आप जैसे प्रभु ही सच्चे हैं देव
समयसार प्रभु ही सच्चे हैं देव
मिलते हैं उनको जिनका पुण्य हो तेज
आप जैसे प्रभु ही सच्चे हैं देव ----2
वीतरागता का जिनको रंग चढ़ा है
किंचित परिग्रह नहीं संग खड़ा है
समस्त लोकों को जानकर भी,
निज लोक में ही ध्यान लगा है
अनंत सुख भंडार भोगने को
अनंत वीर्य सामर्थ्य मिला है
है उपकारी तीर्थ प्रणेता ,
जिन शासन के अधिकृत गणेशा
झुकता है माथ जिनके आगे स्वयमेव
आप जैसे प्रभु ही सच्चे हैं देव—2।। 1।।
आपके वचन ही प्रामाणिक हैं,
युक्ति शास्त्र से अविरोधी हैं,
स्याद्वाद चिह्न की मोहर लगी है
अनेकांत की ध्वजा फहरी है,
अज्ञान रागादि दूषण रहित हैं,
'सत्यमेव जयते' के द्योतक हैं
तीर्थंकर विरह भुलावन हारे
वस्तु स्वरूप बतावन हारे
दिखाते हैं जो मुक्ति मार्ग सदैव
आप जैसे प्रभु ही सच्चे हैं देव —2।।2।।
अब न रहा मैं दीन-हीन, पामर,
मैं भी प्रभु-सम भगवान ही हूँ
नव तत्त्वों में छुपा हुआ मैं
ज्ञानज्योति वैभववान हूँ मैं
स्व-पर समय का स्वरूप बताया
जिन शासन का मर्म सिखाया
हेय-उपादेय तत्त्व बताकर
भेद ज्ञान का मंत्र सीखाकर
अपने सम ही बना लिया प्रभु आपने
अंतर भेद मिटा दिया प्रभु आपने
आप जैसे प्रभु ही सच्चे हैं देव
समयसार प्रभु ही सच्चे हैं देव —2।।3।।
मिलते हैं उनको जिनका पुण्य हो तेज
मिलते हैं उनको जिनकी श्रद्धा हो नेक
छवि दिखती है उनमें जो हैं रत्नत्रय सेव
ध्याते हैं वे जिनका पुरुषार्थ तेज
आप जैसे प्रभु ही सच्चे हैं देव ------2
रचनाकार: स्वयंप्रभा जैन (Swayamprabha Jain), भिंड