भव्य रूप ज्ञायक है तेरा, राग-द्वेष तो है संसार।
मोह का सब जंजाल है झूठा, झूठा सब ये लोकाचार ।। टेक ।।
लीन होय व्यवहार में चिर से, तुमने जग में भ्रमण किया।
पर को ही सर्वस्व समझ, परमार्थ रूप को भुला दिया।।
इसीलिये तुम दुःख उठाते, कर न सके अपना उद्धार ।। 1 ।।
एक समय की ये पर्यायें, प्रतिक्षण व्यय इनका होता।
फिर क्यों इनमें दुखी-सुखी होकर, संसार बढ़ा लेता।।
ले ध्रुव का आश्रय सुखमय, बस हो जा तू भी भव से पार ।। 2 ।।
यह जग स्वयं व्यवस्थित ही है, तुझको कुछ भी नहीं करना।
जो कुछ होता है होने दे, ज्ञाता-दृष्टा ही रहना।।
ज्ञायक सागर के अन्तस में, अक्षय सुख का है भंडार ।। 3 ।।
ज्ञायक की पहिचान बिना, व्रत तप नहीं मुक्ति प्रदाता है।
पुण्य बँधे स्वर्गादिक पावें, भव का अन्त न आता है।।
ज्ञायक महिमा समझ लें भैया, तोड़ भ्रमों की ये दीवार ।। 4 ।।
ज्ञायक में नहिं भाव विकारी, ज्ञायक तो बस ज्ञायक है।
निरुपाधि चैतन्य चक्रवर्ती तो मुक्ति प्रदायक है।।
मंगल शरणभूत ज्ञायक ही, तीन भुवन में सुख दातार ।। 5 ।।
ज्ञायक का आश्रय होने पर सुःख सभी मिल जाता है।
परमेष्ठी पद भी क्रमशः फिर स्वयं प्रगट हो जाता है।।
भव दुःख की भीषण आंधी में, निज ज्ञायक ही है आधार ।। 6 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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