प्रातःकाल हुआ सुखकारी, भाओ आत्म-भावना प्यारी।। टेक ।।
पंचम भाव स्मरण कर लो, मैं ज्ञायक हूँ अनुभव कर लो।
मैं अनादि से ही मंगलमय, मरण-जन्म से रहो सु निर्भय।।
सहज अकर्त्ता नित अविकारी, भाओ आत्म-भावना प्यारी।। 1 ।।
सब संसार असार दुःखमय, समयसार ही नित आनंदमय।
[अनेकान्तमय वस्तु स्वरूप, शाश्वत धर्म अहिंसा रूप।।
सम्यक् समता ही हितकारी, भाओ आत्म-भावना प्यारी।। 2 ।।
व्यर्थ मोह से जीव भ्रमावे, भेदज्ञान से शिवपद पावे।
ज्ञानाभ्यास करो रे भाई, और उपाय महा दुखदाई।।
रत्नत्रय ही मंगलकारी, भाओ आत्म-भावना प्यारी।। 3 ।।
ध्रुव परमेष्ठी जब ही ध्यावें, तब ही सुप्रभात कहलावे।
सब संकल्प-विकल्प विनाशे, सहज स्वाभाविक सुगुण प्रकाशे।।
त्रिजग पूज्य पद हो अविकारी, भाओ आत्म-भावना प्यारी।। 4 ।।
रचयिता:- बा० ब्र० रवीन्द्र जी आत्मन्
Source: - जिनवर स्तवन