प्रथम अधिकार: जीवसमास (भाग 1/2)
जीवसमास
छद्दव्व-णवपयत्थे दव्वाइहचउव्विहेण जाणंते ।
वंदित्ता अरहंते जीवस्स परूवणं वोच्छं ॥१॥
अर्थ: द्रव्यादि चार प्रकारसे छह द्रव्य और नौ पदार्थोंको जाननेवाले अरहन्तोंको नमस्कार करके जीवकी प्ररूपणा कहूँगा ॥१॥
जीव-प्ररूपणाके भेद
गुण जीवा पज्जत्ती पाणा सण्णा य मग्गणाओ य ।
उवओगो वि य कमसो वीसं तु परूवणा भणिया ॥२॥
अर्थ: गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, चौदह मार्गणाएं और उपयोग; इस प्रकार क्रमसे ये बीस प्ररूपणा कही गई हैं ॥२॥
गुणस्थानका स्वरूप और भेद
जेहिं दु लक्खिज्जंते उदयादिसु संभवेहिं भावेहिं ।
जीवा ते गुणसण्णा णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥३॥
मिच्छो सासण मिस्सो अविरदसम्मो य देसविरदो य ।
विरदो पमत्त इदरो अपुव्व अणियट्टि सुहुमो य ॥४॥
उवसंतखीणमोहो सजोगिकेवलिजिणो अजोगी य ।
चोद्दस गुणट्ठाणाणि य कमेण सिद्धा य णायव्वा ॥५॥
अर्थ (गाथा 3 से 5): उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि अवस्थाओंके होने पर उत्पन्न होनेवाले जिन भावोंसे जीव लक्षित किये जाते हैं, उन्हें सर्वदर्शियोंने ‘गुणस्थान’ इस संज्ञासे निर्देश किया है। १ मिथ्यात्व, २ सासादन, ३ मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व), ४ अविरतसम्यक्त्व, ५ देशविरत, ६ प्रमत्तविरत, ७ अप्रमत्तविरत, ८ अपूर्वकरणसंयत, ६ अनिवृत्तिकरणसंयत, १० सूक्ष्मसाम्परायसंयत, ११ उपशान्तमोह, १२ क्षीणमोह, १३ सयोगिकेवलिजिन और १४ अयोगिकेवली ये क्रमसे चौदह गुणस्थान होते हैं। तथा सिद्धोंको गुणस्थानातीत जानना चाहिए ॥३-५॥
१ मिथ्यात्वगुणस्थानका स्वरूप
'मिच्छत्तं वेदंतो जीवो त्तिवरीयदंसणो होइ ।
ण य धम्मं रोचेदि हु महुरं पि रसं जहा जरिदो ॥६॥
तं मिच्छत्तं *जमसदहणं †त्तचाणं होदि अत्थाणं ।
संसइद × मभिग्गहियं अणभिग्गहियं तु तं तिविहं ॥७॥
मिच्छादिट्ठी जीओ उवइट्ठे पवयणे ण सदहदि ।
सदहदि असब्भावं उवइट्ठं अणुवइट्ठं + च ॥८॥
अर्थ (गाथा 6 से 8): मिथ्यात्वकर्मको वेदन अर्थात् अनुभव करनेवाला जीव विपरीतश्रद्धानी होता है। उसे धर्म नहीं रुचता है, जैसे कि ज्वर-युक्त मनुष्यको मधुर (मीठा) रस भी नहीं रुचता है। जो सात तत्त्वों या नव पदार्थोंका अश्रद्धान होता है, उसे मिथ्यात्व कहते हैं। यह तीन प्रकारका है-संशयित, अभिगृहीत और अनभिगृहीत। मिथ्यादृष्टि जीव जिन-उपदिष्ट प्रवचनका श्रद्धान नहीं करता है। प्रत्युत अन्यसे उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असद्भाव अर्थात् पदार्थके अयथार्थ स्वरूपका श्रद्धान करता है ॥६-८॥
२ सासादनगुणस्थानका स्वरूप
२सम्मत्यरयणपव्वयसिहरादो > मिच्छभावसमभिमुहो ।
णासियसम्मत्तो सो सासणणामो मुणेयव्वो ॥९॥
अर्थ: सम्यक्त्वरूप रत्न-पर्वतके शिखरसे च्युत, मिथ्यात्वरूप भूमिके समभिमुख और सम्यक्त्वके नाशको प्राप्त जो जीव है, उसे सासादन नामवाला जानना चाहिए ॥९॥
३ सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थानका स्वरूप
३दहिगुडमिव वामिस्सं पिहुभावं + णेव कारिदुं सक्कं ।
एवं मिस्सयभावो सम्मामिच्छो त्ति णायव्वो ॥१०॥
अर्थ: जिस प्रकार व्यामिश्र अर्थात् अच्छी तरहसे मिला हुआ दही और गुड़ पृथक्-पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी प्रकारसे सम्यक्त्व और मिथ्यात्वके मिश्रित भावको सम्यग्मिथ्यात्व जानना चाहिए। यह सम्यक्त्व और मिथ्यात्वका सम्मिश्रण उन दोनोंके स्वतंत्र आस्वादसे एक भिन्न-जातीय रूपको धारण कर लेता है, अतएव उसकी अपेक्षासे मिश्रभावको एक स्वतन्त्र गुणस्थान माना गया है । ॥१०॥
४ अविरतसम्यक्त्वगुणस्थानका स्वरूप
‘णो इंदिएसु विरदो णो जीवे थावरे तसे चावि* ।
जो सद्दहइ जिणुत्तं सम्माइट्ठी अविरदो +सो’ ॥११॥
सम्माइट्ठी जीवो उवइट्ठं’ पवयणं तु सद्दहदि ।
सद्दहइ असब्भावं अजाणमाणो गुरुणिओगा³ ॥१२॥
अर्थ (गाथा 11 से 12): जो पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंसे विरत नहीं है और न त्रस तथा स्थावर जीवोंके घातसे ही विरत है, किन्तु केवल जिनोक्त तत्त्वका श्रद्धान करता है, वह चतुर्थ गुणस्थानवर्ती अविरत-सम्यग्दृष्टि है। सम्यग्दृष्टि जीव जिन-उपदिष्ट प्रवचनका तो श्रद्धान करता ही है, किन्तु कदाचित् (सद्भावको) नहीं जानता हुआ गुरुके नियोग (उपदेश या आदेश) से असद्भावका भी श्रद्धान कर लेता है ॥११-१२॥
५ देशविरतगुणस्थानका स्वरूप
'जो तसवहाउ विरदो णो विरओ अक्ख-थावरवहाओ× ।
पडिसमयं सो जीवो विरयाविरओ जिणेकमई³ ॥१३॥
अर्थ: जो जीव एक मात्र जिन भगवान्में ही मति (श्रद्धा) को रखता है, तथा त्रस जीवोंके घातसे विरत है और इन्द्रिय-विषयोंसे एवं स्थावर जीवोंके घातसे विरक्त नहीं है, वह जीव प्रति समय विरताविरत है। अर्थात् अपने गुणस्थानके कालके भीतर हर-क्षण विरत और अविरत इन दोनों संज्ञाओंको एक साथ एक समयमें धारण करता है ॥१३॥
६ प्रमत्तसंयतगुणस्थानका स्वरूप
४वत्तावत्तपमाए जो वसइ पमत्तसंजओ होइ ।
सयलगुणसीलकलिओ महव्वई चित्तलायरणो५ ॥१४॥
‘विकहा तहा कसाया इंदियणिद्दा तहेव पणओ य ।
चदु चदु पण एगेगं होंति पमादा हु पण्णरसा’ ॥१५॥
अर्थ (गाथा 14 से 15): जो पुरुष सकल मूलगुणोंसे और शील अर्थात् उत्तरगुणोंसेसहित है, अतएव महाव्रती है; तथा व्यक्त और अव्यक्त प्रमादमें रहता है, अतएव चित्रल-आचरणो है; वह प्रमत्त संयत कहलाता है। चार विकथा (स्त्रीकथा, भोजनकथा, देशकथा, अवनिपालकथा) चार कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) पाँच इन्द्रिय (स्पर्शन, रसना, नासिका, नयन, श्रवण) एक निद्रा और एक प्रणय (प्रेम या स्नेह-सम्बन्ध) ये पन्द्रह (४+४+५+१+१=१५) प्रमाद होते हैं ॥१४-१५॥
७ अप्रमत्तसंयतगुणस्थानका स्वरूप
'णट्ठासेसपमाओ वयगुणसीलोलिमंडिओ णाणी ।
अणुवसमओ × अखवओ झाणणिलीणो हु अप्पमत्तो सो ॥१६॥
अर्थ: जो व्यक्त और अव्यक्तरूप समस्त प्रकारके प्रमादसे रहित है, महाव्रत, मूलगुण और और उत्तरगुणोंकी मालासे मंडित है, स्व और परके ज्ञानसे युक्त है, और कषायोंका अनुपशमक या अक्षपक होते हुए भी ध्यानमें निरन्तर लीन रहता है, वह अप्रमत्तसंयत कहलाता है ॥१६॥
८ अपूर्वकरणसंयतगुणस्थानका स्वरूप
२भिण्णसमयट्ठिएहिं हु जीवेहि ण होइ सव्वहा सरिसो ।
करणेहिं एयसमयट्ठिएहिं सरिसो विसरिसो वा ॥१७॥
एयम्मि गुणट्ठाणे विसरिससमयट्ठिएहिं जीवेहिं ।
पुव्वमपत्ता जम्हा होंति अपुव्वा हु परिणामा ॥१८॥
तारिसपरिणामट्ठियजीवा हु जिणेहिं गलियतिमिरेहिं ।
मोहस्सऽपुव्वकरणा खवणुवसमणुज्जया भणिया ॥१९॥
अर्थ (गाथा 17 से 19): इस गुणस्थानमें, भिन्न समयवर्ती जीवोंमें करण अर्थात् परिणामोंकी अपेक्षा कभी भी सादृश्य नहीं पाया जाता । किन्तु एक समयवर्ती जीवोंमें सादृश्य और वैसादृश्य दोनों ही पाये जाते हैं । इस गुणस्थानमें यतः विभिन्न-समय-स्थित जीवोंके पूर्वमें अप्राप्त अपूर्व परिणाम होते हैं; अतः उन्हें अपूर्वकरण कहते हैं । इस प्रकारके अपूर्वकरण परिणामोंमें स्थित जीव मोहकर्मके क्षपण या उपशमन करनेमें उद्यत होते हैं, ऐसा गलित-तिमिर अर्थात् अज्ञानरूप अन्धकारसे रहित वीतरागी जिनोंने कहा है ॥१७-१९॥
६ अनिवृत्तिकरणसंयतगुणस्थानका स्वरूप
३एक्कम्मि कालसमए संठाणादीहि जह णिवट्टंति ।
ण *णिवट्टंति तह चिय परिणामेहिं मिहो जम्हा ॥२०॥
होंति अणियट्ठिणो ते पडिसमयं जेसिमेकपरिणामा ।
विमलयर् + झाणुहुवहसिहाहिं णिद्दड्ढकम्मवणा ॥२१॥
अर्थ (गाथा 20 से 21): इस गुणस्थानके अन्तर्मुहूर्त-प्रमित कालमें से विवक्षित किसी एक समयमें अवस्थित जीव यतः संस्थान ( शरीरका आकार ) आदिकी अपेक्षा जिस प्रकार निवृत्ति या भेदको प्राप्त होते हैं, उस प्रकार परिणामोंकी अपेक्षा परस्पर निवृत्तिको प्राप्त नहीं होते हैं, अतएव वे अनिवृत्तिकरण कहलाते हैं । अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवर्ती जीवोंके प्रति समय एक ही परिणाम होता है । ऐसे ये जीव अपने अति विमल ध्यानरूप अग्निकी शिखाओंसे कर्मरूप वनको सर्वथा जला डालते हैं ॥२०-२१॥
१० सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानका स्वरूप
'कोसुंभो जिह राओ अब्भंतरदो य सुहुमरत्तो य ।
एवं सुहुमसराओ सुहुमकसाओ त्ति णायव्वो ॥२२॥
पुव्वापुव्वप्फड्डयअणुभागाओ अणंतगुणहीणे + ।
लोहाणुम्मि य ठिओ हंदि सुहुमसंपराओ य२ ॥२३॥
अर्थ (गाथा 22 से 23): जिस प्रकार कुसुम्भी रंग भीतरसे सूक्ष्म रक्त अर्थात् अत्यन्त कम लालिमावाला होता है, उसी प्रकार सूक्ष्म राग-सहित जीवको सूक्ष्मकषाय या सूक्ष्मसाम्पराय जानना चाहिए। तथा संज्वलन लोभमें स्थित सूक्ष्मसाम्परायसंयत पूर्वस्पर्धक और अपूर्वस्पर्धकके अनुभाग से अनन्तगुणितहीन अनुभागवाला होता है ॥२२-२३॥
११ उपशान्तकषायगुणस्थानका स्वरूप
२सकयाहलं जलं वा सरए सरवाणियं व णिम्मलयं ।
सयलोवसंतमोहो उवसंतकसायओ होइ ॥२४॥
अर्थ: कतकफल (निर्मली) से सहित जल, अथवा शरद्-कालमें सरोवरका पानी जिस प्रकार निर्मल होता है, उसी प्रकार जिसका सम्पूर्ण मोहकर्म सर्वथा उपशान्त हो गया है, ऐसा उपशान्तकषायगुणस्थानवर्ती जीव अत्यन्त निर्मल परिणामवाला होता है ॥२४॥
१२ क्षीणकषायगुणस्थानका स्वरूप
३णिस्सेसखीणमोहो फलिहामलभायणुदयसमचित्तो ।
खीणकसाओ भण्णइ णिग्गंथो वीयराएहिं ॥२५॥
जह सुद्धफलिहभायणखित्तं *खीरं खु †णिम्मलं सुद्धं ।
तह ×णिम्मलपरिणामो खीणकसाओ मुणेयव्वो ॥२६॥
अर्थ (गाथा 25 से 26): मोहकर्मके निःशेष क्षीण हो जानेसे जिसका चित्त स्फटिकके विमल भाजनमें रक्खे हुए सलिलके समान स्वच्छ हो गया है, ऐसे निर्ग्रन्थ साधुको वीतरागियोंने क्षीणकषायसंयत कहा है। जिस प्रकार निर्मली, फिटकरी आदिसे स्वच्छ किया हुआ जल शुद्ध-स्वच्छ स्फटिकमणिके भाजनमें नितरा लेनेपर सर्वथा निर्मल एवं शुद्ध होता है, उसी प्रकार क्षीणकषायसंयतको भी निर्मल, स्वच्छ एवं शुद्ध परिणामवाला जानना चाहिये ॥२५-२६॥
१३ सयोगिकेवलिगुणस्थानका स्वरूप
केवलणाणदिवायरकिरणकलावप्पणासिअण्णाणो ।
णवकेवललद्धुग्गमपावियपरमप्पववएसो ॥२७॥
जं णत्थि राय-दोसो तेण ण बंधो हु अत्थि केवलिणो ।
जह सुक्ककुड्लग्गा बालुया सडइ तह कम्मं ॥२८॥
असहायणाण-दंसणसहिओ वि हु केवली हु जोएण ।
जुत्तो त्ति सजोगिजिनो अणाइणिहणारिसे वुत्तो ॥२९॥
अर्थ (गाथा 27 से 29): केवलज्ञानरूप दिवाकर (सूर्य) की किरणोंके समूहसे जिनकी अज्ञानान्धकार सर्वथा नष्ट हो गया है, जिन्होंने नौ केवल-लब्धियोंके उद्गमसे ‘परमात्मा’ संज्ञा प्राप्त की है और जो पर-सहायसे रहित केवलज्ञान-दर्शनसे सहित हैं, ऐसे योग-युक्त केवली भगवान्को अनादि-निधन आर्षमें सयोगिजिन कहा है। केवली भगवानके यतः राग-द्वेष नहीं होता, इस कारणसे उनके नवीन कर्मका बन्ध भी नहीं होता है। जिस प्रकार सूखी भित्तीपर आकरके लगी हुई बालुका तत्क्षण झड़ जाती है, इसी प्रकार योगके सद्भावसे आया हुआ कर्म भी कषायके न होनेसे तत्क्षण झड़ जाता है ॥२७-२९॥
१४ अयोगिकेवलिगुणस्थानका स्वरूप
सेलेसिं संपत्तो णिरुद्धणिस्सेसआसओ जीवो ।
कम्मरयविप्पमुक्को गयजोगो केवली होई ॥३०॥
अर्थ: जो जीव शैलेशी अवस्थाको प्राप्त हुए हैं, अर्थात् शैल (पर्वत) के समान स्थिर परिणाम-वाले हैं; अथवा जिन्होंने अठारह हजार भेदवाले शीलके स्वामित्वरूप शैलेशात्वको प्राप्त किया है, जिनका निःशेष आस्रव सर्वथा रुक गया है; जो कर्म-रजसे विप्रमुक्त हैं और योगसे रहित हो चुके हैं, ऐसे केवली भगवान्को अयोगिकेवली कहते हैं ॥३०॥
१५ गुणस्थानातीत सिद्धोंका स्वरूप
अट्ठविहकम्मवियडा सीधीभूदा णिरंजणा णिच्चा ।
अट्ठगुणा कयकिच्चा लोयग्गणिवासिणो सिद्धा ॥३१॥
अर्थ: जो अष्ट-विध कर्मोंसे रहित हैं, अत्यन्त शान्तिमय हैं, निरंजन हैं, नित्य हैं, क्षायिक सम्यक्त्व आदि आठ गुणोंसे युक्त हैं, कृतकृत्य हैं और लोकके अग्रभागपर निवास करते हैं, वे सिद्ध कहलाते हैं ॥३१॥
अब दूसरी जीवसमासप्ररूपणाका वर्णन करते हैं
जेहिं अणेया जीवा णिज्जंते बहुविहा वि तज्जादी ।
ते पुण संगहिदत्था जीवसमासेत्ति विण्णेया ॥३२॥
अर्थ: जिन धर्म-विशेषोंके द्वारा नाना जीव और उनकी नाना प्रकारकी जातियाँ जानी जाती हैं, पदार्थोंका संग्रह करनेवाले उन धर्मविशेषोंको जीवसमास जानना चाहिये ॥३२॥
जीवसमासोंके भेदोंका वर्णन
जीवट्ठाणवियप्पा चोद्दस इगिवीस तीस बत्तीसा ।
छत्तीस अढतीसा ऽडयाल चउवण्ण सत्तवण्णा ॥३३॥
अर्थ: जीवोंके स्थानोंको जीवसमास कहते हैं । जीवस्थानोंके भेद क्रमशः चौदह, इक्कीस, तीस, बत्तीस, छत्तीस, अड़तीस, अड़तालीस, चौवन और सत्तावन होते हैं ॥३३॥
चौदह भेदोंका निरूपण
बादरसुहुमेगिंदिय-वि-ति-चउरिंदिय-असण्णि-सण्णी य ।
पज्जत्तापज्जत्ता एवं ते चोद्दसा होंति ॥३४॥
अर्थ: बादर एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञिपंचेन्द्रिय और संज्ञिपंचेन्द्रिय, ये सातों ही पर्याप्तक और अपर्याप्तक रूप होते हैं । इस प्रकार जीवसमासके चौदह भेद होते हैं ॥३४॥ (देखो संदृष्टि सं० १)
इक्कीस भेदोंका निरूपण
चोद्दस पुव्वुट्ठिट्ठा अलब्धिपज्जत्तया य सत्तेव ।
इय एवं इगिवीसा णिद्दिट्ठा जिणवरिंदेहि ॥३५॥
अर्थ: पूर्वोद्दिष्ट चौदह भेद, तथा लब्ध्यपर्याप्तक-सम्बन्धी उपर्युक्त सातों ही भेद, इस प्रकार जीवसमासके ये इक्कीस भेद जिनवरेन्द्रोंने कहे हैं ॥३५॥ (देखो सं० सं० २)
तीस भेदोंका निरूपण
पंच वि थावरकाया बादर-सुहुमा पज्जत्त इयरा य ।
दस चेव तसेसु तहा एवं जाणे हु तीसा य ॥३६॥
अर्थ: पाँचों ही स्थावरकायिकजीव बादर-सूक्ष्म और पर्याप्तक-अपर्याप्तकके भेदसे बीस भेदरूप होते हैं । तथा त्रसजीवोंमें द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञिपंचेन्द्रिय और संज्ञिपंचेन्द्रिय इन पाँचोंके ही पर्याप्तक-अपर्याप्तकके भेदसे दश भेद होते हैं । इस प्रकार स्थावरोंके बीस, त्रसोंके दश ये दोनों मिलकर तीस भेद जानना चाहिये ॥३६॥ (देखो सं० सं० ३)
बत्तीस भेदोंका निरूपण
पुव्वुत्ता वि य तीसा जीवसमासा य होंति णवरं तु ।
सपइट्ठिय दो सहिया जीवसमासेहिं बत्तीसा ॥३७॥
अर्थ: पूर्वोक्त जो तीस जीवसमास हैं, उनमें केवल वनस्पतिकायिक-सम्बन्धी सप्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित ये दो भेद और मिला देनेपर बत्तीस जीवसमास हो जाते हैं ॥३७॥ (देखो सं० सं० ४)
छत्तीस भेदोंका वर्णन
चउ-इयरणिगोएहिं जुआ बत्तीसा य होइ छत्तीसा ।
बादर-सुहुमेहिं तहा पज्जत्ता इयरसंखेहि ॥३८॥
अर्थ: पूर्वोक्त बत्तीस भेदोंमें बादर चतुर्गतिनिगोद पर्याप्तक, बादर चतुर्गतिनिगोद-अपर्याप्तक, बादरनित्यनिगोद पर्याप्तक और बादर नित्यनिगोद-अपर्याप्तक ये सप्रतिष्ठितके चार भेद और मिलानेपर छत्तीस जीवसमास हो जाते हैं ॥३८॥ ( देखो सं० सं० ५ )
अड़तीस भेदोंका वर्णन
पुव्वुत्ता छत्तीसा अड्ढतीसा य सा होइ ।
अपइट्ठिएहिं सहिया दो जीवसमासएहिं च ॥३९॥
अर्थ: पूर्वोक्त छत्तीस भेदोंमें अप्रतिष्ठित वनस्पतिके पर्याप्तक और अपर्याप्तक ये दो जीवसमास और मिला देनेपर अड़तीस जीवसमास हो जाते हैं ॥३९॥ (देखो सं० सं० ६)
अड़तालीस भेदोंका वर्णन
सोलस जीवसमासा अलद्धिपज्जत्तगेसु जे भणिया ।
तेहिं जुआ बत्तीसा अडदालीसा य सा होइ ॥४०॥
अर्थ: लब्ध्यपर्याप्तकोंमें जो पहले सोलह जीवसमास कहे गये हैं, उनसे बत्तीस जीवसमास युक्त करनेपर अड़तालीस भेद हो जाते हैं ॥४०॥ ( देखो सं० सं० ७ )
चौपन भेदोंका वर्णन
अट्ठारसेहिं जुत्ता अलद्धिपज्जत्तएहिं छत्तीसा ।
जीवसमासेहिं तहा चउवण्णा जाण णियमेण ॥४१॥
अर्थ: लब्ध्यपर्याप्तकोंके अठारह जीवसमासोंके साथ पूर्वोक्त छत्तीस जीवसमास युक्त करने पर चौपन भेद हो जाते हैं, ऐसा नियमसे जानना चाहिए ॥४१॥ ( देखो सं० सं० ८ )
सत्तावन भेदोंका वर्णन
उणवीसेहि य जुत्ता अलद्धिपज्जत्तएहिं अडतीसा ।
जीवसमासेहिं तहा सयवण्णा सा य विण्णेया ॥४२॥
अर्थ: लब्ध्यपर्याप्तकोंके उन्नीस जीवसमासोंके साथ पूर्वोक्त अड़तीस जीवसमास युक्त करने पर सत्तावन जीवसमास हो जाते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥४२॥ (देखो सं० सं० ९)
पर्याप्तिप्ररूपणा
जह पुण्णापुण्णाई गिह-घड-वत्थाइयाई दव्वाईं ।
तह पुण्णापुण्णाओ पज्जत्तियरा मुणेयव्वा ॥४३॥
आहारसरीरिंदियपज्जत्ती आणपाणभासमणो ।
चत्तारि पंच छप्पि य इंदिय-वियल-सण्णीणं ॥४४॥
अर्थ (गाथा 43 से 44): जिस प्रकार गृह, घट, वस्त्रादिक अचेतन द्रव्य पूर्ण और अपूर्ण दोनों प्रकारके होते हैं, उसी प्रकार जीव भी पूर्ण और अपूर्ण दोनों प्रकारके होते हैं। पूर्ण जीवोंको पर्याप्त और अपूर्ण जीवोंको अपर्याप्त जानना चाहिए। आहार, शरीर, इन्द्रिय, आनपान (श्वासोच्छ्वास) भाषा और मन ये छह पर्याप्तियाँ होती हैं। इनमेंसे एकेन्द्रियोंके आदिकी चार, विकलेन्द्रियोंके आदिकी पांच और संज्ञी पंचेन्द्रियोंके छहों पर्याप्तियां होती हैं ॥४३-४४॥
