लेखक: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
आजकल शोधपरक-अध्ययन का प्रभाव स्वाध्यायीजनों पर भी पड़ा है और सभी जिज्ञासु-स्वाध्यायीजन भी प्रत्येक कथन का जिनागम से प्रमाण की अपेक्षा करने लगे हैं और कहते हैं कि ‘‘आप जो बात कर रहे हो, उसका प्रमाण किस आगमग्रन्थ में है ?’’ - यह प्रवृत्ति सुखद तो है; किन्तु उसके अतिरेक से भी कुछ समस्यायें उत्पन्न हो रही हैं; क्योंकि समसामयिक कारणों से जो विसंगतियाँ उत्पन्न हो रही हैं, उन सबके विषय में आगमग्रन्थों में कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं मिलते हैं। कारण यही है कि उस समय ऐसी परिस्थितियाँ ही नहीं थीं कि कोई निर्देश दिया जाता तथा जिनवाणी भी अत्यल्प-परिमाण में ही शेष है।
मुझे धवलाकार महाज्ञानी आचार्य वीरसेन स्वामी का एक उद्धरण स्मरण आ रहा है, जिसमें वे कहते हैं कि -
‘‘पण्णवणिज्जा भावा, अणंतभागो दु अणभिलप्पाणं…’’
अर्थात् ‘‘जितना केवली भगवान् के ज्ञान में आता है, उसका अनंतवाँ-भाग मात्र उनकी दिव्यध्वनि में अभिव्यक्त हो पाता है। और जितना तीर्थंकर-परमात्मा की दिव्यध्वनि में अभिव्यक्त होता है, उसका भी अनंतवाँ-भाग गणधरदेव ग्रहण कर पाते हैं। तथा जितना गणधरदेव ग्रहण करते हैं, उसका भी अनंतवाँ-भाग द्वादशांगी-जिनवाणी में ग्रथित हो पाता है। और जितना द्वादशांगी-जिनवाणी में ग्रथित हुआ था, उसका भी अनंतवाँ-भाग ही वर्तमान ‘समय’ (उपलब्ध आगम) में लिपिबद्ध हो सका है।’’
और हमारे ज्ञानी आचार्य-भगवन्त एवं मनीषीगण लिखकर हमें बारम्बार सावधान करते हैं कि ‘‘जो केवली-भगवान् के ज्ञान में आया है और उन्होंने साक्षात् जितना दिव्यध्वनिरूप उपदेश में बताया है, वही प्रमाण है।’’ उन्हीं के शब्दों में कहा जाये, तो ‘‘केवली-कह्या सो प्रमाण है।’’
तब यह तथ्य गम्भीरता से विचारणीय हो पाता है कि हम आज जो हर बात का प्रमाण आज उपलब्ध-जिनवाणी में खोजते और माँगते हैं? तो क्या आज की हर बात का प्रमाण इसमें मिलना संभव है? मुझे तो ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता है।
मेरे इस कथन का यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि वर्तमान में उपलब्ध- जिनवाणी (मूल-आगमग्रन्थ) की प्रामाणिकता कदापि सन्दिग्धहै। वह एक-एक वर्ण-शब्द-वाक्य के रूप में असन्दिग्धरूप से प्रमाण ही है।
किन्तु आज ऐसे मूल-आगमग्रन्थों के रूप में तो मात्र ‘छक्खंडागमसुत्तं’ (षट्खण्डागमसूत्र) एवं ‘पेज्ज-दोस-पाहुड-सुत्तं’ (कषायपाहुडसूत्र) ही आते हैं। इनके अतिरिक्त जिनके हर वर्ण-शब्द-वाक्य इन मूल-आगमग्रन्थों के समान की अप्रतिम-प्रामाणिकता रखते हैं: ऐसे युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव के वचन/ग्रन्थ ही हैं; क्योंकि वर्तमान आचार्य-परम्परा में एकमात्र युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्ददेव ही ऐसे आचार्य हुये हैं, जो वर्तमान में उपलब्ध-जिनवाणी के इन मूल-आगमग्रन्थों के आम्नाय अर्थात् ‘कर्मप्रवाद’ और ‘आत्मप्रवाद’ के एकमात्र युगपत्-ज्ञाता थे। (इस तथ्य की सप्रमाण-पुष्टि मैं अपने आचार्य कुन्दकुन्ददेव-विषयक अन्य-आलेख में भलीभाँति कर चुका हूँ।)
इनके प्रतिपाद्यों/कथनों के पोषक जितने भी टीकाग्रन्थ एवं अन्य ग्रन्थ हैं, वे भी इन मूल-आगमग्रन्थों के पोषक होने के कारण ही प्रमाण माने जाये हैं; अन्यथा उनके प्रमाणत्व का कोई पारम्परिक-आधार नहीं रह जाता है। इसके अलावा जितने कथन इन मूल-आगमग्रन्थों से अनुप्राणित नहीं हैं, उनकी प्रामाणिकता का तो कोई अन्य आधार ही नहीं कहा जा सकता है।
अब यदि इनकी प्रामाणिकता का कोई आधार हमें चुनना है, तो वह व्यक्ति या ग्रन्थ पर आधारित नहीं हो सकता है। वह होता, तो एकमात्र जिनाम्नाय के किसी न किसी सिद्धान्त पर आधारित ही हो सकता है।
और जैनदर्शन में सर्वमान्य-सिद्धान्त कोई हैं, तो वे हैं ‘अहिंसा’ और ‘अपरिग्रह’; क्योंकि शेष सभी किसी न किसी रूप में इन्हीं में अन्तर्गर्भित हो जाते हैं। अतः मूल-आगमग्रन्थों व युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्ददेव के वचनों के अतिरिक्त जिन कथनों/ग्रन्थों/लेखकों की प्रामाणिकता हमें तलाशनी है, तो उन्हें इन्हीं दो सिद्धान्तों की कसौटी पर ही परखनी होगी और अपने विवेक एवं पूरी ईमानदारी से इनकी प्रामाणिकता का निर्णय करना होगा।
यहाँ मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि बहुत सारी बातें व घटनायें आनुषंगिक भी होती हैं। वे कोई शाश्वत-सिद्धान्त या अवश्यंभावी-घटनायें नहीं होती हैं कि केवली-भगवान् की वाणी में और उनसे अनुप्राणित मूल-आगमग्रन्थों में उनकी विवेचन/स्पष्टीकरण मिले ही मिले। तथा बहुत सारी ऐसी भी बातें हैं, जो मूल-द्वादशांगों के वर्ण्य-विषय के अन्तर्गत ही नहीं आती हैं, तब उनका विवरण/स्पष्टीकरण जिनवाणी में मिलने की अपेक्षा ही कैसे की जा सकती है?
