रक्षाबंधन पर्व | Rakshabandhan Parv

धर्म पर्व है मंगलकारी, मन में अति हर्षायें।
हो निश्छल वात्सल्य अंतरंग, धर्म प्रीति उर लाएँ।। टेक।।

कर्मों के प्रेरे संसारी जीव महादुख पायें।
क्षमा भाव हो उन्हें देखकर नहीं दुर्भाव बढ़ाएँ।।
साम्य भाव धर धर्म दिपावें, उर वैराग्य बढ़ाएँ।। १।।

अज्ञानी के भाव ज्ञानमय, क्यों कैसे हो पायें।
भेदज्ञान की कला प्रगटते, स्वयं शांत हो जायें।।
सहज अकर्त्ता ज्ञानी रहते विस्मय नहीं उर लाएँ।। २।।

आत्माराधन में ही हम अब निज उपयोग लगाएँ।
सहज पराश्रित वैभाविक परिणाम स्वयं मिट जाएँ।।
हो एकाग्र तत्व अभ्यासी, शांति स्वयं में पाएं।। ३।।

धन्य अकंपन आदि मुनीश्वर, अद्भुत समताधारी।
तत्त्व विचार करें मनमाँही, वे चैतन्य विहारी ।।
घोर उपसर्ग सहज ही जीता, किंचित् क्षोभ न लायें ।। 4।।

वात्सल्य श्री विष्णु मुनि का अपनी चिंता नाहीं।
वामन वेश धरा था जिनने, भेदज्ञान उर माँही ।।
दूर हुआ उपसर्ग संघ का, बलि आदि पछताएं।। 5।।

प्रायश्चित से विष्णु मुनीश्वर तप से कर्म नशाए।
श्री अकम्पन आदि मुनीश्वर चर्या को थे आए।।
नर-नारी आहार दान दें, मन में अति हर्षाये ।। 6।।

तन-मन-धन है सर्व समर्पण, शुभ संकल्प हमारा।
हो प्रभावना आराधनमय, यही साध्य है प्यारा ।।
भक्तिभाव से करें वंदना चरणों शीस नवाएँ।। 7।।

मोह न आवे, क्रोध न आवे, अहंकार नहीं आए।
माया-लोभ कभी नहीं आये, हास्यादिक नहीं आए ।।
ज्ञान-ज्ञान में होय प्रतिष्ठित, यही भावना भाएं।। 8।।

तृप्त रहें हम अपने में ही, नित संतुष्ट रहाएं।
अक्षय प्रभुता, अद्भुत गुरुता, अपने में ही पाएं।।
नहीं प्रमाद फटकने पाए, सत्पुरुषार्थ जगाएं।। 9।।

रत्नत्रयमय धर्म हितंकर जग में अब फैलाएं।
दशलक्षण हैं कहे धर्म के, जीवन में अपनाएं।।
श्री जिनधर्म हमारा प्यारा, इसकी शान बढ़ाएं।। 10।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह