सच्ची भक्ति नहीं कीर्तन पूजनादि से होती है।
दीप जलाने, धूप चढ़ाने पर भी विशुद्धि सोती है।। 1।।
कर जोड़ो, माथा पटको, या पड़े रहो तुम मंदिर में।
भगवान्-भक्त का ज्ञान नहीं, तो शान्ति न होगी अन्दर में ।। 2 ।।
सर्वप्रथम देव-शास्त्र-गुरु का रूप जानकर ज्ञानी से।
दृढ़ श्रद्धा, परिणाम शुद्ध कर, वैसा गाओ वाणी से।। 3।।
भगवत्-गुण गाते-गाते, वैराग्य भावना मन में हो।
गाने का राग छूट जावे, अरु पुनः ध्यान में तन्मय हो ।। 4 ।।
प्रभु सम ही रूप विचारें निज, पर्याय दोष को गौण करें।
प्रभु से भी दृष्टि हटा करके, उन सम ही जाननहार रहें।।5।।
भेद रूप भक्ति का राग मिटे, निज रूप स्वयं भगवान् दिखे।
साधक से साध्य अवस्था हो, रागादि अठारह दोष नशे।।6।।
भगवान् स्वयं ही बनने का, जो यह सम्यक् पुरुषार्थ अरे।
है ज्ञान रूप सच्ची भक्ति, भक्तों को जग से पार करे।।7।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह