वरात्मकार्यकताया
नयबिभजनयुकक्‍त्यात्यन्तमुच्छादितायाम्‌ ।
अवतरत्ति न बोधों बोपमरेवाद्य कस्य
र्वस्सरभसकृष्ट.. प्रस्फुटन्लेक एवं ॥ २८ ॥
पी न 8 2 नर लक अप
तेसेही अनादि पुदगलसौ संजोगी जीव,
संगके ममत्वतोँ विभाव तामे बह्मौँ है।
भेदज्ञान भवौ जब आपो पर जान्यो तब,
न्यासे॑ परभावसो स्वभाव निज गह्माँ है।। ३२ १।

शब्दार्थ :- सदनल्‍ूघर । धनीरूमालिक । विभावचू्पर बस्तुके सयोगमसे जो विकार हा ।

अर्थ :- जैसे कोई मनुष्य धोबोके घर जावे और दूसरेका कपड़ा पहिनकर अपना मानने लगे, परन्तु उस बस्त्रका मालिक देखकर कहे कि यह तो मेरा कपडा है,तो वह मनुष्य अपने वस्त्रका चिह्द देखकर त्यागब॒द्धि करता है; उसी प्रकार यह कमंसंयोगी जीव परिग्रहके ममत्वसे विभावमें रहता है, अर्थात्‌ शरीर आदिको अपना मानता हैपरन्तु भेदविज्ञान होनेपर जब निज-परका विवेक हो जाता हैतो रागादि भावोंसे भिन्न अपने निज स्वभावको ग्रहण करता है॥ २२ ॥

निजात्माका सत्य स्वरूप (अडिब्ल छन्द )

कहै विचच्छन पुरुष सदा म॑एक हों ।
अपने रससों भन्‍्यो आपनो टेक हों॥।
मोहकर्म मम नांहि नांहि भ्रमकप है ।
सुद्ध चेतता सिधु हमारो रूप है॥३३॥

शब्दार्थ :- टेक>महारा । ममजमेरा । सिधुनममुद्र ।

अर्थ :- ज्ञानी पुरुष ऐसा विचार करता है कि मे सदेव अकेला हूं, अपने ज्ञान-दर्शन रससे भरपूर अपने ही आश्रय हूं । भ्रमजालका कृप सोह- अवतरति न यादवद्व त्तिमत्यन्तवेगा- दनवमपरभावस्यागहृष्टान्तहृ प्टि: । भटिति सकलभावे रन्यदोय विपुक्ता स्वयमियमनुभृतिस्तावदाविबं भूव ॥ २६ ॥

सर्वत स्वस्मनिर्भरभाव चेतये स्वयमह स्वमिहेकम्‌ ।
नास्ति नास्ति मप्त कश्वन मोह. शुद्ध चिदघनमहों निधिरस्मि । ३० ॥।
कर मेरा स्वरूप नहों है ! नहों’ है !! मेरा स्वरूप तो शुद्ध चेतन्यसिधु
है ॥ ३३ ॥

तत्त्वज्ञान होनेपर जीवकी अवस्थाका वर्णन (स्वेया इकतीसा)

तत्त्वकी प्रतीतिसों लख्यों हैनिजपरगुन,
…_हग ज्ञान चरन त्रिविधि परिनयों है।
विसद दिवेक आयो आछो विसराम पायो,
आपुहीम आपनो सहारो सोधि लयो है ।।
कहत बनारसी गहत पुरुषारथकों,
सहज सुभावसों विभाव मिटि गयो है ।
पन्नाके पकायें जंसे कंचन बविमल होत,
तेसे सुद्ध चेतन प्रकास रूप भयो है॥ ३४ ॥

शब्दार्थ :-प्रती ति-श्रद्धान ।विशद-निर्मेल ।विसराम (विश्राम )- चेन । सोधिज्खोज करके । पन्नाके पकायें जैसे कचन विमल होत>अशुद्ध सोनेके छोटे छोटे टुकड़े करके कागजके समान पतला पीटठते है उन्हे पन्ना कहते है। उन पतच्नोंको नमक तेल आदिकी रसायनसे अग्निमें पकाते है तो माना अत्यन्त जुद्ध हो जाता है, इस रीतिसे शोधा हुआ सोना नेशनल पाटला आदिसे बहुत उच्चतम होता है ।

अर्थ :- तत्त्वश्रद्धान होनेसे निज-पर गुणको पहिचान हुई जिससे अपने निज ग्रुण सम्यग्द्शन, ज्ञान, चारित्रमें परिणमन किया है, निर्मल भेदविज्ञान होनेसे उत्तम विश्राम मिला और अपने स्वरूपमें होअपना सहा- यक खोज लिया । पं० बनारसीदासजी कहते हैं कि इस प्रयत्नसे स्वयं हो विभाव परिणमन नष्ट हो गया ओर शुद्ध आत्मा ऐसा प्रकाशवान हुआ जेसे रसायनमें स्वर्णके पत्र पकानेसे वह उज्ज्वल हो जाता है ॥ ३४ ॥

गहा दो बार नहीं है’ कहकर विषयका समर्थन किया है ।
इति सति सह ॒सर्वेरन्यभाज बिवेके
स्वयम्यसुपयोगो विश्वदात्मानमेकम ।
प्रकटितपरमार्येदशनज्ञानवरत्त :
कृतपरिणतिरात्माराम एवं प्रवत्त:॥ ३१ ॥
या न समयसार
ममनाटक कर

वस्तुस्वभावकी प्राप्तिमे नटीका हृ्टान्त (संठैया इकतीसा)

जसे कोऊ पातुर बनाय बस्त्र आभरन,
आवति अखारे निसि आड़ौ पट करिके ।
दृुहूँओर दोवटि संवारि पट दूरि कीज,
सकल सभाके लोग देखे हृष्टि धरिक ॥।
तेस ग्यान सागर मिथ्याति ग्रंथि भेदि करि,
उमग्यौ प्रगट रह्यो तिहूं लोक भरिके ।
ऐसो उपदेस सुनि चाहिए जगत् जीव,
मुद्धता संभारे जग जालसो निसरिक ॥ ३५ ॥
शब्दार्थ “-पातुर (पात्रा )-नटी,नाचनेवाली । अखारे- ताट्यशालामे ।
निशि>रात्रि । पटय्वस्त्र, परदा । ग्रथि>्गाठ । मिसरिके८ निकलकर ।

अर्थ :- जिस प्रकार नटो रात्रिमें वस्त्राभुषणोंसे सजकर नाटयशालामें परदेकी ओटमें आ खडी होती है तोकिसीको दिखाई नहीं देती, परन्तु जब दोनों ओरके शमादान ठीक करके पर्दा हटाया जाता हैतो सभाकी सब मडलोकों साफ दिखाई देतो है, उसी प्रकार ज्ञानका समुद्र आत्मा जो मिथ्यात्वके परदेमे ढंक रहा था सो प्रगट हुआ जो ज्लोक्यका ज्ञायक होवेगा । श्रीगुरु कहते हैकि हेजगवासी जीवो ! ऐसा उपदेश सुनकर तुम्हे जगज्जालसे निकलकर अपनी शुद्धता सम्हालना चाहिये ॥ ३५ ॥ मज्जन्तु निर्भरममी समसंब लोका आलोकमुच्छुलति शान्तरसे समस्ता. । आप्लात्य विश्रमतिरस्करिणो भरेण प्रोन्‍्मस्त एप भगवानवबोधसिन्धु’ ॥ ३२ ॥ दा सगे मुसिका ॥ 2 ॥ प्रथम अधिकारका सार आत्मपवार्थ शुद्ध, बुड, निविकल्प, वेहातीत, चिछ्चमत्कार, विज्ञान- घन, आनंदकंद, परमदेव, सिद्ध सहश है। जेसा वह अनादि है बसा अनंत भी हैअर्थात्‌ न कमी उत्पन्न हुआ हैऔर न कभी नष्ट ही होगा । यद्यपि वह अपने स्वरूपसे स्वच्छ हैपरन्तु संसारी दशामें जबसे वह है तभीसे अर्थात्‌ अनाविकालसे शरोरसे संबद्ध है औरकरमंकालिमासे मलिन है। जिस प्रकार कि सोना धाऊको दशामें कर्दम सहित रहता हैपरन्तु भट्टीमें पकानेसे शुद्ध सोना अलग हो जाता है ओर किट्टिमा पृथक हो जाती है उसी प्रकार सम्यकतप मुख्यतया शुक्लध्यानकी अग्निके द्वारा जीवात्मा शुद्ध हो जाता हैऔर कमंकालिमा पृथक हो जाती है। जिस प्रकार जोहरी लोग कर्दंम मिले हुए सोनेको परखकर सोनेके दाम वेते-लेते हैं उसी प्रकार ज्ञानी लोग अमित्य और मलभरे शरोरमें पुणंज्ञान और पूर्ण आनंदमय परमात्माका अनुभव करते हैं। जब कपड़ेपर मैल जम जाता है तब मलिन कहाता है, लोग उससे ग्लानि करते हैं ओर निरुषयोगी बतलाते हैं, परन्तु विवेकहृष्टिसे विचारा ज्ञावे तो कपड़ा अपने स्वरूपसे स्वच्छ हेसाबुन पानीका निमित्त चाहिये । बस ! सैल सहित वस्त्रके समान कर्देस सहित आत्माको सलिन कहना व्यवहारनयका विषय है, और मैलसे निराले स्वच्छ वस्त्रके समान आत्माको कमंकालिमासे जुदा हो गिनना निश्चयनयका विषय है । अभिप्राय यह है कि, जोवपर वास्तवमें कमंकालिमा लगती नहीं हैकपड़ेके मेलके समान वह शरोर आदिसे बेंधा हुआ है, भेदविज्ञानरूप साबुन और समतारसरूप जल द्वारा वहु स्वच्छ हो सकता है । तात्परय यह कि जीदको देहसे भिन्न शुद्ध बुद्ध जाननेवाला निश्चयनय है और शरीरसे तनन्‍्मय, राग-ह ष-मोहसे मलिन कर्मके आधोन करनेवाला व्यवहारनय है। सो प्रथम अवस्थामें इस नयज्ञान के द्वारा जोवको शुद्ध और अशुद्ध परिणतिको समभकर अपने शुद्ध स्वरूपसें लोन होना चाहिये इसोका नाम अनुभव है। अनुभव प्राप्त होनेके अनंतर फिर नयोंका विकल्प सी नहीं रहता इसलिये कहना होगा कि नय प्रथम अवस्थामें साधक हैं और आत्माका स्वरूप समभे पोछे नयोंका काम नहों है। गुणोंके समूहको द्रव्य कहते हैं,जोवके गुण चेतन्य, ज्ञान, दर्शन आदि हैं। द्रव्यकी हालतको पर्याय कहते हैं,जोवको पर्यायें नर, नारक, देव, पशु, आदि हैं। गुण और पर्यायोंके बिना द्रव्य नहीं होता और गुण-पर्याय बिना द्रव्यके नहों होते, इसलिये व्रब्य और गुण-पर्यायोंमें अव्यतिरिक्त भाव है । जब पर्यायकों गौण और द्रव्यको मुख्य करके कथन किया जाता है तब नय द्रव्याथिक कहलाता हैओर जब पर्थायको मुख्य तथा द्रव्ययों गोण करके कथन किया जाता हैतब तय पर्यायाथिक कहलाता है । द्रव्य सामान्य होता है और पर्याय विशेष होता है, इसलिये द्रव्याथिक और पर्यायाथिक नयके विषयमें सामान्य-विशेषका अन्तर रहता है। जीवका स्वरूप निश्चयनयसे ऐसा है, व्यवहा रनयसे ऐसा है, द्रृव्याथिकतयसे ऐसा है, पर्यायाथिकनयसे ऐसा है, अथवा नयोंके भेद शुद्ध निश्चयनय, अशुद्ध निश्चयनय, सद्भूत व्यवहारनय, असदुभूत व्यवहारनय, उपचरित व्यवहारनय इत्यादि विकल्प चित्तमें अनेक तरंगें उत्पन्न करते हैं,इससे चित्तको विश्ञाम नहीं मिल सकता, इसलिये कहता होगा कि नयके कललोल अनुभवमें बाधक हैंपरन्तु पदार्थका यथार्थ स्वरूप जानने और स्वभाव-विभावके परखनेमें सहायक अधदय हैं। इसलिये नय, निक्षेप और प्रमाणसे अथवा जैसे बने तेसे आत्मस्वरूपकी पहिचान करके सर्देव उसके विचार तथा चितबनमें लगे रहना चाहिये ।

अजीव द्वार (२)

अजीव अधिकार वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा (दोहा)

जीव तत्त्व अधिकार यह, कह्मौं प्रगट समुभझाय ।
अब अधिकार अजीवको, सुनहु चतुर चित लाय ॥ १ ॥

शब्दार्थ :-चतुर-विद्वान् । चित-मन । लाय-लगाकर ।

अर्थ :- यह पहिला अधिकार जीवतत्त्वका समकाकर कहा, अब अजीवतत्त्वका अधिकार कहते हैं, हेविद्वानों !उसे मन लगाकर सुनो ॥३१॥। मगलाचरण-भेद विज्ञानद्वारा प्राप्त पूर्णज्ञानकी बंदना

(सर्वेया इकतीसा )

प्रम प्रतोति उपजाय गनधरकीसी,
अंतर अनादिकी विभावता विदारी है ।
भेदग्यान हृष्टिसों विवेककी सकति साधि,
चेतन अचेतनकी दसा निरवारी है ।।
करमको नासकरि अनुभो अभ्यास धरि,
हिएमें हरलखि निज उद्धता सँभारी है ।
अंतराय नास भयो सुद्ध परकास थयों,
ग्यानको विलास ताकों बंदना हमारी है ॥ २ ॥

शब्दार्थ :- प्रतोति-भ्रद्धान ! विभावताल्से यहाँ मिथ्यादर्शनका प्रयोजन है। विदारी-नष्ट की । निरवारील्‍्दूर की। हिएमैं-हृदयम । हरखि–आनंदित होकर । उद्धता-उत्कृष्टता ।विलास>"आनंद । जीवाजोबविवेकपुष्कलदृशा प्रध्यादयत्पाषंदा- नासंसारनिबद्धवन्धनविधिष्बंसाहिशुदू स्फुटत । आत्मारामसनन्तघाम महसाध्यक्षेण नित्योदितं धीरोदात्तमनाकुल॑ विलसति ज्ञानं मनोछ्लादयत्‌ ॥ १॥

अर्थ :- गणधर’ स्वामी जेंसा ह॒ढ़ श्रद्धान उत्पन्न करके, अनादि कालसे लगे हुए अन्तरंगका मिथ्यात्व नष्ट किया और भेवज्ञानको हृष्टिसे ज्ञानकी शक्ति सिद्ध करके जीव-अजीवका निर्णय क्षिया, पश्चात्‌ अनुभवका अभ्यास करके कर्मोंको नष्ट किया तथा हृदयमें हुषित होकर अपनी उत्कृ- घ्टताको सम्हाला, जिससे अंतरायकर्म नष्ट हुआ और शुद्ध आत्माका प्रकाश अर्थात्‌ पूर्णन्ञानका आनंद प्रगट हुआ। उसको मेरा नमस्कार है ॥२।॥

श्रीगुरुकी पारमाथिक शिक्षा (सवेया इकतीसा )

भेया जगवासी तू उदासी व्हैके जगतसों,
एक छ महीना उपदेस मेरों मातु रे ।
और संकलप विकलपके विकार तजि,
बेठिक एकंत मन एक ठोरु आतनु रे॥।
तेरो घट सर तामें तूही हैकमल ताकौ,
तूहो मधुकर व्है सुवास पहिचानु रे ।
प्रापति न ह्व॑ हैकछु ऐसो तू विचारतु है,
सही द्वोहैप्रापति सरूप योही जानु रे ॥ ३ ॥

शब्दार्थ :- जगवासी-प्सारी । उदासी-विरक्त । उपदेश-सीख । सकलप विकलप (सकल्प-विकल्प )>राग-द्वेप । विकार-विभाव परिणति । तजि>छोडके । एकंत(एकान्त )>अकेलेमे, जहां कोई आहट उपद्रव आदि न हो। ठौरुलस्थान । घट-हृदय । सरर-तालाब । मधुकर-भौरा । सुवासर अपनी सुगधि। प्रापति (प्राप्ति)-मिलना । व्हैहै–होगी। सही>सचमुच । यौहो-ऐसा ही । ) आत्मानूशासनमे आज्ञा आदि दस प्रकारके सम्यक्त्वोमेसे गणधर स्वामीके अवगाढ सम्यक्त्व कहा है । ह॒ विरस किमपरेणाकार्यकोलाहलेन स्वयभपि निभृतः सन्‌ पदय पण्मासमेकम । हृदयसरसि पुंसः पुद्गला-्वूननधास्तो तनु किमनुपलब्धिर्भाति कि च्रोपलब्धि: ॥ २ ॥

अजीवहार भ्र्७

अर्थ :- हेभाई संसारी जीव ! तू संसारसे विरक्त होकर एक छह महिनेके’ लिये मेरी सोख मान, ओर एकान्त स्थानसें बेठकर राग- इषकी तरंगें छोड़के चित्तको एकाग्र कर, तेरे हृदयरूप सरोयरमें तू हो कसल बन और तू ही भौंरा बनकर अपने स्वभावकी सुगंध ले। जो तू यह सोचे कि इससे कुछ नहीं मिलेगा, सो नियमसे स्वरूपकी प्राप्ति होगी; आत्मसिद्धिका यही उपाय है ॥ ३ ॥ विशेष–यह पिडस्थ’ ध्यान है। अपने चित्तरूप सरोबरमें सहख दलका कमल कल्पित करके प्राणायाम किया जाता है जिससे ध्यान स्थिर होता और ज्ञानगुण प्रगट होता है॥ ३ ॥

जोव और पुदुगलका लक्षण (दोहा)

चेतनबंत अनंत गुन, सहित सु आतमराम ।
याते अनमिल और सब, पुदगलके परिनाम ॥ ४ ॥

शब्दार्थ :- आतमराम-निजस्वरूप मे रमण करनेवाला आत्मा। याते-इससे । अनमिल->भिन्न ।

अर्थ :- जीव द्रव्य, चेतन्यमूति और अनंतगुणसम्पन्न है, इससे भिन्न और सब पुदगलकी परिणति है ।

भावार्थ :- चेतन्य, ज्ञान, दर्शन, सुख, वीय आदि आत्माके अनंत ग्रुण है और आत्मगुणोंके सिवाय स्पशे, रस, गंध, वर्ण वा शब्द, प्रकाश, धूप, चांदनी, छाया, अंधकार, शरीर, भाषा, मन, श्वासोच्छुबास तथा काम, क्रोध, लोभ, साया आदि जो कुछ इन्द्रिय ओर मन गोचर है थे सब पौद्गलिक है ॥ ४ ॥

यहां पाठमे जो छह महिना कहा है सो सामान्य कथन है। सम्यक्दर्शनकी प्राप्तिका जघन्य काल अन्‍न्तमु हुर्तेऔर उत्कृष्ट अनत काल है, शिष्यकों मार्गमे लगानेकी हष्टिसे जघन्य और उत्कृष्ट काल न बताकर छह॒महिनेके लिये प्रेरणा की है । छह महिनेमे सम्यग्द्शन उपजे ही उपजे ऐसा नियम नही है । २ पिडस्थ ध्यान सस्थानविचय ध्यानका भेद है, पिडस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातोत इस तरह चार प्रकारका सस्थानविचय ध्यान होता है । चिच्छक्तिव्याप्तसवस्वसारों.. जीव इयानयम्‌ । अतो$तिरिक्ता: सर्बेषवि भावा पौदूयलिका असी ॥३१॥

भ्र्द

आत्मज्ञानका परिणाम (कवित्त)

जब चेतन सेभारि निज पोरुष,
निरखे निज हगसों निज मम ।
तब सुखरूप विमल अविनासिक,
जाने जगत् सिरोमनि धर्म ॥।
अनुभो करे सुद्ध चेतनको,
रमे स्वभाव वर्म सब कर्म ।
इहि विधि सर्घ मुकतिको मारग,
अरु समीप आये सिव सम ॥ ५ ॥

शब्दार्थ :- पौरुष-पुरुषार्थ । निरखैलदेखे। हग>नेत्र । मर्म+अस- लियत । अविनासी नित्य । जगत् सिरोमनिरूससारमे सबसे उत्तम । धर्म स्वभाव । रमैनलीन होवे। वमै>क करता (छोड़ना) । इहि विधि इस प्रकार । मुकति (मुक्ति) मोक्ष ।समीपरपास । सिव (शिव )>मोक्ष । समं-आननन्‍्द ।

अर्थ :- जब आत्मा अपनी शक्तिको सम्हालता है और ज्ञाननेत्रोंसे अपने असली स्वभावकोीं परखता है तब वह आत्माका स्वभाव आनंदरूप, निर्मल, नित्य और लोकका शिरोमणि जानता है, तथा शुद्ध चेतन्यका अनुभव करके अपने स्वभावमें लोन होकर सम्पूर्ण कमंदलको दूर करता है। इस प्रयत्नसे मोक्षमार्ग सिद्ध होता हैऔर निराकुलताका आनंद निकट भाता है ॥५॥

जड-चेतनकी भिन्नता (दोहा)

बरनादिक रागादि यहू, रूप हमारों नांहि ।
एक ब्रह्म नहिं दूसरो, दीसे अनुभव सांहि ॥ ६ ॥
सकलमपि विहायाह्वाय चि॒ुछक्तिरिक्तम्‌
स्फुटतरमबगाह् स्तं चरचिच्छक्तिमात्रम्‌ ।
इमसुपरि चरन्त चार विश्वस्थ साक्षात्‌
कलयतु परमात्मात्मानसात्मन्यनन्तम॥ ४ ॥
वर्णाद्या वा रागमोहादयों वा भिन्‍ना भावा: सर्व एवास्थ पंस: ।
तेनेबाम्तस्तत््वत: पश्यतोध्मी नो हृष्टा: स्पुह ध्टमेक पर स्थातु ॥५॥॥

शब्दार्थ :- ब्रह्म–शुद्ध आत्मा । दीसे-दिखता है ।

अर्थ :- शरीर सम्बन्धी रूप, रस, गंध, स्पशें आदिया राग-हेष आदि विभाव सब अचेतन हैं,ये हमारे स्वरूप नहीं हैं; आत्मअनुभवमें एक बरह्मके सिवाय अन्य कुछ नहीं मासता ।६॥)

॥ देह और जीवकी भिन्‍नतापर हृष्टान्त (दोहा)

खांडो कहिये कनकको, कनक-म्यान-संयोग ।
न्यारों निरखत स्यानसों, लोह कहें सब लोग ।३७।।

शब्दार्थ :- खाडोल्‍तलवार । कनकच्सोना । न्यारौ"अलग । निरखत-दिखता है ।

अर्थ :- सोनेके म्यानमें रक्‍्खी हुई लोहेकी तलवार सोनेकी कही जाती है; परंतु जब वह लोहेकी तलवार सोनेके म्यानसे अलग की जाती है तब लोग उसे लोहेकी ही कहते है ।

भावार्थ :- शरोर और आत्मा एकक्षेत्रावगाह स्थित है। सो संसारी जोव भेदविज्ञानके अभावसे शरीरहोको आत्मा समर जाते हैं । परन्तु जब भेदविज्ञानमें उनकी पहिचान की जाती है तब चितृच्रमत्कार आत्मा जुदा भासने लगता हैऔर शरीरमें आत्माबुद्धि हट जाती है ।७॥।

जीव और पुदुगलकी भिन्नता (दोहा)

वरनादिक’ पुदगल-दसा, धरे जीव बहु रूप ।
वस्तु विचारत करमसों, भिन्न एक चिद्रप ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :- दशा>अवस्था । वहुन्बहुतसे । भिन्न+अलग । चिढद्रप (चित्‌- रूप )>चेतन्यरूप । निजल्यते येन यदत्र किचित्तदेव तत्स्यान्न कर्थ चू नान्‍्यत्‌ । रुक्‍्मेण निर्वत्तमिहासिकोश पश्यम्ति रुक्‍्म न क्थंचनासिम ।६।।

वर्णादिसामग्यूसिद विदन्तु निर्माणमेकस्थ हि पुद्गलस्य ।
ततो६स्व्विद पुदूगल एवं नात्मा घतः स विज्ञानधनस्ततोउन्यः: ॥ ७ ॥
न 5 सन न मम न मननलकनलनलन्ड

अर्थ :- रूप, रस आदि पुद्गलके गुण हैं,इनके निमित्तसे जीव अनेक रूप धारण करता है। परन्तु यदि वस्तुस्वरूपका विचार किया जाबे तो वह कर्मसे बिलकुल भिन्न एक चंतन्यमूर्ति है ।

भावार्थ :- अनंत संसार संसरण करता हुआ जीव, नर नारक आदि जो अनेक पर्यायें प्राप्त करता है वे सब पुदूगलमय है और कमंजनित हैं, यदि वस्तुस्वभाव विचारा जावे तो बे जोवकी नहों हैं, जोब तो शुद्ध, बुद्ध, निविकार, देहातीत और चेतन्यमूर्ति है ॥ ८ ॥

देह और जीवकी भिन्नतापर दूसरा दृप्टान्त (दोहा)

ज्यों घट कहिये घीवको, घटकों रूप न घोष ।
व्यौं वरनादिक नामसो, जड़ता लहै न जीव ॥ ६ ॥

शब्दार्थ :- ज्यौ-जसे ।घट घडा । जडता-अचेतनता ।

अर्थ :- जिस प्रकार घीके संयोगसे सिदट्टीके घड़ेको घीका घड़ा कहते हैपरस्तु घडा घीरूप नहीं हो जाता, उसी प्रकार शरीरके सम्बन्धसे जीव छोटा, बड़ा, काला, गोरा आदि अनेक नाम पाता है परन्तु वह शरीरके समान अचेतन नहीं हो जाता ।

भावार्थ :- शरोर अचेतन है और जीवका उसके साथ अनंत कालसे सम्बन्ध हैतो भीजोव शरोरके सम्बन्धसे कभी अचेतन नहीं होता, सदा चेतन ही रहता है ॥ ६ ॥

आत्माका प्रत्यक्ष स्वरूप (दोहा)

निराबाध चेतन अलख, जाने सहज स्वकीव ।
अचल अनादि अनंत नित, प्रगट जगतमैं जोब ॥ १०१ ॥
घृतकुम्भामिधानेषपि कुस्भो घृतस्यों न चेत्‌ ।
जीवो वर्णादिमज्जोबव जल्पनेषि न तन्मयः ॥८॥
अनाचनन्तमचल॑ स्वसंवेद्यसिंद स्फुटस ।
जीव: स्वयं तु चंतम्यमुच्चेश्रकचकायते ॥ ६ ॥

शब्दार्थ :- निराबाध-साता - असाताकी बाधा रहित । चेतन ज्ञानदर्शन ।अलखज-चर्मचक्षुओसे दिखाई नहीं देता। सहजर-स्वभावसे ! स्वकीव (स्वकीय) 5अपना । प्रगट>स्पष्ट ।

अर्थ :- जीव पदार्थ निराबाध, चेंतन्य, अरूपी, स्वाभाविक, ज्ञाता, अचल, अनादि, अनंत और नित्य हैसो संसारमें प्रत्यक्ष प्रमाण है । ’ भावार्थ :- जीव साता - असाताकी बाघासे रहित है इससे निराबाध है, सदा चेतता रहता हैइससे चेतन है, इन्द्रिययोचर नहीं इससे अलख है, अपने स्वभावको आप हो जानता है इससे स्वकीय है, अपने ज्ञानस्वभावसे नहीं चिगता इससे अचल है, आदि रहित है इससे अनादि है, अनंत गुण सहित है इससे अनंत है, कभो नाश नहों होता इससे नित्य है ॥ १० ॥

अनुभव विधान (सर्वेया इकतीसा )

रूप-रसवंत म्रतीक एक पुदगल,
रूप बिनु ओऔरु यों अजीब दर्व दुधा है ।
चारि हैंअमुरतीक जीव भी अम्रतीक,
याहीत अमुरतीक-वबस्तु-ध्यान मुधा है।।
औरसों न कबहूं प्रगट आप आपुहीसों,
ऐसो थिर चेतन-सुभाउ सुद्ध सुधा है।
चेतनको अनुभो अराध जग तेई जोब,
जिन्हकों अखंड रस चाखिवेकी छुपा है ॥ ११ ॥

शब्दार्थ :- दुधा दो प्रकारका । मुधान्वथा। थिर (स्थिर)८ अचल । सुधा>अमृत । अखंड-पूर्ण । छुधा (क्षुधा) >भूख । वर्णाद्य : सहितस्तथा विरहितो ढंघास्त्यजीबो यतो नामृत्तत्वमापास्य पश्यति जगज्जीवस्य तत्त्व ततः । इस्यालोच्य विवेचकं: समुचित नाथ्याप्यतिवब्यापि वा व्यक्त व्यश्जितजीवतरबमचल चेतन्यमालम्ब्यताम्‌ ॥ १० ॥

अर्थ :- पुद्गलद्रव्य वर्ण रस आदि सहित मूर्तोक है, शेष धर्म, अधर्म आदि चार अजोवद्रव्य अमूर्तोक हैं, इस प्रकार अजीबबद्रव्य मृर्तोक और अमूर्तोीक दो भेद रूप है; जोब भी अमूर्तोक हैइसलिये अमूर्तोक बस्तुका ध्यान करना व्यर्थ है। आत्मा स्वयंसिद्ध, स्थिर, चेंतन्यस्वभावी, ज्ञानामृत- स्वरूप है, इस संप्तारमें जिन्हें परिपृर्ण अमुतरसका स्वाद लेनेकी अभिलाषा हैवे ऐसे हो आत्माका अनुभव करते हैं।

भावार्थ :- लोकमें छह द्रव्य हैं,उनमें एक जोव और पॉच अजीब हैं, अजीब द्रव्य मुर्तीक और अमुर्तोकके भेदसे दो प्रकारके हैं, पुदूगल मुर्तीक है और धम्, अधर्म, आकाश, काल ये चार असूर्तोक हैं। जीव भी अमूुर्तीक है जब कि जीवके सिवाय अन्य भी अमृर्तोक हैं तो अम्नर्तीकका ध्यान करनेसे जीवका ध्यान नहीं हो सकता", अत: अपुर्तीकका ध्यान करना अज्ञानता है, जिन्हें स्वात्मरस आस्वादन करनेकी अभिलाषा है उन्हें मात्र अमुर्तोक- ताका ध्यान न करके शुद्ध चेतन्य, नित्य, स्थिर और ज्ञानस्वभावों आत्माका ध्यान करना चाहिये ॥ ११ ॥

मूढ़ स्वभाव वर्णन (सर्वेया तेर्दसा)
चेतन जीव अजीव अचेतन,
लच्छुन-भेदर उभ्े पद न्यारे।
सम्यक्दृष्टि-उदोत विचच्छन,
भिन्न लखे लखिक निरवारे ॥।
जे जगमांहि अनादि अखंडित,
मोह महामदके मतवारे ।
ते जड़ चेतन एक कहें,
तिन्‍्हुको फिरि टेक टरे नहिं टारे॥ १२॥
इससे अतिव्याप्ति दोषआता है।
जोवादजीवमिति लक्षणतों विभिन्‍न
ज्ञानी जनोप्नुभवति स्वयमुल्लसन्तभ ।
अज्ञानिनों निरवधिप्र विजुस्मितोष्यं
मोहस्तु तत्कथमहों बल नानटौनि ११ ॥

शब्दार्थ :- उमर (उभय )>दो । पदजूयहाँ पदसे पदार्थका प्रयोजन है। उदोत (उद्योत)-प्रकाश । विचच्छुन (विचक्षण )“विद्वान्‌ । निरधारे< निश्चय किया । मद-शराब । मतवारेन्पागल । टेक>हठ ।

अर्थ :- जोब चेतन्य है,अजोव जड़ है; इस प्रकार लक्षण भेदसे दोनों प्रकारके पदार्थ प्रथक-पृथक हैं। विद्वान् लोग सम्यग्दशनके प्रकाशसे उन्हें जुदे-जुदे देखते और निश्चय करते हैं, परन्तु संसारसें जो मनुष्य अनादि कालसे दुनिवार मोहकी तोक्ष्ण मदिरासे उन्मत्त हो रहे हैं वेजीव और जड़को एक ही कहते है; उनको यह कुटेक टालनेसे भी नहीं टलती है ।

भावार्थ -कोई एक ब्रह्म ही ब्रह्म बतलाते हैं, कोई जोवको अंगुष्ठ प्रमाण कोई तंदुल प्रमाण और कोई सूर्तोक कहते हैं,सो इस पद्यमें उनसबकी अज्ञानता बतलाई है ॥ १२ ॥

ज्ञाता विलास (सर्वेया तेईसा )

या घटमें भ्रमरूप अनादि,
विसाल महा अविबेक अखारो ।
तामहि और स्वरूप न दीसत,
पुग्गल नृत्य करें अति भारो॥।
फेरत भेख दिखावत कौतुक,
सौंजि लिये वरनादि पसारो।
मोहसों भिन्न जुदोौ जड़सों,
चिनमुरति नाटक देखनहारों ॥ १३ ॥

शब्दार्थ :- घट-हृदय । भ्रम-मिथ्यात्व । महा>वडा । अविवेक>- अज्ञान ।अखारौ-नाटबशाला । दीसत-दिख ता है। पुग्गल-पुदुगल । नृत्य- नाच । फेरतल्वदलता है। सौजिस्साका । पसारो (प्रसार)<विस्तार । कौतुक-खेल । अस्मिन्ननादिनति सहत्यविवेकनाब्य वर्णाविमान्नटति पुर्गल एवं नान्‍्य:। रागाविपुद्गलविकार विरुद्ध शुद्ध चेतन्यधातुमयमूतिरयं च जीव: ॥ १२॥।

घि४
पततन न नमन नल लपलट

अर्थ :- इस हृदयमें अनादि कालसे मिथ्यात्वरूप महा अज्ञानक केवल एक बिस्तत नाटयशाला है, उसमें और कोई शुद्ध स्वरूप नहीं दिखता पलटता हैऔर रूप पुदूगल ही बड़ा मारी नाच कर रहा है, वह अनेक रूप और जड़से आदि विस्तार करके नाना कौतुक दिखाता है; परन्तु मोह निराला सम्यग्हष्टि आत्मा उस नाटकका मात्र देखने वाला है (हर्ष-विषाद नहों करता) ॥ १३ ॥

भेदविज्ञानका परिणाम (सर्वया इकतीसा)

जंसे करवत एक काठ बीच खंड कर,
जेसे राजहंस निरवारे दूध जलकों।
तेसे भेदग्यान निज भेदक-सकतिसेती,
भिन्न-भिन्न करे चिदानंद पुदगलकों ॥।
अवधिकों धाबे मनपर्यकी अवस्था पाव,
उमगिक आवबे परमावधिके थलकों ।
याहो भांति पूरन सरूप को उदोत धर,
कर प्रतिबिबित पदारथ सकलकों ॥ १४ ॥

शब्दार्थ :-करवत>आरा । खडजटुकडे । निरवारे>प्रथक्‌ करे । सेति-से ।उमगिके-वढकर ।

अर्थ :- जिस प्रकार आरा काष्ठके दो खण्ड कर देता है, अथवा जिस प्रकार राजहंस क्षीर-नी रकापृथककरण कर देता हैउसी प्रकार भेदविज्ञान अपनी भेदक-शक्तिसे जीव और पुद्गलको जुदा-जुदा करता है। पश्चात् यह भेदविज्ञान उन्नति करते करते अवधिज्ञान सनःपर्ययशान और परमावधि ज्ञानकी अवस्थाको प्राप्त होता है और इस रीतिसे ब॒द्धि करके पूर्ण स्वरूपका प्रकाश अर्थात्‌ केवलज्ञानस्वरूप हो जाता है जिसमें लोक-अलोकके सम्पुर्ण पदार्थ प्रतिबिबित होते हैं । १४ ॥॥। इत्य॑ झानक्कअथकलनात्याटन नाटयित्वा जोवाजोबौ स्फुटविघटन नेव यावत्प्रयात: । विश्व व्याप्त प्रसभविकशद्दयक्तचिन्सा श्रशकत्या ज्ञातृद्॒ब्य॑स्वयमतिरसात्तावदुच्चेश्वकाशे ॥ १३ ॥ इति जीवाजीवाधिकार: ॥ २ ॥ दूसरे अधिकारका सार मोक्षमाग्गमें मुख्य अभिप्राय केवलज्ञान आदि गुण सम्पन्न आत्साका स्वरूप समभानेका है। परन्तु जिस प्रकार सोनेकी परख समभानेके लिये सोनेके सिवाय पीतल आदिका स्वरूप समभझाना अथवा होराकी परख समभानेके लिये हीराकेसिवाय कांचकी पहिचान बताना आवदयक है, उसी प्रकार जोब पदार्थका स्वरूप हृढ़ करनेके लिये श्रीगुरुने अजीब पदार्थका वर्णन किया है। अजीब तत्त्व जीव तत्त्वसे सर्वंथा विभिन्न है अर्थात्‌ जीवका लक्षण चेतन और अजोवका लक्षण अचेतन है । यह अचेतन पदार्थ पुदूगल, नभ, धर्म, अधर्म, कालके नामसे पांच प्रकारका है । उनमेंसे पीछेके चार अरूपी और पहिला पुद्गल रूपी अर्थात्‌ इन्द्रियगोचर है । पुद्गल द्रव्य स्पर्श, रस, गंध, वर्णबंत है । यह जोब द्रव्यके चिद्दोसे सर्वथा प्रतिकूल है,जीव सचेतन हैतो पुदूगल अचेतन है, जीव अरूपो है तो पुदुगल रूपी है, जीव अखंड हैतो पुदूगल सखंड है । मुख्यतया जोवको संसार संसरण करनेमें यही पुद्गल निमित्त कारण है, इन्हों पुदगलोंमयय शरीरसे वह सबद्ध है, इन्हों पुदूगलमय कर्मसि वह सर्वात्म प्रदेशोंमें जकड़ा हुआ है, इन्हीं पुद्गलोके निर्ित्तसे उसकी अनंत शक्तिपाँ ढेंक रहीं हैं, पुदुगलोंके निमित्तसे उसमें विभाव उत्पन्न होते हैं, अज्ञानके उदयमें वह इन्हों पुद्गलोंसे राग-ठेष करता है, व इन्हीं पुदगलोंमें इष्ट-अनिष्ट कल्पना करता है, अगर पुदूगल न होते तो आत्मामे अन्य वस्तुका सम्बन्ध नहीं होता न उसमें विकार व राग-देष होता न संसार संसरण होता, संसारमें जितना नाटक है सब पुद्गल जनित है । तुम शरोरमें कहीं चिऊंटोसे दबाओ तो तुम्हें बोध होगा कि हमें दबाया है- हमें दुःखका बोध हुआ है । बस, यह जाननेको शक्ति रखनेबाला जीव हैबही तुम हो, चेतन्य हो, नित्य हो, आत्मा हो। आत्माके सिवाय एक और पदार्थ जिसे तुमने चिऊंटीसे दबाया हैबह नरमसा कुछ सैला कालासा कुछ खारासा कुछ सुगंध-दुर्गंधवानसा प्रतीत होता हैउसे शरीर कहते हैं ।यह शरीर जड़ है, अचेतन है, नाशवान है, पर पदार्थ है, आत्मस्वभावसे भिन्न है । इस शरीरसे अहंबुद्धि करना अर्थात्‌ शरोर और शरीरके संबंधी धन, स्‍त्री, पुत्रादिको अपने मानना मिथ्याज्ञान है। लक्षण भेवके द्वारा निज आत्माको स्व और आत्माके सिवाय सब चेतन-अचेतन पदार्थोको पर जानना हो भेदविज्ञान है, इसोका नाम प्रज्ञा है। जिस प्रकार राजहंस दूध और पानीको पृथक-पृथक कर देता हैउसी प्रकार विवेकके द्वारा जीव व पुदगलका पृथक्करण करना पुदुगलोंसे अहंबुद्धि वराग-हेष हटाकर निजस्वरूपमें लोन होना चाहिये और “तेरो घट सर तामें तुंही हैकमल ताको, तूंही मधुकर हैस्ववास पहचान रे ।” वाली शिक्षाका हमेशा अभ्यास करना चाहिये । राग-रामकली चेतन तू तिहुकाल अकेला नदी नाव संजोग मिले ज्यों त्यों कुटंब का मेला ॥ चेतन० ॥ १ ॥ यह संसार असार रूप सब ज्यों पटपेखन खेला। सुख सम्पति शरीर जल बुद बुद विनसत नाहों बेला ॥। चेतन० ॥ २ ॥ मोह मगन आतम गुन मूलत, परि तोहि गल जेला ॥ मैं मे करत चहूँ गति डोलत, बोलत जंसे छेला।। चेतन० ॥ ३ ॥ कहत ‘बनारसि’ मिध्यामत तज, होइ सुगुरु का चेला। तास बचन परतोत आन जिय, होइ सहज सुरभेला ।। चेतन० ॥ ४ ॥

कर्त्ता-कर्म-क्रिया द्वार (३)

प्रतिज्ञा (दोहा)

यह अजोव अधिकारको, प्रगट बखानों मर्म ।
अब सुनु जीव अजीवके, करता किरिया कम ॥ १ ॥

शब्दार्थ :- प्रगट-स्पप्ट ।बखानौज्-वर्णन किया । मर्मरहस्य । सुनुर सुनो ! अथथे :- यह अजीव अधिकारका रहस्य स्पष्ट वर्णन किया, अब जोव- अजीवके कर्त्ता क्रिया कमंको सुनो ॥ १ ॥ भेदविज्ञानमे जीव कर्मका कर्ता नहीं है, निजस्वभावका कर्ता है :–

(सर्वेया इकतीसा )

प्रथम अग्यानी जीव कहे में सदीव एक,
दूसरो न और मैं ही करता करमकौ ।
अंतर-विवेक आयौ आपा-पर-भेद पायौ,
भयौ बोध गयो मिटि भारत भरमकों।
भासे छहो दरबके गुन परजाय सब,
नासे दुख लख्यों मुख पुरत परमकों।
करमको करतार मान्यो पुदयल पिड,
आप करतार भयोौ आतम धरमकोौं ॥ २ ॥

शब्दार्थ :- सदीव-हमेशा । बोधल्‍"ज्ञान ।भारत-बड़ा । भरम-भूल । भासे>>ज्ञात हुए । परमन्‍्यहाँ परमात्माका प्रयोजन है । एक: कर्त्ता चिदह॒मिह से कर्स कोपादयो5मी इत्यशञानां शमयदमित: कत्तुंक्ंप्रवत्तिम । झानज्योति: स्फुरति परमोवात्तमत्यन्तधीर साक्षात्कुवृश्षिस्पधि पृथग्द्रव्यनिर्भासि विश्व ॥ १ ॥

न पन्ना मनन प्तसितपतन

अर्थ :- जीव पहले अज्ञानकी दशामें कहता था कि, मै सदेव अकेला ही कर्मका कर्ता हेंदूसरा कोई नहीं है; परन्तु जब अंतरंगमें विवेक हुआ और स्वपरका भेद समभा तब सम्यग्ज्ञान प्रगट हुआ, भारी भूल मिट गई, छहों द्रव्य, गुण, पर्याय सहित ज्ञात होने लगे, सब दुख नष्ट हो गये और पूर्ण परमात्माका स्वरूप दिखने लगा, पुद्गल पिडको करमंका कर्त्ता माना, आप स्वमावका कर्त्ता हुआ ।

भावार्थ :- सम्यग्ज्ञान होनेपर जीव अपनेको स्वभावका कर्त्ता और करमंका अकर्त्ता जानने लगता है ॥ २ ॥ पुनः जाही समे जीव देहबुद्धिकौं विकार तजे, वेदत सरूप निज भेदत भरमकोौ । महा परचंड मति मंडन अखंड रस, अनुभा अभ्यासि परगासत परमकों ।। ताही समे घटमें न रहे विपरीत भाव, जेंसे तम नासे भानु प्रगटि धरमको। ऐसी दसा आवे जब साधक कहावे तब, करता ह्व॑ कंसे कर पुग्गल करमकों ॥ ३ ॥

शब्दार्थ - वेदत-भोगता है । भेदत>नाट करता है । परचढड़ (प्रचंड) >तेज । विपरीत८उल्टा ।तमजअथकार । भानुन्यूर्य । हे ल्टोकर ।

अर्थ :- जब जीव शरीरसे अहंबुद्धिका विकार छोड़ देता हैऔर भिथ्यामति नष्ट करके निजस्वरूपका स्वाद लेता हैतथा अत्यन्त तेज बुद्धिको सुशोभित करनेवाले पूर्ण रस भरे अनुभवके अभ्याससे परमात्माका प्रकाश करता हैतब सूर्यके उदयसे नष्ट हुए अधकारके समान कमंके कर्त्तापनेक! परपरिणतिमुज्भत्‌ खडय:ड्ू दवादा- निदसुदितमखण्ड ज्ञानमुच्चण्डमुच्चे, । तनु कथमवकाशः कत्तुकर्मप्रवृत्ते- रिह भवति कथ वा पौदृगल: कर्मबन्ध: ॥ २ ॥ विपरोत भाव हुृदयमें नहीं रहता । ऐसी दशा प्राप्त होनेपर चह आत्म- स्वमावका साधक होता है। तब पौदृगलिक कर्मोंको कर्त्ता होकर कंसे करेगा ? अर्थात्‌ नहीं करेगा ॥ ३ ॥

आत्मा कमंका कर्त्ता नही है, मात्र ज्ञातादृष्टा है। (स्वया इकतीसा)

, जगमें अनादिको अग्यानी कहे सेरो कर्म,
करता मैं याकौ किरियाको प्रतिपाखोी है ।
अंतर सुमति भासी जोगसों भयोौ उदासी,
ममता मिटाह परजाइ बुद्धि नाखी है ।।
निरभे सुभाव लीनो अनुभोके रस भीनोौ,
कीनोौ विवहारहृष्टि निहचंमें राखी है।
भरमकी डोरी तोरी धरमको भयो धोरी,
परमसों प्रीत जोरी करमको साखी है ॥ ४ ॥

शब्दार्थ - प्रतिपाखी (प्रतिपक्षी )जयहाँ पक्षपातीका प्रयोजन है। नाखी">छोड़ दी । निरभे (निर्भय)-निडर । भीनौ>मग्न हुआ । धोरीऊ धारण करनेवाला ।

अर्थ :- संत्तारमें अनादि कालका यह अज्ञानी जोब कहता हैकि कर्म मेरा है,मे इसका कर्ता हैँऔर यह मेराकिया* हुआ है। परन्तु जब अंतरंगमें सम्यग्ज्ञानका उदय हुआ तब मन बचनके योगोंसे विरक्त हुआ, पर पदार्थोसे मसत्व हुट गया, परजायसे अहंबंद्धि छूट गई, निःशंक निजस्वभावष ग्रहण किया, अनुभवसें मश्न हुआ, व्यवहारमें है तो भी निश्चयपर श्रद्धा हुई, सिथ्यात्वका बन्धन टूट गया, आत्मधर्मका धारक हुआ, मुक्तिसे मुहब्बत लगाई और कमंका मात्र ज्ञाता-हष्टा हुआ, कर्त्ता नहीं रहा ॥ ४ ॥

) यह शब्द गुजराती भाषामे प्रचलित है ।

अर्थात्‌ क्रियाका पक्षपात करता है । इत्येबं विरचय्य संप्रति परद्रव्यान्निर्वात्त परां स्‍्व॑ विज्ञानधनस्वभावमभयादास्तिष्नुवान: परम । अज्ञानोत्यितकर्त्‌ कमंकलनात्‌ क्लेशकन्निवत्त: स्वयं ज्ञानोमृत इतश्वकास्ति जगतः साक्षी पुराण पुमान्‌ ॥ ३ ॥

लि - >नननननन–नननन भनतनयमन ननल नत लिन ऑशल >>
वह वास्तव में
भेदविज्ञानी जीव लोगोको कर्मका कर्त्ता दिखता है पर

५५४०७ (स्वेया इकतीसा )

जेसो जो दरब ताके त॑सो गुन परजाय,
ताहीसौं मिलत पे मिले न काहु आनसों ।
जीव वस्तु चेतन करम जड़ जातिभेद,
अमिल मिलाप ज्यों नितंब जुरे कानसों ।॥
ऐसौ सुविवेक जाके हिरद प्रगट भयो,
ताकौ भ्रम गयो ज्यों तिमिर भाग भानसों ।
सोई जीव करमकौ करता सौ दोसे पे,
अकरता कह्मौ है सुद्धताके परमानसों ॥ ५ ॥

शब्दार्थ :- आनसौ (अन्यसे )>दूसरोसे । अमिल मिलाप"भिन्नत्ता । नितब±मोती । सुविवेक >सम्यरज्ञान । भान (भानु)जसूर्य । सोई-वह ।

अर्थ :- जो द्रव्य जैसा हैउसके वेसे ही गुण-पर्याय होते हैंऔर वे उसीसे मिलते हैंअन्य किसोसे नहीं मिलते । चेतन्‍्य जोब और जड़ कमंमें जातिभेद हैसो इनका नितस्ब और कानके समान अमिलाप है,ऐसा सम्यरज्ञान जिसके हृदयमें जाग्रत होता हैउसका मिथ्यात्व, सुयेके उदयमें अन्धकारके समान दूर हो जाता है। वह लोगोंको करमका कर्त्ता दिखता हैपरन्तु राग- ईेंष आदि रहित शुद्ध होनेसे उसे आगममें अकर्ता कहा है ॥ ५ ॥

जीव और पुदुगल के जुदे-जुदे स्वभाव (छप्पय छन्द)

जीव ग्यानगुन सहित, आपगुन-परगुन-ज्ञायक ।
आपा परगुन लखे, नांहि पुग्गल इहि लायक ॥।
व्याप्यव्यापकता तदात्मनति भवेन्नैवातदात्मन्यपि
व्याप्यव्यापकभावसम्भवमते का कतकमस्थितिः ।
इत्युदामविवेकधस्मरमहो भारेण भिन्‍्दंस्तमो
शानीमूय तवा स एब लप्षितः कतुंत्वशुन्यः पुमान्‌ ॥ ४ ॥
जीवदरबव चिद्रूप सहज, पुदगल अचेत जड़ ।
जीव अमूरति मृूरतोक, पुदगल अंतर बड़ ।।
जब लग न होईइ अनुभौ प्रगट,
तब लग सिश्यामति लसे।
’ करतार जीव जड़ करमकोौ,
सुबुधि विकास यहु भ्रम नसे ॥ ६॥॥

शब्दार्थ :- ज्ञायक जानने वाला । इहि लायक-इस योग्य । अचेत- ज्ञानहीन । बड़-बहुत । मिध्यामति"अज्ञान । लसै>रहै । भ्रम>भूल ।

अर्थ :- जोवमें ज्ञान गुण है, वह अपने ओर अन्य द्रव्योंके गुणोंका ज्ञाता है। पुदूगल इस योग्य नहीं हैऔर न उसमें अपने वा अन्य द्रव्योंके गुण जाननेकी शक्ति है। जीव चेतन हैओर पुद्गल अचेतन, जीव अरूपी है और पुदुगल रूपी, इस प्रकार दोनोंमें बड़ा अंतर है। जब तक मेवविजश्ञान नहों होता तब तक मिथ्यामति रहती है और जोब अपनेको कर्मका कर्ता मानता हैपरन्तु सुबुद्धिका उजेला होनेपर यह अआआन्ति मिट जातो है ॥ ६ ॥

कर्त्ता, कर्म और क्रियाका स्वरूप (दोहा)

करता परिनाभी दरव, करम रूप परिनाम ।
किरिया परजयको फिरति, वस्तु एक त्रय नाम ॥ ७ ॥

शब्दार्थ :- कर्ता-जो काये करे । कर्म>किया हुआ कार्ये। क्रिया< पर्यायका रूपान्तर होना, जैसे :- घट बननेमे कुृभकार कर्त्ता है, घट कर्म और मृत्तिकाका पिडपर्यायसे घटरूप होना किया है, पर यह भेद विवक्षा कथन है। अभेद विवक्षामें घटको उत्पन्न करनेवाली मृत्तिका है इसलिये मृत्तिका ज्ञानो जानप्नपोमां स्वपरपरिर्णात पुद्गलश्राप्यजानन्‌ ब्याप्सव्याप्यरवमस्तः: कलपितुमसही नित्यमत्यन्तमेवात्‌ । अज्ञानात्कतुकर्स क्रममतिरनयोर्भाति तावस्त याज- हिलानाविश्वकास्ति क्रच्चयदय भेदसत्पाथ सद्यः ॥ ५॥। यः परिणमति स॒ कर्ता यः परिणामों भवेत्त तत्कम। या परिणतिः क्रिया सा त्रथमपि भिन्‍न न वस्तुतया ॥ ६ ।॥॥ ही कर्त्ता है, मत्तिका घटरूप होती है इसलिये मृत्तिका ही कर्म हैऔर पिड पर्याय मत्तिकाकी थी व घट पर्याय भी मृत्तिका ही हुई इसलिये मृत्तिका ही क्रिया है। परिनामी>अवस्थाये पलटनेवाला । परिनाम-अवस्था ।

अर्थ :- अवस्थाएं पलटनेवाला द्रव्य कर्ता है, उसकी अवस्था कर्म हैऔर अवस्थासे अवस्थान्तर होना क्रिया है; इस प्रकार वस्तुके तोन नाम है। विशेष :- यहाँ अभेदविवक्षासे कथन है, द्रव्य अपने परिणामोंको करनेवाला स्वयं हैइसलिये वह उनका कर्ता है, वे परिणाम द्र॒व्यके हैंओर उससे अभिन्न हैंइसलिये द्रव्य ही कर्म है, द्रव्य अवस्थासे अवस्थान्तर होता हैऔर वह अपनी सब अवस्थाओंसे अभिन्न रहता हैइसलिये द्रव्य ही क्रिया है। माव यह हैकि द्रव्य ही कर्त्ता है, द्रव्य हो. कर्म है और व्रव्य ही क्रिया है; बात एक ही हेनाम तोन हैं ॥ ७ ॥

कर्त्ता, कर्म और क्रियाका एकत्व (दोहा)

करता करम क्रिया करें, क्रिया करम करतार ।
नाम-भेद बहु विधि भयो, वस्तु एक निरधार ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :- बहु विधि-कई प्रकारका। निरधार-निश्चय ।

अर्थ :- कर्त्ता, कर्म और क्रियाका करनेवाला हे, कर्म भी क्रिया और कर्तरूप हे, सो नामके भेदसे एक हो वस्तु कई रूप होतो है ॥ ८ ॥ पुनः एक करम करतव्यता, करे न करता दोइ । दुधा दरव सत्ता सधी, एक भाव क्‍यों होइ ।॥। €॥।

शब्दार्थ :- दुधा-दो प्रकार । एकः परिणमति सदा परिणामों जायते सदेकस्य । एकस्य परिणतिः स्थादनेकसप्येकमेव. यतः ॥ ७॥।

नोभो परिणमतः खलु परिणामों नोभयो: प्रजायेत ।
उभयोन परिणतिः स्वाद्वनेकमनेकमेब सदा १८१४
कर्सा कम क्रियादार ७३
अथे :- एक कमंकी एक हो क्रिया व एक हो कर्ता होता है दो नहीं
होते, सो जोव पुदूगलकी जब जुदो ज्ुदी सत्ता है तब एक स्वभाव कंसे हो
सकता है ?

भावार्थ :- अचेतन कर्मका कर्ता वा क्रिया अचेतन ही होना चाहिये । चेतन्य आत्मा जड़ कर्मका कर्ता नहीं होसकता ॥ ६ ॥

कर्त्ता, कर्म और क्रियापर विचार (सर्वया इकतीसा )

एक परिनामके न करता दरव दोइ,
दोइ परिनाम एक दर्व न धरतु है ।
एक करतूति दोइ दर्व कबहेूँ न करे,
दोड करतूति एक दर्व न करतु है ।।
जीव पुदगल एक खेत-अबगाही दोउ,
अपने अपनें रूप कोउ न टरतु है ।
जड़ परनामनिको करता है पुदगल,
चिदानंद चेतन सुभाउ आचरतु है ॥ १० ॥

शब्दार्थ :- करतृति-क्रिया । एक खेत-अवगाही (एक क्षेत्रावगाही ) एक ही स्थानमे रहनेवाले। ना टरतु है-नहीं हटता है। आचरतु है- वतंता है ।

अर्थ :- एक परिणामके कर्ता दो द्रव्य नहों होते, दो परिणामोंको एक द्रव्य नहीं करता, एक क्रियाको दो द्रव्य कभी नहों करते, दो क्रियाओंकों भी एक द्रव्य नहों करता । जीव ओर पुद्गल यद्यपि एक क्षेत्रावगाह स्थित हैं तोभी अपने अपने स्वभावकों नहीं छोड़ते । पुदूगल जड़ है इसलिये अचेतन परिणामोंका कर्त्ता हैऔर चिदानंद आत्सा चेतन्धरमावकफा कर्ता है ११०१) नेकस्य हि कर्तारों हो स्‍्तो हू कंणी न चेकस्प । नेकस्य सर क्रिये दर एकसनेक यतो न स्थात्‌ ॥६॥

मिथ्यात्व और सम्यक्त्वका स्वरूप (सवेया इकतीसा)

महा धीठ वुखकों बसीठ परदरवृरूप,
अंधकप काहूपे निवान्योँ नहिं गयो है।
ऐसौ मिथ्याभाव लग्यो जीवकों अनादिहीको,
याहि अहंबुद्धि लिए नानाभांति भयो है ।।
काहू समे काहुको सिथ्यात अंधकार भेदि,
ममता उछेदि सुद्ध भाव परिनयों है।
तिनही विवेक धारि बंधकों बिलास डारि,
आतम सकतिसों जगत् जीत लयो है ॥ ११ ॥

शब्दार्थ :- धीठ (धृष्ट)>ढीठ । वसीठरदूत । निवारधौ-हटायौ । समे (समय)-्वक्त । उछेदि-हटाकर । परिनयौल्‍हुआ । सकति (शक्ति) >बल ।

अर्थ :- जो अत्यन्त कठोर है, दुःखोंका दूत है, परद्रव्य जनित है, अंधकृपके समान है, किसीसे हटाया नहीं जा सकता" ऐसा मिथ्यात्वभाव जीवकों अनादि कालसे लग रहा है। और इसी कारण जीव, परदव्रव्यमें अहंब॒द्धि करके अनेक अवस्थाएँ घारण करता है। यदि कोई जीव किसी समय सिध्यात्वका अहंकार नष्ट करे और परव्रव्यसे ममत्वभाव हटाकर शुद्धभावरूप परिणाम करे तो वह भेदविशान धारण करके बंधके कारणोंको * हटाकर, अपनी आत्मशक्तिसे संसारकों जीत लेता है अर्थात्‌ मुक्त हो जाता है ११॥। ) पिथ्यात्व विभाव भाव है उसे हटाकर अनंत जीव मुक्त हुए है। पर हां, कठिनाईसे हटता है इस हृष्टिसे ‘निवारधौ नहिं गयौ है’ यह पद दिया है।

मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कधाय, योग । अआसंततारत एवं धावति पर कुर्बेडहमित्युच्चकं- दुर्वारें ननु मोहिनामिह महाहुडभरूपररूपं तमः । तद्भूतार्भपरिप्रहेण विलय यद्यकवारं ब्जेत्‌ तत्कि शानघनस्म बन्धनमहों भूयों भवेदात्मनः (१०॥ कर्सा कर्म क्रियाहार प्‌

जैसा कम वैसा कर्त्ता (सवैया इकतीसा )

सुद्धाभाव चेतन असुद्धभाव चेंतन,
दुहुँकी करतार जोब और नहि मानिये ।
कर्मपिडकौ विलास बने रस गंध फास,
करता दुहुँकौ पुदगल परबवानिये ॥।
ताते वरनादि गुन ग्यानावरनादि कर्म,
नाना परकार पुदगलरूप जानिये।
समल विभल परिनाम जे जे चेतनके,
ते ते सबअलख पुरुष यो बखानिये ॥१२॥।

शब्दार्थ :- सुद्धभाव>केवलदर्शन केवलज्ञान अनंतसुख आदि । असुद्धभाव-राग द्वेप क्रेणम मान आदि । और-दूसरा। फास"स्पर्श । समलन"्अशुद्ध ।विमलज शुद्ध ।अलख"अरूपी । पुरुष-परमेश्वर ।

अर्थ :- शुद्ध चेतन्यभाव और अशुद्ध चेतन्यभाव दोनों भावोंका कर्त्ता जीब है, दूसरा नहीं है । द्रव्यकर्म-परणति और वर्ण, रस, गंध, स्पर्श इन दोनोंका कर्ता पुदगल है; इससे वर्ण रसादि गुण सहित शरोर और ज्ञाना- बरणादि कम-स्कंध इन्हें अनेक प्रकारकी पुदुगल पर्यायें जानना चाहिये। आत्माके शुद्ध और अशुद्ध जो जो परिणाम हैं वेसब अमूर्तोक आत्माके हैं, ऐसा परमेश्वरने कहा है ।१२॥।

नोट :- अशुद्ध परिणाम कमंके प्रभावसे होते हैऔर शुद्ध परिणाम करममके अभावसे होते हैं; इससे दोनो प्रकारके भाव कर्म-जनित कहे जा सकते है । आत्मभावान्करोत्यात्मा परभावान्सदा पर: । आत्मेब ह्ात्सनो भाषा: परस्थ पर एव ते ॥११॥। भेदज्ञानका मम मिथ्याहृष्टि नही जानता, इसपर दृष्टान्त :-

(सर्वेया इकतीसा )

जसे गजराज नाज घासके गरास करि,
भच्छत सुभाय नहि भिन्न रस लोयो है ।
जसे मतबारों नहि जाने सिखरनि स्वाद,
जु गमेंसमगन कहे गऊ दूध पोयौ है ।॥।
तेस मिथ्याहृष्टि जीव ग्यानरूपो हैसदीब,
पग्यो पाप पुन्नसों सहज सुझ्न हीयो है ।
चेतन अचेतन दूहुंको मिश्र पिड लखि,
एकमेक माने न विवेक कछु कोयो है ॥ १३ ॥

शब्दार्थ :- गजराज-हाथी । गरास (ग्रास )-कौर, कवल । सिखरनि (श्रीखण्ड) >अत्यन्त गाढ़ा दही और मिश्रीका भिश्रण । जुगल्सनक । सुन्न (शून्य )>विवेक रहित । अर्थ '- जेसे हाथी अनाज और घासका मिला हुआ ग्रास खाता है, पर खानेहीका स्वभाव होनेसे जुदा जुदा स्वाद नहों लेता; अथवा जिस प्रकार मद्यसे सतवालेको श्रोखण्ड खिलाया जावे, तो वह नशेमें उसका स्वाद न पहिचानकर कहता है कि इसका स्वाद गौदुग्धके समान है, उसी प्रकार मिथ्याहृष्टि जोब यद्यपि सदा ज्ञानमूर्ति है, तो भी पुण्य-पापमें लोन होनेके कारण उसका हृदय आत्सज्ञान से शून्य रहता है, इसके चेतन-अचेतन दोनोंके मिले हुए पिण्डको देखकर एक ही मानता है और कुछ विचार नहीं करता।

भावार्थ :- सिथ्याहष्टि जोव स्व-पर विवेकके अभावसें पुदृगलके मिलापसे जीवको कर्मका कर्त्ता मानता है ॥ १३ ॥

अशानतस्तु सतृणाम्यवहारकारी
ज्ञान स्वयं किल भवश्नपि रज्यते यः ।
पीत्वा बधोक्षमधुराम्लरसातिगृद्या
गां दोरि दुश्धसिव नूनससो रसालम्‌ ॥ १२ ॥
जीवको कर्मका कर्त्ता मानना भिथ्यात्व है, इसपर दृष्टान्त :-

(सर्वेया इकतीसा )

जेसे महा ध्ृपषकी तपतिमें तिसायो मृग,
भरमसों मिथ्याजल पीवनको धायो है ।
जेसे अंधकार मांहि जेवरी निरखि नर,
भरमसों डरपि सरप सानि आयो है ।।
अपने सुभाव जेसे सागर सुथिर सदा,
पवन-संजोगसों उछरि अकुलायोौ है।
तेसे जीव जड़सों अव्यापक सहज रूप,
भरमसों करमको करता कहायो है ॥१४॥

शब्दार्थ :- तपति>गर्मी ।तिसायौ नप्यासा । मिथ्याजल>मृगजल"* । जेवरी>रस्सी । सरप (सर्प)चसाप। सागरल्समुद्र । थिर5स्थिर । अव्यापक> भिन्न । भरम>भूल ।

अर्थ :- जिस प्रकार अत्यन्त तेज धूपमें प्यासका सताया हुआ हिरण भूलसे मृगजल पोनेको दौड़ता है, अथवा जंसे कोई मनुष्य अंधेरेमें रस्सीको देख उसे सर्प जान भयभीत होकर भागता है, ओर जिस प्रकार समुद्र अपने स्वमावसे सर्देव स्थिर हैतथापि हवाके भकोरोंसे लहराता है; उसी प्रकार जोब स्वभावत: जड़ पदार्थंसि भिन्न है, परन्तु मिथ्यात्वी जोब मूलसे अपनेको कर्मका कर्त्ता मानता है ॥ १४ ॥

) नि्जल देशमे रेतपर गिरी हुई सूयंकी किरणोमे पानीका अम ।
अज्ञानान्मृगतृष्णिकां जलधिया घावन्ति पातुं मृगा
अज्ञानात्तमसि द्रवन्ति भुजगाध्यासेन रज्जो जना: ।
अज्ञानाज्य विकल्पचक्रकरणाद्वातोत्त रद्भाब्धिवत्‌
शुद्धन्लानमया अपि स्वयमसी कर्णोभवन्त्याकुला: ॥ १३ ॥
छ्प समयसार ताटक
2 न पपनप+पटट

भेदविज्ञानी जीव कर्मका कर्त्ता नही है, मात्र दर्शक है :-- (सवैया इकतीसा )

जैसे राजहंसके बदनके सपरसत,
देखिये प्रगट न्‍्यारों छोर न्यारो नीर है ।
तसे समकितीकी सुदृष्टिमें सहज रूप,
न्यारो जीव न्यारो कर्म न्‍्यारों हो सरोर हे ।।
जब सुद्ध चेतनको अनुभो अभ्यास तब,
भास आपु अचल न दूजो और सीर है ।
पूरव करम उदे आइक दिखाई देइ,
करता न होय तिनन्‍्हकौ तमासगीर है ॥ १५ ॥

शब्दार्थ :- बदन मुख । सपरसत (स्पशंत )>छूनेसे । छीर (क्षीर )- दूध । नीर€पानी । भास>दिखता है ।सीर>साथी । तमासगी र>दर्शक ।

अर्थ :- जिस प्रकार हंसके मुखका स्पश होनेसे दूध ओर पानी पृथक्‌ पृथक्‌ हो जाते हैं, उसी प्रकार सम्यग्हष्टि जीवोंकी सुहृष्टिमें स्वभावत: जीव, कर्म और शरोर भिन्न भिन्न भासते हैं। जब शुद्ध चेतन्यके अनुभवका अभ्यास होता है तब अपना अचल आत्मद्रव्य प्रतिभासित होता है,उसका किसी दूसरेसे मिलाप नहीं दिखता। हां, पूर्वबंबद्ध कर्म उदयमें आये हुए दिखते हैं पर अहंबुद्धिके अभावमें उनका कर्त्ता नहीं होता, मात्र दर्शक रहता है ॥१५॥

शानादिवेचकतया तु परात्मनोर्यों
जानाति हूंस इब वा: पयसतोविशेष ।
चेतन्यधातुमचल॑ स सदाधिरूढ़ो
जानोत एब हि करोति न किड्चनापि ॥१४।॥
मिले हुए जीव और पुद्गलकी पृथक्‌ पृथक्‌ परख :–

(सर्वेया इकतीसा )

जैसे उसनोदकर्मे उदक-सुभाव सीरो,
आगकी उसनता फरस ग्यान लखिये ।
जेसे स्वाद व्यंजनमें दोसत विविधरूप,
लोनकोौ सुवाद खारो जीभ-ग्यान चखिये ।।
तेसे घट पिडमें बिभावता अग्यानरूप,
ग्यानरूप जीव भेद-ग्यानसों परखिये ।
भरमसों करमको करता है चिदानंद,
दरब विचार करता भाव नखिये ॥ १६ ॥

शब्दार्थ :- उसनोदक (उष्णोदक) >गरम जल । उदकरूजल । सीरौरठंडा ।उसनता (उष्णता ) > गर्मी ।फरस>स्पश । व्यजन>तरकारी । नखिये*-छोड देना चाहिये ।

अर्थ :- जिस प्रकार स्पशेज्ञानसे शीत स्वभाववाले गरम जलकी अग्निजनित उष्णता पहिचानो जाती है, अथवा जिस प्रकार जिह्ला इन्द्रियसे अनेक स्वादवालोी तरकारीसेंका नमक जुदा चख लिया जाता है, उसी प्रकार भेद विज्ञानसे घर्टापडमेंका अज्ञानरूप विकार ओर ज्ञानमृति जीव परख लिया जाता है, आत्माकों कर्ंका कर्त्ता मानना मिय्यात्व है, द्रव्यटृष्टिसे “आत्मा कमंका कर्त्ता है! ऐसा भाव हो नहीं होना चाहिये ॥ १६ ॥

) यह शब्द गुजराती भाषामे प्रचलित है ।
जानादेव ज्वलनपयसोरोध्ष्पशेत्यव्यवस्था
शानादेवोल्‍लसलि लवणस्वादभेदब्युदासः ।
ज्ञानादेव स्वरसबिकस ज्नित्यचेतस्पधातो:ः
क्रोधादेश्न प्रभवति भिदा निन्‍दती कतृंभावम ॥ १५ ॥
8 3 स-नपनण> मनन निभा>> भ933

पदार्थ अपने स्वभावका कर्त्ता है (दोहा)

र्यान-भाव ग्यानी करे, अग्यानी अग्यान ।
दर्वकर्म पुदगल करे, यह निहच परवान ॥१७॥।

शब्दार्थ :- द्रव्यकर्म -ज्ञानावरणादि कर्मदल। परवान (प्रमाण )+ सच्चा ज्ञान । अ्थे :- ज्ञानभावका कर्ता ज्ञानी है, अज्ञानका कर्त्ता अज्ञानी हैऔर द्रव्यकर्मका कर्ता पुदू्गल हैऐसा निश्चयनयसे जानो ॥ १७ ॥

ज्ञानका कर्ता जीव ही है, अन्य नहीं है (दोहा)

ग्यान सरूपी आतमा, करे ग्यान नहि और ।
दरब करम चेतन करे यह विवहारी दौर ॥ १८ ॥

अर्थ :- ज्ञानरूप आत्मा ही ज्ञानका कर्ता हैऔर दूसरा नहीं है। द्वव्य- कर्मंको जोव करता हैयह व्यवहार-वचन है ॥ १८ ॥

इस विषयम शिप्यकी शका (सवंया तेईसा)

पुग्गलकर्म करे नहिं जीव,
कही तुम में समझो नहि तेसी ।
कौन कर यह रूप कहो अब,
को करता करनी कह कंसी ।।
आपुह्ी आपु मिले बिछुरे जड़,
क्यों करि मो सन संसय ऐसी ?
सिष्य संदेह निवारन कारन,
बात कहें गुरु है कछु जेसी ॥ १९ ॥
अज्ञानं ज्ञानमप्येवं कुर्वेन्नात्मानमञ्जसा ।
स्यात्कत्तत्मात्मभावस्य परभावस्य न क्वचित्‌ ॥१६॥।
आत्मा ज्ञान स्वयं ज्ञान ज्ञानादत्यत्करोति किस ।
परभावस्थ कर्तात्मा मोहोष्यं व्यवहारिणाम्‌ ॥१७॥।
जीव: करोति यदि पुद्गलकर्म नेव कस्ताहि तत्कुरत इत्यभिशद्भूयेव ।
एर्ताह तोब्ररयमोहनिवहंणाय सड्भूस्थते शूणत पुदुगलकर्मकर्त्‌ ॥१८॥
कत्तो कम फक्रयादार घर

शब्दार्थ :- विछुरे-पृथक्‌ होवे । संसय (संशय )>सन्देह, शक ।

अर्थ :- पुदूगल कर्मको जीव नहों फरता है, ऐसा आपने कहा सो मेरी समभमें नहीं आता। करका कर्त्ता कौन हैऔर उसको कंसी क्रिया है ? ये अचेतन करूं अपने आप जोवसे कंसे बंधते-छूटते हैं ? मुभे यह सन्देहु है। शिष्यको इस शंकाका निर्णय करनेके लिये श्रीगुरु यथार्थ बात कहते हैं॥ १६ ॥

ऊपर की हुई शंकाका समाधान (दोहा )

पुदगल परिनामी दरब, सदा परिनव सोइ ।
याते पुदगल करमकौ, पुदगल करता होइ ॥ २० ॥

शब्दार्थ :- परिनामी (परिणामी) 5 अपना स्वभाव न छोड़कर पर्यायसे पर्यायान्तर होनेवाला ।सोइ-वह । याते-इससे । होइ–होता है ।

अर्थ :- पुद्गल द्रव्य परिणामों है, वह सदेव परिणसन किया करता है, इससे पुद्गल कमंका पुदूगल ही कर्त्ता है॥ २० ॥

जीव चेतना संजुगत, सदा प्रण सब ठौर ।
तात चेतन भावकौ, करता जीव न और ॥ २१ ॥

शब्दार्थ :- सजुगत >सयुक्त, सहित । ठौर">जगह, स्थान ।

अर्थ :- जीव चेतना संयुक्त है, सब जगह सदा पूर्ण है,इस कारण चेतनभावोंका कर्त्ता जीव ही हैऔर कोई नहों है ।। २१ !॥ स्थितेत्यविध्ना खलु॒ पुदंगलस्प स्वभावभूता परिणामशक्तिः तस्यां स्थितायां स करोति भाव घमात्सनस्तस्थ स एवं कर्त्ता ॥ १६ ॥

स्थितेति जोवस्य निरन्तराया स्वभावभूता परिणामर्शक्ति:।
तस्यां स्थितायां स करोति भाव य॑ स्वस्थ तस्थेव भवेत्स कर्त्ता । २०॥।

शिष्यका पुन॒प्रइन (अडिल्ल छद॒)

ग्यानवंतकों भोग निरजरा-हेतु है।
अज्ञानीका भोग बंध फल देतु है ।।
यह अचरजकी बात हिये नहि आवही ।
पूछे कोऊ सिष्य गुरू समभावही ॥ २२॥।
शब्दा्थ :- भोगल्‍शुभ अशुभ कर्मोका विपाक । निजंरा-हेतुर
कर्म भडनेके लिये। हियेर मनमे ।

अर्थ – कोई शिष्य प्रइन करता है, कि हे गुरुजी ! ज्ञानीके भोग निर्जराके लिये हैऔर अज्ञानीके भोगोंका फल बंध है, यह अचरज भरो हुई बात मेरे चित्तपर नहों जमतो ? इसको श्रोगुरु समझाते है !। २२॥।

ऊपर की हुई शकाका समाधान (स्रेया इकतीसा)

दया-दान-पुजादिक विषय-कषायादिक,
दोऊ कर्मंबंध पे दृहकौ एक खेतु है ।
ग्घानी मूढ़ करम करत दोसे एकसे पे,
परिनामभेद न्यारो नन्‍्यारो फल देतु है ।।
ग्यानवंत करनी करे पे उदासीन रूप,
ममता न धर ताते नि्जराको हेतु है ।
वहे करतूृति मृढ़ करे पे मगनरूप,
अंध भयो ममतासों बंध-फल लेतु है ॥ २३ ॥

शब्दार्थ - खेतु (क्षेत्र) >स्थान । परिताम (परिणाम) >भाव । उदासोन>रागादि रहित । मगनरूपरतत्लीन । अधविवेकणुस्य । जझानमय एवं भाव कुतो भवेद्‌ ज्ञानिनों न पुनरन्य । अज्नानप्रय: सर्वः कुतोइ्यमशञानिनो. नान्‍्यः ॥ २१॥

ज्ञानिनों ज्ञाननिवत्ताः सर्वे भावा भवन्ति हि।
सर्वेषप्यज्ञाननिर्ष॒ त्ता भवन्त्यज्ञानिनस्तु ते ॥ २२७

अर्थ :- दया, दान, पुजादि पुण्य व विषय-कषाय आदि पाप दोनों कर्मबंध हैंऔर दोनोंका उत्पत्तिस्थान एक ही है। इन दोनों प्रकारके कर्मोके करनेमें सम्यग्जानी और मिथ्यात्वी एकसे दिखते हैं, परन्तु उनके भावोमें अन्तर होनेसे फल भी भिन्न-भिन्न होता है । ज्ञानीकी क्रिया विरक्तभाव सहित और अहंब॒द्धि रहित होती है, इसलिये निज राका कारण है, और वही क्रिया मिथ्यात्वी जीव विवेक रहित तल्‍लीन होकर अहंब॒ुद्धि सहित करता है, इसलियें बन्ध और उसके फलको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥

मिथ्यात्वीके कर्त्तापनेकी सिद्धिपर कुभकारका दृष्टान्त (छप्पय )

ज्यों माटीमे कलस होनकी, सकति रहे धझ्ुव ।
दंड चक्र चोवर कुलाल, बाहजि निमित्त हुब ॥।
त्यों पुदगल परवांनु, पुज बरगना भेस धरि ।
ग्यानावरनादिक स्वरूप, विचरंत विविध परि ।।
बाहजि निरमित्त बहिरातमा,
गहि संसे अग्यानसति ।
जगमांहि अहंकृत भावसों,
करमरूप द्वूं परिनमति ॥ २४ ॥
शब्दाथ :- कलसन्घडा । सकतिन्शक्ति । चक्रल्‍चाक ।
चीवर/-धागा । कुलाल-कुम्भकार। बाहजिन्बाह्य । पुंज-रमुदाय ।
परवानु-परमाणु । वरगना ल्वर्गणा। भेस-रूप ।विचरत-अ्रमण करते हैं ।
विविध"भाँति-भाँति । गहिज्घारण करके । बहिरातमा>भिथ्याहृष्टि ।
अहंकृत >ममत्व ।

अर्थ :- जिस प्रकार मिट्टीमें घटरूप होनेकी शक्ति सदा भोजूद रहतो है अज्ञानमयभावानामन्नानी व्याप्य मुमिकाः । द्रव्यकम निमित्तानां भावानामेति हेतुताम्‌ ॥ २३ ॥॥ द्ड समयसार ताटकपल नसनिपनियननन सन और दंड, चाक, धागा, कुंमकार आदि बाह्य निमित्त हैं, उसी प्रकार लोकमें पुद्गलपरमाणुओंके दल कर्मवर्गंणारूप होकर ज्ञानावरणीय आदि भाँति भांतिकी अवस्थाओंमें भ्रमण करते हैं, उन्हें मिथ्याहश्ट जीव बाह्य निमित्त है। जो संशय आदिसे’ अज्ञानी होता है, सोशरीर आदिमें अहंकार होनेसे वे पुदूगलपिड कसंरूप हो जाते हैं ॥ २४ ॥

जीवको अकर्त्ता मानकर आत्म-ध्यान करनेकी महिमा (सवेया तेईसा)

जे न कर नयपच्छ विवाद,
धर न विखाद अलीक न भाखें।
जे उदवेग तज घट अंतर,
सीतल भाव निरंतर राख ॥।
जे न गुनी-गुन-भेद विचारत,
आकुलता भमनकी सब नाखे।
ते जगमें घरि आतम ध्यान,
अखंडित ग्यान-सुधारस चाखे ॥ २५ ॥

शब्दार्थ :- विवाद-भगडा । विख्ाद (विपाद )>खेद । अलीक>भूठ । उदवेग-चिता । सीतल (शीतल) >शान्त । नाखेब्छोड । अखंडितन-पूर्ण ।

अर्थ :- जो नयवादके भगड़ेसे रहित हैं, असत्य, खेद, चिन्ता, आकुलता आविको ह॒ृदयसे हटा देते हैंऔर हमेशा शांतभाव रखते हैं, गुण- गुणीके भेदविकल्प भी नहों करते, वे संसारभें आत्मध्यान धारण करके पूर्ण ज्ञानामृतका स्वाद लेते हैं ॥ २५ ॥

१ सशय, विमोह और विश्रम ये ज्ञानके दोष है ।
ये एवं सुकत्वा नयपक्षपात स्वरूपग्ुप्ता निवर्सन्ति नित्यम ।
विकल्पजालच्युतशास्तचितास्त एव साक्षादमत॑ पिबन्ति ॥ २४ ॥
कर्सा कम क्रियादार ष्भ्‌

जीव निश्चय नयसे अकर्त्ता और व्यवहार नयसे कर्ता है (स्वेया इकतीसा )

बिवहार-दृष्टिसों बिलोकत बंध्योसौ दोसे,
निहचे निहारत न बांध्यों यह किनिहीं ।
एक पच्छ बंध्यो एक पच्छसों अबंध सदा,
दोउ पच्छ अपने अनादि धरे इनिहों ।।
कोऊ कहे समल विमलरूप कोऊ कहै,
चिदानंद तंसोई बखान्यो जंसो जिनिहों ।
बंध्यो माने खुल्यों माने दोऊ नेको भेद जाने,
सोई ग्यानवंत जीव तत्त्व पायो तिनिहीं ॥ २६ ॥

शब्दार्थ :- विलोकत>देखनेसे । निहारत-देखनेसे । अबधन्मुक्त । बध्योजबध सहित । तेसोई>वेसा ही । खुल्यौ-बंध रहित ।

अर्थ :- व्यवहारनयसे देखो तो आत्मा बेंधा हुआ दिखता है, निश्चय हृष्टिसे देखो तो यह किसीसे बेधा हुआ नहीं है । एक नयसे बेंधा हुआ ओर एक नयसे सदा अबंध-खुला हुआ है, ऐसे ये अपने दोनों पक्ष अनादि कालसे धारण किये हुए है। एक नय कमंसहित ओर एक नय करसंरहित कहता है, सो जिस नयसे जसा कहा है, बेसा है। जो बंधा हुआ तथा खुला हुआ दोनों हो बातोंको मानता है,और दोनोंका अभिप्राय समझता है, वहो सम्यग्जानी जीवका स्वरूप जानता है ॥ २६ ॥

एकस्य बड़ो न तथा परस्थ थिति ह्वयोद्वाविति पक्षपातों।
यस्तस्वबेदी चध्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्य खलु चिशिदेव ॥ २५ ॥

नोट :- इस श्लोकके आगे ४४ वेंश्लोक तकके झोकमें मात्र एक शब्दका फर्क है, शेष सबके सब श्लोक इसी तरह॒के हैं। ज॑से इसमें बढ़ो है तो अगले श्लोकोंमें बद्धोके स्थानमे भूढ़ी, रत्तो, बुष्टो है। इस कारण ये १६ श्लोक नहीं दिये गये हैं। सब श्लोकोंका एक ही आशय होता है । 3 2 नम - मनन पिन नम नयज्ञान द्वारा वस्तुस्वरूप जानकर समरस भावमें रहनेवालोंकी प्रशंसा

(सर्वेया इकतीसा)

प्रथम नियत नय दूजी विवहार नय,
दृहकों फलावत अनंत भेद फले है।
ज्यों ज्योँ नय फल त्यौं त्यां सनके कललोल फले,
चंचल सुभाव लोकालोकलों उछले हैं ।।
ऐसी नयकक्ष ताकौ पक्ष तजि ग्यानी जीव,
समरसी भए एकतासों नहि टले हैं ।
महामोह नासि सुद्ध-अनुभो अभ्यासि निज,
बल परगासि सुखरासि मांहि रले हैं ॥ २७ ॥

शब्दार्थ :- नियत - निश्चय । फलाबत - विस्तार करो तो। फले-उपजे । कललोल-तरग । उछले>बढे । कक्षजकोटि । परगासि८ प्रगट करके । रले*-मिले ।

अर्थ :- पहला निश्चय और दूसरा व्यवहार नय है, इनका प्रत्येक द्रव्यके गुण-पर्यायोंके साथ विस्तार किया जाय तो अनंत भेद हो जाते हैं। जैसे जेसे नयके भेद बढ़ते हैं बसे बसे चंचल स्वभावी चित्तमें तरंगें भी उपजती है, जोलोक और अलोकके प्रदेशोंके बरावर हैं । जो ज्ञानी जीव ऐसी नयकोटिका पक्ष छोड़कर समता-रस ग्रहण करके आत्मस्वरूपको एकताको नहों छोड़ते, वे महामोहकों नष्ट करके, अनुभवके अम्याससे निजात्म बल प्रगट करके, पूर्ण आनंदमें लीन होते है ॥ २७ ॥।

)१ यह शब्द मारवाडो भाषामे प्रचलित है ।
स्वेश्छासमुण्छुलदनल्पविकल्पजाला-
मे व्यतीत्य महतों।] नयपक्षकक्षास्‌ ।
सव॑ भावमेकसुपयात्यनुभूतिसात्रम्‌ ॥ ४५ ॥

सम्यग्जानसे आत्मस्वरूपकी पहिचान होती है (सवेया इकतीसा)

जेसे काहू बाजीगर चोहटे बजाइ ढोल,
नातारूप धरिक भगल-विद्या ठानी है।
तेसे में अनादिको मिथ्यातको तरंगनिसों,
भरममें धाइ बहु काय निज मानी है ।।
अब ग्यानकला जागी भरमक्की हृष्टि भागी,
अपनो पराई सब सोंज पहिचानोी है।
जाक॑ उदे होत परवांन ऐसो भांति भई,
निहचे हमारी जोति सोई हम जानी है ॥ २८ ॥

शब्दार्थ :- बाजीगरजखेल करतनेवाला। चौहटे-चौराहे पर । भगल- विद्याल्घोखेबाजी । धाइ<भटककर । काय>शरीर । सौजन-वस्तु ।

अर्थ :- जैसे कोई तमासगीर चोराहेपर ढोल बजावे और अनेक स्वांग बनाके ठगविद्यासे लोगोंको अमसें डाल देवे, उसी प्रकार मे अनादि कालसे मिथ्यात्वके भकोरोंसे भ्रममें मुला रहा और अनेक शरीरोंको अपनाया । अब ज्ञानज्योतिका उदय हुआ जिससे मिध्याहष्टि हट गई, सब स्व-पर वस्तुकी पहिचान हुई और उस ज्ञानकलाके प्रगट होते ही ऐसी अवस्था प्राप्त हुई कि हमने अपनी असली आत्मज्योति पहिचान ली ॥२८॥।

ज्ञानीका आत्मानुभवमे विचार (सवेया इकतीसा)

जेसे महा रतनको ज्योतिर्मँ लहूरि उठे,
जलकी तरंग जेसें लोन होय जलमें ।
तेसें सुद्ध आतम दरब परजाय करि,
उपज बिनसे थिर रहे निज थलमें ।।
इनाजासमिदसेयमुच्छलत्युष्कलोच्चलविकल्पवी चिलि: ।
गसस्‍्प विस्फुरणमेब तत्क्षणं क्सस्तमस्थति तद्रिस चिन्मह: ॥ ४६ ॥
खित्स्वभावभरभाबितभावाभावभावपश्साथे तयेक॑ ।
बम्धपद़ तिमपास्थ समसस्‍्तां लेतये समयसारमपारमु ॥॥। ४७३
ऐसे अविकलपी अजलपी अनंदरूपी,
अनादि अनंत गहि लीज एक पलमें।
ताको अनुभव कीज परम पोयूष पीजे,
बंधको बिलास डारि दीज पुदगलमें ॥ २९ ।।

शब्दार्थ :- अविकलपी >विकल्प रहित । अजलपी >यहाँ स्थिरताका प्रयोजन है। गहि लीजै>ग्रहण कीजिये ।पीयूष अमृत । विलास>विरतार ।

अर्थ - जिस प्रकार उत्तम रत्तकी ज्योतिमें चमक उठतो है, अथवा जलमें तरग उठतो हैऔर उसीमें समा जाती है, उसी प्रकार शुद्ध आत्मा, पर्यायापेक्षा उपजता और नष्ट होता है,तथा द्रव्यापेक्षा अपने स्वरूपमें स्थिर- जबस्थित रहता है। ऐसे निबिकल्प, नित्य, आनंदरूप, अनादि, अनंत, शुद्ध सात्माको तत्काल ग्रहण कोजिये ।उसीका अनुभव करके परम अमृत-रस पीजिये और कर्मबंधके विस्तारको पुद्गलमें छोड़ दोजिये ॥ २६ ॥

आत्मानुभवकी प्रशंसा (सवेया इकतीसा )

दरबकोी नये परजायनय दोऊ,
श्रुत्यानरूप श्रतग्यान तो परोख है ।
सुद्ध परमातमाकौ अनुभौ प्रगठ ताते,
अनुभो विराजमान अनुभौ अदोख है ।॥।
अनुभो प्रवांन भगवान् पुरुष पुरान,
ग्यान ओ विग्यानघन महा सुखपोख है।
परम पवित्र यों अनंत नाम अनुभौके,
अनुभो बिना न कहूं और ठौर मोख है ॥ ३० ॥
आक्रामश्विकल्पभावभच्ल पक्ष नंयानांबिना
सारों यः समयस्य भाति निभतेरास्वाक्षमान’ स्वयम्‌ ।
विज्ञानेकरस: स एवं भगवास्पुष्य: पुराण: पुमान्‌
शा दर्शनमप्ययं॑ किमथवा पत्किचनकोधप्ययम्‌ ॥ ४८ ॥
कर्सा कम क्रियाहार घर

शब्दार्थ :- परोख (परोक्ष )-इन्द्रिय और मन बश्चित ज्ञान । विराजमान–सुशोभित ।अदोख (अदोष )-निर्दोष ।पोख (पोष )>पोषक । ठौरजूस्थान। मोख (मोक्ष)-समुक्ति ।

अर्थ :- द्रव्याधिक और पर्यायाथिक ये दोनों नय श्रुतशान" हैंओर श्रुतज्ञान परोक्ष प्रमाण’है, पर शुद्ध परमात्माका अनुभव प्रत्यक्ष प्रमाण है। इससे अनुभव शोमनोय, निर्दोष, प्रमाण, भगवान्, प्रुष, पुराण, ज्ञान, विज्ञानधन, परम सुखका पोषक, परम पवित्र ऐसे ओर भी अनंत नामोंका धारक है, अनुभवके सिवाय और कहीं मोक्ष नहों है ॥ ३० ॥

अनुभवके अभावमें संसार और सद्भूव्में मोक्ष है, इसपर दृष्टान्त (स्वेया इकतीसा )

जेसे एक जल नानारूप-दरबानुजोग,
भयो बहु भांति पहिचान्यों न परतु है ।
फिरि काल पाइ दरबानुजोग दूरि होत,
अपने सहज नाोचे मारग ढरतु है।
तेसे यह चेतन पदारथ विभाव तासों,
गति जोनि भेस भव-भांवरि भरतु हे ।
सम्यक् सुभाइ पाइ अनुभौके पंथ धाइ,
बंधको जुगति भानि मुकति करतु है ॥ ३१ ॥

शब्दार्थ :- दरबानुजोग>अन्य वस्तुओंका संयोग, मिलावट । भेस (वेष )>रूप । भव-भावरि>जन्म-मरणरूप संसारका चक्‍कर । भानिरनष्ट करके । १ श्रुतज्ञानके अश है । २ ज्ञय और प्रमाणमें अंश अशी भेद है । दूर॑ं भ्रिविकत्पजालगहने भ्राम्यन्निजौधाचब्ण्युतो दूरादेव विवेकनिस्नगमनान्नीतो निजोधं बलातू । विज्ञानेकरसस्तदेक रसिनामात्मानमात्माह र- न्तात्मन्येव सदा गतानुगततासायास्ययं तोयवत्‌ ॥ ४६ ॥

अर्थ :- जिस प्रकार जलका एक वर्ण है, परस्तु गेरु, राख, रंग आदि अनेक वस्तुओंका संयोग होनेपर अनेक रूप हो जानेसे पहचानमें नहीं आता, फिर संयोग दूर होनेपर अपने स्वभावमें बहने लगता है, उसो प्रकार यह चेतन्यपदार्थ बिभाव-अवस्थामें गति, योनि, कुलरूप संसारमें चक्कर लगाया करता है,पीछे अवसर मिलनेपर निजस्वभावकों पाकर अनुभवके मार्गमें लगकर कर्म-बन्धनको नष्ट करता है और मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥

मिथ्याहृष्टि जीव कमंका कर्त्ता है (दोहा)

निसि दिन सिथ्याभाव बहु, धरे भिथ्यातों जोब ।
ताते भावित करमको, करता कह्यों सदीव ॥ ३२ ॥

शब्दार्थ :- निसिदिन+सदाकाल । तातं+इससे । भावितक रम राग- देष-मोह आदि । सदीव>सर्देव । कर्थ :- मिथ्याहष्टि जीव सदेव मिथ्याभाव किया करता है, हससे बह भावकरमोंका कर्त्ता है।

भावार्थ - सिथ्यात्वी जोब अपनी भूलसे पर द्रव्योंको अपना मानता है, जिससे मैने यह किया, यह लिया, यह दिया इत्यादि अनेक प्रकारके रागादि भाव किया करता है, इससे वह भावकर्मका कर्त्ता होता है॥ ३२ ॥

भिथ्यात्वी जीव कर्मका कर्ता और ज्ञानी अकर्त्ता है (चौपाई)

करें करम सोई करतारा।
जो जाने सौ जाननहारा ॥
जो करता नहिं जाने सोई।
जाने सो करता नहिं होई॥ ३३॥
विकल्पक: पर कर्सा विकल्प: कर्म केवलं।
न जातु कठूकमंत्द सविकल्पस्थ नश्यति ॥ ५० ॥
पः करोति स करोति केवल पस्तु बेत्ति
सतु बेलि केवल ।
पः करोति न हि बेत्ति स क्वचित्‌ यस्तु बेत्ति
नकरोति स क्वचित्‌ ॥ ५१॥
कर्सा कम क्रियादार 8९

शब्दार्थ :- सोई-वही । करत्तारा>कर्त्ता । जाननहारानज्ञाता ।

अर्थ :- जो कम करे वह कर्त्ता है, और जो जाने सो ज्ञाता है, जो कर्ता हैवह ज्ञाता नहों होता और जो ज्ञाता है वह कर्त्ता नहीं होता ।

भावार्थ :- समृढ़ और ज्ञानी दोनों देखनेमें एकसी क्रिया करते हैं,परन्तु दोनोंके भावोंमें बड़ा भेद रहता है। अज्ञानी जीव ममत्वभावके सद्भावमे बन्धनको प्राप्त होता है और ज्ञानी मसत्वके अभावमें अबंध रहता है ॥ ३३ ॥

जो ज्ञानी हैवह कर्त्ता नही है (सोरठा )

ग्यान मिथ्यात न एक, नहि रागादिक ग्यान महि।
ग्यान करम अतिरेक, ग्याता सो करता नहीं ॥ ३४ ॥

शब्दार्थ :- महि>में । अतिरेक (अतिरिक्त) भिन्न भिन्न । अथे :- शानभाव और सिथ्यात्वभाव एक नहीं हैऔर न ज्ञानमें रागादिभाव होते हैं । ज्ञानसे कर्म भिन्न है, जो ज्ञाता है वह कर्त्ता नहीं है ॥ ३४ ॥

जीव करममका कर्त्ता नही है (छप्पय)

करम पिंड अरु रागभाव, सिलि एक होहि नहिं ।
दोऊ भिन्न-सरूप बससहि, दोऊ न जीवमहि ॥।
करमपिड पुग्गल, विभाव रागादि सूढ़ भ्रम ।
अलख एक पुग्गल अनंत, किमि धरहि प्रकृति सम ।।
शप्ति: करोतो न हि भासते5स्तः ज्ञप्तोी करोतिश्र न भासतेषन्तः ।
क्षप्तिः करोतिश्व ततो विभिन्‍्ने ज्ञाता न कर्तेति ततः स्थितं व ॥ ५२ ॥
कर्त्ता क्ंणि नास्ति नास्ति नियतं कर्माषि तत्कत्तरि
इन्द्र! विप्रतिषिष्यते यदि तदा का कठ कर्मस्थिति: ।
ज्ञाता ज्ञातरि करत कर्मणि सदा व्यक्ततिवस्तुस्थिति-
सेंपथ्ये बत नानटीति रभसा मोहस्तथाप्येष कि्‌ ॥। शरे ॥।
निज निज विलासजुत जगतमहि,
जथा सहज परिनमहि तिस ।
करतार जीव जड़ करमको,
मोह-विकल जन कहूहि इस ॥ ३५ ॥
शब्दाय :- बसहि-रहते हैं । महि-में ।अलखच्आत्मा । किमि>
कैसे । प्रकृति>स्वभाव ।सम-एकसा । जृत (युत) >सहित । विकलदुखी ।

अर्थ :- ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म ओर राग-देष आदि भावकर्म ये दोनों भिन्न-भिन्न स्वमाव वाले हैं,मिलकर एक नहों हो सकते, और न ये जीवके स्वमाव हैं। द्रव्यकर्म पुद्गलरूप हैं औरभावकर्म जोवके विभाव हैं । आत्मा एक हैऔर पृद्गलकम अनंत हैं,दोनोंकी एकसी प्रकृति कंसे होसकती है ? क्योंकि संसारमें सब द्रव्य अपने अपने स्वभावमें परिणमन करते हैंइसलिये जो मनुष्य जोबको कमंक! कर्त्ता कहते हैं सोकेवल मोहकी विकलता है ॥३५।।

शुद्ध आत्मानुभवका माहात्म्य (छप्पय)

जीव मिथ्यात न करं, भाव नहिं धरे भरम मल ।
ग्यान ग्यानरस रसे, होइ करमादिक पुदगल ।।
असंख्यात परदेस सकति, जगमगे प्रगट अति ।
चिदविलास गंभोर धीर, थिर रहै विमलमति ॥।
जब लगि प्रबोध घटमहि उदित,
तब लगि अनय न पेखिये।
जिमि धरम-राज वरतंत पुर,
जहूं तह निति परेखिये ॥ ३६॥
कर्त्ता कर्ता भवति न यथा कस कर्मापि नैव
शान ज्ञानं भवति व यया पुदगल: पुब्गलोइपि ।
सानज्योतिज्य लितमचलं ब्यक्तमग्तस्तथोच्च
श्रिच्छक्तोनां निकरभश्तोध्त्यन्तगम्भीरमेतत्‌ ॥ ५४ ॥॥

शब्दार्थ – भरम (भ्रम) ८ अज्ञान । प्रबोध"-सम्यग्ज्ञान । उदित> प्रकाशित । अनय> अन्याय । धरम-राज-घर्मयुक्त राज्य ।वरतंत- प्रवरतित । पुर"नगर । परेखिये-दिखाई देती है ।

अर्थ :- जोव मिथ्याभावको नहीं करता और न रागादि भावमलका घारक है। कर्म पुद्गल हैं औरज्ञान तो ज्ञानरसहीमें लोन रहता है, उसको जोवंके असंख्यात प्रदेशोंमें स्थिर, गंभोर, घीर, निर्मेल ज्योति अत्यन्त जगमगातो है, सो जब तक ज्ञान हृदयमें प्रकाशित रहता है,तब तक मिथ्यात्व नहों रहता । जंसे कि नगरमें धमंराज बतंनेसे जहाँ-तहाँ नोति हो नीति दिखाई देती है, अनीतिका लेश भी नहीं रहता ॥ ३६ ॥ तृतीय अधिकारका सार करना सो क्रिया, किया जाय सो कम, जो करे सो कर्ता है। अभिप्राय यह हैकि जो क्रियाका व्यापार करे अर्थात्‌ काम करनेबालेको कर्त्ता कहते हैं,जिसमें क्रियाका फल रहता है अर्थात्‌ किये हुए कासको कर्म कहते हैं, जो (करतृति) कारंबाई को जाबे उसे क्रिया कहते हैं। जेसे कि कुंभकार कर्त्ता है, घट कर्म हैओर घट बनानेकी विधि क्रिया है। अथवा ज्ञानीराम आम तोड़ता है, इस वाक्यमें ज्ञानीराम कर्ता, आम कर्म और तोड़ना क्रिया है । स्मरण रहे कि ऊपरके दो हृष्टान्तों से जो स्पष्ट किया है वह भेद- विवक्षासे है, क्योंकि कर्त्ता कुंभकार पृथक पदार्थ है, कम घट पृथक पदार्थ है, घट सुष्टिकी क्रिया पृथक है। इसोी प्रकार दूसरे वाक्यमें ज्ञानोराम कर्ता परथक्‌ है, आम कर्म पृथक हैओर तोड़नेकी क्रिया पृथक है। जेसे भेद-व्यवहारमें कर्त्ा-क्म-क्रिया भिन्न भिन्न रहते हैं, बसे अमेद-हृष्टिमें नहों होते-एक पदार्थमें हो कर्त्ता-कम्म-क्रिया तीनों रहते हैं। जेसे कि“चिद्माव कर्म चिदेश करता चेतना किरिया तहाँ” अर्थात्‌ चिदेश आत्मा कर्त्ता, चेतन्यमाव कर्म और चेतना (जानना) क्रिया है; अथवा मृत्तिका कर्त्ता, घट कर्म और मृत्तिकाका पिडपर्यायसे घटपर्यायरूप होना क्रिया है। इस अधिकारनमें कर्त्ता- कमे-क्रिया शब्द कहीं भेद-हष्टिसे और कहीं अभेद-हृष्टिसे आये हैं, सो खूब गहन विचार पुर्बेक समभना चाहिये। पा जप 3 पा >दी कन +2न 5८ ट अज्ञानकी दशासें जोव शुभाशुभ कर्म और शुमाशुभ प्रवृत्तिको अपनी मानता हैओर उनका कर्त्ता आप बनता है, परन्तु खूब ध्यान रहेकि लोकसें अनंत पोद्गलिक कार्माण वर्गणाएँ भरी हुई हैं,इन कार्माण बगंणाओंमें ऐसी शक्ति है कि आत्माके राग-देषका निमित्त पाकर वे कर्मरूप हो जातो हैं । इससे स्पष्ट है किज्ञानावरणीय आदि कम पुद्गलरूप हैं,अचेतन हैं, पुदूगल ही इनका कर्त्ता है-आत्मा नहीं है, हां, राग-द्वं ष-मोह आत्माके विकार है। ये आत्म-जनित हैं या पुद्गल-जनित हैं,इसका बृह॒दृद्॒व्यसंएरदमें बड़ा अच्छा समाधान किया है। वह इस प्रकार है कि- जैसे संतानको न तो अकेली माताहीसे उत्पन्न कह सकते हैं और न अकेले पिताहीसे उत्पन्न कह सकते हैं, किन्तु दोनोंके संयोगसे संतानकी उत्पत्ति है। उसी प्रकार राग-हेष-मोह न तो अकेला आत्मा उपजाता हैऔर न अकेला पुदू्गल ही उपजाता है, जीव और पुद्गल दोनोंके संयोगसे राग-हेष-मोह भावकर्मकी उत्पत्ति है,यदि अकेले पुदूगलसे राग-द्वेष-मोह उत्पन्न होते तोकलम, कागज, इंट, पत्थर आदिसे भो राग-ह ष-मोह पाये जाते; यदि अकेले आत्मासे उत्पन्न होते तो सिद्ध आत्मामें भो राग-देष-मोह पाये जाते ।अधिक लिखनेसे क्या ? राग-द्व ष-मोह पुदूगल और आत्मा दोनोंके संयोगसे होते हैं,जीब-पुदगल परस्पर एक-दूसरेके लिये निमित्त-नेमित्तिक हैं, परन्तु यह ग्रंथ निश्चयनयका है, सो यहाँ राग- हेष-मोहको पुदूगलजनित बतलाया है, ये आत्माके निजस्वरूप नहीं हैं। इसी प्रकार शुभाशुभ क्रिया पौदृगलिक कर्मोके उदयसे जीवमें होती है, अतः क्रिया भो पृदुगलजनित है। सारांश यह हैकि शुभाशुभ कर्म व शुभाशुभ क्रियाको आत्माका मानना और उन दोनोंका कर्त्ता जीवको ठहराना अज्ञान है । आत्मा तो अपने चिद्भाव कम॑ और चेतन्य क्रियाका कर्त्ता है, और पुदूगल कर्मोंका कर्त्ता पुदूगल ही है। मिथ्यात्वके उदयये जीव साता- असाता आदि कर्म ओर दया दान पूजा व विषय-कषाय आदि शुभाशुभ क्रियामें अहंबुद्धि करता हैकि मेरे कम हैं,मेरी क्रिया है,यह मिथ्याभाव है, बंधका कारण है, बंध परम्पराको बढ़ाता है;और शुमाशुभ क्रियामें अहंब॒द्धि नहीं करना अर्थात्‌ उन्हें अपनी नहों मानना, और उनमें तन्‍्मय नहीं होना सम्यक्‌ स्वभाव है–निजेराका कारण है।

पुण्य-पाप-एकत्व द्वार (४)

प्रतिज्ञा (दोहा)

करता किरिया करमकोौ, प्रगट बखान्यो मूल ।
अब बरनों अधिकार यह, पाप पुन्न समतूल ॥ १ ॥

शब्दार्थ :- प्रगट>स्पष्ट । बखान्यौ>वर्णन किया। बरनौं-कहता है! समतून+समानता । अथे :- कर्ता, क्रिया और कर्मका स्पष्ट रहस्य वर्णन किया । अब पाप-पृण्यकी समानताका अधिकार कहते हैं।

मचलाचरण (कवित्त मात्रिक)

जाके उदे होत घट-अंतर,
बिनसे मोह-महातम-रोक ।
सुभ अरु असुभ करमकी दुविधा,
मिट सहज दोसे इक थोक ॥।
जाकी कला होत संप्रन,
प्रतिभासे सब लोक अलोक ।
सो प्रबोध-ससि निरखलि बनारसि,
सीस नवाइ देत पग घोक ॥ २ ॥

शब्दार्थ :- मोह-महातम>मोहरूपी घोर अंधकार । दुविधा>भेद । इक थोक-एक ही । प्रवोध-ससि>केवलज्ञानरूप चन्द्रमा। पग घोकऊ चरणवन्दना । तदथ कर्स शुभाशुभभेदतों द्वितवतां गतसेक्यमुपानयन्‌ । ग्लपितनिर्भरमोहरजा अय॑ स्वयमदेत्यवबो धसुधाप्लव: ॥ १ ॥

६६५ पाअ
हि2अपर शिवटिलट लि किक न कम तन थक
नष्ट

अर्थ :- जिसके उदय होनेपर हृदयसे मोहरूपी महा अंधकारसिटकर भेद हो जाता है, और शुभकर्म अच्छा हैव अशुभकर्म बुरा है,यह क सब दोनों एकसे भासने लगते हैं, जिसकी पूर्ण कलाके प्रकाशमें लोक-अलो पं० करके भअलकने लगते हैं; उस केवलज्ञानरूप चन्द्रमाका अवलोकन बनारसीदासजी मस्तक नवाकर वन्दना करते हैं ॥ २ ॥

पुण्य-पापकी समानता (सववया इकतीसा )

जैसे काहू चंडालो जुगल पुत्र जनें तिनि,
एक दीयो बांभनक एक घर राख्यों है ।
बांभन कहायौ तिनि मद्य मांस त्याग कीनो,
चंडाल कहायो तिनि मद्य मांस चाख्यों है ॥।
तेसे एक वेदनी करमके जुगल पुत्र,
एक पाप एक पुन्न नाम भिन्न भार्यों है ।
दुहूं मांहि दौर धूप दोऊ कर्मंबंधरूप,
याते ग्यानबंत नहि कोउ अभिलाख्यों है ॥३।।

शब्दार्थ :- जुगल दो । वाभन >ब्राह्मण। भिन्न जुदे। भार्यो 5 कहा । दौर धृप-भटकना । अभिलाख्यौ>चाहा ।

अर्थ - ज॑से किसो चांडालनोके दो पृत्र हुए, उनमेंसे उसने एक पृत्र ब्राह्मणों दिया और एक अपने घरमें रक्‍्खा। जो ब्राह्मणको दिया वह ब्राह्मण कहलाया और मद्य-मांसका त्यागी हुआ, पर जो घरमें रहा वह चांडाल कहलाया और मद्य-म्ांसभक्षी हुआ । उसो प्रकार एक बेदनीय कमंके पाप और पुण्य भिन्न-भिन्न नाम वाले दो पुत्र है, सो दोनोंमें संसारकी भटकना है और दोनों बंधपरंपराको बढ़ाते हैं इससे ज्ञानी लोग दोनोंहीकी अभिलाषा नहो करते । भको दूरात््यजति मदिरां ब्रह्मणत्वाभिमाना- बन्य: शुद्ध: स्ववमहमिति सस्‍्नाति नित्यं तयेव । द्वावप्येती. युगपदुदरापक्षिगंती शूद्रिकाया: शुद्री साक्षाषपि ज चरतो जातिभेवश्रमेण ॥ २ ॥

भावार्थ :- जिस प्रकार पापकर्म बधन हैतथा संसारमें क्रमानेबाला है, उसी प्रकार पण्य भी बंधन है,और उसका विपाक संसार ही है, इसलिये दोनों एकहीसे है, पुण्य सोनेकी बेड़ोके समान और पाप लोहेकीो बेडीके समान है, पर दोनों बंधन हैं॥ ३ ॥

पाप-पुण्यकी समानतामे शिष्यकी शंका (चौपाई )

’ कोऊ सिष्य कहै गुरु पांहीं ।
पाप पुन्न दोऊ सम नाहीं॥।
कारन रस सुभाव फल न्यारे।
एक अनिष्ठ लग इक प्यारे ॥ ४ ॥

शब्दार्थ :- गुर पाटी -गुरुकेपास । रस - स्वाद, वियाव ! अह्ष्ट अप्रिय । अथ :- श्रीगुरुक समीप कोई शिष्य कहता है कि, पाप आर पृण्य दोनों सम्तान नहीं है, क्योंकि उनके कारण, रस, स्वभाव तथा फल चारो ही जुटे जुदे है।एकके (कारण, रस, स्वभाव, फल) अप्रिय और एकके प्रिय लगत

हैं ॥ ४ ॥ पुन (सवेया ६कतीसा )

संकलेस परिनामनिसो पाप बंध होइ,
बिसुद्धसों पुन्न बंध हेतु-भेद मानिये ।
पापके उदे असाता ताकौ है कटुक स्वाद.
पुश्न उदे साता मिष्ट रस भेद जानिये ।।
पाप संकलेस रूप पुन्न हैं विसुद्ध रूप,
दुहंको सुभाव भिन्न भेद यों बखानिये ।
पापसों कुगति होइ पुन्नसों सुगति होइ,
ऐसो फलमभेद परतच्छि परमानिये ॥ ५ ॥
हेतुस्वभावानुभवाध्रयाणां सदाप्यकेदान्न हि कमंभद, ।
तदस्धमसार्योश्रितसेकसिष्ट स्वयं समस्त खलु बन्धहेत, ।।

शब्दार्थ - संकलेस ल्‍तांब्रकघाय । विसुद्धलमंद कषाय । असातार दुख । कटुक-कडवा । साता>सुख । परतच्छि (प्रत्यक्ष )-साक्षात्‌ ।

अर्थ :- संक्लिष्ट भावोंसे पाप और निर्मल भावोंसे पुण्यबंध होता है, इस प्रकार दोनोंके बंधमें कारण-भेद है। पापका उदय असाता है, जिसका स्वाद कड॒वा हैऔर पुण्यका उदय साता है, जिसका स्वाद मधुर है, इस प्रकार दोनोंके स्वादमें अंतर हे । पापका स्वभाव तोतन् कषाय और पुण्यका स्वभाव मंद कषाय है, इस प्रकार दोनोंके स्वभावमें भेद है। पापसे कुगति ओर प्ण्यसे सुगति होती है, इस प्रकार दोनोंमें फल-भेद प्रत्यक्ष जान पड़ता हे !। ५ ।।

शिप्यकी शकाका समाधान (सर्वया इकतीसा )

पाप बंध पुन्न बंध दूहूँंमें मुकति नांहि,
कदुक सधुर स्वाद पुग्गलकों पेखिए।
संकलेस विसुद्ध सहज दोऊ कर्मचाल,
कुगति सुगति जगजालमें विसेखिए ।।
कारनादि भेद तोहि सूकत मिथ्यात मांहि,
ऐसो द्वेत्त भाव ग्यान हृष्टिमे न लेखिए ।
दोऊ भहा अंधकूप दोऊ कर्मबंधरूप,
दुहुंकी विनास मोख मारगमैं देखिए ॥ ६ ॥
शब्दाथे :- मुकति (मुक्ति) >मोक्ष । मधुररूमिप्ट । तोहिजतुमे ।
सूकतदिखते । द्वत दुविधा । दृहकौ>दोनोंका ।

अर्थ :- पापबंध और पुण्यबंध दोनों मुक्तिमार्गमें बाधक हैं,इससे दोनों हो समान हैं, इनके क॒दु और मिष्ट स्वाद पुद्गलके हैंइसलिये दोनोंके रस भो समान है, संक्लेश और विशुद्ध भाव दोनों विभाव हैइसलिये दोनोंके भाव भो समान है, कुगति और सुगति दोनों संसारमय हैं, इससे दोनोका फल भी ससान है। दोनोंके कारण, रस, स्वभाव और फलमें तुरे अज्ञानसे भेद दिखता है, परस्तु ज्ञानहृष्टिसे दोनोंमें कुछ अंतर नहों है दोनों आत्मस्वरूपको भुलानेवाले है,इसलिये महा अंधकृप हैं, और दोनों ही कर्मयंघरूप हैं,इससे मोक्षमागंसें इत दोनोंका त्याग कहा है ॥ ६ ॥

। मोक्षमार्गमेंशुद्धोपपोग ही उपादेय है (सवेया इकतीसा )

सील तप संजम विरति दान पूजादिक,
। अथवा असंजम कषाय विषंभोग है ।
कोऊ सुभरूप कोऊ अशुभ स्वरूप मूल,
वस्तुके विचारत दुविध कमंरोग है १॥
ऐसी बंधपद्धति बखानी वीतराग देव,
आतम धरममें करम त्याग-जोग है ।
भौ-जल-तरंया राग-हेषकौ हरेया महा,
मोखको करंया एक सुद्ध उकयोग है ॥ ७ ॥

शब्दार्थ :-सील (शील )>ब्रह्मचर्य । तप5८इच्छाओका रोकना । सजम (सयम )>छह कायके जीवोकी रक्षा और इन्द्रियों तथा मनको वशमे करना । विरति (व्रत)5हिसादि पाच पापोंका त्याग । असंजमच छह कायके जीवोंकी हिसा और इन्द्रियो तथा मनकी स्वतत्रता । भौ (भव) - ससार । सुद्ध उपयोग >वीतराग परिणति ।

अर्थ :- ब्रह्मचयं, तप, संयम, व्रत, दान, पुजा आदि अथवा असंयम, कबाय, विषय-मोग आदि इनमें कोई शुभ और कोई अशुभ हैं, सो आत्म- स्वभाव विचारा जावे तो दोनों ही कमरूपी रोग हैं। मगवान वीतरागदेवने दोनोंको बंधकों परिपाटी बतलाया है,आत्मस्वभावरी प्राप्तिमें दोनों त्याज्य हैं। एक शुद्धोपयोग ही संसार-समुद्रसे तारनेवाला, राग-टेष नष्ट करनेवाला और परमपदका देनेवाला है ॥ ७ ॥

कर्म सर्वर्माष स्वविदों यद्बन्धसाधनशुशन्त्यविशेषात्‌ ।
तेन सर्वमषि तत्म्रतिषिद्धं ज्ञानमेव विहिन शिवहेतु: । ४ ।॥॥
लि नननमनननमनननननिनननननन-

शिष्य-गुरुका प्रइनोत्तर (स्वेपा इकतीसा )

सिष्य कहै स्वामी तुम करनी असुभ सुभ,
कीनो है निषेध मेरे संसे सन मांही है।
मोखके सधेया ग्यता देसविरती मुनीस,
तिनकी अवस्था तो निरावलंब नांही है ।।
कहे गुरु करमको नास अनुभो अभ्यास,
ऐसौ अवलंब उनहोको उन पांही है।
निरुषपाधि आतम समाधि सोई सिवरूप,
और दोर धृष पुदगल परछांही है॥ ८ ॥
शब्दार्थ .-- ससे (संशय )व्सनन्‍देह । देसविरती>श्रावक । मुनीस -
ग।भू । निरावलव॒ूनिराधार । समाधिन्ध्यान ।
अथ :- शिष्प कहता हैकि हेस्वामी ! आपने शुभ-अशुभ क्रियाका
निषध किया सो मेरे सनमें सन्देह है, क्योंकि मोक्षमार्गो ज्ञानी अणुव्रती
श्रावक वा महाव्रतो मुनि तो निरावलब नही होते अर्थात्‌ दान, समिति,
सयम आदि शुभक्रिया करते ही है। इसपर श्रीगुरु उत्तर देते है कि कमे-
लिजिरा अनुभवके अभ्याससे है, सो वे अपने ही ज्ञानमें स्वात्मानुभव करते
ह राग-द्र ष-मोह रहित निविकल्प आत्मध्यान ही सोक्षरूप है, इसके बिना
अर सब भटकना पदगल जनित हे ।

भावार्थ :- शुभक्रिया समिति ब्रत आदि आखब हो है, इनसे रातधु वा श्रावककी कमं-निर्जरा नहों होती, निर्जरा तो आत्मानुभवसे होती है’ ॥ ८ ॥

यैनाशेन सुटृष्टिग्तनागेनास्य बच्चन वारिव । नाणनस तु रागस्तनाएशेनास्य बन्धन भवति । इत्यादि (पुरुषार्श सिद्ध पाय) निषिद्ध सर्वस्मिन्‌ सुकृतदुरिति कर्मणि किल अब्े नेष्कस्यथ नेखलु मुतनय सम्त्यशरणा । तदा ज्ञान जान प्रतिचरितप्तेषा हि शरण लय विददस्येत परमममत तत्न सिरता:॥ ५॥।

मुनि श्रावककी दशामें बंध और मोक्ष दोनो हैं (सवेया तेईसा )

सोख सरूप सदा चिनमूरति,
बंधमई करतूृति कहो है।
,. जावतकाल बसे जहां चेतन,
तावत सो रस रीति गही है ।।
आतमकोौ अनुभो जबलों,
तबलों सिवरूप दसा निबही है ।
अंध भयो करनी जब ठानत,
जंध विथा तब फंल रही है ॥। € ।॥।

शब्दार्थ :- चिनमूरति>आत्मा । करतृति-शुभाशुभ विभाव परिणति। जावत काल>"जितने समय तक । तावत-तब तक । निबही-रहतीो है । अध>अज्ञानी । विथा (व्यथा) रूदुख । ।

अर्थ :- आत्मा सर्देव शुद्ध अर्थात्‌ अबंध हैऔर क्रिया बंधमय कही है, सो जितने समय तक जोव जिसमें (स्वरूप वा क्रियामें) रहता हैउतने समय तक उसका स्वाद लेता है, अर्थात्‌ जब तक आत्म-अनुभव रहता है तब तक अबंधदशा रहती है, परन्तु जब स्वरूपसे चिगकर क्रियामें लगता है तन बंधका प्रपंच बढ़ता है ॥ ६ ॥

मोक्षकी प्राप्ति अतहं ष्टिसे है (सोरठा )

अंतर-हृष्ट-लखाउ, निज सरूपको आचरन ।
ए परमातभ भाउ, सिव कारन येई सदा ॥ १० ॥
यदेतज्ज्ञानात्मा भ्रुवमचलमाभाति भवनम्‌
शिवस्थायं हेतुः स्ववम्पि यतस्तच्छिव इति।
अतोःन्यव्‌बन्धस्य स्वयक्षपि यतो बर्ध इति तत्‌
ततो ज्ञानात्मत्व॑ भवनसनुभतिहि विहितम्‌ ॥ ६ ॥
वृत्त ज्ञनस्वभाबेन ज्ञानस्य भवन सदा ।
एकड्रध्यस्वभावत्वास्मोक्षहेतुस्तदैव तत्‌ ॥ ७ ॥
8 5 8 2 52 न पर न न

शब्दार्थ :- अंतर हष्ट-अंतरंग ज्ञान । स्वरूपकौ आचरण-स्वरूपमें स्थिरता । भाउल्‍-स्वभाव ।

अर्थ :- अंतरंग ज्ञानहष्टि और आत्म-स्वरूपमें स्थिरता यह परमात्माका स्वभाव हैऔर यही मोक्षका उपाय है ।

भावार्थ :- सम्यक्त्व सहित ज्ञान और चारिच्न परमेश्वरका स्वभाव है और यही परमेश्वर बननेका उपाय है ॥१०।॥॥

बाह्यहृष्टिसे मोक्ष नही है (सोरठा)

करम सुभासुभ दोह, पुदंगलपिड विभाव मल ।
इनसौ मुकति न होइ, नहिं केवल पद पाइए ॥१११।

शब्दार्थ :- सुभासभ>भले-बुरे ।विभावविकार । मलब्कलक ।

अर्थ :- शुम और अशुभ ये दोनों कर्म मल हैं, पुदूगलपिण्ड है, आत्माके विभाव हैं, इनसे मोक्ष नहीं होता और केवलज्ञान भी नहीं पा सकता है ॥ ११ ॥

इसपर शिष्य-ग्रुरुका प्रश्नोत्तर (सवेया इकतीसा )

कोऊ शिष्य कहे स्वामी ! असुभक्रिया असुद्ध,
सुभक्रिया सुद्ध तुम ऐसी क्‍यों न वरनी ।
गुरु कहे जबलों क्रियाके परिनाम रहैं,
तबलो चपल उपयोग जोग धरनी ॥।
थिरता न आव॑ तोलों सुद्ध अनुभो न होइ,
याते दोऊ क्रिया मोख-पंथकी कतरनी ।
बंधको करंया दोऊ दुहमें न भली कोऊ,
बाधक विचारि में निसिद्ध कीनी करनी ॥ १२ ॥
वृस कर्मस्थभावेन ज्ञानस्थ भवन न हि।
द्रव्घान्तरस्वभावत्वान्मोक्षहेतुने कर्म तत ॥ ८ ॥
मोक्षहेतुतिरोधानाइन्धत्वात्त्वयप्रेव. च्‌।
सोक्षहेतुतिरोधायि भावत्वासन्निधिध्यते ॥ ६ ॥

शब्दार्थ :- असुभ क्रियापाप । सुभ क्रियापुण्य । क्रिया-शुभाशुभ परिणति ।चपल->चचल । उपयोग ज्ञान दशेन । कतरनी>कंची । निसिद्ध वर्जित । करनी >क्रिया ।

अर्थ :- कोई शिष्य पुछता है कि हेस्वामी ! आपने अशुभ क्रियाको अशुद्ध और शुभ क्रियाकों शुद्ध क्यों न कहा ? इस पर भ्रीगुरु कहते हैंकि, जब तंक शुम-अशुभ क्रियाके परिणाम रहते हैं तब तक ज्ञान-दर्शन-उपयोग और मन-वचन-कायके योग चंचल रहते हैं तथा जब तक ये स्थिर न होबें तब तक शुद्ध अनुभव नहीं होता । इससे दोनों ही क्रियाएँ मोक्षमार्गमें बाधक हैं, दोनों ही बंध उपजाने बाली हैं, दोनोंमेंसे कोई अच्छी नहीं है । दोनों मोक्षमार्गसें बाधक हैं, ऐसा विचार कर मैने क्रियाका निषे् किया है ॥ १२ ॥

ज्ञानमांत्र मोक्षमार्ग है (सवेया इकतीसा )

मुकतिके साधककों बाधक करम सब,
आतमा अनादिको करम मांहि लुक्यों है ।
एते पर कहे जो कि पाप बुरौ पुन्न भलो,
सोई महा मृढ़ मोख मारगसों चुक्यों है ।।
सम्यक् सुभाउ लिये हियेमें प्रगटयौ ग्यान,
ऊरध उम्ंगि चल्यो काहूपे न रुक्‍्यों है ।
आरसीसो उज्जल बनारसी कहत आपु,
कारन सरूप द्व॑के कारजकों दढुक्यों है ॥१३॥।

शब्दार्थ :- साधक>सिद्धि करनेवाला । लुक्यौ-छिपा । चुक्यी (चूका) >भूला । ऊरध (ऊध्वे)>ऊपर । उमगिल्‍जउत्साह पूर्वक । आरसी दर्पण । दुक्यौ -बढा ।

अर्थ :- मुक्तिके साधक आत्माको सब कर्म बाधक हैं, आत्मा अनादि- फालसे कर्मोमें छुपा हुआ है, इतनेपर भी जो पापको बुरा और पुण्यको भला संग्यस्ते सति तत्र का किल कथा पुण्यस्थ पापस्य वा । सस्यक्तवादिनिजस्वभाव पवनास्मोक्षस्थ हेतुभंव- स्तेष्कम्म प्रतिबद्धमुद्धभएसं झञान॑ स्वयं धावति ॥१०॥॥ कहता हैवही महामूर्ख मोक्षमागंसे विमुख है। जब जीवको सम्यग्दर्शन सहित ज्ञान प्रगट होता हैतब बह अनिवाय उन्नति करता है। पं० बनारसोदासजी कहते हैकि वह ज्ञान द्पणके समान उज्ज्वल स्वयं कारणस्वरूप होकर कारयमें परिणत होता है अर्थात्‌ सिद्धपद प्राप्त करता है।

भावार्थ :- विशुद्धतापुर्वक बढ़ा हुआ ज्ञान किसीका रोका नहीं रुकता, बढ़ता हो जाता है, सो पूर्वअवस्थामें जो ज्ञान उत्पन्न हुआ था वहू का:णरूप था, वही कार्यरूप परिणमन करके सिद्धस्वरूप होता है ॥ १३ ॥

ज्ञान और शुभाशुभ कर्मोका व्यौरा (सवेया इकतीसा )

जौलो अष्ट कमंकौ विनास नांही सरवथा,
तौलो अंतरातमार्म धारा दोइ बरनी ।
एक ग्यानधारा एक सुभासुभ कर्मधारा,
दुहुँकी प्रकृति न्यारी न्यारी-न्यारी धरनी ।।
टतनो विसेस जु करमधारा बंधरूप,
पराधीन सकति विविध बंध करनी ।
ग्यानधारा मोखरूप मोखको करनहार,
दोखकी हरनहार भौ-समुद्र-तरनी ॥ १४ ॥
_ शब्दार्थ :- सरवथा (सर्वथा) > बिलकुल । बरनी 5 व्तती है।
बरना>सत्ता । पराधीन>दूसरेंके आश्रित। विविध>भाँति भाँतिके ।
भो (भव) 5 ससार । तरनी>नौका ।

अर्थ:-जब तक आठों कर्म बिलकुल नष्ट नहीं होते तब तक मम्यस्टृष्टिमें ज्ञाधारा और शुभाशुभ कमंधारा दोनों बतंती हैं। दोनों धाराओका जुदा जुदा स्वभाव और जुदो जुदी सत्ता है। विशेष भेद इतना कि कमंथारा बधरूप है, आत्मर्शाक्तको पराधीन करती हैतथा अनेक प्रकार यावत्पाकमुपति कर्मविरतिर्ज्ञानस्थ सम्यड न सा कर्मज्ञानसमुल्चयोपषि विहितस्तावन्न काचित्कषति:। किवन्नापि समुल्लसत्यवशतों यत्कमंत्रन्धाय तनु मोक्षाय स्थितम्रेकमेव परभ॑ ज्ञान बिमुक्तः स्वतः बंध बढ़ाती है; ओर ज्ञानधारा मोक्षस्वरूप है, मोक्षकी दाता है, दोषोंको हटाती है, तथा संसार-सांगरसे तारने के लिये नोकाके समान है ॥ १४ ॥

यथायोग्य कर्म और ज्ञानसे मोक्ष है (सवेया इकतीसा )

समुर्झे न ग्यान कहें करम कियेसों मोख,
ऐसे जीव बिकल मिथ्यातकी गहलमें ।
ग्यान पच्छ गहें कहें आतमा अबंध सदा,
बरतें सुछंद तेऊ बूड़े हैं चहलमें ॥॥
जथा जोग करम करे पे मसता न धरे,
रहे सावधान ग्यान ध्यानकी टहलमें ।
तेई भव सागरके ऊपर ह्वू॑तरे जीव,
जिन्हिको निवास स्यादवादके महलमें ॥ १५ ॥

शब्दार्थ :- विकल-बेचेन । गहल>पागलपन । सुछंद-मनमाने । चहल>कीचड । सावधान->सचेत । टहल>सेवा । महल>-मंदिर ।

अर्थ :- जो ज्ञानमें नही समझते ओर कमंसे हो सोक्ष मानते हैं ऐसे क्रियावादी जीव समिथ्यात्वके कको रोंसेबेचेन रहते हैं। ओर सांख्यवादी जो सिर्फ ज्ञातका पक्ष पकड़के आत्माकों सदा अबंध कहते हैं तथा मनमाने बतंते हैं वे भीसंसारकी कीचड़में फेंसते हैं। पर जो स्पाद्वाद-मंदिरके निवासी है वे अपने पदस्थके अनुसार कर्म करते है और ज्ञान-ध्यानकी सेवामें सावधान रहते हैं वेहीससलार-सागर से तरते हैं ॥ १५ ॥

सग्ना: कर्मनयावलम्बनपरा ज्ञानं न जानन्ति ये
मग्ता ज्ञाननयेबिणोषपि. सतत स्वच्छग्दमन्वोद्यमाः ।
विश्वस्पोपरि ते तरन्ति सततं ज्ञान भवस्तः स्वयम्‌
मे कुबेन्ति न कर्म जातु न वर्श यान्ति प्रमादस्य बच ॥१२॥
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मूढ़ क्रिया तथा विचक्षण क्रियाका वर्णन (सवैया इकतीसा)

जेसे मतवारो कोऊ कहै ओर करें और,
तेसे म्रृढ़ प्रानी विपरीतता धरतु है।
असुभ करम बंध कारन बखाने माने,
मुकतिके हेतु सुभ-रोति आचरतु है 0
अंतर सुहृष्टि भई सूढ़ता बिसर गई,
ग्यानकौ उदोत भ्रम-तिमिर हरतु है।
करनीसों भिन्न रहै आतम-सुरूप गहै,
अनुभो अरंभि रस कोौतुक करतु है ॥१६।॥

शब्दार्थ :- मतवारौ-नशेमें उन्मत्त । मूढ प्रानी-अज्ञानी जीव । बखाने-कहे । मार्न-श्रद्धान करे ।बिसर गई-दूर हो गई । उदोत–प्रकाश ।

अर्थ :- जेसे कोई पागल मनुष्य कहता कुछ और करता कुछ है उसी प्रकार सिथ्याहृष्टि जीवमें विपरीतभाव रहता है, वह अशुभ करममको बंधका कारण समभता है और मुक्तिके लिये शुभ आचरण करता है। पर सच्चा श्रद्धान होनेपर अज्ञान नष्ट होनेसे ज्ञानका प्रकाश मिथ्या-अंधकारको दूर करता हैओर क्रियासे विरक्त होकर आत्मस्वरूपको प्रहण करके अनुभव धारण कर परमरसमें आनंद करता है ॥ १६ ॥ भेदोन्‍्मादं भ्रमरसभराघ्नाटयत्पोतमोह पूलोन्मूल॑ सकलमपि तत्कर्म क्ृत्वा बलेन। हेलोन्मोलत्परमकलया साठंमारब्धकेलि शानज्योति, कबलिततमः प्रोज्जजम्मे भरेण १३॥ इति पृण्य-पापाधिकार ॥ ४ ॥ चौथे अधिकारका सार जिसका बंध विशुद्ध भावोंसे होता है वह प्रुण्य और जिसका बंध संक्लिष्ट भावोंसे होता हैबह पाप है। प्रशस्त राग, अनुकम्पा, कलुषता रहित भाव, अरहंत आदि पंच परमेष्ठीकी भक्ति, व्रत, संयम, शील, दान, मंदकषाय आवि विशुद्ध भाष पुण्यबंधके कारण हैऔर साता, शुभ आयु, ऊँच गोत्र, देवगति आदि शुभ नाम पृण्यकर्म हैं । प्रमाद सहित प्रवृत्ति, चित्तकी कलुषता, विषयोंकी लोलुपता, दूसरोंको संताप देना, दूसरोंका अपवाद करना, आहार, परिग्रह, भय, मंथुन, चारों संज्ञा, तीनों कुज्ञान, आते रोद ध्यान, भिथ्यात्व, अप्रशस्त राग, द्वेष, अन्नत, असंयम, बहुत आरंभ, दुःख, शोक, ताप, आक्रंदन, योगवक्रता, आत्मप्रशसा, मूढ़ता, अनायतन, तीमत्र कषाय आदि संक्लिष्ट भाव है- पाप-बंधके कारण हैं। ज्ञानावरणोय, दर्शनावरणीय, असाता, मोहनीय, नरक आयु, पशु गति, अशुभ नाम, नोच गोत्र, अंतराय आदि पापकम हैं। अशुभ परिणति और शुभ परिणति दोनों आत्माके विभाव हैं, दोनों ही आस्रव-बंधरूप है, संवर-निर्ज राकेकारण नहों हैं, इसलिये दोनों ही मुक्तिमार्गमे घातक होनेसे पाप और पृण्य दोनों एक ही हैं। यद्यपि दोनोंके कारण, रस, स्वभाव, फलमें अंतर हैतथा पृण्य प्रिय और पाप अप्रिय लगता है, तो भी सोनेकी बेड़ी और लोहेकी बेडोके समान दोनों ही जीवको संसारमें संसरण कराणनेवाले हैं। एक शुभोपयोग और दूसरा अशुभोषयोग है, शुद्धोपपोग कोई भी नहीं है, इससे मोक्षमार्गमें दोनोंकी सराहना नहीं है। दोनों हो हेय है, दोनों आत्माके विभावभाव हैं, स्वभाव 'नहों हैं, दोनों पुदुगलजनित है, आत्मजनित नहों है, इनसे मुक्ति नहीं होसकती ओर न केवलज्ञान प्रगट होता है । आत्मामें स्वभाव, विमाव दो प्रकारकी परिणति होती है, स्वभाव परिणति तो बीतरागभाव है ओर विभाव परिणति राग-हेषरूप है। इन राग और देषमेंसे हेष तो सर्वंथा पापरूप है,परंतु राग प्रशस्त और अप्रशस्तके भेदसे दो प्रकारका है, सो प्रशस्त राग पण्य हैओर अप्रशस्त राग पाप है। सम्यग्दशन उत्पन्न होनेके पहले स्वभावभावका उदय ही नहीं होता, अतः मिथ्यात्वकी दशामें जीवकों शुभ वा अशुभरूप विभाव परिणति ही रहती है, सम्यग्दशंनकी उत्पत्ति हुए पीछे कमंका सर्वथा अभाव होने तक स्वभाव और बिभाव दोनों परिणति रहती हैं, सो स्वभाव परिणति संवर-निर्जरा और मोक्षकी जननी रहती है, और विभाव परिणति बंधहीको उत्पन्न करतो है । इसका खुलासा इसप्रकार हैकि “जावत शुद्धोपयोग पावत नहीं मनोग, तावत ही प्रहण जोग कहो पुन्‍न करनी” की रोतिसे सम्यग्हृष्टि श्रावक और घुनि, पाप परिणतिसे बचकर शुभोपयोगका अवलंबन लेते हैं और शुभ परिणति उन्हें आख़व ही उपजाती है। उन्हें जो गुणश्रेणिरूप निजरा होती है बह शूद्धोपयोगके बलसे होतो है, शुभोपयोग तो आख़ब ही करता है। भाव यह हैकि, जितने अंश राग हैउतने अंश बंध है, और जितने अंश ज्ञान और निश्चयचारित्र हैउतने अंश बंध नहीं है, इसलिमे पृण्यको भी पापके समान हेय जानकर शुद्धोपपोगकी शरण लेना चाहिये । ज्ञान बावनी ( घनाक्षरी ) निजकाज सबहीको अध्यात्म शैली भांभ, मृढ़ क्यों न खोज देखें खोज औरवानमें । सदा यह लोकरीति सुनो है ‘बनारसीजु’, वचनप्रशाद नेकु ज्ञानीनके काममें ।। चेरी जेसे मलिमलि धोवत बिराने पांब, परमनरंजिवेको सांक ओ विहानमें। निजपांव क्यों न धौवे ? कोई सखी ऐसोौ कहै, मोसी कोऊ आलसन और न जहानमें ॥ २६ ॥

आस्रव अधिकार (५)

प्रतिज्ञा (दोहा )

पाप पुन्नोकी एकता, वरनी अगम’ अल्प ।
अब आख़व अधिकार कछु, कहो अध्यातम रूप ॥ १॥।

शब्दार्थ :- अगम गहन । अनूप८उपमा रहित ।

अर्थ :- पाप-पुण्यकी एकताका गहन और अनुपम अधिकार वर्णन किया, अब आख्रव अधिकारका आध्यात्मिक रीतिसे कुछ वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥

सम्यरज्ञानकों नमस्कार (सत्रया इकतीसा।
जेते जगवासी जीव थावर जंगमन्ूप,
तेते निज बस करि राखे बल तोरिके उनन्‍मन्‍
महा अभिमानी ऐसो आख्रव अगाघ जोधा,
रोपि रन-थंभ ठाड़ो भयो मुछ मोरिक
आयो तिहि थानक अचानक परम धाम,
ग्यान नास सुभट संवायों बल फोरिक
आख्रव पछारदथो रन-थंभ तोरि डारचौ ताहि,
निरखि बनारसी नमत कर जोरिके ॥ २ ॥)
शब्दार्य .- धावर (स्थावर / लेप । जयम>दि दद्धित अर
जे भिमानी 55 प्रमडो । अगाप ±- जरा ढगश।
राधि - सदा एप
“थम 5 परद्धका मष्टा , तन बवात। वास 5. वुरद पान ।
मर > बाधा । फोरिर - वाग्रग बरत़े । हरि न देखार
है है28 + माली गठ है।
अथ सहामउनिर्भरमन्‍्थर ममरराज़ुपरागतंशातए ।
अयमुदार्गभोरमहोदयों जयति दर्जयबोधघनधेर ॥ १ ।

अर्थ :- जिसने संसारके सब त्रस-स्थावर जीवोंको बलहोन करके अपने आधोन किया है, ऐसा बड़ा अभिमानी आल्वरूप महायोद्धा मृछ मरोड़कर लड़ाईका भण्डा स्थापित करके खड़ा हुआ। इतनेमें वहाँ अचानक हो ज्ञान नामका सहायोद्धा सवाया बल स्फुरित करके आया तो उसने आखबकों पछाड़ डाला और रणथंभको तोड़ डाला । ऐसे ज्ञानरुपी योड्ाकों देखकर पं० बनारसीदासजी हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं ॥ २ ॥

द्रव्याखव, भावाखव और सम्यग्ज्ञानका लक्षण (स्वेया तेईसा )

दवित आखस्रव सो कहिए जहूं,
पुल जीवप्रदेस गरासे ।
भावित आख्रव सो कहिए जहं,
राग विरोध विमोह विकास ॥।
सम्यक् पद्धति सो कहिए जहूं,
द्वित भावित आख्रव नासे।
ग्यान कला प्रगट तिहे थानक,
अंतर बाहिर और न भासे ॥ ३ ॥
शब्दाथ :- दवित आखब 5 पुदुगल परमाणुओंका आगमन ।
गरासेल्‍घेर लेवे। भावित आखव द्रव्य आखवमे कारणभूत आत्माकी
विभाव परिणति । पद्धतिचाल । ग्यान कलाउचज्ञानज्योति ।

अर्थ :- आत्मप्रदेशोपर पुद्गलका आगमन सो द्रव्याखव है, जीवके राग-देष-सो हरूपपरिणाम भावाख्रव है, द्रव्याल्ब और भावाखवका अभाव आत्माका सम्यक् स्वरूप है । जहाँ ज्ञानकला प्रगट होती है बहा अंतरंग और बहिरंगमें ज्ञानके सिवाय और कुछ नहों दिग्वता ॥ ३ ॥

भावों रागद्र षमोहेविना यो जीवम्प स्थाद ज्ञाननिव॒त्त एवं ।
रुन्धन्‌ सर्वान द्रव्यकर्माखोघान्‌ एघो:माव: सर्वेभावात्रबाणाम ॥ २ ॥
आख़ब अधिकार १११

ज्ञाता निराखवी है (चौपाई)

जो दरवास्रव रूप न होई।
जहूं भावात्रव’ भाव न कोई ॥।
जाकी दसा ग्यानसय लहिए।
सो ग्यातार निरास्व कहिए ॥ ४ ॥

शब्दार्थ :- दसा>अवस्था । ग्यातारछ्ज्ञानी । निरास्व>आख्रव रहित ।

अर्थ :- जो द्रव्याल्वरूप नहीं होता और जहाँ भावाखरव भाव भी नहीं हैऔर जिसकी अवस्था ज्ञानसय है वही ज्ञानी आख्रव रहित कहाता है ॥ ४ ॥

सम्यग्ज्ञानी निराखवी रहता है (स्वेया इकतीसा )

जेते मनगोचर प्रगट-बुद्धि-प्रवक,
तिह परिनामनकी ममता हरतु है।
मनसों अगोचर अबुद्धि-प्रवक भाव,
तिनके विनासिवेकों उहिम धरतु है ॥।
याही भांति पर परनतिकौ पतन करे,
मोखको जतन करे भौ-जल तरतु है ।
ऐसे ग्यानबंत ते निराख्रव कहाव सदा,
जिन्हिको सुजस सुविचच्छन करतु है ॥ ५ ॥

शब्दार्थ :- मनगोच र>जहाँ तक मनकी पहुँच है । मनसो अगोचर जहाँ भावालवाभावभय प्रपन्नो द्रव्याखवेस्य: स्वत एवं भिन्नः । ज्ञानी सदा ज्ञानमयकर्भावों निराखवबों ज्ञायक एक एव ॥ ३ ॥ सन्न्‍्यस्यन्निजबुद्धिपूर्वमनिश राग॑ समग्र स्वयम्‌ वारंबारमबुद्धिपूर्वमपि त॑ जेतुं स्वर्शक्ति स्पृशन । उच्छिन्दन्‌ परवृत्तिभेव सकलां ज्ञानस्य पूर्णो भव- प्नात्मा नित्यनिराखबों भवति हि ज्ञानी यदा स्यात्तदा । ४ ।। मनकी पहुँच नही है। उदिम>उद्योग । पतनल्‍नाशण ! जतनरउपाय । भौ-जल (भवजल )>ससार-सागर । सुविचच्छुनपडित । अ्थ :- जिन्हें मन जान सके ऐसे बद्धिग्राही अशुद्ध परिणामोंमें आत्मब॒द्धि नहों करता और मनके अगोचर अर्थात्‌ बुद्धिके अग्राह्म अशुद्ध भाव नहा होने देनेमें सावधान रहता है, इसप्रकार पर-परिणति नष्ट करके और भोक्षमार्गमें प्रयत्त करके जो संसार-सागरसे तरता है वह सम्यग्ज्ञानी निराखवोी कहलाता है, उसकी थिद्वान्‌ लोग सदा प्रशंसा करते है ।

भावार्थ :- वतंमान कालके अशुद्ध परिणामोंमें आत्मबुद्धि नही करता और भूृतकालमें हुए रागादि परिणामोंकों अपने नहीं मानता वा आगामी कालमें होनेवाले विभाव मेरे नहों हैं ऐसा श्रद्धान होने से ज्ञानी जीव सदा निराखवबो रहते हैं ॥ ५ ॥!

शिष्यका प्रश्न (स्वेया तेईसा)

ज्यों जगमे बिचर मतिमंद,
सुछंंद सदा वरत बुध तंसो।
चंचल चित्त असंजित वंन,
सरोर-सनेह जथाबत जंसो ।।
भोग संजोग परिग्रह संग्रह,
मोह बिलास कर जहं ऐसो ।
पूछत सिष्य. आचारजसों यह,
सम्यकबंत निराखब कंसो ॥ ६ ॥

शब्दार्थ :- विचरे ज्वर्ताव करें । सछद (स्वच्छुन्द )> मनमाना। बल जीनना। तवैन- वचन ।। गनर [ स्नेड़ो -महब्बतल ’ गग्नट - इकट करता! ’ मवस्यासेव जोवस्था वव्यप्रत्ययसततों । कुतो तिराखवों ज्ञानी नित्यमवेति चेन्मतिः ॥ ५ ।।

आख़ब अधिकार ११३

अर्थ :- शिष्य गुरुसे प्रइन करता है कि हे स्वामी ! संसारमें जिस प्रकार मिथ्याटृष्टि जीव स्वतंत्र बंता है बेसी ही तो सम्यग्हृष्टि जीवको हमेशा प्रवृत्ति रहती है- दोनोंके चित्तको चंचलता, असंयत वचन, शरोरका स्नेह, भोगका संयोग, परिग्रहका संचय और मोहका विकास एकसा होता है। फिर सम्यग्हृष्टि जीव किस कारणसे आख्रव रहित है ? ॥ ६ ॥

शिष्यकी शंकाका समाधान (स्वेया इकतीसा )

प्रव अवस्था जे करम-बंध कीने अब,
तेई उदे आइ नाना भांति रस देत हैं।
केई सुभ साता केई असुभ असातारूप,
दुहुंसों नराग न विरोध समचेत हैं ।।
जथाजोग क्रिया करे फलकी न इच्छा धरे,
जीवन-मुकतिकौ बिरद गहि लेत हैं ।
यातें ग्यानवंतकों न आख्रव कहत कोऊ,
मुद्धतासों न्‍्यारे भए सुद्धता समेत हैं ॥ ७ ॥

शब्दार्थ :- अवस्था पर्याय । जथाजोग- जैसी चाहिये वैसी, अपने पदके योग्य । समचेतल्‍्समता भाव । बिरदन्‍्यश।। मुद्धता>भिथ्यात्व । समेत>सहित ।

अर्थ :- पूर्वकालमें अज्ञान अवस्थासें जो कम बंध किये थे वे अब उदयमें आकर फल देते हैं, उनमें अनेक तो शुभ हैं जो सुखदायक हैं और अनेक अशुभ हैं जो दुःखदायक हैं, सो सम्पग्टष्टि जोव इन दोनों भाँतिके कर्मोदयमें हष-विधाद नहीं करते - समताभाव रखते हैं; वे अपने पदके योग्य क्रिया करते हैं, परउसके फलको आशा नहीं करते, संसारी होते हुए भी बविजह॒ति न हि सत्तां प्रत्यया: पुर्बंबद्धाः समयसनुसरन्तो यद्यपि द्रव्यरूपा: । तदपषि सकलरागद षमोहव्युदासा- दवतरति न जातु ज्ञानिनः कर्मबन्ध: ॥ ६ ॥

११४4 मिकनक फीफिवीनि नकदसमयतार
है. नाटकनील जल
कल आ7 केटप जल जमलक
मुक्त कहलाते हैं,क्योंकि सिद्धोंके समान देह आदिसे अलिप्त हैं,वे मिथ्यात्वसे
रहित अनुभव सहित हैं, इससे ज्ञानियोंकों कोई आलब सहित नहीं
कहता है ॥ ७ ॥

राग-द्रेष-मोह और ज्ञानका लक्षण (दोहा)

जो हितभाव सु राग है, अनहितभाव विरोध ।
अ्रासिक भाव विमोह है, निरमल भाव सुबोध ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :- श्रामिकल्‍पर द्रव्यमे अहंबुद्धि । निर्मल >विकार रहित । बोध>ज्ञान ।

अर्थ :- प्रेमका भाव राग, घ॒णाका भाव द्वेष, परद्रव्यमें अहंबद्धिका भाव मोह और तीनोंसे रहित निविकारभाव सम्यग्ज्ञान है॥ ८ ॥

राग-देष-मोह ही आंख्रव है (दोहा )

राग विरोध विमोह मल, एई आख्रवपुल ।
एई करम बढ़ाईक, करे धरमको भूल ॥ ६ ॥

अर्थ :- राग-हेष-मोह ये तीनों आत्माके विकार है,आख्रवके कारण हैं और कमंबंध करके आत्माके स्वरूपको भुलाने वाले है ॥ ६ ॥

सम्यग्हष्टि जीव निराख्व है (दोहा)

जहां न रागादिक दसा, सो सम्यक् परिनाम ।
यातें सम्यकवंतको, कह्ो निराखरव नाम ॥१०॥

अर्थ :- जहां राग-हेष-मोह नहीं हैं वह सम्यकत्वभाव है, इसोसे सम्पग्हष्टिको आख्रव रहित कहा है ॥ १० ॥

रागह षविमोहानां ज्ञानिनो यदसंभव:ः !
तत एव न बन्धोष्स्य ते हि बन्धस्थ कारणम्‌ ॥ ७ ॥
आख़व अधिकार ११५

निराखवी जीवोंका आनन्द (सवेया इकतीसा)

जे केई निकटभव्यरासो जगवासी जीव,
मिथ्यामत भेदि ग्यान भाव परिनए हैं।
जिन्हिकी सुहृष्टिमें नराग हेष मोह कहूं,
. बिमल विलोकनिमें तोनों जीति लए हैं ॥।
तजि परमाद घट सोधि जे निरोधि जोग,
सुद्ध उपयोगकी दसामें मिलि गए हैं ।
तेई बंधपद्धति विदारि परसंग डारि,
आपमें सगन हक आपरूप भए हैं ॥ ११ ॥

शब्दार्थ :- सुदृष्टि-सच्चा श्रद्धान ।विमल> उज्ज्वल । विलोकसि८ श्रद्धघात। परमाद 5 असावधानी । घट 5 हृदय । सोधि ८ शुद्ध करके । सुद्ध उपयोग-बीत राग-परिणति । विदारिस-हृटाकर । अथे :- जो कोई निकट भव्यराशि संसारी जीव मिथ्यात्वको छोड़कर सम्यर्भाव ग्रहण करते है, जिन्होंने निमल श्रद्धानसे राम-देष-मोह तोतोंको जीत लिया है और जो प्रमादको हटाकर, चित्तको शुद्ध करके, योगोका निग्रह॒ कर शुद्ध-उपयोगमें लोन हो जाते हैं, वेही बन्ध-परंपराकों नष्ट करके पर बस्तुका सम्बन्ध छोड़कर, अपने रूपमें मगन होकर निज-स्वरूपको प्राप्त होते हैंअर्थात्‌ सिद्ध होते हैं ।११।॥

अध्यास्य शुद्धनयमुद्धतबो घचिह्ल-
सेकास्यसेव कलयन्ति स्देव ये ते।
रागादिमुक्तमनस: सतत भजनन्‍्तः
पश्यन्ति बन्धविधुरं समयस्य सारम ॥ ८ ॥
न न नओंओंझओंघतोव वतीतीतीत७क्‍इौघट।
चनेोिोतत सतना

उपशम तथा क्षयोपशम भावोंकी अस्थिरता (सवेया इकतीसा )

जेते जोब पंडित खयोपसमी उपसभो,
तिन्‍्हकी अवस्था ज्यों लुहारकी संडासी है ।
खिन आगमांहि खिन पानामांहि तेसे एऊ,
खिनसें मिथ्यात खिन ग्यानकला भासी है ॥॥
जौलों ग्यान रहै तौलों सिथिल चरन मोह,
जैसे कीले नागकी सकति गति नासो है।
आबत मिथ्यात तब नानारूप बंध कर,
ज्यों उकीले नागकी सकति परगासो है ॥ १२ ॥

शब्दार्थ :- पंडित-सम्यर्हष्टि ।खयोपसमी >क्षयोपशम सम्यरहृष्टि । उपसमी८उपशम सम्यग्दष्टि ।एऊ>वे । खिन (क्षण )व्यहा क्षणसे अत- मुहतंका प्रयोजन है ।सिधिल>कमजोर । कीले>मत्र वा जड़ीसे बाँघे हुए । नाग>सप । उकीले-"मंत्र-बंधनसे मुक्त । सकति (शक्ति )-बल । परगासी (प्रकाशी )5प्रगट की ।

अर्थ :- जिस प्रकार लुहारकी संडासोी कमी अग्निमें तप्त और कभी पानीमें शीतल होतो है, उसी प्रकार क्षायोपशसिक और ओऔपशमिक सम्यग्हृष्टि जीबोंको दशा है अर्थात्‌ कभो मिथ्यात्वभाव प्रगट होता हैऔर फंभी ज्ञानको ज्योति जगभगातो है। जब तक ज्ञान रहता है तब तक चारित्रमो हनोीयकी शक्ति और गति कोले हुए सपंके समान शिथिल रहती है, ओर जब मिथ्यात्व रस देता है तब बह उकोले हुए सर्पकी प्रगट हुई शक्ति ओर गतिके समान अनंत कर्मोंका बंध बढ़ाता है । प्रच्युत्थ शुद्धनयतः पुनरेव ये तु रागादियोगमुपयान्ति विमुक्तबोधा: । ते कर्मंबन्धमिह विश्वति पूबंबद्ध- द्रब्याखवे: कृतविचित्रविकल्वजालम्‌ ॥ ६ ॥। विशेष :- उपशम्त सम्थवत्वका" उत्कृष्ट ब जघन्य काल अंतमु ह॒तंहै और क्षयोपशम सम्यक्त्वका" उत्कृष्ट काल छियासठ सागर* और जघन्य काल अंतमु ह॒तेहै। ये दोनों सम्यक्त्व नियमसे नष्ट ही होते हैं, सोजब तक सम्पक्त्वभाव रहता हैतब तक आत्मा एक विलक्षण शान्ति और आनंदका अनुभव करता हैऔर जब सम्यक्‍त्वभाव नष्ट होनेसे मिथ्यात्वका उदय होता हैतब आत्मा अपने स्वरूपसे चिगकर कसं-परंपराको बढ़ाता है ॥ १२ ॥

अशुद्ध नयसे बन्ध और शुद्ध नयसे मुक्ति है (दोहा)

यह निचोर या ग्रंथको, यहै परम रसपोख ।
तज सुद्धनय बंध है, गहे सुद्धभय मोख ॥ १३ ॥

शब्दार्थ :- निचोर-सार । पोखल्पोषक । गहैन्ग्रहण करनेसे । मोख>मोक्ष ।

अर्थ :- इस शास्त्रमें सार बात यही हैऔर यही परम तक्त्वकी पोषक हैकि शुद्धनयकी रीति छोड़नेसे बन्ध और शुद्धनयकी रीति ग्रहण करनेसे मोक्ष होता है ॥ १३ ॥

जीवकी बाह्य तथा अन्तरग अवस्था (सर्वया इकतीसा)

करमके चक्रमें फिरत जगवासी जीव,
हूं रह्मौ बहिरमुख व्यापत विषमता ।
अंतर सुमति आई बिमल बड़ाई पाई,
पुदूगलसों प्रीति टूटी छूटी माया मसता (॥
) अनस्तानुबन्धीकी चार और दर्शनमोहनीयकी तीन, इन सात प्रकतियोका उपशम
होनेसे उपशम सम्यकत्व होता है ।
३२ अनम्तानुबन्धीकी चौकडी और भिथ्यात्व तथा संम्यकूमिथ्यात्व इन छह प्रकृतियोका
अनुदय और सम्यक्‌ प्रकृतिका उदय रहते क्षयोपशम सम्पक्‍त्व होता है ।
3 अनन्त संसारकी अपेक्षा यह काल भी थोडा है !
इदमेयात्र तात्पय्यं हेवः शुद्धनयो न हिं।
नास्ति बन्धस्तदत्यागात्तत्यायादबन्ध एवं हि ॥ १०॥।
घोरोदारमहिस्त्यतादिनिधने बोधे निबध्तन्धृतिम्‌
त्याज्य: शुद्धनयों न जातु कतिभि: सर्वकंष: कसंणास ।
तत्रस्थाः स्वम॒रीक्षियक्रमचिरात्संहत्य नियंब्दहिः
पूर्ण ज्ञानघनोधसेकमसल पश्यन्ति शान्त महः॥ ११ ॥
श्श्ध सम्रयसार ताटंक
___ ीतं
*ंित>।>३।–2. ३३ाै्3+++5
सुद्धने निवास कीनौ अनुभो अभ्यास लीनो,
भ्रमभाव छांडि दीनो भीनौ चित्त समता ।
अनादि अनंत अविकलप अचल ऐसो,
पद अवलबि अवलोक॑ राम रमसता ॥ १४ ॥

शब्दार्थ :- वहिरमुख> शरीर, विषय भोग आदि बाह्य वस्तुओंका प्रहक । विषपमता-अशुद्धता । सुमतिजू्सम्यग्शान । भीनोजलीन । अर्थ .- संसारी जीव कर्मक्रे चक्करमें भटकता हुआ मिथ्यात्वी हो रहा हैऔर उसे अशुद्धताने घेर रक्‍्खा है। जब अन्तरंगमें ज्ञान उपजा, निर्मल प्रभुता प्राप्त हु, शरीर आदिसे स्नेह हटा, राग-द्ेष-मोह छूटा, सम्ता-रसका स्वाद मिला, शुद्धनयका सहारा लिया, अनुभवका अभ्यास हुआ, पर्यायमे अहुंबुद्धि नष्ट हुई तब अपने आत्माका अनादि, अनंत, निर्बिकल्प, नित्यपद अवलम्बन करके आत्मस्वरूपको देखता है॥ १४ ॥

शुद्ध आत्मा ही सम्यग्दर्शन है (सवेया इकतीसा )

जाके परगासमें न दीसे राग द्वष मोह,
आख्रव मिटत नहि बंधकौं तरस है ।
तिहू काल जामें प्रतिबिबित अनंतरूप,
आपहूं अनंत सत्ता नंतते सरस है ॥।
भावश्वुत ग्यान परवान जो विचारि वस्तु,
अनुभौ करे न जहां वानोकों परस है ।
अतुल अखंड अविचल अविनासों धाम,
चिदानंद नाम ऐसो सम्यक् दरस है॥ १५ ॥
रागादीनां कगिति विगमात्‌ सर्वतोईप्यास्रवाणां
नित्योद्योतं किमपि परम वस्तु सम्पश्यतोधम्तः ।
स्फारस्फारे: स्वरसविसरे: प्लाययत्सबभावा-
नालोकान्तादबलमतुल॑ ज्ञानमुन्मग्नसेतत्‌ ॥ १२॥।
इत्यात्रवाधिकार: ॥ ५ ॥]

शब्दार्थ :- परगास-प्रकाश, उजेला । तरस (त्रास) कष्ट । प्रति- बिबित-भलकते हैं ।वानीजवचन । परस (स्पर्श )>पहुंच । अतुलल्अनुपम ।

अर्थ :- जिसके उजालेसें राग-देष-मोह नहों रहते, आख्वका अभाव होता है, बंधका त्रास मिट जाता है, जिसमें समस्त पदार्थोंके त्रेकाल्यबर्तों अनंत गुणपर्याय प्रतिबिम्बित होते हैंऔर जो आप स्वयं अनंतानंत गुण- पर्यायोंकी सत्ता सहित है; ऐसा अनुपम, अखंड, अचल, नित्य, शानका निधान चिदानंद हो सम्यग्दर्शन है। भावश्रुतज्ञान-प्रमाणसे पदार्थ विचारा जावे तो वहु अनुभवगम्य है और द्रव्यश्रुत अर्थात्‌ शब्द-शास्त्रसे विचारा जावे तो बचनसे कहा नहीं जा सकता ॥ १५ ॥ पाँचवें अधिकारका सार राग-हेष-मोह तो भाव-आखब हैं,ओर अशुद्ध आत्माके हारा कार्माण- वर्गणारूप पुद्गल प्रदेशोंका आकर्षित होना द्रव्य-आखव है। तथा इन द्रव्य- आखव और माव-आख़वसे रहित सम्यग्ज्ञान है। सम्यग्दशनका उदय होते ही जोवका मोजूदा ज्ञान सम्यग्जञान कहलाता है, इस सम्यग्ज्ञानकी दशामें आख्वका अभाव है। सम्यग्ज्ञानो अब्रती मी क्‍यों न हों, तो भी उन्हें आस्रव नहों होता, इसका कारण यह हैकि अंतरंगमें सम्पर्दर्शनका उदय होनेसे बे शरीर आदियें अहंबद्धि नहों रखते और विषय आदिसें तल्‍लीन नहीं होते । यदापि बाह्यहृष्टिसे लोगोंके देखनेसें सिथ्याहष्टि जीवों और अश्नती सम्पस्हष्टियोंके विषय-भोग परिग्रह-संग्रह आदिको प्रवृत्ति एकसो दिखती है परन्तु दोनोंके परिणासोंसें बड़ा अन्तर होता है, अज्ञानियोंकी शुभ-अशुभ क्रिया फलकी अभिलाषा सहित होती हैऔर ज्ञानी जीवोंकी शुभाशुभ क्रिया फलकी अभिलाषासे शुन्य रहती है, इसोलिये अज्ञानियोंकी क्रिया आख्रवके लिये और ज्ञानियोंकी क्रिया निर्जेराके लिये होती है, ज्ञान-बेराग्यकी ऐसी ही महिमा है । जिस प्रकार रोगी अभिरुत्ति नहों रहते हुए मोऔषधि सेवन करता हैऔर बहुतसे लोग शौकके लिये शबंत मुरब्बे आदि चलते हैं, इसो प्रकार ज्ञानियोंके उदयकी वरजोरीमें आसक्तता रहित भोगे हुए भोगोंमें और मौजके लिये गृद्धता सहित अज्ञानियोंके मोगोंमें बड़ा अन्तर है । आख्रवकी दौड़ तेरहवें गुणस्थान तक योगोंकी प्रवृत्ति होनेसे रहती है और चोथे गुणस्थानमें तो सत्तर प्रकृतियोंका बंध कहा है, फिर सम्पस्हृष्टि जोबोंको अश्नतको दशामें जो निराखव कहा है उसका अभिप्राय यह हैकि अनंत संसारका मूल कारण मिथ्यात्व हैऔर उसके साथ अनुबंध करनेवाली अनंतानुबंधी चौकड़ीका उदय सम्यक्त्वकी वशासें नहीं रहता, इसलिये मिथ्यात्व और अनंतानुबंधीजनित इकतालोस प्रकृतियोंका तो संबर हो रहता है,शेष प्रकृतियोंका बहुत हो कम अनुभाग वा स्थितिसें बंध होता हैऔर गुणश्रेणि निर्जरा शुरू होती हैइसलिये अज्ञानोके सत्तर कोड़ाकोड़ो सागर- प्रमाण और तीब्रतम अनुभागके समक्ष ज्ञानीका यह बंध किसी गिनतोमें नहीं है, इसलिये ज्ञानियोंको निरालव कहा है। वास्तवमें मिथ्यात्व ही आख्रव है ओर बहू सम्यक्त्वके उदयमें नहीं रहता । आख्व विभाव-परिण ति है, पुदृगलमय है,पुदुगल-जनित है,आत्माका निज-स्वमाव नहों है,ऐसा जानकर ज्ञानी लोग अपने स्वरूपमे विश्राम लेते हैऔर अतुल, अखंड. अधिचल, अविनाशो, चिदानंदरूप सम्यग्दर्शनकों निर्मल करते है ।

मत्तगयन्द (स्वेया)

ज्यों सतिहोन विवेक बिना नर, साजि सतड्भज इंधन ढोवे।
कंचन भाजन धूल भरं शठ; मृढ़ सुधारससोँ पग धोवे।॥।
बाहित काग उड़ावन कारण, डार महासणि मूरख रोजे।
त्यों यह दुलंमभ देह ‘बनारसि’, पाय अजान अकारथ खोजे।।

संवर द्वार (६)

प्रतिज्ञा (दोहा )

आख्रवको अधिकार यह, कह्यो जथावत जेम ।
अब संबर वरनन करों, सुनहु भविक धरि प्रेस ॥ १ ॥

शब्दार्थ :- आस्रवपबधका कारण । जथावत “जैसा चाहिये वेसा । संवर>आसख््रवका निरोध । वरनन>कथन । भविकन्संसारो ।

अर्थ :- आस्रवका अधिकार यथार्थ वर्णन किया, अब संवरका स्वरूप कहता हूँ,सो हेमव्यो ! तुम प्रेमपु्वंक सुनो ॥ १ ॥

ज्ञानरूप सव॒रको नमस्कार (सव्वेया इकतीसा)

आतमको अहित अध्यातमरहित ऐसोौ,
आख्रव महातम अखंड अंडवत है।
ताको विसतार गिलिबेकौ परगट भयो,
ब्रहमंडको विकासी ब्रहमंडवत है ।।
जामें सब रूप जो सबमें सबरूपसो पे,
सबनिसों अलिप्त आकास-खंडबत है ।
सोहै ग्यानभान सुद्ध संवरको भेष धर,
ताको रुचि-रेखकों हमारो दंडवत है ॥ २ ॥
आसंसार विरोधिसंवरजयेकान्तावलिप्तालव-
न्यक्‍कारात्प्रतिलब्धनित्यविजयं सम्पादयस्संजरम्‌ ।
व्यावृस्ं पररूपतो नियमित सम्यकस्वरूपे स्फुर-
उन्पोतिश्रिन्सयमुम्ज्वल॑ निजरसप्राग्भारसुज्जुम्भते ॥ १॥।
शब्दार्य :- अहित>बुराई करनेवाला । अध्यातम>आत्म-अनुभव ।
महातम-घोर अंधकार । अखड-पूरा। अडबत-"अंडाकार । विस्तार-
फैलाव । गिलिबेकौ-निगलनेके लिए । ब्रहमड (ब्रह्मांड) >त्रैलोक्य ।
विक्रास> उजेला । अलिप्त-अलग । आकासखड>आकाशका प्रदेश । भान
(भानु) >सूर्य ।रुचि-रेख> किरणरेखा, प्रकाश । दडवत>प्रणाम ।

अर्थ :- जो आत्माका घातक हैऔर आत्म-अनुभवसे रहित हैऐसा आख्रवरूप महा अंधकार अखंड अंडाके समान जगतके सब जीवोंको घेरे हुए है । उसको नष्ट करनेके लिये त्रिजगत्‌ विकासी सुर्यके समान जिसका प्रकाश हैओर जिसमें सब पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैंतथा आप उन सब पदार्थंके आकार रूप होता है", तो भी आकाशके प्रदेशके समान उनसे अलिप्त रहता है, वह ज्ञानरूपी सूर्य शुद्ध संवरके भेषमें है, उसको प्रमाको हमारा प्रणाम है ॥ २ ॥

भेदविज्ञानका महत्त्व (स्वेया तेईसा)

सुद्ध सुछंद अभेद अबाधित,
भेद-विग्यान सुतीक्ष आरा।
अंतरभेद_ सुभाव विभाऊ,
कर जड़-चेतनरूप दुफारा ॥।
सो जिन्हके उरमें उपज्यौ,
न रुचें तिन्हकों परसंग-सहारा ।
आतमभको अनुभौ करि ते,
हरखे परखे परमातम-धारा ॥ ३॥।
शब्दार्थे :- सुद्ध (शुद्ध)-निविकार । सुछंद (स्वच्छुद )-स्वतत्र ।
५ हे > ५
ज्ञायक जैयाकार’ अथवा ‘ज्ञेयाकार ज्ञानकी परिणति’ यह व्यवहार-वचन है ।
चंद्रप्यजड़रूपतां च दघतो: क्त्वा विभाग दयो-
रन्तदरिणदारुणेन परितो ज्ञानस्थ रागस्य च॑।
भेवशानमुदेति निर्मेललिद सोदध्वमध्यासिता:
शुद्धँ्नावधनौधभेकमधुना सम्तो द्वितोयच्युता: ॥ २॥।
अभेद"भेदरहित-एक । अबाधित> बाधा रहित । सुतोछन (सुतीक्षण )८
अतिशय पैता । आरालकरौत । दुफाराज-दो हिस्से ।

अर्थ :- शुद्ध, स्व॒तंत्र, एकरूप, निराबाध, भेद बिज्ञानकूप तीक्ष्ण करोंत भोतर प्रवेश करके स्वभाव-विभाव और जड़-चेतनको जुदे जुदे कर देता है। वह मेद-विज्ञान जिनके हृदयमें उपजा हैउन्हें शरोौर आदि पर बसस्‍्तुका आश्रय नहीं सुहाता, वे आत्म-अनुमव करके प्रसन्न होते हैं औरपरभात्माका स्वरूप पहचानते हैं।

भावार्थ :- ज्ञान, परभावसे रहित है इसलिये शुद्ध है, निज-परका स्वरूप बतलाता हैइसलिये स्वच्छुंद है, इसमें कोई पर बस्तुका मेल नहीं है इसलिये एक है, नय - प्रमाणको इसमें बाधा नहीं हैइसलिये अबाधित है। सो इस मेदविज्ञानको पेनी करोंत जब अंतरमें प्रवेश करती है तब स्वभाव- विभावका पृथक्‍करण कर देती हैओर जड़-चेतनका भेद बतलाती है। इससे भेदविज्ञानियोंकी रुचि परद्रव्यसे हुट जातो है। वे धन परिग्रह आवियें रहें तो भी बड़े ह्षसे परम तत्त्वकी परोक्षा करके आत्मिकरसका आनंद लेते हैं ॥ ३ ॥

सम्यक्त्वसे सम्यग्ज्ञान और आत्मस्वरूपकी प्राप्ति (सवेया तेईसा)

जो कबहूँ यह जीव पदारथ,
ओऔसर पाइ मिथ्यात सिटाये ।
सम्यक् धार प्रवाह बहे ग्रुन,
ज्ञान उदे मुख ऊरध धाव॥।
तो अभिअंतर दवित भावित,
कर्म कलेस प्रवेस न पाबे।
आतम साधि अध्यातमके पथ,
प्रन हू परब्रह्म कहाबे ॥ ४ ॥
यदि कथमपि धारावाहिना बोधनेत
प्रबमुपलभमानः शुद्धमात्मानमास्ते ।
तदयमुदय दात्माराससात्मानसात्मा
परपरिणतिरोधाचछुद्धमेबा भ्युपेति ॥ ३ ॥
शब्वार्थ :- कबहू-कभी । औसर (अवसर )+मौका ।प्रवाहुर
बहाव । ऊरध-ऊँचा । धाव-दौड़े । अभिअंतर (अभ्यन्तर)–अंतरंगमें ।
दबितकर्म>ज्ञानावरणोय आदि द्रव्यकर्म । भावितकर्म > राग-दे ष-मोहआदि
भावकर्म । कलेस दुख । प्रवेस>पहुँच। पथ>मार्ग । प्रतरूपूरा। परब्रह्मल-
परमात्मा ।

अर्थ :- जब कभी यह जोवपदार्थ मौका पाकर मिथ्यात्व नष्ट करता हैऔर सम्यकक्‍त्वरूप जलकी धारामें बहकर ज्ञानगुणके प्रकाशमें ऊपरको चलता हैतब उसके अतरंगमें द्रव्यकर्म ओर भावकर्का दुःख कुछ असर नहीं करता । वह आत्मशुद्धिके साधन अनुभवके मार्गमें लगकर परिपूर्ण अवस्थाको प्राप्त होता है ।उसीको परमात्मा कहते हैं। भावाथे :- अनंत संसारमें संसरण करता हुआ जोव कभो काललब्धि, दर्शनमो हुनोयका अनुदय और गुरु-उपदेश आदिका अवसर पाकर तत्त्वश्रद्धान करता हैतब द्रव्यकर्म वाभावकर्मोंको शक्ति शिथिल हो जातो हैऔर अनुभवके अभ्याससे उन्नति करते करते कर्मबंधनसे मुक्त होकर ऊरध्वंगमन करता हैअर्थात्‌ सिद्धगतिको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥

सम्यग्हष्टिकी महिमा (स्वेया तेईसा )

भेदि सिथ्यात सु बेदि महारस,
भेद-विज्ञान कला जिन्हे पाई।
जो अपनी महिमा अवधारत,
त्याग करे उर सौंज पराई॥।
उद्धत रोति फुरी जिन्हके घट,
होत निरंतर जोति सवाई।
ते मतिमान सुबन समान,
लगे तिन्‍्ह॒कों न सुभासुभ काई ॥ ५॥।
निजमहिमरतानां भेदविज्ञानशब्त्या
भवति तियतसेषां शुद्धतत्वोपलम्भ: ।
अचलितमखिलान्यद्ब्यदूरेस्थितानां
भवति सति थ तस्मिश्नक्षयः क्मंसोक्ष ॥( ४॥
शब्वार्थ :- भेदि>नष्ट करके । बेदिःजान करके । महा रस>आ
त्मान-
भवका अमृत । अवधारत”्ग्रहण करता । उद्धतन-चढ़ती हुई। फुरी
(स्फुरित)>प्रगट । सुबनें+>सोना । काई>मल ।
अ्थे :- जिन्होंने मसिथ्यात्वका विनाश करके और सम्यक्‍त्वका अमृत-
रस चाखकर ज्ञानज्योति प्रकट की है,अपने निजगुण - दर्शन, ज्ञान, चारित्र
ग्रहण किये हैं,हृदयसे परद्रव्योंकी ममता छोड़ दी हैऔर देशब्रत, महात्नतादि
ऊँची क्रियाएँ ग्रहण करके ज्ञानज्योतिको सबाया बढ़ाया है, वे विह्ान्‌
सुवर्णके समान हैं; उन्हें शुभाशुभ कमंमल नहीं लगता है॥ ५ ॥

भेदज्ञान, संवर निजरा और मोक्षका कारण है (अडिल्ल छन्द)

भेदग्यान संवर-निदान निरदोष है।
संबवरसों निर्जरा, अनुक्रम मोष है॥।
भेदग्यान सिवमुल, जगतमहि मानिये ।
जदपि हेय है तदपि, उपादेय जानिये ॥ ६ ॥

शब्दार्थ :- निदानल्‍कारण । निरदोषन शुद्ध । निरजरा”कर्मोका एकदेश भडना । अनुक्रम> क्रमश । सिव-मोक्ष । मुल-जड । हेय- छोडने योग्य । उपादेय>ग्रहण करने योग्य ।

अर्थ :-लोकमें भेदविज्ञान निर्दोष है, संवरका कारण है; संवर निर्जराका कारण है और नि्जरा मोक्षका कारण है। इससे उच्नतिके ऋममें भेदबिज्ञान हो परम्परा मोक्षका कारण है। यद्यपि वह त्याज्य हैतो भो उपादेय है । भावार्थ .- भेदविज्ञान आत्माका निजस्वरूप नहीं हैइसलिये मोक्षका परंपराकारण है, असली कारण नहों है। परन्तु उसके बिना सोक्षके असलो कारण सम्यक्त्व, संवर, निजरा नहीं होते, इसलिये प्रथम अवस्थामें उपादेय सम्पद्यते सबर एव साक्षाष्छुद्धात्मतस्वस्थ किलोपलस्भात्‌ । स भेदविज्ञानता एबं तस्मात्तद्भ दविज्ञाममतोब भाव्यम्‌ ॥ ५ ॥ लि निशनलनक कमल कलकद लक बन व ननननुनभभत माना ा॥७८८८ए८ए९८्शभनननशा है, और कार्य होलेपर कारण-कलाप प्रपंच हो होते हैं इसलिये शुद्ध आत्म- स्वरूपकी प्राप्ति होनेपर हेय है ६ ।।

आत्मस्वरूपकी प्राप्ति होने पर भेदज्ञान हेय है (दोहा)

भेदग्यान तबलों भलो, जबलों मुकति न होइ ।
परम जोति परगट जहां, तहां न विकलप कोइ ॥ ७ ॥

शब्दार्थ :- तबलौ-तब तक । भलौ>अच्छा । परम जोति-उत्कृष्ट ज्ञान ।परगट (प्रगट) "प्रकाशित ।

अर्थ :- भेदविज्ञान तभी तक सराहुनोय है जबतक मोक्ष अर्थात्‌ शुद्धस्वरूपकी प्राप्ति नहीं होती और जहाँ ज्ञानकी उत्कृष्ट ज्योति प्रकाशमान हैबहाँ कोई भी विकल्प नहों है। (भेवविज्ञान तो रहेगा ही कंसे ? ) ॥ ७ ॥!

भेदज्ञान परपरा मोक्षका कारण है (चौपाई )

“भेदज्ञान संवर जिन्‍्ह पायोौ ।
सो चेतन सिवरूप कहायो।॥।
भेदग्यान जिन्हके घट नांही ।
ते जड़ जीव बंधे घट मांही ॥ ८ ॥।

शब्दार्थ :- चेतन-आत्मा । सिवरूप >मोक्षरूप । घटरहृदय ।

अर्थ :- जिन जोबोंने भेदज्ञानरूप संबर प्राप्त किया हैवे सोक्षरूप हो कहलाते हैं ओर जिनके हृदयमें भेदविज्ञान नहीं हैबे सूर्स जीव शरोर आदिसे बंधते हैं ॥ ८ ॥

भावये:।ूं दविशानमिदमस्छिप्रधारया ।
तावचाबत्पराच्च्युत्वा ज्ञान श्ञाने प्रतिष्ठते ॥ ६ ॥

भेदविज्ञानतः सिद्धा सिद्धा येकिल केचन । अस्पेबाभावतो बढ़ा बद्धा येकिल केचन ॥३ ७॥॥ संवर हार १२७

भेदज्ञानसे आत्मा उज्ज्वल होता है (दोहा)

भेदग्यान साबू भयौ, समरस निरमल नोर।
धोबी अंतर आतमा, धोवे निजगुन चीर ॥ ६ ॥
शब्वार्थ :- साबु>साबुन ।समरस>समताभाव । नीर>पानी । अंतर
आत्माज्सम्यग्टष्टि ।चीर>कपडा ।

अर्थ :- सम्यग्हष्टिरूप धोबी, भेदविज्ञानरूप साबुन और समतारूप निर्मेल जलसे आत्मगुणरूप वस्त्रकों साफ करते हैं ॥ ६ ॥

भेदविज्ञानकी क़्ियाके दृष्टान्त (सबवेया इकतीसा )

जसे रजसोधा रज सोधिक दरब काढ़े,
पावक कनक काढ़ि दाहत उपलको ।
पंकके गरभम ज्यों डारिये कतक फल,
नीर कर उज्जल नितारि डारे मलकों ॥।
दधिको सथया मथि काढ़े जेसे माखनकों
राजहंस जसे दूध पीवे त्यागि जलकों ।
तेसे ग्यानवंत भेदग्यानकी सकति साधि,
बेदे निज संपति उछेदे पर-दलकों ॥ १० ॥

शब्दार्थ :- रज-बूल । दरब (द्रव्य )>सोना चादी । पावक>अरिन । कनक-“-सोना । दाहत-जलाता है। उपलब्पत्थर । पंक>कीच । गरभर भीतर । कतक फल->निर्मली । वेदें+अनुभव करे। उछेदे (उच्छेदे )-त्याग करे । पर-दल>-”-आत्माके सिवाय अन्य पदार्थ । भेदश्ानोजच्छलनकलनाच्छुद्धतत्त्वो पलम्भा- द्रागप्रामप्रलयकरणात्कम्संणां. संबरेण । विश्रसोष परममसलालोकमस्लानसेक शान ज्ञाने नियतमुदितं शाश्वतोद्योतमेतत्‌ ॥ ८ ॥

इति सवराधिकार: ॥ ६ ॥
नाम चनन-नान+ न.

अर्थ :- जेसे रजसोधा धूल शोधकर सोना चांदी ग्रहण कर लेता है, अग्नि धाउकों गलाकर सोना निकालतो है, कर्दममें निर्मेली डालनेसे बहु पानोको साफ करके मेल हटा देतो है, दहीका मथनेवाला वही मथकर मकक्‍्खनको निकाल लेता है, हंस दूध पी लेता हैऔर पानी छोड़ देता है; उसी प्रकार ज्ञानो लोग भेदविज्ञानके बलसे आत्स-सम्पदा ग्रहण करने हैं और राग-हेंष आदि वा पुद्गलादि पर पदार्थोंको त्याग देते हैं ;॥ १० ।।

मोक्षका भूल भेदविज्ञान है (छप्पय छन्द)

प्रगटि भेद विग्यान, आपगुन परगुन जाने ।
पर परनति परित्याग, सुद्ध अनुभो थिति ठाने ।।
करि अनुभो अभ्यास, सहज संबर परगासे ।
आखव द्वार निरोधि, करमघन-तिमिर विनासे ।।
छय करि विभाव समभाव भजि,
निरविकलप निज पद गहै ।
निर्मल विसुद्धि सासुत सुथिर,
परम अतोंद्रिय सुख लहै॥ ११ ॥

शब्दार्थ - परित्याग-छोडकर । थिति ठानै-स्थिर करे। परगासे (प्रकाशे)>प्रगट करे । निरोधि"रोककर । तिमिर-अध कार । समभाव८ तमताभाव । भेजिज ग्रहण करके । सासृत (शाश्वत )>स्वयसिद्ध ।सथिर < अचल । अतीन्द्रिय-जो इन्द्रियगोचर नही ।

अर्थ :- भेदविज्ञान आत्माके और परद्रव्योंके गुणोंको स्पष्ट है, परद्रव्योंसे आपा छोड़कर शुद्ध अनुभवमें जानता स्थिर होता हैऔर उसका अभ्यास करके सवरको प्रगट करता है, आख्रवद्वारका नियह करके कर्मंजनित महा अधकार नष्ट करता है, राग-देष आदि विभाव छोड़कर ससताभाव ग्रहण करता हैऔर विकल्परहित अपना पद पाता है तथा निमल, शुद्ध भनत, अचल ओर परम अतोन्द्रिय सुख प्राप्त करता है ॥ ११ ॥ छट्ट अधिकारका सार पूर्व अधिकारमें कह आये हैं किमिथ्यात्व होआख्रव है, इसलिये अखिवका निरोध अर्थात्‌ सम्पक्त्व संवर है। यह संवर निर्ज राकाऔर अनु- ऋमसे मोक्षका कारण है ।जब आत्मा स्वयं बुद्धिसि अथवा श्रीगुरुके उपदेश आदिसे आत्मअनात्मका भेदविज्ञान अथवा स्वभाव-विभावकी पहिचान करता हैतब सम्यग्दशेनगुण प्रगट होता है। स्वको स्व और परको पर जानना इसोका नाम भेदविज्ञान है, इसोको स्व-पर विवेक कहते हैं। “तासु ज्ञानको कारन स्व-पर विवेक बखानौ’ को उक्तिसे मेदविज्ञान सम्यग्दशेनका कारण है। जिस प्रकार कपड़ा साफ करनेमें साबुन सहायक है उसी प्रकार सम्यग्दशनकी उत्पत्तिमें भेदविज्ञान सहायक होता हैऔर जब कपड़े साफ हो जावें तब साब॒नका कुछ काम नहीं रहता और यदि साबुन हो तो एक बोझ हो होता है; उसी प्रकार सम्यग्द्शन हुए पीछे जब स्व-परके विकल्पकों आवश्यकता नहों रहती तब भेदविज्ञान हेय हो होता है। भाव यह हैकि भेदज्ञान प्रथम अवस्थामें उपादेय हैऔर सम्यग्दर्शन निर्मल हुए पीछे उसका कुछ काम नहीं है, हेय है। भेदविज्ञान यद्यपि हेय है तो भी सम्यग्दर्शनको प्राप्तिका कारण होनेसे उपादेय है, इसलिये स्वगुण और परग्रृणणी परख करके परपरिणतिसे विरक्त होना चाहिये और शुद्ध अनुभवका अभ्यास करके

समताभाव ग्रहण करना चाहिये (पद्मावती छन्द )

ज्यों नीराग पुरुषके सनमुख; पुरकामिनि कटाक्ष कर ऊठी ।
ज्यों घन त्यागरहित प्रभुसेबन; ऊसर में वरषा जिम छूठी ।।
ज्यों शिलमाहि कमलको बोबन, पवन पकर जिस बांधिये मुठी ।
ये करतृति होय जिम निष्फल; त्यों बिन भाव क्रिया सब कूठी ॥८५॥।

निर्जरा द्वार (७)

प्रतिज्ञा (दोहा)

वरनी संवरकी दसा, जथा जुगति परवांन ।
मुकति वितरनी निरजरा, सुनहु भविक धरि कान ॥ १ ॥
शददार्थ :- जथा जुगति परवान>जैसी आगममे कही है। वितरनी>
देनेवाली ।

अर्थ :- जेसा आगममें संवरका कथन हैबसा वर्णन किया, हे भव्यो ! अब मोक्षवाधिनी निजराका कथन कान लगाकर सुनो ॥१ ॥।

मंगलाचरण (चौपाई)

“जो संवरपद पाइ अनंदे।
सो प्रवकृत कमे निकंदे ।
जो अफंद ह्व॑ बहुरि न फंद ।
सो निरजरा बनारसि बंदे ॥ २ ॥
शब्दार्थ .- अनदे 5८ प्रसन्न होवे । निकदेननप्ट करे । अफद८-
सुलभता । बहुरिजफिर । फदे5उलके ।

अर्थ :- जो संवरको अवस्था प्राप्त करके आनद करता है, जो पूर्व॑में बॉँघे हुए कर्मोको नष्ट करता है, जो कमंके फदेसे छूटकर फिर नहों फेंसता; उस निजराभावको पण्डित बनारसीदासजी नमस्कार करते हैं ॥ २ ॥

रागाध्यालचरोधतो निजधुरां धत्वा पर, संवर. कर्मायामि समस्तमेव भरतो दूराग्निरुधन्‌ स्थित: । प्राग्बद्ध तु तदेव दग्धमधुना व्याजम्भते निर्जरा ज्ञानज्योतिरपावत न हि यतो रागादिभिमुच्छेति ॥ १॥

ज्ञान-वे राग्यकेबलसे शुभाशुभ क्रियाओंसे भी बंध नही होता (दोहा)

“महिमा सम्यकज्ञानकी, अरु विरागबल जोइ ।
क्रिया करत फल भुजते, करम बंध नहिं होइ ॥ ३ ॥

शब्दार्थ :- महिमा>प्रभाव । अरु> और । भुजतें-भोगते हुए । ’ अर्थ :- सम्यग्ज्ञानके प्रमावसे और बेराग्यके बलसे शुभाशुम क्रिया करते और उसका फल भोगते हुए भी कमंबंध नहीं होता है ॥ ३ ॥

भोग भोगते हुए भी ज्ञानियोंको कर्म-कालिमा नही लगती (सर्वया इकतीसा )

जसे भूप कौतुक सरूप करें नीच कम,
कोतुकी कहावे तासों कौन कहे रंक है ।
जेसे विभचारिनी विचार विभचार वाको,
जारहीसों प्रेम भरतासों चित बंक है ।।
जस धाद बालक चुघाइ करे लालिपालि,
जाने ताहि ओऔरकों जदपि वाकं अंक है ।
तेसे ग्यानवंत नाना भांति करतृति ठाने,
किरियाकों भिन्न माने याते निकलंक हैं ॥ ४ ॥

शब्दार्थ :- भूप-- राजा । कौतुकल्‍खेल । नीच कर्म>छोटा काम । रंक 5 कगाल । वाकौ 5 उसका। जार (यार) >दोस्त । भरता «पति। बंक ८ विमुख । चुँधघाइ >> पिलाकर । लालिपालि >5लालन-पालन । अकज्गोद । निकलकर-निर्दोष । अथ्थे :- जिस प्रकार राजा खेल स्वरूप छोटा काम" करे तो भो बह ९ गधेपर चढ़ना आदि ।..

त्तज्ज्ञानस्यत्क रामध्य विरागस्यक वा किले । यत्कोषपि फ्मेसि: कर्म भुझख्जानोईएपि न बध्यते ॥ रे ॥। खिलाड़ी कहलाता हैउसे कोई गरीब नहीं कहता, अथवा जैसे व्यभिचारिणी सत्रो पतिके पास रहे तोभी उसका चित्त यारहोमें रहता है- पतिसे प्रेम नहों रहता, अथवा जिस प्रकार धाय बालकको दूध पिलाती, लालन-पालन करतो ओर योवसमें लेती है,तो मो उसे दूसरेका जानती है, उसी प्रकार ज्ञानी जोव उदयको प्रेरणासे’ भांति माँतिकी शुभाशुभ क्रिया करता है, परन्तु उस क्रियाकों आत्मस्वमावसे भिन्न कर्मजनित मानता है, इससे सम्यग्नानों जोवको कर्ंकालिसा नहीं लगतो ॥ ४ ॥

पुनः
जैसे निसि बासर कमल रहै पंकहोमें,
पंकज कहावे पे न॒वा्क॑ ढिग पंक है ।
जैसे मंत्रवादी विषधरसो गहावे गात,
मंत्रकों सकति वा्क विना-विष डंक है ।
जैसे जीभ गहै चिकनाई रहै रूखे अंग,
पानीमें कनक जेसे काईसौ अटंक है ।
तेसे ग्यानवंत नानाभांति करतृति ठाने,
किरियाको भिन्न माने याते निकलंक है ॥ ५ ॥

शब्दार्थ :- निसि (निशि) रात्रि । वासर€दिन । पकज-कीचड । पंकज>कमल । विषघधरन्सप । गात>शरीर । काईज्कीट । अटकन्बेदाग ।

अर्थ :- जैसे कमल कोचसे उत्पन्न होता हैऔर दिन-रात कीचड़में रहता हैपरन्तु उसपर कोचड नहीं जमतो, अथवा जिस प्रकार मंत्रवादी अपने शरीरको सांपसे कटवा लेता हैपर मंत्रको शक्तिसे उसपर विष नहीं चढ़ता, अथवा जिस प्रकार जोभ चिकने पदार्थ खाती है पर चिकनी नहीं होती, रूखी रहती है, अथवा जिस प्रकार सोना पानोमें पड़ा रहे तो भी उसपर काई नहीं जमतो; उसो प्रकार ज्ञानी जोव उदयकी प्रेरणासे भाँति माँतिकी शुमाशुम क्रिया करता है परन्तु उसे आत्मस्वभावसे भिन्न कर्म- जतित मानता हैइससे सम्यग्ज्ञानी जीवको कर्मकालिभा नहों लगतो १ गृहवासी तोथंकर, भरत चक्रवर्ती, राजा श्रेणिक आदिकी तरह ।

वराग्यशक्ति वर्णन (सोरठा)

पूर्व उदे सनबंध, वि भोगव समकिती ।
करे न तुतन बन्ध, महिसा ग्यान विरागकी ॥१ ६ १

अर्थ :- सम्यग्हष्टि जीव पू्वंबद्ध कर्मोंके उदयसे विषय आदि भोगते हैंपर कमंबंध नहों होता यह ज्ञान और वराग्यका प्रभाव है ॥ ६ ॥

ज्ञान-वराग्यसे मोक्षकी प्राप्ति है (सवैया तेईसा )

सम्पकवंत सदा उर अंतर,
ग्यान विराग उसे गुन धारे।
जासु प्रभाव लखे निज लच्छन,
जीव अजीव दसा निरवारे ॥।
आतमकोौ अनुभौ करि हू थिर,
आप तरे अर औरनि तारे।
साधि सुदर्व लहे सिव सं,
सु कमं-उपाधि विथा वमि डारे ॥ ७ ॥

शब्दार्थ :- उर5हृदय । प्रभाव>प्रतापसे । निरवारैनिर्णय करे । औरनिन्दूसरोको । सुदर्व (स्वद्रव्य )-आत्मतत्त्व । सर्म (शर्म) >आनद । उपाधि «दंद-फद । व्यथा>कष्ट । वमि डारे-निकाल देता है ।

अर्थ :- सम्यग्हष्टि जीव सर्दव अंत:करणमें ज्ञान और बेराग्य दोनों गुण धारण करते हैं जिनके प्रतापसे निज-आत्मस्वरूपको देखते हैं और नाश्नुते विधयसेवने5पि यत्स्वं फल विषयसेवनरय ना । सानब भवविरागताबलात्सेवकोईपि तदसावसेवक:ः: ॥ ३ ॥

सम्यग्हष्टेभेवति नियत ज्ञानबेराग्यशक्तिः
स्व बस्तुत्वं कलयितुमय स्वान्यरूपाप्तिमुक्त्या ।
यस्साज्ज्ञात्वा ब्यतिकरमिदं तत्त्वतः स्वं परं च
स्वस्मिन्नास्ते विश्मति परात्सबतो रागयोगातृ ॥ ४ ॥
24 व पड असम मियमलक किक /न कम मल अमल महक
जोव-अजीव तत्त्वोंका निर्णय करते हैं’ । वे आत्म-अनुभव कर निज स्वरूपमें
स्थिर होते हैं तथा संसार-समुद्रसे आप स्वयं तरते हैं.वा बूसरोंको
तारते हैं? । इस प्रकार आत्मतत्त्वको सिद्ध करके कर्मोंका फंदा हटा देते हैं
और मोक्षका आनंद प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥

सम्यग्ज्ञान के बिना सम्पूर्ण चारित्र निस्सार है (सवैया तेईसा )

जो नर सम्यकबंत कहावत,
सम्यकग्यान कला नहिं जागी।
आतम अंग अबंध विचारत,
धारत संग कहे हम त्यागी ।।
भेष धरे मुनिराज-पटंतर,
अंतर मोह-महा-नल दागी ।
सुन्न हिये करतृति करे पर,
सो सठ जीव न होय बविरागो ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :- संग>परिग्रह । पटतर (पटतर )समान । महानल तेज अग्नि । दागी>धधकती है। सुन्न हिये८शुन्य हृदयसे । सठरूमू्खे ।

अर्थ :- जिस मनुष्यके सम्यग्ज्ञानकी किरण तो प्रगठ हुई नहीं और अपनेको सम्यग्हष्टि मानता है, वह निजात्मस्थरूपको अबंध चितवन करता है, शरीर आदि परवस्तुमें ममत्व रखता है और कहता है कि हस १ जीवने अनादि कालसे देहादि पर वस्तुओंको अपनी मान रक्खी थी सो उस हठको छोड देता है और अपने आत्माको उनसे प्रथक मानने लगता है ।

धर्मोपदेश देकर । 3 निश्चयनयका एकान्त पक्ष लेकर । सस्यग्हृष्टि: स्ववमयमहूं जातु बन्धो न मे स्था- वित्युत्तानोत्पुलकबदना रागिणोष्प्याचरन्तु । आलम्बन्तां समितिपरतां ते यतोहच्याषि पापा आत्मानात्मावगमविरहातु सस्ति सम्यक्त्वरिक्ता: । ५ ॥॥ त्यागो हैं। बह मुनिराजके समान भेष धरता है परन्तु अंतरंगमें मोहको महाज्वाला धधकतोी है, वह शुन्य-हृदय होकर (मुनिराज जैसी) क्रिया करता हैपरन्तु बह सूर्ख है; वास्तबमें साधु नहों हैद्रव्यलिगों है ॥ ८ ॥

भेदविज्ञानके बिना समस्त चारित्र निस्सार है (सर्वेया तेईसा )

ग्रन्थ रचे चरचे सुभ पंथ,
लखे जगमें विवहार सुपत्ता।
साधि संतोष अराधि निरंजन,
देह सुसीख न लेइ अदत्ता ॥।
नंग धरंग फिरे तजि संग,
छुक॑ सरवंग मुधारस भत्ता ।
ए करतृति करे सठ पे,
समुझे न अनातम-आतम सत्ता ॥। € ।।
शब्दार्थ '- रचे-बनावे । चरचे>कथन करे। सुभ पथ>धर्ममार्ग ।
सुपत्ता>सुपात्र । निरंजन ईश्वर । सुसीख-अच्छा उपदेश । अदत्ता>बिना
दिया हुआ । नग धरंगनग्न, नगे । सग-परिग्रह । मुधारस मत्ता>अज्ञान
रसमें उन्मत्त । आतम सत्तानशुद्ध चेतन्यभाव। अनातम सत्तालशरीर
राग-द्वेष-मोह आदि ।
अथ :- वह सुख ग्रस्थ-रचना करता है, धर्मको चर्चा करता है,
शुभ-अशुभ क्रियाको जानता है, योग्य व्यवहार रखता है, संतोषकों
सम्हालता है, अरहंत भगवानकी भक्ति करता है, अच्छा उपदेश देता है,
बिना विया हुआ नहों लेता", बाह्य परिग्रह छोड़कर नग्न फिरता है,
अज्ञानरसमें उन्‍्मस होकर बाल-तप करता है, वह मूर्ख ऐसी क्रियाएँ करता है
परन्तु आत्मसत्ताका भेद नहों जानता ;। ६ ॥।
१ अचोौर्य्यादि ब्रत और एबणा आदि समिति पालता है।

पुनः (स्वया तेईसा)

ध्यान धरे करे इंद्रिय-निग्नह,
विग्रहसों न गने निज नत्ता।
व्यागि विभूति विभूति सढ़े तन,
जोग गहे भवभोग-विरत्ता ॥।
मोन रहै लहि मंदकषाय,
सहै बध बंधन होइ न तत्ता ।
ए करतृत करें सठ पे,
समुर्के नअनातम-आतम-सत्ता ॥१०१।

शब्दार्थ : - निग्रह>दमन करना । विग्रहर्शरीर । नत्ता (नाता )। रिश्ता, सबंध । विभूति-धन-सम्पत्ति । विभूति>भस्म (राख) । मढ़ ॥ यगगवे । जोगलयोग* । बिरत्ता (विरक्त) त्यागी । तत्ता [तप्त) क्रोधित, दु खी ।

अर्थ :- आसन लगाकर ध्यान करता है, इन्द्रियोंका दमन करता है, शरीरसे अपने आत्माका कुछ सम्बन्ध नहीं गिनता, धन-सम्पत्तिका त्याग करता है, शरीरको राखसे लिप्त रखता है*, प्राणायाम आदि योग साधन करता है, संसार और भोगोंसे विरक्त रहता है, मौन धारण करता है, कषायोंकोीं मंद करता है, बध-बंधन सहकर संतापित नहों होता । बह मूर्ख ऐसी क्रियाएं करता है परन्तु आत्मसत्ता और अनात्मसत्ताका भेद नहीं

जानता (३ १०१ (चौपाई)

जो बिनु ग्यान क्रिया अबगाहे ।
जो बिनु क्रिया मोखपद चाहै।॥।
जो बिनु मोख कहे में सुखिया ।
सो अजान मृढनिमें मुखिया ॥ ११ ॥
है।
दोहा - आसन प्राणायाम यम, नियम घारणा ध्यान ।
प्रत्याहार समाधि ये, अष्ट योग पहिचान ।।
२ हनान आदि नही करनेसे ।
निर्जरा हार १३७

शब्दार्थ :- क्रिया >चारित्र ।अवगाहै>ग्रहण करे। अजान-“मूर्ख । मृढ़निमें -मुर्खोंमें ।मुखिया प्रधान ।

अर्थ :- जो सम्यरज्ञानके बिना चारित्र धारण करता है, वा बिना चारित्रके सोक्षपर चाहता है, तथा बिना मोक्षके अपनेको सुखी कहता है, बह अज्ञानी है, मूर्खोँमें प्रधान अर्थात्‌ महामूर्ख है ॥ ११ ॥

श्रीगुरुका उपदेश अज्ञानी जीव नहीं मानते (सर्वया इकतीसा )

जगवासी जीवनिसों गुरु उपदेस कहे,
तुमें इहां सोवत अनंत काल बाते हैं ।
जागो ह्लेंसचेत चित्त समता समेत सुनो,
केवल-वचन जामें अक्ष-रस जीते हैं ॥।
आवबो मेरे निकट बताऊं में तुम्हारे ग्रुन,
परम सुरस-भरे करमसों रीते हैं।
ऐसे बन कहे ग्रुरु तौऊ ते न धरें उर,
मित्रकंसे पुत्र किधों चित्रकंसे चीते हैं ॥ १२ ॥

शब्दार्थ :- मित्रकंसे पुत्र-मिट्टीके पुतले जैसे । चित्रकेसे चीते>चित्रमें बने हुए।

अर्थ :- श्रोगुरु जगवासी जीवोंको उपदेश करते हैं कि, तुम्हें इस संसारमें मोहनिद्रा लेते हुए अनन्त काल बीत गया; अब तो जागो और सावधान वा शान्तचित्त होकर भगवानकी वाणी सुनो, जिससे इन्द्रियोंके विषय जीते जा सकते हैं।मेरे समीप आओ, में कर्म-कलंक रहित परम आनंदमय तुम्हारे आत्माके गुण तुम्हें बताऊं। श्रीगुरु ऐसे बचन कहते हैंतो भी संसारी मोहीोजीव कुछ ध्यान नहीं देते, मानों वे मिट्टीके पुतले हैंअथवा खित्रमें बने हुए मनुष्य हैं॥ १२ ॥

आसंसारात्प्रतिषववमसी रागिणो नित्यमत्ता:
सुप्ता यस्मिन्नपदमपद तदिदुध्यध्वसन्धाः ।
एतेतेत: पदसिदर्भियं यत्र चेतन्यधातुः
शुरु: शुद्ध: स्वरसभरतः स्थायिभावस्वमेति ॥ ६ ॥
5 2 5 जल कप उप

जीवकी शयन और जाग्रृत दशा कहनेकी प्रतिज्ञा (दोहा)

एतेपर बहुरों सुगुर, बोले बचन रसाल।
सेन दसा जागृत दसा, कहे दुहुँकी चाल ॥ १३ ॥

शब्दार्थ - रसाल-मीठे । सैन (शयन )>सोती हुई । दसान्अवस्था ।

अर्थ :- इतनेपर फिर कृपालु सुगुरु जीवकी निद्रित और जागृत वशाका कथन मधुर वचनोंमें कहते हैं ॥ १२ ॥

जीवकी शयनअवस्था (स्वेया इकतीसा )

काया चित्रसारीसें करम परजंक भारी,
मायाकी संवारो सेज चादरि कलपना ।
सेन करे चेतन अचेतना नींद लिये,
मोहकी मरोर यहै लोचनकौ ढपना ॥।
उदे बल जोर यहै स्वासकौ सबद घोर,
विषे-सुख कारजकी दोर यहै सपना ।
ऐसी मृढ़ दसामें मगन रहै तिहूँ काल,
धाब भ्रम जालमे न पाव॑ रूप अपना ॥ १४ ॥

शब्दार्थ :- काया 5शरी र । चित्रसारी>शयनागार, लिद्रा लेनेकी जगह । सवारी >सजी । परजक (पर्यक) >पलग । सेज-विस्तर । चादरि८ ओढ़नेका वस्त्र । अचेतनान>्स्वरूपका भूलना। लोचन-ननेत्र । स्वासकौ सबद-घुरकना ।

अर्थ :- शरोररूपी महलमें कमंरूुपी बड़ा पलंग है, मायाकी सेज सजी हुई है,कल्पनारूपी" चादर है,स्वरूपको मूलरूप नींद ले रहा है, मोहके भकोरोंसे नेश्रोंके पलक ढेंक रहे है, कर्मोदेयकी जबरदस्त घुरकनेकी आवाज है, विषय-सुखके कार्योके हेतु भटकना यह स्वप्न है; ऐसी अज्ञान-अवस्थामें आत्मा सदा सग्न होकर सिथ्यात्वमें भटकता फिरता हैपरन्तु अपने आत्म- स्वरूपको नहीं देखता ॥ १४ ॥

९ जब राग-द्वे
पकेबाह्य निमित्त नही मिलते तब मनमे भांति-भातिके सकल्प-विकल्प
करना ।
निजरा हार १३६

जीवकी जागृत दशा (सवैया इकतीसा)

चित्रसारी न्यारोी परजंक न्यारो सेज न्यारो,
चादरि भी न्यारी इहां भूठी मेरी थपना।
अतीत अवस्था सेन निद्रावाहि कोउ पे,
न विद्यमान पलक न यामें अब छपता ।।
स्वास ओ सुपन दोऊ निद्राकी अलंग बूकके,
सु सब अंग लखि आतम दरपना।
त्यागी भयो चेतन अचेतनता भाव त्यागि,
भाले हृष्टि खोलिकं संभाल रूप अपना ॥ १५॥।

शब्दार्थ :- थपना- स्थापना । अतीत>भूतकाल । निद्रावाहि "सोने वाला । यामै इसमे । छपना>लगाना ’ अलंग-संबंध । दरपना>"दर्षण । भाले>देखे ।

अर्थ :- जब सम्यग्ज्ञान प्रकट हुआ तब जीव विचारता हैकि शरीर- रूपी महल जुदा है, कर्मरूप पलेंग जुदा है, मायारूप सेज जुदी है, कल्पना- रूप चादर जुदी है, यह निद्रावस्था मेरी नहों है- प्वकालमें सोनेवालो मेरी दूसरी हो पर्याय थो । अब वर्तमानका एक पल भी निद्रामें नहीं बिताऊँगा । उदयका निःश्वास और विषयका स्वप्न ये दोनों निद्राके संयोगसे दिखते थे अब आत्मरूप दपंणमे मेरे समस्त ग्रुण दिखने लगे। इस प्रकार आत्मा अचेतन भावोंका त्यागो होकर ज्ञानहष्टिसे देखकर अपने स्वरूपको सम्हालता है ॥ १५४

जागृत दशाका फल (दोहा)

इहि विधि जे जागे पुरुष, तेशिवरूप सदीव ।
जे सोवहि संसारम, ते जगवासी जोव ॥ १६ ॥

शब्दार्थ :- इह विधिमून-द्स प्रकार । जागरेनसचेत हुए। तेन्‍चवे। सदोव (सदैव )>हमेशा ।जगवासी>5ससारी । अथथ :- जो जीव संसारमें इस प्रकार आत्म-अनुभव करके सचेत हुए हैं बेसदेव सोक्षरूप हो हैं औरजो अचेत हुए सो रहे हैंवे संसारी हैं॥ १६ ॥ 8 3 2 22 3 35 कम नननन+±मनन जनम नमन त+++20+ कमन9००95

आत्म-अनुभव ग्रहण करनेकी शिक्षा (दोहा)

“जो पद भौपद भय हरे, सो पद सेऊ अनृप ।
जिहि पद परसत ओर पद, लगे. आपदारूप ॥ १७॥।

शब्दार्थ :- भो (भव)जसंसार ।सेऊ"स्वीकार करो । अनूप >उपमा रहित । परसत (स्पशंत) >ग्रहण करते ही । आपदारकष्ट ।

अर्थ :- जो जन्म-मरणका भय ह॒टाता है,उपमा रहित है, जिसे प्रहण करनेसे ओर सब पद’ विपत्तिरूप भासने लगते हैं उस आत्म-अनुभवरूप पदको अंगीकार करो ॥ १७॥

संसार स्वंथा असत्य है (सवेया इकतीसा )

जब जीव सौवे तब ससमुर्क सुपन सत्य,
वहि भूठ लागे तब जागे नींद खोइक ।
जागे कहे यह मेरो तन मेरी सोंज,
ताहू भूठ मानत मरन-थिति जोइक ।।
जाने निज मरम सरन तब सुर भूठ,
बूके जब और अवतार रूप होइक ।
वाहू अवतारकी दसामे फिरि यहै पेच,
याही भांति भूठौ जग देख्यो हम टोइक ॥ ८१ ॥

शब्दार्थ :- सोज-वस्तु ।अवतार>जन्म । टोइक€खोज करके ।

अर्थ :- जब जीव सोता हैतब स्वप्नको सत्य मानता है, जब जागता हैतब बह झूठा दिखता हैओर शरीर वा धन-सामग्रीको अपनी गिनता है। पश्चात् मृत्युका खयाल करता है तब उन्हें भी झूठी मानता है, जब अपने $ इन्द्र, घररोन्द्र, नरेन्द्रादि ।

एकसेव हि तत्स्वात्च॑ विपदामपद पदस्‌ । अपवास्येव भासन्ते पदान्यस्यानि यत्पुर॥ ७ ॥ स्वरूपका विचार करता है तब मृत्यु भी असत्य दिखतो हे और दूसरा अवतार सत्य दिखता है। जब दूसरे अवतारपर विचार करता हैतब फिर इसी चक्कर सें पड़ जाता है, इस प्रकार खोजकर देखा तो यह जन्स-मरण- रूप सब संसार भूठा ही झूठा दिखता है ।११८॥।

सम्यग्ज्ञानीका आ्राचरण (सवेया इकतीसा )

पंडित विवेक लहि एकताकी टेक गहि,
दुदज अवस्थाकी अनेकता हरतु है।
मति श्रुति अवधि इत्यादि विकलप मेटि,
निरविकलप ग्यान मनमें धरतु है।।
इंद्रियजनित सुख दुखसों विमुख हुक॑,
परमके रूप छू करम निज्जरतु है।
सहज समाधि साधि त्यागी परकी उपाधि,
आतम आराधि परमातम करतु है ॥१६॥

शब्दार्थ :- टेक>हठ । दुदज >विकल्परूप, आकुलतारूप । मेटि-हटा- कर । समाधि>ध्यान । परकी उपाधि>राम-द्वेष-मोह ।

अर्थ :- सम्यर्दृष्टि जोब भेदज्ञान प्राप्त करके एक आत्माहीको ग्रहण करता है, देहादिसे ससत्वसे नाना विकल्प छोड़ देता है । मति, श्रुत, अवधि इत्यादि क्षायोषशसिकभाव छोड़कर निविकल्प केवलज्ञानकों अपना स्वरू जानता है, इन्द्रियजनित सुख-दुःखसे रुचि हटाकर शुद्ध आत्मा-अनुभव करके कर्मोंकी निर्जेरा करता हैऔर राग-देष-मोहका त्याग करके उज्ज्वल ध्यानमें लीन होकर आत्माकी आराधना करके परमात्मा होता है ॥१६॥

एकज्ञायकभावनिर्भ रमहास्वाद॑ समासादयन्‌
स्वाद इन्द्रभय विधातुमसह स्वां वस्तुर्वाति बिदन्‌ ।
आत्मात्मानुभवानुभावविवशो अ्रश्यद्विशेषोंवर्य
सामान्य कलयतु किलेष सकल॑ शान नयत्येकतास ॥ ८ ॥
3 ान्ाणणणाि्णथ
अमल शा मिद नम तक लत जी
नज घजतल जजम शपज>यन्‍]33२557>>

सम्यग्ज्ञानको समुद्रकी उपमा (सवैया इकतीसा )

जाके उर अंतर निरंतर अनंत दर्वे,
भाव भासि रहे पे सुभाव न टरतु है ।
निर्मलसों निर्मल सु जीवन प्रगट जाके,
घटम॑ अघट-रस कौतुक करतु है।॥।
जागे भति श्रुति औधि मनपर्ये केवल सु,
पंचधा तरंगनि उमंगि उछरतु है।
सो हैग्यान उदधि उदार महिमा अपार,
निराधार एकम अनेकता धरतु है ॥ २० ॥

शब्दार्थ :- अतर-भीतर । अघट’>पूर्ण ।औधि (अवधि )>द्रव्य- क्षेत्रकाल-भावकी मर्यादा लिये हुए रूपी पदार्थोकी एकदेश स्पष्ट जाननेवाला ज्ञान । पंचधानपाच प्रकारकी। तरंगनिल्‍लहरे। ग्यान उदधि८ज्ञानका समुद्र ।निराधार-स्वतत्र ।

अर्थ :- जिस ज्ञानरूप समुद्रमें अनंत द्रव्य अपने ग्रुण-पर्यायों सहित सदेव प्रतिबिम्बित होते हैं पर वह उन द्रव्योंरूप नहीं होता और न अपने ज्ञायकस्वभावकों छोड़ता है। वह अत्यन्त निर्मेल जलरूप आत्मा प्रत्यक्ष है जो अपने पूर्ण रसमें मौज करता हैतथा जिसमें मति, श्रुत, अवधि, मन.पर्यय और केवलज्ञान ये पांच प्रकारकी लहरें उठती हैं, जो महान् है, जिसको महिमा अपरंपार है, जो निजाश्रित है वह ज्ञान एक है तो भो शेयोंको जाननेकी अनेकता लिये हुए है । . मावार्थ :- यहाँ ज्ञानको समुद्रको उपमा दो है। समुद्रमें रत्नादि अनंत द्रव्य रहते हैं, ज्ञानमें भी अनंत द्रव्य प्रतिबिम्बित होते हैं। समुद्र रत्नादिखूप नहीं हो जाता, ज्ञान भी ज्ञेयरूप नहीं होता । समुद्रका जल निमंल १. घंट-कमती । अघट-कमती नही, सपूर्ण । अच्छाच्छा स्वयमुच्छुलन्ति यदिम्ता: संवेदनश्यक्तयो निष्पीतालिलभावमण्डलरसप्राग्भारमत्ता इव। यस्पाशिन्नरसः स एव भगवानेरो5प्यनेकी भवन्‌ वल्गत्युत्कलिकाभिरद्भुतनिधिश्र तन्यरत्नाकर ॥ ६ ॥। रहता है, शञान भी निर्मेल रहता है। ससझुद्र परिपूर्ण रहता है, शान भो परिपूर्ण रहता है, समुद्रमें लहरें उठतो हैं, ज्ञानमें भोमति, अ्रत आदि तरंगें हैं । समुद्र महान् होता है, ज्ञान भो महान् होता है। समुद्र अपार होता है, ज्ञान भो अपार है। समुद्रका जल निजाधार" रहता है, ज्ञान भो निजाधार है। समुद्र अपने स्वरूपकी अपेक्षा एक और तरंगोंकी अपेक्षा अनेक होता है, ज्ञान भी ज्ञायक स्वमावकी अपेक्षा एक और शेयोंको जाननेकी अपेक्षा अनेक होता’ है ॥ २० ॥

ज्ञानरहित क्रियासे मोक्ष नहीं होता (सवैया इकतीसा )

केई कर कष्ट सहें तपसों सरीर दहें,
धृम्रपान करें अधोमुख छ्ुंक भूले हैं ।
केई महाव्रत गहें क्रियाम॑ मगन रहैं,
वहें मुनिभार पे पयारकंसे पूले हैं ॥॥
इत्यादिक जीवनकों सर्वथा मुकति नांहि,
फिरे जगमांहि ज्यों बयारिके बघूले हैं ।
जिन्हके हियमे ग्यान तिन्हिहीकौ निरवान,
करसके करतार भरमसमे मुले है ॥ २१ ॥

शब्दार्थ :- केई–अनेक । क्रर-मुर्ख । दहैं-जलाबें। अधोमुख छ- नीचेको सिर और ऊपरको पैर करके । वयारि-हवा । निरवान–मोक्ष ।

अर्थ :- अनेक मूर्ख कायक्लेश करते हैं,पंचाग्नि तवआदिसे शरीरको जलाते हैं,गाँना चरस आदि पोते हैं, नीचेकी सिर और ऊपरको पेर करके लटकते हैं, महाद्वत ग्रहण करके तपाच रणमें लीन रहते हैं, परिषह आदिका दष्ट उठाते हैं; परन्तु ज्ञानके बिना उनको यह सब क्रिया, कण रहित पयालके गट्टठकेसमान निस्सार है। ऐसे जीवोंकों कमी मुक्ति नहीं मिल १ समुद्रका पानी रत्नोंके ढेरके समान ऊचा ढीला हुआ रहता है। चरचाश० ब्लिश्यस्तां स्वयमेय दुष्क रतरमॉकोन्सुखे. कम भि: क्लिश्यन्तां च परे महाव्रततपोभारेण भग्नाश्विरम । साक्षान्मोक्ष इदं॑निरासयपद संवेधसान स्वय ज्ञान ज्ञानगु्णं विना कथमधि प्राप्तुं क्षमन्ते न हि ॥ १० ॥ सकती, वे पथनके बघूलेके समान संसारमें भटकते हैं- कहों ठिकाना नहीं पाते । जिनके हृदयमें सम्यस्ज्ञान है उन्हींको मोक्ष है; जो ज्ञानशुन्य क्रिया करते हैंवे भ्रममें भूले हुए हैं॥ २१ ॥

व्यवहार-लीनताका परिणाम (दोहा)

लीन भयौ विवहारम, उकति न उपजे कोइ ।
दीन भयौ प्रभुपद जप, मुकति कहासों होइ ? ॥२२॥।

शब्दार्थ :- लीन-मग्न । उकति-मेदज्ञान । प्रभुषद जपै-भेगवत- चरण जपता है ।

अर्थ :- जो क्रियामें लीन है, भेदविज्ञानसे रहित हैऔर दीन होकर भगवानके चरणोंको जपता है, और इसीसे मुक्तिकी इच्छा करता है सो आत्मानुभवके बिना सोक्ष कंसे मिल सकता है ? ॥२२॥।

पुन (दोहा)

प्रभु सुमरो पूजा पढ़ो, करो विविध विवहार ।
मोख सरूपी आतमा, ग्यानगम्य निरधार ॥ २३ ॥

शब्दार्थ :- सुमरौ-स्मरण करो । विविध विवहार-नाना प्रकारका चारित्र। अथे :- भगवानका स्मरण करने, पूजा-स्तुति पढ़ने वा अनेक प्रकारका चारित्र प्रहण करनेसे कुछ नहीं हो सकता, क्‍योंकि मोक्षस्वरूप आत्मा अनुमव-ज्ञानगोचर है ॥ २३ ॥

ज्ञानके बिना मुक्तिमार्ग नही जाना जा सकता (स्वेया इकतीसा )

काज विना न कर जिय उद्यम,
लाज विना रन मांहि न जूके।
डोल बिना न स्थध परमारथ,
सील विना सतसों न अरूफे ।।
नेम विना न लहै निहचे पद,
प्रेम बिना रस रोति न बूझक।
ध्यान बिना न थंत्रे मनको गति,
ग्यान बिना सिव पंथ ने सुर ॥२४।॥
निर्जरा हार श्ड्प्‌

शब्दार्थ :- उद्यम उद्योग । लाज-"स्वाभिमान । डीलजशरीर । जुभे-लडे । प्रमारथ (परमार्थ) >मोक्ष । अहूके>मिले। नेमर नियम । बृकेन्समभे । सिव पथ मोक्षमार्ग । सूक्रे>दिखे ।

अर्थ : - बिना प्रयोजन जीव उद्यम नहों करता, बिना स्वाभिमानके संग्राममें नहों लड़ता, शरीरके बिता मोक्ष नहीं सधता, शील धारण किये बिना सत्यका मिलाप नहीं होता, संयमके बिना सोक्षपद नहीं मिलता, प्रेमके बिता रसरोति नहीं जानी जातो, ध्यानके बिना चित स्थिर नहीं होता और ज्ञानके बिना मोक्षमार्ग नहीं जाना जाता ॥ २४।॥।

ज्ञानकी महिमा (सव्वेया तेईसा)

ग्यान उदे जिन्हके घट अंतर,
जोति जगी मति होत न मेैली।
बाहिज दिष्टि मिटी जिन्हके हिय,
आतमभध्यानकला विधि फंली ॥
जे जड़ चेतन भिन्न लखे,
सुविवेक लिये परखे गुन-थेली ।
ते जगमें परमारथ जाति,
गहैँ रुचि सानि अध्यातमसली ॥ २५ ॥

शब्दार्थ :- अतर"भीतर । मतिन्बुद्धि । मैली>गन्दी । बाहिज दिष्टिशरीर आदिमे आत्मबुद्धि । भिन्न>जुदे । परखे-परीक्षा करें । रुचि श्रद्धान । अध्यातमसली-आत्म-अनुभव ।

अर्थ :- जिनके अंतरंगमें सम्पग्जानका उदव हुआ है, जिनकी आत्म- ज्योति जागृत हुई हैऔर बद्धि निर्मल रहतो है, जिनकी शरीर आदिसे आत्मबुद्धि हट गई है, जो आत्मध्यानमें निपुण है, जोजड़ और चेतनके गुणोंकी परीक्षा करके उन्हें जुदा-जुदा जानते है; वे मोक्षमार्गको अच्छी

तरह समझकर रुचिपुृवंक आत्म-अनुमव करते है ॥! २५ १ पुन. (दोहा)

“बहुविधि क्रिया कलेससोँ, सिवपद लहै न कोह । ग्यानकला परकाशर्सो, सहज मोखपद होइ ॥ २६ ॥

ग्यानकला घटघट बसे, जोग जुगतिके पार ।
निज निज कला उदोत करि, मुकत होइ संसार ॥ २७॥।

शब्दार्थ :- वहुविधि>अनेक प्रकारकी । बसै>रहे । पार (परे)- अगम्य । उदोत>प्रगट । मुकत>मुक्त ।

अर्थ :- अनेक प्रकारकी बाह्य क्रियाओंके क्लेशसे कोई मोक्ष नहीं पा सकता ओर सम्यम्ज्ञान प्रकाशित होनेसे बिना क्लेशके हो मोक्षपद प्राप्त होता है ॥ २६ ॥

अर्थ :- ज्ञानज्योति समस्त जोबोंके अंतरंगमें रहतो है,बह मम, वचन, काय ओर युक्तिके अगम्य है, हेभव्यो ! अपनो अपनो ज्ञानज्योति प्रगट करके संसारसे मुक्त होओ ॥ २७ ॥

अनुभवकी प्रशसा (कंडलिया )
“अनुभव चितामनि रतन, जाके हिय परगास ।
सो पुनीत सिवपद लहै, वहै चतुरगतिवास ॥।
दहे चतुरगतिवास, आस धरि क्रिया न मंडे ।
नृतन बंध निरोधि, पृब्बकृत कर्म बिहंडे ॥।
ताके न गनु विकार, न गनु बहु भार न गनु भव ।
जाके हिरदे मांहि, रतन चितामनि अनुभव ॥ २८ ॥

“पदसिद ननु कसंदुरासद॑ सहजबोधकलासुलभ किल । तत इदं निजबोघकलाबलातू कलथितु यत्ततां सतत जगतु ॥ ११॥।

( अचिन्त्यशक्ति: स्वयमेव देवश्रिन्मात्रचिस्तामणिरेष यस्मात्‌ ।
सर्वार्थसिद्धात्मतया विधते ज्ञानी किमन्यम्य परिग्रहेण॥ १२।॥
निजरा हार १४७

शब्दार्थ :-पुनीतल्यवित्र । दहै->जलावे । आस"आशा । मड़े (मार) >करे । निरोधि > रोककर । बिहडे>भड़ावे । भार>बोभ । भव जन्म ।

अर्थ :- अनुमबरूप चिन्तामणि रत्नका जिसके हृवयमें प्रकाश हो जाता है, वह पवित्र आत्मा चतुर्गति श्रमणरूप संसारको नष्ट करके मोक्षपद पाता है। उसका चारित्र इच्छा रहित होता है, वह कर्मोंका संवर और पुरबकृत कर्मोंकी निर्जंरा करता है। उस अनुभवी जोवके राग -ह्ठेष, परिग्रहका भार और आगे होनेवाले जन्म किसो गिनतोमें नहों हैंअर्थात्‌ वह स्वल्प कालहीमें सिद्धपद पावेगा ॥ २८ ॥

सम्यर्दर्शनकी प्रशसा (सवेया इकतीसा)

जिन्हके हियेमें सत्य सुरजण उदोत भयौ,
फंली मति किरन सिथ्यात तम नष्ट है ।
जिन्हकी सुदिष्टिमैं न परच विषभतासों,
समतासों प्रीति ममतासों लष्ट पुष्ट है ॥।
जिन्हके कटाक्षमे सहज मोखपंथ सघे,
मनकों निरोध जाके तनकों न कष्ट है ।
तिन्‍्हके करमकी कलोल यह है समाधि,
डोल यह जोगासन बोले यह मसष्ट है ॥ २६ ॥

शब्दार्थ :- परचे (परिचय )>संबध, नाता । विषमता>राग-द्वेष । समतान्‍्वीतरागता । लष्ट पुष्टविरुद्ध । कटाक्षज्निगाह । करमकी कलोले>कर्मके भकोरे । समाधि>ध्यान । डोले>फिरे । मष्टल्मौन ।

अर्थ :- जिनके हृदयमें अनुभवका सत्य सूर्य प्रकाशित हुआ है और सुबुद्धरूप किरणें फंलकर मिथ्यात्वका अंधकार नष्ट करतो हैं, जिनके सच्चे श्रद्धानमें राग-हेबसे नाता नहों है, समतासे जिनका प्रेम और ममतासे द्रोह है, जितको चितवन मसाज्से मोक्षमार्ग संधता हैऔर जो कायवलेश आदिके बिना मत आदि योगोंका निग्रह करते हैं; उन सम्यग्जानो जोवोंके विघय-भोग मो समाधि हैं, चलना-फिरना योग वा आसन है और बोलना- चालना हो मोनब्रत है ।

भावार्थ :- सम्यस्ज्ञान प्रगट होते ही गुणभ्रेणी निर्जेरा प्रगठ होतो है, ज्ञानी जोव चारित्रमोहके प्रबल उदयमें यद्यपि संपम नहीं लेते - अव्नतकी दशामें रहते हैं-तो भी कमंनिर्जरा होतो ही है अर्थात्‌ विषय आदि भोगते, चलते-फिरते और बोलते-चालते हुए भी उनके कर्म भड़ते हैं । जो परिणाम, समाधि योग आसन मौनका हैवही परिणाम ज्ञानीके विषय-भोग, चलन- फिरन और बोलचालका है। सम्यक्त्वकी ऐसी ही अटपटो महिमा है ॥ २६ ॥

परियग्रहके विशेष भेद वथन करनेकी प्रतिज्ञा (सवेया इकतीसा )

आतम सुभाउ परभाउकी न सुधि ताकौ,
जाको मन मगन परिग्रहमे रहो है ।
ऐसो अविवेककोी निधान परिग्रह राग,
ताको त्याग इहांलो समुच्चेरूप कह्मौ है।।
अब निज पर भ्रम दूरि करिवेक काज,
बहुरो सुगुरु उपदेसको उमझ्यौँ है।
परिग्रह त्याग परिग्रहको विशेष अंग,
कहिवेको उहिम उदार लहलहोँ है॥ ३० ॥

शब्दार्थ :- सुधि>खबर । जविवेक- अज्ञान । राग प्रेम । समुच्च > रकट्ठा । उमझयो हैतत्पर हुआ है। कटिवेकौ >वहनेको ।

अर्थ :- जिसका चित्त परिग्रहमें रमता है उसे स्वभाव-परभावकों खबर नहीं रहती, इसलिये परिग्रहका प्रेम अज्ञानका कोष ही है। उसके त्याग का यहां तक सामान्य रोतिसे समुच्चयरूप कथन किया है; अब श्रीगुरु निज-परका भ्रम दूर करनेके लिये परिग्रह त्याग ओर परिग्रहके विशेष भेद कहनेको उत्साहपूबंक सावबान हुए हैं ॥ ३० ॥

इत्य परिग्रहमपारथ ससह्तसेव सामान्यत, स्वपरयोरवि
वेकहेतुम ।
अज्ञानमुस्कितुमना अधुना विशेषाद भूयस्तमव परहुनुमय
प्रवत्त: ॥ १३॥।
निजरा हॉर १४६

सामान्य - विशेष परिग्रहका निर्णय (दोहा)

त्याग जोग परवस्तु सब, यह सामान्य विचार ।
विविध वस्तु नाना विरति, यह विशेष विस्तार ॥ ३१ ॥
, शब्दार्थ :- परवस्तु अपने आत्माके सिवाय अन्य सब चेतन-अचेतन
पदार्थ । सामान्य>साधारण । विरति> त्याग ।

अर्थ :- अपने आत्माके सिवाय अन्य सब चेतन-अचेतन पर पदार्थ त्यागने योग्य हैं यहसामान्य उपदेश हैऔर उनका अनेक प्रकारसे त्याग करना यह परिग्रहका विशेष त्याग है ।

भावार्थ :- मिथ्यात्व, राग, हेष आदि चौदह अंतरंग परिग्रह और धनधान्यादि दस बाह्म परिग्रह - इन सबका त्याग सासान्य त्याग है, और मिथ्यात्वका त्याग, अश्नतका त्याग, कषायका त्याग, कुकथाका त्याग, प्रमादका त्याग, अभक्ष्यका त्याग, अन्यायका त्याग आदि विशेष त्याग हैं ॥ ३११

परिग्रहमे रहते हुए भी ज्ञानी जीव निष्परिग्रह है (चौपाई )

“पुरतव. करम उद रस भुजे
ग्यान सगन ममता न प्रयुजे।
उरसें. उदासीनता लहिये,
यों बुध परिग्रहबंत न कहिये ॥ ३२॥।

शब्दार्थ :- पूरव (पूर्व )>पहलेका । भुजै>भोगे । प्रयुजे>लीन होवे । उदासीनता-वेराग्य । बुध सम्यग्हृष्टि ।

अर्थ :- ज्ञानी जीव पूर्वबद्ध कमंके उदयसे सुख-दुख दोनों भोगते हैं पर वे उनमें ममता ओर राग-हेष नहीं करते–ज्ञानहोमें मस्त रहते हैइससे उन्हें निष्परिग्रह ही कहा है ॥ ३२ ॥

“पृर्वबद्धनिजकमं विपाकात्‌ ज्ञानिनो यदि भवत्युपभोगः ।
तड्भूबत्वच उ रागवियोगात्‌ ननसेति न परियग्रहभावम्‌ ॥ १४ ॥

परिग्रहमें रहने पर भी ज्ञानी जीवोंको परिग्रह रहित कहनेका कारण (सवैया इकतीसा )

जे जे मनबंछित विलास भोग जगतमें,
ते ते बिनासीक सब राखे न रहत हैं ।
और जे जे भोग अभिलाष चित्त परिनाम,
तेऊ विनासोक धारारूप ह्वं बहत हैं ।
एकता न बुहूंमांहि ताते बांछा फुर नांहि,
ऐसे भ्रम कारजकों मूरख चहत हैं ।
सतत रहें सचेत परसों न कर हेत,
यात॑ ग्यानबंतकौ अबंछक कहत हैं ॥ ३३ ॥

शब्दार्थ :- विनासीक >नाशवान । फुरे>उपजे । कारज (कार्य) काम । सतत>हमेशा । सचेत-सावधान । अवछक- इच्छा रहित ।

अर्थ :- संसारकी मनवांछित भोग-विलासकी सामग्री अथिर हे, वे अनेक चेष्टाएँ करनेपर भी स्थिर नहों रहतीं, इसी प्रकार विषय- अभिलाषाओंके भाव भी अनित्य है। भोग और भोगकी इच्छाएं इन दोनोंमें एकता नहीं हैऔर नाशबान हैंइससे ज्ञानियोंको भोगोंको अभिलाषा ही नहीं उपजतो, ऐसे भ्रमपूर्ण कार्योको तो मूर्ख हो चाहते है, ज्ञानी लोग तो सदा सावधान रहते हैं-पर पदार्थोसे अनुराग नहीं करते, इससे ज्ञानियोंको निर्बाछुक हो कहा है ॥ ३२३ ॥

परिग्रहमे रहने पर भी ज्ञानी जोव निष्परिग्रह है, इसपर दृष्टान्त (सवेया इकतीसा )

जैसे फिटकड़ी लोद हरड़ेकी पुट बिना,
स्थेत वस्त्र डारिये मजीठ रंग नीरमे ।
… वेशबेदकबिभाबचलत्वाद्‌ वेदते न खलु कांक्षितमेव ।
तेन कांक्षति न किड्चन बिद्वानू स्वतोध्प्यतिविरक्तिपुपति ॥ १४ ॥
ज्ञानिनो भ हि बन्प्रहभाव कमरागरसरिक्ततयति ।
रजूयुक्तिरकषायितवस्त्रे स्वोकृतब हि. बहिलुंढतीह ॥ १६॥
निज
रा द्वार १५१
भीग्यों रहै चिरकाल सर्वथा न होइ लाल,
भेदे नहिं अंतर सुफेदी रहै चीरमें ॥॥
तेसे समकितवंत राग द्वेष मोह बिनु,
रहै निशि वासर परिय्रहकी भीरमें।
पूरव करम हरे नतृतन न बंध कर,
जाचे न जगत्-सुख राच न सरीरमें ॥ ३४ ॥

शब्दार्थ :- मजीठ८आल । चिरकालन्सदेव । सर्वथानंविलकुल । चोरन्‍्वस्त्र । निशि वासर-रात-दित । भीरमन्समुदाय । जाचेनचाहे । राचै लीन होवे ।

अर्थ :- जिस प्रकार फिटकरी, लोद और हरड़ेकी पुट दिये बिना मजोठके रंगमें सफेद कपड़ा डुबानेसे तथा बहुत समय तक ड्बा रखनेसे भी उसपर रंग नहों चढ़ता - वह बिलकुल लाल नहीं होता, अंतरंगमें सफेदी ही रहती है; उसी प्रकार राग-द्ेष-मोहरहित ज्ञानी मनुष्य परिग्रह-समृहमें रात-दिन रहता है तो भी पू्ब-संचित कर्मोकी निर्जरा करता है, नवीन बंध नहीं करता । वह विषय-सुखको वाञछा नही करता और न शरीरसे मोह रखता है।

भावार्थ :- राग-द्वेष-मो हरहित होनेके कारण सम्यरदृष्टि जीव परिग्रह आदिका संग्रह रखते हुए भी निष्परिग्रह है ॥ ३४ ॥

पुन: (सवेया इकतीसा )

जैसे काहू देसको बसेया बलवत नर,
जंगलमें जाइ मधु-छत्ताकों गहतु है ।
बाकों लपटांहि चहुंओर मधु-मच्छिका पें-
कंबलकी ओटसों अडंकित रहतु है ।।
तेसे समकिती सिबसत्ताकौ स्वरूप साध,
उ्देकी उपाधिकों समाधिसी कहतु है ।
पहिरे सहजकों सनाह मनम उछाह,
ठाने सुख-राह उदवेग न लहतु है ॥ ३५॥॥।

शब्दार्थ :- समाधि-ध्यान । सनाहन्बख्तर । उछाहन्उत्साह । उदवेग-आकुलता ।

अर्थ :- जैसे कोई बलवान पुरुष जंगलमें जाकर मधुका छत्ता निकालता हैतो उसको बहुतसी मधु-सक्खियाँ लिप्ट जाती हैं,परन्तु कम्बल ओढ़े हुए होनेसे उसे उनके डंक नही लग सकते। उसी प्रकार सम्यग्हष्टि जीव उदयकी उपाधि रहते हुए भी मोक्षमार्गको साधते हैं, उन्हें ज्ञानका स्वाभाविक बख्तर प्राप्त है,इससे आनंदमें रहते है -उपाधिजनित आकुलता नही व्यापतो, समाधिका काम देती है ।

भावार्थ :- उदयकी उपाधि सम्यग्ज्ञानो जीवोंको निर्जराहीके लिये है, इससे वह उन्हें चारित्र और तपका काम देती है, अतः उनकी उपाधि भी समाधि है ॥ २५ ॥

ज्ञानी जीव सदा अवध है (दोहा)

जि्यानी ग्यानसलगन रहे रागादिक मल खोह।
चित उदास करती कर, करम बंध नहिं होइ ॥ ३६ ॥

शब्दार्थ :- मल->दोप । खोइ८हटाकर । करनी>किया ।

अर्थ :- ज्ञानी मनुष्य राग-देष-मोह आदि दोषोंको हटाकर ज्ञानमें मस्त रहता हैऔर शुभाशुभ क्रिया वेराग्यस हितकरता है, इससे उसे कर्मे- बंध नही होता ॥ ३६ ॥

पुन (दोहा)

मोह महातम मल हर, धरे सुमति परकास ।
मुकति पंथ परगट करे, दीपक ग्यान बिलास ॥ ३७ ॥

शब्दार्थ :- सुमति-अच्छी बुद्धि ।मुकति पथल्मोक्षमार्ग ।

ज्ञानवानू स्वरसतोषषि यतः स्थात्‌ सर्वरागरसवर्जनशील: । लिप्यते सकलकसंभिरेषः: कर्ममध्यपतितोईपि तसो न॥ १७ ॥

अर्थ :- ज्ञानरूपी दोपक मोहरूपी महा अंधकारका मल नष्ट करके सुबुद्धिका प्रकाश करता है और भोक्षमार्गको दरसाता है॥ ३७ ॥

ज्ञानरहूपी दीपककी प्रशसा (सववेया इकतीसा )

जामें ध्ृमकौ न लेस वातको न परवेस,
करम पतंगनिकों नास करे पलमे ।
दसाकौ न भोग न सनेहको संजोग जामें,
मोह अंधकारकौ वियोग जाके थलमें ।।
जामें न तताई नहि राग रकताई रंच,
लहलहै समता समाधि जोग जलमें ।
ऐसी ग्यान दोपकी सिखा जगी अभंगरूप,
निराधार फुरो पे दुरी है पुदगलमें (३८।।

शब्दार्थ :- धुम-धुवाँ । वात>हवा । परवेश (प्रवेश )>पहुँच । दसा>बत्ती । सनेह (स्नेह)-चिकनाई (तेल आदि) । तताईन-गर्मी । रकताई>ललाई । अभग>अखंड । फुरी-स्फुरायमान हुई । दुरी>छूपी ।

अर्थ :- जिसमें किचित्‌ मो धुर्वां नहों है, जो हवाके भकोरोंसे बुक नहीं सकता, जो एक क्षणभरमें कमं-पतंगोंको जला देता है, जिसमें बततोका भोग नहों है, और न जिसमें घृत तेल आदि आवदयक हैं, जो मोहरूपी अंधकारको मिटाता है, जिसमें किचित्‌ भी आँच नहीं हैओर न रागकी लालिसा है,जिसमें समता समाधि और योग प्रकाशित रहते हैं; ऐसी ज्ञानकी अखंड ज्योति स्वयंसिद्ध आत्माबें स्फुरित हुई है - शरीरमें नहीं है ॥ ३८ ॥

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ज्ञानकी निर्मेलतापर हृष्टान्त (सवेया इकतीसा )

जैसो जो दरव तामे तंसोई सुभाउ संघ,
कोऊ दर्व काहुकौ सुभाउ न गहतु है ।
जैसे संख उज्जल विविध वर्न माटी भखे,
साटीसौ न दीसे नित उज्जल रहतु है।॥।
तेसे ग्यानबंत नाना भोग परिंगह-जोग,
करत विलास न अग्यानता लहतु है।
ग्यानकला दूनी होइ दुंददसा सूनी होइ,
ऊनी होइ भौ-थिति बनारसी कहतु है (३६॥

शब्दार्थ :- दवं (द्रव्य )-पदार्थ ।भखे >खाता है। दुददसा> अ्रान्ति । सूनी (शुन्य)>अभाव । ऊनी>कमती । भौ-थिति>भवस्थिति ।

अर्थ :-पं० बनारसीदासजी कहते हैकि जो पदार्थ जंसा होता है उसका वंसा ही स्वभाव होता है, कोई पदार्थ किसी अन्य पदार्थके स्वभावकों ग्रहण नहीं कर सकता, जैसे कि शंख सफेद होता हैऔर मिट्टी खाता हैपर वह मिट्टी सरीखा नहीं होजाता - हमेशा उजला हो रहता है; उसो प्रकार ज्ञानो लोग परिग्रहके संघोगसे अनेक भोग भोगते है पर वे अज्ञानी नहीं हो जाते । उनके ज्ञानको किरण दिन दूनी बढ़ती है, भ्रामक दशा मिट जाती है और भव-स्थिति घट जातो है॥ ३६ ॥

पाहक ताहमिहास्ति तस्थ बशतो यत्य स्वभावों हि यः
कर्तु नेध कथंचनापि हि पररन्याहश: शक्यते ।
अज्ञान न कदाचनापि हि भवेज्ञानं भवेत्सस्ततम्‌
ज्ञानिन भुक्ष्य परापराघजनितों नास्तीह बन्धस्तव ॥१८॥

विषयवासनाओंसे विरक्त रहनेका उपदेश (स्वेया इकतीसा)

जौलों ग्यानको उदोत तौलों नहिं बंध होत,
बरते मिथ्यात तब नाना बंध होहि है ।
ऐसो भेद सुनिक लग्यो तू विषे भोगनिर्सों,
जोगनिसों उहमकी रोति ते बिछोहि है ।।
सुनु भेया संत तू कहे में समकितबंत,
यहु तौ एकंत भगवंतकौ दिरोहि है।
विषेसों विमुख होहि अनुभो दसा अरोहि,
मोख सुख टोहि तोहि ऐसी मति सोहि है ॥ ४० ॥

शब्दार्थ :- उदोत (उद्योत)>उजेला । जोगन्संयम । बिछोहि है+छोड दी है। उद्म>प्रयत्न । दिरोहि (द्रोही )>बेरी (अहित करने- वाला ) । अरोहि-ग्रहण करके । टोहि-देखकर । सोहि है-शोभा देती है !

अर्थ :- हे भाई भव्य सुनो ! जब तक ज्ञानका उजेला रहता है तब तक बंध नहीं होता और मिथ्यात्यके उदयमें अनेक बंध होते हैं,ऐसी घरचा सुनकर यदि तुम विषय-मोगोंमें लगजाओ तथा संयम ध्यान चारित्रकों छोड़ दो और अपनेको सम्यकत्वी कहो तो तुम्हारा यह कहना एकान्त मिथ्यात्व हैओर आत्माका अहित करता है । विषयसुखसे विरक्त होकर आत्म- अनुभव ग्रहण करके मोक्षसुखकी ओर देखो, ऐसी बुद्धिसानी तुम्हें शोभा देगी ।

भावार्थ :- ज्ञानीको बंध नहीं होता ऐसा एकान्तपक्ष ग्रहण करके विषयसुखमें निरंकुश नहीं हो जाना चाहिये, मोक्षसुखक्षी ओर देखना चाहिये ॥ ४० ॥

ज्ञानिन्‌ कम न जातु कर्तृमुचितं किडिचत्तयाप्युच्यते
भुंक्षे हन्त न जातु में यदि पर दुर्भुक्त एवासि भोः ।
बन्ध: स्थादुपभोगतों यदि न तरत्कि कामचारोइ$स्ति ते
ज्ञानं सन्‍्वस बन्धमेष्यपरथा स्वस्थापराधादशुवम्‌ ॥ १६ ॥
न 2 संमयसार
अहम नोटक
2 न नरम

ज्ञानी जीव विषयोमे निरकुश नही रहते (चौपाई)

ग्यानकला जिनके घट जागी।
ते जगमांहि सहज वेरागी ॥।
ग्यानी मगन विषेसुखमांही ।
यह ॒विपरीति संभव नांही ॥४१॥

अर्थ :- जिनके चित्तमें सम्यग्लानकोी किरण प्रकाशित हुई है वे संसारमें स्वभावसे ही बीतरागी रहते है, ज्ञानो होकर विषयसुख में आसक्त हों, यह उलटी रीति असम्भव है ॥४१॥

ज्ञान और वराग्य एकसाथ ही होते है (दोह!)
ग्यान सकति बेराग्य बल, सिव साधे समकाल ।
ज्यों लोचन न्‍्यारे रहे, निरखे दोड नाल ॥४२॥।

शब्दार्थ :- निरखे<देख । नाल-"एकसाथ ।

अर्थ:- ज्ञान-वेराग्य एकसाथ उपजनेसे सम्यग्हष्टि जोब मोक्षमा्गको साधते हैं, जंसे कि दोनों नेत्र पृथक-पृथक रहते हैं पर देखनेका काम एकसाथ करते हैं।

भावार्थ :- जिस प्रकार दोनों नेत्र पृथक-पृथक होते हुए भी देखनेकी क्रिया एकसाथ करते है, उसो प्रकार ज्ञान-व राग्यएक हो साथ कर्म-नि्जरा करते हैं ।बिना ज्ञानका वेराग्प और बिना वेराग्यका ज्ञान सोक्षमार्ग साधनेमें असमथ है ॥४२।॥। अज्ञानी जीवोकी क्रिया बन्धके लिये और ज्ञानी जीवोकी क्रिया

निजेराके लिये है (चौपाई)

मूढ़ करमको करता होव॑े
फल अभिलाष धर फल जोबे ।।
कर्तारं स्वफलेन यत्किल बलात्कमेंब नो योजयेतु
कुर्वाण. फललिप्सुरेव हि फल श्राप्नोति यत्क्ंण:।
ज्ञानं सस्तदपास्तरागरचनों नो बध्यते कर्मणा
कुर्बाणोषपि हि कर्म तरफलपरित्थागेकशीलो मुनि. (४२०॥॥
निजरा हार १५७
ग्यानी क्रिया करें फल-सूनी।
लगे न लेप निजेरा दूनी ॥ ४३॥।

शब्दार्थ :- जोवे देखे । सूनी (शून्य )-रहित । लेप"बध ।

अर्थ :- मिथ्याहृष्टि जीव क्रियाके फलकी (भोगोंकी) अभिलाषा करता है और उसका फल चाहता है इससे वह कर्मबंधका कर्ता है। सम्पग्ज्ञानी जोबोंको भोग आदि शुभाशुभ क्रिया उदासीनतापूर्यक होतो है, इससे उन्हें कर्मका बंध नहीं होता और दिन दूनी निर्जरा ही होती है । विशेष :- यहाँ ‘निर्जरा दूनी’ यह पद कविताका प्रास सिलानेको हृष्टिसे दिया है, सम्पग्दशन उपजे उपरान्त समय समय पर असंख्यातगुनी निर्जरा होती है ॥ ४३ ॥

ज्ञानीके अबंध और अज्ञानीके बधपर कीटकका हृप्टान्त (दोहा )

बंधे करमसों मृढ़ ज्यों, पाट-कीट तन पेम ।
खुले करमसो समकिती, गोरखधंधा जेम ॥ ४४ ॥

शब्दार्थ :- पाट>रेशम । कीट-कीडा । जेम> जैसे ।

अर्थ :- जिस प्रकार रेशमका कीड़ा अपने शरीर पर आप हो जाल पुरता हैउसो प्रकार मिथ्याहृष्टि जीव कर्बंधनको प्राप्त होते हैं, और जिस प्रकार गोरखधंधा नामका कीड़ा जालसे निकलता हैउसी प्रकार समभ्यस्टृष्टि जीव कमंबंधनसे मुक्त होते है ॥ ४४ ॥

ज्ञानी जीव करममके कर्त्ता नही है (स्वेया तेईसा)

जे निज पूरब कर्म उदे,
सुख भु जत भोग उदास रहेंगे ।

त्यक्त’ येन फल स कर्म कुरुते नेति प्रतोमो बय॑ किन्त्वस्थापि कुतोषपि किडिचदपि तत्कर्मावशेनःपतेतु । तस्मिन्नापतिते त्वकस्पपरमज्ञानस्वभावे स्थितो ज्ञानी कि कुरुतेधय कि न कुरुते कमेंति जानाति कः ॥ २१ ॥।

श्ध्र्ष
जे दुखमें न विलाप करें,
निरबेर हिये तन ताप सहेंगे ।।
है जिन्ह॒क॑ दिढ़ आतम ग्यान,
क्रिया करिके फलकों न चहेंगे ।
ते सु विचच्छन ग्यायक है,
तिन्‍्हकौं करता हम तो न कहेंगे ॥ ४५ ॥

शब्दार्थ :- भुजत5भोगते हुए । उदास> विरक्त । विलापल्‍हाय हाय करना । निरबेरनजद्वेष रहित । ताप>कप्ट ।

अर्थ :- जो पूर्वमें बंधे हुए प्रुण्यकर्मके उदय-जनित सुख भोगनेमें आसक्त नहीं होते और पापकर्मके उदय-जनित दुख भोगते हुए संतापित नहीं होते - न दुःख देनेवालेसे द्ेबभाव करते हैंबल्कि साहसपूर्वक शारीरिक कष्ट सहते हैं,जिनका भेद-विज्ञान अत्यन्त हृढ़ है, जो शुभ क्रिया करके उसका फल स्वर्ग आदि नहीं चाहते, वे विद्वान् सम्यग्जञानी हैं। वे यद्चपि सांसारिक सुख मोगते हैंतो भो उन्हें करमंका कर्ता हम तो नहीं कहते ॥ ४५ ॥

सम्यग्जानीका विच[र (सवेया इकतीसा )

जिन्हकी सुदृष्टिमि अनिष्ट इष्ट दोऊ सम,
जिन्हकौ अचार सु विचार सुभ ध्यान है ।
स्वारथकों त्यागि जे लगे हैं परमारथको,
जिन्हक बनिजमे न नफा है न ज्यान है ॥।
जिन्हकी समुभझ्रिमि सरीर ऐसो मानियत,
धानकौसों छीलक क्रपानक्ौसों म्यान है ।॥।
पारखी पदारथके साखी भ्रम भारथके,
तेई साधु तिनहीकी जथारथ ग्यान है ॥ ४६ ॥

शब्दार्थ :- बनिजल्व्यापार । ज्यान-जाना–टोटा या नुकसान । छीलक<छिलका । कृपान तलवार । पारखी परीक्षक । भारथ (भारत )5 लड़ाई । ’ अर्थ :- जिनकी ज्ञानहष्टिमें दृष्ट-अनिष्ट दोनों समान हैं,जिनको प्रवृत्ति और विचार शुभ ध्यानके लिये होती है, जोलौकिक प्रयोजन छोड़कर सत्यमार्गमें चलते हैं, जिनके वचनका व्यवहार किसोकों हानिकारक वा किसोको लाभकारक नहीं है, जिनकी सुबुद्धिमें शरीर धानके छिलके व तलवारके म्यानके समान आत्मासे जुदा गिना जाता है, जो जीव-अजीव पदार्थेकि परोक्षक हैं,संपम आदि मिथ्यात्वकी खोंचतानके जो मात्र ज्ञाता- दृष्टा हैं; वे हो साधु हैंओर उन्होंको वास्तविक ज्ञान है ॥ ४६ ॥

ज्ञानकी निर्भयता (सवैया इकतीसा )

जमकौसो भ्राता दुखदाता है असाता कमं,
ताक उदे म्रख न साहस गहतु है।
सुरगनिवासी भूसिवासोी ओ पतालवासी,
सबहीको तन मन कंपितु रहतु है ॥।
उरकौ उजारोौ न्यारो देखिये सपत भेसों,
डोलत निसंक भयोौ आनंद लहतु है ।
सहज सुबवीर जाको सासतो सरीर ऐसौ,
ग्यानो जीव आरज आचारज कहतु है ॥ ४७ ॥
सम्परहृष्टय एवं साहसमिदं कतु क्षमन्ते परं
यह जेंईवि पतत्यमों भयचलत्त्र लोक्यमुक्ताध्वनि: ।
सवभिव निसगनिर्भपतया शद्भुां विहाय स्वय
जानन्त: स्वमवध्यबोधवपुष बोधाक्च्यवन्ते न हि ॥ २२ ॥

शब्दार्थ :- भ्राता>भाई । साहसल्‍हिम्मत । सुरगनिवासी >देव । भूमिवासी >मनुष्य,पशु आदि । पतालवासी >व्यतर, भवनवासी, नारकों आदि । सपत (सप्त) >सात । भें (भय)>इर । सास्वतकभी नाश नही होनेवाला । आरज>"पवित्र ।

अर्थ :- आचार्य कहते हैं किजो अत्यन्त वुखदाई है मानों जमका भाई ही है, जिससे स्वर्ग, मध्य और पाताल त्रेलोक्यके जीवोंका तन मन काँपता रहता है,ऐसे असाता कमंके उदयमें अज्ञानी जीब हृतसाहस हो जाता है । परन्तु ज्ञानी जीवके हृदयमें ज्ञानका प्रकाश है, वह आत्मबलसे बलवान है, उसका ज्ञानरूपी शरोर अविनाशोी है, वह परम पवित्र हैऔर सप्त भयसे रहित निःशंकित डोलता है ॥ ४७ ॥

सप्त भयके नाम (दोहा)

इहभव-भय परलोक-भय, मरन-वेदना-जात ।
अनरच्छा अनगुप्त-भय, अकस्मात-भय सात ॥ ४८ ॥

अर्थ :- इहभव-भय, परलोक-भय, मरण-भय, बेदना-मय, अनरक्षा- भय, अनगुप्त-सय और अकस्मात-भय - ये सात भय है ॥ ४८ ॥

सप्त भयका प्रथक-पुथक स्वरूप (सर्वेया इकतीसा )

दसधा परिग्रह-वियोग-चिता इह॒ भव,
दुर्गंतिगमन भय परलोक मानिये।
प्राननिको हरन सरन-सभे कहावे सोइ,
रोगादिक कष्ट यह वेदना बखानिये ॥।
रच्छुक हमारो कोऊ नांही अनरच्छा-भय,
चोर-भे विचार अनगुप्त मन आलिये।
अनचित्यों अबही अचानक कहाधों होइ,
ऐसो भय अकस्मात जगतमें जानिये ॥ ४६ ॥

शब्दार्थ :- दसधा ८दस प्रकारका । वियोग > छूटना ।चिता फिकर दुर्गेति>खोटी गति । अनगुप्त* चोर । । ) गुप्तन्माहकार, अनगप्त>चोर ।

अर्थ :-क्षेत्र, वास्तु आदि दस" प्रकारके परिग्रहका वियोग होनेकी खिता करना इस भवका भय है, कुगतिमें जन्म होनेका डर मानना परलोक- भय है, दस प्रकारके प्राणोंका वियोग हो जानेका डर मानना मरणभय है, रोग आदि दुख होनेका डर मानना वेदनामय है, कोई हमारा रक्षक नहीं ऐसो चिता करना अनरक्षाभय है, चोर व दुश्मन आगे तो कंसे बचेंगे ऐसी चिन्ता करना अगुप्तभय है, अचानक ही कुछ विपत्ति नआ खड़ी हो ऐसी चिन्ता करना अकस्मातभय है। संसारमें ऐसे येसात मय है ॥ ४६ ॥

इस भवका भय निवारणका उपाय (छप्पय )

नख सिख सित परवांन, ग्यान अवगाह निरकक्‍्खत ।
आतम अंग अभंग संग, पर धन इम अक्खत ॥।
छिनभंगुर संसार-विभव, परिवार-भार जसु।
जहां उतपति तहां प्रलय, जासु संजोग विरह तसु ।।
परिगह प्रपंच परगट परखि,
इहभव भय उपज न चित ।
ग्यानी निसंक निकलंक निज,
ग्यानरूप निरखंत नित ॥ ४५० ॥

शब्दार्थ - नव सिख मित>परसे सिरकी चोटी तक । अवगाह> व्याप्त ।निरक्खत>देखता है। अक्खत-जानता है । विभव-घन, सम्पत्ति । प्रलय-नाश । प्रपच> जाल । परखि>देखकर ।

अर्थ :- आत्मा सिरसे पर तक शानमयों है, नित्य है, शरीर आदि

क्षेत्र, वास्तु, चादी, सुवर्ण, धन, धान्य, दासी, दास कुप्प और भाड । लोक: शाश्वत एक एब सकलबव्यक्तो विविक्तात्मन- खिललोक॑स्वयमेव केवलसयं य॑ लोकयत्येकक: । लोकोष्य न _तवापरस्तदपरस्तस्थास्ति तद्धीः कुतो निःशद्भू: सतत स्वयं स सहज श्ञार्द सदा विन्वति ॥ २३ ॥। परपदार्थ हैं,संसारका सब बेमब ओर कुदुश्बियोंका समागम क्षणभंगुर है। जिसकी उत्पत्ति हैउसका नाश है। जिसका संयोग है उसका बियोग है, और परिग्रह-समृह जंजालके समान है। इस प्रकार चितवन करनेसे चित्तमें इस मवका मय नहीं उपजता । ज्ञानो लोग अपने आत्माकों सदा निष्कलंक और ज्ञानरूप देखते हैंइससे नि:शंक रहते हैं ॥ ५० ॥

परभवका भय निवारण करनेका उपाय (छप्पय)

ग्यानचक्र सम लोक, जासु अवलोक मोख-सुख ।
इतर लोक मम नाहि, नाहि जिसमाहि दोख दुख ।।
पुश्न सुगतिदातार, पाप दुरगति पद-दायक ।
दोऊ खंडित खानि, में अखंडित सिवनायक ।॥॥
इह॒विधि विचार परलोक-भय,
नहिं व्यापत वरते सुखित ।
ग्यानी निसंक निकलंक निज,
ग्यानरूप निरखंत नित ॥ ५१॥

शब्दार्थ :- जासु-जिसे । इतरतबूसरा । खंडित>नाशवान । अखडित-अविनाशी । सिवनायक>मोक्षका राजा ।

अर्थ :- ज्ञानका पिण्ड आत्मा हो हमारा लोक है, जिसमें मोक्षका सुख मिलता है। जिसमें दोष और दुःख हैं ऐसे स्वर्ग आदि अन्य लोक मेरे नहों हैं ! नहीं है !! सुगतिका दाता पुण्य और दुखदायक दुर्गतिपदका दाता पाप है, सो दोनों होनाशवान हैऔर मै अविनाशी हैं- मोक्षपुरीका बादशाह हू । ऐसा विचार करनेसे परलोकका भय नहीं सताता । ज्ञानी मनुष्य अपने आत्माकों सदा निष्कलंक ओर ज्ञानरूप देखते हैंइससे निःशंक रहते हैं ॥ ५१ ॥

मरणका भय निवारण करनेका उपाय (छप्पय )

फरस जीभ नासिका, नेन अरु श्रवन अच्छ इति ।
मन बच तन बल तीन, स्वास उस्वास आउ-थिति
ये दस प्रान-विनास, ताहि जग मरन कहिज्जइ ।
ग्यान-प्रान संजुगत, जोब तिहुं काल न छिज्जइ ।।
यह चित करत नहि मरन भय,
नय-प्रवांन जिनवरकथित ।
ग्यानी निर्संके निकलंक निज,
ग्यानरूप निरखंत नित ॥ ५२ ॥!

शब्दार्थ :- फरस-स्पर्श ।नासिकाजनाक । नैननेत्र । श्रवत-कान । अच्छ (अक्ष )-इन्द्रिय ।संजुगत-सहित । कथित-कहा हुआ ।

अर्थ :- स्पर्श, जीम, नाक, नेत्र और कान ये पाँच इन्द्रियाँ; मन, बचन, काय ये तीन बल; श्यासोच्छूवास और आयु इन दस प्राणोंके वियोगको लोकमें लोग मरण कहते हैं; परन्तु आत्मा ज्ञानत्राणसंयुक्त हेवह तीनकालसें कभी भी नाश होनेवाला नहीं है । इस प्रकार जिनराजका कहा हुआ नय - प्रमाणसहित तत्त्वस्वरूप जितवन करनेसे मरणका भय नहों उपजता । ज्ञानी मनुष्य अपने आत्माकों सदा निष्कलंक ओर ज्ञानरूप देखते हैंइससे नि:शंक रहते है ॥ ५२ ॥

वेदनाका भय निवारण करनेका उपाय (छप्पय )

वेदनवारों जोव, जाहि वेदत सोऊ जिय ।
यह बेदना अभंग, सु तो मम अंग नांहि बिय ।।
प्राणोक्ष्छेदमुदाहुरन्ति मरणं प्राणा: किलास्यथात्मनों
ज्ञान तत्स्वयमेव शाश्वततया नोच्छिद्यते जातुचित्‌ ।
तस्यातो मरणं न किझचन भवेत्त:द्री: कुतो ज्ञानिनो
निःशड्भू: सततं स्वयं स सहज ज्ञान सदा विन्दति ॥ २४॥।
एपकंव हि बेदना यदचरल ज्ञान स्वयं बेचते
निर्भेदोदितवेद्येदकबलादेक॑ सदा5नाकुले: ।
नेवान्यागतवेदनंव हि भवेत्त:द्ी: कुतो ज्ञानिनो
निःशड्ुः सत्ततं स्वयं स सहज ज्ञानं सदा विन्दति ॥ २५॥
करम वेदना दुविध, एक सुखमय दुतोय दुख ।
दोऊ मोह विकार, पुग्गलाकार बहिरमुख ।।
जब यह बिवेक मनर्माह धरत,
तब न वेदनाभय विदित ।
ग्यानी निसंक निकलंक निज,
ग्यानरूप निरखंत नित ॥ ५३ ॥

शब्दार्थ :- वेदनवारौ5जाननेवाला । जाहि-जिसे । अभंग>अखड । बिय>व्यापता । बहिरमुख बाह्य ।

अर्थ :- जीव ज्ञानी हैऔर ज्ञान जोवका अभंग अंग है, मेरे ज्ञानरूप अंगमें जड़ कर्मोंकी वेदनाका प्रवेश ही नहीं होसकता । दोनों प्रकारका सुलबुखरूप कमं-अनुमव मोहका विकार है, पौद्गलिक है और आत्मासे बाह्य है। इस प्रकारका विवेक जब मनमें आता है तब वेदना-जनित भय बिदित नहों होता । ज्ञानो पुरुष अपने आत्माको सदा निष्कलंक और ज्ञान- रूप देखते हैंइससे नि:शंक रहते हैं॥ ५३ ॥

अनरक्षाका भय निवारण करनेका उपाय (छप्पय)

जो स्ववस्तु सत्तासरूप जगमहिं त्रिकालगत ।
तासु विनास न होइ, सहज निहच प्रवांन मत ।॥।
सो मस आतम दरब, सरवथा नहिं सहाय धर।
तिहि कारन रच्छुक न होइ, भच्छुक न कोह पर ॥॥
यत्सन्नाशमुपेति तन्न नियत व्यक्तति वस्तुस्थिति-
शनि सत्स्वयमेव तत्किल ततस्त्रातं किमस्थापरे: ।
अस्थाज्नाणमतो न किज्चन भवेत्तद्भो: कुतो शानिनो
निःशडुः: सतत स्वयं स सहज ज्ञान सदा विन्दति ॥ २६ ॥
निज
रा द्वार १६५
जब इहि प्रकार निरधार किय,
तब अनरच्छा-भय नसित ।
रानी सनिसंक लिकलंक निज,
ग्यानरूप निरखंत नित ॥ ५४ ॥
शब्दार्थ .- स्ववस्तु-आत्मपदार्थ। तासुउउसका । रच्छुक (रक्षक)
बचानेवाला । भच्छुक >नाश करनेवाला । निरधार-“निश्चय ।

अर्थ :- सत्स्वकूप आत्मवस्तु जगतमें सदा निल्य है, उसका कभी ताश नहों हो सकता, यह बात निश्चयनयसे निश्चित है। सो सेरा आत्म- पदार्थ कभी किसीकी सहायताकी अपेक्षा नहीं रखता, इससे आत्माका न कोई रक्षक है न कोई सक्षक है। इस प्रकार जब निश्चय हो जाता हैतब अनरक्षा-मयका अभाव हो जाता है। ज्ञानी लोग अपने आत्माकों सदा निष्कलंकओर अज्ञानरूप देखते हैंइससे निःशंक रहते हैं ॥ ५४ ॥! चोर भय निवारण करनेका उपाय (छुप्पय ) परम रूप परतच्छ, जासु लच्छन चिन्मंडित । पर प्रवेस तहां नाहि, माहि महि अगम अखंडित ॥। सो मम रूप अनूप, अकृत अनसित अटूट धन । ताहि चोर किम गहे, ठोर नहिं लहै ओर जन ।। चितवंत एस धरि ध्यान जब, तब अगुप्त भय उपसमित । ग्यानी निसंक निकलंक निज, ग्यानरप निरखंत नित ॥ ५५ ॥।

स्थं रूप॑ किल वस्तुनोपस्ति परमा गुप्तिः स्वरूऐे नयत्‌
शर्त: कोषषि पर: प्रबेधष्टमकृत शान स्वरुप उइनु:।
अस्यथाधुप्सिरतो न काक्षम भवेसद्भी: कुतो शासिनो
निःशऊूः सतत स्वयंस सहज ज्ञात सदा बिन्दरति

शब्दार्थ :- परतण्छ ( प्रत्यक्ष ) 5साक्षात्‌ । प्रवेस 5 पहुँच । महिष्प्रृथ्वी । अकृत-स्वयंसिद्ध । अनमितज"्अपार । अटूटज्अक्षय ! ठौर>स्बान । अगुप्त>बोर । उपसमित-नहीं रहता, हट जाता है ।

अर्थ :- आत्मा साक्षात्‌ परमात्मारूप है, ज्ञानलक्षणसे विभूषित है, उसको अगम्ध” ओर नित्य भूमिपर परद्रव्यका प्रवेश नहीं है । इससे मेरा धन अनुपम, स्वयंसिद्ध, अपरंपार और अक्षय है, उसे चोर कंसे ले सकता है ? दूसरे मनुध्यके पहुंचनेको उसमें स्थान ही नहों है। जब ऐसा चितबन किया जाता हैतब अगुप्त-मय नहों रहता । ज्ञानी लोग अपने आत्माकों सदा निष्कलंक ओर ज्ञानरूप देखते हेइससे निःशंक रहते हैं ॥ ५५ ॥

जकस्मात भय निवारण करनेका उपाय (छप्पय )

सुद्ध बुद्ध अविरुद्ध, सहज सुसमृद्ध सिद्ध सम।
अलख अनावि अनंत, अतुल अविचल सरूप सम ॥।
चिदविलास परगास, वोत-घिकलप सुखथानक ।
जहां दुविधा नहिं कोइ, होइ तहां कछु न अचानक ।।
जब यह॒विचार उपजंत तब,
अकस्मात भय नहिं उदित ।
ग्यानी निसंक निकलंक निज,
ग्यानरूप निरखंत नित॥ ५६ ॥
) इन्द्रिय मौर मतके अगोचर ।
एक शानमनाझनन्तमचल सिद्ध किलेसत्स्वतो
यावत्तावदिदय॑ सेव हि भर्वेज्नात्र द्वितीयोदयः।
तप्नाकस्मिकमत्र किड्चन भवेत्तड्गी: क॒तो ज्ञानिनो
निःशजू: सतत स्वयं स सहज जान सद। विन्वति ॥ २८ ॥

शब्दार्थ: - सुद्धकरमंकलंक रहित । बुद्ध-केवलज्ञानी । अविरुद्ध* वीतराग । समृद्धन्वेमवशाली । अलख>“अरूपी । अतुल”-उपमा रहित । वीत-विकलप -निविकल्प ।

अर्थ :- मेरा आत्मा शुद्ध ज्ञान तथा वीतरागभावमय हैऔर सिद्ध भगवानके समान समृद्धिशालोी है । मेरा स्वरूप अरूपी, अनादि, अनंत, अनुपम, नित्य, चेतन्यज्योंति, निविकल्प, आनंदकंद और निद्वंद्र हे। उसपर कोई आकस्सिक घटना नहों हो सकती, जब इस प्रकारका भाव उपजता हैतब अकस्मात-भय उदय नहों होता। शानोी सनुष्य अपने आत्माको सदा निष्कलंक ओर ज्ञानरूप देखते हैंइससे निःशंक रहते हैं ॥ ५६ ॥

सम्यग्ज्ञानी जीवोंको नमस्कार (छप्पय)

जो परगुन त्यागंत, सुद्ध निज गन गहंत धुव ।
बिमल ग्यान अंक्र, जासु घटमहिं प्रकास हुव ।।
जो पु्रबकृत कर्म, निरजरा-धार बहावबत।
जो नव बंध मिरोध, मोख-मारग-मुख धावत ।।
निःसंकतादि जस अष्ट गुन,
अष्ट कर्म अरि संहरत ।
सो पुरुष विचच्छुन तासु पद,
बानारसि बंदन करत ॥ ५७ ॥

शब्दार्थ :- धुव (ध्रुव )-नित्य । धार-प्रवाह । निरोधरोककर । मोख-मारग-मुख मोक्ष मा्गंकीओर । धावत८दौड़ते है। सहरत-नष्ट करते हैं ।

अर्थ :- जो परट्व्यसे आत्मबुद्धि छोड़कर निज-स्वरूपको ग्रहण करते है, जिनके हुंदयमें निर्मेल शानका अंकुर प्रगट हुआ है, जो निजंराके प्रवाहमें टजेरकीणंस्वरसनिचितज्ञानसबंस्वभाज: सम्यग्हष्टेयंदिहू सकल घ्नन्ति लक्ष्माण कम । तरस्यास्मिस्पुनरषि सनाश्कस्मंणों नास्ति अन्ध. पूर्वोपास॑ तवनुभवतो निश्चित निजरेव ॥ २६ ।। पूर्थकृत कर्मोंको बहा देते हैं,ओर नवोन कर्ंबंधका संवर करके मोक्षमार्गके सम्मुख हुए हैं, जिनके निःशंकितादि गुण अष्टकर्सरूप शन्रुओंको नष्ट करते हैं, थेसम्यग्शानी पुरुष हैं। उन्हें पं> बनारसोदासजी नमस्कार करते हैं॥ ५७ ॥

सम्यग्दर्शनके आठ अंगोके नाम (सोरठा)

प्रथम निसंसे जानि, वुतिय अवंछित परिनमन ।
तृतिय अंग अगिलानि, निर्मल दिष्टि चतुर्थे गुन ॥ ५८ ॥
पंच अकथ परदोष, थिरीकरन छट्टम सहज ।
सत्तम वच्छुल पोष, अष्टम अंग प्रभावना ॥ ५६ ॥

शब्दार्थ :- निसंसे (नि.सशय)>नि:शंकित । अवदित>वाबछा- रहित, निः:काक्षित । अगिलानिन्ग्लानि रहित, निविचिकित्सित । निर्मल दिष्टिव्यथार्थ विवेक, अमूढ़हष्टि ।अकथ परदोष–दूस रोके दोष नहीं कहना, उपगूहन । थिरीकरन-स्थिर करना, स्थितिकरण । वत्सल-वात्सल्य, प्रेम ।

अर्थ :- नि शंकित, निःकांक्षित, निविचिकित्सित, अमदृदृष्टि, उपगुृहन, स्थितिकरण, बात्सल्थ और प्रमावना-ये सम्यग्व्शनके आठ अंग हैं।॥। ५८-५६ ॥॥।

पम्यक्त्वके आठ अंगोंका स्वरूप (सवेया इकतीसा )

धममें न संसे सुभकर्म फलंकी न इच्छा,
असुभको देखि न गिलानि आने खितमें ।
सांचो विष्टि राखे काहू प्रानोको न दोष भाखे,
चंचलता भानि थिति ठाने बोध वितमें ।।
प्यार निज रूपसों उछाहकी तरंग उठे,
एई आठों अंग जब जागे समकितमें ।
ताहि समकितकों धर सो समकितबंत,
वहे मोख पावे जो न आबे फिर इतमें ॥ ६० ॥
निजरा हार १६६

शब्दार्थ :- संसे (संशय )>सन्देह । भानि>नष्ट करके । थिति ठानै> स्थिर करे। बोध वितमैं-रत्नत्रयमें । तरंगनलहर । उछाह>-उत्साह । इतमैंल्‍्यहाँ (संसारमें) ।

अर्थ :- स्वरुपमें सन्देह नहीं करमा नि:शंकित अंग है, शुभ क्रिया करके उसके फलकी अभिलाषा नहों करना निःकांक्षित अंग है, दुखदायक पदार्थ देखकर ग्लानि नहीं करना निर्विचिकित्सा अंग है, सूर्खता त्यागकर तस्वका यथार्थ निर्णय करना अमृढहृष्टि अग है, दूसरोंके बोष प्रगट नहीं करना उपगृहन अंग है, चित्तको चंचलता हटाकर रत्नत्रयमें स्थिर होना स्थितिकरण अंग है, आत्मस्वरूपमें अनुराग रखना वात्सल्म अंग है, आत्म- उन्नतिके लिये उत्साहित रहना प्रभावना अड्भ है, इन आठ अडद्धोंका प्रगट होना सम्पकत्व है, उस सम्पकत्वको जो धारण करता है वह सम्यग्हृष्टि है, सम्यग्हृष्टि हो मोक्ष पाता हैऔर फिर इस संसारमें नहीं आता । विशेष :- जिस प्रकार शरीरके आठ अज्भू" होते हैं ओर थे अपने अंगी अर्थात्‌ शरीरसे पृथक नहीं होते और न शरीर उन अंगोंसे पृथक होता है। उसी प्रकार सम्यग्दशंनके निःशंकित आदि आठ अड् होते हैं ओर वे अपने अंगी अर्थात्‌ सम्यग्दर्शनसे प्रथक नहीं होते और न सम्यग्द्शंन अष्ट अंगोंसे निराला होता है-आठों अंगोंका समुदाय ही सम्यग्दर्शन है ॥ ६० ॥

चेतन्यनटका नाटक (सवेया इकतीसा)

पूर्व बंध नासे सो तो संगीत कला प्रकास,
नव॒ बंध रुधि ताल तोरत उछरिकं।
निसंकित आदि अष्ट अंग संग सखा जोरि,
समता अलाप चारो करे सुर भरिक ॥।
१), प्िर नितब उर पीठ कर, जुगल जुगल पद टेक ।
आठ प्रग ये तन विर्ध, और उपग अनेक ॥
दस्धन्‌ बन्यं नवसिति निजेः सद्भतोष़ष्टामिरजु :
प्राग्य्ध तु क्षयमुपनयन्‌ निजरोज्जम्भलेन ।
सम्यग्हष्टि… स्वयमभ्तिरसादा विमध्यान्तमुक्त’
ज्ञान भृत्वा नटति गगमाभोगरद्भ विगाह्या ॥३०॥।
इति निर्ज्जरा निष्कान्ता ॥ ७ ॥
निरजरा नाद गाज ध्यान मिरदंग बाजे,
छकक्‍यो महानंदमेँ समाधि रीकि करिके।
सत्ता रंगमूमिमें मुकत भयो तिहूं काल,
नाच सुद्धविष्टि नट ग्यान स्वांग धरिक ॥ ६१ ॥

शब्दार्थ :- संगीत - गायन । सखा > साथी । नादरूघ्वनि । छकक्‍्यौ लीन हुआ । महानंद>बडा हष । रंगभूमि>नाटथशाला ’

अर्थ :- सम्यग्टूष्टि रूपी नट, ज्ञानका स्वांग बनाकर सत्तारूप रड्- भूमिपर मोक्ष होनेके लिये सदा नृत्य करता है; पूवंबन्धका नाश उसको गायन विद्या है, नवीन बन्धका संवर मानों उसका ताल तोड़ना है,निःशंकित आदि आठ अड् उसके सहचारी हैं,समताका अलाप स्वरोंका उच्चारण है, निर्जराको ध्वनि हो रहो है, ध्यानका मुदंग बजता है, समाधिरूप गायनमें लोन होकर बड़े आनन्दमें मस्त है ॥६१॥। सातवें अधिकारका सार संसारी जीव अनादि कालसे अपने स्वरूपको भूले हुए है, इसकारण प्रथम तो उन्हें आत्महित करनेको मावना ही नहीं होती, यदि कभी इस विषयमें उद्योग भी करते हैं तो सत्यमार्ग नहीं मिलनेसे बहुधा व्यवहा रमें लोन होकर संसारको ही बढ़ाते हैंऔर अनन्त कर्मोका बन्ध करते हैं,परन्तु सम्यग्ज्ञानकी खूटीका सहारा मिलने पर गृहस्थ-सार्ग और परिप्रह-संग्रहको उपाधि रहनेपर भी जीव संसारकी चकक्‍कीमें नहीं पिसता ओर बूसरोंको जगज्जालसे छूटनेका रास्ता बतलाता है। इसलिये सुक्तिका उपाय ज्ञान है, बाह्य आडंबर नहीं । ओर ज्ञानके बिना सम्पूर्ण क्रिया बोका ही है, कर्मका बन्ध अज्ञानको दशामें ही होता है। जिस प्रकार कि रेशमका कीड़ा अपने आप हो अपने ऊपर जाल पूरता हैउसो प्रकार अज्ञानी अपने आप ही शरीर आदिसे अहंदृद्धि करके अपने ऊपर अनन्त कर्मोंका बन्ध करते हैं, पर ज्ञानी लोग सम्पत्तिमें हुई नहीं करते, विपत्तिमें विधाद नहों करते, सम्पत्ति और विपत्तिको कर्मजनित जानते हैंइसलिये उन्हें संसारमें नकोई पदार्थ सम्पत्ति है न कोई पदार्थ विपत्ति है, वे तो ज्ञान-बे राग्यमेंमस्त रहते हैं । उनके लिये संसारमें अपने आत्माके सिवाय और कोईभो पदार्थ ऐसा नहों हैजिससे वे राग करें और न संधारमें कोई ऐसा पदार्थ हैजिससे वे हंष करें ।उनको क्रिया फलको इच्छा रहित होती है इससे उन्हें कमंबन्ध नहों होता, क्षण-क्षणपर असंख्यातगुणो निर्जेरा होतो है। उन्हें शुम-अशुभ, इष्ट-अनिष्ट दोनों एकसे हैंअथवा संसारमें उन्हें कोई पदार्थ न तो इष्ट है, न अनिष्ट है। फिर राग-हेष़ किससे करेंगे ? किससे संयोग-वियोगमें लाभ-हानि गिनेंगे ?इससे विवेकवान जीव लोगोंके देखनेमें धनी हों चाहे निर्धन हों वेतो आनन्दहोमें रहते हैं। जब उन्होंने पदार्भका स्वरूप समझ लिया और अपने आत्माको नित्य और निराबाध जान लिया तो उनके चित्तमें सप्त प्रकारका भय नहीं उपजता और उनका अष्टांग सम्यग्द्शंन निर्मेल होता है जिससे अनन्त कर्मोंकी निजरा होती है । ( राग सारग ) दुविधा कब जेहै या सन कोी॥। कब निजनाथ निरंजन सुमिरों, तज सेवा जन-जन की ।। दुविधा ०।११।॥। कब रुचि साँ पीवे हग चातक, बृद अखयपद घन की। कब सुभ ध्यान धरों समता गहि, करू न ममता तन की ।।दुविधा०॥ २ ॥ कब घट अन्तर रहे निरन्तर, दिढता सुगुरु-वचन की । कब सुख लहाँ भेद परमारथ, मिटे घारना धन की ।।दुविधा०॥ ३ ॥ कब घर छाँडि होहें एकाको, लिये लालसा वन की। ऐसी दशा होय कब मेरी, होंबलि बलि वा छन की ।।दुविधा ०॥ ४ ॥

बंध द्वार (८)

प्रतिज्ञा (दोहा )

कही निरजराकी कथा, सिवषथ साधनहार ।
अब कछु बंध प्रबंधको, कहूं अलप विस्तार ॥ १॥।
शबदार्थ :- सिवपथ मोक्षमार्ग ।अलपन्‍्थोडा ।

अर्थ -मोक्षमार्ग सिद्ध करनेवाले निर्जरा तत््वका कथन किया, अब बन्धका व्याख्यान कुछ विस्तार करके कहता हूँ ॥ १ ॥

मगलाचरण (स्वेया इकतीसा )

मोह मद पाइ जिनि संसारी विकल कोने,
याहोते अजानुबाहु बिरद बिहतु हे।
ऐसो बंध-बीर विकराल महा जाल सम,
ग्यान मंद कर चंद राहु ज्यों गहतु है ।॥।
ताकौ बल भंजिवेकों घटमे प्रगट भयौ,
उद्धरा उदार जाको उद्दिम भमहतु है।
सो है समकित सूर आनंद-अंक्र ताहि,
निरखि बनारसी नमो नसों कहतु है ॥ २ ॥

शब्दार्थ :- पाइ>पिलाकर । विकललूदु खी । बिरद>नामवरी । अजानुबाहु (आजानुबाहु )>घुटने तक जिसकी लम्बी भुजाये है। भजिवेकौ- नष्ट करनेके लिये । उद्धतन्बलवान। उदार>महान् । नमो नमो (नमः नमः )नमस्कार नमस्कार ! रागोद्गारमहारसेन सकल॑ क॒त्वा प्रमत्त॑ जगतु क्रोडन्त रसभावनिभभरमहानाञ्य न बन्धं धुनतु । आनस्दामृतनित्यभोजि सहजावस्थां स्फुटझलाटयद घोरोवाश्सनाकुल॑ निरफचिशा् समुम्मज्जति ॥ १ ॥। बंध हार १्७३ अथे :- जिसने मोहकी शराब पिलाकर संसारी जीवोंको व्याकुल कर डाला है, जिसकी घुटनेतक लम्बो भुजायें हैं ऐसो संसारमें प्रसिद्धि है, जो महाजालके समान है, और जो ज्ञानरूपी चन्द्रमाको प्रभारहित करनेके लिये राहुके सहश है । ऐसे बन्धरूप भयंकर योद्धाका बल तष्ट करनेके लिये जो हृदयमें उत्पन्न हुआ है; जो बहुत बलवान महान् और पुरुषार्थो है; ऐसे आनन्दमय सम्यक्त्वरूपी योद्धाको पंडित बनारसीदासजी बार बार नभस्कार करते हैं ॥ २ ॥

ज्ञानचेतना और कर्मचेतना का वर्णन (सर्वया इकतीसा)

जहां परमातम कलाकों परकास तहां,
धरम धराम सत्य स्रजकोी धृप है।
जहां सुभ अयुभ करमको गढ़ास तहां,
मोहके बिलासम॑ महा अंधेर कप है।।
फंली फिरें घटासी छटासी घन-घटा बीचि,
चेतनकी चेतना दृहंधा गुपच्रष है।
बुद्धिसों नगही जाइ बेनसों न कही जाइ,
पानीकी तरंग जंसे पानीमें गुड्ूप है ॥ ३॥।

शब्दार्थ :- धरा ८ भूमि । गढास 5 सघनता । छाटा 5 बिजली । घनन्मेघ । दुह्धानदोनों ओर, दोनों अवस्थाओमे । बेनल्वचन । गुड़प >डूबी ।

अर्थ :- जहाँ आत्मासें ज्ञानको ज्योति प्रकाशित है वहाँ धर्मरूषी धघरतीपर सत्यरूप सुययंका उजाला हैऔर जहां शुभ-अशुभ करननोंकी सघनता हैवहाँ मोहके फंलावका घोर अंधकारमय कुआ हो है। इस प्रकार जीवको चेतना वोनो अवस्थाओंमें गुपचुप होकर शरीररूपी मेघ-घटामें बिजलीके समान फंल रहो है। वह बद्धिग्राह्म नहों है और न वचनगोचर है, बह तो पानोकी तरंगके समान पानीहीमें गर्क हो जातो हैअर्थात्‌ समा जाती है॥ ३ ॥

कमेबंधका कारण अशुद्ध उपयोग है (सवेया इकतीसा )

कर्मजाल-वर्गनासों जगमें न बंधे जीव,
बंधे न कदापि मन-वच-काय-जोगसों ।
चेतन अचेतनकी हिसासों व॑ बंधे जीव,
बंधे न अलख पंच-विषे-विष-रोगसों ।।
करमंसों अबंध सिद्ध जोगसों अशब्ंध जिन,
हिसासौ अबंध साधु ग्याता विषे-भोगस्ों ।
इत्यादिक वस्तुके मिलापसों न बंधे जीव,
बंधे एक रागादि असुद्ध उपयोगसों ॥ ४ ॥

शब्दार्थ :- वर्गना>कर्मपरमाणुओंके समूहकों वर्गणा कहते हैं । कदापि>कभी भी ।अलख"आत्मा । पच-विषै-पॉंच इन्द्रियोंके विधय-भोग । असुद्ध उपयोग>जीवकी शुभाशुभ परिणति ।

अर्थ :- जीवको बंधके कारण न तो कार्माण बर्गणाएँ हैं, न मन- वचन-कायके योग हैं, न चेतन-अचेतनकी हिंसा है, ओर न इन्द्रियोंके बिषय हैं, केवल राग आदि अशुद्ध उपयोग बंधका कारण है। क्योंकि कार्माण बर्गंणाओंके रहते हुए भी सिद्ध मगवान अबंध रहते हैं, योग* होते हुए भी अरहंत मगवान अबंध रहते हैं,हिसा’* हो जाने पर भी सुनि महाराज अबंध हैऔर पंचेन्द्रियोंके भोग भोगते हुए भी सम्यग्हष्टि जीव अबंध रहते हैं। १. मनोयोग दो - सत मनोयोग, अनुभय मनोयोग । बचनमोग दो - सत वचनयोग, अनुभय वचनयोग । काययोग तीन - औदारिक काययोग, आ्लैदारिक सिश्र काय- योग और कार्माण काययोग - ऐसे सात योग सयोगी जिनराजके होते हैं । २. तरस स्थावर हिंसाके त्यागी महात्रत्ती मुनि ई्या समिति पूर्वक विहार करते हैंऔर अकस्मात कोई जीव उनके पाँवके नीचे आ पड़े तथा मर जावे तो प्रमत्तयोग नहीं होनेसे उन्हे हिसाका बध नहीं होता । न कर्मबहुल॑ जगन्न चलनात्मक॑ कम्म वा से नेककरणानि बान चिद्चिद्रधो बन्धकतु । यर्देक्यमुपयोगमु: ससुपयाति. रागादिभिः स॒ एवं किल केवल भवति बन्‍्धहेतुन्‌णाम्‌ ॥ २॥।

बंध हार श्७प्‌

भावार्थ :- कार्माण वर्गणा, योग, हिसा, इन्द्रिय-विषयभोग ये बंधके कारण कहे जाते हैं, परन्तु सिद्धालयमें अनंतानंत कार्माण पुद्गलबर्गंणाएँ भरी हुई.हैं, वेरागादिके बिना सिद्ध भगवानसे नहीं बेंध जातीं; सेरहवें गुशस्थानबतों अरहंत मगवानकों सन-बचन-कायके योग रहते हैं परन्तु राग-हेंष आदि नहों होते इससे उन्हें कर्मंबंध नहीं होता; महाव्रती साधुओंसे अबुद्धिपुर्वक हिसा हुआ करतो हैपरन्तु राग-द्ेष नहीं होनेसे उन्हें बंध नहीं है, अव्तसम्यग्टष्टि जीव पचेन्द्रयोंके विषय मोगते हैं पर तललोनता न होनेसे उन्हें निर्जेरा ही होतो है। इससे स्पष्ट है कि कार्माण बगंणाएँ, योग, हिसा और सांसारिक विषय बंधके कारण नहीं हैं; केवल अशुद्ध उपयोगहीसे बंध होता है । ४ ॥॥

पुन: (सबेया इकतीसा )

कर्मजाल-वर्गनाकौ वास लोकाकासमांहि,
मन-वच-कायकौ निवास गति आउमें।
चेतन अचेतनकी हिंसा बसे पुग्गलमें,
विषभोग वरत॑ उदेके उरभाउमें ॥।
रागादिक सुद्धता असुद्धता हैअलखको,
यहै उपादान हेतु बंधके बढ़ाउमें ।
याहीते विचच्छुन अबंध कह्मों तिहूं काल,
राग दोष मोह नाहीं सम्यक् सुभाउसे ॥ ५ ॥

शब्दार्थ :- लोकाकास-जितने आकाशमें जीव, पुदूगल, धर्म, अधर्म और काल ये पाँच द्रव्य पाये जाँय । उपादान हेतु-जो स्वयं कार्यको करे। विचच्छत-सम्यग्हृष्टि ।तिहूं काल-भूत, भविष्यत्‌, वर्तमान । लोक: कर्म ततोष5स्तु सोउस्तु लू परिस्पन्वात्मकं कर्म तत्‌ तान्यस्मिन्करणानि सनन्‍्तु चिदर्चिद्व्यापादन चास्तु तसतू । रागादोनुफ्योगभुसिसनयन ज्ञान भवेत्‌ केवल बन्ध नव कुतोष्प्युपत्ययमहो सम्यग्हगात्मा छुबस्‌ ॥। ३१

अर्थ :- कार्माण वर्गणाएँ लोकाकाशमें रहतो हैं, मन-वच न-कायके मोगोंको स्थिति गति और आयु) रहतो है, चेतन-अचेतनकी हिलसाका अस्तित्व पुद्गलमें है, हन्द्रियोंके विषय-मोग उदयको प्रेरणासे होते हैं; इससे बर्गणा, योग, हिसा और मोग इन चारोंका सड्भाव पुद्यलसत्तापर है-आत्म - सत्तापर नहीं है, अतः ये जोवको कमंबंधके कारण नहों हैं और राय-देष- मोह जीवके स्वरूपको भुला वेते हैंइससे बंधकी परम्परामें अशुद्ध उपयोग हो अंतरंग कारण है। सम्यकत्वभावमें राग-देष-मोह नहीं होते इससे सम्य- र्ञानीकों सदा बंध रहित कहा है ॥ ५ ॥

यद्यपि ज्ञानी अबन्ध हैंतो भी पुरुषार्थ करते है (सवेया इकतीसा )

कर्मजाल-जोग हिंसा-भोग्सों न बंधे पे,
तथापि ग्याता उहिमी बखान्यो जिनबेनमे ।
ग्यानदिष्टि देत विषे-भोगनिसों हेत दोऊक-
क्रिया एक खेत यों तो बने नांहि जेनसे ।॥
उद्द-बल उदहिम गहे पे फलकों न चहे,
निरदे दसा न होह हिरदेके नेनमे।
आलस निरुहिमकी मुमिका मिथ्यात मांहि,
जहां न संभारे जीव मोह नोंद सेनमें ॥ ६ ॥

शब्दार्थ :- उहिमी-पुरुषार्थी ।बखान्यौ-कहा ।बेनस-वचन । निरदे- कठोर । न सँभारे (न सम्हाले )>असावधान रहे । सेन (शयन )ूनिद्रा ।

अर्थ :- स्वरूपको सम्हाल और भोगोंका अनुराग ये दोनों बातें एक साथ ही जनधमंमें नहीं होसकतों, इससे यद्यपि सम्यरज्ञानी वर्गणा, योग, हिंसा और भोगोंसे अबंध हैंतो भो उन्हेंपुरुषार्थ करनेके लिये जिनराजकी आज्ञा है। तथापि ने निरगल चरितुसिष्यते ज्ञानिनां तदायतनसेबव सा किल निरगला व्यावृति:। अकामक्त्कर्म तनन्‍्मतसकारणं. .तज्ञानिनां हय न हि विरुद्ध्यते किमु करोति जानाति च ॥ ४ ॥ बंध हुरर १७७ वे शक्ति अनुसार पुरुषार्थ करते हैं परफलकी अभिलाबा नहीं करते और हुदयमें सदा दयाभाव रखते हैं, निर्देय नहीं होते । प्रमाद और पुरुषा्थे- हीनता तो मिथ्यात्ववशा में होतो हैजहाँ जीव मोहनिद्रासे अचेत रहता है, सम्यक्‍त्वसावमें पुरुषार्थहीनता नहीं है ॥ ६ ॥

उदय की प्रबलता (दोहा)

जब जाको जेसो उद्द, तब सोहे तिहे थान ।
सकति भरोरे जीवकीं, उ्दं महा बलवान ॥ ७ ॥।
शरदार्थ :-जाकौ > जिसका । थान 5८ स्थान। उदे ( उदय ) ८
कमेविपाक ।

अर्थ :- जब जिस जोवका जैसा उदय होता हैतब वह जीव उसी माफिक बतेता है। कमंका उदय बहुत हो प्रबल होता है बह जीवको शक्तियोंको कुचल डालता हैऔर उसे अपने उदय के अनुकूल परिणमाता है ॥ ७ ॥

उदयकी प्रबलतापर हृ्टान्त (सवैया इकतीसा)

जेसे गजराज परपौ कर्दमक कुडबीच,
उहिम अहूट पे न छूटे दुख-दंदसों ।
जेस लोह-कंटककी कोरसों उरश्यों मोन,
ऐंचत असाता लहे साता लहे संदसों ॥।
जसे महाताप सिर वाहिसों गरास्थो नर,
तक निज काज उठि सके न सुछंदरसों ।
तेसे ग्यानवन्त सब जाने न बसाइ कछु,
बंध्यो फिरे प्रव करम-फल-फंदसों ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :-गजराज ८ हाथी । कर्दम – कीचड । कंटक 5 काँटा । कोर नोक । उरश्योजफेंसा हुआ । मीन-मछली । संद्सौं-छूटनेसे ।

अर्थ :- जिस प्रकार कीचड़के गड्ढ। में पड़ा हुआ हाथो अनेक चेष्टाएँ करने पर भी दु:खसे नहीं छूटता, जिस प्रकार लोह-कंटकमें फेसो हुई मछलो दुःख पाती है-निकल नहों सकती, जिस प्रकार तेज बुखार और मस्तक- शूलमें पड़ा हुआ सनुष्य अपना कार्य करने के लिए स्वाधीनतापूर्वक नहीं उठ सकता, उसी प्रकार सम्यग्ज्ञानी जीव जानते सब हैंपरन्तु पूर्वोषाजित कर्मोदयके फंदेसें फंसे होने से उनका कुछ वश नहीं चलता अर्थात्‌ ब्रत संय्भ आदि ग्रहण नहीं कर सकते ॥ ८ ॥

मोक्षमार्ग मे अज्ञानी जीव पुरुषार्थशीन और ज्ञानी पुरुषार्थी होते हैं (चौपाई )

जे जिय मोह नोंदमें सोबे ।
ते आलसी निरुद्दिम होवे ॥।
द्विष्टि खोलि जे जगे प्रबीना ।
तिनि आलस तजि उहिम कीना ॥ ६ ॥
शब्दा्थे:- निरुदिम-पुरुषाथथेहीन । प्रवीनाल्‍पडित ।

अर्थ :- जो जीव मिथ्यात्वकी निद्रामे सोते रहते हैं वे मोक्षमार्गमें प्रसादी वा पुरुषा्थहीन होते हैं और जो विद्वान् ज्ञाननेत्र उचाड़कर जाग्रत हुए हैंवे प्रभाद छोड़कर मोक्षमार्ग में पुरुषार्थ करते हैं।। € ।।

ज्ञानी और अज्ञानीकी परिणतिपर हृष्टान्त (सवेया इकतीसा )

काच बांध सिरसों सुमनि बांधे पाइनिसों,
जाने न गंवार कंसी मनि कंसो काच है ।
योही मृढ़ भूठमें मगन भूठहीकों दोरे,
भूंठी बात माने पेन जाने कहा साच है ॥।
सनिकों परखि जाने जोहरो जगत् मांहि,
साचकी समुक्ति ग्यान लोचनकी जाच है ।
जहांको जु वासो सो तो तहांकौ मरम जान॑,
जाको जंसो स्वांग ताकौ ताही रूप नाच है ॥ १० ॥

शब्दार्थ :- सिर-माथा । सुमनि-रत्न । पाइनिसौं>पै रोंम। ेंपरखि> परीक्षा । लोचन>नेत्र । स्वागजवेष । बंध हार १७६

अर्थ :- जिस प्रकार विवेकहीन मनुष्य मायथेसें काँच और पेरमें रत्न पहिनता है वह काँच और रत्नका मुल्य नहीं समझता, उसी प्रकार मिथ्यात्वी जीव अतस्वमें मग्न रहता हैऔर अतत्त्वहीकों प्रहण करता है, वह सत-असतको नहों जानता । संसारमें होराकी परोक्षा जोहरी हो जानते हैं, सांच-भूठकी पहिचान मात्र ज्ञानहृष्टिसे होती है। जो जिस अवस्था का रहनेवाला हैवह उसोको भलो जानता हैऔर जिसका जेसा स्वरूप है बह बसी हो परिणति करता है, अर्थात्‌ मिथ्यादहृष्टि जीव मिथ्यात्वहीको ग्राह्म समझता है और उसे भपनाता है तथा सम्यकक्‍त्वी सम्यक्त्वको ही ग्राह्म जानता है व उसे अपनाता है ।

भावार्थ :- जोहरी मणिकों परीक्षा करके लेता है और कॉँचको काँच जानकर उसको कदर नहीं करता, पर मूख लोग काँचको हीरा और होरा को काँच समभकर काँचकोी कदर और होराका अनादर करते हैं, उसी प्रकार सम्यकत्वी और भिध्यात्वोका हाल रहता है अर्थात्‌ मिथ्याहृष्टि जीव अतत्त्वहीको तत्त्वश्रद्धान करता है और सम्यक्‍त्वी जीव पदार्थका यथार्थ स्वरूप ग्रहण करता है ॥ १० ॥

जैसी क्रिया तेसा फल (दोहा)

बंध बढ़ाब अंध हूं, तेआलसी अजान ।
मुकति हेतु करनी करे, ते नर उहिसवान ॥ ११ ॥

शब्दार्थ : - अध-विवेकहीन । आलसी >प्रमादी । अजान (अज्ञान) जअज्ञानी । उदिमवान>पुरुषार्थी ।

अर्थ :- जो विवेकहीत होकर कर्मको बंध-परम्परा बढ़ाते हैंवे अज्ञानी तथा प्रमादी हैंऔर जो भोक्ष पानेका प्रयत्न करते हैंवे पुरुषार्थों हैं ॥ ११ ॥

जबतक ज्ञान हैतबतक वेराग्य है (सवेया इकतीसा)

जबलग जोब सुड्धवस्तुकों बिचारे ध्यावे,
तबलग भोगसों उदासी सरबंग है ।
जानाति यः स न॒करोति करोति यस्‍स्तु
जानात्यर्य न खलु तत्किल कमराग: ।
राग त्ववोधमयमध्यवसायमाहु-
मिथ्याद्श. स नियत स व बन्धहेतु: ॥ ५ ॥।
भोगमें मगन तब ग्यानकी जगन नांहि,
भोग-अभिलाषकी दसा मिथ्यात अंग है ।।
तातें विषे-भोगम मगन सो मिथ्याती जीव,
भोगसों उदास सो समकिती अभंग है ।
ऐसी जानि भोगसों उदास हू मुकति साध,
यहै मन चंग तो कठौती मांहि गंग है ॥ १२ ॥॥

शब्दार्थ - उदासी>विरक्ति । सरवंग>बिलकुल । जगन> उदय । अभिलापइच्छा । मुकति (मुक्ति)-मोक्ष । चग (चगा१) पवित्र । कठौती>काष्ठका एक बतेन (काठकी होौदी ) ।

अर्थ :-जब तक जीवका विचार शुद्ध वस्तुमें रमता हैतब तक वह भोगोंसे सर्वथा विरक्त रहता हैऔर जब भोगोंमें लीन होता हैतब ज्ञानका उदय नहीं रहता, क्योंकि भोगोंकी इच्छा अज्ञानका रूप है। इससे स्पष्ट है कि जो जीव भोगोंमें मरन होता हैवह्‌ मिथ्यात्वो हैऔर जो भोगोंसे विरक्त हैवह सम्यग्दृष्टि है। ऐसा जानकर भोगोंसे विरक्त होकर मोक्षका साधन करो ! यदि मन पवित्र हैतो कठोतीके जलमें नहाना हो गंगा-स्नानके समान है और यदि मन मिथ्यात्व, विषय-कषाय आदिसे मलोन है तो गंगा आदि करोड़ों तीर्थोके स्तानसे भी आत्मामें पविन्नता नहों आतो ॥ १२॥।

चार पुरुषार्थ (दोहा)

धरम अरथ अरु काम सिव, पुरुषारथ चतुरंग ।
कुधी कलपना गहि रहै, सुधी गहे सरवंग ॥ १३ ॥

शब्दार्थ :- पुरुषा रथ5उत्तम पदार्थ । चतुरग>चार । कुधी-मूर्ख । सुधी >ज्ञानी । सरवंगर (सर्वाग )>पूरा । 5 अर्थ :- धर्म, अथ, काम ओर सोक्ष ये पुरुषा्थंके चार अंग हैं। उन्हें दुबृद्ध जीवमनचाहे ग्रहण करते हैं और सम्यग्दुष्टि ज्ञानी जोब सम्पूर्ण- तया वास्तविक रुपसे अंगीकार करते हैं ॥ १३ ॥

$ यह शब्द पजाबी (गुरुमुली ) भाषा में प्रचलित है ।
शंध द्वार श्८१

चार पुरुषार्थोपर ज्ञानी और अज्ञानीका विचार (सवेया इकतीसा)

कुलको आचार ताहि सूरल धरम कहै,
पंडित धरम कहे वस्तुके सुभाउकों ।
लेहको खजानों ताहि अग्यानी अरथ कहै,
स्यानी कहै अरथ दरब-दरसाउकों ।।
दंपतिकौ भोग ताहि दुरबुद्धी काम कहे,
सुधी काम कहै अभिलाष चित चाउकों ।
इंद्रलोक थानकों अजान लोग कहें मोख,
सुधी मोख कहे एक बंधके अभाउकों ॥॥ १४ (॥

शब्दार्थ :- खेह 5 मिट्टी । दपति # पुरुप-स्त्री । दुरबुद्धि र मूर्ख । सुधी 5 ज्ञानी । इद्रलोक 5 स्वर्ग ।

अर्थ :- अज्ञानो लोग कुलपद्ध ति-स्नान चौका आदिको धर्म कहते है और पंडित लोग वस्तुस्वभावकों धर्म कहते है। अज्ञानो लोग भिट्टीके ढेर सोने-चांदी आदिको द्रव्य कहते हैं, परन्तु ज्ञानी लोग तत्त्व-अबलोकनको द्रव्य कहते हैं। अज्ञानी लोग पुरुष-स्त्रीके विषय-भोगकों काम कहते है, ज्ञानी आत्माकी निस्परहताकों काम कहते है । अज्ञानी स्वर्गलोकृको बेकुंठ (मोक्ष) कहते हैं पर ज्ञानी लोग कमंबन्धन नष्ट होनेकों सोक्ष कहते हैं ॥ १४ ॥

आत्माहीमें चारो पुरुषार्थ हैं (सवेया इकतीसा )

धरमको साधन जु वस्तुकौ सुभाउ साथे,
अरथकौ साधन विलेछ दर्व षटमें।
यहै काम-साधन जु संग्रह निरासपद,
सहज सरूप मोख सुद्धता प्रगटसें ।।
अंतरकी द्रिष्टिसाँ निरंतर बिलोक बुध,
धरम अरथ कास मोख निज घटमें।
साधन आराधनकी सौंज रहै जाके संग,
भूल्यौ फिरे मूर्ख मिथ्यातकी अलटमें ॥ १५ ॥

शब्दार्थ :- विलेछ- भिन्न-भिन्न ग्रहण करना। संग्रहै>ग्रहण करे । निरासपदरनिस्पृहता । सौंज-सामग्री । अलट> भ्रम ।

अर्थ :- वस्तुस्वभावका यथार्थ जानना अर्थ-पुरुषार्थगी सिद्धि करना है, छह द्रव्योंका भिन्न भिन्न जानना अथं-पुरुषार्थजी साधना है, निस्पृहुताका ग्रहण करना काम-पुरुषार्थथी सिद्धि करना हैऔर आत्मस्वरूपको शुद्धता प्रगट करना मोक्ष-पुरुषार्थकी सिद्धि करता है। ऐसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषा्थोको सम्यग्टृष्टि जीव अपने हृदयमें सदा अंतह ष्टिसे देखते हैं और मिथ्याहृष्टि जीव मिथ्यात्वके भ्रममें पड़कर चारों पुरुषार्थोंकी साधक और आराधक सामग्री पासमें रहते हुए भी उन्हें नहीं देखता और बाहर खोजता फिरता है ॥ १५ ॥

वस्तुका सत्य स्वरूप और मू्खंक्रा विचार (सवैया इकतीसा)

तिहू लोकमांहि तिहें काल सब जीवनिकौ,
पूरब. करम उढें आइ रस देतु है।
फोउ दीरघाउ धरे कोउ अलपाउ मर,
कोउ दुखी कोउ सुखी कोउ समचेतु है ।॥।
याहि मे जिवायो याहि सारो याहि सुखी करो,
याहि दुखी करो ऐसे मृढ़ मान लेतु है।
याही अहंबुद्धिसों न विनसे भरम मूल,
यहे मिथ्या धरम करम-बंध-हेतु है॥ १६ ॥
सर सदेव नियत भवति स्वकीय-
कर्सोदियान्मरणजी वितदुः:खसोख्यम्‌ ।
अज्ञानमेतविह यसु परः परस्प
कुर्यात्युणान्‌ मरणजोवितदुःलसोल्यम्‌ ॥ ६ ॥
बंध हार श्ष्रे

शब्दार्थ :- दीरघाउ (दीर्घायु) अधिक उम्र । अलपाउ (अल्पायु) >छोटी उम्र ।जिवायौ>जिलाया । मूढ़-मिथ्याहृष्टि । हेतु-कारण ।

अर्थ :- तीन लोक और तीनों कालमें जगतके सब जीवोंको पूर्व उपा्थित कर्म उदयमें आकर फल देता है जिससे कोई अधिक आयु पाते हैं कोई छोटी उम्रमें मरते हैं, कोई दुखी होते हैं, कोई सुखी होते हैऔर कोई साधारण स्थितिमें रहते हैं। इसपर मिथ्यात्वो ऐसा मानने लगता हैकि मैने इसे जिलाया है, इसे मारा, इसे सुखी किया, इसे दुखो किया है । इसी अहंबुद्धिसे अज्ञानका परदा नहों हटता और यही मिथ्याभाव हैजो ठमंबंधका कारण है ॥ १६ ॥

पुनः (सवेया इकतीसा )

जहांलों जगतके निवासी जीव जगतमें,
सब असहाइ कोऊ काहकौ न धनी है।
जेसी जैसी पुरब करम-सत्ता बांधी जिन,
तेसी उददेसें अवस्था आइ बनो है ।॥॥
एतेपरि जो कोउ कहै कि में जिवाऊं मारू,
इत्यादि अनेक विकलप बात घनी है।
सो तो अहंबुद्धिसों विकल भयो तिहूँ काल,
डोले निज आतम सकति तिन हनी है ॥ १७ ॥
शब्वार्थ :- असहाइ>निराधार । धनो-रक्षक । अवस्था-हालत ।
घनी>बहुतसी । विकलन्बेचेन । डोले>फिरता है। तिहूँ कालरसदेक ।
हनी #नष्ट की ।
अथे :- जब तक संसारी जीवोंका जन्म-मरणरूप संसार है तब तक
वे असहाय हैं- कोई किसोका रक्षक नहीं है। जिसने पूर्वकालमें जैसी
कममंसत्ता बाँधी है उदयमें उसको बंसोहों दशा हो जातो है । ऐसा होनेपर
अशानमेतवधिगम्य परात्परस्य
पश्यन्ति ये मरणजीवितदुः:लसौल्यम्‌ ।
कमण्यहंकृतिरसेन चिकीषंवस्ते
मिथ्याहशों मियतमात्महनों भवस्ति ॥ ७ ॥
भी जो कोई कहता हैकि में पालता हूं, मैमारता हूँइत्यादि अनेक प्रकारकी
कल्पनाएं करता है, सो वह इसो अहूंबुद्धिसे व्याकुल होकर सदा भटकता
फिरता हैओर अपनी आत्मशक्तिका घात करता है॥ १७ ॥

उत्तम, मध्यम, अधम और अधमाधम जीवोंका स्वभाव (सवेया इकतीस।)

उत्तम पुरुषकी दसा ज्यों किसमिस दाख,
बाहिज अभितर विरागी मृद अंग है।
सध्यम पुरुष नारिअरकीसी भांति लिये,
बाहिज कठिन होय कोमल तरंग है ॥॥
अधम पुरुष बदरीफल समान जाकं,
बाहिरस दीखे नरभाई दिल संग है।
अधमसे अधम पुरुष पृगीफल सम,
अतरंग बाहिज कठोर सरवंग है॥ १८ ॥
शब्दा्थ :- अभितर-भीतर । बदरीफलनछ बेर ।नरमाई#कोमलता ।
दिल-हृदय । संग-पत्थर । पूगीफल>"सुपारी ।

अर्थ :- उत्तम मनुष्यका स्वभाव अन्तरंग और बाह्ममें किसमसिश दाखके समान कोसल (दयालु )रहता है ।सध्यम पुरुषका स्वभाव नारियलके समान बाहर तो कड़ा (अभिसानी) और अन्तरड्रमें कोमल रहता है । अधस पुरुषका स्वभाव बेर फलके समान बाहरसे कोमल पर अंतरंगमें कठोर रहता हैऔर अधमाधम पुरुषका स्वभाव सुपारोके समान अंतरंग और बाह्य सर्वाग कठोर रहता है ॥ १८ ॥

उत्तम पुरुषका स्वभाव (सवैया इकतीसा)

कीचसो कनक जाके नोचसो नरेस पद,
मोचसी मिताई गरुबाई जाके गारसी ।
जहरसी जोग-जाति कहरसी करामाति,
हहरसी होस पुदगल-छबि छारसी (॥
बंध हार श्ष्५्‌
जालसो जग-विलास भालसो भरुवत-वास,
कालसो कुटठु ब-काज लोक-लाज लारसी ।
सीठसोौ सुजसु जाने बोठसो बखत माने,
ऐसी जाको रीति ताहि बंदत बनारसो ॥ १६ ॥

शब्दार्थ :- मीच >मृत्यु । मिताई-मित्रता । गरुवाई-बड़प्पन । गार (गाल )लगाली । जोग-जातिज्योगकी क्रियाएँ। कहरदु.ख । हहर८ अनर्थ । होस"हविस-महत्त्वाकांक्षा । पुदुंगल-छविज"शरीरकी कान्ति । छार>भस्म । भाल>बाणपर लगी हुई लोहेकी नोंक । लार>मुखकी राल। सीठरुनाकका मैल । बीठ-विष्टा ।बखत्-भाग्योदय ।

अर्थ :- जो कंचनकों कोचड़के समान, राज्यपवकों नितान्‍्त तुच्छ, लोगोंको मिश्रताको सुत्युके समान, प्रशंसाको गालीके समान, योगकी क्रियाओंको जहरके समान, मंत्रादि करामातकों दुःखके समान, लोकिक उन्नतिको अनर्थके समान, शरीरकी कान्तिको राखके समान, संसारकी मायाको जंजालफे समान, घरके निवासको वाणकों नोंकके समान, कुटुम्बके कार्यको कालके समान, लोकलाजको लारके समान, सुयशको नाकके मैलके समान और भाग्योदयको विष्टाके समान जानता है (बह उत्तम पुरुष है) ; उसे पं० बनारसीदासजी नमस्कार करते हैं ॥ १६ ॥ भावार्थ यह हैकि शञानी जीव सांसारिक अभ्युदयकों एक आपत्ति हो समभते हैं।

मध्यम पुरुषका स्वभाव (स्वेया इकतीसा)

जेसे कोउ सुभट सुभाइ ठग-पमूर खाइ,
चेरा भयो ठगतोके घेरामें रहतु है।
ठगोरी उतरि गई तब ताहि सुधि भई,
परधौ परवस नाना संकट सहतु है ॥।
तेसेही अनादिको मिथ्याती जोव जगतमें,
डोले आठों जाम विसरास न गहतु है ।
श्र समयत्तार नाटक
ग्यानकला भासो भयौ अंतर उदासी पं,
तथापि उदे व्याधिसों समाधि न लह॒तु है ॥ २० ॥

शब्दार्थ :- म्र-मूल या जड़ी । वेरा-वेला ।जाम"पहर । विसराम-- चेन । व्याधिःआपत्ति । समाधि5स्थिरता । अथ :- जैसे किसी सज्जनकों कोई ठग ठगमूली खिला देवे तो वह मनुष्य ठगोंका दास बन जाता हैऔर उन ठगोंकी आज्ञामें चलता है। परन्तु जब उस बूटीका असर मिट जाता है और उसे होश आता है तब ठगोंको भला नहों जानता हुआ भी उनके आधोन रहकर अनेक प्रकारके कष्ट सहता है। उत्ी प्रकार अनादि कालका मिभ्यात्वी जीव संसारमें सदेव भटकता फिरता हैऔर चेत नहीं पाता । परन्तु जब ज्ञानज्योतिका विकास होता है तब अन्तरंगमें यद्यपि विरक्तमाव रहता हैतो भी कर्-उदयकी प्रबलताके कारण शान्ति नहीं पाता । (ऐसा मध्यम पुरुष है) ॥ २०॥

अधम पुरुषका स्वभाव (सर्वेया इकतीसा )

जेसे रंक पुरुषक भाये कानो कौड़ो धन,
उलुवाके भाय जंसे संभझा ही बिहान है।
कुकरुके भाये ज्यों पिडोर जिरबानी मठा,
सूकरुके भाये ज्यों पुरीष्" पकवान है।।
बायसके भाये जेसे नोंबकी निबोरी दाख,
बालकके भाये दंत-कथा ज्यों पुरान है।
हिसकके भाये जसे हिसामैं धरम तंसे,
मूरखके भायें सुभबंध निरवान है॥ २१ ॥
शब्वार्थ :- रंक-गरीब । भायें>प्रिय लगे । कानी ₹फूटी । उलुवा>
उल्लू । विहान->सबेरा । कूकरु>कुत्ता ।पिडोर-वमन । सूकरुजसूअर ।
पुरोष>विष्टा। बायस>कौवा । दत-कथा>लौकिक वार्ता। निरवान>
मोक्ष ।

अर्थ :- जिस प्रकार गरीब मनुष्यको एक फूटी कोड़ी भी बड़ी सम्पत्तिके समान प्रिय लगतो है, उल्लूकों संध्या हो प्रभातके समान इष्ट होती है, कुत्तेको वमन हो वहीके समान रुचिकर होता है, कोवेकों नोमको निबोरी दाखके समान प्रिय होती है, बच्चेको लौकिक वार्ताएँ (गप्पें) ही शास्त्रवत्‌ रोचक होतो हैं,हिसक मनुष्य को हिसाहीमें धर्म दिखता है; उसो प्रकार मूर्खकों पुण्यबन्ध ही मोक्षके समान प्रिय लगता है (ऐसा अधमस पुरुष होताहै) ॥ २१॥।

अधमाधम पुरुषका स्वभाव (सर्वया इकतीसा)

कुजरकों देखि जसे रोस करि भूसे स्वान,
रोस करे निर्धन विलोकि धनवंतकों ।
रंनके जगंय्याकों विलोकि चोर रोस कर,
मिथ्यामती रोस करे सुनत सिद्धंतकों ।
हंसकों विलोकि जेसे काग मन रोस करे,
अभिमानी रोस करे देखत महंतकों ।
सुकविकों देखि ज्यों कुकवि मन रोस करे,
त्यों हीदुरजन रोस करें देखि संतकों ॥ २२ ॥

शब्दार्थ :- कुजर-हाथी । रोस (रोष) «गुस्सा । स्वान>कुत्ता । विलोकिल्‍देखकर । काग>कौआ । दुरजन>अधमसे भी अधम ।

अर्थ :- जिस प्रकार कुत्ता हाथीकों देखनेपर फ्रोधित होकर भोंकता है, धनाढच पुरुषको देखकर निर्धन मनुष्य क्रोधित होता है, रातमें जागने- बालेको देखकर चोर फ्रोधित होता है, सच्चा शास्त्र सुनकर मिथ्यात्वी जोब क्रोधित होता है, हंसको देखकर कौवा क्रोधित होता है, महापुरुषको देखकर घमंडो मनुष्य क्रोध करता है, सुकविको देखकर कुकविके भनमें ऋरध आता है; उसी प्रकार सत्पुरुषको देखकर अधमाधम पुरुष फ्रोघित होता है ॥ २२।॥।

पुन. (सवेया इकतीसा )

सरलकों सठ कहे बकताकों धीठ कहै,
विने कर तासों कहे धनकों अधीन है ।
छमीकों निबल कहै दमीकों अदत्ति कहे;
मधुर वचन बोले तासों कहै दीन है ।
धरमीकों दंभी निसप्रेहीकों गरुमानी कहै,
तिसना घटावे तासों कहै भागहीन है ।
जहां साधुगुन देखे तिन्हकों लगाबे दोष,
ऐसी कछु दुर्जतको हिरदो मलीन है॥ २३ ॥

शब्दार्थ :- सरल5सीधा । सठल्‍मू्ख । वकतान्‍बोलनेमें चतुर । बिने (विनय) >नम्नता । छमी>क्षमा देनेवाला ।दमी>संयमी । अदत्ति- कंजूस । दीन-गरीब । दभी-ढोंगी । निसप्रेही (निस्पृही )-इच्छारहित । तिसना (तृष्णा )>लोभ । साधुगुन -सद्गुण ।

अर्थ :- अधमाधम मनुष्य, सरल चित्त मनुष्यसे मूल कहता है,जो बात- चौतमें चतुर होवे उसे धीठ कहता है, विनयवानकों धनके आश्रित बतलाता है, क्षमावानको कमजोर कहता है, संयभीको" कृपण कहता है, सधुभाषीको गरीब कहता है, धर्मात्माकों ढोंगी कहता है, निस्पहोको घमंडो कहतः है, संतोषोकों भाग्यहीन कहता है अर्थात्‌ जहाँ सदगुण देखता है वहां दोष लगाता है। दुजनका हृदय ऐसा हो मलीन होता है ॥ २३ ॥

मिथ्याहप्टिकी अहृबुद्धिका वर्णन (चौपाई)

मैं करता में कोन्ही कंसी।
अब यों करों कहौ जो ऐसी ।।
ए विपरीत भाव है जामें।
सो बरते मिथ्यात दसामें ॥ २४ ॥
जो पान तम्बाकू आदि व्यसन नही करते अथवा अनावश्यक श्यू गार चटक-मटक
नही करते उनसे अज्ञानी लोग कजूस - कृपण आदि कहते है ।
मिध्याहष्टे: स एवास्य बन्धहेतुविषयंयात्‌ ।
ये एवाध्यवसायोउ्यसशानात्मापस्य दश्यते ॥। & ।
बंध दरार श्ष६

अर्थ :- मेंकहताहूँमैंने यह कंसा काम किया (जो दूसरोंसे नहीं बन सकता), अब भी में जेसा कहता हूँ बेसा ही करूगा। जिसमें ऐसे अहंकाररूप विपरीतभाव होते हैंवह मिथ्याहृष्टि होता है ॥ २४ ॥

पुन: (दोहा)

’ अहंबुद्धि मिथ्यादसा, धरे सो मिथ्यावंत ।
विकल भयो संसारमें, करे विलाप अनंत ॥ २५ ॥

अर्थ :- अहंंकारका माव समिथ्यात्व है, यह माव जिस जीवमें होता है वह मिथ्यात्वी है। मिथ्यात्वो संसारमें दुखो हुआ मटकता है और अनेक प्रकारके विलाप करता है ॥ २५ ॥

मूढ मनुप्य विषयोसे विरक्त नही होते (सवैया इकतीसा )

रविक उदोत अस्त होत दिन बिन प्रति,
अंजुलिक॑ जीवन ज्योँ जीवन घटतु है।
कालक ग्रसत छिन छिन होत छीन तन,
आरेके चलत मानो काठ सो कटतु है
ऐसे परि मुरुख न खोज परमारथकों,
स्वारथक हेतु भ्रम भारत ठठतु है।
लगौ फिरे लोगनिसों परग्यो परे जोगनिसों,
विषेरस भोगनिसों नेकु न हटतु है॥ २६॥।
शब्वार्थ :- जीवन-पानी । जीवन"जिंदगोी । आराचजकरौत ।
परमारथ (परमार्थ)-मोक्ष । स्वारथ (स्वार्थ )>खुदगरजी । लोगनि>
लौकिक-परवस्तु । पस्यौ-लीन । नेकु-किचित्‌ भी ।

अर्थ :- जिस प्रकार अंजुलिका पाती क्रमशः घटता है, उसी प्रकार सूर्यका उदय-अस्त होता है और प्रतिदिन जिन्दगी घटती है। जिस प्रकार शक अनेनाध्यवसायेन निष्फलेन. विमोहितः । तत्किऊ्चनापि नेवास्ति नात्सात्मानं करोति यंत्र ॥ € ॥। 'सर–+जण>-2७»+ रथ 3०७५७ ३७०५० ५०७७५३४8७५००५॥३५७ ७3७७७ भ३3७»५+3थ७3५३३»±े- ५५333» ५४3 कमा9५७७3 भारकक परनमक 33५3 करोंत खोंचनेसे काठ कटता है, उसी प्रकार काल शरीरको क्षण-क्षणपर क्षोण करता है। इतने पर भी अज्ञानी जीव मोक्षमागगंकी खोज नहीं करता और लौकिक-स्वार्थके लिये अज्ञानका बोफा उठाता है, शरीर आदि परवस्तुओंसे प्रीति करता है, मन-वचन-कायके योगोंमें अहंबुद्धि करता है और सांसारिक विषय-भोगोंसे किचित्‌ भी विरक्त नहीं होता ॥ २६॥

अज्ञानी जीवकी मूढतापर मृगजल और अंधेका दृष्टान्त ( सवेया इकतीसा )

जैसे मृग मत्त वषादित्यकी तपत मांहि,
तृषाबंत भुषा-जल कारन अटठतु है।
तेसें भववासी मायाहीसों हित मानि मानि,
ठानि ठानि भ्रम श्रम नाटक नठतु है।
आगेकौं धुकत धाइ पीछे बछरा चवाह,
जैसे ननहोनं नर जैवरी बटतु है।
तेसे मृढ़ चेतन सुकृत करतूति करें,
रोबत हसत फल खोबत खटतु है॥ २७ ॥
शब्दा्य :- वृषादित्य-वृष संक्रान्तिका सूर्य । तृषावतनप्यासा ।*
मृषा>भूठा । अटतु हे-भटकता है। नटतु है+नाचता है । नेनहीन नर >अधा
मनुष्य ।

अर्थ :- जिस प्रकार ग्रीष्मकालमें सूयंका तीन्र आताप होनेपर प्यासा मृग उन्‍्मत होकर सिथ्याजलकी ओर व्यर्थ ही दौड़ता है, उसी प्रकार संसारों जोब मायाहोमें कल्याण सोचकर मभिथ्या कल्पना करके संसारमें ताचते हैं । जिस प्रकार अंध मनुष्य आगे को रस्सी बटता (भाँजता) जावे और पीछेसे बछड़ा खाता जावे, तो उसका परिश्रम व्यर्थ जाता है, उसी प्रकार मूल जीव शुभाशुम क्रिया करता है वा शुभक्रियाके फलमें हर्ष और अशुभक्रियाके फलमें ।वषाद करके क्रियाका फल खो देता है ॥ २७ ॥

९ जेठ महीनेमे सूर्य बंप सक्रान्ति पर शाता है ।

अज्ञानी जीवके बंधनसे न सुलक सकनेपर हृष्टान्त (सवैया इकतीसा )

लियें द्रिढ़ पेच फिरे लोटन कतबूरसौ,
उलटो अनादिको न कहूं सुलटतु है ।
जाको फल दुख ताहि सातासों कहत सुख,
सहत-लपेटी असि-धारासी चटतु है।।
ऐसे पृढ़जन निज संपदा न लखे क्योंहो,
योँहि मेरी सेरी निसिवासर रखठतु है।
याही मसतासों परमारथ विनसि जाइ,
कांजीकौ परस पाइ दूध ज्यों फटतु है ॥ २८॥।

शब्दार्थ :- द्विढ ( हृढ ) 5 मजबूत । सहत ,( शहद ) # मधु । असि > तलवार । निसिवासर 5 रात-दिन । परस (स्पर्श) 5 छूना ।

अर्थ :- जिस प्रकार लोटन कबृतरके पंखोंमें मजबूत पेंच लगे होनेसे वह उलट-पुलट फिरता है, उसो प्रकार संसारी जोब अनादि कालसे कर्म- बन्धनके पेंचसें उलटा हो रहा है, कभी सन्मार्ग ग्रहण नहीं करता, और जिसका फल दुःख है ऐसी विषय-भोगकी किचित्‌ साताको सुख मानकर शहद लपेटी तलवारकी धारकों चाटता है। ऐसा अज्ञानी जीव सदाकाल परवस्तुओंकी मेरी सेरी कहता हैऔर अपनी ज्ञानादि विभूतिको नहों देखता, परद्रव्यके इस मसत्वभावसे आत्महित ऐसा नष्ट हो जाता है जेसे कि कांजीके स्पशंसे दूध फट जाता है ॥ २८ ॥

अज्ञानी जीवकी अहबुद्धिपर दृष्टान्त (सवेया इकतीसा )

रूपकी न भाँक हीये करमको डांक पिये,
ग्यान दबि रह्यौ भिरगांक जंसे धनमें।
लोचनकी ढांकसों न माने सदगुरु हांक,
डोले मृढ़ रांकसो निसांक तिहूं पनमें ।।
टांक एक मांसकी डलीसो तामे तीन फांक,
तीनकौसो आंक लिखि राख्यो काहू तनमे ।
तासों कहै नांक ताके राखिवंकों करे कांक,
लांकसों खड़ग बांधि बांक धर मनमें ॥ २६ ॥
शब्वार्थ :- मिरगांक ( मृगाक ) 5 चन्द्रमा । ढांक ८ ढक्‍्कन ।
हांक- पुकार । टांक (टंक ) 5 तोलनेका एक बाट (चार माशे ) ।
फांक 5 खण्ड । कांक 5> झगड़ा । लाक (लक) >5कमर । खड़ग
(खड्ग) 5 तलवार । बाक & वक्रता।

अर्थ :- अज्ञानी जोवको अपने स्वरूपको खबर नहीं है, उस पर कर्मोदयका डांक* लग रहा है, उसका शुद्ध ज्ञान ऐसा दब रहा है ज॑ंसे कि चन्द्रमा मेघोंसे दब जाता है। ज्ञाननेत्र ढेंक जानेसे वह सदृगुरुकी शिक्षा नहों मानता, मू्खंतावश दरिद्री हुआ सरदेव निःशंक फिरता है। नाक हैसो सांसकी एक डलो है, उसमें तीन फॉक है, मानो किसीने शरीरमें तीनका अंकही लिख रक्‍खा है, उसे नाक कहता है, उस नाक (अहंकार ) के रखनेको लड़ाई करता है, कमरसे तलवार बॉधता है और मसनमें वक्ता ग्रहण करता है ॥ २६ ॥।

अन्ञानीकी विपयासक्ततापर हृ्टान्त (सवेया इकतीसा )

जसे कोउ कूकर छुधित सूके हाड़ चाबं,
हाड़निकी कोर चहूँ ओर चुभे मुख ।
गाल तालु रसना मसूढ़निको मांस फार्टे,
चार्ट निज रुधिर सगन स्वाद-सुखमे ।)
तेसे घृढ विषयों पुरुष रति-रीति ठाने,
ताम चित्त साने हित माने खेद दुखमे ।
देखे परतच्छ बल-हानि मल-मृत-खानि,
गहे न गिलानि पगि रहै राग-रुखस ॥ ३० ॥

शब्दार्थ :- पगि रहे>मग्न हो रहै । रुख>द्वेष ।

अर्थ :- जिस प्रकार भूखा कुत्ता हड्डी चचाता हैऔर उसकी नोंक ९ सफेद काँचपर जिस रगका डॉक लगाया जाता है, उसी रगका काँच दिखने लगता है । उसी अभ्रकार जीवरूप काँचपर कमंका डॉक लग रहा है, सो कर्म ज॑सा रस देता है, जीवात्मा उसी रूप हो जाता है। जारो ओरसे मुखमें चुभ जाती है, जिससे गाल, तालु, जीभ तथा जबड़ोंका मांस फट जाता है और खून निकलता है, उस निकले हुए अपने ही रक्तको बह बड़ें स्वादसे चाटता हुआ आनंदित होता है। उसो प्रकार अज्ञानी विषय- लोलुपी जोब काम-भोगमें आसक्त होकर संताप और कष्टमें भलाई मानता है। कामक्रोड़ामें शक्तिकों हानि और मल-सृत्रकी खानि साक्षात्‌ दिखतो है, तो भो ग्लानि नहीं करता, राग-द्ेषमें मरत हो रहता है ॥ ३० ॥

जो निर्मोही हैवह साधु है (अडिल्ल)

सदा करमसो भिन्न, सहज चेतन कटह्यौँ ।
मोह-विकलता मानि, मिथ्यातों हूं रह्यौ ॥।
करें विकल्प अनंत, अहंसति धारिक।
सो मुनि जो थिर होइ, ममत्त निवारिक ॥ ३१ ॥

शब्दार्थ :- अहमति>अहबुद्धि । निवारिकैरदूर करके ।

अर्थ :- बास्तवमें आत्मा क्मोसि निराला है, परन्तु मोहके कारण स्वरूपको भूलकर मिथ्यात्वी बन रहा हैऔर शरीर आदियमें अहंबुद्धि करके अनेक विकल्प करता है । जो जीव परद्रव्योंस मसत्वभाव छोड़कर आत्म- स्वरूपमें स्थिर होता है बह साधु है ॥ ३१ ॥

सम्यग्हष्टि जीव आत्मस्वरूपमें स्थिर होते हैं (सवेया इकतीसा )

असंख्यात लोक परवांन जे मिथ्यात भाव,
तेई विवहार भाव केवली-उकत हैं।
जिन्हकौ मिथ्यात गयोौ सम्घक दरस भयो,
ते नियत-लीन विवहारसों मुकत हैं ।।
विश्वाद्विभक्तो5पि हि यत्प्रभावादात्मानमात्मा विदधाति विश्वम्‌ ।
मोहेककन्दो5ध्ययसाथ एव. नासस्‍्तोह येबां यतयस्त एब ॥ १० ॥
सर्वत्राध्यवसानमेबमखिल त्याज्यं यदुक्तः जिने-
स्तन्मन्ये व्यवहार एवं बिखिलो5प्यन्याभयस्त्थाजित. ।
सम्मड निश्चयमेकमेव तदसी निष्कम्पसाक्रम्य कि
शुद्धतानघने महिस्ति न निजे बध्नन्ति संतो धतिम्‌ ॥ ११॥
४ 9०२०६७५…-०.. नस न>>9939
न न>>नंममन- नजन मम««_ममम मकान ८
भ०कक मन अनम
ममरमन
कया राय माया
मसिरविकलप तिरुषाधि आतम समाधि,
साधि जे सुगुन मोल पंथकों ढुकत हैं ।
तेई जीव परम दसाम थिररूप हूंक,
धरममें धुके न करमसों रुकत हैं ॥ ३२॥।
शब्वार्थ :- असंख्यात लोक परवांन-+ जितने लोकाकाशके प्रदेश हैं ।
उकतनकहा हुआ । नियतरनिश्चयनय । मुकतल्‍छूटे हुए ।

अर्थ :- जिनराजका कथन है कि जीवके जो लोकाकाशके प्रदेशोंके बराबर मिथ्यात्वमावके अध्यवसाय है वे व्यवहारनयसे हैं।जिस जीवको मिथ्यात्व नष्ट होनेपर सम्यग्दशन प्रगट होता है वह व्यवहार छोड़कर निश्चयमें लोन होता है, वह विकल्प और उपाधिरहित आत्म-अनुभव ग्रहण करके दर्शन-ज्ञान-चा रित्ररूप मोक्षमा्ग मेलगता हैऔर वही परमध्यानमें स्थिर होकर निर्वाण प्राप्त करता है, कर्मोंका रोका नहीं रुकता ॥ ३२ ॥

शिष्यका प्रइन (कवित्त)

जे जेमोह करमकी परनति,
बंध-निदान कही तुम सब्ब ।
संतत भिन्न सुद्ध चेतनसों,
तिन्हको मूल हेतु कहु अब्ब ॥।
के यह सहज जीवको कोतुक,
क॑ निमित्त है पुगगल दब्ब ।
सीस नवाइ शिष्य इस पूछत,
कहे सुगुरु उत्तर सुन भव्ब ।। ३३ !।
रागादणें बन्धनिदानमुक्तास्ते शुद्धचिन्मात्रमहो5तिरिक्ता: ।
आत्मा परो वा किपु तपन्निमित्तमिति प्रणन्ना,
पुनरेबसाहु: ॥ १२ ॥॥
बंध हार श्श्भ्‌

शब्दार्थ :- परनति>चाल । निदानल्कारण । संततल्सदेव । मूल हेतु>मुख्य कारण । कौतुकन्खेल ।

अर्थ :- शिष्य मस्तक नवाकर प्रइन करता हैकि हेगुरुजी ! आपने समोहकमंकी सब परिणति बंधका कारण कही है, सो वह शुद्धचेतन्यमावोंसे सदा निराली हो है। अब कहिये बंधका मुख्य कारण क्या है ? बंध जीवका ही स्वाभाविक धर्म हैअथवा इसमें पुद्गल द्रव्यका निमित्त है? इसपर श्रीगुरु उत्तर देते हैं, किहेभव्य ! सुनो ॥ ३३ ॥

शिष्यकी शंकाका समाधान (सर्वेया इकतीसा )

जेसे नाना बरन पुरी बनाइ दोजे हेठ,
उज्जल विमल मनि स्रज-करांति हे।
उज्जलता भांसे जब वस्तुकौ विचार कीजे,
पुरीकी भलकसों बरन भांति भांति है ॥।
तेसे जीव दरबकों पुग्गल निमित्तरूप,
ताकी ममतासों मोह मदिराकी मांति है ।
भेदग्यान द्विष्टिसों सुभाव साधि लीज तहां,
सांची शुद्ध चेतना अवाची सुख सांति है ॥ ३४ ॥

शब्दार्थ :- नाना बरन"अनेक रंग । पुरीजडाक । हेठ>नीचे । करांति (क्रान्ति) >चमक । माति-उन्मत्तत्ता । अवाची >वचन-अगोच र ।

अर्थ :- जिस प्रकार स्वच्छ ओर सफेद सुर्थेक्रान्ति अथया स्फटिक- मणिके नोचे अनेक प्रकारके डाक लगाये जायें तो वह अनेक प्रकाशका रंग- बिरंगा दिखने लगता है, ओर यदि वस्तुका असलो स्वरूप विचार किया जावे तो उज्ज्वलता ही ज्ञात होतो है, उसो प्रकार जीबद्रव्यमें पुद्गलके निमित्तसे उसको ममताके कारण मोह-मबिराकी उन्मत्तता होतो है, पर भेदविज्ञान द्वारा स्वभाव सोथा जावे, तो सत्य और शुद्ध चेतन्यको बचनातीत सुख-शान्ति प्रतीत होती है ॥ ३४ ॥

न जातुरागादिनिमित्तभावमात्मात्मनो याति बयाकंकान्त ।
तस्मिन्रिसित्त परसज्भ एवं बस्तुस्वभावो5्यमुदेति ताबतु # $३।।
श्६६
3 न 5 न ननननमम±नित मनन नितिन नस +_+

पुनः (सवेया इकतीसा )

जैसे महिमंडलम नदीकों प्रवाह एक,
ताहीम अनेक भांति नौरकी ढरनि है ।
पायरकौ जोर तहां धारकी मरोर होति,
कांकरकी खांनि तहां भागकी भरनि है ।।
पॉनकी भकोर तहां चंचल तरंग ऊठे,
भूमिकी निचांनि तहां भोरकों परनि है।
तेसे एक आतमा अनंत-रस पुदगल,
दुहुँके संजोगम विभावकी भरनि है ॥ ३५॥।

शब्दार्थ :- पाथर<पत्थर । कागज"फेन । पौन-हवा । निचांनिल्डाल ।

अर्थ :- जिस प्रकार कि पृथ्यीतलपर यद्यपि नदीका प्रवाह एकरूप होता है, तो भी पानीकी अनेक अवस्थाएं होतो हैं, अर्थात्‌ जहाँ पत्थरसे ठोकर खाता हैवहाँ पानोकी धार मुड़ जातो है, जहाँ रेतका समूह होता है वहाँ फेन पड़ जाता है,जहाँ हवाका भकोरा लगता है वहाँ लहरें उठती हैं, जहाँ धरती ढालू होती हैवहाँ भेंवर पड़ती है। उसी प्रकार एक आत्मामें भांति भाँतिके पुदूगलोंका संयोग होनेसे अनेक प्रकारकी विभावपरिणति होती है ॥ ३५ ॥

जड ओर चेतन्यकी पृथकता (दोहा)

चेतन लच्छुन आतमा, जड़ लच्छन तन-जाल ।
तनकी ममता त्यागिके, लोजे चेतन-चाल ॥ ३६ ॥
अथ :- आत्माका लक्षण चेतता हैऔर शरीर आदिका लक्षण
जड़ है, सोशरोर आदिसे ममत्व छोड़कर शुद्ध चंतन्यका ग्रहण करना
उचित है ॥ ३६ ॥
इति वस्तुस्वभाव स्व ज्ञानी जानाति तेन सः ।
रागादोश्नास्‍्मन, कुर्यान्नातों भवति कारक: १४ ॥

आत्माकी शुद्ध परिणति (सवैया तेईसा)

जो जगकोी करनी सब ठानत,
जो जग जानत जोबत जोई।
देह प्रवांन पे देहसों दूसरौ,
देह अचेतन चेतन सोई ॥।
देह धरे प्रभु देहसों भिन्न,
रहे परछन्त लखे नहिं कोई।
लक्ष्छ्क्‌ वेवि विचच्छन बूझत,
अच्छुनसों परतच्छ न होई ॥ ३७॥।

शब्दार्थ :- जोवत>देखता है । प्रवातन-ब राबर । परछन्न (प्रच्छन्न )- गुप्त, ढेंका हुआ । वेदि-जानकर । विचच्छुन >ज्ञानी । बूकत >समभता है। अच्छनसौ>इन्द्रियोसे ।परतच्छ (प्रत्यक्ष )>प्रगट ।

अर्थ :- जो संसारकी सब क्रियाएँ" करता है, जो जगतको जानने- देखनेवाला है, जो शरोरके बराबर रहता है,पर शरोरसे पृथक है। क्योंकि शरोर जड़ है और वह चेतन्य है, वह प्रभु (आत्मा) यद्यपि देहमें हैपर देहसे निराला है, वह ठेका हुआ रहता है, सबको दिखाई नहीं देता, ज्ञानो लोग लक्षण आदिसे उसे पहिचानते हैं,वह इन्द्रियगोचर नहीं है ॥ ३७ ॥

शरीरकी अवस्था (सबंया तेईसा )

बेह अचेतन प्रेत-दरो रज,-
रेत-भरी मल-खेतकी कक्‍यारी।
व्याधिकी पोट अराधिकी ओट,
उपाधिकी जोट समाधिसों न्‍्यारी ॥।

खतुर्गंति गमन, राग-हेष आादि। इति वस्तुस्वभावं स्व नाशानी वेत्ति तेन सः । रागादीनात्मनः कुर्पादतो भवति कारकः ॥ १५॥

रेजिय ! देह करे सुख हानि,
इते पर तो तोहि लागत प्यारों।
देह तो तोहि तजेगो निदान पे,
तूहो तजे किन देहकी यारी॥ ३८ ॥

शब्दार्थ :- प्रेत दरी-मुर्दाखाना । रज-रक्त । रेतन्वीय । क्यारी - बाडी । पोट<गठरी । अराधिज्आत्मस्वरूप । उपाधिल्कलेश । जोट>समुह । भ्र्ष :- वेह जड़ हैमानों एक मुर्दाखाना ही है। वह रज और बोयंसे भरो हुई है, सल-मत्ररूपी खेतको क्यारों है, रोगोंको गठरों है, आत्माके स्वरूपको ढंकनेवाली है, कष्टोंका समुदाय है और आत्मध्यानसे पृथक है। हैजीब ! यह वेह सुखका घात करती है, तो भी तुझे प्रिय लगती है, आखिरको यह तुझे छोड़ेगी हो, फिर तु होइससे अनुराग क्यों नहीं छोड़ देता ? ॥ ३८॥।

पुन: (दोहा )

सुन प्रानो सदगुरु कहे, देह खेहकी खांनि ।
धर सहज दुख दोषकों, करें मोखकी हांति ॥ ३६ ॥।
शब्दार्ष :- सेह- मिट्टी ।सहजन्स्वभावसे ।

अर्थ :- श्रोगुरु उपदेश करते हैंकि हेजोब ! शरीर मिट्टीकी खदान है,स्वभावसे हो दुख और दोषमय हैतथा मोक्षसुखमें बाधक है ॥ ३६ ॥

पुन: (सवैया तेईसा)

रेतकोसी गढ़ी किधों मढ़ो है मसानकीसो,
अंदर अंधेरी जेसी कंदरा है सेलकी।
ऊपरकी चसक दसक पट भूषनको,
धोखे लागे भलो जंसी कलो है कनेलकी ।।
ओगुनकी ओंडो महा भोंडी मोहकी’ कनौडी,
सायाको मसूरति है मूरति है मैलकी ।
ऐसी देह याहीके सनेह याको संगतिसों,
हूं रही हमारो मति कोल्हुकेसे बेलकी ॥ ४० ॥

शब्दार्थ :- गढो छोटा गढ या किला । मढ़ी>ःछोटा मंदिर-देवली । कंदरा>गुफा । सैल>पहाड । कली है कनैलकी>कनैरके फूलकी कली। औडी>गहरी । भौडी>खराब, भद्दी। कनौडी>कानी आँख । मसूरति८ आधार ॥

अर्थ :- यह देह बालूकी गढ़ीके समान अथवा मरघटकी मढ़ीके समान हैओर भीतर पबंतकों गुझाके समान अंधकारमय है । ऊपरकी चमक-दमक और बस्त्र - आभूषणोंसे अच्छी दिखती है, परन्तु कनेरकी कलोके समान वुर्गंधित है, अवगुणोंसे भरी हुई, अत्यन्त खराब और कानी आँखके समान निकम्सी है, सायाका समुदाय और सेलकी म॒ति ही है इसहीके प्रेम और संगरे हमारी बुद्धि कोल्हूके बेलके समान हो गई है, जिससे संसारमें सदा भ्रमण करना पड़ता है ॥ ४० ॥

पुन. (सवेया इकतीसा )

ठौर ठोर रकतके कुड केसनिके भु ड,
हाड़निसों भरी जसे थरी है चुरेलको ।
नेकुसे 'धकाके लगे ऐसे फटि जाय मानौ,
कागदकी प्री किधों चादरि है चेलकी ।।
सूर्च श्रम वांनि ठानि मृढ़निसों पहचांनि,
करे सुख हानि अरु खांनि बदफ्फलकी।
ऐसी देह याहोके सनेह याकी संगतिसों,
हूं रहो हमरी मति कोल्ह्केसे बेलकी ॥ ४१ ॥

शब्दार्थ :- ठौर ठौर>जगह जगह । केसनिके >बालोंके। कुंड >समूह । थरी (स्थल)-स्थान । चुरेलनभूतनी । पूरीच्पुड़िया । वानिच्टेव । चेलजकपडा । बदर्फल-बुरे काम । ओरमे’ $ भी पाठ है ।

यमाति’ भी पाठ है ।

अर्थ :- इस देहमें जगह जगह रक्तके कुण्ड ओर बालोंके भुण्ड हैं, यह हड्डियोंसे भरी हुई है, मानों चुड़ेलोंका निवासस्थान ही है । जरासा धक्का लगनेसे ऐसे फट जाती है जेसे कागजकी पुड़िया अथवा कपड़ेकी पुरानी चहर हो; यह अपने अधिर स्वभावको प्रगट करती है, पर मर लोग इससे स्नेह लगाते हैं। यह सुखक्षी घातक और बुराइयोंकी खानि है। इसहीके प्रेम और संगसे हमारी बृद्धि कोल्हूके बेलके समान संपतारमें चक्कर लगानेवाली हो गई है ॥ ४१ !॥॥ ससारी जीवोकी दशा कोल्हुके बेलके समान है

(सव्वेग्रा इकतीसा )

पाटी बांधी लोचनिसों सकुर्च दबोचनिसों,
कोचनिके सोचसों न बेदे खेद तनकों ।
धायबो हो धंधा अरु कंधामांहि लग्यौ जोत,
बार बार आर सहे कायर हे मनको ॥।
भूख सहे प्यास सहे दुर्जनकों त्रास सहे,
थिरता न गहे न उसास लहे छुनकौ।
पराधोत घूमने जेसो कोल्हुकौ कमेरों बेल,
तेसोई स्वभाव या जगतवासी जनकौ ॥ ४२ ॥
. शब्दार्थ :- पाटी>पट्टो । लोचनिसौल्‍-नेत्रोसे ।सकुचैजसिकुइता है।
कोचनिके> चाबुकोके । धायवौरूदौडना । आर5"एक प्रकारका अकुश ।
कायरव्साहसहीन । त्रास>दुख। उसास>विश्वाम । कमेरों (कमाउ)
निरन्तर जुतनेवाला ।

अर्थ :- संसारी जीबोंकी दशा कोल्हुके* बेलके समान हो रही है,वह इस प्रकार हैकि -नेत्रोंपर ढेंकना बंधा हुआ है,स्थानकी कसीकेकारणदबोच से

ससारी जीबोके नेत्रोपर अज्ञानकी पट्टी बेची हुई है, वेपरिमित क्षेत्रसे आगे नही जा सकते, यह उनके लिये दबोचनी है, स्त्री आदिके तीखे वचन चाबुक है, विषय- सतामग्रीके लिये भटकना उनका घधा है, गृहस्थी छोडकर निकल नही सकते यह उनपर जोत है, कपाय चिता आदि अरई हैं, परिग्रह-सग्रहके लिये भूख-प्यास सहते है, स्वामी, राजा आदिका त्रास सहना पडता है, कर्मोकी पराधीनता है, अनतकाल चक्कर लगाते हो चुका पर एक क्षणभरके लिये भी सच्चा सुख नही पाया । सिकुड़ासा रहता है, चाब॒ुककी मारके डरसे शरीरके कष्टकी जरा भी परवाह नहीं करता, दोड़ना हीउसका काम है, उसके कंधेमें जोत लगा हुआ है (जिससे निकल नहीं सकता), हर समय अरईकी मार सहता हुआ मनमें हत-साहस होता है, भूख-प्यास और निर्दय पुरुषों द्वारा प्राप्त कष्ट भोगता है, क्षणमर भी विश्राम लेनेकी थिरता नहीं पाता और पराधीन हुआ चक्‍कर लगाता है ॥ ४२ ॥

ससारी जोवोकी हालत (सर्वेया इकतीसा)

जगतमभे डोल जगवासी नररूप धर,
प्रेतकेसे दीप किधों रेतकेसे शूहे हैं ।
दीसे पट भूषन आडंबरसो नीके फिरि,
फीके छिनसांक सांभ-अंबर ज्यों सूहे हैं ।॥
मोहके अनल दंगे मायाकी सनोसौ पगे,
डाभकी अनोसोौ लगे ओसकेसे फृूहे हैं ।
धरमकी बूक नांहि उरभे भरममांहि,
नाचि नाचि मरि जांहि मरीकेसे चूहे हैं ॥ ४३ ॥

शब्दार्थ :- डोल-फिर ।प्रेतकेसे दीप>मरघटपर जो चिराग जलाया जाता है। रेतकेसे थूहे>रेतके टीले । नीकेन-अच्छे । फीके>मलीन । सामि- अबरण्सध्याका आकाश । अनलज्अग्नि । दगे -दाहे-जले । डाभकी-दूबकी- घासकी । अनी >तोक । फुहे-विन्दु ।बुकरूपहिचान । मरी ऋप्लेग ।

अर्थ :- संसारी जोब मनुष्य आदिका शरोर धारण करके भटक रहे हैं, सोमरघटके दोपक" तथा रेतके *टोलेके समान क्षणभंपुर हैं। बल्त्र- आमूषण आदिसे अच्छे दिखाई देते हैंपरन्तु सॉफके आकाशके समान क्षण- मरमें मलिन हो जाते है। वे मोहकी अग्निसे जलते हैं फिर भी सायाकी ममतामें लीन होते हैंओर घासपर पड़ी हुई ओसको ब्‌ दकेसमान क्षणभरसें ) जल्दी बुक जाता है, कोई धाँमनेवाला नही है । २ मारवाइमे वायुके निमित्तसे बानुके टीले बन जाते हैऔर फिर मिट जाते हैं । 8 नम मिललनननन करननमन नम±+ नल 5+±न नष्ट हो जाते हैं । उन्हें निजस्वरूपक ो पहिचान नहीं है, अममें भूल रहे हैं ओर प्लेगके चूहोंके’ समान नाच-ताचकर शीघ्र मर जाते हैं ॥ ४२ ॥

घन-सम्पत्तिसे मोह हटानेका उपदेश (सबेया इकतीसा )

जासों तू कहत यह संपदा हमारी सो तो,
साधनि अडारी ऐसे जेसे नाक सिनकी ।
ताहि तू कहत याहि पुन्नजोग पाई सो तो,
नरककी साई है बड़ाई डेढ़ दिनकी ।।
घेरा मांहि परभो तू विचारे सुख आंखिनको,
माखिनके चूटत मिठाई जैसे भितकी ।
एते परि होहि न उदासी जगवासो जीब,
जगमें असाता है न साता एक छिनकी ॥ ४४ ॥
शब्वार्थ :- अडारी >छोड़ी । साई-बयाना । घेरा>वकक्‍्कर ।

अर्थ :- हेसंसारी जीवो ! जिसे तुम कहते हो कि यह हमारा धन है, उसे साधुजन इस तरह छोड़ वेते हैं जिस तरह कि नाकका सेल छिनक विया जाता हैओर फिर ग्रहण नहों किया जाता । जिस धनके लिये तुम कहते हो कि पुण्यके निमित्तसे पाया है सो डेढ़ दिनका बड़प्पन है पीछे नरकोंमें पठकनेवाला है, अर्थात्‌ पापरूप है । तुम्हें इससे आंखोंका सुख दिखता है, इसके कारण तुम कुटम्बीजन आविसे ऐसे घिर रहे हो जसे मिठाईके ऊपर सक्खियाँ भिनभिनातों है। आश्रय है कि इतनेपर भी संसारो जीव संसारसे विरक्त नहीं होते, सच पुछो तो संसारमें असाता हो असाता है क्षणमात्रकों भी साता नहीों है ॥ ४४ ॥

लौकिक-जनोसे मोह हटानेका उपदेश (दोहा)

ए जगवासी यह जगत्‌, इन्हसों तोहि न काज ।
तेरे घटमें जग बसे, तामें तेरा राज ॥ ४४ ।॥।
) जब चूहोपर प्लेगका आक्रमण होता है तो वे बिल आदिसे निकलकर भूमिपर
गिरते है और बडी वेचनीके साथ दो चक्कर लगाकर शौघ्र मर जाते हैं।
बंध हार २०३

अर्थ :- हैभव्य ! ये संसारी जोब और इस संसतारसे तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहों है, तुम्हारे ज्ञानघटमें’ समस्त संसारका समावेश हैऔर उसमें तुम्हारा हो राज्य है ॥ ४५ ॥

शरीरमें त्रिलोकके विलास गर्भित हैं (सवैया इकतीसा )

याही नर-पिडमें विराज शत्रिभुवन थिति,
याहीमें त्रिविधि-परिनामरूप सृष्टि है।
याहीमें करमको उपाधि दुख दावानल,
याहीमें समाधि सुख वारिदको बवृष्टि है ।।
याहीमें करतार करतृतिहीमें विभृति,
यामें भोग याहीमें वियोग यामे घृष्टि है ।
याहीमें विलास सब गशभित गुपतरूप,
ताहीकों प्रगट जाके अंतर सुदृष्टि है॥ ४६ ॥

शब्दार्थ :- नर-पिड-मनुध्यशरीर। त्रिविध>उत्पाद-व्यय-प्रौव्यरूप । वारिद>बादल । घृष्टि-घिसना । गर्भित>समावेश ।

अर्थ :- इसी मनुष्य-शरीरमें तीन" लोक मौजूद हैं, इसीमें तीनों प्रकारके परिणाम हैं, इसोमें कर्मं-उपाधिजनित दुखरूप अग्नि है, इसीमें आत्मध्यानरूप सुखकी मेघवृष्टि हैं, इसमें कर्मका कर्ता आत्मा है, इसोमें उसकी क्रिया है, इसोमें ज्ञान-संपदा है, इसीमें कमंका भोग वा वियोग है, इसीमें मले-बरे गुणोंका संघर्षण हैओर इसो बेहमें सब विलास गुप्तरूप गर्भित हैं; परन्तु जिसके अंतरंगमें सम्यग्शान हैउसे हीसब विलास विदित होते हैं ॥ ४६ ॥। १ निर्मल ज्ञानमे समस्त लोक-अलोक प्रतिबिम्बित होते हैं । २ क्टिके नीचे पाताल लोक, नाभि मध्यलोक और नाभिसे ऊपर ऊष्बेलोक । 3 उत्पाद, व्यय, श्रौजब । …ु…3-.–नननननननननननननननननननननननिनीनभषनिनीनन ननीनीनननननक॑कन—+93तनत3+त–भ-लतन -

य+_तनमाततकयतभनत-ईनतथत3तननननन

आत्मविलास जाननेका उपदेश (सव्वेया तेईसा )

रे रुचियंत पचारि कहे ग्रुरु,
तृ अपना पद बूभत नांही।
खोजु हि्यें निज चेतन लच्छन,
है निजमें निज गुभूत नांही ॥।
सुद्ध सुछंद सदा अति उज्जल,
मायाके फंद अरूभत नांहो।
तेरो सरूप न दुदकी दोहोमें,
तोहीमे है तोहि सृुभत नांही )। ४७ ।।

शब्दार्थ :- रुचिवंत>भव्य । पचारि-बुलाकर । बुभत >पहिचानते । हिय-घटमे । गूकत नाहिल्‍उलभता नही है। सुछद-स्वतत्र । उज्जल>" निर्मेल । अरूमत नाहील्‍छूटता नही । दुद (द्वद्व) >>अ्रमजाल । दोही दुविधा ।

अर्थ :- श्रीगुरु बुला करके कहते हैकि हे मव्य ! तुम अपने स्वरूपको पहिचानते नहीं हो, अपने घटमें चेतन्य-चिह्न ढूृढ़ो, बह अपनेहोंमें है, अपनेसे उलभता नहीं है, तुम शुद्ध स्वाध्चीन और अत्यन्त निविकार हो, तुम्हारो आत्मसत्ता-पर मायाका प्रवेश नहीं है । तुम्हारा स्वरूय भ्रमजाल ओर वुधिधासे रहित हैजो तुम्हें सकता नहों है ॥ ४७ ॥

आत्मस्वरूपकी पहिचान ज्ञानसे होती है (स्वेया तेईसा)

केई उदास रहें प्रभु कारन,
केई कहें उठि जांहि कहींक॑ ।
केई प्रनाम करे गढ़ि पूरति,
केई पहार चढे चढ़ि छोक॑ ।।
केई कहें असमानके ऊपरि,
केई कहै प्रभु हेठि जमोंक ।
बंध हार २०५
मेरो धनी नहि दूर दिसन्तर,
मोहोमें हैमोहि सुकत नीक॑ ॥ ४८ ॥

शब्दार्थ :- उदास-विरक्त । गढिच्बनाकर । मूरति (मूर्ति) प्रतिमा । पहार (पहाड़) >”पर्वत । असमान (आसमान) -ऊध्वेलोक । हेठिजनीचे ।जमी (जमीन) >धरती । दिसन्तर (देशान्तर)>अन्य क्षेत्र, विदेश ।

अर्थ :- आत्माको जानने अर्थात्‌ ईश्वरकी खोज करनेके लिये कोई तो बाबाजी बन गये हैं, कोई दूसरे क्षेत्रसें यात्रा आदिको जाते हैं, कोई प्रतिमा बनाकर नमन-पूजन फरते हैं, कोई छींकेपर* बेठ पहाड़ोंपर चढ़ते हैं,कोई कहते हैं किईश्वर आसमानमें हैऔर कोई कहते हैं कि पातालमें है; परन्तु हमारा प्रभु दुरदेशमें नहीं है - हमहीमें हैसो हमें भले प्रकार अनुभवमें आता है ॥ ४८ ॥

पुनः (दोहा)

कहे सुगरु जो समकिती, परम उदासो होइ।
सुथिर चित्त अनुभौ करे, प्रभुपद परसे सोइ ॥ ४६ ॥

शब्दार्थ :- परम अत्यन्त । उदासी-बीतरागी । परसै>प्राप्त करे । अर्थ “- भ्रीगुरु कहते है कि जो सम्पस्हष्टि अत्यन्त बोतरागी होकर सनको खब स्थिर करके आत्म-अनुभव करता है वही आत्मस्थरूपको प्राप्त होता है ॥ ४६ ॥

मनकी चचलता (सवेया इकतीसा)

छिनमें प्रवीन छिनहीमें मायासों मलीन,
छिनकमें दीन छिनमांहि जेसो सक्र है।
लिये दोरधूप छिंन छिनमें अनंतरूप,
कोलाहल ठानत मथानकोसौ तक्र है ॥।
नटकौसो थार किधों हार है रहटकौसो,
धारकौसो भौंर कि कुभारकौसौ चक्र है।
$ बुदेलखडमें सीका कहते है ।
ऐसौ मन भ्रासक सुथिरु आजु कंसे होई,
ओरहीकौ चंचल अनाविहीकौ बक्र है॥ ५० ॥

शब्दार्थ :- प्रवोण>चतुर । सक्र (शक्र )>इन्द्र ।ठानत>करता है। मधथान-बिलोवना । तक्र-छाँछ । थार>थाली । हार>"माला । चक्र–चाक । अआमक–भ्रमण करनेवाला ।चचल<चपल । वक्र-्टेढा ।

अर्थ :- यह मन क्षणभरमें पंडित बन जाता है, क्षएभरमें मायासे मलिन हो जाता है, क्षणमरमें विषयोंके लिये दीन होता है, क्षणभरमें गवंसे इन्द्र जेसा बन जाता है, क्षणभरमें जहाँ-तहाँ दोड़ लगाता हैऔर क्षणमरमें अनेक वेष बनाता है। जिस प्रकार दही व्लोवनेपर छाँछको गड़गड़ी होती हैवसा कोलाहल मचाता है; नटका थाल, रहटकी माला, नदीकी धारका भंवर अथवा कुभारके चाकके समान घूमता हो रहता है। ऐसा भ्रमण करनेवाला मन आज कंसे स्थिर हो सकता है, जो स्वभावसे हो चंचल ओर अनादिकालसे वक्र है ॥ ५० ॥

मनकी चंचलतापर ज्ञानका प्रभाव (सवैया इकतीसा)

धायो सदा काल पे न पायौ कहूं सांचो सुख,
रूपसों विमुख दुखकूपवास बसा है ।
धरमको घाती अधरमकौ संघाती महा,
कुरापाती जाकी संनिपातकीसी दसा है ।।
मायाकों भपटि गहै कायासों लपटि रहै,
मूल्यों श्रम-भोरमैं बहोरकौसौ ससा है।
ऐसो मन चंचल पताकासों अंचल सु,
ग्यानके जगेसों निरवाण पथ धसा है।॥। ५ ११

शब्दार्थ :- धायौ>-दौडा । विमुखविरुद्ध । संघातो>साथी । कुरापाती>उपद्रवी । गहै-पकड़े । बहोर-बहेलिया । ससा (शशा )> खरगोश । पताका 5ध्वजा । अचल>कपडा

अर्थ :- यह मन सुखके लिये हमेशासे हो भटकता रहा है, पर कहीं बंध हार २०७ सच्चा सुख नहों पाया । अपने स्वानुमवके सुखसे विरुद्ध हुआ दुःखोंके कुएमें पड़ रहा है। धर्मका घाती, अधर्मका संगाती, महा उपव्रवी, सन्निषातके रोगीके समान असावधान हो रहा है। धन-सम्पत्ति आदिको फुर्तीके साथ ग्रहण करता है और शरोरसे मुहब्बत लगाता है, भ्रमजालमें पड़ा हुआ ऐसा भूल रहा है जेसा शिकारोके घेरेमें खरगोश भ्रमण करता है। यह मन पताकाके बस्त्रके समान चंचल है,वह ज्ञानका उदय होनेसे मोक्षमार्गमें प्रवेश करता है ॥ ५१ ॥

मनकी स्थिरताका प्रयत्न (दोहा)

जो मन विषे - कषायमें, बरते चंचल सोइ ।
जो मन ध्यान विचारसों, रुक सुअविचल होइ ॥ ५२ ॥

शब्दार्थ :- रुकै>ठहरे ।अविचल - स्थिर ।

अर्थ :- जो मन विषय-कषाय आदियमें बर्तता हैबह चंचल रहता है और जो आत्मस्वरूपके चितयनमें लगा रहता है वह स्थिर हो जाता है ॥ ५२ ॥

पुनः (दोहा)

ताते विष - कषायसों, फेरि सु सनकी बांति।
सुद्धातता अनुभोविषे, कोज अविचल आनि ॥ ५३ ॥

शब्दार्थ :- बानिःआदत-स्वभाव । अविचल>स्थिर । आनि> लाकर ।

अर्थ :- इससे मनको प्रवृत्ति विषय-कषायसे हटाकर उसे शुद्ध आत्म- अनुभवकी ओर लाओ और स्थिर करो ॥ ५३ ॥

आत्मानुभव करनेका उपदेश (स्वेया इकतीसा )

अलख अस्रति अरूपी अविनासी अज,
निराधार निगम निरंजन निरंध है ।
नानारूप भेस धरे भेसकौं न लेस धर,
चेतन प्रदेस धरे चेतनकौ खंध है।।
मोह धरे मोहीसों विराज तोमै तोहीसो,
न तोहीसौ न मोहीसो न रागी निरबंध है ।
ऐसौ चिदानंद याही घटमे निकट तेरे,
ताहि तू विचार मन और सब घंध है ॥ ५४ ।॥

शब्दार्थ :- अमूरति (अमृरति )>आकार रहित । अविनासी ऋनित्य । अज–जन्म-रहित । निगम>ज्ञानी ।निरध>अखड़ । खध (स्कध) >पिड ! धन (द्रद) >द्विविधा ! अथे *- यह आत्मा अलख, अमूर्तोक, अरूपी, नित्य, अजन्मा, निराधार, ज्ञानी, निविकार और अखंड है। अनेक शरीर धारण करता है पर उन शरी रोके किसी अंशरूप नहीं हो जाता, चेनन प्रदेशोंकों धारण किये हुए चेतन्यका पिण्ड ही है। जब आत्मा शरीर आदिसे मोह करता है तब मोही हो जाता हैऔर जब अन्य वस्तुओंमें राग करता है तब उनरूप हो जाता है, वास्तवमे न शरीरख्य हैऔर न अन्य वस्तुओं रूप है, बह बिलकुल बोतरागी और कमंबंधसे रहित है। हैमन ! ऐसा चिदानन्द इसी घटमे तेरे निकट हैउसका तू बिचार कर, उसके सिवाय और सब जंजाल है ॥ ५४ ॥

आत्मानुभव करनेकोी विधि (सयेय्रा इकतीसा)

प्रथम सुद्रिष्टितों सरीररूप कोजे भिकश्न,
तामे और सूच्छम सरोर भिन्न मानिये ।
अष्टकर्म भावकी उपाधि सोऊ कीजे भिन्न,
ताहम सुबुद्धिकौं विलास भिन्न जानिये।।
ताम प्रभु चेतन विराजत अखंडरूप,
वहै श्रुतग्यानके प्रबांन उर आनिये ।
वाहोको विचार करि वाहीमे मगन हज,
वाको पद साधिबेको ऐसी विधि ठानिये ॥ ५५ ॥
शब्दाथं - शरीर-औदारिक, वेक्रियक, आहारक । सूच्छम सरीर
(सूथ्मणरीर) >तैजस, कार्माण । अ्टकर्म भावकी उपाधि> राग-द्वेप-मोष्ट ।
मुबुद्धिकौ विलास>भेदबिज्ञान
बंध हार २०६

अर्थ :- पहले मेदविज्ञानसे स्थूल शरोरकों आत्मासे भिन्न मानना चाहिये, फिर उस स्थूल शरोरमें तेजस, कार्माण सृक्ष्म शरीर हैं,उन्हें भिन्न जानना उचित है। पश्चात्‌ अष्ट क्मंको उपाधिजनित राग-हेंषोंकों भिन्न करना और फिर भेद-विज्ञानकों भी भिन्न मानना चाहिये । उस मेदविज्ञानमें अखंड आत्मा विराजमान है, उसे श्रुतज्ञानप्रमाण वा नय-निक्षेप आदिसे निश्चित करके उसोका विचार करना ओर उसीमें लीन होना चाहिये। मोक्षपद पानेकी निरंतर ऐसी ही रीति है ॥ ५५ ॥

आत्मानुभवसे कर्मंबध नहीं होता (चौपाई)

इहि विधि वस्तु व्यवस्था जाने।
रागादिक निजरूप न माने ।।
ताते ग्यानबंत_ जगमांही ।
करम बंधको करता नांही ॥ ५६ ॥॥

अर्थ :- संसारमें सम्यग्हष्टि जीव ऊपर कहे अनुसार आत्माका स्वरूप जानता हैऔर राग-द्रेष आदिको अपना स्वरूप नहीं मानता इससे वह कर्मबंधका कर्त्ता नहीं है ॥ ५६ ॥

भेदज्ञानीकी क्रिया (स्वेया इकतीसा )

ग्यानो मेदग्यानसों बिलेछि पुदगल कम,
आतमीक धमंसों निरालो करि मानतो।
ताकौ मूल कारन असुद्ध रागभाव ताके,
नासिबेकों सुद्ध अनुभो अभ्यास ठानतौ ॥।
इत्पालोच्य विवेत््य तत्किल पर्वव्य समग्रं बलातु
तन्‍्मूलां. बहुभावसम्ततिमिसासुडतु काम: समस्‌ ।
आत्मानं समुरंति. निर्भरवहत्यूणकर्सविज्ञुतम्‌
पेनोन्मूलितबन्ध एव. भगवानात्मात्मनि स्फूर्जति ॥ १६॥
याही अनुक्रम पररूप सनबंध त्यागि,
आपमांहि अपनो सुभाव गहि आनतो ।
साधि सिवचाल निरबंध होत तिहूं काल,
केवल विलोक पाइ लोकालोक जानतो ॥ ५७ ॥

शब्दार्थ :- विलेछिचजुदा जानना । निरालौ>भिन्न । अनुक्रम८ सिलसिला । साधिझसिद्ध करके। सिवचालन्मोक्षमार्ग । निरबंध>बंध- रहित । विलोक-ज्ञान ।

अर्थ :- ज्ञानी जीव भेदविज्ञानके प्रभावसे पुद्गलकमंको जुदा जानता हैऔर आत्मस्वमावसे भिन्न मानता है। उन पुदूगल कर्मोके मूल कारण राग-इेंष-मोहू आदि विभाव हैं, उन्हें नष्ट करनेके लिये शुद्ध अनुमवका अम्यास करता हैऔर ५४वें कवित्तमें कहो हुई रोतिसे पररूप तथा आत्म- स्वभावसे भिन्न बंधपद्धतिको हटाकर अपनेहोंमें अपने ज्ञानस्वभावको प्रहण करता है। इस प्रकार वह सर्देव मोक्षमार्गंका साधन करके बंधन रहित होता हैऔर केवलज्ञान प्राप्त करके लोकालोकका ज्ञायक होता है । ५७ ॥

भेदज्ञानीका पराक्रम (सवैया इकतीसा )

जेसे कोऊ मनुष्य अजान महाबलवान,
खोदि मूल वृच्छको उखारे गहि बाहूसौ ।
तेसे मतिमान दर्बकर्म भावकर्स त्यागि,
ह्व॑ रहै अतीत मति ग्यानकी दशाहूसों ।॥।
याही क्रिया अनुसार मिटे मोह अंधकार,
जगे जोति केवल प्रधान सबिताहूसों ।
रागादोनामु दयमदयय दारयत्कारणानां
कार्य बन्धं॑ विविधमधुना सद्य एबं प्रणच ।
शानज्योति: क्षपिततिमिरं साधु सन्नद्मेतत्‌
तद्बद्य॒द॒त्प्सरमपर: कोषपि नास्थाबणोति ॥ १७ ॥
इति बन्धीं निष्क्रान्त. । ८॥।
अंध हार २११
चुके न सकतीसों लुक॑ न॒पुदगल मांहि,
धुके मोख थलकों रुके न फिर काहूसों ॥ ५८ ॥

शब्दार्थ:- अतीतजरीता । सविताहुच्सूर्य । लुकेरछिपे । धुकै>चलता है ।

अर्थ :- जिस प्रकार कोई अजान महाबलवान मनुष्य अपने बाहुबलसे किसो व॒क्षकों जड़से उखाड़ डालता है, उसी प्रकार भेदविज्ञानी मनुष्य ज्ञानकी शक्तिसे द्रव्यकर्म और भावकर्मको हटाकर हलके हो जाते हैं । इस रोतिसे मोहका अंधकार नष्ट हो जाता है और सूर्यसे भी श्रेष्ठ केबलज्ञानकी ज्योति जागतो है, फिर कर्म, नोकमंसे नहीं छिप सकने योग्य अनंतशक्ति प्रगट होती हैजिससे वह सीधा मोक्षकों जाता हैऔर किसोका रोका नहों रुकठ ॥ ५८॥। आठवें अधिकारका सार यद्यपि सिद्धालयमें अनंत कार्माण वर्गणाएँ मरी हुई हैं तो भी सिद्ध भगवानको कर्मका बंध नहीं होता, अरहंत भगवान् योगसहित होनेपर अबध रहते हैं, प्रमत्त रहित हिंसा हो जानेपर मुनियोंको बंध नहों होता, सस्याटृष्टि जीव असयभी होनेपर भी बंधसे रहित है। इससे स्पष्ट हैकि कार्माण वर्गणाओं, योग, हिसा और असंयमसे बंध नहीं होता, केवल शुभ- अशुभ अशुद्धोपयोग हो बंधका कारण है। अशुद्ध उपयोग राग-द्वेष-सोहरूप है, और राग-देष-मोहका अभाव सम्यरदर्शन है, अतः बंधका अभाव करनेके लिये सम्यग्दशनकों सम्हालना चाहिये इसमें प्रमाद करना उचित नहीं है, क्योंकि सम्यग्दशन ही धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष - चारों पुरुषा्थोंका दाता है। यह सम्यग्व्शन विपरोत अभिनिवेश रहित होता है, मैने किया, मेरा है, मै चाहूँ सो करू गा, यह मिथ्याभाव सम्यग्दशनमें नही होता, इसमें शरोर-धन-कुटुम्ब वा विषय-भोगसे विरक्तभाव रहते हैं और चंचल चित्तको विश्वाम मिलता है। सम्यग्दशन जगनेपर व्यवहारकी तललोनता नहीं रहती, निश्चयनयके विषयभुत निविकल्प और निरुषपाधि आत्मरामका स्वरूप-चिन्तवन होता है, और मिथ्यात्वके आधीन होकर संसारी आत्मा जो अनादि कालसे कोल्हूके बेलके समान संसारमें चक्कर काट रहा था उसे विलक्षण शान्ति मिलती है। सम्यस्ज्ञानियोंकों अपना ईश्वर अपनेहोमे दिखता है और बन्धके कारणोंका अभाव होनेसे उन्हें परमेश्वरपद प्राप्त होता है

मोक्ष द्वार (९)

प्रतिज्ञा (दोहा )

बंधदार प्रो भयो, जो दुख दोष निदान ।
अब बरनों सक्षेपसों, मोखद्वार सुखथान ॥ १ ॥

शब्दार्थ :- निदान-कारण । बरनो 5 वर्णन करता हैँ। संक्षेपसौ थोडेमें ।

अर्थ :- दु:खों ओर दोषोंके कारणमृत बंधका अधिकार समाप्त हुआ । अब थोड़ेमें सुखका स्थानरूप मोक्ष अधिकारफा वर्णत करता हूँ ॥ १ ॥

मंगलाचरण (सवेया इकतीसा )

भेदग्यान आरासों दुफारा करे ग्यानी जोव,
आतम करम धारा भिन्न भिन्न चरचे ।
अनुभो अभ्यास लहै परम धरम गहै,
करम भरसको खज़ानों खोलि खरचे ॥।
यौही मोख मुख धाये केवल निकट आये,
पूरत समाधि लहे परमको परचे ।
भयों निरदौर याहि करनौन कछु ओर,
ऐसो विश्वनाथ ताहि बनारसो अरचे ॥ २॥।
दिषाहृर्प प्रशाक्रकचदलनादबस्धपुरषौ
सयस्मोक्ष साक्षास्पुरुषमुपलस्संकनिमतस्‌ ।
इतानोमुन्भज्जत्सहुजपरमानन्दसरस
पर पूर्ण ज्ञानं कृततकलकत्यं विजयते ॥। है ॥।
बंध हार ११३

शब्दार्थ :- चरवे>जाने । खरचेलहटावे । परचे-पहिचाने । निरदौर८स्थिर । विश्वनाथ-संसारका स्वामी । अरचै>बंदना करता है ।

अर्थ :- ज्ञानो जोब भेद विज्ञानकी करोंतसे आत्मपरिणति और कसे- परिणतिको पृथक्‌ करके उन्हें जुदी जुदी जानता हैऔर अनुभवका अभ्यास तथा रत्नत्रय ग्रहण करके ज्ञानाबरणादि कर्म वा राग-हेंष आदि विभावका खजाना खालो कर देता है। इस रोतिसे वह मोक्षके सन्‍्मुख दोड़ता है। जब केवलज्ञान उसके समीप आता हैतब पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके परमात्मा बन जाता है और संसारकी भटकना सिट जाती है तथा करनेको कुछ बाको नहों रह जाता अर्थात्‌ कृतकृरय हो जाता है। ऐसे त्रिलोकोनाथको पंडित बनारसीदासजी नमस्कार करते हैं॥ २ ॥

सम्यग्जानसे आत्माकी सिद्धि होती है (सवेया इकतीसा)

काहू एक जेनी सावधान ह्वू॑ परम पैनी,
ऐसी बुद्धि छेनी घटमांहि डार दीनोी है ।
पेठी नोकरम भेदि दरव करम छेदि,
सुभाउ विभाउताकी संधि सोधि लीनी है ॥!
तहां मध्यपाती होय लखी तिन धारा दोय,
एक सुधासई एक सुधारस-भोनी है।
मुधासों विराखि सुधासिधुमें मगत भई,
ऐती सब क्रिया एक समे बोचि कोनो है ॥ ३ १।

शब्दार्थ:- सावधान प्रमाद रहित। पैनी>तेज । पेठी>घुसी । संधि->मिलाप । मध्यपाती>बिचोही । मुघामई-अज्ञानमयी । सुधारस- अमृतरस । विरचि> छोड़कर । प्रशालेत्रो शितियं कबमपि निपुर्ण: परातिता सामधाने: सृक्मेपन्‍्त:सम्धियरणे निपलति रभसादात्मकर्मोभयस्म । आत्मानं सग्नभस्तःस्थिरविशदलसद्धास्ति चअंतस्पप्रे बन्धं चाशानभावे नियमितममितः कुर्बतोमिपन्नभिस्नो ॥ २ ॥

अर्थ :- जेन-शास्त्रके ज्ञाता एक जनोने बहुतहोी सावधान होकर विवेकरूपो तेज छेनो’ अपने हृदयमें डाल दो, जिसने प्रवेश करते ही नोकर्म, ब्रव्यकर्म, भावकर्म और निजस्वमावका प्ृथक्‍करण कर दिया। वहाँ उस जञाताने बीसमें पड़कर एक अज्ञानमय और एक ज्ञानसुधारसमय ऐसी दो धारा देखीं, तब वह अन्ञानधारा छोड़कर ज्ञानरूप अमृतसागरमें मग्न हुआ । इतनी सब क्रिया उसने मात्र एक समयमें हो की ॥ ३ ॥

पुन: (दोहा)

जैसे छेनी लोहको, करे एकसों दोह ।
जड़ चेतनकी भिन्नता, त्यों सुबुद्धिसों होइ ॥ ४ ॥!

अर्थ :- जिसप्रकार लोहेको छुतो काष्ठ आदि वस्तुके दो खंड कर देती है उसी प्रकार चेतन-अचेतनका पृथक्करण भेदविज्ञानसे होता है ॥ ४ ॥

सुबुद्धिका विलास (सर्व वर्ण लघु, चित्रकाव्य घनाक्षरी )
धरति धरम फल हरति करम मसल,
मन बच तन बल करति समरपन ।
भखति असन सित चखति रसन रित,
लखति अमित वित करि चित दरपन ॥।
कहति मरस धुर दहति भरम पुर,
गहति परम गुर उर उपसरपन।
रहति जगति हित लहति भगति रति,
चहति अग॒ति गति यह मति परपन ॥ ५ ॥
शब्दार्य :- भखति>खाती है । असनम-भोजन । सित> उज्ज्वल ।
अमित-अप्रमाण । दहति>जलाता है। पुरूनगर। उपसरपन-स्थिर ।
अगत्ति गति-मोक्ष ।
अथथे :- कल घसंरूप फलकों धारण करतो है, कमंमलको हरती है,
सत-वचन-काय तोनों बलोंकों मोक्षमागमें लगातो है, जीभसे स्वाद लिये
१ शस्त्र विशेष ।
मोक्ष हार २१५
बिना उज्ज्वल ज्ञानका भोजन खातो है, अपनी अनंत ज्ञानरूप सम्पत्ति
खित्तरुप दर्पणमें देखती है, ममंकी बात अर्थात्‌ आत्माका स्वरूप बतलाती
है, मिथ्यात्वरूप नगरको भस्म करतो है, सद्गुरुकी वाणी ग्रहण करती है,
चित्तमें स्थिरता लाती है,जगतकी हितकारो बनकर रहतो है,त्रिलोकनाथकी
भक्तिमें अनुराग करतो है, मुक्तिकी अभिलाषा उत्पन्न करती है; ऐसा
सुबृद्धिका बिलास है । ५ ॥।

सम्पग्ज्ञानीका महत्व (सब वर्ण गुरु, सवैया इकतीसा )

राणाकौसो बाना लीने आपा साधे थाना चोने,
दानाअंगी नानारंगी खाना जंगी जोधा है ।
मायाबेली जेती तेती रेतम धारेती सेती,
फंदाहीकौ कंदा खोद खेतीकौसो लोधा है ॥।
बाधासेती हांता लोर राधासेती तांता जोर,
बांदीसेती नाता तोरे चांदोकौसो सोधा है ।
जाने जाहो ताही नीक॑ माने राही पाही पीक॑,
ठाने बाते डाही ऐसो धारावाही बोधा है ॥ ६ ॥

शब्दार्थ:- राणान्बादशाह । वानात्भेप । थाना>स्थान । चीनैं- पहिचाने । दानाअगी>प्रतापी ।खाना जगी जोधान्यद्धमे महा शरवीर । कदा-कासकी जड़े । खेतीकौंसो लोधा>किसानके समान । वाबास्वलिश । हांता लोरें>अलग करता है। ताता>डोर । बॉदी>दासी । नाता->सम्बन्ध । डाही>होश्यारी । बोधा> ज्ञानी ।

अर्थ :- भेदविज्ञानी ज्ञाता, राजा जेसा रूप बनाये हुए हे । वह अपने आत्मरूप स्वदेशको रक्षाके लिये परिणामोंकी सम्हाल रखता है, और आत्मसत्ता भूमिरूप स्थानको पहिचानता है; प्रशम, सवेग, अनुकंपा आदिकी सेना सम्हालनेमें दाना अर्थात्‌ प्रवोण होता है, शाम, दाम, दंड, भेद आदि कलाओंमें कुशल राजाके समान है; तप, समिति, गुप्ति, परीषहजय, धर्म, अनुप्रेक्षा आदि अनेक रंग धारण करता है; कमंरूपी शत्रुओंकों जोतनेमे बड़ा बहादुर होता है। मायारूपी जितना जोहा है, उस सबको चर-त्ुर करनेको रेतोके समान है, कर्मके फंदेरूप कांसको जड़से उखाइनेके लिये किसानके समान है,कर्मबंधके वुखोंसे बचानेवाला है,सुमति राधिकासे प्रीति जोड़ता है, कुमतिरूप दासीसे संबंध तोड़ता है, आत्मपदार्थरूप चांदोको ग्रहण करते और पर पदार्थरूप धुलकों छोड़नेमें रजत-सोधा (सुनार) के समान है। पदार्थंकों जैसा जानता है बेसाही मानता है, भाव यह हैकि हैयकी हेय जानता और हेय मानता है। उपादेयकोी उपादेय जानता और उपादेय सानता है," - ऐसी उत्तम बातोंदा आराधक धाराप्रवाही ज्ञाता है । ६१।

ज्ञानी जीव ही चक्रवर्ती है(सबया इकतीसा )

जिन्हक॑ दरव मिति साधन छखंड थिति,
बिनसे विभाव अरि पंकति पतन हैं।
जिन्हक॑ भगतिको विधान एई नौ निधान,
त्रिगुनके भेद मानो चौदह रतन हैं ।।
जिन्हक सुबुद्धिरानो चूरे महा सोह बज्च,
पूरे मंगलीक जे जे मोखके जतन है।
जिन्हके प्रमान अंग सोहै चम्र्‌ चतुरंग,
तेई चक्रवत्ती तनु धर पे अतन हैं॥ ७ ॥

शब्दार्थ :- अरि पकति>शन्नु-समृह । पतनल्‍नष्ट होना । नव निधान-तव निधि । मगलीक>मडल, चौक । चमू>सेना । चतुरगन्‍्सेनाके चार अग हाथी, घोडे, रथ, पंदल । अतन"शरी ररहित ।

अर्थ :- ज्ञानी जीव चक्रवर्तोके समान हैं- क्योंकि चक्रवतों छह खंड पृथ्वी साधते-जीतते हैं,ज्ञानी छह द्रव्योंको साधते हैं;चकऋ्रबतों शत्रु-समृहकों नष्ट करते है, ज्ञानी जीव विभाव परिणतिका विनाश करते हैं; चक्रवर्तोके आत्मा उड़दका मास (भीतरी ग्रूदा) मगज आदिके समान उपादेय है, और जन [५ छिलका फोक आदिके समान शरीरादि हेय है । नवनिधि’ होती हैं,ज्ञानो नवमक्ति* धारण करते हैं;बक्रवर्तोके घोदह रत्न होते हैं,शानियोंके सम्पग्द्शन-ल्ान-चारित्रके भेदरूपः चोदह रत्न* होते हैं; चक्रवत्तोकी पटरासी दिग्विजयकों जानेके अवसरपर चुटकोसे बज्य- रत्नोंका चूर्ण करके चोक प्रतो हे,शञानी जीवोंकी सुबुद्धरूप पटरानी मोक्ष जानेका शकुन क रनेको महा-मोहुरूप वज्ञ्कों चूर्ण करतो है;चक्रवत्तोके हाथी, घोड़े, रथ, पेदल ऐसी चतुरंगिनी सेना रहती है, ज्ञानी जोबोंके प्रत्यक्ष, परोक्ष, प्रमाण, नय और निक्षेप होते हैं ।विशेष यह है किचक्रवर्तोके शरीर होता है, पर शानों जीव देहसे विरक्त होनेके कारण शरीररहित होते हैं- इसलिये ज्ञानी जीवबोंका पराक्रम चक्रवर्तोके समान है ॥ ७ ॥

नव भक्तिके नाम (दोहा)

श्रवन कीरतन चितवन, सेवन बंदन ध्यान ।
लघुता समता एकता, नौधा भक्ति प्रवान ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :- श्रवण >उपादेय गुणोंका सुनना । कौरतन (कीतेन)- गुणोंका व्यास्यात करना । चितवनन्य्यगुणोका विचार करना। सेवन गुणोंका अध्ययन करना। बंदनार>गरुणोंकी स्तुति करना । ध्यान >ग्रुणोंका

सहाकाल असि ससिके साधन, देत कालनिधि प्रंथ महान् । मानव आयुध भाड नसरप, सुभग पिगला मूषन लात ॥। पॉडुक लिथि सब धान्य देत है, कर शंख वाजित्र प्रदान । सर्व रतन रत्नोकी दाता, वस्त्र देत निधि पद्म सहास ॥।

जवभक्तिके नाम आगेके दोहेमे कहे है । 3 चक्नवर्तीके चौदह रत्नोमे सात सजीव रत्न होते हैं, और सात अजीब होते हैं । वे इस प्रकार हैं.- दोहा - सेनापति ग्रहपति थपित, प्रोहित नाग तुरंग । बनिता मिलि सातों रतन, हैंसजोब सरवंग ॥ १ ॥

चक्र छत्र असि दंड मणि, चर्म कांकणी नाम ।
ये अजीब सातों रतन, चक्रवत्तिके धाम ॥ २ ॥

कवबिने चौदह रत्नोकी सख्याको त्रिगुणके भेदोमे गिनाया है - सो सम्यर्दर्शनके उपशम, क्षयोपशम, क्षायक ये तीन; ज्ञानके मति, श्रुत, अवधि, मन पर्यय, केवल ये पाँच; और चारित्रके सामायिक छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि सुक्ष्मसांपराय, यथार्यात और संयमासयम ये छह - ऐसे सब मिलकर चोदह जान पड़ते हैं । स्मरण रखना । लघुना>गुणोंका गये नहीं करना । समता>सब पर एकसी हृष्टि रखना । एकत्ताजएक आत्माहीकों अपना मानना, शरीरादिकों पर मानना ।

अर्थ :- श्रवण, कीत्तत, चितवन, सेवन, बंदन, ध्यान, लघुता, समता, एकता ये नव प्रकारकी मक्ति हैं, जोज्ञानो जोव करते हैं ॥ ८ ॥

ज्ञानी जीवोंका मन्‍्तव्य (सवैया इकतीसा )

*“कोऊ अनुभवी जोब कहे मेरे अनुभौभें,
लक्षन विभेद भिन्न करमकौ जाल है।
जाने आपा आपुकों जु आपुकरि आपुविषे,
उत्तपति नास श्रुव धारा असराल है ॥।
सारे बिकलप मोसों न्‍्यारे सरवथा मेरौ,
निहचे सुभाव यह विवहार चाल है।
में तोसुद्ध चेतन अनंत चिनमुद्रा धारी,
प्रभुता हमारी एकरूप तिहूँ काल है॥ ६ ॥

अर्थ :- आत्म-अनुभवी जोब कहते हैं कि हमारे अनुभवसें आत्म- स्वभावसे विरुद्ध चिन्ोंका धारक कर्मोंका फंदा हमसे प्रथक है, बे आप’ अपनेको *अपने द्वारा? अपनेमें” जानते हैं। द्रव्यकी उत्पाद, व्यय और प्र्‌व यह त्रिगुण घारा जो मुभमें बहती हैं, सो ये विकल्प, व्यवहार नयसे हैं,मुझसे संधा भिन्न हैं; में तोनिश्चयनयका विषयन्नत शुद्ध और अनंत चेतन्यमृतिका धारक हूँ, सेरा यह सामथ्यं सदा एकसा रहता है- कभो घटता-बढ़ता नहीं हे ॥ ६ ॥

यह कत्तं
रूप है ।
यह कमंरूप है ।
यह करणरूप है ।
यह अधिकरणरूप है ।

भित्वा सर्वमपि स्वसक्षणबला:दूसंहि. यच्छक्‍्यते चिन्मुद्राडितनिविभायमहिमा शुद्धश्रिवेवास्म्यहम्‌ । निधन्ते यदि कारकाणि यदि वा धर्मा गुणा वा यदि भिद्यन्ता न भिदास्ति काचन विभौ भावे विशुद्ध चिति ॥ ३१

आत्माके चेतन लक्षणका स्वरूप (सवैया इकतीसा )

निराकार चेतना कहावे दरसन गुन,
साकार चेतना सुद्ध ज्ञान गुनसार है।
चेतना अद्व त दोऊ चेतन वदरब मांहि,
सामान विशेष सत्ताहोको बिसतार है ॥।
कोऊ कहे चेतना चिहन नांही आतमा में,
चेतनाके नास होत त्रिविध विकार है।
लक्षनकों नास सत्ता नास मूल वस्तु नास,
ताते जीव दरबको चेतना आधार है । १० ।।

शब्दार्थ :- निराकार चेतना>जीवका दर्शनगुण जो आकार आदिको नहीं जानता । साकार चेतना>जीवका ज्ञानमुण जो आकार आदि समेत जानता है । अद्वत-एक । सामान्य-जिसमे आकार आदिका विकल्प नहीं होता । विशेष>जो आकार आदि सहित जानता है। चिहन (चिह्न) लक्षण । त्रिविध-तोन तरहके । विकारजदोप ।

अर्थ :- चेतन्यपदार्थ एकरूप ही है, पर दर्शनगुणकों निराकार" चेतना और ज्ञानगुणको साकार" चेतता कहते हैं। सो ये सामान्य और विशेष दोनों एक चेतन्यहीके विकल्प है, एकहो द्रव्यमें रहते हैं। वेशेषिक १, * पदार्थंकों जाननेके पहले पदार्थके अस्तित्वका जो किचित्‌ भान होता है बह दर्शन है, दर्शन यह नही जानता कि पदार्थ किस आकार व रगका है, वह तो सामान्य अस्तित्व मात्र जानता है, इसीसे दर्शनगुण निराकार और सामान्य है। इसमें महासत्ता अर्थात्‌ सामान्य सत्ताका प्रतिभास होता है। आकार रग आदिका जानना ज्ञान है, इससे ज्ञान साकार है, सविकल्प है, विशेष जानता है । इसमे अवातर सत्ता अर्थात्‌ विशेषसत्ताका प्रतिभास होता है। (विशेष समभनेके लिये ‘वृहद्द्रव्यसग्रह’ की ज॑ं सामण्ण गहुणं, आदि गाथाओका भ्ष्ययन करना चाहिये । ) अद् तापिहि चेतना जगति चेद्‌ हृग्शप्तिरूपं त्यजेतु तत्सामान्यविशेषरुपविरहात्साइस्तित्वमेव _त्यजेत्‌ । तत्त्यागे जहता चितोषषि भवति व्याप्यो बिना व्यापका- दात्मा चान्तम्ुरपेति सेव नियत॑ हस्कप्तिख्पास्तु चित्‌ ॥ ४ ॥ आदि पतवाले आत्मामें चेतन्पगुण नहीं मानते हैं, सोउनसे जेनमतबालोंका कहना है कि चेतताका अभाव साननेसे तीन दोष उपजते हैं, प्रथम तो लक्षणका नाश होता है, दूसरे लक्षणका नाश होनेसे सत्ताका नाश होता है, तोसरे सत्ताका नाश होनेसे मूल वस्तुहीका नाश होता है। इसलिये जीव द्रव्यका स्वरूप जाननेके लिये चतन्यहोका अवलम्बन है ॥ १० ॥

(दोहा )

चेतन लक्षन आतमा, आतम सत्ता सांहि।
सत्तापरिमित वस्तु है, भेद तिहूंसें नांहि । ११॥।

अर्थ :- आत्माका लक्षण चेतना है, और आत्मा सत्तामें है, क्‍योंकि सत्ता घमंके बिना आत्मपदार्थ सिद्ध नहीं होता, और अपनो सत्ता प्रमाण वस्तु है,सो द्रव्य अपेक्षा तोनोंमें भेद नहीं है, एक हो है॥ ११ ॥

आत्मा नित्य है (सवेया तेईसा )

ज्यों कलधोत सुनारकी संगति,
भूषण नाम कहे सब कोई ।
कंचनता न मिटी तिहि हेत,
वहे फिरि औटिक कंचन होई॥
त्यों यहू जोव अजोब संजोग,
भयो बहुरूप भयो नहि. दोई।
चेततता न गई कबहूं,
तिहि कारन ब्रह्म कहावत सोई ॥ १२ ॥

शब्दार्थ :- कलधौत-सोना । भूषन>गहना । औटत्त-ग लानेसे । ब्रह्म-नित्य आत्मा ।

अर्थ :- जिस प्रकार सुनारके द्वारा गढ़े जानेपर सोना हो जाता है, पर गलानेसे फिर सुवर्ण हीकहलाता है; गहनेके रुपसें अजोवरूप कमंके निभित्तसे अनेक वेष घारण करता उसी प्रकार यह जीव है, पर अन्यरूप नहीं हो जाता, क्योंकि चेतस्यगुण कहीं चला नहीं जाता; इसो कारण जीवको सब अवस्थाओंमें ब्रह्म कहते हैं(। १२ ।॥

सुबुद्धि सखीको ब्रह्मका स्वरूप समभझाते हैं (सवेया तेईसा)

देखु सली यह ब्रह्म विराजित,
। याकी दसा सब याहीकों सोहै।
एकमैं एक अनेक अनेकमें,
दुद लिणें दुविधामह दो है॥
आपु संभारि लखे अपनों पद,
आपु विसारिक आपुहि मोहे।
व्यापकरूप यहै घट अंतर,
ग्यानमें कोन अग्यानमें को है ॥ १३ ॥।

शब्दार्थ :- विराजित-शोभायमान । दसाल्‍परिणति । विसारिके८ भूलके ।

अर्थ :- सुबृद्धिरूप सखोसे कहते हैं कि हेसखो देख; यह अपना ईश्वर सुशोभित है, इसकी सब परिणति इसे हो शोमा देतो है, ऐसी विचित्रता ओर दूसरेमें नहीं है । इसे आत्मसत्तामें देखो तो एकरूप है, ओर परसत्तामें देखो तो अनेकरूप है, ज्ञानदशामें देखो तो ज्ञानरूप, अज्ञानदशामें देखो तो अज्ञानरूप, ऐसी दोनों दुबिधाएँ इसमें हैं। कमी तो सचेत होकर अपनो शक्तिको सम्हालता हैऔर कभी प्रमादमें पड़कर निज-स्वरूपको भूलता है, पर यह ईश्वर निजघटसें व्यापक रहता है। अब विचार करो कि जशञानरूप परिणमन करनेवाला कोन है और अज्ञानदशामें बतंनेवाला कौन है ? अर्थात्‌ वही है ॥ १२ ॥

आत्म-अनुभवका दृष्टान्त (स्वेया तेईसा )

ज्यों नट एक धरे बहु भेख,
कला प्रगट बहु कोतुक देखे ।
आपु लखे अपनी करतूति,
बहै नट भिन्न विलोकत भेखे ।।
०>७७>०७-७+०५५५3०->भन3५33०<3->+.-3+33333-3+
3७3 न-ननम«+नन-भ3५ ननन-नननमन-नन ननननननन- मनन नममनननानक 3++े+नसओ+ १७+++म+न++ननन
त्यों घटमें नट चेतन राव,
विभाउ दसा धरि रूप विसेखें।
खोलि सुदृष्टि लखे अपनों पद,
दुद विचारि दसा नहिं लेखें॥ १४॥।

अर्थ :- जिस प्रकार नट अनेक स्वाँग बनाता है, और उन स्वाँगोंके तमाशे देखकर लोग कौतूहल समभते हैं, पर वह नट अपने असतो रूपसे ऊत्रिम किये हुए वेषकों भिन्न जानता है, उसी प्रकार यह नटरूप चेतनराजा परव्रव्थके निमित्तते अनेक विभाव पर्यायोंको प्राप्त होता है, परंतु जब अंतरंगहष्टि खोलकर अपने सत्य रूपको देखता है तब अन्य अवस्थाओंको अपनी नहीं मानता ॥ १४ ॥

हेय-उपादेय भावोंपर उपदेश (छद अडिहल )
“जाके चेतत भाव, चिदानंद सोइ है।
और भाव जो धरे, सो ओरो कोइ है !।
जो चिनमंडित भाउ, उपादे जानने ।
त्याग जोग परभाव, पराये मानने ॥ १५॥॥

शब्दार्थ :- चिदानद-चेतनवत आत्मा । उपादे (उपादेय )>ग्रहण करनेके योग्य । हेय त्यागने योग्य । पशयेजदुसरे । मानने रश्रद्धान करना चाहिये ।

अर्थ :- जिसमें चेतन्यभाव हैवह चिदात्मा है, और जिसमें अन्यभाव है, वह ओर ही अर्थात्‌ अनात्मा है। चेतन्यमाव उपादेय है, परद्रव्योंके भाव पर हैं+ त्यागने योग्य है॥ १५ ॥ ज्ञानी जीव चाहे घरमे रहे चाहे वनमे रहे मोक्षमार्ग साधते हैं

(सर्वेया इकतीसा )

जिन्हक सुमति जागी भोगसो भये विरागी,
परसंग त्यागी जे पुरुष त्रिभुवनमैं ।

एकश्रितश्रिस्मय एवं भावों भावा. परे ये किल ते परेषाम । ग्राह्मस्ततकथ्रिन्मय एवं भावों भावाः परे स्वत एवं हेया ॥ ५ ॥

भोक्ष हार २२२
रागादिक भावनिर्सों जिनिको रहनि न्यारी,
कबहूं मगन ह्वू न रहें धाम धन में ।।
जे सदेव आपकों विचार सरवांग सुद्ध,
जिन्हके विकलता न व्याप कहूं मन में ।
लेई सोख सारगके साधक कहावे जीव,
भाव रहो मदिरमें भाव रहो वनमें ॥ १६ ॥
शब्वार्थ :- सुमति> अच्छी बुद्धि ।जागी >प्रगट हुई । परसग त्यागी
देह आदिसे ममत्वका त्यागना । त्रिभुवन >तीनलोक - ऊध्वे, मध्य, पाताल ।
सरवाग [सर्वाग) च"्पृर्णतया । विकलता> भ्रम । भावै>चाहे तो । मंदिरमै>
घरमें । वनमे > जगलमें ।

अर्थ :- जिन्हें सुबुद्धिका उदय हुआ है, जो भोगोंसे विरक्त हुए हैं, जिन्होंने शरोर आदि परद्रव्योंस समत्व हटाया है, जो राग-हेष आदि भावोंसे रहित हैं, जोकभी घर ओर धन-सम्पत्ति आदिमें लोन नहों होते, जो सदा अपने आत्माको सर्वांग शुद्ध विचारते हैं, जिन्हें मनमें कभी आकुलता नहों व्यापती, वे ही जोब त्रेलोक्यमें” मोक्ष मागंकेसाधक हैं, चाहे घरमें रहें, चाहे बनमें रहें ॥ १६ ॥

मोक्षमार्गी जीवोकी परिणति (सर्वेया तेईसा )

चेतन मंडित अंग अखंडित,
सुद्ध पवित्र पदारणथ मेरो।
राग विरोध विमोह दसा,
समुर्भे भ्रम नाटक पुदगल केरो॥।

चाहे ऊध्वलोक अर्थात्‌देवगतिमे हो, चाहे मध्यलोक अर्थात्‌ मनुष्य तिर्यच जातिमे हो चाहे पाताललोक अर्थात्‌ भवनवासी व्यतर वा नरकगतिमे हो । सिद्धान्तोष्यमुदासचित्तचरितमोक्षाथिभि:. सेव्यतां शुद्ध चिन्मयमेकमेव परम ज्योति: संर्दवास्म्यहम्‌ । एते ये तु समुल्लसन्ति विविधा भावा: पृथस्लक्षणा- स्तेप्ह नास्मि यतोषज से मस परद्रव्य॑ सरप्रा अपि ॥ ६ ॥

भोग संयोग वियोग बिथा,
अवलोकि कहै यह कमंज घेरो ।
हैजिन्हकौ अनुभो इह भांति,
सदा तिनकों परमारथ नेरो ॥। १७१

शब्दार्थ :- मडितल्‍ शोभित । अखंडित छिद-भिद नही सकता ।

अर्थ :- जो विचारते हैं किमेरा आत्मपदार्थ चेतन्यरूप है, अछेच, अभ्ेद्य, शुद्ध और पवित्र है, जो राग-देष-मोहको पुदुगलका नाटक समभते हैं, जोमोगसामग्रोके संयोग और वियोगकी आपत्तियोंको देलकर कहते हैं कि ये कर्मजनित हैं- इसमें हमारा कुछ नहीं है, ऐसा अनुभव जिन्हें सदा रहता है, उनके समोप हो मोक्ष है ॥ १७ ॥

सम्यग्हष्टि जीव साधु हैंऔर मिथ्यादृष्टि जीव चोर है (दोहा)

जो पुमान परधन हरे, सो अपराधो अग्य ।
जो अपनो धन व्योहरे, सो धनपति सरकाय ॥ १८ ॥
परकी संगति जो रचे, बंध बढ़ाबे सोह ।
जो निज तत्ताम मगन, सहज मुक्त सो होइ ॥ १६॥
शब्दाथ :- पुमान>मनुष्य । परधन हरे"परद्रव्यकों अगीकार करते
है। अग्य>मूर्स ।धनपति-साहुकार । रचे-लीन होवे ।

अर्थ :- जो मनुष्य परद्वव्य हरण करता है बह मुख है, चोर है;जो अपने धनका उपयोग करता है वह समभदार है, साहुकार है॥ १८ ॥ जो परद्रव्यको संगतिमें सग्न रहता है, बहू बंधस ततिको बढ़ाता है और जो निज-सत्तामें लोन रहता है, वह सहज हो मोक्ष पाता है ॥ १६ ॥

परह्श्यप्रहू॑_ कु्षेन बध्यतेवापराधवान्‌ ।
बध्येशानपराधों न स्वढ्टब्ये संबतो यति. ॥ ७ ॥
अनवरतमनन्तेबंध्यते सापराधः
स्पृशति निरफराधो बंधन नेब जातु ।
नियतमयमशुद्ध स्व भजन्सापराधों
भवति निरपराषः साधु शुद्धास्मसेवी । ८।।
सोक्ष हार २२५

भावार्थ :- लोकसें प्रवृत्ति हैकि जो दूसरेके धनको लेता है उसे अज्ञानी, चोर वा डाक्‌ कहते हैं,बह गुनह॒गार ओर दण्डनोय होता है, और जो अपने धनको वर्तता है, वह सहाजन वा समझदार कहलाता है, उसकी प्रशंसा को जाती है । उसो प्रकार जो जोव परद्रव्य अर्थात्‌ शरीर वा शरीरके सम्बन्धी चेतन-अचेतन पदार्थोंको अपना मानता है, वा उनमें लोन होता है, वह भिव्यात्वी है, संसारके क्लेश पाता है। और जो निजात्माकों अपना मानता वा उसोका अनुभव करता है, वह ज्ञानी है, मोक्षका आनन्द पाता है ।। १८-१६ ।।

द्रव्य और सत्ताका स्वरूप’ (दोहा)

उपज विनसे थिर रहै, यह तो वस्तु बखान ।
जो मरजादा वस्तुकी, सो सत्ता परवांन ॥ २० ॥

शब्दार्थ :- उपजै उत्पन्न होवे । विनसै-नष्ट होवे । वस्तु- द्रव्य । मर्यादाल्सीमा, क्षैत्रावगाह । परवान (प्रमाण) -जानना ।

अर्थ :- जो पर्यायोंसे उत्पन्न और नष्ट होता है,परन्तु स्वरूपसे स्थिर रहता है,उसे द्रव्य कहते हैं, और द्रव्यके क्षेत्रावगाहको सत्ता कहते है ॥ २० ॥

पट द्रव्यकी सत्ताका स्वरूप (स्वेया इकतीसा )

लोकालोक मान एक सत्ता हैआकाश दर्व,
धर्म दर्व एक सत्ता लोक परमिति है।
लोक परवान एक सत्ता हैं अधर्म दर्ज,
कालके अन्ू असंख सत्ता अगनिति है ॥।
पुदूगल सुद्ध परवानुकी अनंत सत्ता,
जीवकी अनंत सत्ता न्यारी न्यारो छिति है ।
कोऊ सत्ता काहूसों न मिलि एकमेक होइ,
सबे असहाय यौं अनादिहीकी थिति है ॥ २१ ॥
) ‘पचास्तिकायजी को सत्ता सब्व पयत्या’ आदि गाथाओका स्वाष्याय करके यह
विषय जच्छी तरहसे समझना चाहिये ।

शब्दार्थ :- लोकालोक सर्वआकाश । परमिति>बराबर । परवान (प्रमाण) >बराबर । अगनितिल्‍अश्वख्यात । न्यारी न्यारील्‍छजुदी जुदी । थिति (स्थिति) >मौजूदगी । असहाय-स्वाधीन । मर्थ :- आकाशद्रव्य एक है, उसकी सत्ता लोक-अलोकसें है, धर्मंद्रव्य एक है, उसकी ससा लोक-प्रमाण है, अधमंद्रव्य भी एक है, उसको सत्ता भी लोक-प्रमाण है, कालके अणु असंख्यात हैं,उनको सत्ता असंख्यात है, पुदूगल द्रव्य अनंतानंत हैं, उनकी सत्ता अनंतानंत है, जीव द्रव्य अनंतानंत हैं, उनकी सत्ता अनंतानंत है,इन छहों द्रव्योंकी सत्ताएँ जुदी जुदी हैं, कोई सत्ता किसोसे मिलतो नहीं, और न एकमेक होती है। निश्चयनयसें कोई किसीके आश्रित नहीं सब स्वाधोन हैं ।ऐसा अनादिकालसे चला आ रहा है॥ २१ ॥

छा द्रव्यहीसे जगतकी उत्पत्ति है (सवेया इकतीसा )

एई छूहों दवे इनहीकौ है जगतजाल,
तामे पांच जड़ एक चेतन सुजान हैं ।
काहूकी अनंत सत्ता काहूसों न मिले कोइ,
एक एक सत्तामे अनंत ग्रुन गान है।॥।
एक एक सत्तामे अनंत परजाइ कफिरे,
एकमे अनेक इहि भांति परवान है ।
यहे स्थादवाद यहे संतनिकी मरजाद,
यहे सुख पोख यह मोखको निदान है ॥ २२ ॥

शब्दार्थ :- जगतजालजससार । सुजानज>ज्ञानमय । सतनकीर सत्पुर्षोकी । मरजाद>सीमा । पोख>पुष्टि करनेवाला । निदान>कारण ।

अर्थ:- ऊपर कहे हुए ही छह द्रव्य है, इन्हींसे जगत् उत्पन्न है । इन छह द्रव्योंमें पॉच अचेतन हैं, एक चेतनद्रव्य ज्ञानमय है । किसीकी अनंतसत्ता किसीसे कभी मिलतो नहीं है। प्रत्येक सत्तामें अनंत गुण-समूह है,और अनंत अबस्थाएँ है. इस प्रकार एकमें अनेक जानना। यही स्थाद्वाद है, यही सत्पुरुषोंका अखंडित कथन है, यहो अनंदवर्धक है और यही ज्ञान मोक्षका कारण है ॥ २२ ॥

पुनः (सवैया इकतीसा)

साधी दथधि संथमें अराधी रस पंथनिमें,
जहां तहां ग्रंथनिमें सत्ताहीकों सोर है ।
ग्यान भान सत्तामैं सुधा निधान सत्ताहोमें,
सत्ताकी दुरनि सांक सत्ता मुख भोर है ।।
सत्ताकौ सरूप मोख सत्ता भूल यहै दोष,
सत्ताके उलंघे धृमधाम चहूं बोर है ।
सत्ताकी समाधिमें बिराजि रहे सोई साहू,
सत्ताते निकसि और गहे सोई चोर है ॥ २३ ॥

शब्दार्थ :- दधि-दही । मथमैं-विलोवनेमे ।रस पथ>रसका उपाय । मोर (शोर) >आन्दोलन । सत्ता>वस्तुका अस्तित्व, मौजूदगी । धूमधाम चहू वोर-चतुर्गति श्रमण। समाधि>अनुभव । साहुल्‍भला आदमी । गहै>ग्रहण करे ।

अर्थ :- दहीके मथनेमें घीकी सत्ता साधी जातो है, औषधियोंकी हिकमतमे रसकी सत्ता है, "स्त्रोंमें जहाँ-तहाँ सत्ताहीका कथन है, ज्ञानका सूर्य सत्तामें है, अमृतका पुज सत्तामें है,सत्ताका छुपाना सांभके’ अंधकारके सप्रान है, और सत्ताकों प्रधान करना सबेरेका’ सुर्य उदय करना है । सत्ताका स्वरूप ही मोक्ष है, सत्ताका भूलना ही जन्म-मरण आदि दोषरूप संसार है, अपनी आत्मसत्ताका उलंधन करनेसे चतुर्गतिमें भटकना पड़ता है। जो आत्मसत्ताके अनुभवमें विराजमान हैबही भला आदमी है और जो आत्मसत्ताको छोड़कर अन्यको सत्ताको ग्रहण करता हैवही चोर है ॥ २३ ॥

आत्मसत्ताका अनुभव निविकल्प है (सवेया इकतीसा)

जामें लोकवेद नांहि थापना उछेद नांहि,
पाप पुन्न खेद नांहि क्रिया नांहि करनी ।
जामे राग दोष नांहि जामे बंध मोख नांहि,
जाम प्रभु दास न अकास नांहि धरनों ॥
) -4 माभके अधकारसे भाव यह दिखता है कि अज्ञानका अधकार बढ़ता जावे ।
प्रभातके सूयदियसे यह भाव दिखता ह॑ कि ज्ञानका प्रकाण बढ़ना जावे ।
जामे कुल रीत नांहि जामें हारि जीत नांहि,
जामे गुरु सोष नांहि वीष नांहि भरनों ।
आश्रम बरन नांहि काहुको सरन नांहि,
ऐसी सुद्ध सत्ताको समाधिभूमि बरनी ॥ २४ ॥

शब्दार्थ :- लोकवेद-लौकिक ज्ञान । थापना उछेद-लौकिक बातोका स्थापन-खंडन । (जैसे मृतिको ईश्वर कहना यह लोक-व्यवहार हैऔर मूतिपूजाका खडन करना लोक-स्थापनाका उच्छेद करना हैसो सत्तामें दोनों नही है) । खेद-कष्ट । प्रभु-स्वामी । दास"सेवक । धरनी पृथ्वी । वीष भरनी>मजिल पूरी करना । बरन आश्रम (वर्ण आश्रम) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वेश्य, शूद्र येचार ।

अर्थ :- जिसमें लोकिक रीतियोंकी न विधि है न निषेध है, न पाप- पुण्यका क्लेश है, न क्रियाकी मनाही है, न राग-द्ेष है, न बंध-मोक्ष है, त स्वामी है न सेवक है, नआकाश" हैन धरतो* है, न कुलाचार है, न हार- जीत है, न गुरु है न शिष्य है, नचलना-फिरना है.न वर्णाभ्रम है, न किसीका शरण है। ऐसी शुद्धसत्ता अनुमवरूप भूमि पर पाई जाती है ॥ २४ ॥

जो आत्मसत्ताको नही जानता वह अपराधी है (दोहा)

जाके घट समता नहीं, ममता मगन सदीव ।
रमता राम न जानई, सो अपराधी जीव ॥ २५ ॥
अपराधी भिथ्यामती, निरदे हिरदे अंध।
परकों माने आतमा, करे करमकौ बंध ॥ २६ ॥
भूठी करनी आचरे, भूठे सुखको आस ।
भूठोी भगति हिए धरे, भूठे प्रभुकों दास ॥ २७॥।।
१ ३२ ऊंच नीचका भेद नहो है ।
अतो ह॒ता: प्रमादिनो गता सुखासोनता
प्रलोन॑ चापलमुन्मूलितमालम्बनस ।
आत्मन्येबालानितं च चित्तमा-
संपूर्ण बिशानधनोपलब्घे: ॥ ६ ॥

शब्दार्थ :- समता-राग-द्वेष रहित भाव । ममता>पर द्रव्योमे अहबुद्धि । रमता राम-अपने रूपमें आनंद करनेवाला आतमराम । अपराधी >दोषी । निरदे (निर्देय)-दुष्ट । हिरदे (हृदय) >मनमे । आस (आशा) >उम्मेद । भगति (भक्ति) ल्‍सेवा, पूजा । दासल्‍सेवक ।

अर्थ - जिसके हृदयमें समता नहीं है, जो सदा शरोर आदि परपदार्थोमें मग्न रहता हैऔर अपने आतमरामको नहीं जानता वह जीव अपराधी है॥ २५ ॥ अपने आत्मस्वरूपको नहीं जाननेबाला अपराधी जीव मिथ्यात्वी है, अपनी आत्माका हिसक हे, हृदयका अंधा है। बह शरीर आदि परपदार्थोको आत्मा मानता हे, और कर्म-बंधको बढ़ाता है ॥ २६ ॥ आत्मज्ञानके बिना उसका तपाचरण भिथ्या हे, उसकी सोक्षसुखकी आशा भूठी है,ईश्वरको जाने बिना ईश्वरको भक्ति वा दासत्व मिथ्या हे ॥ २७ ॥

मिथ्यात्वकी विपरीत वृत्ति (सवेया इकतीसा )

माटी भूमि सलकी सो संपदा बखाने निज,
कमेस अमृत जाने ग्यानस जहर है।
अपनो न रूप गहे औरहीसों आपौ कहै,
साता तो समाधि जाक॑ असाता कहर है ॥।
कोपकौ कृपान लिए सान मद पान किये,
मायाकी मरोर हिये लोभकी लहर है ।
याही भांति चेतन अचेतनकी संगतिसो,
सांचसों विमुख भयों भूठम बहर है॥ २८ ॥

शब्दार्थ :-सेल (शैल) >पर्वत । जहरञबिप । ऑरहीसोर पर द्रव्यसे ।कहर>आपत्ति । कृपन>तलवार । वहर है-लगा हुआ है ।

अर्थ :- सोना-चांदीजो पहाड़ोंकी मिट्टी हे,उन्हे निज-सम्पत्ति कहता है,शुभक्रियाकों अमृत मानता हेऔर शानको जहर जानता हे । अपने आत्मरूपको ग्रहण नहीं करता, शरोर आदिको आत्मा मानता है, साता बेदनीय जनित लोकिक-सुखमें आनन्द सानता है और असाताके उदयकों आफत कहता है, क्रेषतों तलवार ले रकक्‍्खों हे,मानकी शराब पी बेठा है, मनमें मायाको बकता हैऔर लोमके चकक्‍्करमे पड़ा हुआ हे । इस प्रकार अचेतनकी संगतिसे चिद्रूप आत्मा सत्यत्ते परान्मुख होकर झूठहोमें उलक रहा है ॥ २८ ॥

पुन (सर्वेया इकतीसा )

तोन काल अतीत अनागत वरतमान,
जगम अखंडित प्रवाहकौ डहर है।
तासौ कहे यह मेरो दिन यह मेरी राति,
यह मेरी घरोी यह मेरोही पहर है।॥
खेहको खजानौ जोर तासों कहै मेरो गेह,
जहां बसे तासों कहे मेरोही सहर है।
याहि भांति चेतन अचेतनकी संगतिसों,
सांचसों विमुख भयो भूठम॑ बहर है ॥ २६॥।
शबदार्थ :- अतीतकाल-नभूतकाल। अनागत>भविष्यत्‌ ।खेहू> कचरा ।
गेहल्घर । सहर (शहर )-नगर ।
भर्थ :- संसारमें मृत, वतंमान, मविष्यत्‌ु कालका धारा-प्रवाह चक्र
चल रहा है, उसे कहता हैकि सेरा दिन, मेरो रात्रि, सेरो घड़ी, सेरा पहर
है। कच्तरेका ढेर इकट्ठा करता हेऔर कहता हे कि यह मेरा भकान हैं,
जिस प्रथ्वोखण्डपर रहता है उसे अपना नगर बतलाता हे। इस प्रकार
अचेतनको संगतिसे चित्र ५आत्मा सत्यसे परान्मुख होकर भूठमें उलभ
रहा हु ॥ २६ ॥

सम्यग्हष्टि जीबोका सदुविचार (दोहा)

जिन्हके मिथ्यामति नहों, ग्यानकला घट मांहि।
परचे आतमरामसों, ते अपराधी नांहि॥ ३० ॥

शब्दार्थ :- मिथ्यामति-खोटी बुद्धि ।परचे (परिचय) >पहिचान ।

अर्थ:- जिन जोबोंकी कुमति नष्ट हो गई हे, जिनके हृदयमें जञानका प्रकाश हे ओर जिन्हें आत्मस्वरूपको पहिचान हैँवे मले मनुष्य है॥ ३० ॥

(सवेया इकतीसा )

जिन्हक॑ धरम ध्यान पावक प्रगट भयौ,
संस मोह विश्रम बिरख तीनों डढ़े हें ।
जिन्हकी चितोनि आगे उद्दे स्वान भूसि भाग,
लागे न करम रज ग्यान गज चढ़े हैं ।॥।
जिन्हकी समुभकिकी तरंग अंग आगमम,
आगमसे निपुन अध्यातमर्म कढ़े हैं ।
तेई परमारथी पुनीत नर आठों जाम,
राम रस गाढ़ करें यहे पाठ पढ़े हैं ॥ ३१ ॥

शब्दार्थ :- पावक>अग्नि । बिरख (वृक्ष )>काड । स्वान-कुत्ता । रज-धूल । ग्यान गज>ज्ञानरूपी हाथी । अध्यातम >आत्माका स्वरूप बताने वाली विद्या ।परमारथी (परमार्थी )परम पदार्थ अर्थात्‌ मोक्षके मार्ममें लगे हुए । पुनीत>पवित्र ।आठी जाम5आठो पहर-सदाकाल ।

अर्थ :- जिनकी धर्मध्यानकरूप अग्निमें संशय-विमोह-विश्रम ये तीनो व॒क्ष जल गये हैं,जिनकी सुदृष्टिके आगे उदयरूपो कुत्ते भोंकते-भोंकते भाग जाते हैं, वे ज्ञानहपी हाथीपर सवार हैं इससे कमंरूपी धूल उन तक नहों पहुँचती । जिनके विचारमें शास्त्रज्ञानकी तरंगें उठती हैं, जो सिद्धान्तमें प्रवीण हैं, जोआध्यात्मिक विद्याके पारगामी है, वे ही मोक्षमार्गी हैं- वे ही पवित्र है, सदा आत्म-अनुभवका रस हृढ करते है और आत्म-अनुभवहोका पाठ पढ़ते हैं॥ ३१ ॥

पुन: (सवेया इकतीसा )

जिन्हकी चिहुंटि चिमटासी गरुन चूनिबेकों,
कुकथाके सुनिबेकों दोऊ कान पढ़े हैं ।
जिन्हकौ सरल चित्त कोमल वचन बोले,
सोमहृष्टि लिये डोले मोमकंसे गढ़े हैं ।।
जिनन्‍्हकी सकति जगी अलख अराधिबेकों,
परम समाधि साधिबेकों मन बढ़े हे ।
तेई परमारथी पुनीत नर आठों जाम,
राम रस गाढ़ करें यहै पाठ पढ़े हैं । ३२ ॥।

शब्दार्थ :- चिहुंटी-बुद्धि । चूनिबेकौ>पकड़नेको-ग्रहण करनेको । कुकथा-खोटी वार्ता, स्त्रीकथा आदि। सोमहष्टिल्‍क्रोध आदि रहित । अलख->आत्मा ।

अर्थ :- जिनको बुद्धि गुण ग्रहण करनेमें खिमीटीके’ समान हें, विकथा सुननेके लिये जिनके कान सढ़ें हुए अर्थात्‌ बहरे हैं, जिनका चित्त निषकपट है, जो मुदु भाषण करते हैं,जिनकी क्रोधादि’रहित सौम्यदृष्टि हे, जो ऐसे कोमल स्वमावी हैं किमानो मोमके’ ही बने हुए हैं, जिन्हें आत्म- ध्यानकी शक्ति प्रगट हुई हैऔर परम सस्राधि साधनेकों जिनका चित्त एस्साहित रहता हे, वे ही मोक्षमार्गी हैं, वे ही पवित्र हैं, सदा आत्म- 3सुभवका रस हृढ़ करते हैंओर आत्म-अनुमवका ही पाठ पढ़ते हैं- अर्थात्‌ आत्माहीकी रठन लगी रहतो है ॥ ३२ ॥

समाधि वर्णन (दोहा)

राम-रसिक अर राम-रस, कहन सुननकों दोइ । जब समाधि परगट भई, तब दुधिधा नहि कोइ ॥ ३३ ॥)

शब्दार्थ :-- राम-रसिक-आत्मा । राम-रस-अनुभव । समाधि आत्मामे लीन होना । दुबिधा>भेद ।

अर्थ :- आत्मा और आत्म-अनुभव ये कहने सुननेकों दो हैं, जब आत्मध्यान पब्रगट हो जाता है तब रसिक और रसका, वा और कोई भेद नहों रहता ॥ ३३ ॥! न्नकी जिस प्रकार चिमीटीसे छोटी वस्तु भी उठा नी जाती है, उसी प्रकार सूक्ष्म तत्त्वोको भी उनकी बुद्धि ग्रहण करती है । जेसे कि मोम सहजमें पिघल जाता है वा मुड़ जाता है, बसे वे भी थोडेही मेकोमल हो जाते हैं, तत्वकी बात बोडेहीमे समझ जाते है, फिर हठ नही करते । “पत्र प्रतिक्रमणमेव दियं प्रणोतम्‌ तन्नाप्रतिक्रमणमेव सुधा कुतः स्थात्‌ । तत्कि प्रमाद्यति जम: प्रपतश्नधोष्ष: कि नोध्वमृध्यंभधिरोहति निष्प्रमाद:॥ १० ॥

मोक्ष हार २३३

शुभ क्रियाओंका स्पष्टीकरण (दोहा)

नंदन बंदन थुति करन, श्रवन चितबन जाप ।
पढ़न पढ़ावन उपदिसन, बहुविधि क्रिया-कलाप ॥ ३४ ॥

शब्दार्थ :- नंदन-रसिक अवस्थाका आनद । बंदनब्नमस्कार करना । थुति (स्तुति) गुणगान करना । श्रवन (श्रवण )आत्म- स्वरूपका उपदेश आदि सुनना। चितवन"-विचार करना । जापन्बार बार नाम उच्चारण करना । पढन>पढना । पढावन>पढाना । उपदिसनर व्याख्यान देना ।

अर्थ :- आनन्द मानना, नमस्कार करना, स्तवन करना, उपवेश सुनना, ध्यान करना, जाप जपना, पढ़ना, पढ़ाना, व्याख्यान देना आदि सब शुभ क्ियाएँ हैं ॥ ३४ ॥

शुद्धोपयोगमे शुभोपयोगका निषेध (दोहा)

सुद्धाता अनुभव जहां, सुभाचार तहां नांहि।
करम करम मारग विषे, सिव मारग सिवमांहि ॥ ३५ ॥

शब्दार्थ :- शुभाचा र-शुभ प्रवृत्ति । करम मारग (कमंमार्ग)- बधका कारण । सिव मारग (शिवमार्ग )>मोक्षका कारण। सिवमाहिर आत्मामे ।

अर्थ :- ऊपर कही हुई क्रियाएँ करते करते जहाँ आत्माका शुद्ध अनुभव हो जाता है, वहाँ शुभोषयोग नहीं रहता । शुभ क्रिया कर्म बंधका कारण हैओर मोक्षकी प्राप्ति आत्म-अनुभवमें है ॥ ३५ ॥

(चौपाई )

इहि बिथि वस्तु व्यवस्था जेसोी ।
कही जिनंद कही में तेसी ॥
जे प्रमाद संजुत मुनिराजा।
तिनके सुभाचारसों काज़ा । ३६॥।
शबदार्थ :- वस्तु व्यवस्थारूपदार्थका स्वरूप । प्रमाद संजुत-
आत्म-अनुभवमें असावधास, शुभोपयोगी ।
राव ३2५५५ करा2५००५ पान ७७३३५ मम 34७33 ±+++मन++3++कानन-+ न+9+++नननतननकरन
नकन न+नन-+आन. ० नहपाकर) ७५७ करन +

अर्थ - प्रभ्थकार कहते हैं किइस प्रकार पदार्थंका जेसा स्वरूप जिन- राजने कहा हैबेसा हमने वर्णन किया । जो मुनिराज प्रमाददशामे रहते हैं,

उन्हे शुभ क्रियाका अवलब लेना ही पडता है ३ ३६४ पुन (चौपाई )

जहा प्रमाद दसा नहिं व्यापे ।
तहा अवलब आपनो आप ॥
ता कारन प्रमाद उतपाती ।
प्रगटः मोख मारगकौ घाती ॥ ३७ ॥
शब्दाथ → अवलब>आधार ।

अर्थ - जहाँ शुभ-अशुभ प्रवृत्तिरूप प्रमाव नही रहता, यहाँ अपनेको अपना ही अवलम्बन अर्थात्‌ शुद्धोपयोग होता है, इससे स्पष्ट है कि प्रभादकी

उत्पत्ति मोक्षमार्गमे बाधक है ॥। २े७।) पुन (चौपाई)

जे प्रमाद सजुगत गुसाई।
उठहि गिर्रह गिदुकको नाई ।।
जे प्रमाद तजि उद्धत हाँहीं ।
तिनकों मोख निकट द्विग सौही ॥ ३८ ॥

शब्दार्थ - गुसाई-साधु । गिदुकल्‍्गद । नाई ८ तरह द्विगरनेत्र ।

अर्थ – जो मुनि प्रमाद सहित होते हैं वेगेंदकी तरह नीचेसे ऊपरको चढते और फिर नीचेको पडते हैं,ओर जो प्रमाद छोडकर स्वरूपमे सावधान होते हैंउनकी हृष्टिमे मोक्ष बिलकुल पास ही दिखता है। विशेष - साधुदशामे छट्ठा! गुणस्थान प्रमत्त मुनिका है सो छट्टसे

सातबेंमे ओर सातवेंसे छट्टंमेअसव्यात बार चढ़ता गिरना होता है ।। रे८ पुन (चौपाई)

घटम है प्रभाव जब ताईं।
पराधीन प्रानी तब ताई।।
जब प्रमादकी प्रभुता नासे ।
तब प्रधान अनुभो परगासे ॥ ३६१।

शब्दार्थ :- जब ताई-जबतक । तब ताई-तबतक । प्रभुता-बल । तासे (नाश )“नष्ट होवे । प्रधान मुख्य । परगासे (प्रकाश) >प्रगट होवे ।

अर्थ :- जब तक हृदयमें प्रमाद रहता है तब तक जीव पराधोीन रहता है, और जब प्रमादकी शक्ति नष्ट हो जातो है तब शुद्ध अनुभवका उदय होता है ॥ ३६ ॥

(दोहा )

ता कारन जगपंथ इत, उत सिव मारग जोर ।
परमादी जगकों धुकं, अपरमादि सिव ओर ॥ ४० ॥

शब्दार्थ :- जगपथ>"संसार भ्रमणका उपाय । इतन्यहाँ। उतजवहाँ । सिव मारग (शिवमार्ग)–मोक्षका उपाय । धुके-देखे। अप रमादि (अप्रमादी )-प्रमाद रहित ।

अर्थ :- इसलिये प्रमाद संसारका कारण है और अनुभव मोक्षका कारण है। प्रमादी जोब संसारकी ओर देखते हैंओर अप्रमादी जीव मोक्षकों तरफ देखते हैं॥ ४० ॥

पुन: (दोहा)

जे परमादी आलसी, जिन्हके विकलप भूरि।
होइ सिथल अनुभोविषे, तिन्‍्हकों सिवपथ दूरि ॥। ४११

शब्दार्थ :- आलसी >निरुद्यमी ।विकलप (विकल्प) 5 राग-ह पकी तरगे। भूरि>बहुत ।सिथल (शिथिल )>असमर्थ ।सिवपथ 5 स्वरूपाचरण ।

अर्थ :-जो जीव प्रमादी और आलसी हैं, जिनके चित्तमे अनेक विकल्प होते है, और जो आत्म-अनुभवमें शिथिल है, उनसे स्वरूपाचरण दूर ही रहता है ॥ ४१ ॥

पुनः (दोहा)

“जे परमादी आलसी, ते अभिमानी जीव ।
जे अविकलपोी अनुभवी, ते समरसी सदोीव ॥ ४२ ॥

प्रसादकलित: कर्य भदति शुद्धभावोपलस: कषायभरगौरवादलसत्ता प्रमादो यतः । अतः स्वर्सनिर्भरे नियमित: स्वभावे भवन मुनि: परमशुद्धतां त्तजति मुच्यते चाइचिरातृ 0॥ ११॥

शब्दार्थ :- अभिमानीजअहंकार सहित । अविकलपी (अविकल्पी )- राग-द्वेष रहित ।

अर्थ :- जो जीव प्रभाद सहित और अनुभवमें शिथिल हैं, वे शरीर आदियमें अहंदृद्धि करते हैंओर जो लिविकल्प अनुभवसें रहते हैंउनके चित्तमें सदा समता रस रहता है ॥ ४२ ॥

पुन. (दोहा)

जे अविकलपी अनुभवी, सुद्ध चेतना युक्त ।
ते सुनिवर लघुकालमं, होंहि करमसों मुक्त ॥ ४३ ॥

शब्दार्थ :- सुद्ध चेतना-शुद्ध ज्ञान-दर्शन । लघुकालमैं > थोड़े समयमें ।

अर्थ :- मो मुनिराज विकल्प रहित हैं,अनुभव और शुद्ध ज्ञान-दर्शन सहित है, थे थोड़े ही समयमें कर्म रहित होते हैं, अर्थात्‌ मोक्ष प्राप्त करते हैं ॥ ४३ ॥

जशञानमें सबजीव एकसे भासते है (कवित्त)

जेसे पुरुष लखें परवत चढ़ि,
भूचर-पुरुष ताहि लघु लग्गे।
भूचर-पुरुष लखे ताकों लघु,
उतरि मिले दृहुको भ्रम भग्गे ।।
तेसे अभिमानी उन्नत लग,
और जीवकों लघुपद दरगे।
अभिमानोकों कहें तुच्छ सब,
ग्यान जागे समता रस जग्गे ॥ ४४ ॥
. _ शददार्थ :- भूचर-धरतोपर रहनेवाला । लघुजछोटा । उन्नत लग
ऊंचा सिर रखनेवाला ।

अर्थ :- जैसे पहाड़ पर चढ़े हुए मनुष्यको नोचेका मनुष्य दिखता है, और नोचेके मनुष्यकोऊपर पहाड़पर चढ़ा हुआ छोटा मनुष्य छोटा भसोक्ष हार २३७ दिखता है, पर जब वह नीचे आता है तब दोनोंका भ्रम हट जाता हैओर विषमता मिट जातो है, उसी प्रकार ऊँचा सिर रखनेवाले अभिमानी मनुष्यको सब आदमो तुच्छ दिखते हैं, ओर सबको वह अभिमानो तुच्छ दिखता है,परन्तु जब ज्ञानका उदय होता है तब मान कषाय गल जानेसे समता प्रगट होती है । ज्ञानमें कोई छोटा बड़ा नहीं दिखता, सब जोव एकसे भासते हैं ॥ ४४ ॥

अभिमानी जीवोंकी दशा (स्वेया इकतीसा )

करमके भारी समुर्क न गुनकों मरम,
परम अनीति अधरम रीति रहे हैं।
होंहि न नरम चित्त गरम घरमहुते,
चरमको द्विष्टिसों भरम भूलि रहे हैं।।
आसन न खोले मुख वचन न बोल,
सिर नाये हू न डोल मानों पाथरके चहे हैं ।
देखनके हाऊ भव पंथके बढ़ाऊ ऐसे,
मायाके खटाऊ अभिमानी जीब कहे हैं । ४५ ॥।

शब्दार्थ - करमके भारी > अत्यन्त कर्म बंध बांधे हुए । मरम - असलियत । अधरम (अधर्म ) 55 पाप । नरम 55 कोमल । चरम द्विप्टि (चर्महप्टि )>इन्द्रिय जनित ज्ञान । चहे (चय )>चिने हुए। हाऊ>भयकर। वढाऊन्‍-बढानेवाले ।खटाऊल्टिकाऊ-मजबूत ।

अर्थ - जो कर्मोका तीब् बंध बांधे हुए हैं,गुणोंका म्ल" नहीं जानते, अत्यन्त अनुचित और पापमय मार्ग ग्रहण करते हैं, नरमचित्त नहीं होते, धृपसे भी अधिक गरम रहते हैं और इन्द्रियज्ञानहीमें भूले रहते ’ हैं,दिखानेके लिये एक आसनसे बेठते वा खड़े हो रहते हैं,मोनसे रहते हैं, महन्तजी जानकर कोई नमस्कार करे तो उत्तरके लिये अंग तक नहीं हिलाते, मानों " दोषको ही गुण समभ जाते है । २ आत्मज्ञान नहीं होता । पत्थर हो चिन रक्ला हो, देखनेमें भयंकर हैं, संसारमार्गके बढ़ानेवाले हैं, मायाचारीमें पक्के हैं,ऐसे अभिमानी जीव होते हैं ॥ ४५ ॥

ज्ञानी जीवोकी दशा (सवेया इकतीसा)

धीरके धरेया भव नोरके तरेंया भय,
भीरके हरेया बर बीर ज्यों उमहे हैं ’
मारके मरंया सुविचारके करंया सुख,
ढारके ढरंया गुन लोौसों लहलहे हें ।।
रूपके रिफेया सब नेके समर्कया सब,-
हीके लघु भेया सबके कुबोल सहे हैं ।
बासके बमेया दुख दामके दमैया ऐसे,
रामके रसंया नर ग्यानी जीव कहे हैं ॥ ४६ ॥

शब्दार्थ :- भव नीरचज्ससार समुद्र । भोर"समुदाय । बरबीर>८ महायोद्धा ।उमहे८उमंग सहित-उत्साहित । मार।कामकी वासना । लह- लहे-हरे-मरे । रूपके रिमेग्रा>-आत्मस्वरूपके रूचिया । लघु भेया>छोटे बनकर नम्रता पूर्वक चलनेवाले । कुबोल>कठोर वचन । वामज्वक्रता- कुटिलता । दुख दामके दमैया“दु.खोंकी सततिको नप्ट करनेवाले । रामके रमेया >-आत्मस्वरूपमें स्थिर होनेवाले ।

अर्थ :- जो धोरजके धरनेवाले हैं, संसार समुद्रसे तरनेवाले हैं,सब प्रकारके भय नष्ट करनेवाले हैं, महायोद्धा समान धर्ममें उत्साहित रहते हैं विषय-बासनाओंको जलाते हैं, आत्महितका चितवन किया करते हैं,सुख- शान्तिको चाल चलते हैं, सदृगुणोंकी ज्योतिसे जगमगाते है, आत्मस्वरूपमें रुचि रखते हैं;सब नयोंका रहस्य जानते हैं,ऐसे क्षमावान्‌ हैं किसबके छोटे भाई बसकर रहते हैं वाउनकी खरी-खोटी बाते सहते हैं, हृदयकी कुटिलता छोड़कर सरल चित्त हुए हैं,दुख संतापकी राह नहीं चलते, भात्मस्वरूपमें विश्वाम किया करते हैऐसे महानुभाव ज्ञानी कहलाते हैं ॥ ४६ ॥

सम्यक्त्वी जीवोंको महिमा (चौपाई )

जे समकिती जीव समचेती ।
तिनकी कथा कहों तुमसेती ।।
जहां प्रमाद क्रिया नहिं कोई ।
'. निरविकलप अनुभाौ पद सोई ॥ ४७॥।
परिग्रह त्याग जोग थिर तीनों ।
करम बंध नहि.. होय नवाीनों ॥।
जहां न राग दोष रस मोहै।
प्रगदभ मोख सारण मुख सोहै ॥ ४८ ॥
प्रब बंध उदय नहि व्याप ।
जहां न भेद पुन्न अरु पापे॥।
दरब भाव गुन निरमल धारा।
बोध विधान विविध बिस्तारा ॥ ४६ ॥
जिन्हकी सहज अवस्था ऐसी ।
तिन्हक॑ हिरदे दुबिधा कंसो ॥।
जे मुनि छपक श्रेणि चढ़ि धाये ।
ते केवलि भगवान् कहाये ॥ ५० ॥।

शब्दार्थ :- समचेती समता भाववाले । कथानवार्ता । तुमसेती८ तुमसे । प्रमादक्रिया-शुभा चार ।जोग थिर तीनों -मन-वचन-कायके योगोंका निग्रह ।नवीनौ>नया । पुन्न (पुण्य) -शुभोपयोग । द्रव्यभाव>बाह्य और त्यक्त्वाइशुद्धिविधायि तत्किल परद्रव्यं समग्रं स्वयं स्वद्वव्ये रतिमेति य’ स नियत सर्वापराधश्युतः । बन्धध्वंसमुपेत्य नित्यमु दित:ःस्वज्योतिरच्छोच्छुल- ज्येतन्यामृतप्रपुर्ण!हिसा शुद्धों भवन्युच्यते ॥ १२ ॥

अंतरंग । बोघि-रत्नत्रय । छपकश्रेणी+मोह कर्म नष्ट करनेकी सीढी ।
धाये>चढे ।

अर्थ :- हेभव्य जीवो ! समता स्वभावके धारक सम्यग्टृष्टि जीवोंको दशा तुमसे कहता हूं, जहां शुभाचारको प्रवृत्ति नहों है वहां निविकल्प अनुभवपद रहता है ॥ ४७ ॥ जो सर्व परिग्रह छोड़कर, मत-वचन-कायके तीनों योगोंका निप्नह करके बंध-परंपराका संवर करते हैं, जिन्हें राग-हेष- मोह नहों रहता बे साक्षात्‌ सोक्षमार्गके सन्‍्मुख रहते हैं ॥ ४८ ॥ जो पूर्व बंधके उदयमें मसत्व नहों करते, पुण्य-पापकी एकसा जानते हैं, अंतरंग और बाह्ममें निविकार रहते हैं’, जिनके सम्यग्वर्शन-शञान-चारित्र गुण उन्नति पर हैं ॥ ४६ ॥ ऐसी जिनको स्वाभाविक दशा है, उन्हें आत्मस्वरूपकी दुविधा कंसे हो सकती है ? वे मुनि क्षपक श्रेणिपर चढ़ते हैं और केवली भगवान् बनते हैं ॥ ५० ॥

सम्यग्हष्टि जीवोंको बदना (दोहा)

इहि बिधि जे पूरन भये, अष्टकरम बन दाहि।
तिन्हकी महिमा जो लखे, नमे बनारसि ताहि ॥ ५१ ॥

शब्दार्थ :- पूरन भये-परिपूर्ण उन्नतिको प्राप्त हुए । दाहिल्‍जला- कर । लखे>जाने ।

अर्थ :- जो इस रोतिसे अष्टकर्मका वन जलाकर परिपूर्ण हुए है, उनको महिमाको जो जानता है उसे पंडित बनारसीदासजी नम्तस्कार करते हैं ५११

मोक्ष प्राप्तिका क्रम (छप्पय छुन्द )

भयो सुद्ध अंक्र,
गयौ मभिथ्यात मर नसि ।
) देखनेमे नेत्रोंकी लालिमा वा चेहरेकी वक्रता रहित शरीरकी मुद्रा रहती है और
अतरंगमे क्रोधादि विकार नहीं होते ।
बन्धच्छेदात्कलय॒दतुल मोक्षसक्षय्यसेत-
झित्योग्योतस्फुटितसहजावस्थमेकान्तशुद्धम ।
एकाकारस्वरसभरतोषत्यन्तगम्भो रधीर
पूर्ण ज्ञान ज्वलितमचले स्वस्य लीन॑ महिम्नि ॥ १३ ॥
इति मोक्षो निष्क्रान्त: ॥६॥॥
क्रम क्रमहोत उदोत,
सहज जिम सुकल पक्ष ससि ॥।
केवल रूप प्रकासि,
भासि सुख रासि धरम धुव ।
करि पुरन थिति आउ,
त्यागि गत लाभ परम हुब ।।
इह विधि अनन्य प्रभुता धरत,
प्ररटि बूदि सागर थयो।
अविचल अखंड अनभय अखय,
जीव दरब जग मंहि जयो॥ ५२ ॥

शब्दार्थ : - अंक्र (अंकुर ) >पौधा । मूर ( मूल ) ८ जडसे । सुकल पक्ष ससि (शुक्ल पक्ष शशि) >उजेले पक्षका चन्द्रमा ।अनन्य जिसके समान दूसरा नही - सब श्रेष्ठ ।

अर्थ :- शुद्धताका अक्ुर प्रगट हुआ, मिथ्यात्व जड़से हट गया, शुक्ल- पक्षके चन्द्रमाके समान क्रमशः ज्ञानका उदय बढ़ा, केवलज्ञानका प्रकाश हुआ, आत्माका नित्य और पूर्ण आनंदसय स्वभाव भासने लगा, सनुष्य आयु और फर्मकी स्थिति पूर्ण हुई, मनुष्यगतिका अभाव हुआ और पूर्ण परमात्मा बना । इस प्रकार सर्वे श्रेष्ठ महिमा प्राप्त करके पानीकी बूंदसे समुद्र होनेके समान अविचल, अखंड, निर्भेथ और अक्षय जोवपदार्थ, संसारमें जयबन्त हुआ ॥ ५२१॥

अप्ट कर्मोके नप्ट होनेसे अप्ट गुणोका प्रगट होना (स्वेया इकतीसा )

ग्यानावरनोक गये जानिये जु है सु सब,
दर्सनावरनक॑ गयेते सब देखिये ।
बेदनी करमके गयेते निराबाध सुख,
मोहनोके गये सुद्ध चारित विसेखिये ।॥।
२४२ समयपतप्तार नाटक
आउकम्ं गये अवगाहना अटल होइ,
नामकर्स गयेते अम्रतीक पेखिये ।
अगुर. अलघुरूप होत गोत्रकर्म गये,
अंतराय गयेते अनंत बल लेखिये ॥ ५३ ॥

शब्दार्थ :- निराबाध रस > साता - असाताके क्षोभका अभाव । अटल अवगाहना>चारो गतिके भ्रमणका अभाव । अमुर्तीकन्चर्म चक्षुओंके अगोचर । अगुरु अलघु>न ऊँच न नीच ।

अर्थ :- ज्ञानावरणीय कमंके अमावसे केवलज्ञान, दर्शनाबरणीय कमंके अभावसे केवल दर्शन, वेदनीय करके अभावसे निराबाधता, मोहनोय कमके अभावसे शुद्ध चारित्र, आयु कमंके अमावसे अटल अबगाहना, नाम कर्मके अभावसे अमुृर्तोकता, गोत्र कमंके अभावसे अगुरु लघुत्व और अन्तराय कर्मके नष्ट होनेसे अनंतवीर्य प्रगट होता है। इस प्रकार सिद्ध भगवानमें अष्ट कम रहित होनेसे अष्ट गुण होते हैं ॥ ५३ ॥ नववें अधिकारका सार प्रगट हो कि मिथ्यात्व होआखव बंध हैऔर मिथ्यात्वका अभाव अर्थात्‌ सम्यकत्व, संबर, निर्जरा तथा मोक्ष है, और सोक्ष आत्माका निज- स्वमाव अर्थात्‌ जोबकी कर्ममल रहित अवस्था है। वास्तवसमें सोचा जावे तो मोक्ष होता ही नहों है, क्योंकि निश्चयनयमें जीव बेधा हुआ नहीं है- अबंध है, और जब अबंध हैतब छूटेगा हो क्या ? जीवका मोक्ष हुआ यह कथन व्यवहार माज्र है, नहीं तो वह हमेशा मोक्षरूप ही है । यह बात जगत्‌ प्रसिद्ध हैकि जो मनुष्य दूसरोंके धनपर अपना अधिकार जमाता है, उस मू्खंको लोक अन्यायी कहते हैं । यदि वह अपनो हो सम्पत्तिका उपयोग करता है तो लोग उसे न्यायशोल कहते हैं, इसो प्रकार जब आत्मा परव्रव्योंमें अहंकार करता है, तब वह अज्ञानोी मिथ्यात्वी होता है, ओर जब ऐसी बद आदतको छोड़कर आध्यात्मिक विद्याका अभ्यास करता हैतथा आत्मीक रसका स्वाद लेता है तब प्रमादका पतन करके पुण्य-पापका भेद हटा देता हैऔर क्षपकश्नेणो चढ़कर केवली भगवान् बनता है, पश्चात्‌ थोड़े होसमयमें अच्ट कम रहित और अष्ट गुण सहित सिद्ध पदको प्राप्त होता है । मुख्य अभिप्राय ममता हटाने और समता सम्हालनेका है । जिस प्रकार कि सुनारके प्रसंगसे सोनेकी नाना अवस्थाएँ होतो हैं, परन्तु उसको सुबर्णता कहीं नहीं चलो जाती, जलानेसे फिर सुवर्णका सुबर्ण हो बना रहता है; उसो प्रकार यह जीवात्मा अनात्माके संसर्गसे अनेक वेष धारण करता है, परन्तु उसको चेतन्यता कहों चली नहीं जाती है- वह तो ब्रह्मका ब्रहा ही बना रहता हे। इसलिये शरोरसे मिथ्या अभिमान हटाकर आत्म- सत्ता और अनात्मसत्ताका पृथक्‍करण करना चाहिये। ऐसा करनेसे थोड़े ही ससयमें आधुनिक बूदसात्र ज्ञान स्वल्प कालहोमें समुद्रूप परिणमन करता है और अविचल अखड अक्षय अनमय और शुद्धरूप होता है। ननन + >ककीन्क–न- ५

सर्वविशुद्धि द्वार (१०)

प्रतिज्ञा (दोहा )

इति श्री नाटक ग्रंथमें, कहो मोख अधिकार ।
अब बरनों संछेपसों, सर्व विसुद्धी द्वार ॥ १॥।

अर्थ :- नाटक समयसार प्रंयके मोक्ष अधिकारकी इति श्री की, अब सर्व विशुद्धि द्वारकों सक्षेपमें कहते हैं ॥ १ ॥

सर्व उपाधि रहित शुद्ध आत्माका स्वरूप (सवैया इकतीसा )

करंनिकौ करता है भोगनिको भोगता है,
जाकी प्रभुतामे ऐसो कथन अहित है ।
जामें एक इंद्री आदि पंचधा कथन नांहि,
सदा निरदोष बंध मोखसों रहित है ।।
ग्यानको समूह ग्यान गम्य है सुभाव जाको,
लोक व्यापी लोकातीत लोकमैं महित है ।
सुद्ध बंस सुद्ध चेतनाक रस अंस भरचो,
ऐसो हंस परम पुनीतता सहित है ॥ २ ॥

शब्दार्थ :- प्रभुता ८ सामथ्य । अहित र बुराई करनेवाला ।! पच्रधा “पाँच प्रकारकी । लोकातीत > लोकसे परे । महित 5 पूजनीय । परम पुनीत>अत्यन्त पवित्र । नोत्या भम्पक्‌ प्रलयमखिलान्‌ कतभोकत्रादिभावान्‌ दूरोमृतः प्रतिषदमय बन्धमोक्षत्रक्लप्ते: । शुद्ध शुद्ध स्वरसविस रापुणपुण्या चलाचि- ध्टंकोल्कीर्ण प्रकट महिमा स्फूर्जतिज्ञानपुउज: ॥ १ ॥

अर्थ :-जिसको सामथ्यंके आगे कर्ंका कर्ता हैऔर कर्मका सोगता हैऐसा कहना हानिकारक’ है,पंचेन्द्रिय मेदका कथन जिसमें नहों है, जो सर्व दोष रहित है, जो न कमंसे बंधता है न छूटता है, जो शानका पिड़ और ज्ञानमोचर है, जो लोक व्यापी है, लोकसे परे है, संसारमें पुजनीय अर्थात्‌ उपादेय है, जिसको जाति शुद्ध है, जिसमें चेतन्यरस भरा हुआ है, ऐसा हंस अर्थात्‌ आत्मा परम पवित्र है॥ २ ॥

पुन: (दोहा)

जो निहर्च निर्मल सदा, आदि मध्य अरू अंत ।
सो चिद्रप बनारसो, जगत् मांहि जयबंत ॥ ३ ॥

शब्दार्थ :- निहचे-निश्चयनयसे । निर्मेल"पविन्र । चिद्र पलूचेतन्य- रूप ।

अर्थ :- जो निश्चयनयसे आदि, मध्य और अंतमें सर्दव निमंल है, पं० बनारसीदासजी कहते हैकि वह चेतन्य-पिड आत्मा जगतमें सदा जयबंत रहे ॥ ३॥।

वास्तवमे जीव कर्मका कर्ता-भोगता नही है (चौपाई)

जीव करम करता नहिं ऐसे ।
रस भोगता सुभाव न ॒तेसे ॥।
मिथ्यामतिसों करता होई।
गएं अग्यान अकरता सोइ ॥ ४ ॥

अर्थ :- जीव पदार्थ वास्तवमें कर्मका कर्ता नहों हैऔर न कम रसका भोगता है,मिथ्यासतिसे कमंका कर्ता-भोगता होता है,अज्ञान हटनेसे कर्मका अकर्ता-अभोगता हो होता है ॥ ४ ॥

) व्यवह्ारनय जीवको कर्मका कर्ता-भोगता कहता है, परन्तु वास्तवमें जीव कर्मका
कर्ता-भोगता नही है, अपने क्ान-दर्शन स्वमावका कर्ता-भोगता है ।
कस त्व॑न स्वभाषोप्स्प चितो वेदयित्त्वथअत्‌ ।
अजशानादेव कर्ताय तदभाबादकारकः ॥ २ ।॥

अज्ञानमें जीव कर्मका कर्ता है (सवेया इकतीसा )

निहणे निहारत सुभाव याहि आतमाको,
आतमोक धरम परम परकासना ।
अतोत अनागत बरतमान काल जाको,
केवल स्वरूप गुन लोकालोक भासना ।।
सोई जीव संसार अवस्था मांहि करमको,
करतासो दीसे लीएं भरम उपासना ।
यहै महा मोहकौ पसार यहै मिथ्याचार,
यहे भो विकार यह विवहार वासना ॥ ५ ॥

शब्दार्थ :- निहा रत-देखनेसे । उपासना >सेवा । पसार-विस्तार । मिथ्याचा र5निजस्वभावसे विपरीत आच रण । भौ>-जन्म-मरणरूप ससार । व्यवहार>किसी निमित्तके वशसे एक पदार्थंकों दूसरे पदार्थरूप जाननेवाले ज्ञानको व्यवहार नय कहते हैं,जैसे - मिद्रीके धडेकों घीके निमित्तसे घीका घड़ा कहना ।

अर्थ :- निश्चयनपसे देखो तो इस आत्माका निज-स्वमाव परस प्रकाशरूप हैऔर जिसमें लोकालोकके छहों द्रव्योंके मृत भविष्यत्‌ बर्तमान त्रिकालबर्तो अनंत गुण पर्यायें प्रतिभासित होती हैं। वही जोव संसारो दशामें मिभ्यात्वको सेवा करनेसे कमंका कर्ता दिखता है,सो यह मिथ्यात्वको सेवा मोहका विस्तार है, मिथ्याचरण है, जन्म-मरणरूप संसारका विकार है, व्यवहारका विषयमृत आत्मा का अशुद्ध स्वभाव है ॥ ५ ॥

जेसे जीव कमेंका अकर्ता है वेसे अभोगता भी है (चौपाई )

यथा जीव करता न कहावे ।
तथा भोगता नाम न पाबे ॥।
अकर्ता जीवो5्यं स्थित इति विशुद्ध: स्वस्सतः
स्फुरच्जिज्ज्पोतिभिशछुरितभुवनाभोग भजनः ।
तथाप्पस्यासों स्याक्षदिह किल अस्ध: प्रकृतिसि:
स लल्वज्ञानस्थ स्फुरति महिमा को5पि गहन: ॥ ३ ॥
है भोगी सिथ्यामति मांहि ।
गये मिथ्यात भोगता नांहीं ॥ ६ ॥

अर्थ :- जिस प्रकार जोब कमंका कर्ता नहों हैउसी प्रकार भोगता भी नहीं है, मिथ्यात्वके उदयमें कर्संका सोगता है, सिध्यात्वके अभावसें भोगता नहीं है ॥ ६ ॥

अज्ञानी जीव विषयोंका भोगता हैज्ञानी नहीं है (सवेया इकतीसा)

जगवासी अग्यानी त्रिकाल परजाइ बुद्धी,
सो तो बिष भोगनिकों भोगता कहायो है ।
समकिती जीव जोग भोगसों उदासी ताते,
सहज अभोगता गरंथनिमें गायोौ है।।
याही भांति वस्तुकी व्यवस्था अवधारि बुध,
परभाउ त्यागि अपनौ सुभाउ आयो है।
निरविकलप निरुषाधि आतस अराधि,
साधि जोग़ जुगत समाधिमें समायो है ॥ ७ ॥

शब्दार्थ :- जगवासी>ससारी । विर्ष (विषय) पत्र इन्द्रिय और मनके भोग । गरथनिमैं-शास्त्रोमे ।अवधारि-निर्णय करके । बुधच्ज्ञानी । जोग जोगतिज्योग निग्रहका उपाय ।

अर्थ :- शास्त्रोंमें मनुष्य आदि पर्यायोंसे सदा काल अहंब॒द्धि रखने- वाले अज्ञानी संसारो जोवको अपने स्वरूपका अज्ञाता होनेसे विषय भोगोंका भोगता कहा है, ओर ज्ञानो सम्यग्हष्टि जोबको मोगोंसे विरक्त भाव रखनेके कारण विषय भोगते हुए मी अभोगता कहा है। शानी लोग इस प्रकार वस्तु स्वरूपका निर्णय करके बिमाव माव छोड़कर स्वभाव ग्रहण करते हैं,ओर भोक्तृत्व॑ न स्‍्थभावोध्स्य स्मृतः कठूत्ववच्चित: । अशानादेव. भोक्तापभ्य॑ तदभाबादवेदक: ॥ ४ ॥ विकल्प तथा उपाधि रहित आत्माको आराधना व योग निप्रह मार्ग ग्रहण करके निजस्वरूपमें लोन होते हैं।। ७

ज्ञानी कमके कर्ता-भोगता नही है इसका कारण (सवेया इकतीसा)

चिनमुव्राधारी ल्लुबव धर्म अधिकारी गुन,
रतन भंडारी अपहारी कर्म रोगकों ।
प्यारों पंडितनकों हुस्यारो मोख मारगमें,
न्यारो पुदगलसों उज्यारों उपयोगकों ।॥॥
जाने निज पर तत्त रहै जगमें विरत्त,
गहे न ममत्त मन बच काय जोगकों ।
ता कारन ग्यानी ग्यानावरनादि करमको,
करता न होइ भोगता न होइ भोगकौं ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :- चिन्मुद्रा>चेतन्य चिह्न । ध्रुव-नित्य । अपहारी कर्म रागकौ>कर्मरूपी रोगका नष्ट करनेवाला । हुस्यारों (होश्यार)<प्रवीण। उज्यारौ प्रकाश । उपयोग > ज्ञानदर्शन । तत्त ( तत्त्व )८ निजस्वरूप । विर्त (विरक्त) >वैरागी । ममत्त (ममत्व )>अपनापन ।

अर्थ :- चेतन्य चिह्नका घारक, अपने नित्य स्वभावका स्वासी, ज्ञान आदि गुणरूप रत्नोंका मण्डार, कर्मरूप रोगोंका नष्ट करनेवाला, शञानों लोगोंका प्रिय, सोक्षमार्गसें कुशल, शरोर आदि पुद्गलोसे पृथक, ज्ञानदर्शनका प्रकाशक, निज पर तत्त्वका ज्ञाता, ससारसे विरक्त, मन-वचन-कायके योगोंसे ममत्व रहित होनेके कारण ज्ञानी जोब ज्ञानावरणादि कर्मोका कर्ता और भोगोंका भोगता नहीं होता है ॥ ८ ॥

अज्ञानो प्रकृतिस्वभावमिरतो मित्य भवेद्व दको
ज्ञानी तु प्रक्तिस्वभावविरतो नो जातुचिद्वदकः ।
इत्येदं नियम निरूप्य निपुणेरशानिता स्पज्यतां
शुद्धकास्ममये महस्यश्वलितेरासेब्यतां शानिता ॥ ५ ॥

(दोहा )

निरभिलाय करनी करें, भोग अरुचि घट मांहि।
ताते साधक सिद्धसम, करता भुगता नांहि। €॥।

शब्दार्थ :- निरभिलाप इच्छा रहित । अरुचि>अनुरागका अभाव । साधक-मोक्षका साधक सम्यग्हष्टि जीव । भुगता (भोक्ता )>भोगनेवाला ।

अर्थ :- सम्पग्हृष्टि जीव इच्छा रहित क्रिया करते हैं ओर अंतरंग भोगोंसे विरक्त रहते हैं, इससे वे सिद्ध भगवानके समान साजत्र ज्ञाता-हष्टा हैं,कर्ता-भोगता नहीं हैं ।। € ।।

अज्ञानी जीव कर्मका कर्ता-भोगता है इसका कारण (कवित्त)

ज्याँ हिय अंध विकल मिथ्यात धर,
मृषा सकल विकलप उपजावत ।
गहि. एकत पक्ष आतमको,
करता मानि अधोमुख धावत ॥।
त्यौ जिनसती दरबचारित्री कर,
कर करनी करतार कहावत ।
बंछित मुकति तथापि मूृढ़मति,
विन समकित भव पार न पावत ॥ १० ॥

अर्थ :- हृदयका अंधा अज्ञानी जीव मिथ्यात्वसे व्याकुल होकर मनमें अनेक प्रकारके झूठे विकल्प उत्पन्न करता है, और एकान्त पक्ष ग्रहण करके ज्ञानी करोति न न बेदयते ल कर्म जानाति केवलमर्य किल तत्स्वभावम्‌ । जानन्परं करणबेदनयोरभावा- छुद्धस्वभावनियतः स हि मुक्त एव ॥। ६१३ ये तु कर्तारमात्मान पश्यन्ति तमसा तला: । सामसास्यजनवत्तेषां न सोक्षोषषि सुसुक्षताम ॥ ७ ॥ २४० समयप्तार नादक आत्माको कर्मका कर्ता मानके नोच गतिका पंथ पकड़ता है । वह व्यवहार- सम्यक्त्वों भावचारित्रके बिना बाह्य चारित्र स्वोकार करके शुभ क्रियासे कमंका कर्ता कहलाता है। वह मूर्ख मोक्षको तो चाहता है परन्तु निश्चय सम्पक्त्वके बिना संसार-समुद्रसे नहों तरता ॥ १० ॥

वास्तवमे जीव कर्मका अकर्ता हैइसका कारण (चौपाई)

चेतन अंक जीव लखि लीन्‍न्हा ।
पुदगल कर्म अचेतन चोन्‍्हा ॥
बासी एक खेतके दोऊ।
जदपि तथापि मिले नहिं. कोऊ ॥११॥।
अथे :- जीवका चेतन्य चिह्न जान लिया और पुदूगल कमंको अचेतन
पहिचान लिया। यद्यपि ये दोनों एक क्षेत्रावगाही हैं तो भी एक दूसरेसे
नहीं मिलते ॥ ११ ॥

पुन. (दोहा)

निज निज भाव क्रियासहित, व्यापक व्यापि न कोइ ।
कर्त्ता पुदगल करमको, जीव कहांसों होइ ॥१२॥।

शब्दार्थ :- व्यापक> जो व्यापे-जो प्रवेश करे । व्यापि> जिसमें व्याप- जिसमे प्रवेश करे ।

अर्थ :- दोनों द्रव्य अपने अपने गुण-पर्यायमें रहते हैं, कोई किसोका व्याप्य-ब्यापक नहीं हैअर्थात्‌ जीबमें न तो पुदूगलका प्रवेश होता हैऔर न पुद्गलमें जोवका प्रवेश होता है। इससे जीव पदार्थ पौदृगलिक कर्मोका कर्ता कंसे होसकता है ? ॥ १२ ॥

नास्ति सर्वोषषि सम्बन्ध: परद्रव्यात्मतस्‍्वयों: ।
कतृकमंत्यसम्बन्धाभावे तत्कतृता कुतः ॥ ८।।

अज्ञानमें जीब करमका कर्त्ता और ज्ञानमें अकर्त्ता है (सवेया इकतीसा )

जीव अरु पुदगल करम रहें एक खेत,
जदपि तथापि सत्ता न्‍्यारी न्यारी कही है ।
लक्षन स्वरूप गुन परजे प्रकृति भेद,
’ बुहुंमें अनाविहीकी दुविधा हू रही है।।
एलेपर भिन्नता न भासे जीव करमकी,
जोलों मिथ्याभाव तोलों ओंधि बाऊ बहो है ।
ग्यानक॑ उदोत होत ऐसो सूधी द्विष्टि भई,
जीव कर्म पिडकौ अकरतार सही है ॥ १३ ॥

शब्दार्थ :- सत्ता अस्तित्व । दुविधान्भेदभाव । ओंघिल्‍उल्टी । सूधी हृष्टि>सच्चा श्रद्धान । सही-सचमुचमे ।

अर्थ :- यद्यपि जोब और पोद्गलिक कम एक क्षेत्रावगाह स्थित हूँतो भो दोनोंको जुदो जुदी सत्ता है। उनके लक्षण, स्वरूप, गुण, पर्याय, स्वभावमें अनादिका हो भेद है। इतनेपर भी जब तक सिव्यासमावका उल्टा विचार चलता हैतब तक जीव पुद्गलकी भमिन्नता नहीं मासती, इससे अज्ञानी जोब अपनेको कर्मका कर्ता मानता है, पर ज्ञानका उदय होते हो ऐसा सत्य श्रद्धान हुआ कि सचमुचमें जीव कर्मका कर्ता नहीं है । विशेष :- जीवका लक्षण उपयोग है, पुद्गलका स्पर्श रस गंघ वर्ण है । जोव अमुर्तोक है, पुदृगल सूर्तोक है। जीवके गुण दर्शन ज्ञान सुख आदि हैं, पुदुगलके गुण स्पर्श रस गंध वर्ण आदि हैं। जीवकी पर्यायें नरनारक आदि हैं, पुदूगलकी पर्यायें इंट पत्थर पृथ्वी आदि हैं। जीव अबंध और अखण्ड द्रव्य है, पुद्गलमें स्निग्धता रुक्षता है। इससे उसके परमाणु मिलते .एकस्य बस्तुन इहान्यतरेण साथ सम्बन्ध एव सकलो5पि यतो निधषिद्धः । तत्कत्‌ करंघटनास्ति न वस्तुभेदे पश्यन्त्वकल मुनयश््व जताश्र तस्वम्‌ ।। € ॥। २५२ सम्रयत्तार नाटक बिछुरते हैं। भाव यह है कि दोनोंके द्रव्य क्षेत्र काल भावका चतुष्टय जुदा जुदा हैऔर जुदी जुदी ससा है। दोनों अपने ही गुण-पर्यायोंके कर्ता-भोगता है,कोई किसी दूसरेका कर्त्ता-भोगता नहीं है ॥११२३।॥।

पुनः (दोहा)

एक वस्तु जंसी जु है, तासों मिले न आन।
जीव अकरता करमकोौ, यह अनुभो परवांन ॥ १४१ ॥

अर्थ :- जो पदार्थ जेसा है वह वेसा हो है, उसमें अन्य पदार्थ नहीं मिल सकता, इससे जीव कर्म काअकर्सा है,यह विज्ञानसे सबंथा सत्य है॥ १४ ॥

अज्ञानी जीव अशुभ भावोका कर्ता होनेसे भावकर्मका कर्ता है (चौपाई )

कजो दुरमती विकल अस्यानोी ।
जिन्हि सु रीति पर रीति न जानी ॥।
माया सगन भरमकफे भरता।
ते जिय भाव करमके करता ॥ १५ ॥

अर्थ :- जो दुबु दिसेव्याकुल और अज्ञानी हे वे निज-परणति और पर-परणतिको नहीं जानते, मायामें सग्न हे और भ्रममें मूले हेइससे वे भाव कसंके कर्ता है ॥१५॥।

( दोहा )

जे भिथ्यासति तिमिरसों, लखे न जीव अजीव ।
तेई भावित करमके, करता होंहि सदीव ॥ १६ ॥
जे असुद्ध परनति धरे, कर अहूं परवांन ।
ते असुद्ध परिनामके, करता होंहि अजान ॥१७।॥।

ये तु स्वभावनियर्म कलयन्ति नेम- सशानसग्नसमहसों बत ते वराकाः । कुबन्ति कम तत एवं हि भावकर्म- कर्ता स्वयं भवति चेतन एब नान्‍्य: ॥ १० ॥ अथे :- जो मिथ्याज्ञानके अंधकारसे जोव-अजीवको नहीं जानते वे हो सदा भावकमंके कर्ता हैं॥१६॥ जो विभावषपरिणतिके कारण पर- पदार्थोर्में अहुंबुद्धि करते हैं वे अल्ञानी अशुद्ध भावोंके कर्ता होनेसे भावकर्मोंके कर्ता हैं ॥ १७ ॥

इसके विषयमें शिष्यका प्रश्न (दोहा)

शिष्य कहे प्रभु तुम कह्यो, दुबिधि करमको रूप । दरब कर्म पुदगल मई, भावकर्म चिद्रप ॥ १८ ॥ करता दरवित करमको, जीव न होइ त्रिकाल । अब यह भावित करम्त तुम, कहो कौनकी चाल ॥ १६ ॥ करता याकौ कौन है, कौन करे फल भोग । के पुदगल के आतमा, के दुहुंकौ संजोग ? ॥ २० ॥ अर्थ .- शिष्य प्रइन करता है कि हेस्वामि ! आपने कहा कि कर्मका स्वरूप दो प्रकारका है, एक पुद्गलमय द्रव्यकमं है और दूसरे चेंतन्यके विकार भावकर् हैं ॥ १८ ॥ आपने यह भी कहा कि जीव, द्रव्यकर्मोका कर्त्ता कभी त्रिकालमें भो नहों होसकता, तो अब आप कहिये कि भावकर्स किसकी परिणति है ? ॥ १६ ॥ इन भावकर्मोका कर्त्ता कौन है ? और उनके फलका भोगता कौन है ? भावकर्मोका कर्त्ता-भोगता पुद्गल है या जीब है, या दोनोंके सयोगसे कर्त्ता-भोगता है ? ॥ २० ॥

इसपर श्षीयुरु समाधान करते हे (दोहा)

क्रिया एक कश्ला जुगल, यो न जिनागम मांहि ।
अथवा करनी ओरकी, और करेंयो नांहि ॥ २१।।
करे और फल भोगवं, और बने नहिं एम।
जो करता सो भोगता, यहे जथावत जेम ॥ २२॥।
कार्यत्वादवर्त न कर्म न च तज्जीवध्रकत्योद्द
रज्ञाया: प्रकतेः स्वकार्यफलभग्भावानुषगात्कृति ।
नेकस्पा: प्रकतेरचित्त्त्तसनाज्जीबोषस्य कर्ता तत्ो
जोवस्येब च कम तच्सिदनुग ज्ञाता न पत्पुदूगल: ॥ ११ ॥
भावकरम करतव्यता, स्वयंसिद्ध नहि होइ ।
जो जगकी करनी कर, जगयासी जिय सोहइ ॥ २३ ॥
जिय करता जिय भोगता, भावकरस जियचाल ।
पुदगल करें न भोगवे, दुविधा मिथ्याजाल ॥ २४ ॥
ताते भावित करमकों, करे मिथ्याती जीव ।
सुख दुख आपद संपदा, भुरज सहज सदीव ॥ २५ ॥

शब्दार्थ :- जुगल (युगल) दो । जिनागम (जिन+आगम )5 जिनराजका उपदेश । जथावत-वास्तवमें । कर्तव्यता-क रतूति । स्वय सिद्ध अपने आप । जगवासी जिय>ससारी जोव । जियवाल-जीवकी परिणति । दुविधाजनदोनों ओरका भुकाव। आपद>इष्ट वियोग, अनिष्ट सयोग । सपदा>अनिष्ट वियोग, इष्ट सयोग । भूजे>भोगे ।

अर्थ :- क्रिया एक ओर कर्त्ता दोऐसा कथन जिनराजके आगममें नहीं है, अथवा किसोको क्रिया कोई करे, ऐसा भो नहीं हो सकता ॥ २१ ॥ क्रिया कोई करे और फल कोई भोगे ऐसा जन बंनमें नहीं है, क्योंकि जो कर्त्ता होता है, वही वास्तबमें भोगता होता है । २२।। मावकर्ंका उत्पाद अपने आप नहों होता, जो ससारकी क्रिया हलन-चलन चतुर्गति भ्रमण आदि करता है,वही संसारी जीव भावकमंका कर्सा है॥ २३ ॥ भावकमोंका कर्त्ता जीव है, भावकमोंका भोगता जोब है, भावकर्म जोवकी विभाव- परिणति है। इनका कर्त्ता-भोक्ता पुदूगल नहीं है, ओर पुदूगल तथा दोनोंका मानना सिथ्या जंजाल है॥ २४ ॥ इससे स्पष्ट है कि भावकर्मोंका कर्त्ता मिथ्यात्वी जीब हैओर बहो उनके फल सुख-दुख वा संयोग-वियोगकों सदा भोगता है ॥ २५ ॥

कर्मके कर्त्ता-भोक्ता बाबत एकांत पक्षपर विचार (सर्वेया इकतीसा )

केई मृढ़ विकल एकंत पच्छ गहेैं कहें,
आतमा अकरतार प्रन परम है।
कर्मेंद प्रदितकर्य कतहतक: क्षिप्टवास्सन कतुंता
फर्तात्मैज कथंचिदित्यचलिता कंश़्िच्छुति:कोपिता ।
तेबाघुद्धतमोहमुद्रितषियां बोधस्य संशुद्धये
स्याद्रादप्र तिबन्धसब्धविजया बस्तुस्थिति: हत्यते ॥ १२ ॥
तिन्हिसों जु कोऊ कहै जोब करता है तासों,
फेरि कहें करमको करता करम है।।
ऐसे मिथ्यामगन मिथ्याती ब्रह्मघातो जीव,
जिन्हिक॑ हिए अनादि मोहकों भरम है ।
तिन्हिकों मिथ्यात दूर करियेकों कहें गुरु,
स्थादवाद परवान आतम धरम है॥ २६ ॥

शब्दार्थ :- विकल>ट्रखी । एकान्त पक्ष >पदार्थके एक धर्मको उसका स्वरूप माननेका हठ । ब्रह्मघाती >अपने जीवका अहित करनेवाला ।

अर्थ :- अज्ञानसे दुखो अनेक एकान्तवादी कहते हैं किआत्मा कमंका कर्ता नहों है, वह पुर्ण परमात्मा है। और उनसे कोई कहे कि कर्मोंका कर्त्ता जोब है, तो वेएकान्तपक्षी" कहते हैं कि कर्मका कर्त्ता कर्म हो है। ऐसे मिथ्यात्वमें पगे हुए मिथ्यात्वो जीव आत्माके घातक हैं,उनके हृदयमें अनादि कालसे मोहकर्म जनित भूल भरी हुई है । उनका मिश्यात्व दर करनेके लिये श्रोगुरुने स्थाह्ादरूप आत्माका स्वरूप वर्णन किया है (१ २६॥।

स्थाद्ादमे आत्माका स्वरूप (दोहा)

चेतन करता भोगता, भिथ्या मगन अजान ।
नहि करता नहि भोगता, निहच सम्यकवान ॥ २७ ॥

अर्थ :- मिथ्यात्वमें पगा हुआ अज्ञानो जीव कर्मका कर्त्ता-भोक्ता है, निश्चयका अवलम्बनलेनेबाला सम्यक्त्वी कमंका न कर्ता है न भोक्ता है ॥ २७ ॥

इस विषयका एकान्तपक्ष खण्डन करनेवाले स्थाद्वादका उपदेश
“जैसे सांख्यमतो कहें अलख अकरता है,
सर्वथा प्रकार करता न होइ कबहीं।

साख्यमतोी आदि ।

सा5कर्तारसमो स्पृशस्तु पुरुष सांख्या इबाप्याहँता: कर्तारं कलयन्तु तंकिल सदा भेदावबोधादध: । ऊध्य तृद्धतबोघधामनियत प्रस्यक्षमेन स्वयम्‌ पश्यन्तु च्युतकठू भावमचल शातारमेक॑ परम्‌ ॥ १३ ॥

तेसे जिनमती गुरुमुख्ल एक पक्ष सुनि,
याहि भांति माने सा एकंत तजो अबहीं ।।
जौलों दुरमतो तोलों करमको करता है,
सुमती सदा अकरतार कटह्मौं सबहों ।
जाक॑ घटि ग्यायक सुभाउ जग्यों जबहीसों,
सो तो जगजालसों निरालौ भयौ तबहीं ॥ २८ ॥

शब्दार्थ :- जिनमती-जिनराज कथित स्याद्वाद विद्याके ज्ञाता ।

अर्थ :- जिस प्रकार सांस्यमती कहते हैकि आत्मा अकर्त्ता है, किसो भी हालतमें कभी कर्ता नहों होसकता । जैनसतो भी अपने गुरुके मुखसे एक नयका कथन सुनकर इसी प्रकार मानते हैं, परइस एकान्तवादको अभी ही छोड़ दो, सत्यार्थ बात यह हैकि जब तक अज्ञान है,तब तक ही जीव कर्मका कर्त्ता है, सम्पग्लानकी सब हालतोंमें सदेव अकर्त्ता कहा है । जिसके हृदयमें जबसे ज्ञायकस्वभाव प्रगट हुआ है वह तभीसे जगतके जंजालसे निराला हुआ - अर्थात्‌ मोक्षके सन्‍्मुख हुआ है ॥ २८ ॥

इस विपयमे बौद्धमतवालोंका विचार (दोहा) (स्वेथा इकतीसा )

बोध छिनकवादी कहे, छिनभंगुर तन मांहि ।
प्रथम समय जो जोब है, दुतिय समय सो नांहि ॥ २६ ॥
ताते मेरं मतबिषे, करे करम जो कोइ ।
सो न भोगव सरवथा, और भोगता होइ ॥ ३० ॥

अर्थ :- क्षणिकवादो बोद्धमतवाले कहते है किजीव शरीरमे क्षणभर क्षणिकमिदर्मिहिक कल्पयित्वात्मतत्त्व निजमनसि विधत्ते कठतृभोकत्रोविभेदम । अपहरति विमोहं तस्य नित्यामतौधे. स्वपमग्रमभिषिञ्य श्विच्चमत्कार एज ॥ १४।। रहता है, सदेव नहीं रहता । प्रथम समयमें जो जीव है वह दूसरे समयमें’ नहीं रहता ॥ २६ ॥ इससे मेरे विचारमभें जो कर्म करता है वह किसी हालतमें भी भोक्ता नहीं हो सकता, भोगनेवाला और हो होता है ॥ ३० ॥

बौद्धमतवालोंका एकान्त विचार दूर करनेको दृष्टान्त द्वारा सम+प८ते है । (दोहा )

यह॒एकंत सिथ्यात पख, दूर करनक॑ काज ।
चिट्विलास अविचल कथा, भाषे श्रोजिनराज ॥ ३१ ॥
बालापन_ काहू पुरुष, देख्यों पुर एक कोह ।
तरुन भए फिरिके लख्यों, कहे नगर यह सोइ ॥ ३२ ॥
जो दुहु पनमें एक थो, तो तिनि सुमिरन कौय ।
और पुरुषको अनुभव्यो, और न जाने जीय ॥ ३३ ॥।
जब यह वचन प्रगट सुन्यौ, सुन्यो जेनमत सुद्ध ।
तब इकतवादी पुरुष, जन भयो प्रतिबुद्ध ॥ ३४ ॥

अर्थ :- इस एकान्तवादकी मिथ्यापक्ष हटानेके लिये श्रीमज्जिनेन्द्रदेव आत्माके नित्यस्वरूपका कथन करते हुए कहते हैं ॥ २१ ॥ कि किसी मनुष्यने बालकपनमें कोई नगर देखा, और फिर कुछ दिनोंके बाद जवानोकी अवस्थामें वही नगर देखा तो कहता हैकि यह वही नगर हैजो पूबमें देखा था ॥ ३२॥ दोनों अवस्थाओंमें वह एक ही जीव था तब तो उसने स्मरण किया, किसी दूसरे जोवका जाना हुआ वह नहों जान सकता था ॥ ३३ ॥ जब इस प्रकारका स्पष्ट कथन सुना और सच्चे जनम्तका उपदेश मिला तब वह एकान्तवादो मनुष्य प्रतिबद्ध हुआ और उसने जेनमत अंगीकार किया ॥ ३४ ॥ ) एक सेंकिण्डमें असख्य समय होते है ।

बौद्ध भी जीव द्रव्यको क्षण-भगुर कंसे मान बैठे इसका कारण वबतलाते है (सवैया इकतीसा )

एक परजादइ एक समंमें विनसि जाइ,
दृूजी परजाइ दूजे समे उपजति है।
ताकौ छल पकरिक बोध कहे समे सम,
नवोौ जीव उपज पुरातनकी छति है॥।
ताते माने करमकों करता है और जीव,
भोगता है और वाक हिए ऐसी मति है ।
परजोौ प्रवांनकों सरवथा दरब जाने,
ऐसे दुरबुद्धोकोँ अवसि दुरगति है॥३५॥

शब्दार्थ :- परजाइ>अवस्था । पुरातनन्प्राचीन । छति (क्षति) नाश । मतिव्समझ । परजोौ प्रवान5हालतोके अनुसार । दुरबुद्धि-मूर्ख ।

अर्थ :- जीवकी एक पर्याय एक समयमें नष्ट होती है और दूसरे समयमें दूसरी पर्याय उपजतो है, और जेनमतका सिद्वान्त भी है, सो उसी बातको पकडके बौद्धमत कहता है कि क्षण-क्षणपर नया जीव उपजता है. और पुराना विनशता है। इससे वे मानते हैंकि कर्मंका कर्ता और जीव है, तथा भोक्ता ओर हो है, सो उनके चित्तमें ऐसी उलटो समझ बेंठ गई है। श्रोगुर कहते हैँकि जो पर्यायके अनुसार हो द्रव्यफो स्बंधा अनित्य मानता है ऐसे मुर्खकी अवश्य कुगति होती है । विशेष :- क्षणिकवादी जानते हैं कि मांस-भक्षण आदि अनाचारमें वर्तेनेवाला जोब है, वह नष्ट हो जावेगा, अनाचारमें वर्तनेबालेको तो कुछ भोगना ही नहीं पड़ेगा, इससे मोज करते हैंऔर मनपाने चतंते हैं। परन्ठु किया हुआ कर्म भोगना हो पड़ता है। सो नियमसे वे अपने आत्माको कुगतिमे पटकते है ॥ ३५ ॥

वृत्त्यशभेदतो5्त्यन्त॑ वृत्तिमन्नाशकल्पनात्‌ ।
अन्य करोति भूडक्तेधन्य इत्येकान्तश्वकास्तु मा ॥ १५ ॥
सबविशुद्धि द्वार र्श्ढ

दुर्बृद्धिकी दु्गंति ही होती है (दोहा)

कहै अनातमकी कथा, चहै न आतम सुद्धि ।
रहै अध्यातमसों विभुख, दुराराधि दुरबुद्धि ॥! ३६॥।
दुरबुद्धी भिथ्यामती, दुरगति मिथ्याचाल ।
गहि एकंत दुरबुद्धिसों, मुकत न होइ त्रिकाल ॥ ३७ ॥

शब्दार्थ :- अनातम-अजीव । अध्यातमल्आत्मज्ञान । विमुख- विरुद्ध । दुराराधि"किसी भी तरहसे न समभनेवाला । दुर्बुद्धिल मूर्ख ।

अर्थ :- मूर्ख मवुब्य अनात्माकी चरक्षा किया करता है, आत्माका अभाव कहता है-आत्मशुद्धि नहीं चाहता। वह आत्मज्ञानसे पराइमुख रहता है, बहुत परिश्रम पूरक समभानेसे भी नहीं समझता ॥ ३६ ॥

सिथ्याहृष्टि जीव अज्ञानी है, और उसकी मिथ्याप्रवृत्ति दुर्गंतिका कारण है,
वह एकान्तपक्ष ग्रहण करता है, और ऐसी मूृखतासे वह कभी भो मुक्त नहीं
हो सकता ॥ ३७ ॥

दुर्वद्धिकी भूलपर हप्टान्त (सवेया इकतीसा )

कायासों विचारं प्रीति मायाहीसों हारि जीति,
लिये हठ रीति जेसे हारिलकी लकरी ।
चंगुलके जोर जेसे गोह गहि रहै भूमि,
त्योंही पाइ गाडे पे न छाड़ टेक पकरी ।।
मोहकी मरोरसों भरमको न छोर पाब,
धार्व चहुं बोर ज्यों बढ़ाये जाल मकरी।
ऐसी दुरबुद्धि भूली भूठक भझरोखे भूलो,
फूली फिरे भमस्तता जंजोरनिसों जकरो ॥ ३८ ॥

शब्दार्थ :- काया >शरीर । हठ-दुराग्रह । गहि रहे>पकड रक्‍से । लकरी >लाठी । चगुल>पक्ड । पाइह गाड>”अड़ जाता है। टेक-हठ । धावे"भटके ।

अर्थ :- अज्ञानी जीव शरोरसे अनुराग रखता है, धनको कमोमें हार और घनकी बढ़तीमें विजय मानता है, हठोला तो इतना होता हैकि जिस प्रकार हरियल पक्षो अपने पांदसे लकड़ीको खूब सजबूत पकड़ता है, अथवा जिस प्रकार गोह" जमोन व दोवालकों पकड़कर रह जाता है, उसी प्रकार बहू अपनो कुटेब नहों छोड़ता - उस्तो पर डटा रहता है। मोहके भकोरोंसे उसके भ्रमको थाह नहों मिलतो अर्थात्‌ उसका मिथ्यात्व अनंत होता है, बह चतुर्गतिमें भटकता हुआ मकड़ीकासा जाल फंलाता है,इस प्रकार उसको मूखंता अज्ञानसे झूठके मार्गमें झल रहो है, ओर ममताको सांकलोंसे जकड़ो हुई बढ़ रही है ॥ ३८

दुर्बद्धकी परिणति (सवेया इकतीसा)

बात सुनि चौंकि उठे बातहीसों भोंकि उठ,
बातसों नरम होइ बातहीसों अकरी।
निदा करें साधुको प्रसंसा करें हिसकको,
साता माने प्रभुता असाता माने फकरी ॥।
मोख न सुहाइ दोष देखे तहां पेठि जाइ,
कालसों डराइ जेसे नाहरसों बकरी ।
ऐसी दुरबुद्धि भूली भूठक॑ भझरोखे भूली,
फूली फिर ममता जंजीरनिसों जकरोी ॥ ३६ ॥
शबदार्थ: - चौकि उठ >तेज पड़े । भौकि उठं-कुत्तेके समान भौकने
लगे । अकरी >ऐंठ जावे । प्रभुतानूवडप्पन । फकरी (फकीरी )>गरीबी ।
काल-मृत्यु ।नाहर-बाघ, सिह ।

अर्थ :- अज्ञानो जोब हिताहित नहों विचारता, बात सुनते हो तेज पड़ने लगता है, बात ही सुनकर कुत्तके समान भौंकने लगता है, मन रुचतो बात सुनकर नरम हो जाता है, और असुहातो बात हो तो ऐंठ जाता है। १ मोह एक प्रकारका जानवर होता हैं। उसे चोर लोग पासमे रखते है, जब उन्हें ऊँचे महलो मदिरोपर चढना होता है तब वे गोहकी कमरसे लम्बी रस्सी बाधकर उसे ऊपरको फेक देते है, तोबह ऊपर जमीन व भीतको खूब मजबूत पकड़ लेता है और चोर लटकती हुई रस्सीको पकड़कर ऊपर चढ़ जाते हैं । मोक्षमार्गो साधुओंकी निन्‍दा करता है,हिंसक अधरमियोंकी प्रशंसा करता है, साताके उदयमें अपनेको महान् और असाताके उदयमें तुच्छ गिनता है । उसे मोक्ष नहीं सुहाता, कहों दुर्गुग दिखाई देयें तो उन्हें शीघ्र अंगीकार कर लेता है। शरीरमें अहंबद्धि होनेके कारण मौतसे तो ऐसा डरता है जसे बाघसे बकरो डरतो है,इस प्रकार उसकी मुर्खता अज्ञानसे झठके मार्गेमें झल रहो हैऔर ममताको सॉकलोंसे जकड़ी हुई बढ़ रही है ॥ ३६ ॥

अनेकान्तकी महिमा (कवित्त)

केई कहें जीव क्षनभंगुर,
केई कहें करम करतार ।
केई करमरहित नित जंपहि,
नय अनंत नानापरकार ।।
जे एकांत गहें ते म्रख,
पंडित अनेकांत पल्ल धार ।
जेसे भिन्न भिन्न मुकताहल,
गुनसों गहत कहावे हार ॥ ४० ॥

शब्दार्थ :- क्षनभंगुर>अनित्य । जंपहिन्न्कहते है। एकात>एक ही नय । अनेकात८-अपेक्षित अनेक नय । पख धार-पक्ष ग्रहण करना। मुकताहल (मुक्ताफल)-मोती । गुनच्सूत ।

अर्थ :- बौद्धमती जीबको अनित्य ही कहते हैं, मीमांसक मतवाले जीवको कर्मका कर्ता हो कहते हैं ।॥सांख्यमती जीवकों कमेरहित ही कहते हैं । ऐसे अनेक समतवाले एक एक धममंको ग्रहण करके अनेक प्रकारका कहते हैं, पर जो एकान्त ग्रहण करते हैं वे मूर्ख हैं, विद्वान् लोग अनेकांतको आत्मान परिशुद्धमोप्सुलिरतिब्याप्ति प्रपश्चान्पक: कालोपाधियलादशुद्धिमणघिकां तत्रापि भत्वा परे: । चैतन्य क्षणिक प्रकल्प्प पृथकेः शुद्धओुसृत्रेरते: आत्सा ब्युण्कित एव हारबबहो लिःसृत्रमुक्त क्षिभिः ॥ १६॥। किम कमिकमनक मिल दममनन नवकिलीकभी जी जज 3… ाएए्रणनाणराणशशशश/शशशशणणशणशशानाणतओ स्वीकार करते हैं। जिस प्रकार मोतो जुदा-जुदा होते है, पर सूतमें गुहनेसे हार बन जाता है। उसी प्रकार अनेकांतसे पदार्थवी सिद्धि होती है, ओर जिस प्रकार जुदा-जुदा मोती हारका काम नहीं देते, उसो प्रकार एक नयसे पदार्थका स्वरूप स्पष्ट नहीं होता, बल्कि विपरीत हो जाता है ॥ ४० ॥

पुन (दोहा)

यथा सूत संग्रह बिना, मुकत माल नहि होइ।
तथा स्थादवादी बिना, मोख न साथे कोइ ॥ ४१ ॥

शब्दार्थ :- सप्रह+ इकट_ । मकत माल>मोतियोकी माला ।

अर्थ :- जैसे सूतमें पोये बिना सोतियोंकी माला नहों बनती बसे हो स्पाह्ादीके बिता कोई मोक्षमार्ग नहों साध सकता ॥ ४१ ॥

पुन. (दोहा)

पद सुभाव प्रब उ्दे, निहच उद्यम काल।
पच्छुपात मिथ्यात पथ, सरबंगी सिदर चाल ॥ ४२ ॥

शब्दार्थ :- पद + पदार्थ । सुभाव ( स्वभाव ) ८ निजधर्म । उद्यम>पुरुपार्थ, तदबीर । कालसमय । पक्षपात-एक ही नयका ग्रहण । सरवगीजअनेक नयका ग्रहण ।

अर्थ :- कोई पदार्थके स्वभावहोको, कोई पृर्वंकमंके उदयहीको, कोई निश्चयमात्रको, कोई पुरुषार्थो और कोई कालहोको मानते हैं, पर एकहो पक्षका हठ प्रहण करना मिथ्यात्व है, और अपेक्षित सबहोको स्वीकार करना सत्याथ है॥ ४२ ॥

भावार्थ :- कोई कहता है कि जो कुछ होता है, सो स्वभाव (नेचरल ) हीसे अर्थात्‌ प्रकृतिसे होता है, कोई कहते है कि जो कुछ होता है, वह तकदीरसे होता है, कोई कहते हैं कि एक ब्रह्म हो है, न कुछ नष्ट कतुबेंदयितुभ्न पुक्तिवशतो भेदोःसत्वभेदोषषि बा कर्ता वेदथिता च मा भवतु वा वस्त्वेब सब्चिन्त्यताम । प्रोता मृत्र इवात्मनोह निपुणभेत्त’ न शक्‍या क्वचि- च्चिच्चिस्तामणिमालिकेयससितोप्येका चकास्त्वेव नः ।। होता है, न कुछ उत्पन्न होता है, कोई कहते हैं कि तदबोर ही प्रधान है, कोई कहते हैकि जो कुछ करता है सो काल ही करता है, परन्तु इन पॉचोंमेंस एक क्रिसोहीको मानना, शेष चारका अमाव करना एकान्त है।

छहो मतवालोंका जीव पदार्थपर विचार (स्वेया इकतीसा )

एक जीव वस्तुके अनेक युन रूप नाम,
निजजोग सुद्ध परजोग्सों असुद्ध है।
वेदपाठी ब्रह्म कहें मीमांसक कम कहें,
सिवमती सिब कहे बोद्ध कहे बुद्ध है ।।
जनी कहे जिन न्यायवादी करतार कहें,
छहों दरसनमें वचनको विरुद्ध है।
वस्तुका सुरूप पहिचाने सोई परवोन,
वचनक भेद भेद माने सोई सुद्ध है ॥॥ ४३१

शब्दार्थ :- निजजोग-निजस्वरूपसे । परजोगलअन्य पदार्थके सयोगसे । दरसन (दर्शन) >मत । वस्तुकौ सुरूप>पदार्थका निजस्वभाव । परवीन (प्रवीण )-पंडित ।

अर्थ :- एक जीव पदार्थके अनेक ग्रुण, अनेक रूप, अनेक नाम हैं, वह परपदार्थके संयोग बिना अर्थात्‌ निजस्वरूपसे शुद्ध हैऔर परद्रव्यके सयोगसे अशुद्ध है। उसे वेदपाठो अर्थात्‌ वेदान्ती ब्रह्म कहते है, मोमांसक कर्स कहते है, शबलोग वेशेषिक सतवाले शिव कहते हैं, बोह मतवाले बुद्ध कहते है, जेनी लोग जिन कहते है, नेयायिक कर्त्ता कहते हैं । इस प्रकार छहों मतके कथनमें वचनका विरोध है। परन्तु जो पदार्थंका निज-स्वरूप जानता हैवही पंडित है, और जो वबचनके भेदसे पदार्थमें भेद मानता है वही मूर्ख है ॥ ४३ ॥

पॉचो मतवाले एकान्ती और जेनी स्याद्वादी हैं (सवेया इकतीसा )

वेदपाठी ब्रह्म मांनि निहचे सुरूप गहेैं,
सीसांसक कर्म मसांनि उदेसें रहत है।
बोड़मतो बुद्ध मांनि सूच्छम सुभाव साध,
सिवमती सिवरूप कालकों कहत है ॥।
न्याय ग्रंथके पढ़ेया थापे करतार रूप,
उदहिम उदोरि उर आनंद लहत है।
पांचों दरसनि तेतो पोष एक एक अंग,
जेनी जिनपंथी सरवंगी ने गहुत है ॥ ४४॥

शब्दार्थ :- उहिम ७ क्रिया। आनद 5 हषे। पोषे ८ पुष्ट करे। जितपथी >जैनमतके उपासक । सरवगी नँनच्सवेनय-स्याद्वाद ।

अर्थ :- वेदान्ती जीवकों निश्चयनयकों हृष्टिसे देखकर उसे सर्वथा ब्रह्म कहता है, मोमांसक जीवके कसं-उदयकी तरफ हृष्टि देकर उसे कर्म कहता है, बोद्धमतो जीवको बुद्ध मानता है और उसका क्षणभंगुर सुक्ष्म रवभाव सिद्ध करता है, शव जोवकों शिव मानता हैऔर शिवकों कालरूप कहता है, नेयायिक जीवको क्रियाका कर्त्ता देखकर आनंदित होता हैऔर उसे कर्त्ता मानता है । इस प्रकार पाँचों मतवाले जोबके एक एक धर्मको पुष्टि करते हैं, परन्तु जेनधर्मके अनुयायी जेनी लोग सर्व नयका विषयमूत आत्मा जानते हैं, अर्थात्‌ जंनमत जोवको अपेक्षासे ब्रह्म भी मानता है, कमरूप भो सानता है, अनित्य भो मानता है, शिवस्वरूप भी मानता है, कर्ता भी समानता है, निष्कर्म भी मानता है, पर एकान्‍्त रूपसे नहीं । जेनमतके सिवाय सभी मत मतवाले है, सर्वथा एक पक्षके पक्षपाती होनेसे उन्हें स्वरूपको समझ नहीं है॥ ४४ ॥

पाँचों मतोके एक एक अगका जैनमत समर्थक है (सवेया इकतीसा )

निहचे अभेद अंग उदे गुनकी तरंग,
उहिमकी रोति लिए उद्धता सकति है।
परजाइ रूपको प्रवान सुच्छम सुभाव,
कालकीसो ढाल परिनाम चक्र गति है।।
याही भांति आतम दरबके अनेक अंग,
एक माने एककों न माने सो कुमति है ।
टेक डारि एकमें अनेक खोजें सो सुबुद्धि,
खोजी जीव वादी मरे सांची कहवति है ॥ ४५ ॥

शब्दार्थ :- याही भाँति 5इस प्रकार। कुमति 5 भिथ्याज्ञान । खोजे “ दूढे । सुबुद्धि सम्यग्ज्ञान ।खोजी 5 उद्योगी। वादी 5 बकवाद करनेवाला ।

अर्थ :-जीव पदार्थके लक्षणमें भेद नहीं है, सब जीव समान हैं, इसलिये वेदान्तीका माना हुआ अद्वंतवाद सत्य है। जीवके उबयमें ग्रुणोंकी तरंगे उठती है, इसलिये मीमांसकका माना हुआ उदय भी सत्य है। जीवमें अनंत शक्ति होनेसे स्वभावमें प्रवर्तता है, इसलिये नेयायिकका माना हुआ उद्यम अंग भी सत्य है। जीवकी पर्यायें क्षण-क्षणमें बदलती हैं, इसलिये बोद्धमतीका माना हुआ क्षणिक भाव भी सत्य है। जीवके परिणास कालके चक्रके समान फिरते है, और उन परिणामोंके परिणसनमें कालद्रव्य सहायक है, इसलिये शेबोंका माना हुआ काल भी सत्य है। इस प्रकार आत्मपदार्थके अनेक अंग है। एकको मानना और एकको नहों मानना सिथ्याज्ञान है, और दुराग्रह छोड़कर एकमें अनेक धर्म दूढ़ता सम्यग्ज्ञान है। इसलिये संसारमें जो कहावत है कि ‘खोजी पावे वादी मरे’ सो सत्य है ॥ ४५ ॥

स्पाद्वादका व्याख्यान (सवेया इकतीसा )

एकमें अनेक है अनेकहीमें एक है सो,
एक न अनेक कछु कह्मों न परतु है।
करता अकरता है भोगता अभोगता है,
उपजे न उपजत मूृएं न मरतु है।॥॥
बोलत विचारत न बोले न विचार कछू,
भेखको न भाजन पे भेखसों धरतु है ।
ऐसौ प्रभु चेतन अचेतनकी संगतिसों,
उलट पलट नटबाजीसी करतु है ॥ ४६ ॥

अर्थ :- जीवसें अनेक पर्यायें होती हैं इसलिये एकमें अनेक है, अनेक पर्यायें एक ही जीवद्रव्यको हैंइसलिये अनेकमें एक है,इससे एक है या अनेक हैकुछ कहा हो तहीं जासकता। एक मी नहीं है,अनेक भी नहों है, अपेक्षित एक है, अपेक्षित अनेक है । वह व्यवहारनयसे कर्त्ता है, निश्चयसे अकर्त्ता है, वयवहा रनयसे कर्मोका भोक्ता है,निश्चयसे कर्मोका अभोक्ता है,व्यवहारनयसे उपजता है,निश्चयनयसे नहीं उपजता है- था, हैऔर रहेगा, व्यवहारनयसे मरता है, निश्चयनयसे अमर है, व्यवहारनयसे बोलता है, विचारता है, निश्चयनयसे न बोलता है, न विचारता है, निश्चयनयसे उसका कोई रूप नहीं है, व्यवहारनयसे अनेक रूपोंका धारक है। ऐसा चंतन्य परमेश्वर पौदगलिक कर्मोंकी संगतिसे उलट-पलट हो रहा है, मानों नट जेसा खेल खेल रहा है॥ ४६ ॥

निविकल्प उपयोग ही अनुभवके योग्य है (दोहा)

नटबाजी ’ विकलप दसा, नांही अनुभो जोग ।
केवल अनुभो करनको, निरविकलप उपजोग ॥ ४७ ॥

शब्दार्थ :- नटबाजी >नटका खेल । जोगल्‍्योग्य ।

अर्थ :- जीवकी नटके समान उलदा-पुलटो सबिकल्प अवस्था है, वह अनुभवके योग्य नही है। अनुभव करने योग्य तोउसकी सिर्फ निविकल्प अबस्था हो है ॥ ४७ ॥

अनुभवम विकल्प त्यागनेका हृष्टान्त (सवैया इकतीसा)

जेसे काहू चतुर संवारी है मुकत माल,
मालाको क्रियासे नाना भांतिकौ विग्यान है ।
क्रियाकौं विकलप न देखे पहिरनवारो,
मोतिनकी सोभामें सगन सुखवान है।।
१ “घटवासोी” ऐसा भी पाठ है ।
तेसें न करे न भु जेअथवा करे सो भुज,
और करें और भुजे सब नय प्रवांन है ।
जदपि तथापि विकलप विधि त्याग जोग,
निरविकलप अनुभो अमृत पान है ॥ ४८॥

शब्दार्थ :- संवारी >सजाई । मुकत माल न-मोतियोंकी माला । विग्यान>चतुराई । मगन मस्त । अमृत पान-"अमृत पीता ।

अर्थ :- जैसे किसी चतुर मनुष्यने मोतियोंको माला बनाई, माला बनानेसें अनेक प्रकार खतुराई की गई, परन्तु पहिननेवाला साला बनानेकी कारीगरोपर ध्यान नहीं देता, मोतियोंको शोभामें मस्त होकर आनन्द मानता है,उसी प्रकार यद्यपि जोव न कर्त्ता है, न भोक्ता है,जो कर्ता हैवही भोक्ता है, कर्त्ता और है,भोक्ता और है, येसब नय मान्य हैं तोभी अनुभवमें ये सब विकल्प-जाल त्यागने योग्य हैं,केवल निविकल्प अनुभव ही अमृतपान करना है ॥ ४८ ॥

किस नयसे आत्मा कर्मोंका कर्त्ता हैऔर किस नयसे नही है (दोहा )

दरब करस करता अलख, यह विवहार कहाउ ।
निहचे जो जंसोौ दरब, तेसो ताकौ भाउ ॥ ४६ ॥

शब्दार्थ :- दरव करम (्रव्यकर्म )>ज्ञानावरणीय आदि कर्मोकी धूल । अलखज"आत्मा । ताकौ८उसका । भाउल्‍स्वभाव ।

अर्थ :-द्रव्परकमंका कर्ता आत्मा है यह व्यवहारनय कहता है, पर निश्चयनयसे तो जो द्रव्य जेत्ता हैउसका वेसा हो स्वभाव होता है- अर्थात्‌ अचेतन द्रव्य अचेतनका कर्त्ता है और चेतनमावका कर्त्ता चेतन्य है ॥ ४६ ॥

व्यायहारिकहशव केबल कत कम जे विभिन्नसिष्यते ।
निश्चयेन यदि वस्तु खिन्ट्यते कठूं कर्म च सर्देकमिष्यते ॥ १८ ॥

ज्ञानका ज्ञेयाका ररूपपरिणमन होता है पर वह ज्ञेयरूप नहीं हो जाता (सवेया इकतीसा )

ग्यानकौ सहज शेयाकार रूप परिणवे,
यद्यपि तथापि ग्यान ग्यानरूप कह्मौं।
शेय शेयरूप यो अनाविहीकी मरजाद,
काहू वस्तु काहुको सुभाव नहि गह्मो है ॥।
एतेपर कोऊ मिथ्यामती कहै शेयाकार,
प्रतिभासनसों ग्यान असुद्ध हूं रह्मों है ।
याही दुरबुद्धिसों विकल भयो डोलत है,
समुर्क न धरम यों भरम मांहि बह्लों है॥ ५० ॥

शब्दार्थ :- ज्ञेयाका र>ज्ञेयके आकार । ज्ञेय> जानने योग्य घटपटादि उदार्थ। मरजाद (मर्यादा) > सीमा। प्रतिभासना -छाया पडना। भर्म (भरम)-प्रान्ति ।

अर्थ :- यद्यपि ज्ञानका स्वभाव शेयाकाररूप परिणमन करनेका है, तो भो ज्ञान, ज्ञान हीरहता है और ज्ञेय शेय ही रहता है। यह मर्यादा अनादि कालसे चली आतो है, कोई किसोके स्वभावको ग्रहण नहीं करता स भवति नापरस्य परिणामिन एवं भवेत्‌ । न भवति कतृशून्यभिह कं न चेकतया स्थितिरिह बस्तुनो भवतु कतु तदेव ततः ॥। यह झ्लोक कलकत्तेकी छपी हुई परमाध्यात्मत्तरगिणीमे है। किन्तु इसकी सस्क्ृत टीका प्रकाशकको उपलब्ध नहीं हुई। काशीके छपे हुए प्रथम गुच्छुकमे यह श्लोक नही है। ईडर-भण्डारकी प्राचीन हस्तलिखित प्रतिमें भी यह झ्लोक नहीं है, ओर न इसकी कविता ही है । बहिलु ठतियद्यपि स्फुटबनम्तशक्ति. स्वयं तथाध्प्पपरवस्तुनो विशति नान्यवस्त्यस्तरम्‌ । स्वभावनियतं यतः सकलमेव वस्त्विष्यते स्वभावध्वलनाकुल: किमिह सोहितः विलश्यते (। १६ ॥॥ अर्थात्‌ ज्ञान शेय नहीं होजाता और भेय शान नहीं हो जाता । इतने पर कोई मिथ्यामतो - वेशेषिक आदि कहते हैं, कि शेयाकार परिणमनसे ज्ञान अशुद्ध हो रहा है, सो वे इसी मूर्खतासे व्याकुल हुए मटकते हैं- वस्तुस्वभाव नहीं समझे, अ्ममें भूले हुए हैं। विशेष :- वेशेषिकोंका एकान्त सिद्धान्त है, किजगतके पदार्थ शानसें प्रतिबिम्बित होते हैं,इससे ज्ञान अशुद्ध होजाता है, सो जब तक अशुद्धता नहीं मिटेगी तब तक मुक्त नहीं होगा । परन्तु ऐसा नहीं है, श्ञान’ स्वच्छ आरसीके समान है, उसपर पदार्थोंकी छाया पड़तो है सो व्यवहारसे कहना पड़ता हैकि अधुक रंगका पदार्थ भलकनेसे काँच अमुक रंगका दिखता है, पर वास्तबमें छाया पड़नेसे काँचमें कुछ परिवतंन नहीं होता ज्योंका त्यों बना रहता है ॥ ५० ॥

जगतके पदार्थ परस्पर अव्यापक है (चौपाई)

सकल वस्तु जगमें असहाई !
वस्तु वस्तुसोँ मिले न काई ।॥।
जीव वस्तु जाने जग जेतो।
सोऊ भिन्न रहै सब सेतोी ॥ ५१ ॥

शब्दार्थ :- असहाई >स्वाधीन । जेती-जितनी । अर्थ .- निश्चयनयसे जगतमें सब पदार्थ स्वाधोन हैं, कोई किसोकी अपेक्षा नहीं करते और न कोई पदार्थ किसी पदार्थसे मिलता है। जीवात्मा जगतके जितने पदायर्थ हैंउन्हें जानता हैपर वे सब उससे भिन्न रहते है ।

भावार्थ :- व्यवहारनयसे जगतके द्रव्य एक-दूसरेसे मिलते हैं, एक- दूसरेमें प्रवेश करते ओर एक-दूसरेको अबकाश देते हैं, पर निश्चयनयसे सब निजाश्रित हैं, कोई किसीसे नहीं मिलते हैं । जोवके पूर्ण ज्ञानमें वे सबऔर अपूर्ण ज्ञानमें ययासम्भव जगतके पदार्थ प्रतिभासित होते हैं, पर ज्ञान उनसे मिलता नहों हैऔर न वे पदार्थ ज्ञानसे मिलते हैं ॥ ५१ ॥

वस्तु चेंकमिह नान्यवस्तुनों येन तेन खलु उस्तु वस्तु तत्‌ ।
निश्चयोप्यमपरो परस्य कः कि करोति हि बहिलु ठन्नपि ॥२०॥।

कर्म करना और फल भोगना यह जीवका निज-स्वरूप नहीं है (दोहा)

करम करें फल भोगव, जीव अग्यानी कोइ ।
यह कथनी विवहारकी, वस्तु स्वरूप न होइ ॥ ५२ ॥
शत्रदार्थ :- कथनी>चरचा । वस्तु-पदार्थे ।

अर्थ :- अज्ञानी जीव कर्म करते हैं और उनका फल भोगते हैं, यह कथन व्यवहारनयका है, पदार्थका निजस्वरूप नहों है ॥ ५२ ॥

ज्ञान और जेयकी भिन्नता (कवित्त )

जेयाकार ग्यानकी परणति,
पे वह ग्यान शेय नहि होइ ।
जेय रूप घट दरब भिन्न पद,
ग्थानर्प आतम पद सोडह ॥।
जाने भेदभाउ सु विचच्छन,
गुन लच्छन सम्यकद्रिंग जोड़ ।
म्रख कहे ग्यानसय आकृति,
प्रगट कलंक लख नहि कोइ ॥ ५३ ॥

शब्दार्थ :- ज्ञान- जानना । ज्ञेय-जानने योग्य पदार्थ ।

अर्थ :- ज्ञानको परिणति प्ेयके आकार हुआ करती है, पर ज्ञान क्ेयरूप नहों हो जाता, छहों द्रव्य ज्ेय हैंऔर वे आत्माके निज स्वभाष यत्त, वस्तु कुर्तेध्न्यवस्तुन: किड्चनापि परिणामिनः स्वयम्‌ । ध्यावहारिकहशंव तन्मत नान्‍्यदस्ति किसपोह निश्चयात्‌ ॥ २१५ शुद्धदव्यनिरूषणापितमतेस्तस्व॑ समुत्पश्यतो नेकद्रव्यगतं चफास्ति किसपि द्रथ्याग्तरं जातुचित्‌ । जान शेयपमबति यत्तु तदयं शुद्धस्वभावोदय. कि द्रब्यान्तरचुम्बनाकुलधियस्तस्वास्च्यवन्ते जनाः॥ २२ ॥ ज्ञानसे भिन्न हैं, जो ज्ेप-ज्ञायकका मेदमाव गुण-लक्षणसे जानता है बह भेदविज्ञानी सम्यस्टष्टि है।वेशेषिक आदि अज्ञानो ज्ञानसें आकारका विकल्प देखकर कहते हैंकि ज्ञानमें सेपकी आकृति है, इससे ज्ञान स्पष्टतया अशुद्ध हो जाता है लोग इस अशुद्धताकों नहीं देखते । विशेष :- जीव पदार्थ ज्ञायक है,ज्ञान उसका गुण है, वह अपने ज्ञान- गुणसे जगतके छहों द्रव्योंको जानता है, और अपनेको भी जानता है, इसलिये जगतके सब जोव-अज्ञोव पदार्थ और वह स्वयं आत्मा ज्ञेव है, और आत्मा स्व-परको जाननेसे ज्ञायक है, भाव यह है आत्मा शेय भो है, ज्ञायक भी है, और आत्माके सिवाय सब पदार्थ ज्षेय हैं। सो जब कोई शेयपदार्थ श्ञानमें प्रतिभासित होता हैतब ज्ञानको ज्ञेवाकार परिणति होती है, पर ज्ञान, ज्ञान हो रहता है ज्ञेप नहों होजाता, और ज्ञेप ज्ञेय हो रहता है ज्ञान नहीं हो जाता, न कोई किसीमें मिलता है। ज्ञेयका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव चतुष्टय जुदा रहता हैऔर ज्ञायकका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव चतुष्टय जुदा रहता है, परन्तु विवेकशुन्य वेशेषिक आदि ज्ञानमें ज्ञेवककी आक्ृति देखकर ज्ञानमें अशुद्धता ठहराते है ॥ ५३ ॥ वे कहते हैंकि -

जेप ओर ज्ञानके सम्बन्धमे अज्ञानियोंका हेतु (चौपाई )

निराकार जो ब्रह्म कहावे।
सो साकार नाम क्‍यों पाबे ।।
ज्ेयाकार ग्यान जब तांई।
पुरन ब्रह्म नांहि तब तांई ॥ ५४ ॥।

शब्दार्थ :- निराकार-आकार रहित । ब्रह्माल्आत्मा, ईश्वर । साकार>आकार-सहित । पूरन (पूर्ण) ऋपूरा । तांई तब तक । अथे :-जो निराकार ब्रह्म हैवह साकार कंसे हो सकता है? इसलिये जब तक ज्ञान ज्ञेयाकार रहता है, तब तक पूर्ण ब्रह्म नहों हो सकता ॥ ५४ ॥

इस विषयमें अज्ञातियोंकों संबोधन (चौपाई )

शेयाकार ब्रह्म मल माने ।
नास करनकों उदिम ठाने ॥।
वस्तु सुभाव मिटे नहि कयोंही ।
ताते खेद करे सठ यौंही ॥ ५५ ॥

शब्दार्थ :- मलजदोपष । उद्दिम-प्रयत्न ।क्यौही>किसी प्रकार ।

अर्थ :- बेशेषिक आदि ब्रह्मको शेयाकार परिणतिको दोष मानते हैं, और उसके मिटानेका प्रयत्न करते हैं, सोकिसी भी प्रयत्नसे बस्तुका स्वभाव

नहीं मिट सकता, इसलिये वे मूर्ख वथा ही कष्ट करते हैं ।। ५५ ! पुन (दोहा)

मृढ़ मरम जाने नहीं, गहे एकंत कुपक्ष ।
स्थादवाद सरवंग ने, साने दक्ष प्रतक्ष ॥ ५६ ॥

अर्थ :- अज्ञानी लोग पदार्थयी असलियत नहीं जानते और एकान्त कुटेब पकड़ते है, स्याद्वादी पदार्थके सब अंगोके ज्ञाता हैं और पदार्थफे सब धर्मोको साक्षात्‌ मानते है ।

भावार्थ :- स्थाद्राद, ज्ञानकी निराकार साकार दोनों परिणति मानता है। साकार तो इसलिये कि ज्ञानको ज्ञेयाकार परिणति होतो है, और निराकार इसलिये कि ज्ञानमें ज्ञेय जनित कुछ विकार नहीं होता ॥ ५६ ॥

स्याद्गादी सम्यग्हष्टिकी प्रशसा (दोहा)

सुद्ध दरब अनुभो कर, सुद्धद्रिष्टि घटमांहि ।
ताते समकितवंत नर, सहज उछेदक नांहि ॥ ५७ ॥

शब्दार्थ :- घट-हृदय । उछेदक-लोप करनेवाला । अथ :- सम्यग्टृष्टि जीव शुद्ध द्रव्यका अनुभव करते है,ओर शुद्ध वस्तु जाननेसे हृवयमें शुद्धरृष्टि रखते है, इससे वेसाहजजिक स्वभावका लोप नही करते; अभिप्राय यह है कि ज्षेयाकार होना ज्ञानका साहजिक स्वभाव है, सो सम्यग्टृष्टि जीवके स्वभावका लोप नहों करते ॥ ५७ ॥

ज्ञान जैयसे अव्यापक है इसपर दृष्टान्त

(सर्वेया इकतीसा )

“जैसे चंद किरनि प्रगटि मृुभि सेत कर,
भूमिसी न दोसे सदा जोतिसी रहति है ।
'तैसे ग्यान सकति प्रकास हेय उपादेय,
ज्ञेयाकार दीसे पे न शेयकों गहति है।।
सुद्ध वस्तु सुद्ध परजाइरूप परिनवं,
सत्ता परवांन माहें ढाहें न ढहति है ।
सो तो औररूप कबहूं नहोदद सरवथा,
निहचे अनादि जिनवानी यों कहति है ॥ ५८॥।

शब्दार्थ :- प्रगटि >उदय होकर । भूमि -धरती । जोतिसी>किरण- रूप । प्रकार - प्रकाशित करे । सत्ता परवान >अपने क्षेत्रावगाहके बराबर । हाहे>विचलित करनेसे । न ढहति है+ विचलित नही हीती । कबहूँ कभी भी । सरवथाजहर हालतमे ।

अर्थ :- जिस प्रकार चन्द्रकिरण प्रकाशित होकर धरतीको सफेद कर देती है, परधरतोरूप नहों हो जाती - ज्योतिरूप ही रहती है, उसी प्रकार ज्ञानशक्ति हेयउपादेबरूप ज्ञेब पदार्थोको प्रकाशित करतो है, पर ज्ञेयरूप नहीं हो जातो, शुद्ध वस्तु शुद्धपर्यायरूप परिणमन करती हैओर निज सत्ता- प्रमाण रहतो है, बह कभी भी किसो हालतमें अन्यरूप नहीं होती, यह बात निश्चित है और अनादि कालकी जिनवाणो कह रही है ॥ ५८ ॥

शुद्धदव्यस्वरसभवनात्कि स्वभावस्यथ शेष- सन्यद्रव्य भवति यदि वा तस्य कि स्थात्स्वभावः ! ज्योत्स्नारूप स्‍्नपयति भव नैव तस्यथास्ति भूसि- जश्ञनि शेय कलयति सदा सेयमस्यास्ति नेव ॥ २३॥।

आत्मपदार्थका यथार्थ स्वरूप (स्वेया तेईसा )

राग विरोध उ्द जबलों तबलों,
यह जोब सृथा मग धावे।
ग्यान जग्यो जब चेतनको तब,
कम दसा पर रूप कहावे ।।
कर्म विलेछि करे अनुभो तहां,
मोह मिथ्यात प्रवेस न पावे।
मोह गयें उपजे सुख केवल,
सिद्ध भयो जगमांहि न आये ॥ ५६ ॥

शब्दार्थ :- विरोधद्व ष। मृषा मग>मिथ्या मार्ग । धावे-दौडता है।

अर्थ :- जब तक इस जीवको मिथ्याज्ञानका उदय रहता है, तब तक वह राग-देषमें बतंता है। परन्तु जब उसे ज्ञानका उदय हो जाता है, तब वह कर्मंपरिणतिकों अपनेसे भिन्न गिनता है, और जब कसंपरिणति तथा आत्मपरिणतिका पृथककरण करके आत्म-अनुमब करता है, तब मिथ्या मोहनीयको स्थान नहीं मिलता । और मोहके पूर्णतया नष्ट होनेपर केवल- ज्ञान तथा अनन्तसुल प्रगट होता है,जिससे सिद्ध पदकी प्राप्ति होती हैऔर फिर जन्म-मरणरूप संसा रसेंनहीं आना पड़ता ॥ ५६ ॥

परमात्मपदकी प्राप्तिका मार्ग (छप्पय छन्द )

जीव करम संजोग, सहज मिथ्यातरूप धर ।
राग दोष परनति प्रभाव, जाने न आप पर ।।
राग वदपमुदयते तावदेसस्न यावत्‌
ज्ञान ज्ञानं भवति म॒पुनर्थोधतां याति बोध्यम्‌ ।
ज्ञान ज्ञान भबतु तदिद न्यक्कृताशानभावं
भावषाभावी भवति तिरयन्‌ येद पूर्णस्वभावः ॥ २४॥।
रागट वाबिह हि भवति शानमज्ञामभावात्‌-
तो वस्तृत्वप्रभिहितदशा हृइ्यसानों न किश्चितु ।
सम्पग्हृष्टि: क्षपयतु ततस्तस्वहृष्ट्या स्फुटम्तो
ज्ञानज्योतिज्बेलति सहज येन पूर्णाचलाचि: ॥ २५॥
तम मिथ्यात मिटि गयो, हुवों समकित उदोत ससि ।
राग दोष कछु वस्तु नांहि, छिन मांहि गये नसि ॥।
अनुभो अभ्यास सुख रासि रमि,
भयो निपुन तारन तरन ।
पुरन प्रकास निहचल निरखि,
बानारसि वंदत चरन ॥ ६० ॥

शब्दार्थ :- उदोत>उदय । ससि"शशि (चन्द्रमा) । निपुन- पूर्ण ज्ञाता ।त्तारन तरन>संसारसागरसे दूसरोंको तारनेवाला और स्वयं तरनेवाला ।

अर्थ :- जोवात्माका अनादिकालसे कर्मोंके साथ सम्बन्ध है, इसलिये बहू सहज हो मिथ्याभावको प्राप्त होता है, और राग-देष परिणतिके कारण स्व-पर स्वरूपको नहीं जानता। पर भिथ्यात्वरूप अंधकारके नाश और सम्यक्त्व-शशिके उदय होनेपर राग-द्वेषका अस्तित्व नहीं रहता - क्षणभरें नष्ट हो जाता है, जिससे आत्म-अनुभवके अभ्यासरूप सुखमें लोन होकर तारनतरन पूर्ण परमात्मा होता है। ऐसे पूर्ण परमात्माका निश्चयस्वरूप अवलोकन करके पं० बनारसोदासजी चरणवन्दना करते हैं ॥ ६० ॥

राग-द्वेषका कारण मिथ्यात्व है (सवेया इकतीसा )

कोऊ सिधष्य कहे स्वामी राग दोष परिनाम,
ताकौ मूल प्रेरक कहहु तुम कौन है ।
पुग्गल करम जोग किधों इंद्रिनिकौ भोग,
किधों धन किधों परिजन किधों भोन है ।।
गुरु कहे छहों दये अपने अपने रूप,
सबनिको सदा असहाई परिनोन है।
रागहू घोत्पादक तत्त्वहष्टया सान्यदद्व्य दोकयते किझ्खनापि।
स्वव्रध्योत्पत्तिरन्तभ्वकास्ति व्यक्तात्यन्तं स्वस्वभावेन मस्‍्मात्‌ ॥ २६ ॥
कोऊ दरब काहूको न॒ प्रेरक कदाचि ताते,
राग दोष सोह मृषा सदिरा अचोन है ॥ ६१॥।

शब्दार्थ :- मूल>असली । प्रेरक- प्रेरणा करनेवाला। परिजन-८ घरके लोग। भौन (भवन)-मकान । परिनौनल्‍परिणमन । मदिरा> शराब । अचौन (अचवन)"पीना ।

अर्थ :- शिष्य प्रइन करता हैकि हे स्वामी, राग-हेष परिणामोंका मुख्य कारण क्या है ? पौद्गलिक कर्म हैं? या इन्द्रियोंके भोग हैं ? या धन है ? या घरके लोग हैं ? या चर है ? सो आप कहिए । इसपर श्रीगुर समाधान करते हैं, कि छहों द्रव्य अपने अपने स्वरूपमें सदा निजाश्रित परिणमन करते है,कोई द्रव्य किसी द्रव्यकी परिणतिके लिये कभी भी प्रेरक नहों होता, अतः राग-हेषका मल कारण मोह भिध्यात्वका मदिरापान है॥ ६१ ॥

अज्ञानियोंके विचारमे राग-द्वेषका कारण (दोहा)

कोऊ म्रख यो कहै, राग दोष परिनाम ।
पुग्गलकी जोरावरी, बरते आतमराम ॥ ६२ ॥
ज्यों ज्यों पुग्गल बल करे, धरिधरि कर्मज भेष ।
रागदोषकौ परिनमन, त्यों त्याँ होइ विशेष ॥ ६३ ॥

शब्दार्थ :- परिनाम "भाव । जोरावरी जबरदस्ती । भेप (वेष )८ रूप । विशेष८ ज्यादा ।

अर्थ :- कोई कोई सूर्ख ऐसा कहते है कि आत्मासे राग-द्रेषभाव पुदुगलकी जबरदस्तीसे होते है॥ ६२ ॥ वे कहते हैं कि पुदूगल कर्मरू५ परिणमनके उदयमें जंसा जैसा जोर करता है, वेसे बसे बाहुल्यतासे राग- द्ेष परिणाम होते है ॥ ६३ ॥ है यदिह भवति रागद्ठ षदोधप्रसूति कतरदपि परेषा दूषण नास्लि तत्र । स्वयभप्ुपराघो तत्र सपंत्यवोधों भवतु विदितमस्तं यात्वब्ोधोषस्सि बोध ॥ २७ ॥

अज्ञानियोको सत्य मार्गका उपदेश (दोहा)

इह्विधि जो विपरीत पख, गहे सहृहे कोइ ।
सो नर राग विरोधसों, कबहूं भिन्न न होइ ॥ ६४ ॥।

सुगुरु कहे जगमें रहै, पुग्गल संग सदीब । सहज सुद्ध परिनमनिकौो, औसर लहै न जीव ॥। ६५ !। ताते चिदभावनि विष, समरथ चेतन राउ। राग विरोध सिथ्यातमें, समकितमें सिबव भाउ ॥ ६६ ॥

शब्दार्थ :- विपरीत पख"उल्टा हठ। भिन्नलजुदा । परिणाम भाव। औसर«मौका । चिदभावनि विषे>चंत्तन्यभावोमे - अशुद्ध दशामें राग-द्वेष ज्ञानावरणीय आदि और शुद्ध दणशामे पूर्णश्ञान पृर्णभानंद आदि। समरथ (समर्थ)-बलवान । चेतन राउ>"चेतन्यराजा । सिव भाउन्मोक्षके भाव - पूर्णज्ञान, पूर्णदर्शन, पूर्णभानद, सम्यक्त्व, सिद्धत्व आदि ।

अर्थ :- श्रीगुरु कहते है किजो कोई इस प्रकार उल्टा हठ ग्रहण करके श्रद्धान करते हैं वेकभी भी राग-द्रेष-मोहसे नहीं छुट सकते ॥ ६४ ॥ और यदि जगतमें जीवका पुदूगलसे हमेशा ही सम्बन्ध रहे, तो उसे शुद्ध भावोंकी प्राप्ततका कोई मी मोका नहीं है- अर्थात्‌ वह शुद्ध होही नहीं सकता ॥ ६५।। इससे चेतन्यभाव उपजानेमें चेतन्यराजा ही समर्थ है, सो मिथ्यात्वकी दशामें राग-द्ेष भाव उपजते हेंऔर सम्यवत्व दशामें शिवभाव अर्थात्‌ ज्ञान-दर्शन-सुख आदि उपजते हैं॥ ६६ ॥

ज्ञानका माहात्म्य (दोहा )

ज्यों दीपक रजनी समे, चहुं दिस करे उदोत ।
प्रगट/… घटपटरूपमें, घटपटरूप न होत ॥ ६७ ॥

रागजन्मनि निर्मिश्षतां परद्रब्यमेव कलयन्ति येतु ते। उसरन्ति न हि मोहबाहिनों शुद्धधोधविधुरान्धबुद्धयः ॥ २८।।

पुर्णकाच्युतशुद्धधोधमहिमा बोधा न ओष्यादय
यायात्कामपि विक्रियां तत इतो दीप: प्रकाइयादिव ।
तदहस्तुस्थितिबोधबन्धधिषणा एते किमजञानिनों
रागह घमयो भवन्ति सहजां मुड्चन्त्युदासीनताम ॥ २६ ॥
ननननननननलि
त्यों सम्यान जाने सकल, ज्ञेय वस्तुको मर्म
ज्ञेयाकृति परिनवे पे, तजे न आतम-धर्म ॥
कोइ ।
ग्यानधर्म अधिचल सदा, गहैँ विकार न
राग विरोध बिमोह मय, कबहूं भूलि न होइ ॥ ६६ ॥॥
ऐसी महिमा ग्यानकी, निहचे है घट मांहि ।
मूरख मिथ्याद्रिष्टिसों, सहज बिलोक नांहि ॥ ७० ॥

अर्थ :- जिस प्रकार रात्रिमें दीपक चहुँ ओर प्रकाश पहुँचाता हैऔर घटपट पदार्थोको प्रकाशित करता है,पर घट, पटरूप नहों हो जाता ॥ ६४७ ॥ परिणमन उसीप्रकार ज्ञान सब ज्ञेय पदार्थोकों जानता है और ज्ञेयाकार जानना करता हैतो भी अपने निजस्व॒भावको नहीं छोड़ता ॥ ६८ ॥ ज्ञानका नहीं स्वन्नाव सदा अचल रहता है, उसमें कभी किसी भी प्रकारका विकार होता और न वह कभी भूलकर भो राग-द्व ष-मोहरूप होता है।। ६६ निश्चयनयसे आत्मामें ज्ञानकी ऐसी महिमा है, परन्तु अज्ञानी सिथ्याहृष्टि आत्मस्वरूपकी ओर देखते मो तहीं हैं ॥ ७० ॥

अज्ञानी जीव परद्रव्यमें होलीन रहते है (दोहा)

पर सुभावमें सगन हु, ठाने राग विरोध ।
धरे परिग्रह धारना, करे न आतम्त सोध ॥ ७१४१

शब्दार्थ :- पर सुभाव”आत्मस्वभावके बिना सब अचेतन भाव। ठानै>करे । राग विरोध- राग-द्ेष ।। सोध >खोज ।

अर्थ :- अज्ञानी जोव परद्रव्योंमें मस्त रहते हैं, राग-हष करते है ओर परिग्रहकी इच्छा करते है, परन्तु आत्मस्वभावकी खोज नहीं करते ॥ ७१ ॥

अज्ञानीकों कुमति ओर ज्ञानीकों सुमति उपजती है (चौपाई)

मूरखक॑ घट दुरमति भासी ।
पंडित हिये समति परगासी ॥।
दुरमति कुबिजा करम कसाजे ।
सुमति राधिका राम रमावे ॥ ७२॥।

(दोहा )

कुबिजा कारो कूबरी, करे जगतमे खेद ।
अलख अराघे राधिका, जाने निज पर भेद ॥ ७३ ॥

अर्थ :- म्खके हृदयमें कुमति उपजती है ओर ज्ञानियोंके हृदयमें सुमतिका प्रकाश रहता है। दुबंद्धि कुब्जाके’ समान है, नवीन कर्मोंका बन्ध करती है, ओर सुब॒द्धि राधिका है, आत्मराममें रम्णण कराती है ॥ ७२ ॥ कुब॒द्धि काली कूबड़ोी कुब्जाके समान है, संसारमें संताप उपजातो है, ओर सुब॒द्धि राधिकाके समान है, निज-आत्माकी उपासना करातो हैतथा स्व- परका भेद जानतो है ॥ ७३ ॥

दुर्मति और कुब्जाकी समानता (स्वेया)

कुटिल कुरूप अंग लगी है पराये संग,
अपुनो प्रवांन करि आपुहो बिकाई है।
गहे गति अंधकीसी सकति कबंधकीसी,
बंधकौ बढ़ाउ कर धंधहोमें धाई है।॥।
रांडकीसी रीत लियें मांडकीसी मतवारो,
सांड ज्यों सुछंद डोल भांडकोीसी जाई है ।
घरको न जाने भेद करे पराधोन खेद,
याते दुरबुद्धि दासोी कुबजा कहाई है ॥ ७४ ॥

शब्दार्थ :- कुटिल–कपटिन । पराये>दूसरेके । संग साथ । कवध- एक राक्षसका नाम । मांड (मण्ड)>शराब । सुछुद>-स्वतत्र । जाईल्‍पैदा हुई । यातें-इससे । ) हिन्दू-धर्म के देवीभागवत आदि प्रन्थोका कथन है कि, कुब्जा कसको दासी थी । उसका शरीर कुरूप कान्तिहीन था। राजा श्रीकृष्णचन्द्र अपनी स्त्री राधिकासे अलग होकर उससे फेस गये थे, राधिकाके बहुत प्रयत्न करनेपर वे सन्मार्गपर आये । सो यहाँ पर दृष्टास्तमात्र ग्रहण किया है ।

अर्थ :- कुबुद्धि मायाका उदय रहते होती है इससे कुटिला है, और कुब्जा सायाचारिणो थी, उसने पराये पतिको वशमें कर रक्‍्खा था। कुब॒द्धि जगतको असुहावनो लगती है इससे कुरूपा है, कुब्जा काली कान्तिहोन हो थी इससे कुरूपा थी। कुब॒द्धि परद्रव्योंकोी अपनाती है, कुब्जा परपतिसे सम्बन्ध रखतो थी इससे दोनों व्यभिचारिणी हुईं । कुब॒द्धि अपनी अशुद्धतासे विषयोंके आधोन होतो है इससे बिकी हुईके समान है, कुकजा परवशमें पड़ी हुई थी इससे दूसरेके हाथ 'बिकी हुई ही यो। वुबु ड्िकोवा कुब्जाको अपनो भलाई-बुराई नहीं दिखतो, इससे दोनोंकी दशा अंधेके समान हुई । कुबद्धि परपदार्थोंसे अहंब॒द्धि करनेमें समर्थ है, कुब्जा भी कृष्णको कब्जेमे रखनेके लिये समर्थ थी, इससे दोनों *कबंधके सभान बलवान हैं। दोनों कर्मोका बंध बढ़ाती हैं। दोनोंकी प्रव॒त्ति उपद्रवकोी ओर रहती है । कुबंदधि अपने पति आत्माको ओर नहीं देखतो, कुब्जा मी अपने पतिकी ओर नहीं देखती थी, इससे दोनोंकी रांड सरीखी रीति है। दोनों ही शराबीके समान मतवालोी हो रही हैं। दुबद्विमें कोई घामिक नियम आदिका बंधन नहीं, कब्जा भी अपने पति आदिको आज्ञामें नहीं रहती थी, इसलिये दोनों सांडके समान स्वतंत्र हैं। दोनों भांडकी संततिके समान निलंज्ज हैं। दुबंद्धि अपने आत्मक्षेत्ररूप घरका सर्म नहीं जानती, कु्जा भी दुराचारमें रत रहती थी, घरका हाल नहीं देखतो थी। दुबंद्धि कमंके आधीन है, कुब्जा परपतिके आधीन, इससे दोनों पराधीनताके क्लेशमें हैं।इस प्रकार दुर्बृद्धिको कुब्जा 3दासीकी उपमा दी है ॥ ७४ ॥ ) व्यभिचारिणी स्त्रियां अपने मुखसे अपने शरीरका मोल करती हैं- अर्थात्‌ अपना अमूल्य शील बेच देती हैं, यह बात ध्यानमे रखके कवबिने कहा है कि 'आपनों प्रवानकरि आपुह्दी बिकाई है । यह भी हिन्दू-धमं-शास्त्रोका हृष्टान्त मात्र लिया है, कि कबंध पूर्वजन्ममे गधर्वे था। उसने दुर्वासा ऋषिकों गाता सुनाया, पर वे कुछ प्रसन्न नहीं हुए, तब उसने मुनिकी हँसी उडाई, तो दुर्वासाने करोधित होकर शाप दिया, कि तू राक्षस हो जा । बस फिर क्‍या था, वह राक्षस हो गया । उसकी एक एक योजनबी भुजाएँ थो, और वह बहुत ही बलवान था, सो अपनी भुजाओसे वह एक योजन दूर तकके जीवोको खा जाता था, और बहुत उपद्रव करता था, इससे इन्द्रने उसे बद्ध मारा, जिससे उसका माधथा उसीके पेटप्रे घेंस गया, पर वह शापके कारण मरा नहीं, तबसे उसका नाम कबंघ पडा । एक दिन वनमे विचरते हुए राजा राम लक्ष्मण दोनो भाई इसके सपाटेमे आ गये, और इन्हे भी उसने खाना चाहा, तब रामचन्द्रने उसके हाथ काट डाले और उसे स्वरगंधाम पहुचा दिया । ? दाइता-विवाह-विधिके बिना ही धर्ंविरुद्ध रक्खी हुई औरत ।

सुबुद्धिसि राधिकाकी तुलना (सवेया इकतीसा)

रूपको रसोली अम कुलफको कोली सील,
सुधाके समुद्र भीली सीलो सुखदाई है।
प्राची ग्यानभानकी अजाची है निदानको,
सुराची निरवाची ठोर साची ठकु्राई है ॥।
धामकी खबरदारि रामको रमनहारि,
राधा रस-पंथनिके ग्रंथनिमें गाई है ।
संतनकी मानी निरबानी न्रकी निसानी,
याते सदबुद्धि रानी राधिका कहाई है ॥ ७५॥।

शब्दार्थ :- कुलफल्ताला । कीली>चाबी । भीली स्नान की हुई । सीलीजभीगो हुई । प्राची>पूर्वे दिशा ।अजाचील्‍नही मागनेवाली । निदान आगामी विषयोंकी अभिलाषा। निरवाची (निर्वाच्य)>वचन अगोचर । ठकुराई-स्वामीपन । धाम>घर । रमनहारिस्मौज करनेवाली। रस- पथनिके ग्रथनिमै>रस-मार्गके शास्त्रोमे । निरबानीज>-गभीर । नूरकी निसानो >सौन्दर्यका चिह्न ।

अर्थ :- सुबुद्धि आत्मस्व॒रूपमे सरस है, राधिका भी रूपवतो है। सुबुद्धि अज्ञानका ताला खोलनेकी चाबी है, राधिका भो अपने पतिको शुभ- सम्पति देती है। सुदुद्धि और राधिका दोनों शोलरूपी सुधाके समुद्रमें स्नान को हुई हैं, दोनों शान्तस्वभावी सुखदायक हैं । ज्ञानरूपी सूयेका उदय करनेमें दोनों पूर्व दिशाके समान हैं। सुबद्धि आगासो विषय - भोगोंकी वांछासे रहित है, राधिका मो आगासोी भोगोंकी याचना नहों करतो। सुब॒द्धि आत्मस्वरूपमें मले प्रकार राचतो है, राधिका भी पति-प्रेममें पगतो है । सुबद्धि और राधिका रानी दोनोंके स्थानकी महिमा वचन-अगोचर अर्थात्‌ महान्‌ है। सुबुद्धिका आत्मापर सच्चा स्वामित्व है, राधिकाकी सी धरपर मालिकोी है। सुबृद्धि अपने घर अर्थात्‌ आत्माकी सावधानी रखती है,राधिका भी घरकी निगरानी रखती है। सुबुद्धि अपने आत्मराममें रमण करती है, राधिका अपने पति कृष्णके साथ रमण करतो है। सुबंद्धिको महिमा अध्यात्मरसके ग्रंथोंमें बलानो गई है, ओर राधिकाकों महिमा श्‌गाररस आदिके ग्रन्थोंमें कही गई है। सुब॒द्धि साधुजनों द्वारा आदरणोय है, राधिका ज्ञानियों हारा माननीय है । सुबुद्धि औरराधिका दोनों क्षोभरहित अर्थात्‌ गंभोर हैं। सुबद्धि शोभासे सम्पन्न है, राधिका भी कान्तिवान्‌ है। इस प्रकार सुबुद्धिको राधिका रानीको उपमा दो गई है ॥७५।।

कुमति सुमतिका कृत्य (दोहा)

बह कुबिजा वह राधिका, दोऊ गति मतिवानि ।
बह अधिकारनि करसकी, यह विवेककी खानि ॥ ७६ ॥

अर्थ :- बुबुंद्धि कुब्जा है, सुबुद्धि राधिका है, कुबुद्धि संसारमें भ्रमण करानेवाली है और सुबुद्धि विवेकवान है । दुबंद्धिकमंबंधके योग्य हैऔर सुबुद्धि स्व-पर विवेककों खानि हे ॥ ७६ ॥

द्रव्यकर्म भावकर्म और विवेकका निर्णय (दोहा)

दरबकरम पुरगल दसा, भावकरम मति वक्र ।
जो सुग्यानको परिनमन, सो विवेक गुरु चक्र । ७७ ।।

शब्दार्थ :- दरबकरम (द्रव्यकम )>शानावरणीय आदि । भावकर्म८ राग-द्वेष आदि । मति वक्र>आत्माका विभाव । गुरु चक्र-बडा पुज ।

अर्थ :- शानावरणीय आदि द्रव्यकर्म पुदुगलकी पर्यायें हैं, राग-देष आदि मावकर्म आत्माके विभाव हैं, और स्व-पर विवेककी परिणति ज्ञानका बड़ा पुज है ॥ ७७ ॥

कमेंके उदयपर चौपड़का हृष्टान्त (कवित्त )

जेसे नर खिलार चौपरिकौ,
लाभ विचारि करे चितचाउ।
घर/बु० संवारि सारि बुधिबलसों,
पासा जो कुछ परे सु दाउ ॥।
तेसें जगत् जीव स्वारथकौ,
करि उदिम चितव उपाउ ।
लिख्यो ललाट होई सोई फल,
करम चक्रको यही सुभाउ ॥ ७८ ॥

शब्दार्थ :- चितचाउ-उत्साह । सारि>गोट । उपाउ (उपाय) प्रयत्न । लिख्यौ ललाट>मस्तकका लिखा-तकदीर ।

अर्थ :- जिस प्रकार चौपड़का खेलनेवाला मनमें जोतनेका उत्साह रखके अपनी अक्लके जोरसे सम्हालकर ठीक ठीक गोटे जमाता है, पर दाव तो पॉसेके आधोन है । उसी प्रकार जगतके जीव अपने प्रयोजनकी सिद्धिके लिये प्रयत्न सोचते हैं, पर जंसा कर्मका उदय है बसा हो होता है, कर्म- परिणतिकी ऐसी ही रीति है । उदयावलीमें आया हुआ कर्म फल दिये बिना नहीं रुकता ॥ ७८ ॥

विवेक-चक्रके स्वभावपर शतरजका हृप्टान्त (कवित्त)

जेसे नर खिलार सतरंजको,
समुरके सब सतरंजकी घात।
चले चाल निरखे दोऊ दल,
मोहरा गिने विचारे मात ॥॥
तेसे साथु निषुन सिवषथ्मैं,
लच्छुन लखे तज उतपात।
साथ गुन चितवे अभयपद,
यह सुविवेक चक्रकी बात ॥ ७६॥।

शब्दार्थ :- घात-दावपेच । निरखेज्देखे । मौहरा>हाथी घोड़े वगैरह । मात5चाल बन्द करना - हराना ।

अर्थ :- जिस प्रकार शतरंजका खेलनेवाला शतरंजके सब दावपेंच समभता है, और दोनों दलपर नजर रखता हुआ चलता है, वा हाथी, घोड़ा, वजोर, प्यादा आदिकी चाल ध्यानमें रखता हुआ जीतनेका विचार करता है, उसी प्रकार मोक्षमार्गमें प्रवोण ज्ञानी पुरुष स्वरूपकी परख करता हैऔर बाधक कारणोंसे बचता है । वह आत्मग्रुणोंको निर्मल करता है और जीत अर्थात्‌ निंय पदका चितवन करता है। यह ज्ञानपरिणतिका हाल है ॥ ७६ ॥

कुमति कुब्जा और सुमति राधिकाके कृत्य (दोहा )

सतरंज खेले राधिका, कुबिजा खेले सारि।
याक॑ निसिदिन जीतयो, बाक निसिदिन हारि ॥॥ ८०
जाक॑ उर कुबिजा बसे, सोई अलख अजान ।
जाफ॑ हिरदे राधिका, सो बुध सम्यकवान ॥ ८5१ ॥

शब्दार्थ :- निशस्िदिन-संदा । सारि-चौपड़ ।अलख>जो दिखाई न पडे - आत्मा ।

अर्थ :- राधिका अर्थात्‌ सुबुद्धि शतरंज खेलती है इससे उसकी सदा जोत रहती है, ओर कुष्जा अर्थात्‌ दुबुद्धिचोपड़ खेलतो है, इससे उसको हमेशा हार रहती है ॥ ८० ॥ जिसके हृदयमें कुब्जा अर्थात्‌ कुब॒ुद्धिका बास हैवह जोब अशानो है, ओर जिसके हृदयमें राधिका अर्थात्‌ सुबुद्धि है, वह ज्ञानी सम्यग्हष्टि है॥ ८१ ॥

भावार्थ :- अज्ञानी जीव कर्मचक्रपर चलते हैं, इससे हारते है- अर्थात्‌ संसारमें भटकते हैं,और पंडित लोग विवेक पूर्वक चलते हैं, इससे विजय पाते अर्थात्‌ मुक्त होते हैं ।

जहाँ शुद्धज्ञान हैवहाँ चारित्र है (सवेया इकतीसा)

जहां सुद्ध ग्यानकी कला उदोत दोसे तहां,
सुद्धता प्रवांन सुद्ध चारितको अंस है।
राग बविभावमुक्तमहसो नित्यस्वभावस्पृशः
पूर्वागामिसमस्तक्सं विकला भिन्नास्तदात्वोदयात्‌ ।
वूरारूठयरित्रवेभवबलाध्चऊूच स्चिद चिमंयीं
बिन्दन्ति स्वरसानिषिक्तमुवनां झ्ञानस्प संबेतनाम्‌ ॥ ३० ॥॥
सब्रेविशुद्धि हार रण
ता कारन ग्यानी सब जाने ज्ञेय वस्तु मर्स,
बेराग विलास धर्म वाकाों सरवंस है।॥
राग दोष मोहकी दसासो भिन्न रहे याते,
सर्वथा त्रिकाल कर्म जालकों विधुस हे ।
'निरुषाधि आतम समाधिमे वबिराजे ताते,
कहिए प्रगट प्रन परम हंस है॥ ८२ ॥

शब्दार्थ :- सरवस (सर्वेस्व )> पूर्ण सपति । जाने जेय वस्तु मर्म- व्यागने योग्य और ग्रहण करने योग्य पदार्थोकोीं जानते है ।

अर्थ :- जहाँ शुद्ध ज्ञानकी कलाका प्रकाश दिखता है, वहाँ उसके अनुसार चारित्रका अंश रहता है, इससे ज्ञानी जीव सब हेय - उपादेयको समभते हैं। उनका सर्वेस्व वेराग्यभाव हो रहता है, वे राग-द ष-मोहसे भिन्न रहते है, इससे उनके पहलेके बंधे हुए कर्म भडते है, और बतंसान तथा भविष्यमें कमंबन्ध नहों होता । वे शुद्ध आत्माकी भावनामें स्थिर होते है, इससे साक्षात्‌ पूर्ण परमात्मा ही है ॥ ८२ ॥

पुन (श_ोट)
ग्यायक भाव जहां तहां, सद्द चरनकी चाल ।
ताते ग्यान विराग सिलि, सिव साधे समकाल ॥ ८३ ॥

शब्दार्थ -ग्रायक भाव आम ३+ पा ज्ञान । चरन-ज-चारित्र । समकाल–एक हो समयमे । अर्थ *- जहाँ ज्ञानभाव है वहां शुद्ध चारित्र रहता है, इसलिये ज्ञान ओर वेराग्य एक साथ मिलकर मोक्ष साधते है ॥ ८३ ॥

सानस्य सचेतनयेब नित्य प्रकाशते ज्ञानमतोब शुद्धम ।
अज्ञानसचेतनया तु घावन्‌ बोधस्य शरद्धि निरुणद्धि बन्धः ॥ ३१ ॥

ज्ञान चारित्रपर पंगु अंधका हृष्टान्त (दोहा)

जथा अंधके कंधपर, चढ़े पंगु नर कोह।
बाके हग वाके चरन, होंहि पथिक मिलि दोइ ॥ ८४ ॥
जहां ग्यान किरिया मिले, तहां मोल-मग सोह ।
वह जाने पदकौ मरम, वह पदमें थिर होइ ।। ८५ !॥

शब्दार्थ :- पगु>लेंगडा । वाके८उसके। हगलनेत्र । चरन>पैर । पथिकर रस्तागीर । क्रिया>चारित्र । पदकौ मरमज>आत्माका स्वरूप । पद्म थिर होइ>आत्तमामें स्थिर होवे ।

अर्थ :- जिस प्रकार कोई लेंगड़ा मनुष्य अंधेके कंघेपर चढ़े, तो लेंगड़ेकी आँखों और अंधेके पैरोंके योगसे दोनोंका गसन होता है॥ ८४ ॥ उसी प्रकार जहाँ ज्ञान और चारित्रकी एकता है वहाँ मोक्षमार्ग है, ज्ञान आत्माका स्वरूप जानता हैओर चारित्र आत्मामें स्थिर होता है ॥ ८५ ॥

ज्ञान और क्रियाकी परिणति (दोहा)

ग्यान जीवकी सजगता’ , करम जोवकोी मूल ।
ग्यान मोख अंक्र है, करम जगतकौ मूल ॥ ८६ ॥
ग्यान चेतनाके जगे, प्रगटे. केवलरास ।
कर्म चेतनामें बसे, कर्मंबंध परिनास ॥ ८७ ॥।
शब्दा्थ :- सजगता: सावधानी । अक्र-पौधा । केवलरामर
आत्माका शुद्ध स्वरूण । कर चेतना>ज्ञानरहित भाव। परिनाम"भाव ।

अर्थ :- ज्ञान जीवकी सावधानता है, ओर शुभाशुम परिणति उसे भुलाती है, ज्ञान मोक्षका उत्पादक है और कर्म जन्म-मरणरूप संसारका कारण है ॥ ८६॥ ज्ञानचेतनाका उदय होनेसे शुद्ध परमात्मा प्रगट होता है, और शुभाशुभ परिणतिसे बन्धके योग्य भाव उपजते है ॥ ८७ ॥

) ‘सहजगति’ ऐसा भी पाठ है ।

कम और ज्ञानका भिन्न भिन्न प्रभाव (चौपाई)

जबलगग्यान चेतना न्‍्यारी’ ।
तबलग जोव विकल संसारी ॥।
जब घट ग्यान चेतना जागी।
तब समकिती सहज बेरागी ॥ ८८ ॥
सिद्ध समान रूप निज जाने।
पर संजोग भाव परसाने ॥।
सुद्धासापा अनुभो अम्यासे ।
त्रिविधि कमंकी ममता नासे॥ ८६ ॥

अर्थ :- जबतक ज्ञानचेतना अपनेसे भिन्न है,अर्थात्‌ ज्ञानचेतनाका उदय नहीं हुआ है, तबतक जोव दुःखोी और संसारी रहता है, और जब हृदयमें ज्ञानचेतना जागती है, तब वह अपने आप ही ज्ञानी वरागी होता है॥ ८८ ॥ वह अपना स्वरूप सिद्ध सहश शुद्ध जानता है, और परके निमित्तसे उत्पन्न हुए भावोंको पर स्वरूप मानता है। वह शुद्ध आत्माके अनुभवका अभ्यास करता हैओर भावकमं द्रव्यकमं तथा नोकमंको अपने नहीं मानता ॥ ८६ ॥

ज्ञानीकी आलोचना (दोहा)

परयानवंत अपनी कथा, कहे आपसों आप ।
में मिथ्यात दसाविषे, कोने बहुविधि पाप ॥ ६० ॥

अर्थ :- शञानी जोब अपनो कथा अपनेहोसे कहता है, कि मेने सिथ्यात्वकी दशामें अनेक प्रकारके पाप किये ॥ ६० ॥

१ “मारी’ ऐसा भी पाठ है।
कुतकाश्तिानुमननैस्त्रिका
लविधयं मनोबचनकाये: !
परिहत्य कर्म सर्व परस नेष्कम्यमबलस्बे ॥ ३२ ॥

यदहमकार्ष यदहमचीकर यत्कुवेन्तमप्यन्यं समन्‍्वज्ञासिष, सनसा थ वाचा थ कायेन च तन्मिथ्या मे वुष्कृतमिति ।

पुनः (सर्वया इकतीसा )

हिरदे हमारे महा मोहकी विकलताई,
ताते हम करुना न कीनी जीवधातकी ।
आप पाप कीन औरनिको उपदेस दीने,
हुती अनुमोदना हमारे याही बातकी ।॥
मन बच कायामे मगन हाँ कमाये कम,
धाये भ्रमजालमे कहाये हम पातकी ।
ग्यानके उदय भए हमारी दसा ऐसी भई,
जेसे भानु भासत अवस्था होत प्रातकी ॥ ६१ ॥

अर्थ :- हमारे हृदयमें महा मोहजनित भ्रम था, इससे हमने जीवोपर दया नहीं की । हमने खुद पाप किये, दूसरोंको पापका उपदेश दिया, और किसीको पाप करते देखा, तो उसका समर्थन किया। सन-वचत-कायकोी प्रवृत्तिके निजत्वमें मगन होकर कमंबन्ध क्रिये, और भश्रमजालसे भटककर हम पापी कहलाये, परन्तु ज्ञानका उदय होनिसे हमारी ऐसी अवस्था हो गई, जसे कि सुयंका उदय होनेसे प्रभातकी होक्ी है- अर्थात्‌ प्रकाश फंल जाता है, और अंधकार नष्ट हो जाता है ॥॥ ६ १॥। ज्ञानफ़ा उदय होनेपर अज्ञानदणा हट जाती है सिेथा हयतीसा) ग्यानभान भासत प्रवान ग्यानवान कहे, करुना-निधान अमलान मेरो रूप है । कालसी अतीत कम जालसी अजीत जोग- जालसों अभीत जाकी महिमा अनृप है ।। मोहकीो विलास यह जगत् वास में तो, जगतसो सुन्न पाप पुचन्न अंध कप है । मोहाध्यवहमकार्थ समस्त कर्म तत्प्रतिक्रस्थ । आत्मनि चेलन्यात्मनि निष्कर्मण निन्‍यमात्मना व्ते ॥ ३३ ॥।

याप किनि कियो कौन करे करिहे सु कौन,
क्रियाकौं विचार सुपिनेकी दौर ध्रृप है॥ ६२ ॥

शब्दार्थ :- अभीत-निर्भय । किनि> किससे । भुपिनेरम्वप्न । अर्थे :- ज्ञान-सूयंका उदय होते ही ज्ञानी ऐसा विचारता है कि मेरा स्वरूप करुणामय और निर्मल है। उसपर मुृत्युकी पहुँच नहीं है, बह कर्मे- परिणतिको जीत लेता है, वह योग-समुदायसे निर्भय’ है, उसकी सहिमा अपरम्पार है,यह जगतका जंजाल मोहजनित है, भै तो संसार अर्थात्‌ जन्म- मरणसे रहित हूँ, और शुभाशुभ प्रवृत्ति अंध-फपफे समान है। किसने पाप किये ? पाप कौन करता है? पाप कौन करेगा ? इस प्रकारकी क्रियाका विचार ज्ञानीको स्वप्नके समान मिथ्या दिखता है ॥ ६२ ॥

कर्म-प्रपच मिथ्या है (दोहा)

में कोनों मेयों करों, अब यह मेरो काम !
सन वच कायामें बसे, ए सिथ्या परिनाम ॥ ६३ ॥
सनवचकाया करमफल, करम-दसा जड़ अंग।
दरबित पुरगल पिडमय, भावित भरम तरंग ॥ ६४ ॥
ताते आतम धरमसों, करम सुभाउ अपूठ ।
कौन करावे को करं, कोसल है सब भूठ ॥ €५॥

शब्दार्थ :- अपूठ>अजानकार । कोसल>कौशल (चतुराई) ।

अर्थ :- मैंने यह किया, अब ऐसा करूगा, यह मेरी कारंवाई है, ये सब भिध्याभाव सन-वचन-कायमें निवास करते हैं ॥ ६३ ॥ मन-वचन-काय १ बह जानता है कि मन-वचन-कायके योग पुदगलके हैं, मेरे स्वरूपको बिगाड़ नही सकते । न करोनि न कारयामि न कु्वल्तमप्यन्यं समनुजानासि सनसा चर वाया च॑ कापेन चेति । कर्ंजनित हैं,कमं-परिणति जड़ है, दृव्यकम पुद्गलके पिण्ड हैं, और भाव- कर्म अज्ञानकी लहर है ।६४॥। आत्मासे कर्मस्वभाव विपरीत है,इससे कर्मको कोन करावे ? कौन करे ? यह सब कोशल मिथ्या है ॥६५।।

मोक्ष-मार्गमे क्रियाका निषंध (दोहा)

करनी हित हरनी सदा, मुकति वितरनी नांहि । गनी बंध-पद्धति विष, सनो महादुखमांहि । ६६।। अथे :- क्रिया आत्माका अहित करनेवाली है, मुक्ति देनेवाली नहीं है, इससे क्रियाकी गणना बन्ध-पद्धतिसें की गई है, यह महादु:खसे लिप्त है ।॥६६१

क्रियाकी निन्‍दा (सवैया इकतीसा)

करनीकोी धरनीमें महा भोह राजा बसं,
करनी अग्यान भाव राकिसकी पुरी है।
करनी करम काया पुग्गलकी प्रतिछापा,
करनो प्रगट माया मिसरीकी छुरी है।।
करनीके जालमें उरशििि रह्यौँ चिदानंद,
करनीकी वोट ग्यानभान दुति दूरी है।
आचारज कहे करनीसों विवहारी जीव,
करनी सदेव निहचे सुरूप बुरी है।॥। €७।॥।

शब्दार्थ :- राकिस> राक्षस ।वोट>ओट (आड )। दुरी है-छिपी है । मोहविलासविजुश्मितभिदमु दय॒त्कमं सकलमालोच्य । आत्मनि खेतम्यात्मनि निष्कर्मणि निश्यमात्मना ब्तें ॥३४॥॥ न फरिष्यामि न कारयिष्यामि न कुर्वन्तसप्यन्य समनुजास्यासि सनसा थ वाया च कायेन चेति । इस प्रकारका ऊपर तीन जगह संस्कृत गद्य दिया गया है, सो यह गद्य दोनो मुद्रित प्रतियोभे नही है । किन्तु ईडरको प्रतिसे उपलब्ध हुआ है । इन गद्योंके अर्थसे कविताके अर्थक्रा बराबर मिलान नहीं होता है । ईडरकी प्रतिमें कही से उद्धत किया है ऐसा मालूम पड़ता है ।

अर्थ :- क्रियाकी मूमिपर मोह महाराजाका निवास है,क्रिया अज्ञान- भमावरूप राक्षसका नगर है,क्रिया, कमें और शरीर आदि पुदुगलों की मूर्ति है, क्रिया साक्षात्‌ मायारूप मिश्री लपेटी हुई छुरी है, क्रियाके जंजालमें आत्मा फेस रहा है, क्रियाकी आड़ ज्ञान-सूर्यके प्रकाशकों छुपा देती है। ओगुरु कहते हैं कि क्रियासे जोव कमंका कर्त्ता होता है, निश्चय स्वरूपसे देखो तो क्रिया सदेव दुः:खदायक है ॥ ६७ ॥

ज्ञानियोंका विचार (चौपाई)

मृषा मोहकी परनति फंली ।
ताते करम चेतना मैली ।।
ग्यान होत हम समझी एतो ।

जीव सदीव भिन्न परसेती ॥। &८ (दोहा )

जीव अनादि सरूप मस, करम रहित निरुपाधि ।
अविनासी असरन सदा, सुखसय सिद्ध समाधि ॥ ६६ १।

अर्थ :- पहले भूठा मोहका उदय फंल रहा था, उससे मेरी चेतना कमंसहित होनेसे मलीन हो रही थी, अब ज्ञानका उदय होनेसे हम समझ गये कि आत्मा सदा पर परिणतिसे भिन्न है १६८॥ हमारा स्वरूप चेतन्य है, अनादि है, कम रहित है, शुद्ध है,अविनाशी है, स्वाधीन है, निविकल्प और सिद्ध समान सुखमय है ६६।॥। प्रत्याख्याय. भविष्यत्कम॑ समस्त निरस्तसम्मोह:ः । आत्मनि चंतस्यात्मनि निष्कमणि नित्यमात्मना बसें ॥ ३५ ॥

समस्तमित्येव्पास्य कर्म त्रैफालिक शुद्धनयायलस्धी ।
विलीनमोहो रहित विकारभ्रिन्मात्रमात्मानमथादलम्बे ॥ ३६ ॥

पुन: (चौपाई )

& में त्िकाल करनोसों नन्‍्यारा।
चिदविलास पद जग उजयारा ॥
राग विरोध मोह मम नांही।
मेरी. अवलंबन मुभमांही ॥१००॥।

अर्थ :-मै सर्देव करमसे पृथक हूँ, मेरा चेतन्य पदार्थ जगत्‌का प्रकाशक है, राग-टंष-सोह मेरे नहीं हैं,मेरा स्वरूप मुभहीमें है ॥ १०० ॥

(सवेया तेईसा )

सम्यकबंत कहै अपने ग़ुन,
में नित राग विरोधसों रोतो।
में करतृति करू निरवंछक,
मोहि विर्ष रस लागत तीतो ॥।
सुद्ध सुचेतनकों अनुभो करि,
में जग मोह महा भट जीतौ।
मोख समोप भयो अब मो कहें,
काल अनंत इही विधि बीतो ॥ १०१ ॥

शब्दार्थ :- रीतौ>गहित । मोय ल्‍मुभे । तीती (तिक्त) 5चरपरा । अथे -सम्यग्हष्टि जीव अपना स्वरूप विचारते हैं कि मै सदा राग-देष-मोहसे रहित हूं, मे लौकिक क्रियाएं इच्छारहित करता हूं, मुझे विषय-रस चरपरा लगता है, मैने जगतमें शुद्ध आत्माका अनुभव करके मोहरूपी महा योद्धाको जीता है, मोक्ष मेरे बिलकुल समीप हुआ, अब मेरा अनन्तकाल इसी प्रकार बीते ॥१०१॥।

विगलन्तु कमंविषतरुफलानि सस भुक्तिमस्तरेणव। संचेतयेडहुमचल चतन्यात्मानमात्मानम ॥३७॥।

यदि ज्ञान ढेंक जाय, तो समस्त ससार अधक्ारमय ही है (दोहा )

कहे विचच्छन में रह्यो, सदा ग्यान रस राच्ि !
सुद्धातपा अनुभूतिसो, खलित न होहुं कदाचि ॥ १०२ ॥
पुब्वकरमस विषतरु भए, उदे भोग फलफूल।
में इनको नहि- भोगता, सहज होहु निरमूल ॥ १०३ ॥

शब्दार्थ :- विचच्छन>ज्ञानी पुरुष । राचि>रमण । खलितच्युत ।

अर्थ :- ज्ञानी जीव विचारते हैकि मै सदव ज्ञानरसमें रमण करता हूँ और शुद्ध आत्म-अनुभवसे कभी भी नहों चूकता ॥ १०२ ॥ पूर्वकृत कर्म विषवृक्षके समान हैं, उनका उदय फल-फूलके समान है, मे इनको भोगता नही हूँ,इसलिये अपने आप ही नष्ट हो जायेंगे ॥ १०३ ॥

वेराग्यकी महिमा (दोहा)

जो पुरवकृत करसम-फल, रुचिसो भुंजे नांहि।
सगन रहे आठों पहर, सुद्धातम पद मांहि ॥१०४॥॥
सो बुध करमदसा रहित, पाव मोख तुरंत ।
भुृंज परम समाधि सुख, आगम काल अनंत ॥ १०५ ॥

शब्दार्थ :- भुजे-भोंगे ।आगम काल-आगामी काल । निःशेषकर्सफलसंन्यसनात्मनवं सर्वक्रियान्तरविह्ारनिवृत्तवत्ते: खतन्यलक्ष्म भजतों भुशमात्मतत्त्वं कालावलीयमचलस्य बहुत्वनन्ता ॥ ३८ ॥! यः पूर्वभावकतकम विषद्र मार्णा भुडक्त फलानि न खलु स्वत एव तृप्तः । आपातकाल रमणीयमुदर्क रम्यं निष्कमं शर्ममयसे तिदशान्तरं सः ॥६ ३६॥।

अर्थ :-जो ज्ञानी जीव पुर्वसें कमाये हुए शुभाशुम कमंफलको अनुराग- पुबंक नहीं भोगता, और सर्देव शुद्ध आत्म-पदार्थमें मस्त रहता है, वह शीघ्र हो करंपरिणति रहित मोक्षपद प्राप्त करता है, और आगामी कालमें परम ज्ञानका आनन्द अनन्त काल तक भोगता है।॥। १०४-१०५ ।॥।

ज्ञानीकी उन्नतिका क्रम (छप्पय )

जो प्रबकृतकरम, विरख-विष-फल नहि भ्रुज ।
जोग जुगति कारिज करंति, ममता न प्रयुज ॥।
राग विरोध निरोधि, संग विकलप सब छुंडइ ।
सुद्धातत अनुभो अभ्यासि, सिव नाटक संडइ॥।
जो ग्यानवंत इहि मग चलत, प्रन ह्व॑ केवल लहै ।
सो परम अतींद्रिय सुख विषे, मगन रूप संतत रहै ॥ १०६ ॥

शब्दार्थ :- विरख-विष-फल >विषवृक्षेके फल । कारिज-का्ये । प्रयुजै>करे । छुडई>छोडे । मडइ-करे (खेले) । सतत>सदेव ।

अर्थ :- जो पूर्वमे कमाये हुए कमंरूप विष-वृक्षके विष-फल नहीं भोगता, अर्थात्‌ शुभ फलमें रति और अशुभ फलमे अरति नहीं करता, जो मन-बचन- कायके योगोंका निग्रह करता हुआ वतंता है, और ममतारहित राग-द्षको रोककर परिग्रहजनित सब बिकल्पोंका त्याग करता है, तथा शुद्ध आत्माके अनुभवका अभ्यास करके मुक्तिका नाटक खेलता है, वह ज्ञानी ऊपर कहे हुए मार्गको ग्रहण करके पूर्णस्वमाव प्राप्तकर केवलज्ञान पाता है, और सर्देव उत्कृष्ट अतोन्द्रिय सुखमें मस्त रहता है ।॥ १०६ ७ ० अत्यस्त भावयित्वा विरतिसबिरत कर्मणस्तत्फलाज्ल प्रस्षष्ट नाटपित्दा प्रलयनसखिलाज्ञानसंचेलनाया: । पूर्ण कत्वा स्वभाव स्वरसपरिणतं ज्ञानसंचेतनां स्वां साननन्‍्द नाटयन्तः प्रशमरसमितः सर्मकालं पिवन्तु ॥ ४० ॥

शुद्ध आत्मद्रव्यको नमस्कार (सवेया इकतीसा )

निरभे निराकुल निगस वेद निरमेद, जाके परगासमें जगत् माइयतु है । रूप रस गंध फास पुदगलकों विलास, तासों उदवास जाको जस गाइयतु है ॥। विग्रह्सों विरत परिग्रहसो न्‍्यारों सदा, जामें जोग निग्रह चिह्न पाइयतु है। सो है ग्यात परवांन चेतन निधान ताहि, अविनासी ईस जानि सीस नाइयतु है ॥ १०७ ॥

शब्दार्थ :- निराकुलल्‍क्षोभरहित । तिगमच उत्कृष्ट । निरक् (निर्भय )>भयरहित । परगास प्रकाश । माइयतु है+समाता है । उदवास- रहित । विग्रहन्शरीर । निग्रह>निराला । चिह्नुजलक्षण ।

अर्थ :- आत्मा निर्भव, आनन्दमय, सर्वोत्कृष्ट, ज्ञानकप और भेद- रहित है। उसके ज्ञानरूप प्रकाशमें त्रेलोक्यका समावेश होता है । स्पशे- रस-गन्ध-वर्ण ये पुदुगलके ग्रुण है, इनसे उसकी सहिमा निराली कही गई है। उसका लक्षण शरीरसे भिन्न, परिग्रहसे रहित, मन-बचन-कायके योगोंसे निराला है, वह ज्ञानस्वरूप चेतन्य-पिण्ड है, उसे अविनाशी ईश्वर मानकर मस्तक नवाता हूँ ॥ १०७ ॥

शुद्ध आत्मद्रव्य अर्थात्‌ परमात्माका स्वरूप (सर्वेया इकतीसा )

जेसो निरभेदरूप निहचे अतीत हुतौ,
तंसो निरभेद अब भेद कौन कहेगो ।

इतः पदार्थप्रयनावसुष्ठतादिना कतेरेकमनाकुल ज्वलत्‌ । समस्तवस्तुव्य तिरेकनिश्चयाद्विवेचितं ज्ञानमिहावतिष्ठते ॥ ४१ ॥

अन्येस्यो व्यतिरिक्तमाम्मानियतं विश्वत्‌ पृथग्बस्तुता-
सादानोज्कनशुन्यमेतदमल ज्ञान तथावस्थितम्‌ ।
मध्याश्वस्तविभागमुक्ततहजस्फारप्र भा भासुर:
शुद्धज्ञानधनों ययास्य महिसा नित्योदितस्तिष्ठति ॥ ४२ ॥॥
दीसे कर्म रहित सहित सुख समाधान,
पायो निजस्थान फिर बाहरि न बहेगो ।।
कबहूं कदाचि अपनो सुभाव त्यागि करि,
राग रस राचिक न पर वस्तु गहेगो ।
अमलान ग्यान विद्यमान परगट भयोौ,
याही भांति आगम अनंत काल रहैगौ ॥१०८।॥।

शब्दार्थ :-निरभेदल्भेदरहित । अतीत>पहले । राचिके८"लीन होकर । अमलान>्मलरहित । आगम>आगामी ।

अर्थ :- पूर्वमें अर्थात्‌ संसारो दशामे निश्चयनयसे आत्मा जेसा अभेदरूप था, बसा प्रगट हो गया, उस परमात्माको अब भेदरूप कौन कहेगा ? अर्थात्‌ कोई नहों ।जो कर्मरहित और सुख-शान्तिसहित दिखता है, तथा जिसने निजस्थान अर्थात्‌ सोक्षकी प्राप्ति की है, वह बाहर अर्थात्‌ जन्म- सरणरूप संसारमें न आवेगा । वह कभी भो -अपना निज-स्वभाव छोड़कर राग-देषमें लगकर परपदार्थ अर्थात्‌ शरीर आदिको ग्रहण नहीं करेगा, क्योंकि वतमानकालमें जो निर्मल पूर्णज्ञान प्रगट हुआ है, बह तो आगामी अनन्त काल तक ऐसा हो रहेगा ॥ १०८ ॥

पुन. (सवया इकतीसा )

जबहीते चेतन विभावसों उलटि आपु, सम पाइ अपनो सुभाउ गहि लोनोौ है । तबहोते जो जो लेने जोग सो सो सब लोनो, जो जो त्यागजोग सो सो सब छांड़ि दीनो है ।। लेबेकों न रहो ठोर त्यागिवेको नांहि और, बाकी कहा उबरधो जु कारजु नवीनो है । उन्मुक्तमुन्मोच्यमशेषतस्तत्त यात्तमादेषमशेष तस्तत्‌ । बदात्सन. संहृतसर्व शक्त पूर्णस्य सन्धारणमात्सनीह ॥ ४३ ॥ संग त्यागि अंग त्यागि बचन तरंग त्यागि, मन त्यागि बुद्धि त्यागि आपा सुद्ध कीनो है ॥ १०६ ॥ शब्दार्थ .- उलटि>विमुख होकर । समै (समय ) > मौका । उबरचौ- शेष रहा । कारजु (कार्य)>काम । सगजपरिग्रह। अगल्देह। तरगं> लहर । बुद्धि इन्द्रिय-जनितज्ञान । आपा-निज-आत्मा । अथे :- अवसर मिलनेपर जबसे आत्माने विभावपरिणति छोड़कर निजस्व॒भाव ग्रहण किया है, तबसे जो जो बातें उपादेय अर्थात्‌ ग्रहण करने योग्य थों, वे वे सब ग्रहण कीं, और जो जो बातें हेय अर्थात्‌ त्यागने योग्य थीं, वे वेसब छोड़ दीं। अब प्रहण करने योग्य और त्यागने योग्य कुछ नहीं रह गया और न कुछ शेष रह गया जो नया काम करनेको बाकी हो । परिग्रह छोड़ दिया, शरीर छोड़ दिया, बजनकी क्रियासे रहित हुआ, मनके विकल्प त्याग दिये, इन्द्रियजनित ज्ञान छोड़ा और आत्माको शुद्ध किया ॥ १०६ ॥।

मुक्तिका मूल कारण द्र॒व्यलिग नही है (दोहा)

सुद्ध ग्यानक देह नहिं, मुद्रा भेष न कोह ।
ताते कारन मोखकौ, दरबलिग नहिं होइ ॥ ११० ॥

दरबलिग न्यारो प्रगट, कला वचन विग्यान । अष्ट महारिधि अष्ट सिधि, एऊ होहि न ग्यान ॥ १११ ॥

शब्दार्थ :- मुद्रा-आकृति । भेष (वेष)>बनावट । दरबलिग-वाह्य वेष । प्रगट>स्पष्ट । एऊन्यह ।

अर्थ :- आत्मा शुद्धज्ञानमय है, और शुद्धज्ञानके शरीर नहीं है,और न आक्ृति - बेष आदि हैं, इसलिये द्रव्यलिग मोक्षका कारण नहीं है ॥११०।॥॥

व्यतिरिक्त परद्रव्यादेवे॑ जश्ानसवस्थितम ।
कथमाहा रक॑तत्स्याद्यन देहोःस्प शझूचते ॥ ४४ ॥।

एवं ज्ञानस्थ शुद्धस्थ देह एवं न विछते। ततो वेहमयं ज्ञातुर्न लिन मोक्षकारणम्‌ ॥ ४५ ॥ श्श्द सेमयसार माटक बाह्य वेष जुदा है, कला-कौशल जुदा है, बचन-चातुरी जुदा है, अष्ट महाऋद्धियाँ’ जुदो हैं, सिद्धियाँ’ जुदो हैऔर ये कोई ज्ञान नहों हैं ॥ १११ ॥

आत्माके सिवाय अन्यत्र ज्ञान नही है (सवेया इकतीसा )

भेषमें न ग्यान नहि ग्यान गुरु वर्तनमे,
मंत्र जंत्र तंत्रमें नग्यानकी कहानी है ।
ग्रंथमें न ग्यान नहि ग्यान कवि चातुरीमें,
बातनिमे ग्यान नहि ग्यान कहा बानी है ।।
ताते भेष ग्रुरुता कवित्त ग्रंथ मंत्र बात,
इनते अतोत ग्यान चेतना निसानी है ।
ग्यानहीमें ग्यान नहि ग्यान और ठौर कहूं,
जाक॑ घट ग्यान सोई ग्यानका निदानो है ॥ ११२ ॥

शब्दार्थ :- मत्र>माड़ना-फूंकना । जंत्र>गण्डा-तावीज । तत्रर टोटका । कहानी >-बात । ग्रंथशास्त्र ।निसानी>चिह्न । वानी>वचन । ठौर>स्थान । निदानी>कारण ।

अर्थ :- वेषमें ज्ञान नहीं है, महंतजी बने फिरनेमें ज्ञान नहीं है, मंत्र- जंत्र-तंत्रमें ज्ञाककोी बात नहों है, शास्त्रमें? ज्ञान नहीं है, कविता-कौशलमें ज्ञान नहों है, व्याख्यानमें * ज्ञान नहीं है, क्योंकि वचन" जड़ है, इससे वेष, गुरुता, कविताई, शास्त्र, मंत्र-तंत्र, व्याख्यान इनसे चेतन्यलक्षणका धारक ज्ञान निराला है। ज्ञान ज्ञानहीमें है, अन्यत्र नहों है। जिसके घटमें ज्ञान उपजा है, वही ज्ञानका मूल कारण अर्थात्‌ आत्मा है ॥ ११२ ॥

१ अष्ट ऋद्धिएँ -
दोहा - अणिमा महिसा गरमिता, लधिमा प्राप्ती काम ।
वशीकरण अरु ईशता, अष्ट रिद्धिके नाश ॥।
3 अ्रष्ट सिद्धिएँ- आचार, श्रुत, शरीर, वचन, वाचन, बुद्धि, उपयोग ओऔर सग्रह
सलीनता ।
3_४ ये ज्ञान नही ज्ञानके कारण हैं ।

बचन शब्दका प्रकार है, सो शब्द जड़ है, चैतन्य नही है ।

ज्ञानके बिना वेषधारी विषयके भिखारी हैं (सवेया इकतीसा )

भेष धरि लोकनिकों बंचे सौ धरम ठग,
गुरु सो कहावे गुरुवाई जाहि चहिये।
मंत्र तंत्र साधक कहावे गुनी जादूगर,
पंडित कहाये पंडिताई जामें लहिये ।।
कवित्तकी कलामें प्रवीन सो कहाबे कवि,
बात कहि जाने सो पवारगीर कहिये ।
एतौ सब विबेके भिखारी मायाधारी जीव,
इन्हकों विलोकिक दयालरूप रहिये ॥ ११३ ॥

शब्दार्थ :- बचै >ठगे । प्रवीन>चतुर । पवारगीर-बातचीतमें होश्यार - सभाचतुर । विलौकि>देखकर ।

अर्थ :- जो वेष बनाकर लोगोंको ठगता है, बह घर्म-ठग कहलाता है जिसमे लौकिक बड़प्पन होता है, वह बड़ा कहलाता है, जिससें मंत्र-तंत्र साधनेका गुण है, वह जादूगर कहलाता है, जो कविताईमें होशियार है, वह कवि कहलाता है, जो बात-चीतमें चटपटा है, वह व्यास्याता कहलाता है। सो ये सब कपटी जीव विषयके भिक्षुक हैं, विषयोंकी पुतिके लिये याचना करते फिरते हैं, इनमें स्वार्थ -त्यागकका अश भी नहीं है । इन्हें देखकर दया आनी चाहिये ॥ ११३ ॥

अनुभवकी योग्यता (दोहा)

जो दयालता भाव सो, प्रगट ग्यानकौं अंग ।
पे तथापि अनुभौ दसा, वरते विगत तरंग ॥ ११४ ॥
दरसन ग्यान चरन दसा, कर एक जो कोइ ।
थिर छ्व॑ साधे मोख-मग, सुधी अनुभवी सोह॥ ११५ ॥
बर्शनश्ानचारित्रत्रयात्मा तस्वमात्मन: ।
एक एव सदा सेव्यो मोक्षमार्गों सुमुक्षणा ॥४६॥॥

शब्दार्थ :- प्रगटन्‍्साक्षात्‌ । तथापिज्तों भी । विगत>रहित। तरंग विकल्प । सुधी>भेदविज्ञानी ।

अर्थ : यदहापि करुणाभाव ज्ञानका साक्षात्‌ अंग है, पर तो भी अनु- भवकी परिणति निर्विकल्प रहतो है ॥ ११४ ॥ जो सम्यर्दशेन-ज्ञान- चारित्रकी एकता पूर्वक आत्मस्वरूपमे स्थिर होकर मोक्षमार्गको स्तधता है, वही भेदविज्ञानी अनुभवी है॥ ११५ ॥

आत्म-अनुभवका परिणाम (सर्वैया इकतीसा )

जोई द्विग ग्यान चरनातसमे बेठि ठौर,
भयौ निरदोर पर वस्तुकों न परसे।
सुद्धता विचार ध्यावे सुद्धतामै केलि करे,
सुद्धतामें थिर ह्ं अमृत-धारा बरसे ॥।
त्यागि तन कष्ट ह्वू सपष्ट अष्ट करमकोौ,
करि थान भ्रष्ट नष्ट करे और करसे ।
सोतो विकलप विजई अलप काल मांहि,
त्यागि भो विधान निरवान पद परसे ॥ ११६ ॥

शब्दार्थ :- निरदार>परिणामोकी चचलता रहित । परसे (स्पर्श) छूवे ।केलिन्‍्मौज । सपष्ट (स्पष्ट) >खुलासा। थान (स्थान) -क्षैत्र । करसे (कृश करे)->जीण करे ।विकलप विजई-विकल्प जाल जीतनेवाला । अलप (अल्प )ल्‍-थोड़ा । भौ विधान>जन्म-मरणका फेरा । निरवान (निर्वाण) >मोक्ष ।

अर्थ :- जो कोई सम्यग्दर्शन-झ्ञान-चारित्ररूप आत्मामें अत्यन्त हढ़ स्थिर होकर विकल्प-जालकों दूर करता है, और उसके परिणाम पर- पदार्थोको छू तक नहों पाते । जो आत्मशुद्धिको भावना व ध्यान करता है, वा शुद्ध आत्मामें मौज करता है, अथवा यों कहो कि शुद्ध आत्मामें स्थिर होकर आत्सोय आनन्दकी अमृत-धारा बरसाता है, वह शारीरिक कष्टोंको नहीं गिनता, और स्पष्टतया आठों कर्मोकी सत्ताको शिथिल और बिचलित कर देता है, तथा उनकी निजेरा और नाश करता है, वह निविकल्प ज्ञानी थोड़े हीसमयमें जन्म-सरणरूप संसारकों छोड़कर परमधाम अर्थात्‌ मोक्ष पाता है ॥ ११६॥

आत्म-अनुभव करनेका उपदेश (चौपाई )

गुन परजमें द्विष्टि न दोजे।
निरविकलप अनुभौ-रस पीजे ॥।
आप समाइ आपमें लीजे।
तनुपा मेटि अपनुपौ कीज ॥ ११७ ॥

शब्दार्थ :- द्विष्टितजर । रस-अमृत । तनुपौरूशरीरमे अहकार । अपनुपौ-आत्माको अपना मानना ।

अर्थ :- आत्माके अनेक गुण-पर्यायोंके विकल्पमें न पड़कर निविकल्प आत्मअनुभमवका अमृत पियो । आप अपने स्वरूपमें लोन होजाओ, और शरीरमें अहंबुद्धि छोड़तर निज-आत्माकों अपनाओ ॥ ११७ ॥

पुन: (दोहा )

तजि विभाउ हूजे मगन, सुद्धातम पद सांहि ।
एक मोख-मारग यहे, और दूसरो नांहि॥ ११८ ॥

अर्थ :- राग-दहेष आदि विभावपरिणतिको हटाकर शुद्ध आत्मपदमें लीन होओ, यहो एक मोक्षका रास्ता है,दूसरा मार्ग कोई नहीं है ॥ ११८ ॥

आत्म-अनुभवके बिना वाद्य चारित्र होनेपर भी जीब अब्रती है (सवेया इकतीसा )

केई भिश्याद्रिष्टी जीव धरे जिनमुद्रा भेष, क्रियामें मगन रहें कहें हम जती हैं । एको मोक्षपथों य एव नियतो हस्शप्तिवृत्त्यात्मक- स्ततश्रंब स्थितिमेति पस्तमनिशं ध्यायेच्च तं चेतति । तस्मिन्न व निरन्तर विहरति ब्रय्यान्तराण्यस्पृशन्‌ सोध्वश्य॑ समयस्य सारमधचिराज्नित्योदयं विन्दति ॥ ४७ ॥॥

“ये त्वेने परिहत्य संबुतिपथप्रस्थापितेनात्मना
लिड्ज व्रव्यमये वहन्ति ममतां तत्त्वावबोधच्युता: ।
निश्पोद्योतमखण्डमेकसतुलालोक स्वभावप्रभा-
प्राभारं॑ समपस्थ साश्ममल नागापि परश्यान्त ते ॥ ४८ ॥
३०२ ससयसार ताटक
अतुल अखंड मसल रहित सदा उदोत,
ऐसे ग्यान भावसों विमुख मूढ़मती हैं ।।
आगमस संभाल दोस टाल विवहार भाले,
पाले ब्रत जदपि तथापि अबिरती हैं ।
आपुकों कहावे मोल मारगके अधिकारी,
मोखसों सदीव रुष्ट दुष्ट दुरमती’ हैं ॥ ११६ ॥

शब्दार्थ :- क्रिया-बाह्मचारित्र ।जती (यति )>साधु । अतुल >उपमा रहित । अखड-नित्य । सदा उदोत >हमेशा प्रकाशित रहनेवाला । विमुख- परांमुख । मृढ्मतीरअज्ञानी । आगमन्शास्त्र । भाले-देखे । अविरती (अव्ती )>ब्रत रहित । रुष्ट >नाराज । दुरमती >खोटी बुद्धिवाले ।

अर्थ :- कई मिथ्याहृष्टि जोब जिनलिग धारण करके शुभाचारमें लगे रहते हैं,और कहते हैंकि हम साधु हैं, वेमे, अनुपम, अखण्ड, असल, अविनाशी ओर सदा प्रकाशवान ऐसे ज्ञानभावसे सदा पराइमुख हैं । यद्यपि वे सिद्धान्तका अध्ययन करते, निर्दोष आहार-बिहार करते और ब्रतोंका पालन करते हैं,तो भी अव्नती हैं। वे अपनेको मोक्षमार्गंका अधिकारी कहते हैं,परन्तु वे दुष्ट मोक्षमार्गसे बिमुख हैं,और दुर्मति है ॥ ११६ ॥

पुन: (चौपाई)

जेसे मुगध धान पहिचाने।
तुष तंदुलका भेद न जाने ।॥।
तेसे मृढ़गती विवहारो ।
लखे न बंध मोख गति न्‍्यारो ॥ १२० ॥

अर्थ :- जिस प्रकार भोला मनुष्य घानको पहिचाने और तुष तंदुलका ) दुरगती’ ऐसा भी पाठ है । व्यवहारविमृटदृष्टयः परमार्थ कलयन्ति नो जनाः । तुषब्ोधविभुग्धबुद्धघ: कलयन्तीहु तुष न तण्डुलम ॥ ४६ ॥। भेद न जाने, उसी प्रकार बाह्य-क्रियामें लोन रहनेवाला अज्ञानी बन्ध और मोक्षकी प्रथकता नहीं समभता ॥ १२० ॥

पुन. (दोहा)

जे विवहारी पृढ़ नर, परजे बुद्धी जीव ।
तिन्‍्ह॒कौं बाहिज क्रियाविषे, हैअवबलंब सदीव ॥ १२१ ॥
कुमति बाहिज हष्टिसौ, बाहिज क्रिया करंत ।
साने सोख परंपरा, मनमें हरष धरंत ॥ १२२ ॥
सुद्धातस अनुभो कथा, कहे समकिती कोइ ।
सो सुनिक तासों कहै, यह सिवपंथ न होड ॥ १२३ ॥

अर्थ :- जो व्यवहारमें लीन और पर्यायहोमें अहूंब॒ुद्धि करनेवाले भोले मनुष्य हैं,उन्हें हमेशा बाह्य क्रियाक्राण्डहीका बल रहता है ७ १२१॥ जो बहिह ए्टि और अज्ञानी हैंवे बाह्यचारित्र ही अंगीकार फरते हैं, और मनमें प्रसन्न होकर उसे मोक्षमाग समभते हैं॥ १२२ ॥ यदि कोई सम्यग्हष्टि जीव उन मिथ्यात्वियोंसे शुद्ध आत्म-अनु मवकी वार्ता करे, तो उसको सुनकर वे कहते हैंकि यह मोक्षमार्ग नहों है॥ १२३ ॥

अज्ञानो ओर ज्ञानियोंकी परिणतिमे भेद है (कवित्त

जिन्हके देहबुद्धि घट अंतर, मुनि-मुद्रा धरि क्रिया प्रबांनहि। ते हिंयथ अंध बंधके करता, परम तत्तकौ भेद न जानहि॥। जिनन्‍्हके हिए सुमतिकी कनिका, बाहिज क्रिया भेष परमानहि ।

द्ृव्यलिड्रममकारमीलितेह श्यते सममसार एवं न। द्रब्यलिडुमिह यस्किलान्यतो ज्ञानसेकसिदसेव हि स्वतः ॥ ५० ॥

ते समकिती मोख मारग सुख,
करि प्रस्थान भवस्थिति भानहि ॥ १२४ ॥

शब्दार्थ :- देहबुद्धश रीरको अपना मानना । प्रवांनहि-सत्य मानना । हियचजहुदय । परमतत्तल्‍्आत्मपदार्थ । कनिका>किरण । भवस्थिति>संसारकी स्थिति । भानहि-नष्ट करते है ।

अर्थ :- जिनके हृदयमें शरोरसे अहंबुद्धि है, वेमुनिका वेष धारण करके बाह्य चारित्रहीकों सत्य मानते है। वे हृदयके अंधे बन्धके कर्त्ता है, आत्म-पदार्थका मर्स नहीं जानते, और जिन सम्यस्टृष्टि जीवोके हृदयमें सम्यग्लानकी किरण प्रकाशित हुई है, वे बाह्यक्रिया और बेबको अपना निमज-स्वरूप नहीं सप्रभते, वे सोक्ष भार्गकेसन्‍्तुख गसन करके भवस्थितिकों नष्ट करते हैं ॥ १२४ ॥

समयसारका सार (सवेया इकतीसा )

आचारज कहैं जिन वचनको विसतार,
अगम अपार है कहेंगे हम कितनों ।
बहुत बोलिबेसो न मकसुद चुप्प भल्री,
बोलिये सुबचन प्रयोजन है जितनों ॥।
नानारूप जलपसों नाना विकलप उठे,
ताते जंतो कारज कथन भलो तितनों ।
सिद्ध परमातमाकों अनुभो अभ्यास कीजे,
यहै मोख-पंथ परमारथ है इतनो ॥ १२५ ॥

शब्दार्थ :- विसतार (विस्तार )>फलाव । अगम"अथाह । मकसूदर इृष्ट । जलपन्वकवाद ।" कारज>"काम । परमारथ (परमार्थ )न्पर्म पदार्थ । श । अलमलमतिजस्पेदू विकल्‍्पैरनत्पे- रयमहि. परमार्थश्व त्यता नित्यमेकः । स्व॒रसविस्तरप्रणंज्ञान विस्फूृतिमात्रा- पक्ष खलु समयसाराबुतर किड्चिदस्ति ॥ ४१ ॥

अर्थ :- श्रीगुरु कहते हैं किजिनवाणीका विस्तार विशाल और अपरम्पार है, हम कहाँ तक कहेंगे । बहुत बोलना हमें इश नहों है, इससे अब मौन हो रहना भला है, क्योंकि वचन उतने ही बोलना चाहिये, जितनेसे प्रयोजन सधे। अनेक प्रकारका बकवाद करनेसे अनेक विकल्प उठते हैं, इसलिये उतना हो कथन करना ठीक है जितनेका काम है। बस, शुद्ध परमात्माके अनुभवका अभ्यास करो यही सोक्षमार्ग हैऔर इतना ही परमार्थ है ॥ १२५ ॥

पुनः (दोहा )

सुद्धातम अनुभौ क्रिया, सुद्ध ग्यान द्विग दौर ।
मुकतति-पंथ साधन यहै, बागजाल सब और ॥ १२६ ॥

शब्दार्थ :- क्रिया >चा रित्र । द्विगनदर्शन । वागजालन्वाक्याडंबर ।

अर्थ :- शुद्ध आत्माका अनुभव करना ही सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र हे, बाको सब वाक्याडस्बर है ॥१२६।॥।

अनुभव योग्य शुद्ध आत्माका स्वरूप (दोहा)

जगत् चक्षु आनंदसय, ग्यान चेतनाभास ।
निरविकलप सासुत सुथिर, कीज अनुभो तास ॥ १२७ ॥
अचल अखंडित ग्यानमय, पुरन बीत ममत्व ।
ग्यान ग़म्य बाधा रहित, सो हेआतम तत्व ॥१२८।॥॥

अर्थ :- आत्मपदार्थ जगतके तब पदार्थोकों देखनेके लिये नेत्र हैं, इदमेक जगच्चक्षरक्षयं याति पूर्णताम्‌ । विज्ञानघधनमानन्दसयमध्यक्षता. नयत्‌ ॥५२॥।

इतीदमात्मनस्तत्त्व॑ जञानमात्रमवस्थितम्‌ ।
अखण्डमेकसनचल स्वसवेश्वमबाधितम्‌ ॥ ५२ ॥
इति स्व विणुद्धिज्ञानाधिकार ॥ १० ॥
५ । रत 9३ प, फ्९८यः
आनन्दमय है, ज्ञान-चेतनासे प्रकाशित हे, संकल्प-विकल्प रहित है, स्वयं
सिद्ध है, अविनाशी है, अचल है, अखण्डित है, शानका पिण्ड है, सुख आदि
अनन्त गुणोंसे परिपृर्ण हे, बीतराग है, इन्द्रियोंके अगोचर है, शञानगोचर है,
जन्म-मरण या क्षुधा-तषा आदिको बाधासे रहित निराबाध है। ऐसे आत्स-

तर्वका अनुभव करो ॥।१२७-१२६८॥ (दोहा )

सर्वे विसुद्धों द्वारा यह, कह्यों ध्रगट सिवपंथ ।
कुन्दकुन्द मुनिराज कृत, प्रर भयो गरंथ ॥१२६।।

अर्थ :- साक्षात्‌ मोक्षका सार्ग यह सर्वविशुद्धि अधिकार कहा और स्वामी कुन्वकुन्दमुनि रचित शास्त्र समाप्त हुआ ॥ १२६ ॥

ग्रन्थकर्ताका नाम और ग्रन्थकी महिमा (चौपाई )

कुन्दकुन्दमुनिराज प्रवोना।
तिन्‍्ह यह ग्रंथ इहांलों कीना ।।
गाथा बद्ध सुप्राकृत वानी ।
गुरुपरंपप. रीति बखानी ॥ १३०१ ॥
भयौ गिरंथ जगत् बिख्याता।
सुनत महा सुख पावहि ग्याता ॥।
जे नव रस जगमांहि बखाने।
ते सब समयसार रस साने’॥ १३१ ॥

अर्थ :- आध्यात्मिक विद्यासें कुशल स्वामी कुन्दकुन्द सुनिने यह ग्रन्थ यहाँ तक रचा है, ओर वह गुरु-परम्पराके कथन अखुसार प्राकृत भाषासें गाथाबद्ध कथन किया है ॥ १३० ॥ यह ग्रन्थ जगत्‌प्रसिद्ध है, इसे सुनकर ज्ञानी लोग परमाननद प्राप्त करते हैं । लोकमें जो नव रस प्रसिद्ध हैं वे सब इस समयसारके रससें समाये हुए हैं॥ १३१ ॥

१ माने ऐसा भी पाठ है पुन: (दोहा)

प्रगटररूप.. संसारमें, नव रस नाटक होइ ।
नवरस गणित ग्यानसय, विरला जाने कोइ ॥१३२॥

अर्थ :- संतारमें प्रसिद्ध है किनाटक नव रस सहित होता है, पर ज्ञानमें नव हो रस गर्मित हैं, इसबातको कोई विरला हो ज्ञानी जानता है।

भावार्थ :- नव रसोंमें सबका नायक शान्तरस है, और शान्तरस ज्ञानमें है ॥ १३२ ॥

नव रसोंके नाम (कवित्त )

प्रथम सिगार वीर दूजो रस,
तोजी रस करुना सुखदायक ।
हास्य चतुर्थ रुद्र रस पंचम,
छट्टम रस बीभच्छ विभायक ॥।
सप्तम भय अद्ुम रस अड्भू त,
नवमी शांत रसनिको नायक ।
ए नव रस एई नव नाटक,
जो जहूंसगन सोइ तिहि लायक ११३३)

अर्थ :- पहला श’ृंगार, दूसरा बोर रस, तोसरा सुखदायक करुणा रस, चोथा हास्य, पाँचवाँ रोद रस, छा घिनावना बोभत्स रस, सातयाँ सयानक, आठवाँ अदभुत ओर नवभा सब रसोंका सरताज शान्त रस है । ये नव रस हैं। और यही नाटकरूप हैं। जो जिस रसमें मग्न होवे उसको वही रुचिकर होता है ॥१३३॥।

नव रसोके लौकिक स्थान (सवेया इकतीसा)

सोभासें सिगार बसे बोर पुरुषारथमें,
कोमल हिएमें करुना रस बखानिये ।
आनंदमें हास्य रंड मुंडमें विराज रुद्र,
बोभत्स तहां जहां गिलानि मन आनिये ॥।
खितामें भयानक अथाहतामें अवभुत,
सायाकी अरुचि तामें सांत रस मानिये ।
एई नव रस भवरूप एई भावरूप,
इनिकौ विलेछिन सुद्रिष्टि जागे जानिये ॥ १३४ ॥

शब्दार्थ :- रुद मुड- रण-सग्राम । विलेछिन > प्रथकुरण । अथे :- शोमामें श्यंगार, पुरुषार्थमें बीर, कोमल हुृदयमें करुणा, आनन्दमें हास्य, रण-संप्राममें रोद, ग्लानिमें वीभत्स, शोक मश्णादिकी चितामें भयानक, आश्रयंमें अद्भुत और वंराग्यमें शान्त रसका निवास है। ये नव रस लोकिक है और पारमाथिक है, सो इनका पृथक्करण ज्ञानहृष्टिका उदय होनेपर होता है ॥ १३४ ॥

नव रसोंके पारमाथिक स्थान (छप्पय )

गुन विचार सिगार, बोर उद्यम उदार रुख ।
करुना समरस रीति, हास हिरदे उछाह सुख ।।
अष्ट करम दल मसलन, रुद्र बरते तिहि थानक ।
तन बिलेछ बोभच्छ, दुन्द मुख दसा भयानक ॥।
अदभुत अनंत बल चितबन,
सांत सहज वेराग धुव ।
नव रस विलास परगास तब,
जब सुबोध घट प्रगट हुब ॥१३५।॥

शब्दार्थ :- उछाह-उत्साह ।दन मलन>नष्ट करना । विलेछु-अशुचि । अथ -आत्माको ज्ञानगुणसे विभूषित करनेका विचार श्रृंगार रस है, कमं-निजं राका उद्यम बीररस है, अपने ही समान सब जीवोंको समभना करुणा रस है, मनमें आत्म-अनुभवका उत्साह हास्थरस है, अष्ट कर्मोंका नष्ट करना रौद्ररस है, शरोरको अशुध्चिता विचारना वीभत्स रस है, जन्म्-मरण आदिका दुःख चितवन करना भयानक रस है,आत्माकी अनन्तशक्ति चितवन करना अदभुत रस है, हृढ़ बेराग्य धारण करना शान्त रस है। सो जब हुदयमें सम्यग्शान प्रगट होता हैतब इस प्रकार नव रसका बविलास प्रकाशित होता है ॥ १३५ ॥

(चौपाई)

जब सुबोध घटमें परगासे ।
तब रस बिरस विषमता नासे ॥।
नव रस लखे एक रस मांही ।
, ताते विरस भाव सिटि जांहो ॥ १३६ ॥५

शब्दार्थ :- सुबोध-सम्यग्ज्ञान ।विषमतान-भेद ।

अर्थ :- जब हृदयमें सम्यग्लान प्रगट होता है, तब रस-विरसका भेद मिट जाता है । एक ही रसमें नव रस दिखाई देते हैं,इससे विरसभाव नष्ट होकर एक शान्त रसहीमें आत्मा विश्वास लेता है॥ १३६ ॥

(दोहा )

सबरसगर्भित मूल रस, नाटक नाम गरंथ ।
जाके सुनत प्रवांन जिय, समुर्क पंथ कुपंथ ॥ १३७ ॥

शब्दार्थ :- मूल रस >प्रधानरस । कुपंथ-मिथ्यामार्ग ।

अर्थ :- यह नाटक समयसार ग्रन्थ सब रसोसे गर्भित आत्मानुभव- रूप मुलरसमय है, इशके सुनते ही जोव सन्‍्म्राग और उन्मरा्गको समकक जाता है ॥ १३७ ॥

(चोपाई)

बरते ग्रंथ जगत् हित काजा ।
प्रगटे. अमृतचंद्र समुनिराजा ॥॥
तब तिन्हि ग्रंथ जानि अति नीका ।
रची बनाई संसकृत टीका ॥ १३८ ॥

अर्थ :- यह जगतृहितकारो ग्रन्थ प्राकृत भाषामें था सो अमृतचन्द्र- स्वामीने इसे अत्यन्त श्रेष्ठ जानकर इसको संस्कृत टीका बनाई ॥ १३८१

( दोहा )

सरब विसुद्धी द्वारलों, आए करत बखान।
तब आचारज भगतिसों, कर ग्रंथ गुन गान ॥१३६॥

अर्थ :- स्वामी अमृतचंद्रने सर्वविशुद्धिदवार पयंत इस प्रन्थका संस्कृत भाषासें व्याल्यान किया है और भक्तिपूर्वक गुणानुवाद गाया है ॥ १३६ ॥ दसवें अधिकारका सार अनन्तकालसे जन्म-मरणरूप संसारमें निवास करते हुए इस मोही जीबने पुदुगलोंके समागमसे कभो अपने स्वरूपका आस्वादन नहीं किया, और राग-हेष आदि मिथ्याभावोंमें तत्पर रहा। अब सावधान होकर निजात्म-अभिरुचिरूप सुमति राधिकासे नाता लगाना और परपदार्थो्मे अहंबुद्धिरूप कुमति कुब्जासे विरक्त होना उचित है। सुमति राधिका शतरंजके खिलाड़ीके समान पुरुषार्थकों प्रधान करती है और कुमति कुब्जा चोसरके खिलाड़ी के समान ‘पाँसा परे सो दाव’ की नीतिसे तकदीरका अवलम्बन लेतो है। इस हृष्टान्तसे स्पष्ट हैकि नीतिसे अपने बृद्धिबल और बाह्य साधनोंको संग्रह करके उद्योगमे तत्पर होने को शिक्षा दो गई है । नसोबकी बात है, कर्म जेसा रस देगा सो होवेगा, तकदोरमें नहीं है । इत्यादि किसमतके रोनेको अज्ञानभाव बतलाया है, क्योंकि तकदीर अंधी है ओर तदबीर सूभतो हुई है । आत्मा पूर्वकर्मरूप विष-युक्षोंका कर्त्ता-भोक्ता नहीं है, इस प्रकारका विचार हृढ़ रखनेसे और शुद्धात्म पदमें मस्त रहनेसे वे कर्मं-समूह अपने आप नष्ट हो जाते हैं। यदि अधा मनुष्य लंगड़े मनुष्यको अपने कंधेपर रख ले, तो अंधा लंगड़े के ज्ञान और लंगड़ा अंधेके परोंकी सहायतासे रास्ता पार कर सकता है, परन्तु अंधा अकेला हो रहे ओर लंगड़ा भी उससे जुदा रहे तो, वे दोनों इच्छित क्षेत्रकों नहों पहुँच सकते, और न विपत्तिपर विजय पा सकते हैं। यही हाल जञानचारित्रका है ।सच पुछो तो, ज्ञानके बिना चारित्र चारित्र ही नहीं है, और चारित्रके बिना ज्ञान ज्ञान ही नहीं है, क्योंकि जशानके बिना पदा्थके स्वरूपको कौन पहिचानेगा ओर चारित्रके बिना स्वरूपमें विश्रास कंसे मिलेगा ? इससे स्पष्ट है, कि ज्ञान-वे राग्यका जोड़ा है। फल-कियामें लोन होतेकी जेनमतसें कुछ सहिसा नहीं है, उसे ‘करनी हित हरनी सदा सुकति वितरनी नांहि’ कहा है। इसलिये ज्ञानी लोग जझानगोचरओर शानस्वरूप आत्माका ही अनुभव करते हैं। . स्मरण रहे कि ज्ञान आत्माका असाधारण गुण है, जब वह जेयको प्रहण करता अर्थात्‌ जानता है, तब उसकी परिणति ज्ञेयाकार होती है, क्योंकि ज्ञान सविकल्प है, दर्शनके समान निथिकल्प नहों है, अर्थात्‌ ज्ञान शेयके आकार आदिको विकल्प करता है, कि यह छोटा है, बड़ा है, टेढ़ा है, सोधा है, ऊँचा है, नोजा है, गोल है, त्रिकोण है, मोठा है, कड॒वा है, साधक है, बाधक है,हेय है, उपादेय हैइत्यादि । परन्तु ज्ञान ज्ञानही रहता है,ज्ेपका ज्ञायक होनेसे वा शेयाकार परिणमनेसे शेयरूप नहीं होता, परन्तु ज्ञानमें शेयकी आकृति प्रतिविम्बित होनेसे वाउसमें आकार आदिका विकल्प होनेसे अज्ञानी लोग ज्ञानका दोष समभते हैं, ओर कहते हैं, किजब यह ज्ञानकी सबिकल्पता मिट जावेगी - अर्थात्‌ आत्मा शुन्य जड़सा हो जावेगा, तब ज्ञान निर्दोष होगा, परन्तु “बस्तुस्वभाव मिटे नहि क्‍योंही’ की नीतिसे उनका विचार भिथ्या है। बहुधा देखा गया है कि हम कुछ न कुछ चितवन किया हो करते हैं, उससे खेद-खिन्न हुआ करते है और चाहते हैं कियह्‌ चितवन न हुआ करे । इसके लिये हमारा अनुभव यह है कि चेतयिता चेतन तो चेतता हो रहता है, चेतता था, और चेतता रहेगा, उसका चेतना स्वभाव मिट नहीं सकता । ‘ताते खेद कर सठ योंहो’ की नोतिसे खिन्नता प्रतोति होती है, अतः चितबन, धर्संध्यान और मंदकघायरूप होता चाहिये, ऐसा करनेसे बड़ी शान्ति मिलतो है, तथा स्वभावका स्वाद मिलनेसे सांसारिक संताप नहीं सता सकते, इसलिये सदा सावधान रहकर इृष्ट-वियोग, अनिष्ट- संयोग, परिपग्रह-संग्रह थ्वादिको अत्यन्त गौण करके निर्भय, निराकुल, निगम, निर्भेद आत्माके अनुभवका अभ्यास करना चाहिए।

स्याद्वाद द्वार (११)

स्वामी अमृतचन्द्र मुनिकी प्रतिज्ञा (चौपाई )

अदभुत ग्रंथ अध्यातम वानी ।
समुर्कभ कोउ बिरला ग्यानों ॥।
या स्थादवाद अधिकारा।
ताकौ जो कीज बिसतारा ॥ १ ॥
तो गरंथ अति सोभा पावं।
वह मंदिर यहु कलस कहावे ॥।
तब चित अमृत बचन गढ़ि खोले ।
अमृतचंद्र आचारज बोले ॥ २ ॥

शब्दार्थ :- अदभुत-अथाह । विरला>कोई कोई । गढि-रचकर ।

अर्थ :- यह अध्यात्म-कथनका गहन प्रन्थ है, इसे कोई विरला हो मनुष्य समक सकता है। यवि इसमें स्थाद्राद अधिकार बढ़ाया जाबे तो यह ग्रन्थ अत्यन्त सुन्दर हो जावे, अर्थात्‌ यवि कुन्वकुन्दस्वामीरचित ग्रन्थकी रचना मन्दिरवत्‌ है, तो उसपर स्याद्वादका कथन कलश के समान सुशोभित होगा । ऐसा विचार कर अमृत-बचनोंकी रचना करके स्वामी अमृत्ंद्र

कहते हे ।॥ १-२ ॥ पुनः (दोहा)

कुदकुद नाटक विष, कह्यो दरब अधिकार ।
स्यादवाद ने साधि में, कहाँ अवस्था द्वार ॥ ३॥।
कहां मुकति-पदकी कथा, कहाँ मुकतिको पंथ ।
जस घृत कारज जहां, तहां कारन दधि मंथ ॥ ४ ॥
स्थाह्वाद द्वार ३१३२

अर्थ :- स्वामी कुदकु दाचायने नाटकग्रन्थमें जोब-अजीब ब्रव्योंका स्वरूप वर्णन किया है, अब में स्थाह्वाद, नय और साध्य-साधक अधिकार कहता हूँ ॥ ३ ॥ साध्यस्वरूप मोक्षपर और साधकस्वरूप मोक्षमा्गंका कथन करता हैं,जिस प्रकार कि घृतरूप पदार्थको प्राप्तिके हेतु वधि-मंथन कारण है॥ ४ ॥

भावार्थ :- जिस प्रकार दधिमंथनरूप कारण मिलनेसे घृत पदार्थकी प्राप्तिरूप कार्य सिद्ध होता है, उसो प्रकार मोक्षमार्ग ग्रहण करनेसे मोक्ष- पदार्थकी प्राप्ति होती है। मोक्षमार्ग कारण है और मोक्षपदार्थ कार्य है। कारणके बिना कार्यकोीं सिद्धि नहों होती, इससे कारणस्वरूप मोक्षमा्गं ओर

कार्यस्वरूप सोक्ष दोनोंका वर्णन किया जाता है (चौपाई )

अमृतचंद्र बोले मृदुवानो ।
स्यादबादकी सुना कहानी ॥।
कोऊ कहे जीव जग मांही ।
कोऊ कहै जीव है नांही ॥ ५ ॥

(दोहा )

एकरूप कोौऊ कहै, कोऊ अगनित अंग ।
छिनभंगुर कोऊ कहै, कोऊ कहै अभंग ॥ ६ ॥
ने अनंत इहबिधि कही, मिले न काहू कोइ ।
जो सब ने साधन करं, स्थादवाद है सोई ॥ ७ ॥
शबदार्थ :- कहानी कथन । अगनित अंग>अनेक रूप । छिनभंगुर>
अनित्य । अभंगरूनित्य ।

अर्थ :- स्वामी अमुतचन्द्रने मुदुबचनोंमें कहा, कि स्थाहादका कथन सुनो; कोई कहता है कि संसारमें जीव है, कोई कहता है कि जीव नहां है ॥ ५ ॥ कोई जोवको एकरूप और कोई अनेकरूप कहता है, कोई जीबको अनित्य और कोई नित्य कहता है॥ ६ ॥ इस प्रकार अनेक नय हैं कोई किसोसे नहों मिलते, परस्पर विरुद्ध हैं, और जो सब नयोंको साधता हैवह स्थाह्ाद है ॥ ७ ॥ विशेष :- कोई जीव पदार्थों अस्तिस्वरूप और कोई जीव पदार्थको नास्तिस्वरूप कहते हैं । अद्वेतवादी जीवकों एक ब्रह्मरूप कहते हैं,नेयायिक जीवको अनेकरूप कहते हैं, बोड़मतवाले जीोवको अनित्य कहते हैं, सांख्य- मतवाले शाश्वत अर्थात्‌ नित्य कहते हैं। और यह सब परस्पर बिरुद्ध हैं, कोई किसीसे नहों मिलते, पर स्याद्वादी सब नयोंको अविरुद्ध साधता है।

स्ाद्ाद संसारसागरसे तारनेवाला है (दोहा)

स्थादवाद अधिकार अब, कहों जनको मूल ।
जाके जानत जगत् जन, लहैं जगत्-जल-कल ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :- मूल-मुख्य ।जगत् जन-ससारके मनुष्य ।कूल-किनारा ।

अर्थ :- जेनमतका मूल सिद्धान्त 'स्थाह्राद अधिकार” कहता हें, जिसका ज्ञान होनेसे जगतके मनुष्य संसार-सागरसे पार होते हैं ॥ ८ ॥

नय समूहपर शिप्यकी शका और गुरुका समाधान (स्वेया इकतीसा )

शिष्य कहे स्वामी जीव स्वाधीन कि पराधीन,
जीव एक है किधों अनेक मानि लोजिए ।
जोब है सदीब किधों नांहि हैजगत् मांहि,
जीव अविनश्वर कि नश्वर कहीजिए ॥।
सतगुरु कहै जीव है सदोव निजाधीन,
एक अविनश्रर दरव-द्विष्टि दीजिए ।
अज्॒ स्पाद्रादशुद्धधर्थ वस्तुतत्त्वव्यवस्थितिः ।
उपायोपेधभावश्च मनाग्भूयोषपषि… चिन्त्यते ॥ १ ॥
बाह्मायें: परिपीतमुज्कितनिजप्रव्यक्तिरिक्तोभवद्‌
विशान्त पररूप एवं परितों ज्ञानं पशो: सोदति ।
यत्तलसदिह्‌ स्वरूपत इति स्थाह्ादिनस्तत्पुन -
हूरान्मस्तधनस्वभावभरत: पूर्ण समुन्मज््जति ॥ २॥।
स्थाद्गाद द्वार 3 4.
जीव पराधीन छिनभंगुर अनेक रूप,
नांही जहां तहां परजे प्रवांन कीजिए ॥। € ॥।
शब्वार्थ :- अविनश्वर नित्य । नश्वरमन्अनित्य । निजाधीन >अपने
आधीन । पराधीन>दूसरेके आधीन । नांही>नष्ट होनेवाला" ।
, अर्थ :- शिष्य पूछता हैकि हेस्वामी ! जगतमें जीव स्वाधोन हैकि
पराधीन ? जोव एक हैअथवा अनेक ? जोब सदाकाल है अथवा कभी
जगतमें नहीं रहता है ? जोब अविनाशों हैअथवा नाशवान्‌ है ? आओगुरु
कहते हैंकि द्रव्यहृष्टिसे देखो तो जोब सदाकाल है,स्वाधीन है, एक है, और
अविनाशो है; पर्यायटृष्टिसे पराधोन, क्षणभंगुर, अनेकरूप और नाशबवान है,
सो जहाँ जिस अपेक्षासे कहा गया है उसे प्रमाण करना जाहिये।
विशेष :- जब जीवको कर्मरहित शुद्ध अवस्थापर दृष्टि डालो जाती
हैतब वह स्वाधोन है, जब उसकी कर्माधीन वशापर ध्यान दिया जाता है,
तब वह॒पराधोन है। लक्षणको हृष्टिसे सब जोवद्रग्य एक हैं, संख्याकी
हृष्टिसे अनेक हैं । जोव था, जोब है,जोव रहेगा, इस हृष्टिसे जीब सदाकाल
है,जीव गतिसे गत्यन्तरमें जाता है, इसलिये एक गतिमें सदाकाल नहों है ।
जीव पदार्थ कभो नष्ट नहीं हो जाता, इसलिये बहू अविनाशी है, क्षण-क्षणमें
परिणमन करता हैइसलिये वह अनित्य है ॥ ६ ॥
पदार्थ स्वचतुष्टयकी अपेक्षा अस्तिरूप और परचतुष्टयकी अपेक्षा

नास्तिरूप है। (सवेया इकतीसा)

दर्ब खेत काल भाव च्यारों भेद बस्तुहोमें,
अपने चतुष्क वस्तु अस्तिरूप मानिये।
परके चतुष्क वस्तु नासति नियत अंग,
ताकौ भेद दर्ब-परजाइ सध्य जानिये ॥।
दरव तो वस्तु खेत सत्ताभमुमि काल चाल,
स्वभाव सहज मूल सकति बखानिये ।
यहां 'नाही से नाशवानका अभिप्राय है ।
याही भांति पर विकलप बुद्धि कलपना,
वियहारद्विष्टि अंस भेद परवांनिये ॥ १०॥

शब्दार्थ – चतुष्क- चार-द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव । अस्ति> है। नासतिजनहीं है । नियतरनिश्चय । परजाइन्अवस्था । सत्ताभूमिर क्षैत्रावगाह ।

अर्थ :- द्रव्य, क्षेत्र, काल, माव ये चारों बस्तुहोमें हैं,इसलिये अपने चतुष्क अर्थात्‌ स्वव्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावकी अपेक्षासे वस्तु अस्तिस्वरूप है, और परचतुष्क अर्थात्‌ परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावकी अपेक्षा वस्तु नास्तिरूप है। इस प्रकार निश्चयसे द्रव्य अस्ति- नास्तिरूप है। उनका भेद द्रव्य और पर्यायमें जाना जाता है। वस्तुको व्रव्य, सत्तामूमिको क्षेत्र, वस्तुके परिणमनकों काल और वस्तुके मूल स्वभावकों भाव कहते हैं। इस प्रकार बृद्धिसे स्वचतुष्टय और परचतुष्टयकी कल्पना करना सो व्यवहार नयका भेव है। विशेष :- गुण-पर्यायोंके समृहको वस्तु कहते हें,इसोका नाम द्रव्य है। पदार्थ आकाशके जिन प्रवेशोंको रोककर रहता है, अथवा जिन भ्रदेशोंमें पदार्थ रहता है, उस सत्तामूमिको क्षेत्र कहते हैं। पदार्थके परिणमन अर्थात्‌ पर्यायसे पर्यायान्तररूप होनेको काल कहते हैं। और पदार्थके निजस्वभावको भाव कहते हैं। यही द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव पदार्थका चतुष्क अथवा चतुष्टय कहलाता है, यह पदार्थका चतुष्टय सदा पदार्थहीमें रहता है, उससे पृथक नहीं होता । जेसे - धटमें स्पश रस वा रूक्ष कठोर रक्त आदि गुण-पर्यायोंका समुदाय द्रव्य है,जिन आकाशके प्रदेशोंमें घटस्थित हैवा घटके प्रदेश उसका क्षेत्र है, घटके गुण-पर्यायोंका परिवर्तत उसका काल है, घटकी जलधारणा शक्ति उसका भाव है। इसी प्रकार पट भो एक पदार्थ है, घटके समान पटमें भी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव हैं। घटका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव घटमें नहीं; इसलिये घट अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे अस्तिरूप है औरहै, पटमें पटके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे नास्तिरूप है। इसी प्रकार पटका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव पटसें है,इसलिये पट अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे अस्तिरूप है, पटका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव घटमें नहीं है,इसलिये पट, घटके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे नास्तिरूप है॥ १० ॥

स्थाहाद हार ३१७

स्याद्गादके सप्त भंग (दोहा)

है नांही नांही सु है, है है नांही नांहि।
यह सरवंगी नय धनी, सब साने सबसांहि । ११॥।

शब्दार्थ :- हैलअस्ति । नांही>नास्ति । है नांही>अस्ति-नास्ति । नांही सु है+अवक्तव्य ।

अर्थ :- अस्ति, नास्ति, अस्ति नास्ति, अवक्तव्य, अस्ति अवक्तय्य, नाह्ति अवक्तव्य और अस्ति-नास्ति अवक्तव्य । ऐसे सात भंग होते हैं, सो इन्हें सर्वांग नयका स्वामों स्थाद्वाद सर्व वस्तुमें मानता है । विशेष :- स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभाव इस अपने चतुष्टयकी अपेक्षा तो व्रव्य अस्तिस्वरूप हैअर्थात्‌ आपसा है । परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परमभाव, इस परचतुष्टयकी अपेक्षा द्रव्य नास्तिस्वरूप है, अर्थात्‌ परसहश नहीं है । उपयुक्तस्वचतुष्टय परचतुष्टयकी अपेक्षा द्रव्य ऋमसे तोन कालमें अपने भावोंकर अस्ति-नास्तिस्वरूप हैं अर्थात्‌ आपसा है- परसहृश नहीं है। और स्वचतुष्टयकी अपेक्षा द्रव्य एकही काल वचनगोचर नहीं है, इस कारण अवक्तव्य हैअर्थात्‌ कहनेमें नहीं आता । और बहो स्वचतुष्टपकी अपेक्षा और एकहो काल स्व-पर चतुष्टयकों अपेक्षासे द्रव्य अस्तिस्वरूप है तथापि अवक्तव्य है। और वही द्रव्य परचतुष्टयकी अपेक्षा और एक हो काल स्व-पर चतुष्टयकी अपेक्षा नास्तिस्वरूप है, तथापि कहा जाता नहों । और वही द्रव्य स्वचतुध्टयकी अपेक्षा और परचतुष्टयकी अपेक्षा ओर एकही बार स्वपरचतुष्टयकी अपेक्षा अस्ति-तास्तिस्वरूप है, तथापि अवक्तव्य है । जेसे कि - एक हो पुरुष पुत्रकोीं अपेक्षा पिता कहलाता है, और वही पुरुष अपने विताकी अपेक्षा पुत्र कहलाता है, और वही पुरुष मासाकी अपेक्षा भानजा कहलाता है, ओर मानजेकी अपेक्षा मामा कहलाता है, स्त्रीकी अपेक्षा पति कहलाता है, बहिनको अपेक्षा भाई भी कहलाता है, तथा बहो पुरुष अपने बेरीको अपेक्षा शत्रु कहलाता है, और इष्टकी अपेक्षा मित्र भी कहलाता हैइत्यादि अनेक नातोंसे एक हो पुरुष कथंचित्‌ अनेक प्रकार कहा जाता है, उसी प्रकार एक द्रव्य सप्त भंगके द्वारा साधा जाता है। इन सप्ल भंगोंका विशेष स्वरूप सप्तभंगोतर गिणोआदि अन्यान्य जेनशास्त्रोंसे सम भना चाहिये ।। ११५

एकान्तवादियोंके चौदह नय-भेद (सवेया इकतीसा )

ग्यानकौ कारन शेय आतमा बत्रिलोकमय,
ज्ञेयसों अनेक ग्यान मेल ज्ञेय छांही है ।
जोलों ज्ञेग तौलों ग्यान सर्व द्वंम”ं विग्यान,
ज्ञेय क्षेत्र मान ग्यान जीव वस्तु नांही है ॥।
देह नसे जीव नसे देह उपजत लसे,
आतमा अचेतना है सत्ता अंस मांही है ।
जीव छिनभंगुर अग्यायक सहजरूपी ’ ग्यान,
ऐसी ऐसी एकान्त अवस्था मूढ़ पांही है ॥ १२ ॥

अर्थ :- (१) ज्ञेय, (२) त्रेलोक्यमय, (३) अनेकज्ञान, (४) शेयका प्रतिबिग्ब, (५) ज्ेय काल, (६) द्रव्यमय ज्ञान, (७) क्षेत्रयुत ज्ञान, (८) जोब नास्ति, (६) जीव विनाश, (१०) जीव उत्पाद, (११) आत्मा अचेतन, (१२) सत्ता अंश (१३) क्षणभंगुर और (१४) अज्ञायक। ऐसे चौदह नय हैं।सो जो कोई एक नयकी प्रहण करे और शेषको छोड़े, वह एकान्तो भिथ्यादृष्टि है। (१) जशेय - एक पक्ष यह हैकि ज्ञानके लिये शेय कारण है । (२) तलोक्य प्रमाण - एक पक्ष यह है कि आत्मा तोन लोकके बराबर है। हर बगकहह अनेक ज्ञान - एक पक्ष यह है कि ज्ञानमें अनेकता होनेसे ज्ञेय होते है (४) ज्ेयका प्रतिबिम्ब - एक पक्ष यह हैकि ज्ञानमें सेय प्रतिबिम्बित (५) शेय काल - एक पक्ष यह हैकि जब तक ज्ञेय हैतब तक ज्ञान है, ज्ेयका नाश होनेसे ज्ञानका भो नाश है । हे छ ‘सुरूुषी ज्ञान’ ऐसाभी पाठ है। स्थाह्दाद द्वार ३१६ (६) द्रव्यमय ज्ञान - एक पक्ष यह है कि सब द्रव्य श्रह्मसे अभिन्न हैं, इससे सब पदार्थ लानरूप हैं। (७) क्षेत्रयुत ज्ञान - एक पक्ष यह हैकि ज्ञेयके क्षेत्रके बराबर शान है इससे बाहर नहीं है । (८) जीवनास्ति - एक पक्ष यह हैकि जीवपदार्थका अस्तित्व ही नहीं, है।। (९६) जोव विनाश - एक पक्ष यह हैकि देहका नाश होते हो जोवका नाश हो जाता है । (१०) जीव उत्पाद - एक पक्ष यह हैकि शरोरकी उत्पत्ति होनेपर जीवकी उत्पत्ति होती है । (११) आत्मा अचेतन - एक पक्ष यह है कि आत्मा अचेतन है, क्योंकि ज्ञान अचेतन है । (१२) सत्ता अंश - एक पक्ष यह है कि आत्मा सत्ताका अंश है । (१३) क्षणभंगुर - एक पक्ष यह है किजोवका सदा परिणमन होता है, इससे क्षणभंगुर है । (१४) अज्ञायक - एक पक्ष यह है कि ज्ञानमें जाननेकी शक्ति नहीं है, इससे अज्ञायक है ।। १२१

प्रथम पक्षका स्पष्टीकरण और खण्डन (सवेया इकतीसा )

कोऊ मूढ़ कहै जेसें प्रथम सवारी भोंति,
पाछे ताक॑ ऊपर सुचित्र आछ्चयो लेखिए ।
तेसे मुल कारन प्रगट घट पट जंसो,
तंसो तहां ग्यानरूप कारज विसेखिए ।।
ग्यानी कहै जंसी वस्तु तेसो ही सुभाव ताकौ,
ताते ग्यान ज्ञेय भिन्न भिन्न पद पेखिए।
कारन कारज दोऊ एकहीमैं निहचे पे,
तेरो मत साचो विवहारदृष्टि देखिए ॥ १३॥॥।

शब्दार्थ :- भीति-दीवाल । आछघौ>उत्तम । मूल कारन मुख्य कारण । कारजल्‍कार्य । निहचे-निश्चयनयसे ।

अर्थ :- कोई अज्ञानी (मीमांसक आदि) कहते हैंकि पहले दोवाल साफ करके पोछे उसपर चित्रकारी करनेसे चित्र अच्छा आता है, और यदि दोवाल खराब हो तो चित्र मो खराब उघड़ता है, उसी प्रकार ज्ञानके मूल कारण घट-पट आदि शेय जंसे होते हैं,वेसा हो शानरूप कार्य होता है, इससे स्पष्ट हैकि ज्ञानका कारण ज्ञेय है। इसपर स्याद्वादी ज्ञानी संबोधन करते हैं किजो जैसा पदार्थ होता है, बसा ही उसका स्वभाव होता है, इससे भान और ज्ञेय भिन्न भिन्न पदार्थ हैं। निश्चयनयसे कारण और कार्य दोनों एक ही पदार्थमें हैं,इससे तेरा जो मन्तव्य हैवह व्यवहारनयसे सत्य है॥ १३ ॥

द्वितीय पक्षका स्पप्टीकरण और खण्डन (सर्वेया इकतीसा )

कोऊ मिथ्यामतो लोकालोक व्यापि ग्यान मानि,
समुर्के तिलोक पिड आतम दरब है।
याहीतें सुछंद भयौ डोल मुखह न बोलें,
कहे या जगतमें हमारोई परब है।
तासों ग्याता कहै जोबव जगतसों भिन्न पं,
जगतको विकासी तोहो याहीतें गरब है ।
जो वस्तु सो वस्तु पररूपसों निरालो सदा,
निह्च॑ प्रमान स्यादवादसै सरब है ॥ १४॥।
विश्व शानमिति प्रतकक्‍्यं सकल॑ हृष्ट्वा स्वतत्त्वाशया
मूत्वा विश्वसय’ पशु- पशुरिव स्वच्छान्दमाचेष्टले ।
पत्तत्ततपरखूपतों न तदिति स्थाद्वाददर्शों पुन-
विश्वाडिद्न्रमविश्वविश्वघटितं तस्य स्वतत्व स्पृशेतू ॥ ३ ॥
स्थाह्ाद हार ३२१

शब्दार्थ :- लोक" जहाँ छह द्रव्य पाये जाय । अलोकन-लोकसे बाहरका क्षेत्र । सुछुंद-स्वतत्र ।गरब>अभिमान ।

अर्थ :- कोई अज्ञानी (नंयायिक आदि) ज्ञानको लोकालोक व्यापी जानकर आत्म-पदार्थंको त्रेलोक्य-प्रमाण समझ बेठे हैं, इसलिये अपनेको सर्वव्यापी समभकर स्वतंत्र बतंते हैं, औरअभिमानमें मस्त होकर दूसरोंको मूर्ख समझते हैं, किसीसे बात भी नहीं करते और कहते हैं कि संसारमें हमारा ही सिद्धान्त सच्चा है। उनसे स्थाहादी शञानी कहते हैं कि जीव जगतसे जुदा है, परन्तु उसका ज्ञान त्रेलोक्यमें प्रसारित होता है इससे तुझे ईश्वरपनेका अभिमान है, परन्तु पदार्थ अपने सिवाय अन्य पदा्थोंसे सदा निराला रहता है, सो निश्चयनयसे स्पाद्वादमें सब गर्भित है ॥ १४ ॥

तृतीय पक्षका स्पष्टीकरण और खण्डन (सवेया इकतीसा )

कोऊ पसु ग्यानकी अनंत विचित्राई देखे,
शेयक अकार नानारूप विसतरधचों है।
ताहीको विचारि कहे ग्यानकी अनेक सत्ता,
गहिके एकंत पच्छ लोकनिसों लरचो है ।।
ताको अ्रम भंजिवेकौ ग्यानवंत कहे ग्यान,
अगम अगाध निराबाध रस भरधो है।
ज्ञायक सुभाई परजायसों अनेक भयो,
जशपि तथापि एकतासों नहिं टरयो है ॥ १५ ॥

शब्दार्थ :- पसु>मूख । विसतरधौ<फेला । लरधौ>भगड़ता है। भजिवेकौ >नष्ट करनेके लिये । बाह्मार्थग्रहुणस्वभावभरतो. विष्वग्विथित्रोल्लसद- शेयाकार विशो्णशक्तिरभितस्त्रुटन्पशुन श्यति । एकद्रव्यतथा सदा व्युवितया भेदघ्र्म ध्वंसय- स्तेक ज्ञानमबाधितानुभवन पश्यत्यनेकान्तवित्‌ ॥ ४ ॥

लक असम जम नकल हनन जीवित>ककनव अप ३०० गम भी तुलइ मु
लुरा॥रुक ३३_ जरा 24 >> था ७छचछछ

अर्थ :- अनन्त शेयके आकाररूप परिणमन करनेसे ज्ञानमें अनेक विचित्रताएं दिखतो हैं,उन्हें विचारकर कोई कोई पशुवत्‌ अज्ञानों कहते हैं कि ज्ञान अनेक हैं,और इसका एकान्त पक्ष प्रहण करके लोगोंसे भगड़ते हैं। उनके अज्ञान हटानेके लिये स्थाह्ादो ज्ञानी कहते हैं किशञान अगस्य, गंभीर, और निराबाध रससे परिपूर्ण है। उसका ज्ञायकस्वभाव है, सो बह यद्यपि पर्यायदृष्टिसे अनेक है, तो मी द्रव्यटश्सि एक हो है ॥ १५ ॥

चतुर्थ पक्षका स्पष्टीकरण और खण्डन (सवैया इकतीसा )

कोऊ कुधी कहै ग्यान मांहि ज्ेयकी अकार,
प्रतिभासि रह्मौ हैकलंक ताहि धोइये ।
जब ध्यान जलसों पखारिक धवल कीजे,
तब निराकार सुद्ध ग्यानमय होइये ॥।
तासों स्थादवादी कहै ग्यानको धुभाव यहै,
ज्ञेयको अकार वस्तु मांहि कहां खोइये ।
जैसे नानारूप प्रतिबिबकी भलक दीखें,
जद्यपि तथापि आरसी विमल जोइये ॥ १६॥।

शब्दार्थ :- कुधी >मूर्ख । प्रतिभासि"कऋलकना । कलकल्दोध । पखाश्कि८घोकरके ।धवल- उज्ज्वल । आरसी नदर्पण। जोइये-देखिये ।

अर्थ :- कोई जलवस्‍्ते कहते हैं किज्ञानमें जेयका आकार भलकता है, यह ज्ञानका दोष है, जब ध्यानरूप जलसे ज्ञानका यह दोष धोकर साफ किया जावे तब शुद्ध ज्ञान निराकार होता है। उनसे स्पाहादी ज्ञानी कहते हैं कि ज्ञानका ऐसा हो स्वभाव है, ज्ञेवकका आकार जो ज्ञानमें भलकता है, बह शेयाकारकलडुमेचकचिति प्रक्षालन कल्पय- स्नेकाकारचिकीषंया स्फुटमपि ज्ञान पशुनेंच्छति । वेचित्येप्प्य विच्रित्रतामुपगत ज्ञानं स्वतः क्षालितं पर्यायेस्‍तवनेकतां. परिमृशन्पश्यत्यनेकान्तवित्‌ ॥५॥॥ कहाँ भगा दिया जावे ? जिस प्रकार दपंणमें मच्चपि अनेक पदार्थ प्रतिबिस्बित होते हैं, तोभो दर्पण ज्योंका त्यों स्वच्छ ही बना रहता है, उसमें कुछ भी बिकार नहीं होता ॥१६।॥।

पंचम पक्षका स्पष्टीकरण और खण्डन (सर्वेया इकतीसा )

कोऊ अज्ञ कहे शेयाकार ग्यान परिनाम,
,._ जोलों विद्यमान तोलों ग्यान परगट है।
शेयके विनास होत ग्यानकौ विनास होड़,
ऐसी वाक हिरदे मिथ्यातकी अलट है ॥॥
तासों समकितवंत कहे अनुभो कहानि,
पर्जयप्रवांन ग्यान नानाकार नह है।
निरविकलप अविनस्वर दरबरूप,
ग्यान शेय वस्तुसों अव्यापक अघट है ॥ १७॥

शब्दार्थ :- अज्ञ>अज्ञानी । विद्यमानल्‍मौजूद । कहानिल्‍्कथा। पेय प्रवांन ल्‍पर्यायके बराबर । नानाकार>अनेक आकृति। अव्यापक८ एकमेक नहीं होने वाला । अधट नही घटती अर्थात्‌ नहीं बैठती ।

अर्थ :- कोई कोई अज्ञानी कहते हैं कि ज्ञानका परिणमन शेयके आकार होता है, सो जब तक शेय विद्यमान रहता है तब तक शान प्रगट रहता है, और ज्ञेयके विनाश होते ही ज्ञान नष्ट हो जाता है, इस प्रकार उसके हृदयमें सिथ्यात्वका दुराग्रह है। उनसे भेदविशानी अनुमवकी बात फहते हैं किजिस प्रकार एक ही नट अनेक स्वांग बनाता है, उसोप्रकार एक ही शान पर्यायोंके अनुसार अनेक रूप धारण करता है। वास्तवमें ज्ञान निविकल्प और नित्य पदार्थ है, वह शेयमें प्रवेश नहों करता, इसलिये ज्ञान और ज्ञेयकी एकता नहीं घटती ॥११७॥॥

प्रत्यक्षालिखितस्फुटस्थिरपरव्रष्याध्तितावश्चितः
स्वष्रध्यानवलोकनेन परितः शून्य पशुनेश्यति ।
स्वद्रव्यास्तितया निरूष्य निपुर्ण सच्च; समुन्मज्जता
स्पाद्ादी तु विशुद्धधोघमहसा पूर्णों भवन्‌ जीवति ॥ ६ ॥
ग्यानकी सकति साधि अनुभो दसा अराधि,
करमकों त्यागिकं परम रस पीजिये ॥ २० ॥

शब्दार्थ :- जीजिये-जीना होगा । खेद खिन्न>दु खी । विरचि८ विरक्त होकर । अराधिःआराधना करके । सत्यवादी>पदार्थका यथार्थ स्वरूप कथन करनेवाला ।

अर्थ :- कोई कोई शून्यवादो अर्थात्‌ नास्तिक कहते हैं, ज्ेयका नाश होनेसे शञानका नाश होना सम्भव है, ओर ज्ञान जोबका स्वरूप है, इसलिये ज्ञानका नाश होनेसे जीवका नाश होना स्पष्ट है, तो फिर ऐसी दशामें क्योंकर जीवन रह सकता है, अत: जोबकी नित्यताके लिये ज्ञानमें शेयाकार परिणमनका अभाव सानना चाहिये। इसपर सत्यवादो ज्ञानी कहते हैंकि है भाई ! तुम व्याकुल मत होओ, ज्ेयसे उदासीन होकर ज्ञानको उससे पृथक मानो, तथा ज्ञानकी ज्ञायक शक्ति सिद्ध करके अनुभवका अभ्यास करो और कर्मबन्धनसे मुक्त होकर परमानन्दसय अमृतरसका पान करो ॥ २० ॥

नववे पक्षका स्पष्टीकरण और खण्डन (सर्वेया इकतीसा )

कोऊ क्र कहै काया जोव दोऊ एक पिड,
जब देह नसंगी तबही जीव मरंगोौ।
छायाकौसो छल किधों मायाकौसो परपंच,
कायामें समाइ फिरि कायाकौ न धरंगौ ।।
सुधी कहे देहसों अव्यापक सदोव जीब,
समे पाई परकौ समत्व परिहरंगौ।
अपने सुभाई आई धारना धराम धाइ,
आपम मगन ह्ंके आप सुद्ध करेंगौ ॥२१॥
पूर्वालस्थितबोध्यनाशसमसये ज्ञानस्थ नाशं विवन्‌
सोदत्येव न किड्चनापि कलयस्नस्यन्ततुच्छ: पशु ।
अस्तित्व निजकालतो5स्य कलयन्‌ स्थाह्ादवेदी पुन.
पूर्णस्तिष्ठति बाह्यवस्तुषु मुहुभृत्वा विनइयत्स्वपि ॥ १० ॥

शब्दार्थ :- क््र>मूर्ख । परपंचल्ठगाई । सुधीरसम्यण्ज्ञानी । परिहरेंगौ>छोड़ेगा । धराज्धरती ।

अर्थ :- कोई कोई सूर्ख चार्वाक कहते हैं किशरोर और जीव दोनोंका एक पिण्ड है, सोजब शरीर नष्ट होगा तब जीव भी नष्ट हो आायगा; जिस प्रकार व॒क्षके नष्ट होनेसे छाया नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार शरोरके नाश होनेसे जीव भी नाश हो जायगा । यह इन्द्रजालियाकी सामाके समात कोतुक बन रहा है, सो जीवात्मा दीपककी लो (ज्योत) के प्रकाशके समान शरीरसें समा जायगा, फिर शरोर धारण नहों करेगा । इसपर सम्परजानों कहते हैँ कि जीव पदार्थ शरीरसे सर्देव भिन्न है, सोकाललब्धि पाकर परपदार्थासे ममत्व छोड़ेगा, और अपने स्वरूपको प्राप्त होकर निजात्ममूमिसें विश्राम

करके उसोमें लोन होकर अपनेको आपही शुद्ध करेगा ।॥॥ २१ १ पुन: (दोहा)

ज्यों तन कंचुक त्यागसों, बिनसे नांहि भुजंग ।
त्याँ सरीरके नासते, अलख अखंडित अंग ॥ २२ ॥
शबदार्थ :- कचुक>काँचली । भुजग>साँप। अखडित>अविनाशी ।

अर्थ :- जिस प्रकार काँचलीके छोड़नेसे सपं नष्ठ नहीं हो जाता, उसी प्रकार शरोरका नाश होनेसे जीव पदार्थ नष्ट नहीं होता ॥१ २२ ॥॥

दसवे पक्षका स्पष्टीकरण और खण्डन (सवेया इकतीसा )

कोऊ दुरबुद्धी कहै पहले न हुतो जीव,
देह उपजत अब उपज्यो है आइकं ।
अर्थालस्थनकाल एवं कलयनु ज्ञानस्थ सस्‍्य बहि-
शेंयालम्बनलालसेन मनसा ज्ाम्यन्‌ पशुनश्यति ।
नास्तित्वं परकालतोउस्प कलयन स्थाद्ादवेदी पुन-
स्तिष्ठत्थात्मनिखातनित्यसहुजज्ञानकपुझ्जी
भवन्‌ ।4१११)
जौलों देह तौलों देहधारी फिर देह नस,
रहैगो अलख जोति जोतिसे समाहइके ।।
सदबुद्धी कहै जीव अनादिको देहधारो,
जब ग्यानी होइगो कबहूं काल पाइक ।
तबहीसों पर तजि अपनों सरूप भजि,
पावगो. परसपद करम नसाइक ॥ २३ ॥

अर्थ :- कोई कोई मूर्ख कहते हैं किपहले जीव नहीं था, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँच तत्त्वमय शरोरके उत्पन्न होनेपर ज्ञान- शक्तिरूप जीव उपजता है, जबतक शरोर रहता है तबतक जोव रहता है, और शरीरके नाश होनेपर जीवात्माकी ज्योतिरें ज्योति समा जाती है। इसपर सम्यग्जानी कहते हैकि जीव पदार्थ अनादि कालसे देह धारण किये हुए है, नवीन नहीं उपजता, और न देहके नष्ट होनेसे बह नष्ट होता है, कभी अवसर पाकर जब शुद्ध ज्ञान प्राप्त करेगा, तब परपदार्थोसे अहंब॒द्धि छोड़कर आत्मस्वरूपको प्रहण करेगा और अष्ट कर्मोका विध्यंस करके निर्वाणपद पावेगा ॥ २३ ॥

ग्यारहवे पक्षका स्पष्टीकरण और खण्डन (सर्वया इकतीसा )

कोऊ पक्षपाती जीव कहे ज्ञेयकं अकार,
परिनयो ग्यान तात चेतना असत है।
जेयके नसत चेतनाकौ नास ता कारन,
आतमा अचेतन त्रिकाल मेरे मत है॥
पंडित कहत ग्यान सहज अखंडित है,
शेयकोी आकार धर ज्ञेयसाँ बिरत है।
विश्वास्त;। परभावभावकलना
स्नित्यं बहिवस्तुषु
नश्यत्येव पशु स्वभावमहिमन्येकान्तनिश्यतन ।
सर्वस्मान्नियतस्वभावभवनज्ञानादिभक्तोी.. भवन
स्पाद्रादों तुन नाशमेति सहजस्पष्टीकतप्रत्यय ॥ १२ ॥
स्थाहाद द्वार ३२६
चेतनाकौाौ नास होत सत्ताकौं विनास होह,
यात॑ ग्यान चेतना प्रबांन जीव तत है ॥ २४ ॥

शब्दार्थ :- पक्षपाती >हठग्राही । असतन्सत्ता रहित । सहज- स्वाभाविक । विरत-विरक्त । ततन्‍्तत्त्व ।

अर्थ :- कोई कोई हटठग्राही कहते हैं किलेयके आकार शानका परिण- मन होता है, भोर आकार परिणमन असत्‌ है, इससे चेतनाका अमाव हुआ, शेयके नाश होनेसे चेलनाका नाश है, इसलिये मेरे सिद्धान्तमें आत्मा सदा अखेतन है। इसपर स्याद्रादी शञानी कहते हैं किशानस्वभावसे हो अविनाशी है, वह शेयाकार परिणमन करता है, परन्तु शेयसे भिन्न है, यदि शञान- चेतनाका नाश मानोगे तो आत्मसत्ताका नाश हो जायेगा, इससे जीव तत्त्वको ज्ञानचेतनापुक्त मानना सम्पर्जान है ॥ २४ ॥

बारहवे पक्षका स्पष्टीकरण और खंडन (सर्वेया इकतीसा )

कोऊ महाभ्रख कहत एक पिंड मांहि,
जहांलों अचित चित अंग लहलहै है ।
जोगरूप भोगरूप नानाकार शेयरूप,
जेते भेद करमके तेते जीब कहे है ।।
मतिमान कहे एक पिड मांहि एक जीव,
ताहीके अनंत भाव अंस फंलि रहे है।
पुग्गलसों भिन्न कर्स जोगसों अखिन्न सदा,
उपज बिनसे थिरता सुभाव गहे है ॥ २५ ॥
अध्यास्पात्मनि सर्वभावभवन शुद्धस्वभावच्युतः
सबत्राप्यनिवारितो गतभय:ः स्वरं पशु: क्रोड़ति ।
स्थाह्ाादी तु विशुद्ध एवलसति स्वस्थ स्वभाव भरा-
दारूढ: परभावभावविरहव्यालोकनिष्कस्पित: ॥ १३ ॥

शब्दार्थ :- अचित>अचेतन-जड । चितन्चेतन । मतिमान> बुद्धिमान् - सम्यग्ज्ञानी ।

अर्थ :- कोई कोई मूर्ख कहते हैकि एक शरोरमें जबतक चेतन- अच्षेतन पदार्थोंके तरंग उठते हैं, तबतक जो जोगरूप परिणमे बह जोगी जीव और जो भोगरूप परिणमे वह भोगी जीव है, ऐसे ज्ञेयरूप क्रियाके जितने भेद होते हैं जीवके उतने भेद एक देहमें उपजते हैं, इसलिये आात्म- ससाके अनंत अंश होते हैं। उनसे सम्यग्ज्ञानी कहते हैं किएक शरीरमें एकही जीव है,उसके ज्ञानगुणके परिणमनसे अनंत भावरूपष अंश प्रगट होते हैं। यह जीव शरीरसे पृथक है, कमंसंयोगसे रहित हैऔर सवा उत्पाद- व्यय-भ्रोव्यगुणसम्पन्न है॥ २५ ॥

तेरहवे पक्षका स्पष्टीकरण और खंडन (सर्वया इकतीसा )

कोऊ एक छिनवादी कहे एक पिड मांहि,
एक जोव उपजत एक विनसत है।
जाही समे अंतर नवीन उतपति होइ,
ताही समे प्रथम पुरातन बसत है।॥।
सरवांगवादी कहे जेस जल वस्तु एक,
सोई जल विविध तरंगनि लसत है।
तेसे एक आतम दरब गुन परजंसों,
अनेक भयो पे एकरूप दरसत है ॥२६॥।

शब्दार्थ :-सरवागवादी -अनेकान्तवादी । तरगनि*लहरो ।

अर्थ :- कोई कोई क्षणिकवादी-बोद्ध कहते हैं कि एक शरीरमें एक जीव उपजता और एक नष्ट होता है, जिस क्षणमें नवीन जीव उत्पन्न होता हैउसके पूर्वसमयमें प्राचोन जोव था। उनसे स्याद्वादी कहते हैं कि जिस प्रादुभविविराममुद्रितवहज्शानांशनानात्मना निर्शानातक्षणभड्भसड्भयतित: प्राय. पशुन॑श्यति । स्थाद्वादी तु चिदास्मना परिमृशं श्रिहस्तुनित्योदितं टड्जेत्कीणंघतस्वभावमहिमज्नानं भवन. जीवति ॥१४॥ व्याहाद द्वार रे३१ प्रकार पानी एक पदार्थ है बहो अनेक लहरोंरूप होता है, उसी प्रकार आत्मद्रव्य अपने गुणपर्यायोंसे अनेकरूप होता है, पर निश्चयनयसे एकरूप दिखता है ॥ २६ ॥

चौदहवें पक्षका स्पष्टीकरण और खंडन (सवैया इकतीसा )

’ कोऊ बालबुद्धी कहे ग्यायक सकति जोलों,
तोलों ग्यान असुद्ध जगत् मध्य जानिये ।
ज्ञायक सकति काल पाइ मिटि जाइ जब,
तब अविरोध बोध विमल बखानिये ।।
परम प्रवीन कहै ऐसी तो न बने बात,
जेसे बिन परगास सूरज न मानिये।
तेसे बिन ग्यायक सकति न कहावे ग्यान,
यह तो न परोच्छ परतच्छ परवांनिये ॥ २७ ॥

शब्दार्थ :- बालबुद्धी -अज्ञानी । परम प्रवीन"सम्यग्ज्ञानी ।परगास (प्रकाश) >उजेला । परतच्छ-साक्षात्‌ ।

अर्थ :- कोई कोई अज्ञानी कहते हैं किजबतक ज्ञप्नमें ज्ञायकशक्ति है, तबतक वह ज्ञान संसारमें अशुद्ध कहलाता है, भाव यह है कि ज्ञायकशक्ति ज्ञानका दोष है, ओर जब समय पाकर ज्ञायकशक्ति नष्ट हो जातो है, तब ज्ञान निविकल्प और निर्मल हो जाता है। इसपर सम्यम्ज्ञानी कहते हैं कि यह बात अनुभवमें नहीं आती, क्योंकि जिस प्रकार बिना प्रकाशके सूर्य नहीं हो सकता, उसी प्रकार बिना ज्ञायकशक्तिके ज्ञान नहीं होसकता, इसलिये तुम्हारा पक्ष प्रत्यक्षप्रभाणसे बाधित है ॥ २७ ॥

ट्जूकीण विशुद्धधो पविस राकाराश्मतस्वाशया
वाजछत्पुर्छलदच्छुचित्परिणतेभिस्न पशु: किड्चम ।
ज्ञानं.। नित्यमनित्यतापरिगमेपप्यासादयत्युम्बलं
स्थाद्ादी तदनित्यतां परिभर्शश्रिद्वस्तुव॒त्तिकृुमात्‌ (१५।।

स्याद्वादकी प्रशसा (दोहा)

इहि विधि आतम ग्यान हित, स्थादवाद परवांन ।
जाके वचन विचारसों, म्रव होइ सुजान ॥ २८ ॥
स्थादवाद आतमस दशा, ता कारन बलवान ।
सिवसाधक बाधा रहित, अखे अखंडित आन ॥ २६ ॥

अर्थ :- इस प्रकार आत्मज्ञातके लिये स्याद्वाद हीसमर्थ है, इसके बचन सुनने व अध्ययन करनेसे अज्ञानी लोग पंडित हो जाते हैं ॥ २८ ॥ स्थाह्रादसे आत्माका स्वरूप पहिचाना जाता है, इसलिये यह शान बहुत बलवान है, मोक्षका साधक है, अनुमान-प्रभाणकी बाधासे रहित है, अक्षय है, इसको आज्ञावादी प्रतिवादी खंडन नहीं कर सकते ॥ २६ ॥ ग्यारहवें अधिकारका सार जेनधमंके महत्वपूर्ण अनेक सिद्धान्तोंमें स्थाद्वाद प्रधान है, ज॑नधर्मको जो कुछ गोरव है, वह स्थाद्वादका है। यह स्याह्वाद अन्य धर्मोको निमूल करनेके लिये सुदर्शन-चक्रके समान है, इस स्थाद्वादका रहस्य समझना कठिन नहीं हैपरन्तु गृढ़ अवश्य है, और इतना गूढ़ हैकि इसे स्वामी शंकराचार्य वा स्वामी दयानन्द सरस्वती जसे अजेन विद्वान् नहीं समझ सके, और स्थाह्रादका उलटा खण्डन करके जनधमंको बड़ा धक्का दे गये । इतना ही नहीं आधुनिक कई विद्वान् इस धरंपर नास्तिकपनेका लाऊछन लगाते हैं। हर पदार्थमें जोअनेक धर्म होते है, वेसबएक साथ नहीं कहे जा सकते, क्योंकिशब्दमें इतनी शक्ति नहों जोकि अनेक धर्मोको एक साथ कह सके, इत्यशानविमृढानां. ज्ञानमात्र. प्रसाधयनु । आत्मतत्त्वमनेकान्तः स्वयमेबानुमूयते ॥१६॥! एवं तत्त्वव्यवस्थित्या स्व॑ व्यवस्थापयन्स्वयम । अलंध्यं शासन जनमनेकान्तो श्यवस्थितः ॥१७॥। इति स्याद्वादाधिकार. । इसलिये किसी एक धर्मको सुख्य और शेषकों गोण करके कथन किया जाता है। ‘स्वामिकासिकेयानुप्रेक्षा’ में कहा है:- णाणाधम्मजुद्दं पि य एयं धस्मं॑ पि वच्चदे अत्थं ! तस्सेयविवकक्‍्वादो णत्यि विवक्‍्खाहु सेसाणं ॥ २६४ ॥

अर्थ :- इसलिये जिस धर्मका जिसकी अपेक्षा कथन किया गया है वह धर्म, जिस शब्दसे कथन किया गया हैवह शब्द, और उसको जाननेवाला ज्ञान ये तीनों नय हैं । कहा भी हैकि :- सो चिय इक्को धम्मो वाचयसहो थि तस्स धम्मस्स । त॑ जाणदि तं॑ णाणं ते तिण्णि विणय बिसेसा य॥॥

अर्थ :- हमारे नित्यके बोलचाल भी नय-गर्भित हुआ करते है, जेसे जब कोई मरणोन्मुख होता है,तब उसे साहस देते हैं किजीव नित्य है, जीव तो मरता नहों है,शरोररूप वस्त्रका उससे सम्बन्ध है,सो वस्त्रके समान शरीर बदलना पड़ता है। न तो जीव जन्मता है, न मरता है, और न घन संतान कुटुम्ब आदिसे उसका नाता है, यह जो कुछ कहा गया हैवह जीव पदार्थके नित्यधर्मंकी ओर हृष्टि देकर कहा गया है। पश्चात्‌ जब बह मर जाता है, ओर उसके सम्बन्धियोंको सम्बोधन करते हैंतब कहते हैं किसंसार अनित्य है, जो जन्मता हैवह मरता ही है, पर्याधोंका पलटना जीवका स्वभाव ही है, यह कथन पदार्थके अनित्य धर्मकी ओर दृष्टि रखकर कहा है। कुन्दकुन्द- स्वामीने पंचास्तिकायमें इस विषयको खूब स्पष्ट किया है, स्वामोजीने कहा हैकि जीवके चेतना उपयोग आवि गुण हैं,नर नारक आदि पयरयें हैं। जब कोई जीव मनुष्य पर्यायसे देव पर्यायमें जाता है, तब मनुष्य पर्यायका अभाव (व्यय) और देव पर्यायका सद्भाव (उत्पाद) होता है, परन्तु जीव न उपजा है न मरा है, यह उसका ध्र्‌व धर्म है, बस ! इसीका नाम उत्पाद- व्यय-प्रोग्य है । सो चेव जादि मरणं जादि ण णट्टरोी ण चेव उप्पण्णो । उप्पण्णो य विणट्रो देवों सणुसुत्ति पज्ञाओं ॥ १८ ॥

(पंचास्तिकाय पृ० ३८)

अर्थ :- बह ही जीव उपजता है, जोकि मरणभाषको प्राप्त होता है, स्वभावसे वह जोब न विनशा हैऔर न निश्चयसे उपजा है, सदा एकरूप है तब कौन उपजा और विनशा है? पर्याय ही उपजी और पर्याय ही विनशी है, जैसे कि देव पर्याय उत्पन्न हुई है, मनुष्य पर्याय नष्ट हुई है, यह पर्यायका उत्पाव-ध्यय है । जीवको प्रौव्य जानना । एवं. भावभभाव॑ भावाभाव॑ अभावभाव॑ च। गुणपज्जयेहि सहिदों संसरमाणो कुणदि जीवों ॥ २१ ॥

(पचास्तिकाय पृ० ४५)

अर्थ :- पर्यायाथिक नयकी विवक्षासे पंचपरावतंनरूप संसारमें भ्रमण करता हुआ यह आत्मा देवादिक पर्यायोंको उत्पन्न करता है, सनुष्यादि पर्यायोंकी नाश करता है, तथा विद्यमान देवादिक पर्यायोंके नाशका आरम्म करता है, और जो विद्यमान नहीं है मनुष्यादि पर्याय उनके उत्पादका आरम्भ करता है । ख़ब स्मरण रहे नयका कथन अपेक्षित होता है, और तभी वह सुनय कहलाता है; यदि अपेक्षा रहित कयन किया जावे तो वह नय नहीं कुनय है। ते साविक्वा सुणया णिरविक्खा ते वि दृष्णया होंति । सयलववहारसिद्धी सुणयादों होदि णियसेण ॥।

अर्थ :- ये नय परस्पर अपेक्षा सहित हों तब तो सुनय हैं,और वे ही जब अपेक्षा रहित ग्रहण किये जाँय तब दुनंथ हैं; सुनयसे सर्व व्यवहारको सिद्धि होतो है । अन्य मतावलंबी भो जोब पदार्थके एक ही धर्मंपर हृष्टि देकर मस्त हो गये हैं, इसलिये जेनमतमें उन्हे ‘मतवारे”’ कहा है। इस अधिकारमें चोदह मतवालोंको सम्बोधन किया है, और उनके माने हुए प्रत्येक धर्मका समर्थन करते हुए स्थाद्वादको पुष्ट किया है। ) पागल ।

साध्य-साधक द्वार (१२)

प्रतिज्ञा (दोहा )

स्पादवाद अधिकार यह, कह्ञलाँ अलप विसतार ।
अमृतचंद मुनिवर कहे, साधक साध्य दुवार ॥ १॥

शब्दार्थ :- साध्य>जोी सिद्ध करने योग्य है- इष्ट । साधक>जों साध्यको सिद्ध करे ।

अर्थ :- यह॒स्थाहाद अधिकारका संक्षिप्त वर्णन किया; अब श्री अमृतचनद्र मुनिराज साध्य-साधक द्वारका वर्णन करते हैं ॥ १ ॥

(सर्वेया इकतीसा )

जोई जीव वस्तु अस्ति प्रमेय अगुरुलघु,
अभोगी अमुरतीक परदेसबंत है।
उतपतिरूप नासरूप अविचलरूप,
रतनत्रयादि गुनभेदसों अनंत है ।।
सोई जीव दरब प्रमान सदा एकरूप,
ऐसो सुद्ध निहचे सुभाउ निरतंत है।
स्थादवाद मांहि साध्य पद अधिकार कह्मौ,
अब आगे कहिवेकों साधक सिद्धंत है ॥ २॥।

शब्दार्थ :- अस्ति- था, है,और रहेगा। प्रमेय > * प्रमाणमें आने योग्य । ) सम्प्ज्ञान प्रमाणम्‌ । इत्याद्यनेकनिजशक्तिसु निर्भ रोईपि यो ज्ञानसात्रमयतां न जहाति भाव: । एवं क्रमाक्रमविवर्तिविवर्तत्िश्र तद॒द्रव्यपयंयमयं चिदिहास्ति वस्तु ॥ ११॥

'०७७७-७७-५»>०७५३५३०५७७७५५७३.७५७७8५3५33०० काम ५३)५५५५५४५५३५५५+& ५७भमकथन 33५५3५७३3७स्‍ न+3५933७3३ 093
नममन+++++५स ७9७३७ न ननननननन्‍न
अगुरुलघुड्न भारी न हलका। उतपतिनवीत पर्यायका प्रगट होना ।
नासपूर्व पर्यायका अभाव । अविचलन प्रौव्य ।

अर्थ :- यह जीव पदार्थ अस्तित्व, प्रमेयत्व, अगुरुलघुत्व, अभोकवषतृत्व, अमू्तिकत्व, प्रवेशत्व सहित है । उत्पाद-व्यय-प्रौव्य वा वर्शन-ज्ञान-चा रित्र आदि गुणोंसे अनंतरूप है। निश्चयनयमें उस जोब पदार्थका स्वाभाविक धर्म सदा सत्य और एकरूप है। उसे स्याद्राद अधिकारमें साध्यस्वरूप कहा, अब आगे उसे साधकरूप कहते हैं॥ २ ॥

जीवकी साध्य-साधक अवस्थाओका वर्णन (दोह,)
साध्य सुद्ध केवल दशा, अथवा सिद्ध महंत ।
साधक अविरत आदि बुध, छीन मोह परजंत ॥ ३॥।

शब्दार्थ :- सुद्ध केवल दशा-तेरहवे और चौदहवे गुणस्थानवर्ती अरहत । सिद्ध महतरजीवकी अप्टकर्म रहित शुद्ध अवस्था । अविरत बुध-चौथे गुणस्थानवर्ती अव्नतसम्यग्टृष्टि । खीनमोह (क्षीणमोह )>वारहवे गुणस्थानवर्ती सर्वथा निर्मोही । अथे :- केवलशानी अरहूंत वा सिद्ध परमात्मपद साध्य हैओर अश्वत सम्यस्टृष्टि अर्थात्‌ चतुर्थ गुणस्थानसे लगाकर क्षीणमोह अर्थात्‌ बारहवें गुणस्थानपर्यत नव गुणस्थानोमेंसे किसो भी गुणस्थानका धारक ज्ञानी जीव साधक है ।। ३ १।

साधक अवस्थाका स्वरूप (सर्वया इकतीसा )

जाको अधो अप्रब अनिवृति करनको,
भयोौ लाभ भई गुरुवचनकों बोहनो ।
जाक॑ अनंतानुबंधी फ्रोध मान माया लोभ,
अनादि मिथ्यात मिश्र समकित मोहनी ।॥।
सातों परकिति खपां किवा उपसमी जाके,
जगोी उर मांहि समकित कला सोहनी ।
सोई मोख साधक कहायो ताके सरबंग,
प्रगटो सकति गुन थानक अरोहनी ॥ ४ ॥

शब्दार्थ :- अधःकरण"-जिस करणमें (परिणाम-समूहमें )उपरितन- समयवर्ती तथा अधस्तनसमयवर्ती जीवोंके परिणाम सहश तथा विसहृश हों । अपूवंकरण*>जिस करणमें उत्तरोत्तर अपूर्व ही अपूर्व परिणाम होते जाय॑, इस करणमें भिन्नसमयवर्ती जीवोंके परिणाम सदा विसहृश ही रहते हैं, और एकसमयवर्ती जीवोंके परिणाम सहश भी और विसहृश भी रहते हैं। अनिवृत्तिकरण२>जिस करणमें भिन्नसमयवर्ती जीवोंके परिणाम विसहृश ही हों और एकसमयवर्ती जीवोंके परिणाम सहश ही हों । बोहनी (वोधनी ) > उपदेश । खपीरूसमूल नष्ट हुई। किवा>अथवा । सोहनी> सुहावती । अरोहनी चढनेकी ।

अर्थ :- जिस जीवको अध:ः, अपूर्व, अनिवृत्तिरूप* करणलब्धिकी प्राप्ति हुई है और श्रीगुरुका सत्य उपदेश मिला है, जिसकी अनंतानुबंधो क्रोध, समान, साया, लोभ तथा मिथ्यात्व, सिश्व, सम्यक्त्व मोहनीय ऐसी सात प्रकृतियाँ सर्वेथा क्षय वा उपशम हुई हैं, वा अंतरंगमें सम्बग्दशनकी सुन्दर किरण जागृत हुई हैवही जीव सम्यग्हृष्टि मुक्तिका साधक कहलाता है। उसके अंतरंग और बाह्दा, सर्व अंगमें गुणस्थान चढ़नेकी शक्ति प्रगट होती है॥ ४ ॥

(सोरठा )

जाके मुकति समीप, भई भवस्थिति घट गई ।
ताकी मनसा सीप, सुग्ुरु मेघ मुकता वचन ॥ ५ ॥

शब्दार्थ :- भवस्थिति>भव-भ्रमणका काल । मुकतान्मोती ।

अर्थ :- जिसकी भवस्थिति घट जानेसे अर्थात्‌ किचित्‌ न्यून अभंपुद्गल- परावत्तन कालमात्र शेष रहनेसे मुक्ति-अवस्था समीप आ गई है, उसके मन- रूप सीपमें सदगुरु सेघरूप और उनके वचन सोतीरूप परिणमत करते हैं। भाज यह कि ऐसे जोधोंको ही भ्रीगुरुके वजन रुचिकर होते हैं॥ ५ ॥ १.२…» इन्हे विशेष समभनेके लिये ग्रोम्मटसार जीवकांडका अध्ययन करना बाहिये और सुशीला उपन्यासके पृष्ठ २४७ से २६३ तकके पृष्ठोंमें इसका विस्तारसे वर्णन है । ४ इन तीनों करणोके परिणाम प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धता लिये होते हैं। रेरे८ समयसार माटक

सदयुरुको मेघकी उपमा (दोहा)

ज्यों वरषे वरषा समे, मेघ अखंडित धार ।
त्यों सदगुरु बानी खिरे, जगत् जीव हितकार ॥ ६ ॥

शब्दार्थ :- अखडित धार-लगातार । वानी (वाणी )>वचन ।

अर्थ :- जिस प्रकार बरसातमें मेघकी धाराप्रवाह वृष्टि होती है, उसी प्रकार श्रीगुरुका उपदेश संसारी जोबोंके लिये हितकारी होता है ।

भावार्थ :- जिस प्रकार जलवृष्टि जगतको हितकारी है उसी प्रकार सद्गुरुकी वाणी सब जीवोंको हितकारी है ॥ ६ ॥

धन-सम्पत्तिसे मोह हटानेका उपाय (सवेया तेईसा )

चेतनजी तुम जागि विलोकह,
लागि रहे कहा मायाके तांई ।
आए कहींसों कहीं तुम जाह॒गे,
माया रमेगी जहांकी तहांई ॥।
माया तुम्हारी न जाति न॒पांति न,
बंसकी वेलि न अंसकी भांई।
दासी किये विनु लातनि सारत,
ऐसी अनीति न कीज गुसांई ॥ ७॥।

शब्दार्थ :- विलोकहु देखो । माया>धन-सम्पदा । भांईपरछाई- प्रतिविम्ब । दासी-नौक रानी । गुसाई >महंत ।

अर्थ :- हैआत्मन्‌ ।तुम सोहानदा को छोड़कर सावधान होओ और देखो, तुम घन-सम्पत्तिरूप मायामें क्‍यों भूल रहे हो ? तुम कहाँसे आये हो ओर कहाँ चले जाओगे और दौलत जहाँकी तहाँ पड़ी रहेगी। लक्ष्मी न तुम्हारी जातिकी है,न पाँतिको है, न बंश-परंपराकी है,और तो कया तुम्हारे एक प्रदेशका भो प्रतिरूप नहों है। यदि इसे तुमने नौकरानी बनाकर न रक्‍्खा तो यह तुम्हें लाते मारेगी, सो बड़े होकर तुम्हें ऐसा अन्याय करना उचित नहीं है॥ ७ ॥

पुनः (दोहा)

माया छाया एक है, घटे बढ़े छिन मांहि ।
इन्हकी संगति जे लगे, तिन्हहिं कहूं सुख नांहि ॥ ८ ॥

अर्थ :- लक्ष्मो और छाया एक सारखो हैं, क्षणमें बढ़ती और क्षणमें घटती हैं, जो इनके संगमें लगते हैं अर्थात्‌ नेह लगाते हैं, उन्हें कभी चेन नहीं मिलती ॥ ८ ॥

कुटुम्बियों आदिसे मोह हटानेका उपदेश (स्वेया तेईसा )

लोकनिसों कछु नातो न तेरो न,
तोसों कछु इह लोकको नातो।
ए तौ रहे रमि स्वारथके रस,
तू परसमारथके रस मातों ।।
ये तनसों तनमे तनसे जड़,
चेतन तू तिनसों नित हांतो ।
होहु सुखी अपनो बल फेरिक,
तोरिक राग विरोधको तांतो ॥ € ॥

शब्दार्थ :- लोकनिसौ>कुटुम्ब आदि जनोंसे । नातौजसम्बन्ध । रहै रमि>लीन हुए ।परमारथ -आत्महित । मातौ>मस्त । तनमै (तन्मय )८ लीन । हांतौर्भिन्न । फेरिक>प्रगट करके । तोरिक>तोडकर । तातौ (तंतु)>धागा।

अर्थ :- हेजीव ! कुटुम्बो आदि जनोंका तुमसे कुछ सम्बन्ध नहों है ओर न तुम्हारा उनसे कुछ इस लोक सम्बन्धी प्रयोजन है, ये तो अपने मतलबके वास्ते तुम्हारे शरोीरसे मुहब्बत लगाते हैऔर तुम अपने आत्म- हितमें मस्त होओ । ये लोग शरीरमें तन्‍्मय हो रहे हैं, इसलिये शरीरहीके समान जड़बुद्धि है, ओर तुम चेतन्य हो, इनसे अलग हो, इसलिये राग- देषका धागा तोड़कर अपना आत्मबल प्रगट करो और सुखी होओ ॥। € ॥।

इन्द्रादि उच्च पदकी चाह अज्ञानता है (सोरठा)

जे दुरबुद्धी जीव, ते उतंग पदवी चहें।
जे समरसी सदीव, तिनकों कछु न चाहिये ॥ १० ॥

अर्थ :- जो अज्ञानी जीव हैं वे इन्द्रादि उच्चचदकी अभिलाषा करते हैं,परन्तु जोसदा समतारसके रसिया हैं, वेसंसार सम्बन्धी कोई भी वस्तु नहों चाहते ॥ १० ॥

समताभाव मात्रहीमे सुख है (सवैया इकतीसा )

हांसोमै विषाद बसे विद्यामें विवाद बस,
कायामे मरन गुरु वतंनमें हीनता।
सुचिमें गिलानि बसे प्रापतिमें हानि बसे,
जमें हारि सुदर दसामें छवि छीनता ।।
रोग बसे भोगमे संजोगमें वियोग बसे,
'गुनमे गरब बसे सेवा मांहि हीनता।
ओर जग रीति जेती गभित असाता सेती,
साताकी सहेली है अकेली उदासीनता ॥ ११ ॥

शब्दार्थ :- विपाद-रज । विवाद-उत्तर-प्रत्युतर । छबि-कान्ति । छीनता -कमी । गरव८घमड़ । साता > सुख । सहेलीरूसाथ देनेवाली ।

अर्थ : -यदि हँसोमें सुख माना जावे तो हँसीमें तकरार (लड़ाई) खड़ी होनेकी संभावना है,यदि विद्यामें सुख माना जावे तो विद्यामें विवादका निवास है,यदि शरीरमें सुख माना जावे तो जो जन्मता हैवह अवश्य मरता है, यदि बड़प्पनमे सुख माना जाबे तो उसमे नीचपनेका बास है,यदि *पविज्नतामें ) ‘प्रीतिमै अप्रीति’ ऐसा भी पाठ रे / लौकिक पवित्रता नित्य नही है, उसके नष्ट होनेपर मलिनता भा जाती है । सुख माना जावे तो पवित्रतामें ग्लानिका वास है, यदि लाभमें सुख माना जावे तो जहाँ नफा है वहाँ नुकसान भी है, यदि जोतमें सुख माना जावे तो जहाँ जय है वहाँ हार भी है, यदि सुन्दरतामें सुख माना जाबे तो वह सदा एकसी नहीं रहती - बिगड़ती भी है, यदि भोगोंमें सुख माना जावे तो वे रोगोंके कारण हैं, यदि इष्ट संयोगमें सुख माना जाबे तो जिसका संयोग होता हैउसका वियोग भी है, यदि गुणोंमें सुख माना जावे तो गुणोंमें घमंडका नियास है, यदि नोकरी-चाकरीमें सुख माना जावे तो वह हीनता (गुलामी) ही है। इनके सिवाय और भी जो लौकिक कार्य हैं वेसब असातामय हैं, इससे स्पष्ट है किसाताका संयोग मिलानेके लिये उदासीनता सखीके समात है, भाव यह है कि समतामात्र भावहीं जगतमें सुखदायक है ॥ ११ ॥

जिस उन्नतिकी फिर अवनति है वह उन्नति नही है (दोहा)

जिहि उतंग चढ़ि फिर पतन, नहि उतंग वह कप ।
जिहि सुख अंतर भय बसे, सो सुख है दुखरूप ॥ १२ ॥
जो बिलसे सुख संपदा, गये तहां दुख होइ ।
जो धरती बहु तृनवती, जरे अगनिसों सोइ ॥ १३ ॥
शबदार्थ :- उतग ऊंचा ।पतन>गिरना । कृप5कुआ । विलसै-भोगे।
तृनवतीनघासवाली । जरे>जलती है ।

अर्थ :- जिस उच्च स्थानपर पहुँचके फिर गिरना पड़ता है, वह उच्च पद नहीं गहरा कुआ ही है। उसो प्रकार जिस सुखके प्राप्त होनेपर उसके नष्ट होनेका भय हैवह सुख नहों दुःखरूप है॥ १२ ॥ क्योंकि लोकिक सुख- सम्पत्तिका विलास नष्ट होनेपर फिर वुःख ही प्राप्त होता है, जिस प्रकार कि सघन घासवाली ही धरती अग्निसे जल जातो है ॥ १३ ॥

श्रीगुरुक उपदेशमें ज्ञानी जीव रुचि लगाते हैऔर मूर्ख समभते ही नही (दोहा )

सबद मांहि सतगुरु कहे, प्रगट रूप निज धर्म ।
सुनत विचच्छन सहहे, मूढ़ ने जाने मर्स ॥ १४ ॥
। ‘सुखमैंफिरदुखबसे’ ऐसा भी पाठ है ।

अर्थ :- श्रोगुरु आत्म-पदार्थका स्वरूप वर्णन करते हैं, उसे सुनकर बुद्धिमान् लोग घारण करते हैंओर म्‌्ख उसका मर्म ही नहों समभते ॥ १४।॥।

ऊपरके दोहेका दृष्टान्त द्वारा समर्थत (सवेया इकतीसा )

जैसे काह नगरके वासी 6 पुरुष भूले,
तामें एक नर सुष्ट एक दुष्ट उरको।
दोउ फिरें पुरके समीप परे ऊटवमें,
काहू और पथिकसों पूछे पंथ पुरको ।।
सो तो कहे तुमारों नगर है तुमारे ढिग,
मारग दिखाब समुझाव खोज पुरकौ ।
एतेपर सुष्ट पहचाने पे न माने दुष्ट,
हिरद प्रवांन तेसे उपदेस गुरुको ॥ १५॥।

शब्दार्थ :- वासी>रहनेवाले । सुष्टलसमभदार । दुष्टूदुरब॑द्धि । ऊटव>उलटा रास्ता । ढिगरूपास, निकट ।

अर्थ :- जिस प्रकार किसी शहरके रहनेवाले दो पुरुष बस्तीके समीप रास्ता मूल गये, उसमें एक सज्जन ओर दूसरा हृदयका दुजन था। रास्ता मूलकर उलटे फिरें और किसो तोसरे रास्तागोरसे अपने नगरका रास्ता पूछें तथा वह रास्तागोर उन्हें रास्ता समक्राकर दिखावे और कहे कि यह तुम्हारा नगर तुम्हारे हीतिकट है। सो उन दोनों पुरुषोंमें जोसज्जन है बहू उसकी बातकों सच्ची मानता हैअर्थात्‌ अपने नगरकों पहिचान लेता है और मूर्ख उसे नहीं मानता; इसी प्रकार ज्ञानी लोग श्रीगुरुके उपदेशको सत्य श्रद्धान करते हैं, पर अज्ञानियोंकी समभमें नहीं आता । भाव यह है कि उपदेशका असर श्रोताओंके परिणामोंके अनुसार ही होता है’ ॥ १५ ॥

पुन: (सवेया इकतीसा )

जैसे काहू जंगलमें पावसकों समे पाइ,
अपने सुभाव महामेघ बरधतु है।
) चौपाई - सुगुरु सिखा बारह बारा । सूझ परे तऊं मति अनुसारा ।॥।
साध्य-सा
धक द्वार ३४३
आमल कथषाय कटठु तीखन सधुर खार,
तेसो रस बाढ़े जहां जैसो दरखतु है ।॥
तेसे ग्यानवंत नर ग्यानकौ बखान करे,
रसको उमाहू है नकाहू परखतु है।
बहै धुनि सुनि कोऊ गहे कोऊ रहै सोइ,
काहको विखाद होइ कोऊ हरखतु है ॥ १६ ॥

शब्दार्थ :- पावसल्‍बरसात । आमल>खट्टा । कषाय>ऐठायला । कटु>कड़वा । तीखन (तोक्ष्ण) व रपरा । मधुरूमीठा । खार (क्षार)5 खारा । दरखतु (दरख्त)न्‍्व॒क्ष ।उमाहुउत्साहित । न परखतु है-परीक्षा नही करता । धुनि (घ्वनि)-शब्द । विखाद (विषाद)>रंज । हरखतु- हित (आनन्दित) ।

अर्थ :- जैसे किसी थनमें बरसातके दिनोंमें अपने आप पानी बरसता हैतो खट्टा, कषायला, कड॒वा, चरपरा, मिष्ट, खारा जिस रसका ब॒क्ष होता हैबहु पानी भी उसी रसरूप हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञानी लोग ज्ञानके व्याख्यानमें अपना अनुभव प्रगट करते हैं,पात्र-अपात्रको परीक्षा नहों करते, उस बाणीकों सुनकर कोई तो ग्रहण करते हैं, कोई ऊँघते हैं, कोई विषाद करते हैंऔर कोई आनंदित होते हैं।

भावार्थ :- जिस प्रकार पानी अपने आप बरसता हैऔर वह नोमके व॒क्षपर पड़नेसे कड़वा, नोंबके वृक्ष पर पड़नेसे खट्टा, गन्नकेकाड़पर पड़नेसे सिष्ट, सिचके काड़पर पड़नेसे खरपरा, चनेके काइपर पड़सेसे खारा और बबलपर पड़नेसे कधायला हो जाता है। उसो प्रकार ज्ञानी लोग ख्याति लामाबविकी अपेक्षा रहित माध्यस्थमावसे तत्वका स्वरूप कथन करने हैं उसे सुनकर कोई भोता परमार्थ ग्रहण करते हैं, कोई संसारसे भयभीत होकर यम-नियम लेते हैं, कोई लड़ बेठते हैं, कोई ऊँघते हैं, कोई कुतर्क करते हैं,कोई निन्‍्दा-स्तुति करते हैं ओर कोई व्यास्यानके पूर्ण होनेकी ही वाट देखते रहते हैं॥ १६ ॥

(दोहा)

गुरु उपदेश कहा करे, दुराराध्य संसार ।
बसे सदा जाक॑ उदर, जीव पंच परकार ॥ १७ ॥
3%49.-ननन्कपमक ५७ 3+++>ननन-म न ५५७नल
जन-क
५3५33 3८०«नस०»कनननण«+५+ जनम नीनन–+99«33+±+०«3ज+ज±.>.५3>५०-»—५००००७५,
अथ्थ :- जिसमें पांच प्रकारके जीव निवास करते हूँ वहु संसार हो
बहुत दुस्तर है, उसके लिये श्रोगुरुका उपदेश क्या करेगा ? ॥ १७ ॥

पाँच प्रकारके जीव (दोहा)

डूघा प्रभु ब्ूघा चतुर, सुधा रूचक सुद्ध ।
ऊंधा दुरबुढ्ी विकल, धृधा घोर अबुद्ध ॥ १८॥।

शब्दार्थ :- रूचक>रुचिवाला । अबुद्ध>अज्ञानी ।

अर्थ :-डूघा जीव प्रभु है, चघा चतुर है, सूधा शुद्ध रुचिवंत है, अंधा बुबुंद्धि ओर दुःखी हैओर घ्‌धा महा अज्ञानी है॥ १८ ॥

डूघा जीवका लक्षण (दोहा)

जाकी परम दसा विधे, करम कलंक न होइ ।
डू घाअगम अगाधपद, वचन अगोचर सोइ ॥ १६ ॥

अर्थ :- जिनका कर्म-कालिमा रहित अगम्य, अगाध और बचन- अग्ोचर उत्कृष्ट पद है वेसिद्ध मगवान ड्घा’ जीव हैं ।। १६

चूघा जीवका लक्षण (दोहा)

जो उदास हूं जगतसों, गहे परम रस प्रेम ।
सो चूघा गुरुके बचन, चूधे बालक जेम ॥ २०॥

शब्दार्थ :- उदास>विरक्त ।परम रस« आत्म-अनुभव । चूघे-चूसे ।

अर्थ :- जो संसारसे विरक्त होकर आत्म-अनुभवका रस करता है और श्रोगुरुके बचन बालकके समान वृग्धवत्‌ सप्रेम ग्रहण चूसता हे यह चू’घा जीव है ॥ २६ ॥

सू था जीवके लक्षण (दोहा)

जो सुबचन रुचिसों सुने, हिये दुष्टता
नांहि ।
परमारथ समुर्क नहों, सो सूघा जगमांहि
नमन“न ननन–+ 3 ०3०» >-±…
) यह कथन प० बनारसीदासजोने अपने
मनसे किया हैकिसी ग्रन्थके आधारसे
नही ।

शब्दार्थ :- रुचिसौ> प्रेमसे ।परमारथ-आत्मतत्त्व ।

अर्थ :- जो गुरुके वचन प्रेमपृर्वक सुनता है और हृदयमें दुष्टता नहों है- भद्र है, पर आत्मस्वरूपको नहीं पहिचानता ऐसा मन्द कषायी जोब सूधा है ॥ २१ ॥

ऊघा जीवका लक्षण (दोहा)

जाको विकथा हित लगे, आगमस अंग अनिष्ट ।
सो ऊंघा विषयी विकल, दुष्ट रुष्ट पापिष्ट ॥२२॥।

शब्दार्थ :- विकथा>खोटी वार्ता । अनिष्ट>अप्रिय ।दुष्ट-द्वेषी । रुष्ट&क्रोधी । पापिष्ट>अधर्मी ।

अर्थ :- जिसे सत्‌ शास्त्रका उपदेश तो अध्रिय और विकथाएँ प्रिय लगती हैंवह विषयामिलाषी, हेघी-क्रोधी ओर अधर्मो जीव ऊंधा है ॥ २२ ॥

घू धाजीवका लक्षण (दोहा)

जाक॑ वचन श्रवन नहीं, नहि मन सुरति विराम ।
जड़तासों जड़वत भयो, घूघा ताकौ. नाम ॥२३॥।

शब्दार्थ :- सुरति-स्मृति । विराम>अव्ती ।

अर्थ - वचन रहित अर्थात्‌ एकेन्द्रिय, श्रवण रहित अर्थात्‌ द्वि, त्रि, चतुरिन्द्रिय, मन रहित अर्थात्‌ असंज्ञी पंचेन्द्रिय और अव्ती अज्ञानी जीव जो ज्ञानावरणीयकर्मके तीव्र उदयसे जड़ हो रह? हेवह घूधा है ॥ २३ ॥

उपयुक्तपाँच प्रकारके जीबोका विशेष वर्णन (चौपाई)

डूघा सिद्ध कहै सब कोऊ ।
सुधा ऊंधघा मूरख दोऊ ॥॥
घूघा घोर बिकल संसारी ।
चुघा जीव मोख अधिकारी ॥१२४।।

अर्थ :- हधा जोवको सब कोई सिद्ध कहते हैं, सुधा ऊंघा दोनों मूर्ख हैं, घूषा घोर संसारी हैऔर चू घाजोब मोक्षका पात्र है ॥२४।।

चूघा जीवका वर्णन (दोहा)

घुघा साधक मोखको, करे दोष दुख नास।
लहै. मोल संतोषसों, वरनों लच्छुन तास ॥ २५ ॥

अर्थ :- चरूघा जीव मोक्षका साधक है, दोष और दुखोंका नाशक है,

संतोषसे परिपूर्ण रहता है, उसके गुण वर्णन करता हूँ (१२५ (दोहा )

कृपा प्रसम संवेग दम, अस्तिभाव वेराग्य ।
ये लच्छन जाके हिये, सप्त व्यसनकों त्याग ॥ २६ ॥

शब्दार्थ :- कृपा नदया । प्रसम ( प्रशम )>कपषायोकी मंदता । सवेग >ससारसे भयभीत । दम इन्द्रियोंका दमन ।अस्तिभाव (आस्तिक्य ) जिन वचनोंपर श्रद्धा । वैराग्य-संसारसे विरक्ति ।

अर्थ :- दया, प्रशम, संवेग, इन्द्रिय-दसमन, आतस्तिक्य, वेराग्य और सप्तव्यसनका त्याग ये चू घाअर्थात्‌ साधक जीवके चिह्न हैं ॥ २६ ॥

सप्त व्यसनके नाम (चौपाई)

जूबा आभिष मविरा दारोी।
आखेटक चोरी परनारी ॥।
एई सात बिसन दुखदाई ।
दुरित मूल दरगतिके भाई ॥ २७ ॥

शब्दार्थ :- आमिष > मास । मदिरा + शराब । दारी > वेश्या । आखेटक >शिकार । परनारी>पराई स्त्री । दुरितनपाप । मूलरजड़ ।

अर्थ :- जुबा खेलना, मांस खाना, शराब पीना, वेश्या सेवन, शिकार करना, चोरो और परस्त्री सेबन। ये सातों व्यसन दुःखदायक हैं, पापको जड़ हैऔर कुगतिमें लेजानेवाले हैं ॥ २७ ॥

व्यसनोके द्रव्य और भाव भेद (दोहा)

दरबित ये सातों बिसन, दुराचार दुखधाम ।
भावित अंतर कलपना, मृषा मोह परिनाम ॥२८!।

अर्थ :- ये सातों जो शरीरसे सेवन किये जाते हैंवे दुराचाररूप द्रव्य- व्यसन है, और भूठे मोहपरिणामकी अन्तरंग कल्पना सो भाव-व्यसन हैं। द्रव्य और भाव दोनों ही दुःखोंके घर हैं ॥ २८ ॥

सप्त भाव व्यसनोका स्वरूप (सर्वया इकतीसा )

अशुभमें हारि शुभ जीति यहै दूत कर्म,
देहकी मगनताई यहे मांस भखिवो।
मोहकी गहलसों अजान यहै सुरापान,
कुमतिकी रीति गनिकाकौ रस चखिवों ।।
निरद हूँ प्रानधात करवौ यहै सिकार,
परनारी संग परबुद्धिको परखियों।
प्यारसों पराई सौज गहिवेकी चाह चोरी,
एई सातों विसन बिडार ब्रह्म लखियो ॥ २६ ॥

शब्दार्थ :-दूत (द्यूत)>जुआ। गहलम्मूर्छा। अज्ञानजअचेत। सुराल्शराब । पानल्‍पीना। गनिकाल्‍्वेश्या। सौज>वस्तु । बिडारे" विदारण करे ।

अर्थ :- अशुभ कमके उदयमें हार ओर शुभ कमंके उदयसमें विजय मानना यह भाव जुआ है, शरीरमें लीन होना यह भाव मांस-भक्षण है, सिथ्यात्वसे मूछित होकर स्वरूपको भूलना यह भाव मद्यपान है, कुबुढ्धिके सार्गपर चलना यह भाव बेहया सेवन है, कठोर परिणाम रखकर प्राणोंका घात करना यह भाव शिकार है, वेहादि परबस्तुमें आत्मबद्धि रखना सो भाव परस्त्री संग है, अनुराग पूर्वक परपदार्थोंके ग्रहण करनेकी अभिलाषा करना सो भाव चोरी है। ये हो सातों भाव-व्यसन आत्मज्ञानको विदारण करते हैंअर्थात्‌ आत्मज्ञान नहीं होने देते ।।२€।।

साधक जीवका पुरुषार्थ (दोहा)

बिसन भाव जामें नहों, पोरष अगम अपार ।
किये प्रगट घट सिंधुमें, चौदह रतन उदार ॥ ३० ॥
शब्दा्थ :- सिधु>समुद्र ।उदार-महान् ।

अर्थ :- जिसके चित्तमें माव-व्यसनोंका लेश भो नहीं रहता है वह अतुल्य और अपरम्पार पुरुषार्थका धारक हृदयरूप समुद्रमें चोदह महारत्न प्रगट करता है ॥ ३० ॥

चौदह भावरत्न (सर्वेया इकतीसा )

लक्ष्मी सुबुद्धि अनुभूति कउस्तुभ मनि,
वेराग कलपवृच्छ संख सुबचन है।
ऐराबत उदिम प्रतीति रंभा उद्द विष,
कामधेनु निर्जरा सुधा प्रमोद धन है।॥।
ध्यान चाप प्रेमरीति मदिरा विवेक वंद्य,
सुद्धभाव चन्द्रमा तुरंगरूप मन है।
चोदह्‌ रतन ये प्रगट होंहि जहां तहां,
ग्यानके उदोत घट सिधुकों मथन है ॥ ३१ ॥

शब्दार्थ :- सुधाअमृत। ४! प्रमोद-आनंद । चाप-धनुष नुष। । तुतुरग-घोडा ।

अर्थ :- जहाँ ज्ञानके प्रकाशमें चित्तरूप समुद्रका सन्‍्थन किया जाता हैवहाँ सुबुद्धरूप लक्ष्मी, अनुभूतिरूप कौस्तुभमणि, वेराग्यरूप कल्पवृक्ष, सत्यवचनरूप शंख, ऐराबत हाथीरूप उच्चम, भ्रद्धारूप रम्भा, उदयरूप विष, निर्जरारूप कामधेनु, आनन्दरूप अमृत, ध्यानरूप धनुष, प्रेमरूप मदिरा, विवेकरूप बेद्य, शुद्धभावरूप चन्द्रमा और मनरूप घोड़ा ऐसे चौदह रत्न प्रगट होते हैं ॥ ३१ ॥।

चौदह रत्नोमे कौन हेय और कौन उपादेय हैं (दोहा)

किये अवस्थामें’ प्रगट, चौदह रतन रसाल ।
कछु त्याग कछु संग्रह, विधिनिषेधकी चाल ॥ ३२ ॥
रमा संख विष धनु सुरा, बंद्य धेनु हय हेय ।
मनि रंभा गज कलपतरु, सुधा सोम आदेय ॥ ३३ ॥
इह विधि जो परभाव विष, वमे रस निजरूप ।
सो साधक सिवपषंथको, चिद बेदक चिद्रूप ॥ ३४ ॥

शब्दार्थ :-संग्रहै-ग्रहण करे। विधि> ग्रहण करना । निषेध 5 छोडना । रमाल्‍्लक्ष्मी ।धनुधनुष । सुरारशराब । पेनुल्गाय । हयरघोडा । रंभा> अप्सरा । सोम >चन्द्रमा । आदेय> ग्रहण करने योग्य । वमै>छोड़े ।

अर्थ :- साधकदशामें जो चौदह रत्न प्रगट किये उन्हें ज्ञानी जीव विधिनिषेधकी रोतिपर कुछ त्याग करता है और कुछ प्रहण करता है ॥ ३२ ॥ अर्थात्‌ सुबृद्धिरूप लक्ष्मी, "सत्यवचनरूप शंख, उदयरूप विष, ध्यानरूप धनुष, प्रेमरूप मदिरा, विवेकरूप धन्वन्तरि, निर्जरारूप कामधनु और भनरूप घोड़ा ये आठ अस्थिर हैं इसलिये त्यागने योग्य हैं तथा अनुभुतिरूप मणि, प्रतीतिरूष रम्भा, उद्यमरूप हाथी, बेराग्यरूप कल्पबक्ष, आनन्दरूप अमृत, शुद्धभावरूप चन्द्रमा, ये छह रत्न उपादेय हैं ॥ ३३ ॥ इस प्रकार जो परभाव- रूप विष-विकार त्याग करके निज स्वरूपमें मग्न होता हैवह निज स्वरूपका भोक्ता चेतन्य आत्मा मोक्षमार्गंका _साधक है ॥ ३४ ॥ ) साधक दशा ।

सत्यवचन भी हेय है, जेनमतमे तो मौनहीकी सराहना है ! 3 सात भावनव्यसनो और चौदह रत्नोकी कविता पडित बनारसीजीने स्वतत्र रची है।

मोक्ष मागंकेसाधक जीवोकी अवस्था (कवित्त )

ग्यान द्विष्टि जिन्हके घट अंतर,
निरख दरव सुगुन परजाइ ।
जिन्हक॑सहजरूप दिन दिन प्रति,
स्थादवाद साधन अधिकाइ ।।
जे केवलि प्रनीत मारग मुख,
चिते चरन राख ठहराइ।
ते प्रवीन करि खोन मोहमल,
अविचल होहि. परमपद पाइ ॥ ३५ ॥
शब्दा्थ :- निरखे>देखे । प्रनीत (प्रणीत )-रचित ।

अर्थ :- जिनके अन्तरग्े ज्ञानहष्टि द्रव्य, गुण और पर्यायोंका अवलोकन करतो है, जो स्वयमेव हो दितपर दिन स्याद्वादके द्वारा अपना स्वरूप अधिक अधिक जानते हैं, जो केवबली कथित धमंभागंमें श्रद्धा करके उसके अनुसार आचरण करते हैं, वे ज्ञानी मनुष्य मोहकमंका मल नष्ट करते हैंऔर परमपदको प्राप्त करके स्थिर होते हैं ॥ ३५ ॥

शुद्ध अनुभवसे मोक्ष और मिथ्यात्वसे संसार है (सवेया इकतीसा )

चाकसो फिरत जाकाों संसार निकट आयो, पायौ जिन सम्यक् मिथ्यात नास करिके । नेकान्तसड्भरतहशा स्वयमेव वस्तु- तस्वव्यवस्थितिमिति प्रविलोकयम्त: । स्पाद्रादशुद्धमधिका सधिगम्य सन्‍्तो ज्ञानी भवस्ति जिनमोतिमलंघयन्तः ॥ २ ॥

यह श्लोक ईडरकी प्रतिमे नही है, किन्तु मुद्रित दोनो प्रतियोमे है ।
ये ज्ञानमात्रतिजभावमयीसकम्पां
मूसि अ्रयन्ति कथमप्यपनोतमोहा: ।
ते साधकत्वमधिगम्य भवन्ति सिद्धा.
मूढास्त्वमुमनुपलभ्य… परिभ्रमन्ति ॥ ३ ।
निरदु दमनसा सुमूसि साधि लीनी जिन,
कोनी मोखकारन अवस्था ध्यान धरिकं ।।
सो ही सुद्ध अनुभो अभ्यासी अविनासी भयो,
गयो ताकौ करम भरम रोग गरिकं।
भिथ्यामती अपनों सरूप न पिछाने तात॑,
डोले जगजालमें अनंत काल भरिक ॥ ३६ ॥

शब्दार्थ :- चाक 5 चक्र । निरदुद ( निर्ठद्व )८ दुविधा रहित। गरिके (गलिके) 5गलकर नष्ट हुआ । पिछाने >पहिचाने ।

अर्थ :- चाकके समान घूमते घूमते जिसके संसारका अन्त निकट आ गया और जिसने मिथ्यात्वका नाश करके सम्यग्दश्शन प्राप्त किया है, जिसने राग-देष छोड़कर सनरूप मूसिकों शुद्ध किया है और ध्यानके द्वारा अपनेको मोक्षके योग्य बनाया है, वही शुद्ध अनुभवका अम्यास करनेबाला अविच्वल पद पाता है, और उसके कर्म नष्ट हो जाते हैं वअन्ञानरूपी रोग हट जाता है, परन्तु मिथ्याहष्टि अपने स्वरूपकों नहों पहिचानते इससे वे अनन्तकाल पर्यनत जगतके जालमें भटकते हैंओर जन्म-मरणके चक्कर लगाते हैं ॥ ३६ ॥

आत्म-अनुभवका परिणाम (सर्वेया इकतीसा)

जे जीव दरबरूप तथा परजायरूप,
दोऊ ने प्रबांन वस्तु सुद्धता गहतु हैं ।
जे असुद्ध भावनिके त्यागी भये सरवधा,
विषेसों विभुख हू विरागता बहतु हैं ।।
स्पाहादकौशलसुनिश्चलसंय
माम्यां
यो भावयत्यहरह स्वमिहोपयुक्त: ।
ज्ञानक्रियानयपरस्परतोब्रम
पात्रीकृत: क्षयति भूसिसिमा स एक ॥ ४ ॥
जे जे ग्राह्मभाव त्याग भावदोऊ भावनिकों,
अनुभो अभ्यास विषे एकता करतु हैं ।
तेई ग्यान क्रियाके आराधक सहज मोख,
मारगके साधक अबाधक महतु हैं ॥ ३७ ॥

अर्थ :- जिन जीवोने द्रव्याथिक और पर्यायाथिक दोनों नयोके द्वारा पदार्थका स्वरूप समभकर आत्माको शुद्धता ग्रहण को है, जो अशुद्ध भावोंके सर्वथा त्यागो हैं,इन्द्रिय-विषयोंसे पराइमुख होकर बवोतरागी हुए हैं,जिन्होंने अनुमवके अम्यासमें उपादेय और हेय दोनों प्रकारके भावोंको एकसा जाना है, वे ही जीव ज्ञानक्रियाके उपासक हैं, मोक्षमा्गके साधक हैं, कर्मंबाधा रहित हैंऔर महान् हैं ॥ ३७ ॥

ज्ञानक्रियाका स्वरूप (दोहा)

विनांस अनादि असुद्धता, होइ सुद्धता पोख।
ता परनतिको बुध कहें, ग्यान क्रियासों मोख ॥१३८।।

शब्दार्थ :- विनसि>नष्ट होकर । पोख-पुष्ट । परनतिल्‍चाल ।

अर्थ :- ज्ञानी लोग कहते हैं किअनादि कालकी अशुद्धताके नष्ट होने ओर शुद्धताके पुष्ट होनेकी परिणति ज्ञानक्रिया हैऔर उसीसे मोक्ष होता है ॥ ३८ ॥

सम्यक्त्वसे क्रमश’ ज्ञानकी एूर्णता होती है (दोहा)

जगी सुद्ध समकित कला, बगी सोख मग जोइ ।
वहै करस चूरन करे, क्रम क्रम पूरन होइ ॥ ३६ ॥
जाके घट ऐसो दसा, साधक ताकौ नाम ।
जसे जो दोपक घरे, सो उजियारो धाम ॥ ४० ॥
शब्दा्थ :- बगी> चली ।
साध्य-साधक हार शेशरे

अर्थ :- सम्यग्द्शनकी जो किरण प्रकाशित होती है और मोक्षके भागमें चलतो हैवह धोरे धीरे क्मोका नाश करतो हुई परमात्मा बनतो है ॥ ३६ ॥ जिसके चित्तमें ऐसी सम्यग्दशंनकी किरणका उदय हुआ है उसीका नाम साधक है, जेसे कि जिस घरमें दोपषक जलाया जाता है उसी घरमें उजेला होता है ॥ ४० ॥

सम्यक्त्वकी महिमा (सवेया इकतीसा )

जाके घट अंतर भिथ्यात अंधकार गयो,
भयो परगास सुद्ध समकित भानकों।
जाकी मोहनिद्रा घटी ममता पलक फटी,
जान्यों जिन मरम अवाची भगवानकों ॥।
जाकोौ ग्यान तेज बग्यो उद्दिम उदार जग्यौ,
लगो सुख पोख समरस सुधा पानकों ।
ताही सुविचच्छनकौ संसार निकट आयो,
पायौ तिन सारग सुगम निरवानकों ॥ ४१ ॥

शब्दार्थ :- अवाची-वचनातीत । बग्यौज्बढ़ा ।

अर्थ :- जिसके हुदयमें मिथ्यात्वका अन्धकार नष्ट होनेसे शुद्ध सम्यग्दर्शनका सुर्य प्रकाशित हुआ, जिसको मोहनिद्रा हट गई और मसताकोी पलक उधड़ पड़ों, जिसने बचनातोत अपने परमेश्थरका स्वरूप पहिचान लिया, जिसके ज्ञानका तेज प्रकाशित हुआ, जो महान् उद्यममें सावधान हुआ, जो साम्यभावका असमृतरस पान करके पुष्ट हुआ, उसी ज्ञानोके संसारका अन्त समोप आया हैओर उसने हो सुगम मार्ग पाया है ॥ ४१ ॥

खित्पिण्डचण्डिम विलासिविकासहास:
शुद्धप्रकाशभरनिभरसुप्रभात: ।
आनन्दसुस्थितसदास्खलितेकरूप-
स्तस्थेव चायघुदयत्यचलाचिरात्मा ॥ ५ ॥।

सम्यग्ज्ञानकी महिमा (सवेया इकतीसा )

जाके हिरदेमें स्थाह्दद साधना करत,
सुद्ध आतमाकौं अनुभौ प्रगट भयौ है।
जाके संकलप विकलपके विकार मिटि,
सदाकाल एकीभाव रस परिनयों है।॥
जिन बंध विधि परिहार मोख अंगीकार,
ऐसौ सुविचार पच्छ सोऊ छांड़ि दयो है ।
ताकौ ग्यान महिमा उदोत दिन दिन प्रति,
सोही भवसागर उलंधि पार गयोौ है ॥ ४२ ॥

शब्दार्थ :- परिनयौज्हुआ । परिहार>नप्ट । अगीकार “स्वीकार । पररच्तट ।

अर्थ :- स्पाहादके अभ्याससे जिसके अन्तःकरणमप्रें शुद्ध आत्माका अनुभव प्रगट हुआ, जिसके सकल्प-विकल्पके विकार नष्ट हो गये और सर्देव ज्ञानभावरूप हुआ, जिसने बन्धविधिका परिहार और मोक्ष अंगीकारका सद्रिचार भी छोड़ दिया, जिसके ज्ञानकी महिमा दिनपर दिन प्रकाशित हुई, वह ही संसार-सागरसे पार होकर उसके किनारे पर पहुँचा है ॥ ४२ ॥

अनुभवमे नय पक्ष नहीं है (सवेया इकतीसा )

अस्तिरुष नासति अनेक एक थिररूप,
अथिर इत्यादि नानारूप जीव कहिये।
स्पाह्राददीपितलसन्महसि प्रकाशे
शुद्धस्वभावमहिमन्युदिति सथीति ।
कि बन्धमोक्षपथपातिभिरन्यभारे-
नित्योदय: परमयं स्फुरतु स्वभाव, । ६॥।
चित्रात्मशक्तिसमुदायमयो5यमात्मा
सद्यः प्रणश्यति नवेक्षणखण्डशमान:ः ।
तस्मादवण्दसनिराकततबपटमेक-
मेकान्तशान्तमचल चिदहें महोईस्मि ॥ ७ ॥
दीसे एक नेकी प्रतिषच्छी न अपर दूजी,
नेकौ न दिखाइ वाद विवादमें रहिये ।।
थिरता न होइ विकलपकी तरंगनिमै,
चंचलता बढ़ें अनुभो दसा न लहिये।
तातें जीव अचल अबाधित अखंड एक,
ऐसो पद साधिक॑ समाधि सुख गहिये ॥ ४३ ॥

शब्दार्थ :- थिर स्थिर । अधिर-चंचल । प्रतिपच्छी-विपरीत । अपर-और । थिरता"-शान्ति ।समाधि5अनुभव । अथथ :- जोवपदार्थ नयकी अपेक्षासे अस्ति-नास्ति, एक-अनेक, थिर- अधिर, आदि अनेकरूप कहा गया है। यदि एक नयसे विपरीत दूसरा नय न दिखाया जाय तो विपरोतता दिखने लगतो है और वादानुबाद उपस्थित होता है । ऐसी वशार्म अर्थात्‌ नयके विकल्पजालमें पड़नेसे खिसको विश्राम नहीं होता और चंचलता बढ़नेसे अनुभव टिक नहों सकता, इसलिये जीव- पदार्थों अचल, अबाधित, अखंडित और एक साधकर अनुभवका आनन्द लेना चाहिये । भावाथ :- एक नय पदार्थंकों अस्तिरूप कहता हैतो दूसरा नय उसी पदार्थकों नास्तिरूप कहता है, एक नय उसे एकरूप कहता हैतो दूसरा नय उसे अनेक कहता है, एक नय नित्य कहता है तो दूसरा नय उसे अनित्य कहता है, एक नय शुद्ध कहता है तो दूसरा नय उसे अशुद्ध कहता है, एक नय ज्ञानी कहता हैतो दूसरा उसे अज्ञानी कहता है, एक नय सबंध कहता हैतो दूसरा नय उसे अबंध कहता है। ऐसे परस्पर विरुद्ध अनेक धर्मोकी अपेक्षा पदार्थ अनेकरूप कहा जाता है। जब प्रथस नय कहा गया और उसका विरोधी न दिखाया जावे तो विवाद खड़ा होता है और नयोंके भेद बढ़नेसे अनेक विकल्प उपजते हैं जिससे चित्तमें चंचलता बढ़नेके कारण अनुभव नष्ट हो जाता है, इसलिये प्रथम अवस्थामें तो नयोंका जानना आवश्यक है, फिर उनके द्वारा पदार्थंका वास्तविक स्वरूप निर्णय करनेके अनंतर एक शुद्ध ब॒द्ध आत्मा ही उपादेय है ॥ ४३ ॥

आत्मा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे अखण्डित है (सवेया इकतीसा )

जेसें एकपाकौ आंबफल ताके चार अंस,
रस जालो गुठली छीलक जब मानिये ।
यौंतो न बने पे ऐसे बने जेंसे वहे फल,
रूप रस गंध फास अखंड प्रमानिय ।।
तेसे एक जीवकों दरव खेत काल भाव,
अंस भेद करि भिन्न भिन्न न बखानिये ।
दर्यरूप खेतरूप कालरूप भावरूप,
चारोंरूप अलख अखंड सत्ता मानिये ॥। ४४

शब्दार्थ :- आवफल “आम । फासन्‍ू"स्पर्ण । अखडलज्अभिन्न । अलख>-”-आत्मा ।

अर्थ - कोई यह समभे कि जिस प्रकार पके हुए आमके फलमें रस, जालो, गुठली, छिलका ऐसे चार अंश हैं,वेसे ही पदाथमें द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव ये चार अंश है, सो ऐसा नहीं है। इस प्रकार है कि जेसे आमका फल हैऔर उसके स्पशं, रस, गध, बर्ण उससे अभिन्न हैं, उसी प्रकार जीव पदार्थके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव उससे अभिन्न हैं ओर आत्मसत्ता अपने स्वचतुष्टयसे सदा अखडित है।

भावार्थ :- यदि कोई चाहे कि अग्निसे उप्णता पृथक की जावे अर्थात कोई तो अपने पासमें अग्नि रक्ले और दूसरेके पास उच्णता सौंपे तो नही हो सकतो, इसो प्रकार द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावकों पदार्थसे अभिन्न जानना चाहिये ॥ ४४ ॥

ज्ञान और जेय्रका स्वरूप (सर्वेया उकतीसा)
कोऊ ग्यानवान कहे ग्यान तौ हमारोौ रूप,
ज्ञेय घट दर्व सो हमारो रूप नाहीं है ।
थेद्रब्पेण खब्डयामि, न क्षेत्रेण खण्डपामि, न कालेन खण्डयासि, न भावेन
खणष्डयामि, सुविशुद्ध एको ज्ञानमात्रभावो5स्मि ।।
यट सस्कृत अश मुद्रित दोनों प्रतियोग नहीं है, किन्तु इसकी प्रतिमे है ।
योध्य भावों ज्ञानमात्रोहहमस्मि ज्ञेयों ज्ेयश्ञानसात्र: स नव ।
सेयों जेयज्ञानकल्लोलवल्गन्‌ ज्ञाननेयज्ञानुमद्रस्तुमात्र. ॥ ८ ।।
एक ने प्रवांन ऐसे दूजो अब कहूं जेंसे,
सरस्वती अक्खर अरथ एक ठाहों है ॥
तेसे ग्याता मेरो नाम ग्यान चेतना विराम,
शेयरूप सकति अनंत मुझ पांही है।
आ कारन वचनके भेद भेद कहै कोऊ,
ग्याता ग्यान ज्ञेककौ बिलास सत्ता मांही है ॥ ४५ ॥

अर्थ :- कोई ज्ञानी कहता है कि ज्ञान मेरा रूप हैऔर ज्ञेय षट द्रव्य मेरा स्वरूप नहीं है। इसपर श्रोगुरु सम्बोधन करते हैं कि एक नय अर्थात्‌ व्यवहार नयसे तुम्हारा कहना सत्य है, और दूसरा निश्चयनय मै कहता हू वह इस प्रकार हैकि जेसे विद्या अक्षर और अर्थ एक ही स्थानपर हे, भिन्न नहों हैं। उसी प्रकार ज्ञाता आत्माका नाम है, और ज्ञान ’ चेतनाका प्रकार हैतथा वह ज्ञान शेयरूप परिणमन करता है सो ज्ञेयरूप परिणमन करनेको अनंत शक्ति आत्मामें हो है,इसलिये वचनके भेदसे भले ही भेद कहो, परन्तु निश्चयसे ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेयका विलास एक आत्मसत्तामें ही है ॥ ४५ ॥।

(चौपाई)

स्‍्वपर प्रकासक सकति हमारी ।
ताते बचन भेद भ्रम भारी ।।
भेय दशा दुविधा परगासी ।
निजरूपा पररूपा भासी ॥ ४६ ॥।
अथे :- आत्माकी ज्ञानशक्ति अपना स्वरूप जानतो है और अपने
सिवाय अन्य पदार्थोको भी जानती है, इससे ज्ञान और ज्ञेयका वचन-भेद
मूखोंको बड़ा भ्रम उत्पन्न करता है। शेय अवस्था दो प्रकारकी है- एक तो
स्वज्ेय और दूसरी परज्ञेय ॥ ४६ ॥
) चेतना दो प्रकारकी है - जानचेतना और दश्शनचेतना ।
णशशणशशणणणणण
नशणशणणरशशणश
ुलन॒मााशाएए

लिमशिकनिनलिशिकिन अल नकल अल कक बस 3 भुनभुननननुन (दोहा )

निजरूपा आतम सकति, पररूपा पर बसस्‍्त ।
जिन लखि लोनों पेंच यह, तिन लखि लियो समस्त ॥ ४७ ॥

अर्थ :- स्वज्ञेय आत्मा हैऔर परज्ञेय आत्माके सिवाय जगत॒के सब पदार्थ हैं, जिसने यह स्वज्ञेय और परशेयकी उलभन समझ लो है- उसने सब कुछ ही जान लिया समझो ॥ ४७ ॥

स्याह्ादमे जीवका स्वरूप (सर्वेया इकतीसा)

करम अवस्थामैं असुद्धसो विलोकियत,
करम कलंकर्सों रहित सुद्ध अंग है।
उभ ने प्रवांग समकाल सुद्धासुद्ध रूप,
ऐसौ परजाइ धारोी जीव नाना रंग है ।॥।
एक हो समैमैं त्रिधारूप .प तथापि याकोी,
अखंडित चेतना सकति सरवबंग है।
पहै स्पादबाद याकौ भेद स्थादबादी जाने,
मूरख न माने जाकौं हियो हृगर्भंग है ॥ ४८ ॥।

शब्दार्थ :- अवस्थानदशा ।विलोकियतरूदिखता है । उसे (उभय )5 दो । नैज्नय । परजाइ धारी>शरीर सहित, संसारी । रग>धर्म । तिध पद तीन । दृगभग>अंधा ।

अर्थ :- यदि जोवकोी कम सहित अवस्थापर दृष्टि दी जाबे तो वह प्यवहारनयसे अशुद्ध दिखता है, यदि निश्चयनयसे कर्म-मलरहित अवस्था विचारी जावे तो वह निर्दोष है, और यदि थे दोनों नय एक साथ सोचे जावे बवचिललसति मेचक क्वचिन्भेत्चकामेचक क्वचित्पुनरसेजक सहजमेब तत्त्द सम । तथापि न विमोहयत्यमलमेघसा तन्मनः प्रस्परसुसंहतप्रकट शक्तिचक्र स्फुरत्‌ ॥ ६ ॥। तो शुद्धाशुद्ररूप जाना जाता है। इस प्रकार संसारी जीवको विचित्र गति है । यद्यपि वह एक क्षणमें शुद्ध, अशुद्ध और शुद्धाशुद्ध ऐसे तोनरूप हैतो भो इन तीनों रूपोंमें बहु अलंड चेतन्यशक्तिसे सर्वबांग सम्पन्न है। यही स्थाद्वाद है, इस स्पाद्वादके समंको स्याह्वादी हो जानते हैं जो मूर्ख हृदयके अंधे हैं वेइस मतलबको नहीं समभते ॥ ४८ ॥

पुन: (सर्वेया इकतीसा )

निहचे दरवद्रिष्टि दीज तब एक रूप,
गुन परजाइ भेद भावों बहुत है।
असंल्य परदेस संजुगत सत्ता परमान,
ग्यानकी प्रभासों लोकाइ्लोक मानयुत है ।।
परजे तरंगनिके अंग छिनभंगुर है,
चेतना सकतिसों अखंडित अच्ुत है।
सो है जीव जगत् विनायक जगतसार,
जाकी मौज महिमा अपार अदभुत है ॥ ४६ ॥

शब्दार्थ :- भेदभाव >व्यवहार नय । संजुगत (सयुक्त) सहित । जुत (युक्त)-सहित । अचुत-अचल । विनायक-शिरोमणि । मौजच्सुख ।

अर्थ :- आत्सा निश्चयनय वा द्रव्यद्ृष्टिसि एकरूप है, गुण-पर्यायोंके भेद अर्थात्ब्यवह्ा रनयसे अभेदरूप है। अस्तित्वकी हृष्टिसे निज क्षेत्रावगाहमें स्थित है, प्रदेशोंकी हृष्टिसे लोक-प्रसाण असंख्यात्त प्रदेशी है, ज्ञायक हृष्टिसे "लोकालोक प्रमाण है। पर्यायोंकी दृष्टिसे क्षणभंगुर है, अविनाशी चेतनाशक्तिकी दृष्टिसे नित्य है। वह जीव जगतमें श्रेष्ठ और सार पदार्थ है, उसके सुखगुणकी महिसा अपरम्पार और अद्भुत है ॥ ४६ ॥

१ लोक और अलोकमे उसके ज्ञानकी पहुँच है ।
इतो गतसनेकतां द्भदितः सवाप्येकता-
मितः क्षणविभद्ध रंश्वसितः स्देवोदयात्‌ ।
हुतः: परमबिस्तृतं धतमित: प्रदेशनिजे-
रहो सहजमात्मनस्तदिदमद्भुत॑ बेभवम्‌ ॥ १० ॥।

पुनः (सवेया इकतीसा )

विभाव सकति परनतिसों विकल दीसं,
सुद्ध चेतना विचारत सहज संत है।
करम संजोगर्सों कहाबे गति जोनि वासी,
निहचे सुरूप सदा मुकत महंत है।॥।
ज्ञायक सुभाउ धरे लोकालोक परगासी,
सत्ता परवांन सत्ता परगासवंत है।
सो हैजीव जानत जहान कोतृ॒क महान्,
जाको कोरति 'कहां न अनावि अनंत है ॥ ५० ॥

शब्दार्थ :- विकल->दुखी । सहज संत-स्वाभाविक शान्त । वासी> रहनेवाला । जहान->लोक । कीरति (कीति) >यश । कहा न०कहोॉ नही ।

अर्थ :- आत्मा विभाव परिणतिसे दुखी दिखता है, पर उसकी शुद्ध चेतन्यशक्तिका विचार करो तो वह साहजिक शान्तिमय ही है। वह कमंके संसगंसे गति योनिका प्रवासी कहलाता है, पर उसका निश्चय स्वरूप देखो तो कमें-बन्धनसे मुक्त परमेश्वर ही है। उसको ज्ञायक शक्तिपर दृष्टि डालो तो लोकालोकका शाता-ह॒ृष्टा है, यदि उसके अस्तित्वपर ध्यान दो तो निज क्षेत्रावगाहु-प्रमाण ज्ञानका पिण्ड है। ऐसा जोबव जगतका ज्ञाता है, उसकी लीला विशाल है, उसकी कोति कहाँ नहीं है, अनादि कालसे चली आतो है और अनंत काल तक चलेगी ॥ ५० ॥

१ ‘कहान’ ऐसा भी पाठ है अर्थात्‌ कहानी-कथा ।
कषायकलिरेकत: स्खलति शान्तिरस्स्येकतो
भवोपह॒तिरेकत: स्पृश?ाति मुक्तिरप्पेकत: ।
जगत्त्रितवमेकत: स्फुरति चिच्चकास्स्पेकत:
स्वभावमहिसात्सतों विजयतेप्द भताददूभुत: ॥ ११॥

साध्यस्वरूप केवलज्ञानका वर्णन (सवेया इकतीसा )

पंच परकार ग्यानावरनकों नास करि,
प्रगटी प्रसिद्ध जग मांहि जगसगी है।
जशञायक प्रभामें नाना शेयकी अवस्था धरि,
अनेक भई पे एकताके रस पगी है॥।
याही भांति रहेगी अनंत काल परजंत,
अनंत सकति फोरि अनंतसों लगी है ।
नरदेह देवलमें केवल सरूप सुद्ध,
ऐसी ग्यानज्योतिकी सिखा समाधि जगी है ॥ ५१ ॥

शब्दार्थ :- फोरि८स्फुरित करके । देवल> मंदिर । सिखा (शिखा ) लो । समाधि>अनुभव ।

अर्थ :- जगतमें जो ज्ञायक ज्योति पाँच प्रकारका ज्ञानावरणोय कर्म नष्ट करके चमकती हुई प्रगट हुई हैओर अनेक प्रकार शेयाकार परिणमन करने पर भो जो एकरूप हो रही है बह ज्ञायक शक्ति इस ही प्रकार अनन्त काल तक रहेगी और अनन्त वीर्यकों स्फुरित करके अक्षय पव प्राप्त करेगी । वह शुद्ध केवलज्ञानरूप प्रभा मनुष्य-वेहरूप मंदिरमें परम शान्तिमय प्रगट हुई है ॥ ५१ ॥

अमृतचन्द्र कलाके तीन अर्थ (सवेया इकतीसा )

अच्छुर अरथमें सगन रहे सदा काल,
महासुख देवा जेसी सेवा कामगविकी ।
जयति सहजतेज पुञ»जमज्जत्त्रिलोको-
स्खवलदखिलविकल्पो5प्येक एवं स्वरूप: ।
स्वरसविसरपूर्णाष्छिप्नतत्त्वोपलम्भ.
प्रसभनियमिताश्चिथ्िनद्मत्कार एव ॥ १२ ॥
अविचलितलिदात्मन्यात्मतात्मानमात्म-
स्थनवरतनिसरत घारयद ध्वस्तमोहम ।
उवितमभृतचन्रज्यो तिरेतरसमन्ता-
ज्ज्वलतु विमलपूर्ण नि सपत्नस्वभावम्‌ ॥१३।॥।
अमल अबाधित अलख गुन गावना है,
पावना परम सुद्ध भावना है भविकी ।।
मिथ्यात तिमिर अपहारा वर्धमान धारा,
जेसी उ्भ जामलों किरण दोपें रबिको ।
जैसी है अमृतचन्द्र कला त्रिधारूप धरे,
अनुभो दसा गरंथ टीका बुद्धि कविकी ॥ ५२ ॥
शबदार्थ :- कामगवि>कामघधेनु ।अलख"आत्मा । पावनाल्‍पवित्र।
अपहारा नष्ट करनेवाली । वर्धभान>उन्नतिरूप । उभे जामलदोपहर ।
त्रिधारूप "तीन प्रकारकी ।

अर्थ :-अमृतचन्द्र स्वामीकी चंद्रकला; अनुभवको, टोकाकी और कविताकी तोनरूप हैसो सदाकाल अक्षर अर्थ अर्थात्‌ मोक्ष पदार्थसे भरपूर है, सेवा करनेसे कामधेनुके समान महा सुखदायक है। इसमें निमेल और शुद्ध परमात्माके गुणसमूहका वर्णन है, परम पवित्र है,निमंल हैऔर भव्य जीवोंके चितवन करने योग्य है, सिथ्यात्वका अंधकार नध्ट करनेवाली है, दोपहरके सुयके समान उन्नतिशोल है ॥५२॥

(दोहा )

नाम साध्य साधक कट्ों, द्वार द्वादसम ठीक ।
समयसार नाटक सकल, पुूरन भयो सटीक ॥ ५३१ ॥

अर्थ :- साध्य-साधक नामक बारहवाँ अधिकार वर्णन किया और श्रीअमृतचंद्राचायक्रत समयसा रजी समाप्त हुए ॥ ५३ ॥

ग्रंथके अतमे ग्रथका रकीआलोचना (दोहा)

अब कवि निज पूरब दसा, कहें आपसों आप।
सहज हरख मनमें धरे, कर न पश्चाताप ।५४।।

अर्थ :- स्वरूपका ज्ञान होनेसे प्रसन्नता प्रगट हुई और संतापका अभाव हुआ हैइसलिये अब काव्यकर्त्ता स्वयं ही अपनी पृवेंदशाकी आलोचना करते हैं ॥ ५४ ॥

(सवेया इकतीसा )

जो मैंआपा छांड़ि दीनो पररूप गहि लीनो,
कीनो न बसेरो तहां जहां मेरो थल है ।
भोगनिकौ भोगी छूंकरमकौ करता भयौ,
हिरदे हमारे राग हंघ मोह मल है ॥।
,. ऐसी विपरीत चाल भई जो अतीत काल,
सो तो मेरे क्रियाकी समताहीको फल है ।
ग्यान हृष्टि भासी भयो क्रियासों उदासी वह,
मिथ्या मोह निद्रामें सुपनकोसो छल है ॥ ५५ ॥

शब्दार्थ :- बसेरौ>निवास । थल>स्थान । अतीत काल“पूर्व समय । सुपन स्वप्न ।

अर्थ :- मैंने पृ्वंकालमें अपना स्वरूप ग्रहण नहीं किया, परपदार्थोंको अपना साना और परम सम्राधिमें लीन नहीं हुमा, भोगोंका भोक्‍्ता बनकर कर्मोका कर्ता हुआ, और हृदय राग-द्वेष-मोहके मलसे मलिन रहा। ऐसी विभाव परिणतिसें हमने ममत्वभाव रक्‍्खा अर्थात्‌ विभाव परिणतिकों आत्म- परिणति समझा, उसके फलसे हमारी यह दशा हुई। अब ज्ञानका उदय होनेसे क्रियासे ब्रक्त हुआ हूँ, पहलेका कहा हुआ जो रूछ हुआ यह भिथ्यात्वकों मोहनिद्रामें स्वप्न कंसा छल हुआ है, अब नोंद खुल गई ॥ ५५ ॥

(दोहा)

अम्नतचन्द्र मुनिराजकृत, पूरन भयौ गिरंथ।
समयसार नाटक प्रगटठट, पंचम गतिको पंथ ॥ ५६ ॥
यस्सावुह तमभुत्पुरा स्वपरयोगू ते यतो5त्रान्तरं
रागद षपरिप्रहे सति यतो जात॑ क्रियाकारके. ।
भुझ्जाना च यतोउतुभतिरखिलं खिन्च’ क्रियाया: फल
तद्िज्ञानधनौघमर्नमधुता किड्चिन्न किड्चित्किल ॥ १४ ॥
स्वशक्तिसंप्तुच्ितवस्तुतस्वेव्याख्या कृतेव समयस्य शब्दें: ।
स्वरुपगुप्तस्य न किश्चिवस्ति कर्तव्यसेवामृतवन्दसूरे’ ॥१५॥।
इति समयसारकलशा. समाप्ता: ॥
मिनी शक नकल निनिकिकिकफिभअ कक की
जीकी ककककक… ल_ललभलुुनन नाश

अर्थ :- साक्षात्‌ मोक्षका मार्ग बतलानेवाला श्रीअमृतचंद्रजो मुनिराज- कृत समयसार नाटक ग्रंथ संपूर्ण हुआ ॥॥ ५६ (। बारहबें अधिकारका सार जो साथ सो साधक, जिसको साधा जावे सो साध्य है। मोक्षमार्गमें, “मैं साध्य साधक मै अबाधक ” को नीतिसे आत्मा ही साध्य हैऔर आत्मा हो साधक है, भेद इतना हैकि ऊंँचेकी अवस्था साध्य और नीचेकी अवस्था साधक हैइसलिये केवलज्ञानी अहँत सिद्ध पर्याय साध्य ओर सम्यग्हृष्टि श्रावक साधु अवस्थाएँ साधक हैं। अनंतानुबंधीकी चौकड़ी और वर्शनमोहनोय त्रयका अनुदय होनेसे सम्यग्दर्शन होता है, और सम्यग्दर्शन प्रगट होने पर हीजीव उपदेशका वास्तविक पात्र होता है, सो मुख्य उपदेश तन धन जन आदिसे राग हटाने और व्यसन तथा विषय-वासनाओंसे विरक्त होनेका है।जब लौकिक सम्पत्ति और विषय-वासनाओंसे चित्त बिरक्त हो जाता है तब इन्द्र अहमिन्द्रकी सम्पदा भी विरस और निस्सार भासने लगती है, इसलिये ज्ञानी लोग स्वर्गादिकी अभिलाषा नहीं करते, क्योंकि जहाँ तक चढ़कर ‘देव इक इन्द्री मया’ को उक्तिके अनुसार फिर नीचे पड़ता है उसे उन्नति ही नहों कहते है, और जिस सुखमें दु:ःखका समावेश है वह सुख नहों दुःख हो है, इससे विवेकबान स्व ओर नक॑ दोनोंको एकही सा गिनते हैं। इस सर्वथा अनित्य संसारसें कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिससे अनुराग किया जावे; क्योंकि भोगोंमें रोग, संयोगमें वियोग. विद्यामें विवाद, शुचिमें ग्लानि, जयमें हार पायी जाती है। भाव यह हैकि संसारकी जितनी सुख-सामग्रियों हैं वेदु:खसय हो हैं,इससे साताकी सहेली अकेली उदासीनता जानकर उसकी हो उपासना करना चाहिए । ++5कभक कब

चतुर्दश गुणस्थानाधिकार (१३)

कवबिवर पंडित बनारसीदासजी विरचित मगलाचरण (दोहा)

जिन-प्रतिमा जिन-सारखो, नम बनारसि ताहि।
जाकी भक्ति प्रभावसो, कीनो ग्रन्थ निवाहि ॥ १ ॥

शब्दार्थ :- सारखी-सहश । निवाहिल्‍निर्वाह ।

अर्थ - जिसकी भक्तिके प्रसादसे यह ग्रग्थ निविध्न समाप्त हुआ ऐसी जिनराज सहश जिन-प्रतिमाको पं ० बनारसो दासजो नमस्कार करते हैं॥ ११ ॥

जिन-प्रतिविम्वका माहात्म्य (सर्वेया इकतीसा )

जाके मुख दरससों भगतके नेननिकों,
थिरताकी बानि बढ़े चंचलता बिनसी ।
मुद्र। देखि केवलीकी मुद्रा याद आवे जहां,
जाके आगे इंद्रको विभूति दीसे तिनसी ।॥
जाको जस जपत प्रकास जग हिरदेम,
सोइ सुद्धमति होइ 'हुती ज्ञु मलिनसी।
कहत बनारसी सुमहिमा प्रगट जाकी,
सोहे जिनकी छबि सुविद्यमान जिनसी ॥ २॥।
शब्दर्थ :- वानि>आदत । विनसो-नष्ट हुई। विभूति-सम्पत्ति ।
तिनसी (तृणसी)5तिनकाके समान । मलिनसी (मलिन सी)>मैली
सरीखी । जिनसी+ऊजिनदेव सहण ।

‘कुमति मलिनसी’ ऐसा भी पाठ है ।

अर्थ :- जिसके मुखका दर्शन करनेसे भक्तजनोंके नेत्रोंकी चंचलता नष्ट होती है और स्थिर होनेकी आदत बढ़ती है अर्थात्‌ एकदस टकटकी लगाकर देखने लगते हैं,जिस मुद्राके देखनेसे केवली भगवानका स्मरण हो पड़ता है, जिसके सामने सुरेन्द्रको सम्पदा भी तिनकेके समान तुच्छ भासने लगती है, जिसके गुणोंका गान करनेसे हृदयमें ज्ञानका प्रकाश होता हैऔर जो बुद्धि सलिन थो वह पवित्र हो जातो है। पं० बनारसोदासजो कहते हैं कि जिनराजके प्रतिबिस्बको प्रत्यक्ष महिमा है, जिनेन्द्रकी मुति साक्षात्‌ जिनेन्द्रके समान सुशोभित होती है ॥ २।॥

जिन-मू्ति पृजकोंकी प्रशंसा (सवेया इकतीसा )

जाके उर अंतर, सुद्रिष्टिकी लहर लसी,
विनसी मिथ्यात मोहनिद्राकी ममारखी ।
सेली जिनशासनकी फंली जाके घट भयो,
गरबकौ त्यागी षट-दरबकों पारखी ॥
आगमक अच्छर परे है जाके श्रवनम,
हिरदे-भंडारस समानी वानी आरखी।
कहत बनारसी अलप भवधिति जाकोी,
सोई जिन प्रतिमा प्रवांने जिन सारखों )। ३॥।

शब्दार्थ :- सुद्रिप्टिज्सम्यग्द्शन । ममारखी->समूर्छा - अचेतना । सेली (शेली )>पद्धति । गरव (गर्व)-अभिमान । पारखी-परीक्षक । श्रवन>कान । समानी-प्रवेश कर गई ।आरखी (आएषित )5ऋषि प्रणीत। अलप (अल्प) "थोड़ी ।

अर्थ :- पण्डित बनारसोदासजो कहते हैं किजिसके अंतरंगमें सम्यग- दर्शनकी तरंग उठकर मिथ्यात्व मोहनीयजनित निद्राकी असावधानी नष्ट हो गई है, जिनके हृदयमें जेनमतकी पद्धति प्रगट हुई है, जिन्होंने मिथ्यामि- मानका त्याग किया है, जिन्हें छह द्रव्योंके स्वरूपकी पहिचान हुई है, जिन्हें अरहंत कथित आगमका उपदेश श्रवणगोचर हुआ है, जिनके हृदयरूप भंडारसे जन ऋषियोके वचन प्रवेश कर गये है, जिनका संसार निकट आया हैवे हीजिन-प्रतिमाको जिनराज सहश मानते हैं ।। ३ ७

प्रतिज्ञा (चौपाई )

जिन-प्रतिमा जन दोष निकंदे ।
सीस नमाइ बनारसि बंद ॥।
किरि मनमांहि विचार ऐसा ।
’ नाटक गरंथ परम पद जैसा ॥ ४ ॥
परम तत्त परच इस मांही।
गुनथानककी रचना नांही ॥।
या गुनथानक रस आवदे।
तो गरंथ अति सोभा पावे ॥ ५॥।

शब्दार्थ :- निर्कंद >नप्ट करे । गुनथानक (ग्रुणस्थान) >मोह और योगके निमित्तसे सम्यम्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्ररूप आत्माके गुणोकी तारतम्यरूप अवस्थविशेषको गुणस्थान कहते है। यामै-इसमें ।

अर्थ :- जिनराजकी प्रतिमा भक्तोंके मिथ्यात्वको दूर करती है । स जिनप्रतिसाको पं० बनारसीदासजीने नमस्कार करके मनमें ऐसा विचार किया कि यह नाटक समयतसार ग्रंथ परमपदरूप है ओर इसमें आत्मतत्त्वका व्याख्यान तो है,परन्तु गुणस्थानोंका वर्णन नहीं है ।यदि इसमें गुणस्थानोंकी

चर्चा सम्मिलित हो तो ग्रंथ बहुत ही उपयोगी हो सकता है ।। ४-५॥।॥ (दोहा )

इह विचारि संछेपसों, गुनथानक रस चोज ।
वरनन करे बनारसी, कारन सिव-पथ खोज ॥ ६ ॥
नियत एक विवहारसों, जीव चतु्दंस भेद ।
रंग जोग बहु विधि भयौ, ज्यों पटसहज सुफेद ॥ ७ ॥

शब्दार्थ :- सछेपसो >थोडेमे । जोग (योग) ->-सयोग । पट८-वस्त्र ।

अर्थ :- यह सोचकर पं० बनारसीदासजी शिव-पार्ग खोजनेमें कारणभूत गुणस्थानोंका संक्षिप्त वर्णन करते हैं ॥ ६ ॥ जीवपदार्थ निश्चयनयसे एकरूप है और व्यवहारनयसे गुणस्थानोंके भेदसे चोदह प्रकारका है । जिस प्रकार श्वेत वस्त्र रंगोंके संयोगसे अनेक रंगका हो जाता है, उसी प्रकार मोह और योगके संयोगसे संसारी जीबोंमें चौदह अवस्थाएँ पायी जाती हैं ॥ ७ ॥

चौदह गुणस्थानोके नाम (सबेया इकतीसा )

प्रथम मिथ्यात दूजो सासादन तीजो मिश्र,
चतुर्थ अन्त पंचमो विरत रंच है।
छट्टी परमत्त नाम सातमो अपरमत्त,
आठमो अप्रवकरन सुखसंच है।।
नौमों अनिवत्तिभाव दशमों सूच्छम लोभ,
एकादशमों स॒ उपसांत मोहबंच हे!
द्ादशमों खोनमोह तेरहो सजोगी जिन,
चोदहो अजोगी जाकी थिति अंक पंच है ॥ ८ ॥

शब्दार्थ :- रंच + किचित्‌ु । सुखसच 5आनंदका सग्रह। वच (वचकता ) >ठगाई-- धोखा । थिति-स्थिति । अक पच>-पांच अक्षर ।

अर्थ :- पहला मिथ्यात्व, दूसरा सासादन, तीसरा मिश्र, चौथा अश्वत- सम्पस्टष्टि, पाँचवों देशव्त, छठवाँ प्रमत्त मुनि, सातवाँ अप्रभत्त मुनि, आठवाँ अपुर्वकरण, नववाँ अनिवृत्तिकरण, दसवाँ सुक्ष्मलोंम, ग्यारहवों उपशांतमोह, बारहवाँ क्षीणमोह, तेरहवाँ सयोगी-जिन और चौदहवाँ अयोगी जिन जिसकी स्थिति अइ उ ऋ लू इन पाँच अक्षरोंके उच्चारण-फालके बराबर है ॥ ८ ॥

मिथ्यात्व गुणस्थानका वर्णन (दोहा )

बरने सब गुनथानके, नाम चतुर्दंस सार ।
अब बरनो मिथ्यातके, भेद पंच परकार ॥ ६ ॥

अर्थ :- गुणस्थानोंके चोदह मुख्य नाम बतलाये । अब पाँच प्रकारके मिथ्यात्वका वर्णन करते हैं ॥ ६ ॥

मिथ्यात्व गुणस्थानमें पॉच प्रकारके भिथ्यात्वका उदय रहता है (सवैया इकतीसा )

प्रथम एकांत नाम मिथ्यात अभिग्रहीत,
दूजी विपरीत अभिनिवेसिक गोत है।
तीजौ विने मिथ्यात अनाभिग्रह नाम जाकौ,
चोथोौ संस जहां चित्त भोरकौसो पोत है ।।
पांचमो अग्यान अनाभोगिक गहलरूप,
जाक॑ उदे चेतन अचेतसौ होत है।
एई पांचों मिथ्यात जीवकौ जगमे अ्रमावे,
इनको विनास समकितकौ उदोत है॥ १० ॥
शब्दा्थ :- गोतननाम । भौर>भेंवर । पोत>"जहाज । गहल>
अचेतता । उदोत>प्रगट होना ।

अर्थ :- पहला अभिग्रहोत अर्थात्‌ एकान्त मिथ्यात्व है, दूसरा अभि- निवेशिक अर्थात्‌ विपरीत भिथ्यात्व है, तीसरा अनाभिग्रह अर्थात्‌ विनय मिथ्यात्व है, चौथा चित्तकों भंवरमें पड़े हुए जहाजके समान डॉाँवा्डोल़ करनेवाला संशय भिथ्यात्व है, पाँचवाँ अनामोगिक अर्थात्‌ अज्ञान मिथ्यात्व सर्वथा असावधानीकी मूर्ति है। ये पाँचों मिथ्यात्व जीवको संसारमें भ्रमण कराते हैंऔर इनके नष्ट होनेसे सम्यग्दर्शन प्रगट होता है ॥ १० ॥

एकान्त मिथ्यात्वका स्वरूप (दोहा)

जो इकंत नय पच्छ गहि, छके कहावे दच्छ ।
सो इकंतवादी पुरुष, मृषावंत परतच्छ ॥ ११ ॥

शब्दार्थ :- मृषावंत>भूठा । परतच्छ (प्रत्यक्ष )>साक्षात्‌ ।

अर्थ :- जो किसो एक नयका हठ प्रहण करके उसोमें लोन होकर अपनेको तस्ववेत्ता कहता है यह पुरुष एकान्तवादी साक्षात्‌ मिथ्यात्वी है ॥ ११ ॥

विपरीत मिथ्यात्वका स्वरूप (दोहा)

ग्रंथ उकत पथ उथपि जो, थापे कुमत स्वकीउ ।
सुजस हेतु गुरुता गहेै,सो विपरीती जोउ ॥ १२॥।

शब्दार्थ :- उकतत>कहा हुआ । उथपिज्खडन करके । गुरुता" बडप्पन ।

अर्थ :- जो आगमकरथित मार्गका खंडन करके स्नान, छुआछूत आदियें धर्म बतलाकर अपना कपोलक ल्पित पाखंड पुष्ट करता है ब अपनी नामवरीके लिये बड़ा बना फिरता हैवह जोव विपरोत-मिथ्यात्वी है ॥ १२॥।

विनय मिथ्यात्वका स्वरूप (दोहा)

देव कुदेव सुगुरु कुगुरु, ठाने समान जु कोइ ।
नते भगतिसों सबनिकों, बिने मिथ्याती सोइ ॥ १३ ॥

अर्थ :- जो सुदेव-कुदेव, सुगुरु-कुगुरु, सतशास्त्र-कुशास्त्र, सबको एकसा गिनता हैओर विवेकरहित सबकी भक्ति बन्दना करता है वह जीव बविनय-मिथ्यात्वी है ॥ १३ ॥

संशय मिथ्यात्वका स्वरूप (दोहा)

जो नाना विकलप गहै, रहै हिये हैरान ।
थिर ह्व॑ं तत्त्व न सहहै, सो जिय संसयवान ॥ १४ ॥

अर्थ :- जो जीव अनेक कोटिका अवलम्बन करके चंचल चित्त रहता हैओर स्थिर जित्त होकर पदार्थका यथार्थ श्रद्धान नहीं करता बह संशय- मिथ्यात्यी है ॥ १४ ॥

अज्ञान मिथ्यात्वका स्वरूप (दोहा)

जाको तन दुख दहलसों, सुरत होत नहि रंच ।
गहल रूप बरते सदा, सो अग्यान तिरजंच ॥! १५॥

शब्दार्थ :- सुरत >सुध । रंच>जरा भी । गहल>अचेतता ।

अर्थ :- जिसको शारीरिक कष्टके उद्वेगसे किखित्‌ मात्र मी सुध नहीं हैऔर सदेव तस्वज्ञानसे अनभिज्ञ रहता है, वह जीव अज्ञानों है, पशुके समान है । १५ ।)

मिथ्यात्वके दो भेद (दोहा)

पंच भेद मिथ्यातके, कहे जिनागम जोइ ।
सादि अनादि सरूप अब, कहूं अवस्था दोइ (। १६ ॥।

अर्थ :- जन शास्त्रोंसें जोपाँच प्रकारका सिथ्यात्व वर्णन किया है उसके सादि और अनादि दोनोंका स्वरूप कहता हूँ ॥ १६॥॥

सादि मिथ्यात्वका स्वरूप (दोहा)

जो मिथ्या दल उपसमे, ग्रंथि भेदि बुध होइ ।
फिर आवबे भिशथ्यातमं, सादि मिथ्याती सोइ ॥ १७ ॥

अर्थ :- जो जीव दर्शनमोहनीयका दल अर्थात्‌ मिथ्यात्व, सम्यक्- मिथ्यात्व और सम्यकप्रकृतिको उपशम करके मिथ्यात्व गुणस्थानसे चढ़कर सम्यक्‍त्वका स्वाद लेता हैऔर फिर भिथ्यात्वमें गिरता है वह सादि मिथ्यात्वी है ॥ १७ ॥

अनादि मिथ्यात्वका स्वरूप (दोहा)

जिनि ग्रंथी मेदी नहीं, ममता समगन सदोव ।
सो अनादि मिथ्यामतो, विकल बहिमुख जीव ॥ १८ ॥

शब्दार्थ :- विकल मूर्ख । बहिर्मुख >पर्यायबुद्धि ।

अर्थ :- जिसने सिथ्यात्वका कभी अनुदय नहीं किया, सदा शरोरादिसे अहंबुद्धि रखता आया है वह मूर्ख आत्मज्ञानसे शुन्य अनादि मिथ्यात्वी है॥ १८ ॥

सासादन गुणस्थानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा (दोहा)

कह्यों प्रथम गुनथान यह, मिथ्यामत अभिधान ।
करू "अलप वरनन अब, सासादन गुनथान ॥ १६॥।
? ‘अलपरूप अब बरनवी’ ऐसा भी पाठ है ।

अर्थ :- यह पहले मिथ्यात्व गुणस्थानका स्वरूप कहा । अब संक्ेफ्स सासादन गुणस्थानका कथन करते हैं॥ १६ ॥

सासादन गुणस्थानका स्वरूप (सवेया इकतीसा)

जैसे कोऊ छुधित पुरुष खाद खीर खांड,
वोन कर पीछेकौ लगार स्वाद पावे है ।
तेसे चढ़ि चौथे पांचए के छंद गुनथान,
काहू उपसमीकौ कषाय उदे आवे है ॥।
ताही समे तहांसों गिरे प्रधान दसः त्यागी,
मिथ्यात अवस्थाकां अधोमुख हूं धाव है।
बोचि एक समे वा छ आवली प्रवांन रहे,
सोई सासादन गनथानक कहावे है ॥ २० ॥

शब्दार्थ :- खाइ>णवकर । वौन"वमन ।प्रधान >ऊचा । अधोमुख गीचे । आवली >असख्यात समयोंकी एक आवली होती है ।

अर्थ :- जिस प्रकार कोई भूखा मनुष्य शक्कर मिली हुई खोर खादे और बमन होनेके बाद उसका किखित्‌ सान्र स्वाद लेता रहे, उसी प्रकार चोथे पांचदें छठयें गुणस्थान तक चढ़े हुए किसो उपशमोी सम्यकत्वीको कवायका उदय होता है तो उसी समय वहाँसे मिथ्यात्वमें गिरता है, उस गिरती हुई दशामें एक समय और अधिकसे अधिक छह आवली तक जो सम्पकत्वका किखचित्‌ स्वाद मिलता हैवह सासादन गुणस्थान है । विशेष :- यहाँ अनंतानुबंधी चौकड़ीमेंसे किसो एकका उदय रहता है ॥ २० ॥

तीसरा गुणस्थान कहनेकी प्रतिज्ञा (दोहा)

सासादन गनथान यह, भयो समापत बीय।
सिश्रनाम गुनथान अब, वरनन करू तृतीय ॥ २१॥।

शब्दार्थ :- बीय (बीजो’ )८दूसरा ।

अर्थ :- यह दूसरे सासादन गुणस्थानका स्वरूप समाप्त हुआ, अब तोसरे मिश्र गुणस्थानका वर्णन करते हैं ॥ २१ ॥

तृतीय गुणस्थानका स्वरूप (सर्वेया इकतीसा )

उपसमी समकितो क॑ तो सादि मिथ्यामतो,
द दुहुँनिकों सिश्चित सिश्यात आइ गहे है ।
अनंतानुबंधी चोकरोकों उदे नाहि जामे,
मिथ्यात समे प्रकृति सिथ्यात न रहे हे ।।
जहां सहृहन सत्यासत्यरूप समकाल,
ग्यानभाव मिथ्याभाव सिश्र धारा बहे है ।
याकी थिति अंतर मुहरत उभयरूप,
ऐसो मिश्र गुनधान आचारज कहे है ॥ २२ ॥

अर्थ :- आचाय॑े कहते हैं किउपशम सम्यग्हृष्टिअ थवा सादि सिथ्या- दृष्टि जीवको यदि सिश्र सिय्यात्व नामक करमंप्रकृतिका उदय हो पड़े और अनन्तानुबंधोकी चोकड़ी तथा मिध्यात्व मोहनीय और सम्पक्टथ मोहनीय इन छुह प्रकृतियोंका उदय न हो, वहाँ एकसाथ सत्यासत्य श्रद्धानरूप शान ओर मिश्यात्वभिश्वित माव रहते हैं वह मिश्र गुणस्थान है, इसका काल प्रंतमुहत है ।

भावार्थ :- यहाँ गुड़ मिश्रित बहोके समान सत्यासत्य सिश्चित भाव रहते हैं ॥ २२ ॥

चौथा गरुणस्थान बर्णन करनेकी प्रतिज्ञा (दोहा)

मिश्र दसा प्रन भई, कहो यथामति भाखि ।
अब चतुर्थ ग्रनथान विधि, कहों जिनागम साखि ॥ २३ ॥
) यह शब्द गुजराती भाषाका है ।

अर्थ :- अपने क्षयोपशमके अनुतार सिश्र गुणस्थानका कथन समाप्त हुआ, अब लिनागमक्की साक्षीपूर्वक चोथे गुणस्थानका वर्णन करता हूं ॥२३।।

चौथे गुणस्थानका वर्णन (सवेया इकतीसा )

केई जीव समकित पाइ अर्ध पुदगल-
परावते काल तांई चोखे होइ चिंतके ।
केई एक अंतरमुहरतमें गंठि भेदि,
समारग उलंधि सुख वेद मोल वितके।॥।
ताते अंतरमुहरतसों अधंपुदगल लौॉं,
जेते समे होहि तेते भेद समकितके ।
जाही समे जाकों जब समकित होइ सोई,
तबहीसों गुन गहैे दोस वहै इतके ॥ २४ ॥
शबदार्थ :- चोखे>अच्छे । वेदं>भोगे । दहै-जलावे । इतके-ससारके ।

अर्थ :- जिस किसी जीवके संसार संसरणका काल अधिकसे अधिक अद्धंपुदूगल परावर्तन और कमसे कम अंतसु हते शेष रहता हैवह निश्चय सम्यग्दर्शन ग्रहण करके चतुर्गतिरूप संसारकों पार करनेवाले मोक्षसुखकी बानगो लेता है। अंतस्ु हृतेसेलगाकर अद्धंपुद्गल परावर्तन कालके जितने समय हैंउतने ही सम्यक्त्वके भेद हैं। जिस समय जोवकों सम्यकत्व प्रगट होता हैतभीसे आत्मग्रुण प्रगट होने लगते हैं ओर सांसारिक वोष नष्ट हो जाते हैं ॥ २४ ॥

(दोहा )

अध अपूव्व अनिवृत्ति त्रिक, करन करे जो कोइ ।
मिथ्या गंठि विदारि गुन, प्रगटे समकित सोह ॥ २५ ॥

