प्रतिक्रमण-आलोचना-सामायिक पाठ | Pratikraman-Aalochna-Samayik Path

प्रतिक्रमण-आलोचना-सामायिक पाठ

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

प्रतिक्रमण-आलोचना-सामयिक पाठ

णिच्चं पच्चक्खाणं कुव्वदि णिच्चं पडिक्कमदि जो य।
णिच्चं आलोचेयदि सो हु चरित्तं हवदि छेदा॥

प्रतिक्रमण सामायिक आलोचना पाठ

पूज्य श्री कानजीस्वामी स्मारक ट्रस्ट, देवलाली अंतर्गत
पूज्य कहान गुरुदेव स्मृति ग्रंथ प्रकाशन पुष्प-37

प्रकाशक
श्री जैन मुमुक्षु महिला मंडल
कहाननगर, लाम रोड,
देवलाली

अंतर्गत
पूज्य श्री कानजीस्वामी स्मारक ट्रस्ट
कहाननगर, लाम रोड,
देवलाली

प्रथम आवृत्ति

प्रथम आवृत्ति : प्रत 1000 कहान संवत-11 विक्रम संवत 2058
वीर संवत 2528 इ.स. 2002

प्राप्तिस्थान

  • पूज्य श्री कानजीस्वामी स्मारक ट्रस्ट
    कहाननगर, लाम रोड,
    देवलाली-422401
  • श्री सीमंधर भगवान जिनालय
    173/175, मुंबादेवी रोड,
    मुंबई-400002

मूल्य

मूल्य : रु. २६=००

मुद्रक

मुद्रक :
स्मृति ऑफसेट
सोनगढ़-364 250
:telephone: : (02846) 44081

परम पूज्य अध्यात्ममूर्ति सद्गुरुदेव श्री कानजीस्वामी

प्रस्तावना (आमुख)

परम पूज्य कहान गुरुदेवश्री की स्मृति स्मारक रूप में देवलाली के
मध्य में अति मनोरम्य, शांत वातावरण में पूज्य श्री कानजीस्वामी स्मारक
ट्रस्ट नवनिर्मित हुआ है। जो पूज्य गुरुदेवश्री की अति प्रभावना का निमित्त
हुआ है। इस संकुलन में न्यूनतम सुंदर सुंदर शिविर, विधान तथा अनेक
रोचक प्रवृत्तियाँ नित्य-प्रति चल रही हैं। जिसमें बालक से लेकर अनेक
मुमुक्षुओं लाभान्वित हुए हैं।

अति सुंदर आयतनों युक्त महाराष्ट्र प्रांत देवलाली एक तीर्थधाम बन
गया है। यहाँ प्रतिदिन यात्रियों का आवागमन रहता है। श्री दिगंबर
महावीर मंदिर, आदिनाथ त्रिमूर्ति से संयुक्त श्री परमागममंदिर में अति
मनोज्ञ शांतिनाथ भगवान की मूर्ति तथा अष्ट बलभद्र भगवंत खड्गासन
रूप में विराजमान हैं। अति सुंदर कांच की चित्रकारी वाली दीवारों से
समवसरणमंदिर में विराजमान चौमुख मुद्राधारी श्री सीमंधरस्वामी तथा
चतुर्विंशति भगवंत और चौगान के मध्य में गगनचुंबी मानस्तंभ ५३ फुट
उन्नत स्थित है, जिसमें ऊपर-नीचे चतुर्मुख श्री सीमंधरस्वामी विराजमान
हैं। उसकी नीचे ३ वेदियाँ अद्भुत दृश्यों से अंकित सुशोभित हैं। श्री
वीतरागी भगवंतों का दर्शन करते हुए मुमुक्षुओं को आश्चर्य होता है।
वैराग्य-प्रेरक चित्रालय में चित्रों भी अद्भुत हैं।

पर्वाधिराज पर्युषण में अनेक मुमुक्षुगण अपनी निज हित की साधना
हेतु देवलाली में अधिक संख्या में आते हैं। हिन्दी, मराठी मुमुक्षु भाई
अधिक संख्या में लाभ लेते हैं। पर्युषण पर्व में प्रत्येक प्रवृत्तियों से पूरा
दिन आनंदमय आराधनापूर्वक व्यतीत हो जाता है। तथा शाम को
प्रतिदिन प्रतिक्रमण होता है। उसमें हिन्दी, मराठी मुमुक्षुओं को गुजराती
प्रतिक्रमण पुस्तक तथा आलोचना-पाठ गुजराती भाषा में होने से समझने में

[२]

नहीं आता, अतः बहुत से मुमुक्षुओं की इच्छानुसार हिन्दी में छापने का
यह निर्णय किया गया है उसके हेतु आर्थिक सहयोग शीघ्र प्राप्त हुआ।
अतः पुस्तक छापने का शीघ्र निर्णय लिया गया।

इस पुस्तक में प्रतिक्रमण, आलोचना पाठ, श्री आचार्य पद्मनन्दि-
विरचित तथा श्री अमितगति आचार्यदेव कृत सामायिक पाठ हिन्दी
अक्षरों में लिया गया है।

देवलाली में श्री जैन मुमुक्षु महिला मंडल की दिनप्रतिदिन धार्मिक
प्रवृत्तियों में वृद्धिगत हो रही है और मुमुक्षु महिलाओं ने उत्साहपूर्वक
जिनवाणी की प्रवृत्ति को सचेत किया है। जिनवाणी का प्रकाशन प्रत्येक
पर्युषण में होता है। इस वर्ष श्री प्रतिक्रमण आलोचना-पाठ का हिन्दी
पुस्तक प्रकाशन करते हुए आनंद का अनुभव करते हैं।

इस अनादि मिथ्यात्व परिणाम का प्रायश्चित, प्रत्याख्यान, प्रतिक्रमण,
आलोचना करके स्व-स्वरूप में स्थिर हो-यही भावना है।

श्री जैन मुमुक्षु महिला मंडल-देवलाली
अंतर्गत
पूज्य श्री कानजीस्वामी स्मारक ट्रस्ट, देवलाली

प्रतिक्रमण-आवश्यक ]

।। श्री जिनाय नमः ।।
★ श्री गौतम स्वामी विरचित ★

देवसिक (रात्रिक) प्रतिक्रमण

श्लोक— जीवे प्रमादजनिताः प्रचुरा प्रदोषः,
यस्मात् प्रतिक्रमणतः प्रलयं प्रयान्ति ।
तस्मादर्थमलं, मुनिबोधनार्थं,
वक्ष्ये विचित्रभवकर्म विशोधनार्थम् ॥१॥

अर्थ :—प्रतिक्रमण की आवश्यकता को बतलाते हुए, मुनियों के लिए भी उसके स्पष्टीकरण की प्रतिज्ञा करते हुए, पूज्य आचार्य कहते है कि जीव में प्रमाद से जनित अनेक दोष पाये जाते है। वे प्रतिक्रमण करने से प्रलय (नाश) को प्राप्त होते है, इसलिए नाना भवों में संचित हुए कर्मरूप दोषों की विशुद्धि के निमित्त मुनियों के समझने के लिए प्रतिक्रमण का निर्मल अर्थ करता हूं ॥१॥

आशा है मुनिगण इसे अवश्य ध्यान से पढ़ेंगे तथा इस आवश्यक क्रिया का नियमित रूप से पालन करेंगे।

श्लोक— पापिष्ठेन दुरात्मना जड़धिया, मायाविना लोभिना,
रागाद्वेष मलोपमेसन मनसा दुष्कर्म यन्निर्र्भितम् ।
त्रैलोक्यधिपते जिनेंद्र भवतः, श्रीपादामूलेऽधुना,
निन्दापूर्वमहं जहामि सततं, वर्त्तितुः सत्वथे ॥२॥

अर्थ :—हे तीन लोक के अधिपति जिनेंद्रदेव ! अत्यन्त पापी, दुरात्मा, जड़बुद्धि, मायावी, लोभी और राग द्वेष से मलीन मेरे मन ने जो दुष्कर्म उपार्जन किया है उसका निरन्तर सन्मार्ग में चलने

प्रतिक्रमण-आवश्यक ]

की इच्छा रखता हुआ आज मैं आपके चरण कमलों में अपनी निन्दा पूर्वक त्याग करता हूं ॥२॥

गाथा— खम्माममि सव्वजीवाणं; सव्वे जीवा खमंतु मे ।
मित्ती मे सव्वभूएसु, वैरं मज्ज न केणवि ॥३॥

अर्थ :—मैं सब जीवों से क्षमा याचना करता हूं, सब मुझे क्षमा प्रदान करें मेरा सब जीवों में मैत्रीभाव है, किसी के भी साथ मेरा बैर-भाव नहीं है ॥३॥

गाथा— रागबंध पडोसंव, हरिसं दीणभावयं ।
उस्सुगत्तं भयं सोगं, रदिमरदिं-च वोस्सरस्से ॥४॥

अर्थ :—१. राग, २. द्वेष, ३. हर्ष, ४. दीनभाव, ५. उत्सुकता, ६. भय, ७. शोक, ८. रति (प्रीति) और ९. अरति (अप्रीति) इन सब आकुलता को उत्पन्न करने वाले भावों का, मैं परित्याग करता हूं ॥४॥

गाथा— हा दुट्ठ कयं, हा ! दुट्ठ चिंतियं, भासियं च हा दुट्ठं ।
अंतो अंतो उज्झामि, पच्छुत्तावेणं वेवंतो ॥५॥

अर्थ :—हा ! १. यदि मैंने कार्य से कोई दुष्ट कार्य किया हो। हा ! २. यदि मन से कोई दुष्ट चिन्तन किया हो, और हा ! ३. यदि मैंने मुख से कोई दुष्ट वचन बोला हो, उसको मैं बुरा समझता हुआ, पश्चाताप पूर्वक मन ही मन में जल रहा हूं अर्थात् उन दुर्भावनाओं का त्याग करता हूं ॥५॥

गाथा— दुक्खे खेत्ते काले; भावे च कयवराह सोहणयं णिंदण,
गरहण जुत्तो, मण, वच च कायवण पडिक्कमणं ॥६॥

प्रतिक्रमण-आवश्यक ]

अर्थ :—१. द्रव्य-आहार, शरीर आदि, २. क्षेत्र-वसतिका, शयन, मार्गादि, ३. काल-पूर्वाह्न (प्रातःकाल) मध्यान्ह (दोपहर) अपरान्ह (सायंकाल) दिवस, रात्रि, पक्ष (१५ दिन) मास (३० दिन) चातुर्मास (४ महीने) संवत्सर (१ वर्ष) अतीत (भूतकाल) अनागत (भविष्यत् आने वाला काल) वर्तमान (मौजूद रहने वाला) ४. भाव-संकल्प और विकल्प खोटे व्यापार से किये गये अपराधों की निन्दा, तथा यहां से मुक्त होकर शुद्ध मन, वचन और काय से शोधन करना प्रतिक्रमण है ॥६॥

विशेष-निंदा और गर्हा-यद्यपि दोनों शब्द एकार्थ सरीखे दिखते है फिर भी इनमें निम्नलिखित अंतर है-- (क) जो अपने आत्मा की साक्षीपूर्वक किये हुए पापों को बुरा समझना उसे निंदा कहते है, किन्तु जो (ख) गुरु आदि की साक्षी पूर्वक किये हुए पापों की निंदा करना सो गर्हा कहलाती है।

गद्य-एइंदिया, बेइंदिया, तेइंदिया, चउरिंदिया,
पुढविकाइया, आउकाइया, तेउकाइया, वाउकाइया, वणप्फदिकाइया,
तसकाइया, एदेसिं उवघाणं, परिदावणं विराहणं, उवघादो कदो वा, कारिदो
वा, करेतो वा समणुमण्णिदो, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥७॥

अर्थ :—१. एकेन्द्रिय, २. द्वीन्द्रिय, ३. त्रीन्द्रिय, ४. चतुरिन्द्रिय,
५. पंचेन्द्रिय, ६. पृथ्वीकायिक, ७. अपकायिक (जल कायिक)
८. तेजस्कायिक, (अग्निकायिक), ९. वायुकायिक, १०. वनस्पति-
कायिक, और त्रसकायिक, इन सब इन्द्रिय और कायिक जीवों का
१. उत्तापन, २. परितपन, ३. विराधण और ४. उपघात मैंने स्वयं
किया हो, औरों से कराया हो, और स्वयं करते हुए दूसरों की
अनुमोदना की हो, वे सब पाप मेरे मिथ्या हों।

विशेष

यद्यपि ये चारों ही शब्द प्रायः एकार्थ वाचन है फिर भी इनका भेद समझने के लिए नीचे विशेषार्थ दिया है।
१. पृथ्वीकायिकादि जीवों का उपापन अर्थात् प्राणों का वियोग रूप मारण।
२. परितापन पृथ्वीकायिकादि जीवों को संताप पहुंचाना,
३. विराधण-पृथ्वीकायिकादि जीवों को पीड़ा पहुंचाना और अनेक प्रकार से दुःखी करना,
४. उपघात-एक देश से अथवा संपूर्ण रूप से पृथ्वीकायिकादि जीवों को प्राणों से रहित करना।।१।।

आलोचना

गद्य-इच्छामि भंते! चरित्तयारो तेरसविहो, परिविहाविदो, पंचमहव्वदाण, पंचसमिरदीओ, तिगुत्तीओ चेदि। तत्थ पढमे महव्वदे पाणादिवादादो वेरमण, से. पुढविकादिया जीवा असंखेजासंखेजा, आउकादिया जीवा असंखेजासंखेजा, तेउकादिया जीवा असंखेजासंखेजा वाउकादिया जीवा असंखेजासंखेजा, वणप्फदिकादिया जीवा अणण्णंता हरिया, वीआ, अंकुरा। हिण्णा भिण्णा एदेसिं उद्दावणं परिदावणं, विराहणं, उवघादो कदो वा, कारिदो वा, कीरंतो वा समणुमण्णिदो, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं।।१।।

अर्थ

हे भगवन्! पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति इस प्रकार तेरह प्रकार का चारित्र है उसका मैंने प्रमाद वश परिहापण (खंडन) किया हो, उसकी आलोचना-विशुद्धि करना चाहता हूं। उस तेरह प्रकार के चारित्र में पहला महाव्रत प्राणों के व्यतिपात से रहित है। उसमें मैंने असंख्यातासंख्यात पृथ्वीकायिक जीव, असंख्याता-संख्यात अप्कायिक जीव, असंख्यातासंख्यात तेजस्कायिक जीव, असंख्यातासंख्यात वायुकायिक जीव, अनंतानंत वनस्पतिकायिक जीव तथा हरित (सचित्त) बीज, अंकुर, छेदे भेदे उनका उत्तापन, परितापन विराधण और उपघात किया है, कराया है और करने वाले की अनुमोदना की है, वह मेरा दुष्कृत मिथ्या होवे।।१।।

गद्य-बेइंदिया जीवा असंखेजासंखेजा, कुक्खि किमि संख खुल्लुय, वराडय, अक्खरिट्ठय-गण्डवाल संबुक्क-सिप्पि, पुलविकादिया एदेसिं उद्दावणं, परिदावणं, विराहणं, उवघादो कदो वा, कारिदो वा, कीरंतो वा, समणुमण्णिदो, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं।।२।।

अर्थ

स्पर्शण और रसना ये जिनके दो इन्द्रियां होती है ऐसे दो इन्द्रिय जीव असंख्याता- संख्यात प्रमाण है उनमें से कुक्षि, कृमि (लट्ट) घावों में पैदा होने वाले जीवों का भी ग्रहण किया गया है तथा शंख खुल्लक (बाला) वराटक (कौड़ी) अक्ष, अरिश्रबाल (बाल जातिका ही जन्तु विशेष) संबुक्क (लघुशंख) सीप, पुलवीक (पानी की जोंक) आदि अन्य भी दो इन्द्रिय जीव बहुत से है उनका उत्तापन, परितापन, विराधणा और उपघात मैंने किया हो, कराया हो और करने वाले की अनुमोदना की हो, वह मेरा दुष्कृत मिथ्या होवे।।२।।

गद्य-तेइंदिया जीवा-असंखेजासंखेजा, कुन्थुदेहिय विच्छिय गोभिंद-गोज्जुव-मक्कुण, पिप्पीलियादिया एदेसिं उद्दावणं, परिदावणं, विराहणं उवघादो कदो वा कारिदो वा, कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं।।३।।

अर्थ

स्पर्शण, रसना, और घ्राण ये जिनके तीन इन्द्रियां होती है ऐसे तीन इन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात संख्या प्रमाण है उनमें से कुन्थु (सूक्ष्म जंतु) देहिक (उद्वेलन) गोभिंद, गोजों, मक्कुण (खटमल) पिपीलिका (कीड़ी) सावण की डोकरी आदि अन्य भी तीन इन्द्रिय जीव बहुत से है उनका उत्तापन, परितापन, विराधणा और उपघात मैंने किया हो, कराया हो और करने वाले की अनुमोदना की हो, वह मेरा दुष्कृत मिथ्या होवे।।४।।

गद्य-चउरिंदिया जीवा असंखेजासंखेजा, दंसमसय, मक्खिय, पयंग-कीड-भमर-महुर-गोम्मिच्छ-याइया, एदेसिं उद्दावणं परिदावणं, विराहणं, उवघादो कदो वा, कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं।।४।।

अर्थ

स्पर्शण, रसना, घ्राण चक्षु ये चार इंद्रियां होती है ऐसे चार इंद्रिय जीव असंख्याता- संख्यात संख्या प्रमाण है उनमें से दंश (डांस) मशक (मच्छर) मक्खि (मक्खी) पतंग (पतंगा) कीट (गोमय कीट, रक्तकीट, अर्ककीटादि) भ्रमर (भौंरा) मधुयर (मधुमक्खी) गोम्मिका इत्यादि असंख्याता- संख्यात संख्या प्रमाण जो चौ इन्द्री जीव है इनका उत्तापन, परितापन विराधणा और उपघात मैंने किया हो, कराया हो और करने वाले की अनुमोदना की हो, वह मेरा दुष्कृत मिथ्या होवे।।४।।

लघु सिद्धभक्ति

तवसिद्धे णयसिद्धे, संजमसिद्धे चरित्त सिद्धे य।
णाणम्मि दंसणम्मि य, सिद्धे सिद्धे सिरसा णमंसामि।।१।।

अर्थ

तप से सिद्ध, नय से सिद्ध, संयम से सिद्ध, चरित्र से सिद्ध, ज्ञान से सिद्ध और दर्शन में सिद्ध हुए ऐसे सब सिद्धों को मैं सिर झुकाकर नमस्कार करता हूं।।१।।

गद्य-(अंचालिका)-इच्छामि भंते! सिद्धभक्ति काउस्सग्गो करों,
तस्सालोचेउं सम्मण्णाण-सम्मदंसण-सम्मचारित्त जुत्ताणं, अट्ठविह-कम्म-विप्प मुक्काणं, अट्ठगुणसंपण्णाणं, उड्ढलोयग्गम्मि पयट्टियाणं, तवसिद्धाणं णयसिद्धाणं, संजमसिद्धाणं, चरित्तसिद्धाणं, अतीताणागदवट्टमाणकालत्तय-

प्रतिक्रमण-आवश्यक

सिद्धाणं, सव्वसिद्धाणं, णिच्चकाल अंचेमि, पूजेमि, वंदामि, णमंसामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो सुगइगमणं, समाहि मरणं, जिणगुणसम्पत्ति होउ मज्झं।।

अर्थ

हे भगवन्! मैंने सिद्ध भक्ति सम्बन्धी कायोत्सर्ग किया, उसकी आलोचना करने की इच्छा करता हूं। जो सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र से युक्त है, आठ प्रकार के कर्मों से मुक्त है, आठ गुणों से सम्पन्न है, ऊर्ध्वलोक के मस्तक पर प्रतिष्ठित है, तप सिद्ध है, नयसिद्ध है, संयमसिद्ध है, चारित्र सिद्ध है, सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र से सिद्ध है, अतीत, अनागत और वर्तमान इन तीनों कालों में सिद्ध है ऐसे सब सिद्धों की नित्यकाल अर्चा करता हूं पूजा करता हूं, वंदना करता हूं, नमस्कार करता हूं। मेरे दुःखों का क्षय हो, कर्मों का क्षय हो, बोधि रत्नत्रय का लाभ हो, सुगति में गमन हो, समाधि मरण हो और जिनेंद्र के गुणों की सम्यक् प्राप्ति हो।

कृति अनुयोग द्वारा (वाचना शुद्धि प्ररूपणा)

धवला पुस्तक-६

यम्पदहरसव्ववणे रुधिरस्सावेदगत्तोऽतिचारे च।
वात्तुब्बुद्धकायेषु भुक्तवति चापि नाध्येयम्।।६२।।
तिलपलल-पुक्कु-लाजा-पूयदिस्सिग्घयसुरभिगधेसु।
भक्तेषु भोजनेषु च दावाग्गिधूमे च नाध्येयम्।।६३।।
योजनमण्डलमात्रे सन्त्रासविधौ महोपवासे च।
आवश्यकक्रियायां केशेषु च लुंच्यमानेषु ।।६४।।

प्रतिक्रमण-आवश्यक

समदिनान्ध्ययने प्रतिषिद्धं स्वर्गगते श्रमणासुरौ।
योजनमात्रे दिवसत्रयं त्वतिदूरं दिवसम् ।।६५।।
प्राणिनि च तीव्रदुःखानिप्रमाणं स्फुरति चालिवेदना।
एकलिवर्तनमात्रे तिर्यग्गं चरसु च न पाठ्यम् ।।६६।।
तावन्मात्रे स्थावरकायसत्कर्मणि प्रवृत्ते च।
क्षेत्राशुद्धौ दूराद् दुर्गे वातिकूपने वा ।।६७।।
विगताथागमे वा स्वशरीरे शुद्धिस्तिविरे वा।
नाध्येयः सिद्धान्तः सुखसुखफलभिच्छता व्रतिना ।।६८।।
प्रमितिररन्तिशांतं स्यादुच्चारविमोक्षणीक्षतेरात्।
तनुसलिलमोक्षणेऽपि च पंचाक्षररलितेरात् ।।६९।।
मानुषशरीरलेशावश्यपचण्दण्डंशात्तु।
संशोध्या तिरश्चां तददंमात्रे भूयिः स्यात् ।।७०।।
व्यन्तरभेरीताडन-तलूजासंकटे कर्षणे वा।
संभ्रमण-समावर्जनसमीपचण्डालवालेषु ।।७१।।
अग्निजलरुधिरदीपे मांसासिप्रयत्नने तु जीवानां।
क्षेत्रविशुद्धिर्न स्याद्योदितं सर्वभावैः ।।७२।।
क्षेत्रं संशोध्य पुनः स्वहस्तपदौ विशोध्य शुद्धमनाः।
प्राशुकदेशावस्थो गृह्णीयाद् वाचनां पश्चात् ।।७३।।
युक्त्या समधीयानो वक्षणकषायमसुशनु स्वाङ्गम्।
यत्नेनाधीत्य पुनर्यथाश्रुतं वाचनां मुंचेत ।।७४।।
तपसि द्वादशसंख्यं स्वाध्यायः श्रेष्ठ उच्यते सद्भिः।
अस्वाध्यायदिनानि ज्ञेयानि ततोऽत्र विद्भिः ।।७५।।

प्रतिक्रमण-आवश्यक

पर्वसु नन्दीश्वरमहिमा दिवसेषु चोपरोगेषु।
सूर्याचन्द्रमसोरपि नाध्येयं जानता व्रतिना ।।७६।।
अष्टम्यामध्ययनं गुरु-शिष्य द्वयोर्योगमावहति।
कलहं तु पौर्णमास्यां करोति विघ्नं चतुर्दश्याम् ।।७७।।
कृष्णचतुर्दश्यां यदधीयते साधवो हामावास्यायाम्।
विद्योपवासविधयो विनाश्रुतिं प्रयान्त्येष सर्वं ।।७८।।
मध्यान्हे जिनरूपं नाशयति करोति संध्ययोर्व्याधिम्।
तुष्यन्तोऽप्रियतां यद्ममरात्रौ समुपयान्ति ।।७९।।
अतिदीर्घदुःखितानां रुदतां संदर्शने समीपे च।
स्तनयित्नुविद्युदग्निभ्रष्टवृक्षा उल्कानिर्घाते ।।८०।।
प्रतिप्रयेकः पादो ज्येष्ठामूलस्य पौर्णमास्यां तुं।
सा वाचनाविमोक्षे छाया पूर्वाण्हवेलायाम् ।।८१।।
सैवापरागृहकाले वेला स्याद्वाचनाविधौ विहिता।
समपदी पूर्वाण्हपराहण्हयोर्मोक्षेणु ।।८२।।
ज्येष्ठामूल्यतोऽप्यापौषाढपूर्वांगुला हि वृद्धिः स्यात्।
मासे मासे विहिता क्रमेण सा वाचनायाम् ।।८३।।
एवं क्रमप्रवृद्ध्या पादद्वयमत्र हीयते पश्चात्।
पौषाढज्येष्ठान्ताद् द्वयंगुलमेव विज्ञेयम् ।।८४।।
दव्वादिविक्रमणं करोदि सुतत्वसिकखलोहेण।
असमाहिमस्सज्जायं कलहं विहि वियोगं च ।।८५।।
विणएण सुदम्मीहं किह वि पमादेण होइ विसरिदं।
तमुवट्टादि परभवे केवलणाणं च आवहेदि ।।८६।।

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

इदि वयुणादो तित्थयरवयणविणिग्गयबीजपदं सुत्तं। तेण सुत्तेण समं वट्टदि उप्पज्जदि त्ति गणहरदेवम्मि द्धिदसुदणाणं सुत्तसमं। अयंते परिच्छिण्हे गम्मते इत्यर्था द्वादशंगविषयः, तेण अत्थेण समं सह वट्टदि त्ति अत्थसमं। दव्वसुदाइएण अणवेक्खिय संजमजुदसुद-णाणावरणक्खओवसमसमुप्पण्ण-बारहसुगंद सव्वसुद्धारमत्थसममिदि।

यमपटहका शब्द सुननेपर, अंगसे रक्तस्रावके होनेपर, अतिचारके होनेपर, तथा दाताओके अशुद्धकाय होते हुए भोजन कर लेनेपर स्वाध्याय नहीं करना चाहिये ॥६३॥

तिलमोदक, चिउडा, लाई और पुआ आदि चिक्रण एवं सुगन्धित भोजनोंके खानेपर तथा दावानलका धुआँ होनेपर अध्ययन नहीं करना चाहिये ॥६३॥

एक योजनके घेरेमें सन्यासविधि, महोपवासविधि, आवश्यकक्रिया एवं केशोंका लौंच होनेपर तथा आचार्योंका स्वर्गवास होनेपर सात दिन तक अध्ययनका प्रतिषेध है। उक्त घटनाओंके योजन मात्रमें होनेपर तीन दिन तक तथा अत्यन्त दूर होनेपर एक दिन तक अध्ययन निषिद्ध है ॥६४-६५॥

प्राणीके तीव्र दुःखसे मरणासन्न होनेपर या अत्यन्त वेदनासे तड़फड़ानेपर तथा एक निर्वर्तन (एक वीघा या गुंठा) मात्रमें तिर्यंचोंका संचार होनेपर अध्ययन नहीं करना चाहिये ॥६६॥

उतने मात्रमें स्थावरकाय जीवोंके घात रूप कार्यमें प्रवृत्त होनेपर, क्षेत्रकी अशुद्धि होनेपर, दूसरे दुर्गन्ध आनेपर अथवा अत्यन्त सड़ी गन्धके आनेपर, ठीक अर्थ समझनेमें न आनेपर अथवा अपने शरीरके शुद्धिरहित होनेपर मोक्षसुखके चाहनेवाले व्रती पुरुषको सिद्धान्तका अध्ययन नहीं करना चाहिये ॥६७-६८॥

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

मल छोडनेकी भूमिसे सो अरलि प्रमाण दूर, तनुसलिल अर्थात् मूत्रके छोडनेमें भी इस भूमिसे पचास अरलि दूर, मनुष्यशरीरके लेशमात्र अवयवके स्थानसे पचास धनुष, तथा तिर्यंचोंके शरीरसम्बन्धी अवयवके स्थानसे उससे आधी मात्र अर्थात् पच्चीस धनुष प्रमाण भूमिको शुद्ध करना चाहिये ॥६६-७००॥

व्यन्तरोंके द्वारा भेरीताडन करनेपर, उनकी पूजाका संकट होनेपर, कर्षणके होनेपर, चाण्डालबालकोंके समीपमें झाडा-बुहारी करनेपर; अग्नि, जल व रुधिरकी तीव्रता होनेपर; तथा जीवोंके मांस व हड्डियोंके निकाले जानेपर क्षेत्रकी विशुद्धि नहीं होती जैसा कि सर्वज्ञोंने कहा है ॥७०१-७०२॥

क्षेत्रकी शुद्धि करनेके पश्चात् अपने हाथ और पैरोंको शुद्ध करने तदनन्तर विशुद्ध मन युक्त होता हुआ प्राशुक देशमें स्थित होकर वाचनाको ग्रहण करे ॥७०३॥

बाजू और कांख आदि अपने अंगका स्पर्श न करता हुआ उचित रीतिसे अध्ययन करे और यत्नपूर्वक अध्ययन करके पश्चात् शास्त्रविधिसि वाचनाको छोड़ दे ॥७०४॥

साधु पुरुषोंमें बारह प्रकारके तपोंमें स्वाध्यायको श्रेष्ठ कहा है। इसीलिये विद्वानोंको स्वाध्याय न करनेके दिनोंको जानना चाहिये ॥७०५॥

पर्वदिनों (अष्टमी व चतुर्दशी आदि), नन्दीश्वरके श्रेष्ठ महिमा-दिवसों अर्थात् अधिक दिनोंमें और सूर्य-चन्द्रका ग्रहण होनेपर विद्वान व्रतीको अध्ययन नहीं करना चाहिये ॥७०६॥

अष्टमीमें अध्ययन गुरु और शिष्य दोनोंके वियोगको करता है। पूर्णिमासीके दिन किया गया अध्ययन कलह और चतुर्दशी और

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

अमावस्याके दिन किया गया अध्ययन विघ्नको करता है ॥७०७॥

यदि साधु जन कृष्ण चतुर्दशी और अमावस्याके दिन अध्ययन करते हैं तो विद्या और उपवासविधि सब विनाशवृत्तिको प्राप्त होते हैं ॥७०८॥

मध्यान्ह कालमें किया गया जिनरूपको नष्ट करता है, दोनों संध्याकालोंमें किया गया अध्ययन व्याधिको करता है, तथा मध्यम रात्रिमें किये गये अध्ययनसे अनुरक्त जन भी द्वेषको प्राप्त होते हैं ॥७०६॥

अतिशय तीव्र दुःखसे युक्त और रोते हुए प्राणियोंको देखने या समीपमें होनेपर मेघोंकी गर्जना व बिजलीके चमकनेपर और अतिवृष्टिके साथ उल्कापात होनेपर (अध्ययन नहीं करना चाहिये) ॥७१०॥

जेठ मासकी प्रतिपदा एवं पूर्णिमासीको पूर्वाह्न कालमें वाचनाकी समाप्तिमें एक पाद अर्थात् एक वितस्ति प्रमाण (जांघकी) वह छाया कही गई है। अर्थात् इस समय पूर्वाह्न कालमें बारह अंगुल प्रमाण छायाके रह जानेपर अध्ययन समाप्त कर देना चाहिये ॥७११॥

वही समय (एक पाद) अपराह्नकालमें वाचनाकी विधिमें अर्थात् प्रारम्भ करनेमें कहा गया है। पूर्वाह्नकालमें वाचनाका प्रारम्भ करने और अपराह्नकालमें उसके छोड़नेमें सात पाद (वितस्ति) प्रमाण छाया कही गई है (अर्थात् प्रातः काल जब सात पाद छाया हो जावे तब अध्ययन प्रारम्भ करे और अपराह्नमें सात पाद छाया रहजानेपर समाप्त करे) ॥७१२॥

ज्येष्ठ मासके आगे पौष मास तक प्रत्येक मासमें दो अंगुल

प्रतिक्रमण-आवश्यक

[१३]

प्रमाण वृद्धि होती है। यह क्रमसे वाचना समाप्त करनेकी छायाका प्रमाण कहा गया है ॥१११३॥

इस प्रकार क्रमसे वृद्धि होनेपर पौष मास तक दो पाद हो जाते हैं। पश्चात् पौष माससे ज्येष्ठ मास तक दो अंगुल ही क्रमशः कम होते जाते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥१११४॥

सूत्र और अर्थकी शिक्षाके लोभसे किया गया द्रव्यादिका अतिक्रमण असमाधि अर्थात् सम्यक्त्वादि की विराधना, अस्वाध्याय अर्थात् शास्त्रादिकोंका अलाभ, कलह, व्याधि और वियोगको करता है ॥१११५॥

विनयसे पढ़ा गया श्रुत यदि किसी प्रकार भी प्रमादसे विस्मृत हो जाता है तो परभवमें वह उपस्थित हो जाता है और केवलज्ञानको भी प्राप्त कराता है ॥१११६॥

[१४]

“सामायिक” का स्वरूप, लाभ एवं उसके भेद

राग-द्वेष रहित, आय-उपयोग की प्रवृत्ति। राग-द्वेष की परिणति का अभाव करके साम्यभावरूप परिणति को प्राप्त करना ‘सामायिक’ है। सम-राग-द्वेष की निवृत्ति, आय-प्रशमादिरूप ज्ञान का लाभ। राग-द्वेष में माध्यस्थ भाव रखना ‘सामायिक’ है। मोह-क्षोभ रहित आत्मा का परिणाम ही ‘सामायिक’ है। सम्यक्त्व, ज्ञान, संयम और तप इन चार प्रकार की अवस्था को ‘सामायिक’ कहते हैं। अपने स्वरूप की साधना में भूल न हो जाय उसके लिए शरीर की शुद्धि के साथ शुद्ध कपड़े पहन कर एकान्त में स्थिरता पूर्वक अपने शुद्ध स्वरूप का विचार करना ही ‘सामायिक’ है।

‘सामायिक’ क्यों करना चाहिये :-

आर्त्तध्यान, रौद्रध्यान रूप संसार प्रवृत्ति की निवृत्ति और धर्मध्यान रूप प्रवृत्ति में सर्व जीवों के प्रति वैर विरोध को त्यागकर संयम तप और त्याग भावना के भावरूप उदासीनता को प्राप्त कर समताभाव की सिद्धि के लिए सामायिक करने में आवे तो वह वीतरागता की प्राप्ति का कारण है।

‘सामायिक’ आत्म कल्याण के हेतु करने में आती है। जितने-जितने अंशों में विषय कषाय घट जावे और परिणामों में वीतरागता व शान्ति बढ़ती जावे, उतने-उतने अंशों में धर्मस्थान की प्राप्ति के लिए मुमुक्षुओं का सामायिकादि षट् आवश्यक करना परम कर्तव्य है।

‘सामायिक’ करने से लाभ :-

‘सामायिक’ करने वाले मुमुक्षु के सब प्रकार के पापोंसे

[१५]

रुककर सातिशय पुण्य का बन्ध होता है। भावपूर्वक सामायिक करने से सुख और शान्ति की प्राप्ति होती है। आत्मत्व की प्राप्ति का मूल कारण ‘सामायिक’ ही है। एकाग्रतारूप साम्यता से ही जीव को निष्कर्मरूप अवस्था प्राप्त होती है।

अभव्य जीव को भी ‘द्रव्य-सामायिक’ के प्रभाव से नौवें ग्रैवेयक के अहमिन्द्र पद की प्राप्ति हो जाती है, तो फिर ‘भाव-सामायिक’ से केवलज्ञान क्यों नहीं प्राप्त होगा? अवश्य होगा।

‘सामायिक’ करने से पंचेन्द्रिय-विषय एवं अंतरंग कषाय का नाश होता है और पदार्थ के प्रति ममता छूट जाती है। छह काय के जीवों के प्रति समता प्रकट होती है।

‘सामायिक’ का प्रारम्भिक अभ्यासी श्रावक शुभोपयोग से सातिशय पुण्य बांध कर अभ्युदय युक्त सर्व सुख भोग कर मनुष्य भव की प्राप्ति करता है; और फिर निर्ग्रन्थ-मुनि होकर शुद्धोपयोग को प्राप्त करके संवर पूर्वक समस्त कर्मों की निर्जरा करते हुए मोक्षपद की प्राप्ति कर लेता है।

‘सामायिक’ करने का स्थान :-

जिस स्थान में, चित्त में विक्षेप करने के कारण न हों, जहाँ अनेक लोगों के वाद-विवादिका कोलाहल न हो, अधिक असंयमी जीवों का आवागमन न हो, स्त्रियों का, नपुंसकों का, विशेष जाना जाना न हो, गीत, नृत्य वाद्य यंत्रों आदि का प्रचार समीप में न हो, तिर्यंचों एवं पक्षियों का संचार न हो, जहाँ बहुत शीत तथा उष्णता की, प्रचण्ड पवन की, वर्षा की बाधा न हो, डाँस, मच्छर, मक्खी, सर्प, बिच्छु इत्यादि जीवों के द्वारा कोई बाधा न हो, ऐसे विक्षेप रहित एकान्त स्थान हो, वन हो या जीर्ण बाग में मकान

[१६]

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

हो, गृह हो, चैत्यालय हो या धर्मला पुरुषों का प्रोषधोपवास करने का स्थान हो, ऐसे एकान्त विक्षेप रहित स्थान में प्रसन्नचित्त होकर, समस्त मन के विकल्पों को छोड़कर ‘सामायिक’ करनी चाहिये।
(रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक ९९ के आधार से)

‘सामायिक’ प्रारम्भ करने की विधिः-

“सामायिक” प्रारम्भ करने से पहिले अपनी इन्द्रियों के विषय-व्यापार से विरक्त होकर अपने केश-वस्त्रादि को यथाविधि बाँध लेना चाहिए, जिससे के सामायिक करते समय क्षोभ न हो। सामायिक के काल में खान, पान, व्यापार, रोजगार, लेन-देन विकथा, आरम्भ, समारंभ विसंवादादि समस्त पाप क्रियाओं को मन-वचन-काय-कृत-कारित अनुमोदना से त्याग कर एवं मर्यादा के बाहर क्षेत्र में नियत समय तक हिंसादि पांच पापों को सर्वथा त्याग कर राग-द्वेष रहित सकल जीवों पर समता भाव धारण कर; आर्त, रौद्र ध्यान छोड़कर एक चिदानन्द स्वरूप शुद्धात्मा का ध्यान करने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए।

“अहं समस्त सावद्ययोगगंरतोस्मि”

“मैं समस्त सावद्ययोग का त्याग करता हूँ।” ऐसे कहकर पूर्व या उत्तर दिशा में मुँह करके दोनों हाथों को सीधा लटका कर दोनों पावों के बीच में चार अंगुल की जगह रखकर नासादृष्टि लगाकर कायोत्सर्ग पूर्वक आसन पर खड़ा होकर अरहंत सिद्ध भगवान की साक्षी से दो घड़ी ४८ मिनिट तक “सामायिक” करने की आज्ञा लेकर प्रतिज्ञा करनी चाहिये।

मेरी सामायिक काल की मर्यादा पूर्ण न हो जाय, तब तक मैं दूसरे स्थान का एवं परिग्रह का त्याग करता हूँ, पुनश्च अपनी

[१७]

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

देह पर रहे हुए परिग्रह एवं शरीर के प्रति ममता का त्याग करने के अभ्यास पूर्वक नौ बार ‘णमोकार मन्त्र’ का जाप्य मन में बोलकर, ३ आवर्त ए एक शिरोनति करनी चाहिये। इसी प्रकार चारों दिशाओं में से प्रत्येक में नौ बार णमोकार मंत्र का जाप्य, ३ आवर्त व एक शिरोनति करनी चाहिये। (दोनों हाथ जोड़कर बाई ओर से दाहिनी ओर ले जाते हुए घुमाना आवर्त है और मस्तक झुकाना शिरोनति है) प्रत्येक दिशा में पंच परमेष्ठी है, उस दिशा में विद्यमान तीन लोक के कृत्रिम-अकृत्रिम जिन चैत्यालयों को नमस्कार करें। बाद में जिस दिशा से आज्ञा ली है, उस दिशा में अघंग नमस्कार करके तीन बार नमोऽस्तु, नमोऽस्तु, नमोऽस्तु बोलकर आसन लगाना चाहिए और फिर सामायिक पूर्ण होने तक उस आसन को नहीं बदलना चाहिए। किसी प्रकार की विघ्न-बाधा आने पर भी अपने आसन को नहीं छोड़ना चाहिए।

आसन लगाने की विधिः-

(१) खड़गासन-अपने दोनों पैरों को चार अंगुल के फासले से रखकर दोनों हाथ को सीधा लटका कर सीधा खड़ा होने को “खड़गासन” कहते हैं।

(२) पद्मासन-दाहिनी जाँघ पर बायें पैर, बाईं जाँघ पर दाहिने पैर को रखकर गोद में बायें हाथ की हथेली को नीचे रखकर दाहिने हाथ की हथेली को ऊपर रख कर सीधा बैठने को “पद्मासन” कहते हैं।

(३) अर्द्धपद्मासन-बायें पैर की जाँघ के ऊपर दाहिना पैर रखकर पद्मासन की भाँति हाथों की हथेलियों को रखकर सीधा बैठने को “अर्द्धपद्मासन” कहते हैं।

“सामायिक” करते समय पूर्व दिशा में इन आसनों में से कोई

[१८]

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

एक आसन लगाकर आँखों को आधी खुली रखकर सौम्य नासादृष्टि से उपयोग को (तत्त्वों के ज्ञेयों की), तत्वदृष्टि (प्रष्ट द्रव्य व उनकी गुणपर्यायों) पर लगाना चाहिये। (सामायिक काल में मौन पूर्वक शान्त चित्त से प्रमाद छोड़कर उत्साह पूर्वक “सामायिक” करना चाहिये। मनोवृत्ति की शुद्धि से चित्त शान्त होता है और उपयोग निश्चल दशा को प्राप्त होता है। शुद्धात्म स्वरूप में उपयोग की स्थिरता करना ही यथार्थ ‘सामायिक’ है।)

यदि सामायिक का पाठ याद न हो तो इस पुस्तक में जिस क्रम से सामायिक के पाठ छपे हैं, उसके अनुसार शुद्ध उच्चारण करें। साथ में अपने दूसरे साथी हों तो उनके स्वर में स्वर मिलाकर पाठ करें, पाठ का भाव बराबर समझते रहना चाहिये।

सामायिक में णमोकार मंत्र, अ सि आ उ सा नमः अरहंतसिद्धाचार्योपाध्याय सर्वसाधुभ्यो नमः; अरिहंत सिद्ध, ॐ ह्रीं अर्ह अ सि आ उ सा नमः, ॐ नमः सिद्धेभ्यः, मंत्र का १०० बार जाप करें। जाप पूरे होने पर पूर्वोक्त लिखे अनुसार पुनः चारों दिशाओं में णमोकार मंत्र पूर्वक नमस्कार करें।

(सूत्र की जापमाला में १०८ दाने होते हैं। उनका रहस्य यह है कि गृहस्थ समरम्भ, समारम्भ, आरम्भ ये तीन मन-वचन और काय से स्वयं करते हैं, कराते हैं जो क्रोध, मान, माया, लोभ में होकर करते हैं, इसलिए इनके परस्पर गुणने से १०८ कर्मास्रव के भंग होते हैं। कोई भी पापकार्य उक्त प्रकार से होता रहता है जिससे अशुभ-कर्म बंधता है इसके रोकने का उपाय ‘सामायिक’ है।)

‘सामायिक’ पूर्ण करने की विधिः-

सामायिक काल में मन, वचन, काय की प्रवृत्ति में ३२ दोषों

प्रतिक्रमण-आवश्यक

में से कोई भी दोष जाने-अनजाने प्रमादवश हो गया हो तो अरहन्त भगवान से क्षमा माँगनी चाहिए।

सामायिक पाठ बोलने में मात्रा, बिन्दी, पद, अक्षर, गाथा सूत्र आदि का हीनाधिक, विपरीत, अशुद्ध-उच्चारण किया हो या और कोई दोष लग गया हो तो उनकी भगवान से क्षमा माँगनी चाहिये।

सामायिक काल में मन, वचन, काय से आत्मभावना में न ठहर कर उपयोग को अशुभ भावों में (मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग) असावधानी से लगाया हो या और किसी प्रकार का पाप दोष लगा हो तो भगवान से क्षमा माँगनी चाहिए।

सामायिक में अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार, जान से, अनजान से किसी प्रकार का पाप दोष प्रमादजन्य हो गया हो तो भगवान से क्षमा माँगनी चाहिए।

इस तरह क्रिया करने के बाद ६ बार ‘णमोकार मन्त्र’ का जाप्य करके “सामायिक” पूर्ण करनी चाहिए।

‘सामायिक’ के छः भेद :-

१. नाम-सामायिक-शुभ-अशुभ नाम को सुनकर राग-द्वेष नहीं करना, सो ‘नाम-सामायिक’ है।

२. स्थापना-सामायिक-कोई स्थापना प्रमाणादिक से सुन्दर है और प्रमाणादि से हीनाधिक होने से असुन्दर है। उनके प्रति राग-द्वेष का अभाव, सो ‘स्थापना-सामायिक’ है।

३. द्रव्य-सामायिक-सुवर्ण, चाँदी, रत्न, मोती इत्यादि एवं मिट्टी, काष्ठ, पाषाण, कण्टक, राख, भस्म, धूलि इत्यादि में राग-द्वेष रहित सम देखना, सो ‘द्रव्य-सामायिक’ है।

४. क्षेत्र-सामायिक-महल, उपवनादिक रमणीक, श्मशानादिक अरण्यक क्षेत्र में राग-द्वेष छोड़ना सो ‘क्षेत्र-सामायिक’ है।

५. काल-सामायिक-हिम, शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद ऋतु में और रात्रि; दिवस व शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष इत्यादि काल में राग-द्वेष का वर्जन, सो काल-सामायिक है।

६. भाव-सामायिक-समस्त जीवों के दुःख न हो ऐसे मैत्रीभाव से तथा शुभ-अशुभ परिणामों के अभाव को ‘भाव-सामायिक’ कहते हैं।

वैर-त्याग चिन्तन :-

“सामायिक” करने वाला समस्त जीवों में मैत्री धारण करता हुआ परम क्षमा को धारण करता है। कोई जीव मेरा वैरी नहीं है, अज्ञानवश उपार्जन किया मेरा कर्म ही वैरी है। मैंने स्वयं अज्ञान भाव से क्रोधी, मानी, लोभी होकर विपरीत परिणाम किये। जिस वस्तु-व्यक्ति से मेरा अभिमान पुष्ट नहीं हुआ उसको वैरी माना, किसी ने मेरी प्रशंसा-स्तुति नहीं की, उसी को वैरी समझा। मेरा आदर-सत्कार नहीं किया व उच्च-स्थान नहीं दिया उसको वैरी समझा। किसी ने मेरे दोषों को प्रगट किया उसको वैरी जाना-सो यह सब मेरी कषाय से, दुर्बुद्धि से अन्य जीवों में वैर-बुद्धि उपजी है, इसको छोड़कर क्षमा अंगीकार करता हूँ और अन्य समस्त जीव मेरा अज्ञान भाव जानकर मुझे क्षमा करें।

आत्म चिन्तन

समस्त दिन में प्रमाद के वश होकर तथा कषायों के वशीभूत होकर अथवा विषयों में रागी-द्वेषी होकर किन्हीं एकेन्द्रियादिक जीवों का घात किया तथा अनर्थक प्रवर्तन किया व सदोष भोजन किया अथवा किसी जीव के प्राणों को पीड़ा पहुँचाई तथा कर्कश-कठोर मिथ्या वचन कहे अथवा किसी की विक्रिया की अथवा अपनी प्रशंसा करी अथवा अदत्त धन ग्रहण किया अथवा पर के धन में लालसा करी तथा पर की स्त्री में राग किया तथा धन परिग्रह आदि में लालसा करी, ये समस्त पाप खोटे किए - अब ऐसे पापरूप परिणाम से भगवान पंच परमेष्ठु, हमारी रक्षा करें। ये सब परिणाम मिथ्या हैं। पंच परमेष्ठी के प्रसाद से हमारे पापरूप परिणाम न हों। ऐसे भावों की शुद्धता के लिए कायोत्सर्ग करके पंच नमस्कार पूर्वक नौ बार जाप करें।

‘सामायिक’ करने की विधि

शरीर से शुद्ध होकर शुद्ध वस्त्र पहनकर किसी मन्दिर आदि एकान्त स्थान में ‘सामायिक’ करना चाहिए। प्रत्येक दिशा में तीन आवर्त व एक शिरोनति करके नमस्कार पूर्वक अपने आसन पर बैठना चाहिए व सामायिक की प्रत्येक क्रिया को मनन पूर्वक करना चाहिए। मन को पवित्र रखना चाहिए, जब तक सामायिक पूर्ण न हो अपने आसन को नहीं छोड़ना चाहिए। छोटे बालकों को अपने पास नहीं बैठाना चाहिए।

‘सामायिक’ के बाद एक वहत् कायोत्सर्ग करना चाहिए जिसमें कम से कम २७ बार या १०८ बार णमोकार मन्त्र का जाप करना चाहिए। सामायिक के समय दृष्टि व मन पर कड़ा नियन्त्रण रखना चाहिए। अन्त में पूर्ववत् ही दिशा वंदन करना चाहिए।

‘सामायिक’ पाठ प्रारंभ

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं।
चत्तारि मंगलं, अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं,
साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा, अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा,
साहू लोगुत्तमा, केवलि पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरहंते सरणं पव्वज्जामि,
सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि,
केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि।

ॐ ह्रीं सर्व शान्ति कुरु कुरु स्वाहा।।

भावार्थ—अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्व साधुओं को
नमस्कार हो। संसार में अरहंत, सिद्ध साधु, केवलिप्रणीत, धर्म ये
ही चार मंगल रूप हैं। ये ही चार उत्तम हैं, ये ही चार परम शरण
हैं। ये सर्व प्रकार शान्ति करें।

(ईर्यापथ शुद्धि पाठ)

श्लोक- ईर्या पथे प्रचलिताय मया प्रमादा,
देकेन्द्रिय प्रमुख जीव निकाय बाधा।
निर्वर्तिता यदि भवेद् युगान्तरेवा,
मिथ्यात्वदास्तु दुरितं गुरु भक्ति तो मे।।

भावार्थ—हे भगवन्! मार्ग में चलते हुए मुझसे प्रमाद वश बिना
देखे एकेन्द्रियादिक जीव की हिंसा हुई हो तो, वह आपकी भक्ति
से मिथ्या होवे।

(ईर्यापथ प्रतिक्रमण)

पडिक्कमामि भंते ईरियावहियाए विराहणाए
अणुग्गए अइग्गए णियग्गए ठाणेणगमे
चंकमणे पाणुग्गमे बीजुग्गमे हरिदुग्गमे
उच्चार पसवण खेल सिंघाणय विड्डी
पडिबुग्गणाए जे जीवा एइंदिया वा बेइंदिया वा
तेइंदिया वा चउरिंदिया वा पंचेंदिया वा णोल्लिदा
वा पिल्लिदा वा संधादिदा वा ओहादिदा वा
परिदाविदा वा किरिछिदा वा लोसिदा वा
छिद्दिदा वा भिन्दिदा वा ठाणदो वा ठाण-
चंकमणदो वा तस्स उत्तर गुणं तस्स
पायच्छित्तकरणं तस्स विसोही करणं जावरहंताणं
भयवंताणं णमोक्कारं करोमि।

भावार्थ—हे भगवन्! मेरे चलन में जीवों की हिंसा हुई हो तो
उसके लिये मैं प्रतिक्रमण करता हूँ।

यथा मन-वच-काय को वश में न रखने, बहुत चलने, इधर
उधर फिरने तथा द्विइन्द्रियादि प्राणियों पर पैर रखकर चलने में मल,
मूत्र, थूक, नाक-मल मिट्टी वगैरह डालने से एकेन्द्रियादि पंचेन्द्रिय
प्राणी अपने स्थान पर जाने से रोके गये हों, दूसरी जगह डाले
गये हों, संघर्षित किये, कराये हों, दूसरे पर डाले गये हों, तपाये
गये हों, काटे गये हों, मूर्छित किये गये हों, छेदे गये हों, और
अपने स्थान से जाते हुए पृथक्-पृथक् किये गये हों, तो मैं उसका
प्रायश्चित्त करता हूँ, दोषों की शुद्धि के लिये भगवान अरहंत को
नमस्कार करता हूँ।

तावकाय पावकम दुच्चरियं वोस्सरामि।
कायोत्सर्गं करोम्यहं।।
(नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिये)

(ईर्यापथ आलोचना)

इच्छामि भंते ईरिया वह मालोचेउं पुव्वुत्तर
दक्खिण पच्छिम चउ दिसासु विदिसासु
विहरमाणेण जुगुत्तर विट्ठाणा दड्ढव्वा डव डव
चरियाये पमाददोसेण पाणुभूद जीव सत्तार्ण
एदेसिं उवघादो कदो वा कारिदो वा किरित्तो
वा समणुण्णिदो वा तस्स भिक्खामि दुक्कडं।।

भावार्थ—हे भगवन्! मैं ईर्यापथ की आलोचना करता हूँ।
पूर्वोत्तर दक्षिण पश्चिम चारों दिशा और ईशानादि विदिशाओं में इधर
उधर फिरने और ऊपर की ओर दृष्टि कर चलने में मैंने प्रमादवश
द्विइन्द्रियादिक प्राणियों का घात किया हो कराया हो वा अनुमति दी
हो वे पाप मिथ्या होवें।

(दिग्वंदना)

(तीन आवर्त व एकशिरोनति प्रति दिशा में करना चाहिये।)
(पूर्व की ओर मुख करके पढ़े)

प्राग्दिग्वंदनात्तः केवलि जिन सिद्ध साधु
गणदेवाः ये सर्वदिक्समुद्राः योगीशास्तान्ह वन्दे।

भावार्थ—पूर्व दिशा में अरहंत, सिद्ध, साधु, केवलि,

प्रतिक्रमण-आवश्यक

[ २५

कृत्रिमकृत्रिम, जिन चैत्य, चैत्यालय जहां-जहां हों उनको मेरा मन से, वचन से, काय से बारम्बार नमस्कार होवे।

(दक्षिण की ओर मुख करके पढ़े)

दक्षिण दिग्दिगन्तरतः केवलि जिन सिद्ध साधु गणदेवाः ये सर्वद्धि समुद्रा योगीशस्तानहं वंदे।

भावार्थ—दक्षिण दिशा विदिशा में अरहंत, सिद्ध, साधु, केवलि, कृत्रिमकृत्रिम, जिन चैत्य, चैत्यालय जहां जहां हों उनको मेरा मन से, वचन, काय से बारम्बार नमस्कार होवे।

(पश्चिम की ओर मुख करके पढ़े)

पश्चिम दिग्दिगन्तरतः केवलि जिन सिद्ध साधु गणदेवाः ये सर्वद्धि समुद्रा योगीशस्तानहं वंदे।

भावार्थ—पश्चिम दिशा विदिशा में अरहंत, सिद्ध, साधु, केवलि, कृत्रिमकृत्रिम, जिन चैत्य, चैत्यालय जहां जहां हों उनको मेरा मन से, वचन से, काय से बारम्बार नमस्कार होवे।

(उत्तर की ओर मुख करके पढ़े)

उत्तर दिग्दिगन्तरतः केवलि जिन सिद्ध साधुगण देवाः ये सर्वद्धि समुद्रा योगीशस्तानहं वंदे।

भावार्थ—उत्तर दिशा विदिशा में अरहंत, सिद्ध, साधु, केवलि, कृत्रिमकृत्रिम, जिन चैत्य, चैत्यालय जहां जहां हों उनको मेरा मन से, वचन से, काय से बारम्बार नमस्कार होवे।

(पश्चात् दण्डवत् प्रणाम करके अपने आसन पर स्थिर चित्त से बैठ जाना चाहिये।)

[ २६ ]

प्रतिक्रमण-आवश्यक

(सामायिक करने की प्रतिज्ञा)

भगवन् नमोऽस्तुते एषोऽहमय अपराहिक देव वंदना करिष्यामि (सामायिक स्वीकारः)

भावार्थ—हे भगवन् ! मैं आपको नमस्कार करता हुआ संध्या काल की देव वंदना में सामायिक स्वीकार करता हूँ। अर्थात् सामायिक काल पर्यन्त किसी प्रकार का आरंभ नहीं करूंगा और न इस स्थान को छोड़कर स्थानान्तर गमन करूंगा तथा जो मेरे शरीर पर परिग्रह है उससे निर्ममत्व होता हुआ अन्य सब परिग्रहों को छोड़ता हूँ।

(यहां समय की मर्यादा कर लेना चाहिये)

(सामायिक में चिन्तन)

(श्लोक)

सिद्धं सम्पूर्ण भव्यार्थ सिद्धेः कारणं मुत्तमम्। प्रशस्त दर्शन ज्ञान चारित्रं प्रतिपादनम्।।

भावार्थ—सम्पूर्ण भव्यों के लिये इष्ट सिद्धि के सर्वोत्तम कारण तथा सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के प्रतिपादन करने वाले अनंतानंत सिद्धों को मेरा नमस्कार हो।

(श्लोक)

सुरेन्द्र मुकुटाश्लिष्टपाद पद्धांशु केशरम्। प्रणमामि महावीरं लोक त्रितय मंगलम्।।

भावार्थ—प्रमाण करते हुये इन्द्रों के मुकुटों पर जिन प्रभु के चरणों की प्रभा प्रकाशन हो रही है ऐसे तीनों लोकों के मंगल स्वरूप श्री वर्धमान स्वामी को नमस्कार हो।

[ २७ ]

प्रतिक्रमण-आवश्यक

(श्लोक)

सिद्ध वस्तु ववो भक्ता सिद्धानु प्रणमतां सदा। सिद्ध कार्याः शिवं प्राप्ताः सिद्धदत्तुनोऽभयाम्।।

भावार्थ—सिद्ध हो चुके हैं समस्त कार्य जिनके तथा परम सुख को प्राप्त हुए सम्पूर्ण सिद्धों को भक्तिवश हम प्रणाम करते हैं। वे सिद्ध प्रभु हमें अविनाशी मोक्ष सिद्धि प्रदान करें।

(श्लोक)

नमोऽस्तु श्रुत पापेभ्यः सिद्धेभ्यः ऋषि परिषदे। सामायिक प्रपचेऽहं भव-भ्रमण सूदनम्।।

भावार्थ—मैं निर्दोष सिद्धों को तथा मुनि समुदाय को नमस्कार करता हूँ तथा संसार के परिभ्रमण को नाश करने वाली सामायिक को धारण करता हूँ।

(श्लोक)

दव्वे खेत्ते काले भावेय कदा वराहसो हयणम्। णिन्दण गरहण जुत्तो मण, कायेण पाडिकमणम्।।

भावार्थ—द्रव्य, क्षेत्र, काल भाव, से मैंने कभी किसी की निन्दा, गर्हा की हो तो मैं मन, वचन, काय से उसका प्रतिक्रमण (पश्चाताप) करता हूँ।

(श्लोक)

खम्माम सव्वजीवाणं, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्तिमे सव्व भूदेसु, वैरंमज्झ ण केणवि।।

अर्थ—मैं सब जीवों को क्षमा करता हूँ सब जीव मुझ पर

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

क्षमा करें मेरा सब प्राणियों से मैत्री भाव है किसी से बैर भाव नहीं है।

(श्लोक)
समता सर्व भूतेषु संयमः शुभ भावना।
आर्त रौद्र परित्याग स्तद्धि सामायिकं व्रतम्॥
अर्थ—सर्व प्राणियों में सम भाव रखना संयम पालन करना, पवित्र भाव रखना तथा आर्त—रौद्र परिणामों को छोड़ना ही सच्चा सामायिक व्रत है।

(श्लोक)
साम्य मे सर्व भूतेषु, वैर मम न केनचित्।
आशा सर्वाः परित्यज्य समाधि महमाश्रये॥
अर्थ—मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समता रखता हूँ किसी से बैर भाव नहीं है। मैं सर्व आशाओं को छोड़कर समाधि का आश्रय लेता हूँ।

(श्लोक)
रागात् द्वेषात् ममत्वादा हा मया ये विरधिताः।
क्षम्यन्तु जन्तवस्ते मे, तेभ्यो क्षाम्याम्यहं पुनः॥
अर्थ—राग, द्वेष अथवा मोह से मैंने किसी जीव का विराधन किया हो तो वे मुझ पर क्षमा करें, मैं भी उनसे बार-बार क्षमा चाहता हूँ।

(श्लोक)
मनसा, वपुषा वाचा, कृत कारित सम्मतैः।
रत्नत्रये भवाः दोषात् गृहं निन्दामि वर्जये॥

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

अर्थ—मन, वचन, काया से अथवा कृत कारित, अनुमोदना, से मैंने अपने रत्नत्रय में जो दोष लगाये हों उनकी मैं निन्दा गर्हा करता हूँ और उनका परित्याग करता हूँ।

(श्लोक)
तैरश्च, मानर्व, देवमुपसर्ग सहेडुना।
काया-हार कषायादीन्, प्रत्याख्यामि त्रिशुद्धितः।
अर्थ—तिर्यञ्च, मनुष्य या देव कृत उपसर्ग को मैं इस समय धैर्य पूर्वक सहन करूँगा तथा शरीर आहार व कषायों को मन, वचन, काय से छोड़ता हूँ।

(श्लोक)
रागं द्वेषं भयं शोकं प्रहर्षोत्सुक्यदीनताः।
व्युत्सृजामि त्रिधा, सर्वां मरतिं रतिमेव च॥
अर्थ—मैं राग, द्वेष, भय, शोक हर्ष, विषाद दीनता तथा सब प्रकार की प्रीति और अप्रीति को मन वचन काय से छोड़ता हूँ।

(श्लोक)
जीवितें मरणे लाभाऽलाभे योगे विपर्यये।
बन्धुवारौ सुखे दुःखे सर्वदा समता मम॥
अर्थ—जीवन, मरण, लाभ–हानि, योग–वियोग, बन्धु–शत्रु, तथा सुख–दुःख में मेरे सदा समता भाव रहे।

(श्लोक)
आत्मैव मे सदा ज्ञाने दर्शने चरणे तथा।
प्रत्याख्याने ममात्मैव, तथा संवरयोगयोः॥

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

अर्थ—सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र तथा प्रत्याख्यान संवर और योग मम आत्म स्वरूप हैं अर्थात् आत्मा से ये कोई भिन्न पदार्थ नहीं हैं।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2442.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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