रक्षाबंधन | Rakshabandhan

रक्षाबंधन के सन्दर्भ में सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसके संबंध में जो कहानियाँ जैनों और हिन्दुओं में प्रचलित हैं, उनमें अद्भुत समानता देखने को मिलती है। हिन्दुओं में भी राजा बलि हैं, विष्णु भगवान हैं और विष्णु भगवान ने बलि का वध करने के लिए बावनिया का अवतार लिया था और जैनियों में भी मुनिराज विष्णुकुमार ने बावन अंगुल के बनकर बलि को काबू में किया था।

मैं यह नहीं कहना चाहता कि हमने उनकी नकल की है या उन्होंने हमारी नकल की है; क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि दोनों कहानियाँ मौलिक हों या दोनों ही काल्पनिक । पर यह परमसत्य है कि दोनों में अद्भुत समानता है। जो भी थोड़ा-बहुत अन्तर दिखाई देता है, वह अपनी-अपनी दार्शनिक मान्यताओं के कारण ही हुआ है।

हमारा उद्देश्य दोनों की सत्यता-असत्यता पर विचार करना नहीं है। हमारे इस आलेख का मूल विषय तो जैनशास्त्रों में प्राप्त कहानी के आधार पर प्रचलित मान्यताओं की समीक्षा करना है।

कहानी सुनाना भी मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं ऐसा मानकर चलता है कि मेरे सभी श्रोता और पाठक मूल कहानी से तो परिचित ही हैं; तथापि उस पर विचार करने के पूर्व उसका खाका खींचना तो आवश्यक है ही।

सात सौ मुनिराजों का एक संघ था। उसके आचार्य थे अकम्पन । उनमें एक श्रुतसागर नाम के मुनिराज भी थे। जब संघ उज्जयिनी नगरी में पहुँचा; तब वहाँ का श्रीवर्मा नामक राजा बलि, प्रह्लाद, नमुचि और बृहस्पति नामक मंत्रियों के साथ उनके दर्शनार्थ आया।

अकम्पनाचार्य ने सभी को आदेश दे दिया था कि उनके आने पर सभी को मौन रखना है, अन्यथा वादविवाद हो सकता है, झगड़ा हो सकता है। वे आये और दर्शन कर वापस चले गये, आचार्यश्री के आदेश के अनुसार पूरा संघ ध्यान में मग्न रहा।

जब वे लौटकर जा रहे थे, तब रास्ते में मुनिराजों से द्वेष रखनेवाला एक मंत्री कहने लगा - 'मौनम् मूर्खस्य भूषणम् - मूर्ख का आभूषण मौन है। ये लोग अपने अज्ञान को छुपाने के लिए ध्यान का ढोंग कर रहे हैं। अरे हम इन्हें नमस्कार कर रहे हैं और ये आशीर्वाद तक नहीं देते।

मुनिराज श्रुतसागर सामने से आ रहे थे; उन्हें यह बात बर्दाश्त नहीं हुई। श्रुतसागर ने उनसे वादविवाद किया और उनके बाप-दादों की नहीं; उनके ही पूर्वभव की कहानी सुना दी। आखिरकार वे बहुत जलभुन गये और रात को आकर उन्होंने मुनिराज श्रुतसागर पर उपसर्ग किया तो देवताओं ने उन्हें कीलित कर दिया।

उन मंत्रियों के इस व्यवहार के कारण उन्हें देश निकाला दे दिया गया और वे हस्तिनापुर नगर में पद्मराय नामक राजा के यहाँ काम करने लगे।

उन मुनिराजों का संघ भी कुछ दिनों बाद वहाँ पहुँचा। जब इस बात का पता उन मंत्रियों को चला तो उन्होंने बदला लेने का विचार किया।

किसी काम के कारण राजा ने उन्हें कुछ वरदान माँग लेने का वचन दिया था, जिसका अभी तक उपयोग नहीं किया गया था। इस अवसर पर उन्होंने ७ दिन का राज्य माँग लिया। इसप्रकार बलि नामक मंत्री ७ दिन के लिए राजा बन गया।

वह जानता था कि जैन साधु घास पर नहीं चलते; इसलिए उसने साधुसंघ को कैद करने के लिए जहाँ संघ ठहरा था, उसके चारों ओर गेहूँ बो दिये। उसके बाद धुआँ कराके उन पर उपसर्ग किया।

मुनिराज विष्णुकुमार ने उनका उपसर्ग दूर करने के लिए विक्रियाऋद्धि के बल से बावनिया का रूप धरकर बलि राजा से समस्त पृथ्वी ले ली।

इसप्रकार उनका उपसर्ग दूर हुआ। संक्षेप में रक्षाबंधन की कहानी इतनी ही है।

कहानी तो सत्य ही है; पर उसके आधार पर हमने जो निष्कर्ष निकाले हैं; वे कितने सही हैं - यहाँ विचार का बिन्दु तो मूलतः यही है।

इस कहानी में तीन मुनिराज हैं, तीन तरह के मुनिराज हैं - एक तो हैं सबके सिरमौर अकंपनाचार्य, दूसरे हैं महान विद्वान श्रुतसागर और तीसरे हैं विक्रिया ऋद्धिधारी विष्णुकुमार। ये तीनों के नाम भी एकदम सार्थक हैं; क्योंकि जो बड़े से बड़े उपसर्ग आने पर भी विचलित नहीं हुए, कम्पायमान नहीं हुए; वे हैं अकम्पन और जिन्होंने वादविवाद में मंत्रियों को हरा दिया और उनकी पूर्व पीढ़ियों की ही नहीं, बल्कि उनके पूर्व भवों की कहानी उन्हें सुना दी - ऐसे श्रुत के सागर श्रुतसागर। विष्णु माने होता है रक्षक । रक्षा करनेवाले मुनिराज का नाम विष्णुकुमार भी सार्थक नाम ही है।

मैंने अपने उपन्यास सत्य की खोज में भी ऐसे ही नाम रखे हैं - विवेक का धनी विवेक और रूपवान रूपमती। विवेक के पास रूप था की नहीं ? इसकी चर्चा तो उसमें नहीं की, लेकिन रूपमती के पास अकल नहीं थी, इसकी चर्चा तो उसमें है ही। रूपमती के पास विवेक नहीं था। भले ही वह विवेक की पत्नी थी, लेकिन विवेकरहित थी।

शास्त्रों में ऐसी हजारों कहानियाँ हैं और वे उतनी ही प्रामाणिक हैं, जितनी की राम की कहानी, भगवान महावीर की कहानी है। क्योंकि वे सोद्देश्य हैं और वे प्रथमानुयोग में शामिल हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि वे प्रथमानुयोग के बाहर नहीं हैं।

तीन तरह के मुनिराज हैं - एक वे जिनके प्रतिनिधि विष्णुकमार थे, एक वे जिनके प्रतिनिधि श्रुतसागर थे और एक वे जिनके प्रतिनिधि थे आचार्य अकंपन।

कितनी भी अनुकूलता-प्रतिकूलता आए, लेकिन जो अपने पद मर्यादाओं से कँपे नहीं, उनका उल्लंघन नहीं करें; कोई कितना ही उत्तेजित करे, पर उत्तेजित न हो, उनके प्रतिनिधि आचार्य अकंपन और उनके वे सात सौ शिष्य थे कि, जिन्होंने इतनी अधिक प्रतिकूलता में भी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, आत्मसाधना में रत रहे।

ईंट का जवाब पत्थर से देना मुनिराजों का काम नहीं।

जगत की दृष्टि में तो सबसे जोरदार मुनिराज तो विष्णुकुमार ही थे न? बलि की छाती पर पैर रखकर आकाश के तारे दिखा दिये और मुनिराजों की सुरक्षा कर दी। पहले रक्षाबंधन के दिन विष्णुकुमार की ही पूजन की जाती थी। अब तो अकम्पनाचार्य की पूजन भी बन गई है।

और हमारे प्रतिपादन से प्रभावित कहीं-कहीं कुछ लोग उनको भी याद करने लग गये हैं।

अकंपनाचार्य के बारे में हम कहते हैं कि बेचारे अकम्पन! वहाँ (उज्जैनी में) भी पिटते-पिटते बचे और यहाँ (हस्तिनापुर में) तो पिट ही गये; कुछ नहीं कर पाये, जवाब तक नहीं दे पाये।

दूसरे नम्बर पर हमें दिखाई देते हैं मुनिराज श्रुतसागर। हम कहते हैं कि देखो! कैसा मुँहतोड़ जवाब दिया कि नानी याद आ गई।

तात्पर्य यह है कि हमारे अन्दर जो लड़ाकू वृत्ति है, उसके कारण हमने मुनिराजों में भी संघर्ष में उलझे मुनिराजों को ही पसन्द किया; पर अपने ज्ञान-ध्यान में लीन रहनेवाले, उपसर्ग से कभी न डिगनेवाले अकम्पनाचार्य और उनके सात सौ शिष्यों को पसन्द नहीं किया।

मैं इन तीनों प्रकार के मुनिराजों के मुनिपने में शंका नहीं कर रहा हूँ। वे सभी मुनिराज हैं, हमारे लिए तीनों परमपूज्य हैं। पर बात यह है कि इस रक्षाबन्धन की कहानी के आधार पर सबसे महान कौन हैं, सर्वश्रेष्ठ कौन ? बस बात मात्र इतनी ही है।

अकम्पन आचार्य हैं और उन्होंने मर्यादाओं को भी पाला; इसलिए भी वे महान हैं। श्रुतसागर और विष्णुकुमार तो मुनि ही थे, आचार्य नहीं थे। फिर भी हमने स्वयं अपनी लड़ाकू प्रकृति के कारण आचार्य अकंपन को महत्त्व न देकर उनके ही शिष्य मुनिराज श्रुतसागर और विष्णुकुमार को ही महत्त्व दिया।

मैं मुनिराजों की नहीं, अपने चित्त की खराबी बता रहा हूँ कि उन तीन तरह के मुनिराजों में हमारे चित्त ने किसको सबसे ज्यादा महत्त्व दिया; हमारी दृष्टि में महिमा किस बात की अधिक है।

विष्णुकुमार ने जो कुछ किया, उसके फल में उन्हें मुनिपद छोड़ना पड़ा। क्या इसका सीधा-सच्चा अर्थ यह नहीं है कि मुनिपद में ये काम करने योग्य नहीं हैं?

आज के जो मुनिराज उन्हें आदर्श मानकर धर्मरक्षा के नाम पर उत्तेजना फैलाते हैं, तोड़-फोड़ करना चाहते हैं; उन्हें विष्णुकुमार के उस निर्णय पर ध्यान देना चाहिए कि उनको यदि ऐसा करने का विकल्प आया तो दिगंबर भेष बदनाम न हो और इस पद की मर्यादा कायम रहे; इसलिए उन्होंने पहले मुनिपद छोड़ा और बाद में यह काम किया।

वस्तुत: बात यह है कि जब उन्होंने मुनिपद छोड़कर बावनिया का भेष बना लिया तो वे उस समय मुनिराज ही नहीं रहे; अत: यह कहना कि मुनिराज विष्णुकुमार ने यह काम किया मात्र औपचारिक ही है; वास्तविक नहीं।

बावनिया का भेष गृहस्थ का था या मुनिराज का था? उस भेष में उन्होंने छल-कपट किया, झूठ बोला। ये तो हमारे यहाँ प्रसिद्ध खोटे काम हैं, जो गृहस्थ के लिए भी करनेयोग्य नहीं हैं, जो हम और आप करें तो भी कोई अच्छा नहीं माने । पर हम उन्हीं कामों पर लट्टू हो रहे हैं। हम कहाँ खड़े हैं ? सवाल यह है।

उन्होंने यह काम अपना पद छोड़कर किया, इसका मतलब यह है कि वे मानते थे की यह काम मुनि पद में करने योग्य नहीं है। बस बात इतनी ही है कि उन्हें विकल्प आ गया और उसके लिए उन्होंने पद छोड़ा; जिसके लिए उन्हें प्रायश्चित्त लेना पड़ा, दुबारा दीक्षा लेनी पड़ी।

अरे ! इससे बड़ा प्रायश्चित्त दुनिया में क्या हो सकता है की दीक्षाच्छेद हो गई।

क्या आप जानते हैं कि दीक्षाच्छेद का क्या मतलब है ?

मान लो वे बीस वर्ष पुराने दीक्षित थे। उनके बाद के अबतक जितने भी दीक्षित मुनि थे, वे उन्हें नमस्कार करते थे और ये उन्हें धर्मवृद्धिरस्तु का आशीर्वाद देते थे। अब आजतक जितने भी मुनि दीक्षित हुए हैं, भले ही उनसे ही क्यों नहीं हुए हों, फिर भी उन्हें उनको नमस्कार करना पड़ेगा और वे उन्हें धर्मवृद्धि का आशीर्वाद देंगे । सम्पूर्ण वरिष्ठता समाप्त। किसी मुनिराज के लिए इससे बड़ा और कौनसा दण्ड हो सकता है ?

ध्यान रहे, मैं उनकी गलती नहीं बता रहा हूँ; मैं हमारे मन की गलती बता रहा हूँ कि हमने उनको पसन्द किया और उनके उस काम को पसन्द किया कि जिस काम को वे स्वयं पसन्द नहीं करते थे और उस काम को मुनिधर्म के पद के योग्य नहीं मानते थे । मुनिपद छोड़कर उन्होंने यह काम किया और इसके कारण हम उन्हें महान मानते हैं। उक्त सन्दर्भ में टोडरमलजी का निम्नांकित कथन दृष्टव्य है -

"विष्णुकुमार ने मुनियों का उपसर्ग दूर किया सो धर्मानुराग से किया; परन्तु मुनिपद छोड़कर यह कार्य करना योग्य नहीं था, क्योंकि ऐसा कार्य तो गृहस्थधर्म में सम्भव है और गृहस्थधर्म से मुनिधर्म ऊँचा है; सो ऊँचा धर्म छोड़कर नीचा धर्म अंगीकार किया, वह अयोग्य है; परन्तु वात्सल्य अंग की प्रधानता से विष्णुकुमारजी की प्रशंसा की है।

इस छल से औरों को ऊँचा धर्म छोड़कर नीचा धर्म अंगीकार करना योग्य नहीं है।"

उनकी जिन्दगी का वह सबसे महान कार्य था या सबसे हल्का कार्य था ? (छात्रों की ओर लक्ष्य करके) पाँच साल तुम यहाँ रहे और बहुत अच्छा अध्ययन किया, पढ़े-लिखे; पर बीच में एक उद्दण्डता की, जिसके कारण तुम्हें निकाल दिया गया। फिर तुम्हारे पिताश्री आए, उन्होंने हाथ-पैर जोड़े, तुमने भी हाथ-पैर जोड़े; तब मुश्किल से तुम्हें दोबारा प्रवेश मिला।

पाँच साल की जिन्दगी में किया गया तुम्हारा यही काम सबसे बढ़िया रहा होगा ? क्या इसी के कारण तुम याद किये जाओगे ? क्या इसी से तुम्हें याद किया जाना चाहिए?

आप यही कहेंगे न कि मैंने गोल्ड मैडल लिया, उसकी बात तो नहीं करते; पर निकालने की बात करते हो, बार-बार सभी को बताते हो।

इसीप्रकार ये काम अच्छा तो नहीं था कि जिसके कारण उन्हें साधुपद छोड़ना पड़ा।

हम श्रुतसागर मुनिराज का भी बहुत बचाव करते हैं। कहते हैं कि उन्हें आचार्यश्री के आदेश का पता नहीं था। यदि पता होता तो वे गारन्टी से वादविवाद में नहीं उलझते।

मैंने ‘आप कुछ भी कहो’ कहानी संग्रह में एक कहानी लिखी है ‘अक्षम्य अपराध’। मुनिराज विष्णुकुमारजी का भी यह कार्य अक्षम्य अपराध ही था। उनका अपराध क्षमा कहाँ हुआ? यदि क्षम्य होता तो क्षमा हो जाता न?

क्षमा हुआ तो तब माना जाता कि जब मुनिपद नहीं छूटता। जब दण्ड मिल गया, प्रायश्चित्त लेना पड़ा तो क्षमा कहाँ हुआ?

मैंने एक बहुत बढ़िया वाक्य उसमें लिखा है कि श्रुत के सागर को इतना विवेक तो होना ही चाहिये था कि राह चलते लोगों से व्यर्थ के विवाद में उलझना ठीक नहीं है।

इतना तो हम-तुम सभी समझते है कि किसी सज्जन पुरुष का राह चलते किसी राहगीर से उलझना कोई अच्छी बात नहीं है।

आचार्यश्री का आदेश सुन पाये थे या नहीं सुन पाये थे - वह बात जाने दो। पर श्रुत के सागर को इतना विवेक तो होना ही चाहिए था। यह ज्ञान काम का है या दूसरों के पूर्वभव जानना काम का है ? जातिस्मरण काम का है या यह जानना काम का है ?

मैं आपसे ही पूछता हूँ कि वर्तमान के काल में हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए - इसका ज्ञान होना जरूरी है या किसी के पूर्वभव का ज्ञान होना जरूरी है ?

श्रुत के सागर को इतना विवेक होना चाहिए था - यह एक बात है और दूसरी बात यह कि आज्ञा देते समय, जब वहाँ संघ के सभी मुनि उपस्थित थे, तो ये उपस्थित क्यों नहीं थे? अनुपस्थिति भी तो अच्छा काम नहीं है।

हमें तो पता ही नहीं था, क्योंकि कल हम आए ही नहीं थे; इसलिए हमने सुना ही नहीं - ऐसा कहनेवाले छात्र का असत् व्यवहार क्या उपेक्षा योग्य है?

बाकी सब आ गये थे तो वे लेट क्यों आए? किसी के दिमाग में यह क्यों नहीं आता? हम उनसे इतना अभिभूत हो जाते हैं कि यह सब सोचने की हममें शक्ति ही नहीं रहती। मैंने उस अक्षम्य अपराध कहानी में बहुत सभ्य भाषा में यह सब लिखा है।

मैंने उसमें यह लिखा ही नहीं कि अकम्पनाचार्य ने उन्हें आदेश दिया की जाओ तुम उसी स्थान पर खड़े रहो। वे तो सारी बात सुनकर एकदम गंभीर हो गये।

शायद श्रुतसागर सोचते होंगे कि आज तो मुझे शाबासी मिलेगी कि अच्छे दाँत खट्टे कर दिये, लेकिन आचार्य कुछ नहीं बोले। यह मौन की भाषा है।

उनकी गंभीरता देखकर श्रुतसागर के होश उड़ गये और उन्हें यह समझते देर न लगी कि कोई बहुत बड़ा अपराध हो गया है। यह साधारण अपराध नहीं है। क्योंकि इतना चिंतित तो मैंने आचार्यश्री को कभी नहीं देखा। तब वे खुद ही बोले कि इस अक्षम्य अपराध के लिए आचार्यश्री मुझे जो भी दण्ड दें; मैं उसे स्वीकार करने के लिए नतमस्तक हूँ।

तो आचार्यश्री ने जवाब दिया - “श्रुतसागर! सवाल दण्ड का या प्रायश्चित्त का नहीं है; सवाल संघ की सुरक्षा का है।

मुझे इस बात की चिन्ता नहीं कि मैं तुम्हें दण्ड दूँगा तो तुम मानोगे की नहीं मानोगे या तुम उद्दण्डता पर उतर आओगे और एक नया संघ बना लोगे, तोड़-फोड़ करके स्वयं आचार्य बन जाओगे।

यह तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं जो भी दण्ड दूंगा, वह तुम स्वीकार करोगे। मेरी चिन्ता का विषय यह नहीं है। मेरी चिन्ता का विषय संघ की सुरक्षा है; क्योंकि अब संघ पर कोई महासंकट आनेवाला है।

वे लोग आयेंगे और कोई न कोई उपसर्ग संघ पर अवश्य करेंगे।"

श्रुतसागर बुद्धिमान तो थे ही, आखिर वे श्रुतसागर थे। मैं तो ऐसा मानता हूँ कि अकम्पनाचार्य ने उनकी प्रतिभा को देखकर उन्हें श्रुतसागर नाम की उपाधि दी होगी, नाम कुछ और रहा होगा उनका।

वे कहते हैं कि मैं वहीं जाऊँगा और मैं वहीं खड़ा रहूँगा, वहीं आत्मध्यान करूँगा; क्योंकि वे मंत्री उसपर्ग करने के लिए उसी रास्ते से आयेंगे और रास्ते में उन्हें मैं सहज ही मिल जाऊँगा । यदि उन्हें उनका असली प्रतिद्वन्दी मिल गया तो जो कुछ होगा वहीं होगा, संघ सुरक्षित रहेगा।

यह उनका स्वयं का प्रस्ताव था। आचार्यदेव ने उन्हें यह आज्ञा नहीं दी थी कि तुम वहाँ जाकर खड़े रहो।

मेरे चित्त को यह स्वीकार नहीं हुआ कि अकम्पनाचार्य जैसे दयावान आचार्य यह जानते हुए कि वे जान भी ले सकते हैं, श्रुतसागर को इतना कठोर दण्ड दें कि जाओ बेटा, तुम अकेले ही मरो। तुम्हारे पीछे हम सब नहीं मरेंगे। तुम वहीं खड़े रहो। तुमने गलती की, तुम ही मरो, हम सब नहीं मरेंगे।

आचार्यश्री सोचते हैं कि श्रुतसागर को तो मैंने घड़े जैसा घड़ा है। ऐसे श्रुतसागर को मैं मरने के लिए वहाँ कैसे छोड़ दूँ? श्रुतसागर ऐसे ही तैयार नहीं होते। सातसौ शिष्यों पर मेहनत की तो एक श्रुतसागर तैयार हुआ है।

अरे भाई ! प्रतिभाशाली विद्यार्थी हो तो भी उसे विद्वान बनाने में

खून-पसीना एक करना पड़ता है; उसपर वर्षों मेहनत करनी पड़ती है। तब जाकर वह उच्चकोटि का विद्वान बनता है।

आचार्यश्री ने कहा कि “मैं ऐसी आज्ञा नहीं दे सकता, मैं अनुमति भी नहीं दे सकता।"

श्रुतसागर बोले - “आचार्यश्री ! न तो आज्ञा का सवाल है और न अनुमति का। इसके अलावा कोई रास्ता ही नहीं है। एक ही रास्ता है।" - ऐसा कहकर श्रुतसागर वहाँ से चल दिये।

आचार्यश्री ने हाँ या ना की ही नहीं, लेकिन श्रुतसागर की समझ में आ गया कि इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है। आचार्यश्री तो कहेंगे ही नहीं - यह सोचकर वे चल दिये।

मेरा कहना यह है कि अपराध का बोध उन्हें स्वयं ही हुआ।

पाठकों की जिज्ञासा शान्त करने के लिये ‘अक्षम्य अपराध’ नामक कहानी इस आलेख के तत्काल बाद ही दी जा रही है।

मैं कहना यह चाहता हूँ कि विष्णुकुमार भी स्वयं अपनी गलती मानते थे, तभी तो उन्होंने दीक्षाच्छेद किया था; श्रुतसागर भी स्वयं अपनी गलती मानते थे, तभी तो प्रायश्चित्त लिया।

जिन कार्यों को वे स्वयं अपनी गलतियाँ मानते थे; उन कार्यों को ही हमने उनके सबसे बड़े गुणों के रूप में स्वीकार कर लिया। जो उनकी दृष्टि में अपराध था, हमने उसको सबसे महान गुण मान लिया।

यह बात मेरे दिमाग में अठारह वर्ष की उम्र से ही घूमती है। मैंने २०-२१ वर्ष की उम्र में एक ‘पश्चात्ताप’ नामक खण्डकाव्य लिखा था। उसकी भूमिका में दो लाईनें लिखी थीं -

"जिस बड़ी गलती के लिए हमारे महापुरुष जीवनभर पश्चात्ताप करते रहे; आज हमने उनकी उस बड़ी गलती को ही उनका सबसे बड़ा गुण मान लिया है।"

सीताजी की अग्निपरीक्षा हुई और रामचन्द्रजी उन्हें मनाने लगे की सीते, तुम आओ, हम साथ में ही घर में रहेंगे; क्योंकि यह सिद्ध हो गया है कि तुम निर्दोष हो।

इसके उत्तर में सीता ने कह दिया कि मैंने तो दुनिया देख ली है। अब मुझे इस दुनियाँ में रहने में कोई रस नहीं है। अब तो मैं दीक्षा लूँगी।

राम पछताते रह गये, हाथ मलते रह गये। ये राम का पश्चात्ताप है। राम इस बात पर पश्चात्ताप कर रहे हैं कि इसमें सीता की क्या गलती है? सीता नारी थी, मेरी ड्यूटी उसकी रक्षा करना था। वह अपने पति के साथ वन में गई थी। देवर भी साथ में थे और हम दोनों उसकी रक्षा नहीं कर पाए। इसमें उसकी क्या गलती थी?

रावण हर ले गया, उसमें सीता की क्या गलती थी? सीता रावण के साथ भागकर थोड़े ही गयी थी। वह वहाँ जितने दिन भी रही, उतने दिनों तक हम उसे छुड़ाकर नहीं ला पाये - यह किसकी गलती है - सीता की या मेरी?

जब राम उन्हें अपवित्र ही मान चुके थे, तो दुबारा जंगल में भेजने के लिए लाये ही क्यों? जरा सी आलोचना के आधार पर पत्नी को छोड़ दिया। हमारी इज्जत में कोई धब्बा न लग जाए, बस इसलिए छोड़ दिया।

यह जो अग्निपरीक्षा आज हो रही है, वह उस दिन भी हो सकती थी। उस दिन क्यों नहीं हुई?

इन सब गलतियों के लिए राम शेष सारे जीवनभर पछताते रहे। वे अपनी गलती पर पश्चात्ताप कर रहे हैं और उन्हीं के कारण हम ये मानते हैं कि वे कितने महान थे, पत्नी तक को त्याग दिया, इतने न्यायवान थे। उक्त ‘खण्ड काव्य’ में अंत में एक बहुत मार्मिक बात लिखी है -

प्रजा की सुनकर करुण पुकार,किया यदि रामचन्द्र ने न्याय।
हुआ पर जनकसुता के साथ महा अन्याय, महा अन्याय।।

रामचंद्र ने न्याय किया या अन्याय किया - मैं इस झगड़े में नहीं पड़ना चाहता हूँ; लेकिन सोचने की बात यह है कि सीता के साथ न्याय हुआ या अन्याय?

सीता निर्दोष है या नहीं - यह पता नहीं लगा पाना - यह किसकी गलती है? दण्ड देने वाले की गलती है या सीता की गलती है? सीता तो चिल्ला-चिल्लाकर कहती रही, कि मैं निर्दोष हूँ। एक निरपराधी को दण्ड देना - क्या यह अन्याय नहीं है?

तुम कहते हो रामचंद्रजी कितने बड़े न्यायवादी थे; कि उन्होंने पत्नी को भी नहीं बक्शा। इतना महान न्यायाधीश बनने के चक्कर में जो अपराधी नहीं था, उसको दण्ड दे दिया। तो क्या निरपराधी को दण्ड देना न्याय है? यह कौनसी डिक्शनरी में लिखा है की निरपराधी को दण्ड देना न्याय है? चारों तरफ की दीवारों पर उन्हें यही लिखा दिखाई देता था कि सीतादेवी के साथ महाअन्याय हुआ, अन्याय हुआ, अन्याय हुआ। आकाश में से यही आवाज आती थी, जो कानों में गूंजती थी। जहाँ आँख उठाकर देखते थे, वहाँ यही दिखाई देता था।

रामचंद्रजी सोचते हैं कि तू तो न्यायाधीश था, तेरी अदालत में केस आया था; पर तूने न्याय कहाँ किया?

मैंने उसमें लिखा कि “जो अपने अन्याय के लिए सारे जीवनभर पछताते रहे, हमने उसी कारण उन्हें सबसे महान न्यायाधीश मान लिया।"

और अपने केस भी उनकी अदालत में सौपने को तैयार हैं। राम हमने तेरे भरोसे नैय्या छोड़ दी मझधार में। जैनी तो अपनी नैय्या पार्श्वनाथ के भरोसे छोड़ते हैं न? सीता ने राम के भरोसे छोड़ी थी और हम पारसनाथ के भरोसे छोड़ते हैं।

जो महापुरुष सारे जीवनभर अपनी जिस कमजोरी के कारण पश्चात्ताप करते रहे, हमने उसको उनकी क्वालिटी मान लिया। डिसक्वालिटी को क्वालिटी मान लिया। हमारी दृष्टि में क्वालिटी और डिसक्वालिटी का निर्णय नहीं है। कोई बड़ा आदमी आ जाता है तो हमारी परिभाषा बदल जाती है। हम निष्पक्ष होकर न्याय नहीं कर सकते। हम अपने चित्त में निर्णय नहीं कर सकते कि अच्छी चीज क्या है और बुरी चीज क्या है? जो बुरा काम कोई बड़ा पुरुष कर ले, तो हम उस काम को अच्छा कहने लगते हैं। दृढ़ता से यह कहने की ताकत हम में नहीं है; कि "खोटा काम तो खोटा काम है, भले ही किसी ने भी किया हो।"

स्वयं विष्णुकुमार और श्रुतसागर दोनों ही जिस कार्य के लिए प्रायश्चित्त लेते हैं; हम उसी काम के लिए उनकी पूजा करते हैं।

विष्णुकुमार ने दुबारा दीक्षा ली, तो उनके मुनिधर्म का मरण हो गया कि नहीं हो गया और श्रुतसागर तो मरण के लिए ही तैयार हो गये थे।

उन्होंने स्वयं जिस अपराध को मौत की सजा के योग्य माना; उस अपराध को हम गुण मान रहे हैं और उसके उल्लेखपूर्वक उनकी पूजा कर रहे हैं।

हमारे लिए अकम्पनाचार्य बेचारे हो गये, विष्णुकुमार और श्रुतसागर उनके रक्षक हो गये और वे उनसे रक्षित। इस पर भी हम ऐसा कहते फिर रहे हैं कि जो स्वयं की भी रक्षा नहीं कर सके, वे हमारी रक्षा क्या करेंगे?

मैं आपसे ही पूछता हूँ कि जिसकी रक्षा की वह महान है या जिसने रक्षा की वह महान है? मान लो पारसनाथ की रक्षा पद्मावती ने की। तो हम पूजा किसकी करें पद्मावती की या पार्श्वनाथ की?

पर अपन तो सचमुच ही पार्श्वनाथ को छोड़कर पद्मावती के पुजारी बन गये हैं। वहाँ विष्णुकुमार ने रक्षा की तो वे महान हो गये; यहाँ पद्मावती ने रक्षा की तो वे महान हो गईं। मन्दिर में ३ फुट की मूर्ति पद्मावती की और माथे पर २ इंच के पार्श्वनाथ। महिलाओं को उनसे सात हाथ दूर रहना चाहिए; पर हमने उन्हें माथे पर ही बैठा दिया।

’रक्षा का भाव भी बंधन का कारण है’ - इसका नाम है रक्षाबंधन। मारने का भाव तो बंध का कारण है ही, लेकिन बचाने का भाव भी बंध का ही कारण है। मारने का भाव पापबंध का कारण है और बचाने का भाव पुण्यबंध का कारण है; लेकिन बंध के कारण तो दोनों ही हैं - बचाने का भाव भी और मारने का भाव भी।

रक्षा करने का भाव भी बंध का कारण है’ - यह कहानी में से ही निकल रहा है। मुनिराज विष्णुकुमारजी को रक्षा करने का भाव आया तो उन्हें पुण्यबंध भी अवश्य हुआ होगा; पर उससे ही उन्हें दीक्षा का छेद करना पड़ा। जो कर्म बंधे, वे तो बंधे ही; लेकिन सबसे पहले रत्नत्रय की संपत्ति लुट गयी, गुणस्थान गिर गया। रक्षा करने का भाव भी, मुनिराजों की रक्षा करने का भाव भी बंध का कारण है; जिसके कारण उन्हें मुनिपद छोड़ना पड़ा, प्रायश्चित्त लेना पड़ा।

मुनिराज दीक्षा पुण्य बाँधने के लिए नहीं, कर्म काटने के लिए लेते हैं; बंधने के लिए नहीं, छूटने के लिए लेते हैं।

हमारे चित्त में कौन महान लगे - इससे यह मालूम पड़ता है कि हमारी दृष्टि में महानता की परिभाषा क्या है?

कोई आकर कुछ भी करे, कितना भी उपसर्ग करे; तो भी अपने ही महानता की श्रेणी में आते हैं।

इतनी बात तो अजैनी शत्रु भी जानते थे कि मर जायेंगे; पर ये मुनिराज घाँस पर पैर नहीं रखेंगे, निकल कर नहीं भागेंगे। इससे मुनिधर्म की महानता ख्याल में आती है।

मुनिराजों ने आहार नहीं लिया था तो जनता भी उपवास कर रही थी। लेकिन जब यह पता चला कि उपसर्ग दूर हो गया है; तो हरियाली हटा दी गई। उक्त उखड़ी हुई घास को लेकर सभी जैनी भागे और अपने -अपने गाँवों में आकर खबर दी की मुनिराजों का उपसर्ग दूर हो गया है।

आप जानते हो गाँवों में आज भी रक्षाबंधन के दिन भुजरियाँ निकलती हैं, हमारे गाँव में भी निकलती हैं।

एक आदमी दूसरे आदमी को भुजरियाँ भेंट करता है।

**जो बुजुर्ग लोग घर पर ही थे; उन्हें जब यह बताया गया कि मुनिराजों का उपसर्ग दूर हो गया है, तो उन्हें एकाएक विश्वास ही नहीं हुआ।

तब घास से रास्ता रोका गया था, वह घास हम उखाड़कर लाये हैं।**

फिर क्या हुआ, सारे मुनिराज आहार को आये, तो श्रावकों ने देखा कि सात दिन से भूखे हैं, धुएँ से गला खराब है; इसलिए आहार में सिवईयाँ बनाई गई; जिससे मुँह में डालो, तो बिना ही प्रयत्न के वे पेट में पहुँच जाए। चबाना भी सरल और गुटकने में भी ज्यादा दिक्कत न हो। उस दिन से रक्षाबंधन के दिन घरों में सिवईयाँ बनने लगीं।

लेखक : डॉ.श्री हुकमचंद जी भारिल्ल
source: रक्षाबंधन और दीपावली

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