सच्ची-माता | Sachchi-Maata

लौकिक माताएँ तो शरीर से ही राग करें,
पंचेन्द्रिय भोगों की रुचि सिखलाती हैं।
नग्न हुआ पैदा तो भी वस्त्रों का आवरण,
झूठ-चोरी औ कुशील पाप ही बढ़ाती है।।1।।

अनादि से अनुभूत काम-भोग बंध दुःख,
फिर भी उन्हीं में मूढ़ जीव को फँसाती हैं।
कभी बहुमान अरु सेवा से प्रसन्न होय,
भव वृद्धि रूप अभिप्राय को सुनाती हैं।।2।।

सीख बिना सीख रहे विषयों की केलि जीव,
इन विषयों में आचार्यत्व दिखलाती हैं।
तो भी तुष्ट नहीं होय, मानव से पशु करें,
कामिनी से नाता जोड़, हर्ष को मनाती हैं।।3।।

चार पैर होने पर छह की अभिलाषा करें,
पौत्र हेतु नाना भाँति मनौती मनाती हैं।
धर्म त्याग संयम बुढ़ापे में करन योग,
ऐसे कहि संयम से गिरे को गिराती हैं।।4।।

क्या कहें अधिक ये तो मोह में अचेत करें,
एक जिनवाणी माँ ही बंध से छुड़ाती है।
सम्यक्त्व की ज्योति जगा, मोह अंधकार भगा,
सच्चे सुख का सभी को मारग जताती है।।5।।

पंच पाप, सात व्यसन, नरक, निगोद द्वार,
स्वर्ग सुख दुःख रूप उनसे बचाती है।
अतीन्द्रिय निराकुल अनन्त अव्याबाध सुख,
आत्मा में आत्मा से मिले सिखलाती है।। 6।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

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