पुत्र-माता संवाद | Putra-Mata Samvad

पुत्र-
शुद्ध होकर मैं मंदिर को धाया, प्रभु को श्रद्धा सहित सिर झुकाया।
आज्ञा पाली सभी, दर्शन कीने अभी, माता मेरी ।।
भोजन देने में मत कर तू देरी ।। 1 ।।

माता-
मैं हूँ चेतन प्रभू, तुम
भी चेतन ही हो, ज्ञानधारी।
इसमें परिवर्तन
नहीं
करना
है।।
कैसे कहते हो मैं माँ तुम्हारी ।। 2 ।।

पुत्र-
माता मैंने तो अब तक सुना था, जन्म दात्री बड़ी होती माता।
तुम बड़ी मुझसे हो, जन्म दीना अहो, माता मेरी ।।
इसलिए आशा कीनी मैं तेरी ।। 3 ।।

माता-
दोनों काल अनादि से भ्रमते, नाना योनियों में जन्म धरते।
आयु को पूर्ण कर, वहाँ से प्रस्थान पर, अति दुःखारी ।।
कैसे कहते हो मैं माँ तुम्हारी ।। 4 ।।

पुत्र-
माता काया कहाँ से ये आई ? गर्भ में तो तुम्हीं ने बनाई ।
वहाँ पै भोजन दिया, अंग सुन्दर किया, माता मेरी ।।
कायापेक्षा कहूँ माता मेरी ।। 5 ।।

माता-
धर्मशाला में यात्री हैं आते, ठहरते फिर वहाँ से सिधाते ।
वैसे निजकर्म से, गर्भ में आ बसे, गति ये धारी ।।
कैसे कहते हो काया हमारी ।। 6 ।।

पुत्र-
माना अपने करम से ही पाई, फिर भी काया तो मेरी ही माई।
इन्द्रियों से सबल, श्वाँस बिन मैं निबल, माता मेरी ।।
पुष्टि कर्जी तुम्हीं माता मेरी ।। 7 ।।

माता-
इस अवस्था में जो तन दिखाता, वह तो पुद्गल, नहीं तुमसे नाता।
ये तो प्रत्यक्ष जड़, तुमसे होगा विलग, ये विकारी।।
तुम तो चैतन्यमय निर्विकारी ।। 8 ।।

पुत्र

माना काया से मेरा न नाता, जीव इसको यहीं छोड़ जाता।
ओह ! अब क्या करूँ, चेतन कैसे वरूँ, सुख हो नेरी ।।
शीघ्र मुझको बता माता मेरी ।।9।।

माता
जब ये काया नहीं है तुम्हारी, दृष्टि क्यों तुमने मुझपै है डारी।
मुझको माता कहो, व्यर्थ मोह गहो ज्ञानधारी ।।
तुम स्वयं सुखमय अविकारी ।। 10 ।।

पुत्र-
समझा तुम तो कथन मात्र माता, कौन देगा मुझे सुख साता ।
जिससे दुःख को हरूँ, सत्य मारग लगूँ, हो न देरी ।।
निश्चय माता बता तू ही मेरी ।। 11 ।।

माता-
पूर्व में पुण्य तुमने कमाया, धर्म साधन का शुभ योग पाया।
तत्त्वज्ञानी मिले जिनवाणी मिली, माँ तुम्हारी ।।
कैसे कहते हो मैं माँ तुम्हारी ।। 12 ।।

बात इनकी सुनो और मानो, शीघ्र निज आत्मा को पिछानो।
ज्ञान अभ्यास कर, स्वानुभव कर निडर, हो सुखारी ।।
कैसे कहूँ मैं माता तुम्हारी ।। 13 ।।

पुत्र-
माता उपकार तेरा महा है, स्वाद आत्मा का आज चखा है।
बाह्य दृष्टि तजूँ, लीन निज में रहूँ, मेटूँ फेरी ।।
देओ आशिष मुझे माता मेरी ।। 14 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह