प्रतिक्रमण-सूत्र | Pratikraman-Sutra

प्रतिक्रमण-सूत्र

  • यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है -

अविरत-सावक-पडिक्कमण-सुत्तं

अविरत-श्रावक
प्रतिक्रमण-सूत्र
(प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजी भाषा-निबद्ध)

लेखक एवं अनुवादक :
प्रो. सुदीप कुमार जैन
वरिष्ठतम प्रोफेसर, प्राकृतभाषा विभाग
श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय
नई दिल्ली - 110016

प्रकाशक :
महावीर परमार्थ फाउण्डेशन
नई दिल्ली-110074

इस कृति के विषय में…

दिखावा-रहित ‘शिष्टाचार’ और दागा-रहित ‘सदाचार’ की समवेत-शिक्षा एवं अचूक-प्रभाववाली प्रक्रिया का नाम ‘प्रतिक्रमण’ है।

नैतिकता एवं धार्मिक-सदाचरण की यदि हमें कहीं बिना किसी औपचारिकत्ता के स्वेच्छिक-प्रस्तुति देखनी है, जो दूसरों को प्रभावित करने के लिये न होकर सचमुच अपने को सुधारने के लिये पूरी-निष्ठा एवं ईमानदारी से प्रतिफलित होती है, तो वह ‘प्रतिक्रमण’ ही है।

मनो-मालिन्य को मिटाने, पारस्परिक-सौहार्द को बढ़ाने के साथ-साथ जो व्यक्ति को उसकी अपनी दृष्टि से प्रतिष्ठित बनाती है, वह अनूठी-विधि ‘प्रतिक्रमण’ है।

संयोगवश यह अतुलनीय-प्रक्रिया आज तक धर्मक्षेत्र में अतिविशिष्ट (मुनिराजों) एवं विशिष्ट (देशव्रती-श्रावकों) पदों के धारकों तक ही सीमित थी, क्योंकि अन्य सामान्यजनों के लिये इसका पाठ्यक्रम ही नहीं बना था, तो वे इसे सीखने और अपनाते कैसे?

इसी चिर-अभाव की पूर्ति-हेतु की गयी सरल-सुगम एवं सर्वांगोपयोगी-कृति का नाम है ‘अविरत-श्रावक प्रतिक्रमण-सूत्र’, जो वास्तव में रटने की नहीं, बल्कि जीवन का अंग बनाने के लिये शब्दांकित हुई रचना है।

इस ग्रन्थ के अतिविशिष्ट एवं विशिष्ट-वर्गों के भाषिक-स्वरूप ‘प्राकृतभाषा’ में ही मूलतः इस सामान्यजन के लिये लिखे गये इस संस्करण को निबद्ध किया है, तथा विविध-भाषाभाषीयों को सुविधा के लिये इसके संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजी भाषाओं में मूलानुगामी-अनुवाद दिये गये हैं।

अविरत-श्रावक

प्रतिक्रमण-सूत्र
(प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजीभाषा-निबद्ध)

लेखक एवं अनुवादक :
प्रो. सुदीप कुमार जैन
वरिष्ठतम प्रोफेसर, प्राकृतभाषा विभाग
श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय
(केन्द्रीय विश्वविद्यालय)
नई दिल्ली - 110016

प्रकाशक :
महावीर परमार्थ फाउण्डेशन (पंजीकृत)
नई दिल्ली 110074

महावीर परमार्थ फाउंडेशन, नई दिल्ली का चतुर्थ-प्रकाशन

अविरत-श्रावक प्रतिक्रमण-सूत्र

(प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजी-भाषाओं में)
लेखक व अनुवादक : प्रो. सुदीप कुमार जैन
ISBN No. : 978-81-938483-3-3
प्रकाशक : महावीर परमार्थ फाउंडेशन (रजि.), नई दिल्ली
© : लेखक प्रो. सुदीप कुमार जैन के पास सर्वाधिकार सुरक्षित
प्राप्ति-स्थान : प्रो. सुदीप कुमार जैन
बी-32, छतरपुर एक्सटेंशन, नंदा हॉस्पीटल के पीछे,
नई दिल्ली-110074, मो- 8750332266
मुद्रक : एस.पी. प्रिंटर्स, (www.esspeeprinters.com)
लागत मूल्य : 80/-
प्रथम-संस्करण : 2000 प्रतियाँ (2020 ई.)

Avirat-Shravak

PRATIKRAMAN-SUTRA

(As per jain philosophical methods, Pratikraman Sutra is a process
of self-discipline by observing and correcting our own potential
faults/ mistakes in our lives and seek resolution daily.)
Author & Translator : Prof. Sudeep Kumar Jain
Publisher : Mahaveer Parmarth Foundation,
New Delhi-110074
© : All Rights Reserved with Author
Prof. Sudeep Kumar Jain, Delhi
ISBN No. : 978-81-938483-3-3
Size : Demy Size, 112 Pages
Printer : Ess Pee Printers, (www.esspeeprinters.com)
Price : 80/-
First Edition : 2000 Copies, at 2020 A. D.

विषय-सूची

  1. प्रकाशकीय ४
  2. सम्पादकीय ५
  3. अपनी बात ६
  4. प्रस्तावना ७
  5. प्ररोचना २५
  6. समर्पण २६
  7. प्राकृत-प्रतिक्रमण-सूत्र 1
  8. संस्कृत-प्रतिक्रमण-सूत्र 13
  9. हिन्दी-प्रतिक्रमण-सूत्र 25
  10. गुजराती-प्रतिक्रमण-सूत्र 39
  11. अंग्रेजी-प्रतिक्रमण-सूत्र 53
  12. परिशिष्ट-1 67-71
    पीलिका
    चउब्बीस-तित्थयर-थुदि
    पंच-महागुरु-भत्ती
    सिद्ध-भत्ती
  13. परिशिष्ट-2 72-74
    अविरत-श्रावक-प्रतिक्रमण-संबंधी पारिभाषिक-पदों का
    परिचय

प्रकाशकीय

भगवान् श्री महावीर स्वामी के प्रधान-शिष्य इन्द्रभूति गौतम स्वामी ने जब
प्रतिक्रमण-सूत्र की रचना की थी, तबसे आज तक उसमें मात्र दो वर्ग के धर्मावलंबियों
के लिये ही प्रतिक्रमण के पाठ थे, मुनिराजों के लिये ‘यति-प्रतिक्रमण’ एवं देशविरति-
श्रावकों के लिये ‘श्रावक-प्रतिक्रमण’। अविरति-श्रावकों के लिये कोई प्रतिक्रमण आज
तक नहीं बना था। इस बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति इस संस्करण के द्वारा होने जा
रही है, यह अपार-हर्ष का विषय है।

समाज के सुप्रतिष्ठित-विद्वान् प्रो. सुदीप कुमार जैन जी ने बड़ी-निष्ठा के
साथ इसका मूलपाठ प्राकृत भाषा में जिनागम की मर्यादा के अनुरूप लिखा है,
जिसमें गौतम-स्वामी ने आज से 2550 वर्षों से अधिक समय पहले प्रतिक्रमण के पाठ
लिखे थे। और उस पाठ का प्रामाणिक संस्कृत, हिन्दी-भाषाओं में रूपांतरण उन्होंने
स्वयं करके दिया है तथा गुजराती एवं अंग्रेजी के अनुवाद को उन्होंने इन भाषाओं के
विद्वानों से परामर्श करके बनवाया है। इसप्रकार यह संस्करण पाँच-भाषाओं में एकसाथ
प्रकाशित होने जा रहा है-इसका हमें गर्व है।

इसके लेखन आदि कार्यों के लिये कई धर्मानुरागी महानुभावों (विशेषतः श्री
आनंद जैन, दुबई, श्री भंडारी परिवार, बेंगलुरु, श्री कमल बोहरा, कोटा, श्रीमती मधु
जैन, दिल्ली एवं डॉ. अरविंद जैन, करहल, श्री मुकेश जैन सर्राफ, सहारनपुर आदि) ने
बारम्बार डॉ. सुदीप जी से अनुरोध करके उनसे यह अत्यन्त लोकोपयोगी-कृति लिखने
का अनुरोध कर रहे थे। उन्होंने अतीव-श्रम एवं निष्ठा के साथ यह कार्य सम्पन्न किया
है।

एस. पी. प्रिंटर्स के श्री अक्षय जैन ने कम समय में बहुत समर्पण के साथ इसका
स्तरीय-मुद्रणकार्य किया है। धर्मानुरागी श्री अमित जैन DIDC कूरियर्स ने इस कृति
को धर्मानुरागियों एवं विभिन्न-स्थानों तक पहुँचाने का दायित्व सहर्ष स्वीकार्य किया
है, तदर्थ हम उनके कृतज्ञ हैं। इसकी ‘प्ररोचना’ लिखने के लिए मैं वयोवृद्ध-विद्वान्
पं. शांतिलाल जैन, महीदपुर (म.प्र.) का भी हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। सभी
प्रेरक एवं सहयोगी-जनों के आभार-पूर्वक मैं प्रो. सुदीप कुमार जैन के प्रति इस कृति के
निर्माण के लिये कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।

- अजित प्रसाद जैन, अध्यक्ष
महावीर परमार्थ फाउंडेशन

सम्पादकीय

यद्यपि यह अविरति-श्रावक-प्रतिक्रमण-पाठ मूलतः प्राकृतभाषा में मैंने ही लिखा है, किन्तु इसमें अपनी मर्जी या पूर्वाग्रहों को तनिक भी नहीं जोड़ा है। अविरत-श्रावकों एवं सम्यग्दृष्टियों के जीवन में जैसी सहज-धर्माराधना होती है और उसमें जो दोष संभावित होते हैं, उनका जिनागम के आधार पर ही प्राचीन-दिगम्बर-जैन-आगमों की भाषा में शालीनतापूर्वक लिपिबद्धीकरण किया गया है। और फिर इसका संस्कृत-रूपान्तरण, एवं सरल-हिन्दी-अनुवाद भी मैंने सावधानीपूर्वक किया है। अंग्रेजी एवं गुजराती-भाषाओं के अनुवादों में मैंने इनके विशेषज्ञों की सहायता भी ली है।
इनके संयोजन एवं सम्पादन के कार्य में कुछ विसंगतियाँ आयीं, जिन्हें सावधानीपूर्वक दूर करते हुये इन पाठों को वर्गीकृत एवं व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
अत्यन्त अल्प-समयावधि (लगभग मात्र 15 दिनों) में इनका लेखन, टंकण, सम्पादन एवं परिशोधन करना अत्यन्त श्रमसाध्य तो था ही, भाषा और विषय की दृष्टि से कोई त्रुटि जानने-अनजाने में नहीं रह जाये–इसकी विशेष-सावधानी रखनी पड़ी।
इसका यह लघु-संस्करण दशरक्षण-पर्व के अन्त में विश्वभर के जिनधर्मानु-यायियों के द्वारा किये जाने वाले ‘सांवत्सरिक प्रतिक्रमण-कर्म’ के निमित्त किया गया है, इसलिये इसमें विषय-परिचयात्मक प्रस्तावना अत्यन्त-संक्षिप्त रखी गयी है, ताकि पुस्तक का कलेवर अधिक नहीं बढ़े। किन्तु इसका एक वृहत्-संस्करण शीघ्र ही तैयार करूँगा, जिसमें प्रतिक्रमण के स्वरूप एवं सार्थकता के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुये इसके समस्त-प्राकृतों के प्रामाणिक-मूलपाठों एवं उनके सटीक-हिन्दी-अनुवादों के साथ-साथ विशिष्ट-पारिभाषिक-पदों का परिचय भी यथाशक्ति दिया जायेगा। वह संस्करण लगभग 500 पृष्ठों का होगा।
विषय, समयसीमा एवं उपयोगिता की दृष्टि से यह संस्करण प्रयोजन-परक बनाया गया है, ताकि पुस्तक भारी न हो तथा उपयोग में सुविधाजनक बनी रहे।
इसके संकलन व संशोधन के कार्य में मेरी सहधर्मिणी डॉ. रंजना जैन ने पर्याप्त-सम्पूर्ण-सहयोग किया है। तदर्थ उन्हें धन्यवाद देता हूँ।

– सुदीप कुमार जैन

५

अपनी बात

मैं लगभग 17 वर्ष पूर्व जब कैलिफोर्निया दशरक्षण-पर्व के निमित्त गया, तब वहाँ अंतिम-दिन सामूहिक-प्रतिक्रमण का आयोजन देखा। लगभग सम्पूर्ण-समाजों ने तीन घंटों तक निरन्तर इस विषय पर व्याख्यान सुने एवं यथाशक्ति इसकी विधि की। उस प्रसंग में मैंने पहली बार समाज-जनों को सामूहिकरूप से प्रतिक्रमण करते देखा। यद्यपि उसका पाठ न तो परिशुद्ध था और न ही बहुत-उपयोगी, क्योंकि उसमें पिछले विभिन्न संभावित-भवों/जन्मों में हुये पापकार्यों की क्षमापना की जा रही थी। तब मैंने आश्चर्य व्यक्त किया कि “जो भूलें अभी आप करते हैं, उनका प्रतिक्रमण आप क्यों नहीं करते हैं। वह रचना आपके मन एवं जीवन में अपील करेगा और आप सब इसके निमित्त अपने में कुछ रचनात्मक-सुधार कर सकेंगे।” तब उन लोगों ने मुझसे अविरत-श्रावकों के लिये प्रतिक्रमण का पाठ बनाने का अनुरोध किया था, पर बात आयी-गयी हो गयी थी।
उसके बाद मैंने विदेश-प्रवास लगभग बंद कर दिये। दो वर्षपूर्व मैं दुबई के ‘अरिहंत मित्र मंडल’ के निमंत्रण पर वहाँ दशरक्षण-पर्व के निमित्त गया। वहाँ भी अंतिम-दिन प्रतिक्रमण का आयोजन वे सब करते थे। मैंने अपने व्याख्यान-क्रम में ‘प्रतिक्रमण’ पर भी तीन व्याख्यान दिये थे और इसका बहुआयामी-विवेचन किया था। तभी वहाँ की समाज ने मुझसे अनुरोध किया कि “मैं उन्हें प्रतिक्रमण कराऊँ।” तब मैंने वहाँ कुछ हिंदी में लिखकर उन्हें प्रतिक्रमण कराया, तो वे लोग प्रभावित हुये और मुझसे कहा कि “आप इसका प्रामाणिक पाठ बनाकर दीजिये!” मैंने उन्हें वचन तो दिया था, परन्तु भारत लौटकर अपने कार्य में व्यस्त हो गया था। अब कुछ लोगों ने मुझे स्मरण दिलाया कि यह काम मैं इस दशरक्षण-पर्व के पहले कर दूँ। तो मुझे लगा कि यदि अभी तत्काल नहीं किया, तो यह फिर अगले दशरक्षण-पर्व के लिये टल जायेगा। अतः मैंने दृढ़-संकल्पित होकर यह कार्य सम्पन्न किया है। इस कार्य के करने में ‘गुजराती-अनुवाद’ के टंकण-कार्य में रूपलबेन, दुबई का सहयोग रहा। एवं ‘अंग्रेजी-अनुवाद’ के कार्य में भाई अमित जैन (एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, नॉर्दर्न रेलवे, नई दिल्ली) उल्लेखनीय-सहयोग मिला है। एवं इसके पुनरीक्षण-कार्य में डॉ. अभिषेक तिवारी जी (श्रीलाल बहादुर शास्त्री-राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) का एवं संस्कृत-पाठ के पुनरीक्षण-कार्य में डॉ. सुमन कुमार झा (श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) का आत्मीय-सहयोग मुझे मिला है। उनका मैं कृतज्ञ हूँ।

– सुदीप कुमार जैन

६

प्रस्तावना

मनुष्य की सामाजिकता का सबसे बड़ा-आधार है कि वह स्वयं अच्छे आचार-विचार रखे और दूसरों के साथ भी परस्पर हितकारी-व्यवहार करे। अन्यथा छली-प्रपंचियों एवं क्रोध-लोभ-पूर्ण अनैतिक-आचरण करनेवालों से तो शिष्ट-व्यक्ति संबंध ही नहीं रखना चाहता है। मनुष्य की सद्-विचार, सदाचार एवं सद्-व्यवहार की आदर्श-परिणति में सबसे बड़ी-बाधा उसकी वैचारिक एवं चारित्रिक-कमजोरियाँ ही हैं। इन कमजोरियों से वह बचना तो चाहता है, किन्तु इसके लिये कोई आदर्श व्यावहारिक-पद्धति लोकजीवन में सुलभ नहीं है। इसलिये वह चाहकर भी अपने जीवन को आदर्श नहीं बना पाता है।
मनुष्य के जीवन को आदर्श बनाने की मनोवैज्ञानिक-प्रक्रिया ‘प्रतिक्रमण’ है, जैसे जिनदर्शन में वर्तमान-परिस्थितियों में अनिवार्य-जीवनशैली बताया गया है।

‘प्रतिक्रमण’ का अर्थ

प्रतिक्रमण का परिचय जिनवाणी में कृत-दोषों की परिष्कार की स्वाधीन-विधि के रूप में मिलता है। अपने स्वरूप एवं भूमिका की मर्यादा से यदि उपयोग या चर्या कहीं भटक जाये, मर्यादा-विहीन हो जाये; तो उसे पुनः लौटाकर मर्यादित करने की प्रक्रिया का ही नाम ‘प्रतिक्रमण’ है।

यह अद्भुत-वैज्ञानिकी-प्रक्रिया है एवं श्रावक से लेकर साधु तक – सभी को अपनी-अपनी भूमिकानुसार अनिवार्य-कर्तव्य है। ज्ञान और चर्या – दोनों को अद्यतन एवं सामंजस्यपूर्ण बनाकर जीवनशैली को निर्दोष बनाये रखने की यह अद्भुत की विधि है। एक ओर जहाँ यह शिष्टाचार का पुनीत-पाठ है, तो दूसरी ओर आत्मबल को निरंतर जागरूक रखने की अप्रतिम-कला है। वर्तमान युग के लिये ऐसी नितान्त-अपरिहार्य-प्रक्रिया और कहीं दूसरी नहीं मिलती है।

‘प्रतिक्रमण’ की पृष्ठभूमि

वर्तमान अवसर्पिणी-काल में इसका शुभारम्भ प्रथम-तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रधान-गणधर वृषभसेन ने किया था। इसका कारण था कि उस समय लोग सरल-प्रकृति के तो थे, छल-छिद्र नहीं करते थे; किन्तु वे धर्म व इसकी मर्यादाओं से भी

७

अनभिज्ञ थे। इसीलिए उन्हें ‘वक्र-जड़’ कहा गया। अज्ञान के कारण उनसे धर्मविधि में गलतियाँ होतीं स्वाभाविक थीं, अतः वे अपनी गलतियों को पहिचान भी न सकें और स्वयं ही उसका सुधार भी कर सकें-इस दृष्टि से उन्हें प्रतिक्रमण का अनिवार्य-विधान किया गया था।

बाद में धर्मचर्या करते करते वे लोग धर्मविधि को अच्छी तरह से जान गये, तो उन्हें प्रतिक्रमण की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी और मात्र गलती होने पर ही प्रतिक्रमण करने का निर्देश किया गया। दूसरे तीर्थंकर-अजितनाथ जी से लेकर तेईसवें तीर्थंकर-पार्श्वनाथ जी तक कुल बाईस-तीर्थंकरों के काल में प्रतिक्रमण के विषय में यही नीति रही।

किन्तु चौबीसवें-तीर्थंकर महावीर स्वामी का काल आते-आते शिष्यों की प्रकृति धर्मविधि के प्रति उदासीनतापूर्ण होने से अज्ञानता की भी हो गयी थी, और वे जितनी जो धर्मविधि करते भी थे, उसमें बाहरी दिखावा बढ़ गया था व अंतरंग-विशुद्धि घटती जा रही थी। इसीलिये इन लोगों को ‘वक्र-जड़’ (कुटिल भी + अज्ञानी भी) की संज्ञा मिली। इस स्थिति को देखते हुये महावीर स्वामी के प्रधान गणधर इन्द्रभूति गौतम ने महावीर स्वामी की शिष्य-परम्परा के समस्त श्रमणों व श्रावकों को प्रतिक्रमण की विधि अनिवार्य कर दी गयी।

जिन्नामय में ‘प्रतिक्रमण’ का स्वरूप एवं महत्त्व

प्रतिक्रमण जैसी स्वाधीन एवं सटीक, नियमित व नैमित्तिक आत्मशोधन की व्यापक-विधि मात्र जैनदर्शन में ही देखने को मिलती है। यह जहाँ आत्मिक-शुद्धि की विधि है, वहीं लौकिक-दृष्टि से भी यह शिष्टजनों की दृष्टि से आदर्श-आचारसंहिता के रूप में अनुकरणीय है।

शिष्टाचार का पहला-पाठ:-

प्रतिक्रमण का मूलमंत्र है कि अपनी गलती को पहिचानो व उसे तुरंत स्वीकार करो और प्रतिक्रमण की विधि से तुरन्त ही उसका परिष्कार कर लो। इसकी सबसे बड़ी-विशेषता यद्यपि आत्मिक-शुद्धि में है, तथापि यह एकमात्र धर्मविधि है, जो लोक में शिष्टजनों के लिये अनुकरणीय-आदर्श बनकर लौकिक-प्रतिष्ठा एवं सामाजिक-सम्मान का कारक भी सिद्ध होता है। क्योंकि लोक में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिससे कभी कोई भी गलती नहीं हुई हो; परन्तु यह भी सत्य है कि समाज में शिष्ट और

सभ्य उसे ही माना जाता है जो कि अपनी गलती को तुरंत पहिचानकर न केवल उसे स्वीकार करता है, बल्कि उसे सुधारने एवं भविष्य में पुनः नहीं करने की ईमानदार-प्रक्रिया भी करता है।

लोकजीवन में ‘प्रतिक्रमण’ की व्यावहारिकता एवं वैज्ञानिकता

लौकिक-दृष्टि से शिष्टसमाज में जहाँ लोग गलतियों को स्वीकार करना, उन पर खेद व्यक्त करना तक तो शिष्टाचार का नाते कर लेते हैं; परन्तु आध्यात्मिक तौर पर उन गलतियों के पुनः न हो सकने एवं हो चुकी भूलों को मिटाने को कोई वैज्ञानिक-विधि लोक के पास नहीं है, सिवाय ‘सॉरी’ बोलने के। उनके अनुसार ‘सॉरी’ नहीं बोले, तो समाज में अशिष्ट माने जाते हैं। इसीप्रकार धार्मिक-क्षेत्र में जो ‘प्रतिक्रमण’ नहीं करे, तो वह धर्म में अशिष्ट-व्यक्ति माना जाता है।

यहाँ यह स्वाभाविक-प्रश्न है कि तो धर्म की दृष्टि से हमें प्रतिक्रमण कब-कब करना चाहिये?-
इसका उत्तर इसप्रकार है-

  1. जब गलती हो, तभी करना चाहिये।
  2. जब हम अपनी गलती को गलती के रूप में पहिचानकर उस गलती की समीक्षा कर सकें, तब प्रतिक्रमण कर लेना चाहिये। और
  3. जिनवाणी के ग्रन्थों में आचार्यों ने जो निर्देश दिये हैं, उन शास्त्रोक्त-निर्देशों के अनुसार निर्धारित-समय पर करना चाहिये।

‘प्रतिक्रमण’ के योग्य गलतियाँ:-

जीवन में गलतियाँ कईतरह की होती हैं, कोई सामान्य भूल-चूक के रूप में होती हैं, तो कुछ गम्भीर-अपराध के रूप में। इन्हें हम निम्नलिखित तीन-वर्गों में रख सकते हैं-

  1. जानबूझकर की गयी गलती/अपराध?
  2. अनाचार?
  3. अतिचार?

तो सांकृतिकरूप में यहाँ यही कह सकते हैं कि प्रतिक्रमण मात्र अतिचाररूप हल्के दोषों/भूलों/गलतियों का ही होता है।

प्रतिक्रमण की प्रक्रिया से समाहित-कार्य-

  1. दोषों की पहिचान- इसके अन्तर्गत जो शास्त्रों के अनुसार गलतियों की पहिचान समझते हैं, वे स्वयं पहिचानें, और जो स्वयं इतनी व्यापक-जानकारी नहीं रखते हैं, वे प्रतिक्रमण के पाठों से/जिनवाणी से उन दोषों को अपनी गलती के रूप में पहिचानते हैं।
  2. दोषों को आलोचना- हम ईमानदारी से उन दोषों को अपनी गलतियों के रूप में स्वीकार करते हुये उनको नहीं छिपाने को योग्य अपराध स्वीकारते हैं, उसे ही हम सरल-शब्दों में ‘आलोचना’ कह सकते हैं।
  3. पुनः न करने का संकल्प- अपनी भूल की गलती के रूप में स्वीकार करने व अपना अपराध मानने से बात पूरी नहीं हो जाती है, बल्कि पुनः जीवन में नहीं करने का संकल्प आपके परिणामों की पवित्रता को प्रमाणित करता है।
  4. भक्ति-विशेष- जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति-विशेष से अपनी भूल को पहिचानकर उसे सुधारने की प्रक्रिया को समझते हैं, तो उसके हृदय में उस सद्बुद्ध-प्रदाता के लिये अगाध-बहुमान का भाव स्वाभाविकरूप से जगता है और वह निश्छलता से उसकी सविनय-अभिव्यक्ति करता है। इसी का रूप ‘भक्तियों का पाठ’ होता है।
  5. समताभाव या सामायिक- अपनी गलती पहिचानने पर जो अपराधबोध से ग्रस्त होकर उस व्यक्ति को व्यग्रता हुई थी, उस अपराध का निवारण करने की प्रक्रिया एवं भक्ति करने के बाद स्वाभाविकरूप से उसकी व्यग्रता शांत होती ही है, और वह निर्भार होकर समताभाव में अपने को पाता है, यही वास्तव में ‘सामायिक’ है।
  6. कायोत्सर्ग- जब अपराधबोध दूर होकर व्यक्ति स्वस्थ होकर साम्यभाव का अनुभव करता है, तो वह अपनी निरपराधी-वृत्ति की ऊर्जा को बढ़ाने के लिये कायोत्सर्ग की अत्यन्त आध्यात्मिक प्रक्रिया करता है, जैसे कि कोई व्यक्ति बीमारी दूर करने के बाद निश्चिंत होकर अपनी रोग-प्रतिरोधक-क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ाने के लिये प्राणायाम आदि की प्रक्रियायें करता है। यह कायोत्सर्ग भी आध्यात्मिक रूप से पाप-प्रतिरोधक-क्षमता यान आत्मबल बढ़ाने की ही विशिष्ट-प्रक्रिया है। और यह प्रतिक्रमण की अन्तिम एवं अनिवार्य-विधि है। इसके बिना प्रतिक्रमण की पूर्णता नहीं मानी जाती है।

यह तो इसके इतिवृत्त की बात हुई। अब इसके उद्देश्य, स्वरूप व भेद-प्रभेदों के विषय में संक्षिप्त-विवेचन प्रस्तुत कर रहा हूँ।

प्रतिक्रमण के उद्देश्य:-

  1. कृत-दोषों का परिहार,
  2. अकृत-दोषों का परिज्ञान,
  3. आत्मबल की वृद्धि,
  4. शिष्टाचार का पालन,
  5. परिणाम-विशुद्धि

‘प्रतिक्रमण’ का अर्थ :-

  1. ‘प्रति’ = की ओर /विपरीत-दिशा में
  2. ‘क्रम’ पादविक्षेपे धातु से गमनात्मक या कदम-बढ़ाना अर्थ में ‘क्रमण’ शब्द है, जिसका सामान्य-अर्थ है ‘चलना या आगे बढ़ना’।
  3. इसे प्रतिदिन पढ़ना अनिवार्य किया था, ताकि अकृत-दोषों का परिज्ञान रहे, ताकि वे दोष चर्या में न हों।
  4. किन्तु आज ‘पढ़ने’ का नाम ‘प्रतिक्रमण’ माना जाने लगा है।
  5. पर वस्तुतः ‘बढ़ने’ का नाम ‘प्रतिक्रमण’ था।
  6. बुराई/दोषों से पीछे हटकर पुनः अच्छाई की ओर बढ़ने का नाम ‘प्रतिक्रमण’ है।
  7. संकल्पपूर्वक बुराई को पहचानकर अलग करने का नाम प्रतिक्रमण है।
  8. आज जो पढ़ा जाता है, उसमें भी न तो अर्थ पर ध्यान दिया जाता है, न ही औचित्य पर।

प्रतिक्रमण के स्वरूप में पहली-खूबी है सभ्यता या शिष्टाचार की। यदि व्यक्ति अपनी गलती को गलती के रूप में पहचानता तक नहीं है, उसे उसका अहसास तक नहीं है; तब तो स्थिति बेहद-शोचनीय है। वह क्या प्रतिक्रमण करेगा? सभ्य या शिष्ट-व्यक्ति की पहली-पहचान है कि यदि उससे कोई गलती होती है, तो उसे तुरंत उसका ‘गलती’ के रूप में अहसास होता है; और वह उसे तत्काल, बिना किसी विलंब के या बिना किसी प्रतिष्ठा-प्रश्न (प्रेस्टेज-इश्यू) के उसे न केवल स्वीकार करता है; बल्कि उसका तुरंत परिष्कार भी करता है। यही विशेषता प्रतिक्रमण को महान्-विधि बनाती है।
प्रतिक्रमण की दूसरी-विशेषता है कि हम सूक्ष्म से सूक्ष्म-गलतियों को पहचान

सके, व उनको सुधारने की दृढ़-संकल्पशक्ति हमारे पास हो। यह बात धर्मज्ञान व विधि के प्रति व्यक्ति की निरंतर-सजगता के साथ साथ हम बिना किसी बहाने के (कि जैसे श्रावक वैसे साधु, या पंचकाल है, या संस्थान-संहनन से हीन है - इत्यादि) के तत्काल सुधारने को तैयार हो-इस बात की अनिवार्यता बताती है।

तीसरी-बात

है कि दोषों की इतनी क्षीणता, कि अपने संकल्पमात्र से वे विनष्ट हो सकें। आत्मबल प्रबल हो, और दोष कमजोर हों; तभी यह संभव है। यदि दोष प्रबल हों, और ऊपर से आत्मबल भी क्षीण हो; तो प्रतिक्रमण की सार्थकता ही नहीं हो सकेगी। क्योंकि तब मात्र किसी तरह पढ़ना तो हो जायेगा; परंतु प्रतिक्रमण नहीं हो पायेगा।

प्रतिक्रमण बुराई से अच्छाई की ओर बढ़ने का नाम है, पढ़ने की औपचारिकता का नाम ‘प्रतिक्रमण’ है। परन्तु आज की स्थितियों को देखते हुये तो मैं इसे पढ़ने को भी किसी सीमा तक सार्थक मानने को तैयार हूँ। क्योंकि यदि लोग पढ़ेंगे, तो गलतियों से परिचित तो रहेंगे; उन्हें पता तो रहेगा कि क्या गलत है? आज श्रावकों में से तो प्रतिक्रमण ‘पढ़ने’ के रूप में भी लुप्तप्रायः है। दिगंबरों ने तो पढ़ने की औपचारिकता का भी मज़ाक बना-बनाकर समाज में इसके पढ़ने तक की परम्परा नष्ट कर दी है, जो बेहद-घातक भी है और महावीर स्वामी के शासन की मर्यादा का उल्लंघन भी है। क्योंकि स्वयं गौतम गणधर ने इसे सभी शिष्यों को अनिवार्य बनाया था।

और कुछ प्रतिशत श्वेतांबर-भाईयों ने किसी तरह इसके पढ़ने की औपचारिकता चालू भी रक्खी है, तो उसमें विवेक को पूरीतरह तिलांजलि दी गयी है। मैं प्रत्यक्ष-साक्षी हूँ इस प्रसंग का, जिसमें वे पढ़ रहे थे कि “झाबी के भव में मैंने ऐसे दोष किये हों, ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’; तेली के भव में ऐसे दोष किये हों, ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’”। मुझे समझ नहीं आया यह क्या है? अरे! वर्तमान-चर्या के संभावित-दोषों का नाम तक नहीं ले रहे और न ही उनका ‘मिच्छामि’ करने का संकल्प कर रहे हैं?

दिगम्बर-जैन-मुनिराजों में किसी सीमा तक इसका पाठ करने की परिपाटी बची हुई है। यह शुभ-संकेत है। परंतु वे प्राकृतभाषा में इसका पाठ तो किसी तरह पढ़ लेते हैं, लेकिन इस भाषा के ज्ञान के बिना वे उस पाठ का अर्थ तक नहीं समझ पाते हैं। और जब अर्थ ही नहीं समझ पायेंगे, तब प्रतिक्रमण किसका करेंगे? यह मेरी समझ से बाहर है।
प्रतिक्रमण का पाठ तो इसलिये बनाया गया था, कि इसे पढ़कर हमें अपनी चर्या की गलतियों का ज्ञान हो जाये, और हम संकल्पपूर्वक उनका परिष्कार कर सकें।

किसी अध्यात्मवेत्ता ने कहा है - “अज्ञान की स्वीकृति ही अज्ञान की मौत का वारंट है!” जब अपनी गलतियों को हम पहचानेंगे ही नहीं और उन्हें ‘गलती’ के रूप में ईमानदारी से स्वीकार ही नहीं करेंगे; तो फिर सुधारने की कल्पना करना तक व्यर्थ है। अतः प्रतिक्रमण-पाठों के माध्यम से हमें अपने दोषों को पहचानने का सुअवसर मिलता है और बाकी-काम हमें अपनी दृढ़-संकल्पशक्ति से उन दोषों को दूर करके करना होगा।

प्रतिक्रमण : भेद-प्रभेद:-

  1. काल की अपेक्षा-
    दैवसिक प्रतिक्रमण, रात्रिक प्रतिक्रमण, आप्टाहिक प्रतिक्रमण, पाक्षिक प्रतिक्रमण, चातुर्मासिक प्रतिक्रमण, सांवत्सरिक प्रतिक्रमण, और युग-प्रतिक्रमण।

  2. पात्र की अपेक्षा-
    श्रावक-प्रतिक्रमण और यति-प्रतिक्रमण।

  3. प्रयोजन की अपेक्षा-
    ईर्यापथिक-प्रतिक्रमण, आहारचर्या-प्रतिक्रमण, ज्ञानाचार-प्रतिक्रमण, देववंदना-प्रतिक्रमण, तीर्थवंदना-प्रतिक्रमण आदि।

प्रतिक्रमण के ‘काल’ एवं ‘प्रयोजन’-मुख्यतः इन दो आधारों पर भेद बताये गये हैं। इनका संक्षिप्त-परिचय निम्नानुसार है :–

काल के आधार पर भेद :-

प्रतिक्रमण के काल के आधार पर निम्नलिखित भेद हैं :-

  1. दैवसिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पूरे दिन के कार्यों की समीक्षास्वरूप होता है और संध्याकाल में किया जाता है।
  2. रात्रिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पूरी रात्रि की क्रियाओं की समीक्षास्वरूप होता है और प्रातःकाल किया जाता है।
  3. आप्टाहिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पूरे सप्ताह के कार्यों की समीक्षास्वरूप होता है और अष्टमी व चतुर्दशी को या आठ-दिनों में किया जाता है।
  4. पाक्षिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पंद्रह दिन का पक्ष (पखवाड़ा) पूर्ण होने पर उस अन्तराल में सम्पन्न-कार्यों की समीक्षास्वरूप होता है और अमावस्या व पूर्णिमा को किया जाता है।
  5. मासिक-प्रतिक्रमण – माह-भर की गतिविधियों की समीक्षास्वरूप यह प्रतिक्रमण

माह के अंत में किया जाता है।

  1. चातुर्मासिक-प्रतिक्रमण – चार महीने पूर्ण होने पर उस अन्तराल में हुये कार्यों की समीक्षारूप यह प्रतिक्रमण होता है, जो हर चार-महीनों में किया जाता है। इसका मुनियों के ‘चातुर्मास’ या ‘चौमासे’ से कोई संबंध नहीं है।
  2. वार्षिक-प्रतिक्रमण – एक-वर्ष पूर्ण होने पर वर्ष-भर के कार्यों की समीक्षा इसमें की जाती है। इसे ‘सांवत्सरिक-प्रतिक्रमण’ भी कहते हैं।
  3. युग-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पाँच-वर्ष पूर्ण होने पर समग्र-समीक्षारूप होता है। इसका रूप व्यापक होता है और सब दिशाओं से आकर श्रमण एक स्थान पर एकत्रित होते हैं और वरिष्ठ-आचार्य के नेतृत्व में विस्तार से समीक्षा की जाती है। तथा आगे के लिये भी नीति-निर्धारण किया जाता है।

प्रयोजन के आधार पर प्रतिक्रमण के भेद निम्नानुसार हैं :-

  1. ईर्यापथ-प्रतिक्रमण :- यह किसी भी प्रयोजन-विशेष पर गमन करने के बाद किया जाता है।
  2. भक्तपान-प्रतिक्रमण :- आहारचर्या के बाद यह प्रतिक्रमण किया जाता है।
  3. ज्ञानाचार-प्रतिक्रमण :- शास्त्र-स्वाध्याय के उपरान्त यह प्रतिक्रमण किया जाता है।
  4. उत्तमार्थ-प्रतिक्रमण :- सल्लेखना के समय यह प्रतिक्रमण किया जाता है।
  5. सर्वातिचारिक-प्रतिक्रमण :- मुनिदीक्षा से लेकर समाधिमरण तक के सभी अतिचारों के परिमार्जन-हेतु यह प्रतिक्रमण जीवन की उपान्त्य-वेला में किया जाता है।

पात्र की अपेक्षा प्रतिक्रमण के भेद :-

इस अपेक्षा से मात्र दो ही भेद हैं :-

  1. श्रावक-प्रतिक्रमण :- इसे मुख्यरूप से देशव्रती-श्रावक करते हैं।
  2. यति-प्रतिक्रमण :- मुनिधर्म के साधक सभी मुनिराज, उपाध्याय व आचार्य यहाँ सामान्यतः ‘यति’ संज्ञा से विवक्षित हैं। उनके लिये जो प्रतिक्रमण का विधान है, वह ‘यति-प्रतिक्रमण’ है।

इनके अतिरिक्त कुछ और प्रतिक्रमण-भेद भी जिनवाणी में बताये गये हैं :-

98

  1. नाम-प्रतिक्रमण :- अयोग्य-नामों के उच्चारण का त्याग करना ‘नाम-प्रतिक्रमण’ है।
  2. स्थापना-प्रतिक्रमण :- वीतरागी-जिनबिंब के अतिरिक्त अन्य किसी भी रागी देवी-देवता के मंदिर में न जाना, उनकी सत्कार-प्रकार की विनय/बहुमान का त्याग करना ‘स्थापना प्रतिक्रमण’ है। इसीप्रकार एकेन्द्रिय से लेकर संज्ञी-पंचेन्द्रिय तक के जीवों के चित्र आदि रूप स्थापनाओं को मसलने, फाड़ने या नष्ट करने के भाव तक का त्याग ‘स्थापना-प्रतिक्रमण’ कहलाता है।
  3. द्रव्य-प्रतिक्रमण :- अयोग्य-आहार, वसतिका, उपकरण आदि का त्याग करना ‘द्रव्य-प्रतिक्रमण’ है।
  4. क्षेत्र-प्रतिक्रमण :- पानी से युक्त, कीचड़ से युक्त, त्रस और स्थावर-जीवों से भरे, जहाँ जाने पर रत्नत्रय की हानि की संभावना हो-ऐसे सभी क्षेत्रों में गमनागमन का त्याग करना ‘क्षेत्र-प्रतिक्रमण’ है।
  5. काल-प्रतिक्रमण :- रात्रि में, तीनों सन्ध्याओं के समय में, स्वाध्याय (ज्ञानाचार) के समय में तथा अन्य आवश्यक-क्रियाओं के समय में समस्त गमनागमन का त्याग करना ‘काल-प्रतिक्रमण’ है।
  6. भाव-प्रतिक्रमण :- आर्त-रौद्र आदि अशुभ-भावों का, तथा पुण्यास्त्रव के कारणभूत शुभ-भावों का भी त्याग करना ‘भाव-प्रतिक्रमण’ है।

प्रश्न यह उठता है कि प्रतिक्रमण जैसी विशुद्धि की स्वाधीन-प्रक्रिया को काल के बंधन में बाँधा ही क्यों गया? कि अब करना या तब करना। जब गलती हो, तभी करना प्रतिक्रमण के स्वरूप से मेल खाता है। मुँह पर जब दाग दिखे, तभी सफाई करना तो तर्क-संगत प्रतीत होता है; परन्तु कालिक-प्रतिक्रमण तो नियत-काल पर प्रतिक्रमण करने का विधान करता है? यह कैसे सुसंगत हो सकता है? जैसे ईर्यापथ-प्रतिक्रमण गमनागमन की क्रिया पूर्ण होते ही उसके दोषों के परिहार के लिये तभी करते हैं, उसीप्रकार शेष प्रतिक्रमण भी कार्य की अवधि से जुड़े होने चाहिये?

—यह समीचीन-प्रश्न है, परन्तु सही नहीं है। क्योंकि यदि प्रतिक्रमण की संपूर्ण-प्रक्रिया को दृष्टिगत रखा गया होता, तो यह प्रश्न ही नहीं उठता।

प्रतिक्रमण के जितने भी भेद बताये गये हैं, वे भिन्न-भिन्न आधारों पर अलग-अलग दृष्टिकोणों से वर्णित हैं। जब सबका एक ही आधार और एक ही दृष्टिकोण नहीं

99

है, तो सबके लिये एक जैसा विधान कैसे किया जा सकता है? इसे इसप्रकार समझा जा सकता है :-

  1. कालिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण दोषों के परिमार्जन के लिये तो होता ही है, पर इसका मुख्य-प्रयोजन दोषों का परिज्ञान कराते हुये निर्दोष-चर्या के लिये प्रेरित करना है। जब हम संभावित-दोषों की जानकारी-पूर्वक उनसे सजग रहेंगे, तो हमारी चर्या में दोषों की संभावना स्वतः ही न्यूनतर रहेगी।
  2. नित्य-प्रयोजन प्रतिक्रमण – जीवन-चर्या में दोष लगते समय तो उनकी संवेदना गहन होती है। बाद में वह क्रमशः क्षीण होती जाती है। यदि हम उसके परिमार्जन के लिये कोई समय-विशेष तय कर देंगे कि “इसीसमय इसका प्रतिक्रमण करना”; तो परिणामों में वह संवेदनशीलता ही नहीं रहेगी, जो दोषों को दूर करने की स्वतः प्रेरणा देती है। तब वह भाव उपेक्षा में बदल सकता है। और फिर धीरे-धीरे वह गलती हमारी दिनचर्या का अंग बनती जायेगी। हमें उसका गलती के रूप में अहसास क्रमशः घटता जायेगा। परिणाम-स्वरूप हम उस गलती के आदी बन जायेंगे और वह गलती हमारी दिनचर्या का अंग बनती जायेगी। अतः यह प्रतिक्रमण हमें तत्काल दोष-परिमार्जन के लिये सजग बनाता है।
  3. विशेष-प्रयोजन-प्रतिक्रमण :- ‘सर्वातिचारिक’ और ‘उत्तमार्थ’-प्रतिक्रमण – ये दोनों न तो किसी नियमकाल पर करने के हैं, और न ही किसी सामान्य-दोष के परिहार के लिये किये जाते हैं। जब यह पौद्गलिक-देह अपनी आयु की पूर्णता की ओर होती है, और विविध-कारणों से संयम की साधना के अनुरूप नहीं रह जाती है; तब ‘निर्यापक-मरण’ की अव्यर्थभावनाविता जानकर सल्लेखना-व्रत अंगीकार करते समय उसमें कोई दोष न लगें-इस प्रशस्त-भावना से क्षपक सल्लेखना-विधि में संभावित-दोषों की समीक्षा करते हुये अपने आत्मबल को पुष्ट करते हैं कि उनकी सल्लेखना-विधि में वैसे कोई दोष हों ही नहीं। – यह ‘उत्तमार्थ-प्रतिक्रमण’ का स्वरूप है।

और जब बिल्कुल अंतसमय आसन्न प्रतीत हो, तो जैसे ट्रेन से अपने स्टेशन पर उतरते समय हम अपने महत्त्वपूर्ण सामानों की समीक्षा करके उन्हें संभालते हैं व सहयात्रियों से कृत-दोषों के पुनः परिहार के लिये क्षमायाचना करते हैं, ताकि हम किसी भी प्रकार की उपयोगी-सामग्री को साथ लेना न भूल जायें और हमारे किसी

100

भी व्यवहार के कारण किसी के व हमारे मन में कटुता का भाव शेष न रहे – इस उदात्त भावना से ‘संवत्सरीचार- प्रतिक्रमण’ किया जाता है।
4. द्रव्यादि-प्रतिक्रमण :- यह प्रतिक्रमण यदि नहीं किया जायेगा, तो अतिचारों जैसे अनेकों दुष्परिणाम हमारे जीवन में आयेंगे। क्योंकि प्रकृति के न्यायालय में कभी भी घूसखोरी नहीं चलती है। जैसा करेगा, वैसा भरेगा – यही कर्मसिद्धान्त है।

प्रतिक्रमण का लक्षण ‘अतिचार’ :-

  1. वह सूक्ष्म-दोष, जो स्वयं के संकल्पमात्र से मिट सके।
  2. समझने के लिए – परमानेंट-मार्कर से लिखना > साधारण-स्याही या रंग से लिखना > कच्ची पेंसिल से कागज़ पर लिखना, जिसे इरेज़र से मिटाया जा सके > पाटी पर खड़िया से लिखना, जो बिना निशान छोड़े मिट सके।
  3. संकल्प-शक्ति की श्रेष्ठता एवं दोष की न्यूनता इसकी प्रमुख शर्तें।

स्थूल एवं जानबूझकर किये दोष ‘अनाचार’ :-

  1. इनका ‘प्रतिक्रमण’ नहीं, ‘प्रायश्चित्त’ होता है।
  2. वह अपने आप नहीं किया जाता, बल्कि आचार्य या विशेष-ज्ञानी से लिया जाता है।
  3. ये संज्ञेय-अपराध की श्रेणी में हैं।

अब मैं प्रतिक्रमण के विषय में कुछ ऐसी स्वरूपगत व प्रक्रियागत-जानकारियाँ देना चाहता हूँ, जिनके बारे में संभवतः इतनी सजगता व गंभीरता से सोचा तक नहीं जाता है।

  1. ‘इच्छामि’ :- प्रतिक्रमण के किसी भी पाठ की शुरूआत इसी शब्द से होती है। इसका सीधा व सटीक-अर्थ यही है कि ‘‘मैं जो कुछ भी पढ़ या कर रहा हूँ, वह पूर्णतः स्वाधीन होकर स्वेच्छा से कर रहा हूँ।’’ किसी के निर्देश से, दबाव से, भय से, लालसा से कभी प्रतिक्रमण जैसी विधि सार्थक हो ही नहीं सकती है। आख़िर जो दोष हो चुका है, वह मुझे स्वयं ही अपने लिये मिटाना है, तो इसमें यदि पूरीतरह से स्वयं की दृढ़-इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब ज़्यादा से ज़्यादा पाठ पढ़ने की औपचारिकता तो हो सकती है; परन्तु हो चुके दोष के भाव का, उससे बंधे कर्म का बाल भी बांका होनेवाला नहीं है। अतः प्रतिक्रमण की संपूर्ण-प्रक्रिया पूरीतरह से अपने अंतःकरण की प्रेरणा से स्वाधीन होकर की जाये; तभी इसकी सार्थकता संभव है। – यही तथ्य बतलाने के लिये प्रतिक्रमण

91

में ‘इच्छामि’ पद का प्रयोग हर बार अनिवार्यतः किया जाता है।
2. ‘भंते!’ :- इस शब्द का पारंपरिक-अर्थ है ‘सौ इन्द्रों से पूजनीय भगवान्-तीर्थंकरदेव’। यह एकप्रकार से हम अपने आप को दृढ़-संकल्पी बनाने के लिये कहते हैं। व्यक्ति को अकेले में अपने मन से कुछ भी काम करने को कहा जाये, तो स्वाभाविकरूप से कमज़ोर-इच्छाशक्ति के कारण वह जितना/जैसा कहेगा; उतना कर नहीं सकेगा।

वह कथा आप सबने सुनी ही होगी कि एक राजा ने एक बड़ा भारी-गड्ढा खुदवाकर प्रजाजनों से अपील की कि ‘‘रात के अंधेरे में सब अपने अपने घरों से एक-एक लोटा दूध लाकर उस गड्ढे में डालेंगे।’’ नतीजा क्या रहा, सभी जानते हैं। सबने यह सोचा कि ‘रात के अंधेरे में कौन देख रहा है? सब दूध डालेंगे, तो मेरे एक लोटे पानी का इतने बड़े गड्ढे में क्या पता चलेगा?’ इसी मनोबल की कमज़ोरी के कारण अगले दिन सुबह वह गड्ढा पानी से भरा मिला था।

पंचमकाल के जीवों की मनोबल की इसी कमी को दूर करने व प्रतिक्रमण की दृढ़-इच्छाशक्ति से करने की भावना से ही साक्षात् तीर्थंकरदेव को साक्षी बनाने की मनोवैज्ञानिक-विधि अपनायी गयी है। जब कोई संकल्प साक्षात् तीर्थंकरदेव की साक्षीपूर्वक किया जायेगा, तो उसमें कमी व कमज़ोरी की संभावना स्वतः ही नगण्य रह जायेगी।

विदेशों में होनेवाले गंधर्व-विवाहस्वरूप शादी-संबंधों व भारतीय-पारंपरिक-विवाहों के आयोजनों में यही तो मनोवैज्ञानिकता है, कि विदेशों में अकेला लगा, तो साथ पकड़ लिया और मन भर गया, तो हाथ छोड़कर दूसरा हाथ थाम लिया। जबकि भारतीय विवाह-पद्धति में इतने लोगों के बीच इतनी सारी प्रक्रियायें होती हैं, कि उसका मन कच्चा भी पड़े, तो वह आसानी से न तो साथ छोड़ पाता है और न ही हाथ छोड़ पाता है। मनमर्जी के कामों में और बड़ों की साक्षी व सान्निध्य में हुये कामों में यही अंतर होता है। मनमर्जी में मात्र स्वार्थ-मूलकता होती है, जबकि बड़ों के सान्निध्य में होनेवाले विधि-विधान हमारे मन पर गुणवत्ता भी बढ़ाते हैं। हमारे संकल्पों को न केवल संबल प्रदान करते हैं, बल्कि उनकी गुणवत्ता को भी बढ़ाते हैं। यही उद्देश्य ‘भंते!’ पद का हर प्रतिक्रमण के पाठ के ‘इच्छामि’ पद के साथ अनिवार्यतः प्रयोग करने का है।
3. ‘मिच्छामि दुक्कडं’ :- ‘दुक्कडं’ पद का अर्थ तो ‘दुष्कृत’ या ‘दोष’ है, जो यहाँ ‘अतिचार’ का वाचक है। यहाँ ‘मिच्छामि’ पद पर ही मुख्यतः विचार ‘भंते!’ पद

92

यह अद्भुत-प्रयोग है। इसकी गहराई को समझे बिना आजकल सामान्यतः ‘सॉरी’ इस अर्थ में इसका प्रयोग कुछ साधर्मीजन करने लगे हैं। पहिले तो यह समझना होगा कि क्या ‘मिच्छामि’ अर्थात् (उन कहे गये दोषों को) मिथ्या करता हूँ – इतना कहने मात्र से वे दोष नष्ट हो जायेंगे? या कुछ और प्रक्रिया भी करनी पड़ेगी?

कुछ कहा जाता है, तो उसके पीछे पूरी तैयारी होती है। हम तो आजकल इसीतरह ‘मिच्छामि दुक्कडं’ बोलते हैं। जैसे बोलने भर से दुष्कृत मिथ्या हो जायेंगे। पहिले तो दुष्कृतों के स्तर का तो पता हो, कि वे अतिचाररूप ही हैं या अनाचाररूप। अनाचारों का तो प्रतिक्रमण होता ही नहीं है। दोष का स्तर तो पता हो, और फिर उसे सुधारने की विधि व अपनी संकल्प-शक्ति का भी बोध हो, तभी ‘मिच्छामि दुक्कडं’ कहने की सार्थकता है। इसे हम फैशन की तरह बोलने लगे हैं। यह सही-रूप नहीं है।

जब हमें अपनी गलती का ठीक से अहसास हो, और उसका स्तर भी इतना हो कि हम स्वयं संकल्पपूर्वक बोलें, और वह दोष नष्ठप्रायः हो सके; तभी ‘मिच्छामि दुक्कडं’ बोलने की सार्थकता है।
4. ‘अतिचार’ :- व्रत या नियम की मर्यादा का उल्लंघन करना ही ‘अतिचार’ है। इसके समानार्थक ‘अतिक्रम’ आदि कई शब्द प्रचलित हैं, जिससे कई बार भ्रम भी हो जाता है। आचार्य अमृतचन्द्र सूरि जी ने इनकी स्पष्टरूप से व्याख्या करके भ्रम-निवारण का सार्थक-प्रयास किया है। तदनुसार –
मन की अपेक्षित-शुद्धि का न होना ‘अतिक्रम’ है।
मर्यादा से बाहर जाकर विषयों की इच्छा करना ‘व्यतिक्रम’ है।
इन्द्रियों की प्रमादचर्या से व्रतों में दोष लगना ‘अतिचार’ है।
व्रत की मूलभावना ही खंडित हो जाये-ऐसा आचरण करना ‘अनाचार’ है।
(पुरुषि.3.,30)

इनमें से प्रथम-तीन को मिलाकर भी कई आचार्यों ने ‘अतिचार’ ही कहा है।

निष्कर्ष यह है कि ‘अतिचार’ जैसे सूक्ष्म-दोष का तो प्रतिक्रमण हो सकता है, किन्तु ‘अनाचार’ का कोई भी प्रतिक्रमण नहीं है। वह ‘अनाचार’ यदि अज्ञान या प्रमाद आदि कारणों से कदाचित् हो, तब तो उसके लिये आचार्य से प्रायश्चित्त लिया जा सकता है। किन्तु यदि वह जानबूझकर इन्द्रिय-विषयों की लालसा से किया जाये, तो उसे तो

96

मन की अपेक्षित-शुद्धि का न होना ‘अतिक्रम’ है।

  • (पु.सि.उ., 30)

इनमें से प्रथम-तीन को मिलाकर भी कई आचार्यों ने ‘अतिचार’ कहा है।

  1. क्या कर्म-सिद्धांत ‘प्रतिक्रमण’ जैसी प्रक्रिया की सार्थकता का समर्थन करता है ? :-

हाँ, करता है। यह सही है कि जिस समय दोषरूप-परिणाम व आचरण किया,

उसके निमित्त से अप्रशस्त-कर्मों का बंध तत्काल ही हो चुकता है। बाद में प्रतिक्रमण करें या कुछ भी करें, वह सत्ता में आ चुका है। किन्तु बाद के प्रशस्त-परिणामों से पूर्वबद्ध-कर्मों के स्थिति-अनुभाग आदि क्षीण होते हैं। उत्कृष्ट-भावों से पूर्वबद्ध उन कर्मों की प्रकृति-स्थिति-अनुभाग आदि का संक्रमण भी होता है। और यदि बहुत-कम आबाधाकाल के होंगे, तो इससे उनकी निर्जरा भी की जा सकती है। अतः कर्म-सिद्धांत प्रतिक्रमण के प्रभाव का समर्थन ही करता है। बशर्ते कि जितने अप्रशस्त-भावों के फलस्वरूप ‘अतिचार’ रूप क्रिया हुई है, उसी अनुपात में विशुद्धतर-भावों से प्रतिक्रमण की विधि की जाये। मात्र पढ़ने औपचारिकता से यह होनेवाला नहीं है। पढ़ने से अशुद्ध- परिणाम नहीं होंगे, व नया अशुभ-बंध नहीं होगा – यही लाभ है। वह भी तभी, जब वह पढ़नेरूप क्रिया विनय व भावों को समझकर की जाये।

  1. क्या प्रतिक्रमण ‘हरबार गल्ती करना व हरबार सॉरी बोलने’ जैसी प्रक्रिया है?:-

कदापि नहीं, ऐसा तो जानबूझकर उपहास बनाने के भाव से ही कोई कर सकता

है। और प्रतिक्रमण कभी भी ऐसे निकृष्ट-भावों से नहीं किया जाता है। हाँ, कोई गल्ती कदाचित् पुनः हो भी जाये, तो वह जानबूझकर तो कभी नहीं हो सकती है। अतः उसका प्रतिक्रमण करना न्यायसंगत है।

जब तक गल्तियाँ होंगीं, तब तक प्रतिक्रमण किया जायेगा। जब परिणामों की विशुद्धि के फलस्वरूप गल्तियाँ ही नहीं होंगीं, तो प्रतिक्रमण की भी आवश्यकता नहीं रहेगी। परन्तु पंचमकाल में जीवों के इतने पुरुषार्थी-परिणामों की संभावना नहीं है, इसीलिये हमें प्रतिक्रमण करना अनिवार्य बनाया गया है।

हम रोज मलिन होते हैं, तो रोज नहाते हैं। यदि शरीर मलिन होना बंद कर देगा, तो स्नान की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी। यही स्थिति प्रतिक्रमण की है। किन्तु यह सावधानी अनिवार्यतः अपेक्षित है कि दोष का स्तर ‘अतिचार’ का ही हो, ‘अनाचार’ का न हो। अन्यथा प्रतिक्रमणरूपी-औषधि कारगर नहीं होगी। उसके लिये तो प्रायश्चित्तरूपी-सर्जरी ही काम कर सकेगी।

  1. क्या ‘प्रतिक्रमण’ पढ़ने से काम चल जायेगा ? :-

पढ़ने का नाम प्रतिक्रमण है ही नहीं। किसी से पूछना भी होता है, तो यही पूछते हैं कि 'आपने प्रतिक्रमण किया क्या ? किन्तु ‘पढ़ा क्या’ – ऐसे कोई भी नहीं पूछते हैं। पर यह सत्य है कि प्रतिक्रमण की विधि में पढ़ने की भी अनिवार्यता है। ‘मन में पढ़ लेंगे, पता तो है ही’ – जैसी बहानेबाज़ी इसमें नहीं चलती है। विनयपूर्वक पाठ पढ़ा जाये, साक्षात् गणधरदेव की आज्ञा मानकर पढ़ा जाये, और फिर दृढ़- संकल्पपूर्वक उसके आधार पर अपने दोषों को पहिचानकर उनका प्रतिक्रमण किया जाये। – यही जिनाम्नाय है।

  1. क्या अविरतियों के लिये ‘प्रतिक्रमण’ का कोई विधान नहीं है ? :- हाँ, यह सही है कि प्रतिक्रमण के उपलब्ध-पाठों में मात्र महाव्रती यतियों/मुनिराजों के लिये ‘यति-प्रतिक्रमण’ और देशव्रती-श्रावकों के लिये ‘श्रावक- प्रतिक्रमण’ के ही पाठ मिलते हैं। किन्तु दोष तो सम्यग्दर्शन में भी लगते हैं, ‘आठ-अंग और पच्चीस- दोष’-ऐसा हम पढ़ते रहते हैं। और इन दोषों को सम्यग्दृष्टि-जीव के ‘अतिचार’ ही कहा गया है –

“शंकाकांक्षा… सम्यग्दृष्टेरतिचाराः”

और अतिचारों का प्रतिक्रमण आवश्यक है। अन्यथा दोष जीवनशैली बन

जायेंगे। सम्यग्दर्शन भी तो अति- महत्त्वपूर्ण-उपलब्धि है। मोक्ष-महल की पहली सीढ़ी है। अनंत-संसारचक्र को मेटने की गारंटी है। तो इसके दोषों का भी प्रतिक्रमण होना ही चाहिये। वर्ना धर्म का मूल ही यदि सदोष हो गया, तो धर्म का वृक्ष निर्दोष कैसे हो सकेगा ? अतः सम्यग्दृष्टि-जीवों को भी नित्यप्रति सम्यग्दर्शन के अतिचारों को पढ़कर, भलीभाँति समझकर उन दोषों के परिमार्जन का दृढ़ संकल्प लेते हुये उनका प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिये।

जैसे कि हम यदि किसी भी साधर्मी से वात्सल्यभाव की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं, तो न केवल प्रतिक्रमण में उसका उल्लेख करें, बल्कि उससे स्वयं जाकर अपने वात्सल्यभाव को दृढ़ करें। यदि हमने जिनवचनों में शंका का भाव स्वप्न में भी किया हो, तो ‘आज्ञासिद्धं हि तद्-ग्राह्यं, नान्यथावादिनो जिनाः’ के संकल्प के साथ अपनी भूल सुधारें। इसीप्रकार सम्यग्दर्शन के आठ-अंगों के पच्चीस-अतिचारों की समीक्षा करते हुये सम्यग्दृष्टि जीवों को भी प्रतिक्रमण करके उपयोग और चर्या की विशुद्धि करनी चाहिये।

  1. क्या सदाचारी व सम्यग्दर्शन के लिये प्रयासरत लोगों के लिये भी कोई ‘प्रतिक्रमण’ हो सकता है ? :-

यह बड़ी विकट-बात है कि जिनका अभी मिथ्यात्व-गुणस्थान ही है, तो इसमें तो सारे दोष ‘दूषण’ न होकर ‘भूषण’ होते हैं। तब किसका प्रतिक्रमण करें, व उससे क्या लाभ होगा? परन्तु जो जीव अपनी चर्या सुधारकर सम्यग्दृष्टि बनना चाहते हैं, उनके लिये तो सम्यग्दर्शन के अतिचारों से बचने का अभ्यासरूप प्रतिक्रमण करना बेहद जरूरी है। अरे ! जब अंतरिक्ष- यात्रियों को धरती पर ही भारहीनता का अभ्यास महीनों- सालों कराया जाता है, ताकि अंतरिक्ष की भारहीनता को वे सहजता से एडजेस्ट कर सकें। संसार के कामों का पूर्वाभ्यास तो जरूरी है, क्योंकि वे उपलब्धिरूप हैं। तो क्या जन्म-मरण के दुष्चक्र से छुड़ानेवाला सम्यग्दर्शन विपत्तिरूप है? यह तो अनादिकाल से आज तक नहीं मिली - ऐसी संपत्ति है। लिखा है न -

'मुनि-व्रत धार अनंतबार ग्रैविक उपजायो।

पै निज-आतम-ज्ञान बिना सुख लेश न पायो।।’

अतः आत्मानुभूति या आत्मज्ञानरूपी सर्वोत्कृष्ट-उपलब्धि के लिये हमें अपने आपको पूरीतरह से अभ्यास करके तैयार करना होगा, ताकि सम्यग्दर्शन होने पर उसमें कोई दोष न लगने पाये और हम मोक्षमार्ग पर अग्रसर हो सकें।

यदि हमें भव्यत्व प्रकट करना है, तो सम्यग्दर्शन की स्थिति का पूर्वाभ्यास करना ही होगा। और इसमें संभावित-दोषों को पहिचानकर अभी से उनसे बचने के अभ्यास के लिये उनका प्रतिक्रमण भी करना होगा। तभी हम सम्यग्दर्शन के लिये मानसिकरूप से तैयार हो सकेंगे। जो कार्य सम्यग्दृष्टि के जीवन में दोषरूप हैं, वे हमें भी अभी से दोषरूप ही लगने चाहिये। अन्यथा हमारा सम्यक्त्वाकर्षण तो होगा, पर सम्यक्त्व की पात्रता भी प्रकट नहीं हो सकेगी।

प्रतिक्रमण के व्यावहारिक-पक्षों का समीक्षात्मक-अध्ययनः-

प्रतिक्रमण की एक बड़ी-बिडम्बना-

प्रतिक्रमण के पाठ श्वेताम्बर-परम्परा में पढ़ने में सीमित रह गये हैं, दिगम्बर- परम्परा में पढ़ना भी बंद हो गयी है, विशेषतः अविरत-श्रावकों ने तो पढ़ना तक छोड़ दिया है ! जो अनिवार्य-जीवनशैली कहकर सिखायी गयी थी, वह हमारी जीवनशैली से गायब क्यों हुई? – इसका विचार एवं निर्णय करना आवश्यक है।

आज भी साधुओं में पढ़ने की औपचारिकता तो की जाती है, किन्तु न तो इनकी कोई सुनिश्चित-विधि होती है और न ही इसका मर्म उन्हें ज्ञात है। जिस संघ में जिस आचार्य या वरिष्ठ-साधु के निर्देशन में प्रतिक्रमण जिस विधि से कराया जाता है, उसी विधि से संघस्थ-जन करने लगते हैं। उनमें भी जिसकी जैसी निष्ठा और मानसिकता होती है, वैसा ही इसकी औपचारिकता पूरी करते हैं। मैं स्वयं साक्षी हूँ कुछ संघों की इस प्रक्रिया का, और प्रत्यक्षदर्शी के अनुभव से यह बात कह रहा हूँ। (मेरा कोई अभिप्राय किसी की समीक्षा या टिप्पणी करने का कदापि नहीं है, मात्र विषयक्रम में यह संकेत किया है।)

विचारणीय-तथ्य यह है कि यदि हम अपनी अपनी भूमिकाओं के अनुरूप इनकी

प्रविधियों और संवेदनाओं से परिचित नहीं होंगे, तो यह सुनिश्चित जानिये कि प्रतिक्रमण या तो होगा ही नहीं और यदि होगा भी, तो औपचारिकता की पूर्ति ही होगी। प्रतिक्रमण की विधि वास्तव में हमारी जीवनशैली का अंग बने, इसके लिये हमें संवेदनशील बनकर उन दोषों की दोषरूप में पहिचान, संज्ञान करनी होगी, जिनका हमें प्रतिक्रमण करना है। और इच्छामि, भंते, पडिक्कमामि, वोस्सरामि, मणसा, वाचा, कम्मुणा/कायेण, कदो वा, कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो आदि शब्दों की गहराईयों एवं मर्म से सुपरिचित होते हुये ‘भक्ति’ एवं ‘कायोत्सर्ग’ की भावनात्मक- प्रक्रिया को पूरे मनोयोग से समझना होगा, अन्यथा यह महनीय-प्रक्रिया औपचारिकता से ऊपर नहीं उठ सकेगी।

तब वास्तविक ‘प्रतिक्रमण’ कैसे हो ?-

पहले अपनी भूमिका का यथार्थ-ज्ञान करें और फिर उस भूमिका के कर्त्तव्यों एवं अकर्त्तव्यों को पहिचानकर उनमें गुण-दोष के दृष्टिकोण को आत्मसात् करें। गहराई से विचार करें कि क्या जिनवाणी में कथित वे गुण आपको आदर्श प्रतीत होते हैं और उन्हें आप अपने जीवन का आदर्श बनाना चाहते हैं? साथ ही वे दोष क्या आपको वास्तव में दोषरूप लगने लगे हैं और आप उन्हें अपनी दिनचर्या एवं विचारधारा से दूर करना चाहते हैं? इन बिन्दुओं से स्वयं को सहमत (कन्विंस) करने के बाद ही प्रतिक्रमण जैसी महनीय आध्यात्मिक प्रकिया हमारे जीवन में चरितार्थ हो सकेगी।

आज अधिकांश-लोग तो दोषों का स्वरूप तक ढंग से नहीं जानते हैं, तब

‘प्रतिक्रमण’ किसका व कैसे करेंगे? – यह अत्यन्त व्यावहारिक-समस्या है। यह कृति इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये लिखी जा रही है। क्योंकि दोषों को आजकल जीवनशैली की शोभा माना जाने लगा है, अतः आज वे दोष लगें व छोड़ने योग्य लगें – यह सर्वप्रथम अनिवार्य है।

जिन सप्त-व्यसनों का नाम लेना भी पहले सभ्यजनों में अभिशाप माना जाता था, आज वे ही जैनों के समृद्ध-वर्ग से लेकर आधुनिक पढ़े-लिखे लोगों में भी स्तरीयता के प्रतीक (स्टेटस-सिंबल) बनते जा रहे हैं। लोग गर्व से उनका उल्लेख करते हैं कि "आप निश्चिंत होकर पार्टी में आइये भाईसाहब ! रूखी-सूखी नहीं हरी-भरी पार्टी है। आपके स्तर की हर गरिमापूर्ण-व्यवस्थायें इसमें हैं।‘’ इस कथन में शब्दावली तो आदर्श ही है, परन्तु इनके पीछे निहित-अभिप्राय सातों व्यसनों के या इनमें से अधिकांश के सेवन करने की व्यवस्थाओं से रहता है। इतनी बिडम्बनापूर्ण-स्थिति में आज हम पहुँचते जा रहे हैं।

शादियों व पार्टियों में वेशभूषा एवं परिधानों के खुलेपन की बात तो अब करनी ही व्यर्थ हो चुकी है, किन्तु अभक्ष्य-पदार्थों का भोजन, कोल्ड-ड्रिंक्स की स्पेशल-सर्विस के कोडवर्ड में मदिरा परोसना, छद्मरूप में माँसाहार-मिश्रित पदार्थों का परोसा जाना (ज्ञातव्य है कि चाइनीज़ व इटैलियन-फूड्स में आधार-सामग्रियों में अंडा-पावडर, चर्बी एवं अन्य ऐसी वस्तुओं का मिश्रण आमबात हो गया है, जो कत्लखानों से आतीं हैं– यह अतिरेकपूर्ण-कथन नहीं, बल्कि तथ्य हैं), कैटरिंग-सर्विस के नाम पर किराये की लड़कियों को चुनना, ताकि परोसने के साथ-साथ अन्यप्रकार से मनोरंजन भी लोग कर सकें, प्री-वेडिंग-शूट्स के नाम पर मनोविकृतियों व अश्लीलतापूर्ण विवाह- पूर्व एवं विवाहेतर-संबंधों को सार्वजनिक-मान्यता देना, लेडीज़-संगीत के नाम पर अश्लील एवं भौंड़े-गानों पर अमर्यादित-नृत्यों के विकृत-प्रदर्शन, वैभव-प्रदर्शन के नाम पर देर-रात को किये जानेवाले आयोजन- इत्यादि में खुलकर मर्यादाओं की धज्जियाँ जैनसमाज के आभिजात्य-वर्ग में आमतौर पर उड़ायी जा रहीं हैं और अधिकांश-लोग इन्हें स्वीकार करने लगे हैं। ‘पूल-पार्टियों’ का आयोजन इस विकृत-मानसिकता का एक नया-प्रकल्प बनता जा रहा है। इसीतरह ‘एगेटेरियन’ (अंडाभोजी) एक नया-वर्ग बनता जा रहा है, जो कि इसे मांसाहार ही नहीं मान रहा है।– ये सभी तथा ऐसे अन्य कई प्रयोग चल पड़े हैं, जो हमारी जीवनशैली को ‘अतिचारी’ की जगह ‘अपराधी’ बनाता जा रहा है। प्रतिक्रमण अतिचारों का किया जाता है, अपराधों व अनाचारों का नहीं। इसलिये आज अविरत-गृहस्थ संज्ञा तो फिर भी कह सकते हैं, परन्तु ‘अविरत- श्रावक’ संज्ञा तो इन स्वच्छन्दी-कदाचारियों के लिये प्रयुक्त नहीं की जा सकती है। और जो ‘अविरत-श्रावक’ संज्ञा तक के पात्र नहीं हैं, वे प्रतिक्रमण की भी पात्रता खो चुके हैं। हमारा उद्देश्य उनको दुत्कारना नहीं है, बल्कि उन्हें सौहार्द से धर्माचरण का ज्ञान कराना व पुनः अविरत-श्रावक संज्ञा के योग्य बनाना है, ताकि यदि अतिचार उनकी चर्या में लगें, तो उनका प्रतिक्रमण किया जा सके। यदि वे अनाचारी व श्रावकत्व के अपात्र बने रहेंगे, तब तो प्रतिक्रमण की पात्रता ही वे खो देंगे।

इसलिये यह समझना होगा कि सामान्य-सदाचार से युक्त, देव-गुरु-धर्म के विनीत-भक्त एवं अपने आचरण को समुन्नत बनाने की सद्भावना वाले सज्जन (भाई/ बहिन) ही प्रतिक्रमण की पात्रता रखते हैं। जो इससे बाहर हैं, वे यदि इतनी विवेकपूर्ण जीवनशैली को अपनाने को तत्पर होते हैं, तो प्रतिक्रमण की पावन-प्रक्रिया उनके इहलोक व परलोक को संवारने के लिये अपने द्वार खोलकर स्वागतार्थ तैयार है। प्रतिक्रमण करने का वास्तविक-उद्देश्य-

यह प्रतिक्रमण वर्तमान-स्थिति में हम लोगों के लिये आत्मशुद्धि की सर्वाधिक- सशक्त-प्रक्रिया है। किन्तु इसे नैष्ठिकरूप में कोई करने व समझने को तैयार नहीं दिखता। या तो कोई करता ही नहीं है, और जो करने की औपचारिकता कर भी रहे हैं, वे सब खानापूर्ति करते दिख रहे हैं। ऐसी स्थिति में आत्मशुद्धि हो कैसे ? ‘प्रति’ उपसर्ग का अर्थ वापस या विपरीत-दिशा में तथा ‘क्रमण’ का अर्थ ‘लौटना’/आना/पुरुषार्थपूर्वक-गमन करना है। इसके अनुसार ‘प्रतिक्रमण’ का अर्थ होता है “बुराई से अच्छाई की ओर लौटना, पतित से पावनता की ओर लौटना, संसार से मुक्ति की ओर चलने का नैष्ठिक-प्रयास है।”

किन्तु आज इसमें से निष्ठा ही नदारद दिखाई दे रही है। इसका एक बड़ा-कारण इस विषय में लोगों की अज्ञानता भी है। क्योंकि जो पाठ बने हैं, वे महाव्रती-मुनिराजों या देशव्रती-श्रावकों के लिये बने हैं। ऐसी उच्च-भूमिकावाले व्यक्ति अत्यल्प ही हैं। और जब सामान्य अविरत-श्रावकों को ही अपने सदाचार के विषय में सहीरूप में जानकारी नहीं है, तो व्रतीजनों के विषय में तथ्यात्मकरूप से जानकारी कैसे हो सकती है? और जब जानकारी ही नहीं होगी, तो किसी की समीक्षा कैसे कर सकते हैं कि वे सही कर रहे हैं या नहीं? और अविरति-श्रावकों के लिये कोई प्रतिक्रमण का पाठ आज तक बना ही नहीं है, तब वे किस आधार पर अपने आचार-विचार की समीक्षा करते ? – यही तो इस कृति के प्रणयन का मूल-प्रेरक-तत्त्व रहा है। इसे पढ़कर ही तो अब वे प्रतिक्रमण की विशेषता, उपयोगिता एवं महत्त्व को पहिचान सकेंगे और इसे अपनी जीवनशैली का अंग बनाने के लिये प्रयत्नशील हो सकेंगे।

प्रतिक्रमण की पात्रता-

‘प्रतिक्रमण’ के लिये दोषों का न केवल हल्का (माइल्ड) होना अनिवार्य होता है, बल्कि उनका दोष के रूप में अहसास होना भी जरूरी है। साथ ही दोष सुधारने व स्वयं सुधरने की अदम्य-भावना भी होना चाहिये।

लोक में भी ‘भूल-चूक’ एवं ‘अपराध’ की संज्ञायें समानार्थक नहीं हैं और न ही इनका एक जैसे कार्य के लिये प्रयोग किया जाता है। जो कार्य मानवीय-भूल की दृष्टि से गलत तो हैं, किन्तु यदि व्यक्ति का उद्देश्य वह गल्ती करना नहीं है और वह तत्काल उसके प्रति अपनी भूल स्वीकारने एवं सुधारने को सच्चे हृदय से सहमत है, तो फिर वह बात वहीं खत्म हो जाती है। यदि सामनेवाला इतना करने पर भी उस बात पर और अधिक तूल देता है, तो फिर सामनेवाले के व्यवहार को ही लौकिक-शिष्टाचार में गलत बताया जाता है।

बस, यही विशेषता प्रतिक्रमण में प्रतिक्राम्य-भूलों की भी है। उन्हें यदि वह भूल करनेवाला ईमानदारी से गल्ती के रूप में स्वीकार कर ले और पुनः वैसा न करने का निश्छल-हृदय से संकल्प ले, तो वह बात वहीं स्वतः समाप्त हो जाती है। उसके बाद उसे तूल देना समझदारी नहीं माना जाता है। यदि करनेवाले की भूल निजी तौर पर स्वीकार करने व पुनः नहीं करने के संकल्प के बाद भी लोक में समीक्षणीय रहती है, तो वह भूल प्रतिक्रमण के योग्य भूल (अतिचार) हो ही नहीं सकती है। वह निश्चितरूप से ‘अपराध’ की श्रेणी में संज्ञित होगी और फिर किसी वैधानिक संस्था/व्यक्ति/प्रक्रिया के द्वारा प्रदत्त प्रायश्चित्त/दंडविधान के माध्यम से ही उसका निदान संभव हो सकता है। अतः यह विवेक से ही समीक्षणीय है कि किस गल्ती का प्रतिक्रमण हो सकता है और किसका नहीं? शास्त्रीय-शब्दावली में जो कहा गया है, वह एक सीमा तक ही उसका संकेत करता है; उसकी वास्तविक गम्भीरता के निर्धारण के लिये हमें स्व- विवेक से ही निर्णय करना होगा।

क्या प्रतिक्रमण पढ़ने से काम चल जायेगा ?-

सामान्यतः प्रतिक्रमण करनेवाले इनके पाठों को मात्र पढ़ते ही हैं। और पढ़कर ही सन्तुष्ट हो जाते हैं कि उन्होंने प्रतिक्रमण कर लिया। जबकि वास्तविकता यह है कि प्रतिक्रमण की विधि में प्रतिक्रमण का पाठ पढ़ा अवश्य जाता है, किन्तु उस पाठ को पढ़ने का उद्देश्य उसके अभिप्रायों को संकल्पशक्ति के साथ अपने जीवन में लागू करना रहता है, मात्र पढ़कर खानापूर्ति करना नहीं।

‘प्रतिक्रमण’ ‘पढ़ो’ की नहीं, ‘आगे बढ़ो’ के संकल्प का नाम है। तोता “राम- राम” रटे और राम की तस्वीर सामने आने पर उस पर बीट कर दे- आजकल कुछ ऐसी ही स्थिति ‘प्रतिक्रमण’ का पाठ पढ़ने की हो रही है। प्रतिदिन जिन गल्तियों के लिये “तस्स मिच्छा मे दुक्कडं” कहकर हम प्रतिक्रमण करते हैं, अगले दिन उससे भी अधिक गल्तियाँ करें, तो ‘प्रतिक्रमण’ का पाठ पढ़ने का क्या औचित्य है ? तब यह पढ़ना तो निरर्थक होगा ही, प्रतिक्रमण की अवधारणा (कॉन्सेप्ट) ही महत्त्वहीन हो जायेगी। प्रतिक्रमण-सूत्र में वर्णित सारे दोषों के पढ़ने का औचित्य ? -

आज की दिनोंदिन व्यस्त होती जा रही जीवनशैली में लोगों के पास समय की उपलब्धता बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है। लोग तो विवाह में भी संकल्प तक पूरे नहीं पढ़ने देते हैं, उसमें भी संक्षिप्तीकरण (शॉर्टकट) करने की कहने लगे हैं। वे कहते हैं कि “महानुभाव ! ‘हमें सब मंजूर है’ – मानकर आप सब फटाफट निबटा दीजिये।” जब आपने उन संकल्पों को सुना तक नहीं, तो स्वीकार किसे किया है?- यह बहुत बड़ी बिडम्बना है।

वैसे तो पूरी बात सुनकर ‘हाँ’ करनेवालों की भी क्या गारंटी है कि वे उस वचन को निभायेंगे ही? जैसे आज के नेता ‘संविधान’ की शपथ पूरी औपचारिक-प्रक्रिया से लेते हैं, परन्तु न तो उन्हें ‘संविधान’ के निर्देशों के बारे में कुछ पता होता है, और न ही वे अपने व्यावहारिक-जीवन में उसकी कभी परवाह करते हैं। बस शपथ के समय “सब स्वीकार है” कहना होता है;– ऐसी ही स्थिति’ प्रतिक्रमण’ की भी आज हो गयी है। पढ़ते समय सब कुछ पढ़ लेते हैं, लेकिन न तो उसका अर्थ विचारते हैं और न ही उसे संकल्प के रूप में स्वीकारते हैं।

क्या गल्ती के बिना भी प्रतिक्रमण करें-

प्रतिक्रमण करने के लिये हमारे जीवन में वे दोष हरसमय हों ही – यह अनिवार्य नहीं है। तथापि प्रतिक्रमण की विधि में उन सभी दोषों का एकसाथ ही किया जाता है। भले ही उनमें से एक भी गल्ती उस दिन/उससमय नहीं की गयी हो, फिर भी प्रतिक्रमण करते समय सभी संभावित-दोषों का उल्लेख हरबार करना अनिवार्य है। यह हमारी मानसिकता को ध्यान में रखते हुये किया गया अत्यन्त-सुविचारित प्रयोग है, जिससे हम उन सभी कार्यों को पहिचान सकें, जिन्हें जिनाम्नाय में उस भूमिका में प्रतिक्राम्य-भूलों के रूप में प्रतिपादित किया गया है। ताकि जब दोषों की पहिचान होगी, तो जानबूझकर दोष करने की संभावना स्वतः घटेगी। जानबूझकर की जानेवाली गलतियों को प्रतिक्रमण करके दूर करने योग्य भूल के रूप में माना ही नहीं गया है।- यही ‘प्रतिक्रमण’ और उसकी भूलों की मूल-पहिचान है।

बार-बार एवं अलग-अलग प्रतिक्रमण क्यों करें ?-

चूँकि प्रतिक्रमण के मूलतः दो भेद बताये गये हैं, पहला ‘कालिक-प्रतिक्रमण’ और दूसरा ‘प्रयोजन-विशेष के अन्तर्गत किया जानेवाला प्रतिक्रमण’ । दोनों की अपनी- अपनी सार्थकता है।

कालक्रम के अनुसार दोषों की स्थितियों में परिवर्तन आता रहता है, उनकी दोष के रूप में व्याख्या उस काल में ही सार्थक होती है और नियतकाल में ही उसका दोषरूप अहसास रहता है। जैसे कि दिन में सोना गलत है, परन्तु रात में नहीं। अतः ‘प्रतिक्रमण’ के दैवसिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, सांवत्सरिक एवं युग-प्रतिक्रमण जैसे कालिक-भेद किये गये। इनमें कुछ नियमितरूप से किये जाने वाले तात्कालिक- समीक्षण के अन्तर्गत आते हैं, तो कुछ निश्चित-कालखंड में कर्त्तव्यों की समीक्षा के रूप में होते हैं। जैसे कि व्यक्ति को एक सप्ताह में/एक माह में/चार महीनों में/एक वर्ष में /पाँच वर्षों में इतने-इतने कार्य करने थे, इतनी उपलब्धियाँ हासिल करनीं थीं। उसने उन-उन-कालखण्डों में अपने वे दायित्व पूरे किये हैं या नहीं ? - इस बात की भी समीक्षा इनके अन्तर्गत की जाती है और इनके अलावा भी जिन बातों को हमने कोई विशेष ध्यान दिये बिना उपेक्षित कर दिया था, उनकी भी समीक्षा की जाये, कि उनके कारण हम लक्ष्य को पूरा करने में कितने बाधित हुये हैं। यदि बाधित हुये हैं, तो उन्हें भी भूल के रूप में स्मरण करना होगा और पुनः वे भूलें हमसे नहीं हों- यह संकल्प भी करना होगा। तभी हमारी वह प्रतिक्रमण की विधि सार्थक हो सकेगी।

काल की तरह ही प्रयोजन के अनुसार भी प्रतिक्राम्य-दोषों का वर्गीकरण भिन्न है और उनके ‘निदान’ की विधियाँ भी भिन्न हैं। अतः प्रयोजन की अपेक्षा गमनागमन करते समय, सामान उठाते-रखते समय, बोलते-चालते समय, पढ़ते-लिखते समय, भोजनादि करते समय संभावित-दोषों का वर्गीकरण भी भिन्न है और इनके निवारण के लिये किये जानेवाले ‘प्रतिक्रमण’ भी भिन्न-भिन्न संज्ञाओं के अन्तर्गत जिनाम्नाय में कहे/बताये गये हैं। उनकी दोषात्मकता उस पद के व्यक्ति को एवं उस कार्य की परिस्थिति को दृष्टिगत रखते हुये ही पहिचानी एवं व्याख्यायित की जा सकती है और वही विवेक प्रतिक्रमण के प्रयोजनगत-भेदों में रखा जाता है।

‘प्रतिक्रमण’ की विधियों का क्रम ?–

प्रतिक्रमण की उपयोगिता जानने के बाद प्रतिक्रमण करने की पूरी-प्रक्रिया जानने की जिज्ञासा होना स्वाभाविक है। अतः प्रतिक्रमण की पूरी-विधि की संक्षिप्त-जानकारी यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

  1. आलोचना :- दोषों की पहिचान व व्यक्त करना ‘आलोचना’ कहा गया है। यदि हमें अपने दोषों की पहिचान दोषरूप में जब तक नहीं होगी, तो हम उन्हें सुधारने को प्रयत्नशील कैसे हो सकेंगे। अतः आलोचना नामक यह पहली-प्रक्रिया इस कार्य की सफलता के लिये सर्वप्रथम की जानी अनिवार्य है।

आलोचना का औचित्य क्या है ?-

(क) जैसे शरीर का विकार/मल निकालने पर ही औषधि कार्यकारी होती है, वैसे ही अपने परिणामों के दोष पहिचान कर उन्हें आलोचना के द्वारा निकालने पर ही 'तप’रूपी औषधि कार्यकारी होती है।

(ख) लेकिन आलोचना निश्छल-मन से आत्मशुद्धि के दृढ़-संकल्प से होती है, कभी भी अंटी-गुंटी बाँधकर नहीं होती। अर्थात् आलोचना में अपने से या गुरु से किसी भी तरह का कोई छल नहीं करना चाहिये। बालकवत् निश्छल व निर्विकार बनकर ही आलोचना करनी चाहिये- इस कथन का यही अभिप्राय है।

आलोचना का क्रम क्या है ?-

१. आलोचन- आलोचना के पहले चरण ‘आलोचन’ का अर्थ है दोषों का

समीक्षात्मक-कथन। अर्थात् अपने संभावित-दोषों की सटीक-मीमांसा करते हुये उन्हें अपनी विगत-चर्या में स्पष्टरूप से पहिचानना एवं दोष/त्रुटि/अपराध के रूप में स्वीकार करना ही ‘आलोचन’ है।

२. आलुंछन– आलोचना की प्रक्रिया का दूसरा-चरण है ‘आलुंछन’, जिसे समभाव भी कहते हैं। बिना किसी विद्वेष या आत्मग्लानि के समताभाव पूर्वक आलोचन में स्वीकृत दोषों पर विचार करते हुये शांतमन से उसको दूर करने की विधि को क्रियान्वित देने के लिये अपनी मनःस्थिति तैयार करना आलुंछन है।

३. अविकृतिकरण- इसे माध्यस्थ-भावना भी कहते हैं। जब तक व्यक्ति अपने दोषों का मध्यस्थ-भाव से उपचार करने को मानसिकरूप से तैयार नहीं होगा, तब तक वह ‘प्रतिक्रमण’ की विधि को पूर्णता की ओर नहीं ले जा सकता है। अतः ‘आलुंछन’ के बाद ‘अविकृतिकरण’ या ‘माध्यस्थ-भावना’ का होना अति-आवश्यक है।

४. भाव-शुद्धि- आलोचना की इस प्रविधि का अन्तिम-चरण है ‘भाव-शुद्धि’ । इसे निर्मल-आत्मभावना भी कहते हैं। इसमें आत्मिकरूप से वह व्यक्ति दोषों के परिष्कार एवं स्वाभाविक-निर्मलता के लिये इतना प्रतिबद्ध (कमिटेड) हो जाता है कि वह अपने परिणामों को निर्मल बनाने के लिये पूर्णतः समर्पित हो जाता है।

  1. सामयिकः- आलोचना के बाद दूसरे क्रम पर सामयिक की प्रक्रिया कही गयी है, जिसे समताभाव धारण करना भी कहते हैं।

सामयिक कैसे व कब की जाती है?-

१. तीनों संधिकालों में- यह विधि तीनों संधिकालों में की जाती है, जो कि प्रकृति एवं मनोविज्ञान से अनुरूप-कार्य है।

२. आर्त्त-रौद्र-ध्यानों का त्याग- आर्त्त-रौद्र-ध्यानों के त्यागपूर्वक ही सामयिक की जा सकती है। संक्लेश-परिणामोंरूप आर्त्तध्यान एवं क्रूरता की विशिष्ट-अवस्था, जिसमें हिंसा आदि पाप करके जीव खेदखिन्न होने की जगह हर्षित होता है, को रौद्रध्यान कहा गया है। -इन दोनोंप्रकार के भावों के रहते जीव कभी भी सामयिक नहीं कर सकता है। 3. आवर्त्त, वंदना, प्रदक्षिणाः- कृतिकर्म-पूर्वक की जानेवाली सामयिक की विधि में तीन-आवर्त्त (हाथ जोड़कर, तीन बार सीधी दिशा में/क्लॉक-वाइज़ घुमाना) एवं एक शिरोनति (सिर झुकाकर बंद-हथेलियों पर रखना) पूर्वक वंदना करते हुये यही विधि चारों दिशाओं में तीन बार करना। इसी को ‘प्रदक्षिणा’ भी कहा गया है। ४. ध्यान- इसके अन्तर्गत अपने स्वरूप का/जिनबिम्ब का/पंच-परमेष्ठी-वाचक- अक्षरों का/ कर्मफल का / कृत्रिम-अकृत्रिम-चैत्यालयों व उनके जिनबिम्बों का ध्यान किया जाता है। यह ‘सालम्बन-धर्मध्यान’ माना गया है।

सामयिक की इतनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद प्रतिक्रमण की मुख्यविधि सम्पन्न की जाती है।

  1. ‘प्रतिक्रमण’:– आलोचना एवं सामयिकरूपी प्रारम्भिक-विधियों के बाद दोषों के विनाश की स्वाधीन-प्रक्रिया के रूप में ‘प्रतिक्रमण’ किया जाता है। ‘आलोचना’ व ‘प्रतिक्रमण’ में क्या अंतर है?–

१. आलोचना में किसी की साक्षी जरूरी होती है। चाहे वह ‘गुरु’ की हो, या ‘देव’/‘जिनबिम्ब’ की हो; किंतु ‘प्रतिक्रमण’ पूर्णतः स्वाधीन-प्रक्रिया है। जो बिना किसी की प्रेरणा या दबाव के स्वेच्छापूर्वक ही की जाती है। इसीलिये इसकी पहली शब्द ‘इच्छामि’ होता है।

२. ‘प्रतिक्रमण’ में मात्र भावरूप में जिनेन्द्र देव की साक्षी होती है, इसीलिये दूसरा शब्द ‘भंते’ होता है, जिसका अर्थ होता है ‘शतेन्द्र-पूजित-जिनेन्द्र-भगवन् !’ किंतु ‘प्रतिक्रमण’ में प्रतिक्रामक उस दोष को पहिचान कर उसका निवारण आत्म-सन्मुख-पुरुषार्थ-पूर्वक स्वयं करके दोष के चिह्नों तक को मिटा देता है।

पाप-परिणामों से हमें क्या हानियाँ होतीं हैं ?–

पाप-परिणामों से हमारे जीवन को बचाने के लिये ही प्रतिक्रमण का प्रस्तुत- प्रकल्प है। पापाचरण हमारे जीवन के लिये न केवल आध्यात्मिक-दृष्टि से बल्कि लौकिक, सामाजिक व शारीरिक, मानसिक-स्वास्थ्यों की दृष्टि से भी बहुत-बुरे परिणाम देते हैं।

इनके विषय में कुछ संक्षिप्त-विवरण निम्नानुसार है–

  1. कलुषित-परिणाम– पाप चाहे हिंसारूप हों, झूठ रूप या चोरी आदि किसी भी रूप में हों, वे सभी आत्मा के स्वभाव के विपरीत ही होते हैं, जबकि शांति, सौमनस्य आदि प्रवृत्तियाँ उसकी सहज व स्वाभाविक-परिणतियाँ हैं। इसका एक प्रमाण यह भी है कि संसारावस्था में संलग्न-शरीर तक इन आत्मस्वभाव से विपरीत-परिणतियों को आत्मसात् नहीं कर पाता है और उसमें तत्काल रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) आदि असंतुलित होने लगते हैं। इनसे शारीरिक और मानसिकरूप से असहजता/असंतुलन के साथ- साथ आध्यात्मिकरूप से भी बाधित व अशांत/कष्टमय बनाते हैं। इसीलिये जीवन की सूक्ष्मतम-पाप-प्रवृत्तियों को पहिचानकर उनसे बचानेवाली अद्भुत-प्रक्रिया ‘प्रतिक्रमण’ है।

  2. तनाव – हमें जीवन में शांति चाहिये, तो पापमय-विचारों व कार्यों से स्वयं को बचाना ही होगा। अत्यन्त-सरल व संक्षिप्तरूप में समझना चाहें, तो एक झूठ को ढँकने के लिये हजार चिंतायें रहतीं हैं, हरसमय सावधानी चाहिये। किन्तु यदि वही बात सीधे शब्दों में ज्यों की त्यों स्वीकार कर ली जाये, तो उन सभी तनावों से बिना किसी परेशानी के बचा जा सकता है। पापरूप कलुषित-विचार एवं आचरण तनाव के साथ ही उत्पन्न होते हैं। अतः मानसिक-शांति एवं सहज-प्रसन्न मनोवृत्ति के लिये ‘प्रतिक्रमण’ एक ऐसी अनुपम-प्रक्रिया है, जो किसी दवा, आसन-प्राणायाम आदि बिना ही व्यक्ति को तनावमुक्त जीवनशैली प्रदान करती है।

  3. अशुभ-लेश्या – कषायों के आवेग से प्रेरित हमारे मन-वचन-काय-योगों की प्रवृत्ति ही लेश्या है। इनमें तीन लेश्यायें मानव-जीवन के लिये तनावमुक्त बनानेवालीं हैं, इसलिये उन्हें (पीत-पद्म-शुक्ल) ‘शुभ-लेश्या’ कहा गया है। जबकि कृष्ण, नील, कापोत-इन तीन लेश्याओं को ‘अशुभ-लेश्या’ कहा गया है। इनकी व्यावहारिक- परिणति व्यक्ति, समाज के लिये सदैव घातक ही होतीं हैं। अतः इन परिणतियों के किसी रूप में मन-वचन-काय से हो जाने पर उनका निवारण करना व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के हित में होने से प्रतिक्रमण जैसी स्वाधीन-प्रकिया से इसका निवारण किया जाना चरित्र-निर्माण की सर्व-हितकारी-प्रक्रिया होगी।

  4. अशुभ-कर्मबंध – कर्म-सिद्धांत के अनुसार बुरे-परिणामों से अशुभकर्मों का बंध होना एवं उनका उदय होने पर हमारे जीवन एवं परिणामों की विसंगति होना अवश्यम्भावी है। अतः उन अशुभ-कर्मों के हो चुके बंध के स्थिति-अनुभाग हीन करके उन्हें निष्प्रभावी बनाना तथा आगामी अशुभ-कर्मबंध रोकने के लिये प्रतिक्रमण की विधि एक सार्थक-विधि है, जिसका समर्थन न केवल कर्मशास्त्र (करणानुयोग) करता है, बल्कि मनोविज्ञान एवं समाजशास्त्र भी करता है। अतः इसकी हमारे जीवन में सार्थक- उपयोगिता असन्दिग्ध है।

  5. अन्य पूर्वबद्ध पाप-प्रकृतियों को भी पुण्यरूप में संक्रमित कर सकते हैं– जैन-कर्म-सिद्धांत इसका स्पष्ट समर्थन करता है कि यदि पहले अशुभ-परिणामों से किसी ने पापकर्म का बंध कर भी लिया हो, तो उसका वह पापबंध आगे किये जानेवाले प्रशस्त-परिणामों से पुण्यरूप में संक्रमित हो जाते हैं, इसे ‘प्रकृति-संक्रमण’ कहते हैं। ऐसी प्रक्रिया मात्र आगे किये जानेवाले प्रशस्त-परिणामों से उतनी सटीक-घटित नहीं होती है, जितनी कि उन अशुभ-परिणामों को पहिचानकर उनको संकल्पपूर्वक सुधारने की विधि से होती है और इसी विधि का नाम प्रतिक्रमण कहा गया है।

  6. पूर्वबद्ध पाप-प्रकृतियों की स्थिति व अनुभाग घटा सकते हैं - इस प्रक्रिया को जैन-कर्म-सिद्धांत में ‘अपकर्षण’ कहा जाता है। पहले अशुभ-परिणामों के कारण बांधी गयी पाप-प्रकृतियों के स्वरूप को तो यह विधि नहीं बदलती है, किन्तु उनके बुरे- फल के प्रभाव (अनुभाग), एवं समय (स्थिति) को यह इतना कमजोर बना देता है कि वह उदय में आने पर भी जीव को पीड़ित नहीं कर पाता है। इस अपकर्षण-विधि की सर्वाधिक-समर्थ-प्रक्रिया ‘प्रतिक्रमण’ ही है।

पाप-परिणामों का दुष्फल कैसा होता है ?-

आजकल की तार्किकबुद्धि के लोग प्रायः एक तर्क प्रस्तुत करते हैं कि “जो हो गया, वह हो गया; किसने देखा कि उससे कैसे कर्म बंधे और कब कहाँ भोगने पड़ेंगे? इसलिये चुप रहो और जिंदगी के मजे लो।” उन्हें मैं कर्म-सिद्धांत तो यहाँ नहीं समझाऊँगा, परन्तु इतना अवश्य कहूँगा कि यह कर्म-सिद्धान्त न केवल वास्तविकता है, बल्कि वर्तमान-परिस्थितियों में भी हम सब इनका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। एक ही समय में एक ही जगह पर जन्मे बच्चों के भाग्य ज्योतिष के अनुसार एक ही जैसे होने चाहिये, परन्तु सबकी परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न होना यह स्पष्ट करता है कि संयोग और ज्योतिषीय-गणना से भाग्य नहीं बनता है, बल्कि हर व्यक्ति के अपने-अपने कर्म ही उसके भाग्यविधाता हैं। इन कर्मों की कुछ विशेषतायें हम निम्नानुसार समझ सकते हैं और इनके उपशमन के लिये प्रतिक्रमण का महत्त्व स्वतः स्पष्ट हो जायेगा। 1. कर्म का कर्ज़ उधार की तरह बुराई के रूप में चक्रवृद्धि ब्याज की तरह दिन दूना, रात चौगुना बढ़ता है। आज जो कर्म बंधा है, वह आगामी बुरे-कर्मों की सन्तति पाकर कई गुना बढ़ सकता है, साथ ही उदयकाल में हुये संक्लेश-परिणामों से सविपाक- निर्जरा से नवीन-बंध कई गुना हो जाने से पुराने कर्मों से कभी छुटकारा ही नहीं मिलता है। इसलिये पुराने कर्मों के स्थिति-अनुभाग क्षीण करने व पाप-प्रकृति-संक्रमित करके पुण्यरूप परिणमित करने में सर्वाधिक-समर्थ-भूमिका यदि कोई निभा सकता है, तो वह व्यक्ति का स्वयं का संकल्प ही है, जो पापों को छोड़ने के लिये वचनबद्ध है। और यह प्रक्रिया मात्र प्रतिक्रमण ही निभाता है।

  1. यदि हम दान-व्रतादिक से हुये पुण्यबंध को उपलब्धि मानते हैं, तो हमें यह ध्यान रखना होगा कि शुभ का बंध तो ‘दुर्जन को दिये उधार’ की तरह है, जो देने के बाद वापस मिलेगा या नहीं ? – यह चिंता उत्पन्न करता है। आज पुण्य बांधा, वह कल के तीव्र-पापबंध से बहुत-जल्दी संक्रमित होता है। जैसे कोई जीवनभर सदाचार करके प्रतिष्ठा बनाये, किन्तु यदि एक गल्ती हो जाये, तो सारी प्रतिष्ठा मटियामेट होने में एक क्षण भी नहीं लगता है।

  2. और यदि हम पाप की कमाई से कमाई सम्पत्ति का दान-पुण्य भी करें, तो वह अशुभ का दान तो ‘अकुलीन को दिये उधार’ की तरह है, जिसे लेकर वह चैन की नींद सोता है और देनेवाला दिन-रात चिंता में जागता है। अतः पुण्य के भरोसे बैठने की जगह अपने परिणामों की पवित्रता अधिक कीमती है और यह प्रतिक्रमण से सबसे अधिक नियमितरूप से स्वाधीनपने होता है।

धर्म की महत्ता जानिये-

सगे भाई-बहिन में संपत्ति का बंटवारा संपर्क सिर्फ ‘राग-द्वेष’ बढ़ाता है। किंतु साधर्मियों की संपत्ति (धार्मिक-संस्कारों) का बंटवारा राग घटाता, सौहार्द बढ़ाता है। अतः सगे की तुलना में साधर्मी बेहतर व हितकारी हैं। अतः प्रतिक्रमणरूपी धार्मिक एवं आध्यात्मिकसंस्कार को हम आपस में साधर्मीजनों के मध्य सौहार्द-पूर्वक वितरित करें और इसकी संवृद्धि करें। – यही इस प्ररूपण का उद्देश्य एवं सार्थकता है।

03 अगस्त 2020

—सुदीप कुमार जैन

प्ररोचना

‘प्रतिक्रमण’ जिनाम्नाय में आत्मिक-परिणामों एवं चर्या के शोधन की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और स्वाधीन-प्रक्रिया है। इसकी तुलना अन्य किसी विधि से नहीं की जा सकती है। प्रत्येक आत्महित का इच्छुक व्यक्ति अपने जीवन को सन्मार्ग पर गतिशील करने के लिये इस विधि को अवश्य अपनाकर मनुष्य-जन्म सार्थक करना चाहता है।

यद्यपि वर्तमान-काल में मात्र महाव्रती-मुनिराजों एवं देशव्रती-श्रावकों के लिये ही प्रतिक्रमण के पाठ लिखे मिलते हैं, और सामान्य-अविरति-श्रावकों एवं अविरत- सम्यग्दृष्टियों के लिये कोई प्रतिक्रमण का पाठ आज तक नहीं बनाया गया था, जबकि सामान्य-श्रावक भी जिनधर्म के श्रद्धानी एवं सदाचारी होते हैं। और अविरत-सम्यग्दृष्टि तो भले ही व्रतों की दृष्टि से ‘अविरत’ कहे जाते हैं, परन्तु सुनिश्चितरूप से वे सम्यग्ज्ञानी व सदाचार के धनी होते ही हैं। अतः उनके जीवन के समुन्नयन के लिये जिनाम्नाय की मर्यादा में मर्यादित ‘प्रतिक्रमण’ का विधान होना ही चाहिये था। फिर भी उसका अभाव सभी को खलता था।

यह अपार-हर्ष का विषय है कि पिछले लगभग 2560 वर्षों के इस अभाव

की पूर्ति जिनधर्म के श्रद्धानी एवं जिनाम्नाय की प्रभावना में निरत धर्मानुरागी विद्वान् प्रो. सुदीप कुमार जैन ने उसी प्राकृतभाषा में लिखकर की, जिस भाषा-शैली में शेष दोनों प्रतिक्रमण के पाठ उपलब्ध हैं। साथ ही प्रायः जिनधर्मानुयायियों की सुविधा की दृष्टि से उन्होंने इसके संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजी-भाषाओं में अनुवाद करके इसी संस्करण में प्रकाशित कराने का भगीरथ-प्रयत्न किया है।

मुझे संतोष है कि 92 वर्ष की आयु में इस मनुष्य-देह में रहते हुये मुझे यह देखने एवं इस पर दो-शब्द लिखने का सुअवसर मिल सका है।

आशा है कि विश्वभर के जिनधर्मानुयायी-जन इससे लाभान्वित होंगे।

अशेष-मंगलभावना के साथ

पं. शान्तिलाल जैन

महीदपुर (म. प्र.)

दिनांक - 04 अगस्त, 2020,

भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा, मंगलवार

समर्पण

जिन महामनीषी इन्द्रभूति-गौतम स्वामी ने मूलतः जैनकुल में जन्म नहीं लिया

और जैनत्व के संस्कार भी नहीं पाये थे; फिर जिन्होंने अपनी अगाध-प्रतिभा

एवं समर्पित-निष्ठा के बल पर

प्रभु महावीर स्वामी की प्रशान्त-मुद्रा के दर्शनमात्र के बल पर

क्षणभर में ही उनके प्रधान-शिष्य (गणधर) बनने का सौभाग्य पाया था

और जो वर्तमान प्रतिक्रमण-पाठों के मूल-प्रवर्तक थे, जिनके वचनों एवं भाषा का अनुसरण करके मैं यह पाठ बना सका हूँ, उन गौतम-स्वामी के प्रति एवं प्रतिक्रमण के परमार्थ-पक्ष के उद्घाटक युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव के प्रति कृतज्ञ-विनयांजलि के साथ

यह कृति सबहुमान-सप्रणति समर्पित है।

  • सुदीप कुमार जैन

पागद-भासा-णिबद्धं अविरद-सावगाणं

पडिक्कमण-सुत्तं ।। अविरद-सावगाणं पडिक्कमण-सुत्तं ।।

(जिणसुत्ताणं पागद-भासम्मि णिबद्धं)

पडिक्कमामि भंते ! संवच्छरियं पडिक्कमणं करेमि ।

अस्सिं संवच्छरे बारस-मासेसु, चउवीस-पक्खेसु, बावण-सत्ताहेसु, छाछट्ठाहिय-तिसद-दिवसेसु जिणधम्ममणुसरंतं मए मणसा वाया कम्मुणा जं किंपि अदिचारं अणुट्ठिदं, तं दसलक्खण-पव्वे किद-धम्माराहणेहिं णिम्मल- चित्तेण वोस्सरितुं पयत्तामि।

संवच्छरे अस्सिं जं किंपि अट्ठविह-सम्मत्तगुणेसु, सत्त-विसणचागे, अविरदि-सावगस्स अट्ठमूलगुणाराहणम्मि, अभक्ख-चाग-चरियम्मि, राइय- चउव्विहाहार-चाग-चरियम्मि, जिणवंदण-पक्खाल-पूयाविहीसु, सज्झाय- चरियम्मि, छव्विहावस्सग-कम्मेसु, सम-सामयिग-विविह-कज्जेसु, वावारादि- कज्जेसु य जं किंपि अणुचिदं सयं आचरिदं, परेहिं आयारिदं, आचरंतस्स य अणुमोदणं विहिदं, तस्स मण-वयण-कायेहिं णिंदामि, गरहामि, वोस्सरामि य। ताणं अदिचाराणं मिच्छामि दुक्कडं ।

अट्ठविह-सम्मत्तगुण-पडिक्कम-विही

इच्छामि भंते ! ‘णिस्संकिय’-गुणाराहणम्मि जिणुवदिट्ठ-तच्चणाणे जं संकिदं, परेसिं संकाविदं, संकिज्जंतं वा अणुमोदणं विहिदं, तस्स जिणसासण- विराहणस्स दोसाणं णिस्संक-अत्ताराहणा-बलेण केवलि-पण्णत्त-वयणाणं सद्दहेण च मणसा-वाया-कम्मुणा वोस्सरामि । तस्स णिस्संकियगुणस्स संकादि-अदिचाराणं मिच्छामि दुक्कडं ।

इच्छामि भंते ! ‘णिक्कंखिय’ - गुणाराहणम्मि जिणुवदिट्ठ-आराहण- विहम्मि जं किंपि कंखिदं, परेसिं कंखाविदं, कंखिज्जंतं वा अणुमोदणं विहिदं, तस्स जिणसासण-विराहणस्स दोसाणं णिक्कंखिय-अत्ताराहणा-बलेण केवलि-पण्णत्त-वयणाणं सद्दहेण च मणसा-वाया-कम्मुणा वोस्सरामि । तस्स णिक्कंखिय-गुणस्स कंखादि-अदिचाराणं मिच्छामि दुक्कडं ।

इच्छामि भंते ! ‘णिव्विचिकिच्छा’ - गुणाराहणम्मि जिणुवदिट्ठ- आराहणविहम्मि, जं, किंपि व्विचिकिच्छिदं, परेसिं व्विचिकिच्छंछाविदं, विचिक्खिज्जंतं वा अणुमोदणं विहिदं, तस्स जिणसासण-विराहणस्स दोसाणं णिव्विचिकिच्छिय-अत्ताराहणा-बलेण केवलि-पण्णत्त-वयणाणं सद्दहेणेण च मणसा-वाया-कम्मुणा वोस्सरामि। तस्स णिव्विचिकिच्छा-गुणस्स विचिकिच्छादि-अदिचाराणं मिच्छामि दुक्कडं ।

इच्छामि भंते ! ‘अमूढदिट्ठी’ - गुणाराहणम्मि मिच्छदिट्ठीणं एगंतवादीणं परूविदमदेहिं रागीदेवाणं कुदेवाणं, हिंसादिसु धम्मपरूवणरूवं कुधम्मस्स, विविहवेसधराणं मोहुवदेसगाणं कुगुरूणं पसंसणमणुवंदणरूवं देवमूढदाए; णिदाण-बंध-कारगं अण्णाणबहुलं अहिमदाणं अणुकरणरूवं लोगमूढदाए तह य हिंसादिसु धम्मपरूवणरूवाए समयमूढदाए कारणेणं जं किंपि गिहीद- मिच्छत्तं करिदं, अगिहीद-मिच्छत्तं च पोसिदं, तं वोस्सरामि। तह य अमूढदिट्ठी- गुणाराहणबलेण मूढदिट्ठीए दोसाण णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि। अमूढदिद्विगुणस्स मूढदिद्यादि सव्वविह-दोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

इच्छामि भंते ! ‘उवगूहण’ - गुणाराहणम्मि णियगुणाणं पसंसणं परावगुणाणं च णिंदणं जं किंपि मए अणुट्ठिदं, तेणायरणेण य मोक्खमग्गस्स सम्मदंसणस्स च जा विराहणा कदा, कारिदा वा, कीरंतं वा समणुमण्णिदा, तं वोस्सरामि । तेसिमप्पाणं सव्वदोसाणं णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । उवगूहण-गुणस्स विवरीदाणं सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

इच्छामि भंते ! ‘ठिदिकरण’ - गुणाराहणम्मि कसायादिवसेण धम्ममग्गेण उम्मग्गं गच्छंतं सगं परं च जिणमदे सयं ण ठिदिकरणं किदं, ण ठाविदं, ठविस्संतं पि णाणुमोणिंदं, तेसिमप्पाणं सव्वदोसाणं णिंदामि गरहामि परिच्चागं करोमि । ठिदिकरण-गुण-विरोहि-सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

इच्छामि भंते ! ‘पहावणा’ - गुणाराहणम्मि, विज्जारहमारूढो जो जीवो मणोरहपहेसु भमित्ता जिणुवदिट्ठ-सम्मणाणस्स पहावणं करोदि, तस्स ‘पहावणां’ णाम। आगम-विवरीद-वयणाणं किदेण वा कारिदेण व अणुमंतेण वा जं मया अप्पहावणा अण्णहा-पहावणा वा किदा, करिदा वा, कीरंतं वा समणुण्णिदा तस्स पहावणागुणस्स सव्वदोसाणं णिंदामि गरहामि परिच्चागं करोमि । जिण- णाण-पहावणाए जं किंपि मए विवरीदमाचरिदं, तेसिं सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

इच्छामि भंते ! ‘वच्छल्ल’-गुणाराहणम्मि चदुगदि-भमणरूव-संसारस्स तारगाणं रिसीणं मुणीणं जदीणमणगाराणं च चदुव्विहे संघे अवि य मोक्खमग्ग- पहावगाणं साहम्मिजणाणं किदे वच्छे गावी जहा गिद्धिव्व वच्छल्लकरणं सम्मदिट्ठीणं सोहा। एदेसु जं मए एरिसं वच्छल्लं ण किच्चा तेसिं उवेक्खणं किदं, परेहिं कारिदं, कीरंतं वा समणुमण्णिदं, तेसिं सव्वदोसाणं णिंदामि गरहामि परिच्चागं च करोमि । वच्छल्लकरणं गुणस्स-विरोहि-सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

सम्मदंसणस्स चदुगुणाणं दोस-पडिकमणं

इच्छामि भंते ! सम्मदंसणस्स आराहणाए चदुगुणा परूविदा, ते च - पसमो, संवेगो, अणुकंपा अत्थिक्कं च। एदेसिं गुणाणं आराहणं साहणं च सम्मदिट्ठी जीवो सदा करेदि । तहेव जिणधम्माणुरागिजणा वि एदेसिं अणुगरणं करेंति कारेंति अणुमण्णंति च। एदेसिं गुणाणं आराहणाए जे दोसा मए अण्णाणेण, पमादेण व किदा, कारिदा वा, कीरंतो वा अणुमण्णिदा, तेसिं मणसा वचसा कायेण च णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । कमसो एदेसिं दोसाणं पडिक्कमणं करेमि ।

पडिक्कमामि भंते ! सम्मदंसणस्स पढमे ‘पसम’ - गुणे पंचिंदिय- विसयेसु सिढिलणं तह य अवरज्झेसु वि कोहादि-समणं पसमभावं ति। तह जं मए पंचिंदिय-विसया गिद्धत्तणेण अहिलसिदा तह य अवरज्झेसु वि कोहुग्गमे कोहसमणं णेव किदं त्ति कारणेण जो पसमभावो ण किदो, कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो; अहवा पसमभाव-जुत्ताणं समायरं ण किदो, ण कारिदो, कीरंतो वा ण समणुमण्णिदो, तेसिं सव्वदोसाणं णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । पसम-गुणस्स-विरोहि-सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं । पडिक्कमामि भंते ! सम्मदंसणस्स बिदिए ‘संवेग’-गुणे संसार-दुहेसु अदिभीरुदा संवेगं णाम, अहवा रयणत्तयस्स लद्धीए हरिसो संतो संवेगो णाम, धम्मे धम्मफले च हरिसभावो वि संवेगो त्ति। तह जं मए संसार-दुहेसु अदिभीरुदा ण किदा, तह य रयणत्तयस्स लद्धीए हरिसो, धम्मे धम्मफले च हरिसभावो वि ण किदो, ण कारिदो, कीरंतो वा ण समणुमण्णिदो; अहवा संसारे सुहणुवेक्खा, रयणत्तयलद्वाणं धम्मपरायणाणं जणाणं पदि हरिसभावो ण किदो, ण कारिदो, कीरंतो वा ण समणुमण्णिदो, तेसिं सव्वदोसाणं णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । संवेगगुणस्स-विरोहि-सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं । पडिक्कमामि भंते ! सम्मदंसणस्स तिदिए ‘अणुकंप’-गुणे “तिसिदं बुभुक्खिदं वा दुहिदं दडूण जो दुहिदमणो किविया पडिवज्जदि तस्सेसा अणुकंपा होदि” - त्ति वयणादो जं मए दुहिद-जीवाणं संसार-सायर-णिमग्गाणं पदि करुणा-भावणा-पुव्वं अणुकंपा णेव किदा, ण कराविदा, कीरंतं व समणुमण्णिदा, तेसिं सव्वदोसाणं णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । अणुकंप-गुणस्स-विरोहि-सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

पडिक्कमामि भंते ! सम्मदंसणस्स चदुत्थे ‘अत्थिक्क’ - गुणे “जो जिणिंदे तप्पण्णत्त-तच्चणाणे, जिणसत्थेसु जिणधम्मायरणे च अणण्णभावेण सद्धाणं हवदि, तं खु अत्थिक्कं णाम। तह जं मए वीदरागे जिणिंदे, तप्पण्णत्ते तच्चणाणे, जिणिंद-वयणरूवेसु जिणसत्थेसु तह य जिणधम्मायरणे रदाणं जदीणं गिहत्थाणं च विसये” इदं सच्चं, हिदकरं चेदि" - त्ति ण मण्णंति, णेव मण्णेंति, मण्णमाणाणं वि ण समणुमोदंति। अहवा एदेसिं पेक्खिदूण वि उवेक्खाभावं किदं, कराविदं, कीरंतं व समणुमण्णिदं, तेसिं सव्वदोसाणं णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । अत्थिक्क-गुणस्स-विरोहि-सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

अविरदि-सावगाणं अट्ठ-मूलगुण-संबंधि-दोसाणं पडिक्कमणं

इच्छामि भंते ! अविरदि-सावगाणं अट्ठ-मूलगुणेसु संति ‘पंचुदुंबर- फलाणं अभुंजणं’ तह य ‘महु-मंस-मज्जाणं सेवणस्स परिच्चागो’ त्ति। कोवि अविरदि-सावगो वि एदेसिं भुंजणं सेवणं च सिविणे विणकरेदि, अण्णहा तस्स जिणधम्मे अवट्ठिदी वि ण संभाविदा। एदेसिं मूलगुणाणं आराहणं साहणं च सम्मदिट्ठी जीवो सदा करेदि । तहेव जिणधम्माणुरागि-जणा वि एदेसिं अणुगरणं करेंति, कारेंति, अणुमण्णंति च। एदेसिं मूलगुणाणं आराहणाए जे दोसा मए अण्णाणेण, पमादेण व किदा, कारिदा कीरंतो व अणुमण्णिदा, तेसिं मणसा वचसा कायेण च णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । कमसो एदेसिं दोसाणं पडिक्कमणं करेमि ।

इच्छामि भंते ! 'पंचुटुंबर-फल-चागं पडिक्कमामि। एदेसु फलेसु वडफलं, पिप्पलफलं, उंबारफलं, कटुंबरफलं, पिंपरीफलं ति तसजीवाणं जोणिरूवादो हिंसारूवाणि। एदेसिं भुंजणं, सेवणं वा अजाणमाणेण, पमादेण, गिद्धत्तणेण वा सयं किदं, अण्णेहि कराविदं, कीरंतस्स वा समणुमण्णिदं ति तेसिं मणसा वचसा कायेण च णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । पंचुटुंबर- फलाणं परिच्चागे संभाविदाणं सव्व-दोसाणं मिच्छामि दुक्कडं । इच्छामि भंते ! ‘तिविह-मगार-चागं’ पडिक्कमामि। तिविह-मगार- च्चागे महु-मंस-मज्जाणं परिच्चागो परूविदो अविरदि-सावगाणं किदे जिणसासणे। तेसु महुं दाव महुमक्खियाणं मंसेण रत्तेण वमणेण च होदि, तम्हा महुसेवणं पच्चक्खं हिंसाभूदं ति। तहेव मंसं वि तसजीवाणं देह-मंसेण होदि, तम्हा आदि-मज्झावसाणे च हिंसामयं हि मंस-सेवणं। तह य मज्जं वि बहुविह- पावजणगं, मज्जुप्पादणे गलिय-दव्वेसु पच्चक्ख-तसजीवा उप्पज्जंति, अदो हिंसापावं मज्जसेवणे हवदि हि; एवमेव मज्जपायीजणो अप्पसरूवं विसुमरिय अणत्थमेव करेदि, तम्हा हिंसादो कुसील-पज्जंता सव्वे पावा मज्ज-सेवणे संभवंति। पडिक्कमामि भंते ! मए जं तिविह-मगाराणं महु-मंस-मज्जाणं अण्णाणेण वा पमादेण वा गिद्धत्तणेण वा सेवणं किदं वा कारिदं वा कीरंतं व समणुमण्णिदं, तस्स मणसा वचसा कायेण च णिंदामि गरहामि परिच्चागं च करोमि । तिविह-मगाराणं महु-मंस-मज्जाणं परिच्चागे संभाविदाणं सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

अभक्ख-सेवण-पडिक्कमणं

एवमेव ‘बावीसाणं अभक्ख-पदत्थाणं’ (ओलादीणं), तह य

पंचविह-अभक्ख-पगाराणं (तसघादं, बहुघादं, गाहिलदाकारगं/णसाकारणं, अणुवसेव्वं, अणिटुं चेदि) वि सेवणं कोवि सम्मदिट्ठी, अविरदि-सावगो चावि ण हि करेदि, ण कारेदि, कीरंतं वि ण समणुमण्णेदि । एदेसिं चागाभावे जेण्हत्तणं वि ण संभवदि। एदे सव्वे हिंसादि-पावमया लोगणिंज्जा च होंति। अदो हं एदेसिं सव्वेसिं मणसा वचसा कायेण च णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । एदेसिं सव्वेसिं अभक्खाणं परिच्चागे संभाविदाणं सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं । अविरदि-सावगाणं सेस-पच्चीस-दोसाणं परिच्चाग-संबंधि-दोसाणं

पडिक्कमणं

इच्छामि भंते ! अविरदि-सावगाणं 'सम्मत्तस्स सेस-पच्चीस-

दोसा’ पडिक्कमामि। तेसु पच्चीस-दोसेसु सम्मत्तस्स णिसंकिदादि-अदूंगाणं पडिक्कमणे संकादि-अट्ठदोसाणं वि पडिक्कमणं जादं। सेस-दोसेसु विण्णाणादि-अट्ठमदाणि, कुदेवसेवणादि-छव्विहाणायदणाणि, देवमूढत्तणादि- तिविह-मूढदाओ संति। एदेसिं दोसाणं परिच्चागं सम्मदिट्ठी-जीवो सदा करेदि। तहेव जिणधम्माणुरागिजणा वि एदेसिं दोसाणं परिच्चागं करेंति कारेंति अणुमण्णंति च। एदेसिं दोसाणं परिच्चागविहीए जे दोसा मए अण्णाणेण, पमादेण व किदा, कारिदा कीरंतो व अणुमण्णिदा, तेसिं मणसा वचसा कायेण च णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । कमसो एदेसिं दोसाणं पडिक्कमणं करेमि ।

इच्छामि भंते ! ‘अट्ठ-मदा’ पडिक्कमामि। अट्ठ-मदेसु दाव विण्णाण- पूया-कुल-जादि-बल-रिद्धि-तवो-रूवं च संति। एदेहिं जं मए अप्पाणं महिदो सेट्ठो वा मण्णिदो, एवं मण्णंतेण मए अप्पसरूवस्स विराहणा तह य परस्साराहणा-दारेण दुरहिमाणस्स पोसणेण णियरूवं विराहिदं। एवं करंतेण मए अप्पसरूवस्स विराहणाए पावं तह य परेसिं अवमाणस्स च लोगणिंज्ज- कज्जदारेण बहुविहा पावा किदा, कारिदा कीरंता वि समणुमण्णिदा। संपदि सम्मत्तस्स आराहंतेण मए एदेसिं दोसाणं परिच्चागविहीए जे मदा मए अण्णाणेण, पमादेण व किदा, कारिदा कीरंतो व अणुमण्णिदा, तेसिं सव्वेसिं मदाणं मणसा, वचसा, कायेण च णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । एदेसिं सव्वेसिं मदाणं परिच्चागे संभाविदाणं सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

इच्छामि भंते ! अविरदि-सावगाणं छव्विह-अणायदणाणं सेवणादो

जायमाण-दोसा पडिक्कमामि। एदे छव्विह-अणायदणा सम्मदिट्ठीणं अविरदि- सावगाणं वि ण होंति। ते छव्विह-अणायदणा संति कुदेव-कुगुरु-कुहम्मं तिण्णि, एदेसिं तिण्हं वि सेवगा— एवं छव्विहाणं अणायदणाणं अणुमण्णणं सेवणं पसंसणं च। एदेसिं छव्विह-अणायदणाणं सेवाए जं गहीद-मिच्छत्तस्स बंधणं होदि, तं तु सम्मत्तस्स खयकारगं अणंत-संसार-परिब्भमण-हेतुभूदं च । एवं करंतेण मए अप्पसरूवस्स विराहणाए मिच्छत्तस्स महापावस्स बंधणं तह य परेसिं वि मोक्खमग्ग-विराहणा कारिदा। अण्णाणेण, पमादेण वा एदेसिं छव्विह-अणायदणाणं सेवणेण पसंसणेण च जं मए सम्मत्तं विराहिदं, अण्णेहिं विराहाविदं, विराहणा-कीरंतस्स व समणुमण्णिदं, तेसिं मणसा वचसा कायेण च णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं, करोमि । एदेसिं सव्वेसिं छव्विह-अणायदणाणं सेवण-पसंसण-परिच्चागे संभाविदाणं सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं । इच्छामि भंते ! अविरद-सावगाणं ‘तिविह-मूढत्तणं’ पडिक्कमामि । तिविहासु मूढदासु लोगमूढदा, देवमूढदा तह य समयमूढदा। एदासु लोगमूढदाए जले तित्थत्तं, रुक्खादिपूयणं इच्चादि अण्णाणमयि-किरिया-करणं लोगमूढदा, राग-दोस-मोहादि-विउडीहिं विउडाणं पूया देवमूढदा, तह य पुव्वावर-विरोह- सहिदं लोगिग-सत्थाणं वयणेसु आदहिद-बुद्धी सत्थमूढदा। अण्णाणेण, पमादेण वा एदेसिं तिविह-मूढत्तणाणं सेवणेण पसंसणेण च जं मए सम्मत्तं विराहिदं, अण्णेहिं विराहाविदं, विराहणा-कीरंतस्स व समणुमण्णिदं, तेसिं मणसा, वचसा, कायेण च णिंदामि, गरहामि परिच्चागं, च करोमि । एदेसिं सव्वेसिं तिविह-मूढत्तणाणं सेवण-पसंसण-परिच्चागे संभाविदाणं सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं ।

अविरदि-सावगाणं सत्तण्हं विसणाणं परिच्चाग-संबंधि-दोसाणं

पडिक्कमणं

इच्छामि भंते ! अविरदि-सावगाण सत्तण्हं विसणााणं पडिक्कमामि । तेसु सत्तविसणेसु जूदखेलणं, मंसभुंजणं, मदिरापाणं, वेस्सागमणं, आखेडणं, चोरकम्मं तह य परदार-सहवासं चेदि सव्वे वि लोगिग-परमत्थिय-ववहारेसु अणेगविह-दुहाण कारणाणि, तम्हा अविरदि-सम्मदिट्ठी, अविरद-सावगो तह य सामण्णेण सिट्टलोगो वि एदेसिं परिच्चागं करेंति कारेंति अणुमण्णंति य। एदेसिं सत्त-विसणाणं परिच्चागविहीए जे दोसा मए अण्णाणेण, पमादेण व किदा, कारिदा कीरंतो व अणुमण्णिदा, तेसिं मणसा, वचसा, कायेण च णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च करोमि । एदेसिं सव्वेसिं सत्त-विसणाणं सेवण- पसंसण-परिच्चागे संभाविदाणं सव्वदोसाणं मिच्छामि दुक्कडं । अविरदि-सावगस्स छव्विहावस्सग-कम्म-संबंधि-दोसाणं पडिक्कमणं इच्छामि भंते ! छव्विहावस्सग-कम्माणि पडिक्कमामि। जिणधम्मे गिहत्थाणं छव्विहावस्सग-कम्माणि, तेसु देवपूया, गुरूवासणं, सज्झायं, संजमो, तवो, दाणं चेदि। एदाणि छव्विहावस्सग-कम्माणि गिहिधम्मे कम्म- विसोहगाणि धम्म-पवेसगाणि च संति। कमसो एदे दोसा पडिक्कमामि । तेसु पढमे आवस्सगे देवपूयम्मि पढमं हि जिणबिंब-पक्खालविही, अस्सिं पावायरणं चत्ता अदीव-विणयेण णिम्मल-सेद-कप्पासमयेण किंचि अद्द-वत्थेण जिणबिंबस्स अंगपोक्खणं होदि, पुणो सुयोमलेण सुक्क-वत्थेण जिणबिंबोयरि समागदं अद्दत्तणं अवहरणविही। तदो पासुग-दव्वेहिं अप्पारंभ- परिग्गह-विहिणा भावेण विणयेण च देवपूया-विही होदि त्ति। ‘देवपूया’ - कम्मे रागी-देवाणं पूयणेण, वीदरागस्स च णिदाणभावेण पूयणेण जिणधम्मस्स णिकंखिद-भावं उवेक्खिदं, तेण महदि मिच्छत्तं पोसिदं । एयारिस-दुच्चरणेण मए अण्णाणेण वा पमादेण वा दुरासयेण वा जं पावबंधं किदं, कारिदं, कीरंतं वा समणुमण्णिदं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।

तेसु बिदिये आवस्सगे ‘गुरूवासणं’ -कम्मे भावलिंग-रहिदाणं,

अट्ठाविंसदि-मूलगुणाणं णिद्दोस-अपालगाणं, परिग्गह-लुद्धाणं वेसियाणं जं मए पूया-वंदणं-थुदीहिं भत्ती अण्णाणेण वा पमादेण वा लोगाणुकरणेण वा किदा वा, कारिदा वा, कीरंतं वा समणुमण्णिदा, तस्स मिच्छामि दुक्कडं। तेसु तिदिये आवस्सगे ‘सज्झाय’ -कम्मे मिच्छत्त-राग-दोस-पोसगाणं हिंसादिसु धम्मपरूवगाणं कुसत्थाणं सज्झायेण मिच्छत्तादि-पावा पोसिदा, तह य सम्म-सत्थाणं सज्झाये वि अक्खर-पद-विंजण-मत्ता-अत्थादीणं सुद्धी ण किदा, कत्ताभावस्स पोसणं किदं । - एदे सव्वे दोसा पावकम्मकारगा। अण्णाणेण वा पमादेण वा लोगाणुकरणेण वा जं किंपि एरिसं मए कदो वा, कारिदो वा, कीरंतो वा समणुमण्णिदो, तस्स मिच्छामि दुक्कडं । तेसु चदुत्थे आवस्सगे ‘संजमायरणे’ अविरद-सावगाणं णिद्दिद्वं सदाचरणं, तं जहा सत्तविसणाणं परिच्चागं, छव्विहावस्सगाणं णिच्चायरणं, णिसंकिदादि-अटुंगाणं पालणं, बाबीस-अभक्खाणं चागं, सम्मत्तस्स पच्चीस- दोसाणं विरमणं-एदेसिं अणुपालणं अण्णाणेण वा पमादेण वा लोगाणुकरणेण वा मणसा, वचसा, कायेण च ण किदं, ण कारिविदं, कीरंतं वा ण समणुमण्णिदं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।

तेसु पंचमे आवस्सगे ‘तवायरणे’ अविरद-सावगाणं णिद्दिद्वं तवायरणं, तं जहा अट्ठमियम्मि, चउदसियम्मि, ति-अट्ठह्निगापव्वेसु, ति-दसलक्खण- पव्वेसु जहासत्तिं तवोकम्मं, किंति हरिदकाय-चागो, अणसणादीणं अणुचरणं, मज्जादित-भोयणं, बह्मचेर-रक्खणं इच्चादीणं अण्णाणेण वा, पमादेण वा, दुच्चरिदेण वा मणसा वचसा कायेण च ण किदं, ण कराविदं, कीरंतं पि ण समणुमण्णिदं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।

तेसु छड्डे आवस्सगे दाणाणुट्ठाणे अविरद-सावगाणं णिद्दिद्वं जं दाणं, तं दु सग-परस्स अणुगहत्थं णायोपज्जिद-दव्वस्स विणयेण बहुमाणेण चेव होदि। तं जहा विहिपुव्वं समीचीण-दव्वस्स सुपत्तस्स दाणविही जहासत्तिं अण्णाणेण वा पमादेण वा गिद्धत्तणेण वा ण किदा, ण कारिदा कीरंतं वि ण समणुमण्णिदा, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ।

सम-सामयिग-दोसाणं पडिक्कमणं

इच्छामि भंते ! अविरद-सावगाणं समसामयिग-दोसा पडिक्कमामि । जिणधम्माणुसारिणं अविरद-सावयाणं जीवणे सांपदिगे जुगे एदारिसाणि कज्जाणि पचलिदाणि, जेसिं वण्णणं जिणसत्थेसु ण मिलदि, तहवि ते दोसा सामण्ण-जिणधम्मायरण-विघादका संति, अदो तेसिं वि पडिक्कमणं एत्थाहं करिस्सामि। तं जहा - सेअर-वावारे बहुसो संठाणा हिंसादि-पावकज्जेसु णिरदा संति, तेसु धण-णिवेसणं हिंसादि-पावाणं पोसणं। एवमेव गिहादो बहि जे भोजणत्थं वावार-केंदाणि, तेसु वि सामिस-भोयणं अमज्जादिय-भोयणं विणिम्मदं होदि, जेहिं हिंसापाव-पउत्ती होदि अभक्ख-भोयणस्सावि दोसो पसत्तो होदि। एमेव आहुणिय-ओसढीसु वि बहूणि हिंसग-साहणहिं सामग्गीहिं य विणिम्मिदा होंति। परिहाणेसु वि वत्थेसु कोसेय-वत्थेसु बहूणं तसजीवाणं हिंसा होदि हि, उवाहणेसु वि चम्म-णिम्मिदेसु थूलाणं पसूणं वहेण बहुहिंसा होदि हि। उसव-समाजेसु वि विसेसदो णिसाए आयोज्जमाणेसु बहुजीव-हिंसा तह य अउलीणायरणे होंति । एदेसिं हिंसादि-पावकम्म-पहाणाणं सामग्गीणं सेवणेण बहुविहा हिंसादिमया पावबंधा होंति । एदेसिं सेवणं अण्णाणेण पमादेण दुच्चरिदेण वा मए जं किदं वा, कारिदं वा, कीरंतं वा समणुमण्णिदं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।

एमेव वावारे वि मिच्छा-संभासणेण, रहोब्भक्खाणे केसिं वि वीसास- भंगविहिणा गोवणीय-तथ्थ-पकडेण, कूडलेह-करणे छलेण लेहं लिहित्ता सासणस्स मज्जायोलंघणेण, णासावहारे परेसिं णासाणं अवहरणेण, सायार- मंत-भेदे परेसिं गोवणीय-रहस्सुग्घाडणेण, थेणप्पओगे चोरकम्मकरणेण कराविदेण वा, थेणाहिदादाणे चोरिद-वत्थूणं कयेण विणियमेण वा, विरुद्ध- रज्जादिकमणे राजगीय-णियमाणं उल्लंघणेण, हीणाधिग-माणुम्माणे वावारे माव-तोलणेसु अवरज्झणेण, पडिरूवय-ववहारे सेट्ठ-पदत्थेसु हीण-पदत्थाणं मिस्सणेण जं मए अणेदिग-रूवेण लोगविरुज्झं धम्मविरुज्झं च आयरणं विहिदं पावबंधो य किदो, कारिदो कीरंतो वा समणुमण्णिदो, तं पडिक्कमामि। एदेसिं सेवणं अण्णाणेण, पमादेण दुच्चरिदेण वा मए जं किदं वा, कारिदं वा, कीरंतं वा समणुमण्णिदं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।

एमेव सेवाकम्मुणि णियदकालाणाणुवट्टणेण, काले य कम्म-

विमुहणेण, उक्कोच-गहणेण, ईसावसेणामज्जादिय-ववहारेण अण्णेहिं वा कारणेहिं कत्तव्व-विमुहो संभुत्ता जं किं पि विहि-विरुद्धं आयरणं अण्णाणेण, पमादेण, विद्दोहेण वा किदं वा, कारिदं वा, कीरंतं वा समणुमण्णिदं, तं वोस्सरामि। णिट्ठापुव्वं कम्मसंकप्पं किच्चा संजाद-दोसाणं मणसा वचसा कायेण च णिंदामि, गरहामि, परिच्चागं च कुव्वं पडिक्कमामि । तेसिं किदे मिच्छा मे दुक्कडं ।

सम्मत्तस्स भावणा-

तिण्णि-सदा तेसट्ठा, मिच्छत्ता दंसणस्स पडिवक्खा।

अण्णाणे सद्दहियीया, मिच्छा मे दुक्कडं होज्ज ।।

अंचलिगा

इच्छामि भंते ! पडिक्कमण-अदिचारं आलोचेढुं । अस्सिं संवच्छरियम्मि सम्मदंसणस्स सम्मणाणस्स अविरदीणं सदायारस्स सव्वे अदिचारा सावज्जजोगं च परिहरामि। एरिसं करंतेण मए अच्छाकारिदं, मिच्छा-मेलिदं, आमेलिदं, अण्णहा-दिण्णं अण्णहा-पडिच्छदं, आवस्सगेसु परिहीणदाए तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।

इच्छामि भंते ! चउवीस-तित्थयर-भत्ती, सुद-भत्ती, समाहिभत्ति-पुव्वं च काउस्सग्गो किदो, तस्सालोचेतुं इंद-सद-वंदियाणं थुदि-सहस्स-णिलयाणं उसहादि-वीरंत-मंगल-महापुरिसाणं णिच्चकालं अंचेमि पूजेमि वंदामि णमंसामि। दुक्खखओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो, सुगदिगमणं, समाहिमरणं जिण-गुण-संपत्ती च होदु मज्झं ।

।। इदि अविरदि-सावगाणं संवच्छरियं पडिक्कमणं संपुण्णं ।। । सव्वेसिं सुहं कल्लाणं च भोदु।

प्रतिक्रमण के विषय में आचार्य कुन्दकुन्द के उद्गार

मोत्तूण अट्टरुदं, झाणं जे झादि धम्म-सुक्कं च ।

सो पडिकमणं उच्चदि, जिणवर-णिद्दिट्ठ-सुत्तेसु ।।

अर्थ :- जो जीव आर्त्त-रौद्र-ध्यानों को छोड़कर धर्म्य-शुक्ल-ध्यानों को ध्याता है, वह जीव जिनेन्द्र देव के द्वारा कथित सूत्रों में स्वयं प्रतिक्रमण कहा गया है।

मिच्छा-दंसण-णाण-चरित्तं चइदूण णिरवसेसेण।

सम्मत्त-णाण-चरणं, जो भावदि सो पडिक्कमणं।।

अर्थ :-- जो जीव मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र को पूर्णतः छोड़कर (छोड़ने की भावना करके) सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्य- क्चारित्र की भावना करता है, वह प्रतिक्रमण रूप होता है। - (नियमसार, गाथा 87, 91)

संस्कृतभाषा-निबद्धम् अविरत-श्रावकाणां

प्रतिक्रमण-सूत्रम् ।। अविरति-श्रावक-प्रतिक्रमण-सूत्रम् ।।

(संस्कृत - अनुवाद)

प्रतिक्रमामि भंते ! सांवत्सरिकं प्रतिक्रमणं करोमि ।

अस्मिन् संवत्सरे द्वादश-मासेषु चतुर्विंशति-पक्षेषु षट्षष्ट्यधिक- त्रिशतदिवसेषु जिनधर्ममनुसरन्तं मया मनसा वाचा कर्मणा यत्किञ्चिदपि अतिचारमनुष्ठितं, तं दशलक्षण-पर्वणि कृत-धर्माराधनाभिः निर्मलचित्तेन विस्मरितुं प्रयतते ।

संवत्सरेऽस्मिन् यत्किमपि अष्टविध-सम्यक्त्व-गुणेषु, सप्तविध-व्यसन- त्यागे, अविरत-श्रावकस्य अष्ट-मूलगुणाराधनायां, अभक्ष्य-त्याग-चर्यायां, रात्रिक-चतुर्विधाहार-त्याग-चर्यायां, जिनवंदन-प्रक्षाल-पूजाविधीषु, स्वाध्याय-चर्यायां, षट्विधावश्यक-कर्मसु, समसामयिक-विविध-कार्येषु व्यापारादि-कार्येषु च यत्किञ्चिदपि अनुचितं स्वयमाचरितं, परैः आचारितं, आतरन्तस्य चानुमोदनं विहितं, तस्य मनः-वचन-कायैः निंदामि गर्हामि, विस्मरामि च । तेषामतिचारानां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

अष्टविध-सम्यक्त्व-गुण-प्रतिक्रमण-विधिः

इच्छामि भंते ! निःशंकित-गुणाराधनायां जिनोपदिष्ट-तत्त्वज्ञाने यत् शङ्कितं, परैः शङ्कापितं, शङ्कमानं वा अनुमोदनं विहितं, तस्य जिनशासन- विराधनायाः दोषाणां निःशङ्क-आत्माराधना-बलेन केवलि-प्रज्ञप्त-वचनानां श्रद्धानेन च मनसा वाचा कर्मणा विस्मरामि । तस्य शङ्कादि-अतिचाराणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

इच्छामि भंते ! निःकांक्षित-गुणाराधनायां जिनोपदिष्टाराधनाविधौ यत्किमपि काङ्क्षितं परैः काङ्क्षापितं, काङ्क्षायमानस्य वा अनुमोदना विहिता, तस्य जिनशासन-विराधनस्य दोषाणां निःकांक्षित-आत्माराधनाबलेन केवलि- प्रज्ञप्त-वचनानां श्रद्धानेन च मनसा वाचा कर्मणा विस्मरामि । तस्य काङ्क्षादि- अतिचाराणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

इच्छामि भंते ! निर्विचिकित्सा-गुणाराधनायां जिनोपदिष्टाराधनाविधौ यत्किमपि विचिकित्सितं, परेषां विचिकित्सापितं, विचिकित्सन् वा अनुमोदनं विहितं, तस्य जिनशासन-विराधनायस्य दोषाणां निर्विचिकित्सा- आतमाराधना-बलेन केवलि-प्रज्ञप्त-वचनानां श्रद्धानेन च मनसा वाचा कर्मणा विस्मरामि । तस्य निर्विचिकित्सा-अतिचाराणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि । इच्छामि भंते ! अमूढदृष्टि-गुणाराधनायां मिथ्यादृष्टीनामेकान्तवादिनां प्ररूपित-मतैः रागीदेवतानां कुदेवतानां, हिंसादिषु धर्म-प्ररूपणरूप-कुधर्मणः विविध-वेषधरानां मोहोपदेशकानां कुगुरूणां प्रशंसनमनुवंदनरूपं देवमूढतायाः तथा च निदानबंध-कारकमज्ञानबहुलमभिमतानामनुकरणरूपं लोकमूढतायाः कारणेन यत्किमपि गृहीत-मिथ्यात्वं कृतमगृहीत- मिथ्यात्वं च पोषितं, तं विस्मरामि। तथा च अमूढदृष्टि-गुणाराधनाबलेन मूढदृष्टेः दोषान् निंदामि गर्हामि परित्यागं करोमि । मूढदृष्टेः सर्वविध-दोषानां दुष्कृतं मिथ्या करोमि । इच्छामि भंते ! उपगूहन-गुणाराधनायां निजगुणानां प्रशंसनं, परवगुणानां च निंदनं यत्किमपि मया अनुष्ठितं, तेनाचरणेन च मोक्षमार्गस्य सम्यग्दर्शनस्य च या विराधना कृता वा, कारिता वा, कुर्वन्तमपि वा समनुमन्निता, तं विस्मरामि । उपगूहन-गुणस्य विपरीतानां सर्वदोषानां दुष्कृतं मिथ्या करोमि । इच्छामि भंते ! स्थितिकरण-गुणाराधनायां कषायादिवशेन धर्ममार्गेण उन्मार्गं गच्छन्तं स्वकं परञ्च जिनमते स्वयं स्थितिकरणं न कृतं, न स्थितिकरणं कारावितं, स्वयं स्थितिकरणं कुर्वन्तमपि नानुमोदितम्। तेषामात्मानां सर्वदोषान् निंदामि, गर्हामि, परित्यागं करोमि । स्थितिकरण-, गुण-विरोधि-सर्वदोषाणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

इच्छामि भंते ! प्रभावना-गुणाराधनायां "विद्यारथमारूढः जो जीवो मनोरथपथेषु भ्रमित्वा जिनोपदिष्ट-सम्यग्ज्ञानस्य प्रभावनां करोति, तस्स प्रभावनं नाम। आगम-विपरीत-वचनानां कृतेन वा कारितेन वा अनुमन्तेन वा यन्मया अप्रभावना अन्यथा-प्रभावना वा कृता, कारिता, कुर्वन्तमपि अनुमोदनं कृतं, तस्य सर्वदोषान् निंदामि, गर्हामि, परित्यागं च करोमि । जिनज्ञान- प्रभावनायां यत्किमपि मया विपरीतमाचरितम्, तेषां सर्वदोषाणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

इच्छामि भंते ! वात्सल्य-गुणाराधनायां चतुर्गति-भ्रमणरूप-संसारस्य तारकाणां ऋषीणां मुनीनां यतीनामनगाराणाञ्चचतुर्विधे संघे अपि च मोक्षमार्ग- प्रभावकानां साधर्मिजनानां कृते वत्से गौरिव यथा गृद्धीव वात्सल्यकरणं सम्यग्दृष्टीणां शोभा। एतेषु यन्मया एतादृशं वात्सल्यं न कृत्वा तेषामुपेक्षणं कृतं, परैः कारापितं कुर्वन्तमपि समनुमोदितं, तेषां सर्वदोषाणां निन्दामि, गर्हामि, परित्यागं च करोमि । वात्सल्यकरण-गुणस्य विरोधि-सर्वदोषाणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

सम्यग्दर्शनस्य चतुर्गुणानां दोष-प्रतिक्रमणम्

इच्छामि भंते ! सम्यग्दर्शनस्याराधनायां चतुर्गुणाः प्ररूपिताः, ते च- प्रशमः, संवेगः, अनुकम्पा आस्तिक्यञ्च। एतेषां गुणानां आराधनं साधनञ्च सम्यग्दृष्टि-जीवः सदा करोति। तथैव जिनधर्मानुरागीजनाः अपि एतेषामनुकरणं कुर्वन्ति, कारपयन्ति अनुमन्यन्ते च । एतेषां गुणानामाराधनायां ये दोषाः मया अज्ञानेन प्रमादेन वा कृताः, कारिताः कुर्वन्तमपि अनुमन्यिता, तेषां मनसा वाचा कायेन च निंदामि, गर्हामि, परित्यागं च करोमि । क्रमशः एतेषां दोषाणां प्रतिक्रमणं करोमि ।

प्रतिक्रमामि भंते ! सम्यग्दर्शनस्य प्रथमे प्रशमगुणे पञ्चेन्द्रिय-विषयेषु शिथिलनं, तथा च अपरद्धेष्वपि क्रोधादि-शमनं प्रशमभावमिति । तथा यन्मया पञ्चेन्द्रिय-विषया गृद्धतया अभिलषिताः, तथा चापरद्धेष्वपि क्रोधादिशमनं नैव कृतमिति कारणेन यत्प्रशमभावं न कृतः, न कारितः, कुर्वन्तमपि नानुमोदितः, अथवा प्रशमभाव-युक्तानां समादरं न कृतः न कारितः कुर्वन्तमपि नानुमोदितः, तेषां सर्वदोषाणां निन्दामि, गर्हामि, परित्यागं च करोमि । प्रशमगुण-विरोधि- सर्वदोषाणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

प्रतिक्रमामि भंते ! द्वितीये संवेग-गुणे संसार-दुःखेषु अतिभीरुता संवेगं नाम, अथवा रत्नत्रयस्य लब्ध्या हर्षितः सन्तः संवेगः नाम। धर्मे धर्मफले च हर्षभावः संवेग इति। तथा यन्मया संसार-दुःखेषु अतिभीरुता न कृता, तथा च रत्नत्रयस्य लब्ध्या हर्षः, धर्मे धर्मफले च हर्षभावोऽपि न कृतः, न कारितः, कुर्वन्तमपि नानुमोदितः; अथवा संसारे सुखानुप्रेक्षा, रत्नत्रयलब्धानां धर्म- परायणानां जनानां प्रति हर्षभावः न कृतः, न कारितः, कुर्वन्तमपि न समनुमन्यितः, तेषां सर्वदोषाणां निन्दामि गर्हामि परित्यागं करोमि । संवेगगुणस्य विरोधि- सर्वदोषाणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

प्रतिक्रमामि भंते ! तृतीयेऽनुकम्पागुणे “तृषितं बुभुक्षितंवादुःखितं दृष्ट्वा यः दुःखितमनः कृपया प्रतिपद्यते, तस्येषानुकम्पा भवति” - इति वचनात् यन्मया दुःखित-जीवानां संसार-सागर-निमग्नानां प्रति कारुण्यभावनापूर्वमनुकम्पा नैव कृता, न कारिता कुर्वन्तमपि न समनुमोदिता, तेषां सर्वदोषान् निन्दामि, गर्हामि, परित्यागं, करोमि । अनुकम्पा-गुण-विरोधि-सर्वदोषाणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

प्रतिक्रमामि भंते ! चतुर्थे आस्तिक्यगुणे "यः जिनेन्द्रे, तत्प्रज्ञप्त- तत्त्वज्ञाने, जिनशास्त्रेषु जिनधर्माचरणे चानन्यभावेन श्रद्धानं भवति, तत्खलु आस्तिक्यं नाम। तथा यन्मया वीतरागे जिनेन्द्रे, तत्प्रज्ञप्त-तत्त्वज्ञाने, जिनेन्द्र- वचनरूपेषु जिनशास्त्रेषु तथा च जिनधर्माचरणे रतानां यतीनां गृहस्थानाञ्च विषये “इदं सत्यमिदं हितकरञ्चेति” - इति न मन्यन्ते, नैव मन्यायन्ते, मन्यमानानामपि न समनुमोदन्ति । अथवा एतान् प्रेक्ष्यापि उपेक्षाभावं कृतं, कारितं, कुर्वन्तमपि समनुमोदितं, तेषां सर्वदोषान् निंदामि गर्हामि परित्यागं करोमि । आस्तिक्यगुणविरोधि-सर्वदोषाणां दुष्कृतं मिथ्या करोमि । अविरत-श्रावकाणामष्टमूलगुण-सम्बन्धि-दोषाणां प्रतिक्रमणम्

इच्छामि भंते ! अविरत-श्रावकाणामष्टमूलगुणेषु सन्ति पञ्चोदुम्बर- फलानामभुञ्जनं तथा च मधु-मांस-मद्यानां सेवनस्य परित्याग इति। कोऽपि अविरत-श्रावकः अपि एतेषां भुञ्जनं सेवनं च स्वप्नेऽपि न करोति, अन्यथा तस्य जिनधर्मेऽवस्थित्यपि न सम्भाविता। एतेषां मूलगुणानामाराधना साधनञ्च सम्यग्दृष्टि-जीवः सदा करोति । तथैव जिनधर्मानुरागीजनाः अपि एतेषामनुकरणं कुर्वन्ति, कारयन्ति, कुर्वन्तमपि अनुमोदन्ति। एतेषां मूलगुणानामाराधनायां ये दोषाः मया अज्ञानेन प्रमादेन वा कृताः कारापिताः कुर्वन्तः अपि अनुमोदिताः, तेषां मनसा वाचा कायेन च निंदामि, गर्हामि, परित्यागं च करोमि । क्रमशः एतेषां दोषाणां प्रतिक्रमणं करोमि ।

इच्छामि भंते ! पञ्चोदुम्बर-फलानां त्यागस्य प्रतिक्रमणं करोमि । एतेषु वटफलं, पिप्लफलमुम्बरफलं, न्यग्रोधफलं, पिम्परीफलं च त्रसजीवानां योनिरूपतः हिंसारूपाणि । एतेषां भुञ्जनं सेवनं वा अज्ञायमानेन प्रमादेन गृद्धतणेन वा स्वयं कृतमन्यैः कारितं, कुर्वन्तस्य वा समनुमन्नितमिति तेषां मनसा वाचा कायेन च निंदामि, गर्हामि, परित्यागं च करोमि । पञ्चोदुम्बर-फलानां परित्यागे संभावितानां सर्वदोषानां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

इच्छामि भंते ! त्रिविध-मकार-परित्यागे मधु-मांस-मद्यानां परित्यागः प्ररूपितोऽविरत-श्रावकाणां कृते जिनशासने। तेषु मधु तावत् मधुमक्षिकाणां मांसेन रक्तेन वमनेन च भवति, तस्मात् मधुसेवनं प्रत्यक्षं हिंसाभूतमिति । तथैव मांसमपि त्रसजीवानां देह-मांसेन भवति, तस्मात् आदि-मध्यावसाने च हिंसामयं हि मांससेवनम्। तथा च मद्यमपि बहुविध-पापजनकं, मद्योत्पादने गलित-द्रव्येषु प्रत्यक्ष-त्रसजीवा उत्पद्यन्ते, अतः हिंसापापं मद्यसेवने भवति हि; एवमेव मद्यपायिजनः आत्मस्वरूपं विस्मृत्य अनर्थमेव करोति । तस्मात् हिंसातः कुसील-पर्यन्ताः सर्वाणि पापानि मद्यसेवने सम्भवन्ति । प्रतिक्रमामि भंते ! मया यत् त्रिविध-मकाराणां मधु-मांस-मद्यानामज्ञानेन प्रमादेन वा गृद्धत्वेन वा सेवनं कृतं वा कारितं वा कुर्वन्तं वा समनुमन्नितं, तस्य मनसा वाचा कायेन च निंदामि, गर्हामि, परित्यागं च करोमि । त्रिविध-मकाराणां मधु-मांस-मद्यानां परित्यागे संभावितानां सर्वदोषानां दुष्कृतं मिथ्या करोमि ।

एवमेवात्र द्वाविंशतीनामभक्ष्यपदार्थानां (ओलादीनां) तथा च

पञ्चविधाभक्ष्यप्रकारानां (त्रसघातं, बहुघातं, नशाकारकमनुपसेव्यमनिष्टञ्चेति) अपि सेवनं कोऽपि सम्यग्दृष्टिः अविरत-श्रावकश्चापि न हि करोति, न कारयति, कुर्वन्तमपि न समनुमन्यते। एतेषामभावे जैनत्वमपि न संभवति । एते सर्वे हिंसादि-पापमयाः लोकनिंद्याश्च भवन्ति । अतएव एतेषां सर्वेषां मनसा वाचा कायेन च निंदामि, गर्हामि, परित्यागं च करोमि ।

  • अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2447.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है