प्राकृत-संस्कृत की मैत्री अमर रहे !
-प्रो० (डॉ.) वीरसागर जैन
प्राकृत और संस्कृत दोनों ही परम पूज्य भाषाएँ हैं, माँ सरस्वती की अमूल्य देन हैं और प्राचीन काल से आज तक सदैव एक-दूसरे के साथ प्रगाढ़ रूप से संबद्ध रही हैं।
यद्यपि कभी-कभी कुछ संकीर्ण मनोवृत्ति वालों ने इन्हें अलग-अलग ही नहीं, एक-दूसरी को भला-बुरा कह कर शत्रु भी बनाना चाहा है; एक को प्राचीन, शुद्ध या महान् बताकर, दूसरी को अर्वाचीन, अशुद्ध और क्षुद्र तक भी कहा है।
परन्तु समूचा साहित्य-इतिहास साक्षी है कि इनकी मैत्री को कभी कोई ‘ग्रहण’ नहीं लग पाया है। और हम समझते हैं कि भविष्य में भी कभी नहीं लग पाएगा, चाहे कोई कितना ही जोर लगा ले। प्राकृत और संस्कृत अनादि काल से साथ-साथ रहती आई हैं और साथ-साथ ही रहती रहेंगी। किसी के कुछ भी बोलने-करने से इनकी मैत्री पर कोई बुरा असर पड़ने वाला नहीं है।
इस पर भी यदि कोई व्यक्ति इनमें से एक को रखकर दूसरी को नष्ट करना चाहेगा तो वह अपनी अभीष्ट एक को भी नष्ट कर लेगा- यह माँ सरस्वती का चिर वरदान है। यथा-
“एकोदराः पृथक्ग्रीवा अन्योन्यफलभक्षिणः ।
असहंता तं विनश्यन्ति भारुण्डा इव पक्षिणः ।।” - पंचतंत्र
अर्थात् प्राकृत और संस्कृत -इन दोनों भाषाओं की स्थिति उस भारुण्ड पक्षी के समान है जिसका पेट एक ही होता है, पर मुख दो होते हैं। दोनों मुख एक ही उदर का पोषण करते हैं। यदि वे दो मुख परस्पर लड़ने लगें और एक-दूसरे को विष खिलाकर मारने लगें तो समझ लेना कि वे दोनों ही शीघ्र मर जाएंगे।
प्राकृत और संस्कृत -दोनों की मैत्री और उपादेयता का एक और उदाहरण महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसंभव’ में शिव-पार्वती के विवाह-प्रसंग में प्रस्तुत किया है जहाँ मंगल-पाठ हेतु स्वयं सरस्वती उपस्थित होती हैं और शिव एवं पार्वती दोनों के लिए कमशः संस्कृत और प्राकृत-इन दो भाषाओं में अपना मंगल-पाठ प्रस्तुत करती हैं। यथा-
“द्विधा प्रयुक्तेन च वाड्.मयेन सरस्वती तन्मिथुनं निनाव ।
संस्कारपूतेन वरं वरेण्यं वधू सुखग्राह्यनिबन्धनेन ।।” - कुमारसंभव
नारायण श्रीकृष्ण भी प्राकृत एवं संस्कृत-दोनों का समदृष्टि से व्यवहार करते थे। ‘मल्लपुराण’ (3/12) में वे कहते हैं-
“तत्रादौ तावदुच्यन्ते निःशेषा ज्येष्ठिनां गुणाः ।
संस्कृतप्राकृताभ्याञ्च ततो लौकिकभाषया ।।”
वेदान्तदर्शन के प्रकाण्ड विद्वान् आदि शंकराचार्य ने भी प्राकृत और संस्कृत दोनों भाषाओं को शास्त्रों की संरक्षिका सरस्वती कहा है-
“वाचः प्राकृत-संस्कृताः श्रुतिशिरो…”
‘वराही संहिता’ में भी कहा गया है कि गर्ग आदि सप्तर्षि संस्कृत एवं प्राकृत- दोनों भाषाओं का व्यवहार करते थे-
सप्तर्षिणां मतं यच्च संस्कृतं प्राकृतं च यत् ।
यानि चोक्तानि गर्गाद्यैर्यात्राकारैश्च ।। - वराही संहिता 86/3
‘ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका’ में तो संस्कृत-प्राकृत-समन्वित भाषा को ही शुभ भाषा कहा गया है-
“संस्कृत-प्राकृताभ्यां यद् भाषाभ्यामन्वितं शुभम् ।” - ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, 5
इसीप्रकार का अभिप्राय संस्कृत-प्राकृत के प्रायः सभी श्रेष्ठ मनीषियों का पाया जाता है। जैनाचार्य श्री वीरसेन स्वामी ने तो अपने दो लाख श्लोक प्रमाण विशाल टीकाग्रन्थ ‘धवला’ की रचना प्राकृत-संस्कृत दोनों भाषाओं के मिश्रण द्वारा ही की है और उसे ‘मणिप्रवाल’ जैसी सुन्दर उपमा भी दी है।
‘धवला’ की तरह हजारों पुस्तकें भारतीय वाड्.मय में ऐसी हैं जिनको अकेले प्राकृत या अकेले संस्कृत की सम्पत्ति नहीं कहा जा सकता है, अपितु वे समान रूप से दोनों ही भाषाओं की अनमोल धरोहर सिद्ध होती हैं और यह सिद्ध करती हैं कि प्राकृत और संस्कृत-ये दोनों ही भाषाएँ साहित्य के क्षेत्र में आदि काल से ही परस्पर प्रगाढ़ मैत्री के साथ रहती आई हैं।
भारतीय साहित्य में ही नहीं, भारतीय जन-जीवन में भी प्राकृत-संस्कृत की प्रगाढ़ मैत्री के दर्शन होते हैं। यहाँ उसका भी एक संक्षिप्त शब्द-चित्र प्रस्तुत है-
प्राकृत संस्कृत प्राकृत संस्कृत
जोशी ज्योतिषी खाती क्षत्रिय
तिवारी त्रिपाठी सूद शूद्र
दुबे द्विवेदी इक्का एकः
चौबे चतुर्वेदी चौका चतुष्क
झा उपाध्याय छक्का षट्क
ओझा उपाध्याय घर गृह
बनर्जी वन्द्योपाध्याय फर्स स्पर्श
मुखर्जी मुखोपाध्याय मादा माता
चटर्जी चट्टोपाध्याय सिया सीता
दिल्ली देहली दादा तात
पापा परमप्पा आप अप्पा
अप्पा आत्मा दुद्ध दूध/दुग्ध
गोविन्द गोपेन्द्र