पृथक्त्वैकान्त की समीक्षा
-प्रो. वीरसागर जैन
पृथक्त्वैकान्त की चर्चा मुख्य रूप से आचार्य समन्तभद्रस्वामी कृत ‘आप्तमीमांसा’ के द्वितीय परिच्छेद में आई है, जिसे बाद में आचार्य अकलंक एवं विद्यानन्द स्वामी आदि ने भी उसकी ‘अष्टशती’ एवं ‘अष्टसहस्री’ आदि टीकाओं में बहुत विस्तार के साथ स्पष्ट किया है ।
पृथक्त्वैकान्त को द्वैतैकान्त या भिन्नैकान्त भी कहा गया है | आप्तमीमांसा के द्वितीय परिच्छेद में कुल 13 कारिकाएँ हैं, क्रमांक 24 से 36 तक | इन सबकी विषयवस्तु संक्षेप में इसप्रकार ज्ञातव्य है-
- कारिका 24 से 27 तक चार कारिकाओं में अद्वैतैकान्त का निराकरण है |
- कारिका 28 से 31 तक चार कारिकाओं में द्वैतैकान्त का निराकरण है ।
- कारिका 32 में उभयैकान्त व अवाच्यैकान्त का निराकरण है |
- कारिका 33 से 36 तक चार कारिकाओं में स्याद्वाद की स्थापना है |
यहाँ हम कारिका 28 से 31 तक में वर्णित द्वैतैकान्त, जिसका अपर नाम पृथक्त्वैकान्त या भिन्नैकान्त भी है, की समीक्षा करने का प्रयास करेंगे |
यह द्वैतैकान्त या पृथक्त्वैकान्त दो प्रकार से कहा गया प्रतीत होता है-
- यौगाभिमत पृथक्त्वैकान्त (कारिका 28 में)
- बौद्धाभिमत पृथक्त्वैकान्त ( कारिका 29 से 31 में)
यौगाभिमत पृथक्त्वैकान्त में यौग अर्थात् नैयायिक-वैशेषिकों के मत का निराकरण है और बौद्धाभिमत पृथक्त्वैकान्त में बौद्धों के मत का निराकरण है | यहाँ हम दोनों को पृथक्-पृथक् समझने का प्रयास करते हैं |
यौगाभिमत पृथक्त्वैकान्त की समीक्षा -
नैयायिक और वैशेषिकों का मानना है कि द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव - ये सातों पदार्थ सर्वथा पृथक् पृथक् हैं | इसी प्रकार प्रमाण, प्रमेय आदि सोलह पदार्थ भी सर्वथा पृथक् पृथक् ही हैं। उन सबके के सर्वथा पृथक् पृथक् होने का कारण उनमें विद्यमान पृथक्त्व गुण है | वे सब उस पृथक्त्व गुण के कारण ही सदा सर्वथा पृथक् पृथक् रहते हैं |
इस पर जैनाचार्यों का कहना/पूछना है कि वे पदार्थ उस पृथक्त्व गुण से पृथक् हैं या अपृथक् ? अपृथक् तो आप कह ही नहीं सकते, क्योंकि गुण और गुणी में आपने सर्वथा भेद माना है, अतः यदि आप अपृथक् कहेंगे तो स्वसिद्धांतविरोध उपस्थित होगा | तथा यदि पृथक् कहेंगे तो वे सब पदार्थ जब उस पृथक्त्व गुण से ही पृथक् हो जाएँगे, तब फिर वे पृथक् पृथक् किससे रहेंगे ? अपृथक् ही सिद्ध होंगे | यदि कहा जाए कि समवाय के द्वारा पृथक्त्व गुण द्रव्य, गुण, कर्म आदि से पृथक् नहीं होगा तो फिर वही प्रश्न पुनः उपस्थित होगा जो पृथक्त्व के सम्बन्ध में उत्पन्न हुआ था | समवाय का समवाय किससे होगा ? ऐसे में अनवस्था दोष भी उत्पन्न होगा |
समवाय को मानने पर यह व्यवस्था भी कैसे होगी कि ज्ञान गुण का समवाय आत्मा से ही है, पुद्गल आदि अन्य किसी से नहीं; उष्ण गुण का समवाय अग्नि से ही है, आकाश आदि अन्य किसी से नहीं ।
पृथक्त्वैकान्त को मानने पर गुण-गुणी, क्रिया-क्रियावान, अवयव-अवयवी, सामान्य-सामान्यवान, विशेष-विशेषवान आदि का विधान भी नहीं बन सकता है | अर्थात् यह कैसे कहा जा सकेगा कि यह गुणी है और यह इसका गुण है, इत्यादि | यह व्यपदेश कैसे हो सकेगा कि ज्ञान आत्मा का गुण है, गन्ध पृथ्वी का गुण है, इत्यादि | समवाय के द्वारा भी इनमें एकत्व की प्रतीति नहीं हो सकती है |
पृथक्त्व गुण से सबको पृथक्-पृथक् मानने में एक आपत्ति यह भी है कि वह पृथक्त्व गुण एक है या अनेक ? यदि अनेक है तो फिर उन सबमें एकत्व की प्रतीति होगी और यदि एक है तो वह एक गुण अनेक पदार्थों में कैसे स्थित रह सकता है ?
