तर्ज : परम उपकारी जिनवाणी…
अरे संसार में कोई, नहीं अपना दिखाता है।
जिसे हम मानते अपना, वही नहीं काम आता है।। 1।।
स्वार्थ का राज्य यहाँ पर है, फँसे इसमें सभी प्राणी।
मोह ही क्लेश का कारण, समझ में आज आता है।। 2।।
यदि कुछ पास में धन है, सगे तब चार होते हैं।
विनश्वर धन के जाने पर, नहिं कोई मुँह दिखाता है।। 3 ।।
मतलबी मात सुत सब ही भाई भी आसरा चाहते।
बिना स्वारथ के इस जग में नहीं कोई निभाता है ।। 4।।
सभी कहते हैं मेरा है, आय मित्रों ने घेरा है।
विपत्ति के समय में, मित्र भी छोड़ जाता है।। 5।।
यही संसार का सुख है, बाद में दुख का कारण है।
लीन अपने में तुम होवो, यही सब सुख का दाता है ।। 6 ।।
विषमता है दुखों का घर, सुख समता से होता है।
सहज निज के ही आश्रय से, क्लेश सब दूर होता है।। 7 ।।
पराश्रय छोड़कर आत्मन् ! शीघ्र निज रूप पहिचानो।
स्वरुचि, अनुभूति, थिरता से, सिद्धपद प्राप्त होता है ।। 8 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: Sansarik Sambandh