पञ्चसंग्रह (प्राकृत), संस्कृत टीका, प्राकृत चूर्णि एवं हिन्दी अनुवाद सहित | Panchsangrah

पञ्चसंग्रह (प्राकृत), संस्कृत टीका, प्राकृत चूर्णि एवं हिन्दी अनुवाद सहित

सम्पादन एवं अनुवाद: पं॰ हीरालाल जैन सिद्धान्तशास्त्री
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ, काशी (मूर्तिदेवी ग्रन्थमाला, प्राकृत ग्रन्थांक १०)
संस्करण: प्रथम, १९६०

कर्म सिद्धान्त का प्राकृत ग्रन्थ: जीवसमास, प्रकृतिसमुत्कीर्तन, कर्मस्तव, शतक और सप्ततिका, इन पाँच प्रकरणों का संग्रह, संस्कृत टीका, प्राकृत चूर्णि और हिन्दी अनुवाद सहित।

Panchsangrah (Prakrit): the five sections Jivasamas, Prakritisamutkirtan, Karmastav, Shatak and Saptatika on karma, with Sanskrit tika, Prakrit churni and Hindi translation by Pt. Hiralal Jain Siddhantashastri.


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):


:open_book: मूल गाथा और गाथा अर्थ, अधिकार अनुसार पढ़ें:

हर गाथा अलग, उसके नीचे उसका अर्थ, इसी ग्रन्थ के PDF से ज्यों का त्यों (स्कैन से टंकित, मिलान बाकी)।

प्रथम अधिकार: जीवसमास (भाग 1/2)

जीवसमास


छद्दव्व-णवपयत्थे दव्वाइहचउव्विहेण जाणंते ।
वंदित्ता अरहंते जीवस्स परूवणं वोच्छं ॥१॥

अर्थ: द्रव्यादि चार प्रकारसे छह द्रव्य और नौ पदार्थोंको जाननेवाले अरहन्तोंको नमस्कार करके जीवकी प्ररूपणा कहूँगा ॥१॥


जीव-प्ररूपणाके भेद


गुण जीवा पज्जत्ती पाणा सण्णा य मग्गणाओ य ।
उवओगो वि य कमसो वीसं तु परूवणा भणिया ॥२॥

अर्थ: गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, चौदह मार्गणाएं और उपयोग; इस प्रकार क्रमसे ये बीस प्ररूपणा कही गई हैं ॥२॥


गुणस्थानका स्वरूप और भेद


जेहिं दु लक्खिज्जंते उदयादिसु संभवेहिं भावेहिं ।
जीवा ते गुणसण्णा णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥३॥

मिच्छो सासण मिस्सो अविरदसम्मो य देसविरदो य ।
विरदो पमत्त इदरो अपुव्व अणियट्टि सुहुमो य ॥४॥

उवसंतखीणमोहो सजोगिकेवलिजिणो अजोगी य ।
चोद्दस गुणट्ठाणाणि य कमेण सिद्धा य णायव्वा ॥५॥

अर्थ (गाथा 3 से 5): उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि अवस्थाओंके होने पर उत्पन्न होनेवाले जिन भावोंसे जीव लक्षित किये जाते हैं, उन्हें सर्वदर्शियोंने ‘गुणस्थान’ इस संज्ञासे निर्देश किया है। १ मिथ्यात्व, २ सासादन, ३ मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व), ४ अविरतसम्यक्त्व, ५ देशविरत, ६ प्रमत्तविरत, ७ अप्रमत्तविरत, ८ अपूर्वकरणसंयत, ६ अनिवृत्तिकरणसंयत, १० सूक्ष्मसाम्परायसंयत, ११ उपशान्तमोह, १२ क्षीणमोह, १३ सयोगिकेवलिजिन और १४ अयोगिकेवली ये क्रमसे चौदह गुणस्थान होते हैं। तथा सिद्धोंको गुणस्थानातीत जानना चाहिए ॥३-५॥


१ मिथ्यात्वगुणस्थानका स्वरूप


'मिच्छत्तं वेदंतो जीवो त्तिवरीयदंसणो होइ ।
ण य धम्मं रोचेदि हु महुरं पि रसं जहा जरिदो ॥६॥

तं मिच्छत्तं *जमसदहणं †त्तचाणं होदि अत्थाणं ।
संसइद × मभिग्गहियं अणभिग्गहियं तु तं तिविहं ॥७॥

मिच्छादिट्ठी जीओ उवइट्ठे पवयणे ण सदहदि ।
सदहदि असब्भावं उवइट्ठं अणुवइट्ठं + च ॥८॥

अर्थ (गाथा 6 से 8): मिथ्यात्वकर्मको वेदन अर्थात् अनुभव करनेवाला जीव विपरीतश्रद्धानी होता है। उसे धर्म नहीं रुचता है, जैसे कि ज्वर-युक्त मनुष्यको मधुर (मीठा) रस भी नहीं रुचता है। जो सात तत्त्वों या नव पदार्थोंका अश्रद्धान होता है, उसे मिथ्यात्व कहते हैं। यह तीन प्रकारका है-संशयित, अभिगृहीत और अनभिगृहीत। मिथ्यादृष्टि जीव जिन-उपदिष्ट प्रवचनका श्रद्धान नहीं करता है। प्रत्युत अन्यसे उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असद्भाव अर्थात् पदार्थके अयथार्थ स्वरूपका श्रद्धान करता है ॥६-८॥


२ सासादनगुणस्थानका स्वरूप


२सम्मत्यरयणपव्वयसिहरादो > मिच्छभावसमभिमुहो ।
णासियसम्मत्तो सो सासणणामो मुणेयव्वो ॥९॥

अर्थ: सम्यक्त्वरूप रत्न-पर्वतके शिखरसे च्युत, मिथ्यात्वरूप भूमिके समभिमुख और सम्यक्त्वके नाशको प्राप्त जो जीव है, उसे सासादन नामवाला जानना चाहिए ॥९॥


३ सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थानका स्वरूप


३दहिगुडमिव वामिस्सं पिहुभावं + णेव कारिदुं सक्कं ।
एवं मिस्सयभावो सम्मामिच्छो त्ति णायव्वो ॥१०॥

अर्थ: जिस प्रकार व्यामिश्र अर्थात् अच्छी तरहसे मिला हुआ दही और गुड़ पृथक्-पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी प्रकारसे सम्यक्त्व और मिथ्यात्वके मिश्रित भावको सम्यग्मिथ्यात्व जानना चाहिए। यह सम्यक्त्व और मिथ्यात्वका सम्मिश्रण उन दोनोंके स्वतंत्र आस्वादसे एक भिन्न-जातीय रूपको धारण कर लेता है, अतएव उसकी अपेक्षासे मिश्रभावको एक स्वतन्त्र गुणस्थान माना गया है । ॥१०॥


४ अविरतसम्यक्त्वगुणस्थानका स्वरूप


‘णो इंदिएसु विरदो णो जीवे थावरे तसे चावि* ।
जो सद्दहइ जिणुत्तं सम्माइट्ठी अविरदो +सो’ ॥११॥

सम्माइट्ठी जीवो उवइट्ठं’ पवयणं तु सद्दहदि ।
सद्दहइ असब्भावं अजाणमाणो गुरुणिओगा³ ॥१२॥

अर्थ (गाथा 11 से 12): जो पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंसे विरत नहीं है और न त्रस तथा स्थावर जीवोंके घातसे ही विरत है, किन्तु केवल जिनोक्त तत्त्वका श्रद्धान करता है, वह चतुर्थ गुणस्थानवर्ती अविरत-सम्यग्दृष्टि है। सम्यग्दृष्टि जीव जिन-उपदिष्ट प्रवचनका तो श्रद्धान करता ही है, किन्तु कदाचित् (सद्भावको) नहीं जानता हुआ गुरुके नियोग (उपदेश या आदेश) से असद्भावका भी श्रद्धान कर लेता है ॥११-१२॥


५ देशविरतगुणस्थानका स्वरूप


'जो तसवहाउ विरदो णो विरओ अक्ख-थावरवहाओ× ।
पडिसमयं सो जीवो विरयाविरओ जिणेकमई³ ॥१३॥

अर्थ: जो जीव एक मात्र जिन भगवान्में ही मति (श्रद्धा) को रखता है, तथा त्रस जीवोंके घातसे विरत है और इन्द्रिय-विषयोंसे एवं स्थावर जीवोंके घातसे विरक्त नहीं है, वह जीव प्रति समय विरताविरत है। अर्थात् अपने गुणस्थानके कालके भीतर हर-क्षण विरत और अविरत इन दोनों संज्ञाओंको एक साथ एक समयमें धारण करता है ॥१३॥


६ प्रमत्तसंयतगुणस्थानका स्वरूप


४वत्तावत्तपमाए जो वसइ पमत्तसंजओ होइ ।
सयलगुणसीलकलिओ महव्वई चित्तलायरणो५ ॥१४॥

‘विकहा तहा कसाया इंदियणिद्दा तहेव पणओ य ।
चदु चदु पण एगेगं होंति पमादा हु पण्णरसा’ ॥१५॥

अर्थ (गाथा 14 से 15): जो पुरुष सकल मूलगुणोंसे और शील अर्थात् उत्तरगुणोंसेसहित है, अतएव महाव्रती है; तथा व्यक्त और अव्यक्त प्रमादमें रहता है, अतएव चित्रल-आचरणो है; वह प्रमत्त संयत कहलाता है। चार विकथा (स्त्रीकथा, भोजनकथा, देशकथा, अवनिपालकथा) चार कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) पाँच इन्द्रिय (स्पर्शन, रसना, नासिका, नयन, श्रवण) एक निद्रा और एक प्रणय (प्रेम या स्नेह-सम्बन्ध) ये पन्द्रह (४+४+५+१+१=१५) प्रमाद होते हैं ॥१४-१५॥


७ अप्रमत्तसंयतगुणस्थानका स्वरूप


'णट्ठासेसपमाओ वयगुणसीलोलिमंडिओ णाणी ।
अणुवसमओ × अखवओ झाणणिलीणो हु अप्पमत्तो सो ॥१६॥

अर्थ: जो व्यक्त और अव्यक्तरूप समस्त प्रकारके प्रमादसे रहित है, महाव्रत, मूलगुण और और उत्तरगुणोंकी मालासे मंडित है, स्व और परके ज्ञानसे युक्त है, और कषायोंका अनुपशमक या अक्षपक होते हुए भी ध्यानमें निरन्तर लीन रहता है, वह अप्रमत्तसंयत कहलाता है ॥१६॥


८ अपूर्वकरणसंयतगुणस्थानका स्वरूप


२भिण्णसमयट्ठिएहिं हु जीवेहि ण होइ सव्वहा सरिसो ।
करणेहिं एयसमयट्ठिएहिं सरिसो विसरिसो वा ॥१७॥

एयम्मि गुणट्ठाणे विसरिससमयट्ठिएहिं जीवेहिं ।
पुव्वमपत्ता जम्हा होंति अपुव्वा हु परिणामा ॥१८॥

तारिसपरिणामट्ठियजीवा हु जिणेहिं गलियतिमिरेहिं ।
मोहस्सऽपुव्वकरणा खवणुवसमणुज्जया भणिया ॥१९॥

अर्थ (गाथा 17 से 19): इस गुणस्थानमें, भिन्न समयवर्ती जीवोंमें करण अर्थात् परिणामोंकी अपेक्षा कभी भी सादृश्य नहीं पाया जाता । किन्तु एक समयवर्ती जीवोंमें सादृश्य और वैसादृश्य दोनों ही पाये जाते हैं । इस गुणस्थानमें यतः विभिन्न-समय-स्थित जीवोंके पूर्वमें अप्राप्त अपूर्व परिणाम होते हैं; अतः उन्हें अपूर्वकरण कहते हैं । इस प्रकारके अपूर्वकरण परिणामोंमें स्थित जीव मोहकर्मके क्षपण या उपशमन करनेमें उद्यत होते हैं, ऐसा गलित-तिमिर अर्थात् अज्ञानरूप अन्धकारसे रहित वीतरागी जिनोंने कहा है ॥१७-१९॥


६ अनिवृत्तिकरणसंयतगुणस्थानका स्वरूप


३एक्कम्मि कालसमए संठाणादीहि जह णिवट्टंति ।
ण *णिवट्टंति तह चिय परिणामेहिं मिहो जम्हा ॥२०॥

होंति अणियट्ठिणो ते पडिसमयं जेसिमेकपरिणामा ।
विमलयर् + झाणुहुवहसिहाहिं णिद्दड्ढकम्मवणा ॥२१॥

अर्थ (गाथा 20 से 21): इस गुणस्थानके अन्तर्मुहूर्त-प्रमित कालमें से विवक्षित किसी एक समयमें अवस्थित जीव यतः संस्थान ( शरीरका आकार ) आदिकी अपेक्षा जिस प्रकार निवृत्ति या भेदको प्राप्त होते हैं, उस प्रकार परिणामोंकी अपेक्षा परस्पर निवृत्तिको प्राप्त नहीं होते हैं, अतएव वे अनिवृत्तिकरण कहलाते हैं । अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवर्ती जीवोंके प्रति समय एक ही परिणाम होता है । ऐसे ये जीव अपने अति विमल ध्यानरूप अग्निकी शिखाओंसे कर्मरूप वनको सर्वथा जला डालते हैं ॥२०-२१॥


१० सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानका स्वरूप


'कोसुंभो जिह राओ अब्भंतरदो य सुहुमरत्तो य ।
एवं सुहुमसराओ सुहुमकसाओ त्ति णायव्वो ॥२२॥

पुव्वापुव्वप्फड्डयअणुभागाओ अणंतगुणहीणे + ।
लोहाणुम्मि य ठिओ हंदि सुहुमसंपराओ य२ ॥२३॥

अर्थ (गाथा 22 से 23): जिस प्रकार कुसुम्भी रंग भीतरसे सूक्ष्म रक्त अर्थात् अत्यन्त कम लालिमावाला होता है, उसी प्रकार सूक्ष्म राग-सहित जीवको सूक्ष्मकषाय या सूक्ष्मसाम्पराय जानना चाहिए। तथा संज्वलन लोभमें स्थित सूक्ष्मसाम्परायसंयत पूर्वस्पर्धक और अपूर्वस्पर्धकके अनुभाग से अनन्तगुणितहीन अनुभागवाला होता है ॥२२-२३॥


११ उपशान्तकषायगुणस्थानका स्वरूप


२सकयाहलं जलं वा सरए सरवाणियं व णिम्मलयं ।
सयलोवसंतमोहो उवसंतकसायओ होइ ॥२४॥

अर्थ: कतकफल (निर्मली) से सहित जल, अथवा शरद्-कालमें सरोवरका पानी जिस प्रकार निर्मल होता है, उसी प्रकार जिसका सम्पूर्ण मोहकर्म सर्वथा उपशान्त हो गया है, ऐसा उपशान्तकषायगुणस्थानवर्ती जीव अत्यन्त निर्मल परिणामवाला होता है ॥२४॥


१२ क्षीणकषायगुणस्थानका स्वरूप


३णिस्सेसखीणमोहो फलिहामलभायणुदयसमचित्तो ।
खीणकसाओ भण्णइ णिग्गंथो वीयराएहिं ॥२५॥

जह सुद्धफलिहभायणखित्तं *खीरं खु †णिम्मलं सुद्धं ।
तह ×णिम्मलपरिणामो खीणकसाओ मुणेयव्वो ॥२६॥

अर्थ (गाथा 25 से 26): मोहकर्मके निःशेष क्षीण हो जानेसे जिसका चित्त स्फटिकके विमल भाजनमें रक्खे हुए सलिलके समान स्वच्छ हो गया है, ऐसे निर्ग्रन्थ साधुको वीतरागियोंने क्षीणकषायसंयत कहा है। जिस प्रकार निर्मली, फिटकरी आदिसे स्वच्छ किया हुआ जल शुद्ध-स्वच्छ स्फटिकमणिके भाजनमें नितरा लेनेपर सर्वथा निर्मल एवं शुद्ध होता है, उसी प्रकार क्षीणकषायसंयतको भी निर्मल, स्वच्छ एवं शुद्ध परिणामवाला जानना चाहिये ॥२५-२६॥


१३ सयोगिकेवलिगुणस्थानका स्वरूप


केवलणाणदिवायरकिरणकलावप्पणासिअण्णाणो ।
णवकेवललद्धुग्गमपावियपरमप्पववएसो ॥२७॥

जं णत्थि राय-दोसो तेण ण बंधो हु अत्थि केवलिणो ।
जह सुक्ककुड्लग्गा बालुया सडइ तह कम्मं ॥२८॥

असहायणाण-दंसणसहिओ वि हु केवली हु जोएण ।
जुत्तो त्ति सजोगिजिनो अणाइणिहणारिसे वुत्तो ॥२९॥

अर्थ (गाथा 27 से 29): केवलज्ञानरूप दिवाकर (सूर्य) की किरणोंके समूहसे जिनकी अज्ञानान्धकार सर्वथा नष्ट हो गया है, जिन्होंने नौ केवल-लब्धियोंके उद्गमसे ‘परमात्मा’ संज्ञा प्राप्त की है और जो पर-सहायसे रहित केवलज्ञान-दर्शनसे सहित हैं, ऐसे योग-युक्त केवली भगवान्को अनादि-निधन आर्षमें सयोगिजिन कहा है। केवली भगवानके यतः राग-द्वेष नहीं होता, इस कारणसे उनके नवीन कर्मका बन्ध भी नहीं होता है। जिस प्रकार सूखी भित्तीपर आकरके लगी हुई बालुका तत्क्षण झड़ जाती है, इसी प्रकार योगके सद्भावसे आया हुआ कर्म भी कषायके न होनेसे तत्क्षण झड़ जाता है ॥२७-२९॥


१४ अयोगिकेवलिगुणस्थानका स्वरूप


सेलेसिं संपत्तो णिरुद्धणिस्सेसआसओ जीवो ।
कम्मरयविप्पमुक्को गयजोगो केवली होई ॥३०॥

अर्थ: जो जीव शैलेशी अवस्थाको प्राप्त हुए हैं, अर्थात् शैल (पर्वत) के समान स्थिर परिणाम-वाले हैं; अथवा जिन्होंने अठारह हजार भेदवाले शीलके स्वामित्वरूप शैलेशात्वको प्राप्त किया है, जिनका निःशेष आस्रव सर्वथा रुक गया है; जो कर्म-रजसे विप्रमुक्त हैं और योगसे रहित हो चुके हैं, ऐसे केवली भगवान्को अयोगिकेवली कहते हैं ॥३०॥


१५ गुणस्थानातीत सिद्धोंका स्वरूप


अट्ठविहकम्मवियडा सीधीभूदा णिरंजणा णिच्चा ।
अट्ठगुणा कयकिच्चा लोयग्गणिवासिणो सिद्धा ॥३१॥

अर्थ: जो अष्ट-विध कर्मोंसे रहित हैं, अत्यन्त शान्तिमय हैं, निरंजन हैं, नित्य हैं, क्षायिक सम्यक्त्व आदि आठ गुणोंसे युक्त हैं, कृतकृत्य हैं और लोकके अग्रभागपर निवास करते हैं, वे सिद्ध कहलाते हैं ॥३१॥


अब दूसरी जीवसमासप्ररूपणाका वर्णन करते हैं


जेहिं अणेया जीवा णिज्जंते बहुविहा वि तज्जादी ।
ते पुण संगहिदत्था जीवसमासेत्ति विण्णेया ॥३२॥

अर्थ: जिन धर्म-विशेषोंके द्वारा नाना जीव और उनकी नाना प्रकारकी जातियाँ जानी जाती हैं, पदार्थोंका संग्रह करनेवाले उन धर्मविशेषोंको जीवसमास जानना चाहिये ॥३२॥


जीवसमासोंके भेदोंका वर्णन


जीवट्ठाणवियप्पा चोद्दस इगिवीस तीस बत्तीसा ।
छत्तीस अढतीसा ऽडयाल चउवण्ण सत्तवण्णा ॥३३॥

अर्थ: जीवोंके स्थानोंको जीवसमास कहते हैं । जीवस्थानोंके भेद क्रमशः चौदह, इक्कीस, तीस, बत्तीस, छत्तीस, अड़तीस, अड़तालीस, चौवन और सत्तावन होते हैं ॥३३॥


चौदह भेदोंका निरूपण


बादरसुहुमेगिंदिय-वि-ति-चउरिंदिय-असण्णि-सण्णी य ।
पज्जत्तापज्जत्ता एवं ते चोद्दसा होंति ॥३४॥

अर्थ: बादर एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञिपंचेन्द्रिय और संज्ञिपंचेन्द्रिय, ये सातों ही पर्याप्तक और अपर्याप्तक रूप होते हैं । इस प्रकार जीवसमासके चौदह भेद होते हैं ॥३४॥ (देखो संदृष्टि सं० १)


