प्रमेय का स्वरूप | Pramey Ka Svarup

प्रमेय का स्वरूप

-प्रो. वीरसागर जैन

भूमिका

जैन न्याय का एक वैशिष्ट्य यह भी है कि इसमें केवल प्रमाण का ही वर्णन नहीं किया गया है, अपितु उसके साथ प्रमेय, प्रमाता, प्रमिति (प्रमाणफल) का भी वर्णन किया गया है । यहाँ हम प्रमेय के स्वरूप पर संक्षेप में विचार करना चाहते हैं ।

प्रमेय का स्वरूप-निरूपण जैन नैयायिकों का अत्यन्त प्रिय एवं प्राथमिक विषय रहा है । प्रायः सभी न्यायग्रन्थों में, प्राथमिक न्यायग्रन्थों में भी, प्रमेय के स्वरूप का निरूपण उपलब्ध होता है । कहीं-कहीं तो इस विषय पर पूरा एक स्वतन्त्र अध्याय तक मिलता है । जैसे कि ‘परीक्षामुख’ में चतुर्थ अध्याय पूरा का पूरा मात्र प्रमेय के स्वरूप को ही स्पष्ट करने के लिए लिखा गया है और फिर उसके आधार से उसकी सभी टीकाओं में भी इस विषय को स्वतंत्र अध्याय में स्पष्ट किया गया है ।

अनेक जैन-न्याय-ग्रन्थों के तो नाम ही ‘प्रमेय’ शब्द पर आधारित रखे गये हैं । जैसे कि- प्रमेयकमलमार्तण्ड (प्रभाचन्द्र), प्रमेयरत्नमाला (अनन्तवीर्य), प्रमेयरत्नाकर (आशाधरसूरि), प्रमेयरत्नकोश (चन्द्रप्रभसूरि), प्रमाप्रमेय (भावसेन), प्रमेयरत्नसार (शान्तिषेण) इत्यादि । इससे भी सिद्ध होता है कि जैन न्याय में प्रमेय-स्वरूप के प्रकाशन पर भी विशेष बल दिया गया है ।

प्रमेय का अर्थ, व्युत्पत्ति एवं पर्यायवाची

प्रमाण के विषय को प्रमेय कहते हैं । जिसप्रकार ध्यान के विषय को ध्येय कहते हैं, ज्ञान के विषय को ज्ञेय कहते हैं, श्रद्धा के विषय को श्रद्धेय कहते हैं, उसीप्रकार प्रमाण के विषय को प्रमेय कहते हैं।

‘प्रमेय’ शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए जैनाचार्यों ने कहा है कि-

  1. 'प्रमाणविषयः प्रमेयः |'¹
  2. 'प्रमाणेन परिच्छेद्यं प्रमेयं प्रणिगद्यते |'²
  3. 'योऽर्थः प्रमीयते तत्प्रमेयम् |'³ 4. 'द्रव्यपर्यायात्मकं वस्तु प्रमेयम् इति तु समीचीनं लक्षणं सर्वसंग्राहकत्वात् |'4

‘प्रमेय’ शब्द के अनेक पर्यायवाची हैं- ज्ञेय, परिच्छेद्य, वस्तु, अर्थ, पदार्थ, द्रव्य, तत्त्व, आदि

|

प्रमेय का स्वरूप

‘प्रमेय’ शब्द की उपर्युक्त व्युत्पत्तियों एवं पर्यायवाची शब्दों से यद्यपि प्रमेय का सामान्य स्वरूप स्पष्ट हो जाता है, तथापि जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आखिर वह प्रमेय कैसा है, उसका वास्तविक स्वरूप क्या है, अतः जैनाचार्य कहते हैं कि-

“सामान्यविशेषात्मा तदर्थो विषयः |” 5

अर्थात् सामान्यविशेषात्मक अर्थ/पदार्थ/वस्तु ही प्रमाण का विषय है |

तात्पर्य यह है कि प्रमाण का विषय केवल सामान्यरूप या केवल विशेषरूप नहीं होता, सामान्यविशेषात्मक ही होता है ।

दरअसल जैन आचार्यों के अनुसार जगत् में ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है जो केवल सामान्यरूप या केवल विशेषरूप हो | अनेक जैनेतर दर्शन वस्तु को केवल सामान्यरूप या केवल विशेषरूप मानकर उसे प्रमाण का विषय स्वीकार करते हैं, किन्तु जैन आचार्यों की यह सयुक्तिक स्थापना है कि कोई भी वस्तु केवल सामान्यरूप या केवल विशेषरूप हो ही नहीं सकती, अतः वह प्रमाण का विषय भी नहीं हो सकती | केवल सामान्यरूप या केवल विशेषरूप वस्तु को प्रमाण का विषय मानना अवस्तु को विषय मानना है, खरविषाण को विषय मानना है |

कोई जैनेतर दर्शन सामान्यरूप और विशेषरूप दोनों को भी स्वीकार करते हैं, किन्तु वे दोनों को स्वतन्त्र या पृथक् पृथक् स्वीकार करते हैं, अतः यह भी समीचीन नहीं है | जैनाचार्यों के अनुसार प्रत्येक वस्तु सामान्यविशेषात्मक है, उसमें एक साथ दोनों धर्म पाए जाते हैं- सामान्यरूप भी और विशेषरूप भी | उनके अनुसार वस्तु एक साथ सामान्यविशेषात्मक हो तभी वह अपनी अर्थक्रिया कर सकती है, अन्यथा उसमें अर्थक्रिया भी सिद्ध नहीं हो सकती है | तथा सामान्य के बिना विशेष और विशेष के बिना सामान्य की स्थिति भी सम्भव सिद्ध नहीं होती | अतः वस्तु को युगपद् सामान्यविशेषात्मक स्वीकार करना आवश्यक है | सामान्यविशेषात्मक को ही अनेकान्तात्मक भी कहते हैं, जैसा कि श्रीमदभिनव धर्मभूषण यति ने ‘न्यायदीपिका’ में कहा है-

"अथ कोऽयमर्थो नाम ? उच्यते- अर्थोऽनेकान्तः | अर्थ इति लक्ष्यनिर्देशः अभिधेय इति यावत् | अनेकान्त इति लक्षणकथनम् | अनेके अन्ताः धर्माः सामान्यविशेषगुणाः यस्येति सिद्धोऽनेकान्तः |'6

तात्पर्य यह हुआ कि जैन दर्शन के अनुसार प्रमेय सामान्यविशेषात्मक या अनेकान्तात्मक ही है, एकान्तात्मक नहीं |

प्रमेय सामान्यविशेषात्मक कैसे सिद्ध होता है - इसका उत्तर देते हुए आचार्य माणिक्यनन्दी अपने ‘परीक्षामुख’ ग्रन्थ में लिखते हैं कि-

“अनुवृत्तव्यावृत्तप्रत्ययगोचरत्वात् पूर्वोत्तराकारपरिहारावाप्तिस्थितिलक्षणपरिणामेनार्थक्रियोपपत्तेश्च ।”7

यह सूत्र बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और बहुत ही ध्यान से समझने योग्य है | इसमें कहा गया है कि प्रत्येक वस्तु सामान्यविशेषात्मक इसलिए सिद्ध होती है, क्योंकि उसमें एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय होता है और उसमें पूर्व आकार का व्यय, उत्तर आकार का उत्पाद एवं स्थितिलक्षणपरिणामरूप अर्थक्रिया भी होती दिखाई देती है |

यह वही है, यह वही है - इसप्रकार के ज्ञान को अनुवृत्त प्रत्यय कहते हैं और यह वह नहीं है, यह वह नहीं है - इसप्रकार के ज्ञान को व्यावृत्त प्रत्यय कहते हैं | जगत् की कोई भी दो वस्तु देखिए, आपको वे दोनों एक साथ ऐसी भी दिखाई देंगी कि ये समान हैं और ऐसी भी दिखाई देंगी कि ये असमान हैं | इसी का नाम अनुवृत्त-व्यावृत्त प्रत्यय है | न केवल दो वस्तुएं, अपितु एक वस्तु की भी कोई भी दो पर्याय देखी जाएँ तो भी हमें ज्ञात होता है कि ये दोनों एक अपेक्षा से समान भी हैं और अन्य अपेक्षा से असमान भी हैं | यही अनुवृत्त-व्यावृत्त प्रत्यय है और यही सिद्ध करता है कि प्रत्येक वस्तु सदा सामान्यविशेषात्मक है |

सामान्य दो प्रकार का होता है- अनेक वस्तुओं में पाया जानेवाला सामान्य और एक ही वस्तु में पाया जानेवाला सामान्य | अनेक वस्तुओं में पाए जानेवाले सामान्य को तिर्यक् सामान्य कहते हैं और एक ही वस्तु में पाए जानेवाले सामान्य को ऊर्ध्वता सामान्य कहते हैं | जैसा कि ‘परीक्षामुख’ में कहा है-

“सामान्यं द्वेधा तिर्यगूर्ध्वताभेदात् | सदृशपरिणामस्तिर्यक्खण्डमुण्डादिषु गोत्ववत् | परापरविवर्तव्यापिद्रव्यमूर्ध्वता मृदिव स्थासादिषु |”8

अर्थ- सामान्य दो प्रकार का होता है- तिर्यक् सामान्य और ऊर्ध्वता सामान्य | अनेक वस्तुओं में होनेवाली सदृशता को तिर्यक् सामान्य कहते हैं | जैसे कि खण्डी, मुण्डी आदि अनेक प्रकार की गायों में पाया जानेवाला गोत्व | तथा एक ही वस्तु की भूत-भविष्यवर्ती पर्यायों में रहनेवाली सदृशता को ऊर्ध्वता सामान्य कहते हैं | जैसे कि स्थास, कोश, कुसूल आदि सभी पर्यायों में पाया जानेवाला मिट्टीपना |

सामान्य की भांति विशेष भी दो प्रकार का होता है- अनेक वस्तुओं में पाया जानेवाला विशेष और एक ही वस्तु में पाया जानेवाला विशेष | अनेक वस्तुओं में पाए जानेवाले विशेष को व्यतिरेक विशेष कहते हैं और एक ही वस्तु में पाए जानेवाले विशेष को पर्याय विशेष कहते हैं | जैसा कि ‘परीक्षामुख’ में ही आगे कहा है-

“विशेषश्च | पर्यायव्यतिरेकभेदात् | एकस्मिन् द्रव्ये क्रमभाविनः परिणामाः पर्यायाः आत्मनि हर्षविषादादिवत् | अर्थान्तरगतो विसदृशपरिणामो व्यतिरेको गोमहिषादिवत् |” 9

अर्थ- विशेष भी दो प्रकार का होता है- पर्याय विशेष और व्यतिरेक विशेष | एक ही द्रव्य में होनेवाले क्रमभावी परिणामों को पर्याय विशेष कहते हैं | जैसे कि आत्मा में होनेवाले हर्ष, विषाद आदि | अनेक वस्तुओं में पाए जानेवाले विसदृश परिणाम को व्यतिरेक विशेष कहते हैं | जैसे कि पशुओं में पाई जानेवाली असमानता कि यह गो है, यह महिष है, इत्यादि |

कहने का तात्पर्य यह है कि जगत् की प्रत्येक वस्तु सामान्यविशेषात्मक है, क्योंकि उसमें एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय होता है और उसमें पूर्व आकार का व्यय, उत्तर आकार का उत्पाद एवं स्थितिलक्षणपरिणामरूप अर्थक्रिया भी होती दिखाई देती है |

यहाँ ‘परीक्षामुख’ के मूल सूत्रों में सामान्य और विशेष के स्वरूप एवं भेदों को भी भलीभांति समझाया गया है, जो ध्यान से समझने योग्य है | तथा उन्हें समझाने के लिए कतिपय उदाहरण भी दिए गये हैं | हम स्वयं भी ऐसे ही अनेकानेक उदाहरण और भी घटित करके देख सकते हैं, ताकि विषयवस्तु भलीभांति स्पष्ट हो सके | जैसे कि मान लीजिए हमारे समक्ष विविध फल रखे हैं- सेवफल, केला, आम, अनार, संतरा, पपीता आदि | तो यहाँ हमें एक साथ दो प्रकार का ज्ञान हो रहा है- उनमें समानता का भी और उनमें असमानता का भी | समानता का ज्ञान इस प्रकार हो रहा है कि यह भी फल है, यह भी फल है, यह भी फल है और असमानता का ज्ञान इस प्रकार हो रहा है कि यह सेवफल है, यह केला है, यह आम है, यह अनार है, आदि । समानता और असमानता के इसी ज्ञान को ‘परीक्षामुख’ में क्रमशः अनुवृत्त-प्रत्यय एवं व्यावृत्त-प्रत्यय कहा गया है । यह अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय हमें सदा सभी वस्तुओं में होता है । इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक वस्तु सदा सामान्यविशेषात्मक है ।

मान लीजिए कि हमारे समक्ष केवल आम ही आम हैं, किन्तु तब भी हमें उनमें एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय होता है । एक अपेक्षा से लगता है कि वे सभी समान हैं- यह भी आम है, यह भी आम है, यह भी आम है आदि, किन्तु अन्य अपेक्षा से ऐसा भी लगता है कि ये सब अलग-अलग हैं- यह दशहरा है, यह सफेदा है, यह चौसा है, यह लँगड़ा है आदि । इस प्रकार इनमें भी हमें एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय हो रहा है ।

मान लीजिए कि हमारे समक्ष केवल दशहरा आम ही हैं, किन्तु तब भी हमें उनमें एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय होता है । एक अपेक्षा से लगता है कि वे सभी समान हैं- यह भी दशहरा आम है, यह भी दशहरा आम है, यह भी दशहरा आम है आदि, किन्तु अन्य अपेक्षा से ऐसा भी लगता है कि ये सब अलग-अलग हैं- यह छोटा है, यह बड़ा है, यह हरा है, यह पीला है आदि । इस प्रकार हमें यहाँ भी एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय हो रहा है ।

अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय को यहाँ हमने अनेक वस्तुओं में घटित करके देखा, किन्तु यह एक वस्तु में भी घटित होता है । अनेक वस्तुओं में घटित होनेवाले अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय को क्रमशः तिर्यक् सामान्य और व्यतिरेक विशेष कहते हैं । किन्तु यही अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय जब एक वस्तु में घटित किया जाएगा तो उसे क्रमशः ऊर्ध्वता सामान्य और पर्याय विशेष कहेंगे ।

एक वस्तु में घटित होनेवाले अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय को स्पष्ट करने के लिए भी ‘परीक्षामुख’ में अच्छे उदाहरण दिए हैं । उसके अनुसार, मान लीजिए घट की अनेक अवस्थाएँ हैं- स्थास, कोश, कुसूल आदि । तो यहाँ भी हमें एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय हो रहा है । एक अपेक्षा से लग रहा है कि यह भी मिट्टी है, यह भी मिट्टी है, यह भी मिट्टी है, आदि, किन्तु अन्य अपेक्षा से ऐसा भी लग रहा है कि यह अलग है, यह अलग है, यह अलग है, आदि । इस प्रकार एक ही घट की अनेक अवस्थाओं में भी हमें एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय हो रहा है ।

इसी बात को हम आत्मा पर भी घटित करके देख सकते हैं । एक आत्मा में हर्ष, विषाद आदि रूप अनेक अवस्थाएँ हुईं । तो यहाँ भी हमें एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय हो रहा है । एक अपेक्षा से लग रहा है कि यह भी वही आत्मा है, यह भी वही आत्मा है, आदि, किन्तु अन्य अपेक्षा से ऐसा भी लग रहा है कि यह प्रसन्न है, यह खिन्न है, आदि । इस प्रकार एक ही आत्मा की अनेक अवस्थाओं में भी हमें एक साथ अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय होता है ।

कहने का तात्पर्य यही है कि जगत् की कोई भी दो वस्तुएं ले लीजिए, चाहे वे परस्पर कितनी भी समान हों या कितनी भी असमान हों, उनमें आपको अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय होगा ही होगा, नियम से होगा । अथवा एक ही वस्तु की कोई भी दो अवस्थाएँ ले लीजिए, चाहे वे परस्पर कितनी भी समान हों या कितनी भी असमान हों, उनमें भी आपको अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय होगा ही होगा, नियम से होगा ।

अनुवृत्त-व्यावृत्त-प्रत्यय के अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु सदा उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यरूप अर्थक्रिया भी करती रहती है । उसमें निरन्तर नवीन पर्याय का उत्पाद, पूर्व पर्याय का व्यय और स्वभाव की स्थिरतारूप ध्रौव्य भी बना रहता है । जैसे कि स्वर्णघट का व्यय हुआ, स्वर्णमुकुट का उत्पाद हुआ और स्वर्णभाव दोनों में स्थिर रहा ।

इस प्रकार यह भलीभांति सिद्ध होता है कि जगत् की सभी वस्तुएँ सदा सामान्यविशेषात्मक हैं और ऐसी सामान्यविशेषात्मक वस्तु ही प्रमाण का विषय है ।

प्रमेय के भेद

जैनाचार्यों ने प्रमेय के भेद अनेक दृष्टि से निरूपित किये हैं । यथा-

  1. प्रमेय एक प्रकार का है- प्रमाण के विषयरूप । अथवा- सत् रूप ।
  2. प्रमेय दो प्रकार का भी है- जीव और अजीव । अथवा- स्व और पर । अथवा- हेय और उपादेय ।
  3. प्रमेय तीन प्रकार का भी है- शब्द प्रमेय, अर्थ प्रमेय और ज्ञान प्रमेय । अथवा- द्रव्य, गुण, पर्याय के भेद से भी प्रमेय तीन प्रकार का है । अथवा- हेय, ज्ञेय और उपादेय के भेद से भी प्रमेय तीन प्रकार का है ।
  4. प्रमेय चार प्रकार का भी है- नाम प्रमेय, स्थापना प्रमेय, द्रव्य प्रमेय, भाव प्रमेय ।
  5. प्रमेय छह प्रकार का भी है- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल ।

इसप्रकार और भी अनेक भेद-प्रभेद प्रमेय के किये जा सकते हैं | जैनाचार्यों के अनुसार प्रमेय के संख्यात, असंख्यात और अनन्त भेद भी किये जा सकते हैं, किन्तु मुख्य बात यही ध्यान देने योग्य है कि वह सामान्यविशेषात्मक ही होगा, केवल सामान्यरूप या केवल विशेषरूप नहीं हो सकता |

उपसंहार

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रत्येक वस्तु सामान्यविशेषात्मक है और वही प्रमाण का विषय है, प्रमेय है |

सन्दर्भ-

  1. सिद्धिविनिश्चयवृत्ति, 1/23
  2. द्रव्यानुयोगतर्कणा, 11/23
  3. न्यायसूत्रवृत्ति, 1/11
  4. स्याद्वादमंजरी, 10
  5. परीक्षामुख, 4/1
  6. न्यायदीपिका, 3/78
  7. परीक्षामुख, 4/2
  8. परीक्षामुख, 4/3,4,5
  9. परीक्षामुख, 4/6,7,8,9