यौगाभिमत पृथक्त्वैकान्त के निराकरण का सम्पूर्ण निर्देश आप्तमीमांसा की निम्नलिखित 28वीं कारिका में भलीभांति हुआ है | यथा-
पृथक्त्वैकान्तैकान्तपक्षेऽपि पृथक्त्वादपृथक् तु तौ ।
पृथक्त्वे न पृथक्त्वं स्यादनेकस्थो ह्यसौ गुणः ||
इसे यदि और अधिक विस्तार से समझना हो तो इसकी अष्टशती, अष्टसहस्री आदि टीकाओं का अध्ययन करना चाहिए | आर्यिका ज्ञानमती और प्रो. उदयचन्द जैन ने भी अपनी व्याख्याओं में इस विषय का अच्छा स्पष्टीकरण किया है ।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि यौगाभिमत पृथक्त्वैकान्त को समीचीन नहीं माना जा सकता |
बौद्धाभिमत पृथक्त्वैकान्त की समीक्षा -
बौद्धों का मानना है कि सभी पदार्थ परमार्थतः क्षणिक हैं, प्रतिक्षण विनाशशील हैं, किन्तु भ्रान्तिवश वे हमें नित्य जैसे प्रतीत होते हैं | बौद्धों का यह भी मानना है कि प्रत्येक कार्य का अणु-अणु परमार्थतः सर्वथा पृथक्-पृथक् हैं तथा कार्य एवं कारण भी परमार्थतः सर्वथा पृथक् पृथक् ही हैं, निरन्वय विनश्वर हैं | हमें अज्ञान के कारण उनका पृथक्त्व दिखाई नहीं देता है |
किन्तु जैनाचार्यों का कहना है कि यदि प्रत्येक कार्य का अणु-अणु यदि सर्वथा पृथक्-पृथक् ही हैं तो फिर घट का रूप कैसे दिखाई देता है ? न केवल दिखाई देता है, उसमें जलाहरण आदि की अर्थक्रिया भी सम्पन्न होती है | वह कैसे सम्पन्न होती है ?
इसीप्रकार यदि कारण से कार्य सर्वथा पृथक्-पृथक् ही है तो मृत्पिंड के नाश हो जाने के बाद आखिर घट किससे बनता है ? उसकी व्यवस्था कैसे होगी ?
बौद्धों की एक और विशेष बात है कि वे प्रत्येक पदार्थ का निरन्वय विनाश मानते हैं, उनमें किसी प्रकार का एकत्व नहीं मानते हैं, फिर भी सन्तान, समुदाय, साधर्म्य और प्रेत्यभाव को मानते हैं | इन सन्तान आदि से ही वे सर्व व्यवस्थाओं की सिद्धि कर लेते हैं। जैसे कि उनके अनुसार आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है, किन्तु ज्ञान की सन्तान चलती है वही आत्मा है | तथा वह ज्ञान भी परमार्थतः क्षणिक है, किन्तु उसकी सन्तान चलती है, उससे स्मृति आदि का व्यवहार हो जाता है | इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिए |
किन्तु जैनाचार्यों का कहना है कि सन्तान, समुदाय, साधर्म्य, प्रेत्यभाव के लिए भी एकत्व का होना अनिवार्य है | एकत्व के अभाव में उनको उसी प्रकार सिद्ध नहीं किया जा सकता, जिस प्रकार मूल के अभाव में वृक्ष को सिद्ध नहीं किया जा सकता | जब विनाश को निरन्वय ही मान लिया गया तो कार्य-कारण आदि की समीचीन व्यवस्था कैसे बन सकती है ? स्मृति आदि का व्यवहार प्रामाणिक, अविसंवादी कैसे माना जा सकता है ? प्रेत्यभाव को एक ही जीव का कैसे माना जा सकता है ? पाप-पुण्य और उसके फल की व्यवस्था कैसे बन सकती है ? यदि परमाणु भी सर्वथा क्षणिक और अन्य सजातीय-विजातीय परमाणुओं से व्यावृत्त है तो उनमें समुदाय की प्रतीति कैसे हो सकती है ? इसीप्रकार एकत्व के अभाव में अनेक पदार्थों में साधर्म्य भी नहीं बन सकता है | साधर्म्य, समुदाय आदि की प्रतीति को मिथ्या भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह सर्वानुभूत है, उसे आप (बौद्ध) भी स्वीकार करते हैं ।
इस सन्दर्भ में आप्तमीमांसा की निम्नलिखित कारिका महत्त्वपूर्ण है-
सन्तानः समुदायश्च साधर्म्य च निरंकुशः |
प्रेत्यभावश्च तत्सर्वं न स्यादेकत्वनिह्नवे || 29 ||
पृथक्त्वैकान्त को मानने पर और भी अनेक दोष उपस्थित होते हैं | जैसे कि एक दोष उत्पन्न होता है कि ज्ञान और ज्ञेय दोनों सर्वथा पृथक् सिद्ध होंगे और ऐसी स्थिति में दोनों हो असत् सिद्ध होंगे, क्योंकि ज्ञान के अभाव में ज्ञेय नहीं हो सकता और ज्ञेय के अभाव में ज्ञान नहीं हो सकता | वही आप्तमीमांसा की निम्नलिखित कारिका में भी स्पष्ट कहा है-
सदात्मना च भिन्नं चेज्ज्ञानं ज्ञेयाद् द्विधाप्यसत् |
ज्ञानाभावे कथं ज्ञेयं बहिरन्तश्च ते द्विषाम् || 30 ||
पृथक्त्वैकान्त को मानने पर एक और भी महा दोष उत्पन्न होता है | बौद्धों के अनुसार शब्दों के द्वारा अर्थ का कथन नहीं होता है, अपितु मात्र सामान्य का प्रतिपादन होता है और यह सामान्य पारमार्थिक नहीं होता, कल्पित ही होता है | अन्य व्यावृत्ति का नाम सामान्य है | जैसे कि मनुष्यों में कोई मनुष्यत्व सामान्य नहीं रहता है, किन्तु सब मनुष्य अमनुष्यों से व्यावृत्त हैं, इसलिए उनमें एक मनुष्यत्व सामान्य की कल्पना कर ली जाती है | यही बात गोत्व आदि में सर्वत्र समझ लेनी चाहिए | जैनाचार्यों का इस सम्बन्ध में कहना है कि शब्द जब सामान्य को ही कहते हैं, विशेष को नहीं कहते हैं और सामान्य पारमार्थिक है ही नहीं, केवल कल्पित ही है तो समस्त शब्द असत्य ही सिद्ध होंगे | यथा-
सामान्यार्था गिरोऽन्येषां विशेषो नाभिलप्यते |
सामान्याभावतस्तेषां मृषैव सकला गिरः || 31 ||
इस विषय का भी विशेष विस्तार से स्पष्टीकरण समझना हो तो इसकी अष्टशती, अष्टसहस्री आदि टीकाओं का अध्ययन करना चाहिए | तथा आर्यिका ज्ञानमती, पं. जुगलकिशोर मुख्त्यार और प्रो. उदयचन्द जैन की व्याख्याओं को भी देखना चाहिए |
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि बौद्धाभिमत पृथक्त्वैकान्त को भी समीचीन नहीं माना जा सकता |
तब फिर समीचीन क्या है ? यह जानने के लिए कारिका 33 से 36 तक का प्रकरण गहराई से पढ़ना चाहिए, जिसमें स्याद्वाद की स्थापना की गई है। कहा गया है कि भेद और अभेद दोनों ही प्रमाण के विषय होने से वास्तविक हैं, कोई भी काल्पनिक नहीं है | गौण और मुख्य विवक्षा से देखा जाए तो दोनों ही एकत्र अविरोध भाव से रह सकते हैं, रहते ही हैं, उसमें कोई आपत्ति नहीं आती | यथा-
प्रमाणगोचरौ सन्तौ भेदाभेदौ न संवृती |
तावेकत्राविरुद्धौ ते गुणमुख्य विवक्षया || 36 ||
इस प्रकार हम देखते हैं कि सर्वथा अद्वैत और सर्वथा द्वैत दोनों ही एकान्त होने से अनुचित सिद्ध होते हैं और स्याद्वाद ही उसका समुचित समाधान है ।