दीप सम्यक्त्व जब परिणति में जले।
सच्ची दीपावली तेरी तब ही मने।। टेक।।
ज्ञान से ज्ञानमय ज्ञान को जानकर,
ज्ञानमय परिणति सच्चिदानन्दमय ।
बाह्य दीपक से अन्दर उजाला न हो,
ज्ञान दीपक से चेतन भवन जगमगे।। 1।।
निज के वैभव का स्वयमेव प्रकाश हो,
मोह का अंधकार सुक्षण में भगे।
आशा तृष्णा का हो जाये निर्वाण शुभ,
ज्ञानमय तप से अंतर का शोधन बने।। 2।।
कालिमा सब विकारों की तत्क्षण मिटे,
स्वर्ण पाषाण तब शुद्ध सोना बने।
दृष्टा-ज्ञाता रहे लोक-अलोक का,
किन्तु उपयोग तो निज में तन्मय सने ।। 3।।
तेल बत्ती से जो दीप जलता अरे,
कालिमा उगले वायु से वह जगमगे।
दीप मणि जैसे शाश्वत प्रकाशित रहे,
ना घटे, ना बढ़े कालिमा ना वमे ।। 4।।
ठीक वैसे ही जो ज्ञान परलक्षी है,
है अथिर वह तो रागादि पैदा करे।
ज्ञान होता प्रतिष्ठित है जब ज्ञान में,
फिर वह शाश्वत सुखी रूप निज का बने ।।5।।
कीना अब तक उजाला अरे बाह्य में,
आत्मा का खजाना निहारा नहीं।
होवे त्रैलोक्य का नाथ उस ही समय,
स्व में तन्मय हो उपयोग जिस क्षण रमे ।।6।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह