पर्याय बदलते रहते हो
द्रव्य सदा अविचल रहता
जैसे नभ में मेघ बदलते हैं
फिर भी नभ तो नभ ही रहता है
बचपन बीता, बीता मेरा यौवन
वृद्धावस्था ने दी दस्तक
हर पल बदल मेरी काया रे !
पर मेरा ध्रुव तो ध्रुव था, उसमें कुछ नहीं होता रे !
सुख, दुःख दो बहनें हैं, खूब बना करती हैं
सुख आता तो कभी दुःख और मुझे निचोड़ा करती हैं
हर कल्पित सुख दुःख की घूटें पिलाया करती हैं
फिर भी मेरा ध्रुव तो ध्रुव है, उसमें कुछ नहीं होता रे !
सम्मान अपमान के जहरीले सर्पों ने खूब झकझोरा है
संयोगों के विरहों ने भी खूब सताया है रे !
निज को न पहचान सका , धक्के खाऐ हैं रे !
फिर भी मेरा ध्रुव तो ध्रुव है, उसमें कुछ नहीं होता रे !
अरे न मैं शरीर , न मन - वाणी हूँ रे !
मैं तो ध्रुव चेतन अविनाशी अखण्ड मेरी काया है
मैं तो निज में ही रहता हूँ वही मेरा बसेरा है
मेरा ध्रुव तो ध्रुव है, उसमें कुछ नहीं होता रे !
द्रष्टा बनकर देखा ही था,
की आनंद के झरने फूट पड़े
क्षणभंगुर पर्यायों का तड़-तड़ टूटा
सहज हुआ बस सहज सहज हुआ
जन्म मरण का भय भागा
बंधन की चिन्ता भी थक कर चली गई
शाश्वत पथ पर आ गया॥
पल-पल द्रव्य वही, पर्याय बदलती जाती हैं,
बदल-बदल कर अन-बदला रहना यही जगत् की रीति है
पर मेरा ध्रुव तो ध्रुव था, उसमें कुछ नहीं होता रे !
पं० चैतन्य जैन शास्त्री, कोटा