रण | Ran (सिद्ध जैन)

शंखों की घोर दहाड़ उठी, नभ तल में सूर्य उतर आया।
ताप बिखेर सब जग भर में, हर दल में ओज अनल छाया॥

षड्यंत्र, यन्त्र, रणतंत्र लिये, अरु लिये तान स्वाभिमान।
देने जगभू को उपजाऊ कुछ, निर्भयी हो निर्हरण प्राण॥

इक ओर, ‘श्रमण ऋषिराज’ खड़े।
पर दल का करते संहार, खड़े॥
ले गुण अनन्त सेना समूह।
उत्सुक ठाड़े हैं कुरु की भू॥

दृग-बोध-वृत्ति अधिपति महान।
तैयार, करने जय का सम्मान॥
इक ओर, ‘कर्म’ वीरों का गण।
‘मोह’, ईश कर्माभूषण॥

असि-धारी सेनाधीश दो।
हैं दर्शन अरु चारित्र मोह॥
शत्रु पर दया न करते हैं।
मारते या स्वयं ही मरते हैं।

ले वक्षस्थल-सी ढाल प्रबल।
कर सेमर तरु के पत्र धवल॥
पद पर ज्वाला घनघोर लिये।
भुज बल अनन्त का जोर लिये॥

हृदय को करके वज्र सघन।
है स्थित ले सम्पूर्ण सदन॥
कर्मों का दल हुंकार उठा।
जय जय जय! मोह पुकार उठा॥

कर्मेश समर में आ बरसा।
रण में अधीर हो आ गर्जा॥
करके जगतीतल को कम्पन।
छाया वह शत्रु पर, तम-सम॥

मोह दहाड़ते हुए कहा "मैं संचालक, मैं हर्ता हूँ।
भ्रम बल से अनन्त गुणों को निज आवेश में धरता हूँ॥
इस गुण अनन्त के धारी को मेरी अनन्त ही गरिमा है।
वो मेरे आधीन परिणमे यह सब मोह की महिमा है॥

“है घोर अनन्त मेरी माया
है इसे रोकने तू आया”
यति जल-से पर ताप लिये
रण में टूटा संताप लिये।।
कर्मों के मद को ढा करके।
उनपर गूँजा चिल्ला करके।।
“तेरा कथन न टालूँगा।
हस्तों से उसे सम्भालूँगा॥
तू जिस मद में उल्लसित है।
वह मेरे ही आश्रित है॥
जिस-जिस भ्रम ने तुझे बनाया है।
वह स्तम्भ अब डगमगाया है॥”
रण वीर समर में टूट पड़े।
असि बाण शत्रु पर छूट पड़े॥
कर्म भरम की खड्ग चला।
दुख के बाणों से लक्ष्य बना।

शत्रु पर काल-सा छाया है।
कर्म अति हर्षाये हैं।
पर चेतन के पराक्रमी वीर।
रण में चमके होकर गम्भीर॥
नीराग गदा लेकर दमके।
ढाल सहजता ले दमके॥
हो कर आत्म श्रद्धानी जो।
धर छेद रहे धनु धारी जो॥

फिर प्रतिगण में हाँहाकार जगा।
कर्मेश ले अपनी फौज भगा॥
चेतन ने ब्रह्मास्त्र उठाया था।
निज शुक्ल ध्यान लगाया था॥

शत्रु नृप था भयभीत खड़ा।
था बेहोश या मरणान्त डरा॥
फिर कहाँ रण का क्लेश और,
पराजय का था शोक कहाँ।
होकर अशोक चिरकाल भोग
भोगन का था आनन्द महा॥
जय कर अनादि का शत्रु,
वो अनादि तन्त्र लोकान्त हुये।
करके जय मोही शत्रु को,
वह लोकालोक महाराज हुये॥

रचनाकार:- सिद्ध जैन

रचनाकार: सिद्ध जैन (Siddh Jain), बांदा
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