रक्षाबंधन कथा | Rakshabandhan Katha

जाने अनजाने धर्म पर उपसर्ग न हो पाये।
शुभ रक्षाबंधन पर्व ये संकल्प जगाये।। टेक।।

ज्ञायक की हो न उपेक्षा, संयोगों की नहीं चिन्ता।
हों तृप्त स्वयं में क्षण-क्षण, नहीं हो किंचित् व्याकुलता।।
ज्ञेयों से भिन्न सु ज्ञायक, अनुभव माँही आये।। 1।।

है निरुपसर्ग शुद्धातम, उपसर्ग विकल्प सतावें।
ध्रुव ज्ञायक के आश्रय से, उपसर्ग न होने पावे।।
शुद्धातम ही है शरणा, ध्रुव में ही रम जाये।। 2।।

निज प्रभुता में नहीं शंका, तत्त्वों में भी निःशंका।
परिपूर्ण स्वयं में श्रद्धा, पर धर्मों में नहिं वांछा।।
अशुभोदय होने पर भी, नहीं ग्लानि हो पाये।। 3।।

चाहे जैसे नहीं माने, तत्त्वों का मर्म पिछाने।
चिगते को धर्म में दृढ़ कर, स्थितिकरण नित ठाने।।
धर्मी के प्रति भावों में, वात्सल्य उमगाये।। 4।।

अज्ञान को दूर भगाकर, शुभ तत्त्वज्ञान फैलाकर ।
नित भेदज्ञान के द्वारा, आतम अनुभव प्रगटाकर ।।
स्थिरता का हो उद्यम, उपयोग न भटकाये ।। 5।।

हैं धन्य अकम्पन स्वामी, अरु धन्य सभी मुनिराजा।
भारी उपसर्ग भये भी, जो करें आपनो काजा।।
बलि आदिक प्रति भी जिनको, कुछ क्रोध न उपजाये ।। 6 ।।

श्री विष्णुकुमार मुनीन्द्रा, चैतन्य ऋद्धि के धारी।
विक्रिया ऋद्धि प्रति जिनको, थी सहज उपेक्षा भारी ।।
वात्सल्य संघ प्रति जागा, वामन बनकर धाये।। 7।।

उपसर्ग दूरकर तत्क्षण प्रायश्चित लिया अविकारा।
निज ध्येय रूप को ध्याकर, अविनाशी शिवपद धारा ।।
उन गुरुओं के चरणों में, नित शीश नवाये ।। 8।।

श्री देव-शास्त्र अरु गुरुवर, साधक साधर्मी सुखकर ।
मदवश प्रमाद के कारण, कहीं हो नहीं जाये अनादर ।।
धर्मी का आदर करते, निज भाव सहज बढ़ जाये ।। 9 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह