प्राणीलाल ! धरम अगाऊ धारौ | Pranilaal ! Dharam agau dhaaro

प्राणीलाल ! धरम अगाऊ धारौ |
जबलौं धन जोवन हैं तेरे, दान शील न विसारौ || टेक ||

जबलौं करपद दिढ़ हैं तेरे, पूजा तीरथ सारौ |
जीभ नैन जबलों हैं नीके, प्रभु गुन गाय तिहारौ || १ ||

आसन श्रवण सबल हैं तोलौं, ध्यान शब्द सुनि धारौ |
जरा न आवै गद न सतावै, संजम पर उपकारौ || २ ||

देह शिथिल मति विकल न तौलों, तप गहि तत्त्वविचारो |
अन्त समाधि पोत चढ़ि अपनो, ‘घानत’ आतम तारो || ३ ||

Artist- पं. घानतराय जी

खोज: Pranilal ! Dharam agau dharo

अर्थ

हे प्राणी, हे लाल! अब तुम पहले धर्म-धारण करो। जब तक यौवन व धन तुम्हारे पास हैं, तुम दान, शील व संयम को मत भूलो।

हे प्राणी ! जब तक हाथ-पाँवों में दृढ़ता है, शक्ति है तब तक पूजा करो, सब तीर्थं-क्षेत्रों की यात्रा करो। जब तक जीभ व आँखों में शक्ति है अर्थात् वचन-उच्चारण की व देखने की शक्ति भली प्रकार है तब तक अपने प्रभु के गुणों का गुणगान करो, स्तवन-स्मरण करो।

हे प्राणी! जब तक सुनने की और आसन पर अभ्यासपूर्वक बैठने या खड़े होने की शक्ति है तब तक शास्त्र-श्रवणकर हृदय में धारण करो, ध्यान करो। अरे जब तक बुढ़ापा न आवे, रोग न सतावे तुम संयम का पालन करो, अन्य जनों का भला करो, उपकार करो।

हे प्राणी! जब तक देह अशक्त न हो, तब तक तत्त्व-चिंतनकर तप-साधन करो, उनके निर्वाह का अभ्यास करो। तत्पश्चात् अन्त समय में समाधिरूपी जहाज पर चढ़कर इस आत्मा को भवसागर के पार करलो, तार दो, ऐसा ह्यानतराय कहते हैं।

शब्दार्थ: अगाऊ = पहले, अग्रिम; गद = रोग।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

:paperclip: मूल पृष्ठ (छवि):

प्रूफरीडिंग बाकी है