पश्चात्ताप | Pashchattaap

पश्चात्ताप

( शृंगार छन्द )
(१)
प्रथम धर अरहंतों का ध्यान, और कर जिनवाणी गुणगान ।
सदाचरणों में नित अम्लान, किया जिन-जिन ने जीवनदान ।।
(२)
नमन कर उन गुरुओं को आज, राम के मन की गहरी छाप ।
राम के अन्तर का आताप, राम के मन का पश्चात्ताप ।।
(३)
राम के मन का पश्चात्ताप, सती सीता का यह अनुताप ।
कहूँ कैसे किन शब्दों में, प्रजा के मन का यह संताप ।।
(४)
समाई सीता रग-रग में, बस रहे रग-रग में श्री राम ।
करूँ मैं वन्दन अभिनन्दन, रमूँ नित अपने आतम राम ।।
(५)
प्रजा से सुन लांछन की बात, किया यदि रामचन्द्र ने न्याय ।
हुआ पर जनक-सुता के साथ, महा अन्याय महा अन्याय ।।
(६)
हो गई अग्निपरीक्षा आज, खड़ा था पूरा अवध समाज ।
शील ने रखी सती की लाज, प्रेम से व्याकुल थे रघुराज ।।
(७)
सोचते थे मन में रघुवीर, खड़े थे जैसे हों तस्वीर ।
मनीषा करती तर्क-वितर्क, हो रहे थे वे बहुत अधीर ।।
(८)
मुझे था भय कि मोह में आज, प्रजा के साथ न हो अन्याय ।
इन्हीं संकल्प-विकल्पों में, हो गया यह कैसा अन्याय ।।
(९)
न्याय करना न आवे जिसे, न्यायप्रिय कहता उसे जहान ।
स्वजन को दे देने से दण्ड, नहीं हो जाता कोई महान ।।
(१०)
किसी को कैसे दे वह दण्ड, सत्य की नहीं परख है जिसे ।
बिठा कैसे देते हैं लोग, न्याय के सिंहासन पर उसे ।।
(११)
दिया है निरपराध को दण्ड, न्यायप्रिय मुझको मत कहना ।
न्याय है यह अथवा अन्याय, न्याय है मुझे आज सपना ।।
(१२)
प्रजाजन में कैसा अज्ञान, भरा है हे मेरे भगवान ।
चुने चाहे जिसको नेता, नहीं जो उचित दण्ड देता ।।
(१३)
किन्तु है यह कसूर किसका, हमारा अथवा जनगण का ।
उन्होंने अपराधी को चुना, किन्तु मैं क्यों कहने से बना ।।
(१४)
हमारा ही है इसमें दोष, हुआ जो जाने-अनजाने ।
प्रजाजन कैसे पहचाने, नहीं हम अपने को जानें ।।
(१५)
जा रही वैदेही वन में, राम उद्विग्न हुये मन में।
करें क्या समझ नहीं आवे, राम सोचे मन ही मन में ।।
(१६)
उदर में था लवकुश जोड़ा, तभी निर्जन वन में छोड़ा ।
प्रथम मैंने नाता तोड़ा, आज उसने मुखड़ा मोड़ा ।।
(१७)
नहीं मैं जाने ना दूँगा, आज मैं उसको रोकूँगा।
सगद्गद् बोले राम नरेश, रुंधा था कण्ठ गिरा निश्शेष ।।
(१८)
न मैंने तुमको पहचाना, मुझे शोकानल ने घेरा।
सुनो अपराधी हूँ सीते !, करो अपराध क्षमा मेरा ।।
(१९)
कहा इतना ही सीता ने, नहीं अपराध तुम्हारा है।
करमफल पूरव का जानो, करमबल सबसे न्यारा है ।।
(२०)
विगतभव में जो बाँधे कर्म, वही फल देते इस भव में ।
किया होगा कोई अपराध, भयंकर मैंने गत भव में ।।
(२१)
उसी के फल में यह संयोग, मिला होगा, न आपका दोष ।
‘करे सो भरे’ यही है सत्य, आपका इसमें कोई न दोष ।।
(२२)
अधिक क्या कहूँ, हुआ सो हुआ, अरे जाने दो बीती बात ।
परन्तु अब ऐसा कुछ करें, न होवे फिर ऐसा आघात ।।
(२३)
आप न करें विकल्प विशेष, सभी कुछ निश्चित हैं संयोग ।
बात बस इतनी है हे नाथ !, मिला देते सत् का संयोग ।।
(२४)
भेज देते आर्याश्रम में, यही था क्या उपाय बस एक ।
धर्मपालन होता रहता, जरा तुम सोचो कुछ स्वयमेव ।।
(२५)
यदि था मन में कुछ सन्देह, जलाकर अग्नि शिखा की आँच ।
और देकर कठोर आदेश, प्रभो तत्क्षण कर लेते जाँच ।।
(२६)
सत्य की होती है जब जाँच, नहीं आती है उसको आँच ।
जाँच का अवसर भी न दिया, किया क्यों यह असीम अन्याय ।।
(२७)
हुआ जो आज, उसी दिन क्यों, नहीं हो सकता था हे नाथ ।
न होती मैं अनाथ इस तरह, किन्तु कुछ भी न सोचा नाथ ।।
(२८)
अरे निन्दा सुनकर मेरी, नाथ ! त्यागा तुमने मुझको ।
धर्म की सुनकर निन्दा कभी, त्याग मत देना तुम उसको ।।
(२९)
त्यागने से मुझको हे नाथ !, हुआ होगा थोड़ा आताप ।
त्याग देने से आतम धर्म, मिलेगा भव-भव में संताप ।।
(३०)
हुआ सो हुआ किन्तु अब तो, जगत की वणिकवृत्ति लखकर ।
नहीं रहना है इसमें मुझे, धरूँगी जिनदीक्षा हितकर ।।
( पद्धरिका छन्द )
(३१)
ऐसा कह जनक सुता चल दी, माँ-माँ कह लवकुश चिल्लाये ।
वे रुंधे गले से बोले हे माँ !, हमें छोड़कर क्यों जाये ? ।।
(३२)
हमने क्या किया दोष जननी, जो हमें छोड़कर तुम जातीं ? ।
हम रहे सदा ही आज्ञा में, क्यों कर हमको तुम बिसराती ? ।।
(३३)
सौमित्र भरत भी आ पहुँचे, शत्रुघ्न खड़े थे सिर नाये ।
लौटो-लौटो हे जगजननी !, क्यों हम पर नहीं दया आये ? ।।
(३४)
यह सुनकर सीता देवी यों, मृदु स्वर में धीरे से बोलीं ।
नाते-रिश्ते सब झूठे हैं, इनमें उलझी दुनिया भोली ।।
(३५)
नातों का ताप न तपना है, नाते न मुझको अब भायें ।
नाते ही जग के बन्धन हैं, ये सभी जगत को भरमायें ।।
(३६)
जन को निहार जग मरता है, फिर बार-बार देखा करता ।
मुझको निहार लंकेश मरा, तप धारेगी अब जनकसुता ।।
(३७)
यह कह कर फेरी नेत्र किरण, मानो सूरज की किरण मुड़ी ।
निर्जन जंगल की ओर बढ़ी, थी देख रही सब मही खड़ी ।।
(३८)
पृथिवीमती आर्या के समक्ष, सीता ने व्रत स्वीकार किये ।
बस एक श्वेत साड़ी रखकर, सब वस्त्राभूषण त्याग दिये ।।
(३९)
पृथिवीमति की अनुगामिन हो, मानो पृथिवी में समा गईं।
बस इसीलिये जग कहता है, सीता पृथिवी में समा गईं ।।
(४०)
देहान्त समय तो सबका तन, मिट्टी में ही मिल जाता है।
सीता देवी का कोमल तन, भी मिट्टी में मिल जाता है ।।
(४१)
है अरे नयापन इसमें क्या, मिट्टी मिट्टी में समा गई ।
सीता माता का शुद्धातम, तो शुद्धातम में समा गया ।।
(४२)
जन-जन की आँखें भर आईं, अर रोम-रोम हो गये खड़े ।
सीतेश प्रभु की आँखों से, टपटप दो आँसू टपक पड़े ।।
(४३)
वे आँसू थे या मुक्तामणि, या राम हृदय-परिचायक थे ।
या प्रेमलता सिंचक जल थे, घनश्याम राम के द्रावक थे ।।
(४४)
या सीता प्रेम विसर्जन था, या श्रद्धांजलि का अर्पण था ।
दो मोती राम के मानस के, सीता को आज समर्पण था ।।
(४५)
अब थे विचारते राम अहो, क्या जीवन जनता का मन है।
जनता को चाहे खुश करना, तो न्याय नहीं करता जन है ।।
(४६)
वन में उसका अपहरण हुआ, इसमें उसका अपराध न था ।
वह लंका में छह मास रही, पर मन तो उसका साथ न था ।।
(४७)
जंगल में उसकी रक्षा का, उत्तरदायित्व हमारा था ।
इसमें उसका था क्या कसूर ?, उसने तो हमें पुकारा था ।।
(४८)
पर हमने इसके बदले में, उसको निर्जन वनवास दिया ।
क्या यही न्याय है रामचन्द्र !, हमने इसमें क्या न्याय किया ? ।।
(४९)
जन नायक तो उसको कहिये, जो न्याय तुला पर तोल सके ।
जनता के मन को न देखे, बस न्याय नेत्र ही खोल सके ।।
(५०)
जो न्याय नहीं कर सकता वह, कैसा अधिकारी शासन का ?
परित्यक्ता भी फटकार सके, वह राजा नहीं प्रजाजन का ।।
(५१)
यदि न्याय पक्ष अपना सच हो, चाहे जनगण विद्रोह करे ।
चाहे सुमेरु भी हिल जाये, पर नहीं न्याय से वीर फिरे ।।
(५२)
लोकापवाद से डरकर के, है सत्य छिपाना कायरता ।
किसकी जग निन्दा नहीं करे, निन्दा से डरना पामरता ।।
(५३)
बहुमत का कहना सच्चा है, बहुमत कह दे कि पाप करो ।
क्या पाप न्याय कहलायेगा, तो दीन हीन असहाय मरो ।।
(५४)
सीता-सतीत्व में शंका थी, तो क्यों उसको मैं घर लाया ।
सीता यदि परम पुनीता थी, तो क्यों जनमत से घबराया ।।
(५५)
जनता क्या जाने सीता को, शायद उसको विश्वास न हो ।
मुझको था जब पूरा यकीन, क्यों मुझको अब संताप न हो ।।
(५६)
सीता-सतीत्व का जनता को, विश्वास दिलाना था मुझको ।
जो अग्नि-परीक्षा आज हुई, स्वीकृत होती उस दिन उसको ।।
(५७)
देना नजीर न्यायालय में, तो है कोई अपराध नहीं।
अपने बचाव में कुछ कहना, क्या जनजन का अधिकार नहीं ? ।।
(५८)
आदर्श राम थे पतियों के, उनकी नजीर दी पतियों ने ।
आदर्श जानकी सतियों की, उनकी नजीर दी सतियों ने ।।
(५९)
इस जग में अपनी रक्षा में, सारी दुनियाँ देती नजीर ।
धोबिन ने अपनी रक्षा में, सीता की दी थी बस नजीर ।।
(६०)
आरोप जानकी देवी पर, उसने तो नहीं लगाया था ।
उसने तो घर में रहने का, अपना अधिकार जताया था ।।
(६१)
हम धोबिन को बदनाम करें, इसमें उसका कुछ दोष नहीं ।
उस पर भी था संकट भारी, सीता पर कोई रोष नहीं ।।
(६२)
सारा अपराध हमारा है, धोबी-धोबिन का दोष नहीं ।
कह रहे राम मेरे मन में, धोबी-धोबिन पर रोष नहीं ।।
(६३)
रावण के घर में रही हुई, सीतादेवी को वर्षों तक ।
रक्खा था सादर मान सहित, हमने ही तो अपने घर में ।।
(६४)
घर में रखना अपराध यदि, तो यह अपराध हमारा है।
पर दण्ड जानकी को देना, कैसा यह न्याय हमारा है? ।।
(६५)
तो हमने नहीं दिया है क्या, ऐसा सन्देश जगत जन को ।
छुड़वा दें जन निर्जन वन में, एकाकी ऐसी नारी को ।।
(६६)
छुड़वाकर सीता देवी को, जंगल में हमने धोबी को ।
मानों चैलेंज किया अब तुम, जंगल में छोड़ो धोबिन को ।।
(६७)
हमने झोंका निर्दय होकर, सीता देवी को ज्वाला में ।
अब तुम भी क्यों हो उदासीन, धोबिन को झोंको ज्वाला में ।।
(६८)
पर अग्निपरीक्षा बिन घर में, रखकर धोबी ने न्याय किया ।
पर मैंने सीता को तज कर, अन्याय किया अन्याय किया ।।
(६९)
अब क्यों मुझको संताप न हो, केवल मैं ही अपराधी हूँ।
हे शोकानल ! तू जला मुझे, मैं इसी सजा का भागी हूँ।।
(७०)
हे विधि ! मैंने अन्याय किया, पर तू अन्याय नहीं करता ।
विकराल अग्नि की ज्वाला को, सज्जित सरवर क्यों नहीं करता ।।
(७१)
मेरे अपराध दण्ड में भी, तू अरे देर क्यों करता है।
तू खूब जला शोकानल में, रे बन्धु दया क्यों करता है? ।।
(७२)
मैं शोकानल में जल-जलकर, निष्कीट सुवर्ण खरा हूँगा।
जितना जल सकूँ जलूँ हे विधि !, पर जनभय पूर्ण जला दूँगा ।।
(७३)
सीता अब तक परित्यक्ता थी, पर हुआ आज मैं परित्यक्त ।
सुन लो हे जन-जन कान खोल, मैं करता हूँ स्पष्ट व्यक्त ।।
(७४)
अब तक तो समझा था मैंने, नारी ही होती परित्यक्त ।
अन्याय देख कर पतिवर का, हो जाती वह नर से विरक्त ।।
(७५)
नारी का यह वैराग्य प्रेम, कर देता नर का बहिष्कार ।
जिसको जग कहता है अबला, सबला हो जाती शील धार ।।
(७६)
नर जीता हरदम नारी से, रखता है उस पर स्वाधिकार ।
कर्तव्यमुखी नारी पाकर, कर्तव्यविमुख नर गया हार ।।
(७७)
जब सीता को मैं समझाता, उस दिन की याद मुझे आती ।
पर आज देखता हूँ उलटा, है सीता मुझको समझाती ।।
(७८)
नर नारी से पैदा होता, उससे पाता है नेह मान ।
पर अहंकार से भरा स्वयं, जगजननी का करतापमान ।।
(७९)
नारी क्या-क्या न कर सकती, करता हो जिसको नर महान ।
दोनों होएँ जब कर्मवीर, तब जग होता आदर्शवान ।।
(८०)
नारी कोमल को कोमल है, पर निष्ठुर को निष्ठुर महान ।
नर के अनुरूप रही नारी, जाना मैंने नारी विधान ।।
(८१)
राजा की नारी रानी है, तो महाराजा की महारानी ।
नट की नारी को नटी कहें, मिश्रा की नारी मिसरानी ।।
(८२)
दर्जी की नारी दर्जिन है, तो सेठ की नारी सेठानी ।
ठाकुर की नारी ठकुराइन, मैतर की नारी मितरानी ।।
(८३)
मुझ से निर्मोही की रानी, होवेगी निश्चय निर्मोही ।
सीता का है अपराध नहीं, नर होता जो नारी सो ही ।।
(८४)
छोड़ा था सीता को मैंने, असहाय अकेली कानन में ।
मुझको सबन्धु वह छोड़ चली, क्या मृदुता है नारी जन में ? ।।
(८५)
नारी कितनी है त्याग-शील, नररत्नों को पैदा करके ।
जो उसको देवे त्रास महा, चल देती उसको दे कर के ।।
(८६)
सीता ने लव-कुश महावीर, निर्भीक सुसुन्दर सुत जाये ।
जिनको देखो रणप्रांगण में, न लक्ष्मण राम जीत पाये ।।
(८७)
ऐसे इन लव-कुश बेटों को, अपराधी को अर्पित करके ।
शोकार्त्त पति को त्याग सती, बन गई वीर अबला बन के ।।
(८८)
कई भगवन् का अपवाद करें, पर उनको त्याग न देंगे हम ।
यदि निन्दक साधु को निन्दे, तो क्या असाधु कह देंगे हम ? ।।
(८९)
सज्जन सज्जन ही रहें किन्तु, हम ही दुर्जन कहलायेंगे।
कौआ कोसे यदि शतक बार, तो नहीं पशु मर जायेंगे ।।
(९०)
मेरा अपवाद जगत करता, क्या छोड़ जानकी देती चल ।
यदि नहीं, कहो फिर तुम्हीं राम, क्या नहीं मूर्खता यह केवल ।।
(९१)
जिसका आलोचक कोई न हो, ऐसा दर्शन या महापुरुष ।
इस जगतीतल में दुर्लभ है, जो सर्वमान्य हो महापुरुष ।।
(९२)
तो क्या हम सभी दर्शनों को, निन्दा के कारण तज देंगे ? ।
तथा प्रशंसा के कारण, चाहे जो कुछ अपना लेंगे? ।।
(९३)
निन्दा करने से मात्र नहीं, मैं कभी धरम को छोड़ेंगा।
जग कर दे चाहे बहिष्कार, भगवान से मुख ना मोडूंगा ।।
(९४)
लोकापवाद के कारण ही, सीता को मैंने क्यों छोड़ा ।
पाखण्ड नहीं क्या यह मेरा, लोकापवाद का ले रोड़ा ।।
(९५)
चुप क्यों हो आज सुनो लक्ष्मण !, धिक्कारो मुझको बार-बार ।
अन्यायी भूपति को पाकर, करते क्यों ना तुम असि प्रहार ? ।।
(९६)
तुम तो अन्यायी नृपगण का, मद-मर्दन करने वाले हो।
पर आज हो गया क्या तुम को, जो चुप्पी साधे बैठे हो ?
(९७)
मैं नहीं तुम्हारा भाई हूँ, मैं हूँ अब अन्यायी नायक ।
अन्यायी के अपराध दण्ड, के हेतु चलाओ तुम शायक ।।
(९८)
पर आज दया क्यों करते हो ?, तुम समझ मुझे अग्रज भ्राता ।
यह पक्षपात क्या नहीं अनुज ?, अन्यायी से तोड़ो नाता ।।
(९९)
मेरे बेटे ! सीता-सपूत !!, सुन लो तुम मेरी एक बात ।
लक्ष्मण तो कायर हुये किन्तु, मुझको मत कहना कभी तात ।।
(१००)
मैं अन्यायी क्या कहलाऊँ, ऐसे वीरों का पिता आज ?।
लव कुश लक्ष्मण शत्रुघ्न भरत, नहिं दिखें न मुझको रुचे राज ।।
(१०१)
सब सूना सूना लगता है, प्रासाद खण्डहर से लगते ।
अमृत भी विष सा लगे आज, सब भोग व्याल सम हैं डसते ।।
(१०२)
सीते ! तुमसे ही पूछ रहा, निरदये कहूँ अथवा सदये ? ।
माना मेरा ही है कसूर, क्या क्षम्य नहीं अपराध प्रिये ? ।।
(१०३)
नहिं-नहिं मैं भूल गया सीता, निर्दय होकर तुमको त्यागा ।
न्यायोचित दण्ड नहीं भोगूँ, तो फिर अन्याय महा होगा ।।
(१०४)
छूकर तुमको अपवित्र करूँ, यह होगा मेरा पागलपन ।
तुम अग्निशिखाओं में तपकर, पा चुकी चिरन्तन उजलापन ।।
(१०५)
जाओ ! जाओ ! सीते ! जाओ !!, मैं आज तुम्हें ना रोकूँगा ।
अपनी करनी का पुरस्कार, पाकर मैं उसको भोगूँगा ।।
(१०६)
कैकेई ने वनवास दिया था, धीर-वीर नर को पाकर ।
उसको दुष्टा निर्दया कहें, जो नररत्नों की रत्नाकर ।।
(१०७)
जिसने वैरागी भरतराज से, वीर सु-सुन्दर सुत जाये ।
पर पुत्र प्रेम में अंधी हो, कर विगत धरोहर वर पाये ।।
(१०८)
मैंने अबला अनुगामिन को, एकाकी जंगल में छोड़ा।
कर्कश शब्दों का है अभाव, जो कुछ कह दो मुझको थोड़ा ।।
(१०९)
जब शीलवती सीतादेवी, की अग्नि परीक्षा मैंने ली ।
तो अब मुझको भी देना है, भारतवासी जन सुन लो जी ।।
(११०)
सीता का कुण्ड मही में था, मेरा होगा मनमन्दिर में।
उसमें था सूखा काष्ठ भरा, मेरा तन ही होगा इसमें ।।
(१११)
उसमें अग्नि सुलगाई थी, मैंने शोकानल लगा दिया ।
जब कूदीं कुण्ड में सीताजी, अग्नि ने भी जल बहा दिया ।।
(११२)
अगनी को अमल सलिल करके, उसने पवित्रता दिखला दी।
मैंने शोकाग्नि लगा मन में, आँसू की बूँदें ढुलका दी ।।
(११३)
तेरी पवित्रता का सीता, मैंने प्रमाण जब पाया था ।
अपराध समझ करके अपना, तुमको अपनाना चाहा था ।।
(११४)
मेरी पवित्रता पाकर के, क्यों ना अपराध भुलातीं हो ।
कह दो सीते तुम साफ-साफ, मुझको अब क्यों भरमातीं हो ।।
(११५)
हे राम ! राम !! तू बता राम !!, क्या सोच रहा है तू मन में।
अन्याय प्रमाणित हो जिसका, कैसी पवित्रता उस जन में ।।
(११६)
श्री रामचन्द्र हृदयस्थल में, यह गूंज उठे प्रति छिन-छिन में।
अन्याय प्रमाणित हो जिसका, कैसी पवित्रता उस जन में !
(११७)
दिग-दिगन्त में गूंज उठे अर, गूँज उठें सारे नभ में।
अन्याय प्रमाणित हो जिसका, कैसी पवित्रता उस जन में ?
(११८)
रे अग्निकुण्ड की ज्वालाओं के, स्वर में थी आवाज यही ।
कह रही पगतले पड़ी हुई, जगधात्री यह पार्थिव्य मही ।।
(११९)
जिस तरफ नेत्र उनके जावें, वे यही देख बस पाते हैं।
अन्यायी राजा को पाकर, निर्दोष सताये जाते हैं ।।
(१२०)
लिखने वाला है नहीं कोई, अक्षर भी नहीं दीखते थे ।
पर बाँच रहे थे रामचन्द्र, कहते बस सीते-सीते थे ।।
(१२१)
सीता निर्दोषी सिद्ध हुई, मैं ही हूँ दोषी सिद्ध आज ।
पहले सीता परित्यक्त हुई, परित्यक्त हुआ फिर रघुराज ।।
(१२२)
अब तक मैं आगे रहा और, सीता अनुगामी रही सदा ।
सीता आगे अब हुई राम, उसके पीछे है सुनो प्रजा ।।
(१२३)
कहना भारत माँ के सपूत, जब मिलो परस्पर सीताराम ।
जिससे तुमको नित याद रहे, सीता अनुगामी हुए राम ।।
(१२४)
साकेत प्रजा के गूंजे स्वर, सीता-सी नहीं और अन्या ।
हे जगत्पूज्य सीता धन्या, सीता धन्या सीता धन्या ।।
(१२५)
सीता देवी सी शीलवती, धरती पर कोई नहीं अन्या ।
सीता धन्या सीता धन्या, सीता धन्या सीता धन्या ।।
(१२६)
न रामचन्द्र-सा राजा भी, अब तक जगती में हुआ अन्य ।
जय रामचन्द्र से राजा की, शत बार धन्य शत बार धन्य ।।
(१२७)
इस पृथ्वीतल की जनता के, हैं रोम-रोम में रमे राम ।
रग-रग में समाहित हैं सीता, पर कहते हैं सब राम-राम ।।
(१२८)
घटनायें बासी हो जातीं, पर कथा नहीं होती बासी ।
इस दुविधा से कब उबरेंगे, कर्त्तव्यनिष्ठ भारतवासी ।।
(१२९)
भारतवासी गुणग्राही हैं, वे अवगुण अनदेखी करते ।
है यही वजह कि वे हरदम, सबके सद्गुण ही अपनाते ।।
(१३०)
अरिहंत राम के परमभक्त, हम आत्मराम के आराधक ।
जिनवाणी सीता के सपूत, भगवान आतमा के साधक ।।
(१३१)
भगवान आतमा के साधक, ध्रुवधाम आतमा के साधक ।
निज आतम में ही रहें लीन, है यही भावना भवनाशक ।।

रचयिता: डॉ० हुकमचंद जैन भारिल्ल जी

1 Like