प्राकृत-जैन-साहित्य की एक अनूठी कृति | Prakrit Jain Sahity Ki Ek Anuthi Kriti

प्राकृत-जैन-साहित्य की एक अनूठी कृति

-सम्पादन-अनुवाद : प्रो. (डॉ.) वीरसागर जैन

कवि अजितब्रह्म द्वारा रचित
कल्लाणालोयणा (कल्याणालोचना)

भूमिका- यह ‘कल्लाणालोयणा’ अर्थात् ‘कल्याणालोचना’ नामक कृति प्राकृतभाषा एवं जैन साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। यह कृति आकार में लघु अवश्य है, परन्तु विषयवस्तु की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसके रचनाकार के विषय में अभी तक कोई विशेष जानकारी नहीं मिल सकी है। कृति की अन्तिम गाथा से मात्र इतना संकेत अवश्य प्राप्त होता है कि इसके रचयिता का नाम ‘अजितब्रह्म’ था जो संभवतः १४ वीं-१५ वीं शताब्दी में हुए प्रतीत होते हैं। प्रस्तुत कृति में अपने नामानुरूप ‘कल्याणकारी आलोचना’ का विशद वर्णन किया गया है। सर्वप्रथम कवि ने मंगलाचरण में पंचपरमेष्ठी को प्रणाम किया है। तदनन्तर अपनी मिथ्यात्व-अज्ञानमयी अवस्था और उसके अपार दुःखों का स्मरण करते हुए ८४ लाख योनियों के सर्वजीवों से क्षमायाचना की है और अपने सम्पूर्ण दुष्कृत्यों के मिथ्या हो जाने की हार्दिक अभिलाषा प्रकट की है- ‘मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज’। इसके बाद जगत् के सर्व पदार्थों की अभिलाषा त्यागकर वर्णादि और रागादि सर्व विकल्पों से रहित एक अपने ज्ञानादमयी परमात्मतत्त्व की ही शरण की बारम्बार भावना की है- “अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।” अन्त में जिनदेव, जिनगुरु, जिनधर्म का सान्निध्य मुक्तिपर्यन्त प्राप्त होता रहे- इस प्रार्थना के साथ ग्रन्थ-समापन किया है। ग्रन्थ में कुल मिलाकर ५४ गाथाएँ निबद्ध हैं। विद्वज्जनों से अनुरोध है कि वे इस कृति के अध्ययन को आगे बढ़ाएँ।

परमप्पइ वड्ढमदिं परमेठीणं करोमि णवकारं।
सगपरसिद्धिणिमित्तं कल्लाणालोयणा वोच्छे ।। १ ।।

अर्थ- परमपद में स्थित पंच परमेष्ठियों को नमस्कार करके मैं स्व-पर-सिद्धि के हेतु यह ‘कल्याणालोचना’ कहता हूँ।

रे जीवा णंत-भवे संसारे संसरंत बहुवारं।
पत्तो ण बोहिलाहो मिच्छत्तविभंजपयडीहिं ।। २ ।।

अर्थ- अरे, अनंत संसार में परिभ्रमण करते हुए इस जीव ने और सब तो बहुत बार प्राप्त किया, किन्तु मिथ्यात्व प्रकृति का नाश करके सम्यक् बोधि की प्राप्ति कभी नहीं की।

संसारभमणगमणं कुणंत आराहिदो ण जिणधम्मो ।
तेण विणा वर दुक्खं पत्तोसि अणंतवाराइं ।। ३ ।।

अर्थ- संसार-भ्रमण करते हुए इस जीव ने कभी जिनधर्म की आराधना नहीं की। तथा उसी जिनधर्म के बिना इसने अनन्त बार अनन्त दुःखों को प्राप्त किया है।

संसारे णिवसंता अणंतमरणाइं तुमं पाओसि।
केवलि विणणा तेसिं संखापज्जत्ति णो हवदि ।। ४।।

अर्थ- हे जीव ! तुमने संसार में रहते हुए जो जन्म-मरणादि अनन्त दुःखों को प्राप्त किया है, केवली भगवान् कहते हैं कि उनकी संख्याओं का कोई अंत नहीं है।

तिण्णि सया छत्तीसा छावट्ठिसहस्सवार मरणाई।
अंतोमुहुत्तमज्झे पत्तोसि णिगोयमज्झम्मि ।। ५ ।।
वियलिंदिये असीदी सट्ठी चालीसमेव जाणेहिं।
पंचेंदिय चउवीसं खुद्दभवंतोमुहुत्तस्स ।। ६ ।।

अर्थ- हे जीव ! तूने निगोद में एक अन्तर्मुहूर्त में ६६,३३६ बार जन्म-मरणादि दुःख को प्राप्त किया है। इसी प्रकार द्वीन्द्रियादि पर्यायों में क्रमशः ८०,६० एवं ४० बार और पंचेन्द्रिय पर्याय में २४ बार जन्म-मरणादि दुःख को एक अन्तर्मुहूर्त में प्राप्त किया है।

अण्णोण्णं खज्जंता जीवा पावंति दारुणं दुक्खं।
गहु तेसिं पज्जत्ती कह पावइ धम्ममदिसुण्णे ॥ ७॥

अर्थ- एक-दूसरे को खाने के चक्कर में पड़े हुए जीव यहाँ दारुण दुःख को ही प्राप्त कर रहे हैं। कभी भी धर्मबुद्धि प्राप्त नहीं करते।

माया पिया कुटुंबो सुजणजणो को वि णायदि सत्थे।
एगागी भमदि सदा णहि वीओ अत्थि संसारे ।।८ ।।

अर्थ- इस संसार में माता-पिता, कुटुम्बीजन, या अन्य कोई भी स्वजन इस जीव के साथ नहीं जाता है। यह जीव अकेला ही सदा भ्रमण करता है। दूसरा कोई भी इसका साथ नहीं दे सकता।

आउक्खएवि पत्ते ण समत्थो को वि आउदाणे य।
देविंदो ण णरिंदो मणि-ओसह-मंत-जालाई ।। ९।।

अर्थ- आयुक्षय होते समय देवेन्द्र, नरेन्द्र, मणि, औषध, मंत्रादि कोई भी आयु देने (बढ़ाने) में समर्थ नहीं हो सकता।

संपडि जिणवरधम्मो लब्द्धोसि तुमं विसुद्धजोएण।
खामसु जीवा सव्वे पत्तेसमये पयत्तेण ।। १० ।।

अर्थ- हे जीव ! तुमने अब जिनवर धर्म को प्राप्त किया है, अतः तुम विशुद्धभावों से प्रयत्नपूर्वक सर्व जीवों को क्षमा करो। वह इस प्रकार -

तिण्णिसया तेसट्ठि मिच्छत्ता दंसणस्स पडिवक्खा।
अण्णाणे सद्दहिया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ।। ११ ।।

अर्थ- मैंने ३६३ मिथ्या दर्शनों का अज्ञान-अवस्था में श्रद्धान किया था, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

महुमज्जमंसजूआपभिदी वसणाइं सत्तभेयाइं।
णियणो ण कथं च तेसिं मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ।। १२ ।।

अर्थ- मधु, मद्य, मांस, जुआ आदि सप्तव्यसनों में मैं संलग्न रहा, कैसे भी उनसे निवृत्त नहीं होता था, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

अणुवयमहव्वया जे जमणियमा सील साहुगुरुदिण्णा।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ।। १३।।

अर्थ- अणुव्रत, महाव्रत आदि जो भी यम, नियम, शीलादि मुझे मेरे साधु गुरुओं ने दिया था, उनकी मैंने विराधना की थी, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

णिच्चिदरधादु सत्त य तरु दस वियलिदिएसु छच्चेव।
सुर-णरय-तिरिय चउरो चउदस मणुए सदसहस्सा ।। १४।।

अर्थ- नित्यनिगोद, इतरनिगोद, पृथिवीकाय, जलकाय, अग्निकाय और वायुकाय की सात-सात लाख, प्रत्येक वनस्पति की दस लाख, विकलत्रय की छह लाख, देव-नारकी-तिर्यंच की चार-चार लाख और मनुष्य की चौदह लाख योनियाँ होती हैं।

एदे सव्वे जीवा चउरासीलक्खजोणिवसि पत्ता।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ।। १५ ।।

अर्थ- इस प्रकार चौरासी लाख योनियों में जितने भी जीव हैं, उनकी मैंने विराधना की है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

पुढवीजलग्गिवाओ तेओवि वणप्फदी य वियलतया।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे टुक्कडं हुज्ज ।। १६ ।।

अर्थ- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और विकलत्रय के जिन जीवों की मैंने विराधना की है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

मल सत्तरा जिणुत्ता वयविसये जा विराहणा विविहा।
सामइया खमइया खलु मिच्छा मे टुक्कडं हुज्ज ।। १७।।

अर्थ- व्रत-विषयक जो भी मल (अतिचार आदि) जिनेन्द्र भगवान् ने कहे हैं, मैंने उनका ध्यान नहीं रखा, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

फलफुल्लछल्लिवल्लि अणगल ण्हाणं च धोवणादीहिं।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ।। १८ ।।

अर्थ- फल-फूल छीलने-जलाने आदि से और अनर्गल स्नान-धोवनादि से मैंने जिन जीवों की विराधना की है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

णो सीलं णेव खमा विणओ तवो ण संजमोवासा।
ण कदा ण भाविकदा मिच्छा मे टुक्कडं हुज्ज ।। १९ ।।

अर्थ- न तो मैंने कभी शील की भावना की, न क्षमा की भावना की और न ही विनय, तप, संयम, उपवास आदि की ही कोई भावना की, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

कंद-फूल-मूल-बीया सचित्त रयणी य भोयणाहारा।
अण्णाणे जे वि कदा मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ।।२० ।।

अर्थ- कन्दफल, मूल, बीज, सचित्त एवं रात्रिभोजन का जो मैंने अज्ञान-अवस्था में सेवन किया है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

णो पूया जिणचरणे ण पत्तदाणं न चेइयागमणं।
ण कदा ण भाविदा मय मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।२१।।

अर्थ- न मैंने जिनचरणों की पूजा की, न पात्र-दान किया, न ही चैत्यालय गया और न ही कभी मैंने इन कार्यों की हृदय में भावना ही की, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

बंभारंभपरिग्गह सावज्जा बहु पमाददोसेण।
जीवा विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।२२।।

अर्थ- बहु आरम्भ-परिग्रह, सावद्य कार्य और अतिप्रमाद के कारण मैंने बहुत जीवों की विराधना की है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

सत्तातिसदखेतभवा तीदाणागदसुवट्टह्माणजिणा।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।२३।।

अर्थ- एक सौ सत्तर (१७०) विविध क्षेत्रों में होने वाले भूत-भविष्य-वर्तमानकालीन जिनेन्द्रों की जो कुछ भी मुझ से विराधना हुई है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

अरुहासिद्धाइरिया उवझाया साहु पंचपरमेट्ठी।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।२४।।

अर्थ- अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु- ये पंचपरमेष्ठी हैं। इनकी जो भी विराधना मुझसे हुई है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

जिणवयण-धम्म-चेदिय जिणपडिमा किट्टियाऽकिट्टिमया।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।२५।।

अर्थ- जिनवचन, जिनधर्म और जिनचैत्यालय एवं जिनप्रतिमा- ये जितने भी कृत्रिमाकृत्रिम हैं और इनकी जो भी विराधना मुझसे हुई है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

दंसणणाणचरित्ते दोसा अट्ठट्ठपंचभेयाई।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।२६।।

अर्थ- आठ, आठ और पाँच प्रकार के दर्शन-ज्ञान-चारित्र में दोष लगाकर मैंने उनकी जो विराधना की है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

मदिसुदओहीमणपज्जयं तहा केवलं च पंचमयं।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।२७।।

अर्थ- मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल- ये पाँच ज्ञान हैं। मुझसे इनकी जो भी विराधना हुई है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

आयारादी अंगा पुव्वपइण्णा जिणेहिं पण्णत्ता।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।२८।।

अर्थ- जिनेन्द्र-प्रज्ञप्त जो आचारादि अंग और पूर्व हैं, उनकी मुझसे जो भी विराधना हुई है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

पंचमहव्वदजुत्ता अट्ठादससहस्ससीलकदसोहा।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।२९।।

अर्थ- पंच महाव्रतों से युक्त और अठारह हजार (१८०००) शीलों से सुशोभित मुनिराजों की मुझसे जो भी विराधना हुई है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

लोए पियरसमाणा रिद्धिपवण्णा महागणवइया।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।३०।।

अर्थ- जो लोक के अत्यन्त प्रिय हैं, ऋद्धि-प्राप्त हैं और महागणपति (गणधर) हैं, उनकी मुझसे जो भी विराधना हुई है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

णिग्गंथ अज्जियाओ सड्ढा सड्ढी य चउविहो संघो।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।३१।।

अर्थ- निर्ग्रन्थ, आर्यिका, श्रावक और श्राविका- यह चतुर्विध संघ है। इसमें जिसकी भी जो भी विराधना मुझसे हुई है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो।

देवा सुरा मणुस्सा णेरड्या तिरियजोणिगदजीवा।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।३२।।

अर्थ- देव, मनुष्य, नरक एवं तिर्यञ्च गति की सर्व योनियों के जिन-जिन जीवों की मैंने विराधना की है, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हों।

कोहो माणो माया लोहो एदे य रायदोसाइं।
अण्णाणे जे वि कदा मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।३३।।

अर्थ- क्रोध, मान, माया और लोभ- ये राग-द्वेषादि भाव मैंने अज्ञानवश जो भी किये हैं, वे मेरे दुष्कृत्य मिथ्या हों।

परवत्थुं परमहिला पमादजोगेण अज्जियं पावं।
अण्णावि अकरणीया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज।।३४।।

अर्थ- परवस्तु, परमहिला आदि के प्रति प्रमाद योग से मैंने जो भी पाप अर्जित किया है तथा और भी जो कुछ अकरणीय किया है, वे सब मेरे दुष्कृत्य मिथ्या हों।

एगो सहावसिद्धो सोहं अप्पा वियप्पपरिमुक्को।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।३५।।

अर्थ- मैं एक स्वभावसिद्ध सर्वविकल्प-परिमुक्त आत्मा हूँ- सोऽहं, और वही एक परमात्मा मेरे लिए शरणभूत है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

अरस अरूव अगंधो अव्वावाहो अणंतणाणमओ।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।३६।।

अर्थ- जो अरस, अरूप, अगन्ध, अव्याबाध और अनन्तज्ञानमय परमात्मा है, वही एक मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

णेयपमाणं णाणं समए एगेण हुंति ससहावे।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।३७।।

अर्थ- जिसका ज्ञान अपने स्वभाव में स्थित होकर एक समय में सर्व-ज्ञेय-प्रमाण हो जाता है, वही एक परमात्मा मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

एयाणेयवियप्पप्पसाहणे सयसहाव सुद्धगदी।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा।।३८।।

अर्थ- एकानेक विकल्पों से भी जिसकी साधना करने पर अपने स्वभाव की शुद्ध परिणति होती है, वही एक परमात्मा मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

देहपमाणो णिच्चो लोयपमाणो वि धम्मदो होदि।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा ।।३९ ।।

अर्थ- जो सदा देहप्रमाण है, फिर भी निश्चय से लोकप्रमाण है, वही एक परमात्मा मुझे शरण-भूत है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

केवलदंसणणाणं समये एगेण दुण्णि उवओगा।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा ।। ४० ।।

अर्थ- केवलदर्शन और केवलज्ञान- ये दोनों ही उपयोग जिसके एक ही समय में होते हैं, वही एक परमात्मा मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

सगरूव सहजसिद्धो विहावगुणमुक्ककम्मवावारो।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा ।। ४१ ।।

अर्थ- जो स्वरूप से ही सहजसिद्ध है और विभावगुण के कर्मव्यापार से मुक्त है, वही एक परमात्मा मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

सुण्णो णेय असुण्णो णोकम्मो कम्मवज्जिओ णाणं।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा ।।४२ ।।

अर्थ- जो न शून्य है और न अशून्य, फिर भी कर्म-नोकर्म से रहित ज्ञानस्वरूपी है, वही एक परमात्मा मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

णाणाउजोण भिण्णो वियप्पभिण्णो सहावसुक्खमओ।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा ।। ४३।।

अर्थ- जो अज्ञानभावों से भिन्न है, विकल्प से भी भिन्न है और स्वभाव से सुखमय है, वही एक परमात्मा मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

अच्छिण्णोवच्छिणो पमेय रूवत्त गुरुलहू चेव ।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा ।। ४४।।

अर्थ- जिसमें अस्तित्व, वस्तुत्व, प्रमेयत्व, प्रदेशत्व और अगुरुलघुत्व नाम के सामान्य गुण पाये जाते हैं,वही एक परमात्मा मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

सुह असुहभावविगओ सुद्धसहावेण तम्मयं पत्तो।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा ।। ४५।।

अर्थ- जो समस्त शुभाशुभ भावों से रहित है और शुद्धस्वभाव से तन्मय है, वही एक परमात्मा मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

णो इत्थी ण णउंसो णो पुंसो णेव पुण्णपावमओ।
अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एग परमप्पा ।। ४६ ।।

अर्थ- जो न स्त्री है, न नपुंसक है, न पुरुष है और न ही पुण्यपापमय है, वही एक परमात्मा मुझे शरण है, अन्य कुछ भी मुझे शरण नहीं है।

ते को ण होदि सुजणो तं कस्स ण बंधवो ण सुजणो वा।
अप्पा हवेह अप्पा एगागी जाणगो सुद्धो ।। ४७।।

अर्थ- वे कोई भी किसी के स्वजन या बन्धु-बान्धव नहीं हैं। आत्मा तो मात्र एकाकी और शुद्ध ज्ञायक आत्मा ही है।

जिणदेवो होटु सदा मई सु जिणसासणे सया होऊ।
सण्णासेण य मरणं भवे भवे मज्झ संपदओ ।। ४८ ।।

अर्थ- जिनदेव सदा मेरे रहें, जिनशासन सदा मेरा रहे और संन्यासपूर्वक मेरा मरण हो। बस, यही सम्पत्ति मुझे जन्म-जन्म में प्राप्त होती रहे।

जिणो देवो जिणो देवो जिणो देवो जिणो जिणो।
दया धम्मो दया धम्मो दया धम्मो दया सदा ।। ४९ ।।

अर्थ- जिनदेव, जिनदेव, जिनदेव, बस एक जिनदेव ही सदा मेरे रहें। दयाधर्म, दयाधर्म, दयाधर्म, बस एक दयामय धर्म ही सदा मेरा रहे।

महासाहू महासाहू महासाहू दिगंबरा।
एवं तच्चं सया हुज्ज जावणो# मुत्ति संगमो ।। ५०।।

अर्थ- महासाधु, महासाधु, महासाधु, बस एक दिगम्बर महासाधु ही सदा मेरे रहें। जब तक मुझे मुक्ति की प्राप्ति न हो तब तक एक यही समीचीन तत्त्व मुझे प्राप्त रहे।

एवमेव गओ कालो अणंतो दुक्ख संगमे।
जिणोवदिट्ठसण्णासे ण यत्तारोहणा कया।। ५१।।

अर्थ- अहो, मेरा अनन्तकाल यूँ ही अनन्त दुःखों को भोगते हुए व्यतीत हो गया और मैंने कभी जिनोपदिष्ट संन्यास में स्वयं को लगाने का प्रयत्न नहीं किया।

संपइ एव संपत्ताराहणा जिणदेसिया।।
किं किं ण जायदे मज्झ सिद्धिसंदोह-संपई।। ५२।।

अर्थ- जिनोपदिष्ट धर्म की आराधना ही वस्तुतः सच्ची सम्पत्ति (सम्प्राप्ति) है, क्योंकि उससे अन्य क्या-क्या सिद्धि प्राप्त नहीं होती? अर्थात् जिनधर्म की आराधना से सर्व सिद्धि होती है।

अहो धम्ममहो धम्मं अहो मे लद्धि णिम्मला।
संजदा संपदा सारा जेण सुक्खमणूपमं।।५३।।

अर्थ- अहो, धन्य है यह धर्म, धन्य है यह धर्म, और धन्य है इस निर्मल धर्म की सम्प्राप्ति को, जिससे श्रेष्ठ संपत्ति उत्पन्न होती है और अंत में अनुपम सुख की प्राप्ति होती है।

एवं आराहंतो आलोयणवंदणापडिक्कमणं।
पावइ फलं च तेसिं णिद्दिष्टुं अजियवंभेण।।५४।।

अर्थ- अजितब्रह्म (ग्रन्थकार) कहते हैं कि इस प्रकार आलोचना, वन्दना और प्रतिक्रमण की आराधना करता हुआ जीव उसके महान् फल को प्राप्त करता है।

Dr. Veer Sagar Jain
Head, Deptt. of Jain Darshan
Shri Lal Bahadur Shastri Rashtriya Samskrit Vidyapeeth
(Deemed University), Qutub Institutional Area,
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Res. : C-274/4, II Floor, Arjun Nagar, Safdarjung Enclave,
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