सज्जन चित्त वल्लभ | Sajjan Chitta Vallabh

सज्जनचित्तवल्लभ : प्रस्तावना
– डॉ. योगेशचन्द्र जैन, अलीगंज

प्रस्तुत सज्जनचित्तवल्लभ २५ शार्दूलविक्रीडित छंदों में संस्कृत का एक अत्युत्तम लघुकाय मुनि उपदेश प्रधान ग्रन्थ है; यद्यपि इसमें कहीं-कहीं गृहस्थों को भी सम्बोधित करने की कृपा की गई है।

मुनि को सम्बोधित करते हुए दूसरे श्लोक में कहा है कि जिस प्रकार रात्रि की शोभा चन्द्रमा से, सरोवर की शोभा कमलों के समूह से, सभा की शोभा पण्डित से, गज की शोभा दन्त से, पुष्प की शोभा गन्ध से, स्त्री की शोभा पति से ही होती है, उसके बिना नहीं होती; उसी प्रकार मुनीश्वर की शोभा उसके सम्यक्चारित्र से ही होती है, उसके बिना नहीं होती, भले ही वह विशेष शास्त्रज्ञ हो।

अतः हे मुने ! तुम अपने चारित्र को निर्मल रखो तथा एकल-विहार कदापि मत करो, ग्राम के समीप मत रहो, नारियों से सम्पर्क और वचनालाप मत करो। अरे ! तुम्हारी परिग्रह-धनादिक की आकांक्षा तो निश्चित ही तुम्हारे हृदय में स्थित कुवासनाओं की ही प्रसिद्धि करती है। भिक्षा में जो कुछ रूखा-सूखा मिल जावे, उसी से सन्तुष्ट होकर उदर-पूर्ति करो और अपने यति नाम को सार्थक करो।

इसप्रकार विभिन्न श्लोकों में सचोट स्पष्ट विवेचन किया है।

प्रस्तुत ग्रन्थ का पठन करके यदि हम दिगम्बर निर्ग्रन्थ दशा धारण करने की प्रेरणा लेते हैं, तो हमारे लिए सार्थक होगा, इसके विपरीत यदि हम अन्य किसी के दोषों को देखने के लिए पढ़ेंगे तो हम अपनी कषाय की ही पुष्टि करेंगे, लाभ तो कुछ भी नहीं; क्योंकि जो पर के कषाय परिणामों को देखकर स्वयं कषाय करता है, तो वह भी कषायी नहीं तो और क्या है ?

मुनि प्रधान ग्रन्थों को पढ़ते हुए ऐसा चिन्तन होना चाहिए कि –

अहो ! में अनन्त बार मुनि बना। यदि उस दशा के पीछी-कमण्डल को एकत्र किया जावे तो सुमेरू जैसे पर्वतों के ढेर लग जावे। अतः अब मैं ऐसी शिथिलता से दूर रहकर इसो भव में नग्न दिगम्बर निर्धारग्रही भार्वालगो साधु बनकर अनन्त भवों का अभाव करने में समर्थ बनूं। ऐसी पवित्र दृढ़ भावना पूर्वक इस ग्रन्थ का स्वाध्याय करके आत्म कल्याण की दिशा में अग्रसर हो तो ग्रन्थ का सच्चा स्वाध्याय कहा जा सकता है।

आचार्य मल्लिषेण कृत सज्जनचित्तवल्लभ,
प्रस्तावना से साभार संगृहीत