अर्थ :- जो अध:करण, अपूर्यकरण, अनिव॒त्तिकरण पूर्वक मिथ्यात्वका हा करता है उसे आत्मातुभव गुण प्रगट होता है और बही सम्यक्‍त्व

सम्यक्‍्त्वके आठ विवरण (दोहा)

समकित उतपति चिहन गुन, मृषन दोष विनास।
अतीचार जुत अष्ट विधि, वरनों विबवरन तास ॥ २६ ॥

अर्थ :- सम्यक्त्वका स्वरूप, उत्पत्ति, चिह्न, गुण, भूषण, दोष, नाश, ओर अतिचार ये सम्यक्‍त्वके आठ विवरण हैं ॥ २६ ॥

(१) सम्यक्त्वका स्वरूप (चौपाई)

सत्यप्रतीति अवस्था जाको ।
दिन दिन रोति गहे समताको ॥।
छिन छिन करे सत्यकौ साकौ ।
समकित नाम कहाबे ताकों । २७।॥।

अर्थ :- आत्मस्वरूपकी सत्यप्रतोति होना, दिन-प्रतिदिन समता भावें उन्नति होना, और क्षण क्षणपर परिणामोंकी विशुद्धि होना इसोका नाम सम्यग्दर्शन है ॥ २७ ॥

(२) सम्यकत्वकी उत्पत्ति (दोहा)

क॑ तो सहज सुभाउ कं, उपदेसे गुरु कोद ।
चहुंगति सेनी जीउकौ, सम्यकदरसन होईइ ॥ २८ ॥

अर्थ :- चतुर्गतिमें संनी जोवको सम्यग्दशेन प्रगट होता है, सो अपने- आप अर्थात्‌ निसगेज और गुरुके उपदेशसे अर्थात्‌ अधिगमज होता है ॥ २८ ॥

(३) सम्यक्त्वके चिह्न (दोहा)

आपा परिचे निज विष, उपजे नहीं संदेह ।
सहज प्रपंच रहित दसा, समकित लच्छ्न एहू । २६॥।

अर्थ :- अपनेमें हीआत्मस्क्टपका परिचय पाता है, कभो सन्देह नहीं उपजता और छल-कपटरहित वेराग्यमाव रहता है, यही सम्यरदर्शनका चिह्न है ॥ २६ ॥

(४) सम्यग्दशंनके आठ गुण (दोहा)

करुना वच्छेल सुजनता, आतम निंदा पाठ ।
समता भगति विरागता, धरमराग गुन आठ ॥ ३० ॥

अर्थ :- करुणा, मैत्री, सज्जनता, स्वलघुता, समता, श्रद्धा, उदासीनता और धर्मानुराग ये सम्यक्त्वके आठ गुण हैं ॥ ३० ॥

(५) सम्यकत्वके पाँच भूषण (दोहा)

चित प्रभावना भावजुत, हेय उपादे वानि ।
धीरज हरख प्रवीनता, भूषन पंच बखानि ॥ ३१ ॥

अर्थ :- जेनधर्मकी प्रभावता करनेका अभिप्राय, हेय-उपादेयका विवेक, धीरज, सम्यग्दर्शनकी प्राप्सिका हुए और तत्त्व-विचारमें चतुराई मे पांच सम्यग्दशनके भूषण हैं ॥ ३१ ॥

(६) सम्यर्दर्शन पच्चीस दोष वर्जित होता है (दोहा)

अष्ट महाभद अच्ट मल, घट आयतन विशेष ।
तीन मढ़ता संजुगत, दोष पचीसों एब ॥ ३२ ॥

अर्थ – आठ मद, आठ मल, छह अनायतन और तोन म॒ढ़ता ये सब मिलाकर पच्चोस दोष हैं॥ ३२ ॥

आठ महामदके नाम (दोहा )

जाति लाभ कुल रूप तप, बल विद्या अधिकार ।
इनको गरब जु कीजिये, यह मद अष्ट प्रकार ॥ ३३ ॥
,. अर्थ :-जाति, धन, कुल, रूप, तप, बल, विद्या ओर अधिकार इनका
गव करना यह आठ प्रकारका महामद है ॥ ३३ ॥

आठ मलोंके नाम (चौपाई )

आसंका अस्थिरता वांछा ।
ममता द्विष्टि दसा 'दुरगंछा ।।
१) उलानि।
वच्छुल रहित दोष पर भाख।
चित प्रभावना मांहि न राख ॥ ३४ ॥

अर्थ :- जिन-वचनमें सन्‍्देह, आत्मस्वरूपसे चिगना, विषयोंकी अभिलाषा, शरीरादिसे ममत्व, अशुचिमें ग्लानि, सहधर्मियोंसे हेष, दूसरोंकी निंदा, ज्ञानको बुद्धि आदि धर्म-प्रभावनाओंमें प्रसाद येआठ मल सम्यग्दर्शन को,वृषित करते हैं॥ २४ ॥

छह अनायतन (दोहा)

कुगुरु कुदेव कुधर्म धर, कुगुरु कुदेव कुधर्म ।
इनकी करें सराहना, यह षडायतन कम ॥ ३५॥॥

अर्थ :- कुगुरु, कुदेव, कुधर्मके उपासकों और कुगुरु, कुदेव, कुधमंकी प्रशंसा करना ये छह अनायतन हैं॥ ३५ ॥

तीन मूढताके नाम और पच्चीस दोषोका जोड (दोहा)

देवमढ़ गुरुमढ़ता, धमंमृूढ़ता पोष ।
आठ आठ बट तोन मिलि, ए पच्चीस सब दोष ॥ ३६ ॥

अर्थ :- देवमुढ़ता अर्थात्‌ सच्छे देवका स्वरूप नहीं जानना, ग्रुरुमृढ़ता अर्थात्‌ निम्नंत्थ सुनिका स्वरूप नहीं समझना और धमंमूढ़ता अर्थात्‌ जिन- मा्ित धर्मका स्वरूप नहीं समभना ये तोन मूढ़ता हैं। आठ मद, आठ मल, छह अनायतन तथा तोन मूढ़ता सब मिलाकर पच्खीस दोष हुए ॥॥ ३६१

(७) पॉच कारणोसे सम्यक्त्वका विनाश होता है (दोहा)

ग्यान गरब सति संदता, निठर वचन उदगार।
रद्रभाव आलस दसा, नास पंच परकार ॥ ३७ ॥

अर्थ :- ज्ञानका अभिमान, बुद्धिको होनता, निर्देय बचनोंका भाषण, क्रोधी परिणाम और प्रमाद ये पाँच सम्यकत्वके घातक हैं ॥ ३७ ॥

शैजद संभ्रयंतार नौटैक

(5८) सम्यग्दर्शनके पाँच अतिचार (दोहा)

लोक हास भय भोग रुचि, अग्र सोच थिति मेव ।
सिथ्या आगमकी भगति, सृषा दर्सनी सेव ॥ ३८ ॥

अर्थ :- लोक-हास्यका भय अर्थात्‌ सम्यवत्वरूप प्रवृत्ति क रनेमें लोगोंकी हँसीका मय, इन्द्रियोंके विषय भोगनेमें अनुराग, आगामी कालकी चिन्ता,

कुशास्त्रोंकी भक्ति ओर कुवेबोंकी सेवा ये सम्यग्दर्शनके पाँच अतिचार थे (चौपाई )

अतोचार ए पंच परकारा ।
समल कर्राह समकितकी धारा ॥।
दृषन भूषन गति अनुसरनी ।
दसा आठ समकितको बरनी ॥ ३६ ॥

अर्थ :- ये पाँच प्रकारके अतिचार सम्यग्दर्शनकी उज्ज्वल परिणतिको मनिन करते हैं। यहाँ तक सम्यग्दर्शनको सदोष व निर्दोष दशा प्राप्त कराने वाले आठ विवरण वर्णन किये ॥ ३६ ॥

मोहनोयकर्मकी सात प्रकृतियोके अनुदयसे सम्यर्दर्शन प्रगट होता है (दोहा )

प्रकृति सात अब मोहकी, कहूं जिनागम 'जोइ ।
जिनको उदे निवारिकं, सम्यग्दरसन होइ ॥ ४० ॥

अर्थ :- मोहनीयकमंकी जिन सात प्रकृतियोंके अनुदयसे सम्यर्दर्श प्रगट होता है,उन्हें जिनशासनके अनुसार कहता हूँ ॥। न मोहनीयकमंकी सात प्रकृतियोके नाम (स्वेया इकतीसा चारित मोहको च्यारि सिथ्यातकी तोन तामें, प्रथम प्रकृति अनंतानुबंधी कोहनी । बीजी महा-मानरसभीजी मायामयी तीजी, चोथी भहालोभ दसा परिपग्रह पोहनो ॥॥ पाँच मिध्यातमति छट्टी मिश्रपरनति, सातईं समे प्रकृति समकित मोहनी । एई घट विगवनितासी एक कुतियासी, सातों सोहप्रकृति कहावे सत्ता रोहनी ॥ ४१ ॥

शब्दार्थ :- चारितमोह>जो आत्माके चारित्र ग्रुणका घात करे। अनन्तानुबन्धी “जो आत्माके स्वरूपाचरण चारित्रकों घाते-अनन्त संसारके कारणभूत मिथ्यात्वके साथ जिनका बन्ध होता है। कोहनी>क्रोध । 'बीजो- दूसरी । पोहनी>पुष्ट करनेवाली । विगवनितान्ब्याप्रनी । कुतिया कुृकरी - अथवा ककंशा स्त्री । रोहनी>ढदँकनेवाली ।

अर्थ :- सम्यक्त्वकी घातक चारित्रमोहनोषको चार और दर्शन- मोहनीयकी तीन ऐसी सात प्रकृतियाँ हैं ।उनमेंसे पहली अनंतानुबंधी क्रोध, दूसरी अभिमानके रंगसे रंगी हुई अनंतानुबंधो मान, तीसरी अनंतानुबंधी माया, चौथी परिप्रहको पुष्ट करनेवाली अनंतानुबंधी लोभ, पाँचयों मिथ्यात्व, छट्टी मिश्र मिध्यात्व ओर सातवों सम्यकत्वमोहनोय है। इनमेंसे छह प्रकृतियाँ व्या प्रनोकेसमान सम्यक्त्वके पीछे पड़कर भक्षण करनेवालोी हैं, और सातवीं कुतिया अर्थात्‌ कुत्तो वा क्कंशा स्त्रोके समान सम्यकक्‍त्वको सकंप वा सलिन करनेवालो है । इस प्रकार ये सातों प्रकृतियाँ सम्पक्त्वके सद्भावको रोकहो हैं ॥ ४१ ॥

सम्यक्त्वोंके नाम (छप्पय छन्द)

सात प्रकृति उपसमहि, जासु सो उपसम संडित ।
सात प्रकृति छय करन-हार छायिकी अखंडित ॥।
सातमांहि कछु खप, कछुक उपसम करि रकक्‍खें ।
सो छय उपसमवंत, मिश्र समकित रस रक्‍खें ।।
) यहू शब्द गुजराती भाषाका है ।
लि कमान की मिकमकिलीअधिक पल कक आनजक 38. 33 3.नाब कहकल
घट प्रकृति उपसमे वा खपे, अथवा छय उपसम करे ।
सातई प्रकृति जाके उदय, सो वेदक समकित धरे ॥ ४२ ॥

शब्दार्थ :- अखडित-अविनाशी । चक्खे-स्वाद लेवे। खपेरक्षय करे ।

अर्थ :-जो ऊपर कही हुई सातों प्रकृतियोंको उपशमाता हैवह ओऔपशमिकसम्यस्टृष्टि है। सातों प्रकृतियोंका क्षय करनेवाला क्षायिकसम्ध- गहृष्टि है, यह सम्यक्त्व कभी नष्ट नहों होता । सात प्रकृतियोंमेंसे कुछ क्षय हों ओर कुछ उपशम हों तो, वह क्षपोपशमसम्यफ्त्वी है, उसे सम्यक्त्वका मिश्ररूप स्वाद मिलता है। छह प्रकृतियाँ उपशम हों वा क्षय हों अथवा कोई क्षय और कोई उपशम हो केवल सातवों प्रकृति सम्यक्त्व मोहनीयका उदय हो तो बह वेदक सम्यकत्वधारी होता है ॥ ४२ ॥

सम्यक्त्वके नव भेदोंका वर्णन (दोहा)

छुयठपसम वरते त्रिविधि, वेदक च्यारि प्रकार ।
छायक उपसम जुगल जुत, नौधा समक्तित धार ॥ ४३ ॥

शब्दार्थ :- त्रिविधि>तीन प्रकारका । जुगल>दों । जुत>सहित ।

अर्थ :- क्षयोपशमसम्पक्त्व तीन प्रकारका है, वेदकसम्यक्त्व चार प्रकारका है, ओर उपशम तथा क्षायिक ये दो भेद और मिलानेसे सम्पक्‍्त्वके नव भेद होते हैं॥ ४३ ॥

क्षयोपशमसम्यक्त्वके तीन भेदोका वर्णन (दोहा)

उ्यारि खिप त्रय उपसमे, पन छे उपसम दोड ।
छें घट उपसम एक यौ, छयउपसम त्रिक होइ ॥ ४४ ॥

अर्थ :- (१) चारका* अर तीनका* उपशम, (२) पाँचका: क्षय दोका* उपशम, (३) छहका* क्षय एकका उपशम, इस प्रकार क्षयोपशम- सम्यक्त्वके तीन भेद है ॥ ४४ ॥

) अनतानुबधीकी चोकडी ।

दर्शनमोहनीयका त्रिक । 3 अनंतानुबधी चौकड़ी और महामिथ्यात्व । 5 सिश्रमिध्यात्व और सम्यकप्रकृति ।

अनतानुबंधीकी चौकडी, महामिध्यात्व और मिश्र ।

वेदकसम्यक्त्वके चार भेद (दोहा)

जहां उ्यारि परकिति लिपि, हे उपसम इक वेद ।
छय-उपसम वेदक दसा, तासु प्रथम यह भेद ॥ ४५ ॥
पंच लिप इक उपसमे, इक वेदे जिहि ठोर।
सो छथ-उपसम वेदकी, दसा दुतिय यह और ॥ ४६ ॥
छे घट वेदे एक जो, छायक वेदक सोइ ।
षट उपसम इक प्रकृति विद, उपसम वेदक होइ ॥ ४७ ॥

अर्थ :- (१) जहॉ "चार प्रकृतियोंका क्षय, 'दोका उपशम ओऔर 3एकका उदय हैबह प्रथम क्षयोपशमवेदकसम्पक्त्व है, (२) जहाँ "पाँच प्रकृतियोंका क्षय * एकका उपशम ऑर एफका उदय हैवह द्वितोय क्षयोपशस- वेदकसम्यवत्व है, (३) जहाँ *छह ॒प्रकृतियोंका क्षय. और एकका उदय है वह क्षायिकवेदकसम्यक्त्व है, (४) जहाँ “छह प्रकृतियोंका उपशम और एकका उदय हैवह उपशसवेदकसस्यकत्व हे ॥। ४५-४६-४७॥

यहा क्षायिक व उपशमसम्यक्त्वका रवरूप न कहनेका कारण (दोहा)

उपसम छायककी दसा, प्रव षट पदमांहि।
कही प्रगट अब पुनरुकति, कारन वरनी नांहि ॥ ४८ ॥

शब्दार्थ :- पुनरुकति (पुनरुक्ति ) >बार बार कहना,।

अर्थ :- क्षायिक और उपशमसम्यक्त्वका स्वरूप पहले ४२ वें छप्पय छन्दमें कह आये हैं,इसलिये पुनरुक्ति दोषके कारण यहाँ नहीं लिखा ॥ ४८ ॥

नव प्रकारके सम्यक्त्वोका विवरण (दोहा)

छय-उपसम वेदक खिपक, उपसम समकित च्यारि ।
तोन च्यारि इक इक मिलत, सब नव भेद विचारि ॥ ४६ ॥
१ अनतानुबंधीकी चौकडी ।
२ प्रहामिथ्यात्व और मिश्र ।
3 सम्पकप्रकृति ।
डे अनंतानुबंधी चौकडी और महामिथ्यात्व ।
है मिश्र ।
६ अनतानुबधीकी चौकडी, महामिथ्यात्व और मिश्र ।

अनतानुबंधीकी चौकडी, महामिध्यात्व और मिश्र । जम आज >>म >> >लु>> लाए सकल लि

अर्थ :- क्षयोपशमसम्यवत्व तीन प्रकारका, वेदकसम्यक्त्ब चार इस प्रकार प्रकारका और उपशमसम्यवत्व एक तथा क्षाथिकसम्पक्ट्व एक, सम्यक्त्वके मूल भेद चार और उत्तर भेद नव हैं ॥ ४६ ॥

प्रतिज्ञा (सोरठा )

अब निहचे विवहार, अरु सामान्यविशेष विधि ।
कहाँ च्यारि परकार, रचना समकित भूमिकी ॥ ५० ॥

अर्थ :- सम्यकत्व सत्ताकी निश्चय, व्यवहार, सामान्य और विशेष ऐसी चार विधि कहते हैं ॥ ५० ॥

सम्यक्त्वके चार प्रकार (सवेया इकतीसा)

मिथ्यामति-गंठि-भेदि जगी निरमल जोति,
जोगसों अतीत सो तो निहचे प्रमानिये ।
वहै दुद दसासों कहावे जोग मुद्रा धरे,
मति श्रुतग्यान भेद विवहार मानिये ॥।
चेतता चिहन पहिचानि आपा पर वेदे,
पौरुष अलख ताते सामान्य बखानिये।
करे भेदाभेदकका विचार विसतार रूप,
हेय गेय. उपादेयलो विशेष जानिये ॥ ५१॥।
शब्दा्थ :- गंठि (ग्रंथि)-गॉठ । भेदिल्‍नष्ट करके । अतीतर
रहित । दुद दसासविकल्पता ।

अर्थ :- मिथ्यात्वके नष्ट होनेसे मन-बचन-कायके अग्रोचर जो आत्मा को निविकार श्रद्धानको ज्योति प्रकाशित होती है, उसे निश्चय सम्यक्त्व जानना चाहिये । जिसमें योग, मुद्रा, मतिज्ञान, श्रुतज्ञान आदिके विकल्प हैं, वह व्यवहार सम्यकत्व जानना । ज्ञानकी अल्प शक्तिके कारण मात्र चेतना चिह्लके धारक आत्माको पहिचानकर निज और परके स्वरूपका जानना सो सामान्य सम्यकत्व है, और हेय, ज्ञेय, उपादेयके भेदाभेदकों विस्तार- रूपसे समभना सो विशेष सम्यकत्व है ॥ ५१ ॥

चतुर्थ गुणस्थानके वर्णनका उपसंहार (सोरठा)

थिति सागर तेतीस, अंतम्‌ हुरतः एक वा।
अविरतसमकित रीति, यह चतुर्थ शुनथान इति ॥ ५२ ॥

अर्थ :- अव्वतत्म्पग्टष्टि गुणस्थानकी उत्कृष्ट स्थिति तेतीस सागर और जघन्य स्थिति अन्तमृहतेकी है। यह चौथे गुणस्थानका कथन समाप्त हुआ ॥ ५२॥।

अणब्रतगुणस्थानका वर्णन प्रतिज्ञा (दोहा)

अब वरनों इकईस गरुन, अरु बाबीस अभक्ष ।
जिनके संग्रह त्यागर्सों, सोभे श्रावक पक्ष ॥ ५३॥।

अर्थ :- जिन गुणोंके ग्रहण करने और अभक्ष्योंके त्यागनेसे श्रावकका पाँचवाँ गुणस्थान सुशोनित होता है,ऐसे इककीस गुणों और बाईस अभद्षयोंका वर्णन करता हूँ॥ ५३ ॥।

धरावकके इक्‍्कीस गुण (स्वेया इकतीसा )

लज्जाबंत दयावंत प्रसंत प्रतीतब॑ंत,
परदोषकों ढर्कया पर-उपगारी है।
सोमहष्टी गुनग्राही गरिष्ट सबकों दृष्ट,
शिष्टपक्षी मिष्टवादी दीरध बिचारी है 0
विशेषग्य रसग्य कृतग्य तग्य धरमग्य,
ने दीन न अभिसानी सध्य विवहारी है ।
सहज बविनीत पापक्रियासों अतीत ऐसो,
श्रावक पुनीत इकवीस गुनधारी है॥ ५४ ॥

शब्दार्थ :- प्रसंत-मंद कपायी । प्रतीतवंत>श्रद्धालु । ग्रिष्ट८ सहनशील । इष्ट>प्रिय । शिष्टपक्षी >सत्य पक्षमें सहमत । दी रघ विचारी अग्रसोची । विशेषज्ञरअनुभवी । रसज्ञ-मर्मका जाननेवाला। क्ृतज्ञ- दूसरोके उपकारको नहीं भूलनेवाला । मध्य विवहारी >दीनता और अभि- मान रहित । विनीत-नम्न । अतीतरहित । अथ्थे :- लज्जा, दया, मंदकषाय, श्रद्धा, दूसरोंके दोष ढहाँकना, परोप- कार, सौम्यहृष्टि, गुणप्राहकता, सहनशोलता, सर्वेप्रियता, सत्य पक्ष, सिष्ट- वचन, अग्रसोचो, विशेषज्ञानी, शास्त्रज्ञानकी मर्सज्ञता, कृतज्ञता, तस्वज्ञानो, धर्मात्मा, न दीन न अभिमानी - मध्य व्यवहारी, स्वाभाविक विनयवान, पापाचरणसे रहित - ऐसे इक्कोस पवित्र गुण श्रावकोंकोी ग्रहण करना चाहिये॥ ५४ ॥

बाईस अभक्ष्य (कवित्त
ओरा घोरबरा निसिभोजन,
बहुबीजा बंगन संधान ।
पीपर बर ऊमर कहठूबर,
पाकर जो फल होइ अजान (।
कंदमूल माटी विष आपमिष,
मधु साखन अरु मदिरापान ।
फल अति तच्छ तुसार चलित रस,
जिनमत ए बाईस अखान ॥ ५५ ॥

शब्दार्थ :- घोरवरा>द्विदल" । निसिभोजन>रातिमे आहार करना । सधान-अथाना, मुरब्बा। आमिष-मांस । मधु-शहद । मदिरा>शराब । अति तुच्छ-बहुत छोटे । तुषार>बफ । चलित रस>जिनका स्वाद बिगड़ जाय । अखान>अभक्ष्य ।

अर्थ :- (१) ओला (२) द्विदल (३) रात्रिभोजन (४) बहुबीजार (५) बेगन (६) अथाना, मुरब्बा (७) पीपर फल (5) बड़फल (६) ऊमर फल (१०) कठ्मर (११) पाकर फल (१२) 3अजान फल (१३) कंदमूल (१४) माटी (१५) विष (१६) मांस (१७) शहद (१८) मक्खन (१६) शराब (२०) अतिसूक्ष फल (२१) बर्फ (२२) चलित रस -ये बाईस अभक्ष्य जेनमतमें कहे हैं ॥ ५५ ॥

राज
जिन अन्नोकी दो दाले होती है, उन झन्नोके साथ
बिना गरम किया हुआ अर्थात्‌
कच्चा दूध, दही, मठा आदि मिलाकर खाना
अभद्ष्य है !

जिन बटबीजनके घर नाटि, ते गब बहुबीजा कहलाहि । ‘क्रियाकोश’ 3 जिन्हें पहिचानते ही नही है ।

प्रतिज्ञा (दोहा)

अब पंचम गुनथानकी, रचना बअरनों अल्प।
जामें एकादस दसा, प्रतिमा नाम विकल्प ॥ ५६ ॥

अर्थ :- अब याँचवें गरुणस्थानका थोड़ासा वर्णन करते हैं, जिसमें ग्यारह प्रतिमाओंका विकल्प है ॥ ५६ ॥

ग्यारह प्रतिमाओंके नाम (स्वेया इकतीसा )

दर्सनविसुद्धधारी बारह विरतधारो, सामाइकचारी पर्वप्रोषय विधि बवहे। सचितकौ परहारो दिवा अपरस नारो, आठों जाम ब्रह्मचारो निरारंभी हूँ रहै ॥। पाप परिग्रह छंडे पापकी न शिक्षा मंडे, कोऊ याके निमित्त करे सो वस्तु न गहे । ऐते देसब्रतके धरेया समकिती जीव, ग्यारह प्रतिमा तिन्‍हें भगवंतजी कहे ॥ ५७ ॥ अथे :- (१) सम्यग्वर्शनमें विशुद्धि उत्पन्न करनेवाली दर्शन प्रतिमा है, (२) बारह वरतोंका आचरण ब्ञत प्रतिमा है, (२) सामायिककी प्रवृत्ति सामायिक प्रतिमा है, (४) पर्वमें उपदवास-विधि करना प्रोषध प्रतिमा है, (५) सचिसका त्याग सब्ित्तविरत प्रतिमा है, (६) विनमें स्त्रो-स्पशेका त्याग विवासैथुनब्रत प्रतिमा है, (७) आठों पहुर स्त्रीमात्रका त्याग ब्रह्मचय प्रतिमा है, (८५) सर्व आरंभका त्याग निरारंम प्रतिमा है, (£) पापके कारणमुत परिग्रहका त्याग सो परिग्रहत्याग प्रतिमा है, (१०) पापकी शिक्षाका त्याग अनुमतित्याग प्रतिमा है, (११) अपने वास्‍्ते बनाये हुए मोजनाबिका त्याग उद्देशविरति प्रतिमा है। ये ग्यारह प्रतिमा वेशब्रतथारी सम्पर्हृष्टि जीवोंकी जिनराजने कहो हैं ॥ ५७ ॥

प्रतिमाका स्वरूप (दोहा)

संजम अंस जग्यो जहां, भोग अरुचि परिनाम ।
उद प्रतिग्याकाँ भयों, प्रतिमा ताकों नाम ॥ ४५८॥।

अर्थ :- चारित्र गुणका प्रगट होना, परिणामोंका मोगोंसे विरक्त होगा ओर प्रतिशाका उदय होना इसको प्रतिमा कहते हैं ॥ ५८ ॥

दर्शन प्रतिमाका स्वरूप (दोहा)

आठ मूलगुण संग्रहै, कुबिसन क्रिया नकोइ ।
दरसन गुन निरमल करे, दरसन प्रतिमा सोइ ॥ ५६ ॥

अर्थ :- दर्शन गुणकी निर्मेलता, अष्ट मूलगुणोंका" ग्रहण ओर सात कुव्यसनोंका त्याग इसे दर्शन प्रतिभा कहते हैं ॥ ५६ ॥

व्रत प्रतिमाका स्वरूप (दोहा)

पंच अनुश्रत आदर, तीनों गुनव्रत पाल।
सिच्छाव्रत चारों घरे, यह व्रत प्रतिमा चाल ॥ ६० ॥

अर्थ :- पाँच अणुत्रत, तीन गुणत्रत ओर चार शिक्षात्रतके धारण करनेको ब्रत प्रतिमा कहते हैं। विशेष :- यहाँ पंच अणुद्नतका निरतिचार पालन होता है,पर गुणव्त ओर शिक्षात्रतोंके अतिचार सबंधा नहों टलते ॥ ६० ॥

सामायिक प्रतिमाका स्वरूप (दोहा)

“दर्व भाव विधि संजुगत, हिये प्रतिग्या टेक ।
तजि समता समता ग्रहै, अंतरमुहरत एक ॥ ६१ ॥
पचपरमेष्ठीमेभक्ति, जीवदया, पानी छानकर काममे लाना, मद्य त्याग, मांस त्याग,
मधु त्याग, राजिभोजन त्याग और उदम्बर फलोका त्याग, ये आठ मूलगुण हैं।
कही कही मय, मास, मधु और पाँच पापके त्यागकों अष्ट मूलगुण कहा है, कही
कही पाँच उदबर फल और मद्य, माँस, मधुके त्यागकों मूलगुण बतलाये हैं ।
न्ज

सब ऐसा भी पाठ है (चौपाई)

जो अरि मित्र समान विचार!
आरत रोौदर कुध्यान निवार ।।
संयम सहित भावना भावे।
सो सामायिकबंत कहाबे ॥ ६२ ॥

शब्दार्थ :- दर्व विधि-बाह्य क्रिया - आसन, मुद्रा, पाठ, शरीर और वचनकी स्थिरता आदिकी सावधानी । भाव विधि>मनकी स्थिरता और प्रिणामोंमें समता भावका रखना । प्रतिज्ञान्आखड़ी । अरि> शत्रु । कुध्यान-खोटा विचार । निवारै<दूर करे ।

अर्थ :- मनमें समयकी प्रतिज्ञापू्वक द्रव्य और भावषविधि सहित, एक मुहुर्त अर्थात्‌ दोघड़ी’ तक समत्वभावरहित साम्यभाव ग्रहण करना, शत्रु और मित्रपर एकसा भाव रखना, आतं ओर रोद दोनों कुष्यानोंका निवारण करना और संयममें सावधान रहना सामायिक प्रतिभा कहलातो है ॥॥। ६१-६२॥।

चौथी प्रतिमाका स्वरूप (दोहा)

सामायिककीसी दसा, च्यारि पहरलों होइ ।
अथवा आठ पहर रहै, प्रोसह प्रतिमा सोइ ॥ ६३ ४४

अर्थ :- बारह घंटे अथवा चोबीस घंटे तक सामायिक जेसी स्थिति अर्थात्‌ समताभाव रखनेको प्रोषध प्रतिमा कहते हैं ॥ ६३ ॥

पाँचवीं प्रतिमाका स्वरूप (दोहा)

जो सचित्त भोजन तजे, पीवे प्राशुक नोर।
सो सचित्त त्यागी पुरुष, पंच प्रतिग्यागीर ॥ ६४ ॥॥।

अर्थ :- सचित्त भोजनका त्याग करना और प्रासुक* जल पान करना उसे सचित्तविरति प्रतिमा कहते हैं। विशेष :- यहाँ सचित्त वनस्पतिको भुखसे विदारण नहीं करते ।१६४।॥

गम किया हुआ वा लवग इलायची राख थआदि डालकर स्वाद बदल देनेसे पानी प्रासुक होता है । इै८दु समपतार नाटक

छट्ठी प्रतिमाका स्वरूप (चौपाई)

जो दिन ब्रह्मचर्य व्रत पाले।
तिथि आये निसि दिवस संभाल ।।
गहि नौ वाड़ि करे ब्रत रख्या ।
सो षट्‌ प्रतिमा श्रावक अख्या॥ ६५ ॥

अर्थ :- नव वाड़ सहित दिनमें ब्रह्मचयं त्रत पालन करना और परववं- तिथियोंमें दिन-रात ब्रह्मचर्य सम्हालना दिवामैयुनब्रत प्रतिमा है ॥ ६५ ॥।

सातवी प्रतिमाका स्वरूप (चौपाई)

जो नो वाड़ि सहित विधि साथ ।
निसि दिन ब्रह्मच्य आराधे।।
सो सप्तम प्रतिमा धर ग्याता ।
सील-सिरोसनि जग विख्याता ॥ ६६ ॥

अर्थ :- जो नव बाड़ सहित सदाकाल ब्रह्मचय व्रत पालन करता है,वह ब्रह्मचय नामक सातवों प्रतिमाका धारी ज्ञानी जगत्‌ विख्यात शोल-शिरोमणि है ॥ ६६ ॥

नव वाडके नाम (कवित्त)

तियथल वास प्रेम रुचि निरखन,
दे परोछ भाखे॑ मधु वेन।
पुरव भोग केलि रस चितन,
गुरु आहार लेत चित चेन ।।
करि सुचि तन सिगार बनावत,
तिय परजंक मध्य सुख सेन ।
सनसथ-कथा उदर भरि भोजन,
ये नोवाड़ि 'कहै जिन बेन ॥ ६७॥।
) ‘कहै मत ज॑न’ ऐसा भी पाठ है

शब्दार्थ :- तियथल वास #स्त्रियोंके समुदायमें रहना। निरखन> देखना । परीछ (परोक्ष)न्अप्रत्यक्ष । गुरु आहार« गरिष्ट भोजन । सुचिपवित्र ।परजंक>पलंग । मनमथ काम । उदर–पेट ।

अर्थ :- स्त्रियोंके समागममें रहना, स्त्रियोंको रागमरों हष्टिसे देखना, स्त्रियोंसे परोक्षमें’ सराग सम्भाषण करना, पूर्वकालमें भोगे हुए भोग-विलासोंका स्मरण करना, आनन्ददायक गरिष्ट भोजन करना, स्नान संजन आविके द्वारा शरोरको आवद्यकतासे अधिक सजाना, स्थ्रियोंके पलंग आसन आविपर सोना बेठता, कामकथा वा कामोत्पादक कथा गोतोंका सुनना, भूखसे अधिक अथवा खूब पेट मरकर भोजन करना। इनके त्यागकों जनमतमें ब्रह्मचयंकी तव वाड़ कहा है ॥ ६७ ॥

आठवीं प्रतिमाका स्वरूप (दोहा)

जो विवेक विधि आवरे, करे न पापारंभ ।
सो अष्टम प्रतिमा धनी, कुगति विज रनथंभ ॥ ६८ ॥

अर्थ :- जो विवेक पूर्वक घमंमें सावधान रहता है ओर सेवा कृषि वाणिज्य आदिका पापारंम नहीं करता, वह कुगतिके रणथंभको जोतनेबाली शाठवों प्रतिमाका स्वासी है ॥ ५८ ॥

नवबीं प्रतिमाका स्वरूप (चौपाई)

जो दसधा परियग्रहको त्यागी ।
सुख संतोष सहित वेरागी ॥।
खमसस संचित किचित ग्राही ।
सो श्रावक नो प्रतिमा बाही ॥ ६६ ॥

अर्थ :- जो बेराग्य और संतोषका आनन्द प्राप्त करता है, तथा दस प्रकारके परिग्रहोंमेंसे योड़ेसे वस्त्र व पात्र मात्र रखता है, बहु साम्य्ायका धारक नववों प्रतिमाका स्वामी है १ ६९ ॥॥ १ हृष्टि-दोष बचानेके लिये परदा आआादिकी ओटमें समाषण करना, अथवा पत्र-व्यवहार करना ।

दसवीं प्रतिमाका स्वरूप (दोहा)

परकों पापारंभको, जो न देइ उपदेस ।
सो दसमी प्रतिमा सहित, श्रावक विगत कलेस ॥ ७० ॥

अर्थ :- जो कुटुम्बो व अन्य जनोंकों विवाह, वाणिज्य आदि पापारंम करनेका उपदेश नहीं देता, वह पापरहित दसवों प्रतिमाका धारक है॥ ७० ॥

ग्यारहवी प्रतिमाका स्वरूप (चौपाई)

जो सुछंद वरत तजि डेरा।
मठ मंडपमैं करे बसेरा॥।
उचित आहार उदंड वबिहारी।
सो एकादश प्रतिमा धारी ॥ ७१ ॥

अर्थ :- जो घर छोड़कर मठ मंडपमें निवास करता है, और स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब आदिसे विरक्त होकर स्वतंत्र बतेता है, तथा कृत कारित अनु- मोवना रहित योग्य आहार ग्रहण करता है, वह ग्यारह॒वीं प्रतिमाका धारक है॥ ७१ ॥

प्रतिमाओंके सम्बन्धमें मुख्य उल्लेख (दोहा)

एकादश प्रतिमा दसा, कही देसब्नत मांहि ।
वही अनुक्रम मूलसों, गहो सु छूटे नांहि॥ ७२ ॥

अर्थ :- देशश्नत गुणस्थानमें ग्यारह प्रतिमाएँ ग्रहण करनेका उपवेश है। सो शुरूसे उत्तरोत्तर अंगीकार करना चाहिये और नीचेकी प्रतिमाओंकी क्रिया छोड़ना नहों चाहिये ॥ ७२ ॥

प्रतिमाओंकी अपेक्षा श्रावकोके भेद (दोहा)

षट प्रतिमा तांई जघन, मध्यम नौ परजंत ।
उत्तम दससी ग्यारसो, इति प्रतिमा बिरतंत ॥ ७३ ॥

अर्थ :- छठ्वों प्रतिमा तक जघन्य श्रावेक, नवदों प्रतिमा तक मध्यम भ्रावक और दसवों ग्यारह॒वीं प्रतिमा धारण करनेबालोंको उत्कृष्ट श्रावक कहते हैं। यह प्रतिमाओंका बर्णन पूरा हुआ ॥ ७३ ॥

पाँचवें ग्रुणस्थानका काल (चौपाई)

एक कोडि प्रव गिनि लीजे।
तामें आठ बरस घटि कीजे ।।
यह उत्कृष्ट काल थिति जाकी ।
अंतरमुहरत जघन दशाकों ॥ ७४॥।

अर्थ :- पांचवें गुणस्थानका उत्कृष्ट काल आठ वर्ष कम एक कोटि पूर्वओर जघन्य काल अंतमु ह॒त्तहै ॥ ७४ ॥

एक पू्वका प्रमाण (दोहा)

सत्तर लाख किरोर मित, छप्पन सहस किरोड़ ।
ऐते बरस सिलाइके, पुरव संख्या जोड़ ॥ ७५॥।।

अर्थ :-सत्तर लाख छप्पन हजार एक करोड़का गुणा करनेसे जो संख्या प्राप्त होती है, उतने वर्षका एक पृ" होता है ॥ ७५ ॥

अतर्मुहुतंका मान (दोहा)

अंतमु हूरत 6 घरी, कछुक घाटि उतकिष्ट ।
एक समय एकावली, अंतरमुहते कनिष्ट ॥ ७६ ॥

अर्थ :- दो घड़ीमेंसे एक समय कम अंतमु हृतंका उत्कृष्ट काल है और एक समय अधिक एक आवली *अंतमु हतंका जघन्य काल है तथा बीचके असंख्यात भेद हैं । ७६ ॥।

छट्ठ गुणस्थानका वर्णन-प्रतिज्ञा (दोहा)

यह पंचम गुनथानको, रचना कही विचित्र ।
अब छूट गुनथानकी, दसा कहू सुन मित्र ॥ ७७॥।

अर्थ :- पाँचवें गुणस्थानका यह विचित्र वर्णन किया; अब हेमित्र ! छूटु गुणस्थानका स्वरूप सुनो ॥ ७७ ॥

" चौरासी लाख वैषका एक पूर्वांग होता है, और चोरासी लाख पूर्वागका एक पूर्व
होता है ।
२ असंख्यात समयकी एक आवली होती है ।

छट्ु॑ गुणस्थानका स्वरूप (दोहा)

पंच प्रमाद दशा धरे, अट्टाइस गुनवान ।
थविरकल्पि जिनकल्पि जुत, हैप्रसत्तनुनथान ॥ ७८ ॥

अर्थ :- जो मुनि अट्टाईस मूलगुणोंका पालन करते हैं, परन्तु पाँच प्रकारके प्रमादोंमें किचित्‌ बतंते हैं, वेमुनि प्रमत्तगुणस्थानों हैं। इस गुण- स्थानमें स्थविरकलपी और जिनकल्‍पी दोनों प्रकारके साधु रहते है ॥ ७८ ॥

पाँच प्रमादोके नाम (दोहा)

धर्मराग विकथा वचन, निद्रा विषय कथषाय ।
पंच प्रसाद दसा सहित, परसादी मुनिराय ॥ ७६॥।

अर्थ :- घर्मंमें अनुराग, विकथावच्नन, निद्रा, विषय", कषाय* ऐसे पांच प्रमाद सहित साधु छंट्ट गुणस्थानवर्तों प्रमत्तमुनि होते है ।५७६।॥।

साधुके अट्टाईस मूलगरुण (सवेया इकतीसा )

पंच महाद्षत पाले पंच समिति संभाल,
पंच इंद्री जोति भयौ भोगी चित चेनकौ ।
घट आवश्यक क्रिया ववित भावित साध,
प्रासुक धरासमैं एक आसन है सेनकों ॥।
मंजन न करे केश लुच तन वस्त्र मु,
त्याग दंतवन पे सुगंध स्वास बेनकों।
ठाड़ो करसे आहार लघुभुजीएक बार,
भट्टठाइस मूलगुनधारों जती जेनकों ॥ ८० ॥

शब्दार्थ:-पचमहात्रत>पच पापोका सर्वथा त्याग । प्रासुक&जीव रहित । सेन (शयन )>सोना ।मजन>स्नान । केश>बाल । लुंचे>उखाड़े । मुचे>छोड़े ।करसे>हाथसे । लघु+थोड़ा । जती>साधु । )-* यहाँ अनतानुबंधी अप्रत्याख्यान प्रत्याब्यान इन तीन चौकड़ीकी बारह फषायोका अनुदय मौर सज्वलन कषायका तीब्र उदय रहता है, इससे वे साधु किचित्‌ प्रमादके बशमे होते हैऔर शुभाचारमे विशेषतया वर्तते हैं । यहाँ विषय सेवन वा स्थुलरूपसे कषायमे वर्तनेका प्रयोजन नही है । हाँ, शिष्योको ताड़ना श्रादिका विकल्प तोभीहै । ७0200

अर्थ :- पंच महात्रत पालते हैं, पाँचों समिति पूर्वक बतते हैं, पाँचों इन्द्रियोंके विधयोंसे बिरक्त होकर प्रसन्न होते हैं, द्ब्थय और भाज छह आवश्यक साधते हैं, अ्स जीव रहित मुसिपर करवट रहित शयन करते हैं, पावज्जीवन स्नान नहीं करते, हाथोंसे केशलोंच करते हैं, नग्न रहते हैं, दंतवन नहीं करते, तो भोवचन ओर श्वासमें सुगंध ही निकलतो है, खड़े भोजन लेते हैं,थोड़ा भोजन लेते हैं, भोजन विनमें एक ही बार लेते हैं। ऐसे अट्टाईस मूलगुणोंके धारक जैन साधु होते हैं ॥ ८० ॥

पंच अणुृत्नरत और पंच महाब्रतका स्वरूप (दोहा)

हिसा मृषा अदत्त धन, मेथुन परिगह साज ।
किचित त्यागी अनुव्रती, सब त्यागी मुनिराज ॥ ८१ ॥

शब्दार्थ :- मृषा5भूठ । अदत्त बिना दिया हुआ ।

अर्थ :- हिसा, झूठ, चोरी मैथुन और परिग्रह इन पाँचों पापोके किचित्‌ त्यागी अणुश्रती श्रावक और सर्वथा त्यागी महात्ती साथु होते हैं ॥ ८१ ॥

पंच समितिका स्वरूप (दोहा)

चले निरखि भाख उचित, भरे अदोष अहार ।
लेइ निरणि डारे निरखि, समिति पंच परकार ॥ ८२ ॥

अर्थ :- जीवजन्तुको रक्षाके लिये देखकर चलना ईर्यासमिति है, हित सित प्रिय बचत बोलना भाषाससिति है, अन्तराय रहित निर्दोष आहार लेना एषणासमिति है; शरीर, पुस्तक, पींछी, कमण्डलु आदिको वेख शोध- कर उठाना-रखना आदाननिक्षेपणससिति है, त्रस जोब रहित प्रासुक मूमिपर सल-सूत्रादिक छोड़ना प्रतिष्ठापनाससिति है;-ऐसो ये पाँच समिति हैं ॥ ८२ ॥

छह आवश्यक (दोहा)

समता बंदन थरुति करन, पड़कोना सज्काव । काउसग्ग सुद्रा धरन, षड़ावसिक ये भाव ॥ ८३ ॥ शब्दार्य :- समतानसामायिक करना । वंदनब्न्वौबीस तीर्थकरों वा गुरु आदिकी वंदना करना। पड़िकौना (प्रतिक्रमण) “लगे हुए दोषोंपर पश्चात्ताप करना । सज्कावस्वाध्याय । काउसग्ग (कायोत्सगे) >खड्गासन होकर ध्यान करना । षडावसिक-छह आवश्यक । अ्थे :- सामायिक, वंदना, स्तवन, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और कायोरसगं ये साधुके छह आवश्यक कम हैं॥ ८३ ॥

स्थविरकल्पी और जिनकलपी साधुओंका स्त्रूप (सवेया इकतीसा )

थविरकलपि जिनकलपि दृुविधि मुनि,
दोऊ वनवासी दोऊ नगन रहतु हैं ।
दोऊ अठाईस मूलगनके धरेया दोऊ,
सरव त्यागी ह्ं विरागता गहतु हैं।।
थविरकलपि ते जिनके शिष्य साखा होड़,
बेठिक सभामें धर्मदेसना कहतु हैं ।
एकाकी सहज जिनकलपि तपस्वी घोर,
उ्देकी मरोरसों परीसह सहतु हैं ॥ ८४ ॥

अर्थ :- स्थविरकल्पी और जिनकलपोी ऐसे दो प्रकारके जैन साधु होते हैं। दोनों वनवासी हैं,दोनों नग्न रहते हैं, दोनों अट्टाईस मूलगुणके धारक होते हैं,दोनों सर्व परिग्रहके त्यागी बेरागी होते हैं। परन्तु स्थविरकल्पी साधु शिष्य-समुदायके साथमें रहते हैं, तथा सभामें बेठकर धर्मोषदेश देते और सुनते हैं, परजिनकल्पी साधु शिष्य छोड़कर निर्भय अकेले बिचरते हैं ओर महा तपश्चरण करते हैं, तथा कर्मके उदयसे आई हुई बाईस परीषह सहते हैं ॥ ८४ ॥

वेदनीय कर्मजनित ग्यारह परीषह (सवैया इकतीसा )

ग्रीषममें धूषथित सीतमैं अकंपचित,
भूख धर धोर प्यास नोर न चहतु हैं ।
डंस ससकादिसों न डरें भूमि सेन करे,
बध बंध विथामें अडोल हूं रहतु हैं॥
चर्या दुख भरे तिन फाससों न थरहरं,
मसल दुरगंधकी गिलानि न गहतु हैं ।
रोगनिकौ न करें इलाज ऐसे मुनिराज,
वेदनीके उदे ये परीसह सहतु हैं॥ ८५ ॥

अर्थ :- गर्माके दिनोंमें छुपमें खड़े रहते हैं यह उष्णपरीषहजय है, शीत ऋतुमें जाड़ंसे नहीं डरते यह शोतपरीषहजय है, भूख लगे तब घोरज रखते हैं यह मृखपरीषहजय है, प्यासमें पानी नहीं चाहते यह तृषा- परीषहजय है, डांस मच्छरका भय नहीं करते यह दंशमशकपरीषहका जीतना है, धरतोपर सोते हैंपह्‌ शय्यापरोषहजय है, मारने बाँधनेके कष्टमें अचल रहते हैंयह बधपरोषहजय है, चलनेका कष्ट सहते हैं यह चर्यापरी- षहजय है, तिनका काँटा लग जावे तो घबराते नहीं यह तृणस्पशंपरीषहका जीतना है, मल ओर दुर्गंधित पदार्थंसि ग्लानि नहीं करते यह मलपरीषहजय है, रोगजनित कष्ट सहते हैं परउसके निवारणका उपाय नहीं करते यह रोगपरीषहजय है। इस प्रकार बेदतीयकर्मके उदयजनित ग्यारह परीषह मुनिराज सहते हैं ॥ ८५ ॥

चारित्रमोहजनित सात परीषह (कुण्डलिया )

ऐले संकट मुनि सहै, चारितमोह उदोत ।
लज्जा संकुच दुख धरे, नगन॒ दिगंबर होत ॥।
नगन दिगम्बर होत, श्रोत रति स्वाद न सेव ।
तिय सनमुख हग रोकि, मान अपमान न बेवे ॥॥
थिर ह्व॑ निरभे रहै, सहै कुवबचन जग जेते।
भिच्छुकपद संग्रहे, लहै मुनि संकट ऐते ॥ ८६ ॥

शब्दार्थ :- सकट-दुख । उदोत-उदयसे । श्रोतनकान । हगरनेत्र । बेबे (वेदे)>भोगे । कुवचन >माली । भिच्छुक-्याचना ।

अर्थ :- चारित्रमोहके उदयसे मसुनिराज निम्न-लिखित सात परोषह सहते हैअर्थात्‌ जीतते हैं। (१) नग्न विगस्वर रहनेसे लज्जा और संकोचजनित दुःख सहते हैं, यह नग्नपरीषहजय है। (२) कर्ण आदि इन्द्रियोंके विषयोंका अनुराग नहों करना सो अरतिपरीषहजय है। (३) स्त्रियोंके हावमावमें मोहित नहीं होना, स्त्रीपरीषहजय है। (४) माल-अपसान की परवाह नहों करते यह सत्कारपुरस्कारपरीषहजय है । (५) सयका निमित्त सिलनेपर मी आसन ध्यानसे नहीं हटना, सो निषय्यापरीषहजय है । (६) सुखोंके कठु वचन सह लेना, आक्रोशपरीषहका जीतना है। (७) प्राण जावे तो मी आहारादिकके लिये दोनतारूप प्रवत्ति नहीं करना, यह याचनापरीषहजय है । ये सात परीषह चारित्रमोहके उदयसे होती हैं ॥ ८६ ॥

ज्ञानावरणीयजनित दो परीषह (दोहा)

अलप ग्यान लघुता लखे, मति उतकरष बिलोइ । ज्ञानावरन उदोत मुनि, सहै परीसह दोइ ॥ ८७॥। अथे :- ज्ञानावरणीयजनित दो परोषह हैं । अल्पश्ान होनेसे लोग छोटा गिनते हैं,इससे जो दुख होता है उसे साधु सहते हैं, यह अज्ञानपरी- षहजय है। शानको विशालता होनेपर गये महों करते, यह प्रश्मापरोषहजय है। ऐसी ये दो परीषह ज्ञानावरणीय कर्मके डदयसे जैन साधु सहते हैं॥ ८७ ॥

दर्शनमोहनीयजनित एक और बंतरायजनित्त एक परीषह (दोहा)

सहै अदरसन दुरदसा, दरसन मोह उदोत ।
रोक॑ उम्ग अलाभकी, अंतरायके होत ॥ ८८ ॥

अर्थ :- दर्शनमो हनीयके उदयसे सम्यग्दर्शनमें कदाचित्‌ दोष उपजे तो वे सावधान रहते हैं -चलायमान नहीं होते, यह दर्शनपरीषहजय है । अंतरायकर्मके उदयसे वाड्छित पदार्थंकी प्राप्तिन हो, तो जेनमुनि खेद- खिन्न नहीं होते, यह्‌ अलाभ्परोीषहुजय है ॥ ८८ ॥

बाईस परीषहोंका वर्णन (सवैया इकतीसा)

एकादस वेदनोकी, चारितमोहकी सात,
ग्यानावरनीकी दोइ, एक अंतरायकी ।
दर्सनमोहकी एक द्वाविसति बाधा सबे,
केई मनसाकी, केई बाकी, केई कायकी ।।
काहुकौ अलप काहूको बहुत उनीस तांई,
एक ही समंमें उदे आवे असहायकोी ।
चर्या धित सज्जामांहि एक सीत उस्न मांहि,
एक दोइ होहि तोन नाहि समृदायकी ॥ ८६ ॥

शब्दार्थ :- मनसाकी>मनकी । वाकी (वाक्यकी )>वचनकी । काम-शरीर । सज्जा-शय्या । समुदाय5एक साथ ।

अर्थ :- वेदनोयको ग्यारह, चारित्रमोहनीयकी सात, शानावरणीयकी दो, अंतरायकी एक ओर वशंनमोहनीयकी एक - ऐसी सब बाईस परोषह हैं। उनमेंसे कोई मनजनित, कोई वचनजनित और कोई कायजनित हैं। इन बाईस परीषहोंमेंसे एकसमयमें एक साधुको अधिकसे अधिक उद्चयोस तक परीषह उदय आती हैं। क्‍योंकि चर्या, आसन ओर शब्या इन तोनमेंसे कोई एक और शोत उष्णमेंसे कोई एक, इस तरह पाँचमेंसे दोका उदय होता है, शेष तोनका उदय नहों होता ॥ ८६ ॥

स्थविरकल्पी और जिनकलल्‍्पी साधुकी तुलना (दोहा)

नाना विधि संकट-दसा, सहि साथे सिबपंथ ।
थविरकल्पि जिनकल्पि धर, दोऊ सम निगरंथ ।॥॥ €०॥।
जो मुनि संगतिमें रहै, थविरकल्पि सो जान ।
एकाकी जाकी दसा, सो जिनकल्पि बखान ।। ६ १॥।

अर्थ :- स्थविरकल्पी और जिनकल्‍पी दोनों प्रकारके साधु एकसे निग्नेथ होते हैं ओर अनेक प्रकारकी परोषह जोतकर मोक्षमार्ग साधते हैं । ६ ० ॥ जो साधु संघमें रहते हैं वे स्थविरकल्पधारी हैं और जो एकल- बिहारी हैं वेजिनकल्पधारी है ॥ ६१ ॥

>> ननप-लिललननन पिता-+त्रियत जन गन उन्नत (चौपाई )

थविरकलपि धर कछुक सरागी ।
जिनकलपी महान् वेरागोी ।
इति प्रमत्तनुनथानक धरनी ।
पुरन भई जथारथ वरनी ।। €२॥।

अर्थ :-स्थविरकल्पी साधु किचित्‌ सरागी होते हैं, आर जिनकल्पी साधु अत्यन्त वरागी होते हैं। यह छट्ट गुणस्थानका यथाथ स्वरूप वणन किया ॥। €२॥।

सप्तम गुणस्थानका वर्णन (चौपाई )

अब वरनों सप्तम विसरामा ।
अपरमत्त गुनथानक नामा ।।
जहां प्रमाद क्रिया विधि नासे ।
धरम ध्यान थिरता परगास ॥ €३ ॥।

अर्थ :- अब स्थिरताके स्थान अप्रमत्तगुणस्थानका वर्णन करते हैं, जहाँ घर्मध्यानमें चंचलता लानेवाली पंच प्रकारकी प्रमाद क्रिया नहों हैऔर

मन ध्ंध्यानमें स्थिर होता है।। ६ र ४) (दोहा )

प्रथम करन चारित्रको, जासु अंत पद होइ ।
जहां अहार विहार नहिं, अपरमत्त है सोह ॥ ६४ ॥।

अर्थ :- जिस गुणस्थानके अंत तक चारित्रमोहके उपशम व क्षयका कारण अध:ःप्रवत्तिकरण चारित्र रहता हैऔर आहार विहार नहीं रहता वह अप्रमत्तगुणस्थान है । विशेष :- सातवें गुणस्थानके दो भेद हैं - पहला स्वस्थान ओर दूसरा सातिशय, सो जब तक छटु से सातवें और सातवेंसे छट्टूमें अनेक बार चढ़ना-पड़ना रहता है, तब तक स्वस्थान गुणस्थान रहता है, और सातिशय 208 अधःकरणके परिणाम रहते हैं, वहाँ आह्ार-बिहार नहीं

अष्टम गुणस्थानका वर्णन (चौपाई )

अब वरनों अष्टम गुनथाना ।
नाम अपूरवकरन बखाना ।।
कुक मोह उपशसम करि राखे ।
अथवा किचित छय करि नाखे ॥ ६५ ॥

अर्थ :- अब अपूर्वकरण नामक आठवें गुणस्थानका वर्णन करता हूँ, जहाँ मोहका किलितु उपशम" अथवा किचित क्षय’ होता है ॥ ६५ ॥

पुनः (चौपाई)

जे परिनाम भए नहीं कबही ।
तिनकौ उदे देखिये जबही।।
तब अष्टम गुनथानक होई।
चारित करन दूसरों सोई ॥ ६६ ॥

अर्थ :- इस गुणस्थानमें ऐसे विशुद्ध परिणाम होते हैं,जैसे पुवमें कमी नहीं हुए थे, इसोलिये इस आठवें गुणस्थानका नाम अपुर्वकरण है। यहाँ चारित्रके तोन करणोंमेंसे अपुवंकरण नामक दूसरा करण होता है॥ ६६ ॥

नववें गुणस्थानका वर्णन (चौपाई )

अब अनिवृत्तिकरन सुनु भाई ॥॥
जहां भाव थिरता अधिकाई ॥।
पूरव भाव चलाचल जेते।
सहज अडोल भए सब तेते ॥ ६७ ॥

अर्थ :- हे भाई, अब अनिवृत्तिकरण नामक नववें गुणस्थानका स्वरूप सुनो । जहाँ परिणामोंकी अधिक स्थिरता है, इससे पहले आठवें गुणस्थानमें जो परिणास किचित्‌ चपल थे, वे यहां अचल हो जाते हैं ॥ ६७ ॥

१-९ हउपशमश्रेणीमे उपशम

और क्षपकश्नेणीमे क्षय होता है पुनः (चौपाई)

जहां नभाव उलटि अध आये ।
सो नवमों गुनथान कहाबे।।
चारितमोह जहां बहु छीजा।
सो है चरन करन पद तोजा ॥। €८॥

शब्दार्थ :- उलटि>लौटकर । अध>नीचे । छीजा-नष्ट हुआ ।

अर्थ :- जहाँ घढ़ेंहुए परिणाम फिर नहीं गिरते, बह नवथाँ गुणस्थान कहलाता है । इस नववें गुणस्थानमें चारिश्रमोहनीयका बहु" अंश नष्ट हो जाता है, यह चारित्रका तोसरा करण है ।। € ८ ॥।

दसवें गुणस्थानका वर्णन (चौपाई )

कहाँ दसम गुनथान दुसाखा ।
जहें सुछम सिवकी अभिलाखा ।।
सुछमलोभ दसा जहूँ लहिये ।
सुछ्मसांपराय. सो कहिये ॥। €€॥।

अर्थ :- अब दसवें गुणस्थानका वर्णन करता हूँ, जिसमें आठवें और नववें गुणस्थानके समान उपशम ओर क्षायिकश्रेणोके भेद हैं । जहाँ मोक्षकी अत्यन्त सुक्ष अभिलाषा मात्र है, यहाँ सुक्षन लोभका उदय है इससे इसे सुक्ष्मसाम्पराय कहते हैं ॥ ६६ ॥

ग्यारहवें गुणस्थानका वर्णन (चौपाई)

अब उपशांतमोह गुनथाना ।
कहाँ तासु प्रभुता परवांना ॥।
जहां मोह उपशमे न भासे ।
यथाख्यातचारित परगासे ॥ १०० ॥

अर्थ :- अब ग्यारहवें गणस्थान उपशांतमोहकी सामर्थ्य कहता हें, यहाँ मोहका सर्वंथा उपशम है- बिलकुल उदय नहीं दिखता और जीवका यथाव्यातचारित्र प्रगट होता है ॥ १०० ॥

) सुक्ष्मलोभकों छोड़कर ।
पुन: (दोहा) ।
जाहि फरसक जीव गिर, परे करे गुन रह ।
सो एकादससी दसा, उपसमकी सरहद ॥ १०१ ॥

अर्थ :- जिस गुणस्थानको प्राप्त होकर जीव अवध्य हो गिरता है, और प्राप्त हुए गुणोंको नियमसे नष्ट करता है,वह उपशम चारित्रकी चरम सीमा प्राप्त करनेवाला ग्यारहवाँ गुणस्थान है ॥ १०१ ॥

बा रहवें गुणस्थानका वर्णन (चौपाई )

केवलग्यान निकट जहेँ आवबे ।
तहां जीव सब मोह खिपावे ।॥।
प्रगट/. यथार्यात परधाना ।
सो दह्ादसस खीनगुनठाना ॥ १०२ ॥

अर्थ :- जहाँ जीव भोहको सर्वथा क्षय करता है, वा केवलज्ञान बिलकुल समीप रह जाता है ओर यथाख्यातचारित्र प्रगट होता है, वह क्षीणमोह नामक बारहवाँ गुणस्थात है ॥ १०२ ॥

उपशमश्रेणीकी अपेक्षा गुणस्थानोका काल (दोहा)

घट सातें आठे नव, दस एकादस थान।
अंतरमुह्रत एक वा, एक सम थिति जान ॥१०३॥।

अर्थ :- उपशम श्रेणीकी अपेक्षा छट॒ठे, सातवें, आठवें, नववें, दसवें और ग्यारहवें गुणस्थानका उत्कृष्ट काल अन्तर्मूहृत वा जघन्य काल एक समय है ॥ १०३ ॥।

क्षपकश्नेणीमें गुणस्थानोंका काल (दोहा)

छपकश्रेनि आठे नव, दस अर वलि 'बार।
थिति उत्कृष्ट जघन्य भी, अंतरमृहूरत काल ॥ १०४ ॥
१-९ यह प्रास र और ल की कही कही सवर्णताकी नीतिसे निर्दोष है- “रलयो
सावण्य वा वक्तव्य” सारस्वत व्याकरण ।

अर्थ :- क्षपकश्नेणीमें आठवें, नववें, दसवें ओर बारहवें गुणस्थानको उत्कृष्ट स्थिति अन्तमुंहतं तथा जघन्य भी अन्तमु हूतेंहै ॥ १०४ ॥

तेरहवें गुणस्थानका वर्णन (दोहा)

छीनमोह पुरन भयौ, करि चूरन चित-चाल।
अब सजोगगुनथानकी, वरनों दसा रसाल ॥ १०५ ॥

अर्थ :- चित्तकी वत्तिको चूर्ण करनेवाले क्षोीणमोह गुणस्थानका कथन समाप्त हुआ, अब परमानन्दसय सयोगगुणस्थानकी अवस्था वर्णन करता हूँ ॥ १०५ ॥।

तेरहवें गुणस्थानका स्वरूप (सबेया इकतीसा )

जाकी दुखदाता-घातोी चौकरी विनसि गई,
चौकरी अघाती जरी जेवरी समान है ।
प्रटभ भयो अनंतदंसन अनंतग्यान,
बोरजअनंत सुख सत्ता समाधान है।॥।
जामें आउ नास गोत बेदनी प्रकृति अस्सी,
इक्यासी चोरासी वा पचासी परवांन है ।
सो है जिन केवली जगतवासी भगवान्,
ताकी जो अवस्था सो सजोगीगुनथान है ॥ १०९ ॥

शब्दार्थ :- चोकरी >चार । विनसि गई नष्ट हो गई । अनतदसन+< अनतदशेन । समाधान-सम्यवत्व ।जगतवासी>-ससारी, शरीर सहित ।

अर्थ :- जिस मुनिके दुःखदायक घातिया चतुष्क अर्थात्‌ ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय, अन्तराय नष्ट हो गये हैं और अघातिया चतुष्क जरी जेवरोके समान शक्तिहीन हुए हैं, जिसको अनन्तदर्शन, अनन्तज्ञान, अनन्तबोयं, अनन्तसुख सत्ता और परमावगाढ़सम्यक्त्व प्रगट हुए हैं। जिसकी आयु नाम गोत्र और बवेदनीय कर्मोंकी मात्र अस्सी, हकक्‍यासो, चोौरासो वा पचासी प्रकृतियोंको सत्ता रह गई है, वह केवलज्ञानी प्रभु संसारमें सुशोभित होता है, और उसीकी अवस्थाको "सयोगकेवली गुणस्थान कहते हैं। ) यहाँ मन-वचन-कायके मात योग होते हैं,इससे इस गुणस्थानका नाम सयोगकेवली है। विशेष :- तरहवें गुणस्थानमें जो *पचासी प्रकृतियोंकी सत्ता कही गई है, सो यह सामान्य कथन है। किसो किसीको तो तीर्थंकर प्रकृति, आहारक शरीर, आहारक आंगोपांग, आहारक बन्धन, आहारक संघात सहित पचासी प्रकृतियोंकी सत्ता रहती है, पर किसीको तीर्थंकर प्रकृतिका सत्व नहीं होता, तो चोरासी प्रकृतियोंकी सत्ता रहती है, और किसीकों आहारक चतुष्कका सत्व नहीं रहता और तीर्थंकर प्रकृतिका सत्व रहता है, तो इक्यासी प्रकृतियोंकी सत्ता रहती है तथा किसीको तीर्थंकर प्रकृति और आहारक चतुष्क पाँचोंका सत्व नहों रहता, मात्र अस्सी प्रकृतियों की सत्ता रहती है ॥ १०६ ॥

केवलज्ञानीकी मुद्रा और स्थिति (सवेया इकतीसा )

जो अडोल परजंक मुद्राधारी सरवथा,
अथवा सु काउसग्ग मुद्रा थिरपाल है।
खेत सप्रस कम प्रकृतिक॑ उदे आये,
बिना डग भरे अंतरीच्छ जाकी चाल है ।’
जाको थिति प्रव करोड़ आठ वर्ष घाटि,
अंतरमह्रत॒॒ जघन्य. जग-जाल है।
सो है देव अठारह दृषन रहित ताकॉं,
बानारसि कहे मेरी वंदना त्रिकाल है ॥१०७॥।

शब्दार्थ :- अडोल>अचल । परजंक मुद्राल्पद्मासन । काउसग्गू (कायोत्सर्ग )खडे आसन । अतरीच्छु"अधर । त्रिकालजसदेव ।

अर्थ :- जो केवलज्ञानो भगवान्‌ पद्मासन अथवा कायोत्सगे सुद्रा धारण किये हुए हैं, जो क्षेत्र-स्पर्श नामकर्मकी प्रकृतिके उदयसे बिना कदम रक्‍खे अधर गमन करते हैं, जिनकी संसार स्थिति उत्कृष्ट *आठ वर्ष कम एक करोड़ पूर्वकी और जधघन्य स्थिति अन्तमु हतंको है, वे सर्वेश्देव अठारह दोष रहित हैं । पं० बनारसोदासजी कहते हैं कि उन्हें भेरी त्रिकाल वन्‍्वना है ॥ १०७ ॥

पचासी प्रकृतियोंके नाम पहले अधिकारमे कंह भाये हैं ।

मोक्षगामी जीवोकी उत्कृष्ट आयु चौथे काल की अपेक्षा एक कोटि पू्वकी है, और क्षाठ वर्षदी उमरतक केवलज्ञान नहीं जागता ।

केवली भगवानको अठारह दोष नहीं होते (कुण्डलिया)

दूषन अट्टारह रहित, सो केवलि संजोग ।
जनम मरन जाक॑ नहीं, नहिं निद्रा भय रोग ॥।
नहि निद्रा भय रोग, सोग विस्मय न मोह मति ।
जरा खेद परस्वेद, नांहि मद बेर विष रति ॥॥
चिता नांहि सनेह, नांहि जहूँ प्यास न भूखन ।
थिर समाधि सुख सहित, रहित अट्ठारह दृूषन ॥ १०८ ॥

शब्दार्थ :- सोग >शोक । विस्मय-आश्चय । जरा>बुढापा । परस्वेद (प्रश्न द)-पसीना । सनेह> राग ।

अर्थ :- जन्म, मुत्यु, निद्रा, भय, रोग, शोक, आश्चयं, मोह, बुढ़ापा, खेद, पसीना, गवं, हेष, रति, चिता, राग, प्यास, भूख ये अठारह दोष सयोगकेवली जिनराजको नहीं होते, और निविकल्प आनन्‍्दमे सदा लीन रहते है ॥ १०८ ॥)

केवलज्ञानीप्रभुके परमौदारिक शरीरका अतिशय (कुण्डलिया )

वानी जहां निरच्छरी, सप्त धातु मल नांहि।
केस रोम नख नहिं बढ़े, परम उदारिक मांहि ।।
परम उदारिक मांहि, जांहि इद्रिय विकार नसि ।
यथाख्यातचारित, प्रधान थिर सुकल ध्यान ससि ॥।
लोकालोक प्रकास-करन केवल रजधानी ।
सो तेरम गुनथान, जहां अतिशयमय वानी ॥ १०६ ॥

शब्दार्थ :- निरच्छुरी > अक्षर रहित। केस (केश) > बाल । नख>नाखून । उदारिक (औदारिक)>स्थूल । ससि (शशि) चन्द्रमा ।

अर्थ :- तेरह॒वें गुणस्थानमें भगवानकी अतिशयमय निरक्षरी दिव्य- ध्वनि खिरतोी है। उनका परमौदारिक शरीर सप्त धातु और मल-समृत्र रहित होता है। केश रोम और नाखून नहीं बढ़ते, इन्द्रियोंके विषय नष्ट हो जाते हैं, पवित्र यथाख्यातचारित्र प्रगट होता है. स्थिर शुक्लध्यानरूप चन्द्रमाका उदय होता है, लोकालोकके प्रकाशक केवलज्ञानपर उनका साम्राज्य रहता है ॥ १०६ ॥

चौदहवें गुणस्थानका वर्णन-प्रतिज्ञा (दोहा)

यह सयोगगुनथानकी, रचना कही अनूप ।
अब अयोगकेवल दसा, कहू जथारथ रूप ॥ ११० ॥

अर्थ: – यह सयोगी गुणस्थानका वर्णन किया, अब अयोगकेवली गुणस्थानका वास्तविक वर्णन करता हूँ ॥ ११० ॥

चौदहवे गुणस्थानका स्वरूप (स्वेया इकतीसा )

जहां काहू जीवकों असाता उ्द साता नाहि,
काहूकों असाता नाहि, साता उदे पाइये ।
मन बच कायसों अतीत भयोौ जहां जीव,
जाकौ जसगीत जगजीतरूप गाइये ।।
जामें कम प्रकृतिकी सत्ता जोगी जिनकीनोी,
अंतकाल हू समेमें सकल खिपाइये ।
जाकी थिति पंच लघु अच्छर प्रमान सोई,
चोदहों अजोगीगुनठाना ठहराइये ॥ १११॥।
शबदार्थ :- अतीत रहित । खिपाइये"]"क्षय करते है। लघु-छस्व ।

अर्थ :- जहाँपर किसी जोवकों असाताका’ उदय रहता हैसाताका नहीं रहता, और किसी जोवको साताका उदय रहता हैअसाताका नहीं रहता, जहाँ जीवके मन-बचन-कायके योगोंकी प्रवृत्ति सबंथा शून्य हो जाती है, जिसके जगज्जयी होनेके गीत गाये जाते हैं,जिसको सयोगी जिनके समान अधघातिया कर्मं-प्रकृतियोंकी सत्ता रहती है, सो उन्हें अन्‍्तके दो समयोमें सर्वथा क्षय’ करते हैं, जिस गुणस्थानका काल हृस्व पंच अक्षर प्रमाण है, बह अयोगी जिन चोदहवाँ गुणस्थान है ॥ १११ ॥

इति चतुर्दश गुणस्थानाधिकार वर्णन समाप्त ।
९ केवलज्ञानी भगवानको असाताका उदय बाचकर विस्म्रित नहीं होना चाहिये ।
वहा असाता कर्म, उदयमे सातारूप परिणमता है ।

धुनि चौदहे चोथे सुकलबल बहुत्तर तेरह हतों, 'जिनन्द्रपचकल्याणक

बंधका मूल आख््रव और मोक्षका मूल सवर है (दोहा)

चोदह गुनथानक दसा, जगवासो जिय भूल ।
आखस्रव संवर भाव हूं, बंध मोखके भूल ॥ ११२ ॥

अर्थ :- गुणस्थानोंकी ये चौदह अवस्थाएँ संसारी अशुद्ध जीवोंकी हैं। आख्रव और संवर भाव बन्ध और मोक्षकी जड़ हैं; अर्थात्‌ आख्रव बन्धकी जड़ है और संबर मोक्षकी जड़ है ॥ ११२ ॥

संवरको नमस्कार (चौपाई)

आलस्रव संवर परनति जौलों ।
जगतनिवासी चेतन तौलों ॥॥
आख्रव संवर विधि विवहारा ।
दोऊ भव-पथ सिव-पथ धारा ॥ ११३॥।
आखसत्रवरूप बंध उतपाता !
संवर ग्यान मोख-पद-दाता ।॥।
जा संवरसों आखस्रव छोजे।
ताकों नमस्कार अब कीजे॥ ११४॥।

अर्थ :- जब तक आख्रव और संवरके परिणाम हैं, तब तक जीवका संसारमें निवास है। उन दोनोंमें आख्रव-विधिका व्यवहार संसार-सार्गकी परिणति है, और संवर-विधिका व्यवहार मोक्ष-मार्यकी परिणति है॥११३॥। आख़ब बन्धका उत्पादक हैऔर संबर ज्ञानका रूप है, मोक्षपदका देनेवाला है। जिस संवरसे आख्नवका अभाव होता है,उसे नमस्कार करता हूँ ॥ ११४ ॥

ग्रथके अतमें संवरस्वरूप ज्ञनकों नमस्कार (सर्वया इकतीसा)

जगतके प्रानी जीति हूं रह्मौ गुमानी ऐसौ,
आखस्रव असुर दुखदानी महाभीम है ।
ताको परताप खंडिवंकों प्रगट भयौ,
धर्मको धरेया कर्म-रोगकौ हकीस है ।॥
जाक परभाव आगे भागें परभाव सब,
नागर नवल सुखसागरकी सीम है।
संबरकौ रूप धरे साथ सिवराह ऐसो,
ग्यान पातसाह ताकों मेरी तसलीम है ॥ ११५॥।

शब्दार्थ :- गुमानी >अभिमानी । असुरछ राक्षस। महाभीमनबड़ा भयानक । परताप (प्रताप) >तेज । खडिवेकौं-नष्ट करनेके लिये । हकीम> वेद्य ।परभाव (प्रभाव) >पराक्रम। परभाव-पुदूगलजनित विका र।नागर- चतुर । नवलब्नवीन । सीम>मर्यादा। पात्तसाहु>बादशाह । तसलीम-- वन्दना ।

अर्थ :- आस्रवरूप राक्षस जगतके जीवोंको अपने वशमें करके अभि- मानो हो रहा है, जो अत्यन्त दःखदायक और महा भयानक है, उसका वैभव नष्ट करनेके लिये जो उत्पन्न हुआ है, जोधमंका धारक है, कर्मरूप रोगके लिये बेद्यके समान है, जिसके प्रभावके आगे परव्रव्यजनित राग-द्वेष आदि विभाव दूर भागते हैं, जो अत्यन्त प्रवीन और अनादिकालसे नहीं पाया था इसलिये नवीन है,जो सुखके समुद्रकी सीमाको प्राप्त हुआ है, जिसते संबरका रूप धारण किया है, जो मोक्षमागंका साधक है, ऐसे शानरूप बादशाहको मेरा प्रणामहै॥ ११५ ॥ तेरहवें अधिकारका सार जिस प्रकार सफेद वस्त्रपर नाना रंगोंका निमित्त लगनेसे बह अनेका- कार होता है, उसो प्रकार शुद्ध बुद्ध आत्मापर अनादि कालसे मोह और योगोंका सम्बन्ध होनेसे उसकी संसारो दशामें अनेक भवस्थाएँ होतो हैं, उनहोका नाम गुणस्थान है। यद्यपि वे अनेक हैं पर शिष्योंके सम्बोधनार्थ श्रीगुरुने १४ बतलाये हैं । ये गुणस्थान जोवके स्वभाव नहों हैं, पर अजीवमें नहों पाये जाते, जीवमें ही होते हैं, इसलिये जीवके विभाव हैं, अथवा यों कहना चाहिये कि व्यवहार नयसे गुणस्थानोंकी अपेक्षा संसारी जीवबोंके चौदह भेद हैं। पहले ग्ुणस्थानमें सिथ्यात्व, दूसरेमें अनन्तानुबन्धी, तीसरेमें सिश्र- मोहनीयका उदय सुख्यतया रहता है, ओर चौथे गुणस्थानमें मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धी और मिश्रसोहनोयका, पाँचवेमें अप्रत्या्यानावरणीयका, छट्टुमेंप्रत्यास्यानावरणीयका अनुदय रहता है । सातवें आठवें और नववंमें संज्वलनका ऋमश: मन्द, मन्दतर, मन्दतम उदय रहता है, दसवेंमें संज्वलन सुक्ष्मलोभ सात्रका उदय ओर सर्वभोहका क्षय है। ग्यारहवेंमें स्वमोहका उपशम्र और बारहवेंमें सवंभोहका क्षय है । यहाँ तक छंग्नमस्थ अवस्था रहती है, केवलज्ञानका विकास नहीं है । तेरहवंमें पृर्णशान है परन्तु योगोंके द्वारा आत्मप्रदेश सकम्प होते हैं, ओर चौदह॒वें गुणस्थानमें केवलज्ञानी प्रभुके आत्म-प्रदेश भी स्थिर हो जाते हैं। सभो गुणस्थानोंमें जीब सदेह" रहता है, सिद्ध भगवान् गुणस्थानोंकी कल्पनासे रहित हैं,इसलिये गुणस्थान जीवके निज-स्वरूप नहीं है, पर हैं,परजनित है,ऐसा जानकर गुणस्थानोंके विकल्पोंसे रहित शुद्ध बुद्ध आत्माका अनुभव करना चाहिये। हम बेठे अपनी मौन सो ।। दिन दस के मिहमान जगत् जन, बोलि बिगारे कौन साँ ।हम ० ॥ १ ॥ गये बिलाय भरभ के बादर, परमारथ-पथ-पौनसों । अब अन्तर गति भई हमारी, परे राधारोनसों । हम० ॥ २।॥। प्रगटी सुधापान को महिमा, सन नहि लागे बौनसों । छिन न सुहाय और रस फीके, रुचि साहिब के लौनसों । हम० ॥ ३ ॥ रहे अघाय पाय सुख सपति, को निकरस निज भौनसों । सहज भाव सदुगुरु को संगति, सुरन्ते आवागौनसौ । हम० ॥ ४ ॥ १ विग्रह गतिमे कार्माण तेजस शरीरका सम्बन्ध रहता हे ।

ग्रन्थ समाप्ति और अन्तिम प्रशस्ति

(चौपाई )

भयो ग्रंथ संपु्रन भाखा।
जरनी गुनथानककी साखा ॥।
वरनन और कहांलों कहिये ।
जथा सकति कहि चुप हूँ रहिये ॥ १॥।

अर्थ :- भाषाका समयसार ग्रन्थ समाप्त हुआ ओर गुणस्थान अधिकारका वर्णन किया । इसका और कहाँ तक वर्णन करें, शक्ति अनुसार कहकर चुद हो रहना उचित है ॥३११।

(चौपाई )

लहिये ओर न ग्रंथ उदधिका ।
ज्यों ज्यों कहिये त्यों त्यों अधिका ।॥)
तातें नाटक अगम अपारा ।
अलप कवोीसुरकी मतिधारा ॥ २॥।

अर्थ :- ग्रन्थरूप समुद्रका पार नहीं पा सकते, ज्यों ज्यों कथन किया जावे त्यों त्यों बढ़ता ही जाता है, क्योंकि नाटक अपरस्पार हैऔर कविकी बुद्धि तुच्छ है ॥२॥। विशेष :- यहाँ ग्रन्थको समुद्रकी उपमा दी हैऔर कविकी बृद्धिको

छोटी नदीको उपमा है (दोहा )

समयसार नाटक अकथ, कविकी मति लघु होइ ।
ताते कहत बनारसी, पुरन कर्थ न कोइ ॥ ३॥।

अर्थ :- समयसार नाटकका वर्णन महान् है, कविको बृद्धि थोड़ी है, इससे पंडित बनारसीदासजी कहते हैं, कि उसे कोई पूरा पुरा नहीं कह सकता ॥ ३ ॥

ग्रन्थ-महिमा (सवैया इकतीसा)

जैसे कोऊ एकाकी सुभट पराक्रम करि,
जीते किहि भांति चक्री कटकसों लरनों ।
जेसे कोऊ परवीन तारू भुजभारू नर,
तेरे कंसे स्वयंभ्रमन सिधु तरनों ॥।
जेसे कोऊ उद्दमो उछाह मनमांहि धरे,
करे कंसे कारज विधाता कंसौ करनों ।
तेसे तुच्छ मति मोरो तामें कविकला थोरो,
नाटक अपार में कहांलों याहि वरनौं ॥ ४ ॥

अर्थ :- यदि कोई अकेला योद्धा अपने बाहुबलके द्वारा चक्रवत्तोके बलसे लड़े, तो वह कंसे जोत सकता है ? अथवा कोई जलतारिणी विद्या्ें कुशल मनुष्य स्वयंभूरमण समुद्रको तेरना चाहे, तो कंसे पार पा सकता है? अथवा कोई उद्योगी मनुष्य मनमें उत्साहित होकर विधाता" जैसा काम करना चाहे, तो कंसे कर सकता है ? उसी प्रकार मेरी बद्धि अल्प है वा काव्य-कोौशल कम है और नाटक महान् है, इसका में कहाँ तक वर्णन करू ॥४॥।

जीव-नटकी महिमा (सवेया इकतीसा )

जेसे वट वृच्छु एक, तामें फल हैं अनेक,
फल फल बहु बीज, बीज बीज वट है।
वटर्माहि फल, फल मांहि बीज तामें बट,
कोज जो विचार, तो अनंतता अघट है ॥।
तेसे एक सत्तामें, अनंत गुन परजाय,
पर्जेमं अनंत नृत्य तामैंइनंत ठट है।
) यहां हृष्टान्तमान्र ग्रहण किया है ।
ग्रन्थ समाप्ति और अन्तिम प्रशस्ति ४ड११
ठटमैं अनंतकला, कलामें अनंतरूप,
रूपमें अनंत सत्ता, ऐसी जोव नट है ॥ ५ ॥

अर्थ :- जिस प्रकार एक बटके वक्षमें अनेक फल होते हैं, प्रत्येक फलमें बहुतसे बोज तथा प्रत्येक बोजमें फिर वट व॒क्षका अस्तित्व रहता है,ओर बुढ्धिसे काम लिया जावे तो फिर उस बट ब॒क्षमें बहुतसे फल और प्रत्येक फलमें बहुतसे बोज ओर प्रत्येक बीजमें बट वक्षकी सत्ता प्रतीत होती है, इस प्रकार बट वक्षके अनन्तपनेकी थाहु नहीं मिलती । उसी प्रकार जोवरूपी नटकी एक सत्तामें अनन्त गुण हैं, प्रत्येक गुणमें अनन्त पर्याय हैं, प्रत्येक पर्यायमें अनन्त नुत्य हैं, प्रत्येक नृत्यमें अनन्त खेल हैं, प्रत्येक खेलमें अनन्त कलाएं हैं, ओर प्रत्येक कलाको अनन्त आक्ृतियाँ हैं,इस प्रकार जीब बहुत ही विलक्षण नाटक करने वाला है ॥ ५ ॥

(दोहा)

ब्रह्गयान आकासमें, उड़ सुमति खग होइ ।
यथा सकति उद्दिम करे, पार न पाव कोइ ॥ ६॥।

अर्थ :- ब्रह्मज्नानरूपी आकाशसमें यदि श्रुतज्ञानरूपी पक्षी शक्ति अनुसार उड़नेका प्रयत्न करे, तो कभो अन्त नहों पा सकता ॥ ६॥।

(चौपाई )

ब्रह्मयान-नभ अंत न पावे।
सुमति परोछ कहांलों धावे ॥।
जिहि विधि समयसार जिनि कोनों ।
तिनके नाम कहाँ अब तीनों ॥ ७॥।
अथे :- ब्रह्मशानरूप आकाश अनन्त है ओर श्रुतज्ञान परोक्ष है, कहाँ
तक दोड़ लगावेगा? अब जिन्होंने समयसारकी जंसो रचना की है उन तीनों
के नाम कहता हूँ ॥ ७ ॥

त्रय कवियोंके नाम (सवेया इकतीसा )

कु दकुदाचारिज प्रथम गाथाबद्ध करि,
समेंसार नाटक विचारि नाम दयो है ।
ताहीकी परंपरा अमृतचंद्र भये तिन,
संसकृत कलस सस्‍्हारि सुख लयो है।॥
प्रगट्यों बनारसी गृहस्थ सिरीमाल अब,
किये हैं कवित्त हिये बोधिबोीज बयो है ।
सबद अनादि तामें अरथ अनादि जीव,
नाटक अनादि यों अनादि ही कौ भयो है ॥ ८ ॥

अर्थ :- इसे पहले स्वामो कुन्वकुन्दाचार्यने प्राकृत गाथा छन्दमें रा ओर समयसार नाम रक्‍्खा। उन्होंको कृतिपर उन्होंके आम्नायी स्वामी अमृतचन्द्रसुरि संस्कृत भाषाके कलशा रचकर प्रसन्न हुए। पश्चात् श्रीमाल जातिमें पण्डित बनारसीदासजी श्रावकथधर्म प्रतिपालक हुए, उन्होंने कवित्त रचना करके हृदयमें ज्ञानका बीज बोया। यों तो शब्द अनादि है उसका पदार्थ अनादि है,जीव अनादि है,नाटक अनादि है,इसलिये नाटक समयसार अनादि कालसे ही है ॥ ८५ ॥

सुकवि लक्षण (चौपाई)

अब कछु कहों जथारथ वानी ।
सुकवि कुकबिकी कथा कहानी ।!
प्रथर्माह सुकवि कहावे॑ सोई ।
परमारथ रस॒ वबरने जोई॥ ६॥।
कलपित बात हिये नहिं आने ।
गुरुपरंपप. रीति बखान॥।
सत्यारथ सेली नहिं छूंडे ।
मृषावादसों प्रीति न मंडे ॥ १० ॥

अर्थ :- अब सुकवि कुकविको थोड़ीसो वास्तविक चर्चा करता हूँ। उनमें सुकविको प्रथम श्रेणी है। वे पारमाथिक रसका वर्णन करते है, मनमें कपोलकल्पना नहीं करते और ऋषि-परम्पराके अनुसार कथन करते हैं । सत्यार्थे-भार्मको नहीं द्ोड़ते और असत्य कथनसे प्रीति नहीं जोड़ते (६-१०

ग्रन्थ समाप्ति और अन्तिम प्रशस्ति ४१३ (दोहा )

छंद सबद अच्छर अरथ, कहे सिद्धांत प्रवांन ।
जो इहि विधि रचना रचे, सो हैसुकवि सुजान ॥ ११ ॥

अर्थ :- जो छन्द, शब्द, अक्षर, अर्थंकी रचना सिद्धान्तके अनुसार करते हूँवे ज्ञानी सुकवि हैं ॥ ११ ॥

कुकवि लक्षण (चौपाई)

अब सुनु कुकवि कहाँ है जेसा ।
अपराधो हिय अंध अनेसा ।।
मृषाभाव रस॒ वरने हितसों ।
नई उकति उपजाबे चितसों ॥ १२ ॥
ख्याति लाभ पूजा मन आने ।
परमारथ-पथ भेद न जाने ।।
वानी जीव एक करि बूझके।
जाको चित जड़ ग्रंथ न सूके ॥ १३ ॥।

अर्थ :- अब जेसा कुकवि होता हैसो कहता हूँ,उसे सुनो, वह पापी हृदयका अंधा ह॒ठग्राही होता है। उसके मनमें जो नई कल्पनाएँ उपजतो हैं, उनका और सांसारिक रसका वर्णन बड़े प्रेमसे करता है । वह मोक्षमागंका मर्म नहीं जानता और मनमें रूयवाति लाभ पूजा आदिकोी चाह रखता है। वह वचनको आत्मा जानता है, हृदयका मूर्ख होता है, उसे शास्त्रज्ञान नहों

है।। १२-१३ ॥ (चौपाई)

वानी लोन भयो जग डोले ।
बानी मसता त्यागिन बोले ॥॥।
है अनादि बानो जगमांही ।
कुकवि बात यह समर नांही ॥ १४॥
१४ समयसार मादक

अर्थ :- वह वचनमें लीन होकर संसारमें भटकता है, वबचनकी ममता छोड़कर कथन नहीं करता। संसारमें वचन अनादिकालका है, यह तत्त्व कुकवि लोग नहों समझते ॥ १४ ॥

वाणी-व्याख्या (सवैया इकतीसा )

जेसे काहू देसमें सलिल-धारा कारंजकी,
नदीसों निकसि फिर नदीसे समानी है ।
नगरमें ठौर ठोर फंलि रही चहु ओर,
जाक ढिग बहै सोइ कहे मेरो पानी है ५
त्योंही घट सदन सदनमे अनादि ब्रह्म,
बदन वदनमे अनादिहीकी वानी है।
करम कलोलसों उसासकी बयारि बाज,
तासों कहे मेरी धुनि ऐसो घुृढ़ प्रानो है ॥ १५ ॥

अर्थ :- जिस प्रकार किसी स्थानसे पानीकी धारा शाखारूप होकर नदोसे निकलतो है और फिर उसी नदामें मिल जाती है, वह शाखा शहरमें जहाँ तहाँ होकर बह निकलती है, सो जिसके सकानके पास होकर बहती है वही कहता हैकि, यह पानी मेरा है,उसी प्रकार हृदयरूप घर हैऔर घरमें अनादि ब्रह्म है और प्रत्येकके मुखमें अनादि कालका वचन है, कमंकी लहरोंसे उच्छ वासरूप हवा बहतो है इससे मूर्ख जोव उसे अपनो ध्वनि कहते हैं ॥ १५ ॥

(दोहा)

ऐसे मूढ़ कुकवि कुधी, गहे मृषा सग दौर ।
रहे मगन अभिमानमे, कहैं औरकी और ॥ १६ ॥।
वस्तु सरूप लखे नहों, बाहिज द्विष्टि प्रवांन ।
मृषा विलास विलोकिक, करे मृषा गुन गान ॥ १७॥
प्रग्थ समाप्ति और अन्तिम प्रशस्ति डश्भू्‌

अर्थ :- इस प्रकार मिथ्याहृष्टि कुकवि उन्मागंपर चलते हैं और अभिमानमें मस्त होकर अन्यथा कथन करते हैं । वे पदार्थथा असली स्वरूप नहीं देखते, बाह्यहृष्टिसे असत्य परिणति वेखकर झूठा वर्णन करते हैं ।। १६-१७ ।।

मृषा गुणगान कथन (सव्वेया इकतीसा)

मांसकी गरंथि कुच कंचन-कलस कहें,
कहें मुख चंद जो सलेषमाकों घर है।
हाड़के दसन आहि हीरा भोती कहैं ताहि,
मांसके अधर ओंठ कहें बिबफरु है।।
हाड़ दंड भ्रुजा कहैं कॉलनाल कामधुजा,
हाड़हीक॑ थंभा जंघा कहें रंभातरु है।
योंही भूठी जुगति बनावे और कहाबे कवि,
येतेपरप कहें हमे सारदाको वरु है॥ १८॥।

शब्दार्थ :- गरथि-डली । कुच स्तन । सलेषमा (श्लुष्मा) >कफ । दसन–दाँत । आहिल्‍ल्है । बिबफल (बिबाफल )>कुंदरू । कौलनाल (कमलनाल) >कमलकी डडी । रंभातरु-केलेका वक्ष ।

अर्थ :- कुकवि मांसके पिण्डरूप कुचोंको सुवर्णघट कहते है, कफ, खकार आदिके धररूप मुखको चन्द्रमा कहते हैं, हड्डीके दाँतोंको होरा-मोती कहते हैं,मांसके ओठोंको कुंदरू कहते हैं,हाड़के दण्डोंहप भुजाओंको कमल की दंडो अथवा फामदेवको पताका कहते हैं,हड्डीके खम्भेरूप जांघोंकों केलेका वृक्ष कहते हैं । वे इस प्रकार झूठी भी युक्तियाँ गढ़ते हैंओर कवि कहलाते हैंइतनेपर भो कहते हैं किहमें सरस्वतो का वरदान है ॥ १८ ॥

(चौपाई )

सिथ्यावंत कुकवि जे प्रानी ।
मिथ्या तिनकी भाषित वानी ॥।
मिथ्यामती सुकवि जो होई।
बचन प्रर्वान करे सब कोई ॥ १६ ॥

अर्थ :-जो प्राणी मिथ्याहृष्टि और कुकवि होते हैं, उनका कहा हुआ बचन असत्य होता है, परन्तु जो सम्यग्दशनसे सम्पन्न तो नहीं होते पर शास्त्रोक्त कविता करते हैं,उनका वचन श्रद्धान करने योग्य होता है ॥ १६ ॥

(दोहा)

बचन प्रवांन करें सुकवि, पुरुष हिए परवांन ।
दोऊ अंग प्रबांन जो, सो है सहज सुजान ॥। २० (॥

अर्थ :- जिनको वाणी शास्त्रोक्त होतो हैऔर हृदयमें तत्त्वश्रद्धान होता है, उनका सन और वचन दोनों प्रामाणिक है और वे ही सुकवि हैं॥ २० ॥

समयसार नाटककी ०्यवस्था (चौपाई )

अब यह बात कहू है जंसे।
नाटक भाषा भयोौ स्॒‌ ऐसे ।॥।
कु दकु दसुनि मूल उधरता ।
अमृतचंद्र टीकाके करता ॥ २१ ॥

अर्थ :- अब यह बात कहता हें किनाटक समयसारकी काव्य-रचना किस प्रकार हुई है । इस ग्रन्थके मूलकर्त्ता कुन्दकुन्दस्वामी और टोकाकार अमृतचन्द्रसूरि हैं ॥ २१ ॥

समेसार नाटक सुखदानी ।
टोका सहित संस्कृत वानों ।।
पंडित पढ़ें सुदिढ़मति बूभ ।
अलपमतोकों अरथ न सूझे ॥ २२॥।
भ्न्थ समाप्ति और अन्तिम प्रशस्ति ४१७

अर्थ :- समयसार नाटकको सुखदायक संस्कृतटोका पण्डित लोग पढ़ते और विशेष शानी समभते हैं,परन्तु अल्पब॒द्धि जीवोंकी समभमें नहीं भा सकती थी ।। २२१

पांडे राजमलल जिनधर्मो ।
समेसार नाटकके मर्मी ॥।
तिन गिरंथकी टीका कीनी ।
बालबोध सुगम कर दोनी ॥ २३॥।
इहि विधि बोध-वचनिका फंलो ।
समैँ पाय अध्यातम सेलो ।।
प्रगटी जगमांही जिनवानी ।
घर घर नाटक कथा बखानी ॥ २४ ॥

अर्थ :- जनधर्मो पांडे राजमलजी नाटक समयसारके ज्ञाताने इस ग्रग्थकी घबालयोध सहज-टीका की । इस प्रकार समय पाकर इस आध्यात्मिक- विद्याकी माषावचनिका विस्तृत हुई, जगतमें जिनवाणीका प्रचार हुआ और

घर घर नाटकको चर्चा होने लगी ।। २३-२४॥ (चौपाई)

नगर आगरे मांहि विख्याता।
कारन पाद भए बहू ग्याता ॥।
पंच पुरुष अति निपुन प्रवीने।
निसिदिन ग्यान-कथा रस-भीने ॥ २५ ॥

अर्थ :- प्रसिद्ध शहर आगरेमें "निमित्त मिलनेपर इसके बहुतसे जानकार हुए, उनमें पाँच मनुष्य अत्यन्त कुशल हुए, जो दिन-रात ज्ञान- चर्चामें लवलीन रहते थे ॥ २५॥।

*** सत्सगति, गुरुसमागम आदिका ) (दोहा )**

रूपचंद पंडित प्रथम, दुतिय चतुभु ज नाम ।
तृतिय भगोतीदास नर, कौरपाल गुन धाम ॥ २६ ॥
धमंदास ये पंचजन, मिलि बेठें इक ठौर ।
परमारथ-चरचा कर, इनके कथा न और ॥ २७ ॥

अर्थ :- पहले पण्डित रूपचन्दजी, दूसरे पण्डित चतुभु जजी, तीसरे पण्डित भगोतीदासजी, चौथे पण्डित कुंबरपालजी और पाँचवबे पण्डित धर्मदासजी । ये पाँचों सज्जन मिलकर एक स्थानमें बेठते तथा मोक्षमसार्गकी

चर्चा करते थे ओर दूसरी वार्ता नहीं करते थे॥। २६-२७॥ (दोहा )

कबहू’ नाटक रस सुने, कबहू और सिद्धंत ।
कबहूं बिग बनाइक, कहें बोध विरतंत ॥ २८ ॥

अर्थ :- ये कभी नाटकका रहस्य सुनते, कभी और शास्त्र सुनते और कभी तक खड़ी करके ज्ञानचर्चा करते थे ॥ २८ ॥

(दोहा )

चित कौरा करि धरमधर, सुमति भगोतीदास ।
चतुरभाव थिरता भये, रूपचंद परगास ॥ २६॥।

अर्थ :- कुंवरपालजीका चित्त कौंरा अर्थात्‌ कोमल था, धर्मदासजी धमंके धारक थे, भगोतीदासजी सुमतिवान थे, चतुभु जजीके भाव स्थिर थे और रूपचन्दजीका प्रकाश चन्द्रमाके समान था ॥ २६ ॥

(चौपाई )

जहां तहां जिनवानी फंली ।
लखे न सो जाकी सति मैली ।।
जाए सहज बोध उतपाता ।
सो ततकाल लखे यह बाता ॥ ३० ॥
ग्रन्थ समाप्ति और अन्तिम प्रशस्ति ४१६

अर्थ :- जहाँ तहाँ जिनवाणोका प्रचार हुआ, पर जिसको ब॒द्धि मलिन हैवह नहीं समझ सका । जिसके चित्तमें स्वाभाविक ज्ञान उत्पन्न हुआ हैवह इसका रहस्य तुरन्त समझ जाता है ॥ २० ॥

(दोहा)

घट घट अंतर जिन बसे, घट घट अंतर जेन ।
मति-मदिराके यानसों, मतवाला समु्े न ॥ ३१ ॥
अथे :- प्रत्येक हृदयमें जिनराज और जेनघमंका निवास है, परन्तु
मजहबके पक्षरूपी शराबके पो लेनेसे 'मतवाले लोग नहों समझते ॥ ३१ ॥

(चौपाई )

बहुत बढ़ाई कहांलों कीजे ।
कारिजरूप बात कहि लोजे ।॥।
नगर आगरे मांहि बविख्याता।
बानारसी नाम लघु ग्याता ॥ ३२॥।
ताम॑ कवितकला चतुराई।
कृपा करे ये पांचों भाई॥।
पंच प्रपंच रहित हिय खोले।
ते बनारसीसों हँसि बोले॥ ३३ ॥

अर्थ :-- अधिक सहिसा कहाँ तक कहें, मुहेकी बात कह देना उचित है। प्रसिद्ध शहर आगरेमें बनारसी नामक स्वल्प ज्ञानों हुए, उनमें काव्य- कोशल था और ऊपर कहे हुए पाँचों माई उनपर कृपा रखते थे, उन्होंने निष्कपट होकर सरल चित्तसे हंसकर फहा ।। ३२-३३ ।। १ यहा मतवाले शब्दके दो अर्थ है- (१) मतवाले>नशेमे चुर, (२) मतवाले+

जिनको मजहुबका पक्षपात है (चौपाई )

नाटक समैसार हित जोका ।
सुगमरूप राजमली टीका ॥।
कवितबद्ध रचना जो होई।
भाषा ग्रंथ पढ़े सब कोई ॥ ३४॥।

अर्थ :- जोबका कल्याण करनेवाला माटक समयसार है। उसकी राजमलजी रचित सरल टोका है। भाषामें छदबद्ध रचा जावे तो इस ग्रन्थको सब पढ़ सकते हैं ॥ ३४ ॥

(चौपाई )

तब बनारसी मनमहि आनी ।
कीजे तो प्रग्ट जिनवानी ।।
पंच पुरुषकी आज्ञा लीनो।
कवितबद्धकी रचना कीनी ॥ ३५ ॥

अर्थ :- तब बनारसीदासजीने मनमें सोचा कि यदि इसको कवितामें रचना करू, तो जिनवाणीका बड़ा प्रचार होगा। उन्होंने उन पाँचों सज्जनोंकी आज्ञा लीऔर कवित्तबद्ध रचना की ॥। ३५१

(चोपाई )

सोरहसो तिरानव बीत॑ ।
आसोौ मास सित पच्छ बितीते ।।
तिथि तेरस रविवार प्रवोना ।
ता दिन ग्रंथ समापत कीना ॥ ३६ ॥

अर्थ :- वि० सम्बत्‌ सोलहसौ तेरानवे, आश्विन मास, शुक्ल पक्ष, तैरस तिथि रबिवारके दिन यह ग्रन्थ समाप्त किया ॥ ३६ ॥

ग्रन्थ समाप्ति और अन्तिम प्रशस्ति ४२१ (दोहा)

सुख-निधान सक बंध नर, साहिब साह किरान ।
सहस-साह सिर-मुकुट-मनि, साहजहां सुलतान ॥ ३७ ॥

अर्थ :- उस समय हजारों बावशाहोंमें प्रधान महा प्रतापी और सुख- बायक सुसलसान बादशाह शाहजहाँ थे ॥ ३७ ॥

( दोहा )

जाक॑ राज सुचेनसों, कीनों आगम सार ।
ईति भीति व्यापी नहीं, यह उनको उपगार ॥ ३८ ॥

अर्थ :- उनके राज्यमें आनन्दसे इस ग्रन्थतो रचना को और कोई भय वा उपद्रव नहीं हुआ यह उनकी कृपाका फल है ॥ ३८ ॥

भ्रन्थके सब पद्योको संख्या (सर्वेया इकतीसा)

तीनसे दसोत्तर सोरठा दोहा छांद दोड,
युगलस पंतालोस इकतीसा आने हैं ।
छपघासी चोपाई, संतीस तेईसे सबंये,
बोस छप्प अठारह कवित्त बखाने है।।
सात पुनि ही अडिल्ल, चारि कुडलिए मिलि,
सकल सातसे सत्ताइस ठोक ठान हैं।
बसीस अच्छरके सिलोक कोने लेख,
ग्रंथ-संख्या सन्नह से सात अधिकाने हैं ॥ ३६ ॥

अर्थ :- ३१० सोरठे और दोहे, २४५ इकतीसे स्देये, ८५६ चोपाई, ३७ तेईसा सर्वेया, २० छुप्पय, १८ अट्टारह कविरः (घनाक्षरी ), ७ अडिल्ल, ४ कुण्डलिए - ऐसे ये सबमिलकर ७२७ सातसो सत्ताईस नाटक समयसारके पद्मयोंको संख्या है, २२ अक्षरके श्लोकके प्रमाणसे ग्रन्थ-संख्या १७०७ है ॥ ३६ ॥

( दोहा )

सम्रयसार आत्तम दरव, नाटक भाव अनत ।
सो है आगम नामसमें, परमारथ विरतंत ॥ ४० ॥
अथे :- सब द्रव्योंमें आत्मद्रव्य प्रधान हैओर नाटकके भाव अनन्त
हैं, सोउसका आगममें सत्यार्थ कथन है ॥ ४० ॥)
(भजन )
विराज रामायण घटमाहि।
मरमी होयथ सरम सो जाने, म्रख साते नाहि।
विराजे रामायण० ॥ १ ॥
आतम राम ज्ञान गुन लछमन, सोता सुमति समेत ।
शुभपयोग बानरदल मंडित, बर विवेक रनखेत. विराजे० ॥ २ ॥
ध्यान धनुष टंकार शोर सुनि, गई विषयदिति" साग।
भई भस्स मिथ्यामत लंका, उठी धारणा आग. विराजे० ॥ ३ ॥
जरे अज्ञान भाव राक्षसकुल, लरे निकांचित सूर।
जूके रागह्ेष सेनापति, संसे गढ़ चकचूर. बिराजे० ॥ ४ ॥
विलखत कुमकरण भव विभ्रम, पुलकित मन दरयाव।
थकित उदार बोर महिरावण, सेतुबंध समभाव. विराज ० ॥ ५ ॥
मृछित मंदोदरी दुराशा, सजग चरन हनुसान।
घटी चतुर्गंति परणति सेना, छुठे छपकगुण बान. विराजे० ॥ ६ ॥
निरखि सकति गुन चक्रसुद्शन, उदय बिभोषण दीन।
फिरे कबंध सही रावणकी, प्राणमाव शिरहीन. विराजें० ॥ ७ ॥
इह विधि सकल साधु घट अंतर, होय सहज संग्राम ।
यह विवहारहृष्टि रामायण, केवल निश्चय राम. विराजे० ८१

सूर्पनखा राक्षसी

ईडर भंडार की प्रति का अन्तिम अंश

इह प्रन्थकों परति एक ठोर देखो थी, वाके पास बहुत प्रकार करि मांगो, पे वापरति लिखनको नहिं दीनो, पाछें पांच भाई मिलि विचारि कियो, ज्यों ऐसी परति होवे तो बहुत आछौ । ऐसो बिचारिक तिन परति

जुदी २ देखिक अर्थ विचारिकें अनुक्रमै २ समुच्चय लिखी है ॥ (दोहा )

समयसार नाटक अकथ, अनुभव-रस-भंडार ।
याको रस जो जानहोीं, सो पावें भव-पार ॥ १॥।

(चौपाई )

अनुभो - रसके रसियाने ।
तीन प्रकार एकत्र बखाने ।।
समयसार कलसा अति नीका।
राजमलोी सुगम यह टोका ॥ २ ॥
ताके अनुक्रमः भाषा कीनी ।
बनारसी ग्याता रसलीनी ॥।
ऐसा ग्रंथ. अप्रब पाया।
तासे सबका सनहिं लुभाया॥३॥

(दोहा )

सोई ग्रंथके लिखनको, किए बहुत परकार।
बाँचनको देवे नही, ज्यों 'कृपी रतन-भेंडार ॥ ४ ॥
$ कृपण–कजूस ।
डएड सैभपसार नाटंक
सानसिघ चितन कियो, क्‍यों पाये यह ग्रंथ ।
गोविदसो इतनी कही, सरस सरस यह ग्रंथ ॥ ५॥
तब गोविद हरित भयोौ, मन बिच धर उल्लास ।
कलसा टीका अरु कवित, जे जेते तिहि पास ॥ ६ ॥

(चौपाई )

जो पंडित जन बांचो सोइ ।
अधिको उचो चौकस 'जोह॥॥
आगे पीछे अधिकौ ओछो ।
देखि विचार सुगुरुसो पुछो॥ ७ ॥
अलप मती है यह मति मेरी ।
मनमें धरहु चाह घछनेरी ॥॥
ज्यौं निज भुजा समुद्रहि तरनों ।
है अनादि ० ० ० ०
जात
१ देखकर ।