सलूना पर्व पूजन (कवि कुमरेश) | Saluna Parv Pujan (Kavi Kumaresh)

सलूना पर्व पूजन

रचयिता: कवि कुमरेश

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सलूना पर्व पूजन
श्री अकम्पनाचार्यादि सप्तशतमुनि पूजा

(चाल जोगीरासा)
पूज्य अकम्पन साधु-शिरोमणि सात-शतक मुनि ज्ञानी ।
आ हस्तिनापुरके काननमें हुए अचल दृढ़ ध्यानी ॥
दुखद सहा उपसर्ग भयानक सुन मानव घबराये ।
आत्म-साधनाके साधक वे, तनिक नहीं अकुलाये ॥
योगिराज श्री विष्णु त्याग तप, वात्सल्य-वश आये ।
किया दूर उपसर्ग, जगत-जन मुग्ध हुए हर्षाये ॥
सावन शुक्ला पन्द्रस पावन शुभ दिन था सुखदाता ।
पर्व सलूना हुआ पुण्य-प्रद यह गौरवमय गाथा ॥
शान्ति दया समताका जिनसे नव आदर्श मिला है ।
जिनका नाम लियेसे होती जागृत पुण्य-कला है ।
करूँ वन्दना उन गुरुपदकी वे गुण मैं भी पाऊँ ।
आह्वानन संस्थापन सन्निधि कर्ण करूँ हर्षाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिसमूह अत्र अव-
तर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः प्रति-
ष्ठापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ।

अथाष्टकम्

( गीता-छन्द )

मैं उर-सरोवरसे विमल जल भावका लेकर अहो ।
नत पाद-पद्मोंमें चढ़ाऊँ मृत्यु जनम जरा न हो ॥
श्रीगुरु अकम्पन आदि मुनिवर मुझे साहस शक्ति दें ।
पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता भक्ति दें ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यः जन्म जरा-मृत्यु-
विनाशनाय जलम् ।

सन्तोष मलयागिरीय चन्दन निराकुलता सरस ले ।
नत पाद-पद्मोंमें चढ़ाऊँ, विश्वताप नहीं जले ॥
श्रीगुरु अकम्पन आदि मुनिवर मुझे साहस शक्ति दें ।
पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता भक्ति दें ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यः संसारताप-
विनाशनाय चन्दनम् ।

तंदुल अखण्डित पूत आशाके नवीन सुहावने ।
नत पाद-पद्मोंमें चढ़ाऊँ दीनता क्षयता हने ॥
श्रीगुरु अकम्पन आदि मुनिवर मुझे साहस शक्ति दें ।
पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता भक्ति दें ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यः अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतम् ।

ले विविध विमल विचार सुन्दर सरस सुमन मनोहरे ।
नत पाद-पद्मोंमें चढ़ाऊँ कामकी बाधा हरे ॥
श्रीगुरु अकम्पन आदि मुनिवर मुझे साहस शक्ति दें ।
पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता भक्ति दें ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यः कामबाण-
विध्वंसनाय पुष्पम् ।

शुभ भक्ति घृतमें विनयके पकवान पावन मैं बना ।
नत पाद-पद्मोंमें चढ़ा मेटूँ क्षुधाकी यातना ॥
श्रीगुरु अकम्पन आदि मुनिवर मुझे साहस शक्ति दें।
पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता भक्ति दें ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यः क्षुधारोगविना-
शनाय नैवेद्यम् ।

उत्तम कपूर विवेकका ले आत्म-दीपकमें जला ।
कर आरती गुरुकी हटाऊँ मोह-तमकी यह बला ॥
श्रीगुरु अकम्पन आदि मुनिवर मुझे साहस शक्ति दें ।
पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता भक्ति दें ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यो मोहान्धकारवि-
नाशनाय दीपम् ।

ले त्याग-तपकी यह सुगन्धित धूप मैं खेऊँ अहो ।
गुरुचरण-करुणासे करमका कष्ट यह मुझको न हो ॥
श्रीगुरु अकम्पन आदि मुनिवर मुझे साहस शक्ति दें ।
पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता भक्ति दें ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यः अष्टकर्मविध्वं-
सनाय धूपम् ।

शुचि-साधनाके मधुरतम प्रिय सरस फल लेकर यहाँ ।
नत पाद-पद्मोंमें चढ़ाऊँ मुक्ति मैं पाऊँ यहाँ ॥
श्रीगुरु अकम्पन आदि मुनिवर मुझे साहस शक्ति दें ।
पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता भक्ति दें ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यो मोक्षफलप्राप्तये
फलम् ।

यह आठ द्रव्य अनूप श्रद्ध स्नेहसे पुलकित हृदय ।
नत पाद-पद्मोंमें चढ़ाऊँ भव-पारमें होऊँ अभय ॥
श्रीगुरु अकम्पन आदि मुनिवर मुझे साहस शक्ति दें ।
पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता भक्ति दें ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घम् ।

जय-माला

( सोरठा )

पूज्य अकम्पन आदि सात शतक साधक सुधी
यह उनकी जयमाल वे मुझको निज भक्ति दें ॥

(पद्धड़ी छन्द)

वे जीव दया पालें महान ,
वे पूर्ण अहिंसक ज्ञानवान् ।
उनके न रोष उनके न राग ,
वे करें साधना मोह त्याग ।
अप्रिय असत्य बोलें न वैन ,
मन वचन कायमें भेद है न ।
वे महा सत्य धारक ललाम ,
है उनके चरणोंमें प्रणाम ।
वे लें न कभी तृणजल अदत्त ,
उनके न धनादिकमें ममत्त ।
वे व्रत अचौर्य दृढ़ धरें सार ,
हैं उनको सादर नमस्कार ।
वे करें विषयकी नहीं चाह ।
उनके न हृदयमें काम-दाह ॥

वे शील सदा पालें महान,
कर मग्न रहें निज आत्मध्यान ।
सब छोड़ वसन भूषण निवास ,
माया ममता सनेह आस ।
वे धरें दिगम्बर वेष शान्त ,
होते न कभी विचलित न भ्रान्त ॥
नित रहें साधनामें सुलीन ,
वे सहें परीषह नित नवीन ।
वे करें तत्त्वपर नित विचार ,
है उनको सादर नमस्कार ॥
पंचेन्द्रिय दमन करें महान ,
वे सतत बढ़ावें आत्म-ज्ञान ।
संसार देह सब भोग त्याग ,
वे शिव-पथ साधें सतत जाग ॥
“कुमरेश” साधु वे हैं महान ,
उनसे पाये जग नित्य त्राण ।
मैं करूँ वन्दना बार बार ,
वे करें भवार्णव मुझे पार ॥
मुनिवर गुण-धारक पर-उपकारक,
भव-दुख-हारक सुख-कारी ।

वे करम नशायें सुगुण दिलायें,
मुक्ति मिलायें भय-हारी ॥
ॐ ह्रीं श्रीअकम्पनाचार्यादिसप्तशतमुनिभ्यो महार्घम् ॥
( सोरठा )
श्रद्धा भक्ति समेत जो जन यह पूजा करे ।
वह पाये निज ज्ञान, उसे न व्यापे जगत दुख ॥
इत्याशीर्वादः ।

श्री विष्णुकुमार महामुनि पूजा
( लावनी छन्द )
श्री योगी विष्णुकुमार बाल वैरागी ।
पाई वह पावन ऋद्धि विक्रिया जागी ॥
सुन मुनियोंपर उपसर्ग स्वयं अकुलाये ।
हस्तिनापुर वे वात्सल्य भरे हिय आये ॥
कर दिया दूर सब कष्ट साधना-बलसे ।
पा गये शान्ति सब साधु अग्निके झुलसे ॥
जन जनने जय-जयकार किया मन भाया ।
मुनियोंको दे आहार स्वयं भी पाया ॥
हैं वे मेरे आदर्श सर्वदा स्वामी ।
मैं उनकी पूजा करूँ बनूँ अनुगामी ॥
वे दें मुझमें यह शक्ति भक्ति प्रभु पाऊँ ।
मैं कर आतम कल्यान मुक्त हो जाऊँ ॥

ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये अत्र अवतर अवतर
संवौषट् इत्याह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः प्रतिष्ठापनम्
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्

(चाल जोगीरासा)

श्रद्धाकी वापीमें निर्मल, भावभक्ति जल लाऊँ।
जनम मरण मिट जायें मेरे इससे विनत चढ़ाऊँ॥
विष्णुकुमार मुनीश्वर वन्दू यति-रक्षा हित आये
यह वात्सल्य हृदयमें मेरे अभिनव ज्योति जगाये॥
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलम्।

मलयागिरि धीरजमे सुरभित समता चन्दन लाऊँ।
भव-भवकी आतप न हो यह इससे विनत चढ़ाऊँ॥
विष्णुकुमार मुनीश्वर वन्दू यति-रक्षा हित आये
यह वात्सल्य हृदयमें मेरे अभिनव ज्योति जगाये॥
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये संसारतापविनाशनाय चन्दनम्।

चन्द्रकिरन सम आशाओंके अक्षत सरस नवीने।
अक्षय पद मिल जाये मुझको गुरु सन्मुख धर दीने॥
विष्णुकुमार मुनीश्वर वन्दू यति-रक्षा हित आये।
यह वात्सल्य हृदयमें मेरे अभिनव ज्योति जगाये॥
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये अक्षयपदप्राप्तये अक्षतम्।

उर उपवनसे चाह सुमन चुन विविध मनोहर लाऊँ।
व्यथित करे नहिं काम वासना इससे विनत चढ़ाऊँ॥

विष्णुकुमार मुनीश्वर वन्दू यति-रक्षा हित आये ।
यह वात्सल्य हृदयमें मेरे अभिनव ज्योति जगाये ॥
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये कामबाणविनाशनाय पुष्पम् ।
नव नव व्रत मधुर रसीले मैं पकवान बनाऊँ ।
क्षुधा न बाधा यह दे पाये इससे विनत चढ़ाऊँ ॥
विष्णुकुमार मुनीश्वर वन्दू यति रक्षा हित आये ।
यह वात्सल्य हृदयमें मेरे अभिनव ज्योति जगाये ॥
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यम् ।
मैं मनका मणिमय दीपक ले ज्ञान-वर्तिका जारूँ ।
मोह-तिमिर मिट जाये मेरा गुरु सन्मुख उजियारूँ ॥
विष्णुकुमार मुनीश्वर वन्दू यति-रक्षा हित आये ।
यह वात्सल्य हृदयमें मेरे अभिनव ज्योति जगाये ॥
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये मोहतिमिरविनाशनाय दीपम् ।
ले विरागकी धूप सुगन्धित त्याग धूपायन खेऊँ ।
कर्म आठका ठाठ जलाऊँ गुरुके पद नित सेऊँ ॥
विष्णुकुमार मुनीश्वर वन्दू यति-रक्षा हित आये ।
यह वात्सल्य हृदयमें मेरे अभिनव ज्योति जगाये ॥
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये अष्टकर्महननाय धूपम् ।
पूजा सेवा दान और स्वाध्याय विमल फल लाऊँ ।
मोक्ष विमल फल मिले इसीसे विनत गुरू पद ध्याऊँ ॥

विष्णुकुमार मुनीश्वर वन्दू यति-रक्षा हित आये ।
यह वात्सल्य हृदयमें मेरे अभिनव ज्योति जगाये ॥
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये मोक्षफलप्राप्तये फलम् ।
यह उत्तम वसु द्रव्य संजोये हर्षित भक्ति बढ़ाऊं ।
मैं अनर्घपदको पाऊँ गुरुपदपर बलि जाऊँ ॥
विष्णुकुमार मुनीश्वर वन्दू यति-रक्षा हित आये ।
यह वात्सल्य हृदयमें मेरे अभिनव ज्योति जगाये ॥
ओं ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घम् ।
दोहा
श्रावण-शुक्ला पूर्णिमा यति-रक्षा दिन जान ।
रक्षक विष्णु मुनीशकी यह गुणमाल महान् ॥
जय-माला
पद्धड़ी छन्द
जय योगिराज श्रीविष्णु धीर,आकर वह हर दी साधु-पीर ।
हस्तिनापुर वे आये तुरन्त. कर दिया विपत्का शीघ्र अन्त ॥
वे ऋद्धि-सिद्धि-साधक महान् , वे दयावान वे ज्ञानवान ।
धर लिया स्वयं वामन सरूप, चल दिये विप्र बनकर अनूप ॥
पहुचे बलि नृपके राजद्वार, वे तेज-पुञ्ज धर्मावतार ।
आशीष दिया आनन्दरूप,होगया मुदित सुन शब्द भूप ॥

बोला वर मांगो विप्रराज, दूंगा मनवांछित द्रव्य आज ।
पग तीन भूमि याची दयाल, बस इतना ही तुम दो नृपाल।

नृप हँसा समझ उनको अजान,बोला यह क्या लो,और दान ।
इससे कुछ इच्छा नहीं शेष, बोले वे ये ही दो नरेश ॥

सकंल्प किया दे भूमि दान, ली वह मनमें अति मोद मान ।
प्रगटाई अपनी ऋद्धि सिद्धि, हो गई देहकी विपुल वृद्धि ॥

दो पगमें नापा जग समस्त, हो गया भूप बलि अस्त-व्यस्त ।
पग एक और दो भूमिदान, बोले बलिसे करुणानिधान ॥

नतमस्तक बलिने कहा अन्य, है भूमि न मुझपर हे अनन्य ।
रख लें पग मुझपर एक नाथ, मेरी हो जाये पूर्ण बात ॥

कह कर तथास्तु पग दिया आप,सह सका न बलि वह भार-ताप ।
बोला तुरन्त ही कर विलाप, करदें अब मुझको क्षमा आप ॥

मैं हूँ दोषी मैं हूँ अजान, मैंने अपराध किया महान ।
ये दुखित किये जो साधुसन्त, अब करो क्षमा हे दयावन्त ॥

तब की मुनिवरने दया-दृष्टि, हो उठी गगनसे मधुर वृष्टि ।
पागये दग्ध वे साधु-त्राण, जन-जनके पुलकित हुये प्राण ॥

घर घरमें छाया मोद-हास, उत्सवने पाया नव प्रकाश ।
पीड़ित मुनियोंका पूर्णमान,रख मधुर दिया आहार दान ॥

युग युग तक इसकी रहे याद, कर-सूत्र बंधाया साल्हाद ।
बन गया पर्व पावन महान, रक्षाबन्धन सुन्दर निधान ॥
वे विष्णु मुनीश्वर परम सन्त, उनकी गुण-गरिमाका न अन्त ।
वे करें शक्ति मुझको प्रदान; कुमरेश प्राप्त हो आत्मज्ञान ॥

घत्ता

श्री मुनि विज्ञानी आतम-ध्यानी ,
मुक्ति-निशानी सुख-दानी ।
भव-ताप विनाशे सुगुण प्रकाशे ।
उनकी करुणा कल्याणी ॥

ओं ह्रीं श्रीविष्णुकुमारमुनये महार्घम् ।

दोहा

विष्णुकुमार मुनीशको, जो पूजे धर प्रीत ।
वह पावे कुमरेश शिव, और जगतमें जीत ॥


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स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/60248।