समर्पण | Samarpan

पहले सच्ची श्रद्धा धारें, शंका भय आलस्य निवारें।
आतम हित की करें प्रतिज्ञा, समझे पालें श्री जिन आज्ञा।।

धर विवेक हम क्रिया सुधारें, सम्यक्‌ वस्तु स्वरूप विचारें ।
तन-मन-धन सब क्रिया करें समर्पण, धर्म हेतु जीवन हो अर्पण ।।

देव-गुरु हैं प्राण हमारे, मंगलोत्तम शरण सहारे।
सदा स्मरण करें इन्हीं का, सदा अनुकरण करें इन्हीं का।।

अन्तर्मुख हो समकित पायें, नित वैराग्य भावना भायें।
ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना, धर्म ध्वजा घर-घर फहराये।।

Artist: बाल ब्र. श्री रवीन्द्रजी ‘आत्मन्‌’
Source: बाल काव्य तरंगिणी