रात्रिभोजन-निषेध
-प्रो. वीरसागर जैन
रात्रिभोजन-निषेध केवल जैन धर्म की क्रिया नहीं है, अपितु सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति का ही एक उत्कृष्ट जीवनमूल्य है, जैसा कि नीचे दिए जा रहे अनेक उद्धरणों से सिद्ध होता है, अतः सभी लोगों को इसका पालन करना चाहिए, इससे न केवल व्यक्ति की, हमारे सम्पूर्ण देश की सर्वांगीण उन्नति हो सकती है, हम सहज ही एक सुन्दर राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं ।
रात्रिभोजन-निषेध को बहुत-से लोग केवल जैन धर्म की क्रिया मानते हैं, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । रात्रिभोजन-निषेध की प्रेरणा केवल जैन ग्रन्थों में ही नहीं दी गई है, अपितु वैदिक ग्रन्थों में भी बारम्बार दृढ़तापूर्वक दी गई है । अतः इसे जैनों तक सीमित करना उचित नहीं है ।
जैन और वैदिक ग्रन्थ ही नहीं, वर्तमान में तो आधुनिक विज्ञान भी रात्रिभोजन को अत्यन्त हानिकारक सिद्ध कर रहा है, उसके अनेकानेक अनुसन्धान सिद्ध कर चुके हैं कि रात्रिभोजन के कारण ही आज सैकड़ों बीमारियाँ हो रही हैं और मानव-जीवन में अन्य भी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं, इत्यादि ।
समाजशास्त्र आदि अन्य विषयों के शोधार्थियों ने भी रात्रिभोजन को अनेक दृष्टियों से हानिकारक सिद्ध किया है । उनके अनुसार रात्रिभोजन से मनुष्य का स्वास्थ्य तो खराब होता ही है, अन्य भी अनेक हानियाँ होती हैं । मनुष्य का पारिवारिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन भी समृद्ध नहीं हो पाता है; क्योंकि उनका भी इससे बहुत गहरा सम्बन्ध है ।
इसप्रकार रात्रिभोजन एक बहुत बड़ी बुराई सिद्ध होती है, जीवन की मूलभूत बुराई सिद्ध होती है, राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में एक बहुत बड़ी बाधा सिद्ध होती है; परन्तु खेद है कि आजकल रात्रिभोजन बहुत अधिक बढ़ता जा रहा है और सरकार आदि का भी इसकी ओर कोई ध्यान नहीं है ।
जबकि हमारा मानना है कि यदि एक इसी की ओर गम्भीरता से ध्यान दिया जाए तो राष्ट्र का शीघ्र ही बड़ा हित हो सकता है । हम नहीं कहते कि सरकार रात्रिभोजन पर प्रतिबन्ध लगाए, परन्तु इसकी अपील तो राष्ट्रहित हेतु कर ही सकती है ।
प्रस्तुत निबन्ध में हम रात्रिभोजन-निषेध के सम्बन्ध में अनेक ग्रन्थों से कतिपय प्रमुख उद्धरण संकलित करके प्रस्तुत कर रहे हैं । आशा है सभी लोग इन पर गम्भीरतापूर्वक चिन्तन करेंगे ।
जैन ग्रन्थों में रात्रिभोजन-निषेध
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षट्खंडागम की टीका ‘धवला’, पुस्तक 12, पृष्ठ 1283 पर कहा गया है कि- ‘मद्य, मांस, मधु, पञ्च उदुम्बर फल, रात्रिभोजन और असमय भोजन आदि ज्ञानावरणी कर्म बन्ध के कारण हैं ।’
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वसुनन्दि-श्रावकाचार, गाथा 314 में कहा गया है कि-
एयारेसु पढम वि जदो णिसिभोयण कुणंतस्स ।
ठाणं ण ठाइ तम्हा णिसिभुत्ति परिहरे णियमा ।। -
लाटी संहिता, प्रथम अधिकार, श्लोक 45 में कहा गया है कि-
अस्ति तत्र कुलाचारः सैष नाम्ना कुलक्रिया ।
तां विना दर्शनिको न स्यान्न स्यान्नामतस्तथा ।।
अर्थ- रात्रि में भोजन करने वाले मनुष्य के ग्यारह प्रतिमाओं में से पहली प्रतिमा भी नहीं ठहरती, इसलिए नियम से रात्रिभोजन का परिहार करना चाहिए।
- कार्तिकेयानुप्रेक्षा, गाथा 82 में कहा गया है कि-
जो णिसिभुत्तिं वज्जदि सो उववासं करेदि छम्मासं।
संवच्छरस्स मज्झे आरंभं चयदि रयणीए ।।
अर्थ- जो पुरुष रात्रिभोजन छोड़ देता है वह वर्ष में 6 माह का उपवास कर रहा है-ऐसा जानना चाहिए, क्योंकि रात्रिभोजन-त्याग से आरंभ आदि पाप को देने वाली क्रियाएँ 12 घंटे नहीं होती हैं।
- अमितगति-श्रावकाचार, पंचम अधिकार, श्लोक 40 से 42 में कहा गया है कि-
यत्र राक्षसपिशाचसंचरो यत्र जन्तुनिवहो न दृश्यते।
यत्र मुक्तमपि वस्तु भक्ष्यते यत्र घोरतिमिरं विजृम्भते॥
यत्र नास्ति यतिवर्गसंगमो यत्र नास्ति गुरुदेवपूजनम्।
यत्र संयमविनाशिभोजनं यत्र संसजति जीवभक्षणम्॥
यत्र सर्वशुभकर्मवर्जनं यत्र नास्ति गमनागमक्रिया।
तत्र दोषनिलये दिनात्यये धर्मकर्मकुशला न भुंजंते॥’
अर्थ- जिस रात्रि में राक्षस, भूत, पिशाचों का संचार होता है, जिससे सूक्ष्म जन्तुओं का समूह दिखाई नहीं देता है, जिसमें स्पष्ट न दिखने से त्यागी हुई वस्तु भी खा ली जाती है, जिसमें घोर अन्धकार फैलता है, जिसमें साधु वर्ग का संगम नहीं है, जिसमें देव और गुरु की पूजा नहीं की जाती है, जिसमें खाया गया भोजन संयम का विनाशक है, जिसमें जिंदा जीवों के भी खाने की सम्भावना रहती है, जिसमें सभी शुभ कार्यों का अभाव रहता है, जिसमें संयमी पुरुष गमनागमन क्रिया भी नहीं करते हैं, ऐसे महादोषों के आलयभूत दिन के अभाव स्वरूप रात्रि के समय धर्म कार्यों में कुशल पुरुष भोजन नहीं करते हैं।
- अमितगति-श्रावकाचार, पंचम अधिकार, श्लोक 67 में भी कहा गया है कि-
रात्रिभोजनविमोचिनां गुणा ये भवन्ति भवभागिनां परे।
तानपास्य जिननाथमीशते वक्तुमत्र न परे जगत्त्रये ॥
अर्थ- रात्रिभोजन का परित्याग करने वाले जीवों के जिन महान् गुणों की प्राप्ति परभव में होती है, उसे कहने के लिए तीन जगत् में एक केवलज्ञानी को छोड़कर और कोई समर्थ नहीं है।
- पुरुषार्थसिद्धयुपाय, श्लोक 129, 134 में कहा गया है कि-
“जो जीवों पर दया युक्त चित्त वाला होता हुआ रात्रि में अन्न, पान, लड्डू, पेड़ा आदि खाद्य, रेवड़ी आदि चाटने वाले पदार्थ, दूध, पानी आदि पीने वाले, सौंफ, इलायची आदि खाद्य पदार्थों को नहीं खाता वह रात्रिभोजन-त्याग नामक प्रतिभा का धारी है।”
- अन्यत्र भी कहीं (क्षमा करें सन्दर्भ नोट करना भूल गया) कहा गया है कि-
“रात्रिभोजन का त्याग अवश्य करना चाहिए। अत्याग भाव एवं रागादि कषाय भावों के उदय की उत्कृष्टता (तीव्रता) से रात्रिभोजन करने की इच्छा होती है। रात्रिभोजन करना, बनाना एवं बनवाना द्रव्य हिंसा का उल्लंघन करके नहीं हो सकता है। रात-दिन आहार करने वालों के भोजन अति तीव्र रागरूप होने से निश्चय ही हिंसा है। जो मन, वचन, काय से रात्रिभोजन-त्याग देते हैं, वे निरन्तर अहिंसा का पालन करते हैं।"
वैदिक ग्रन्थों में रात्रिभोजन-निषेध
- पद्मपुराण में कहा गया है कि-
मद्यमांसाशन रात्रौ भोजनं कन्दभक्षणम्।
ये कुर्वन्ति वृथा तेषां तीर्थयात्राजपस्तपः।।
वृथा एकादशी प्रोक्ता वृथा जागरणं हरेः।
वृथा च पौष्करी यात्रा कृत्स्त्रं चान्द्रायणं तथा।
अर्थ- अर्थात् जो मद्य पीते हैं मांस भक्षण करते हैं, रात्रि के समय भोजन करते हैं, कन्द भक्षण करते हैं, उनका जप करना, तप करना, एकादशी व्रत करना, जागरण करके विष्णु भगवान् का कीर्तन करना, पुष्कर स्नान करना, चान्द्रायण व्रत करना ये सब व्यर्थ है।
अमावस्यां दिने प्राप्ते ग्रहद्वारे समाश्रिताः।
वायुभूताः प्रवाञ्छन्ति श्राद्धं पितृगणाः नृणाम्॥
यावदस्त गते भानौ क्षुत्पिपासासमाकुलाः।
ततश्चास्त गते सूर्ये निराशाः दुखसंयुताः।।
निःश्वसन्तश्विरं यान्ति गर्हयन्तः स्ववंशजम्।
तस्मात् श्राद्धं प्रयत्नेन ह्यमायां कर्तुमर्त्यते॥
अर्थ- अर्थात् पितृजन जो परलोक में चले गये हैं वे भी सूर्यास्त के पहले ही श्राद्ध (भोजन) चाहते हैं। रात्रि में भोजन करना वे भी अनुचित समझते हैं। वे सूर्यास्त के समय तक यह प्रतीक्षा करते हैं कि कब हमें भोजन प्रदान किया जाएगा, परन्तु जब सूर्यास्त के पहले तक उनका तर्पण नहीं होता है तो अपने वंशजों की निन्दा करते हुए वापस लौट जाते हैं और रात को ग्रहण करना पसन्द नहीं करते हैं।
- मनुस्मृति, तृतीय अधिकार, श्लोक 280 में कहा गया है कि-
रात्रौ श्राद्धं न कुर्वीत राक्षसी कीर्तिता हि सा।
संध्ययोरुभयोश्चैव सूर्ये चैवाचिरोदिते।।
अर्थ- अर्थात् रात्रि को राक्षसी कहा गया है, अतः रात्रि के समय में दोनों संध्याओं में और सूर्य के उदय हुए थोड़ी देर हुई हो तब श्राद्ध न करें।
- यजुर्वेद में कहा गया है कि-
पूर्वाह्णे भुज्यते देवैर्मध्याह्ने ऋषिभिस्तथा।
अपराहणे च पितृभिः सायाह्ने दैत्यदानवैः॥
अ अर्थ- र्थात् स्वर्गवासी देवों के भोजन का समय प्रातःकाल है, ऋषिजनों का मध्याह्न काल पितृजन दिन के तीसरे पहर में भोजन करते हैं और राक्षस व दैत्यजन रात के समय भोजन करते हैं।
- महाभारत एवं याज्ञवल्क्यस्मृति में कहा गया है कि-
श्वभ्रद्वाराणि चत्वारि प्रथमं रात्रिभोजनम्।
परस्त्रीगमन चैव संधानानन्तकायकम्॥
ये रात्रौ सर्वदाऽऽहारं वर्जयन्ति सुमेधसः।
तेषां पक्षोपवासस्य फलं मासेन जायते॥
पातव्यं नोदकमपि रात्रावत्र युधिष्ठिरः।
तपस्विनां विशेषेण गृहिणां च विवेकिनाम्॥
अर्थ- अर्थात् मनुष्यों को नरक जाने के चार दरवाजे हैं, जिनमें सबसे पहला रात्रि के समय भोजन करना, दूसरा परस्त्री-गमन, तीसरा अचार, मुरब्बे, मांस, शराब आदि का सेवन और चौथा जमीकन्द का सेवन करना, क्योंकि अचार और जमीकन्द आदि में अनन्तकायिक (सूक्ष्मजीव) रहते हैं। जो श्रेष्ठ बुद्धिमान् अर्थात् विवेकी मनुष्य हमेशा रात्रि के समय में आहार नहीं करते उनको एक महीने में 15 दिन के उपवास का फल मिल जाता है। हे युधिष्ठिर, रात्रि में तो तपस्वियों और विवेकी गृहस्थों को पानी भी नहीं पीना चाहिए।
- मार्कण्डेयपुराण 33/53 में कहा गया है कि-
अस्तं गते दिवानाथे, आपो रुधिरमुच्यते।
अन्नं मांससमं प्रोक्तं मार्कण्डेयमहर्षिणा॥
अर्थ- अर्थात् सूर्य के अस्त हो जाने पर पानी रुधिर पीने के समान समान और अन्न खाना मांस खाने के है- ऐसा मार्कण्डेय महर्षि ने कहा है।
- मार्कण्डेयपुराण 23/39 में कहा गया है कि-
मृते स्वजनमात्रेऽपि सूतकं जायते किल।
अस्तं गते दिवानाथे भोजनं क्रियते कथम्॥
अर्थ- अर्थात् स्वजन मरने पर ही जब सूतक हो जाता है तो दिवानाथ सूर्य के अस्त हो जाने पर भोजन कैसे किया जा सकता है?
- स्कन्दपुराण में कहा गया है कि-
एकभुक्ताशनान्नित्यमग्निहोमफलं भवेत्।
अनस्तभोजिनो नित्यं तीर्थयात्राफलं भजेत्॥
अर्थ- अर्थात् जो दिन में एक बार भोजन करता है उसे अग्नि होम के फल के समान फल मिलता है। और सदैव सूर्यास्त के पहले भोजन करने वाला तीर्थयात्राओं से होने वाले फल को घर में ही प्राप्त कर लेता है।