पिताजी :-
कहेँ पिताजी सुनो पुत्र प्रिय! तेरा पालन करने में।
चिंता कीनी, दुःख उठाये, तेरी माता अरु मैंने।। 1।।
बहुत दिनों से आशा कीनी, वह अवसर अब आया है।
बड़ा हुआ तू पढ़-लिखकर, अरु जग में नाम कमाया है।। 2।।
पूर्ण करो मेरी आशायें, ठाठ से ब्याह रचाओ तुम।
अतुल द्रव्य का संचय करके, सुंदर महल बनाओ तुम।। 3।।
कार,फ्रिज,टेलीविजन ला, सुख-साधन सम्पन्न बनो।
नौकर-चाकर करें चाकरी, बैठे बस आदेश करो।। 4।।
पौत्रादिक को गोद खिलाऊँ, मन मेरा हर्षित होवे।
दूर होंय दुःख दारिद्र सारे, जन्म सफल मेरा होवे।। 5।।
पुत्र-
सुनो पिताजी! ज्ञानवान हो, ये नहीं वचन तुम्हारे हैं।
मिथ्या श्रद्धा, तीव्र राग के कारण ये उच्चारे हैं।। 6।।
तुमने मुझको बचपन से ही, जैनधर्म है सिखलाया।
जिन गुरुओं ने काया से भी, भिन्न सहज सुख बतलाया।। 7।।
सांसारिक वैभव जुटने से तो, दुःख उल्टा बढ़ता है।
इसलिए तो साधुजनों को लौकिक वैभव खलता है।। ४।।
वनिता धोखे की टटिया है, दुःख प्रवाह बहाती है।
बहुरूपिया की भाँति रूपधर, भोगेच्छा उपजाती है।। ९।।
नरक पद्धति इसी हेतु से, नारी को बतलाया है।
वास्तव में तो अन्य न कोई, सुख-दुःख दायक गाया है ।। 10 ।।
पुत्रादिक भी स्वार्थी ही हैं, इनसे मोह बढ़ाओ ना।
दुर्लभ मानव जीवन के क्षण, इसीप्रकार गँवाओ ना।। 11 ।।
अल्प आयु ही शेष रही है, आत्म तत्त्व का ज्ञान करो।
सम्यक् रत्नत्रय धारण कर, निज-पर का कल्याण करो ।। 12 ।।
मैं प्रिय पुत्र तुम्हारा हूँ, तब सच्चे सुख का इच्छुक हूँ।
धर्म-ध्यान में निरत रहूँ, बस इस आज्ञा का भिक्षुक हूँ।। 13 ।।
आत्म तत्त्व का सत्य ज्ञान कर, सब जग को बतलाऊँगा।
स्वयं सुख में लीन होऊँगा, सबको पथ दर्शाऊँगा।। 14।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह