तर्ज : प्रेम भाव हो सब जीवों से…
पर की आस धरे क्यों मूरख, व्यर्थ जगत् में भ्रमता है।
कार्य किसी का कभी न कोई, अरे ! दूसरा करता है।।1।।
अपना सुख-दुःख स्वयं ही भोगे, जीव सदा ही इकला है।
साथी कोई न भव में भी है, मुक्ति माँहि भी इकला है।।2।।
द्रव्य-क्षेत्र अरु काल भाव तो न्यारे-न्यारे सबके हैं।
हो संयोग भले ही चाहे, निज-निज रूप न तजते हैं।।3।।
निमित्त-नैमित्तिक बने सहज, पर कर्त्ता-कर्म न बनता है।
शक्ति स्वयं में व्यक्त स्वयं हो, कोई न कर्त्ता-हर्त्ता है ।। 4 ।।
झूठे हैं संकल्प-विकल्प, अरु झूठी पर की ममता है।
भेद-विज्ञान करो अंतर में, धारो सुखमय समता है।। 5।।
संयोगों की सर्व व्यवस्था, जानो उदयाधीन है।
अन्तर्मुख हो आतम अनुभव, करो सुख स्वाधीन है ।। 6।।
देखो कैसे उपसर्गों में, समता धरि निज ध्यान किया।
उन संतों ने सहज निरंजन, अविनाशी पद प्राप्त किया।। 7 ।।
उनके जीवन से शिक्षा ले, हर्षित हो कल्याण करो।
उदासीन हो पर भावों से, धीर-वीर-गम्भीर बनो।। 8 ।।
जीवन सफल हुआ उन ही का, जिन रत्नत्रय प्राप्त किया।
पंच परावर्तन से छूटे, अचल सिद्ध पद प्राप्त किया।। ९।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: Safal Jivan