सहजता रत्न | Sahajta ratn

(वीर छंद)
नमन कर लोकरत्न अरहंत, चन्द्रसम श्री सिद्ध भगवन्त ।
और आचार्यों का कर ध्यान, करें हम उपाध्याय गुणगान ।।
सर्व साधुजन रत्न अध्यात्म, करें नित आत्म का ही ध्यान ।
उन्हें लख सहज होंय सब योग, करें नित आत्म का ही भोग ।।

रत्न सम्पूर्ण जगत् में एक, प्राप्त हो जिससे सुख अविशेष ।
जिसे धर अपने में प्रभु पंच, वरें जो सुख साम्राज्य अनंत ।।
सहजता ऐसा अनुपम रत्न, रहे जो जीवन का आधार ।
करें हम आतम का नित ध्यान, सहजता है मुक्ति का द्वार ।।

सुखी जीवन का मूलाधार, नींव का पत्थर भी है यही ।
जान अर देख विचारो यही, द्रव्यदृष्टि का विषय भी यही ।।
सहजतारूपी अनुपम रत्न, जो भी खोजे पाते वे ही ।
अरे खोजा जिनने वे बने, प्रथम तो चलते-फिरते सिद्ध ।।

बताए भावों का फल क्या? अरे ये द्वादशांग वाणी ।
अरे पर से कुछ भी संबंध हमारा नहीं कदाचित भी ।‌।
विदाई की बेला आ गई, हुए संस्कार मुक्ति जागृत ।
सहजता की पगडंडी चढ़, वरें सब सिद्ध दशामय अंत ।।

(दोहा)
नमकर पंच परम प्रभु, अर आगममय रत्न।
चंद्रकांतीमय सहजता, करें सभी कर्म अंत।।

रचनाकार: सहज जैन (Sahaj Jain), छिंदवाड़ा
Instagram: @Sahaj.Jain2003