परमात्मप्रकाश की संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी | Paramatmaprakash Ki Sankshipt Prashnottari

परमात्मप्रकाश की संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी

-प्रो. वीरसागर जैन

परमात्मप्रकाश अपभ्रंश भाषा का एक उच्चकोटि का आध्यात्मिक ग्रन्थ है। मैंने इसका श्री दिगम्बर जैन मन्दिर, ग्रीनपार्क, नई दिल्ली में नियमित रूप से सभा में आद्योपान्त स्वाध्याय किया था। स्वाध्याय के अंत में एक बार पुनः पूरे ग्रन्थ को दोहराने के लिए मैंने यह संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी बनाई। इससे सभी को बहुत लाभ हुआ और मैं भी इसे जब-जब पढ़ता हूँ तो मुझे बहुत आनन्द आता है, अतः सभी के लाभार्थ इसका यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। इस प्रश्नोत्तरी की एक विशेषता यह है कि हर प्रश्न के उत्तर में परमात्मप्रकाश के दूहों का प्रमाण भी साथ में कोष्ठक में दिया गया है।

पहला महाधिकार

प्रश्न-1. ‘परमात्मप्रकाश’ की रचना कब और किसने की?
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ की रचना आज से लगभग 1300 वर्ष पूर्व विक्रम की छठी-सातवीं शताब्दी में मुनिराज योगीन्दु देव ने की है।

प्रश्न-2. मुनिराज योगीन्दु देव के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर- मुनिराज योगीन्दु देव जिन-अध्यात्म के उत्कृष्ट ज्ञाता थे। वे अत्यन्त सरल-सुबोध ढंग से आत्मकल्याण का मार्ग समझाने में भी समर्थ थे। वे आज से लगभग 1300 वर्ष पूर्व इसी पवित्र भारत-भूमि पर विचरण करते थे। उन्होंने ‘परमात्मप्रकाश’ के अतिरिक्त ‘योगसार’ और ‘अमृताशीति’ नाम के श्रेष्ठ ग्रन्थों की भी रचना की है।

प्रश्न-3. ‘परमात्मप्रकाश’ की रचना किस भाषा में हुई है?
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ की रचना अपभ्रंश भाषा में हुई है।

प्रश्न-4. अपभ्रंश भाषा के सम्बन्ध में आप क्या जानते हैं?
उत्तर- अपभ्रंश भाषा प्राकृत और संस्कृत जैसी ही एक महत्त्वपूर्ण भाषा है। उसका समय सामान्यतया 5वीं शती से 15वीं तक माना जाता है। अपभ्रंश भाषा को हम संस्कृत और हिन्दी के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी कह सकते हैं। यदि संस्कृत भाषा हिन्दी भाषा की नानी है तो अपभ्रंश भाषा उसकी माँ है।

प्रश्न-5. ‘परमात्मप्रकाश’ की संस्कृत-टीका कब और किसने लिखी?
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ की संस्कृत-टीका आज से लगभग 900 वर्ष पूर्व विक्रम की बारहवीं शती में श्री ब्रह्मदेवसूरि ने लिखी।

प्रश्न-6. श्री ब्रह्मदेवसूरि के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर- श्री ब्रह्मदेवसूरि आध्यात्मिक शैली में टीका लिखने वाले एक अत्यन्त कुशल विद्वान् थे। वे आज से लगभग 900 वर्ष पूर्व विक्रम की 12वीं शती में इसी पवित्र भारतभूमि पर विचरण करते थे। उन्होंने ‘परमात्मप्रकाश’ के अतिरिक्त ‘बृहद्रव्यसंग्रह’ की भी बहुत सुन्दर टीका लिखी है।

प्रश्न-7. ‘परमात्मप्रकाश’ की हिन्दी-भाषा-वचनिका कब और किसने लिखी?
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ की हिन्दी-भाषा-वचनिका आज से लगभग 250 वर्ष पूर्व पं. दौलतराम कासलीवाल ने लिखी।

प्रश्न-8. पं. दौलतराम कासलीवाल के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर- पं. दौलतराम कासलीवाल का समय विक्रम संवत् 1749 से 1829 तक है। वे राजस्थान के जयपुर राज्य में वकील के पद पर कार्य करते थे। उन्होंने कुल मिलाकर 20 ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें से 10 गद्य में हैं और 10 पद्य में। उनके कुछ प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित हैं- पद्मपुराण-वचनिका, आदिपुराण-वचनिका, अध्यात्म-बारहखड़ी, विवेक-विलास आदि।

प्रश्न-9. ‘परमात्मप्रकाश’ के किसी एक अच्छे प्रकाशक और प्राप्ति-स्थान का पता लिखिये।
उत्तर- श्री परमश्रुत प्रभावक मंडल, श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम, स्टेशन-अगास, वाया-आणंद, पोस्ट बोरिया, गुजरात, पिन-388130

प्रश्न-10. ‘परमात्मप्रकाश’ में कुल कितने महाधिकार हैं और उनके क्या नाम हैं?
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ में दो महाधिकार हैं और उनके नाम क्रमशः आत्माधिकार और मोक्षाधिकार हैं।

प्रश्न-11. ‘परमात्मप्रकाश’ के पहले अधिकार में कुल कितने दोहे हैं?
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ के पहले अधिकार में कुल 123 दोहे हैं, परन्तु 3 दोहे प्रक्षेपक भी हैं जिनको इनमें नहीं गिना गया है।

प्रश्न-12. ‘परमात्मप्रकाश’ के पहले महाधिकार के सर्व दोहों की विषय-वस्तु संक्षेप में बतलाइए।
उत्तर-
दोहा-संख्या विषय-वस्तु
1 से 7 मंगलाचरण (पंचपरमेष्ठी को नमस्कार)।
8 से 10 प्रभाकरभट्ट का प्रश्न - परमात्मा का स्वरूप समझाइये।
11 से 12 योगीन्दु देव ने कहा- मैं उत्तर देता हूँ, ध्यान से सुनो।
13 से 15 बहिरात्मा, अन्तरात्मा व परमात्मा का स्वरूप ।
16 से 25 परमात्मा के स्वरूप का विशेष प्रतिपादन ।
26 से 49 जैसा परमात्मा है वैसा ही निजात्मा है।
50 से 55 आत्मा सर्वगत भी है, जड़ भी है, देहप्रमाण भी है और शून्य भी है।
56 से 58 द्रव्य-गुण-पर्याय ।
59 से 66 कर्मसिद्धान्त ।
67 से 75 भेदाभेद रत्नत्रय की भावना।
76 से 92 सम्यग्दृष्टि व मिथ्यादृष्टि का स्वरूप।
93 से 123 चूलिका।

प्रश्न-13. ‘परमात्मप्रकाश’ के मंगलाचरण में किनको नमस्कार किया गया है? क्रमशः बतलाइये ।
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ के मंगलाचरण में पंचपरमेष्ठी को नमस्कार किया गया है, परन्तु उनका क्रम इस प्रकार रखा गया है- 1. सिद्ध (पाँच दोहों में), 2. अरिहन्त (एक दोहे में), 3. आचार्य-उपाध्याय-साधु (एक दोहे में)। (देखिए दूहा- 1 से 7)

प्रश्न-14. ग्रन्थ के प्रारम्भ में प्रभाकर भट्ट ने क्या प्रश्न पूछा है? अच्छी तरह लिखिये।
उत्तर- ग्रन्थ के प्रारम्भ में प्रभाकर भट्ट ने भावसहित पंचपरमेष्ठी को नमस्कार करके विनयपूर्वक यह प्रश्न पूछा है कि हे स्वामी! मुझे इस संसार में परिभ्रमण करते हुए अनंतकाल व्यतीत हो गया है, परन्तु मैंने आज तक किंचित् मात्र भी सुख नहीं प्राप्त किया है, अपितु महान् दुःख ही प्राप्त किया है, अतः मुझे अब उस परमात्मा का स्वरूप समझाने की कृपा कीजिए जिसको जानने पर मेरे चतुर्गति के समस्त दुःखों का विनाश हो जाए। (देखिए दूहा- 8-9-10)

प्रश्न-15. आत्मा की तीन अवस्थाएँ कौन-कौन सी हैं? उनका क्या स्वरूप है?
उत्तर- आत्मा की तीन अवस्थाएँ ये हैं- बहिरात्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा। जो शरीर को ही आत्मा मानता है वह बहिरात्मा है, जो निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर ज्ञानमय परमात्मा को देखता है वह अन्तरात्मा है, और जिसने कर्मों से मुक्त होकर ज्ञानमय आत्मा को प्राप्त कर लिया है वह परमात्मा है। (देखिए दूहा-13-14-15)

प्रश्न-16. श्री ब्रह्मदेवसूरि के अनुसार प्रत्येक विषय का व्याख्यान किन 5 प्रकारों से जानना चाहिए?
उत्तर- शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ, आगमार्थ और भावार्थ। (देखिए दूहा-1 की टीका)

प्रश्न-17. ‘परमात्मप्रकाश’ और उसकी टीका में किन दो प्रमुख नयों के द्वारा व्याख्यान किया गया है?
उत्तर- निश्चयनय और व्यवहारनय ।

प्रश्न-18. निश्चयनय के मुख्य भेद कितने हैं? कौन-कौन?
उत्तर- निश्चयनय के प्रमुख भेद दो हैं- अशुद्धनिश्चयनय और शुद्धनिश्चयनय। शुद्धनिश्चयनय के फिर तीन भेद होते हैं- एकदेशशुद्धनिश्चयनय, पूर्णशुद्धनिश्चयनय और परमशुद्धनिश्चयनय। इन सबके विषयों के उदाहरण इसप्रकार हैं-
(क) अशुद्धनिश्चयनय- अशुद्ध पर्यायों को जीव का कहना। जैसे- जीव के राग-द्वेष हैं।
(ख) एकदेशशुद्धनिश्चयनय- आंशिक शुद्धता को पूर्ण शुद्धता कहना। जैसे- सम्यग्दृष्टि मुक्त ही है।
(ग) पूर्णशुद्धनिश्चयनय- आत्मा को क्षायिक भावों का कर्ता बताना। जैसे- जीव के केवलज्ञान है।
(घ) परमशुद्धनिश्चयनय- त्रिकाली शुद्ध परमपारिणामिक भाव को ग्रहण करना। जैसे- जीव सत्ता, चैतन्य एवं ज्ञानादि शुद्ध प्राणों से जीता है।

प्रश्न-19. व्यवहारनय के मुख्य भेद कितने हैं? कौन-कौन?
उत्तर- व्यवहारनय के प्रमुख भेद दो हैं- सद्भूत और असद्भूत। एक अभेद वस्तु में भेद बताना सद्भूत व्यवहारनय है और दो भिन्न-भिन्न वस्तुओं को अभिन्न बताना असद्भूत व्यवहारनय है। सद्भूत और असद्भूत- इन दोनों के दो-दो भेद ये भी होते हैं- अनुपचरित और उपचरित। इस प्रकार चार भेद हो गये। इन सबके प्रयोग इसप्रकार हैं-

  1. अनुपचरितसद्भूत, यथा- जीव के केवलज्ञानादि हैं।
  2. उपचरितसद्भूत, यथा- जीव के रागादि हैं।
  3. अनुपचरितअसद्भूत, यथा- जीव का शरीर है।
  4. उपचरितअसद्भूत, यथा- जीव का धन है।

प्रश्न-20. ‘निरंजन’ किसे कहते हैं? ‘निरंजन’ शब्द का अर्थ भी बताइए।
उत्तर- जिसके वर्ण, गंध, रस, शब्द, स्पर्श, जन्म, मरण, क्रोध, मान, माया, मोह, पुण्य, पाप, हर्ष, विषाद आदि एक भी दोष नहीं है वही निरंजन है। निर्+अंजन=निरंजन। जो अंजन अर्थात् समस्त विभावों से रहित है वही निरंजन है। अन्य कोई परमत-कल्पित निरंजन नहीं है। (देखिए, दूहा- 19-20-21)

प्रश्न-21. ‘जीव और अजीव को एक मत कर!’ - इसका क्या अभिप्राय है?
उत्तर- यद्यपि जीव और अजीव सदा अलग-अलग ही हैं, उनको एक नहीं किया जा सकता, तथापि अज्ञानी जीव अपनी मान्यता में अजीव पदार्थों से एकत्व, ममत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व के भाव करता है, इसे ही अध्यात्म में जीव और अजीव को एक करना कहते हैं।
अजीव पाँच प्रकार का है- पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। स्वयं को स्पर्श-रसादि वाला मानना जीव और पुद्गल को एक करना है। मैं जीवादि को गमन कराता हूँ- ऐसा मानना जीव और धर्मद्रव्य को एक करना है। मैं जीवादि को रोकता हूँ- ऐसा मानना जीव और अधर्मद्रव्य को एक करना है। मैं जीवादि को जगह देता हूँ- ऐसा मानना जीव और आकाश द्रव्य को एक करना है। मैं जीवादि को परिणमन कराता हूँ- ऐसा मानना जीव और काल द्रव्य को एक करना है। (देखिए दूहा- 30)

प्रश्न-22. आत्मा ही जगत् का कर्ता-हर्ता है- कैसे?
उत्तर- अज्ञानदशा में यह आत्मा ही नाना प्रकार के विकारी भावों को करता हुआ चतुर्गतिरूप जगत् को उत्पन्न करता है, अतः उसका कर्ता है, तथा शुद्ध स्वभावरूप परिणमन करके उस चतुर्गति रूपी जगत् का विनाश भी करता है, अतः उसका हर्ता भी है।

प्रश्न-23. ‘परमात्मा जगत् के अन्दर रह रहा है और जगत् परमात्मा के अन्दर रह रहा है।’ - इस कथन का क्या अभिप्राय है?
उत्तर- परमात्मा जगत् के बाहर नहीं रहते, जगत् में ही रहते हैं, परन्तु वे सम्पूर्ण जगत् को जानते भी हैं, इसलिए यह कहा गया है कि परमात्मा जगत् के अन्दर रह रहा है और जगत् परमात्मा के अन्दर रह रहा है। सो इस अपेक्षा से उचित ही है। (देखिए दूहा- 41)

प्रश्न-24. ‘आत्मा सर्वगत भी है, जड़ भी है, देह-प्रमाण भी है और शून्य भी’ - इसकी अपेक्षा समझाइए।
उत्तर- आत्मा केवलज्ञान से सम्पूर्ण लोकालोक को जानता है- इस अपेक्षा सर्वगत कहा जाता है, इन्द्रियजनित ज्ञान से रहित है- इस अपेक्षा जड़ कहा जाता है, सिद्ध दशा में अन्तिम शरीर के प्रमाण रहता है- इस अपेक्षा देह-प्रमाण कहा जाता है और समस्त कर्मों व विभावों से अत्यन्त रहित हो जाता है- इस अपेक्षा शून्य भी कहा जाता है। (देखिए दूहा- 52 से 55)

प्रश्न-25. अष्टकर्म और उनके अभाव से प्रकट होने वाले अष्टगुणों के नाम बताइये?
उत्तर- कर्म कर्म के अभाव से प्रकट होने वाले गुण

  1. ज्ञानावरण अनन्तज्ञान
  2. दर्शनावरण अनन्तदर्शन
  3. मोहनीय अनन्तसुख
  4. अन्तराय अनन्तवीर्य
  5. वेदनीय अव्याबाध
  6. आय सूक्ष्मत्व
  7. नाम अवगाहनत्व
  8. गोत्र अगुरुलघुत्व

प्रश्न-26. कर्म किसे कहते हैं?
उत्तर- जो पौद्गलिक अणु विषय-कषाय से रंजित मोही जीवों के आत्मप्रदेशों से चिपकते हैं उन्हें कर्म कहते हैं। (देखिए दूहा- 62)

प्रश्न-27. अनंत चतुष्टय किसे कहते हैं?
उत्तर- अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख और अनंत वीर्य को ही अनंत चतुष्टय कहते हैं। अनंतबल अनंतवीर्य का ही दूसरा नाम है। (देखिए दूहा- 1)

प्रश्न-28. आत्मा पंगु है - कैसे? समझाइये।
उत्तर- यद्यपि यह आत्मा शुद्ध निश्चयनय से अनन्त वीर्य को धारण करनेवाला है, परन्तु व्यवहारनय से शुभाशुभ कर्मों से ऐसा दृढ़ बँधा हुआ है कि स्वयं से न कहीं आता है न कहीं जाता है, अतः इस अपेक्षा से वह पंगु ही है। (देखिए दूहा- 66)

प्रश्न-29. शास्त्रज्ञान एवं व्रत-तपश्चरणादि का क्या फल होता है?
उत्तर- शास्त्रज्ञान एवं व्रत-तपश्चरणादि का फल निम्नप्रकार होता है-
(क) यदि ये वीतराग सम्यक्त्व सहित हों तो मोक्ष के सहकारी कारण होते हैं।
(ख) यदि वीतराग सम्यक्त्व के अभाव में कोरे शुभभाव सहित हों तो पुण्यबंध के कारण हैं।
(ग) यदि मिथ्यात्व-रागादि सहित हों तो पापबंध के कारण हैं। (देखिए दूहा- 98)

प्रश्न-30. जिसने आत्मा को जाना उसने सब जान लिया - इस बात को युक्ति से सिद्ध कीजिए।
उत्तर- इसमें चार युक्तियाँ हैं-
(क) सम्पूर्ण द्वादशांग का सार एक आत्मा ही है, अतः जिसने एक आत्मा को जाना उसने सब जान लिया।
(ख) जगत् में दो ही प्रकार के पदार्थ हैं- स्व और पर। जो आत्मा को जानता है वह स्व और पर में कभी कहीं कोई भूल नहीं करता, अतः यह सही है कि जिसने आत्मा को जाना उसने सब जान लिया।
(ग) जो आत्मा को जानता है वह श्रुतज्ञानरूप व्याप्तिज्ञान से लोकालोक को जान लेता है, अतः यह युक्तिसंगत है कि जिसने आत्मा को जाना उसने सब जान लिया।
(घ) जो आत्मा को जानता है वह शीघ्र ही निर्विकल्प समाधि के द्वारा केवलज्ञान को प्राप्त करके सम्पूर्ण लोकालोक को जानेगा, अतः इस अपेक्षा भी यह कहना ठीक है कि जिसने आत्मा को जाना उसने सब जान लिया। (देखिए दूहा- 99)

प्रश्न-31. ‘आत्मा ही परलोक है’- कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- (क) आत्मा ही परलोक है, क्योंकि आत्मा ही ‘पर’ को अर्थात् उत्कृष्ट वीतराग चिदानंद स्वभाव को, ‘लोक’ अर्थात् देखता है।
(ख) पर+लोक=परलोक । अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष ही परलोक है। श्रेष्ठ पुरुष एक आत्मा ही है, अन्य कोई नहीं। (देखिए दूहा- 110 से 111)

प्रश्न-32. निर्विकल्प समाधि या आत्मध्यान की सामर्थ्य बताइये।
उत्तर- निर्विकल्प समाधि या आत्मध्यान की सामर्थ्य यह है कि जिस प्रकार अग्नि की एक कणी पर्वत के समान घास के ढेर को भस्म कर देती है, उसी प्रकार निर्विकल्प समाधि जन्म-जन्मान्तरों के संचित कर्मों को क्षणभर में नष्ट कर देती है। (देखिए दूहा- 114)

प्रश्न-33. ‘परमात्मप्रकाश’ के प्रथमाधिकार का कोई एक दोहा हिन्दी-अर्थ-सहित लिखिए।
उत्तर- जो दोहा स्वयं को विशेष प्रिय हो, उसे स्वेच्छा से लिखिए।

दूसरा महाधिकार

प्रश्न-1. ‘परमात्मप्रकाश’ के दूसरे महाधिकार में कुल कितने दोहे हैं?
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ के दूसरे महाधिकार में कुल 214 दोहे हैं, परन्तु पाँच दोहे प्रक्षेप भी हैं, जिनको नहीं गिना है।

प्रश्न-2. ‘परमात्मप्रकाश’ के दूसरे महाधिकार का मुख्य विषय क्या है?
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ के दूसरे महाधिकार का मुख्य विषय मोक्ष, मोक्ष का फल और मोक्ष का मार्ग है। (देखिए दूहा- 1 से 2)

प्रश्न-3. ‘परमात्मप्रकाश’ के दूसरे महाधिकार के सर्व दोहों का विषय अति संक्षेप में लिखिये।

दोहा संख्या दोहों का विषय
1 हे स्वामी! मोक्ष, मोक्ष का फल और मोक्ष का मार्ग बताइये।
2 हे प्रभाकर! मैं इसका जिनप्रणीत उत्तर देता हूँ।
3 से 10 मोक्ष का स्वरूप ।
11 मोक्ष का फल ।
12 से 13 निश्चय मोक्षमार्ग ।
14 से 30 व्यवहार मोक्षमार्ग ।
31 से 38 अभेद रत्नत्रय ।
39 से 52 समभाव ।
53 से 66 पुण्य-पाप समान ।
67 से 71 शुद्धोपयोग ।
72 से 86 वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान।
87 से 94 परिग्रह-त्याग ।
95 से 107 सब जीव समान हैं।
107 से 214 चूलिका ।

प्रश्न-4. मोक्ष का क्या स्वरूप है?
उत्तर- आत्मा की उस पूर्ण स्वाधीन दशा का नाम ही मोक्ष है, जो उत्तम सुख से परिपूर्ण है।

अथवा

कर्मकलंक से विमुक्त ज्ञानियों को जो परमात्म-लाभ होता है उसे मोक्ष कहते हैं। (देखिए दूहा- 10)

प्रश्न-5. मोक्ष सर्वोत्तम है, इसका क्या प्रमाण है?
उत्तर- (क) यदि मोक्ष सर्वोत्तम न होता तो वह तीन लोक में सबसे ऊपर क्यों होता?
(ख) यदि मोक्ष सर्वोत्तम न होता तो बड़े-बड़े तीर्थंकर आदि धर्म, अर्थ, काम को छोड़कर मोक्ष में क्यों जाते? (देखिए दूहा- 3-4-6)

प्रश्न-6. मोक्ष में उत्तम सुख है, इसका क्या प्रमाण है?
उत्तर- (क) यदि मोक्ष में उत्तम सुख न होता तो बन्धनबद्ध पशु-पक्षी भी मोक्ष को क्यों चाहते हैं?
(ख) यदि मोक्ष में उत्तम सुख न होता तो सिद्ध जीव अनन्त काल तक वहीं क्यों रहते हैं? लौटकर संसार में क्यों नहीं आते? (देखिए दूहा-5 एवं 7)

प्रश्न-7. मोक्ष का फल क्या है?
उत्तर- अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख और अनन्त वीर्य का अनन्त काल तक निरन्तर लाभ होना ही मोक्ष का फल है। (देखिए दूहा- 11)

प्रश्न-8. मोक्ष का उपाय (कारण/हेतु/मार्ग) क्या है?
उत्तर- परमार्थ से आत्मा ही मोक्ष का उपाय (कारण/हेतु/मार्ग) है, क्योंकि वही देखता है, वही जानता है और वही अनुचरण करता है, परन्तु भेद-अपेक्षा से रत्नत्रय को भी मोक्ष का उपाय कहते हैं। (देखिए दूहा- 12 से 13)

प्रश्न-9. रत्नत्रय किसे कहते हैं?
उत्तर- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का सामूहिक नाम रत्नत्रय है।

प्रश्न-10. सम्यग्दर्शन किसे कहते हैं?
उत्तर- परमार्थ से निज शुद्धात्मा का श्रद्धान ही सम्यग्दर्शन है तथा व्यवहार से षड्द्रव्यों के यथार्थ श्रद्धान का नाम सम्यग्दर्शन है। (देखिए दूहा- 15)

प्रश्न-11. षड्द्रव्यों के नाम लिखिये और संक्षेप में उनका स्वरूप भी बताइये।
उत्तर- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये षड्द्रव्य हैं। जो जानता-देखता है वह जीव है। जिसमें स्पर्श-रस-गन्ध-वर्ण आदि पाये जायें वह पुद्गल है। जो जीव-पुद्गलों के गमन में निमित्त हो उसे धर्म द्रव्य कहते हैं। जो जीव और पुद्गलों की स्थिति में निमित्त हो उसे अधर्म द्रव्य कहते हैं। जो सर्वद्रव्यों को अवगाहन देता है उसे आकाश द्रव्य कहते हैं। जो सर्व द्रव्यों के परिणमन में निमित्त है उसे काल द्रव्य कहते हैं। (देखिए दूहा- 17 से 21)

प्रश्न-12. षड्द्रव्यों में से कितने द्रव्य चेतन हैं और कितने अचेतन?
उत्तर- षड्द्रव्यों में से एक जीव द्रव्य चेतन है और शेष पाँच अचेतन। (देखिए दूहा- 28)

प्रश्न-13. षड्द्रव्यों में से कितने द्रव्य मूर्त (रूपी) हैं और कितने अमूर्त?
उत्तर- षड्द्रव्यों में से एक पुद्गल द्रव्य ही मूर्त है और शेष पाँच अमूर्त हैं। (देखिए दूहा- 28)

प्रश्न-14. षड्द्रव्यों में से कितने द्रव्य सक्रिय (गमन क्रिया वाले) हैं और कितने निष्किय?
उत्तर- षड्द्रव्यों में से जीव और पुद्गल- ये दो द्रव्य सक्रिय हैं और शेष चार निष्क्रिय। (देखिए दूहा- 28)

प्रश्न-15. षड्द्रव्यों में से कितने द्रव्य अप्रदेशी (एकप्रदेशी) हैं और कितने बहुप्रदेशी?
उत्तर- षड्द्रव्यों में से एक कालद्रव्य अप्रदेशी है और शेष पाँच द्रव्य बहुप्रदेशी हैं। (देखिए दूहा-28)

प्रश्न-16. षड्द्रव्यों का एक साथ परिचय कराने वाली एक सारिणी (चार्ट) बनाइये।
उत्तर- देखिए दूहा संख्या 28 की टीका-

नाम स्वरूप संख्या प्रदेश मूर्तत्व चेतनत्व क्रिया अस्तिकायत्व परिणमन
जीव अमूर्तिक, ज्ञानानन्दमय अनन्त असंख्य अमूर्तिक चेतन सक्रिय अस्तिकाय है स्वभावविभाव
पुद्गल स्पर्श-रस-वर्णमय-गंध अनंता-नंत संख्य, असंख्य, अनन्त मूर्तिक अचेतन सक्रिय अस्तिकाय है स्वभावविभाव
धर्म गतिहेतु एक असंख्य अमूर्तिक अचेतन निष्क्रिय अस्तिकाय है मात्र स्वभावरूप
अधर्म स्थितिहेतु एक असंख्य अमूर्तिक अचेतन निष्क्रिय अस्तिकाय है मात्र स्वभावरूप
आकाश अवगाहनहेतु एक अनन्त अमूर्तिक अचेतन निष्क्रिय अस्तिकाय है मात्र स्वभावरूप
काल परिणमनहेतु असंख्य एक अमूर्तिक अचेतन निष्क्रिय अस्तिकाय नहीं है मात्र स्वभावरूप