उक्त-सन्दर्भ में हमें यह स्पष्टरूप से स्वीकार कर लेना होगा कि हमारे धार्मिक-जीवन में आज उपस्थित होने वाली बहुत सारी विषमताओं/समस्याओं/जिज्ञासाओं का समाधान मूल-आगमग्रन्थों में मिल ही जायेगा, यह संभव नहीं है। अतः हमें अपने विवेक एवं पूरी ईमानदारी के साथ ‘अहिंसा’ और ‘अपरिग्रह’, इन दो मानदण्डों के आधार पर इनके बारे में निर्णय करना होगा। मूल-आगमग्रन्थों एवं आचार्य कुन्दकुन्ददेव के ग्रन्थों तथा इन पर आधारित पूर्णतः शुद्ध-जिनाम्नाय पर केन्द्रित ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य किसी ग्रन्थ को हम केवली-भगवान् के वचनों के रूप में असन्दिग्धरूप से प्रमाण नहीं मान सकते हैं। वे सही भी हो सकते हैं और गलत भी हो सकते हैं। उनका परीक्षण हमें उक्त ‘अहिंसा’ और ‘अपरिग्रह’ सिद्धान्तों को केन्द्र में रखकर करना होगा।
वर्तमान सन्दर्भ में ‘स्त्री-अभिषेक’, ‘पंचामृत-अभिषेक’, ‘आरती’ एवं ‘दान’ आदि, ये ऐसे ज्वलंत-विषय हैं, जिनके बारे में समाज में पक्ष और प्रतिपक्ष के रूप में विद्वानों के द्वारा ढेरों शास्त्र-प्रमाण प्रस्तुत किये जा रहे हैं। समाज के लोग प्रबुद्ध होकर भी आगम-परम्परा के विशेषज्ञ नहीं होने से पर्याप्तरूप में दिग्भ्रमित हैं और कुछ अनिर्णय की स्थिति में हैं कि ‘समझ नहीं आ रहा कि क्या मानें या क्या करें?’ तथा कुछ तथाकथित शास्त्र-प्रमाणों से प्रभावित होकर तथा वर्तमान में चल रहे एक ऐसे ही आयोजन के महिमामंडित-प्रचार से अभिभूत होकर अनचाहे ही इन कार्यों के कृत-कारित-अनुमोदना से सहभागी बन रहे हैं।
अतः बहुत सारे जिज्ञासुओं के अनेकों अनुरोध मेरे पास आये कि आप सही मार्गदर्शन करिये कि वास्तव में जिनाम्नाय क्या है? अतः यह पुस्तक लिख रहा हूँ।
पहले तो यह जान लेना आवश्यक है कि आगमों में इन विषयों पर कुछ नहीं लिखा गया। मात्र गृहीत-मिथ्यात्व के निषेध का निर्देश आगमों में आया है; क्योंकि यह मात्र उसी मनुष्यभव में विशेषरूप से बढ़ता है, जो मनुष्यभव सभी कर्मों का नाश करके अविनाशी-मोक्षपद को प्राप्त करने का बहुत बड़ा-साधन है।
अभिषेक समीक्षा को मैं दो अलग-अलग शीर्षकों में वर्गीकृत करके विवेचित करूँगा: 1. पंचामृत-अभिषेक-समीक्षा, और 2. स्त्री-प्रक्षाल/अभिषेक-समीक्षा।
1. अभिषेक-समीक्षा :-
मैं इस विषय में प्रकाशित या अप्रकाशित किसी भी ग्रन्थ के उद्धरण यहाँ नहीं दूँगा; क्योंकि आगमयुग में यह समस्या थी ही नहीं। यही कारण है कि मूल-आगम-ग्रन्थों में इस विषय में कोई निर्देश हैं नहीं, तथा अन्य-ग्रन्थों के उद्धरण इसीलिये नहीं दूँगा कि वे मूल-आगम-ग्रन्थ हैं नहीं। अतः उनकी असंदिग्ध-प्रामाणिकता के अभाव में उनके कथनों पर चर्चा करना समय नष्ट करना है। कई बार प्रमाणों की बोझिलता के कारण लोग पढ़ने व समझने की चेष्टा ही नहीं करते हैं। अतः मात्र ‘अहिंसा’ एवं ‘अपरिग्रह’, इन दो सर्वमान्य और निर्विवाद जैन-सिद्धान्तों के आधार पर इस विषय की समीक्षा करूँगा।
इस विषय पर चर्चा करने के पहले यह जानना अपेक्षित है कि ‘अभिषेक-विधि है क्या’ और ‘अभिषेक किया क्यों जाता है’?
‘अभिषेक’ या ‘प्रक्षालन’ मात्र जिनबिम्बों का किया जाता है, न कि जिनेन्द्रदेव का, क्योंकि जिनबिम्बों पर धूलिकण आदि लग जाते हैं, तो उनको दूर करने के लिये एवं जिनबिम्ब की गरिमा व पवित्रता बनाये रखने के लिये यह विधि नियमितरूप से किये जाने का विधान है। और सभी इस तथ्य से सुपरिचित हैं कि ‘मल’ या ‘मैल’ के प्रक्षालन के लिये जल ही अपेक्षित होता है। विज्ञान भी मानता है कि ‘पानी एक महान्- विलायक है’ अर्थात् उससे किसी ठोस पदार्थ के ऊपर चिपके या लगे मैल आदि घुलकर दूर हो जाते हैं।
इस बात से यह सुस्पष्ट है कि अभिषेक या प्रक्षालन जल से ही होना चाहिये। अन्य किसी सामग्री की अपेक्षा ही नहीं है; क्योंकि जिनबिम्बों पर कोई अन्य चिपकनेवाला मैल अथवा रंग/केमिकल आदि के लगने का प्रसंग ही नहीं उठता है। इसका कारण यह है कि जिनमंदिरों में प्रतिष्ठित-जिनबिम्ब बहुत ही गरिमापूर्वक पवित्रता व सावधानी से वेदी में विराजमान होते हैं और शुद्धवस्त्रों वाले पुजारीगण भी मात्र सुबह एकबार ही उन्हें स्पर्श कर सकते हैं। सामान्यजन तो स्पर्श भी नहीं करते सकते हैं। अतः अन्य किसी भी प्रकार की मलिनता का तो प्रश्न ही नहीं उठता और सूखे धूलिकण सामान्य-प्रासुक-जल से बहुत आसानी से दूर किये जा सकते हैं। इसीलिये मैंने लिखा है कि ‘अभिषेक’ या ‘प्रक्षालन’ के लिये जल के अतिरिक्त अन्य किसी द्रव-पदार्थ के प्रयोग का कोई औचित्य ही नहीं है।
अब रही बात ‘पंचामृत’ या घी-दूध-दही आदि चिक्कण-पदार्थों से अभिषेक करने अथवा मसालों के तीव्र-सुगंधवाले जल से अभिषेक करने की। तो जिनबिम्ब मुख्यतः तो पाषाण से निर्मित होते हैं (ध्यातव्य है कि रत्न भी पाषाण ही हैं, अंग्रेजी में आज भी इन्हें ‘स्टोन’ Stone ही कहते हैं); या फिर स्वर्ण, चाँदी, पीतल या मिश्रित पंचधातु/अष्टधातु से निर्मित होते हैं। ये प्रकृत्या कठोर व ठोस वस्तुयें हैं, जो न तो पानी, हवा, धूप आदि से गलतीं या विकृत नहीं होती हैं। सामान्य-धूलिकण के अलावा अन्य किसीप्रकार की मलिनता की संभावना तक नहीं होने से इनसे निर्मित जिनबिम्बों का प्रासुक-जल से अभिषेक/प्रक्षालन करना ही विज्ञान एवं जिनाम्नाय से सम्मत है। यह बात सामान्य-विवेक रखने वाले साधारण से साधारण व्यक्ति भी भलीभाँति समझ सकता है।
यहाँ यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि तब फिर ‘पंचामृत’ या घी-दूध-दही आदि चिक्कण-पदार्थों से या मसालों के तीव्र-सुगंधवाले जल से अभिषेक प्रक्षालन करने की परिपाटी चली ही क्यों? भले ही वह किसी क्षेत्र-विशेष में चली हो।
तो वैदिक आदि परम्पराओं में गाय को पवित्र माने जाने के कारण गाय से प्राप्त होने वाले ‘पंचगव्य’ (दूध, दही, घी, गोबर, एवं गोमूत्र) को ‘पंचामृत’ माना गया और इनसे ही वे प्रतिमाओं की तथा पापादि-दोषयुक्त हो जाने पर व्यक्ति की भी शुद्धि मानते हैं। तो उनके ‘पंचामृत’ को तो हम अपनाते नहीं हैं, अन्यथा गोबर और गोमूत्र से भी अभिषेक या प्रक्षालन करने की परिपाटी हमारे यहाँ होती। ये गोमूत्र आदि तो हमारे यहाँ स्पष्टरूप से ‘मल’ माने गये हैं और इनके स्पर्शमात्र से शुद्धि की अनिवार्यता कही गयी है। इससे यह बात साफ हो जाती है कि इस वैदिक-आम्नाय ‘पंचामृत’ या ‘पंचमव्य’ से अभिषेक करने की परिपाटी हमारे यहाँ वैदिकों से नहीं आयी है।
तब क्यों, कैसे कहाँ से यह परिपाटी जैनों में आयी? यह प्रश्न यथावत् रहता है। तो जैन-इतिहास का बारीकी से अध्ययन करने पर पता चला कि हमारे यहाँ एक ‘काष्ठासंघ’ कभी परिस्थितिवश अस्तित्व में आया था, जिसके अनुसार लकड़ी की बनी जिनप्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। मूडबिद्री आदि दक्षिणभारत के कुछ मठों के मंदिरों में मैंने स्वयं आज भी लकड़ी से बनी ऐसी जिनप्रतिमायें देखी हैं।
चूँकि लकड़ी से बनी ऐसी जिनप्रतिमाओं में लकड़ी सूखने से दरारें पड़ना स्वाभाविक है और जिनप्रतिमाओं में ‘दरार आना’ आदि कोई भी विकृति बहुत बड़ा दोष है। अतः उनमें हल्की नमी व चिकनाई से दरारें पड़ने से रोका जा सकता है। इसीलिये दूध-दही-घी आदि चिक्कण-पदार्थों से अभिषेक करने की परिपाटी ‘काष्ठासंघ’ में प्रचलित हुई। चूँकि तथा लकड़ी में घुन आदि लगने की भी प्रचुर-संभावना होती है, इसीलिये विभिन्नप्रकार के मसालों को उबालकर उनसे निर्मित सुगन्धित-जल से अभिषेक करने की परिपाटी शुरू की गयी; ताकि उनके औषधीय-गुणों के व तीव्र-सुगंध के प्रभाव से ‘घुन’ आदि कीटों की संभावना ही नहीं रहे।
महत्त्वपूर्ण-बात यह रही कि इस ‘काष्ठासंघ’ की शिथिलाचारी-मान्यताओं को और लकड़ी की मूर्तियाँ बनाने की परम्परा को अधिकांश जैनसमाज एवं तत्कालीन-मुनिराजों व विद्वानों ने जिनाम्नाय के विरुद्ध घोषित करते हुये ‘अमान्य’ कर दिया तथा ऐसी मान्यतावालों को ‘जिनाम्नाय से बाहर’ कर दिया।
इनके अलावा अन्य सभी आम्नायों में पाषाण, धातु की जिनप्रतिमाओं का ही निर्माण होता था। अत: उनके लिये दूध-दही-घी आदि चिक्कण-पदार्थों से या मसालों के तीव्र-सुगंधवाले जल से अभिषेक करने की आवश्यकता ही नहीं थी; इसीलिये अन्य किसी संघ या आम्नाय में इनकी परिपाटी नहीं चली और उनमें मात्र शुद्ध-प्रासुक-जल से ही अभिषेक या प्रक्षालन करने की परिपाटी बनी रही।
चूँकि लकड़ी से बनी जिनप्रतिमाओं की पूज्यता ही मूल-जिनाम्नाय में नहीं थी, अत: पंचामृत के नाम पर दूध-दही-घी आदि चिक्कण-पदार्थों से या मसालों के तीव्र-सुगंधवाले जल से अभिषेक या प्रक्षालन करने का प्रसंग तक मूल-जिनाम्नाय में उपस्थित नहीं हुआ। इसतरह से देखा जाये, तो तथाकथित पंचामृत से अभिषेक या प्रक्षालन करने की परम्परा मूल-जिनाम्नाय में कभी स्वीकृत हुई ही नहीं। जिन्होंने अपनी जिद से इसे कईप्रकार के तर्क (जैसे लकड़ी की प्रतिमा में दरारें आने से बनाने या घुन लगने से बचाने) देकर इस पर अडिग रहना चाहा, उन्हें जिनाम्नाय के तत्कालीन-आचार्यों व मनीषियों ने काष्ठ-निर्मित प्रतिमाओं को ही एकस्वर से नकार दिया और ये पंचामृत के पक्षधर जिनाम्नाय से बहिष्कृत हो गये।
ये जिनाम्नाय से बहिष्कृत लोग दक्षिण भारत के गिने-चुने स्थलों पर एकत्रित होकर बसे और वहाँ के निवासियों को भी ये कुछ कारणवश अपने पक्ष में करने में कामयाब रहे; क्योंकि अपने कुछ आचरणों के कारण वे जिनाम्नाय से बहिष्कृत बने हुये थे। वे परिपाटियाँ थीं रात्रि में जिनेन्द्र भगवान् की पूजन करने की एवं स्त्रियों के द्वारा अभिषेक आदि करने की। यह इनकी मजबूरी थी; क्योंकि ये सभी कृषि-आधारित आजीविका वाले किसान थे। इन्हें सुबह चार बजे खेतों में जाना पड़ता था और पूरे दिन कृषि-कार्य करके संध्या के समय ये वापस घर लौटते थे। अत: आने के बाद स्नानादि करके व दिवाभोजन से निर्वृत्त होकर ये मंदिरजी में जाते थे और तभी पूजन आदि करते थे। इनकी आजीविका और जीवनशैली की मजबूरी के कारण इनके जीवन में रात्रि में जिनमंदिरों में पूजा- पाठ करने की परिपाटी प्रचलित हुई, जो कि जिनाम्नाय के विरुद्ध थी। और इसीकारण दक्षिणभारत में पुरुषों के दिन में घर पर न रहने से जिनमंदिरों एवं जिनबिम्बों के देखभाल का दायित्व भी विवशता में स्त्रियों के कंधों पर आ पड़ा और वे सुबह से जिनमंदिरों की देखभाल, जिनबिम्बों का मार्जन एवं प्रातःपूजन आदि के कार्य करने लगीं। इसीलिये ये मूल-जिनाम्नाय से उपेक्षित या बहिष्कृत थे।
जब ‘काष्ठासंघ’ के लोगों को मूल-जिनाम्नाय से बहिष्कृत घोषित किया गया, तो वे लोग इन रात्रिपूजन करनेवाले लोगों के साथ एकजुट हो गये और संगठित होकर वहाँ के मंदिरों में इनके प्रभाव से तथाकथित पंचामृत से अभिषेक या प्रक्षालन करने की परम्परा चल पड़ी। लकड़ी से बनी जिनप्रतिमायें जिनाम्नाय में अस्वीकृत होते हुए भी इनका तो इस पंचामृत से अभिषेक किये जाने की परिपाटी की कुछ तार्किकता मानी जा सकती थी, किन्तु पाषाण और धातु की जिनप्रतिमाओं पर पंचामृत से अभिषेक करने का तो दूर-दूर तक कहीं कोई औचित्य ही नहीं था।
इसप्रकार जिनाम्नाय से बहिष्कृत दो समूहों ने आपस में संगठित होकर इन जिनाम्नाय से विपरीत-परिपाटियों को अपने पूर्वाग्रह से जीवित रखा। फिर इनके आम्नाय में जो विद्वान् भट्टारक या लेखक हुये, उन्होंने कथाग्रन्थों में एवं चरणानुयोग के श्रावकाचार-ग्रन्थों में मूल-संज्ञायें तो व्रतादिक की व देवपूजादि की वे ही रखीं, जो जिनाम्नाय में प्रचलित थीं। किन्तु उनकी विधियों में कथाओं के द्वारा एवं स्वरचित-चरणानुयोग के श्रावकाचार-ग्रन्थों में इसकी कल्पितरूप से पुष्टि की है। इसके अनेकों प्रमाणों में एक प्रमाण यह है कि ‘तत्त्वार्थसूत्र’ के रचयिता आचार्य उमास्वामी ने कोई श्रावकाचार-ग्रन्थ नहीं लिखा। पूरी टीकाकार-परम्परा उनकी एकमात्र कृति ‘तत्त्वार्थसूत्र’ का ही उल्लेख करती है। पन्द्रहवीं शताब्दी के बाद किसी भट्टारक/विद्वान् ने मूल-जिनाम्नाय के विपरीत बातों को मान्य कराने के लिए एक श्रावकाचार-ग्रन्थ लिखकर उसमें ये सारी जिनाम्नाय के विपरीत-बातें प्ररूपित कीं और उसका नाम छल से ‘उमास्वामी श्रावकाचार’ रख दिया। इन रात्रिपूजन, सचित्त-पदार्थों से पूजन और पंचामृत से अभिषेक या प्रक्षालन करने की बातें जोड़ दीं। जिनका प्रमाण देकर आज इन मान्यताओं के पैरोकार इन जिनाम्नाय से बहिष्कृत मान्यताओं व परिपाटियों का समर्थन कर रहे हैं; क्योंकि एक भी मूल-आगम-ग्रन्थ में या आगमवेत्ता आचार्य कुन्दकुन्ददेव के ग्रन्थों में तो इन बातों को स्थान तक नहीं मिला है। अनेकत्र आचार्य कुन्दकुन्ददेव के ग्रन्थों में इनका दृढ़-शब्दों में निराकरण किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है।
आज जो पंचामृत-अभिषेक के आयोजन चल रहे हैं, ये तो एकमात्र धर्म के नाम पर ‘हिंसा’ और ‘परिग्रह-प्रदर्शन’ के महापाप का महिमामंडन है।
यह कोई आरोप नहीं है, बल्कि ज्वलंत-सत्य है। कितनी भीड़ है और कितनी भव्यता - इन दोनों को उपेक्षित कर यदि सत्य और तथ्य पर ईमानदारी से विचार किया जाये, तो यह सौ प्रतिशत (100%) वास्तविकता है।
पहली बात तो यही है कि वीतरागी-जिनाम्नाय में यह भगवान् के साथ बहुरंगी एवं महंगी होली खेलने जैसे आडम्बर के अलावा कुछ नहीं है; क्योंकि पंचामृत-अभिषेक में तो पाँच ही चीजों से अभिषेक करते हैं, परन्तु यहाँ तो न जाने कितनी रंगों की चीजों से वैभव-प्रदर्शन के रूप में अभिषेक किया जा रहा है, उसकी कोई गिनती ही नहीं है। यह आयोजन सिर्फ ‘परिग्रह-प्रदर्शन’ का है, इसमें विवेक और औचित्य का दूर-दूर तक कहीं नामोनिशान तक नहीं है। जो भीड़ जुट रही है, वह मात्र मनुष्य की उत्सवप्रियता की निशानी है। विवेक का प्रयोग तो इनके किसी कोण से भी दिखाई नहीं दे रहा है। इनमें से कई लोग तो रिश्तेदारों व परिवारजनों के साथ के दबाव में रुचि नहीं होते हुये भी कृत-कारित-अनुमोदना से अपार-पाप बाँध रहे हैं।
यह आरोप नहीं है, बल्कि यदि कोई देखना चाहे, तो ज्वलंत-सत्य के रूप में सामने देखा जा सकता है। परन्तु भीड़ की मनोवृत्ति व अंधानुकरण करनेवाले इस जैनसमाज को समझाना लगभग अशक्य-अनुष्ठान जैसा है। अतः समझदार-लोगों के द्वारा आगाह किये जाने पर भी प्रतिदिन हजारों लोग जा रहे हैं और किराये-खर्चे के अलावा बोलियों (इसे ‘अभिषेक का टैक्स’ या ‘लोगों की श्रद्धा की जेबतराशी’ कहा जाये, तो अनुचित नहीं होगा। बस अंतर इतना है कि आयोजक भव्य-प्रचार से लोगों को मतिभ्रम पैदा कर रहे हैं और दिखाई यही दे रहा है कि लोग अपनी मर्जी से अभिषेक के बदले धनराशि चुका रहे हैं) व अनिवार्य-शुल्क के रूप में भरपूर पैसा देने के बाद किसी तरह धक्कामुक्की करके कहने मात्र का अभिषेक कर पा रहे हैं।
बिडम्बना की बात तो यह भी है कि न तो अभिषेक के लिये अपेक्षित द्रव्यशुद्धि है, न वस्त्रादि की शुद्धि का विवेक रखा जा रहा है और न ही विधि का पवित्रता पर किसी का ध्यान है। जिनबिम्ब तो निर्विकारभाव से वीतरागी की तरह खड़े हुये हैं और तथाकथित-भक्तगण उपसर्गकर्ताओं की तरह उनके ऊपर कुछ भी, कैसे भी उड़ेलकर चले जा रहे हैं।
अभिषेक के बाद इतने जल व पंचामृत के नाम पर अनगिनत अशुद्ध-पदार्थों को जिनबिम्ब के ऊपर ढोलने के बाद कोई यह विचार तक नहीं कर रहा है कि नीचे जाकर इसकी क्या गति हो रही है? यह लोगों के पैरों में जाकर अविनय को प्राप्त हो रहा है, या इससे बन रहे तालाब में कितनी अपार-त्रसजीवराशि उत्पन्न होकर बिलबिलाते हुये तेज धूप में मरण को प्राप्त हो रही है? किसी को सोचने तक की फुर्सत नहीं है। इस अपार-जीवहिंसा का पापभागी कौन है? आयोजक तो हैं ही, पर आयोजकों के ऊपर अव्यवस्था का आरोप मढ़कर अभिषेक करनेवाले अपने जघन्यपाप से बच नहीं सकते हैं।
विचार करिये कि प्रतिदिन प्रक्षाल के बाद हम लोग कितनी विनय से जिनबिम्ब का मार्जन/अंगप्रोक्षण तत्काल करके तब सादर गंधोदक का वंदन करते हैं। और यहाँ तो दिनभर अभिषेक ही चल रहा है। अंगप्रोक्षण करे कौन? सारे तथाकथित भक्तगण तो जिनबिम्ब के ऊपर विविधप्रकार के तरल-पदार्थ ढोलने के अलावा कुछ कर ही नहीं रहे हैं और गंधोदक के नाम पर वंदनीय तो कुछ है ही नहीं; क्योंकि लोगों के पैरों में गिरकर नाली में बहता हुआ द्रव-पदार्थ कभी ‘गंधोदक’ संज्ञा का पात्र हो ही नहीं सकता है? तब क्या उसका वंदन किया जा सकता है? क्या इन जिनबिम्ब के ऊपर ढोले जानेवाले तरल-पदार्थों की प्रासुकता की संभावना इस आयोजन में सोचने भी संभव है?
धिक्कार है उन लोगों को, जो जिनबिम्ब की व अभिषेक/प्रक्षाल की जिनाम्नाय में निर्दिष्ट हर मर्यादा का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन देखते हुये भी चुपचाप इस हिंसक-आयोजन में अपना योगदान करके ‘निधत्त’ और ‘निकाचित’ जैसे पापों का बंध कर रहे हैं। यह सही है कि जिनवाणी में ‘‘जिनबिम्ब के दर्शनमात्र से इन पापों की निर्जरा’’ कही गयी है। किन्तु उसी जिनवाणी में वीतरागी प्रतिष्ठित-जिनबिम्ब की मर्यादा के उल्लंघनरूपी कदाचार करने से इन्हीं पापों का तीव्र-बंध होना भी तो बताया गया है। अब विवेकपूर्वक विचार करिये कि आप जिनाभिषेक के नाम पर हो रहे इस आडम्बरपूर्ण, विवेकरहित-आयोजन के प्रतिभागी बनकर क्या अर्जित कर रहे हैं? पुण्य या पाप? क्योंकि धर्म की तो इसमें कहीं कोई संभावना तक नहीं है।
कुछ शुद्धाम्नाय के अनुयायी सज्जन-प्रकृति के लोग भी आयोजन को देखने के नाम पर यह कहकर जा रहे हैं कि ‘हम तो सुबह सबसे पहले जब जिनबिम्ब साफ, सूखे होंगे; तभी शुद्ध-प्रासुक-जल से अभिषेक करके चले आयेंगे। तब तो कोई दोष नहीं लगेगा?’ आश्चर्य है कि वे कैसे विवेकी हैं? जो लोग नित्य सविनय-प्रक्षाल करते हैं, उन्हें तो पता ही है कि प्रतिदिन प्रक्षाल के बाद तत्काल अंगप्रोक्षण करके ही अर्घ्य समर्पित करके गंधोदक-वंदन किया जाता है। क्या यहाँ प्रक्षाल के बाद आप अंगप्रोक्षण कर पा रहे हैं? क्या जल का ही सही, पर क्या गंधोदक बन भी पा रहा है? और क्या आप जिनाभिषेक के बाद जिनबिम्ब का अंगप्रोक्षण किये बिना उन्हें गीली-अवस्था में ही छोड़कर आने का जिनाम्नाय के विपरीत-कार्य नहीं कर रहे हैं?
मैं तो स्पष्ट कहता हूँ कि इस गृहीत-मिथ्यात्व के वर्द्धक तथा ‘हिंसा’ और ‘परिग्रह-प्रदर्शन’ के आडम्बरपूर्ण विवेकरहित आयोजन के सहभागी कदापि मत बनिये। जब यह आयोजन निबट जाये, तब शांत-परिणामों से उन्हीं जिनबिम्ब के निर्मल-स्वरूप की वंदना कर लेना। परन्तु इस आयोजन का अंग बनकर पापार्जन मत करिये। कहीं भी पंचामृत-अभिषेक जैसे जिनाम्नाय के विपरीत-कार्य के सहभागी कदापि मत बनिये।
जिनेन्द्रदेव व जिनबिम्ब की जिनाम्नाय के अनुसार सविवेक-भक्ति पूरी विधि एवं मर्यादा के साथ करें - यही जिनाज्ञा है और यही जैन-श्रावक की मर्यादा है।
यदि यहाँ कोई यह कहे कि “आजकल के कुछ मुनिराज एवं विद्वान् पंचामृत-अभिषेक कराते हैं व इनकी अनिवार्यता बताते हैं ? तो हम क्या करें?”
अब आपने पंचामृत-अभिषेक की प्रक्रिया के विषय में तो अभी तक के विवरण में पढ़ ही लिया है कि वह कितनी हिंसा-मूलक एवं आरम्भ-परिग्रह के अतिरेक से होने वाली प्रक्रिया है। घोर-आश्चर्य तो तब होता है, जब कई मूढ़मति-लोग ‘गन्ने के रस’ से और ‘मधु’ (शहद) से भी जिनबिम्ब का अभिषेक कराने की बात करते हैं। इनमें से ‘शहद’ तो विवेकीजनों के लिये छूने में भी महापाप है; क्योंकि अनन्त-त्रसजीवों की हिंसा के बिना शहद की उत्पत्ति नहीं होती है और इसके साथ ही यह मधु-मक्खियों की जूठन/उगला हुआ पदार्थ होने से भी नितान्त-अस्पृश्य है। ‘सामान्य-गृहस्थ को भी शहद छूने तक का निषेध है।’ क्योंकि छूने का राग भी उसकी निर्माण-विधि में हुई अनिवार्य-जीवहिंसा की अनुमोदनारूप पाप ही है। जो चीज श्रावक को छूने तक के लिए निषिद्ध है, उसी से जिनबिम्ब का अभिषेक करना घोर-अनर्थ नहीं, तो क्या है ?
गन्ने के रस में भी मिठास की विशेषता के कारण मक्खियों की भरमार इस पर होती है। वे इसमें गिरकर मर भी जाती हैं। साथ ही यह कब निकला होगा, पहाड़ पर ले जाने का समय और अभिषेक-हेतु प्रतीक्षा का समय निश्चितरूप से इसकी मर्यादा नष्ट करके इसे प्रासुक एवं ग्राह्य नहीं रहने देता है। तब ऐसे अमर्यादित एवं सचित्त हो चुके गन्ने के रस को सामान्य-गृहस्थ भी पीने तक के काम में नहीं ले सकते हैं, तो वीतरागी-जिनबिम्ब के निमित्त तो इसको छूना भी महापाप है। अभिषेक-हेतु इसका प्रयोग तो जिनाम्नाय में किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
साथ ही यह गंधोदक के रूप में प्रयोग नहीं लिया जा सकता है एवं नालियों में बहकर, गड्ढों में इकट्ठा होकर अनन्त-त्रसजीवों की उत्पत्ति का कारण होने से, जिसका प्रायश्चित्त करना भी कठिन है: ऐसे दुस्तर-पापबंध का निमित्त बनता है। अत: ऐसे पदार्थों से जिनबिम्ब का अभिषेक कराने की कल्पना भी विवेकीजनों के लिये असहनीय है।
जिनबिम्ब-प्रक्षालन की प्रामाणिक-विधि :-
एक प्रश्न यह भी आया था कि ‘जिनबिम्ब के अभिषेक या प्रक्षालन की विधि और कालगत-मर्यादा क्या है?’ इसका संक्षिप्त-समाधान निम्नानुसार है:
जिनाम्नाय के अनुसार तो स्थिर-जिनबिम्बों का सामान्यत: मात्र सूखे कपड़े से प्रोक्षण (पोंछ देना, धूलिकणों का निवारण करना) ही किया जाता है। यदि कदाचित् कोई अन्य दाग जैसा प्रतीत हो, तो गीले कपड़े से प्रोक्षण कर दिया जाता है। जल डालकर अभिषेक नहीं किया जाता। कोई अतिविशिष्ट-स्थिति (गीले कपड़े से भी दूर न हो सके, ऐसे दाग आदि) हो, और मज्जन करने की अनिवार्यता प्रतीत हो; तो मज्जन करने के बाद शुद्ध-प्रासुक-जल से प्रक्षालन करके तत्काल सूखे मुलायम कपड़े से अच्छी तरह से अंगप्रोक्षण करके जिनबिम्ब को पूरी गरिमापूर्वक विराजमान किया जाता है।
'यदि लोगों को दिखाने के लिये जिनबिम्ब को जल में एक क्षण के लिये भी अतिरिक्त-समय रखा जाये और अनावश्यकरूप से लोगों की तसल्ली के लिये जिनबिम्ब पर जल ढोला जाये; तो यह प्रतिष्ठित-जिनबिम्ब की घोर-अविनय है और वीतरागी-जिनबिम्ब की मर्यादा का उल्लंघन है। इसके परिणामस्वरूप तीव्र-पापबंध होना निश्चित है; क्योंकि अनावश्यकरूप से जिनबिम्ब को गीला रखना, यह अशुभ है। सामुद्रिक-विद्या (ज्योतिष-संबंधी शारीरिक-लक्षणशास्त्र) के स्वप्नशास्त्र के अनुसार भी यदि कोई व्यक्ति गीले जिनबिम्ब का स्वप्न देखता है, तो यह नितान्त-अशुभ ही है और उस व्यक्ति व समाज/राष्ट्र के लिये अमंगल का सूचक है। अत: अपनी सुविधा के लिये जिनबिम्ब को गीला रखना - यह जिनाम्नाय और विवेक - दोनों के विपरीत ही है।
सचल-जिनबिम्ब मुख्यतः मात्र धातुनिर्मित ही होते हैं, अतः उनका शुद्ध-प्रासुक जल से अभिषेक की परिपाटी प्रचलित तो है। परन्तु इसकी अनिवार्यता का कोई तर्क मुझे समझ में नहीं आ सका। मेरे विवेक के अनुसार तो सूखे-वस्त्र से या अधिकतम नमीयुक्त हल्के गीले-वस्त्र से ही उनका प्रक्षालन होना चाहिये और उसे दिखाने के लिये किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करना चाहिये। क्योंकि कोई भी सांसारिक-व्यक्ति तीन लोक के नाथ वीतरागी-जिनेन्द्र-परमात्मा से तुलनीय नहीं है। अतः लौकिकजनों के लिये जिनबिम्ब की विधि को रोककर नहीं रखा जा सकता है और यदि कोई भी किसी व्यक्ति-विशेष के लिए जिनबिम्ब को प्रक्षाल के थाल में रखे रहने का अतिसाहस करता है, तो वह जिनाज्ञा के उल्लंघन का घोर अपराधी है।
जिनबिम्ब का अभिषेक या प्रक्षालन मात्र उनकी पवित्रता और मर्यादा को बनाये रखने के लिये किया जाता है, न कि यह कोई उनकी अनिवार्यता है। क्योंकि ‘जिनप्रतिमा जिन-सारखी कही जिनागम-माँहिं’ के अनुसार जिनबिम्ब की वैसी ही पवित्रता बनायी रखी जानी चाहिये, जैसी साक्षात् जिनबिम्ब की होती है। जिनेन्द्रदेव पर कभी भी धूलिकण आदि की अपवित्रता संभव ही नहीं है, अतः उनका अभिषेक या प्रक्षालन कभी भी नहीं होता है। ‘जो जन्माभिषेक सौधर्मेन्द्र करता है, वह ‘बाल-तीर्थंकर’ का करता है; न कि अरिहंत-अवस्था में।’
किन्तु जिनबिम्ब साक्षात् जिनेन्द्रदेव नहीं हैं, आकार और गरिमा में उनके सदृश माने गये हैं। अतः उन पर धूलिकण आदि की अपवित्रता संभव है, और उसी के निवारण के लिये जिनबिम्ब की प्रक्षालन या अभिषेक की विधि कही गयी है। न कि अभिषेक या प्रक्षालन देखना और इस कारण से जिनबिम्ब को घंटों गीली-अवस्था में रखना कोई धर्मविधि है। इसका सभी श्रावकों को पूर्ण-विवेक होना ही चाहिये।
जिनबिम्ब का प्रक्षालन देखने का मुख्य-उद्देश्य :-
जो जिनबिम्ब का प्रक्षालन देखने की प्रेरणा कदाचित् दी भी जाती है, तो उसकी उद्देश्य मात्र यही हो सकता है कि चूँकि जिनबिम्ब का प्रक्षालन सुबह-सुबह सबसे पहले एक ही बार होता है; अतः हम सबसे पहले सर्वोच्च-वरीयता (टॉप-प्रियारिटी) पर जिनेन्द्रदेव के दर्शन-पूजन करें। न कि पहले टीवी, अखबार, चाय-नाश्ता आदि करके फिर सुविधानुसार मंदिर जी जाया जायें; क्योंकि वास्तविक नियम यही है कि यदि कुछ भी खा-पी लिया जाये, तो जिनबिम्ब को स्पर्श करने का भी अधिकारी श्रावक उस दिन नहीं रह जाता है। जिनबिम्ब का प्रक्षालन सर्वप्रथम हो, इसी दृष्टि से प्रक्षालन की प्रेरणा दी गयी है। यदि हम अपनी दिनचर्या प्रारम्भ कर लेते हैं और जिनबिम्ब बिना प्रक्षालन के रहते हैं, तो सम्पूर्ण-समाज इसकी दोषी है; क्योंकि उन्हें हमने प्रतिष्ठापूर्वक विधिवत् मंदिरजी में विराजमान कराया है, तो उनकी गरिमा बनाये रखना हम सबकी सर्वोपरि जिम्मेवारी है। इसी दृष्टि से जिनबिम्ब का प्रक्षालन देखने की कदाचित् प्रेरणा दी गयी मालूम होती है। यह सामाजिक-सावधानी व जन-जागृति की बात है, कोई धर्मविधि ज्ञात नहीं होती।
हाँ, जिनेन्द्रदेव की पूजनविधि के लिये जिनबिम्ब का प्रक्षालन क्रमिक-विधि में कहा गया है। वह मात्र इसीलिये कि जिनबिम्ब के प्रक्षालन के बिना उनकी पूजनविधि करना समीचीन नहीं है। अतः जिनबिम्ब का प्रक्षालन करके पूजनविधि करने का निर्देश है। किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि यदि आप मंदिरजी बिलम्ब से पहुँचते हैं, और जिनबिम्ब की प्रक्षालन विधि उसके पहले सम्पन्न हो चुकी है, तो आप दुबारा जिनबिम्ब की प्रक्षालन विधि करेंगे। ऐसा करना कदापि उचित नहीं है। यह अमर्यादित-आचरण है और जिनाज्ञा का स्पष्टरूप से उल्लंघन है। आज जो अधिकांश जिनमंदिरों में जिनबिम्बों पर पानी के दाग दिखायी देते हैं, कई जगह तो जिनबिम्ब पर काई (शैवाल) जैसी जमी दिखती है, वह इसी गलत परम्परा की देन है कि जब जिसका मन किया, तब पानी डालकर अभिषेक कर लिया। अंगप्रोक्षण की जिम्मेवारी ढंग से निभायी नहीं जाती है। अतः जिनबिम्ब में मलिनता के चिह्न दिखायी देते हैं। ऐसी कल्पना भी वीतरागी-जिनबिम्ब के विषय में करना अशुभ है। तो ऐसी स्थिति का निर्माण करना तो प्रतिष्ठित-जिनबिम्ब की मर्यादा को भंग करना है। मलिन-स्थितिवाले जिनबिम्ब तो दर्शन-पूजन के योग्य हैं ही नहीं।
‘पंचामृत-अभिषेक’ की बात तो जिनाम्नाय की मर्यादा में संभव ही नहीं है। मात्र शुद्ध-प्रासुक जल से ही प्रक्षालन-विधि करने का निर्देश जिनाम्नाय में मिलता है। क्योंकि ‘इन तथाकथित-पंचामृतों को डालने से जिनबिम्ब के मलिन होने की ही संभावना होती है, न कि निर्मलता की।’ इसके करने से आरम्भ-परिग्रह बढ़ता है और पंचामृत-अभिषेक से जीवहिंसा की अनिवार्य एवं प्रचुर-संभावना होती है।
अतः दिन में एक बार शुद्ध-प्रासुक-जल से हलके गीले किये गये वस्त्र से जिनबिम्ब का प्रक्षालन करना और तत्काल सूखे मुलायम निर्मल-वस्त्र से उनका अंगप्रोक्षण करके पूरीतरह से सूखा करके उन्हें विराजमान करना - यही जिनबिम्ब के अभिषेक या प्रक्षालन की एकमात्र शुद्ध व सात्त्विक-विधि है। अन्य पंचामृत-अभिषेक आदि की प्रक्रिया आरम्भ-परिग्रह की अधिकता से युक्त होने से तथा अनिवार्य-जीवहिंसा से परिपूर्ण होने से इसका देखना भी ‘तीव्र-पापबंध’ और ‘दर्शनमोहनीय-कर्म के बंध’ का कारण है; क्योंकि ऐसा करने से ‘जिनबिम्ब का अवर्णवाद’ निश्चितरूप से होता ही है।
ज्ञातव्य है कि ‘संयम-धारण करने योग्य मनुष्यगति यदि हमें इष्ट है, तो अल्प-आरम्भ और अल्प-परिग्रह के साथ-साथ स्वभाव की सरलता निरन्तर बनी रहना अनिवार्य है।’ क्योंकि मनुष्यायु के बंध के कारण ये ही हैं। इनसे विपरीत-आचरण करके (अर्थात् बहुत-आरम्भ, बहुत-परिग्रह एवं मन की कुटिलतापूर्वक आचरण करके) जीव नरक-निगोद आदि का पात्र होगा और यदि अन्य ग्रन्थों के उल्लेखों को दिखाकर छल से ऐसा किया; तो तिर्यंचगति का बंध होना सुनिश्चित है। इन गतियों में जिनबिम्ब के दर्शन तक दुर्लभ हैं, प्रक्षालन व पूजनविधि करने का सौभाग्य तो पूर्णतः असंभव है।
अतः जिनबिम्ब का पंचामृत-अभिषेक करना या मात्र जल से भी मनमाने ढंग से अभिषेक करना - यह जिनाज्ञा का उल्लंघन है। जिनाम्नाय के विरुद्ध है। विवेकपूर्वक जिनबिम्ब का प्रक्षालन करना ही जिनाम्नाय है।
स्त्रियों को जिनबिम्ब-स्पर्श व प्रक्षाल क्यों नहीं करना चाहिए :-
स्त्रियों को जिनबिम्ब का स्पर्श व अभिषेक करना चाहिये या नहीं? - इस विषय पर अब विवेचन प्रस्तुत किया जायेगा।
स्त्रियों से वीतरागी-जिनबिम्ब का प्रक्षालन या अभिषेक कराना या उनके द्वारा स्वयं किया जानी क्या जिनाम्नाय के अनुरूप है? शास्त्रीय-प्रमाणों की बहस में उलझे बिना विवेकपूर्ण-रीति से इस प्रश्न का समाधान यहाँ करने की पूरी ईमानदारी व निष्ठा से कोशिश करूँगा।
स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 13-37
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