भले धीरे चलो थोड़ा, शिष्य तुम चलते रहो,
अपने प्रयोजन हेतु चेतन, अहर्निश जागृत रहो।
विकारों में उलझ करके, क्यों? आत्मज्ञान भूले हो ,
उत्साह वैभवपूर्ण हो, अपने प्रयोजन हित चलो।।
दूरस्थ लक्ष्य पास हो, चलते रहो चलते रहो,
प्रकाशित दीप अंतर में, उसे ज्योतित करते रहो।
ज्ञायक स्वभाव आत्मा का, उसे तुम भूलते क्यों हो ?
उत्साह वैभवपूर्ण हो, अपने प्रयोजन हित चलो ।।
है सुख जो तेरा लक्ष्य में, उसके लिए बढ़ते चलो,
बस कर्म तेरे हाथ में, परिणाम चिंतन मत करो।
होगा वही जो होना है, क्योंकि सभी क्रमबद्ध है,
उत्साह वैभवपूर्ण हो, अपने प्रयोजन हित चलो ।।
काल लब्धि जब पके, परिणाम स्वयं प्राप्त हो,
परम पुरुषार्थ है यही, वस्तु स्वभाव जान लो।
पुरुषार्थ और पुरुषार्थियों से, है देश समाज यह,
उत्साह वैभवपूर्ण हो, अपने प्रयोजन हित चलो।।
सत् शिव सुंदर धाम को, दृष्टि में स्वीकार लो।
विनयवंत उद्यमी पुरुष को, मुक्ति लक्ष्मी प्राप्त हो।
जब तक न पाओ लक्ष्य आत्मन, सतत तुम चलते रहो,
उत्साह वैभवपूर्ण हो, अपने प्रयोजन हित चलो ।।
AJ
रचनाकार: शाश्वत अन्नू जैन, शाश्वत धाम, उदयपुर
Instagram: @annuJain991
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