प्राणप्ररूपणा
बाहिरपाणेहिं जहा तहेव अब्भंतरेहि पाणेहिं ।
जीवंति जेहिं जीवा पाणा ते होंति बोधव्वौ ॥४५॥
पंचेविंदियपाणा मण-वचि-काएण तिण्णि बलपाणा ।
आणप्पाणप्पाणा आउगपाणेण दस होंति ॥४६॥
अर्थ (गाथा 45 से 46): जिस प्रकार बाह्य प्राणोंके द्वारा जीव जीते हैं, उसी प्रकार जिन आभ्यन्तर प्राणोंके द्वारा जीव जीते हैं, वे प्राण कहलाते हैं, ऐसा जानना चाहिए। स्पर्शन, रसन, घ्राण, नयन और श्रवण ये पाँच इन्द्रियाँ, मनोबल, वचनबल और कायबल ये तीन बल, आयु और आनपान ये दश प्राण होते हैं ॥४५-४६॥
उस्सासो पज्जत्ते सव्वेसिं काय-इंदियाऊणि ।
वचि-पज्जत्ततसाणं चित्तबलं सण्णिपज्जत्ते ॥४७॥
दस सण्णीणं पाणा सेसेगूणंतिमस्स बे ऊणा ।
पज्जत्तेसु दरेसु अ सत्त दुए सेसमेगूणा ॥४८॥
पुण्णेसु सण्णि सव्वे मणरहिया होंति ते दु इतरम्मि ।
सोदक्खिघाणजिब्भारहिया सेसिगिंदिमाऊणा ॥४९॥
पंचक्ख-दुए पाणा मण वचि उस्सास ऊणिया सव्वे ।
कण्णक्खिगंधरसणारहिया सेसेसु ते अपुण्णेसु ॥५०॥
अर्थ (गाथा 47 से 50): कायबल, इन्द्रियाँ और आयु ये प्राण सभी पर्याप्त और अपर्याप्त जीवोंके होते हैं। श्वासोच्छ्वास पर्याप्त स्थावर और त्रसजीवोंके होता है। वचनबल पर्याप्त त्रसजीवोंके, तथा मनोबल संज्ञी पर्याप्त जीवोंके होता है। पर्याप्त संज्ञीपंचेन्द्रियोंके दश प्राण होते हैं। शेष पर्याप्त जीवोंके एक-एक प्राण कम होता है और एकेन्द्रियोंके दो प्राण कम होते हैं। अपर्याप्त संज्ञी और असंज्ञी पंचेन्द्रियोंके सात प्राण होते हैं, और शेष जीवोंके एक-एक प्राण कम होता जाता है। पर्याप्त संज्ञी पंचेन्द्रियोंके पाँचों इन्द्रियाँ, तीनों बल, आयु और आनपान ये दशों प्राण होते हैं। पर्याप्त असंज्ञी पंचेन्द्रियके मन-रहित शेष नौ प्राण होते हैं। पर्याप्त चतुरिन्द्रियके उक्त नौ प्राणोंमेंसे श्रोत्र-रहित शेष आठ प्राण होते हैं। पर्याप्त त्रीन्द्रियके उक्त आठ प्राणोंमेंसे चक्षु-रहित शेष सात प्राण होते हैं। पर्याप्त द्वीन्द्रियके उक्त सात प्राणोंमेंसे घ्राण-रहित शेष छह प्राण होते हैं। पर्याप्त एकेन्द्रियके उक्त छह प्राणोंमेंसे रसनाइन्द्रिय और वचनबल इन दो प्राणोंसे रहित शेष चार प्राण होते हैं। अपर्याप्त पंचेन्द्रिय-द्विकमें मनोबल, वचनबल और श्वासोच्छ्वास इन तीनसे कम शेष सात प्राण होते हैं। अपर्याप्त चतुरिन्द्रियके उक्त सातमें कर्णेन्द्रिय कम करनेपर शेष छह प्राण होते हैं। अपर्याप्त त्रीन्द्रियके उक्त छहमेंसे चक्षुरिन्द्रिय कम करने पर शेष पाँच प्राण होते हैं। अपर्याप्त द्वीन्द्रियके घ्राणेन्द्रिय कम करने पर शेष चार प्राण होते हैं। अपर्याप्त एकेन्द्रियके रसना-रहित शेष तीन प्राण होते हैं। इनको अंकसंदृष्टि मूलमें दी है ॥४७-५०॥
संज्ञाप्ररूपणा
‘इह जाहि बाहिया वि य जीवा पावंति दारुणं दुक्खं ।
सेवंता वि य उभए ताओ चत्तारि सण्णाओ’ ॥५१॥
अर्थ: जिनसे बाधित होकर जीव इस लोकमें दारुण दुःखको पाते हैं और जिनको सेवन करनेसे जीव दोनों ही भवोंमें दारुण दुःखको प्राप्त करते हैं, उन्हें संज्ञा कहते हैं और वे चार होती हैं-आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा और परिग्रहसंज्ञा ॥५१॥
आहारसंज्ञाका स्वरूप
‘आहारदंसणेण य तस्सुवओगेण ऊणकुट्ठेण ।
सादिदुदीरणाए होदि हु आहारसण्णा दु’ ॥५२॥
अर्थ: बहिरंगमें आहारके देखनेसे, उसके उपयोगसे और उदररूप कोठाके खाली होने पर तथा अन्तरंगमें असातावेदनीयकी उदीरणा होने पर आहारसंज्ञा उत्पन्न होती है ॥५२॥
भयसंज्ञाका स्वरूप
‘अह भीमदंसणेण य तस्सुवओगेण ऊणसत्तेण ।
भयकम्मुदीरणाए भयसण्णा जायदे चउहिं ॥५३॥
अर्थ: बहिरङ्गमें अति भयानक रूपके देखनेसे, उसका उपयोग करनेसे और शक्तिकी हीनता होने पर, तथा अन्तरंगमें भयकर्मकी उदीरणा होने पर, इस प्रकार इन चार कारणोंसे भयसंज्ञा उत्पन्न होती है ॥५३॥
पणिदरसभोयणेण य तस्सुवओगेण कुसीलसेवाए ।
वेदस्सुदीरणाए मेहुणसण्णा हवदि एत्थ ॥५४॥
अर्थ: बहिरंगमें गरिष्ठ, स्वादिष्ट और रसयुक्त भोजन करनेसे, पूर्व-भुक्त विषयोंके ध्यान करनेसे, कुशीलका सेवन करनेसे, तथा अन्तरंगमें वेदकर्मकी उदीरणा या तीव्र उदय होनेपर मैथुनसंज्ञा उत्पन्न होती है ॥५४॥
उवयरणदंसणेण य तस्सुवओगेण मुच्छियाए व ।
लोहस्सुदीरणाए परिग्गहं जायदे सण्णा ॥५५॥
अर्थ: बहिरंगमें भोगोपभोगके साधनभूत उपकरणोंके देखनेसे, उनका उपयोग करनेसे, उनमें मूर्च्छाभाव रखनेसे तथा अन्तरंगमें लोभकर्मकी उदीरणा होने पर परिग्रहसंज्ञा उत्पन्न होती है ॥५५॥
मार्गणाप्ररूपणा
जाहि य जासु व जीवा मग्गिज्जंते जहा तहा दिट्ठा ।
ताओ चोद्दस जाणे सुदणाणे मग्गणाओ त्ति ॥५६॥
गइ इंदियं च काए जोए वेए कसाय णाणे य ।
संजम दंसण लेस्सा भव्वा सम्मत्त सण्णि आहारे ॥५७॥
अर्थ (गाथा 56 से 57): जिन-प्रवचन-दृष्ट जीव जिन भावोंके द्वारा, अथवा जिन पर्यायोंमें अनुमार्गण किये जाते हैं, उन्हें मार्गणा कहते हैं। जीवोंका अन्वेषण करनेवाली ऐसी मार्गणाएँ श्रुतज्ञानमें चौदह कही गई हैं, ऐसा जानना चाहिए। वे चौदह मार्गणाएँ इस प्रकार हैं- १, गतिमार्गणा, २ इन्द्रियमार्गणा, ३ कायमार्गणा, ४ योगमार्गणा, ५ वेदमार्गणा, ६ कषायमार्गणा, ७ ज्ञानमार्गणा, ८ संयममार्गणा, ९ दर्शनमार्गणा, १० लेश्यामार्गणा, ११ भव्यमार्गणा, १२ सम्यक्त्वमार्गणा, १३ संज्ञिमार्गणा और १४ आहारमार्गणा ॥५६-५७॥
मणुया य अपज्जत्ता वेउव्वियमिस्सऽहारया दोण्णि ।
सुहुमो सासणमिस्सो उवसमसम्मो य संतग अट्ठ ॥५८॥
अर्थ: अपर्याप्त मनुष्य, वैक्रियिकमिश्रयोग, दोनों आहारक अर्थात् आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोग, सूक्ष्मसाम्परायचारित्र, सासादनसम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और उपशमसम्यक्त्व ये आठ सान्तर मार्गणा होती हैं ॥५८॥ इनमेंसे गतिमार्गणामें एक, योगमार्गणामें तीन, संयममार्गणामें सूक्ष्मसाम्परायचारित्र तथा सम्यक्त्वमार्गणामें अन्तिम तीन, इस प्रकार आठ सान्तर मार्गणाएँ जानना चाहिए ।
गइकम्मविणिव्वत्ता जा चेट्ठा सा गई मुणेयव्वा ।
जीवा हु चाउरंगं गच्छंति हु सा गई होई ॥५६॥
अर्थ: गतिनामा नामकर्मसे उत्पन्न होनेवाली जो चेष्टा या क्रिया होती है उसे गति जानना चाहिए। अथवा जिसके द्वारा जीव नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव इन चारों गतियोंमें गमन करते हैं, वह गति कहलाती है ॥५६॥
ण रमंति जदो णिच्चं दव्वे खेत्ते य काल भावे य ।
अण्णोण्णं पि य णिच्चं तम्हा ते णारया भणिया ॥६०॥
अर्थ: यतः तत्स्थानवर्ती द्रव्यमें, क्षेत्रमें, कालमें और भावमें जो जीव रमते नहीं हैं, तथा परस्परमें भी जो कभी भी प्रीतिको प्राप्त नहीं होते हैं, अतएव वे नारक या नारकी कहे जाते हैं ॥६०॥
तिरियंति कुडिलभावं विगयसुसण्णा णिकट्ठमण्णाणा ।
अच्चंतपावबहुला तम्हा ते तिरिक्खिया भणिया ॥६१॥
अर्थ: यतः जो सदा कुटिलभावका आचरण करते हैं, उत्कट संज्ञाओंके धारक हैं, निकृष्ट एवं अज्ञानी हैं, अत्यन्त पाप-बहुल हैं, अतः वे तिर्यञ्च कहे जाते हैं ॥६१॥
मणंति जदो णिच्चं मणेण णिउणा जदो दु जे जीवा ।
मणुउक्कडा य जम्हा तम्हा ते माणुसा भणिया ॥६२॥
अर्थ: यतः जो मनके द्वारा नित्य ही हेय-उपादेय, तत्त्व-अतत्त्व और धर्म-अधर्मका विचार करते हैं, कार्य करनेमें निपुण हैं, मनसे उत्कृष्ट हैं, अर्थात् उत्कृष्ट मनके धारक हैं, और युगके आदिमें मनुओंसे उत्पन्न हुए हैं, अतएव वे मनुष्य कहलाते हैं ॥६२॥
कीडंति जदो णिच्चं गुणेहिं अट्ठेहिं दिव्वभावेहिं ।
भासंतदिव्वकाया तम्हा ते वण्णिया देवा ॥६३॥
अर्थ: जो दिव्यभाव-युक्त अणिमादि आठ गुणोंसे नित्य क्रीड़ा करते रहते हैं और जिनका प्रकाशमान दिव्य शरीर है, वे देव कहे गये हैं ॥६३॥
जाइ-जरा-मरण-भया संजोय-विजोय-दुक्ख-सण्णाओ ।
रोगादिया य जिस्से ण होंति सा होइ सिद्धिगई ॥६४॥
अर्थ: जहाँ पर जन्म, जरा, मरण, भय, संयोग, वियोग, दुःख, संज्ञा और रोगादिक नहीं होते हैं, वह सिद्धगति कहलाती है ॥६४॥
अहमिंदा जह देवा अविसेसं अहमहं ति मण्णंता ।
ईसंति एकमेकं इंदा इव इंदियं जाणे ॥६५॥
