दास-तुमसे लागी लगन, ले लो अपनी शरण, पारस प्यारा।
मेटो-मेटो जी संकट हमारा… ।। 1 ।।
नाथ- कर कुदृष्टि भगन, ले लो अपनी शरण, भव्य प्यारे।
सारे संकट मिटेंगे तुम्हारे… ।। 2 ।।
दास- निशदिन तुमको जपूँ, पर से नेहा तजूँ, जीवन सारा।
तेरे चरणों में बीते हमारा ।। मेटो. ।। 3 ।।
नाथ- मत तुम मुझको जपो, मुझ सम निज को लखो, क्षण ये सारे ।
तत्त्व चिंतन में बीतें तुम्हारे ।। मेटो. ।। 4 ।।
दास- अश्वसेन के राजदुलारे, वामादेवी के सुत प्राण प्यारे ।
सबसे नेहा तोड़ा, जग से मुँह को मोड़ा, संयम धारा ।। मेटो. ।। 5 ।।
नाथ- आत्मा के पिता माँ न कोई, ममता अज्ञान से तेरे होई ।
सबसे दृष्टि मोड़ो, निज को निज में जोड़ो, समता धारे ।। मेटो. ।। 6 ।।
दास- इन्द्र और धरणेन्द्र भी आए, देवी पद्मावती मंगल गाए।
आशा पूरो सदा, दुःख न पावे कदा, सेवक थारा ।। मेटो. ।। 7 ।।
नाथ- देवताओं ने स्तुतियाँ जो की, उससे महिमा नहीं आत्मा की।
महिमामय निज भाव, उसको दृष्टि में लाय, आशा भागे ।। मेटो. ।। 8 ।।
दास-जग केदुःख की तो परवाह नहीं है, स्वर्ग सुख की भी चाह नहीं है।
मेटो जामन-मरण होवे ऐसा यतन, पारस प्यारा ।। मेटो. ।। 9 ।।
नाथ- बाह्य जग में कहीं दुख नहीं है, स्वर्ग मे सुख किंचित नहीं है।
दुःखदाता भरम, राग-द्वेष करम, इनको त्यागें ।। मेटो. ।। 10।।
दास-लाखों बार तुम्हें शीश नवाऊँ, जग के नाथ तुम्हें कैसे पाऊँ।
पंकज व्याकुल भया, दर्शन बिन ये जिया, जीवन खारा ।। मेटो. ।। 11 ।।
नाथ-सम्यग्दर्शन तथा ज्ञान-चारित्र, सुखमय पद तुमको देते पवित्र ।
तुम भी इनको धरो, खुद ही नाथ बनो, निज संभारे ।। मेटो. ।। 12 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह