साधुओं में बढ़ता शिथिलाचार और हमारा कर्तव्य
-प्रो. वीरसागर जैन
दिगम्बर जैन साधु तो बहुत ही उच्च कोटि की अवस्था है, परन्तु खेद है कि आजकल उनमें भी शिथिलाचार आ रहा है और कभी कभी तो ऐसे समाचार मिलते हैं कि चित्त अत्यधिक व्याकुल हो जाता है | समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए | समाज के सभी लोग अत्यधिक चिंतित एवं दुःखी हैं | मुनिधर्म का ऐसा पतन उनसे देखा नहीं जा रहा है | वे जानना चाहते हैं कि ऐसी स्थिति में आखिर किया क्या जाए ? क्या इसका कुछ समाधान है ? अतः यहाँ मैं अपने कुछ सुझाव हृदय की पवित्रता से बहुत ही संक्षेप में प्रकट कर रहा हूँ | आशा है समाज के सभी लोग इन पर गम्भीरतापूर्वक चिन्तन करेंगे | मुझे विश्वास है कि इन पर ध्यान देने से साधु एवं श्रावक सबका परम हित होगा | यथा-
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पहली बात तो हम बहुत अधिक दुःखी और चिन्ताग्रस्त न हों | दुःख, चिंता, विषाद आदि हर हालत में त्याज्य होते हैं, क्योंकि इनसे घोर असाता वेदनीय आदि कर्मों का आस्रव-बन्ध होता है | दुःखी होने से समस्या का समाधान भी नहीं होता और अपनी ऊर्जा बहुत बर्बाद होती है | अतः अपनी तरफ से हम प्रयास तो खूब करते रहें, परन्तु बहुत अधिक दुःखी और चिन्ताग्रस्त न हों | इसे कलिकाल का प्रभाव जानकर अपने अन्तरंग में शान्ति भी धारण किये रहें | यह दुर्लभ मनुष्य भव हमें अपने आत्मकल्याण के लिए मिला है | हम किसे सुधारेंगे ? कौन किसे सुधार सकता है ? (‘आदहिदं कादव्वं’/‘अरे सुधारक जगत् के चिंता मत कर यार, तेरा मन ही जगत् है पहले इसे सुधार’)
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शिथिलाचार को मिटाने के लिए जो उचित प्रयास हमें करने चाहिए, उनमें से एक तो सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि हमें स्वयं भी आगम के आलोक में मुनिदशा का स्वरूप भलीभांति समझना चाहिए और दूसरों को भी भलीभांति समझाना चाहिए | यह अत्यंत आवश्यक कार्य है, क्योंकि समस्या का मूल कारण अज्ञान है | अज्ञान दूर किये बिना शिथिलाचार को समाप्त करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती | जितना भी शिथिलाचार समाप्त होगा, इसी से होगा | अतः हमें स्थान-स्थान पर मुनियों के स्वरूप पर गोष्ठियां करनी चाहिए | तथा इन गोष्ठियों में किसी व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी किये बिना शास्त्रीय पद्धति से निष्पक्ष चर्चा करनी चाहिए | इनसे जन-जागरण का महान् कार्य होगा और शिथिलाचार पर सहज ही अंकुश लग जाएगा | साधु के शिथिलाचार में आज श्रावक भी उन्हें अनुचित वस्तुएं प्रदान करके महा दोष के भागी बने हुए हैं, अतः जब उन्हें भी सम्यक् ज्ञान होगा तो सहज ही उसका परिणाम बहुत अच्छा आएगा |
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हम सबको भलीभांति समझना चाहिए कि दिगम्बर साधु बनना आसान नहीं है, खासकर आज की विषम परिस्थितियों में; अतः इस विषय में जल्दबाजी करना उचित नहीं है | मन तो करेगा, लोग भी बहुत उकसाएँगे, परन्तु हमें अपनी योग्यता का गहराई से विचार करके ही निर्णय करना होगा, अन्यथा बहुत पश्चात्ताप हो सकता है | यदि हमारा कोई साधर्मी भाई भी इस विषय में जल्दबाजी कर रहा हो तो उसे भी सावधान करना चाहिए | यद्यपि यहाँ ऐसी बात कहते हुए मुझे बहुत संकोच हो रहा है, किन्तु वर्तमान परिस्थितियां अच्छी नहीं हैं और आगे आनेवाले दिनों में तो और भी खराब हो जाएंगी-ऐसा लगता है | 4. वर्तमान में बढ़ते हुए शिथिलाचार को देखते हुए अब एक नियम यह बना देना चाहिए कि किसी को भी सीधी मुनिदीक्षा नहीं दी जाएगी, उसे पहली-दूसरी-तीसरी आदि प्रतिमाओं के क्रम से अभ्यास करते हुए ही आगे बढना होगा। हाँ, एक सल्लेखना-काल इसका अपवाद हो सकता है।
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जो लोग दिगम्बर मुनिदीक्षा ले चुके हैं, उन्हें बहुत ही सावधानीपूर्वक इस परम धर्म का निर्वाह करना चाहिए। हो सके तो उन्हें किन्हीं उत्तम तीर्थस्थानों पर जाकर ज्ञान-ध्यानपूर्वक आत्मसाधना करनी चाहिए, महानगरों में कंचन-कामिनी के बीच नहीं रहना चाहिए। तथा एक बात और अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि यदि इस महान् मुनिव्रत का निर्वाह स्वयं से कथमपि नहीं हो रहा हो तो इसे निःसंकोच छोड़ देना चाहिए। इसी में हित है। जबरदस्ती अपने परिणाम खराब करते रहना और इस ऊँचे मुनि पद में ही नीचा कार्य करना उचित नहीं है। बाद में जब परिणाम अच्छे हो जाएँ तो पुनः दीक्षा ली जा सकती है।
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साधुओं को छोटे-छोटे शिथिलाचार न छूटें तब भी बड़े-बड़े शिथिलाचार तो अवश्य ही छोड़ देना चाहिए। जैसे- एकांत में स्त्री से वार्ता करना, उसे छूना, धनादि परिग्रह को रखना, उसका स्वयं लेन-देन करना, आदि। ये भयंकर अपराध हैं जो जन्म-जन्मान्तर खराब कर देंगे। साधुओं को सभी आगन्तुकों से भी सदा ज्ञान-ध्यान की ही बात करनी चाहिए, सांसारिक बातें नहीं करनी चाहिए।
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कुछ लोग कहते हैं कि हमें शिथिलाचारी साधुओं को आहार, आवास आदि भी नहीं देना चाहिए, उनके पास ही नहीं जाना चाहिए और उनकी स्पष्ट शब्दों में खुले आम निंदा-आलोचना करनी चाहिए। यह बात एक अपेक्षा से ठीक हो सकती है, परन्तु मुझे सर्वथा उचित नहीं लगती। वे लोग हमारे साधर्मी भाई हैं। उनके प्रति वात्सल्य भाव रखकर स्थितीकरण का भाव रखना हमारा कर्तव्य है। समस्या सुलझेगी तो इसी से सुलझेगी, अन्यथा दूरी बढ़ाने से तो समस्या के सुलझने की सम्भावना ही समाप्त हो जाएगी। हाँ, जो मुनि बहुत ही कलुषित परिणाम के हैं, उनसे दूर रहना चाहिए। परन्तु मेरा अनुभव है कि आज भी अधिकांश मुनि अच्छे मन के हैं, मुमुक्षु हैं, जिज्ञासु भी हैं और स्वयं में परिष्कार के सच्चे अभिलाषी भी हैं, परन्तु उन्हें न तो कुछ स्वयं समझ में आ रहा है और न ही कोई अन्य व्यक्ति उन्हें अच्छी तरह समझाने वाला है, इसलिए वे जैसा समझ में आ रहा है, वैसा कर रहे हैं। उन्होंने घर-परिवार आदि छोड़ा तो आत्मकल्याण की विशुद्ध भावना से ही था, परन्तु ठोस तत्त्वज्ञान न होने से बात बनी नहीं। अतः हमें उनके पास अवश्य उठना-बैठना चाहिए और उनकी साधना में सहयोग देना चाहिए, उनसे गहरी तत्त्वचर्चा करनी चाहिए। उनके साथ बहुत अधिक स्वाध्याय करना चाहिए। परन्तु ध्यान रहे कि हमें उनके शिथिलाचार का किंचित् भी पोषण नहीं करना है, अपितु शालीनता से उनको उससे बचाने का विशुद्ध प्रयास करना है। यह भी समझना है कि आज भी इन साधुओं का जैन संस्कृति की रक्षा-सुरक्षा में बहुत बड़ा योगदान है।
अन्त में एक बार पुनः साधु और श्रावक सभी के परम हित की मंगल कामना करता हुआ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ। जैनं जयतु शासनम्।
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