सभी शास्त्रों में मिलता है स्याद्वाद | Sabhi Shastron Men Milata Hai Syadvad

सभी शास्त्रों में मिलता है स्याद्वाद

-प्रो. वीरसागर जैन

जैनदर्शन के स्याद्वाद सिद्धांत का सबसे अधिक दुर्गम पक्ष है- एक ही वस्तु में परस्पर विरुद्ध दो धर्मों के अस्तित्व की स्वीकृति | इसी पर लोगों को सर्वाधिक आपत्ति होती है | यही पक्ष लोगों के गले नहीं उतरता | परन्तु जरा ध्यान से देखा जाए तो यह बात बिलकुल कठिन नहीं है, असम्भव तो है ही नहीं, क्योंकि उनमें अपेक्षाभेद है | जैनाचार्यों ने एक ही वस्तु में परस्पर विरुद्ध दो धर्मों का अस्तित्व एक ही अपेक्षा से नहीं स्वीकार किया है, अपितु उनमें अपेक्षा-भेद बताया है, इसलिए इसमें कहीं कोई आपत्ति नहीं आती | दर्शनशास्त्र में ही नहीं, भारतीय विविध विद्याओं के सभी शास्त्रों में अपेक्षाभेद से परस्पर विरुद्ध धर्मों का एकत्र अस्तित्व स्वीकार किया गया है, जिससे सारा जगत् सुपरिचित भी है | यथा -

  1. ज्योतिषशास्त्र में एक ही तिथि को (नक्षत्र, वार आदि को भी) एक अपेक्षा से शुभ भी कहा है और अन्य अपेक्षा से अशुभ भी |
  2. गणितशास्त्र में एक ही संख्या/मान को एक अपेक्षा से कम भी कहा है और अन्य अपेक्षा से अधिक भी; एक ही रेखा को छोटी भी कहा है और बड़ी भी |
  3. भूगोल में एक ही स्थान को एक अपेक्षा से दूर भी कहा है और अन्य अपेक्षा से पास भी; पूर्व में भी कहा है और पश्चिम में भी, उत्तर में भी कहा है और दक्षिण में भी |
  4. भौतिकशास्त्र में एक ही वस्तु को एक अपेक्षा से ठोस कहा है और अन्य अपेक्षा से द्रव भी; आकर्षक भी कहा है और विकर्षक भी; सूक्ष्म भी कहा है और स्थूल भी |
  5. पाकशास्त्र में एक ही वस्तु को एक अपेक्षा से भक्ष्य/हितकारी भी कहा है और अन्य अपेक्षा से अभक्ष्य/अहितकारी भी; एक ही खीर मीठी भी है और फीकी भी |
  6. साहित्य में एक ही कहानी को काल्पनिक और यथार्थ दोनों माना जाता है; पात्रों के नाम-ग्राम आदि काल्पनिक होते हैं, परन्तु अन्य सारा चित्रण यथार्थ होता है |
  7. संगीतशास्त्र में एक ही स्वर को उच्च भी कहा है और निम्न भी |
  8. आयुर्वेद में एक ही वस्तु को औषध भी कहा है और विष भी |
  9. छंदशास्त्र में एक ही छंद के प्रयोग को गुण भी कहा है और दोष भी |
  10. न्यायशास्त्र में एक ही साधन को हेतु भी कहा है और हेत्वाभास भी |
  11. नीतिशास्त्र के अनुसार एक ही व्यक्ति शत्रु भी है और मित्र भी; योग्य भी है और अयोग्य भी |
  12. राजनीतिशास्त्र के अनुसार विरोधी दल का सदस्य सरकार का विरोधी भी है और सहयोगी भी |
  13. नाट्यशास्त्र के अनुसार राम का अभिनय करनेवाला व्यक्ति राम है भी और नहीं भी |
  14. चित्रकला के अनुसार चित्रित मयूरादि मयूरादि हैं भी और नहीं भी |
  15. व्याकरण के अनुसार एक ही वर्ण समान भी है और असमान भी |

इसीप्रकार अन्यत्र भी स्वयं समझ लेना चाहिए | सभी शास्त्र अपेक्षाभेद से विरोधी धर्मों का एकत्र अवस्थान मानते हैं और उसी से उनकी सार्थकता भी सिद्ध होती है, उसके बिना नहीं होती | जैनदर्शन का स्याद्वाद सिद्धांत भी इसी बात को गहराई से स्पष्ट करता है, अतः वहाँ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है ।