पथिक-संदेश | Pathik Sandesh

पथिक-संदेश
कविवर श्री छोटेलालजी

अरे क्यों इधर भटकता है ?
मूढ़ पथिक ! क्यों इस अटवी के निकट फटकता है ?॥टेक॥

यह संसार महा अटवी है, विषय चोर दुख रूप।
लूट रहे धोखा दे दे कर, तेरी निधि चिद्रूप ॥
शीघ्र क्यों नहीं सटकता है ? अरे क्यों इधर भटकता है॥१॥

मरु भूमि सम है ये नीरस, यहाँ क्यों बैठा आय !।
भाग यहाँ से अरे पथिक! तू अब मत धोखा खाय॥
यहाँ तू व्यर्थ ठिठकता है, अरे क्यों इधर भटकता ॥२॥

इस वन के भीतर रहते हैं, पंच इन्द्रिय मय चोर।
उनका नृत्य मनोहर है, ज्यों वन में नाचे मोर।।
देख क्यों व्यर्थ बहकता है ? अरे क्यों इधर भटकता है ।।३।।

पथरीली यह भूमि भयानक, खड़े झाड़ झंखाड़।
तेरे सर पर खड़ा हुआ है, काल सिंह मुँह फाड़।।
अभी आ तुझे गटकता है, अरे क्यों इधर भटकता है ॥४॥

आगे तेरे महा भयानक, है दुर्गम पथ देख।
फँसा आज तू बीच भंवर में, इसमें मीन न मेख ।।
देखकर हृदय धड़कता है, अरे क्यों इधर भटकता है ॥५॥

कई बार धोखा खाकर तू, खोया सब धन माल ।
बचा खुचा धन यहाँ खोयेगा, होगा अब कंगाल ।।
व्यर्थ तू यहाँ अटकता है, अरे क्यों इधर भटकता है ?||६||

तू क्षण-सुख पाकर के मूरख, बैठा है सुख मान।
किन्तु लुटेरा खड़ा सामने, लेकर तीर कमान ॥
झपट सब रकम झपटता है, अरे क्यों इधर भटकता है ॥७॥

इस अटवी के गहन स्थल में, क्यों तू रहा लुभाय ?
बिछा जाल माया का यहाँ पर, सभी रहे पछताय।
देखकर हृदय धड़कता है, अरे क्यों इधर भटकता है ।।८।।

इधर-उधर क्या देख रहा है, मनो-विनोदी राग।
इनके भीतर छुपी हुई है महा भयानक आग॥
इन्हीं में महा कटुकता है, अरे क्यों इधर भटकता है ॥९॥

खाता ठोकर तू पथ-पथ पर, पाता है संताप।
इधर-उधर तू भटक-भटक कर, आता अपने आप।
गठरिया यहीं पटकता है, अरे क्यों इधर भटकता है ॥१०॥

क्यों उन्मत्त भया है मूरख, आँख खोलकर देख।
इस जीवन के पथ में तेरे, पड़ी भयानक रेख ।
भाग्य हर जगह अटकता है, अरे क्यों इधर भटकता है॥११॥

स्वार्थ-पूर्ण मय इस जंगल में, है सरिता भरपूर।
उसने मेरे पथ को अब तक,किया बहुत ही दूर।॥
इधर क्यों व्यर्थ ढुलकता है ? अरे क्यों इधर भटकता है।।१२॥

पहले तो तू इस अटवी में, आया था कर प्यार।
अब फिर क्यों सिर पकड़-पकड़ कर, रोता है हरबार।।
खड़ा क्यों व्यर्थ ढुलकता है, अरे क्यों इधर भटकता है।॥१३॥

जीवन-शकट भयानक तेरा, उलझ गया अब आय।
पागल बना मोह माया में, विषय-वृक्ष फल खाय॥
हृदय में यही खटकता है, अरे क्यों इधर भटकता है ?॥१४॥

तेरी निधि का रक्षक भाई, यहाँ न दीखे कोय।
लगे आग तब कूप खुदाये, कैसे रक्षा होय॥
खड़ा क्यों यहाँ सिसकता है ? अरे क्यों इधर भटकता है।।१५॥

यहाँ बैठ तू भूल गया है, अपने पथ की राह।
आगे तेरा क्या होवेगा, जरा नहीं परवाह ।।
हृदय में यही कपटता है, अरे क्यों इधर भटकता है ?॥१६॥

इस जंगल में जो कोई आया, वही रहा पछताय।
किन्तु आज तू यहाँ बैठकर, मौजें रहा उड़ाय ।।
विषय-विष यहाँ महकता है, अरे क्यों इधर भटकता है।।१७।।

जरा देख तू आँख खोलकर, मत मन माहीं फूल।
तेरे पथ में बिछे हुए हैं, कंटक-वृक्ष बबूल ॥
अकड़ में व्यर्थ मटकता है, अरे क्यों इधर भटकता है॥१८॥

इस अटवी में आ पथ भूला, बना प्रचुर अज्ञान।
मोह लुटेरा एक क्षणक में, नाश करे विज्ञान ॥
अभी वह आन टपकता है, अरे क्यों इधर भटकता है॥१९॥

अरे गठरिया पथिक ! उठाले, यहाँ बैठ मत भूल।
उस पथ का तू पथिक नहीं है, क्यों चलता प्रतिकूल ॥
यहाँ क्यों खड़ा लटकता है, अरे क्यों इधर भटकता है ॥२०॥

यहाँ बैठ क्या सोच रहा है, समय नहीं अब देख।
आयु दिवाकर पार कर रहा, अस्ताचल की रेख॥
अभी तो सूर्य चमकता है, अरे क्यों इधर भटकता है ॥२१॥

तेरा पथ कुछ दूर नहीं है, इसमें है इक भूल।
दृष्टि बदल इस पथ से फिर हो, उस पथ के अनुकूल॥
इधर क्यों व्यर्थ लपकता है ? अरे क्यों इधर भटकता है।।२२॥

मोह वारुणी पीकर मूरख, सत्पथ दिया भुलाय।
शिव नगरी का तू पथतज कर, इधर भटकता आय॥
हुई क्यों नहीं विरकता है ? अरे क्यों इधर भटकता है ॥२३ ॥

इसप्रकार सन्देश-श्रवण कर, पथिक गया घबराय।
मुक्ति मार्ग से च्युत होकर मैं, इस पथ पहुँचा आय।
श्रवण अब पड़ी भनकता है, अरे क्यों इधर भटकता है।।२४॥

हाथ जोड़कर पथिक कहे, गुरु किया महा-उपकार।
इस नगरी के विषम मार्ग से, मुझको वेग निकर।।
मार्ग यह बहुत कसकता है, अरे क्यों इधर भटकता है।।२५।।

हो प्रसन्न गुरुदेव दयानिधि, दीना मार्ग बताये।
शिव नगरी में पहुँच पथिक वह, बना चिदानन्द राय॥
चरण छोटे नित नमता है, अरे क्यों इधर भटकता ॥२६॥

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