रक्षाबंधन पर्व पर आगम आधारित विश्लेषण | Rakshabandhan parv par aagam aadharit Vishleshan

रक्षा बंधन पर्व पर आगम आधारित विश्लेषण

हम से अवर्णवाद न हो

लेखक : आ० पं० श्री अरुण जी जैन, जयपुर

वर्ण अर्थात् अक्षर (अक्षरों) का सही अर्थ, सही भाव, सही अभिप्राय न जान कर उसका अन्यथा, विपरीत निरूपण करनाः अवर्णवाद कहलाता है-

“केवलि-श्रुत-संघ-धर्म-देव-अवर्णवादो दर्शनमोहस्य”¹ अर्थ- केवली, श्रुत (जिनवाणी), संघ, धर्म अहिंसादि (रत्नत्रय) और देव (वैमानिकादि)- इन गुणोत्पादक महान् पदार्थों में जो दोष मूल में नहीं हैं, उनका अपने मन से कल्पना करके उत्पन्न करना ही अवर्णवाद है-

“गुणवत्सु महत्सु असद्‌भूत दोषो‌द्भावनमवर्णवादः”²

जीव अवर्णवाद अपने स्वयं के दोष से करता है-

“अन्तःकलुष-दोषात्…अवर्णवादः”³

अवर्णवाद दर्शनमोहनीय (मिथ्यात्व) के आस्रव का कारण है। अर्थात् नरक गति के आस्रव (बंध) का कारण है, क्योंकि “बहवारं-भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः”⁴ बहुत आरंभ और परिग्रह के भाव नरक गति के कारण हैं। मिथ्यात्व 14 प्रकार के अंतरंग परिग्रहों में सबसे बड़ा परिग्रह कहा है। मिथ्यात्व तो बहुत नहीं अपितु अनंत आरंभ और परिग्रहरूप है। क्योंकि धवला टीकों में मिथ्यात्व का प्रर्यायवाची अनंत कहा है।

अर्थात् अवर्णवाद नरक, निगोद का कारण है।

श्रुत के किसी कथन के अभिप्राय को सही नहीं जानकर उसका अन्यथा निरूपण करना अवर्णवाद है।

जैसे - विष्णुकुमार मुनि ने संघ के उपसर्ग को दूर किया। इस कार्य को उन्होंने सुनि रहते हुए नहीं किया था। उन्हें अणिमा, महिमा, आप्ति आदि ऋदि‌याँ प्राप्त थीं। आप्ति ऋद्धि से उनका हाथ मेरु तक गया था- इससे उन्होंने अपनी ऋद्धियाँ चेक(परीक्षण) की, कि ऋद्धियाँ उन्हें प्रकट हैं या नहीं हैं। अणिमा ऋद्धि से वामन (बौने पुरुष का) रूप बनाया। महिमा ऋद्धि से मेरु जितना ऊंचा रूप बनाया था।

रिफरेंस ग्रंथ: -

  1. आ. उमास्वामी, तत्वार्थ सूत्र, अध्याय 6, सूत्र-13

  2. पूज्यपाद स्वामी, सर्वार्थसिद्धि पृष्ठ 331

  3. आ. अकलंकदेव जी, तत्त्वार्थिवार्तिक, अ..6, सूत्र. 13. पृष्ठ-311, भाग-2,

  4. आ० उमास्वामी जी, तत्त्वार्थसूत्र, अ.6, सू. 15


2

यह घटना चौथे काल की है। क्योंकि पंचम काल के मुनि में इतनी शक्ति, योग्यता नहीं होती कि वह इतना तप कर सकें, जिससे ऋद्धि प्रकट हों।
विष्णुकुमार मुनि ने यह उपसर्गनिवारक कार्य मुनि पद छोड़‌कर गृहस्थ वेष धारण करके किया था। इसलिए टोडरमलजी ने लिखा कि-

“विष्णुकुमार ने मुनियों का उपसर्ग दूर किया, सो धर्मानुराग से किया, किन्तु मुनि पद छोड़‌कर यह कार्य करना योग्य नहीं था, क्योंकि ऐसा कार्य तो गृहस्थ धर्म में संभव है। और गृहस्थधर्म से मुनिधर्म ऊँचा है,
सो ऊंचा धर्म छोड़कर नीचा (गृहस्थ) धर्म अंगीकार किया, वह अयोग्य है।
परन्तु वात्सल्य-अंग की प्रधानता से विष्णुकुमारजी की प्रशंसा की है।
इस छल (बहाने) से औरों को ऊँचा धर्म छोड़ कर नीचा धर्म अंगीकार करना योग्य नहीं है।”¹

टोडरमलजी के वक्तव्य के तीन गर्भितार्थ हैं-

  1. मुनि उपसर्ग दूर करने का कर्तव्य गृहस्थों का है, न कि मुनिका.

  2. विष्णुकुमार मुनि को भी यह मुनिपना छोड़कर करना पड़ा.

  3. इस उदाहरण से अन्य जीवों को छल (बहाना) नहीं ग्रहण करें। टोडरमलजी ने" विष्णुकुमार के वात्सल्य अंग की प्रधानता कही
    है।

गृहस्थों को उनका कर्तव्य बताया और कहा प्रथमानुयोग पढ़कर छल ग्रहण नहीं करें।

यह तो साधर्मी का साधर्मी के प्रति वात्सल्य का प्रसंग है। सिद्धान्त में मुनि के शुक्ल, धर्म, आर्त्त तीन ध्यान कहे हैं। आर्त्त ध्यान निदान को छोड़कर इष्ट वियोग, अनिष्टसंयोगज और वेदनाजन्य-ये तीन छठे प्रमत्त गुणस्थान में मुनि के हो सकते हैं।

जब मुनि के आर्त्त ध्यान संभव है, तब वात्सल्य भाव क्यों नहीं हो सकता है। वात्सल्य भाव न होता तो शास्त्र क्यों लिखते ?

रिफरेंस ग्रंथ:

टोडरमल जी, मोक्षमार्ग प्रकाशक, अ. 8, पेज-274


3

ज्ञानियों का वात्सल्यभाव अहेतुक होता है। ज्ञानी को ज्ञानी, अज्ञानी दोनों के प्रति वात्सल्य भाव होता है।

विष्णुकुमार के वात्सल्य भाव उमड़ा था, परंतु उसकी परिणति गृहस्थ में ही संभव थी, अतः दीक्षाच्छेद करके गृहस्थ बने।

पहले वे अपने बड़े भाई राजा प‌द्म के पास गये। उन्हें समझाया कि बिना विवेक के कार्य के दुष्परिणाम कैसे होते हैं?

फिर अकंपनादि मुनिवरों का उपसर्ग दूर कर, पुनः दीक्षा ली।

विष्णुकुमार मुनि को मुनिसंघ रक्षा का भाव आया था, उसके लिए मुनिपना छोड़कर गृहस्थ बनना अपवाद मार्ग था, उत्सर्ग मार्ग नहीं था।

सभी प्रकार के मुनि होते हैं- कोई स्थविर कल्पी होते हैं तो कोई
जिनकल्पी होते हैं तो कोई उत्सर्गमार्गी होते हैं, तो कोई अपवाद मार्गी होते हैं।

यह अपवाद मार्ग है, राजमार्ग नहीं था- टोडरमलजी का इतना ही अभिप्राय है।

गृहस्थ माघनंदी से संघ ने एक शंका का समाधान मांगा था, वहाँ संघ से माघनंदी ने पूछा था-

क्या संघ आज भी मेरा सम्मान करता है?

संघ ने उत्तर दिया-

आपका नहीं, आपके ज्ञान का संघ आज भी सम्मान करता है।
अतः गृहस्थ आदि अवस्था का नहीं, ज्ञान का सम्मान करना चाहिए।

अंत में एक प्रश्न- गृहस्थ बनने पर ऋद्धियाँ कैसे रहीं?

उसका उत्तर -

  1. “ऋद्धि ध्यानकाल में विशुध्दि से उत्पन्न होती हैं।

  2. विशुद्धि रहने तक बनी रहती हैं।

  3. विशुद्धि नष्ट हो तो भले ही बाहर में मुनि हो तो भी नष्ट होती है।

  4. विशुध्दि होने से विष्णुकुमार के कपडा भाव डालने से ऋद्धियाँ बनी रहीं।

  5. अन्तर्मुहूर्त काल के गृहस्थ पने में आये थे।

  6. वे मुनिसन्मुख गृहस्थ थे।

  7. वासना गृहस्थ की न होने से उनकी ऋद्धियाँ बनी रहीं।