हे ज्ञान कुन्ज, हे दिव्य ज्योति, तुम अकिंचन मुझे न भुला देना।
ज्ञान का प्रकाश पुंज लिए, चिर ज्योति हमें दिखला देना।।
यह कर्म का बंधन है प्रबल, आगे नहीं बढ़ने पाता हूँ।
जितना मैं इससे विरक्त बनूँ, तो और भी कसता जाता हूँ।।
यदि बचाना चाहते हो, तो एक बार और “प्रखर” बुद्धि।
निश्चित है कि मैं अपने ही, पुरुषार्थ से निकल न सकूँगा।।
तुम संयम के अनूठे प्रहार लिए, कर्मों को जलाते आ जाना।
ज्ञान का प्रकाश पुंज लिए, बंधन से बाहर खींच देना।। हे०।।1।।
हे बाल ब्रह्मचारी मुनिवर जी, मैं स्तुति नहीं कर पाया हूँ।
तुम मोक्ष मारग साधक हुए, मैं अर्थ न समझ पाया हूँ।।
करुणानिधि के सागर में, नवनीत भरा पा न सका हे “सरलमूर्ति”।
पारसमणि भी रखा पास, अज्ञान से मैं उसे छू न सका।।
तो सम्यक् दर्शन का दर्पण देकर, सम्यक् ज्ञान चक्षु से दिखला देना।
सम्यक् चारित्र का दीप लिए, जीवन सार्थक बना देना।। हे०।।2।।
दर्शनसार के दर्श कुन्ज, ‘योगसार’ से योग न पाया।
समय सार से समय ज्ञान, ‘नियमसार’ से नियम न पाया।।
कर्मों की जलती मशालें लेकर, लो बना दस धर्म बाराती “सरलमूर्ति”।
बारह भावनाओं का हार बना के पहुँचो, मैं साथ आपके चल न सकूँगा।।
फिर भी बाराती मुझे चाहते, तो अपने अमिट पद चिन्ह बना देना।
मैं सिर पर पद रज रखकर आऊँगा, मुझे पहचान लो भुला न देना।। हे०।।3।।
मेरा कुछ काम बकाया, पूरा कर कर्तव्य निभाना है।
जन्म तो मेरा हुआ ही नहीं, बालापन भी अभी पाना है।।
अध्ययन पूरा ना कर सका है, जिनवाणी के ‘वरद’ पुत्र।
हो आभा की तेज स्याही से रोम-रोम में विद्यासागर लिख लूँगा।।
तुम अपनी वाणी अमृत जल से, स्याही निर्भीक बनाना।
मद माया मोह से लड़कर आऊँगा।
भाग्य चन्द को पद सेवक बनाना।। हे०।।4।।
रचनाकार: भाग्यचन्द जैन, हटा
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