अर्थ: जिस प्रकार अहमिन्द्रदेव बिना किसी विशेषताके ‘मैं इन्द्र हूँ, मैं इन्द्र हूँ’ इस प्रकार मानते हुए ऐश्वर्यका स्वतन्त्ररूपसे अनुभव करते हैं उसी प्रकार इन्द्रियोंको जानना चाहिए। अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय अपने-अपने विषयके सेवन करनेमें स्वतन्त्र है ॥६५॥
जवणालिया-मसूरी-चंदद्ध-अहुमुत्तफुलतुल्लाइं ।
इंदियसंठाणाई फासं पुण णेगसंठाणं ॥६६॥
अर्थ: श्रोत्रेन्द्रियका आकार यव-नालीके समान, चक्षुरिन्द्रियका मसूरके समान, रसनेन्द्रियका अर्ध-चन्द्रके समान और घ्राणेन्द्रियका अतिमुक्तक पुष्प अर्थात् कदम्बके फूलके समान है। किन्तु स्पर्शनेन्द्रिय अनेक आकारवाली है ॥६६॥
एइंदियस्स फुसणं एकं चिय होइ सेसजीवाणं ।
एयाहिया य तत्तो जिब्हाघाणक्खिसोत्ताईं ॥६७॥
अर्थ: एकेन्द्रिय जीवके एक स्पर्शन-इन्द्रिय ही होती है। शेष जीवोंके क्रमसे जिह्वा, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये एक-एक इन्द्रिय अधिक होती हैं ॥६७॥
पुट्ठं सुणेइ सद्दं अपुट्ठं पुण वि पस्सदे रूवं ।
फासं रसं च गंधं बद्धं पुट्ठं वियाणेइ ॥६८॥
अर्थ: श्रोत्रेन्द्रिय स्पृष्ट शब्दको सुनती है। चक्षुरिन्द्रिय अस्पृष्ट रूपको देखती है। स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय और घ्राणेन्द्रिय क्रमशः बद्ध और स्पृष्ट, स्पर्श, रस और गन्धको जानती हैं ॥६८॥
जाणइ पासइ भुंजइ सेवह फरसिंदिएण एक्केण ।
कुणइ य तस्सामित्तं थावर एइंदियो तेण ॥६९॥
अर्थ: स्थावरजीव एक स्पर्शनेन्द्रियके द्वारा ही अपने विषयको जानता है, देखता है, भोगता है, सेवन करता है और उसका स्वामित्व करता है इसलिए वह एकेन्द्रिय कहलाता है ॥६९॥
चुल्ला वराड संखा अक्खुण्ड अरिट्ठगा य गंडोला ।
कुक्खिकिमी सिप्पिआई णेया बेइंदिया जीवा ॥७०॥
अर्थ: चुल्लक अर्थात् छोटी कौड़ी, बड़ी कौड़ी, शंख, अक्ष, अरिष्टक, गंडोला, कुक्षि-कृमि अर्थात् पेटके कीड़े और सीप आदि द्वीन्द्रिय जीव जानना चाहिए ॥७०॥
कुंथु पिपीलय मंकुण विच्छिय जूंविंदगोव गोम्ही य ।
उत्तिंगमट्टियाई णेया तेइंदिया जीवा ॥७१॥
अर्थ: कुंथु (चींटी) पिपीलक (चींटा) मत्कुण (खटमल) बिच्छू, जूँ, इन्द्रगोप, (बीर-बहूटी) गोम्ही (कनखजूरा), उत्तिंग (अन्नकीट) और मृद्-मक्षी दीमक आदि त्रीन्द्रिय जीव जानना चाहिए ॥७१॥
दंसमसगो य मक्खिय गोमच्छिय भमर कीड मकडया ।
सलह पयंगाईया णेया चउरिंदिया जीवा ॥७२॥
अर्थ: दंश-मशक (डांस, मच्छर) मक्खी, मधुमक्खी, भ्रमर, कीट, मकड़ी, शलभ, पतंग आदि चतुरिन्द्रिय जीव जानना चाहिए ॥७२॥
अंडज पोदज जरजा रसजा संसेदिमा य सम्मुच्छा ।
उब्भिंदिमोववादिय णेया पंचेंदिया जीवा ॥७३॥
अर्थ: अंडज, पोतज, जरायुज, रसज, स्वेदज, सम्मूर्च्छिम, उद्भेदिम, और औपपादिक जीवोंको पंचेन्द्रिय जानना चाहिए ॥७३॥
ण य इंदियकरणजुआ अवगहाईहिं गाहया अत्थे ।
णेव य इंदियसुक्खा अणिंदियाणंतणाणसुहा ॥७४॥
अर्थ: जो इन्द्रियोंके व्यापारसे युक्त नहीं हैं, अवग्रहादिके द्वारा भी पदार्थोंके ग्राहक नहीं हैं और जिनके इन्द्रिय-सुख भी नहीं हैं, ऐसे अतीन्द्रिय अनन्त ज्ञान और सुखवाले जीवोंको इन्द्रियातीत सिद्ध जानना चाहिये ॥७४॥
अप्पप्पवुत्तिसंचियपुग्गलपिंडं वियाण काओ त्ति ।
सो जिणमयम्हि भणिओ पुढवीकायाइयो छह्ढा ॥७५॥
अर्थ: योगरूप आत्माकी प्रवृत्तिसे संचयको प्राप्त हुए औदारिकादिरूप पुद्गलपिंडको काय जानना चाहिये । वह काय जिनमतमें पृथिवीकाय आदिके भेदसे छह प्रकारका कहा गया है ॥७५॥
जह भारवहो पुरिसो वहइ भरं गिण्हिऊण काउडियं ।
एमेव वहइ जीवो कम्मभरं कायकाउडियं ॥७६॥
अर्थ: जिस प्रकार कोई भारको ढोनेवाला पुरुष कावडिकाको लेकर भारको वहन करता है, इसी प्रकार यह जीव कायरूपी कावडिकाको ग्रहण करके कर्मरूपी भारको वहन करता है ॥७६॥
पृथिवीकायिक जीवोंके भेद
पुढवी य सक्करा वालुया य उवले सिलाइ छत्तीस ।
पुढवीमया हु जीवा णिद्दिट्ठा जिणवरिंदेहिं ॥७७॥
अर्थ: पृथिवी, शर्करा, वालुका, उपल, शिला आदिके भेदसे छत्तीस प्रकारके पृथिवीमय अर्थात् पृथिवीकायिक जीव जिनवरेन्दोंने निर्दिष्ट किये हैं ॥७७॥
जलकायिक जीवोंके भेद
ओसा य हिमिय महिया हरदणु सुद्धोदयं घणुदयं च ।
एदे दु आउकाया जीवा जिणसासणे दिट्ठा ॥७८॥
अर्थ: ओस, हिमिका (बर्फ), महिका (कुहरा), हरदणु, (हरे तृण आदिके ऊपर अवस्थित जलबिन्दु) शुद्धोदक (चन्द्रकान्त, मणिसे उत्पन्न शुद्ध जल) घनोदक (स्थूल सघन जल) इत्यादि आकायिक (जलकायिक) जीव जिनशासनमें कहे गये हैं ॥७८॥
अग्निकायिक जीवोंके भेद
इंगाल जाल अच्ची मुम्मुर सुद्धागणी य अगणी य ।
अण्णेवि एवमाई तेउकाया समुद्दिठ्ठा ॥७९॥
अर्थ: अंगार, ज्वाला, अर्चि (अग्निकिरण), मुर्मुर (निर्धूम और ऊपर राखसे ढँकी हुई अग्नि) शुद्ध-अग्नि (बिजली और सूर्यकान्तमणिसे उत्पन्न अग्नि) और धूमवाली अग्नि इत्यादि अन्य अनेक प्रकारके तेजस्कायिक जीव कहे गये हैं ॥७६॥
वाउब्भामो उक्कलि मंडलि गुंजा महाघण तणू य ।
एदे दु वाउकाया जीवा जिणसासणे दिट्ठा ॥८०॥
अर्थ: सामान्य वायु, बद्धभ्राम (ऊर्ध्व भ्रमणशील) वायु, उत्कलिका (अधोभ्रमणशील और तिर्यक् बहनेवाली), मण्डलिका (गोलरूपसे बहनेवाली वायु), गुंजा (गुंजायमान वायु), महावात (वृक्षादिकको गिरा देनेवाली वायु), घनवात और तनुवात इत्यादिक अनेक प्रकारके वायुकायिक जीव जिनशासनमें कहे गये हैं ॥८०॥
मूलगपोरवीया कंदा तह खंध बीय बीयरुहा ।
सम्मुच्छिमा य भणिया पत्तेयाणंतकाया य ॥८१॥
अर्थ: मूलबीज, अग्रबीज, पर्वबीज, कन्दबीज, स्कन्धबीज, बीजरुह और सम्मूर्च्छिम, ये नाना प्रकारके प्रत्येक और अनन्तकाय (साधारण) वनस्पतिकायिक जीव कहे गये हैं ॥८१॥
साहारणमाहारो साहारण आणपाणगहणं च ।
साहारणजीवाणं साहारणलक्खणं भणियं ॥८२॥
अर्थ: साधारण अर्थात् अनन्तकायिक वनस्पति जीवोंका साधारण अर्थात् समान ही आहार होता है और साधारण ही श्वास-उच्छ्वासका ग्रहण होता है, इस प्रकार साधारण जीवोंका साधारण लक्षण कहा गया है ॥८२॥
जत्थेक मरइ जीवो तत्थ दु मरणं हवे अणंताणं ।
चक्कमइ जत्थ एको तत्थक्कमणं अणंताणं ॥८३॥
अर्थ: साधारण जीवोंमें जहाँ एक मरता है, वहाँ उसी समय अनन्त जीवोंका मरण होता है और जहाँ एक जन्म धारण करता है, वहाँ अनन्त जीवोंका जन्म होता है ॥८३॥
एयणिओयसरीरे जीवा दव्वप्पमाणदो दिट्ठा ।
सिद्धेहि अणंतगुणा सव्वेण विदीदकालेण ॥८४॥
अर्थ: एक निगोदिया जीवके शरीरमें द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा सिद्धोंसे और सर्वव्यतीत कालसे अनन्तगुणित जीव सर्वदर्शियोंके द्वारा देखे गये हैं ॥८४॥
अत्थि अणंता जीवा जेहिं ण पत्तो तसत्तपरिणामो ।
भावकलंकसुपउरा णिगोयवासं ण मुंचंति ॥८५॥
अर्थ: नित्य निगोदमें ऐसे अनन्तानन्त जीव हैं, जिन्होंने त्रस जीवोंकी पर्याय आजतक भी नहीं पाई है और जो प्रचुर कलंकित भावोंसे युक्त होनेके कारण निगोदवासको कभी भी नहीं छोड़ते ॥८५॥
विहिं तिहिं चउहिं पंचहिं सहिया जे इंदिएहिं लोयम्हि ।
ते तसकाया जीवा णेया वीरोवएसेणं ॥८६॥
अर्थ: लोकमें जो दो इन्द्रियोंसे, तीन इन्द्रियोंसे, चार इन्द्रियोंसे और पाँच इन्द्रियोंसे सहित जीव दिखाई देते हैं, उन्हें वीर भगवान्के उपदेशसे त्रसकायिक जीव जानना चाहिए ॥८६॥
जह कंचणमग्गिमयं मुच्चइ किट्टेण कलियाए य ।
तह कायबंधमुक्का अकाइया झाणजोएण ॥८७॥
अर्थ: जिस प्रकार अग्निमें दिया गया सुवर्ण किट्टिका ( बहिरंगमल ) और कालिमा ( अन्तरंगमल ) इन दोनों प्रकारके मलोंसे रहित हो जाता है, उसी प्रकार ध्यानके योगसे शुद्ध हुए और कायके बन्धनसे मुक्त हुए जीव अकायिक जानना चाहिए ॥८७॥
मणसा वाया काएण वा वि जुत्तस्स विरियपरिणामो ।
जीवस्स प्पणिओगो जोगो त्ति जिणेहिं णिद्दिष्ट्ठो ॥८८॥
अर्थ: मन, वचन और कायसे युक्त जीवका जो वीर्य-परिणाम अथवा प्रदेश-परिस्पन्द रूप प्रणियोग होता है, उसे योग कहते हैं, ऐसा जिनेन्द्र भगवान्ने कहा है ॥८८॥
सब्भावो सच्चमणो जो जोगो सो दु सच्चमणजोगो ।
तव्विवरीओ मोसो जाणुभयं सच्चमोस त्ति ॥८९॥
अर्थ: सद्भाव अर्थात् समीचीन पदार्थके विषय करनेवाले मनको सत्य मन कहते हैं और उसके द्वारा जो योग होता है, उसे सत्यमनोयोग कहते हैं। इससे विपरीत योगको मृषामनोयोग कहते हैं। सत्य और मृषारूप योगको सत्यमृषामनोयोग कहते हैं ॥८९॥
ण य सच्चमोसजुत्तो जो हु मणो सो असच्चमोसमणो ।
जो जोगो तेण हवे असच्चमोसो दु मणजोगो ॥९०॥
अर्थ: जो मन न तो सत्य हो और न मृषा हो, उसे असत्यमृषामन कहते हैं । उस असत्यमृषामनके द्वारा जो योग होता है, उसे असत्यमृषामनोयोग कहते हैं ॥६०॥
दसविहसच्चे वयणे जो जोगो सो दु सच्चवचिजोगो ।
तव्विवरीओ मोसो जाणुभयं सच्चमोस त्ति ॥९१॥
जो णेव सच्चमोसो तं जाण असच्चमोसवचिजोगो ।
अमणाणं जा भासा सण्णीणामंतणीयादी ॥९२॥
अर्थ: दश प्रकारके सत्य वचनमें वचनवर्गणाके निमित्तसे जो योग होता है उसे सत्यवचनयोग कहते हैं । इससे विपरीत योगको मृषावचनयोग कहते हैं । सत्य और मृषा वचनरूप योगको उभयवचनयोग कहते हैं । जो वचनयोग न तो सत्यरूप हो और न मृषारूप ही हो, उसे असत्यमृषावचनयोग कहते हैं । असंज्ञी जीवोंकी जो अनक्षररूप भाषा है और संज्ञी जीवोंकी जो आमंत्रणी आदि भाषाएँ हैं, उन्हें अनुभय भाषा जानना चाहिए ॥६१-६२॥
‘पुरु महमुदारुरालं एयट्ठ’ तं बियाण तम्हि भवं ।
ओरालयि त्ति वुत्तं ओरालयिकायजोगो सो ॥९३॥
अर्थ: पुरु, महत्, उदार और उराल ये सब शब्द एकार्थ-वाचक हैं। उदार या स्थूलमें जो उत्पन्न हो, उसे औदारिक जानना चाहिए। (यहाँ पर भव-अर्थमें ठण् प्रत्यय हुआ है।) उदारमें होने वाला जो काययोग है, वह औदारिककाययोग कहलाता है। अर्थात् मनुष्य और तिर्यंचोंके स्थूल शरीरमें जो योग होता है, उसे औदारिककाययोग कहते हैं ॥६३॥
अंतोमुहुत्तमब्भं वियाण मिस्सं च अपरिपुण्णो त्ति ।
जो तेण संपओगो ओरालियमिस्सकायजोगो सो ॥९४॥
अर्थ: औदारिकशरीरकी उत्पत्ति प्रारम्भ होनेके प्रथम समयसे लगाकर अन्तर्मुहूर्त तक मध्यवर्ती कालमें जो अपरिपूर्ण शरीर है, उसे औदारिकमिश्र जानना चाहिए। उसके द्वारा होनेवाला जो संप्रयोग है, वह औदारिकमिश्र काययोग कहलाता है। अर्थात् शरीरपर्याप्ति पूर्ण होनेसे पूर्व कार्मणशरीरकी सहायतासे उत्पन्न होनेवाले औदारिककाययोगको औदारिकमिश्रकाययोग कहते हैं ॥६४॥
विविहगुणइड्ढिजुत्तं वेउव्वियमहव विकिरियं चेव ।
तिस्से भवं च गेयं वेउव्वियकायजोगो सो ॥९५॥
अर्थ: विविध गुण और ऋद्धियोंसे युक्त, अथवा विशिष्ट क्रियावाले शरीरको वैक्रियिक कहते हैं। उसमें उत्पन्न होनेवाला जो योग है, उसे वैक्रियिककाययोग जानना चाहिए ॥६५॥
अंतोमुहुत्तमज्झं वियाण मिस्सं च अपरिपुण्णो त्ति ।
जो तेण संपओगो वेउव्वियमिस्सकायजोगो सो ॥९६॥
अर्थ: वैक्रियिकशरीरकी उत्पत्ति प्रारम्भ होनेके प्रथम समयसे लगाकर शरीरपर्याप्ति पूर्ण होने तक अन्तर्मुहूर्तके मध्यवर्ती अपरिपूर्ण शरीरको वैक्रियिकमिश्रकाय कहते हैं। उसके द्वारा होनेवाला संप्रयोग वैक्रियिकमिश्रकाययोग कहलाता है। अर्थात् देव-नारकियोंके उत्पन्न होनेके प्रथम समयसे लेकर शरीरपर्याप्ति पूर्ण होने तक कार्मणशरीरकी सहायतासे उत्पन्न होनेवाले वैक्रियिककाययोगको वैक्रियिकमिश्रकाययोग कहते हैं ॥६६॥
आहरइ अणेण मुणी सुहुमे अठ्ठे सयस्स संदेहे ।
गत्ता केवलिपासं तम्हा आहारकायजोगो सो ॥९७॥
अर्थ: स्वयं सूक्ष्म अर्थमें सन्देह उत्पन्न होनेपर मुनि जिसके द्वारा केवलि-भगवान्के पास जाकर अपने सन्देहको दूर करता है, उसे आहारक काय कहते हैं। उसके द्वारा उत्पन्न होनेवाले योगको आहारककाययोग कहते हैं ॥६७॥
अंतोमुहुत्तमज्झं वियाण मिस्सं च अपरिपुण्णो त्ति ।
जो तेण संपओगो आहारयमिस्सकायजोगो सो ॥९८॥
अर्थ: आहारकशरीरकी उत्पत्ति प्रारम्भ होनेके प्रथम समयसे लगाकर शरीरपर्याप्ति पूर्ण होने तक अन्तर्मुहूर्तके मध्यवर्ती अपरिपूर्ण शरीरको आहारकमिश्रकाय कहते हैं। उसके द्वारा जो योग उत्पन्न होता है वह आहारकमिश्रकाययोग कहलाता है ॥६८॥
कम्मेय य कम्मइयं कम्मभवं तेण जो दु संजोगो ।
कम्मइयकायजोगो एय-विय-तियगेसु समएसु ॥९९॥
अर्थ: कर्मोंके समूहको, अथवा कार्मणशरीर नामकर्मके उदयसे उत्पन्न होनेवाले कायको कार्मण-काय कहते हैं और उसके द्वारा होनेवाले योगको कार्मणकाययोग कहते हैं। यह योग विग्रहगतिमें अथवा केवलिसमुद्घातमें एक, दो अथवा तीन समय तक होता है ॥६९॥
जेसिं ण संति जोगा सुहासुहा पुण्णपापसंजणया ।
ते होंति अजोगिज्जिणा अणोवमाणंतगुणकलिया ॥१००॥
अर्थ: जिनके पुण्य और पापके संजनक अर्थात् उत्पन्न करनेवाले शुभ और अशुभ योग नहीं होते हैं, वे अयोगिजिन कहलाते हैं, जो कि अनुपम और अनन्त गुणोंसे सहित होते हैं ॥१००॥
वेदस्सुदीरणाए बालत्तं पुण णियच्छदे बहुसो ।
इत्थी पुरिस णउंसय वेयंति तदो हवदि वेदो ॥१०१॥
अर्थ: वेदकर्मकी उदीरणा होनेपर यह जीव नाना प्रकारके बालभाव अर्थात् चांचल्यको प्राप्त होता है और स्त्रीभाव, पुरुषभाव एवं नपुंसक भावका वेदन करता है, अतएव वेदकर्मके उदयसे होनेवाले भावको वेद कहते हैं ॥१०१॥
तिव्वेद एव सव्वे वि जीवा दिट्ठा हु दव्व-भावदो ।
ते चेव हु विवरीया संभवंति जहाकमं सव्वे ॥१०२॥
अर्थ: द्रव्य और भावकी अपेक्षा सर्व ही जीव तीनों वेदवाले दिखाई देते हैं और इसी कारण वे सर्व ही यथाक्रमसे विपरीत वेदवाले भी सम्भव हैं ॥१०२॥
उदयादु णोकसायाण भाववेदो य होइ जंतूणं ।
जोणी य लिंगमाई णामोदय दव्ववेदो दु ॥१०३॥
अर्थ: नोकषायोंके उदयसे जीवोंके भाववेद होता है तथा योनि, लिंग आदि द्रव्यवेद नामकर्मके उदयसे होता है ॥१०३॥
इत्थी पुरिस णउंसय वेया खलु दव्व-भावदो होंति ।
ते चेव य विवरीया हवंति सव्वे जहाकमसो ॥१०४॥
अर्थ: स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद ये तीनों ही वेद निश्चयसे द्रव्य और भावकी अपेक्षा दो प्रकारके होते हैं और वे सर्व ही विभिन्न नोकषायोंके उदय होनेपर यथाक्रमसे विपरीत भी परिणत होते हैं ॥१०४॥
'छादयदि सयं दोसेण जदो छादयदि परं पि दोसेण ।
णियमेण सहावं तम्हा सा *वण्णिया इत्थी ॥१०५॥
अर्थ: जो मिथ्यात्व आदि दोषसे अपने आपको आच्छादित करे और मधुर-भाषणादिके द्वारा दूसरेको भी आच्छादित करे, वह निश्चयसे यतः आच्छादन स्वभाववाली है अतः ‘स्त्री’ इस नामसे वर्णित की गई है ॥१०५॥
२पुरु गुण भोगे सेदे करेदि लोयम्हि पुरुगुणं कम्मं ।
पुरु + उत्तमो य जम्हा तम्हा सो वण्णिओ पुरिसो२ ॥१०६॥
अर्थ: जो उत्तम गुण और उत्कृष्ट भोगमें शयन करता है, लोकमें उत्तम गुण और कर्मको करता है, अथवा यतः जो स्वयं उत्तम है, अतः वह ‘पुरुष’ इस नामसे वर्णित किया गया है ॥१०६॥ जो क्रोधादिक जीवके सुख-दुःखरूप बहुत प्रकारके धान्यको उत्पन्न करनेवाले कर्मरूप खेत को कर्षित करते हैं, अर्थात् जोतते हैं और जिनके लिए संसारकी चारों गतियाँ मर्यादा या मेंढ़-रूप हैं, इसलिए उन्हें कषाय कहते हैं ॥१०६॥
३णेवित्थी ण य पुरिसो णउंसओ उभयलिंगवदिरित्तो ।
इट्ठावग्गिसमाणो वेदणगरुओ कलुसचित्तो३ ॥१०७॥
अर्थ: जो भावसे न स्त्रीरूप है और न पुरुषरूप है, तथा द्रव्यकी अपेक्षा जो स्त्रीलिंग और पुरुषलिंगसे रहित है, ईंटोंको पकानेवाली अग्निके समान वेदकी प्रबल वेदनासे युक्त है, और सदा कलुषित-चित्त है, उसे नपुंसकवेद जानना चाहिए ॥१०७॥
४करिसतणेट्ठा१वग्गीसरिसपरिणामवेदणुम्मुक्का ।
अवगयवेदा जीवा सयसंभव×णंतवरसोक्खा४ ॥१०८॥
अर्थ: जो करीष अर्थात् कंडेकी अग्नि, तृणकी अग्नि और इष्टपाककी अग्निके समान क्रमशः स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेदरूप परिणामोंके वेदनसे उन्मुक्त हैं और अपनी आत्मामें उत्पन्न हुए श्रेष्ठ अनन्त सुखके धारक या भोक्ता हैं, वे जीव अपगतवेदी कहलाते हैं ॥१०८॥
५सुह-दुक्खं बहुसस्सं कम्मक्खित्तं कसेइ जीवस्स ।
संसारगदी +मेरं तेण कसाओ त्ति णं विंति५ ॥१०९॥
'सम्मत्त-देससंजम-संसुद्धीघाइकसई पढमाईं ।
तेसिं तु भवे नासे सद्धाई चउण्हं +उप्पत्ती ॥११०॥
अर्थ: प्रथमादि अर्थात् अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन कषाय क्रमशः सम्यक्त्व, देशसंयम, संकलसंयम और पूर्ण शुद्धिरूप यथाख्यातचारित्रका घात करते हैं। किन्तु उनके नाश होनेपर आत्मामें श्रद्धा अर्थात् सम्यक्त्व आदिक चारों गुणोंकी उत्पत्ति होती है ॥११०॥
²सिलमेय पुढविभेया धूलीराई य उदयराइसमा ।
‡णिर-तिरि-णर-देवत्तं उविंति जीवा हु कोहवसा ॥१११॥
अर्थ: अनन्तानुबन्धी क्रोध शिलाभेदके समान है, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध पृथ्वीभेदके समान है, प्रत्याख्यानावरण क्रोध धूलिराजिके समान है और संज्वलनक्रोध उदक अर्थात् जलराजिके समान है। इन चारों जातिके क्रोधके वशसे जीव क्रमशः नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगतिको प्राप्त होते हैं ॥१११॥
