तर्ज : महा सुख होय, जिनपद पूजे शिव सुख होय…
परम इष्ट निज ज्ञायक भाव, शाश्वत शिव स्वरूप निजभाव।
यों लख जब अन्तर्मुख भयो, स्वयं-स्वयं में तृप्त सु भयो ।। 1।।
सर्व पाप नाशे दुखकार, प्रगटी प्रभुता अपरम्पार ।
ध्रुव मंगल लोकोत्तम सार, सहज शरण आतम अविकार।। 2।।
हुआ कृतार्थ दर्श से देव, जगी भक्ति अंतर स्वयमेव ।
जगा सहज आराधक भाव, निज पद आराधन का चाव।। 3।।
सारभूत प्रभु सहज पवित्र, अहो शुद्ध चिद्रूप सु नित्य ।
अपराजित नित ध्येय स्वरूप, परम ब्रह्म परमातम रूप।। 4।।
नित्य मुक्त आतम भगवान्, सर्व सम्पदाओं की खान ।
स्वयं सिद्ध प्रभु सहज प्रसिद्ध, सर्वोत्तम आराध्य विशुद्ध ।। 5।।
रही न चिन्ता चाह लगार, सहज जनावे जाननहार ।
वर्ते ध्यान सहज अभिराम, निज में ही पाऊँ विश्राम।। 6।।
जय अनन्त धर्मात्मक तत्त्व, चिदानंदमय अपना सत्व।
सर्व प्रकार सहज आराध्य, एक अभेद ही साधन साध्य।। 7।।
परमप्रभु अमृतमय जान, नाहिं आदि-मध्य अवसान ।
अद्भुत ललित विभव सम्पन्न, चित्प्रकाशमय पूर्ण प्रसन्न।। 8।।
सहज विमल महिमा सुखकार, निज प्रभु सर्व स्वस्ति दातार।
सिद्धालय ज्यों सिद्ध भगवन्त, त्यों अन्तर में ही विलसन्त।। ९।।
अनुभव माँहि प्रत्यक्ष दिखाय, हुई प्रतीति सहज सुखदाय।
हुआ निशल्य निरीह निराश, अपना सर्वस्व अपने पास।। 10।।
धनि-धनि तीर्थनाथ भगवंत, धनि-धनि आत्म-अनुभवी संत ।
मार्ग यथानुभूत सुखकार, दर्शायो जग में अविकार।। 11।।
रहो नाथ आदर्श स्वरूप, मैं भी आराधूँ निज रूप।
मग्न हुआ चैतन्य ऋद्धि पाय, बाह्य ऋद्धियाँ कुछ न सुहाय।। 12।।
कब वह धन्य घड़ी प्रभु आय, यथाजात तन रूप रहाय।
हो निर्ग्रन्थ सहज पद ध्याय, निज अक्षय प्रभुता विलसाय।। 13।।
ध्रुव शुद्धातम स्वस्ति रूप, हो आराधन स्वस्ति रूप।
नाथ निरंजन स्वस्ति रूप, निर्विकल्प रहूँ स्वस्ति रूप।। 14।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह