प्रतिक्रमण-सूत्र | Pratikraman-Sutra

प्रतिक्रमण-सूत्र

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

अविरत-सावक-पडिक्कमण-सुत्तं

अविरत-श्रावक
प्रतिक्रमण-सूत्र
(प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजी भाषा-निबद्ध)

लेखक एवं अनुवादक :
प्रो. सुदीप कुमार जैन
वरिष्ठतम प्रोफेसर, प्राकृतभाषा विभाग
श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय
नई दिल्ली - 110016

प्रकाशक :
महावीर परमार्थ फाउण्डेशन
नई दिल्ली-110074

इस कृति के विषय में…

दिखावा-रहित ‘शिष्टाचार’ और दागा-रहित ‘सदाचार’ की समवेत-शिक्षा एवं अचूक-प्रभाववाली प्रक्रिया का नाम ‘प्रतिक्रमण’ है।

नैतिकता एवं धार्मिक-सदाचरण की यदि हमें कहीं बिना किसी औपचारिकत्ता के स्वेच्छिक-प्रस्तुति देखनी है, जो दूसरों को प्रभावित करने के लिये न होकर सचमुच अपने को सुधारने के लिये पूरी-निष्ठा एवं ईमानदारी से प्रतिफलित होती है, तो वह ‘प्रतिक्रमण’ ही है।

मनो-मालिन्य को मिटाने, पारस्परिक-सौहार्द को बढ़ाने के साथ-साथ जो व्यक्ति को उसकी अपनी दृष्टि से प्रतिष्ठित बनाती है, वह अनूठी-विधि ‘प्रतिक्रमण’ है।

संयोगवश यह अतुलनीय-प्रक्रिया आज तक धर्मक्षेत्र में अतिविशिष्ट (मुनिराजों) एवं विशिष्ट (देशव्रती-श्रावकों) पदों के धारकों तक ही सीमित थी, क्योंकि अन्य सामान्यजनों के लिये इसका पाठ्यक्रम ही नहीं बना था, तो वे इसे सीखने और अपनाते कैसे?

इसी चिर-अभाव की पूर्ति-हेतु की गयी सरल-सुगम एवं सर्वांगोपयोगी-कृति का नाम है ‘अविरत-श्रावक प्रतिक्रमण-सूत्र’, जो वास्तव में रटने की नहीं, बल्कि जीवन का अंग बनाने के लिये शब्दांकित हुई रचना है।

इस ग्रन्थ के अतिविशिष्ट एवं विशिष्ट-वर्गों के भाषिक-स्वरूप ‘प्राकृतभाषा’ में ही मूलतः इस सामान्यजन के लिये लिखे गये इस संस्करण को निबद्ध किया है, तथा विविध-भाषाभाषीयों को सुविधा के लिये इसके संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजी भाषाओं में मूलानुगामी-अनुवाद दिये गये हैं।

अविरत-श्रावक

प्रतिक्रमण-सूत्र
(प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजीभाषा-निबद्ध)

लेखक एवं अनुवादक :
प्रो. सुदीप कुमार जैन
वरिष्ठतम प्रोफेसर, प्राकृतभाषा विभाग
श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय
(केन्द्रीय विश्वविद्यालय)
नई दिल्ली - 110016

प्रकाशक :
महावीर परमार्थ फाउण्डेशन (पंजीकृत)
नई दिल्ली 110074

महावीर परमार्थ फाउंडेशन, नई दिल्ली का चतुर्थ-प्रकाशन

अविरत-श्रावक प्रतिक्रमण-सूत्र

(प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजी-भाषाओं में)
लेखक व अनुवादक : प्रो. सुदीप कुमार जैन
ISBN No. : 978-81-938483-3-3
प्रकाशक : महावीर परमार्थ फाउंडेशन (रजि.), नई दिल्ली
© : लेखक प्रो. सुदीप कुमार जैन के पास सर्वाधिकार सुरक्षित
प्राप्ति-स्थान : प्रो. सुदीप कुमार जैन
बी-32, छतरपुर एक्सटेंशन, नंदा हॉस्पीटल के पीछे,
नई दिल्ली-110074, मो- 8750332266
मुद्रक : एस.पी. प्रिंटर्स, (www.esspeeprinters.com)
लागत मूल्य : 80/-
प्रथम-संस्करण : 2000 प्रतियाँ (2020 ई.)

Avirat-Shravak

PRATIKRAMAN-SUTRA

(As per jain philosophical methods, Pratikraman Sutra is a process
of self-discipline by observing and correcting our own potential
faults/ mistakes in our lives and seek resolution daily.)
Author & Translator : Prof. Sudeep Kumar Jain
Publisher : Mahaveer Parmarth Foundation,
New Delhi-110074
© : All Rights Reserved with Author
Prof. Sudeep Kumar Jain, Delhi
ISBN No. : 978-81-938483-3-3
Size : Demy Size, 112 Pages
Printer : Ess Pee Printers, (www.esspeeprinters.com)
Price : 80/-
First Edition : 2000 Copies, at 2020 A. D.

विषय-सूची

  1. प्रकाशकीय ४
  2. सम्पादकीय ५
  3. अपनी बात ६
  4. प्रस्तावना ७
  5. प्ररोचना २५
  6. समर्पण २६
  7. प्राकृत-प्रतिक्रमण-सूत्र 1
  8. संस्कृत-प्रतिक्रमण-सूत्र 13
  9. हिन्दी-प्रतिक्रमण-सूत्र 25
  10. गुजराती-प्रतिक्रमण-सूत्र 39
  11. अंग्रेजी-प्रतिक्रमण-सूत्र 53
  12. परिशिष्ट-1 67-71
    पीलिका
    चउब्बीस-तित्थयर-थुदि
    पंच-महागुरु-भत्ती
    सिद्ध-भत्ती
  13. परिशिष्ट-2 72-74
    अविरत-श्रावक-प्रतिक्रमण-संबंधी पारिभाषिक-पदों का
    परिचय

प्रकाशकीय

भगवान् श्री महावीर स्वामी के प्रधान-शिष्य इन्द्रभूति गौतम स्वामी ने जब
प्रतिक्रमण-सूत्र की रचना की थी, तबसे आज तक उसमें मात्र दो वर्ग के धर्मावलंबियों
के लिये ही प्रतिक्रमण के पाठ थे, मुनिराजों के लिये ‘यति-प्रतिक्रमण’ एवं देशविरति-
श्रावकों के लिये ‘श्रावक-प्रतिक्रमण’। अविरति-श्रावकों के लिये कोई प्रतिक्रमण आज
तक नहीं बना था। इस बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति इस संस्करण के द्वारा होने जा
रही है, यह अपार-हर्ष का विषय है।

समाज के सुप्रतिष्ठित-विद्वान् प्रो. सुदीप कुमार जैन जी ने बड़ी-निष्ठा के
साथ इसका मूलपाठ प्राकृत भाषा में जिनागम की मर्यादा के अनुरूप लिखा है,
जिसमें गौतम-स्वामी ने आज से 2550 वर्षों से अधिक समय पहले प्रतिक्रमण के पाठ
लिखे थे। और उस पाठ का प्रामाणिक संस्कृत, हिन्दी-भाषाओं में रूपांतरण उन्होंने
स्वयं करके दिया है तथा गुजराती एवं अंग्रेजी के अनुवाद को उन्होंने इन भाषाओं के
विद्वानों से परामर्श करके बनवाया है। इसप्रकार यह संस्करण पाँच-भाषाओं में एकसाथ
प्रकाशित होने जा रहा है-इसका हमें गर्व है।

इसके लेखन आदि कार्यों के लिये कई धर्मानुरागी महानुभावों (विशेषतः श्री
आनंद जैन, दुबई, श्री भंडारी परिवार, बेंगलुरु, श्री कमल बोहरा, कोटा, श्रीमती मधु
जैन, दिल्ली एवं डॉ. अरविंद जैन, करहल, श्री मुकेश जैन सर्राफ, सहारनपुर आदि) ने
बारम्बार डॉ. सुदीप जी से अनुरोध करके उनसे यह अत्यन्त लोकोपयोगी-कृति लिखने
का अनुरोध कर रहे थे। उन्होंने अतीव-श्रम एवं निष्ठा के साथ यह कार्य सम्पन्न किया
है।

एस. पी. प्रिंटर्स के श्री अक्षय जैन ने कम समय में बहुत समर्पण के साथ इसका
स्तरीय-मुद्रणकार्य किया है। धर्मानुरागी श्री अमित जैन DIDC कूरियर्स ने इस कृति
को धर्मानुरागियों एवं विभिन्न-स्थानों तक पहुँचाने का दायित्व सहर्ष स्वीकार्य किया
है, तदर्थ हम उनके कृतज्ञ हैं। इसकी ‘प्ररोचना’ लिखने के लिए मैं वयोवृद्ध-विद्वान्
पं. शांतिलाल जैन, महीदपुर (म.प्र.) का भी हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। सभी
प्रेरक एवं सहयोगी-जनों के आभार-पूर्वक मैं प्रो. सुदीप कुमार जैन के प्रति इस कृति के
निर्माण के लिये कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।

- अजित प्रसाद जैन, अध्यक्ष
महावीर परमार्थ फाउंडेशन

सम्पादकीय

यद्यपि यह अविरति-श्रावक-प्रतिक्रमण-पाठ मूलतः प्राकृतभाषा में मैंने ही लिखा है, किन्तु इसमें अपनी मर्जी या पूर्वाग्रहों को तनिक भी नहीं जोड़ा है। अविरत-श्रावकों एवं सम्यग्दृष्टियों के जीवन में जैसी सहज-धर्माराधना होती है और उसमें जो दोष संभावित होते हैं, उनका जिनागम के आधार पर ही प्राचीन-दिगम्बर-जैन-आगमों की भाषा में शालीनतापूर्वक लिपिबद्धीकरण किया गया है। और फिर इसका संस्कृत-रूपान्तरण, एवं सरल-हिन्दी-अनुवाद भी मैंने सावधानीपूर्वक किया है। अंग्रेजी एवं गुजराती-भाषाओं के अनुवादों में मैंने इनके विशेषज्ञों की सहायता भी ली है।
इनके संयोजन एवं सम्पादन के कार्य में कुछ विसंगतियाँ आयीं, जिन्हें सावधानीपूर्वक दूर करते हुये इन पाठों को वर्गीकृत एवं व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
अत्यन्त अल्प-समयावधि (लगभग मात्र 15 दिनों) में इनका लेखन, टंकण, सम्पादन एवं परिशोधन करना अत्यन्त श्रमसाध्य तो था ही, भाषा और विषय की दृष्टि से कोई त्रुटि जानने-अनजाने में नहीं रह जाये–इसकी विशेष-सावधानी रखनी पड़ी।
इसका यह लघु-संस्करण दशरक्षण-पर्व के अन्त में विश्वभर के जिनधर्मानु-यायियों के द्वारा किये जाने वाले ‘सांवत्सरिक प्रतिक्रमण-कर्म’ के निमित्त किया गया है, इसलिये इसमें विषय-परिचयात्मक प्रस्तावना अत्यन्त-संक्षिप्त रखी गयी है, ताकि पुस्तक का कलेवर अधिक नहीं बढ़े। किन्तु इसका एक वृहत्-संस्करण शीघ्र ही तैयार करूँगा, जिसमें प्रतिक्रमण के स्वरूप एवं सार्थकता के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुये इसके समस्त-प्राकृतों के प्रामाणिक-मूलपाठों एवं उनके सटीक-हिन्दी-अनुवादों के साथ-साथ विशिष्ट-पारिभाषिक-पदों का परिचय भी यथाशक्ति दिया जायेगा। वह संस्करण लगभग 500 पृष्ठों का होगा।
विषय, समयसीमा एवं उपयोगिता की दृष्टि से यह संस्करण प्रयोजन-परक बनाया गया है, ताकि पुस्तक भारी न हो तथा उपयोग में सुविधाजनक बनी रहे।
इसके संकलन व संशोधन के कार्य में मेरी सहधर्मिणी डॉ. रंजना जैन ने पर्याप्त-सम्पूर्ण-सहयोग किया है। तदर्थ उन्हें धन्यवाद देता हूँ।

सुदीप कुमार जैन

अपनी बात

मैं लगभग 17 वर्ष पूर्व जब कैलिफोर्निया दशरक्षण-पर्व के निमित्त गया, तब वहाँ अंतिम-दिन सामूहिक-प्रतिक्रमण का आयोजन देखा। लगभग सम्पूर्ण-समाजों ने तीन घंटों तक निरन्तर इस विषय पर व्याख्यान सुने एवं यथाशक्ति इसकी विधि की। उस प्रसंग में मैंने पहली बार समाज-जनों को सामूहिकरूप से प्रतिक्रमण करते देखा। यद्यपि उसका पाठ न तो परिशुद्ध था और न ही बहुत-उपयोगी, क्योंकि उसमें पिछले विभिन्न संभावित-भवों/जन्मों में हुये पापकार्यों की क्षमापना की जा रही थी। तब मैंने आश्चर्य व्यक्त किया कि “जो भूलें अभी आप करते हैं, उनका प्रतिक्रमण आप क्यों नहीं करते हैं। वह रचना आपके मन एवं जीवन में अपील करेगा और आप सब इसके निमित्त अपने में कुछ रचनात्मक-सुधार कर सकेंगे।” तब उन लोगों ने मुझसे अविरत-श्रावकों के लिये प्रतिक्रमण का पाठ बनाने का अनुरोध किया था, पर बात आयी-गयी हो गयी थी।
उसके बाद मैंने विदेश-प्रवास लगभग बंद कर दिये। दो वर्षपूर्व मैं दुबई के ‘अरिहंत मित्र मंडल’ के निमंत्रण पर वहाँ दशरक्षण-पर्व के निमित्त गया। वहाँ भी अंतिम-दिन प्रतिक्रमण का आयोजन वे सब करते थे। मैंने अपने व्याख्यान-क्रम में ‘प्रतिक्रमण’ पर भी तीन व्याख्यान दिये थे और इसका बहुआयामी-विवेचन किया था। तभी वहाँ की समाज ने मुझसे अनुरोध किया कि “मैं उन्हें प्रतिक्रमण कराऊँ।” तब मैंने वहाँ कुछ हिंदी में लिखकर उन्हें प्रतिक्रमण कराया, तो वे लोग प्रभावित हुये और मुझसे कहा कि “आप इसका प्रामाणिक पाठ बनाकर दीजिये!” मैंने उन्हें वचन तो दिया था, परन्तु भारत लौटकर अपने कार्य में व्यस्त हो गया था। अब कुछ लोगों ने मुझे स्मरण दिलाया कि यह काम मैं इस दशरक्षण-पर्व के पहले कर दूँ। तो मुझे लगा कि यदि अभी तत्काल नहीं किया, तो यह फिर अगले दशरक्षण-पर्व के लिये टल जायेगा। अतः मैंने दृढ़-संकल्पित होकर यह कार्य सम्पन्न किया है। इस कार्य के करने में ‘गुजराती-अनुवाद’ के टंकण-कार्य में रूपलबेन, दुबई का सहयोग रहा। एवं ‘अंग्रेजी-अनुवाद’ के कार्य में भाई अमित जैन (एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, नॉर्दर्न रेलवे, नई दिल्ली) उल्लेखनीय-सहयोग मिला है। एवं इसके पुनरीक्षण-कार्य में डॉ. अभिषेक तिवारी जी (श्रीलाल बहादुर शास्त्री-राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) का एवं संस्कृत-पाठ के पुनरीक्षण-कार्य में डॉ. सुमन कुमार झा (श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) का आत्मीय-सहयोग मुझे मिला है। उनका मैं कृतज्ञ हूँ।

सुदीप कुमार जैन

प्रस्तावना

मनुष्य की सामाजिकता का सबसे बड़ा-आधार है कि वह स्वयं अच्छे आचार-विचार रखे और दूसरों के साथ भी परस्पर हितकारी-व्यवहार करे। अन्यथा छली-प्रपंचियों एवं क्रोध-लोभ-पूर्ण अनैतिक-आचरण करनेवालों से तो शिष्ट-व्यक्ति संबंध ही नहीं रखना चाहता है। मनुष्य की सद्-विचार, सदाचार एवं सद्-व्यवहार की आदर्श-परिणति में सबसे बड़ी-बाधा उसकी वैचारिक एवं चारित्रिक-कमजोरियाँ ही हैं। इन कमजोरियों से वह बचना तो चाहता है, किन्तु इसके लिये कोई आदर्श व्यावहारिक-पद्धति लोकजीवन में सुलभ नहीं है। इसलिये वह चाहकर भी अपने जीवन को आदर्श नहीं बना पाता है।
मनुष्य के जीवन को आदर्श बनाने की मनोवैज्ञानिक-प्रक्रिया ‘प्रतिक्रमण’ है, जैसे जिनदर्शन में वर्तमान-परिस्थितियों में अनिवार्य-जीवनशैली बताया गया है।

‘प्रतिक्रमण’ का अर्थ

प्रतिक्रमण का परिचय जिनवाणी में कृत-दोषों की परिष्कार की स्वाधीन-विधि के रूप में मिलता है। अपने स्वरूप एवं भूमिका की मर्यादा से यदि उपयोग या चर्या कहीं भटक जाये, मर्यादा-विहीन हो जाये; तो उसे पुनः लौटाकर मर्यादित करने की प्रक्रिया का ही नाम ‘प्रतिक्रमण’ है।

यह अद्भुत-वैज्ञानिकी-प्रक्रिया है एवं श्रावक से लेकर साधु तक – सभी को अपनी-अपनी भूमिकानुसार अनिवार्य-कर्तव्य है। ज्ञान और चर्या – दोनों को अद्यतन एवं सामंजस्यपूर्ण बनाकर जीवनशैली को निर्दोष बनाये रखने की यह अद्भुत की विधि है। एक ओर जहाँ यह शिष्टाचार का पुनीत-पाठ है, तो दूसरी ओर आत्मबल को निरंतर जागरूक रखने की अप्रतिम-कला है। वर्तमान युग के लिये ऐसी नितान्त-अपरिहार्य-प्रक्रिया और कहीं दूसरी नहीं मिलती है।

‘प्रतिक्रमण’ की पृष्ठभूमि

वर्तमान अवसर्पिणी-काल में इसका शुभारम्भ प्रथम-तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रधान-गणधर वृषभसेन ने किया था। इसका कारण था कि उस समय लोग सरल-प्रकृति के तो थे, छल-छिद्र नहीं करते थे; किन्तु वे धर्म व इसकी मर्यादाओं से भी

अनभिज्ञ थे। इसीलिए उन्हें ‘वक्र-जड़’ कहा गया। अज्ञान के कारण उनसे धर्मविधि में गलतियाँ होतीं स्वाभाविक थीं, अतः वे अपनी गलतियों को पहिचान भी न सकें और स्वयं ही उसका सुधार भी कर सकें-इस दृष्टि से उन्हें प्रतिक्रमण का अनिवार्य-विधान किया गया था।

बाद में धर्मचर्या करते करते वे लोग धर्मविधि को अच्छी तरह से जान गये, तो उन्हें प्रतिक्रमण की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी और मात्र गलती होने पर ही प्रतिक्रमण करने का निर्देश किया गया। दूसरे तीर्थंकर-अजितनाथ जी से लेकर तेईसवें तीर्थंकर-पार्श्वनाथ जी तक कुल बाईस-तीर्थंकरों के काल में प्रतिक्रमण के विषय में यही नीति रही।

किन्तु चौबीसवें-तीर्थंकर महावीर स्वामी का काल आते-आते शिष्यों की प्रकृति धर्मविधि के प्रति उदासीनतापूर्ण होने से अज्ञानता की भी हो गयी थी, और वे जितनी जो धर्मविधि करते भी थे, उसमें बाहरी दिखावा बढ़ गया था व अंतरंग-विशुद्धि घटती जा रही थी। इसीलिये इन लोगों को ‘वक्र-जड़’ (कुटिल भी + अज्ञानी भी) की संज्ञा मिली। इस स्थिति को देखते हुये महावीर स्वामी के प्रधान गणधर इन्द्रभूति गौतम ने महावीर स्वामी की शिष्य-परम्परा के समस्त श्रमणों व श्रावकों को प्रतिक्रमण की विधि अनिवार्य कर दी गयी।

जिन्नामय में ‘प्रतिक्रमण’ का स्वरूप एवं महत्त्व

प्रतिक्रमण जैसी स्वाधीन एवं सटीक, नियमित व नैमित्तिक आत्मशोधन की व्यापक-विधि मात्र जैनदर्शन में ही देखने को मिलती है। यह जहाँ आत्मिक-शुद्धि की विधि है, वहीं लौकिक-दृष्टि से भी यह शिष्टजनों की दृष्टि से आदर्श-आचारसंहिता के रूप में अनुकरणीय है।

शिष्टाचार का पहला-पाठ:-

प्रतिक्रमण का मूलमंत्र है कि अपनी गलती को पहिचानो व उसे तुरंत स्वीकार करो और प्रतिक्रमण की विधि से तुरन्त ही उसका परिष्कार कर लो। इसकी सबसे बड़ी-विशेषता यद्यपि आत्मिक-शुद्धि में है, तथापि यह एकमात्र धर्मविधि है, जो लोक में शिष्टजनों के लिये अनुकरणीय-आदर्श बनकर लौकिक-प्रतिष्ठा एवं सामाजिक-सम्मान का कारक भी सिद्ध होता है। क्योंकि लोक में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिससे कभी कोई भी गलती नहीं हुई हो; परन्तु यह भी सत्य है कि समाज में शिष्ट और

सभ्य उसे ही माना जाता है जो कि अपनी गलती को तुरंत पहिचानकर न केवल उसे स्वीकार करता है, बल्कि उसे सुधारने एवं भविष्य में पुनः नहीं करने की ईमानदार-प्रक्रिया भी करता है।

लोकजीवन में ‘प्रतिक्रमण’ की व्यावहारिकता एवं वैज्ञानिकता

लौकिक-दृष्टि से शिष्टसमाज में जहाँ लोग गलतियों को स्वीकार करना, उन पर खेद व्यक्त करना तक तो शिष्टाचार का नाते कर लेते हैं; परन्तु आध्यात्मिक तौर पर उन गलतियों के पुनः न हो सकने एवं हो चुकी भूलों को मिटाने को कोई वैज्ञानिक-विधि लोक के पास नहीं है, सिवाय ‘सॉरी’ बोलने के। उनके अनुसार ‘सॉरी’ नहीं बोले, तो समाज में अशिष्ट माने जाते हैं। इसीप्रकार धार्मिक-क्षेत्र में जो ‘प्रतिक्रमण’ नहीं करे, तो वह धर्म में अशिष्ट-व्यक्ति माना जाता है।

यहाँ यह स्वाभाविक-प्रश्न है कि तो धर्म की दृष्टि से हमें प्रतिक्रमण कब-कब करना चाहिये?-
इसका उत्तर इसप्रकार है-

  1. जब गलती हो, तभी करना चाहिये।
  2. जब हम अपनी गलती को गलती के रूप में पहिचानकर उस गलती की समीक्षा कर सकें, तब प्रतिक्रमण कर लेना चाहिये। और
  3. जिनवाणी के ग्रन्थों में आचार्यों ने जो निर्देश दिये हैं, उन शास्त्रोक्त-निर्देशों के अनुसार निर्धारित-समय पर करना चाहिये।

‘प्रतिक्रमण’ के योग्य गलतियाँ:-

जीवन में गलतियाँ कईतरह की होती हैं, कोई सामान्य भूल-चूक के रूप में होती हैं, तो कुछ गम्भीर-अपराध के रूप में। इन्हें हम निम्नलिखित तीन-वर्गों में रख सकते हैं-

  1. जानबूझकर की गयी गलती/अपराध?
  2. अनाचार?
  3. अतिचार?

तो सांकृतिकरूप में यहाँ यही कह सकते हैं कि प्रतिक्रमण मात्र अतिचाररूप हल्के दोषों/भूलों/गलतियों का ही होता है।

प्रतिक्रमण की प्रक्रिया से समाहित-कार्य-

  1. दोषों की पहिचान- इसके अन्तर्गत जो शास्त्रों के अनुसार गलतियों की पहिचान समझते हैं, वे स्वयं पहिचानें, और जो स्वयं इतनी व्यापक-जानकारी नहीं रखते हैं, वे प्रतिक्रमण के पाठों से/जिनवाणी से उन दोषों को अपनी गलती के रूप में पहिचानते हैं।
  2. दोषों को आलोचना- हम ईमानदारी से उन दोषों को अपनी गलतियों के रूप में स्वीकार करते हुये उनको नहीं छिपाने को योग्य अपराध स्वीकारते हैं, उसे ही हम सरल-शब्दों में ‘आलोचना’ कह सकते हैं।
  3. पुनः न करने का संकल्प- अपनी भूल की गलती के रूप में स्वीकार करने व अपना अपराध मानने से बात पूरी नहीं हो जाती है, बल्कि पुनः जीवन में नहीं करने का संकल्प आपके परिणामों की पवित्रता को प्रमाणित करता है।
  4. भक्ति-विशेष- जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति-विशेष से अपनी भूल को पहिचानकर उसे सुधारने की प्रक्रिया को समझते हैं, तो उसके हृदय में उस सद्बुद्ध-प्रदाता के लिये अगाध-बहुमान का भाव स्वाभाविकरूप से जगता है और वह निश्छलता से उसकी सविनय-अभिव्यक्ति करता है। इसी का रूप ‘भक्तियों का पाठ’ होता है।
  5. समताभाव या सामायिक- अपनी गलती पहिचानने पर जो अपराधबोध से ग्रस्त होकर उस व्यक्ति को व्यग्रता हुई थी, उस अपराध का निवारण करने की प्रक्रिया एवं भक्ति करने के बाद स्वाभाविकरूप से उसकी व्यग्रता शांत होती ही है, और वह निर्भार होकर समताभाव में अपने को पाता है, यही वास्तव में ‘सामायिक’ है।
  6. कायोत्सर्ग- जब अपराधबोध दूर होकर व्यक्ति स्वस्थ होकर साम्यभाव का अनुभव करता है, तो वह अपनी निरपराधी-वृत्ति की ऊर्जा को बढ़ाने के लिये कायोत्सर्ग की अत्यन्त आध्यात्मिक प्रक्रिया करता है, जैसे कि कोई व्यक्ति बीमारी दूर करने के बाद निश्चिंत होकर अपनी रोग-प्रतिरोधक-क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ाने के लिये प्राणायाम आदि की प्रक्रियायें करता है। यह कायोत्सर्ग भी आध्यात्मिक रूप से पाप-प्रतिरोधक-क्षमता यान आत्मबल बढ़ाने की ही विशिष्ट-प्रक्रिया है। और यह प्रतिक्रमण की अन्तिम एवं अनिवार्य-विधि है। इसके बिना प्रतिक्रमण की पूर्णता नहीं मानी जाती है।

यह तो इसके इतिवृत्त की बात हुई। अब इसके उद्देश्य, स्वरूप व भेद-प्रभेदों के विषय में संक्षिप्त-विवेचन प्रस्तुत कर रहा हूँ।

प्रतिक्रमण के उद्देश्य:-

  1. कृत-दोषों का परिहार,
  2. अकृत-दोषों का परिज्ञान,
  3. आत्मबल की वृद्धि,
  4. शिष्टाचार का पालन,
  5. परिणाम-विशुद्धि

‘प्रतिक्रमण’ का अर्थ :-

  1. ‘प्रति’ = की ओर /विपरीत-दिशा में
  2. ‘क्रम’ पादविक्षेपे धातु से गमनात्मक या कदम-बढ़ाना अर्थ में ‘क्रमण’ शब्द है, जिसका सामान्य-अर्थ है ‘चलना या आगे बढ़ना’।
  3. इसे प्रतिदिन पढ़ना अनिवार्य किया था, ताकि अकृत-दोषों का परिज्ञान रहे, ताकि वे दोष चर्या में न हों।
  4. किन्तु आज ‘पढ़ने’ का नाम ‘प्रतिक्रमण’ माना जाने लगा है।
  5. पर वस्तुतः ‘बढ़ने’ का नाम ‘प्रतिक्रमण’ था।
  6. बुराई/दोषों से पीछे हटकर पुनः अच्छाई की ओर बढ़ने का नाम ‘प्रतिक्रमण’ है।
  7. संकल्पपूर्वक बुराई को पहचानकर अलग करने का नाम प्रतिक्रमण है।
  8. आज जो पढ़ा जाता है, उसमें भी न तो अर्थ पर ध्यान दिया जाता है, न ही औचित्य पर।

प्रतिक्रमण के स्वरूप में पहली-खूबी है सभ्यता या शिष्टाचार की। यदि व्यक्ति अपनी गलती को गलती के रूप में पहचानता तक नहीं है, उसे उसका अहसास तक नहीं है; तब तो स्थिति बेहद-शोचनीय है। वह क्या प्रतिक्रमण करेगा? सभ्य या शिष्ट-व्यक्ति की पहली-पहचान है कि यदि उससे कोई गलती होती है, तो उसे तुरंत उसका ‘गलती’ के रूप में अहसास होता है; और वह उसे तत्काल, बिना किसी विलंब के या बिना किसी प्रतिष्ठा-प्रश्न (प्रेस्टेज-इश्यू) के उसे न केवल स्वीकार करता है; बल्कि उसका तुरंत परिष्कार भी करता है। यही विशेषता प्रतिक्रमण को महान-विधि बनाती है।
प्रतिक्रमण की दूसरी-विशेषता है कि हम सूक्ष्म से सूक्ष्म-गलतियों को पहचान

सके, व उनको सुधारने की दृढ़-संकल्पशक्ति हमारे पास हो। यह बात धर्मज्ञान व विधि के प्रति व्यक्ति की निरंतर-सजगता के साथ साथ हम बिना किसी बहाने के (कि जैसे श्रावक वैसे साधु, या पंचकाल है, या संस्थान-संहनन से हीन है - इत्यादि) के तत्काल सुधारने को तैयार हो-इस बात की अनिवार्यता बताती है।

तीसरी-बात

है कि दोषों की इतनी क्षीणता, कि अपने संकल्पमात्र से वे विनष्ट हो सकें। आत्मबल प्रबल हो, और दोष कमजोर हों; तभी यह संभव है। यदि दोष प्रबल हों, और ऊपर से आत्मबल भी क्षीण हो; तो प्रतिक्रमण की सार्थकता ही नहीं हो सकेगी। क्योंकि तब मात्र किसी तरह पढ़ना तो हो जायेगा; परंतु प्रतिक्रमण नहीं हो पायेगा।

प्रतिक्रमण बुराई से अच्छाई की ओर बढ़ने का नाम है, पढ़ने की औपचारिकता का नाम ‘प्रतिक्रमण’ है। परन्तु आज की स्थितियों को देखते हुये तो मैं इसे पढ़ने को भी किसी सीमा तक सार्थक मानने को तैयार हूँ। क्योंकि यदि लोग पढ़ेंगे, तो गलतियों से परिचित तो रहेंगे; उन्हें पता तो रहेगा कि क्या गलत है? आज श्रावकों में से तो प्रतिक्रमण ‘पढ़ने’ के रूप में भी लुप्तप्रायः है। दिगंबरों ने तो पढ़ने की औपचारिकता का भी मज़ाक बना-बनाकर समाज में इसके पढ़ने तक की परम्परा नष्ट कर दी है, जो बेहद-घातक भी है और महावीर स्वामी के शासन की मर्यादा का उल्लंघन भी है। क्योंकि स्वयं गौतम गणधर ने इसे सभी शिष्यों को अनिवार्य बनाया था।

और कुछ प्रतिशत श्वेतांबर-भाईयों ने किसी तरह इसके पढ़ने की औपचारिकता चालू भी रक्खी है, तो उसमें विवेक को पूरीतरह तिलांजलि दी गयी है। मैं प्रत्यक्ष-साक्षी हूँ इस प्रसंग का, जिसमें वे पढ़ रहे थे कि “झाबी के भव में मैंने ऐसे दोष किये हों, ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’; तेली के भव में ऐसे दोष किये हों, ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’”। मुझे समझ नहीं आया यह क्या है? अरे! वर्तमान-चर्या के संभावित-दोषों का नाम तक नहीं ले रहे और न ही उनका ‘मिच्छामि’ करने का संकल्प कर रहे हैं?

दिगम्बर-जैन-मुनिराजों में किसी सीमा तक इसका पाठ करने की परिपाटी बची हुई है। यह शुभ-संकेत है। परंतु वे प्राकृतभाषा में इसका पाठ तो किसी तरह पढ़ लेते हैं, लेकिन इस भाषा के ज्ञान के बिना वे उस पाठ का अर्थ तक नहीं समझ पाते हैं। और जब अर्थ ही नहीं समझ पायेंगे, तब प्रतिक्रमण किसका करेंगे? यह मेरी समझ से बाहर है।
प्रतिक्रमण का पाठ तो इसलिये बनाया गया था, कि इसे पढ़कर हमें अपनी चर्या की गलतियों का ज्ञान हो जाये, और हम संकल्पपूर्वक उनका परिष्कार कर सकें।

किसी अध्यात्मवेत्ता ने कहा है - “अज्ञान की स्वीकृति ही अज्ञान की मौत का वारंट है!” जब अपनी गलतियों को हम पहचानेंगे ही नहीं और उन्हें ‘गलती’ के रूप में ईमानदारी से स्वीकार ही नहीं करेंगे; तो फिर सुधारने की कल्पना करना तक व्यर्थ है। अतः प्रतिक्रमण-पाठों के माध्यम से हमें अपने दोषों को पहचानने का सुअवसर मिलता है और बाकी-काम हमें अपनी दृढ़-संकल्पशक्ति से उन दोषों को दूर करके करना होगा।

प्रतिक्रमण : भेद-प्रभेद:-

  1. काल की अपेक्षा-
    दैवसिक प्रतिक्रमण, रात्रिक प्रतिक्रमण, आप्टाहिक प्रतिक्रमण, पाक्षिक प्रतिक्रमण, चातुर्मासिक प्रतिक्रमण, सांवत्सरिक प्रतिक्रमण, और युग-प्रतिक्रमण।

  2. पात्र की अपेक्षा-
    श्रावक-प्रतिक्रमण और यति-प्रतिक्रमण।

  3. प्रयोजन की अपेक्षा-
    ईर्यापथिक-प्रतिक्रमण, आहारचर्या-प्रतिक्रमण, ज्ञानाचार-प्रतिक्रमण, देववंदना-प्रतिक्रमण, तीर्थवंदना-प्रतिक्रमण आदि।

प्रतिक्रमण के ‘काल’ एवं ‘प्रयोजन’-मुख्यतः इन दो आधारों पर भेद बताये गये हैं। इनका संक्षिप्त-परिचय निम्नानुसार है :–

काल के आधार पर भेद :-

प्रतिक्रमण के काल के आधार पर निम्नलिखित भेद हैं :-

  1. दैवसिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पूरे दिन के कार्यों की समीक्षास्वरूप होता है और संध्याकाल में किया जाता है।
  2. रात्रिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पूरी रात्रि की क्रियाओं की समीक्षास्वरूप होता है और प्रातःकाल किया जाता है।
  3. आप्टाहिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पूरे सप्ताह के कार्यों की समीक्षास्वरूप होता है और अष्टमी व चतुर्दशी को या आठ-दिनों में किया जाता है।
  4. पाक्षिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पंद्रह दिन का पक्ष (पखवाड़ा) पूर्ण होने पर उस अन्तराल में सम्पन्न-कार्यों की समीक्षास्वरूप होता है और अमावस्या व पूर्णिमा को किया जाता है।
  5. मासिक-प्रतिक्रमण – माह-भर की गतिविधियों की समीक्षास्वरूप यह प्रतिक्रमण

माह के अंत में किया जाता है।

  1. चातुर्मासिक-प्रतिक्रमण – चार महीने पूर्ण होने पर उस अन्तराल में हुये कार्यों की समीक्षारूप यह प्रतिक्रमण होता है, जो हर चार-महीनों में किया जाता है। इसका मुनियों के ‘चातुर्मास’ या ‘चौमासे’ से कोई संबंध नहीं है।
  2. वार्षिक-प्रतिक्रमण – एक-वर्ष पूर्ण होने पर वर्ष-भर के कार्यों की समीक्षा इसमें की जाती है। इसे ‘सांवत्सरिक-प्रतिक्रमण’ भी कहते हैं।
  3. युग-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण पाँच-वर्ष पूर्ण होने पर समग्र-समीक्षारूप होता है। इसका रूप व्यापक होता है और सब दिशाओं से आकर श्रमण एक स्थान पर एकत्रित होते हैं और वरिष्ठ-आचार्य के नेतृत्व में विस्तार से समीक्षा की जाती है। तथा आगे के लिये भी नीति-निर्धारण किया जाता है।

प्रयोजन के आधार पर प्रतिक्रमण के भेद निम्नानुसार हैं :-

  1. ईर्यापथ-प्रतिक्रमण :- यह किसी भी प्रयोजन-विशेष पर गमन करने के बाद किया जाता है।
  2. भक्तपान-प्रतिक्रमण :- आहारचर्या के बाद यह प्रतिक्रमण किया जाता है।
  3. ज्ञानाचार-प्रतिक्रमण :- शास्त्र-स्वाध्याय के उपरान्त यह प्रतिक्रमण किया जाता है।
  4. उत्तमार्थ-प्रतिक्रमण :- सल्लेखना के समय यह प्रतिक्रमण किया जाता है।
  5. सर्वातिचारिक-प्रतिक्रमण :- मुनिदीक्षा से लेकर समाधिमरण तक के सभी अतिचारों के परिमार्जन-हेतु यह प्रतिक्रमण जीवन की उपान्त्य-वेला में किया जाता है।

पात्र की अपेक्षा प्रतिक्रमण के भेद :-

इस अपेक्षा से मात्र दो ही भेद हैं :-

  1. श्रावक-प्रतिक्रमण :- इसे मुख्यरूप से देशव्रती-श्रावक करते हैं।
  2. यति-प्रतिक्रमण :- मुनिधर्म के साधक सभी मुनिराज, उपाध्याय व आचार्य यहाँ सामान्यतः ‘यति’ संज्ञा से विवक्षित हैं। उनके लिये जो प्रतिक्रमण का विधान है, वह ‘यति-प्रतिक्रमण’ है।

इनके अतिरिक्त कुछ और प्रतिक्रमण-भेद भी जिनवाणी में बताये गये हैं :-

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  1. नाम-प्रतिक्रमण :- अयोग्य-नामों के उच्चारण का त्याग करना ‘नाम-प्रतिक्रमण’ है।
  2. स्थापना-प्रतिक्रमण :- वीतरागी-जिनबिंब के अतिरिक्त अन्य किसी भी रागी देवी-देवता के मंदिर में न जाना, उनकी सत्कार-प्रकार की विनय/बहुमान का त्याग करना ‘स्थापना प्रतिक्रमण’ है। इसीप्रकार एकेन्द्रिय से लेकर संज्ञी-पंचेन्द्रिय तक के जीवों के चित्र आदि रूप स्थापनाओं को मसलने, फाड़ने या नष्ट करने के भाव तक का त्याग ‘स्थापना-प्रतिक्रमण’ कहलाता है।
  3. द्रव्य-प्रतिक्रमण :- अयोग्य-आहार, वसतिका, उपकरण आदि का त्याग करना ‘द्रव्य-प्रतिक्रमण’ है।
  4. क्षेत्र-प्रतिक्रमण :- पानी से युक्त, कीचड़ से युक्त, त्रस और स्थावर-जीवों से भरे, जहाँ जाने पर रत्नत्रय की हानि की संभावना हो-ऐसे सभी क्षेत्रों में गमनागमन का त्याग करना ‘क्षेत्र-प्रतिक्रमण’ है।
  5. काल-प्रतिक्रमण :- रात्रि में, तीनों सन्ध्याओं के समय में, स्वाध्याय (ज्ञानाचार) के समय में तथा अन्य आवश्यक-क्रियाओं के समय में समस्त गमनागमन का त्याग करना ‘काल-प्रतिक्रमण’ है।
  6. भाव-प्रतिक्रमण :- आर्त-रौद्र आदि अशुभ-भावों का, तथा पुण्यास्त्रव के कारणभूत शुभ-भावों का भी त्याग करना ‘भाव-प्रतिक्रमण’ है।

प्रश्न यह उठता है कि प्रतिक्रमण जैसी विशुद्धि की स्वाधीन-प्रक्रिया को काल के बंधन में बाँधा ही क्यों गया? कि अब करना या तब करना। जब गलती हो, तभी करना प्रतिक्रमण के स्वरूप से मेल खाता है। मुँह पर जब दाग दिखे, तभी सफाई करना तो तर्क-संगत प्रतीत होता है; परन्तु कालिक-प्रतिक्रमण तो नियत-काल पर प्रतिक्रमण करने का विधान करता है? यह कैसे सुसंगत हो सकता है? जैसे ईर्यापथ-प्रतिक्रमण गमनागमन की क्रिया पूर्ण होते ही उसके दोषों के परिहार के लिये तभी करते हैं, उसीप्रकार शेष प्रतिक्रमण भी कार्य की अवधि से जुड़े होने चाहिये?

—यह समीचीन-प्रश्न है, परन्तु सही नहीं है। क्योंकि यदि प्रतिक्रमण की संपूर्ण-प्रक्रिया को दृष्टिगत रखा गया होता, तो यह प्रश्न ही नहीं उठता।

प्रतिक्रमण के जितने भी भेद बताये गये हैं, वे भिन्न-भिन्न आधारों पर अलग-अलग दृष्टिकोणों से वर्णित हैं। जब सबका एक ही आधार और एक ही दृष्टिकोण नहीं

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है, तो सबके लिये एक जैसा विधान कैसे किया जा सकता है? इसे इसप्रकार समझा जा सकता है :-

  1. कालिक-प्रतिक्रमण – यह प्रतिक्रमण दोषों के परिमार्जन के लिये तो होता ही है, पर इसका मुख्य-प्रयोजन दोषों का परिज्ञान कराते हुये निर्दोष-चर्या के लिये प्रेरित करना है। जब हम संभावित-दोषों की जानकारी-पूर्वक उनसे सजग रहेंगे, तो हमारी चर्या में दोषों की संभावना स्वतः ही न्यूनतर रहेगी।
  2. नित्य-प्रयोजन प्रतिक्रमण – जीवन-चर्या में दोष लगते समय तो उनकी संवेदना गहन होती है। बाद में वह क्रमशः क्षीण होती जाती है। यदि हम उसके परिमार्जन के लिये कोई समय-विशेष तय कर देंगे कि “इसीसमय इसका प्रतिक्रमण करना”; तो परिणामों में वह संवेदनशीलता ही नहीं रहेगी, जो दोषों को दूर करने की स्वतः प्रेरणा देती है। तब वह भाव उपेक्षा में बदल सकता है। और फिर धीरे-धीरे वह गलती हमारी दिनचर्या का अंग बनती जायेगी। हमें उसका गलती के रूप में अहसास क्रमशः घटता जायेगा। परिणाम-स्वरूप हम उस गलती के आदी बन जायेंगे और वह गलती हमारी दिनचर्या का अंग बनती जायेगी। अतः यह प्रतिक्रमण हमें तत्काल दोष-परिमार्जन के लिये सजग बनाता है।
  3. विशेष-प्रयोजन-प्रतिक्रमण :- ‘सर्वातिचारिक’ और ‘उत्तमार्थ’-प्रतिक्रमण – ये दोनों न तो किसी नियमकाल पर करने के हैं, और न ही किसी सामान्य-दोष के परिहार के लिये किये जाते हैं। जब यह पौद्गलिक-देह अपनी आयु की पूर्णता की ओर होती है, और विविध-कारणों से संयम की साधना के अनुरूप नहीं रह जाती है; तब ‘निर्यापक-मरण’ की अव्यर्थभावनाविता जानकर सल्लेखना-व्रत अंगीकार करते समय उसमें कोई दोष न लगें-इस प्रशस्त-भावना से क्षपक सल्लेखना-विधि में संभावित-दोषों की समीक्षा करते हुये अपने आत्मबल को पुष्ट करते हैं कि उनकी सल्लेखना-विधि में वैसे कोई दोष हों ही नहीं। – यह ‘उत्तमार्थ-प्रतिक्रमण’ का स्वरूप है।

और जब बिल्कुल अंतसमय आसन्न प्रतीत हो, तो जैसे ट्रेन से अपने स्टेशन पर उतरते समय हम अपने महत्त्वपूर्ण सामानों की समीक्षा करके उन्हें संभालते हैं व सहयात्रियों से कृत-दोषों के पुनः परिहार के लिये क्षमायाचना करते हैं, ताकि हम किसी भी प्रकार की उपयोगी-सामग्री को साथ लेना न भूल जायें और हमारे किसी

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भी व्यवहार के कारण किसी के व हमारे मन में कटुता का भाव शेष न रहे – इस उदात्त भावना से ‘संवत्सरीचार- प्रतिक्रमण’ किया जाता है।
4. द्रव्यादि-प्रतिक्रमण :- यह प्रतिक्रमण यदि नहीं किया जायेगा, तो अतिचारों जैसे अनेकों दुष्परिणाम हमारे जीवन में आयेंगे। क्योंकि प्रकृति के न्यायालय में कभी भी घूसखोरी नहीं चलती है। जैसा करेगा, वैसा भरेगा – यही कर्मसिद्धान्त है।

प्रतिक्रमण का लक्षण ‘अतिचार’ :-

  1. वह सूक्ष्म-दोष, जो स्वयं के संकल्पमात्र से मिट सके।
  2. समझने के लिए – परमानेंट-मार्कर से लिखना > साधारण-स्याही या रंग से लिखना > कच्ची पेंसिल से कागज़ पर लिखना, जिसे इरेज़र से मिटाया जा सके > पाटी पर खड़िया से लिखना, जो बिना निशान छोड़े मिट सके।
  3. संकल्प-शक्ति की श्रेष्ठता एवं दोष की न्यूनता इसकी प्रमुख शर्तें।

स्थूल एवं जानबूझकर किये दोष ‘अनाचार’ :-

  1. इनका ‘प्रतिक्रमण’ नहीं, ‘प्रायश्चित्त’ होता है।
  2. वह अपने आप नहीं किया जाता, बल्कि आचार्य या विशेष-ज्ञानी से लिया जाता है।
  3. ये संज्ञेय-अपराध की श्रेणी में हैं।

अब मैं प्रतिक्रमण के विषय में कुछ ऐसी स्वरूपगत व प्रक्रियागत-जानकारियाँ देना चाहता हूँ, जिनके बारे में संभवतः इतनी सजगता व गंभीरता से सोचा तक नहीं जाता है।

  1. ‘इच्छामि’ :- प्रतिक्रमण के किसी भी पाठ की शुरूआत इसी शब्द से होती है। इसका सीधा व सटीक-अर्थ यही है कि ‘‘मैं जो कुछ भी पढ़ या कर रहा हूँ, वह पूर्णतः स्वाधीन होकर स्वेच्छा से कर रहा हूँ।’’ किसी के निर्देश से, दबाव से, भय से, लालसा से कभी प्रतिक्रमण जैसी विधि सार्थक हो ही नहीं सकती है। आख़िर जो दोष हो चुका है, वह मुझे स्वयं ही अपने लिये मिटाना है, तो इसमें यदि पूरीतरह से स्वयं की दृढ़-इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब ज़्यादा से ज़्यादा पाठ पढ़ने की औपचारिकता तो हो सकती है; परन्तु हो चुके दोष के भाव का, उससे बंधे कर्म का बाल भी बांका होनेवाला नहीं है। अतः प्रतिक्रमण की संपूर्ण-प्रक्रिया पूरीतरह से अपने अंतःकरण की प्रेरणा से स्वाधीन होकर की जाये; तभी इसकी सार्थकता संभव है। – यही तथ्य बतलाने के लिये प्रतिक्रमण

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में ‘इच्छामि’ पद का प्रयोग हर बार अनिवार्यतः किया जाता है।
2. ‘भंते!’ :- इस शब्द का पारंपरिक-अर्थ है ‘सौ इन्द्रों से पूजनीय भगवान-तीर्थंकरदेव’। यह एकप्रकार से हम अपने आप को दृढ़-संकल्पी बनाने के लिये कहते हैं। व्यक्ति को अकेले में अपने मन से कुछ भी काम करने को कहा जाये, तो स्वाभाविकरूप से कमज़ोर-इच्छाशक्ति के कारण वह जितना/जैसा कहेगा; उतना कर नहीं सकेगा।

वह कथा आप सबने सुनी ही होगी कि एक राजा ने एक बड़ा भारी-गड्ढा खुदवाकर प्रजाजनों से अपील की कि ‘‘रात के अंधेरे में सब अपने अपने घरों से एक-एक लोटा दूध लाकर उस गड्ढे में डालेंगे।’’ नतीजा क्या रहा, सभी जानते हैं। सबने यह सोचा कि ‘रात के अंधेरे में कौन देख रहा है? सब दूध डालेंगे, तो मेरे एक लोटे पानी का इतने बड़े गड्ढे में क्या पता चलेगा?’ इसी मनोबल की कमज़ोरी के कारण अगले दिन सुबह वह गड्ढा पानी से भरा मिला था।

पंचमकाल के जीवों की मनोबल की इसी कमी को दूर करने व प्रतिक्रमण की दृढ़-इच्छाशक्ति से करने की भावना से ही साक्षात् तीर्थंकरदेव को साक्षी बनाने की मनोवैज्ञानिक-विधि अपनायी गयी है। जब कोई संकल्प साक्षात् तीर्थंकरदेव की साक्षीपूर्वक किया जायेगा, तो उसमें कमी व कमज़ोरी की संभावना स्वतः ही नगण्य रह जायेगी।

विदेशों में होनेवाले गंधर्व-विवाहस्वरूप शादी-संबंधों व भारतीय-पारंपरिक-विवाहों के आयोजनों में यही तो मनोवैज्ञानिकता है, कि विदेशों में अकेला लगा, तो साथ पकड़ लिया और मन भर गया, तो हाथ छोड़कर दूसरा हाथ थाम लिया। जबकि भारतीय विवाह-पद्धति में इतने लोगों के बीच इतनी सारी प्रक्रियायें होती हैं, कि उसका मन कच्चा भी पड़े, तो वह आसानी से न तो साथ छोड़ पाता है और न ही हाथ छोड़ पाता है। मनमर्जी के कामों में और बड़ों की साक्षी व सान्निध्य में हुये कामों में यही अंतर होता है। मनमर्जी में मात्र स्वार्थ-मूलकता होती है, जबकि बड़ों के सान्निध्य में होनेवाले विधि-विधान हमारे मन पर गुणवत्ता भी बढ़ाते हैं। हमारे संकल्पों को न केवल संबल प्रदान करते हैं, बल्कि उनकी गुणवत्ता को भी बढ़ाते हैं। यही उद्देश्य ‘भंते!’ पद का हर प्रतिक्रमण के पाठ के ‘इच्छामि’ पद के साथ अनिवार्यतः प्रयोग करने का है।
3. ‘मिच्छामि दुक्कडं’ :- ‘दुक्कडं’ पद का अर्थ तो ‘दुष्कृत’ या ‘दोष’ है, जो यहाँ ‘अतिचार’ का वाचक है। यहाँ ‘मिच्छामि’ पद पर ही मुख्यतः विचार ‘भंते!’ पद

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यह अद्भुत-प्रयोग है। इसकी गहराई को समझे बिना आजकल सामान्यतः ‘सॉरी’ इस अर्थ में इसका प्रयोग कुछ साधर्मीजन करने लगे हैं। पहिले तो यह समझना होगा कि क्या ‘मिच्छामि’ अर्थात् (उन कहे गये दोषों को) मिथ्या करता हूँ – इतना कहने मात्र से वे दोष नष्ट हो जायेंगे? या कुछ और प्रक्रिया भी करनी पड़ेगी?

कुछ कहा जाता है, तो उसके पीछे पूरी तैयारी होती है। हम तो आजकल इसीतरह ‘मिच्छामि दुक्कडं’ बोलते हैं। जैसे बोलने भर से दुष्कृत मिथ्या हो जायेंगे। पहिले तो दुष्कृतों के स्तर का तो पता हो, कि वे अतिचाररूप ही हैं या अनाचाररूप। अनाचारों का तो प्रतिक्रमण होता ही नहीं है। दोष का स्तर तो पता हो, और फिर उसे सुधारने की विधि व अपनी संकल्प-शक्ति का भी बोध हो, तभी ‘मिच्छामि दुक्कडं’ कहने की सार्थकता है। इसे हम फैशन की तरह बोलने लगे हैं। यह सही-रूप नहीं है।

जब हमें अपनी गलती का ठीक से अहसास हो, और उसका स्तर भी इतना हो कि हम स्वयं संकल्पपूर्वक बोलें, और वह दोष नष्ठप्रायः हो सके; तभी ‘मिच्छामि दुक्कडं’ बोलने की सार्थकता है।
4. ‘अतिचार’ :- व्रत या नियम की मर्यादा का उल्लंघन करना ही ‘अतिचार’ है। इसके समानार्थक ‘अतिक्रम’ आदि कई शब्द प्रचलित हैं, जिससे कई बार भ्रम भी हो जाता है। आचार्य अमृतचन्द्र सूरि जी ने इनकी स्पष्टरूप से व्याख्या करके भ्रम-निवारण का सार्थक-प्रयास किया है। तदनुसार –
मन की अपेक्षित-शुद्धि का न होना ‘अतिक्रम’ है।
मर्यादा से बाहर जाकर विषयों की इच्छा करना ‘व्यतिक्रम’ है।
इन्द्रियों की प्रमादचर्या से व्रतों में दोष लगना ‘अतिचार’ है।
व्रत की मूलभावना ही खंडित हो जाये-ऐसा आचरण करना ‘अनाचार’ है।
(पुरुषि.3.,30)

इनमें से प्रथम-तीन को मिलाकर भी कई आचार्यों ने ‘अतिचार’ ही कहा है।

निष्कर्ष यह है कि ‘अतिचार’ जैसे सूक्ष्म-दोष का तो प्रतिक्रमण हो सकता है, किन्तु ‘अनाचार’ का कोई भी प्रतिक्रमण नहीं है। वह ‘अनाचार’ यदि अज्ञान या प्रमाद आदि कारणों से कदाचित् हो, तब तो उसके लिये आचार्य से प्रायश्चित्त लिया जा सकता है। किन्तु यदि वह जानबूझकर इन्द्रिय-विषयों की लालसा से किया जाये, तो उसे तो

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— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2447.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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