प्रश्न-17. छह प्रकार के पुद्गलों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर- पुद्गल के छह भेद निम्नलिखित हैं-

  1. बादरबादर- जो टुकड़े होकर मिलते नहीं। जैसे- पत्थर, काष्ठ आदि।
  2. बादर- जो टूटकर फिर मिल जाते हैं। जैसे- जल, तेल, घी आदि।
  3. बादरसूक्ष्म- जो दिखाई तो दे, पर पकड़ने में न आये। जैसे- छाया, चाँदनी आदि।
  4. सूक्ष्मबादर- जो नेत्र से नहीं दिखाई देते, परन्तु अन्य इन्द्रियों से पकड़ में आते हैं। जैसे- रस, गन्ध आदि।
  5. सूक्ष्म- जो अनन्त मिली हुई हैं फिर भी दिखाई नहीं देती। जैसे- कर्मवर्गणा।
  6. सूक्ष्मसूक्ष्म- जिसका दूसरा भाग नहीं होता वह परमाणु सूक्ष्मसूक्ष्म है। (देखिए दूहा- 19)

प्रश्न-18. सम्यग्ज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर- निश्चय से निर्विकल्प आत्मज्ञान को ही सम्यग्ज्ञान कहते हैं और व्यवहार से संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय से रहित षड्द्रव्यों के ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते हैं। (देखिए दूहा- 29)

प्रश्न-19. संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय किसे कहते हैं?
उत्तर- परस्पर विरुद्ध अनेक कोटि को स्पर्श करनेवाले ज्ञान को संशय कहते हैं, जैसे- मैं आत्मा हूँ या शरीर। विपरीत एक कोटि का निर्णय विपर्यय है, जैसे- मैं शरीर ही हूँ। कुछ होगा- ऐसा अज्ञान भाव अनध्यवसाय है, जैसे- मैं कोई होऊँगा।

प्रश्न-20. सम्यक्चारित्र किसे कहते हैं?
उत्तर- सम्यग्दर्शन से स्व और पर की यथार्थ प्रतीति करके तथा सम्यग्ज्ञान से स्व और पर को यथार्थ जानकर जो परभाव का त्याग किया जाता है और निजभाव का ग्रहण किया जाता है वही सम्यक्चारित्र है। (देखिए दूहा- 30)

प्रश्न-21. क्या व्यवहारसम्यग्दर्शनादि अभव्य जीव के हो सकते हैं?
उत्तर- नहीं, व्यवहारसम्यग्दर्शनादि अभव्य जीव के नहीं हो सकते, क्योंकि व्यवहारसम्यग्दर्शनादि परम्परा से मुक्ति के कारण हैं और अभव्य जीव मुक्ति का पात्र नहीं है। (देखिए दूहा- 35)

प्रश्न-22. रत्नत्रय के सच्चे भक्त की क्या पहचान है?
उत्तर- (क) वह अपने गुण-निलय आत्मा को छोड़कर जगत् के किसी भी अन्य पदार्थ को ध्येय नहीं समझता।
(ख) बाह्य में शरीरादि के भेद को देखकर भी किसी जीव को छोटा-बड़ा नहीं समझता, सबको समान समझता है। (देखिए दूहा- 31 व 95)

प्रश्न-23. परमार्थ के ज्ञाता पुरुष किसी भी जीव को छोटा या बड़ा नहीं मानते। क्यों?
उत्तर- क्योंकि वे जानते हैं कि परमार्थ से सभी जीव परमब्रह्म स्वरूप हैं, कोई छोटा या बड़ा है ही नहीं।

प्रश्न-24. आत्मकल्याण हेतु हमें किन चार सोपानों पर चढ़ना चाहिए?
उत्तर- (क) परिग्रह का त्याग,
(ख) सुख-दुख सहन करने का अभ्यास,
(ग) तत्त्वातत्त्व का विवेक,
(घ) निर्विकल्प समभाव ।

प्रश्न-25. संवर-निर्जरा किसे होती है?
उत्तर- सर्व परिग्रह-रहित ज्ञानी मुनिराज जब सर्व विकल्पों से रहित होकर निर्विकल्प समभाव के द्वारा सुख-दुख को सहन करते हैं तब उन्हीं के श्रेष्ठ संवर-निर्जरा होती है। (देखिए दूहा- 36)

प्रश्न-26. ज्ञानी मुनिराज भी परमार्थ से कब तक संयमी हैं?
उत्तर- ज्ञानी मुनिराज भी परमार्थ से तभी तक संयमी हैं जब तक वे निर्विकल्प समभाव में स्थित रहते हैं। विकल्प-सहित अवस्था में आने पर तो कषाय के वशीभूत होने से असंयमी हैं। (देखिए दूहा- 41)

प्रश्न-27. धर्मात्मा जीवों का ध्येय (ध्यान करने योग्य/ध्यान का विषय) क्या होता है? स्पष्ट लिखिये।
उत्तर- धर्मात्मा जीवों को प्राथमिक अवस्था में चित्त को स्थिर करने के लिए और विषयकषाय रूप अशुभ ध्यान को रोकने के लिए अरिहंतादि पंचपरमेष्ठी ध्यान करने योग्य होते हैं। तथा बाद में चित्त स्थिर होने पर एक निज शुद्धात्म तत्त्व ही ध्यान करने योग्य होता है, अन्य कुछ नहीं। पंच परमेष्ठी का ध्यान साधक है और निज शुद्धात्मा का ध्यान साध्य है। (देखिए दूहा- 33 व 158)

प्रश्न-28. परिग्रह का त्याग कितने प्रकार से किया जा सकता है?
उत्तर- परिग्रह का त्याग दो प्रकार से किया जा सकता है- (क) श्रद्धा-अपेक्षा, (ख) चारित्र-अपेक्षा। जो जीव दोनों प्रकार से परिग्रह का त्याग कर सकें वे तो धन्य हैं ही, परन्तु जो अभी चारित्र-अपेक्षा परिग्रह का त्याग न कर सकें तो उन्हें श्रद्धा-अपेक्षा तो परिग्रह का त्याग अवश्य ही करना चाहिए।

प्रश्न-29. परिग्रह के तीन भेद हैं- सचित्त, अचित्त और मिश्र। इन्हें भली प्रकार समझाइए।
उत्तर- (क) गृहस्थ की अपेक्षा- स्त्री-पुत्रादि सचित्त परिग्रह हैं, वस्त्राभरणादि अचित्त परिग्रह हैं और वस्त्राभरण-सहित स्त्री आदि मिश्र परिग्रह हैं।
(ख) मुनि की अपेक्षा- शिष्यादि सचित्त परिग्रह हैं, पिच्छि-कमंडलु आदि अचित्त परिग्रह हैं और पिच्छी-कमंडलु-सहित शिष्यादि मिश्र परिग्रह हैं।
(ग) वीतराग आत्मध्यानी मुनिराज की अपेक्षा- सिद्धपरमेष्ठी का ध्यान सचित्त परिग्रह है, पुद्गलादि पाँच द्रव्यों का विचार अचित्त परिग्रह है और गुणस्थान-जीवसमासादि रूप संसारी जीव का विचार मिश्र परिग्रह है। (देखिए दूहा- 91)

प्रश्न-30. परिग्रह के चौबीस भेदों के नाम लिखो।
उत्तर- (क) 14 अंतरंग परिग्रह- मिथ्यात्व, क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, ग्लानि, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद ।
(ख) 10 बहिरंग परिग्रह- क्षेत्र, वास्तु, हिरण्य, सुवर्ण, धन, धान्य, दासी, दास, वस्त्र, बरतन। (देखिए दूहा- 166)

प्रश्न-31. टीकाकार ब्रह्मदेवसूरि ने किन जीवों को धन्य कहा है?
उत्तर- जो जीव भलीप्रकार स्व और पर का भेद जानकर सर्व मिथ्यात्व रागादि विकल्पों को छोड़ देते हैं और निज-शुद्धात्म-तत्त्व में ही लीन रहते हैं वे ही धन्य हैं। (देखिए दूहा- 43)

प्रश्न-32. ज्ञानी जीव परमार्थ से न किसी की निन्दा करते हैं और न स्तुति। क्यों?
उत्तर- क्योंकि वे जानते हैं कि सिद्धि का कारण एक समभाव ही है। (देखिए दूहा- 48)

प्रश्न-33. ज्ञानी मुनिराज परिग्रह से न राग करते हैं, न द्वेष। बताइये क्यों?
उत्तर- क्योंकि वे अपने आत्मस्वभाव को परिग्रह से अत्यन्त भिन्न जानते हैं। (देखिए दूहा- 49)

प्रश्न-34. ज्ञानी मुनिराज पंचेन्द्रिय विषयों से न राग करते हैं, न द्वेष । बताइये क्यों?
उत्तर- क्योंकि वे अपने आत्मस्वभाव को पंचेन्द्रिय विषयों से अत्यन्त भिन्न जानते हैं। (देखिए दूहा- 50)

प्रश्न-35. ज्ञानी मुनिराज शरीर से न राग करते हैं, न द्वेष । बताइये क्यों?
उत्तर- क्योंकि वे अपने आत्मस्वभाव को शरीर से अत्यन्त भिन्न जानते हैं। (देखिए दूहा- 51)

प्रश्न-36. यदि हम पुण्य-पाप को समान नहीं मानें तो क्या होगा?
उत्तर- यदि हम पुण्य-पाप को समान नहीं मानेंगे तो हमें मोह से अनन्त दुःख सहन करते हुए संसार में भटकना होगा। (देखिए दूहा- 55)

प्रश्न-37. धर्म किसे कहते हैं?
उत्तर- आत्मा के वे विशुद्ध भाव ही धर्म हैं जो जीव को चतुर्गति दुःख में गिरने से बचाते हैं। (देखिए दूहा- 68)

प्रश्न-38. वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान का क्या अभिप्राय है?
उत्तर- श्रेष्ठ सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र का ही अपर नाम वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान है। (देखिए दूहा- 72)

प्रश्न-39. वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान से रहित जीवों को मोक्ष की प्राप्ति किस प्रकार नहीं होती है?
उत्तर- वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान से रहित जीवों को मोक्ष की प्राप्ति उसीप्रकार नहीं होती, जिसप्रकार बहुत पानी बिलोने पर भी हाथ चिकना तक नहीं होता। (देखिए दूहा- 74)

प्रश्न-40. ऐसा कौन सा जीव है जो घोर तपश्चरण भी करता है और बहुत शास्त्रों को भी जानता है, फिर भी मूर्ख है और उसे मोक्ष के दर्शन तक नहीं होते?
उत्तर- जो वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान से रहित है अथवा परमसमाधि से रहित है। (देखिए दूहा- 83 व 191)

प्रश्न-41. जो मुनि निर्ग्रन्थ जिनलिंग धारण करके भी परिग्रह रखते हैं वे कैसे हैं?
उत्तर- वे ऐसे हैं जैसे कोई वमन करके पुनः उसको निगले । (देखिए दूहा- 91)

प्रश्न-42. ‘जो मुनीश्वर अम्बर में निवास करते हैं उनका मोह नाश को प्राप्त होता है और उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति होती है’ - यहाँ ‘अम्बर’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर- यद्यपि ‘अम्बर’ शब्द का सामान्य अर्थ आकाश होता है, परन्तु यहाँ आकाश नहीं है, अपितु समस्त विषय-कषाय रूप विकल्पजालों से रहित परमसमाधि ही है। नभ, आकाश, शून्य आदि शब्दों का अर्थ भी इस प्रसंग में निर्विकल्प परमसमाधि ग्रहण करना चाहिए। (देखिए दूहा- 163)

प्रश्न-43. चूलिका किसे कहते हैं? दूसरे महाधिकार की चूलिका में कितने दोहे हैं?
उत्तर- उक्त, अनुक्त और पुनरुक्त का कथन जिसमें किया जाये उसे चूलिका कहते हैं। दूसरे महाधिकार की चूलिका में 107 दोहे (क्रमांक 108 से 214) हैं।

प्रश्न-44. दूसरे महाधिकार की चूलिका में साधक जीव को कुछ विशेष निर्देश दिये गये हैं, उनको लिखिये।
उत्तर-
(क) जो समभाव से रहित है उन दुर्जनों की संगति कभी मत करो। (देखिए दूहा- 109-110)
(ख) परिवार, संघ, समाज, आहार आदि के मोह से अत्यन्त दूर रहो। (देखिए दूहा- 111 से 124)
(ग) अध्रुव, अशरण आदि भावनाओं का चिन्तन करते रहो। (देखिए दूहा- 130)
(घ) पंचेन्द्रिय रूपी ऊँटों को कभी खुला मत छोड़ो। (देखिए दूहा- 136)
(ङ) प्रतिकूलता आने पर भी अपना मनोबल मत गिराओ, ऊँचा ही रखो। (देखिए दूहा- 182 से 183)
(च) किसी के निष्ठुर वचनों को भी तत्त्वचिन्तन करके सहन करो, कभी क्रोध मत करो। (देखिए दूहा- 184)
(छ) अपने मन में किसी भी प्रकार की तनिक-सी भी शल्य मत रखो, अन्यथा वह अवश्य बहुत दुःख देगी। (देखिए दूहा- 187)
(ज) निर्विकल्प परमसमाधि को कभी एक क्षण भी मत भूलो। वही एक सार है। (देखिए दूहा- 191 से 192)

प्रश्न-45. पंचेन्द्रिय रूपी ऊँटों को खुला क्यों नहीं छोड़ें?
उत्तर- क्योंकि वे धर्म के मार्ग पर लगे हुए जीव को भी पुनः विषयरूपी वन में विचरण कराके घोर संसार-सागर में पटक देते हैं। (देखिए दूहा- 136)

प्रश्न-46. पंचेन्द्रियों को वश में करने का क्या उपाय है?
उत्तर- पंचेन्द्रियों का नायक एक मन है, अतः मन को वश में रखना ही पंचेन्द्रियों को वश में करने का उत्तम उपाय है। (देखिए दूहा- 140)

प्रश्न-47. मन को वश में करने का क्या उपाय है?
उत्तर- मन को वश में करने का श्रेष्ठ उपाय यही है कि उससे शांतिपूर्वक एकांत में सारी बात की जाए और उसे सम्पूर्ण वस्तुस्थिति का सही-सही ज्ञान कराया जाए। उसे द्रव्य-गुण-पर्याय, कर्म सिद्धान्त आदि का भी निष्पक्ष होकर सम्यग्ज्ञान कराना चाहिए। उसे भली प्रकार समझा देना चाहिए कि जिसे तुम अपना घर समझ रहे हो, वह वास्तव में तुम्हारा घर नहीं है, अपितु जेलखाना है। यह शरीर भी, तुम कितनी ही सेवा क्यों न करो, तुम्हारा नहीं होने वाला है। और जब यह शरीर ही तुम्हारा अपना नहीं हो सकता तो अन्य क्या हो सकता है? इत्यादि।

प्रश्न-48. ‘परमात्मप्रकाश’ के अध्ययन का फल क्या है?
उत्तर- जो जीव भाव-सहित परमात्मप्रकाश का स्वाध्याय करते हैं वे शीघ्र ही मोह को जीतकर परमार्थ के ज्ञाता हो जाते हैं और उनको लोकालोक को प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान प्राप्त हो जाता है। (देखिए- 204 से 205)

प्रश्न-49. ‘परमात्मप्रकाश’ का स्वाध्याय करने की योग्यता किसमें है?
उत्तर- ‘परमात्मप्रकाश’ का स्वाध्याय करने की योग्यता उसी में है-
(क) जो संसार के दुःखों से अत्यन्त भयभीत है।
(ख) जिसे मात्र मोक्ष की ही अभिलाषा है।
(ग) जिसके हृदय में परमात्मा की भक्ति भरी हुई है।
(घ) जो पंचेन्द्रिय-विषयों में रमता नहीं है।
(ङ) जिसमें विचक्षण ज्ञान है। और
(च) जो शुद्ध मन वाला है। (देखिए दूहा- 207 से 209)

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