पारस प्रभु | Paras prabhu

आत्मिक सौंदर्य विवश कर देता आत्मानंद व्यक्त करने,
अपने में अव्यक्त हो जीवन की अभिव्यक्ति है ।
बाह्य आकर्षण भला क्या लुभा पाते,
यथार्थ भावना के समन्वय युक्त अनुभूति है, निज अनुभूति है।।

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पारस प्रभु पाकर तुमको,
धन्य हुई आराधना----
धन्य हुई आराधना----

पाया नहीं था जब तक तुमको, थी अधूरी ये साधना।
रस्म निभाने धर्म की अब, पूरी होगी ये भावना।।
सदियों से जो थी दुःखी, आज सुखी होगी आत्मा ।।1।।

आराधन होगा स्वरूप का, सिद्ध सम निज आत्मा।
रागादि बंधन टूटे क्षण में, होती ऐसी भावना।।
धर्म ध्यान से शुक्ल ध्यान में, जाने की बस कामना ।।
नाथ आपके अवलंबन से, पूरी होगी साधना ।।2।।

रचनाकार: आराधना जैन (Aaradhana Jain), कानपुर