आचार्य कुन्दकुन्द विरचित प्रवचनसार — इस थ्रेड में प्रतिदिन एक गाथा क्रमशः पोस्ट की जायेगी: प्राकृत मूल गाथा, हरिगीत अनुवाद, अन्वयार्थ एवं टीका (श्री जयसेनाचार्य/अमृतचन्द्राचार्य टीका के हिन्दी अनुवाद अनुसार)।
गाथा १
एस सुरासुरमणुसिंदवंदिदं धोदघाइकम्ममलं।
पणमामि वड्ढमाणं तित्थं धम्मस्स कत्तारं।।१।।
अर्थ: सुर-असुर-नरपतिवंद्यने, प्रविनष्टघातिकर्मने,
प्रणमन करूं हूँ धर्मकर्त्ता तीर्थ श्रीमहावीरने।
अन्वयार्थ — [एषः] यह मैं [सुरासुरमनुष्येन्द्रवंदितं] जो सुरेन्द्रों, असुरेन्द्रों और नरेन्द्रोंसे वन्दित हैं तथा जिन्होंने [धौतघातिकर्ममलं] घातिकर्ममलको धो डाला है ऐसे [तीर्थं] तीर्थरूप और [धर्मस्य कर्तारं] धर्मके कर्ता [वर्धमानं] श्री वर्धमानस्वामीको [प्रणमामि] नमस्कार करता हूँ।
भावार्थ (टीका) — यह स्वसंवेदनप्रत्यक्ष दर्शनज्ञानसामान्यस्वरूप मैं, जो सुरेन्द्रों, असुरेन्द्रों और नरेन्द्रोंके द्वारा वन्दित होनेसे तीन लोकके एक (अनन्य सर्वोत्कृष्ट) गुरु हैं, जिनमें घातिकर्ममलके धो डालनेसे जगत पर अनुग्रह करनेमें समर्थ अनन्तशक्तिरूप परमेश्वरता है, जो तीर्थताके कारण योगियोंको तारनेमें समर्थ हैं, धर्मके कर्ता होनेसे जो शुद्ध स्वरूपपरिणतिके कर्ता हैं, उन परम भट्टारक, महादेवाधिदेव, परमेश्वर, परमपूज्य श्री वर्धमानदेवको प्रथम ही प्रणाम करता हूँ।।१।।
गाथा २
सेसे पुण तित्थयरे ससव्वसिद्धे विसुद्धसब्भावे ।
समणे य णाणदंसणचरित्ततववीरियायारे ।।२।।
वळी शेष तीर्थंकर अने सौ सिद्ध शुद्धास्तित्वने ।
मुनि ज्ञान-दृग-चारित्र-तप-वीर्याचरणसंयुक्तने ।।२।।
अन्वयार्थ — [पुनः] और [विशुद्धसद्भावान्] विशुद्ध सत्तावाले [शेषान् तीर्थकरान्] शेष तीर्थंकरोंको [ससर्वसिद्धान्] सर्व सिद्धभगवन्तोंके साथ ही, [च] और [ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्याचारान्] ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार तथा वीर्याचार युक्त [श्रमणान्] श्रमणोंको नमस्कार करता हूँ ।।२।।
टीका — तत्पश्चात् जो विशुद्ध सत्तावान् होनेसे तापसे उत्तीर्ण हुए (अन्तिम ताव दिये हुए अग्निमेंसे बाहर निकले हुए) उत्तम सुवर्णके समान शुद्धदर्शनज्ञानस्वभावको प्राप्त हुए हैं, ऐसे शेष अतीत तीर्थंकरोंको और सर्वसिद्धोंको तथा ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचारयुक्त होनेसे जिन्होंने परम शुद्ध उपयोगभूमिकाको प्राप्त किया है, ऐसे श्रमणोंको — जो कि आचार्यत्व, उपाध्यायत्व और साधुत्वरूप विशेषोंसे विशिष्ट (–भेदयुक्त) हैं उन्हें — नमस्कार करता हूँ ।।२।।
गाथा ३
ते ते सव्वे समगं समगं पत्तेगमेव पत्तेगं ।
वंदामि य वट्टंते अरहंते माणुसे खेत्ते ।।३।।
हरिगीत —
ते सर्वने साथे तथा प्रत्येकने प्रत्येकने,
वंदुं वळी हुं मनुष्यक्षेत्रे वर्तता अर्हंतने ।।३।।
अन्वयार्थ — [तान् तान् सर्वान्] उन उन सबको [च] तथा [मानुषे क्षेत्रे वर्तमानान्] मनुष्य क्षेत्रमें विद्यमान [अर्हतः] अरहन्तोंको [समकं समकं] साथ ही साथ — समुदायरूपसे और [प्रत्येकं एव प्रत्येकं] प्रत्येक प्रत्येकको — व्यक्तिगत [वंदे] वन्दना करता हूँ ।।३।।
टीका (भावार्थ) — तत्पश्चात् इन्हीं पंचपरमेष्ठियोंको, उस-उस व्यक्तिमें (पर्यायमें) व्याप्त होनेवाले सभीको, वर्तमानमें इस क्षेत्रमें उत्पन्न तीर्थंकरोंका अभाव होनेसे और महाविदेहक्षेत्रमें उनका सद्भाव होनेसे मनुष्यक्षेत्रमें प्रवर्तमान तीर्थनायकयुक्त वर्तमानकालगोचर करके, (महाविदेहक्षेत्रमें वर्तमान श्री सीमंधरादि तीर्थंकरोंकी भाँति मानों सभी पंच परमेष्ठी भगवान वर्तमानकालमें ही विद्यमान हों, इसप्रकार अत्यन्त भक्तिके कारण भावना भाकर — चिंतवन करके उन्हें) युगपद् युगपद् अर्थात् समुदायरूपसे और प्रत्येक प्रत्येकको अर्थात् व्यक्तिगतरूपसे संभावना करता हूँ । किस प्रकारसे संभावना करता हूँ ? मोक्षलक्ष्मीके स्वयंवर समान जो परम निर्ग्रन्थताकी दीक्षाका उत्सव (-आनन्दमय प्रसंग) है उसके उचित मंगलाचरणभूत जो कृतिकर्मशास्त्रोपदिष्ट वन्दनोच्चार (कृतिकर्मशास्त्रमें उपदेशे हुए स्तुतिवचन)के द्वारा सम्भावना करता हूँ ।।३।।