प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा | Pramaan Bade Ya Vivek Bada (Abhishek Samiksha)

लेखक: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

आजकल शोधपरक-अध्ययन का प्रभाव स्वाध्यायीजनों पर भी पड़ा है और सभी जिज्ञासु-स्वाध्यायीजन भी प्रत्येक कथन का जिनागम से प्रमाण की अपेक्षा करने लगे हैं और कहते हैं कि ‘‘आप जो बात कर रहे हो, उसका प्रमाण किस आगमग्रन्थ में है ?’’ - यह प्रवृत्ति सुखद तो है; किन्तु उसके अतिरेक से भी कुछ समस्यायें उत्पन्न हो रही हैं; क्योंकि समसामयिक कारणों से जो विसंगतियाँ उत्पन्न हो रही हैं, उन सबके विषय में आगमग्रन्थों में कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं मिलते हैं। कारण यही है कि उस समय ऐसी परिस्थितियाँ ही नहीं थीं कि कोई निर्देश दिया जाता तथा जिनवाणी भी अत्यल्प-परिमाण में ही शेष है।

मुझे धवलाकार महाज्ञानी आचार्य वीरसेन स्वामी का एक उद्धरण स्मरण आ रहा है, जिसमें वे कहते हैं कि -

‘‘पण्णवणिज्जा भावा, अणंतभागो दु अणभिलप्पाणं…’’

अर्थात् ‘‘जितना केवली भगवान् के ज्ञान में आता है, उसका अनंतवाँ-भाग मात्र उनकी दिव्यध्वनि में अभिव्यक्त हो पाता है। और जितना तीर्थंकर-परमात्मा की दिव्यध्वनि में अभिव्यक्त होता है, उसका भी अनंतवाँ-भाग गणधरदेव ग्रहण कर पाते हैं। तथा जितना गणधरदेव ग्रहण करते हैं, उसका भी अनंतवाँ-भाग द्वादशांगी-जिनवाणी में ग्रथित हो पाता है। और जितना द्वादशांगी-जिनवाणी में ग्रथित हुआ था, उसका भी अनंतवाँ-भाग ही वर्तमान ‘समय’ (उपलब्ध आगम) में लिपिबद्ध हो सका है।’’

और हमारे ज्ञानी आचार्य-भगवन्त एवं मनीषीगण लिखकर हमें बारम्बार सावधान करते हैं कि ‘‘जो केवली-भगवान् के ज्ञान में आया है और उन्होंने साक्षात् जितना दिव्यध्वनिरूप उपदेश में बताया है, वही प्रमाण है।’’ उन्हीं के शब्दों में कहा जाये, तो ‘‘केवली-कह्या सो प्रमाण है।’’

तब यह तथ्य गम्भीरता से विचारणीय हो पाता है कि हम आज जो हर बात का प्रमाण आज उपलब्ध-जिनवाणी में खोजते और माँगते हैं? तो क्या आज की हर बात का प्रमाण इसमें मिलना संभव है? मुझे तो ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता है।

मेरे इस कथन का यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि वर्तमान में उपलब्ध- जिनवाणी (मूल-आगमग्रन्थ) की प्रामाणिकता कदापि सन्दिग्धहै। वह एक-एक वर्ण-शब्द-वाक्य के रूप में असन्दिग्धरूप से प्रमाण ही है।

किन्तु आज ऐसे मूल-आगमग्रन्थों के रूप में तो मात्र ‘छक्खंडागमसुत्तं’ (षट्खण्डागमसूत्र) एवं ‘पेज्ज-दोस-पाहुड-सुत्तं’ (कषायपाहुडसूत्र) ही आते हैं। इनके अतिरिक्त जिनके हर वर्ण-शब्द-वाक्य इन मूल-आगमग्रन्थों के समान की अप्रतिम-प्रामाणिकता रखते हैं: ऐसे युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव के वचन/ग्रन्थ ही हैं; क्योंकि वर्तमान आचार्य-परम्परा में एकमात्र युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्ददेव ही ऐसे आचार्य हुये हैं, जो वर्तमान में उपलब्ध-जिनवाणी के इन मूल-आगमग्रन्थों के आम्नाय अर्थात् ‘कर्मप्रवाद’ और ‘आत्मप्रवाद’ के एकमात्र युगपत्-ज्ञाता थे। (इस तथ्य की सप्रमाण-पुष्टि मैं अपने आचार्य कुन्दकुन्ददेव-विषयक अन्य-आलेख में भलीभाँति कर चुका हूँ।)

इनके प्रतिपाद्यों/कथनों के पोषक जितने भी टीकाग्रन्थ एवं अन्य ग्रन्थ हैं, वे भी इन मूल-आगमग्रन्थों के पोषक होने के कारण ही प्रमाण माने जाये हैं; अन्यथा उनके प्रमाणत्व का कोई पारम्परिक-आधार नहीं रह जाता है। इसके अलावा जितने कथन इन मूल-आगमग्रन्थों से अनुप्राणित नहीं हैं, उनकी प्रामाणिकता का तो कोई अन्य आधार ही नहीं कहा जा सकता है।

अब यदि इनकी प्रामाणिकता का कोई आधार हमें चुनना है, तो वह व्यक्ति या ग्रन्थ पर आधारित नहीं हो सकता है। वह होता, तो एकमात्र जिनाम्नाय के किसी न किसी सिद्धान्त पर आधारित ही हो सकता है।

और जैनदर्शन में सर्वमान्य-सिद्धान्त कोई हैं, तो वे हैं ‘अहिंसा’ और ‘अपरिग्रह’; क्योंकि शेष सभी किसी न किसी रूप में इन्हीं में अन्तर्गर्भित हो जाते हैं। अतः मूल-आगमग्रन्थों व युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्ददेव के वचनों के अतिरिक्त जिन कथनों/ग्रन्थों/लेखकों की प्रामाणिकता हमें तलाशनी है, तो उन्हें इन्हीं दो सिद्धान्तों की कसौटी पर ही परखनी होगी और अपने विवेक एवं पूरी ईमानदारी से इनकी प्रामाणिकता का निर्णय करना होगा।

यहाँ मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि बहुत सारी बातें व घटनायें आनुषंगिक भी होती हैं। वे कोई शाश्वत-सिद्धान्त या अवश्यंभावी-घटनायें नहीं होती हैं कि केवली-भगवान् की वाणी में और उनसे अनुप्राणित मूल-आगमग्रन्थों में उनकी विवेचन/स्पष्टीकरण मिले ही मिले। तथा बहुत सारी ऐसी भी बातें हैं, जो मूल-द्वादशांगों के वर्ण्य-विषय के अन्तर्गत ही नहीं आती हैं, तब उनका विवरण/स्पष्टीकरण जिनवाणी में मिलने की अपेक्षा ही कैसे की जा सकती है?

उक्त-सन्दर्भ में हमें यह स्पष्टरूप से स्वीकार कर लेना होगा कि हमारे धार्मिक-जीवन में आज उपस्थित होने वाली बहुत सारी विषमताओं/समस्याओं/जिज्ञासाओं का समाधान मूल-आगमग्रन्थों में मिल ही जायेगा, यह संभव नहीं है। अतः हमें अपने विवेक एवं पूरी ईमानदारी के साथ ‘अहिंसा’ और ‘अपरिग्रह’, इन दो मानदण्डों के आधार पर इनके बारे में निर्णय करना होगा। मूल-आगमग्रन्थों एवं आचार्य कुन्दकुन्ददेव के ग्रन्थों तथा इन पर आधारित पूर्णतः शुद्ध-जिनाम्नाय पर केन्द्रित ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य किसी ग्रन्थ को हम केवली-भगवान् के वचनों के रूप में असन्दिग्धरूप से प्रमाण नहीं मान सकते हैं। वे सही भी हो सकते हैं और गलत भी हो सकते हैं। उनका परीक्षण हमें उक्त ‘अहिंसा’ और ‘अपरिग्रह’ सिद्धान्तों को केन्द्र में रखकर करना होगा।

वर्तमान सन्दर्भ में ‘स्त्री-अभिषेक’, ‘पंचामृत-अभिषेक’, ‘आरती’ एवं ‘दान’ आदि, ये ऐसे ज्वलंत-विषय हैं, जिनके बारे में समाज में पक्ष और प्रतिपक्ष के रूप में विद्वानों के द्वारा ढेरों शास्त्र-प्रमाण प्रस्तुत किये जा रहे हैं। समाज के लोग प्रबुद्ध होकर भी आगम-परम्परा के विशेषज्ञ नहीं होने से पर्याप्तरूप में दिग्भ्रमित हैं और कुछ अनिर्णय की स्थिति में हैं कि ‘समझ नहीं आ रहा कि क्या मानें या क्या करें?’ तथा कुछ तथाकथित शास्त्र-प्रमाणों से प्रभावित होकर तथा वर्तमान में चल रहे एक ऐसे ही आयोजन के महिमामंडित-प्रचार से अभिभूत होकर अनचाहे ही इन कार्यों के कृत-कारित-अनुमोदना से सहभागी बन रहे हैं।

अतः बहुत सारे जिज्ञासुओं के अनेकों अनुरोध मेरे पास आये कि आप सही मार्गदर्शन करिये कि वास्तव में जिनाम्नाय क्या है? अतः यह पुस्तक लिख रहा हूँ।

पहले तो यह जान लेना आवश्यक है कि आगमों में इन विषयों पर कुछ नहीं लिखा गया। मात्र गृहीत-मिथ्यात्व के निषेध का निर्देश आगमों में आया है; क्योंकि यह मात्र उसी मनुष्यभव में विशेषरूप से बढ़ता है, जो मनुष्यभव सभी कर्मों का नाश करके अविनाशी-मोक्षपद को प्राप्त करने का बहुत बड़ा-साधन है।

अभिषेक समीक्षा को मैं दो अलग-अलग शीर्षकों में वर्गीकृत करके विवेचित करूँगा: 1. पंचामृत-अभिषेक-समीक्षा, और 2. स्त्री-प्रक्षाल/अभिषेक-समीक्षा।

1. अभिषेक-समीक्षा :-

मैं इस विषय में प्रकाशित या अप्रकाशित किसी भी ग्रन्थ के उद्धरण यहाँ नहीं दूँगा; क्योंकि आगमयुग में यह समस्या थी ही नहीं। यही कारण है कि मूल-आगम-ग्रन्थों में इस विषय में कोई निर्देश हैं नहीं, तथा अन्य-ग्रन्थों के उद्धरण इसीलिये नहीं दूँगा कि वे मूल-आगम-ग्रन्थ हैं नहीं। अतः उनकी असंदिग्ध-प्रामाणिकता के अभाव में उनके कथनों पर चर्चा करना समय नष्ट करना है। कई बार प्रमाणों की बोझिलता के कारण लोग पढ़ने व समझने की चेष्टा ही नहीं करते हैं। अतः मात्र ‘अहिंसा’ एवं ‘अपरिग्रह’, इन दो सर्वमान्य और निर्विवाद जैन-सिद्धान्तों के आधार पर इस विषय की समीक्षा करूँगा।

इस विषय पर चर्चा करने के पहले यह जानना अपेक्षित है कि ‘अभिषेक-विधि है क्या’ और ‘अभिषेक किया क्यों जाता है’?

‘अभिषेक’ या ‘प्रक्षालन’ मात्र जिनबिम्बों का किया जाता है, न कि जिनेन्द्रदेव का, क्योंकि जिनबिम्बों पर धूलिकण आदि लग जाते हैं, तो उनको दूर करने के लिये एवं जिनबिम्ब की गरिमा व पवित्रता बनाये रखने के लिये यह विधि नियमितरूप से किये जाने का विधान है। और सभी इस तथ्य से सुपरिचित हैं कि ‘मल’ या ‘मैल’ के प्रक्षालन के लिये जल ही अपेक्षित होता है। विज्ञान भी मानता है कि ‘पानी एक महान्- विलायक है’ अर्थात् उससे किसी ठोस पदार्थ के ऊपर चिपके या लगे मैल आदि घुलकर दूर हो जाते हैं।

इस बात से यह सुस्पष्ट है कि अभिषेक या प्रक्षालन जल से ही होना चाहिये। अन्य किसी सामग्री की अपेक्षा ही नहीं है; क्योंकि जिनबिम्बों पर कोई अन्य चिपकनेवाला मैल अथवा रंग/केमिकल आदि के लगने का प्रसंग ही नहीं उठता है। इसका कारण यह है कि जिनमंदिरों में प्रतिष्ठित-जिनबिम्ब बहुत ही गरिमापूर्वक पवित्रता व सावधानी से वेदी में विराजमान होते हैं और शुद्धवस्त्रों वाले पुजारीगण भी मात्र सुबह एकबार ही उन्हें स्पर्श कर सकते हैं। सामान्यजन तो स्पर्श भी नहीं करते सकते हैं। अतः अन्य किसी भी प्रकार की मलिनता का तो प्रश्न ही नहीं उठता और सूखे धूलिकण सामान्य-प्रासुक-जल से बहुत आसानी से दूर किये जा सकते हैं। इसीलिये मैंने लिखा है कि ‘अभिषेक’ या ‘प्रक्षालन’ के लिये जल के अतिरिक्त अन्य किसी द्रव-पदार्थ के प्रयोग का कोई औचित्य ही नहीं है।

अब रही बात ‘पंचामृत’ या घी-दूध-दही आदि चिक्कण-पदार्थों से अभिषेक करने अथवा मसालों के तीव्र-सुगंधवाले जल से अभिषेक करने की। तो जिनबिम्ब मुख्यतः तो पाषाण से निर्मित होते हैं (ध्यातव्य है कि रत्न भी पाषाण ही हैं, अंग्रेजी में आज भी इन्हें ‘स्टोन’ Stone ही कहते हैं); या फिर स्वर्ण, चाँदी, पीतल या मिश्रित पंचधातु/अष्टधातु से निर्मित होते हैं। ये प्रकृत्या कठोर व ठोस वस्तुयें हैं, जो न तो पानी, हवा, धूप आदि से गलतीं या विकृत नहीं होती हैं। सामान्य-धूलिकण के अलावा अन्य किसीप्रकार की मलिनता की संभावना तक नहीं होने से इनसे निर्मित जिनबिम्बों का प्रासुक-जल से अभिषेक/प्रक्षालन करना ही विज्ञान एवं जिनाम्नाय से सम्मत है। यह बात सामान्य-विवेक रखने वाले साधारण से साधारण व्यक्ति भी भलीभाँति समझ सकता है।

यहाँ यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि तब फिर ‘पंचामृत’ या घी-दूध-दही आदि चिक्कण-पदार्थों से या मसालों के तीव्र-सुगंधवाले जल से अभिषेक प्रक्षालन करने की परिपाटी चली ही क्यों? भले ही वह किसी क्षेत्र-विशेष में चली हो।

तो वैदिक आदि परम्पराओं में गाय को पवित्र माने जाने के कारण गाय से प्राप्त होने वाले ‘पंचगव्य’ (दूध, दही, घी, गोबर, एवं गोमूत्र) को ‘पंचामृत’ माना गया और इनसे ही वे प्रतिमाओं की तथा पापादि-दोषयुक्त हो जाने पर व्यक्ति की भी शुद्धि मानते हैं। तो उनके ‘पंचामृत’ को तो हम अपनाते नहीं हैं, अन्यथा गोबर और गोमूत्र से भी अभिषेक या प्रक्षालन करने की परिपाटी हमारे यहाँ होती। ये गोमूत्र आदि तो हमारे यहाँ स्पष्टरूप से ‘मल’ माने गये हैं और इनके स्पर्शमात्र से शुद्धि की अनिवार्यता कही गयी है। इससे यह बात साफ हो जाती है कि इस वैदिक-आम्नाय ‘पंचामृत’ या ‘पंचमव्य’ से अभिषेक करने की परिपाटी हमारे यहाँ वैदिकों से नहीं आयी है।

तब क्यों, कैसे कहाँ से यह परिपाटी जैनों में आयी? यह प्रश्न यथावत् रहता है। तो जैन-इतिहास का बारीकी से अध्ययन करने पर पता चला कि हमारे यहाँ एक ‘काष्ठासंघ’ कभी परिस्थितिवश अस्तित्व में आया था, जिसके अनुसार लकड़ी की बनी जिनप्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। मूडबिद्री आदि दक्षिणभारत के कुछ मठों के मंदिरों में मैंने स्वयं आज भी लकड़ी से बनी ऐसी जिनप्रतिमायें देखी हैं।

चूँकि लकड़ी से बनी ऐसी जिनप्रतिमाओं में लकड़ी सूखने से दरारें पड़ना स्वाभाविक है और जिनप्रतिमाओं में ‘दरार आना’ आदि कोई भी विकृति बहुत बड़ा दोष है। अतः उनमें हल्की नमी व चिकनाई से दरारें पड़ने से रोका जा सकता है। इसीलिये दूध-दही-घी आदि चिक्कण-पदार्थों से अभिषेक करने की परिपाटी ‘काष्ठासंघ’ में प्रचलित हुई। चूँकि तथा लकड़ी में घुन आदि लगने की भी प्रचुर-संभावना होती है, इसीलिये विभिन्नप्रकार के मसालों को उबालकर उनसे निर्मित सुगन्धित-जल से अभिषेक करने की परिपाटी शुरू की गयी; ताकि उनके औषधीय-गुणों के व तीव्र-सुगंध के प्रभाव से ‘घुन’ आदि कीटों की संभावना ही नहीं रहे।

महत्त्वपूर्ण-बात यह रही कि इस ‘काष्ठासंघ’ की शिथिलाचारी-मान्यताओं को और लकड़ी की मूर्तियाँ बनाने की परम्परा को अधिकांश जैनसमाज एवं तत्कालीन-मुनिराजों व विद्वानों ने जिनाम्नाय के विरुद्ध घोषित करते हुये ‘अमान्य’ कर दिया तथा ऐसी मान्यतावालों को ‘जिनाम्नाय से बाहर’ कर दिया।

इनके अलावा अन्य सभी आम्नायों में पाषाण, धातु की जिनप्रतिमाओं का ही निर्माण होता था। अत: उनके लिये दूध-दही-घी आदि चिक्कण-पदार्थों से या मसालों के तीव्र-सुगंधवाले जल से अभिषेक करने की आवश्यकता ही नहीं थी; इसीलिये अन्य किसी संघ या आम्नाय में इनकी परिपाटी नहीं चली और उनमें मात्र शुद्ध-प्रासुक-जल से ही अभिषेक या प्रक्षालन करने की परिपाटी बनी रही।

चूँकि लकड़ी से बनी जिनप्रतिमाओं की पूज्यता ही मूल-जिनाम्नाय में नहीं थी, अत: पंचामृत के नाम पर दूध-दही-घी आदि चिक्कण-पदार्थों से या मसालों के तीव्र-सुगंधवाले जल से अभिषेक या प्रक्षालन करने का प्रसंग तक मूल-जिनाम्नाय में उपस्थित नहीं हुआ। इसतरह से देखा जाये, तो तथाकथित पंचामृत से अभिषेक या प्रक्षालन करने की परम्परा मूल-जिनाम्नाय में कभी स्वीकृत हुई ही नहीं। जिन्होंने अपनी जिद से इसे कईप्रकार के तर्क (जैसे लकड़ी की प्रतिमा में दरारें आने से बनाने या घुन लगने से बचाने) देकर इस पर अडिग रहना चाहा, उन्हें जिनाम्नाय के तत्कालीन-आचार्यों व मनीषियों ने काष्ठ-निर्मित प्रतिमाओं को ही एकस्वर से नकार दिया और ये पंचामृत के पक्षधर जिनाम्नाय से बहिष्कृत हो गये।

ये जिनाम्नाय से बहिष्कृत लोग दक्षिण भारत के गिने-चुने स्थलों पर एकत्रित होकर बसे और वहाँ के निवासियों को भी ये कुछ कारणवश अपने पक्ष में करने में कामयाब रहे; क्योंकि अपने कुछ आचरणों के कारण वे जिनाम्नाय से बहिष्कृत बने हुये थे। वे परिपाटियाँ थीं रात्रि में जिनेन्द्र भगवान् की पूजन करने की एवं स्त्रियों के द्वारा अभिषेक आदि करने की। यह इनकी मजबूरी थी; क्योंकि ये सभी कृषि-आधारित आजीविका वाले किसान थे। इन्हें सुबह चार बजे खेतों में जाना पड़ता था और पूरे दिन कृषि-कार्य करके संध्या के समय ये वापस घर लौटते थे। अत: आने के बाद स्नानादि करके व दिवाभोजन से निर्वृत्त होकर ये मंदिरजी में जाते थे और तभी पूजन आदि करते थे। इनकी आजीविका और जीवनशैली की मजबूरी के कारण इनके जीवन में रात्रि में जिनमंदिरों में पूजा- पाठ करने की परिपाटी प्रचलित हुई, जो कि जिनाम्नाय के विरुद्ध थी। और इसीकारण दक्षिणभारत में पुरुषों के दिन में घर पर न रहने से जिनमंदिरों एवं जिनबिम्बों के देखभाल का दायित्व भी विवशता में स्त्रियों के कंधों पर आ पड़ा और वे सुबह से जिनमंदिरों की देखभाल, जिनबिम्बों का मार्जन एवं प्रातःपूजन आदि के कार्य करने लगीं। इसीलिये ये मूल-जिनाम्नाय से उपेक्षित या बहिष्कृत थे।

जब ‘काष्ठासंघ’ के लोगों को मूल-जिनाम्नाय से बहिष्कृत घोषित किया गया, तो वे लोग इन रात्रिपूजन करनेवाले लोगों के साथ एकजुट हो गये और संगठित होकर वहाँ के मंदिरों में इनके प्रभाव से तथाकथित पंचामृत से अभिषेक या प्रक्षालन करने की परम्परा चल पड़ी। लकड़ी से बनी जिनप्रतिमायें जिनाम्नाय में अस्वीकृत होते हुए भी इनका तो इस पंचामृत से अभिषेक किये जाने की परिपाटी की कुछ तार्किकता मानी जा सकती थी, किन्तु पाषाण और धातु की जिनप्रतिमाओं पर पंचामृत से अभिषेक करने का तो दूर-दूर तक कहीं कोई औचित्य ही नहीं था।

इसप्रकार जिनाम्नाय से बहिष्कृत दो समूहों ने आपस में संगठित होकर इन जिनाम्नाय से विपरीत-परिपाटियों को अपने पूर्वाग्रह से जीवित रखा। फिर इनके आम्नाय में जो विद्वान् भट्टारक या लेखक हुये, उन्होंने कथाग्रन्थों में एवं चरणानुयोग के श्रावकाचार-ग्रन्थों में मूल-संज्ञायें तो व्रतादिक की व देवपूजादि की वे ही रखीं, जो जिनाम्नाय में प्रचलित थीं। किन्तु उनकी विधियों में कथाओं के द्वारा एवं स्वरचित-चरणानुयोग के श्रावकाचार-ग्रन्थों में इसकी कल्पितरूप से पुष्टि की है। इसके अनेकों प्रमाणों में एक प्रमाण यह है कि ‘तत्त्वार्थसूत्र’ के रचयिता आचार्य उमास्वामी ने कोई श्रावकाचार-ग्रन्थ नहीं लिखा। पूरी टीकाकार-परम्परा उनकी एकमात्र कृति ‘तत्त्वार्थसूत्र’ का ही उल्लेख करती है। पन्द्रहवीं शताब्दी के बाद किसी भट्टारक/विद्वान् ने मूल-जिनाम्नाय के विपरीत बातों को मान्य कराने के लिए एक श्रावकाचार-ग्रन्थ लिखकर उसमें ये सारी जिनाम्नाय के विपरीत-बातें प्ररूपित कीं और उसका नाम छल से ‘उमास्वामी श्रावकाचार’ रख दिया। इन रात्रिपूजन, सचित्त-पदार्थों से पूजन और पंचामृत से अभिषेक या प्रक्षालन करने की बातें जोड़ दीं। जिनका प्रमाण देकर आज इन मान्यताओं के पैरोकार इन जिनाम्नाय से बहिष्कृत मान्यताओं व परिपाटियों का समर्थन कर रहे हैं; क्योंकि एक भी मूल-आगम-ग्रन्थ में या आगमवेत्ता आचार्य कुन्दकुन्ददेव के ग्रन्थों में तो इन बातों को स्थान तक नहीं मिला है। अनेकत्र आचार्य कुन्दकुन्ददेव के ग्रन्थों में इनका दृढ़-शब्दों में निराकरण किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है।

आज जो पंचामृत-अभिषेक के आयोजन चल रहे हैं, ये तो एकमात्र धर्म के नाम पर ‘हिंसा’ और ‘परिग्रह-प्रदर्शन’ के महापाप का महिमामंडन है।

यह कोई आरोप नहीं है, बल्कि ज्वलंत-सत्य है। कितनी भीड़ है और कितनी भव्यता - इन दोनों को उपेक्षित कर यदि सत्य और तथ्य पर ईमानदारी से विचार किया जाये, तो यह सौ प्रतिशत (100%) वास्तविकता है।

पहली बात तो यही है कि वीतरागी-जिनाम्नाय में यह भगवान् के साथ बहुरंगी एवं महंगी होली खेलने जैसे आडम्बर के अलावा कुछ नहीं है; क्योंकि पंचामृत-अभिषेक में तो पाँच ही चीजों से अभिषेक करते हैं, परन्तु यहाँ तो न जाने कितनी रंगों की चीजों से वैभव-प्रदर्शन के रूप में अभिषेक किया जा रहा है, उसकी कोई गिनती ही नहीं है। यह आयोजन सिर्फ ‘परिग्रह-प्रदर्शन’ का है, इसमें विवेक और औचित्य का दूर-दूर तक कहीं नामोनिशान तक नहीं है। जो भीड़ जुट रही है, वह मात्र मनुष्य की उत्सवप्रियता की निशानी है। विवेक का प्रयोग तो इनके किसी कोण से भी दिखाई नहीं दे रहा है। इनमें से कई लोग तो रिश्तेदारों व परिवारजनों के साथ के दबाव में रुचि नहीं होते हुये भी कृत-कारित-अनुमोदना से अपार-पाप बाँध रहे हैं।

यह आरोप नहीं है, बल्कि यदि कोई देखना चाहे, तो ज्वलंत-सत्य के रूप में सामने देखा जा सकता है। परन्तु भीड़ की मनोवृत्ति व अंधानुकरण करनेवाले इस जैनसमाज को समझाना लगभग अशक्य-अनुष्ठान जैसा है। अतः समझदार-लोगों के द्वारा आगाह किये जाने पर भी प्रतिदिन हजारों लोग जा रहे हैं और किराये-खर्चे के अलावा बोलियों (इसे ‘अभिषेक का टैक्स’ या ‘लोगों की श्रद्धा की जेबतराशी’ कहा जाये, तो अनुचित नहीं होगा। बस अंतर इतना है कि आयोजक भव्य-प्रचार से लोगों को मतिभ्रम पैदा कर रहे हैं और दिखाई यही दे रहा है कि लोग अपनी मर्जी से अभिषेक के बदले धनराशि चुका रहे हैं) व अनिवार्य-शुल्क के रूप में भरपूर पैसा देने के बाद किसी तरह धक्कामुक्की करके कहने मात्र का अभिषेक कर पा रहे हैं।

बिडम्बना की बात तो यह भी है कि न तो अभिषेक के लिये अपेक्षित द्रव्यशुद्धि है, न वस्त्रादि की शुद्धि का विवेक रखा जा रहा है और न ही विधि का पवित्रता पर किसी का ध्यान है। जिनबिम्ब तो निर्विकारभाव से वीतरागी की तरह खड़े हुये हैं और तथाकथित-भक्तगण उपसर्गकर्ताओं की तरह उनके ऊपर कुछ भी, कैसे भी उड़ेलकर चले जा रहे हैं।

अभिषेक के बाद इतने जल व पंचामृत के नाम पर अनगिनत अशुद्ध-पदार्थों को जिनबिम्ब के ऊपर ढोलने के बाद कोई यह विचार तक नहीं कर रहा है कि नीचे जाकर इसकी क्या गति हो रही है? यह लोगों के पैरों में जाकर अविनय को प्राप्त हो रहा है, या इससे बन रहे तालाब में कितनी अपार-त्रसजीवराशि उत्पन्न होकर बिलबिलाते हुये तेज धूप में मरण को प्राप्त हो रही है? किसी को सोचने तक की फुर्सत नहीं है। इस अपार-जीवहिंसा का पापभागी कौन है? आयोजक तो हैं ही, पर आयोजकों के ऊपर अव्यवस्था का आरोप मढ़कर अभिषेक करनेवाले अपने जघन्यपाप से बच नहीं सकते हैं।

विचार करिये कि प्रतिदिन प्रक्षाल के बाद हम लोग कितनी विनय से जिनबिम्ब का मार्जन/अंगप्रोक्षण तत्काल करके तब सादर गंधोदक का वंदन करते हैं। और यहाँ तो दिनभर अभिषेक ही चल रहा है। अंगप्रोक्षण करे कौन? सारे तथाकथित भक्तगण तो जिनबिम्ब के ऊपर विविधप्रकार के तरल-पदार्थ ढोलने के अलावा कुछ कर ही नहीं रहे हैं और गंधोदक के नाम पर वंदनीय तो कुछ है ही नहीं; क्योंकि लोगों के पैरों में गिरकर नाली में बहता हुआ द्रव-पदार्थ कभी ‘गंधोदक’ संज्ञा का पात्र हो ही नहीं सकता है? तब क्या उसका वंदन किया जा सकता है? क्या इन जिनबिम्ब के ऊपर ढोले जानेवाले तरल-पदार्थों की प्रासुकता की संभावना इस आयोजन में सोचने भी संभव है?

धिक्कार है उन लोगों को, जो जिनबिम्ब की व अभिषेक/प्रक्षाल की जिनाम्नाय में निर्दिष्ट हर मर्यादा का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन देखते हुये भी चुपचाप इस हिंसक-आयोजन में अपना योगदान करके ‘निधत्त’ और ‘निकाचित’ जैसे पापों का बंध कर रहे हैं। यह सही है कि जिनवाणी में ‘‘जिनबिम्ब के दर्शनमात्र से इन पापों की निर्जरा’’ कही गयी है। किन्तु उसी जिनवाणी में वीतरागी प्रतिष्ठित-जिनबिम्ब की मर्यादा के उल्लंघनरूपी कदाचार करने से इन्हीं पापों का तीव्र-बंध होना भी तो बताया गया है। अब विवेकपूर्वक विचार करिये कि आप जिनाभिषेक के नाम पर हो रहे इस आडम्बरपूर्ण, विवेकरहित-आयोजन के प्रतिभागी बनकर क्या अर्जित कर रहे हैं? पुण्य या पाप? क्योंकि धर्म की तो इसमें कहीं कोई संभावना तक नहीं है।

कुछ शुद्धाम्नाय के अनुयायी सज्जन-प्रकृति के लोग भी आयोजन को देखने के नाम पर यह कहकर जा रहे हैं कि ‘हम तो सुबह सबसे पहले जब जिनबिम्ब साफ, सूखे होंगे; तभी शुद्ध-प्रासुक-जल से अभिषेक करके चले आयेंगे। तब तो कोई दोष नहीं लगेगा?’ आश्चर्य है कि वे कैसे विवेकी हैं? जो लोग नित्य सविनय-प्रक्षाल करते हैं, उन्हें तो पता ही है कि प्रतिदिन प्रक्षाल के बाद तत्काल अंगप्रोक्षण करके ही अर्घ्य समर्पित करके गंधोदक-वंदन किया जाता है। क्या यहाँ प्रक्षाल के बाद आप अंगप्रोक्षण कर पा रहे हैं? क्या जल का ही सही, पर क्या गंधोदक बन भी पा रहा है? और क्या आप जिनाभिषेक के बाद जिनबिम्ब का अंगप्रोक्षण किये बिना उन्हें गीली-अवस्था में ही छोड़कर आने का जिनाम्नाय के विपरीत-कार्य नहीं कर रहे हैं?

मैं तो स्पष्ट कहता हूँ कि इस गृहीत-मिथ्यात्व के वर्द्धक तथा ‘हिंसा’ और ‘परिग्रह-प्रदर्शन’ के आडम्बरपूर्ण विवेकरहित आयोजन के सहभागी कदापि मत बनिये। जब यह आयोजन निबट जाये, तब शांत-परिणामों से उन्हीं जिनबिम्ब के निर्मल-स्वरूप की वंदना कर लेना। परन्तु इस आयोजन का अंग बनकर पापार्जन मत करिये। कहीं भी पंचामृत-अभिषेक जैसे जिनाम्नाय के विपरीत-कार्य के सहभागी कदापि मत बनिये।

जिनेन्द्रदेव व जिनबिम्ब की जिनाम्नाय के अनुसार सविवेक-भक्ति पूरी विधि एवं मर्यादा के साथ करें - यही जिनाज्ञा है और यही जैन-श्रावक की मर्यादा है।

यदि यहाँ कोई यह कहे कि “आजकल के कुछ मुनिराज एवं विद्वान् पंचामृत-अभिषेक कराते हैं व इनकी अनिवार्यता बताते हैं ? तो हम क्या करें?”

अब आपने पंचामृत-अभिषेक की प्रक्रिया के विषय में तो अभी तक के विवरण में पढ़ ही लिया है कि वह कितनी हिंसा-मूलक एवं आरम्भ-परिग्रह के अतिरेक से होने वाली प्रक्रिया है। घोर-आश्चर्य तो तब होता है, जब कई मूढ़मति-लोग ‘गन्ने के रस’ से और ‘मधु’ (शहद) से भी जिनबिम्ब का अभिषेक कराने की बात करते हैं। इनमें से ‘शहद’ तो विवेकीजनों के लिये छूने में भी महापाप है; क्योंकि अनन्त-त्रसजीवों की हिंसा के बिना शहद की उत्पत्ति नहीं होती है और इसके साथ ही यह मधु-मक्खियों की जूठन/उगला हुआ पदार्थ होने से भी नितान्त-अस्पृश्य है। ‘सामान्य-गृहस्थ को भी शहद छूने तक का निषेध है।’ क्योंकि छूने का राग भी उसकी निर्माण-विधि में हुई अनिवार्य-जीवहिंसा की अनुमोदनारूप पाप ही है। जो चीज श्रावक को छूने तक के लिए निषिद्ध है, उसी से जिनबिम्ब का अभिषेक करना घोर-अनर्थ नहीं, तो क्या है ?

गन्ने के रस में भी मिठास की विशेषता के कारण मक्खियों की भरमार इस पर होती है। वे इसमें गिरकर मर भी जाती हैं। साथ ही यह कब निकला होगा, पहाड़ पर ले जाने का समय और अभिषेक-हेतु प्रतीक्षा का समय निश्चितरूप से इसकी मर्यादा नष्ट करके इसे प्रासुक एवं ग्राह्य नहीं रहने देता है। तब ऐसे अमर्यादित एवं सचित्त हो चुके गन्ने के रस को सामान्य-गृहस्थ भी पीने तक के काम में नहीं ले सकते हैं, तो वीतरागी-जिनबिम्ब के निमित्त तो इसको छूना भी महापाप है। अभिषेक-हेतु इसका प्रयोग तो जिनाम्नाय में किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

साथ ही यह गंधोदक के रूप में प्रयोग नहीं लिया जा सकता है एवं नालियों में बहकर, गड्ढों में इकट्ठा होकर अनन्त-त्रसजीवों की उत्पत्ति का कारण होने से, जिसका प्रायश्चित्त करना भी कठिन है: ऐसे दुस्तर-पापबंध का निमित्त बनता है। अत: ऐसे पदार्थों से जिनबिम्ब का अभिषेक कराने की कल्पना भी विवेकीजनों के लिये असहनीय है।

जिनबिम्ब-प्रक्षालन की प्रामाणिक-विधि :-

एक प्रश्न यह भी आया था कि ‘जिनबिम्ब के अभिषेक या प्रक्षालन की विधि और कालगत-मर्यादा क्या है?’ इसका संक्षिप्त-समाधान निम्नानुसार है:

जिनाम्नाय के अनुसार तो स्थिर-जिनबिम्बों का सामान्यत: मात्र सूखे कपड़े से प्रोक्षण (पोंछ देना, धूलिकणों का निवारण करना) ही किया जाता है। यदि कदाचित् कोई अन्य दाग जैसा प्रतीत हो, तो गीले कपड़े से प्रोक्षण कर दिया जाता है। जल डालकर अभिषेक नहीं किया जाता। कोई अतिविशिष्ट-स्थिति (गीले कपड़े से भी दूर न हो सके, ऐसे दाग आदि) हो, और मज्जन करने की अनिवार्यता प्रतीत हो; तो मज्जन करने के बाद शुद्ध-प्रासुक-जल से प्रक्षालन करके तत्काल सूखे मुलायम कपड़े से अच्छी तरह से अंगप्रोक्षण करके जिनबिम्ब को पूरी गरिमापूर्वक विराजमान किया जाता है।

'यदि लोगों को दिखाने के लिये जिनबिम्ब को जल में एक क्षण के लिये भी अतिरिक्त-समय रखा जाये और अनावश्यकरूप से लोगों की तसल्ली के लिये जिनबिम्ब पर जल ढोला जाये; तो यह प्रतिष्ठित-जिनबिम्ब की घोर-अविनय है और वीतरागी-जिनबिम्ब की मर्यादा का उल्लंघन है। इसके परिणामस्वरूप तीव्र-पापबंध होना निश्चित है; क्योंकि अनावश्यकरूप से जिनबिम्ब को गीला रखना, यह अशुभ है। सामुद्रिक-विद्या (ज्योतिष-संबंधी शारीरिक-लक्षणशास्त्र) के स्वप्नशास्त्र के अनुसार भी यदि कोई व्यक्ति गीले जिनबिम्ब का स्वप्न देखता है, तो यह नितान्त-अशुभ ही है और उस व्यक्ति व समाज/राष्ट्र के लिये अमंगल का सूचक है। अत: अपनी सुविधा के लिये जिनबिम्ब को गीला रखना - यह जिनाम्नाय और विवेक - दोनों के विपरीत ही है।

सचल-जिनबिम्ब मुख्यतः मात्र धातुनिर्मित ही होते हैं, अतः उनका शुद्ध-प्रासुक जल से अभिषेक की परिपाटी प्रचलित तो है। परन्तु इसकी अनिवार्यता का कोई तर्क मुझे समझ में नहीं आ सका। मेरे विवेक के अनुसार तो सूखे-वस्त्र से या अधिकतम नमीयुक्त हल्के गीले-वस्त्र से ही उनका प्रक्षालन होना चाहिये और उसे दिखाने के लिये किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करना चाहिये। क्योंकि कोई भी सांसारिक-व्यक्ति तीन लोक के नाथ वीतरागी-जिनेन्द्र-परमात्मा से तुलनीय नहीं है। अतः लौकिकजनों के लिये जिनबिम्ब की विधि को रोककर नहीं रखा जा सकता है और यदि कोई भी किसी व्यक्ति-विशेष के लिए जिनबिम्ब को प्रक्षाल के थाल में रखे रहने का अतिसाहस करता है, तो वह जिनाज्ञा के उल्लंघन का घोर अपराधी है।

जिनबिम्ब का अभिषेक या प्रक्षालन मात्र उनकी पवित्रता और मर्यादा को बनाये रखने के लिये किया जाता है, न कि यह कोई उनकी अनिवार्यता है। क्योंकि ‘जिनप्रतिमा जिन-सारखी कही जिनागम-माँहिं’ के अनुसार जिनबिम्ब की वैसी ही पवित्रता बनायी रखी जानी चाहिये, जैसी साक्षात् जिनबिम्ब की होती है। जिनेन्द्रदेव पर कभी भी धूलिकण आदि की अपवित्रता संभव ही नहीं है, अतः उनका अभिषेक या प्रक्षालन कभी भी नहीं होता है। ‘जो जन्माभिषेक सौधर्मेन्द्र करता है, वह ‘बाल-तीर्थंकर’ का करता है; न कि अरिहंत-अवस्था में।’

किन्तु जिनबिम्ब साक्षात् जिनेन्द्रदेव नहीं हैं, आकार और गरिमा में उनके सदृश माने गये हैं। अतः उन पर धूलिकण आदि की अपवित्रता संभव है, और उसी के निवारण के लिये जिनबिम्ब की प्रक्षालन या अभिषेक की विधि कही गयी है। न कि अभिषेक या प्रक्षालन देखना और इस कारण से जिनबिम्ब को घंटों गीली-अवस्था में रखना कोई धर्मविधि है। इसका सभी श्रावकों को पूर्ण-विवेक होना ही चाहिये।

जिनबिम्ब का प्रक्षालन देखने का मुख्य-उद्देश्य :-

जो जिनबिम्ब का प्रक्षालन देखने की प्रेरणा कदाचित् दी भी जाती है, तो उसकी उद्देश्य मात्र यही हो सकता है कि चूँकि जिनबिम्ब का प्रक्षालन सुबह-सुबह सबसे पहले एक ही बार होता है; अतः हम सबसे पहले सर्वोच्च-वरीयता (टॉप-प्रियारिटी) पर जिनेन्द्रदेव के दर्शन-पूजन करें। न कि पहले टीवी, अखबार, चाय-नाश्ता आदि करके फिर सुविधानुसार मंदिर जी जाया जायें; क्योंकि वास्तविक नियम यही है कि यदि कुछ भी खा-पी लिया जाये, तो जिनबिम्ब को स्पर्श करने का भी अधिकारी श्रावक उस दिन नहीं रह जाता है। जिनबिम्ब का प्रक्षालन सर्वप्रथम हो, इसी दृष्टि से प्रक्षालन की प्रेरणा दी गयी है। यदि हम अपनी दिनचर्या प्रारम्भ कर लेते हैं और जिनबिम्ब बिना प्रक्षालन के रहते हैं, तो सम्पूर्ण-समाज इसकी दोषी है; क्योंकि उन्हें हमने प्रतिष्ठापूर्वक विधिवत् मंदिरजी में विराजमान कराया है, तो उनकी गरिमा बनाये रखना हम सबकी सर्वोपरि जिम्मेवारी है। इसी दृष्टि से जिनबिम्ब का प्रक्षालन देखने की कदाचित् प्रेरणा दी गयी मालूम होती है। यह सामाजिक-सावधानी व जन-जागृति की बात है, कोई धर्मविधि ज्ञात नहीं होती।

हाँ, जिनेन्द्रदेव की पूजनविधि के लिये जिनबिम्ब का प्रक्षालन क्रमिक-विधि में कहा गया है। वह मात्र इसीलिये कि जिनबिम्ब के प्रक्षालन के बिना उनकी पूजनविधि करना समीचीन नहीं है। अतः जिनबिम्ब का प्रक्षालन करके पूजनविधि करने का निर्देश है। किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि यदि आप मंदिरजी बिलम्ब से पहुँचते हैं, और जिनबिम्ब की प्रक्षालन विधि उसके पहले सम्पन्न हो चुकी है, तो आप दुबारा जिनबिम्ब की प्रक्षालन विधि करेंगे। ऐसा करना कदापि उचित नहीं है। यह अमर्यादित-आचरण है और जिनाज्ञा का स्पष्टरूप से उल्लंघन है। आज जो अधिकांश जिनमंदिरों में जिनबिम्बों पर पानी के दाग दिखायी देते हैं, कई जगह तो जिनबिम्ब पर काई (शैवाल) जैसी जमी दिखती है, वह इसी गलत परम्परा की देन है कि जब जिसका मन किया, तब पानी डालकर अभिषेक कर लिया। अंगप्रोक्षण की जिम्मेवारी ढंग से निभायी नहीं जाती है। अतः जिनबिम्ब में मलिनता के चिह्न दिखायी देते हैं। ऐसी कल्पना भी वीतरागी-जिनबिम्ब के विषय में करना अशुभ है। तो ऐसी स्थिति का निर्माण करना तो प्रतिष्ठित-जिनबिम्ब की मर्यादा को भंग करना है। मलिन-स्थितिवाले जिनबिम्ब तो दर्शन-पूजन के योग्य हैं ही नहीं।

‘पंचामृत-अभिषेक’ की बात तो जिनाम्नाय की मर्यादा में संभव ही नहीं है। मात्र शुद्ध-प्रासुक जल से ही प्रक्षालन-विधि करने का निर्देश जिनाम्नाय में मिलता है। क्योंकि ‘इन तथाकथित-पंचामृतों को डालने से जिनबिम्ब के मलिन होने की ही संभावना होती है, न कि निर्मलता की।’ इसके करने से आरम्भ-परिग्रह बढ़ता है और पंचामृत-अभिषेक से जीवहिंसा की अनिवार्य एवं प्रचुर-संभावना होती है।

अतः दिन में एक बार शुद्ध-प्रासुक-जल से हलके गीले किये गये वस्त्र से जिनबिम्ब का प्रक्षालन करना और तत्काल सूखे मुलायम निर्मल-वस्त्र से उनका अंगप्रोक्षण करके पूरीतरह से सूखा करके उन्हें विराजमान करना - यही जिनबिम्ब के अभिषेक या प्रक्षालन की एकमात्र शुद्ध व सात्त्विक-विधि है। अन्य पंचामृत-अभिषेक आदि की प्रक्रिया आरम्भ-परिग्रह की अधिकता से युक्त होने से तथा अनिवार्य-जीवहिंसा से परिपूर्ण होने से इसका देखना भी ‘तीव्र-पापबंध’ और ‘दर्शनमोहनीय-कर्म के बंध’ का कारण है; क्योंकि ऐसा करने से ‘जिनबिम्ब का अवर्णवाद’ निश्चितरूप से होता ही है।

ज्ञातव्य है कि ‘संयम-धारण करने योग्य मनुष्यगति यदि हमें इष्ट है, तो अल्प-आरम्भ और अल्प-परिग्रह के साथ-साथ स्वभाव की सरलता निरन्तर बनी रहना अनिवार्य है।’ क्योंकि मनुष्यायु के बंध के कारण ये ही हैं। इनसे विपरीत-आचरण करके (अर्थात् बहुत-आरम्भ, बहुत-परिग्रह एवं मन की कुटिलतापूर्वक आचरण करके) जीव नरक-निगोद आदि का पात्र होगा और यदि अन्य ग्रन्थों के उल्लेखों को दिखाकर छल से ऐसा किया; तो तिर्यंचगति का बंध होना सुनिश्चित है। इन गतियों में जिनबिम्ब के दर्शन तक दुर्लभ हैं, प्रक्षालन व पूजनविधि करने का सौभाग्य तो पूर्णतः असंभव है।

अतः जिनबिम्ब का पंचामृत-अभिषेक करना या मात्र जल से भी मनमाने ढंग से अभिषेक करना - यह जिनाज्ञा का उल्लंघन है। जिनाम्नाय के विरुद्ध है। विवेकपूर्वक जिनबिम्ब का प्रक्षालन करना ही जिनाम्नाय है।

स्त्रियों को जिनबिम्ब-स्पर्श व प्रक्षाल क्यों नहीं करना चाहिए :-

स्त्रियों को जिनबिम्ब का स्पर्श व अभिषेक करना चाहिये या नहीं? - इस विषय पर अब विवेचन प्रस्तुत किया जायेगा।

स्त्रियों से वीतरागी-जिनबिम्ब का प्रक्षालन या अभिषेक कराना या उनके द्वारा स्वयं किया जानी क्या जिनाम्नाय के अनुरूप है? शास्त्रीय-प्रमाणों की बहस में उलझे बिना विवेकपूर्ण-रीति से इस प्रश्न का समाधान यहाँ करने की पूरी ईमानदारी व निष्ठा से कोशिश करूँगा।

स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 13-37

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पहले तो यही विचार किया जाये कि स्त्रियों को जिनबिम्ब का स्पर्श करने का नैतिक-अधिकार जिनाम्नाय के अनुसार संभव है या नहीं? तो क्यों न हम जिनेन्द्र-अवस्था से पहले की मुनि-अवस्था से हम इस विषय में विचार करें? क्या स्त्री मुनिराज को स्पर्श कर सकती है? क्या इससे उनके ब्रह्मचर्य-महाव्रत में दोष नहीं लगेगा? “अठ-दस-सहस-विध-शील धर, चिद्ब्रह्म में नित रमि रहैं” - इस मुनिधर्म के गौरव-वाक्य का फिर क्या स्वरूप रहेगा, जिसमें मुनिराज को अट्ठारह हजार प्रकार के शील के धारक होने की बात कही गयी है?

यदि कहा जाये कि “आहारदान के समय जैसे मुनिराज को स्पर्श किये बिना उन्हें आहार देती हैं, उसीप्रकार वे जिनेन्द्रदेव के बिम्ब का बिना छुये अभिषेक करने में क्या दोष है?”

अरे! भाई! अभिषेक या प्रक्षालन की विधि में मात्र हल्के गीले कपड़े से जिनबिम्ब का मार्जन किया जाता है, उन पर जल ढोला नहीं जाता है। और अभिषेक की विधि का ही अंग है ‘अंगप्रोक्षण’ अर्थात् उनके शरीर को निर्मल, मुलायम-वस्त्रखण्ड से उनके शरीर को पोंछना और यह कार्य जिनबिम्ब को स्पर्श किये बिना कदापि संभव ही नहीं है। अत: जिनाभिषेक का कार्य स्त्रियाँ नहीं कर सकती हैं: यह स्पष्ट बात है।

इतना ही नहीं, जिसे जिनाभिषेक का अधिकार होता है, उसे वेदी से जिनबिम्ब को उठाना, पुन: विराजमान करना, वेदी की सफाई-व्यवस्था करना और पुन: विराजमान करना आदि सम्पूर्ण-दायित्वों का निर्वाह करना होता है। वह पराश्रित होकर कार्य नहीं कर सकता कि ‘कोई आकर बाकी सारे कार्य कर दे, तो मैं मात्र जल डालकर अभिषेक का पुण्यलाभ ले लूँ।’ इसीलिये जिनाम्नाय में कहा गया है कि “स्त्रियों को जिनाभिषेक/प्रक्षालन का अधिकार नहीं है।”

कहाँ तक कहूँ?’ स्त्रियों को तो जिनबिम्ब के गर्भगृह में जाने और वेदी के स्पर्श तक की मनाही है; क्योंकि वेदी गर्भगृह के भीतर ही होती है।’

इसका कारण यह है कि ‘प्रकृति ने स्त्रियों के शरीर में ऐसी स्थिति ही नहीं दी है, कि वे जिनबिम्ब के स्पर्श के योग्य पवित्र रह सकें। निरन्तर विभिन्नप्रकार के स्रावों के कारण एवं उनके गुह्य-अंगों में सम्मूर्छन-पंचेन्द्रियजीवों तक की उत्पत्ति का योग निरन्तर बना रहता है: यह बात जिनवाणी में भी कही गयी है और हर स्त्री भी भावात्मकरूप से इससे भलीभाँति परिचित होती है।’, यह कोई आक्षेप या दोषारोपण नहीं है; बल्कि यह एक ऐसा कटु-सत्य है, जिससे बाला हो या वृद्धा, सुशिक्षित हो या अशिक्षित, नागर हो या ग्राम्या, हर वर्ग की स्त्रियाँ स्वत: ही अपने प्रतिदिन के अनुभवों के कारण सुपरिचित होती हैं। अब मनुष्यगति में प्रधान ‘मानकषाय’ के प्रभाव में आकर कोई स्त्री भले ही इससे इन्कार करे और जिनाभिषेक करने का आग्रह करे; किन्तु यह वे सभी जानती हैं कि यह उनका कदाग्रह ही है, पात्रता नहीं।

एक बात और, क्या तद्भव-मोक्षगामी बाल-तीर्थंकर का जन्माभिषेक स्त्रियाँ करती हैं? कदापि नहीं कर सकती हैं। तो अर्हन्त-अवस्था में वे उनका अभिषेक कैसे कर सकती हैं। यहाँ यह बात विशेषरूप से विचारणीय है कि नवजात तीर्थंकर-बालक को शची-इन्द्राणी अपने हाथों से गर्भगृह से बाहर लाती है; तथापि जन्माभिषेक हेतु ले जाने के लिये वह उस नवजात तीर्थंकर-बालक को सौधर्मेन्द्र के हाथों में सौंप देती है। तब पांडुकशिला पर इंद्रगण ही उनका जन्माभिषेक करते हैं। उसके बाद इन्द्रों से अंगप्रोक्षण करने के बाद उन्हें वस्त्राभूषण आदि से सज्जित करने का कार्य पुनः शची-इन्द्राणी ही करती है।

इस सम्पूर्ण-प्रक्रिया में हम देखते हैं कि यद्यपि बाल-तीर्थंकर को स्पर्श आदि करने का पूरा काम स्त्री (शची-इन्द्राणी) करती है; तथापि उनके जन्माभिषेक का कार्य स्त्रियाँ नहीं करती हैं, मात्र पुरुष (इंद्रगण) ही करते हैं। क्या इससे यह स्पष्ट संकेत नहीं मिलता है कि जिनाम्नाय में अभिषेक करने का कार्य स्त्रियाँ नहीं करती हैं।

अरे! जिनाभिषेक की बात तो दूर रहे, राजाओं जैसे सांसारिक-व्यक्तियों के राज्याभिषेक जैसे लौकिक-कार्यों में भी अभिषेक-विधि पुरोहित-वर्ग के पुरुष ही सम्पन्न करते हैं - यह नियम है। तो फिर जिनाभिषेक जैसे कार्य की अधिकारिणी स्त्रियाँ कैसे हो सकती हैं? स्त्रियों को दासी आदि रूप में अपने स्नानादि के दायित्व के लिये नियुक्त करना भोग-विलासिता का चिह्न तो हो सकता है, सज्जन-शालीन-गृहस्थ की पहिचान कभी नहीं हो सकती है। तब मुनि-अवस्था से ही 18000 प्रकार के शील के धनी रहे अरिहन्त-परमात्मा के प्रतिष्ठित-जिनबिम्ब का स्त्री अभिषेक कैसे कर सकती है?

फिर हमें इन लोगों का षड्यन्त्र जानते हुये भी इनके जाल में फँसने की आवश्यकता ही क्या है? पर यह लिखने का उद्देश्य समाज को तथ्यों से अवगत कराना है। साथ ही पुरुषों को सावधान करना भी है कि आप अपने दायित्वों को गम्भीरता से समझिये और पूरी जिम्मेवारी से निभाइये।

ऐसा देखने में आ रहा है कि कई जगहों पर समाज का शहरों में पलायन हो जाने से अथवा पुरुष-सदस्यों का व्यापार, नौकरी आदि के लिये महानगरों में या परदेश में बस जाने से उनके मूल-स्थान में पूर्वजों द्वारा निर्मित भव्य-जिनमंदिरों की प्रक्षाल-पूजन की व्यवस्था या तो गरीब जैनभाई वेतनभोगी-पुजारी बनकर कर रहे है, कहीं-कहीं तो ब्राह्मण-पंडित ही किसी तरह कर रहे हैं।

किन्तु जहाँ के निवासियों के पास इन्हें तनख्वाह देने के संसाधन नहीं हैं, वे मजबूर हैं। जिनबिम्ब बिना प्रक्षाल-पूजन के मलिन-अवस्था में रहें - यह देखकर उनकी वहाँ रह रही जैन-गृहिणियों का हृदय रोता है और उनमें से कुछ गृहिणियाँ इसे दोषपूर्ण-कार्य जानते हुये भी जिनबिम्ब के प्रक्षाल-पूजन की विधि करने लगी हैं। यद्यपि वे इसे अनुचित मानती हैं, तथापि जिनबिम्बों की उपेक्षित-दशा बर्दाश्त न कर सकने से तथा अपना साधनविहीनता से वे दुःखी-मन से ऐसे कार्य करने को विवश हैं। वे जिनाम्नाय की विरोधी नहीं हैं और न ही स्त्रियों को जिनाभिषेक करना उचित मानती हैं। किन्तु मजबूरीवश वे ऐसा कर रही हैं।

ग्रामीण-अंचलों से पलायन करके कई स्थानों पर पूर्वजों के पूरे जिनालय (भवन को छोड़कर) शहरों के मंदिरजी में स्थानान्तरित हुये मैंने स्वयं देखे हैं। किन्तु यह बिडम्बना की स्थिति को किसी सीमा तक संवारने का प्रयास है। आदर्शविधि नहीं है। हमें जिनालयों और जिनबिम्बों को बनवाने एवं विराजमान कराने में यह विवेक रखना होगा कि आगामीकाल में इनकी शास्त्रोक्त-विधि से प्रक्षाल-पूजन की व्यवस्था कैसे निर्विघ्नरूप से चल सकेगी?

जिनबिम्बों व जिनमंदिरों की स्थापना का लक्ष्य क्या हो? :-

इसी प्रसंग में तीर्थक्षेत्रों पर लगातार बन रहे और बढ़ रहे जिनमंदिरों एवं जिनबिम्बों की संख्या भी चिंतनीय होती जा रही है। पैसों के जोर पर ‘दानवीर’ बननेवाले श्रीमन्त यह विचार नहीं करते कि मानबढ़ाई के लिये (कुछ लोग प्रभावना के शुभभाव से भी ऐसा करते हैं) पैसा खर्च करके जिनमंदिरों एवं जिनबिम्बों की संख्या बढ़ाने में लगे हुये हैं।

उन्हें शायद प्रतिष्ठाचार्यगण यह शिक्षा ही नहीं देते हैं कि ‘एक जिनमंदिर या जिनबिम्ब विराजमान करना मात्र आर्थिक-संसाधन दे देना नहीं है। बल्कि कम से कम तीन से सात पीढ़ियों तक के लिये उनके जिनाम्नाय के अनुसार नियमितरूप से प्रक्षाल-पूजन की व्यवस्था सुनिश्चित करना व इसकी पूरी जानकारी रखना तथा जहाँ कहीं कोई कमी पता चले, तो स्वयं वहाँ जाकर उस कमी को सर्वोच्च-प्राथमिकता (टॉप प्रियॉरिटी) पर सुधारना - यह भी संकल्प होता है।’ अन्यथा उन जिनमंदिरों या जिनबिम्बों की स्थापना के बाद उपेक्षा का पापबंध भी उन्हें ही होगा।

परन्तु आजकल विधि की पवित्रता की जगह व्यावसायिकता इतनी प्रधान हो गयी है कि प्रतिष्ठाचार्यगण अपनी कमाई देखते हुये अधिक से अधिक जिनमंदिरों एवं जिनबिम्बों की प्रतिष्ठाविधि की औपचारिकता पूरी करते हुये अपना स्वार्थ साध रहे हैं; तो श्रेष्ठिगण द्रव्य देकर अपनी औपचारिकता पूरी मान रहे हैं। इसी के दुष्परिणामस्वरूप वेतनभोगी-पुजारियों की नौबत अब सब जगह अनिवार्यता बनने लगी है। और जब वे ‘तन’ के लिये ‘वेतन’ लेंगे, तो ‘जिन’ के लिये जिनाम्नाय के अनुसार प्रक्षाल-पूजन की ‘शुद्ध-विधि’ कौन करेगा ? किससे आशा रखी जाये ?

अस्तु, हमारी मूल-बात स्त्रियों के द्वारा जिनाभिषेक करने की चल रही थी। तो यदि यह जिनाम्नाय के अनुरूप नहीं है, तो कैसे और क्यों जिनाम्नाय में इसका प्रचलन किया जा रहा है ? - इस विषय में कुछ तथ्यों पर आपका ध्यानाकर्षण करना चाहता हूँ।

स्त्रियों द्वारा प्रक्षाल करने की प्रेरणा के पीछे का परिदृश्य :-

आज तो जमाना बहुमत का हो गया है, सत्य का नहीं। तो जो लोग पंचामृत-अभिषेक एवं सचित्त-पूजन, रात्रिपूजन जैसे कार्यों के कारण मूलाम्नाय से बहिष्कृत थे, उन्होंने अपना बहुमत बनाने के लिये आधी-आबादी को टारगेट बनाया। इससे उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधने की कुटिल-चेष्टा की।

  1. पहला तो भावुक-मना स्त्रियों की कोमल-भावनाओं का समर्थन लेने का काम किया क्योंकि ‘हृदयेन गृह्यते नारी’ की नीति के अनुसार यदि नारियों की मनोभावनाओं का कोई समर्थन करे, तो वे सहज ही उसके अनुकूल हो जाती हैं।

  2. दूसरे शुद्धाम्नायवाले व्यक्तियों के घरों में फूट डालने का काम किया, क्योंकि स्त्रियों के बिना तो कोई घर नहीं होता है और जब घर की गृहिणी ही विपरीतमना हो जायेगी, तो फिर आधी-जंग तो आपने बिना लड़े ही जीत ली मानी जायेगी।

  3. तीसरी बात, स्त्रियाँ ही नयी-पीढ़ी की पहली-गुरु होती हैं; क्योंकि बालक सबसे अधिक उन्हीं पर आश्रित रहता है और उन्हीं की सन्निधि में रहता है; अतः स्त्रियों को अपने पक्ष में करके इन बहिष्कृत-लोगों ने हमारी आगामी-पीढ़ियों को भी बिगाड़ने की बेहद शातिराना-चाल चली। - इन कुटिल-चेष्टाओं से इन लोगों के मन में निहित छल और मायाचार की अनंतानुबंधिता को स्पष्टरूप से पहिचाना जा सकता है।

वह तो भगवान् ऋषभदेवजी ने सुविचारितरूप से पहले ही जैनसमाज में स्त्रियों को सुशिक्षित करके विवेकवान् बना दिया था; अतः सदियों से निरन्तर किये जा रहे ऐसे कुत्सित-प्रयासों के बाद भी अधिकांश जैन-गृहिणियों ने विवेक का परिचय दिया और इनके बहकावे में नही आयीं। इसका ज्वलंत- प्रमाण यह है कि आज ऐसे पंचामृत-अभिषेक एवं सचित्त-पूजन, रात्रिपूजन के साथ स्त्रियों से जिनाभिषेक कराने जैसे आन्दोलन चलानेवाले लोगों के घरों अधिकांश जैन-गृहिणियों ने जिनाभिषेक करने से अपने को अलग रखते हुये मूलाम्नाय का समर्थन किया है।

प्रत्यक्ष देखा जा सकता है कि वर्तमान में चल रहे जिनाम्नाय के विपरीत एक विशाल-आयोजन में जहाँ जिनाम्नाय के विपरीत पंचामृत-अभिषेक आदि अभिषेक-विधि करनेवाले पुरुषों की विशाल संख्या है; वहीं इनकी तुलना में इनके साथ तीर्थवंदना को जानेवाली जैन-गृहिणियों की भरपूर संख्या होते हुये भी दस प्रतिशत भी जैन-गृहिणियाँ वहाँ अभिषेकविधि नहीं कर रहीं हैं।

इसमें भी बड़े रहस्य की बात यह है कि इन दस प्रतिशत गृहिणियों में भी अधिकांश जैन-गृहिणियाँ उसी दक्षिणभारत के जैन-परिवारों की हैं, जिनके यहाँ प्रतिदिन सुबह मंदिरजी में जिनाभिषेक का कार्य स्त्रियाँ ही करती हैं। क्योंकि कृषि-आजीविका के कारण उनके घर के पुरुष-सदस्य सुबह से शाम तक खेतों में कार्यरत रहते हैं। इसीलिये इन गृहिणियों को प्रतिदिन स्थानीय जिनमंदिरों में प्रातःकाल गर्भगृह की सफाई-व्यवस्था एवं अभिषेकविधि आदि करना होती है। अतः उनके दैनंदिन का यह अभ्यास होने से वे गृहिणियाँ सहज ही जिनाभिषेक करने में प्रवृत्त हो जाती हैं। किन्तु उत्तरभारत की अधिकांश जैनसमाज के सदस्यों के रूप में जो जैन-गृहिणियाँ वहाँ जा रही हैं, उनमें से तो आधा-प्रतिशत गृहिणियाँ भी जिनाभिषेक की विधि वहाँ स्वीकृत होते हुये भी नहीं कर रही हैं।

इससे स्पष्टरूप से समझा जा सकता है कि सदियों से इन मूलाम्नाय के विरोधी एवं जिनाम्नाय से बहिष्कृत लोगों के अनेकों षड्यन्त्रों के बाद भी स्त्रियों के द्वारा जिनाभिषेक करने की प्रक्रिया को हमारी प्रबुद्ध और विवेकी गृहिणियों ने ही स्वीकार नहीं किया है, इससे मान्यता नहीं दी है। इसी से स्पष्ट है कि जिनाम्नाय में स्त्रियाँ जिनाभिषेक नहीं करती थीं, न कर रही हैं और जब तक उनकी विवेकबुद्धि जागृत रहेगी, वे यह जिनाम्नाय के विपरीत कार्य नहीं करेंगी। चाहे कुटिलमति लोग कितने ही भव्य-आयोजन करें या कितने ही छली-प्रयोग करें। उनके षड्यन्त्रों की हमें चिंता करने की आवश्यकता ही नहीं है। हमारी प्रबुद्ध जैन-गृहिणियों ने ही उनके षड्यन्त्रों को विफल करने का शुभ-संकल्प ले रखा है।

इस विषय में प्रबुद्ध जिज्ञासुओं के कुछ और प्रश्न आ रहे हैं कि नंदीश्वरद्वीप में स्थित अकृत्रिम-जिनालयों में चतुर्निकाय देवगण तो अभिषेकविधि आदि करते हैं? पूजन की सामग्री कैसी होता है? आदि। इन कुछ सोशल-मीडिया से कुन्दकुन्द आदि आचार्यों का उल्लेख करके फैलाये जा रहे भ्रमों के निवारणार्थ विवेचन आगे प्रस्तुत करूँगा।

क्या जलाभिषेक ही जरूरी है या कपड़े से प्रक्षालन उचित है? :-

कुछ लोगों ने कहा कि कई लोग कहते हैं कि ‘‘जिनबिम्ब पर जल डालकर ही अभिषेक प्रतिदिन करना चाहिये, सूखे या गीले कपड़े से प्रक्षालन नहीं’’ - यह सुनकर मुझे बेहद आश्चर्य हुआ; क्योंकि वे अपने कथन के समर्थन में जो प्रमाण प्रस्तुत कर रहे थे, वह बिल्कुल गलत था। उन्हें या तो प्राकृतभाषा का ज्ञान नहीं था, इसलिये ऐसी गलत-व्याख्या कर रहे थे या फिर उन्होंने यह मान लिया था कि श्रोतागण तो नितान्त-अज्ञानी हैं, उन्हें जो कुछ भी जिनवाणी की गद्दी पर बैठकर बता दिया जायेगा, वे आँख बंदकर उसे मान लेंगे; क्योंकि वक्ता ने सफेद-धोती-दुपट्टा पहिन रखा था। शायद कोई विरक्तजन होंगे और यह समाज विरक्तजन का अतिशय-सम्मान करती है तथा आँख बंदकर उनकी बात सत्य मान लेती है। इसीकारण से सत्य के उद्घाटन के लिये मुझे यह लिखने को विवश होना पड़ा, ताकि सत्य की मूलानुगामी-प्रस्तुति हो सके।

मेरे पास जो वीडिओ-क्लिप आयी, उसमें जिनवाणी की गद्दी पर विराजमान वक्ता, जो कि किसी संघ के अंग बताये जाते हैं, जिनवाणी की जिस तरह गलत व्याख्या कर रहे थे, वह जिनाम्नाय की मर्यादा के विपरीत है। किसी को किसी बात का पक्ष लेना हो, तो वह अपनी मान्यता के रूप में भले ही ले। किन्तु उसके लिये जिनवाणी की पंक्तियों का अनर्थ करे, वह भी जिनवाणी की गद्दी पर बैठकर, जो ‘गणधरदेव की गद्दी’ कही जाती है - यह अक्षम्य-अपराध है।

क्या नन्दीश्वर-भक्ति में अभिषेक का प्रावधान है? :-

वक्ता-महोदय आचार्य कुन्दकुन्द-विरचित ‘दसभत्ति-संगहो’ नामक ग्रंथ की ‘नंदीश्वरभक्ति’ के आधार पर यह प्रतिपादन कर रहे थे कि ‘‘चतुर्निकाय के देवगण अष्टाह्निका-पर्वों में नंदीश्वरद्वीप में जाकर वहाँ स्थित अकृत्रिम-जिनालयों की वंदना के क्रम में वहाँ विराजमान अकृत्रिम-जिनबिम्बों का जल से अभिषेक करते हैं।’’ उसके समर्थन में उन्होंने ‘नंदीश्वरभक्ति’ की अंचलिका का ‘दिव्वेण ण्हाणेण’ पदों को आधार बनाया था कि देखो इसमें आचार्य कुन्दकुन्ददेव स्वयं लिख रहे हैं कि चतुर्निकाय के देवगण नंदीश्वरद्वीप में स्थित अकृत्रिम-जिनालयों में स्थित अकृत्रिम-जिनबिम्बों का जल से अभिषेक करते हैं।

मुझे बेहद दुःख हुआ कि इस शब्द का जो अर्थ और अभिप्राय है ही नहीं, वे उसकी प्रस्तुति कर रहे थे। मैं स्पष्टीकरण के लिये कुछ तथ्यों को प्रस्तुत कर रहा हूँ:

  1. यह सत्य है कि वहाँ ‘अंचलिका’ में ‘दिव्वेण ण्हाणेण’ का प्रयोग है। परन्तु क्या इसका अर्थ ‘ण्हाण’ अर्थात् ‘स्नान’ होता है? इसका मतलब यह हुआ कि आपके अनुसार चतुर्निकाय देवगण नंदीश्वरद्वीप में स्थित अकृत्रिम-जिनालयों के अकृत्रिम-जिनबिम्बों को जल से ‘स्नान’ कराते हैं? यदि आचार्य कुन्दकुन्ददेव को वहाँ ‘अभिषेक’ कहना अभिप्रेत होता, तो क्या वे ‘अभिषेक’ के लिये ‘स्नान’ शब्द का प्रयोग करते?

अरे! धिक्कार है ऐसी पूर्वाग्रही-बुद्धि पर, जिसमें आचार्य कुन्दकुन्ददेव जैसे महानतम-आचार्य के शब्द का ऐसा अनर्थ किया गया? क्या जिनबिम्ब के ‘अभिषेक’ को ‘स्नान’ कभी कहा जा सकता है?

जो आचार्य कुन्दकुन्द जिनाम्नाय के सबसे महान् रक्षक हुये, जिनके इस योगदान के कारण सम्पूर्ण जैनाचार्य-परम्परा ने उन्हें ‘मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो’ कहकर वर्तमान आचार्य-परम्परा का सर्वश्रेष्ठ-आचार्य मानती है, वे कभी ‘अभिषेक’ के लिये ‘स्नान’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं? अरे भाई! आचार्य कुन्दकुन्ददेव महाज्ञानी-आचार्य थे। श्रुतधर-आचार्य थे। उनका एक-एक शब्द जिनेन्द्र भगवान् के साक्षात्-वचन की तरह प्रमाण है। कम से कम उन पर तो ऐसा कुत्सित-आरोप मत लगाओ कि वे जिनबिम्बों के ‘अभिषेक’ के लिये ‘स्नान’ शब्द का प्रयोग करते थे।

‘अभिषेक’ के लिये आगमभाषा प्राकृत में ‘अहिसेय’ शब्द का प्रयोग होता है, ‘ण्हाण’ (‘स्नान’) शब्द का नहीं। ‘स्नान’ साधारण-मनुष्य देह के सौन्दर्य व स्पर्शन-इन्द्रिय के विषयभोग के लिये करते हैं। जबकि जिनबिम्ब की अभिषेक-विधि एक विनय से अनुप्राणित-प्रक्रिया है। इसीलिये उसे ‘अभिषेक’ या ‘प्रक्षालन’ शब्दों का प्रयोग जिनाम्नाय में हुआ है, न कि ‘स्नान’ शब्द का।

यदि मात्र शब्दकोशों के विवरण को आप प्रमाण मानकर यह कहेंगे कि शब्दकोशों में ‘अभिषेक’ और ‘स्नान’ शब्दों को समानार्थक बताया गया है; तो शब्दकोशों के अनुसार तो ‘नमस्ते’ और ‘नमोऽस्तु’ शब्दों को भी समानार्थक बताया गया है। तो क्या आप जिनाम्नाय की उपेक्षा करके मुनिराज को ‘नमोऽस्तु’ की जगह ‘नमस्ते’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं? कदापि नहीं; क्योंकि आम्नाय में शब्दों का अर्थ शब्दकोशों के आधार पर नहीं किया जाता है, बल्कि जिनाम्नाय के विशिष्ट-अभिप्राय के अनुसार ही किया जाता है।

यह कहकर मैं पूरी दृढ़ता से यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ‘नंदीश्वरभक्ति’ में आगत ‘ण्हाण’ शब्द का अर्थ ‘अभिषेक’ है ही नहीं।

  1. तो वहाँ प्रयुक्त ‘ण्हाण’ शब्द का वास्तविक-अर्थ क्या है? तो शब्दकोशों में ‘स्नानीयं जलं’ यह प्रयोग पाया जाता है अर्थात् मल-प्रक्षालनार्थ जिस ‘जल’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, उसी जल के लिये ‘स्नानीयं’ अर्थात् ‘स्नान’ के योग्य होने से उसे ‘स्नान’ या ‘ण्हाण’ शब्द का प्रयोग करना लोक में प्रचलित है। अतः इसके अनुसार ‘ण्हाण’ शब्द का अर्थ हुआ ‘जल’, न कि ‘अभिषेक’ करना। वही जल, जो कि पूजन के अष्टद्रव्यों में पहला होता है।

अकृत्रिम जिनबिम्बों का अभिषेक होता है क्या? :-

और वहाँ प्रकरण भी अष्टद्रव्यों से ‘नंदीश्वरद्वीप’ में स्थित अकृत्रिम-जिनालयों के अकृत्रिम-जिनबिम्बों की पूजा-अर्चना करने का है। तो ‘जल’ को पूजा के आठ-द्रव्यों में सबसे पहला द्रव्य माना गया है: यह तो सभी जानते हैं और उसी का उल्लेख आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने इस ‘दिव्वेण ण्हाणेण’ के द्वारा किया है कि चतुर्निकाय देवगण अष्टाह्निका-पर्वों में नंदीश्वरद्वीप में जाकर शुद्ध-प्रासुक-जल से उन अकृत्रिम-जिनबिम्बों की पूजाविधि सबसे पहले करते हैं। न कि उन अकृत्रिम-जिनबिम्बों का जल से अभिषेक करते हैं।

यदि हम ‘नंदीश्वरभक्ति’ में आगत ‘ण्हाणेण’ का अर्थ ‘जल’ नहीं लेकर ‘जल से जिनबिम्बों का अभिषेक करना’ लेंगे, तो फिर वहाँ अष्टद्रव्यों की संख्या कम हो जायेगी; क्योंकि फिर जलवाची अन्य कोई शब्द ही वहाँ प्रयुक्त नहीं हुआ है। तो क्या देवगण पूरे अष्टद्रव्यों से पूजाविधि नहीं करते हैं? क्या वे अष्टद्रव्यों में जल नहीं चढ़ाते हैं? यदि चढ़ाते हैं, तो उसका शब्द इस ‘अंचलिका’ में बताइये। क्योंकि ‘दिव्वेण ण्हाणेण’ का तो अर्थ आपने देवताओं के द्वारा अभिषेक करना से लिया है। शेष सभी द्रव्यों का उल्लेख ‘अंचलिका’ में है, (यद्यपि आजकल बीसपंथी लोगों ने उसमें ‘दिव्वेण चुण्णेण’ जैसे पदों का प्रयोग बीच में डालकर पकवान चढ़ाने की अपनी मान्यता की घुसपैठ करायी है, जिसका मैं कदापि समर्थन नहीं करता हूँ) मात्र जल का क्यों नहीं है? इसी से आपके छल की पोल खुल रही है; क्योंकि जो जल का वाचक था, उसका अर्थ आपने अपने हठाग्रह की पूर्ति के लिये ‘जलाभिषेक करना’ कर दिया है। जिसके कारण इस ‘अंचलिका’ में जल का वाचक शब्द नहीं मिल रहा है और पूजन के अष्टद्रव्यों की पूर्ति नहीं हो पा रही है।

इस विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि ‘दिव्वेण ण्हाणेण’ का अर्थ ‘जलाभिषेक’ था ही नहीं, वह पूजन के अष्टद्रव्यों का पहला द्रव्य ‘शुद्ध प्रासुक जल’ का ही वाचक था। जिसे इस वीडियो क्लिप के वक्ता वे हठपूर्वक पूर्वाग्रह के साथ ‘जलाभिषेक’ सिद्ध करने की असफल-कोशिश की है।

  1. अकृत्रिम-जिनबिम्बों का अभिषेक होता ही नहीं है, क्योंकि उन पर धूलिकण आदि से मलिनता होती ही नहीं है और जब जहाँ मलिनता होगी ही नहीं, तो प्रक्षाल या अभिषेक करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ेगी? अकृत्रिम-जिनबिम्बों और अकृत्रिम-जिनबिम्बों एवं कृत्रिमों के बीच यह भी एक महत्त्वपूर्ण-अंतर है। संभवतः इसीलिये ‘नंदीश्वरद्वीप’ अकृत्रिम-जिनालयों में विराजमान अकृत्रिम-जिनबिम्बों के दर्शन की महिमा पूजनकार ने इसप्रकार गायी है -

वयन नहीं कहैं, लखि होत सम्यक्धरं।

अर्थात् ‘नंदीश्वरद्वीप’ के अकृत्रिम-जिनालयों में विराजमान अकृत्रिम-जिनबिम्बों की महिमा वचनातीत है। यहाँ तक कि उनके दर्शनों से ‘सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होना’ भी एक ‘प्रमुख-फल’ बताया गया है।

साथ ही उन जिनबिम्बों की निर्मलता और कांति इतनी अद्भुत बतायी गयी है कि उनके समक्ष करोड़ों सूर्यों एवं चन्द्रमाओं की कांति भी फीकी मालूम पड़ती है और इतना होते हुये भी वे जिनबिम्ब दर्शनार्थी-देवों के लिये उनकी गति की मर्यादा से हटकर महावैराग्य-परिणामों में उनके उपयोग को स्थिर करने का काम करते हैं -

‘‘कोटि-शशि-भानु दुति-तेज छुप जात है।
महा-वैराग्य-परिणाम ठहरात है।।’’

जबकि देवों के संयम और वैराग्य की संभावना तक जिनागम में नहीं मानी गयी है। किन्तु वे ऐसे परिणाम और भावना अवश्य भा सकते हैं कि ‘उन्हें शीघ्र ही उत्कृष्ट-वैराग्य की प्राप्ति हो।’ वही भावना उन चतुर्निकाय देवों की ‘नंदीश्वर-द्वीप’ के अकृत्रिम-जिनालयों में विराजमान अकृत्रिम-जिनबिम्बों के दर्शन से पुष्ट होती है।

‘नंदीश्वर भक्ति’ में जिनाभिषेक सूचक कोई शब्द नहीं :-

  1. ‘नंदीश्वरभक्ति’ में भी कोई क्रियापद ऐसा नहीं आया है, जिसका अर्थ ‘अभिषेक करना’ होता है। वहाँ प्रयुक्त सारे क्रियापद निम्नानुसार हैं-

‘अच्चंति’ (अर्चना करते हैं), ‘पुज्जंति’ (पूजा करते हैं), ‘वंदंति’ (वंदना करते हैं), ‘णमंसंति’ (नमस्कार करते हैं)। ‘अच्चेमि’ (अर्चना करता हूँ), ‘पुज्जेमि’ (पूजा करता हूँ), ‘वंदामि’ (वंदना करता हूँ), ‘णमंसामि’ (नमस्कार करता हूँ)।

इन सबके सरल हिंदी-अर्थ भी मैंने यहाँ साथ में ही लिख दिये हैं। आप सब समझदार हैं, देखिये और अपने विवेक से विचारिये कि इनमें से किस शब्द का अर्थ ‘अभिषेक करना’ हो सकता है? किसी का भी नहीं। तब इन वक्ता महोदय ने जिनवाणी की गद्दी पर बैठकर कैसे और किस शब्द का यह अर्थ कर दिया कि चतुर्निकाय देवगण ‘नंदीश्वरद्वीप’ के अकृत्रिम-जिनालयों में विराजमान अकृत्रिम-जिनबिम्बों की अभिषेक विधि या ‘जलाभिषेक’ करते हैं।

यह तो समाज के साथ विश्वासघात है कि जिस समाज ने आप पर विश्वास करके जिनवाणी की गद्दी पर बिठाया, आप उसी समाज को जिनवाणी का गलत-सलत अर्थ करके बरगला रहे हैं? समाज के लोग संयम का सम्मान करते हैं और आप पर विश्वास करते हैं, तो उनके विश्वास का नाजायज लाभ मत उठाइये। अपने भावों पर भी ध्यान दीजिये। क्या आप नहीं जानते हैं कि जिनवाणी के वचनों की विराधना करके आप ‘दर्शनमोहनीय कर्म’ का तीव्र-बंध कर रहे हैं? इन भावों का फल क्या होगा? कभी विचार किया है आपने? और समाज जब आपके इस छल को प्रमाणसहित जानेगी, तब कहाँ जाकर मुँह छुपायेंगे?

दया आती है ऐसे लोगों पर, जो थोड़े से मानकषाय आदि के तुच्छ-स्वार्थवश जिनवाणी की विराधना का जघन्य-पाप कर इस दुर्लभ-मनुष्यभव को बर्बाद कर रहे हैं और तथाकथित-संयम को भी कलंकित कर रहे हैं। यदि शुद्ध-आम्नाय से जुड़े और उसके समर्थक कहे जानेवाले आज के किसी आचार्य के शिष्य होकर आप ‘नंदीश्वरभक्ति’ के उद्धरण से ‘अभिषेक’ का समर्थन करने की चेष्टा कर रहे हैं, तो यह अपने पैर पर कुठारघात तो है ही; साथ ही ‘जिनवाणी का अवर्णवाद’ और ‘आचार्य कुन्दकुन्ददेव की आम्नाय का उल्लंघन’ भी है।

इसी क्रम में मैं एक अन्य प्रश्न पर भी विचार कर लेता हूँ। मुझसे एक जिज्ञासु सज्जन ने प्रश्न किया कि ‘‘यदि वर्तमान में चल रहा ऐसा महा-आयोजन गृहीत-मिथ्यात्व का पोषक एवं पंचामृत-अभिषेक, स्त्रियों द्वारा अभिषेक आदि जिनाम्नाय-विरोधी कार्यों का केन्द्र है, तो ऐसे आयोजन (यहाँ उस क्षेत्र या वहाँ विराजमान जिनबिम्बों की समीक्षा नहीं है, मात्र आयोजन पर केन्द्रित चर्चा है) की आयोजन-समिति के पदाधिकारी के रूप में इन जिनाम्नाय-विरोधी कार्यों का दोष लगेगा या नहीं? इनके चलते हुये यदि कोई इनमें सामान्य-जलाभिषेक भी करे, तो क्या जिनाभिषेक की शुद्ध-विधि मानी जाये?’’

यह स्पष्ट है कि कोई आयोजन यदि गृहीत-मिथ्यात्व का पोषक एवं पंचामृत-अभिषेक, स्त्रियों द्वारा अभिषेक आदि जिनाम्नाय-विरोधी कार्यों का केन्द्र है, तो उसके सूत्रधार बनकर आप कृत-कारित-अनुमोदना के दोषों से कदापि नहीं बच सकते हो और जिनाभिषेक की निर्दोष व पूर्णविधि के बिना आप मात्र जल से अभिषेक करके भी उस आयोजन के अंग तो बन ही रहे हैं।

जिनाज्ञा के अनुसार तो जब ऐसा आयोजन पूर्ण हो चुकें और जिनबिम्ब निर्दोष-अवस्था में आ जायें; तब जाकर निराकुल-भाव से पूरी विधि से दर्शन एवं प्रक्षाल-पूजन करना उचित है। अन्यथा किसी न किसी रूप में परिस्थितियों के अनुसार आप इस आयोजन के सहभागी बनकर इसके दोषों से अपने को बचा नहीं सकते हैं।

इसके अंग बनकर हम जिनाम्नाय-विरोधी कार्यों के सहभागी बन ही रहे हैं।

अतः हमें विवेकपूर्वक ऐसे आयोजनों में सहभागिता नहीं करनी चाहिए। और अपने परिचितों व विश्वस्तजनों को भी इस विषय में स्पष्ट शब्दों में सावधान करने का नैतिक दायित्व निभाना चाहिए। OOO

‘स्नात’, ‘स्नातक’ और ‘अभिषिक्त’

स्नान से विकसित ‘स्नातक’ पद केवल नहा लेने का सूचक नहीं है। उसके लिये तो ‘स्नात’ अर्थात् ‘नहा चुका व्यक्ति’ मूल-प्रयोग है। किन्तु जब बौद्धिक-प्रतिभा के लोकमान्य-मानकों के आधार पर अपनी पात्रता कोई प्रमाणित कर देता है, तब वह ‘स्नातक’ कहलाता है। क्योंकि ‘स्नात’ वह है जो या तो स्वयं नहा लेता है, या नौकर-चाकर जिसे नहला देते हैं। इससे मात्र दैहिक-मल का प्रक्षालन होता है। जबकि ‘स्नातक’ वह होता है, जो अपने निर्धारित विषय की परिधि में लौकिक-मानकों के अनुरूप अपने अज्ञानमल को प्रातिभ-प्रक्षालन कर तद्विषयक ज्ञान की निर्मलता को प्रमाणित कर देता है।

इन दोनों से परे सम्पूर्ण लोकमानस में अपने प्रति विश्वसनीयता और श्रद्धा को जो अर्जित करके उनके हृदय-सिंहासन पर विराजमान हो जाता है, तब तत्कालीन प्रजा उसे उस देश के प्रमुख के रूप में राज्याभिषिक्त करती है।

अन्ततः जो त्रिलोकपूज्यत्व के पथ पर स्वयं चलकर प्राणीमात्र को उस विधि को समझाने के करुण-संकल्प से आप्लावित-हृदय के साथ चरम-देह ग्रहण करता है, तो स्वर्ग के देव आकर मध्यलोक के सर्वोच्च-शिखर पर उसका दिव्याभिषेक करके उसके जन्म की त्रिलोकपूज्यता को ज्ञापित करते हैं। इसके बाद कोई कार्य अभिषेक के योग्य नहीं होता है, अतः इनके बाद कोई अभिषिक्त भी नहीं होता है: यही मानक इस विषय में हैं।

स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 13-37