दिन रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊं,
देहांत के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ।।टेक।।
शत्रु अगर कोई हो, संतुष्ट उनको कर दूं,
समता का भाव धर कर, सबसे क्षमा कराऊं ।1।
त्यागूं आहार पानी, औषध विचार अवसर,
टूटे नियम न कोई, दृढ़ता हृदय में लाऊं ।2।
जागें नहीं कषाएं, नहीं वेदना सतावे,
तुमसे ही लौ लगी हो, दुर्ध्यान को भगाऊं ।3।
आत्म स्वरूप अथवा, आराधना विचारूं,
अरहंत सिद्ध साधू, रटना यही लगाऊं ।4।
धर्मात्मा निकट हों, चर्चा धर्म सुनावें,
वे सावधान रक्खें, गाफिल न होने पाऊं ।5।
जीने की हो न वांछा, मरने की हो न इच्छा,
परिवार मित्र जन से, मैं मोह को हटाऊं ।6।
भोगे जो भोग पहले, उनका न होवे सुमिरन,
मैं राज्य संपदा या, पद इंद्र का न चाहूं ।7।
रत्नत्रय का पालन, हो अंत में समाधि,
‘शिवराम’ प्रार्थना यह, जीवन सफल बनाऊं ।8।
रचयिता:- पं. शिवराम जी
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ४३९
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २९४