पूजा सम्बन्धी-भेद-विज्ञान | Puja Sambandhi-Bhed-Vigyan

तर्ज : शांत चित्त हो …

पूजा में जो शब्द निकलते, भाषा वर्गणा का वह काम।
सामग्री भी जो चढ़ती है, उसमें नहीं तुम्हारा नाम ।। 1 ।।

अपनी क्रियावती शक्ति से, उनका क्षेत्रान्तरण हुआ।
गुण वस्तुत्व और द्रव्यत्व से, उनका खुद परिणमन हुआ ।। 2 ।।

होंठ-तालू-हाथों-आँखों ने, अपना-अपना कार्य किया।
सभी कार्य स्वयमेव हुए हैं, अन्य-अन्य ने नहीं किया ।। 3 ।।

उसी समय निज की परिणति में, योग और उपयोग हुआ।
जिसके कारण निज आत्मा से, पुण्य कर्म का बंध हुआ ।। 4 ।।

सो भी यदि परिणाम उस समय, अशुभ भाव से मुक्त रहे।
पंच-परम गुरु सर्व पूज्यों के गुणों माहिं अनुरक्त रहें ।। 5 ।।

किन्तु सरस वच मैंने बोले, तन-मन स्थिर कीना है।
द्रव्य चढ़ाई अति मँहगी, इस भाँति धर्म बहु कीना है ।। 6 ।।

किंचित् भी मैं बड़ा पुजारी, हो घमण्ड ऐसा मन में।
तो मिथ्यात्व फले फूलेगा, सदा रुलेगा भव-वन में।। 7।।

पूजा से बहुते जीवों के, संकट दूर हुए भगवान्।
मेढ़क भी तो स्वर्ग लोक में देव बना था वैभववान ।। 8 ।।

भोग सम्पदा मिले मुझे भी, यदि ऐसा हो जाय निदान।
तो फिर पूजा निष्फल जानो, पाप बंध का कारण जान ।। १ ।।

ऐसी पूजा तो हे आत्मन् ! बहुत बार तुमने कीनी।
एक बार भी पूज्य प्रभु सम, सम्यग्दृष्टि नहीं लीनी।। 10 ।।

वीतराग के गुण सुमिरन को, ज्ञानीजन पूजा कहते।
उन सम निज स्वभाव आश्रय ले, वे भी सच्चा सुख लहते ।। 11 ।।

तुम भी भेदज्ञान पूर्वक, परिणाम शुद्धि का करो उपाय।
जिससे चंचलता सब छूटे, निज में ही स्थिरता आय ।। 12 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह