अब तक पुण्य और पाप किये हम, धर्म स्वरूप विचारा ना।
आस्रव बंध निरंतर करता, संवर-निर्जरा जाना ना।। 1।।
पुण्य भाव ही धर्म मानता, मिथ्या भूल रही मेरी।
पर भावों से प्रीति लगाकर, हुई परिणति जड़ केरी।। 2।।
हेय पाप है हेय पुण्य दोनों ही बंध के कारण हैं।
अशुचि अचेतन अध्रुव दुखमय, दोनों भव के ही कारण हैं।। 3 ।।
यद्यपि पापों से बचने को, पुण्य भाव हो जाता है।
किन्तु उसे भी हेय मानता, वही तत्त्व का ज्ञाता है।। 4।।
पुण्य क्षणिक जड़मय विभाव है, कर्म रूप जानो भाई।
निज स्वभाव के घातक अशरण, आस्रव ही मानो भाई।। 5।।
धर्म पुण्य से न्यारा है, यह जीव स्वभाव कहाता है।
वीतरागतामय संवर-निर्जरा-मोक्ष का दाता है।। 6।।
पुण्य से धर्म नहीं होता, बस स्वर्गादिक मिल जाता है।
एक मात्र शुद्धात्म शरण से ही सच्चा सुख पाता है।। 7।।
तजो-तजो मिथ्याबुद्धि, पर से उपयोग हटाओ तुम।
‘आत्मन्’ निज ही में तन्मय हो, अविनाशी शिव सुख पाओ तुम।।8।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह