तर्ज : केशरिया चावल रंगवा दो…
सहज रत्नत्रय सुख की खान।
सम्यक् चारित्र धर्म सु निश्चय दर्शन मूल महान्।। टेक।।
पर भावों से भिन्न आत्म-रुचि ही सम्यक्त्व भला है।
स्वयं ज्ञानमय अनुभूति ही, सम्यग्ज्ञान कला है।।
निज स्वरूप में परम लीनता, सम्यक् चारित्र जान।।1।।
जगे आत्म-रुचि अंतर में, तब बाहर कुछ न सुहाय।
निज स्वरूप में सहज निशंकित, निर्वांछक हो जाय।।
विविध वस्तु धर्मों के प्रति, ज्ञानी को होय न ग्लानि।।2।।
निज निर्मूढ़ स्वभाव पिछाना, पर्यय मूढ़ न होय।
निज स्वरूप में युक्त हुआ, निज धर्म बढ़ावे सोय।।
निज से निज में ही थिर होवे, हो वात्सल्य महान्।।3।।
परम भाव को ही नित भावे, होवे ज्ञान प्रकाश।
यही प्रभावना मंगलमय हो, अष्ट अंग यों खास।।
शंकादिक दोषों का जिनके, रहा न नाम निशान।।4।।
चेतन जाति, सिद्धों का कुल, बल वैभव सु अनंता।
सब विद्याओं का ईश्वर, चिद्रूप प्रभु गुणवन्ता।।
शान्त रूप महिमामय जाना, होय न किंचित् मान।।5।।
ज्ञान लोक में सहज विचरते, लोक मूढ़ नहीं होय।
निर्ग्रन्थ गुरु प्रति परम प्रतीति, गुरु मूढ़ता खोय।।
परम देव निर्दोष पिछाना, देव मूढ़ता हान।। 6।।
निज धर्मी में धर्म लखे तें नहीं अनायतन होवे।
नहीं प्रशंसे नाहिं पोषे, रागादिक को जो है।।
इन्द्रादिक भी उनके यश का, करें अहो निशि गान।।7।।
वे ही ज्ञानी अल्प काल में, पावें पद निर्वाण।
मोक्ष महल की पहली सीढ़ी, सम्यग्दर्शन जान।।
अहो सम्यक्त्व परम सुखदान, अहो सम्यक्त्व परम सुखदान।।8।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह