जिनशासन की प्रभावना निर्दोष हो स्वामी।
रे ! अन्तर्मन की भावना निर्दोष हो स्वामी।।टेक।।
श्रद्धान हो सम्यक् सहज अभिप्राय निर्मल हो,
आराधनामय साधनामय जीवन निश्छल हो।
जग ख्याति पूजा लाभ की नहीं चाह हो स्वामी।।रे अन्तर्मन…।।
नहीं करके पक्ष निश्चय का स्वच्छन्द हो जीवन,
नहीं पक्षवश व्यवहार के हो ज्ञान-विराधन।
हो मैत्री ज्ञान-विराग की आनन्दमय स्वामी।।
रे ! अन्तर्मन की भावना निर्दोष हो स्वामी।।
पक्षातिक्रान्त समयसार प्राप्त हो सबको,
चैतन्यमय शुद्धात्मा अनुभूत हो सबको।
अतीन्द्रिय ज्ञानानन्दमय परिणाम हों स्वामी।। रे अन्तर्मन…।।
पर भावों में नहीं कल्पना अच्छे बुरे की हो,
पीवें अतीन्द्रिय ज्ञानरस जिनवर जितेन्द्रिय हों।
इन्द्रिय विषयों से हो विरक्ति स्वभाविक स्वामी।। रे अन्तर्मन…।।
समझें निमित्त अकिंचित्कर हो निरवलम्बी,
निरपेक्ष हों निश्चिंत हों निर्द्वन्द्व स्वस्थ भी।
नित ही रहें निज में ही निज से तृप्त हे स्वामी।। रे अन्तर्मन…।।
नहीं पुण्य-पाप के उदय में हर्ष-खेद हो,
अरि-मित्र निन्दा-स्तुति में कुछ न भेद हो।
हो मोह-क्षोभ-शून्य शुद्ध आचरण स्वामी।। रे अन्तर्मन…।।
नहीं जन्म जयन्ती में ही हम हो जावें मगन,
समझें स्वयं को स्वयं-सिद्ध अनादिनिधन।
निर्लिप्त उदासीन ज्ञातारूप हों स्वामी।। रे अन्तर्मन…।।
मोहीजनों की ममता से नित सावधान हों,
धनि-धनि सिर ऊपर ज्ञानी गुरु विराजमान हों।
उनके अनुशासन में रहकर स्वतंत्र हों स्वामी,।। रे अन्तर्मन…।।
अबद्धस्पृष्ट अनन्य नियत और असंयुक्त,
अविशेष देखें आत्मा होवें सहज ही मुक्त।
परमार्थ ही हो स्वार्थ, हों निस्वार्थ हे स्वामी ।। रे अन्तर्मन… ।।
सब जीव सिद्ध सम दिखें नहिं राग-द्वेष हो,
ज्ञेयों से भिन्न ज्ञायक की महिमा विशेष हो।
हो उपादेय आत्मा को आत्मा नित्य ही स्वामी ।। रे अन्तर्मन… ।।
जानें निज परमब्रह्म ब्रह्मरूप में रमें,
निर्दोष ब्रह्मचर्य हो दुर्वासना भगे।
आदर्श प्रेरणा स्वरूप हो चरण स्वामी ।। रे अन्तर्मन… ।।
होते जावें विज्ञानघन, रागादि क्षीण हों,
नहीं दीन हों स्वाधीन पर से उदासीन हों।
निकलंक हों निष्पाप हों निर्ग्रन्थ हों स्वामी ।। रे अन्तर्मन… ।।
एकाकी निर्भय निज में ही संतुष्ट रहेंगे,
शुद्धात्मा के ध्यान से सब कर्म भगेंगे।
प्रगटे सहज अविनाशी अक्षय प्रभुता हे स्वामी ।। रे अन्तर्मन… ।।
रहकर भी मौन सहज मुक्ति मार्ग कहेंगे,
धनि-धनि अनुभूत मार्ग के प्रणेता बनेंगे।
होगी प्रभावना अहो परिपूर्ण हो स्वामी ।। रे अन्तर्मन… ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह