सर्वविशुद्धि द्वार (१०)
प्रतिज्ञा (दोहा )
इति श्री नाटक ग्रंथमें, कहो मोख अधिकार ।
अब बरनों संछेपसों, सर्व विसुद्धी द्वार ॥ १॥।
अर्थ :- नाटक समयसार प्रंयके मोक्ष अधिकारकी इति श्री की, अब सर्व विशुद्धि द्वारकों सक्षेपमें कहते हैं ॥ १ ॥
सर्व उपाधि रहित शुद्ध आत्माका स्वरूप (सवैया इकतीसा )
करंनिकौ करता है भोगनिको भोगता है,
जाकी प्रभुतामे ऐसो कथन अहित है ।
जामें एक इंद्री आदि पंचधा कथन नांहि,
सदा निरदोष बंध मोखसों रहित है ।।
ग्यानको समूह ग्यान गम्य है सुभाव जाको,
लोक व्यापी लोकातीत लोकमैं महित है ।
सुद्ध बंस सुद्ध चेतनाक रस अंस भरचो,
ऐसो हंस परम पुनीतता सहित है ॥ २ ॥
शब्दार्थ :- प्रभुता ८ सामथ्य । अहित र बुराई करनेवाला ।! पच्रधा “पाँच प्रकारकी । लोकातीत > लोकसे परे । महित 5 पूजनीय । परम पुनीत>अत्यन्त पवित्र । नोत्या भम्पक् प्रलयमखिलान् कतभोकत्रादिभावान् दूरोमृतः प्रतिषदमय बन्धमोक्षत्रक्लप्ते: । शुद्ध शुद्ध स्वरसविस रापुणपुण्या चलाचि- ध्टंकोल्कीर्ण प्रकट महिमा स्फूर्जतिज्ञानपुउज: ॥ १ ॥
अर्थ :-जिसको सामथ्यंके आगे कर्ंका कर्ता हैऔर कर्मका सोगता हैऐसा कहना हानिकारक’ है,पंचेन्द्रिय मेदका कथन जिसमें नहों है, जो सर्व दोष रहित है, जो न कमंसे बंधता है न छूटता है, जो शानका पिड़ और ज्ञानमोचर है, जो लोक व्यापी है, लोकसे परे है, संसारमें पुजनीय अर्थात् उपादेय है, जिसको जाति शुद्ध है, जिसमें चेतन्यरस भरा हुआ है, ऐसा हंस अर्थात् आत्मा परम पवित्र है॥ २ ॥
पुन: (दोहा)
जो निहर्च निर्मल सदा, आदि मध्य अरू अंत ।
सो चिद्रप बनारसो, जगत् मांहि जयबंत ॥ ३ ॥
शब्दार्थ :- निहचे-निश्चयनयसे । निर्मेल"पविन्र । चिद्र पलूचेतन्य- रूप ।
अर्थ :- जो निश्चयनयसे आदि, मध्य और अंतमें सर्दव निमंल है, पं० बनारसीदासजी कहते हैकि वह चेतन्य-पिड आत्मा जगतमें सदा जयबंत रहे ॥ ३॥।
वास्तवमे जीव कर्मका कर्ता-भोगता नही है (चौपाई)
जीव करम करता नहिं ऐसे ।
रस भोगता सुभाव न ॒तेसे ॥।
मिथ्यामतिसों करता होई।
गएं अग्यान अकरता सोइ ॥ ४ ॥
अर्थ :- जीव पदार्थ वास्तवमें कर्मका कर्ता नहों हैऔर न कम रसका भोगता है,मिथ्यासतिसे कमंका कर्ता-भोगता होता है,अज्ञान हटनेसे कर्मका अकर्ता-अभोगता हो होता है ॥ ४ ॥
) व्यवह्ारनय जीवको कर्मका कर्ता-भोगता कहता है, परन्तु वास्तवमें जीव कर्मका
कर्ता-भोगता नही है, अपने क्ान-दर्शन स्वमावका कर्ता-भोगता है ।
कस त्व॑न स्वभाषोप्स्प चितो वेदयित्त्वथअत् ।
अजशानादेव कर्ताय तदभाबादकारकः ॥ २ ।॥
अज्ञानमें जीव कर्मका कर्ता है (सवेया इकतीसा )
निहणे निहारत सुभाव याहि आतमाको,
आतमोक धरम परम परकासना ।
अतोत अनागत बरतमान काल जाको,
केवल स्वरूप गुन लोकालोक भासना ।।
सोई जीव संसार अवस्था मांहि करमको,
करतासो दीसे लीएं भरम उपासना ।
यहै महा मोहकौ पसार यहै मिथ्याचार,
यहे भो विकार यह विवहार वासना ॥ ५ ॥
शब्दार्थ :- निहा रत-देखनेसे । उपासना >सेवा । पसार-विस्तार । मिथ्याचा र5निजस्वभावसे विपरीत आच रण । भौ>-जन्म-मरणरूप ससार । व्यवहार>किसी निमित्तके वशसे एक पदार्थंकों दूसरे पदार्थरूप जाननेवाले ज्ञानको व्यवहार नय कहते हैं,जैसे - मिद्रीके धडेकों घीके निमित्तसे घीका घड़ा कहना ।
अर्थ :- निश्चयनपसे देखो तो इस आत्माका निज-स्वमाव परस प्रकाशरूप हैऔर जिसमें लोकालोकके छहों द्रव्योंके मृत भविष्यत् बर्तमान त्रिकालबर्तो अनंत गुण पर्यायें प्रतिभासित होती हैं। वही जोव संसारो दशामें मिभ्यात्वको सेवा करनेसे कमंका कर्ता दिखता है,सो यह मिथ्यात्वको सेवा मोहका विस्तार है, मिथ्याचरण है, जन्म-मरणरूप संसारका विकार है, व्यवहारका विषयमृत आत्मा का अशुद्ध स्वभाव है ॥ ५ ॥
जेसे जीव कमेंका अकर्ता है वेसे अभोगता भी है (चौपाई )
यथा जीव करता न कहावे ।
तथा भोगता नाम न पाबे ॥।
अकर्ता जीवो5्यं स्थित इति विशुद्ध: स्वस्सतः
स्फुरच्जिज्ज्पोतिभिशछुरितभुवनाभोग भजनः ।
तथाप्पस्यासों स्याक्षदिह किल अस्ध: प्रकृतिसि:
स लल्वज्ञानस्थ स्फुरति महिमा को5पि गहन: ॥ ३ ॥
है भोगी सिथ्यामति मांहि ।
गये मिथ्यात भोगता नांहीं ॥ ६ ॥
अर्थ :- जिस प्रकार जोब कमंका कर्ता नहों हैउसी प्रकार भोगता भी नहीं है, मिथ्यात्वके उदयमें कर्संका सोगता है, सिध्यात्वके अभावसें भोगता नहीं है ॥ ६ ॥
अज्ञानी जीव विषयोंका भोगता हैज्ञानी नहीं है (सवेया इकतीसा)
जगवासी अग्यानी त्रिकाल परजाइ बुद्धी,
सो तो बिष भोगनिकों भोगता कहायो है ।
समकिती जीव जोग भोगसों उदासी ताते,
सहज अभोगता गरंथनिमें गायोौ है।।
याही भांति वस्तुकी व्यवस्था अवधारि बुध,
परभाउ त्यागि अपनौ सुभाउ आयो है।
निरविकलप निरुषाधि आतस अराधि,
साधि जोग़ जुगत समाधिमें समायो है ॥ ७ ॥
शब्दार्थ :- जगवासी>ससारी । विर्ष (विषय) पत्र इन्द्रिय और मनके भोग । गरथनिमैं-शास्त्रोमे ।अवधारि-निर्णय करके । बुधच्ज्ञानी । जोग जोगतिज्योग निग्रहका उपाय ।
अर्थ :- शास्त्रोंमें मनुष्य आदि पर्यायोंसे सदा काल अहंब॒द्धि रखने- वाले अज्ञानी संसारो जोवको अपने स्वरूपका अज्ञाता होनेसे विषय भोगोंका भोगता कहा है, ओर ज्ञानो सम्यग्हष्टि जोबको मोगोंसे विरक्त भाव रखनेके कारण विषय भोगते हुए मी अभोगता कहा है। शानी लोग इस प्रकार वस्तु स्वरूपका निर्णय करके बिमाव माव छोड़कर स्वभाव ग्रहण करते हैं,ओर भोक्तृत्व॑ न स््थभावोध्स्य स्मृतः कठूत्ववच्चित: । अशानादेव. भोक्तापभ्य॑ तदभाबादवेदक: ॥ ४ ॥ विकल्प तथा उपाधि रहित आत्माको आराधना व योग निप्रह मार्ग ग्रहण करके निजस्वरूपमें लोन होते हैं।। ७
ज्ञानी कमके कर्ता-भोगता नही है इसका कारण (सवेया इकतीसा)
चिनमुव्राधारी ल्लुबव धर्म अधिकारी गुन,
रतन भंडारी अपहारी कर्म रोगकों ।
प्यारों पंडितनकों हुस्यारो मोख मारगमें,
न्यारो पुदगलसों उज्यारों उपयोगकों ।॥॥
जाने निज पर तत्त रहै जगमें विरत्त,
गहे न ममत्त मन बच काय जोगकों ।
ता कारन ग्यानी ग्यानावरनादि करमको,
करता न होइ भोगता न होइ भोगकौं ॥ ८ ॥
शब्दार्थ :- चिन्मुद्रा>चेतन्य चिह्न । ध्रुव-नित्य । अपहारी कर्म रागकौ>कर्मरूपी रोगका नष्ट करनेवाला । हुस्यारों (होश्यार)<प्रवीण। उज्यारौ प्रकाश । उपयोग > ज्ञानदर्शन । तत्त ( तत्त्व )८ निजस्वरूप । विर्त (विरक्त) >वैरागी । ममत्त (ममत्व )>अपनापन ।
अर्थ :- चेतन्य चिह्नका घारक, अपने नित्य स्वभावका स्वासी, ज्ञान आदि गुणरूप रत्नोंका मण्डार, कर्मरूप रोगोंका नष्ट करनेवाला, शञानों लोगोंका प्रिय, सोक्षमार्गसें कुशल, शरोर आदि पुद्गलोसे पृथक, ज्ञानदर्शनका प्रकाशक, निज पर तत्त्वका ज्ञाता, ससारसे विरक्त, मन-वचन-कायके योगोंसे ममत्व रहित होनेके कारण ज्ञानी जोब ज्ञानावरणादि कर्मोका कर्ता और भोगोंका भोगता नहीं होता है ॥ ८ ॥
अज्ञानो प्रकृतिस्वभावमिरतो मित्य भवेद्व दको
ज्ञानी तु प्रक्तिस्वभावविरतो नो जातुचिद्वदकः ।
इत्येदं नियम निरूप्य निपुणेरशानिता स्पज्यतां
शुद्धकास्ममये महस्यश्वलितेरासेब्यतां शानिता ॥ ५ ॥
(दोहा )
निरभिलाय करनी करें, भोग अरुचि घट मांहि।
ताते साधक सिद्धसम, करता भुगता नांहि। €॥।
शब्दार्थ :- निरभिलाप इच्छा रहित । अरुचि>अनुरागका अभाव । साधक-मोक्षका साधक सम्यग्हष्टि जीव । भुगता (भोक्ता )>भोगनेवाला ।
अर्थ :- सम्पग्हृष्टि जीव इच्छा रहित क्रिया करते हैं ओर अंतरंग भोगोंसे विरक्त रहते हैं, इससे वे सिद्ध भगवानके समान साजत्र ज्ञाता-हष्टा हैं,कर्ता-भोगता नहीं हैं ।। € ।।
अज्ञानी जीव कर्मका कर्ता-भोगता है इसका कारण (कवित्त)
ज्याँ हिय अंध विकल मिथ्यात धर,
मृषा सकल विकलप उपजावत ।
गहि. एकत पक्ष आतमको,
करता मानि अधोमुख धावत ॥।
त्यौ जिनसती दरबचारित्री कर,
कर करनी करतार कहावत ।
बंछित मुकति तथापि मूृढ़मति,
विन समकित भव पार न पावत ॥ १० ॥
अर्थ :- हृदयका अंधा अज्ञानी जीव मिथ्यात्वसे व्याकुल होकर मनमें अनेक प्रकारके झूठे विकल्प उत्पन्न करता है, और एकान्त पक्ष ग्रहण करके ज्ञानी करोति न न बेदयते ल कर्म जानाति केवलमर्य किल तत्स्वभावम् । जानन्परं करणबेदनयोरभावा- छुद्धस्वभावनियतः स हि मुक्त एव ॥। ६१३ ये तु कर्तारमात्मान पश्यन्ति तमसा तला: । सामसास्यजनवत्तेषां न सोक्षोषषि सुसुक्षताम ॥ ७ ॥ २४० समयप्तार नादक आत्माको कर्मका कर्ता मानके नोच गतिका पंथ पकड़ता है । वह व्यवहार- सम्यक्त्वों भावचारित्रके बिना बाह्य चारित्र स्वोकार करके शुभ क्रियासे कमंका कर्ता कहलाता है। वह मूर्ख मोक्षको तो चाहता है परन्तु निश्चय सम्पक्त्वके बिना संसार-समुद्रसे नहों तरता ॥ १० ॥
वास्तवमे जीव कर्मका अकर्ता हैइसका कारण (चौपाई)
चेतन अंक जीव लखि लीन्न्हा ।
पुदगल कर्म अचेतन चोन््हा ॥
बासी एक खेतके दोऊ।
जदपि तथापि मिले नहिं. कोऊ ॥११॥।
अथे :- जीवका चेतन्य चिह्न जान लिया और पुदूगल कमंको अचेतन
पहिचान लिया। यद्यपि ये दोनों एक क्षेत्रावगाही हैं तो भी एक दूसरेसे
नहीं मिलते ॥ ११ ॥
पुन. (दोहा)
निज निज भाव क्रियासहित, व्यापक व्यापि न कोइ ।
कर्त्ता पुदगल करमको, जीव कहांसों होइ ॥१२॥।
शब्दार्थ :- व्यापक> जो व्यापे-जो प्रवेश करे । व्यापि> जिसमें व्याप- जिसमे प्रवेश करे ।
अर्थ :- दोनों द्रव्य अपने अपने गुण-पर्यायमें रहते हैं, कोई किसोका व्याप्य-ब्यापक नहीं हैअर्थात् जीबमें न तो पुदूगलका प्रवेश होता हैऔर न पुद्गलमें जोवका प्रवेश होता है। इससे जीव पदार्थ पौदृगलिक कर्मोका कर्ता कंसे होसकता है ? ॥ १२ ॥
नास्ति सर्वोषषि सम्बन्ध: परद्रव्यात्मतस््वयों: ।
कतृकमंत्यसम्बन्धाभावे तत्कतृता कुतः ॥ ८।।
अज्ञानमें जीब करमका कर्त्ता और ज्ञानमें अकर्त्ता है (सवेया इकतीसा )
जीव अरु पुदगल करम रहें एक खेत,
जदपि तथापि सत्ता न््यारी न्यारी कही है ।
लक्षन स्वरूप गुन परजे प्रकृति भेद,
’ बुहुंमें अनाविहीकी दुविधा हू रही है।।
एलेपर भिन्नता न भासे जीव करमकी,
जोलों मिथ्याभाव तोलों ओंधि बाऊ बहो है ।
ग्यानक॑ उदोत होत ऐसो सूधी द्विष्टि भई,
जीव कर्म पिडकौ अकरतार सही है ॥ १३ ॥
शब्दार्थ :- सत्ता अस्तित्व । दुविधान्भेदभाव । ओंघिल्उल्टी । सूधी हृष्टि>सच्चा श्रद्धान । सही-सचमुचमे ।
अर्थ :- यद्यपि जोब और पोद्गलिक कम एक क्षेत्रावगाह स्थित हूँतो भो दोनोंको जुदो जुदी सत्ता है। उनके लक्षण, स्वरूप, गुण, पर्याय, स्वभावमें अनादिका हो भेद है। इतनेपर भी जब तक सिव्यासमावका उल्टा विचार चलता हैतब तक जीव पुद्गलकी भमिन्नता नहीं मासती, इससे अज्ञानी जोब अपनेको कर्मका कर्ता मानता है, पर ज्ञानका उदय होते हो ऐसा सत्य श्रद्धान हुआ कि सचमुचमें जीव कर्मका कर्ता नहीं है । विशेष :- जीवका लक्षण उपयोग है, पुद्गलका स्पर्श रस गंघ वर्ण है । जोव अमुर्तोक है, पुदृगल सूर्तोक है। जीवके गुण दर्शन ज्ञान सुख आदि हैं, पुदुगलके गुण स्पर्श रस गंध वर्ण आदि हैं। जीवकी पर्यायें नरनारक आदि हैं, पुदूगलकी पर्यायें इंट पत्थर पृथ्वी आदि हैं। जीव अबंध और अखण्ड द्रव्य है, पुद्गलमें स्निग्धता रुक्षता है। इससे उसके परमाणु मिलते .एकस्य बस्तुन इहान्यतरेण साथ सम्बन्ध एव सकलो5पि यतो निधषिद्धः । तत्कत् करंघटनास्ति न वस्तुभेदे पश्यन्त्वकल मुनयश््व जताश्र तस्वम् ।। € ॥। २५२ सम्रयत्तार नाटक बिछुरते हैं। भाव यह है कि दोनोंके द्रव्य क्षेत्र काल भावका चतुष्टय जुदा जुदा हैऔर जुदी जुदी ससा है। दोनों अपने ही गुण-पर्यायोंके कर्ता-भोगता है,कोई किसी दूसरेका कर्त्ता-भोगता नहीं है ॥११२३।॥।
पुनः (दोहा)
एक वस्तु जंसी जु है, तासों मिले न आन।
जीव अकरता करमकोौ, यह अनुभो परवांन ॥ १४१ ॥
अर्थ :- जो पदार्थ जेसा है वह वेसा हो है, उसमें अन्य पदार्थ नहीं मिल सकता, इससे जीव कर्म काअकर्सा है,यह विज्ञानसे सबंथा सत्य है॥ १४ ॥
अज्ञानी जीव अशुभ भावोका कर्ता होनेसे भावकर्मका कर्ता है (चौपाई )
कजो दुरमती विकल अस्यानोी ।
जिन्हि सु रीति पर रीति न जानी ॥।
माया सगन भरमकफे भरता।
ते जिय भाव करमके करता ॥ १५ ॥
अर्थ :- जो दुबु दिसेव्याकुल और अज्ञानी हे वे निज-परणति और पर-परणतिको नहीं जानते, मायामें सग्न हे और भ्रममें मूले हेइससे वे भाव कसंके कर्ता है ॥१५॥।
( दोहा )
जे भिथ्यासति तिमिरसों, लखे न जीव अजीव ।
तेई भावित करमके, करता होंहि सदीव ॥ १६ ॥
जे असुद्ध परनति धरे, कर अहूं परवांन ।
ते असुद्ध परिनामके, करता होंहि अजान ॥१७।॥।
ये तु स्वभावनियर्म कलयन्ति नेम- सशानसग्नसमहसों बत ते वराकाः । कुबन्ति कम तत एवं हि भावकर्म- कर्ता स्वयं भवति चेतन एब नान््य: ॥ १० ॥ अथे :- जो मिथ्याज्ञानके अंधकारसे जोव-अजीवको नहीं जानते वे हो सदा भावकमंके कर्ता हैं॥१६॥ जो विभावषपरिणतिके कारण पर- पदार्थोर्में अहुंबुद्धि करते हैं वे अल्ञानी अशुद्ध भावोंके कर्ता होनेसे भावकर्मोंके कर्ता हैं ॥ १७ ॥
इसके विषयमें शिष्यका प्रश्न (दोहा)
शिष्य कहे प्रभु तुम कह्यो, दुबिधि करमको रूप । दरब कर्म पुदगल मई, भावकर्म चिद्रप ॥ १८ ॥ करता दरवित करमको, जीव न होइ त्रिकाल । अब यह भावित करम्त तुम, कहो कौनकी चाल ॥ १६ ॥ करता याकौ कौन है, कौन करे फल भोग । के पुदगल के आतमा, के दुहुंकौ संजोग ? ॥ २० ॥ अर्थ .- शिष्य प्रइन करता है कि हेस्वामि ! आपने कहा कि कर्मका स्वरूप दो प्रकारका है, एक पुद्गलमय द्रव्यकमं है और दूसरे चेंतन्यके विकार भावकर् हैं ॥ १८ ॥ आपने यह भी कहा कि जीव, द्रव्यकर्मोका कर्त्ता कभी त्रिकालमें भो नहों होसकता, तो अब आप कहिये कि भावकर्स किसकी परिणति है ? ॥ १६ ॥ इन भावकर्मोका कर्त्ता कौन है ? और उनके फलका भोगता कौन है ? भावकर्मोका कर्त्ता-भोगता पुद्गल है या जीब है, या दोनोंके सयोगसे कर्त्ता-भोगता है ? ॥ २० ॥
इसपर श्षीयुरु समाधान करते हे (दोहा)
क्रिया एक कश्ला जुगल, यो न जिनागम मांहि ।
अथवा करनी ओरकी, और करेंयो नांहि ॥ २१।।
करे और फल भोगवं, और बने नहिं एम।
जो करता सो भोगता, यहे जथावत जेम ॥ २२॥।
कार्यत्वादवर्त न कर्म न च तज्जीवध्रकत्योद्द
रज्ञाया: प्रकतेः स्वकार्यफलभग्भावानुषगात्कृति ।
नेकस्पा: प्रकतेरचित्त्त्तसनाज्जीबोषस्य कर्ता तत्ो
जोवस्येब च कम तच्सिदनुग ज्ञाता न पत्पुदूगल: ॥ ११ ॥
भावकरम करतव्यता, स्वयंसिद्ध नहि होइ ।
जो जगकी करनी कर, जगयासी जिय सोहइ ॥ २३ ॥
जिय करता जिय भोगता, भावकरस जियचाल ।
पुदगल करें न भोगवे, दुविधा मिथ्याजाल ॥ २४ ॥
ताते भावित करमकों, करे मिथ्याती जीव ।
सुख दुख आपद संपदा, भुरज सहज सदीव ॥ २५ ॥
शब्दार्थ :- जुगल (युगल) दो । जिनागम (जिन+आगम )5 जिनराजका उपदेश । जथावत-वास्तवमें । कर्तव्यता-क रतूति । स्वय सिद्ध अपने आप । जगवासी जिय>ससारी जोव । जियवाल-जीवकी परिणति । दुविधाजनदोनों ओरका भुकाव। आपद>इष्ट वियोग, अनिष्ट सयोग । सपदा>अनिष्ट वियोग, इष्ट सयोग । भूजे>भोगे ।
अर्थ :- क्रिया एक ओर कर्त्ता दोऐसा कथन जिनराजके आगममें नहीं है, अथवा किसोको क्रिया कोई करे, ऐसा भो नहीं हो सकता ॥ २१ ॥ क्रिया कोई करे और फल कोई भोगे ऐसा जन बंनमें नहीं है, क्योंकि जो कर्त्ता होता है, वही वास्तबमें भोगता होता है । २२।। मावकर्ंका उत्पाद अपने आप नहों होता, जो ससारकी क्रिया हलन-चलन चतुर्गति भ्रमण आदि करता है,वही संसारी जीव भावकमंका कर्सा है॥ २३ ॥ भावकमोंका कर्त्ता जीव है, भावकमोंका भोगता जोब है, भावकर्म जोवकी विभाव- परिणति है। इनका कर्त्ता-भोक्ता पुदूगल नहीं है, ओर पुदूगल तथा दोनोंका मानना सिथ्या जंजाल है॥ २४ ॥ इससे स्पष्ट है कि भावकर्मोंका कर्त्ता मिथ्यात्वी जीब हैओर बहो उनके फल सुख-दुख वा संयोग-वियोगकों सदा भोगता है ॥ २५ ॥
कर्मके कर्त्ता-भोक्ता बाबत एकांत पक्षपर विचार (सर्वेया इकतीसा )
केई मृढ़ विकल एकंत पच्छ गहेैं कहें,
आतमा अकरतार प्रन परम है।
कर्मेंद प्रदितकर्य कतहतक: क्षिप्टवास्सन कतुंता
फर्तात्मैज कथंचिदित्यचलिता कंश़्िच्छुति:कोपिता ।
तेबाघुद्धतमोहमुद्रितषियां बोधस्य संशुद्धये
स्याद्रादप्र तिबन्धसब्धविजया बस्तुस्थिति: हत्यते ॥ १२ ॥
तिन्हिसों जु कोऊ कहै जोब करता है तासों,
फेरि कहें करमको करता करम है।।
ऐसे मिथ्यामगन मिथ्याती ब्रह्मघातो जीव,
जिन्हिक॑ हिए अनादि मोहकों भरम है ।
तिन्हिकों मिथ्यात दूर करियेकों कहें गुरु,
स्थादवाद परवान आतम धरम है॥ २६ ॥
शब्दार्थ :- विकल>ट्रखी । एकान्त पक्ष >पदार्थके एक धर्मको उसका स्वरूप माननेका हठ । ब्रह्मघाती >अपने जीवका अहित करनेवाला ।
अर्थ :- अज्ञानसे दुखो अनेक एकान्तवादी कहते हैं किआत्मा कमंका कर्ता नहों है, वह पुर्ण परमात्मा है। और उनसे कोई कहे कि कर्मोंका कर्त्ता जोब है, तो वेएकान्तपक्षी" कहते हैं कि कर्मका कर्त्ता कर्म हो है। ऐसे मिथ्यात्वमें पगे हुए मिथ्यात्वो जीव आत्माके घातक हैं,उनके हृदयमें अनादि कालसे मोहकर्म जनित भूल भरी हुई है । उनका मिश्यात्व दर करनेके लिये श्रोगुरुने स्थाह्ादरूप आत्माका स्वरूप वर्णन किया है (१ २६॥।
स्थाद्ादमे आत्माका स्वरूप (दोहा)
चेतन करता भोगता, भिथ्या मगन अजान ।
नहि करता नहि भोगता, निहच सम्यकवान ॥ २७ ॥
अर्थ :- मिथ्यात्वमें पगा हुआ अज्ञानो जीव कर्मका कर्त्ता-भोक्ता है, निश्चयका अवलम्बनलेनेबाला सम्यक्त्वी कमंका न कर्ता है न भोक्ता है ॥ २७ ॥
इस विषयका एकान्तपक्ष खण्डन करनेवाले स्थाद्वादका उपदेश
“जैसे सांख्यमतो कहें अलख अकरता है,
सर्वथा प्रकार करता न होइ कबहीं।
साख्यमतोी आदि ।
सा5कर्तारसमो स्पृशस्तु पुरुष सांख्या इबाप्याहँता: कर्तारं कलयन्तु तंकिल सदा भेदावबोधादध: । ऊध्य तृद्धतबोघधामनियत प्रस्यक्षमेन स्वयम् पश्यन्तु च्युतकठू भावमचल शातारमेक॑ परम् ॥ १३ ॥
तेसे जिनमती गुरुमुख्ल एक पक्ष सुनि,
याहि भांति माने सा एकंत तजो अबहीं ।।
जौलों दुरमतो तोलों करमको करता है,
सुमती सदा अकरतार कटह्मौं सबहों ।
जाक॑ घटि ग्यायक सुभाउ जग्यों जबहीसों,
सो तो जगजालसों निरालौ भयौ तबहीं ॥ २८ ॥
शब्दार्थ :- जिनमती-जिनराज कथित स्याद्वाद विद्याके ज्ञाता ।
अर्थ :- जिस प्रकार सांस्यमती कहते हैकि आत्मा अकर्त्ता है, किसो भी हालतमें कभी कर्ता नहों होसकता । जैनसतो भी अपने गुरुके मुखसे एक नयका कथन सुनकर इसी प्रकार मानते हैं, परइस एकान्तवादको अभी ही छोड़ दो, सत्यार्थ बात यह हैकि जब तक अज्ञान है,तब तक ही जीव कर्मका कर्त्ता है, सम्पग्लानकी सब हालतोंमें सदेव अकर्त्ता कहा है । जिसके हृदयमें जबसे ज्ञायकस्वभाव प्रगट हुआ है वह तभीसे जगतके जंजालसे निराला हुआ - अर्थात् मोक्षके सन््मुख हुआ है ॥ २८ ॥
इस विपयमे बौद्धमतवालोंका विचार (दोहा) (स्वेथा इकतीसा )
बोध छिनकवादी कहे, छिनभंगुर तन मांहि ।
प्रथम समय जो जोब है, दुतिय समय सो नांहि ॥ २६ ॥
ताते मेरं मतबिषे, करे करम जो कोइ ।
सो न भोगव सरवथा, और भोगता होइ ॥ ३० ॥
अर्थ :- क्षणिकवादो बोद्धमतवाले कहते है किजीव शरीरमे क्षणभर क्षणिकमिदर्मिहिक कल्पयित्वात्मतत्त्व निजमनसि विधत्ते कठतृभोकत्रोविभेदम । अपहरति विमोहं तस्य नित्यामतौधे. स्वपमग्रमभिषिञ्य श्विच्चमत्कार एज ॥ १४।। रहता है, सदेव नहीं रहता । प्रथम समयमें जो जीव है वह दूसरे समयमें’ नहीं रहता ॥ २६ ॥ इससे मेरे विचारमभें जो कर्म करता है वह किसी हालतमें भी भोक्ता नहीं हो सकता, भोगनेवाला और हो होता है ॥ ३० ॥
बौद्धमतवालोंका एकान्त विचार दूर करनेको दृष्टान्त द्वारा सम+प८ते है । (दोहा )
यह॒एकंत सिथ्यात पख, दूर करनक॑ काज ।
चिट्विलास अविचल कथा, भाषे श्रोजिनराज ॥ ३१ ॥
बालापन_ काहू पुरुष, देख्यों पुर एक कोह ।
तरुन भए फिरिके लख्यों, कहे नगर यह सोइ ॥ ३२ ॥
जो दुहु पनमें एक थो, तो तिनि सुमिरन कौय ।
और पुरुषको अनुभव्यो, और न जाने जीय ॥ ३३ ॥।
जब यह वचन प्रगट सुन्यौ, सुन्यो जेनमत सुद्ध ।
तब इकतवादी पुरुष, जन भयो प्रतिबुद्ध ॥ ३४ ॥
अर्थ :- इस एकान्तवादकी मिथ्यापक्ष हटानेके लिये श्रीमज्जिनेन्द्रदेव आत्माके नित्यस्वरूपका कथन करते हुए कहते हैं ॥ २१ ॥ कि किसी मनुष्यने बालकपनमें कोई नगर देखा, और फिर कुछ दिनोंके बाद जवानोकी अवस्थामें वही नगर देखा तो कहता हैकि यह वही नगर हैजो पूबमें देखा था ॥ ३२॥ दोनों अवस्थाओंमें वह एक ही जीव था तब तो उसने स्मरण किया, किसी दूसरे जोवका जाना हुआ वह नहों जान सकता था ॥ ३३ ॥ जब इस प्रकारका स्पष्ट कथन सुना और सच्चे जनम्तका उपदेश मिला तब वह एकान्तवादो मनुष्य प्रतिबद्ध हुआ और उसने जेनमत अंगीकार किया ॥ ३४ ॥ ) एक सेंकिण्डमें असख्य समय होते है ।
बौद्ध भी जीव द्रव्यको क्षण-भगुर कंसे मान बैठे इसका कारण वबतलाते है (सवैया इकतीसा )
एक परजादइ एक समंमें विनसि जाइ,
दृूजी परजाइ दूजे समे उपजति है।
ताकौ छल पकरिक बोध कहे समे सम,
नवोौ जीव उपज पुरातनकी छति है॥।
ताते माने करमकों करता है और जीव,
भोगता है और वाक हिए ऐसी मति है ।
परजोौ प्रवांनकों सरवथा दरब जाने,
ऐसे दुरबुद्धोकोँ अवसि दुरगति है॥३५॥
शब्दार्थ :- परजाइ>अवस्था । पुरातनन्प्राचीन । छति (क्षति) नाश । मतिव्समझ । परजोौ प्रवान5हालतोके अनुसार । दुरबुद्धि-मूर्ख ।
अर्थ :- जीवकी एक पर्याय एक समयमें नष्ट होती है और दूसरे समयमें दूसरी पर्याय उपजतो है, और जेनमतका सिद्वान्त भी है, सो उसी बातको पकडके बौद्धमत कहता है कि क्षण-क्षणपर नया जीव उपजता है. और पुराना विनशता है। इससे वे मानते हैंकि कर्मंका कर्ता और जीव है, तथा भोक्ता ओर हो है, सो उनके चित्तमें ऐसी उलटो समझ बेंठ गई है। श्रोगुर कहते हैँकि जो पर्यायके अनुसार हो द्रव्यफो स्बंधा अनित्य मानता है ऐसे मुर्खकी अवश्य कुगति होती है । विशेष :- क्षणिकवादी जानते हैं कि मांस-भक्षण आदि अनाचारमें वर्तेनेवाला जोब है, वह नष्ट हो जावेगा, अनाचारमें वर्तनेबालेको तो कुछ भोगना ही नहीं पड़ेगा, इससे मोज करते हैंऔर मनपाने चतंते हैं। परन्ठु किया हुआ कर्म भोगना हो पड़ता है। सो नियमसे वे अपने आत्माको कुगतिमे पटकते है ॥ ३५ ॥
वृत्त्यशभेदतो5्त्यन्त॑ वृत्तिमन्नाशकल्पनात् ।
अन्य करोति भूडक्तेधन्य इत्येकान्तश्वकास्तु मा ॥ १५ ॥
सबविशुद्धि द्वार र्श्ढ
दुर्बृद्धिकी दु्गंति ही होती है (दोहा)
कहै अनातमकी कथा, चहै न आतम सुद्धि ।
रहै अध्यातमसों विभुख, दुराराधि दुरबुद्धि ॥! ३६॥।
दुरबुद्धी भिथ्यामती, दुरगति मिथ्याचाल ।
गहि एकंत दुरबुद्धिसों, मुकत न होइ त्रिकाल ॥ ३७ ॥
शब्दार्थ :- अनातम-अजीव । अध्यातमल्आत्मज्ञान । विमुख- विरुद्ध । दुराराधि"किसी भी तरहसे न समभनेवाला । दुर्बुद्धिल मूर्ख ।
अर्थ :- मूर्ख मवुब्य अनात्माकी चरक्षा किया करता है, आत्माका अभाव कहता है-आत्मशुद्धि नहीं चाहता। वह आत्मज्ञानसे पराइमुख रहता है, बहुत परिश्रम पूरक समभानेसे भी नहीं समझता ॥ ३६ ॥
सिथ्याहृष्टि जीव अज्ञानी है, और उसकी मिथ्याप्रवृत्ति दुर्गंतिका कारण है,
वह एकान्तपक्ष ग्रहण करता है, और ऐसी मूृखतासे वह कभी भो मुक्त नहीं
हो सकता ॥ ३७ ॥
दुर्वद्धिकी भूलपर हप्टान्त (सवेया इकतीसा )
कायासों विचारं प्रीति मायाहीसों हारि जीति,
लिये हठ रीति जेसे हारिलकी लकरी ।
चंगुलके जोर जेसे गोह गहि रहै भूमि,
त्योंही पाइ गाडे पे न छाड़ टेक पकरी ।।
मोहकी मरोरसों भरमको न छोर पाब,
धार्व चहुं बोर ज्यों बढ़ाये जाल मकरी।
ऐसी दुरबुद्धि भूली भूठक भझरोखे भूलो,
फूली फिरे भमस्तता जंजोरनिसों जकरो ॥ ३८ ॥
शब्दार्थ :- काया >शरीर । हठ-दुराग्रह । गहि रहे>पकड रक्से । लकरी >लाठी । चगुल>पक्ड । पाइह गाड>”अड़ जाता है। टेक-हठ । धावे"भटके ।
अर्थ :- अज्ञानी जीव शरोरसे अनुराग रखता है, धनको कमोमें हार और घनकी बढ़तीमें विजय मानता है, हठोला तो इतना होता हैकि जिस प्रकार हरियल पक्षो अपने पांदसे लकड़ीको खूब सजबूत पकड़ता है, अथवा जिस प्रकार गोह" जमोन व दोवालकों पकड़कर रह जाता है, उसी प्रकार बहू अपनो कुटेब नहों छोड़ता - उस्तो पर डटा रहता है। मोहके भकोरोंसे उसके भ्रमको थाह नहों मिलतो अर्थात् उसका मिथ्यात्व अनंत होता है, बह चतुर्गतिमें भटकता हुआ मकड़ीकासा जाल फंलाता है,इस प्रकार उसको मूखंता अज्ञानसे झूठके मार्गमें झल रहो है, ओर ममताको सांकलोंसे जकड़ो हुई बढ़ रही है ॥ ३८
दुर्बद्धकी परिणति (सवेया इकतीसा)
बात सुनि चौंकि उठे बातहीसों भोंकि उठ,
बातसों नरम होइ बातहीसों अकरी।
निदा करें साधुको प्रसंसा करें हिसकको,
साता माने प्रभुता असाता माने फकरी ॥।
मोख न सुहाइ दोष देखे तहां पेठि जाइ,
कालसों डराइ जेसे नाहरसों बकरी ।
ऐसी दुरबुद्धि भूली भूठक॑ भझरोखे भूली,
फूली फिर ममता जंजीरनिसों जकरोी ॥ ३६ ॥
शबदार्थ: - चौकि उठ >तेज पड़े । भौकि उठं-कुत्तेके समान भौकने
लगे । अकरी >ऐंठ जावे । प्रभुतानूवडप्पन । फकरी (फकीरी )>गरीबी ।
काल-मृत्यु ।नाहर-बाघ, सिह ।
अर्थ :- अज्ञानो जोब हिताहित नहों विचारता, बात सुनते हो तेज पड़ने लगता है, बात ही सुनकर कुत्तके समान भौंकने लगता है, मन रुचतो बात सुनकर नरम हो जाता है, और असुहातो बात हो तो ऐंठ जाता है। १ मोह एक प्रकारका जानवर होता हैं। उसे चोर लोग पासमे रखते है, जब उन्हें ऊँचे महलो मदिरोपर चढना होता है तब वे गोहकी कमरसे लम्बी रस्सी बाधकर उसे ऊपरको फेक देते है, तोबह ऊपर जमीन व भीतको खूब मजबूत पकड़ लेता है और चोर लटकती हुई रस्सीको पकड़कर ऊपर चढ़ जाते हैं । मोक्षमार्गो साधुओंकी निन्दा करता है,हिंसक अधरमियोंकी प्रशंसा करता है, साताके उदयमें अपनेको महान् और असाताके उदयमें तुच्छ गिनता है । उसे मोक्ष नहीं सुहाता, कहों दुर्गुग दिखाई देयें तो उन्हें शीघ्र अंगीकार कर लेता है। शरीरमें अहंबद्धि होनेके कारण मौतसे तो ऐसा डरता है जसे बाघसे बकरो डरतो है,इस प्रकार उसकी मुर्खता अज्ञानसे झठके मार्गेमें झल रहो हैऔर ममताको सॉकलोंसे जकड़ी हुई बढ़ रही है ॥ ३६ ॥
अनेकान्तकी महिमा (कवित्त)
केई कहें जीव क्षनभंगुर,
केई कहें करम करतार ।
केई करमरहित नित जंपहि,
नय अनंत नानापरकार ।।
जे एकांत गहें ते म्रख,
पंडित अनेकांत पल्ल धार ।
जेसे भिन्न भिन्न मुकताहल,
गुनसों गहत कहावे हार ॥ ४० ॥
शब्दार्थ :- क्षनभंगुर>अनित्य । जंपहिन्न्कहते है। एकात>एक ही नय । अनेकात८-अपेक्षित अनेक नय । पख धार-पक्ष ग्रहण करना। मुकताहल (मुक्ताफल)-मोती । गुनच्सूत ।
अर्थ :- बौद्धमती जीबको अनित्य ही कहते हैं, मीमांसक मतवाले जीवको कर्मका कर्ता हो कहते हैं ।॥सांख्यमती जीवकों कमेरहित ही कहते हैं । ऐसे अनेक समतवाले एक एक धममंको ग्रहण करके अनेक प्रकारका कहते हैं, पर जो एकान्त ग्रहण करते हैं वे मूर्ख हैं, विद्वान् लोग अनेकांतको आत्मान परिशुद्धमोप्सुलिरतिब्याप्ति प्रपश्चान्पक: कालोपाधियलादशुद्धिमणघिकां तत्रापि भत्वा परे: । चैतन्य क्षणिक प्रकल्प्प पृथकेः शुद्धओुसृत्रेरते: आत्सा ब्युण्कित एव हारबबहो लिःसृत्रमुक्त क्षिभिः ॥ १६॥। किम कमिकमनक मिल दममनन नवकिलीकभी जी जज 3… ाएए्रणनाणराणशशशश/शशशशणणशणशशानाणतओ स्वीकार करते हैं। जिस प्रकार मोतो जुदा-जुदा होते है, पर सूतमें गुहनेसे हार बन जाता है। उसी प्रकार अनेकांतसे पदार्थवी सिद्धि होती है, ओर जिस प्रकार जुदा-जुदा मोती हारका काम नहीं देते, उसो प्रकार एक नयसे पदार्थका स्वरूप स्पष्ट नहीं होता, बल्कि विपरीत हो जाता है ॥ ४० ॥
पुन (दोहा)
यथा सूत संग्रह बिना, मुकत माल नहि होइ।
तथा स्थादवादी बिना, मोख न साथे कोइ ॥ ४१ ॥
शब्दार्थ :- सप्रह+ इकट_ । मकत माल>मोतियोकी माला ।
अर्थ :- जैसे सूतमें पोये बिना सोतियोंकी माला नहों बनती बसे हो स्पाह्ादीके बिता कोई मोक्षमार्ग नहों साध सकता ॥ ४१ ॥
पुन. (दोहा)
पद सुभाव प्रब उ्दे, निहच उद्यम काल।
पच्छुपात मिथ्यात पथ, सरबंगी सिदर चाल ॥ ४२ ॥
शब्दार्थ :- पद + पदार्थ । सुभाव ( स्वभाव ) ८ निजधर्म । उद्यम>पुरुपार्थ, तदबीर । कालसमय । पक्षपात-एक ही नयका ग्रहण । सरवगीजअनेक नयका ग्रहण ।
अर्थ :- कोई पदार्थके स्वभावहोको, कोई पृर्वंकमंके उदयहीको, कोई निश्चयमात्रको, कोई पुरुषार्थो और कोई कालहोको मानते हैं, पर एकहो पक्षका हठ प्रहण करना मिथ्यात्व है, और अपेक्षित सबहोको स्वीकार करना सत्याथ है॥ ४२ ॥
भावार्थ :- कोई कहता है कि जो कुछ होता है, सो स्वभाव (नेचरल ) हीसे अर्थात् प्रकृतिसे होता है, कोई कहते है कि जो कुछ होता है, वह तकदीरसे होता है, कोई कहते हैं कि एक ब्रह्म हो है, न कुछ नष्ट कतुबेंदयितुभ्न पुक्तिवशतो भेदोःसत्वभेदोषषि बा कर्ता वेदथिता च मा भवतु वा वस्त्वेब सब्चिन्त्यताम । प्रोता मृत्र इवात्मनोह निपुणभेत्त’ न शक्या क्वचि- च्चिच्चिस्तामणिमालिकेयससितोप्येका चकास्त्वेव नः ।। होता है, न कुछ उत्पन्न होता है, कोई कहते हैं कि तदबोर ही प्रधान है, कोई कहते हैकि जो कुछ करता है सो काल ही करता है, परन्तु इन पॉचोंमेंस एक क्रिसोहीको मानना, शेष चारका अमाव करना एकान्त है।
छहो मतवालोंका जीव पदार्थपर विचार (स्वेया इकतीसा )
एक जीव वस्तुके अनेक युन रूप नाम,
निजजोग सुद्ध परजोग्सों असुद्ध है।
वेदपाठी ब्रह्म कहें मीमांसक कम कहें,
सिवमती सिब कहे बोद्ध कहे बुद्ध है ।।
जनी कहे जिन न्यायवादी करतार कहें,
छहों दरसनमें वचनको विरुद्ध है।
वस्तुका सुरूप पहिचाने सोई परवोन,
वचनक भेद भेद माने सोई सुद्ध है ॥॥ ४३१
शब्दार्थ :- निजजोग-निजस्वरूपसे । परजोगलअन्य पदार्थके सयोगसे । दरसन (दर्शन) >मत । वस्तुकौ सुरूप>पदार्थका निजस्वभाव । परवीन (प्रवीण )-पंडित ।
अर्थ :- एक जीव पदार्थके अनेक ग्रुण, अनेक रूप, अनेक नाम हैं, वह परपदार्थके संयोग बिना अर्थात् निजस्वरूपसे शुद्ध हैऔर परद्रव्यके सयोगसे अशुद्ध है। उसे वेदपाठो अर्थात् वेदान्ती ब्रह्म कहते है, मोमांसक कर्स कहते है, शबलोग वेशेषिक सतवाले शिव कहते हैं, बोह मतवाले बुद्ध कहते है, जेनी लोग जिन कहते है, नेयायिक कर्त्ता कहते हैं । इस प्रकार छहों मतके कथनमें वचनका विरोध है। परन्तु जो पदार्थंका निज-स्वरूप जानता हैवही पंडित है, और जो वबचनके भेदसे पदार्थमें भेद मानता है वही मूर्ख है ॥ ४३ ॥
पॉचो मतवाले एकान्ती और जेनी स्याद्वादी हैं (सवेया इकतीसा )
वेदपाठी ब्रह्म मांनि निहचे सुरूप गहेैं,
सीसांसक कर्म मसांनि उदेसें रहत है।
बोड़मतो बुद्ध मांनि सूच्छम सुभाव साध,
सिवमती सिवरूप कालकों कहत है ॥।
न्याय ग्रंथके पढ़ेया थापे करतार रूप,
उदहिम उदोरि उर आनंद लहत है।
पांचों दरसनि तेतो पोष एक एक अंग,
जेनी जिनपंथी सरवंगी ने गहुत है ॥ ४४॥
शब्दार्थ :- उहिम ७ क्रिया। आनद 5 हषे। पोषे ८ पुष्ट करे। जितपथी >जैनमतके उपासक । सरवगी नँनच्सवेनय-स्याद्वाद ।
अर्थ :- वेदान्ती जीवकों निश्चयनयकों हृष्टिसे देखकर उसे सर्वथा ब्रह्म कहता है, मोमांसक जीवके कसं-उदयकी तरफ हृष्टि देकर उसे कर्म कहता है, बोद्धमतो जीवको बुद्ध मानता है और उसका क्षणभंगुर सुक्ष्म रवभाव सिद्ध करता है, शव जोवकों शिव मानता हैऔर शिवकों कालरूप कहता है, नेयायिक जीवको क्रियाका कर्त्ता देखकर आनंदित होता हैऔर उसे कर्त्ता मानता है । इस प्रकार पाँचों मतवाले जोबके एक एक धर्मको पुष्टि करते हैं, परन्तु जेनधर्मके अनुयायी जेनी लोग सर्व नयका विषयमूत आत्मा जानते हैं, अर्थात् जंनमत जोवको अपेक्षासे ब्रह्म भी मानता है, कमरूप भो सानता है, अनित्य भो मानता है, शिवस्वरूप भी मानता है, कर्ता भी समानता है, निष्कर्म भी मानता है, पर एकान््त रूपसे नहीं । जेनमतके सिवाय सभी मत मतवाले है, सर्वथा एक पक्षके पक्षपाती होनेसे उन्हें स्वरूपको समझ नहीं है॥ ४४ ॥
पाँचों मतोके एक एक अगका जैनमत समर्थक है (सवेया इकतीसा )
निहचे अभेद अंग उदे गुनकी तरंग,
उहिमकी रोति लिए उद्धता सकति है।
परजाइ रूपको प्रवान सुच्छम सुभाव,
कालकीसो ढाल परिनाम चक्र गति है।।
याही भांति आतम दरबके अनेक अंग,
एक माने एककों न माने सो कुमति है ।
टेक डारि एकमें अनेक खोजें सो सुबुद्धि,
खोजी जीव वादी मरे सांची कहवति है ॥ ४५ ॥
शब्दार्थ :- याही भाँति 5इस प्रकार। कुमति 5 भिथ्याज्ञान । खोजे “ दूढे । सुबुद्धि सम्यग्ज्ञान ।खोजी 5 उद्योगी। वादी 5 बकवाद करनेवाला ।
अर्थ :-जीव पदार्थके लक्षणमें भेद नहीं है, सब जीव समान हैं, इसलिये वेदान्तीका माना हुआ अद्वंतवाद सत्य है। जीवके उबयमें ग्रुणोंकी तरंगे उठती है, इसलिये मीमांसकका माना हुआ उदय भी सत्य है। जीवमें अनंत शक्ति होनेसे स्वभावमें प्रवर्तता है, इसलिये नेयायिकका माना हुआ उद्यम अंग भी सत्य है। जीवकी पर्यायें क्षण-क्षणमें बदलती हैं, इसलिये बोद्धमतीका माना हुआ क्षणिक भाव भी सत्य है। जीवके परिणास कालके चक्रके समान फिरते है, और उन परिणामोंके परिणसनमें कालद्रव्य सहायक है, इसलिये शेबोंका माना हुआ काल भी सत्य है। इस प्रकार आत्मपदार्थके अनेक अंग है। एकको मानना और एकको नहों मानना सिथ्याज्ञान है, और दुराग्रह छोड़कर एकमें अनेक धर्म दूढ़ता सम्यग्ज्ञान है। इसलिये संसारमें जो कहावत है कि ‘खोजी पावे वादी मरे’ सो सत्य है ॥ ४५ ॥
स्पाद्वादका व्याख्यान (सवेया इकतीसा )
एकमें अनेक है अनेकहीमें एक है सो,
एक न अनेक कछु कह्मों न परतु है।
करता अकरता है भोगता अभोगता है,
उपजे न उपजत मूृएं न मरतु है।॥॥
बोलत विचारत न बोले न विचार कछू,
भेखको न भाजन पे भेखसों धरतु है ।
ऐसौ प्रभु चेतन अचेतनकी संगतिसों,
उलट पलट नटबाजीसी करतु है ॥ ४६ ॥
अर्थ :- जीवसें अनेक पर्यायें होती हैं इसलिये एकमें अनेक है, अनेक पर्यायें एक ही जीवद्रव्यको हैंइसलिये अनेकमें एक है,इससे एक है या अनेक हैकुछ कहा हो तहीं जासकता। एक मी नहीं है,अनेक भी नहों है, अपेक्षित एक है, अपेक्षित अनेक है । वह व्यवहारनयसे कर्त्ता है, निश्चयसे अकर्त्ता है, वयवहा रनयसे कर्मोका भोक्ता है,निश्चयसे कर्मोका अभोक्ता है,व्यवहारनयसे उपजता है,निश्चयनयसे नहीं उपजता है- था, हैऔर रहेगा, व्यवहारनयसे मरता है, निश्चयनयसे अमर है, व्यवहारनयसे बोलता है, विचारता है, निश्चयनयसे न बोलता है, न विचारता है, निश्चयनयसे उसका कोई रूप नहीं है, व्यवहारनयसे अनेक रूपोंका धारक है। ऐसा चंतन्य परमेश्वर पौदगलिक कर्मोंकी संगतिसे उलट-पलट हो रहा है, मानों नट जेसा खेल खेल रहा है॥ ४६ ॥
निविकल्प उपयोग ही अनुभवके योग्य है (दोहा)
नटबाजी ’ विकलप दसा, नांही अनुभो जोग ।
केवल अनुभो करनको, निरविकलप उपजोग ॥ ४७ ॥
शब्दार्थ :- नटबाजी >नटका खेल । जोगल््योग्य ।
अर्थ :- जीवकी नटके समान उलदा-पुलटो सबिकल्प अवस्था है, वह अनुभवके योग्य नही है। अनुभव करने योग्य तोउसकी सिर्फ निविकल्प अबस्था हो है ॥ ४७ ॥
अनुभवम विकल्प त्यागनेका हृष्टान्त (सवैया इकतीसा)
जेसे काहू चतुर संवारी है मुकत माल,
मालाको क्रियासे नाना भांतिकौ विग्यान है ।
क्रियाकौं विकलप न देखे पहिरनवारो,
मोतिनकी सोभामें सगन सुखवान है।।
१ “घटवासोी” ऐसा भी पाठ है ।
तेसें न करे न भु जेअथवा करे सो भुज,
और करें और भुजे सब नय प्रवांन है ।
जदपि तथापि विकलप विधि त्याग जोग,
निरविकलप अनुभो अमृत पान है ॥ ४८॥
शब्दार्थ :- संवारी >सजाई । मुकत माल न-मोतियोंकी माला । विग्यान>चतुराई । मगन मस्त । अमृत पान-"अमृत पीता ।
अर्थ :- जैसे किसी चतुर मनुष्यने मोतियोंको माला बनाई, माला बनानेसें अनेक प्रकार खतुराई की गई, परन्तु पहिननेवाला साला बनानेकी कारीगरोपर ध्यान नहीं देता, मोतियोंको शोभामें मस्त होकर आनन्द मानता है,उसी प्रकार यद्यपि जोव न कर्त्ता है, न भोक्ता है,जो कर्ता हैवही भोक्ता है, कर्त्ता और है,भोक्ता और है, येसब नय मान्य हैं तोभी अनुभवमें ये सब विकल्प-जाल त्यागने योग्य हैं,केवल निविकल्प अनुभव ही अमृतपान करना है ॥ ४८ ॥
किस नयसे आत्मा कर्मोंका कर्त्ता हैऔर किस नयसे नही है (दोहा )
दरब करस करता अलख, यह विवहार कहाउ ।
निहचे जो जंसोौ दरब, तेसो ताकौ भाउ ॥ ४६ ॥
शब्दार्थ :- दरव करम (्रव्यकर्म )>ज्ञानावरणीय आदि कर्मोकी धूल । अलखज"आत्मा । ताकौ८उसका । भाउल्स्वभाव ।
अर्थ :-द्रव्परकमंका कर्ता आत्मा है यह व्यवहारनय कहता है, पर निश्चयनयसे तो जो द्रव्य जेत्ता हैउसका वेसा हो स्वभाव होता है- अर्थात् अचेतन द्रव्य अचेतनका कर्त्ता है और चेतनमावका कर्त्ता चेतन्य है ॥ ४६ ॥
व्यायहारिकहशव केबल कत कम जे विभिन्नसिष्यते ।
निश्चयेन यदि वस्तु खिन्ट्यते कठूं कर्म च सर्देकमिष्यते ॥ १८ ॥
ज्ञानका ज्ञेयाका ररूपपरिणमन होता है पर वह ज्ञेयरूप नहीं हो जाता (सवेया इकतीसा )
ग्यानकौ सहज शेयाकार रूप परिणवे,
यद्यपि तथापि ग्यान ग्यानरूप कह्मौं।
शेय शेयरूप यो अनाविहीकी मरजाद,
काहू वस्तु काहुको सुभाव नहि गह्मो है ॥।
एतेपर कोऊ मिथ्यामती कहै शेयाकार,
प्रतिभासनसों ग्यान असुद्ध हूं रह्मों है ।
याही दुरबुद्धिसों विकल भयो डोलत है,
समुर्क न धरम यों भरम मांहि बह्लों है॥ ५० ॥
शब्दार्थ :- ज्ञेयाका र>ज्ञेयके आकार । ज्ञेय> जानने योग्य घटपटादि उदार्थ। मरजाद (मर्यादा) > सीमा। प्रतिभासना -छाया पडना। भर्म (भरम)-प्रान्ति ।
अर्थ :- यद्यपि ज्ञानका स्वभाव शेयाकाररूप परिणमन करनेका है, तो भो ज्ञान, ज्ञान हीरहता है और ज्ञेय शेय ही रहता है। यह मर्यादा अनादि कालसे चली आतो है, कोई किसोके स्वभावको ग्रहण नहीं करता स भवति नापरस्य परिणामिन एवं भवेत् । न भवति कतृशून्यभिह कं न चेकतया स्थितिरिह बस्तुनो भवतु कतु तदेव ततः ॥। यह झ्लोक कलकत्तेकी छपी हुई परमाध्यात्मत्तरगिणीमे है। किन्तु इसकी सस्क्ृत टीका प्रकाशकको उपलब्ध नहीं हुई। काशीके छपे हुए प्रथम गुच्छुकमे यह श्लोक नही है। ईडर-भण्डारकी प्राचीन हस्तलिखित प्रतिमें भी यह झ्लोक नहीं है, ओर न इसकी कविता ही है । बहिलु ठतियद्यपि स्फुटबनम्तशक्ति. स्वयं तथाध्प्पपरवस्तुनो विशति नान्यवस्त्यस्तरम् । स्वभावनियतं यतः सकलमेव वस्त्विष्यते स्वभावध्वलनाकुल: किमिह सोहितः विलश्यते (। १६ ॥॥ अर्थात् ज्ञान शेय नहीं होजाता और भेय शान नहीं हो जाता । इतने पर कोई मिथ्यामतो - वेशेषिक आदि कहते हैं, कि शेयाकार परिणमनसे ज्ञान अशुद्ध हो रहा है, सो वे इसी मूर्खतासे व्याकुल हुए मटकते हैं- वस्तुस्वभाव नहीं समझे, अ्ममें भूले हुए हैं। विशेष :- वेशेषिकोंका एकान्त सिद्धान्त है, किजगतके पदार्थ शानसें प्रतिबिम्बित होते हैं,इससे ज्ञान अशुद्ध होजाता है, सो जब तक अशुद्धता नहीं मिटेगी तब तक मुक्त नहीं होगा । परन्तु ऐसा नहीं है, श्ञान’ स्वच्छ आरसीके समान है, उसपर पदार्थोंकी छाया पड़तो है सो व्यवहारसे कहना पड़ता हैकि अधुक रंगका पदार्थ भलकनेसे काँच अमुक रंगका दिखता है, पर वास्तबमें छाया पड़नेसे काँचमें कुछ परिवतंन नहीं होता ज्योंका त्यों बना रहता है ॥ ५० ॥
जगतके पदार्थ परस्पर अव्यापक है (चौपाई)
सकल वस्तु जगमें असहाई !
वस्तु वस्तुसोँ मिले न काई ।॥।
जीव वस्तु जाने जग जेतो।
सोऊ भिन्न रहै सब सेतोी ॥ ५१ ॥
शब्दार्थ :- असहाई >स्वाधीन । जेती-जितनी । अर्थ .- निश्चयनयसे जगतमें सब पदार्थ स्वाधोन हैं, कोई किसोकी अपेक्षा नहीं करते और न कोई पदार्थ किसी पदार्थसे मिलता है। जीवात्मा जगतके जितने पदायर्थ हैंउन्हें जानता हैपर वे सब उससे भिन्न रहते है ।
भावार्थ :- व्यवहारनयसे जगतके द्रव्य एक-दूसरेसे मिलते हैं, एक- दूसरेमें प्रवेश करते ओर एक-दूसरेको अबकाश देते हैं, पर निश्चयनयसे सब निजाश्रित हैं, कोई किसीसे नहीं मिलते हैं । जोवके पूर्ण ज्ञानमें वे सबऔर अपूर्ण ज्ञानमें ययासम्भव जगतके पदार्थ प्रतिभासित होते हैं, पर ज्ञान उनसे मिलता नहों हैऔर न वे पदार्थ ज्ञानसे मिलते हैं ॥ ५१ ॥
वस्तु चेंकमिह नान्यवस्तुनों येन तेन खलु उस्तु वस्तु तत् ।
निश्चयोप्यमपरो परस्य कः कि करोति हि बहिलु ठन्नपि ॥२०॥।
कर्म करना और फल भोगना यह जीवका निज-स्वरूप नहीं है (दोहा)
करम करें फल भोगव, जीव अग्यानी कोइ ।
यह कथनी विवहारकी, वस्तु स्वरूप न होइ ॥ ५२ ॥
शत्रदार्थ :- कथनी>चरचा । वस्तु-पदार्थे ।
अर्थ :- अज्ञानी जीव कर्म करते हैं और उनका फल भोगते हैं, यह कथन व्यवहारनयका है, पदार्थका निजस्वरूप नहों है ॥ ५२ ॥
ज्ञान और जेयकी भिन्नता (कवित्त )
जेयाकार ग्यानकी परणति,
पे वह ग्यान शेय नहि होइ ।
जेय रूप घट दरब भिन्न पद,
ग्थानर्प आतम पद सोडह ॥।
जाने भेदभाउ सु विचच्छन,
गुन लच्छन सम्यकद्रिंग जोड़ ।
म्रख कहे ग्यानसय आकृति,
प्रगट कलंक लख नहि कोइ ॥ ५३ ॥
शब्दार्थ :- ज्ञान- जानना । ज्ञेय-जानने योग्य पदार्थ ।
अर्थ :- ज्ञानको परिणति प्ेयके आकार हुआ करती है, पर ज्ञान क्ेयरूप नहों हो जाता, छहों द्रव्य ज्ेय हैंऔर वे आत्माके निज स्वभाष यत्त, वस्तु कुर्तेध्न्यवस्तुन: किड्चनापि परिणामिनः स्वयम् । ध्यावहारिकहशंव तन्मत नान््यदस्ति किसपोह निश्चयात् ॥ २१५ शुद्धदव्यनिरूषणापितमतेस्तस्व॑ समुत्पश्यतो नेकद्रव्यगतं चफास्ति किसपि द्रथ्याग्तरं जातुचित् । जान शेयपमबति यत्तु तदयं शुद्धस्वभावोदय. कि द्रब्यान्तरचुम्बनाकुलधियस्तस्वास्च्यवन्ते जनाः॥ २२ ॥ ज्ञानसे भिन्न हैं, जो ज्ेप-ज्ञायकका मेदमाव गुण-लक्षणसे जानता है बह भेदविज्ञानी सम्यस्टष्टि है।वेशेषिक आदि अज्ञानो ज्ञानसें आकारका विकल्प देखकर कहते हैंकि ज्ञानमें सेपकी आकृति है, इससे ज्ञान स्पष्टतया अशुद्ध हो जाता है लोग इस अशुद्धताकों नहीं देखते । विशेष :- जीव पदार्थ ज्ञायक है,ज्ञान उसका गुण है, वह अपने ज्ञान- गुणसे जगतके छहों द्रव्योंको जानता है, और अपनेको भी जानता है, इसलिये जगतके सब जोव-अज्ञोव पदार्थ और वह स्वयं आत्मा ज्ञेव है, और आत्मा स्व-परको जाननेसे ज्ञायक है, भाव यह है आत्मा शेय भो है, ज्ञायक भी है, और आत्माके सिवाय सब पदार्थ ज्षेय हैं। सो जब कोई शेयपदार्थ श्ञानमें प्रतिभासित होता हैतब ज्ञानको ज्ञेवाकार परिणति होती है, पर ज्ञान, ज्ञान हो रहता है ज्ञेप नहों होजाता, और ज्ञेप ज्ञेय हो रहता है ज्ञान नहीं हो जाता, न कोई किसीमें मिलता है। ज्ञेयका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव चतुष्टय जुदा रहता हैऔर ज्ञायकका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव चतुष्टय जुदा रहता है, परन्तु विवेकशुन्य वेशेषिक आदि ज्ञानमें ज्ञेवककी आक्ृति देखकर ज्ञानमें अशुद्धता ठहराते है ॥ ५३ ॥ वे कहते हैंकि -
जेप ओर ज्ञानके सम्बन्धमे अज्ञानियोंका हेतु (चौपाई )
निराकार जो ब्रह्म कहावे।
सो साकार नाम क्यों पाबे ।।
ज्ेयाकार ग्यान जब तांई।
पुरन ब्रह्म नांहि तब तांई ॥ ५४ ॥।
शब्दार्थ :- निराकार-आकार रहित । ब्रह्माल्आत्मा, ईश्वर । साकार>आकार-सहित । पूरन (पूर्ण) ऋपूरा । तांई तब तक । अथे :-जो निराकार ब्रह्म हैवह साकार कंसे हो सकता है? इसलिये जब तक ज्ञान ज्ञेयाकार रहता है, तब तक पूर्ण ब्रह्म नहों हो सकता ॥ ५४ ॥
इस विषयमें अज्ञातियोंकों संबोधन (चौपाई )
शेयाकार ब्रह्म मल माने ।
नास करनकों उदिम ठाने ॥।
वस्तु सुभाव मिटे नहि कयोंही ।
ताते खेद करे सठ यौंही ॥ ५५ ॥
शब्दार्थ :- मलजदोपष । उद्दिम-प्रयत्न ।क्यौही>किसी प्रकार ।
अर्थ :- बेशेषिक आदि ब्रह्मको शेयाकार परिणतिको दोष मानते हैं, और उसके मिटानेका प्रयत्न करते हैं, सोकिसी भी प्रयत्नसे बस्तुका स्वभाव
नहीं मिट सकता, इसलिये वे मूर्ख वथा ही कष्ट करते हैं ।। ५५ ! पुन (दोहा)
मृढ़ मरम जाने नहीं, गहे एकंत कुपक्ष ।
स्थादवाद सरवंग ने, साने दक्ष प्रतक्ष ॥ ५६ ॥
अर्थ :- अज्ञानी लोग पदार्थयी असलियत नहीं जानते और एकान्त कुटेब पकड़ते है, स्याद्वादी पदार्थके सब अंगोके ज्ञाता हैं और पदार्थफे सब धर्मोको साक्षात् मानते है ।
भावार्थ :- स्थाद्राद, ज्ञानकी निराकार साकार दोनों परिणति मानता है। साकार तो इसलिये कि ज्ञानको ज्ञेयाकार परिणति होतो है, और निराकार इसलिये कि ज्ञानमें ज्ञेय जनित कुछ विकार नहीं होता ॥ ५६ ॥
स्याद्गादी सम्यग्हष्टिकी प्रशसा (दोहा)
सुद्ध दरब अनुभो कर, सुद्धद्रिष्टि घटमांहि ।
ताते समकितवंत नर, सहज उछेदक नांहि ॥ ५७ ॥
शब्दार्थ :- घट-हृदय । उछेदक-लोप करनेवाला । अथ :- सम्यग्टृष्टि जीव शुद्ध द्रव्यका अनुभव करते है,ओर शुद्ध वस्तु जाननेसे हृवयमें शुद्धरृष्टि रखते है, इससे वेसाहजजिक स्वभावका लोप नही करते; अभिप्राय यह है कि ज्षेयाकार होना ज्ञानका साहजिक स्वभाव है, सो सम्यग्टृष्टि जीवके स्वभावका लोप नहों करते ॥ ५७ ॥
ज्ञान जैयसे अव्यापक है इसपर दृष्टान्त
(सर्वेया इकतीसा )
“जैसे चंद किरनि प्रगटि मृुभि सेत कर,
भूमिसी न दोसे सदा जोतिसी रहति है ।
'तैसे ग्यान सकति प्रकास हेय उपादेय,
ज्ञेयाकार दीसे पे न शेयकों गहति है।।
सुद्ध वस्तु सुद्ध परजाइरूप परिनवं,
सत्ता परवांन माहें ढाहें न ढहति है ।
सो तो औररूप कबहूं नहोदद सरवथा,
निहचे अनादि जिनवानी यों कहति है ॥ ५८॥।
शब्दार्थ :- प्रगटि >उदय होकर । भूमि -धरती । जोतिसी>किरण- रूप । प्रकार - प्रकाशित करे । सत्ता परवान >अपने क्षेत्रावगाहके बराबर । हाहे>विचलित करनेसे । न ढहति है+ विचलित नही हीती । कबहूँ कभी भी । सरवथाजहर हालतमे ।
अर्थ :- जिस प्रकार चन्द्रकिरण प्रकाशित होकर धरतीको सफेद कर देती है, परधरतोरूप नहों हो जाती - ज्योतिरूप ही रहती है, उसी प्रकार ज्ञानशक्ति हेयउपादेबरूप ज्ञेब पदार्थोको प्रकाशित करतो है, पर ज्ञेयरूप नहीं हो जातो, शुद्ध वस्तु शुद्धपर्यायरूप परिणमन करती हैओर निज सत्ता- प्रमाण रहतो है, बह कभी भी किसो हालतमें अन्यरूप नहीं होती, यह बात निश्चित है और अनादि कालकी जिनवाणो कह रही है ॥ ५८ ॥
शुद्धदव्यस्वरसभवनात्कि स्वभावस्यथ शेष- सन्यद्रव्य भवति यदि वा तस्य कि स्थात्स्वभावः ! ज्योत्स्नारूप स््नपयति भव नैव तस्यथास्ति भूसि- जश्ञनि शेय कलयति सदा सेयमस्यास्ति नेव ॥ २३॥।
आत्मपदार्थका यथार्थ स्वरूप (स्वेया तेईसा )
राग विरोध उ्द जबलों तबलों,
यह जोब सृथा मग धावे।
ग्यान जग्यो जब चेतनको तब,
कम दसा पर रूप कहावे ।।
कर्म विलेछि करे अनुभो तहां,
मोह मिथ्यात प्रवेस न पावे।
मोह गयें उपजे सुख केवल,
सिद्ध भयो जगमांहि न आये ॥ ५६ ॥
शब्दार्थ :- विरोधद्व ष। मृषा मग>मिथ्या मार्ग । धावे-दौडता है।
अर्थ :- जब तक इस जीवको मिथ्याज्ञानका उदय रहता है, तब तक वह राग-देषमें बतंता है। परन्तु जब उसे ज्ञानका उदय हो जाता है, तब वह कर्मंपरिणतिकों अपनेसे भिन्न गिनता है, और जब कसंपरिणति तथा आत्मपरिणतिका पृथककरण करके आत्म-अनुमब करता है, तब मिथ्या मोहनीयको स्थान नहीं मिलता । और मोहके पूर्णतया नष्ट होनेपर केवल- ज्ञान तथा अनन्तसुल प्रगट होता है,जिससे सिद्ध पदकी प्राप्ति होती हैऔर फिर जन्म-मरणरूप संसा रसेंनहीं आना पड़ता ॥ ५६ ॥
परमात्मपदकी प्राप्तिका मार्ग (छप्पय छन्द )
जीव करम संजोग, सहज मिथ्यातरूप धर ।
राग दोष परनति प्रभाव, जाने न आप पर ।।
राग वदपमुदयते तावदेसस्न यावत्
ज्ञान ज्ञानं भवति म॒पुनर्थोधतां याति बोध्यम् ।
ज्ञान ज्ञान भबतु तदिद न्यक्कृताशानभावं
भावषाभावी भवति तिरयन् येद पूर्णस्वभावः ॥ २४॥।
रागट वाबिह हि भवति शानमज्ञामभावात्-
तो वस्तृत्वप्रभिहितदशा हृइ्यसानों न किश्चितु ।
सम्पग्हृष्टि: क्षपयतु ततस्तस्वहृष्ट्या स्फुटम्तो
ज्ञानज्योतिज्बेलति सहज येन पूर्णाचलाचि: ॥ २५॥
तम मिथ्यात मिटि गयो, हुवों समकित उदोत ससि ।
राग दोष कछु वस्तु नांहि, छिन मांहि गये नसि ॥।
अनुभो अभ्यास सुख रासि रमि,
भयो निपुन तारन तरन ।
पुरन प्रकास निहचल निरखि,
बानारसि वंदत चरन ॥ ६० ॥
शब्दार्थ :- उदोत>उदय । ससि"शशि (चन्द्रमा) । निपुन- पूर्ण ज्ञाता ।त्तारन तरन>संसारसागरसे दूसरोंको तारनेवाला और स्वयं तरनेवाला ।
अर्थ :- जोवात्माका अनादिकालसे कर्मोंके साथ सम्बन्ध है, इसलिये बहू सहज हो मिथ्याभावको प्राप्त होता है, और राग-देष परिणतिके कारण स्व-पर स्वरूपको नहीं जानता। पर भिथ्यात्वरूप अंधकारके नाश और सम्यक्त्व-शशिके उदय होनेपर राग-द्वेषका अस्तित्व नहीं रहता - क्षणभरें नष्ट हो जाता है, जिससे आत्म-अनुभवके अभ्यासरूप सुखमें लोन होकर तारनतरन पूर्ण परमात्मा होता है। ऐसे पूर्ण परमात्माका निश्चयस्वरूप अवलोकन करके पं० बनारसोदासजी चरणवन्दना करते हैं ॥ ६० ॥
राग-द्वेषका कारण मिथ्यात्व है (सवेया इकतीसा )
कोऊ सिधष्य कहे स्वामी राग दोष परिनाम,
ताकौ मूल प्रेरक कहहु तुम कौन है ।
पुग्गल करम जोग किधों इंद्रिनिकौ भोग,
किधों धन किधों परिजन किधों भोन है ।।
गुरु कहे छहों दये अपने अपने रूप,
सबनिको सदा असहाई परिनोन है।
रागहू घोत्पादक तत्त्वहष्टया सान्यदद्व्य दोकयते किझ्खनापि।
स्वव्रध्योत्पत्तिरन्तभ्वकास्ति व्यक्तात्यन्तं स्वस्वभावेन मस््मात् ॥ २६ ॥
कोऊ दरब काहूको न॒ प्रेरक कदाचि ताते,
राग दोष सोह मृषा सदिरा अचोन है ॥ ६१॥।
शब्दार्थ :- मूल>असली । प्रेरक- प्रेरणा करनेवाला। परिजन-८ घरके लोग। भौन (भवन)-मकान । परिनौनल्परिणमन । मदिरा> शराब । अचौन (अचवन)"पीना ।
अर्थ :- शिष्य प्रइन करता हैकि हे स्वामी, राग-हेष परिणामोंका मुख्य कारण क्या है ? पौद्गलिक कर्म हैं? या इन्द्रियोंके भोग हैं ? या धन है ? या घरके लोग हैं ? या चर है ? सो आप कहिए । इसपर श्रीगुर समाधान करते हैं, कि छहों द्रव्य अपने अपने स्वरूपमें सदा निजाश्रित परिणमन करते है,कोई द्रव्य किसी द्रव्यकी परिणतिके लिये कभी भी प्रेरक नहों होता, अतः राग-हेषका मल कारण मोह भिध्यात्वका मदिरापान है॥ ६१ ॥
अज्ञानियोंके विचारमे राग-द्वेषका कारण (दोहा)
कोऊ म्रख यो कहै, राग दोष परिनाम ।
पुग्गलकी जोरावरी, बरते आतमराम ॥ ६२ ॥
ज्यों ज्यों पुग्गल बल करे, धरिधरि कर्मज भेष ।
रागदोषकौ परिनमन, त्यों त्याँ होइ विशेष ॥ ६३ ॥
शब्दार्थ :- परिनाम "भाव । जोरावरी जबरदस्ती । भेप (वेष )८ रूप । विशेष८ ज्यादा ।
अर्थ :- कोई कोई सूर्ख ऐसा कहते है कि आत्मासे राग-द्रेषभाव पुदुगलकी जबरदस्तीसे होते है॥ ६२ ॥ वे कहते हैं कि पुदूगल कर्मरू५ परिणमनके उदयमें जंसा जैसा जोर करता है, वेसे बसे बाहुल्यतासे राग- द्ेष परिणाम होते है ॥ ६३ ॥ है यदिह भवति रागद्ठ षदोधप्रसूति कतरदपि परेषा दूषण नास्लि तत्र । स्वयभप्ुपराघो तत्र सपंत्यवोधों भवतु विदितमस्तं यात्वब्ोधोषस्सि बोध ॥ २७ ॥
अज्ञानियोको सत्य मार्गका उपदेश (दोहा)
इह्विधि जो विपरीत पख, गहे सहृहे कोइ ।
सो नर राग विरोधसों, कबहूं भिन्न न होइ ॥ ६४ ॥।
सुगुरु कहे जगमें रहै, पुग्गल संग सदीब । सहज सुद्ध परिनमनिकौो, औसर लहै न जीव ॥। ६५ !। ताते चिदभावनि विष, समरथ चेतन राउ। राग विरोध सिथ्यातमें, समकितमें सिबव भाउ ॥ ६६ ॥
शब्दार्थ :- विपरीत पख"उल्टा हठ। भिन्नलजुदा । परिणाम भाव। औसर«मौका । चिदभावनि विषे>चंत्तन्यभावोमे - अशुद्ध दशामें राग-द्वेष ज्ञानावरणीय आदि और शुद्ध दणशामे पूर्णश्ञान पृर्णभानंद आदि। समरथ (समर्थ)-बलवान । चेतन राउ>"चेतन्यराजा । सिव भाउन्मोक्षके भाव - पूर्णज्ञान, पूर्णदर्शन, पूर्णभानद, सम्यक्त्व, सिद्धत्व आदि ।
अर्थ :- श्रीगुरु कहते है किजो कोई इस प्रकार उल्टा हठ ग्रहण करके श्रद्धान करते हैं वेकभी भी राग-द्रेष-मोहसे नहीं छुट सकते ॥ ६४ ॥ और यदि जगतमें जीवका पुदूगलसे हमेशा ही सम्बन्ध रहे, तो उसे शुद्ध भावोंकी प्राप्ततका कोई मी मोका नहीं है- अर्थात् वह शुद्ध होही नहीं सकता ॥ ६५।। इससे चेतन्यभाव उपजानेमें चेतन्यराजा ही समर्थ है, सो मिथ्यात्वकी दशामें राग-द्ेष भाव उपजते हेंऔर सम्यवत्व दशामें शिवभाव अर्थात् ज्ञान-दर्शन-सुख आदि उपजते हैं॥ ६६ ॥
ज्ञानका माहात्म्य (दोहा )
ज्यों दीपक रजनी समे, चहुं दिस करे उदोत ।
प्रगट/… घटपटरूपमें, घटपटरूप न होत ॥ ६७ ॥
रागजन्मनि निर्मिश्षतां परद्रब्यमेव कलयन्ति येतु ते। उसरन्ति न हि मोहबाहिनों शुद्धधोधविधुरान्धबुद्धयः ॥ २८।।
पुर्णकाच्युतशुद्धधोधमहिमा बोधा न ओष्यादय
यायात्कामपि विक्रियां तत इतो दीप: प्रकाइयादिव ।
तदहस्तुस्थितिबोधबन्धधिषणा एते किमजञानिनों
रागह घमयो भवन्ति सहजां मुड्चन्त्युदासीनताम ॥ २६ ॥
ननननननननलि
त्यों सम्यान जाने सकल, ज्ञेय वस्तुको मर्म
ज्ञेयाकृति परिनवे पे, तजे न आतम-धर्म ॥
कोइ ।
ग्यानधर्म अधिचल सदा, गहैँ विकार न
राग विरोध बिमोह मय, कबहूं भूलि न होइ ॥ ६६ ॥॥
ऐसी महिमा ग्यानकी, निहचे है घट मांहि ।
मूरख मिथ्याद्रिष्टिसों, सहज बिलोक नांहि ॥ ७० ॥
अर्थ :- जिस प्रकार रात्रिमें दीपक चहुँ ओर प्रकाश पहुँचाता हैऔर घटपट पदार्थोको प्रकाशित करता है,पर घट, पटरूप नहों हो जाता ॥ ६४७ ॥ परिणमन उसीप्रकार ज्ञान सब ज्ञेय पदार्थोकों जानता है और ज्ञेयाकार जानना करता हैतो भी अपने निजस्व॒भावको नहीं छोड़ता ॥ ६८ ॥ ज्ञानका नहीं स्वन्नाव सदा अचल रहता है, उसमें कभी किसी भी प्रकारका विकार होता और न वह कभी भूलकर भो राग-द्व ष-मोहरूप होता है।। ६६ निश्चयनयसे आत्मामें ज्ञानकी ऐसी महिमा है, परन्तु अज्ञानी सिथ्याहृष्टि आत्मस्वरूपकी ओर देखते मो तहीं हैं ॥ ७० ॥
अज्ञानी जीव परद्रव्यमें होलीन रहते है (दोहा)
पर सुभावमें सगन हु, ठाने राग विरोध ।
धरे परिग्रह धारना, करे न आतम्त सोध ॥ ७१४१
शब्दार्थ :- पर सुभाव”आत्मस्वभावके बिना सब अचेतन भाव। ठानै>करे । राग विरोध- राग-द्ेष ।। सोध >खोज ।
अर्थ :- अज्ञानी जोव परद्रव्योंमें मस्त रहते हैं, राग-हष करते है ओर परिग्रहकी इच्छा करते है, परन्तु आत्मस्वभावकी खोज नहीं करते ॥ ७१ ॥
अज्ञानीकों कुमति ओर ज्ञानीकों सुमति उपजती है (चौपाई)
मूरखक॑ घट दुरमति भासी ।
पंडित हिये समति परगासी ॥।
दुरमति कुबिजा करम कसाजे ।
सुमति राधिका राम रमावे ॥ ७२॥।
(दोहा )
कुबिजा कारो कूबरी, करे जगतमे खेद ।
अलख अराघे राधिका, जाने निज पर भेद ॥ ७३ ॥
अर्थ :- म्खके हृदयमें कुमति उपजती है ओर ज्ञानियोंके हृदयमें सुमतिका प्रकाश रहता है। दुबंद्धि कुब्जाके’ समान है, नवीन कर्मोंका बन्ध करती है, ओर सुब॒द्धि राधिका है, आत्मराममें रम्णण कराती है ॥ ७२ ॥ कुब॒द्धि काली कूबड़ोी कुब्जाके समान है, संसारमें संताप उपजातो है, ओर सुब॒द्धि राधिकाके समान है, निज-आत्माकी उपासना करातो हैतथा स्व- परका भेद जानतो है ॥ ७३ ॥
दुर्मति और कुब्जाकी समानता (स्वेया)
कुटिल कुरूप अंग लगी है पराये संग,
अपुनो प्रवांन करि आपुहो बिकाई है।
गहे गति अंधकीसी सकति कबंधकीसी,
बंधकौ बढ़ाउ कर धंधहोमें धाई है।॥।
रांडकीसी रीत लियें मांडकीसी मतवारो,
सांड ज्यों सुछंद डोल भांडकोीसी जाई है ।
घरको न जाने भेद करे पराधोन खेद,
याते दुरबुद्धि दासोी कुबजा कहाई है ॥ ७४ ॥
शब्दार्थ :- कुटिल–कपटिन । पराये>दूसरेके । संग साथ । कवध- एक राक्षसका नाम । मांड (मण्ड)>शराब । सुछुद>-स्वतत्र । जाईल्पैदा हुई । यातें-इससे । ) हिन्दू-धर्म के देवीभागवत आदि प्रन्थोका कथन है कि, कुब्जा कसको दासी थी । उसका शरीर कुरूप कान्तिहीन था। राजा श्रीकृष्णचन्द्र अपनी स्त्री राधिकासे अलग होकर उससे फेस गये थे, राधिकाके बहुत प्रयत्न करनेपर वे सन्मार्गपर आये । सो यहाँ पर दृष्टास्तमात्र ग्रहण किया है ।
अर्थ :- कुबुद्धि मायाका उदय रहते होती है इससे कुटिला है, और कुब्जा सायाचारिणो थी, उसने पराये पतिको वशमें कर रक््खा था। कुब॒द्धि जगतको असुहावनो लगती है इससे कुरूपा है, कुब्जा काली कान्तिहोन हो थी इससे कुरूपा थी। कुब॒द्धि परद्रव्योंकोी अपनाती है, कुब्जा परपतिसे सम्बन्ध रखतो थी इससे दोनों व्यभिचारिणी हुईं । कुब॒द्धि अपनी अशुद्धतासे विषयोंके आधोन होतो है इससे बिकी हुईके समान है, कुकजा परवशमें पड़ी हुई थी इससे दूसरेके हाथ 'बिकी हुई ही यो। वुबु ड्िकोवा कुब्जाको अपनो भलाई-बुराई नहीं दिखतो, इससे दोनोंकी दशा अंधेके समान हुई । कुबद्धि परपदार्थोंसे अहंब॒द्धि करनेमें समर्थ है, कुब्जा भी कृष्णको कब्जेमे रखनेके लिये समर्थ थी, इससे दोनों *कबंधके सभान बलवान हैं। दोनों कर्मोका बंध बढ़ाती हैं। दोनोंकी प्रव॒त्ति उपद्रवकोी ओर रहती है । कुबंदधि अपने पति आत्माको ओर नहीं देखतो, कुब्जा मी अपने पतिकी ओर नहीं देखती थी, इससे दोनोंकी रांड सरीखी रीति है। दोनों ही शराबीके समान मतवालोी हो रही हैं। दुबद्विमें कोई घामिक नियम आदिका बंधन नहीं, कब्जा भी अपने पति आदिको आज्ञामें नहीं रहती थी, इसलिये दोनों सांडके समान स्वतंत्र हैं। दोनों भांडकी संततिके समान निलंज्ज हैं। दुबंद्धि अपने आत्मक्षेत्ररूप घरका सर्म नहीं जानती, कु्जा भी दुराचारमें रत रहती थी, घरका हाल नहीं देखतो थी। दुबंद्धि कमंके आधीन है, कुब्जा परपतिके आधीन, इससे दोनों पराधीनताके क्लेशमें हैं।इस प्रकार दुर्बृद्धिको कुब्जा 3दासीकी उपमा दी है ॥ ७४ ॥ ) व्यभिचारिणी स्त्रियां अपने मुखसे अपने शरीरका मोल करती हैं- अर्थात् अपना अमूल्य शील बेच देती हैं, यह बात ध्यानमे रखके कवबिने कहा है कि 'आपनों प्रवानकरि आपुह्दी बिकाई है । यह भी हिन्दू-धमं-शास्त्रोका हृष्टान्त मात्र लिया है, कि कबंध पूर्वजन्ममे गधर्वे था। उसने दुर्वासा ऋषिकों गाता सुनाया, पर वे कुछ प्रसन्न नहीं हुए, तब उसने मुनिकी हँसी उडाई, तो दुर्वासाने करोधित होकर शाप दिया, कि तू राक्षस हो जा । बस फिर क्या था, वह राक्षस हो गया । उसकी एक एक योजनबी भुजाएँ थो, और वह बहुत ही बलवान था, सो अपनी भुजाओसे वह एक योजन दूर तकके जीवोको खा जाता था, और बहुत उपद्रव करता था, इससे इन्द्रने उसे बद्ध मारा, जिससे उसका माधथा उसीके पेटप्रे घेंस गया, पर वह शापके कारण मरा नहीं, तबसे उसका नाम कबंघ पडा । एक दिन वनमे विचरते हुए राजा राम लक्ष्मण दोनो भाई इसके सपाटेमे आ गये, और इन्हे भी उसने खाना चाहा, तब रामचन्द्रने उसके हाथ काट डाले और उसे स्वरगंधाम पहुचा दिया । ? दाइता-विवाह-विधिके बिना ही धर्ंविरुद्ध रक्खी हुई औरत ।
सुबुद्धिसि राधिकाकी तुलना (सवेया इकतीसा)
रूपको रसोली अम कुलफको कोली सील,
सुधाके समुद्र भीली सीलो सुखदाई है।
प्राची ग्यानभानकी अजाची है निदानको,
सुराची निरवाची ठोर साची ठकु्राई है ॥।
धामकी खबरदारि रामको रमनहारि,
राधा रस-पंथनिके ग्रंथनिमें गाई है ।
संतनकी मानी निरबानी न्रकी निसानी,
याते सदबुद्धि रानी राधिका कहाई है ॥ ७५॥।
शब्दार्थ :- कुलफल्ताला । कीली>चाबी । भीली स्नान की हुई । सीलीजभीगो हुई । प्राची>पूर्वे दिशा ।अजाचील्नही मागनेवाली । निदान आगामी विषयोंकी अभिलाषा। निरवाची (निर्वाच्य)>वचन अगोचर । ठकुराई-स्वामीपन । धाम>घर । रमनहारिस्मौज करनेवाली। रस- पथनिके ग्रथनिमै>रस-मार्गके शास्त्रोमे । निरबानीज>-गभीर । नूरकी निसानो >सौन्दर्यका चिह्न ।
अर्थ :- सुबुद्धि आत्मस्व॒रूपमे सरस है, राधिका भी रूपवतो है। सुबुद्धि अज्ञानका ताला खोलनेकी चाबी है, राधिका भो अपने पतिको शुभ- सम्पति देती है। सुदुद्धि और राधिका दोनों शोलरूपी सुधाके समुद्रमें स्नान को हुई हैं, दोनों शान्तस्वभावी सुखदायक हैं । ज्ञानरूपी सूयेका उदय करनेमें दोनों पूर्व दिशाके समान हैं। सुबद्धि आगासो विषय - भोगोंकी वांछासे रहित है, राधिका मो आगासोी भोगोंकी याचना नहों करतो। सुब॒द्धि आत्मस्वरूपमें मले प्रकार राचतो है, राधिका भी पति-प्रेममें पगतो है । सुबद्धि और राधिका रानी दोनोंके स्थानकी महिमा वचन-अगोचर अर्थात् महान् है। सुबुद्धिका आत्मापर सच्चा स्वामित्व है, राधिकाकी सी धरपर मालिकोी है। सुबृद्धि अपने घर अर्थात् आत्माकी सावधानी रखती है,राधिका भी घरकी निगरानी रखती है। सुबुद्धि अपने आत्मराममें रमण करती है, राधिका अपने पति कृष्णके साथ रमण करतो है। सुबंद्धिको महिमा अध्यात्मरसके ग्रंथोंमें बलानो गई है, ओर राधिकाकों महिमा श्गाररस आदिके ग्रन्थोंमें कही गई है। सुब॒द्धि साधुजनों द्वारा आदरणोय है, राधिका ज्ञानियों हारा माननीय है । सुबुद्धि औरराधिका दोनों क्षोभरहित अर्थात् गंभोर हैं। सुबद्धि शोभासे सम्पन्न है, राधिका भी कान्तिवान् है। इस प्रकार सुबुद्धिको राधिका रानीको उपमा दो गई है ॥७५।।
कुमति सुमतिका कृत्य (दोहा)
बह कुबिजा वह राधिका, दोऊ गति मतिवानि ।
बह अधिकारनि करसकी, यह विवेककी खानि ॥ ७६ ॥
अर्थ :- बुबुंद्धि कुब्जा है, सुबुद्धि राधिका है, कुबुद्धि संसारमें भ्रमण करानेवाली है और सुबुद्धि विवेकवान है । दुबंद्धिकमंबंधके योग्य हैऔर सुबुद्धि स्व-पर विवेककों खानि हे ॥ ७६ ॥
द्रव्यकर्म भावकर्म और विवेकका निर्णय (दोहा)
दरबकरम पुरगल दसा, भावकरम मति वक्र ।
जो सुग्यानको परिनमन, सो विवेक गुरु चक्र । ७७ ।।
शब्दार्थ :- दरबकरम (द्रव्यकम )>शानावरणीय आदि । भावकर्म८ राग-द्वेष आदि । मति वक्र>आत्माका विभाव । गुरु चक्र-बडा पुज ।
अर्थ :- शानावरणीय आदि द्रव्यकर्म पुदुगलकी पर्यायें हैं, राग-देष आदि मावकर्म आत्माके विभाव हैं, और स्व-पर विवेककी परिणति ज्ञानका बड़ा पुज है ॥ ७७ ॥
कमेंके उदयपर चौपड़का हृष्टान्त (कवित्त )
जेसे नर खिलार चौपरिकौ,
लाभ विचारि करे चितचाउ।
घर/बु० संवारि सारि बुधिबलसों,
पासा जो कुछ परे सु दाउ ॥।
तेसें जगत् जीव स्वारथकौ,
करि उदिम चितव उपाउ ।
लिख्यो ललाट होई सोई फल,
करम चक्रको यही सुभाउ ॥ ७८ ॥
शब्दार्थ :- चितचाउ-उत्साह । सारि>गोट । उपाउ (उपाय) प्रयत्न । लिख्यौ ललाट>मस्तकका लिखा-तकदीर ।
अर्थ :- जिस प्रकार चौपड़का खेलनेवाला मनमें जोतनेका उत्साह रखके अपनी अक्लके जोरसे सम्हालकर ठीक ठीक गोटे जमाता है, पर दाव तो पॉसेके आधोन है । उसी प्रकार जगतके जीव अपने प्रयोजनकी सिद्धिके लिये प्रयत्न सोचते हैं, पर जंसा कर्मका उदय है बसा हो होता है, कर्म- परिणतिकी ऐसी ही रीति है । उदयावलीमें आया हुआ कर्म फल दिये बिना नहीं रुकता ॥ ७८ ॥
विवेक-चक्रके स्वभावपर शतरजका हृप्टान्त (कवित्त)
जेसे नर खिलार सतरंजको,
समुरके सब सतरंजकी घात।
चले चाल निरखे दोऊ दल,
मोहरा गिने विचारे मात ॥॥
तेसे साथु निषुन सिवषथ्मैं,
लच्छुन लखे तज उतपात।
साथ गुन चितवे अभयपद,
यह सुविवेक चक्रकी बात ॥ ७६॥।
शब्दार्थ :- घात-दावपेच । निरखेज्देखे । मौहरा>हाथी घोड़े वगैरह । मात5चाल बन्द करना - हराना ।
अर्थ :- जिस प्रकार शतरंजका खेलनेवाला शतरंजके सब दावपेंच समभता है, और दोनों दलपर नजर रखता हुआ चलता है, वा हाथी, घोड़ा, वजोर, प्यादा आदिकी चाल ध्यानमें रखता हुआ जीतनेका विचार करता है, उसी प्रकार मोक्षमार्गमें प्रवोण ज्ञानी पुरुष स्वरूपकी परख करता हैऔर बाधक कारणोंसे बचता है । वह आत्मग्रुणोंको निर्मल करता है और जीत अर्थात् निंय पदका चितवन करता है। यह ज्ञानपरिणतिका हाल है ॥ ७६ ॥
कुमति कुब्जा और सुमति राधिकाके कृत्य (दोहा )
सतरंज खेले राधिका, कुबिजा खेले सारि।
याक॑ निसिदिन जीतयो, बाक निसिदिन हारि ॥॥ ८०
जाक॑ उर कुबिजा बसे, सोई अलख अजान ।
जाफ॑ हिरदे राधिका, सो बुध सम्यकवान ॥ ८5१ ॥
शब्दार्थ :- निशस्िदिन-संदा । सारि-चौपड़ ।अलख>जो दिखाई न पडे - आत्मा ।
अर्थ :- राधिका अर्थात् सुबुद्धि शतरंज खेलती है इससे उसकी सदा जोत रहती है, ओर कुष्जा अर्थात् दुबुद्धिचोपड़ खेलतो है, इससे उसको हमेशा हार रहती है ॥ ८० ॥ जिसके हृदयमें कुब्जा अर्थात् कुब॒ुद्धिका बास हैवह जोब अशानो है, ओर जिसके हृदयमें राधिका अर्थात् सुबुद्धि है, वह ज्ञानी सम्यग्हष्टि है॥ ८१ ॥
भावार्थ :- अज्ञानी जीव कर्मचक्रपर चलते हैं, इससे हारते है- अर्थात् संसारमें भटकते हैं,और पंडित लोग विवेक पूर्वक चलते हैं, इससे विजय पाते अर्थात् मुक्त होते हैं ।
जहाँ शुद्धज्ञान हैवहाँ चारित्र है (सवेया इकतीसा)
जहां सुद्ध ग्यानकी कला उदोत दोसे तहां,
सुद्धता प्रवांन सुद्ध चारितको अंस है।
राग बविभावमुक्तमहसो नित्यस्वभावस्पृशः
पूर्वागामिसमस्तक्सं विकला भिन्नास्तदात्वोदयात् ।
वूरारूठयरित्रवेभवबलाध्चऊूच स्चिद चिमंयीं
बिन्दन्ति स्वरसानिषिक्तमुवनां झ्ञानस्प संबेतनाम् ॥ ३० ॥॥
सब्रेविशुद्धि हार रण
ता कारन ग्यानी सब जाने ज्ञेय वस्तु मर्स,
बेराग विलास धर्म वाकाों सरवंस है।॥
राग दोष मोहकी दसासो भिन्न रहे याते,
सर्वथा त्रिकाल कर्म जालकों विधुस हे ।
'निरुषाधि आतम समाधिमे वबिराजे ताते,
कहिए प्रगट प्रन परम हंस है॥ ८२ ॥
शब्दार्थ :- सरवस (सर्वेस्व )> पूर्ण सपति । जाने जेय वस्तु मर्म- व्यागने योग्य और ग्रहण करने योग्य पदार्थोकोीं जानते है ।
अर्थ :- जहाँ शुद्ध ज्ञानकी कलाका प्रकाश दिखता है, वहाँ उसके अनुसार चारित्रका अंश रहता है, इससे ज्ञानी जीव सब हेय - उपादेयको समभते हैं। उनका सर्वेस्व वेराग्यभाव हो रहता है, वे राग-द ष-मोहसे भिन्न रहते है, इससे उनके पहलेके बंधे हुए कर्म भडते है, और बतंसान तथा भविष्यमें कमंबन्ध नहों होता । वे शुद्ध आत्माकी भावनामें स्थिर होते है, इससे साक्षात् पूर्ण परमात्मा ही है ॥ ८२ ॥
पुन (श_ोट)
ग्यायक भाव जहां तहां, सद्द चरनकी चाल ।
ताते ग्यान विराग सिलि, सिव साधे समकाल ॥ ८३ ॥
शब्दार्थ -ग्रायक भाव आम ३+ पा ज्ञान । चरन-ज-चारित्र । समकाल–एक हो समयमे । अर्थ *- जहाँ ज्ञानभाव है वहां शुद्ध चारित्र रहता है, इसलिये ज्ञान ओर वेराग्य एक साथ मिलकर मोक्ष साधते है ॥ ८३ ॥
सानस्य सचेतनयेब नित्य प्रकाशते ज्ञानमतोब शुद्धम ।
अज्ञानसचेतनया तु घावन् बोधस्य शरद्धि निरुणद्धि बन्धः ॥ ३१ ॥
ज्ञान चारित्रपर पंगु अंधका हृष्टान्त (दोहा)
जथा अंधके कंधपर, चढ़े पंगु नर कोह।
बाके हग वाके चरन, होंहि पथिक मिलि दोइ ॥ ८४ ॥
जहां ग्यान किरिया मिले, तहां मोल-मग सोह ।
वह जाने पदकौ मरम, वह पदमें थिर होइ ।। ८५ !॥
शब्दार्थ :- पगु>लेंगडा । वाके८उसके। हगलनेत्र । चरन>पैर । पथिकर रस्तागीर । क्रिया>चारित्र । पदकौ मरमज>आत्माका स्वरूप । पद्म थिर होइ>आत्तमामें स्थिर होवे ।
अर्थ :- जिस प्रकार कोई लेंगड़ा मनुष्य अंधेके कंघेपर चढ़े, तो लेंगड़ेकी आँखों और अंधेके पैरोंके योगसे दोनोंका गसन होता है॥ ८४ ॥ उसी प्रकार जहाँ ज्ञान और चारित्रकी एकता है वहाँ मोक्षमार्ग है, ज्ञान आत्माका स्वरूप जानता हैओर चारित्र आत्मामें स्थिर होता है ॥ ८५ ॥
ज्ञान और क्रियाकी परिणति (दोहा)
ग्यान जीवकी सजगता’ , करम जोवकोी मूल ।
ग्यान मोख अंक्र है, करम जगतकौ मूल ॥ ८६ ॥
ग्यान चेतनाके जगे, प्रगटे. केवलरास ।
कर्म चेतनामें बसे, कर्मंबंध परिनास ॥ ८७ ॥।
शब्दा्थ :- सजगता: सावधानी । अक्र-पौधा । केवलरामर
आत्माका शुद्ध स्वरूण । कर चेतना>ज्ञानरहित भाव। परिनाम"भाव ।
अर्थ :- ज्ञान जीवकी सावधानता है, ओर शुभाशुम परिणति उसे भुलाती है, ज्ञान मोक्षका उत्पादक है और कर्म जन्म-मरणरूप संसारका कारण है ॥ ८६॥ ज्ञानचेतनाका उदय होनेसे शुद्ध परमात्मा प्रगट होता है, और शुभाशुभ परिणतिसे बन्धके योग्य भाव उपजते है ॥ ८७ ॥
) ‘सहजगति’ ऐसा भी पाठ है ।
कम और ज्ञानका भिन्न भिन्न प्रभाव (चौपाई)
जबलगग्यान चेतना न््यारी’ ।
तबलग जोव विकल संसारी ॥।
जब घट ग्यान चेतना जागी।
तब समकिती सहज बेरागी ॥ ८८ ॥
सिद्ध समान रूप निज जाने।
पर संजोग भाव परसाने ॥।
सुद्धासापा अनुभो अम्यासे ।
त्रिविधि कमंकी ममता नासे॥ ८६ ॥
अर्थ :- जबतक ज्ञानचेतना अपनेसे भिन्न है,अर्थात् ज्ञानचेतनाका उदय नहीं हुआ है, तबतक जोव दुःखोी और संसारी रहता है, और जब हृदयमें ज्ञानचेतना जागती है, तब वह अपने आप ही ज्ञानी वरागी होता है॥ ८८ ॥ वह अपना स्वरूप सिद्ध सहश शुद्ध जानता है, और परके निमित्तसे उत्पन्न हुए भावोंको पर स्वरूप मानता है। वह शुद्ध आत्माके अनुभवका अभ्यास करता हैओर भावकमं द्रव्यकमं तथा नोकमंको अपने नहीं मानता ॥ ८६ ॥
ज्ञानीकी आलोचना (दोहा)
परयानवंत अपनी कथा, कहे आपसों आप ।
में मिथ्यात दसाविषे, कोने बहुविधि पाप ॥ ६० ॥
अर्थ :- शञानी जोब अपनो कथा अपनेहोसे कहता है, कि मेने सिथ्यात्वकी दशामें अनेक प्रकारके पाप किये ॥ ६० ॥
१ “मारी’ ऐसा भी पाठ है।
कुतकाश्तिानुमननैस्त्रिका
लविधयं मनोबचनकाये: !
परिहत्य कर्म सर्व परस नेष्कम्यमबलस्बे ॥ ३२ ॥
यदहमकार्ष यदहमचीकर यत्कुवेन्तमप्यन्यं समन््वज्ञासिष, सनसा थ वाचा थ कायेन च तन्मिथ्या मे वुष्कृतमिति ।
पुनः (सर्वया इकतीसा )
हिरदे हमारे महा मोहकी विकलताई,
ताते हम करुना न कीनी जीवधातकी ।
आप पाप कीन औरनिको उपदेस दीने,
हुती अनुमोदना हमारे याही बातकी ।॥
मन बच कायामे मगन हाँ कमाये कम,
धाये भ्रमजालमे कहाये हम पातकी ।
ग्यानके उदय भए हमारी दसा ऐसी भई,
जेसे भानु भासत अवस्था होत प्रातकी ॥ ६१ ॥
अर्थ :- हमारे हृदयमें महा मोहजनित भ्रम था, इससे हमने जीवोपर दया नहीं की । हमने खुद पाप किये, दूसरोंको पापका उपदेश दिया, और किसीको पाप करते देखा, तो उसका समर्थन किया। सन-वचत-कायकोी प्रवृत्तिके निजत्वमें मगन होकर कमंबन्ध क्रिये, और भश्रमजालसे भटककर हम पापी कहलाये, परन्तु ज्ञानका उदय होनिसे हमारी ऐसी अवस्था हो गई, जसे कि सुयंका उदय होनेसे प्रभातकी होक्ी है- अर्थात् प्रकाश फंल जाता है, और अंधकार नष्ट हो जाता है ॥॥ ६ १॥। ज्ञानफ़ा उदय होनेपर अज्ञानदणा हट जाती है सिेथा हयतीसा) ग्यानभान भासत प्रवान ग्यानवान कहे, करुना-निधान अमलान मेरो रूप है । कालसी अतीत कम जालसी अजीत जोग- जालसों अभीत जाकी महिमा अनृप है ।। मोहकीो विलास यह जगत् वास में तो, जगतसो सुन्न पाप पुचन्न अंध कप है । मोहाध्यवहमकार्थ समस्त कर्म तत्प्रतिक्रस्थ । आत्मनि चेलन्यात्मनि निष्कर्मण निन्यमात्मना व्ते ॥ ३३ ॥।
याप किनि कियो कौन करे करिहे सु कौन,
क्रियाकौं विचार सुपिनेकी दौर ध्रृप है॥ ६२ ॥
शब्दार्थ :- अभीत-निर्भय । किनि> किससे । भुपिनेरम्वप्न । अर्थे :- ज्ञान-सूयंका उदय होते ही ज्ञानी ऐसा विचारता है कि मेरा स्वरूप करुणामय और निर्मल है। उसपर मुृत्युकी पहुँच नहीं है, बह कर्मे- परिणतिको जीत लेता है, वह योग-समुदायसे निर्भय’ है, उसकी सहिमा अपरम्पार है,यह जगतका जंजाल मोहजनित है, भै तो संसार अर्थात् जन्म- मरणसे रहित हूँ, और शुभाशुभ प्रवृत्ति अंध-फपफे समान है। किसने पाप किये ? पाप कौन करता है? पाप कौन करेगा ? इस प्रकारकी क्रियाका विचार ज्ञानीको स्वप्नके समान मिथ्या दिखता है ॥ ६२ ॥
कर्म-प्रपच मिथ्या है (दोहा)
में कोनों मेयों करों, अब यह मेरो काम !
सन वच कायामें बसे, ए सिथ्या परिनाम ॥ ६३ ॥
सनवचकाया करमफल, करम-दसा जड़ अंग।
दरबित पुरगल पिडमय, भावित भरम तरंग ॥ ६४ ॥
ताते आतम धरमसों, करम सुभाउ अपूठ ।
कौन करावे को करं, कोसल है सब भूठ ॥ €५॥
शब्दार्थ :- अपूठ>अजानकार । कोसल>कौशल (चतुराई) ।
अर्थ :- मैंने यह किया, अब ऐसा करूगा, यह मेरी कारंवाई है, ये सब भिध्याभाव सन-वचन-कायमें निवास करते हैं ॥ ६३ ॥ मन-वचन-काय १ बह जानता है कि मन-वचन-कायके योग पुदगलके हैं, मेरे स्वरूपको बिगाड़ नही सकते । न करोनि न कारयामि न कु्वल्तमप्यन्यं समनुजानासि सनसा चर वाया च॑ कापेन चेति । कर्ंजनित हैं,कमं-परिणति जड़ है, दृव्यकम पुद्गलके पिण्ड हैं, और भाव- कर्म अज्ञानकी लहर है ।६४॥। आत्मासे कर्मस्वभाव विपरीत है,इससे कर्मको कोन करावे ? कौन करे ? यह सब कोशल मिथ्या है ॥६५।।
मोक्ष-मार्गमे क्रियाका निषंध (दोहा)
करनी हित हरनी सदा, मुकति वितरनी नांहि । गनी बंध-पद्धति विष, सनो महादुखमांहि । ६६।। अथे :- क्रिया आत्माका अहित करनेवाली है, मुक्ति देनेवाली नहीं है, इससे क्रियाकी गणना बन्ध-पद्धतिसें की गई है, यह महादु:खसे लिप्त है ।॥६६१
क्रियाकी निन्दा (सवैया इकतीसा)
करनीकोी धरनीमें महा भोह राजा बसं,
करनी अग्यान भाव राकिसकी पुरी है।
करनी करम काया पुग्गलकी प्रतिछापा,
करनो प्रगट माया मिसरीकी छुरी है।।
करनीके जालमें उरशििि रह्यौँ चिदानंद,
करनीकी वोट ग्यानभान दुति दूरी है।
आचारज कहे करनीसों विवहारी जीव,
करनी सदेव निहचे सुरूप बुरी है।॥। €७।॥।
शब्दार्थ :- राकिस> राक्षस ।वोट>ओट (आड )। दुरी है-छिपी है । मोहविलासविजुश्मितभिदमु दय॒त्कमं सकलमालोच्य । आत्मनि खेतम्यात्मनि निष्कर्मणि निश्यमात्मना ब्तें ॥३४॥॥ न फरिष्यामि न कारयिष्यामि न कुर्वन्तसप्यन्य समनुजास्यासि सनसा थ वाया च कायेन चेति । इस प्रकारका ऊपर तीन जगह संस्कृत गद्य दिया गया है, सो यह गद्य दोनो मुद्रित प्रतियोभे नही है । किन्तु ईडरको प्रतिसे उपलब्ध हुआ है । इन गद्योंके अर्थसे कविताके अर्थक्रा बराबर मिलान नहीं होता है । ईडरकी प्रतिमें कही से उद्धत किया है ऐसा मालूम पड़ता है ।
अर्थ :- क्रियाकी मूमिपर मोह महाराजाका निवास है,क्रिया अज्ञान- भमावरूप राक्षसका नगर है,क्रिया, कमें और शरीर आदि पुदुगलों की मूर्ति है, क्रिया साक्षात् मायारूप मिश्री लपेटी हुई छुरी है, क्रियाके जंजालमें आत्मा फेस रहा है, क्रियाकी आड़ ज्ञान-सूर्यके प्रकाशकों छुपा देती है। ओगुरु कहते हैं कि क्रियासे जोव कमंका कर्त्ता होता है, निश्चय स्वरूपसे देखो तो क्रिया सदेव दुः:खदायक है ॥ ६७ ॥
ज्ञानियोंका विचार (चौपाई)
मृषा मोहकी परनति फंली ।
ताते करम चेतना मैली ।।
ग्यान होत हम समझी एतो ।
जीव सदीव भिन्न परसेती ॥। &८ (दोहा )
जीव अनादि सरूप मस, करम रहित निरुपाधि ।
अविनासी असरन सदा, सुखसय सिद्ध समाधि ॥ ६६ १।
अर्थ :- पहले भूठा मोहका उदय फंल रहा था, उससे मेरी चेतना कमंसहित होनेसे मलीन हो रही थी, अब ज्ञानका उदय होनेसे हम समझ गये कि आत्मा सदा पर परिणतिसे भिन्न है १६८॥ हमारा स्वरूप चेतन्य है, अनादि है, कम रहित है, शुद्ध है,अविनाशी है, स्वाधीन है, निविकल्प और सिद्ध समान सुखमय है ६६।॥। प्रत्याख्याय. भविष्यत्कम॑ समस्त निरस्तसम्मोह:ः । आत्मनि चंतस्यात्मनि निष्कमणि नित्यमात्मना बसें ॥ ३५ ॥
समस्तमित्येव्पास्य कर्म त्रैफालिक शुद्धनयायलस्धी ।
विलीनमोहो रहित विकारभ्रिन्मात्रमात्मानमथादलम्बे ॥ ३६ ॥
पुन: (चौपाई )
& में त्िकाल करनोसों नन््यारा।
चिदविलास पद जग उजयारा ॥
राग विरोध मोह मम नांही।
मेरी. अवलंबन मुभमांही ॥१००॥।
अर्थ :-मै सर्देव करमसे पृथक हूँ, मेरा चेतन्य पदार्थ जगत्का प्रकाशक है, राग-टंष-सोह मेरे नहीं हैं,मेरा स्वरूप मुभहीमें है ॥ १०० ॥
(सवेया तेईसा )
सम्यकबंत कहै अपने ग़ुन,
में नित राग विरोधसों रोतो।
में करतृति करू निरवंछक,
मोहि विर्ष रस लागत तीतो ॥।
सुद्ध सुचेतनकों अनुभो करि,
में जग मोह महा भट जीतौ।
मोख समोप भयो अब मो कहें,
काल अनंत इही विधि बीतो ॥ १०१ ॥
शब्दार्थ :- रीतौ>गहित । मोय ल्मुभे । तीती (तिक्त) 5चरपरा । अथे -सम्यग्हष्टि जीव अपना स्वरूप विचारते हैं कि मै सदा राग-देष-मोहसे रहित हूं, मे लौकिक क्रियाएं इच्छारहित करता हूं, मुझे विषय-रस चरपरा लगता है, मैने जगतमें शुद्ध आत्माका अनुभव करके मोहरूपी महा योद्धाको जीता है, मोक्ष मेरे बिलकुल समीप हुआ, अब मेरा अनन्तकाल इसी प्रकार बीते ॥१०१॥।
विगलन्तु कमंविषतरुफलानि सस भुक्तिमस्तरेणव। संचेतयेडहुमचल चतन्यात्मानमात्मानम ॥३७॥।
यदि ज्ञान ढेंक जाय, तो समस्त ससार अधक्ारमय ही है (दोहा )
कहे विचच्छन में रह्यो, सदा ग्यान रस राच्ि !
सुद्धातपा अनुभूतिसो, खलित न होहुं कदाचि ॥ १०२ ॥
पुब्वकरमस विषतरु भए, उदे भोग फलफूल।
में इनको नहि- भोगता, सहज होहु निरमूल ॥ १०३ ॥
शब्दार्थ :- विचच्छन>ज्ञानी पुरुष । राचि>रमण । खलितच्युत ।
अर्थ :- ज्ञानी जीव विचारते हैकि मै सदव ज्ञानरसमें रमण करता हूँ और शुद्ध आत्म-अनुभवसे कभी भी नहों चूकता ॥ १०२ ॥ पूर्वकृत कर्म विषवृक्षके समान हैं, उनका उदय फल-फूलके समान है, मे इनको भोगता नही हूँ,इसलिये अपने आप ही नष्ट हो जायेंगे ॥ १०३ ॥
वेराग्यकी महिमा (दोहा)
जो पुरवकृत करसम-फल, रुचिसो भुंजे नांहि।
सगन रहे आठों पहर, सुद्धातम पद मांहि ॥१०४॥॥
सो बुध करमदसा रहित, पाव मोख तुरंत ।
भुृंज परम समाधि सुख, आगम काल अनंत ॥ १०५ ॥
शब्दार्थ :- भुजे-भोंगे ।आगम काल-आगामी काल । निःशेषकर्सफलसंन्यसनात्मनवं सर्वक्रियान्तरविह्ारनिवृत्तवत्ते: खतन्यलक्ष्म भजतों भुशमात्मतत्त्वं कालावलीयमचलस्य बहुत्वनन्ता ॥ ३८ ॥! यः पूर्वभावकतकम विषद्र मार्णा भुडक्त फलानि न खलु स्वत एव तृप्तः । आपातकाल रमणीयमुदर्क रम्यं निष्कमं शर्ममयसे तिदशान्तरं सः ॥६ ३६॥।
अर्थ :-जो ज्ञानी जीव पुर्वसें कमाये हुए शुभाशुम कमंफलको अनुराग- पुबंक नहीं भोगता, और सर्देव शुद्ध आत्म-पदार्थमें मस्त रहता है, वह शीघ्र हो करंपरिणति रहित मोक्षपद प्राप्त करता है, और आगामी कालमें परम ज्ञानका आनन्द अनन्त काल तक भोगता है।॥। १०४-१०५ ।॥।
ज्ञानीकी उन्नतिका क्रम (छप्पय )
जो प्रबकृतकरम, विरख-विष-फल नहि भ्रुज ।
जोग जुगति कारिज करंति, ममता न प्रयुज ॥।
राग विरोध निरोधि, संग विकलप सब छुंडइ ।
सुद्धातत अनुभो अभ्यासि, सिव नाटक संडइ॥।
जो ग्यानवंत इहि मग चलत, प्रन ह्व॑ केवल लहै ।
सो परम अतींद्रिय सुख विषे, मगन रूप संतत रहै ॥ १०६ ॥
शब्दार्थ :- विरख-विष-फल >विषवृक्षेके फल । कारिज-का्ये । प्रयुजै>करे । छुडई>छोडे । मडइ-करे (खेले) । सतत>सदेव ।
अर्थ :- जो पूर्वमे कमाये हुए कमंरूप विष-वृक्षके विष-फल नहीं भोगता, अर्थात् शुभ फलमें रति और अशुभ फलमे अरति नहीं करता, जो मन-बचन- कायके योगोंका निग्रह करता हुआ वतंता है, और ममतारहित राग-द्षको रोककर परिग्रहजनित सब बिकल्पोंका त्याग करता है, तथा शुद्ध आत्माके अनुभवका अभ्यास करके मुक्तिका नाटक खेलता है, वह ज्ञानी ऊपर कहे हुए मार्गको ग्रहण करके पूर्णस्वमाव प्राप्तकर केवलज्ञान पाता है, और सर्देव उत्कृष्ट अतोन्द्रिय सुखमें मस्त रहता है ।॥ १०६ ७ ० अत्यस्त भावयित्वा विरतिसबिरत कर्मणस्तत्फलाज्ल प्रस्षष्ट नाटपित्दा प्रलयनसखिलाज्ञानसंचेलनाया: । पूर्ण कत्वा स्वभाव स्वरसपरिणतं ज्ञानसंचेतनां स्वां साननन््द नाटयन्तः प्रशमरसमितः सर्मकालं पिवन्तु ॥ ४० ॥
शुद्ध आत्मद्रव्यको नमस्कार (सवेया इकतीसा )
निरभे निराकुल निगस वेद निरमेद, जाके परगासमें जगत् माइयतु है । रूप रस गंध फास पुदगलकों विलास, तासों उदवास जाको जस गाइयतु है ॥। विग्रह्सों विरत परिग्रहसो न््यारों सदा, जामें जोग निग्रह चिह्न पाइयतु है। सो है ग्यात परवांन चेतन निधान ताहि, अविनासी ईस जानि सीस नाइयतु है ॥ १०७ ॥
शब्दार्थ :- निराकुलल्क्षोभरहित । तिगमच उत्कृष्ट । निरक् (निर्भय )>भयरहित । परगास प्रकाश । माइयतु है+समाता है । उदवास- रहित । विग्रहन्शरीर । निग्रह>निराला । चिह्नुजलक्षण ।
अर्थ :- आत्मा निर्भव, आनन्दमय, सर्वोत्कृष्ट, ज्ञानकप और भेद- रहित है। उसके ज्ञानरूप प्रकाशमें त्रेलोक्यका समावेश होता है । स्पशे- रस-गन्ध-वर्ण ये पुदुगलके ग्रुण है, इनसे उसकी सहिमा निराली कही गई है। उसका लक्षण शरीरसे भिन्न, परिग्रहसे रहित, मन-बचन-कायके योगोंसे निराला है, वह ज्ञानस्वरूप चेतन्य-पिण्ड है, उसे अविनाशी ईश्वर मानकर मस्तक नवाता हूँ ॥ १०७ ॥
शुद्ध आत्मद्रव्य अर्थात् परमात्माका स्वरूप (सर्वेया इकतीसा )
जेसो निरभेदरूप निहचे अतीत हुतौ,
तंसो निरभेद अब भेद कौन कहेगो ।
इतः पदार्थप्रयनावसुष्ठतादिना कतेरेकमनाकुल ज्वलत् । समस्तवस्तुव्य तिरेकनिश्चयाद्विवेचितं ज्ञानमिहावतिष्ठते ॥ ४१ ॥
अन्येस्यो व्यतिरिक्तमाम्मानियतं विश्वत् पृथग्बस्तुता-
सादानोज्कनशुन्यमेतदमल ज्ञान तथावस्थितम् ।
मध्याश्वस्तविभागमुक्ततहजस्फारप्र भा भासुर:
शुद्धज्ञानधनों ययास्य महिसा नित्योदितस्तिष्ठति ॥ ४२ ॥॥
दीसे कर्म रहित सहित सुख समाधान,
पायो निजस्थान फिर बाहरि न बहेगो ।।
कबहूं कदाचि अपनो सुभाव त्यागि करि,
राग रस राचिक न पर वस्तु गहेगो ।
अमलान ग्यान विद्यमान परगट भयोौ,
याही भांति आगम अनंत काल रहैगौ ॥१०८।॥।
शब्दार्थ :-निरभेदल्भेदरहित । अतीत>पहले । राचिके८"लीन होकर । अमलान>्मलरहित । आगम>आगामी ।
अर्थ :- पूर्वमें अर्थात् संसारो दशामे निश्चयनयसे आत्मा जेसा अभेदरूप था, बसा प्रगट हो गया, उस परमात्माको अब भेदरूप कौन कहेगा ? अर्थात् कोई नहों ।जो कर्मरहित और सुख-शान्तिसहित दिखता है, तथा जिसने निजस्थान अर्थात् सोक्षकी प्राप्ति की है, वह बाहर अर्थात् जन्म- सरणरूप संसारमें न आवेगा । वह कभी भो -अपना निज-स्वभाव छोड़कर राग-देषमें लगकर परपदार्थ अर्थात् शरीर आदिको ग्रहण नहीं करेगा, क्योंकि वतमानकालमें जो निर्मल पूर्णज्ञान प्रगट हुआ है, बह तो आगामी अनन्त काल तक ऐसा हो रहेगा ॥ १०८ ॥
पुन. (सवया इकतीसा )
जबहीते चेतन विभावसों उलटि आपु, सम पाइ अपनो सुभाउ गहि लोनोौ है । तबहोते जो जो लेने जोग सो सो सब लोनो, जो जो त्यागजोग सो सो सब छांड़ि दीनो है ।। लेबेकों न रहो ठोर त्यागिवेको नांहि और, बाकी कहा उबरधो जु कारजु नवीनो है । उन्मुक्तमुन्मोच्यमशेषतस्तत्त यात्तमादेषमशेष तस्तत् । बदात्सन. संहृतसर्व शक्त पूर्णस्य सन्धारणमात्सनीह ॥ ४३ ॥ संग त्यागि अंग त्यागि बचन तरंग त्यागि, मन त्यागि बुद्धि त्यागि आपा सुद्ध कीनो है ॥ १०६ ॥ शब्दार्थ .- उलटि>विमुख होकर । समै (समय ) > मौका । उबरचौ- शेष रहा । कारजु (कार्य)>काम । सगजपरिग्रह। अगल्देह। तरगं> लहर । बुद्धि इन्द्रिय-जनितज्ञान । आपा-निज-आत्मा । अथे :- अवसर मिलनेपर जबसे आत्माने विभावपरिणति छोड़कर निजस्व॒भाव ग्रहण किया है, तबसे जो जो बातें उपादेय अर्थात् ग्रहण करने योग्य थों, वे वे सब ग्रहण कीं, और जो जो बातें हेय अर्थात् त्यागने योग्य थीं, वे वेसब छोड़ दीं। अब प्रहण करने योग्य और त्यागने योग्य कुछ नहीं रह गया और न कुछ शेष रह गया जो नया काम करनेको बाकी हो । परिग्रह छोड़ दिया, शरीर छोड़ दिया, बजनकी क्रियासे रहित हुआ, मनके विकल्प त्याग दिये, इन्द्रियजनित ज्ञान छोड़ा और आत्माको शुद्ध किया ॥ १०६ ॥।
मुक्तिका मूल कारण द्र॒व्यलिग नही है (दोहा)
सुद्ध ग्यानक देह नहिं, मुद्रा भेष न कोह ।
ताते कारन मोखकौ, दरबलिग नहिं होइ ॥ ११० ॥
दरबलिग न्यारो प्रगट, कला वचन विग्यान । अष्ट महारिधि अष्ट सिधि, एऊ होहि न ग्यान ॥ १११ ॥
शब्दार्थ :- मुद्रा-आकृति । भेष (वेष)>बनावट । दरबलिग-वाह्य वेष । प्रगट>स्पष्ट । एऊन्यह ।
अर्थ :- आत्मा शुद्धज्ञानमय है, और शुद्धज्ञानके शरीर नहीं है,और न आक्ृति - बेष आदि हैं, इसलिये द्रव्यलिग मोक्षका कारण नहीं है ॥११०।॥॥
व्यतिरिक्त परद्रव्यादेवे॑ जश्ानसवस्थितम ।
कथमाहा रक॑तत्स्याद्यन देहोःस्प शझूचते ॥ ४४ ॥।
एवं ज्ञानस्थ शुद्धस्थ देह एवं न विछते। ततो वेहमयं ज्ञातुर्न लिन मोक्षकारणम् ॥ ४५ ॥ श्श्द सेमयसार माटक बाह्य वेष जुदा है, कला-कौशल जुदा है, बचन-चातुरी जुदा है, अष्ट महाऋद्धियाँ’ जुदो हैं, सिद्धियाँ’ जुदो हैऔर ये कोई ज्ञान नहों हैं ॥ १११ ॥
आत्माके सिवाय अन्यत्र ज्ञान नही है (सवेया इकतीसा )
भेषमें न ग्यान नहि ग्यान गुरु वर्तनमे,
मंत्र जंत्र तंत्रमें नग्यानकी कहानी है ।
ग्रंथमें न ग्यान नहि ग्यान कवि चातुरीमें,
बातनिमे ग्यान नहि ग्यान कहा बानी है ।।
ताते भेष ग्रुरुता कवित्त ग्रंथ मंत्र बात,
इनते अतोत ग्यान चेतना निसानी है ।
ग्यानहीमें ग्यान नहि ग्यान और ठौर कहूं,
जाक॑ घट ग्यान सोई ग्यानका निदानो है ॥ ११२ ॥
शब्दार्थ :- मत्र>माड़ना-फूंकना । जंत्र>गण्डा-तावीज । तत्रर टोटका । कहानी >-बात । ग्रंथशास्त्र ।निसानी>चिह्न । वानी>वचन । ठौर>स्थान । निदानी>कारण ।
अर्थ :- वेषमें ज्ञान नहीं है, महंतजी बने फिरनेमें ज्ञान नहीं है, मंत्र- जंत्र-तंत्रमें ज्ञाककोी बात नहों है, शास्त्रमें? ज्ञान नहीं है, कविता-कौशलमें ज्ञान नहों है, व्याख्यानमें * ज्ञान नहीं है, क्योंकि वचन" जड़ है, इससे वेष, गुरुता, कविताई, शास्त्र, मंत्र-तंत्र, व्याख्यान इनसे चेतन्यलक्षणका धारक ज्ञान निराला है। ज्ञान ज्ञानहीमें है, अन्यत्र नहों है। जिसके घटमें ज्ञान उपजा है, वही ज्ञानका मूल कारण अर्थात् आत्मा है ॥ ११२ ॥
१ अष्ट ऋद्धिएँ -
दोहा - अणिमा महिसा गरमिता, लधिमा प्राप्ती काम ।
वशीकरण अरु ईशता, अष्ट रिद्धिके नाश ॥।
3 अ्रष्ट सिद्धिएँ- आचार, श्रुत, शरीर, वचन, वाचन, बुद्धि, उपयोग ओऔर सग्रह
सलीनता ।
3_४ ये ज्ञान नही ज्ञानके कारण हैं ।
बचन शब्दका प्रकार है, सो शब्द जड़ है, चैतन्य नही है ।
ज्ञानके बिना वेषधारी विषयके भिखारी हैं (सवेया इकतीसा )
भेष धरि लोकनिकों बंचे सौ धरम ठग,
गुरु सो कहावे गुरुवाई जाहि चहिये।
मंत्र तंत्र साधक कहावे गुनी जादूगर,
पंडित कहाये पंडिताई जामें लहिये ।।
कवित्तकी कलामें प्रवीन सो कहाबे कवि,
बात कहि जाने सो पवारगीर कहिये ।
एतौ सब विबेके भिखारी मायाधारी जीव,
इन्हकों विलोकिक दयालरूप रहिये ॥ ११३ ॥
शब्दार्थ :- बचै >ठगे । प्रवीन>चतुर । पवारगीर-बातचीतमें होश्यार - सभाचतुर । विलौकि>देखकर ।
अर्थ :- जो वेष बनाकर लोगोंको ठगता है, बह घर्म-ठग कहलाता है जिसमे लौकिक बड़प्पन होता है, वह बड़ा कहलाता है, जिससें मंत्र-तंत्र साधनेका गुण है, वह जादूगर कहलाता है, जो कविताईमें होशियार है, वह कवि कहलाता है, जो बात-चीतमें चटपटा है, वह व्यास्याता कहलाता है। सो ये सब कपटी जीव विषयके भिक्षुक हैं, विषयोंकी पुतिके लिये याचना करते फिरते हैं, इनमें स्वार्थ -त्यागकका अश भी नहीं है । इन्हें देखकर दया आनी चाहिये ॥ ११३ ॥
अनुभवकी योग्यता (दोहा)
जो दयालता भाव सो, प्रगट ग्यानकौं अंग ।
पे तथापि अनुभौ दसा, वरते विगत तरंग ॥ ११४ ॥
दरसन ग्यान चरन दसा, कर एक जो कोइ ।
थिर छ्व॑ साधे मोख-मग, सुधी अनुभवी सोह॥ ११५ ॥
बर्शनश्ानचारित्रत्रयात्मा तस्वमात्मन: ।
एक एव सदा सेव्यो मोक्षमार्गों सुमुक्षणा ॥४६॥॥
शब्दार्थ :- प्रगटन््साक्षात् । तथापिज्तों भी । विगत>रहित। तरंग विकल्प । सुधी>भेदविज्ञानी ।
अर्थ : यदहापि करुणाभाव ज्ञानका साक्षात् अंग है, पर तो भी अनु- भवकी परिणति निर्विकल्प रहतो है ॥ ११४ ॥ जो सम्यर्दशेन-ज्ञान- चारित्रकी एकता पूर्वक आत्मस्वरूपमे स्थिर होकर मोक्षमार्गको स्तधता है, वही भेदविज्ञानी अनुभवी है॥ ११५ ॥
आत्म-अनुभवका परिणाम (सर्वैया इकतीसा )
जोई द्विग ग्यान चरनातसमे बेठि ठौर,
भयौ निरदोर पर वस्तुकों न परसे।
सुद्धता विचार ध्यावे सुद्धतामै केलि करे,
सुद्धतामें थिर ह्ं अमृत-धारा बरसे ॥।
त्यागि तन कष्ट ह्वू सपष्ट अष्ट करमकोौ,
करि थान भ्रष्ट नष्ट करे और करसे ।
सोतो विकलप विजई अलप काल मांहि,
त्यागि भो विधान निरवान पद परसे ॥ ११६ ॥
शब्दार्थ :- निरदार>परिणामोकी चचलता रहित । परसे (स्पर्श) छूवे ।केलिन््मौज । सपष्ट (स्पष्ट) >खुलासा। थान (स्थान) -क्षैत्र । करसे (कृश करे)->जीण करे ।विकलप विजई-विकल्प जाल जीतनेवाला । अलप (अल्प )ल्-थोड़ा । भौ विधान>जन्म-मरणका फेरा । निरवान (निर्वाण) >मोक्ष ।
अर्थ :- जो कोई सम्यग्दर्शन-झ्ञान-चारित्ररूप आत्मामें अत्यन्त हढ़ स्थिर होकर विकल्प-जालकों दूर करता है, और उसके परिणाम पर- पदार्थोको छू तक नहों पाते । जो आत्मशुद्धिको भावना व ध्यान करता है, वा शुद्ध आत्मामें मौज करता है, अथवा यों कहो कि शुद्ध आत्मामें स्थिर होकर आत्सोय आनन्दकी अमृत-धारा बरसाता है, वह शारीरिक कष्टोंको नहीं गिनता, और स्पष्टतया आठों कर्मोकी सत्ताको शिथिल और बिचलित कर देता है, तथा उनकी निजेरा और नाश करता है, वह निविकल्प ज्ञानी थोड़े हीसमयमें जन्म-सरणरूप संसारकों छोड़कर परमधाम अर्थात् मोक्ष पाता है ॥ ११६॥
आत्म-अनुभव करनेका उपदेश (चौपाई )
गुन परजमें द्विष्टि न दोजे।
निरविकलप अनुभौ-रस पीजे ॥।
आप समाइ आपमें लीजे।
तनुपा मेटि अपनुपौ कीज ॥ ११७ ॥
शब्दार्थ :- द्विष्टितजर । रस-अमृत । तनुपौरूशरीरमे अहकार । अपनुपौ-आत्माको अपना मानना ।
अर्थ :- आत्माके अनेक गुण-पर्यायोंके विकल्पमें न पड़कर निविकल्प आत्मअनुभमवका अमृत पियो । आप अपने स्वरूपमें लोन होजाओ, और शरीरमें अहंबुद्धि छोड़तर निज-आत्माकों अपनाओ ॥ ११७ ॥
पुन: (दोहा )
तजि विभाउ हूजे मगन, सुद्धातम पद सांहि ।
एक मोख-मारग यहे, और दूसरो नांहि॥ ११८ ॥
अर्थ :- राग-दहेष आदि विभावपरिणतिको हटाकर शुद्ध आत्मपदमें लीन होओ, यहो एक मोक्षका रास्ता है,दूसरा मार्ग कोई नहीं है ॥ ११८ ॥
आत्म-अनुभवके बिना वाद्य चारित्र होनेपर भी जीब अब्रती है (सवेया इकतीसा )
केई भिश्याद्रिष्टी जीव धरे जिनमुद्रा भेष, क्रियामें मगन रहें कहें हम जती हैं । एको मोक्षपथों य एव नियतो हस्शप्तिवृत्त्यात्मक- स्ततश्रंब स्थितिमेति पस्तमनिशं ध्यायेच्च तं चेतति । तस्मिन्न व निरन्तर विहरति ब्रय्यान्तराण्यस्पृशन् सोध्वश्य॑ समयस्य सारमधचिराज्नित्योदयं विन्दति ॥ ४७ ॥॥
“ये त्वेने परिहत्य संबुतिपथप्रस्थापितेनात्मना
लिड्ज व्रव्यमये वहन्ति ममतां तत्त्वावबोधच्युता: ।
निश्पोद्योतमखण्डमेकसतुलालोक स्वभावप्रभा-
प्राभारं॑ समपस्थ साश्ममल नागापि परश्यान्त ते ॥ ४८ ॥
३०२ ससयसार ताटक
अतुल अखंड मसल रहित सदा उदोत,
ऐसे ग्यान भावसों विमुख मूढ़मती हैं ।।
आगमस संभाल दोस टाल विवहार भाले,
पाले ब्रत जदपि तथापि अबिरती हैं ।
आपुकों कहावे मोल मारगके अधिकारी,
मोखसों सदीव रुष्ट दुष्ट दुरमती’ हैं ॥ ११६ ॥
शब्दार्थ :- क्रिया-बाह्मचारित्र ।जती (यति )>साधु । अतुल >उपमा रहित । अखड-नित्य । सदा उदोत >हमेशा प्रकाशित रहनेवाला । विमुख- परांमुख । मृढ्मतीरअज्ञानी । आगमन्शास्त्र । भाले-देखे । अविरती (अव्ती )>ब्रत रहित । रुष्ट >नाराज । दुरमती >खोटी बुद्धिवाले ।
अर्थ :- कई मिथ्याहृष्टि जोब जिनलिग धारण करके शुभाचारमें लगे रहते हैं,और कहते हैंकि हम साधु हैं, वेमे, अनुपम, अखण्ड, असल, अविनाशी ओर सदा प्रकाशवान ऐसे ज्ञानभावसे सदा पराइमुख हैं । यद्यपि वे सिद्धान्तका अध्ययन करते, निर्दोष आहार-बिहार करते और ब्रतोंका पालन करते हैं,तो भी अव्नती हैं। वे अपनेको मोक्षमार्गंका अधिकारी कहते हैं,परन्तु वे दुष्ट मोक्षमार्गसे बिमुख हैं,और दुर्मति है ॥ ११६ ॥
पुन: (चौपाई)
जेसे मुगध धान पहिचाने।
तुष तंदुलका भेद न जाने ।॥।
तेसे मृढ़गती विवहारो ।
लखे न बंध मोख गति न््यारो ॥ १२० ॥
अर्थ :- जिस प्रकार भोला मनुष्य घानको पहिचाने और तुष तंदुलका ) दुरगती’ ऐसा भी पाठ है । व्यवहारविमृटदृष्टयः परमार्थ कलयन्ति नो जनाः । तुषब्ोधविभुग्धबुद्धघ: कलयन्तीहु तुष न तण्डुलम ॥ ४६ ॥। भेद न जाने, उसी प्रकार बाह्य-क्रियामें लोन रहनेवाला अज्ञानी बन्ध और मोक्षकी प्रथकता नहीं समभता ॥ १२० ॥
पुन. (दोहा)
जे विवहारी पृढ़ नर, परजे बुद्धी जीव ।
तिन््ह॒कौं बाहिज क्रियाविषे, हैअवबलंब सदीव ॥ १२१ ॥
कुमति बाहिज हष्टिसौ, बाहिज क्रिया करंत ।
साने सोख परंपरा, मनमें हरष धरंत ॥ १२२ ॥
सुद्धातस अनुभो कथा, कहे समकिती कोइ ।
सो सुनिक तासों कहै, यह सिवपंथ न होड ॥ १२३ ॥
अर्थ :- जो व्यवहारमें लीन और पर्यायहोमें अहूंब॒ुद्धि करनेवाले भोले मनुष्य हैं,उन्हें हमेशा बाह्य क्रियाक्राण्डहीका बल रहता है ७ १२१॥ जो बहिह ए्टि और अज्ञानी हैंवे बाह्यचारित्र ही अंगीकार फरते हैं, और मनमें प्रसन्न होकर उसे मोक्षमाग समभते हैं॥ १२२ ॥ यदि कोई सम्यग्हष्टि जीव उन मिथ्यात्वियोंसे शुद्ध आत्म-अनु मवकी वार्ता करे, तो उसको सुनकर वे कहते हैंकि यह मोक्षमार्ग नहों है॥ १२३ ॥
अज्ञानो ओर ज्ञानियोंकी परिणतिमे भेद है (कवित्त
जिन्हके देहबुद्धि घट अंतर, मुनि-मुद्रा धरि क्रिया प्रबांनहि। ते हिंयथ अंध बंधके करता, परम तत्तकौ भेद न जानहि॥। जिनन््हके हिए सुमतिकी कनिका, बाहिज क्रिया भेष परमानहि ।
द्ृव्यलिड्रममकारमीलितेह श्यते सममसार एवं न। द्रब्यलिडुमिह यस्किलान्यतो ज्ञानसेकसिदसेव हि स्वतः ॥ ५० ॥
ते समकिती मोख मारग सुख,
करि प्रस्थान भवस्थिति भानहि ॥ १२४ ॥
शब्दार्थ :- देहबुद्धश रीरको अपना मानना । प्रवांनहि-सत्य मानना । हियचजहुदय । परमतत्तल््आत्मपदार्थ । कनिका>किरण । भवस्थिति>संसारकी स्थिति । भानहि-नष्ट करते है ।
अर्थ :- जिनके हृदयमें शरोरसे अहंबुद्धि है, वेमुनिका वेष धारण करके बाह्य चारित्रहीकों सत्य मानते है। वे हृदयके अंधे बन्धके कर्त्ता है, आत्म-पदार्थका मर्स नहीं जानते, और जिन सम्यस्टृष्टि जीवोके हृदयमें सम्यग्लानकी किरण प्रकाशित हुई है, वे बाह्यक्रिया और बेबको अपना निमज-स्वरूप नहीं सप्रभते, वे सोक्ष भार्गकेसन््तुख गसन करके भवस्थितिकों नष्ट करते हैं ॥ १२४ ॥
समयसारका सार (सवेया इकतीसा )
आचारज कहैं जिन वचनको विसतार,
अगम अपार है कहेंगे हम कितनों ।
बहुत बोलिबेसो न मकसुद चुप्प भल्री,
बोलिये सुबचन प्रयोजन है जितनों ॥।
नानारूप जलपसों नाना विकलप उठे,
ताते जंतो कारज कथन भलो तितनों ।
सिद्ध परमातमाकों अनुभो अभ्यास कीजे,
यहै मोख-पंथ परमारथ है इतनो ॥ १२५ ॥
शब्दार्थ :- विसतार (विस्तार )>फलाव । अगम"अथाह । मकसूदर इृष्ट । जलपन्वकवाद ।" कारज>"काम । परमारथ (परमार्थ )न्पर्म पदार्थ । श । अलमलमतिजस्पेदू विकल््पैरनत्पे- रयमहि. परमार्थश्व त्यता नित्यमेकः । स्व॒रसविस्तरप्रणंज्ञान विस्फूृतिमात्रा- पक्ष खलु समयसाराबुतर किड्चिदस्ति ॥ ४१ ॥
अर्थ :- श्रीगुरु कहते हैं किजिनवाणीका विस्तार विशाल और अपरम्पार है, हम कहाँ तक कहेंगे । बहुत बोलना हमें इश नहों है, इससे अब मौन हो रहना भला है, क्योंकि वचन उतने ही बोलना चाहिये, जितनेसे प्रयोजन सधे। अनेक प्रकारका बकवाद करनेसे अनेक विकल्प उठते हैं, इसलिये उतना हो कथन करना ठीक है जितनेका काम है। बस, शुद्ध परमात्माके अनुभवका अभ्यास करो यही सोक्षमार्ग हैऔर इतना ही परमार्थ है ॥ १२५ ॥
पुनः (दोहा )
सुद्धातम अनुभौ क्रिया, सुद्ध ग्यान द्विग दौर ।
मुकतति-पंथ साधन यहै, बागजाल सब और ॥ १२६ ॥
शब्दार्थ :- क्रिया >चा रित्र । द्विगनदर्शन । वागजालन्वाक्याडंबर ।
अर्थ :- शुद्ध आत्माका अनुभव करना ही सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र हे, बाको सब वाक्याडस्बर है ॥१२६।॥।
अनुभव योग्य शुद्ध आत्माका स्वरूप (दोहा)
जगत् चक्षु आनंदसय, ग्यान चेतनाभास ।
निरविकलप सासुत सुथिर, कीज अनुभो तास ॥ १२७ ॥
अचल अखंडित ग्यानमय, पुरन बीत ममत्व ।
ग्यान ग़म्य बाधा रहित, सो हेआतम तत्व ॥१२८।॥॥
अर्थ :- आत्मपदार्थ जगतके तब पदार्थोकों देखनेके लिये नेत्र हैं, इदमेक जगच्चक्षरक्षयं याति पूर्णताम् । विज्ञानघधनमानन्दसयमध्यक्षता. नयत् ॥५२॥।
इतीदमात्मनस्तत्त्व॑ जञानमात्रमवस्थितम् ।
अखण्डमेकसनचल स्वसवेश्वमबाधितम् ॥ ५२ ॥
इति स्व विणुद्धिज्ञानाधिकार ॥ १० ॥
५ । रत 9३ प, फ्९८यः
आनन्दमय है, ज्ञान-चेतनासे प्रकाशित हे, संकल्प-विकल्प रहित है, स्वयं
सिद्ध है, अविनाशी है, अचल है, अखण्डित है, शानका पिण्ड है, सुख आदि
अनन्त गुणोंसे परिपृर्ण हे, बीतराग है, इन्द्रियोंके अगोचर है, शञानगोचर है,
जन्म-मरण या क्षुधा-तषा आदिको बाधासे रहित निराबाध है। ऐसे आत्स-
तर्वका अनुभव करो ॥।१२७-१२६८॥ (दोहा )
सर्वे विसुद्धों द्वारा यह, कह्यों ध्रगट सिवपंथ ।
कुन्दकुन्द मुनिराज कृत, प्रर भयो गरंथ ॥१२६।।
अर्थ :- साक्षात् मोक्षका सार्ग यह सर्वविशुद्धि अधिकार कहा और स्वामी कुन्वकुन्दमुनि रचित शास्त्र समाप्त हुआ ॥ १२६ ॥
ग्रन्थकर्ताका नाम और ग्रन्थकी महिमा (चौपाई )
कुन्दकुन्दमुनिराज प्रवोना।
तिन््ह यह ग्रंथ इहांलों कीना ।।
गाथा बद्ध सुप्राकृत वानी ।
गुरुपरंपप. रीति बखानी ॥ १३०१ ॥
भयौ गिरंथ जगत् बिख्याता।
सुनत महा सुख पावहि ग्याता ॥।
जे नव रस जगमांहि बखाने।
ते सब समयसार रस साने’॥ १३१ ॥
अर्थ :- आध्यात्मिक विद्यासें कुशल स्वामी कुन्दकुन्द सुनिने यह ग्रन्थ यहाँ तक रचा है, ओर वह गुरु-परम्पराके कथन अखुसार प्राकृत भाषासें गाथाबद्ध कथन किया है ॥ १३० ॥ यह ग्रन्थ जगत्प्रसिद्ध है, इसे सुनकर ज्ञानी लोग परमाननद प्राप्त करते हैं । लोकमें जो नव रस प्रसिद्ध हैं वे सब इस समयसारके रससें समाये हुए हैं॥ १३१ ॥
१ माने ऐसा भी पाठ है पुन: (दोहा)
प्रगटररूप.. संसारमें, नव रस नाटक होइ ।
नवरस गणित ग्यानसय, विरला जाने कोइ ॥१३२॥
अर्थ :- संतारमें प्रसिद्ध है किनाटक नव रस सहित होता है, पर ज्ञानमें नव हो रस गर्मित हैं, इसबातको कोई विरला हो ज्ञानी जानता है।
भावार्थ :- नव रसोंमें सबका नायक शान्तरस है, और शान्तरस ज्ञानमें है ॥ १३२ ॥
नव रसोंके नाम (कवित्त )
प्रथम सिगार वीर दूजो रस,
तोजी रस करुना सुखदायक ।
हास्य चतुर्थ रुद्र रस पंचम,
छट्टम रस बीभच्छ विभायक ॥।
सप्तम भय अद्ुम रस अड्भू त,
नवमी शांत रसनिको नायक ।
ए नव रस एई नव नाटक,
जो जहूंसगन सोइ तिहि लायक ११३३)
अर्थ :- पहला श’ृंगार, दूसरा बोर रस, तोसरा सुखदायक करुणा रस, चोथा हास्य, पाँचवाँ रोद रस, छा घिनावना बोभत्स रस, सातयाँ सयानक, आठवाँ अदभुत ओर नवभा सब रसोंका सरताज शान्त रस है । ये नव रस हैं। और यही नाटकरूप हैं। जो जिस रसमें मग्न होवे उसको वही रुचिकर होता है ॥१३३॥।
नव रसोके लौकिक स्थान (सवेया इकतीसा)
सोभासें सिगार बसे बोर पुरुषारथमें,
कोमल हिएमें करुना रस बखानिये ।
आनंदमें हास्य रंड मुंडमें विराज रुद्र,
बोभत्स तहां जहां गिलानि मन आनिये ॥।
खितामें भयानक अथाहतामें अवभुत,
सायाकी अरुचि तामें सांत रस मानिये ।
एई नव रस भवरूप एई भावरूप,
इनिकौ विलेछिन सुद्रिष्टि जागे जानिये ॥ १३४ ॥
शब्दार्थ :- रुद मुड- रण-सग्राम । विलेछिन > प्रथकुरण । अथे :- शोमामें श्यंगार, पुरुषार्थमें बीर, कोमल हुृदयमें करुणा, आनन्दमें हास्य, रण-संप्राममें रोद, ग्लानिमें वीभत्स, शोक मश्णादिकी चितामें भयानक, आश्रयंमें अद्भुत और वंराग्यमें शान्त रसका निवास है। ये नव रस लोकिक है और पारमाथिक है, सो इनका पृथक्करण ज्ञानहृष्टिका उदय होनेपर होता है ॥ १३४ ॥
नव रसोंके पारमाथिक स्थान (छप्पय )
गुन विचार सिगार, बोर उद्यम उदार रुख ।
करुना समरस रीति, हास हिरदे उछाह सुख ।।
अष्ट करम दल मसलन, रुद्र बरते तिहि थानक ।
तन बिलेछ बोभच्छ, दुन्द मुख दसा भयानक ॥।
अदभुत अनंत बल चितबन,
सांत सहज वेराग धुव ।
नव रस विलास परगास तब,
जब सुबोध घट प्रगट हुब ॥१३५।॥
शब्दार्थ :- उछाह-उत्साह ।दन मलन>नष्ट करना । विलेछु-अशुचि । अथ -आत्माको ज्ञानगुणसे विभूषित करनेका विचार श्रृंगार रस है, कमं-निजं राका उद्यम बीररस है, अपने ही समान सब जीवोंको समभना करुणा रस है, मनमें आत्म-अनुभवका उत्साह हास्थरस है, अष्ट कर्मोंका नष्ट करना रौद्ररस है, शरोरको अशुध्चिता विचारना वीभत्स रस है, जन्म्-मरण आदिका दुःख चितवन करना भयानक रस है,आत्माकी अनन्तशक्ति चितवन करना अदभुत रस है, हृढ़ बेराग्य धारण करना शान्त रस है। सो जब हुदयमें सम्यग्शान प्रगट होता हैतब इस प्रकार नव रसका बविलास प्रकाशित होता है ॥ १३५ ॥
(चौपाई)
जब सुबोध घटमें परगासे ।
तब रस बिरस विषमता नासे ॥।
नव रस लखे एक रस मांही ।
, ताते विरस भाव सिटि जांहो ॥ १३६ ॥५
शब्दार्थ :- सुबोध-सम्यग्ज्ञान ।विषमतान-भेद ।
अर्थ :- जब हृदयमें सम्यग्लान प्रगट होता है, तब रस-विरसका भेद मिट जाता है । एक ही रसमें नव रस दिखाई देते हैं,इससे विरसभाव नष्ट होकर एक शान्त रसहीमें आत्मा विश्वास लेता है॥ १३६ ॥
(दोहा )
सबरसगर्भित मूल रस, नाटक नाम गरंथ ।
जाके सुनत प्रवांन जिय, समुर्क पंथ कुपंथ ॥ १३७ ॥
शब्दार्थ :- मूल रस >प्रधानरस । कुपंथ-मिथ्यामार्ग ।
अर्थ :- यह नाटक समयसार ग्रन्थ सब रसोसे गर्भित आत्मानुभव- रूप मुलरसमय है, इशके सुनते ही जोव सन््म्राग और उन्मरा्गको समकक जाता है ॥ १३७ ॥
(चोपाई)
बरते ग्रंथ जगत् हित काजा ।
प्रगटे. अमृतचंद्र समुनिराजा ॥॥
तब तिन्हि ग्रंथ जानि अति नीका ।
रची बनाई संसकृत टीका ॥ १३८ ॥
अर्थ :- यह जगतृहितकारो ग्रन्थ प्राकृत भाषामें था सो अमृतचन्द्र- स्वामीने इसे अत्यन्त श्रेष्ठ जानकर इसको संस्कृत टीका बनाई ॥ १३८१
( दोहा )
सरब विसुद्धी द्वारलों, आए करत बखान।
तब आचारज भगतिसों, कर ग्रंथ गुन गान ॥१३६॥
अर्थ :- स्वामी अमृतचंद्रने सर्वविशुद्धिदवार पयंत इस प्रन्थका संस्कृत भाषासें व्याल्यान किया है और भक्तिपूर्वक गुणानुवाद गाया है ॥ १३६ ॥ दसवें अधिकारका सार अनन्तकालसे जन्म-मरणरूप संसारमें निवास करते हुए इस मोही जीबने पुदुगलोंके समागमसे कभो अपने स्वरूपका आस्वादन नहीं किया, और राग-हेष आदि मिथ्याभावोंमें तत्पर रहा। अब सावधान होकर निजात्म-अभिरुचिरूप सुमति राधिकासे नाता लगाना और परपदार्थो्मे अहंबुद्धिरूप कुमति कुब्जासे विरक्त होना उचित है। सुमति राधिका शतरंजके खिलाड़ीके समान पुरुषार्थकों प्रधान करती है और कुमति कुब्जा चोसरके खिलाड़ी के समान ‘पाँसा परे सो दाव’ की नीतिसे तकदीरका अवलम्बन लेतो है। इस हृष्टान्तसे स्पष्ट हैकि नीतिसे अपने बृद्धिबल और बाह्य साधनोंको संग्रह करके उद्योगमे तत्पर होने को शिक्षा दो गई है । नसोबकी बात है, कर्म जेसा रस देगा सो होवेगा, तकदोरमें नहीं है । इत्यादि किसमतके रोनेको अज्ञानभाव बतलाया है, क्योंकि तकदीर अंधी है ओर तदबीर सूभतो हुई है । आत्मा पूर्वकर्मरूप विष-युक्षोंका कर्त्ता-भोक्ता नहीं है, इस प्रकारका विचार हृढ़ रखनेसे और शुद्धात्म पदमें मस्त रहनेसे वे कर्मं-समूह अपने आप नष्ट हो जाते हैं। यदि अधा मनुष्य लंगड़े मनुष्यको अपने कंधेपर रख ले, तो अंधा लंगड़े के ज्ञान और लंगड़ा अंधेके परोंकी सहायतासे रास्ता पार कर सकता है, परन्तु अंधा अकेला हो रहे ओर लंगड़ा भी उससे जुदा रहे तो, वे दोनों इच्छित क्षेत्रकों नहों पहुँच सकते, और न विपत्तिपर विजय पा सकते हैं। यही हाल जञानचारित्रका है ।सच पुछो तो, ज्ञानके बिना चारित्र चारित्र ही नहीं है, और चारित्रके बिना ज्ञान ज्ञान ही नहीं है, क्योंकि जशानके बिना पदा्थके स्वरूपको कौन पहिचानेगा ओर चारित्रके बिना स्वरूपमें विश्रास कंसे मिलेगा ? इससे स्पष्ट है, कि ज्ञान-वे राग्यका जोड़ा है। फल-कियामें लोन होतेकी जेनमतसें कुछ सहिसा नहीं है, उसे ‘करनी हित हरनी सदा सुकति वितरनी नांहि’ कहा है। इसलिये ज्ञानी लोग जझानगोचरओर शानस्वरूप आत्माका ही अनुभव करते हैं। . स्मरण रहे कि ज्ञान आत्माका असाधारण गुण है, जब वह जेयको प्रहण करता अर्थात् जानता है, तब उसकी परिणति ज्ञेयाकार होती है, क्योंकि ज्ञान सविकल्प है, दर्शनके समान निथिकल्प नहों है, अर्थात् ज्ञान शेयके आकार आदिको विकल्प करता है, कि यह छोटा है, बड़ा है, टेढ़ा है, सोधा है, ऊँचा है, नोजा है, गोल है, त्रिकोण है, मोठा है, कड॒वा है, साधक है, बाधक है,हेय है, उपादेय हैइत्यादि । परन्तु ज्ञान ज्ञानही रहता है,ज्ेपका ज्ञायक होनेसे वा शेयाकार परिणमनेसे शेयरूप नहीं होता, परन्तु ज्ञानमें शेयकी आकृति प्रतिविम्बित होनेसे वाउसमें आकार आदिका विकल्प होनेसे अज्ञानी लोग ज्ञानका दोष समभते हैं, ओर कहते हैं, किजब यह ज्ञानकी सबिकल्पता मिट जावेगी - अर्थात् आत्मा शुन्य जड़सा हो जावेगा, तब ज्ञान निर्दोष होगा, परन्तु “बस्तुस्वभाव मिटे नहि क्योंही’ की नीतिसे उनका विचार भिथ्या है। बहुधा देखा गया है कि हम कुछ न कुछ चितवन किया हो करते हैं, उससे खेद-खिन्न हुआ करते है और चाहते हैं कियह् चितवन न हुआ करे । इसके लिये हमारा अनुभव यह है कि चेतयिता चेतन तो चेतता हो रहता है, चेतता था, और चेतता रहेगा, उसका चेतना स्वभाव मिट नहीं सकता । ‘ताते खेद कर सठ योंहो’ की नोतिसे खिन्नता प्रतोति होती है, अतः चितबन, धर्संध्यान और मंदकघायरूप होता चाहिये, ऐसा करनेसे बड़ी शान्ति मिलतो है, तथा स्वभावका स्वाद मिलनेसे सांसारिक संताप नहीं सता सकते, इसलिये सदा सावधान रहकर इृष्ट-वियोग, अनिष्ट- संयोग, परिपग्रह-संग्रह थ्वादिको अत्यन्त गौण करके निर्भय, निराकुल, निगम, निर्भेद आत्माके अनुभवका अभ्यास करना चाहिए।