प्रभु नाम का सुमरन कर ले, पाया अवसर सुखदानी।
फिर मानुष कुल मिलन कठिन है, ये निश्चय जानो ज्ञानी ।।
ना जाने जमराज कौन दिन, हरे प्राण रे अज्ञानी ।। टेक ।।
या से धरम करो तन-मन से, जो संग जावे सुखदानी।
हाथों से दान चतुर्विध दीजे, कानन सुनो जिनवानी ।। 1 ।।
आँखों से लख लो परमातम, मुख से कहो वीर वानी।
चखो जीभ से ज्ञानामृत को, सब शरीर तप में सानी ।। 2 ।।
ये ही तेरे संग में जाकर, वरि है सुख मुक्ति-रानी।
मात-पिता तिया सुत भाई, स्वारथ के सब जग-प्रानी ।।3।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’