³सेलसमो अट्ठिसमो दारुसमो तह य जाण वेत्तसमो ।
× णिर-तिरि-णर-देवत्तं उविंति जीवा हु माणवसा ॥११२॥
अर्थ: अनन्तानुबन्धी मान शैल-समान है, अप्रत्याख्यानावरण मान अस्थि-समान है, प्रत्याख्यानावरण मान दारु अर्थात् काष्ठके समान है और संज्वलन मान वेत्र (बेंत) के समान है। इन चारों जातिके मानके वशसे जीव क्रमशः नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥११२॥
⁴बंसीमूलं मेसस्स सिंग गोमुत्तियं च खोरुप्पं ।
+णिर-तिरि-णर-देवत्तं उविंति जीवा हु मायवसा ॥११३॥
अर्थ: अनन्तानुबन्धी माया बाँसकी जड़के समान है, अप्रत्याख्यानावरण माया मेढ़ाके सींगके समान है, प्रत्याख्यानावरण माया गोमूत्रके समान है और संज्वलन माया खुरपाके समान है। इन चारों ही जातिके मायाके वशसे जीव क्रमशः नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य और देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥११३॥
⁵किमिराय चकमल कद्दमो य तह चेय÷ जाण हारिद्दं ।
※णिर-तिरि-णर-देवत्तं उविंति जीवा हु लोहवसा ॥११४॥
अर्थ: अनन्तानुबन्धीलोभ किरमिजी रंगके समान है, अप्रत्याख्यानावरणलोभ चक्र अर्थात् गाड़ीके पहियेके मलके समान है, प्रत्याख्यानावरणलोभ कर्दम अर्थात् कीचड़के समान है और संज्वलन लोभको हल्दीके रंगके समान जानना चाहिए । इन चारों ही जातिके लोभके वशसे जीव क्रमशः नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य और देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥११४॥
पढमो दंसणघाई विदिओ तह घाइ देसविरइं त्ति ।
तइओ संजमघाई चउत्थो जहक्खायघाइया ॥११५॥
अर्थ: प्रथम अनन्तानुबन्धी कषाय सम्यग्दर्शनका घात करती है, द्वितीय अप्रत्याख्यानावरण कषाय देशविरतिकी घातक है । तृतीय प्रत्याख्यानावरण कषाय सकलसंयमकी घातक है और चतुर्थ संज्वलन कषाय यथाख्यातचारित्रकी घातक है ॥११५॥
अप्पपरोभयवाहणबंधासंजमणिमित्तकोहाई ।
जेसिं णत्थि कसाया अमला अकसाइणो जीवा ॥११६॥
अर्थ: जिनके अपने आपको, परको और उभयको बाधा देने, बन्ध करने और असंयमके आचरणमें निमित्तभूत क्रोधादि कषाय नहीं हैं, तथा जो बाह्य और आभ्यन्तर मलसे रहित हैं, ऐसे जीवोंको अकषाय जानना चाहिए ॥११६॥
जाणइ त्तिकालसहिए दव्व-गुण-पज्जए बहुब्भेए ।
पच्चक्खं च परोक्खं अणेण णाणं त्ति णं विंति ॥११७॥
अर्थ: जिसके द्वारा जीव त्रिकाल-विषयक सर्व द्रव्य, उनके समस्त गुण और उनकी बहुत भेदवाली पर्यायोंको प्रत्यक्ष और परोक्ष रूपसे जानता है, उसे निश्चयसे ज्ञानी जन ज्ञान कहते हैं ॥११७॥
विस-जंत-कूड-पंजर-बंधादिसु अणुवदेसकरणेण ।
जा खलु पवत्तइ मई मइअण्णाणं त्ति णं विंति ॥११८॥
अर्थ: परोपदेशके बिना जो विष, यन्त्र, कूट, पंजर तथा बन्ध आदिके विषयमें बुद्धि प्रवृत्त होती है, उसे ज्ञानी जन मत्यज्ञान कहते हैं ॥११८॥
श्रुताज्ञानका स्वरूप
‘आभीयमासुरक्खा भारह-रामायणादि-उवएसा ।
तुच्छा असाहणीया सुयअण्णाणं त्ति णं* विंति’ ॥११९॥
अर्थ: चौरशास्त्र, हिंसाशास्त्र तथा महाभारत, रामायण आदिके तुच्छ और परमार्थ-शून्य होनेसे साधन करनेके अयोग्य उपदेशोंको ऋषिगण श्रुताज्ञान कहते हैं ॥११९॥
कुअवधि या विभंगज्ञानका स्वरूप
२विवरीयओहिणाणं खओवसमियं च कम्मबीजं च ।
वेभंगो त्ति य वुच्चइ समत्तणाणीहिं समयम्हि३ ॥१२०॥
अर्थ: जो क्षायोपशमिक अवधिज्ञान मिथ्यात्वसे संयुक्त होनेके कारण विपरीत स्वरूप है, और नवीन कर्मका बीज है, उसे समाप्त अर्थात् जिनका ज्ञान सम्पूर्णताको प्राप्त है ऐसे ज्ञानियोंके द्वारा उपदिष्ट आगममें कुअवधि या विभंगज्ञान कहा है ॥१२०॥
आभिनिबोधिक या मतिज्ञानका स्वरूप
३अहिमुहणियमियबोहणमाभिणिबोहियमणिंदि-इंदियजं ।
वहुउग्गहाइणा खलु कयछत्तीसा तिसयभेयं४ ॥१२१॥
अर्थ: अनिन्द्रिय अर्थात् मन और इन्द्रियोंकी सहायतासे उत्पन्न होनेवाले, अभिमुख और नियमित पदार्थके बोधको आभिनिबोधिक ज्ञान कहते हैं । उसके बहु आदिक बारह प्रकारके पदार्थोंकी और अवग्रह आदिकी अपेक्षा तीन सौ छत्तीस भेद होते हैं ॥१२१॥
श्रुतज्ञानका स्वरूप
४अत्थाओ अत्थंतरउवलंभे तं भणंति सुयणाणं ।
आहिणियोहियपुव्वं णियमेण य सद्दयं मूलं५ ॥१२२॥
अर्थ: मतिज्ञानसे जाने हुए पदार्थके अवलम्बनसे तत्सम्बन्धी दूसरे पदार्थका जो उपलब्ध अर्थात् ज्ञान होता है, उसे श्रुतज्ञान कहते हैं । यह ज्ञान नियमसे आभिनिबोधिकज्ञान-पूर्वक होता है । ( इसके अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक अथवा शब्दजन्य और लिंगजन्य, इस प्रकार दो भेद हैं) । उनमें अक्षरात्मक श्रुतज्ञानका मूल कारण शब्द-समूह है ॥१२२॥
अवधिज्ञानका स्वरूप
५अवहीयदि चि ओही सीमाणाणेत्ति वण्णियं समए ।
भव-गुणपच्चयविहियं तमोहिणाण त्ति †णं विंति’ ॥१२३॥
अर्थ: जो द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा अवधि अर्थात् सीमासे युक्त अपने विषयभूत पदार्थको जाने, उसे अवधिज्ञान कहते हैं, सीमासे युक्त जाननेके कारण परमागममें इसे सीमाज्ञान कहा है। यह भवप्रत्यय और गुणप्रत्ययके द्वारा उत्पन्न होता है, ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं ॥१२३॥
अवधिज्ञानके भेदोंका वर्णन
'अणुगो अणाणुगामी × तेत्तियमेत्तो य अप्पबहुगोऽयं ।
वड्ढंतहीयमाणो ओही जाणेहि छव्विहो ॥१२४॥
अर्थ: अनुगामी, अननुगामी, तावन्मात्र अर्थात् अवस्थित, अल्प-बहुत अर्थात् अनवस्थित, क्रमसे बढ़नेवाला अर्थात् वर्द्धमान और क्रमसे हीन होनेवाला अर्थात् हीयमान, इस प्रकार अवधिज्ञान छह भेदरूप जानना चाहिए ॥१२४॥
मनःपर्ययज्ञानका स्वरूप
२चिंतियमचिंतियं* वा अद्धं‡ चिंतिय अणेयभेयगयं ।
मणपज्जय त्ति णाणं जं जाणइ तं तु णरलोए३ ॥१२५॥
अर्थ: जो चिन्तित अर्थात् भूतकालमें विचारित, अचिन्तित अर्थात् अतीतमें अविचारित किन्तु भविष्यमें विचार्यमाण, और अर्धचिन्तित इत्यादि अनेक भेदरूप दूसरेके मनमें अवस्थित पदार्थको नरलोक अर्थात् पैंतालीस लाख योजनरूप मनुष्यक्षेत्रमें जानता है, वह मनःपर्ययज्ञान कहलाता है ॥१२५॥
केवलज्ञानका स्वरूप
३संपुण्णं तु समग्रं केवलमसपत्त१ सव्वभावगयं ।
लोयालोयवितिमिरं केवलणाणं मुणेयव्वं२ ॥१२६॥
अर्थ: जो जीवद्रव्यके शक्तिगत ज्ञानके सर्व अविभागप्रतिच्छेदोंके व्यक्त हो जानेसे सम्पूर्ण है, ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कर्मके सर्वथा क्षय हो जानेसे अप्रतिहतशक्ति है, अतएव समग्र है, जो केवल अर्थात् इन्द्रिय और मनकी सहायतासे रहित है, असपत्न अर्थात् प्रतिपक्षसे रहित है, युगपत् सर्व भावोंको जाननेवाला है, लोक और अलोकमें अज्ञानरूप तिमिर (अन्धकार) से रहित है, अर्थात् सर्व-व्यापक और सर्व-ज्ञायक है, उसे केवलज्ञान जानना चाहिए ॥१२६॥
संयममार्गणा, द्रव्यसंयमका स्वरूप
४वय-समिदि-कसायाणं दंडाणं इंदियाण पंचण्हं ।
धारण-पालण-णिग्गह-चाय-जओ संजमो भणिओ३ ॥१२७॥
अर्थ: अहिंसादि पाँच महाव्रतोंका धारण करना, ईर्यादि पाँच समितियोंका पालन करना, क्रोधादि चारों कषायोंका निग्रह करना, मन, वचन, कायरूप तीन दण्डोंका त्याग करना और पाँचों इन्द्रियोंका जीतना सो द्रव्यसंयम कहा गया है ॥१२७॥
सगवण्ण जीवहिंसा अट्ठावीसिंदियत्थदोसा य ।
तेहिंतो जो विरओ भावो सो संजमो भणिओ ॥१२८॥
अर्थ: पहले जीवसमासोंमें जो सत्तावन प्रकारके जीव बता आये हैं, उनकी हिंसासे उपरत होना, तथा अट्ठाईस प्रकारके इन्द्रिय-विषयोंके दोषोंसे विरत होना, सो भावसंयम कहा गया है ॥१२८॥
संगहियसयलसंजममेयममणुत्तरं दुरवगम्मं ।
जीवो समुव्वहंतो सामाइयसंजदो होइ ॥१२९॥
अर्थ: जिसमें सकल संयम संगृहीत हैं, ऐसे सर्व सावद्यके त्यागरूप एकमात्र अनुत्तर एवं दुरवगम्य अभेद-संयमको धारण करना सो सामायिकसंयम है, और उसे धारण करने वाला सामायिक-संयत कहलाता है ॥१२९॥
छेत्तूण य परियायं पोराणं जो ठवेइ अप्पाणं ।
पंचजमे धम्मे सो छेदोवट्ठावगो जीवो ॥१३०॥
अर्थ: सावद्य संस्कार रूप पूर्व पर्यायको छेद कर अहिंसादि पाँच प्रकारके यमरूप धर्ममें अपनी आत्माको स्थापित करना छेदोपस्थापनासंयम है, और उसका धारक जीव छेदोपस्थापक-संयत कहलाता है ॥१३०॥
पंचसमिदो तिगुत्तो परिहरइ सया वि जो हु सावज्जं ।
पंचजमेयजमो वा परिहारयसंजदो साहू ॥१३१॥
अर्थ: पाँच समिति और तीन गुप्तियोंसे युक्त होकर सदा ही सर्व सावद्य योगका परिहार करना तथा पाँच यमरूप भेद-संयम (छेदोपस्थापना) को, अथवा एक यमरूप अभेद-संयम (सामायिक) को धारण करना परिहार विशुद्धि संयम है, और उसका धारक साधु परिहार-विशुद्धिसंयत कहलाता है ॥१३१॥
अणुलोहं वेयंतो जीओ उवसामगो व खवगो वा ।
सो सुहुमसंपराओ जहक्खाएणूणओ किंचि ॥१३२॥
अर्थ: मोहकर्मका उपशमन या क्षपण करते हुए सूक्ष्म लोभका वेदन करना सूक्ष्मसाम्परायसंयम है और उसका धारक सूक्ष्मसाम्परायसंयत कहलाता है । यह संयम यथाख्यातसंयमसे कुछ ही कम होता है । (क्योंकि सूक्ष्मसाम्परायसंयम दशवें गुणस्थानमें होता है और यथाख्यातसंयम ग्यारहवें गुणस्थानसे प्रारम्भ होता है ) ॥१३२॥
यथाख्यातसंयमका स्वरूप
उवसंते खीणे वा असुहे कम्मम्हि मोहणीयम्हि ।
छदुमत्थो व जिणो वा जहक्खाओ संजओ साहू ॥१३३॥
अर्थ: अशुभ ( पाप ) रूप मोहनीय कर्मके उपशान्त अथवा क्षीण हो जानेपर जो वीतराग संयम होता है, उसे यथाख्यातसंयम कहते हैं। उसके धारक ग्यारहवें-बारहवें गुणस्थानवर्ती छद्मस्थ साधु और तेरहवें-चौदहवें गुणस्थानवर्ती केवली जिन यथाख्यातसंयत कहलाते हैं ॥१३३॥
संयमासंयमका सामान्य स्वरूप
जो ण विरदो दु भावो थावरवह-इंदियत्थदोसाओ ।
तसवहविरओ सोच्चिय संजमासंजमो दिट्ठो ॥१३४॥
अर्थ: भावोंसे स्थावर-वध और पाँचों इन्द्रियोंके विषय-सम्बन्धी दोषोंसे विरत नहीं होने, किन्तु त्रस-वधसे विरत होनेको संयमासंयम कहते हैं और उनका धारक जीव नियमसे संयमासंयमी कहा गया है ॥१३४॥
संयमासंयमका विशेष स्वरूप
पंच-तिय-चउविहेहिं अणु-गुण-सिक्खावएहिं संजुत्तो ।
वुच्चंति देसविरया सम्माइट्ठी झडियकम्मा ॥१३५॥
अर्थ: पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रतोंसे संयुक्त होना विशिष्ट संयमासंयम है। इसके धारक और असंख्यातगुणश्रेणीरूप निर्जराके द्वारा कर्मोंके झड़ानेवाले ऐसे सम्यग्दृष्टि जीव देशविरत या संयतासंयत कहलाते हैं ॥१३५॥
देशविरतके भेद
दंसण-वय-सामाइय पोसह सचित्त राइभत्ते य ।
बंभारंभपरिग्गह अणुमण उद्दिट्ठ देसविरदेदे ॥१३६॥
अर्थ: दार्शनिक, व्रतिक, सामायिकी, प्रोषधोपवासी, सचित्तविरत, रात्रिभुक्तिविरत, ब्रह्मचारी, आरम्भविरत, परिग्रहविरत, अनुमतिविरत और उद्दिष्टविरत ये देशविरतके ग्यारह भेद होते हैं ॥१३६॥
असंयमका स्वरूप
जीवा चउदसभेया इंदियविसया य अट्ठवीसं तु ।
जे तेसु णेय विरया असंजया ते मुणेयव्वा ॥१३७॥
अर्थ: जीव चौदह भेद रूप हैं और इन्द्रियोंके विषय अट्ठाईस हैं। जीवघातसे और इन्द्रिय-विषयोंसे विरत नहीं होनेको असंयम कहते हैं। जो इनसे विरत नहीं हैं, उन्हें असंयत जानना चाहिए ॥१३७॥
दर्शनमार्गणा, दर्शनका स्वरूप
'जं सामण्णं गहणं भावाणं णेव कट्टु आयारं ।
अविसेसिऊण अत्थे दंसणमिदि भण्णदे समए१ ॥१३८॥
अर्थ: सामान्य-विशेषात्मक पदार्थोंके आकारविशेषको अग्रहण कर केवल सत्तात्मक अंशका या स्वरूपमात्रका सामान्य ग्रहण होता है, उसे परमागममें दर्शन कहा गया है ॥१३८॥
चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शनका स्वरूप
२चक्खूणं जं पयासइ दीसइ तं चक्खुदंसणं विंति ।
सेसिंदियप्पयासो णायव्वो सो अचक्खु त्ति ॥१३९॥
अर्थ: चक्षुरिन्द्रियके द्वारा जो पदार्थका सामान्य अंश प्रकाशित होता है, अथवा दिखाई देता है, उसे चक्षुदर्शन कहते हैं। शेष चार इन्द्रियोंसे और मनसे जो सामान्य-प्रतिभास होता है, उसे अचक्षुदर्शन जानना चाहिए ॥१३९॥
अवधिदर्शनका स्वरूप
३परमाणुआदियाइं अंतिमखंध *त्ति मुत्तदव्वाइं ।
तं ओहिदंसणं पुण जं पस्सइ ताई पच्चक्खं ३ ॥१४०॥
अर्थ: सर्व-लघु परमाणुसे आदि लेकर सर्व-महान् अन्तिम स्कन्ध तक जितने मूर्त्त द्रव्य हैं, उन्हें जो प्रत्यक्ष देखता है, उसे अवधिदर्शन कहते हैं ॥१४०॥
केवलदर्शनका स्वरूप
४बहुविह बहुप्पयारा उज्जोवा परिमियम्हि खेत्तम्हि ।
लोयालोयवितिमिरो सो† केवलदंसणुज्जोवो ॥१४१॥
अर्थ: बहुत जातिके और बहुत प्रकारके चन्द्र-सूर्यादिके उद्योत (प्रकाश) तो परिमित क्षेत्रमें ही पाये जाते हैं, अर्थात् वे थोड़ेसे ही पदार्थोंको अल्प परिमाणमें प्रकाशित करते हैं। किन्तु जो केवलदर्शनरूप उद्योत है, वह लोकको और अलोकको भी प्रकाशित करता है, अर्थात् सर्व चराचर जगत्को स्पष्ट देखता है ॥१४१॥
लेश्यामार्गणा, लेश्याका स्वरूप
लिप्पइ अप्पीकीरइ एयाए णियय पुण्ण पावं च ।
जीवो त्ति होइ लेसा लेसागुणजाणयक्खाया५ ॥१४२॥
अर्थ: जिसके द्वारा जीव पुण्य और पापसे अपने आपको लिप्त करता है अर्थात् उनके आधीन होता है, ऐसी कषायानुरंजित योगकी प्रवृत्तिको लेश्याके गुण-स्वरूपादिके जाननेवाले गणधरोंने लेश्या कहा है ॥१४२॥
जह गेरुवेण कुड्डो लिप्पइ लेवेण आमपिट्ठेण ।
तह परिणामो लिप्पइ सुहासुहा य त्ति लेवेण ॥१४३॥
अर्थ: जिस प्रकार आमपिष्ट (दालकी पिट्ठी या तैलादि) से मिश्रित गेरू मिट्टीके लेप-द्वारा भित्ती (दीवाल) लीपी या रंगी जाती है, उसी प्रकार शुभ और अशुभ भावरूप लेपके द्वारा जो आत्माका परिणाम लिप्त किया जाता है उसे लेश्या कहते हैं ॥१४३॥
चंडो ण मुयद वेरं भंडणसीलो य धम्मदयरहिओ ।
दुट्ठो ण य एइ वसं लक्खणमेयं तु किण्हस्स ॥१४४॥
अर्थ: जो प्रचण्ड-स्वभावी हो, वैरको न छोड़े, भंडनशील या कलहस्वभावी हो, धर्म और दयासे रहित हो, दुष्ट हो, और जो किसीके भी वशमें न आवे, ये सब कृष्णलेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१४४॥
मंदो बुद्धिविहीणो णिव्विण्णाणी य विसयलोलो य ।
माणी माई य तहा आलस्सो चेव भेजो य ॥१४५॥
णिद्दावंचणबहुलो धण-धण्णे होइ तिव्वसण्णाओ ।
लक्खणमेयं भणियं समासाओ णीललेसस्स ॥१४६॥
अर्थ (गाथा 145 से 146): जो कार्य करनेमें मन्द-उद्यमी एवं स्वच्छन्द हो, बुद्धि-विहीन हो, कला और चातुर्यरूप विशेष ज्ञानसे रहित हो, इन्द्रियोंके विषयोंका लोलुपी हो, मानी हो, मायाचारी हो, आलसी हो, अभेद्य-स्वभावी हो, अर्थात् दूसरे लोग जिसके अभिप्रायको प्रयत्न करने पर भी न जान सकें, बहुत निद्रालु हो, पर-वंचनमें अतिदक्ष हो, और धन-धान्यके संग्रहादिमें तीव्र लालसावाला हो, ये सब संक्षेपसे नीललेश्यावालेके लक्षण कहे गये हैं ॥१४५-१४६॥
रूसइ णिंदइ अण्णे दसणबहुलो य सोय-भयबहुलो ।
असुवइ परिभवइ परं पसंसइ य अप्पयं बहुसो ॥१४७॥
ण य पत्तियइ परं सो अप्पाणं पिव परं पि मण्णंतो ।
तूसइ अइथुव्वंतो ण य जाणइ हाणि-वड्डीओ ॥१४८॥
मरणं पत्थेइ रणे देइ सु बहुयं पि थुव्वमाणो हु ।
ण गणइ कज्जाकज्जं लक्खणमेयं तु काउस्स ॥१४९॥
अर्थ (गाथा 147 से 149): जो दूसरोंके ऊपर रोष करता हो, दूसरोंकी निन्दा करता हो, दूषण-बहुल हो, शोक-बहुल हो, भय-बहुल हो, दूसरेसे ईर्ष्या करता हो, परका पराभव करता हो, नानाप्रकारसे अपनी प्रशंसा करता हो, परका विश्वास न करता हो, अपने समान दूसरेको भी मानता हो, स्तुति किये जाने पर अति सन्तुष्ट हो, अपनी हानि और वृद्धि [लाभ] को न जानता हो, रणमें मरणका इच्छुक हो, स्तुति या प्रशंसा किये जाने पर बहुत धनादिक देवे और कर्त्तव्य-अकर्त्तव्यको कुछ भी न गिनता हो; ये सब कापोतलेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१४७-१४९॥
जाणइ कज्जाकज्जं सेयासेयं च सव्वसमपासी ।
दय-दाणरदो य विदू लक्खणमेयं तु तेउस्स ॥१५०॥
अर्थ: जो अपने कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य और सेव्य-असेव्यको जानता हो, सबमें समदर्शी हो, दया और दानमें रत हो, मृदु-स्वभावी और ज्ञानी हो, ये सब तेजोलेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१५०॥
चाई भद्दो चोक्खो उज्जुकम्मो य खमइ बहुयं पि ।
साहुगुणपूयणिरओ लक्खणमेयं तु पउमस्स ॥१५१॥
अर्थ: जो त्यागी हो, भद्र (भला) हो, चोखा (सच्चा) हो, उत्तम कार्य करनेवाला हो, बहुत भी अपराध या हानि होने पर क्षमा कर दे, साधुजनोंके गुणोंकी पूजनमें निरत हो, ये सब पद्मलेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१५१॥
ण कुणइ पक्खवायं ण वि य णिदाणं समो य सव्वेसु ।
णत्थि य राओ दोसो णेहो वि हु सुक्कलेसस्स ॥१५२॥
अर्थ: जो पक्षपात न करता हो, और न निदान करता हो; सबमें समान व्यवहार करता हो, जिसे परमें राग न हो, द्वेष न हो और स्नेह भी न हो; ये सब शुक्ललेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१५२॥
किण्हाइलेसरहिया संसारविणिग्गया अणंतसुहा ।
सिद्धिपुरीसंपत्ता अलेसिया ते मुणेयव्वा ॥१५३॥
अर्थ: जो कृष्णादि छहों लेश्याओंसे रहित हैं, पंच परिवर्त्तनरूप संसारसे विनिर्गत हैं, अनन्त-सुखी हैं, और आत्मोपलब्धिरूप सिद्धिपुरीको संप्राप्त हैं, ऐसे अयोगिकेवली और सिद्ध जीवोंको अलेश्य जानना चाहिए। ॥१५३॥
भव्यमार्गणा, भव्यसिद्धका स्वरूप
सिद्धत्तणस्स जोग्गा जे जीवा ते भवंत्ति भवसिद्धा।
ण उ मलविगमे णियमा ताणं कणकोवलाणमिव ॥१५४॥
अर्थ: जो जीव सिद्धत्व अर्थात् सर्व कर्मसे रहित मुक्तिरूप अवस्था पानेके योग्य हैं, वे भव्य-सिद्ध कहलाते हैं। किन्तु उनके कनकोपल (स्वर्ण-पाषाण) के समान मलका नाश होनेमें नियम नहीं है ॥१५४॥
भव्य और अभव्य जीवोंका निरूपण
संखेज्ज असंखेज्जा अणंतकालेण चवि ते णियमा।
सिज्झंति भव्वजीवा अभव्वजीवा ण सिज्झंति ॥१५५॥
भविया *सिद्धी जेसिं जीवाणं ते भवंत्ति भवसिद्धा।
तव्विवरीयाऽभव्वा संसाराओ ण सिज्झंति ॥१५६॥
अर्थ (गाथा 155 से 156): जो भव्य जीव हैं, वे नियमसे संख्यात, असंख्यात अथवा अनन्तकालके द्वारा सिद्धपद प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु अभव्य जीव कभी भी सिद्ध-पद प्राप्त नहीं कर पाते हैं। जिन जीवोंकी मुक्तिपद-प्राप्तिरूप सिद्धि होनेवाली है, अथवा जो उसकी प्राप्तिके योग्य हैं, उन्हें भव्यसिद्ध कहते हैं। जो इनसे विपरीत स्वरूपवाले हैं, वे अभव्य कहलाते हैं और वे कभी संसारसे छूटकर सिद्ध नहीं होते हैं ॥१५५-१५६॥
भव्यत्व और अभव्यत्वसे रहित जीवोंका वर्णन
ण य जे भव्वामव्वा मुत्तिसुहा होंति तीदसंसारा।
ते जीवा णाएव्वा णो भव्वा णो अभव्वा य ॥१५७॥
अर्थ: जो न भव्य हैं और न अभव्य हैं, किन्तु जिन्होंने मुक्ति-सुखको प्राप्त कर लिया है और अतीत-संसार हैं, अर्थात् पंचपरिवर्त्तनरूप संसारको पार कर चुके हैं, उन जीवोंको ‘नो भव्य नो अभव्य’ जानना चाहिए ॥१५७॥
सम्यक्त्वमार्गणा, जीव सम्यक्त्वको कब प्राप्त करता है, इस बातका निरूपण
'भव्वो पंचिंदिओ सण्णी जीवो पज्जत्तओ तहा ।
काललद्धाइ-संजुत्तो सम्मत्तं पडिवज्जए ॥१५८॥
अर्थ: जो भव्य हो, पंचेन्द्रिय हो, संज्ञी हो, पर्याप्तक हो, तथा काललब्धि आदिसे संयुक्त हो, ऐसा जीव सम्यक्त्वको प्राप्त करता है । [ यहाँ पर आदि पदसे वेदनाभिभव, जातिस्मरण आदि बाह्य कारण विवक्षित हैं । संस्कृत पञ्चसंग्रह ] ॥१५८॥
सम्यक्त्वका स्वरूप
छप्पंचणवविहाणं अत्थाणं जिणवरोवइट्ठाणं ।
आणाए अधिगमेण य सद्दहणं होइ सम्मत्तं ॥१५६॥
अर्थ: जिनवरोंके द्वारा उपदिष्ट छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय और नौ प्रकारके पदार्थोंका आज्ञा या अधिगमसे श्रद्धान करना सम्यक्त्व है ॥१५६॥
क्षायिकसम्यक्त्वका स्वरूप
खीणे दंसणमोहे जं सद्दहणं सुणिम्मलं होइ ।
तं खाइयसम्मत्तं णिच्चं कम्मक्खवणहेउं ॥१६०॥
वयणेहिं वि हेऊहि य इंदियमयजणणेहिं रूवेहिं ।
वीभच्छ-दुगुंछेहि य णो तेल्लोकेण चालिजा ॥१६१॥
एवं विउला बुद्धी ण य विभयमेदि किंचि दट्ठूणं ।
पहुविए सम्मत्ते खहए जीवस्स लद्धीए ॥१६२॥
अर्थ (गाथा 160 से 162): दर्शनमोहनीय कर्मके सर्वथा क्षय हो जाने पर जो निर्मल श्रद्धान होता है, उसे क्षायिक सम्यक्त्व कहते हैं । वह सम्यक्त्व नित्य है, अर्थात् होकरके फिर कभी छूटता नहीं है और सिद्धपद प्राप्त करने तक शेष कर्मोंके क्षपणका कारण है । यह क्षायिकसम्यक्त्व श्रद्धानको भ्रष्ट करनेवाले वचनोंसे, तर्कोंसे, इन्द्रियोंको भय उत्पन्न करनेवाले रूपों [आकारों] से तथा वीभत्स और जुगुप्सित पदार्थोंसे भी चलायमान नहीं होता । अधिक क्या कहा जाय, वह त्रैलोक्यके द्वारा भी चल-विचल नहीं होता । क्षायिकसम्यक्त्वके प्रस्थापन अर्थात् प्रारम्भ होने पर अथवा लब्धि अर्थात् प्राप्ति या निष्पापन होने पर क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवके ऐसी विशाल, गम्भीर एवं दृढ़ बुद्धि उत्पन्न हो जाती है कि वह कुछ (असंभव या अनहोनी घटनाएँ) देखकर भी विस्मय या क्षोभको प्राप्त नहीं होता ॥१६०-१६२॥
वेदकसम्यक्त्वका स्वरूप
बुद्धी सुहाणुबंधी सुहकम्मरओ सुए य संवेगो ।
तच्चत्थे सद्दहणं पियधम्मे तिव्वणिव्वेदो ॥१६३॥
इच्चेवमाइया जे वेदयमाणस्स होंति ते य गुणा ।
वेदयसम्मत्तमिणं सम्मत्तु दएण जीवस्स ॥१६४॥
अर्थ (गाथा 163 से 164): वेदकसम्यक्त्वके उत्पन्न होने पर जीवकी बुद्धि शुभानुबन्धी या सुखानुबन्धी हो जाती है, शुचि कर्ममें रति उत्पन्न होती है, श्रुतमें संवेग अर्थात् प्रीति पैदा होती है, तत्त्वार्थमें श्रद्धान, प्रिय धर्ममें अनुराग, एवं संसारसे तीव्र निर्वेद अर्थात् वैराग्य जागृत हो जाता है। इन गुणोंको आदि लेकर इस प्रकारके जितने गुण हैं, वे सब वेदकसम्यक्त्वी जीवके प्रगट हो जाते हैं। सम्यक्त्वप्रकृतिके उदयका वेदन करनेवाले जीवको वेदकसम्यक्त्वी जानना चाहिए ॥१६३-१६४॥
उपशमसम्यक्त्वका स्वरूप
देवे अणण्णभावो विसयविरागो य तच्चसद्दहणं ।
दिट्ठीसु असम्मोहो सम्मत्तमणूणयं जाणे ॥१६५॥
दंसणमोहस्सुदए उवसंते सच्चभावसद्दहणं ।
उवसमसम्मत्तमिणं पसण्णकलुसं जहा तोयं ॥१६६॥
अर्थ (गाथा 165 से 166): उपशमसम्यक्त्वके होने पर जीवके सत्यार्थ देवमें अनन्य भक्तिभाव, विषयोंसे विराग, तत्त्वोंका श्रद्धान और विविध मिथ्या दृष्टियों (मतों) में असममोह प्रगट होता है, इसे क्षायिक-सम्यक्त्वसे कुछ भी कम नहीं जानना चाहिए। जिस प्रकार पंकादि-जनित कालुष्यके प्रशान्त होने पर जल निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार दर्शनमोहके उदयके उपशान्त होनेपर जो सत्यार्थ श्रद्धान उत्पन्न होता है उसे उपशमसम्यक्त्व कहते हैं ॥१६५-१६६॥
तीनों सम्यक्त्वोंका गुणस्थानोंमें विभाजन
खाइयमसंजयम्हि वेदयसम्मत्तमप्पमत्तंते ।
उवसमसम्मत्तं पुण उवसंतंतेसु गायव्वं ॥१६७॥
अर्थ: क्षायिकसम्यक्त्व असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर उपरिम सर्व गुणस्थानोंमें होता है। वेदकसम्यक्त्व अप्रमत्तसंयतगुणस्थान तक होता है और उपशमसम्यक्त्व उपशान्तमोह गुणस्थानान्त जानना चाहिए ॥१६७॥
सासादनसम्यक्त्वका स्वरूप
ण य मिच्छत्तं पत्तो सम्मत्तादो य जो हु परिवडिओ ।
सो सासणो त्ति णेओ सादियपरिणामिओ भावो ॥१६८॥
अर्थ: उपशमसम्यक्त्वसे परिपतित होकर जीव जब तक मिथ्यात्वको प्राप्त नहीं हुआ है, तब तक उसे सासादनसम्यग्दृष्टि जानना चाहिए। इसके सादि पारिणामिक भाव होता है ॥१६८॥
सम्यग्मिथ्यात्वका स्वरूप
सद्दहणासद्दहणं जस्स य जीवेसु होइ तच्चेसु ।
विरयाविरएण समो सम्मामिच्छो त्ति णादव्वो¹ ॥१६६॥
अर्थ: जिसके उदयसे जीवोंके तत्त्वोंमें श्रद्धान और अश्रद्धान युगपत् प्रगट हो, उसे विरता-विरतके समान सम्यग्मिथ्यात्व जानना चाहिए ॥१६६॥
मिथ्यात्वका स्वरूप
²मिच्छादिट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहइ ।
सद्दहइ असब्भावं उवइट्ठं अणुवइट्ठं वा³ ॥१७०॥
अर्थ: मिथ्यात्वकर्मके उदयसे मिथ्यादृष्टि जीव जिन-उपदिष्ट प्रवचनका तो श्रद्धान करता नहीं, है, किन्तु कुदैवादिकके द्वारा उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असद्भावका श्रद्धान करता है ॥१७०॥
उपशमसम्यक्त्वकी उत्पत्ति के विषयमें सर्वोपशम और देशोपशमका नियम
³सम्मत्तपढमलंभो सयलोवसमा दु भव्वजीवाणं ।
णियमेण होइ अवरो सव्वोवसमा दु देसपसमा वा³ ॥१७१॥
अर्थ: भव्यजीवोंके प्रथम बार उपशमसम्यक्त्वका लाभ नियमतः दर्शनमोहनीयके सकलोपशमसे ही होता है । किन्तु अपर अर्थात् द्वितीयादि बार सर्वोपशम अथवा देशोपशमसे होता है ॥१७१॥
सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके पश्चात् मिथ्यात्व-प्राप्तिका नियम
⁴सम्मत्तादिमलंभस्साणंतरं णिच्छएण णायव्वो ।
मिच्छासंगो पडुछा अण्णस्स दु होइ भयणिज्जो⁵ ॥१७२॥
अर्थ: आदिम सम्यक्त्वके लाभके अनन्तर मिथ्यात्वका संगम निश्चयसे जानना चाहिए । किन्तु अन्य अर्थात् द्वितीयादि बार सम्यक्त्व-लाभके पश्चात् मिथ्यात्वका संगम भजनीय है, अर्थात् किसीके होता भी है और किसीके नहीं भी होता ॥१७२॥
संज्ञिमार्गणा, संज्ञी और असंज्ञीका स्वरूप
⁵सिक्खाकिरिओवएसा आलावगाही मणोवलंबेण ।
जो जीवो सो सण्णी तव्विवरीओ असण्णी य⁶ ॥१७३॥
अर्थ: जो जीव मनके अवलम्बनसे शिक्षा, क्रिया, उपदेश और आलापको ग्रहण करता है, उसे संज्ञी कहते हैं । जो इससे विपरीत है, अर्थात् शिक्षा आदिको ग्रहण नहीं कर सकता, उसे असंज्ञी कहते हैं ॥१७३॥
संज्ञी-असंज्ञीके स्वरूपका और भी स्पष्टीकरण