इक्कीस भेदोंका निरूपण


चोद्दस पुव्वुट्ठिट्ठा अलब्धिपज्जत्तया य सत्तेव ।
इय एवं इगिवीसा णिद्दिट्ठा जिणवरिंदेहि ॥३५॥

अर्थ: पूर्वोद्दिष्ट चौदह भेद, तथा लब्ध्यपर्याप्तक-सम्बन्धी उपर्युक्त सातों ही भेद, इस प्रकार जीवसमासके ये इक्कीस भेद जिनवरेन्द्रोंने कहे हैं ॥३५॥ (देखो सं० सं० २)


तीस भेदोंका निरूपण


पंच वि थावरकाया बादर-सुहुमा पज्जत्त इयरा य ।
दस चेव तसेसु तहा एवं जाणे हु तीसा य ॥३६॥

अर्थ: पाँचों ही स्थावरकायिकजीव बादर-सूक्ष्म और पर्याप्तक-अपर्याप्तकके भेदसे बीस भेदरूप होते हैं । तथा त्रसजीवोंमें द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञिपंचेन्द्रिय और संज्ञिपंचेन्द्रिय इन पाँचोंके ही पर्याप्तक-अपर्याप्तकके भेदसे दश भेद होते हैं । इस प्रकार स्थावरोंके बीस, त्रसोंके दश ये दोनों मिलकर तीस भेद जानना चाहिये ॥३६॥ (देखो सं० सं० ३)


बत्तीस भेदोंका निरूपण


पुव्वुत्ता वि य तीसा जीवसमासा य होंति णवरं तु ।
सपइट्ठिय दो सहिया जीवसमासेहिं बत्तीसा ॥३७॥

अर्थ: पूर्वोक्त जो तीस जीवसमास हैं, उनमें केवल वनस्पतिकायिक-सम्बन्धी सप्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित ये दो भेद और मिला देनेपर बत्तीस जीवसमास हो जाते हैं ॥३७॥ (देखो सं० सं० ४)


छत्तीस भेदोंका वर्णन


चउ-इयरणिगोएहिं जुआ बत्तीसा य होइ छत्तीसा ।
बादर-सुहुमेहिं तहा पज्जत्ता इयरसंखेहि ॥३८॥

अर्थ: पूर्वोक्त बत्तीस भेदोंमें बादर चतुर्गतिनिगोद पर्याप्तक, बादर चतुर्गतिनिगोद-अपर्याप्तक, बादरनित्यनिगोद पर्याप्तक और बादर नित्यनिगोद-अपर्याप्तक ये सप्रतिष्ठितके चार भेद और मिलानेपर छत्तीस जीवसमास हो जाते हैं ॥३८॥ ( देखो सं० सं० ५ )


अड़तीस भेदोंका वर्णन


पुव्वुत्ता छत्तीसा अड्ढतीसा य सा होइ ।
अपइट्ठिएहिं सहिया दो जीवसमासएहिं च ॥३९॥

अर्थ: पूर्वोक्त छत्तीस भेदोंमें अप्रतिष्ठित वनस्पतिके पर्याप्तक और अपर्याप्तक ये दो जीवसमास और मिला देनेपर अड़तीस जीवसमास हो जाते हैं ॥३९॥ (देखो सं० सं० ६)


अड़तालीस भेदोंका वर्णन


सोलस जीवसमासा अलद्धिपज्जत्तगेसु जे भणिया ।
तेहिं जुआ बत्तीसा अडदालीसा य सा होइ ॥४०॥

अर्थ: लब्ध्यपर्याप्तकोंमें जो पहले सोलह जीवसमास कहे गये हैं, उनसे बत्तीस जीवसमास युक्त करनेपर अड़तालीस भेद हो जाते हैं ॥४०॥ ( देखो सं० सं० ७ )


चौपन भेदोंका वर्णन


अट्ठारसेहिं जुत्ता अलद्धिपज्जत्तएहिं छत्तीसा ।
जीवसमासेहिं तहा चउवण्णा जाण णियमेण ॥४१॥

अर्थ: लब्ध्यपर्याप्तकोंके अठारह जीवसमासोंके साथ पूर्वोक्त छत्तीस जीवसमास युक्त करने पर चौपन भेद हो जाते हैं, ऐसा नियमसे जानना चाहिए ॥४१॥ ( देखो सं० सं० ८ )


सत्तावन भेदोंका वर्णन


उणवीसेहि य जुत्ता अलद्धिपज्जत्तएहिं अडतीसा ।
जीवसमासेहिं तहा सयवण्णा सा य विण्णेया ॥४२॥

अर्थ: लब्ध्यपर्याप्तकोंके उन्नीस जीवसमासोंके साथ पूर्वोक्त अड़तीस जीवसमास युक्त करने पर सत्तावन जीवसमास हो जाते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥४२॥ (देखो सं० सं० ९)


पर्याप्तिप्ररूपणा


जह पुण्णापुण्णाई गिह-घड-वत्थाइयाई दव्वाईं ।
तह पुण्णापुण्णाओ पज्जत्तियरा मुणेयव्वा ॥४३॥

आहारसरीरिंदियपज्जत्ती आणपाणभासमणो ।
चत्तारि पंच छप्पि य इंदिय-वियल-सण्णीणं ॥४४॥

अर्थ (गाथा 43 से 44): जिस प्रकार गृह, घट, वस्त्रादिक अचेतन द्रव्य पूर्ण और अपूर्ण दोनों प्रकारके होते हैं, उसी प्रकार जीव भी पूर्ण और अपूर्ण दोनों प्रकारके होते हैं। पूर्ण जीवोंको पर्याप्त और अपूर्ण जीवोंको अपर्याप्त जानना चाहिए। आहार, शरीर, इन्द्रिय, आनपान (श्वासोच्छ्वास) भाषा और मन ये छह पर्याप्तियाँ होती हैं। इनमेंसे एकेन्द्रियोंके आदिकी चार, विकलेन्द्रियोंके आदिकी पांच और संज्ञी पंचेन्द्रियोंके छहों पर्याप्तियां होती हैं ॥४३-४४॥


प्राणप्ररूपणा


बाहिरपाणेहिं जहा तहेव अब्भंतरेहि पाणेहिं ।
जीवंति जेहिं जीवा पाणा ते होंति बोधव्वौ ॥४५॥

पंचेविंदियपाणा मण-वचि-काएण तिण्णि बलपाणा ।
आणप्पाणप्पाणा आउगपाणेण दस होंति ॥४६॥

अर्थ (गाथा 45 से 46): जिस प्रकार बाह्य प्राणोंके द्वारा जीव जीते हैं, उसी प्रकार जिन आभ्यन्तर प्राणोंके द्वारा जीव जीते हैं, वे प्राण कहलाते हैं, ऐसा जानना चाहिए। स्पर्शन, रसन, घ्राण, नयन और श्रवण ये पाँच इन्द्रियाँ, मनोबल, वचनबल और कायबल ये तीन बल, आयु और आनपान ये दश प्राण होते हैं ॥४५-४६॥


उस्सासो पज्जत्ते सव्वेसिं काय-इंदियाऊणि ।
वचि-पज्जत्ततसाणं चित्तबलं सण्णिपज्जत्ते ॥४७॥

दस सण्णीणं पाणा सेसेगूणंतिमस्स बे ऊणा ।
पज्जत्तेसु दरेसु अ सत्त दुए सेसमेगूणा ॥४८॥

पुण्णेसु सण्णि सव्वे मणरहिया होंति ते दु इतरम्मि ।
सोदक्खिघाणजिब्भारहिया सेसिगिंदिमाऊणा ॥४९॥

पंचक्ख-दुए पाणा मण वचि उस्सास ऊणिया सव्वे ।
कण्णक्खिगंधरसणारहिया सेसेसु ते अपुण्णेसु ॥५०॥

अर्थ (गाथा 47 से 50): कायबल, इन्द्रियाँ और आयु ये प्राण सभी पर्याप्त और अपर्याप्त जीवोंके होते हैं। श्वासोच्छ्वास पर्याप्त स्थावर और त्रसजीवोंके होता है। वचनबल पर्याप्त त्रसजीवोंके, तथा मनोबल संज्ञी पर्याप्त जीवोंके होता है। पर्याप्त संज्ञीपंचेन्द्रियोंके दश प्राण होते हैं। शेष पर्याप्त जीवोंके एक-एक प्राण कम होता है और एकेन्द्रियोंके दो प्राण कम होते हैं। अपर्याप्त संज्ञी और असंज्ञी पंचेन्द्रियोंके सात प्राण होते हैं, और शेष जीवोंके एक-एक प्राण कम होता जाता है। पर्याप्त संज्ञी पंचेन्द्रियोंके पाँचों इन्द्रियाँ, तीनों बल, आयु और आनपान ये दशों प्राण होते हैं। पर्याप्त असंज्ञी पंचेन्द्रियके मन-रहित शेष नौ प्राण होते हैं। पर्याप्त चतुरिन्द्रियके उक्त नौ प्राणोंमेंसे श्रोत्र-रहित शेष आठ प्राण होते हैं। पर्याप्त त्रीन्द्रियके उक्त आठ प्राणोंमेंसे चक्षु-रहित शेष सात प्राण होते हैं। पर्याप्त द्वीन्द्रियके उक्त सात प्राणोंमेंसे घ्राण-रहित शेष छह प्राण होते हैं। पर्याप्त एकेन्द्रियके उक्त छह प्राणोंमेंसे रसनाइन्द्रिय और वचनबल इन दो प्राणोंसे रहित शेष चार प्राण होते हैं। अपर्याप्त पंचेन्द्रिय-द्विकमें मनोबल, वचनबल और श्वासोच्छ्वास इन तीनसे कम शेष सात प्राण होते हैं। अपर्याप्त चतुरिन्द्रियके उक्त सातमें कर्णेन्द्रिय कम करनेपर शेष छह प्राण होते हैं। अपर्याप्त त्रीन्द्रियके उक्त छहमेंसे चक्षुरिन्द्रिय कम करने पर शेष पाँच प्राण होते हैं। अपर्याप्त द्वीन्द्रियके घ्राणेन्द्रिय कम करने पर शेष चार प्राण होते हैं। अपर्याप्त एकेन्द्रियके रसना-रहित शेष तीन प्राण होते हैं। इनको अंकसंदृष्टि मूलमें दी है ॥४७-५०॥


संज्ञाप्ररूपणा


‘इह जाहि बाहिया वि य जीवा पावंति दारुणं दुक्खं ।
सेवंता वि य उभए ताओ चत्तारि सण्णाओ’ ॥५१॥

अर्थ: जिनसे बाधित होकर जीव इस लोकमें दारुण दुःखको पाते हैं और जिनको सेवन करनेसे जीव दोनों ही भवोंमें दारुण दुःखको प्राप्त करते हैं, उन्हें संज्ञा कहते हैं और वे चार होती हैं-आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा और परिग्रहसंज्ञा ॥५१॥


आहारसंज्ञाका स्वरूप


‘आहारदंसणेण य तस्सुवओगेण ऊणकुट्ठेण ।
सादिदुदीरणाए होदि हु आहारसण्णा दु’ ॥५२॥

अर्थ: बहिरंगमें आहारके देखनेसे, उसके उपयोगसे और उदररूप कोठाके खाली होने पर तथा अन्तरंगमें असातावेदनीयकी उदीरणा होने पर आहारसंज्ञा उत्पन्न होती है ॥५२॥


भयसंज्ञाका स्वरूप


‘अह भीमदंसणेण य तस्सुवओगेण ऊणसत्तेण ।
भयकम्मुदीरणाए भयसण्णा जायदे चउहिं ॥५३॥

अर्थ: बहिरङ्गमें अति भयानक रूपके देखनेसे, उसका उपयोग करनेसे और शक्तिकी हीनता होने पर, तथा अन्तरंगमें भयकर्मकी उदीरणा होने पर, इस प्रकार इन चार कारणोंसे भयसंज्ञा उत्पन्न होती है ॥५३॥


पणिदरसभोयणेण य तस्सुवओगेण कुसीलसेवाए ।
वेदस्सुदीरणाए मेहुणसण्णा हवदि एत्थ ॥५४॥

अर्थ: बहिरंगमें गरिष्ठ, स्वादिष्ट और रसयुक्त भोजन करनेसे, पूर्व-भुक्त विषयोंके ध्यान करनेसे, कुशीलका सेवन करनेसे, तथा अन्तरंगमें वेदकर्मकी उदीरणा या तीव्र उदय होनेपर मैथुनसंज्ञा उत्पन्न होती है ॥५४॥


उवयरणदंसणेण य तस्सुवओगेण मुच्छियाए व ।
लोहस्सुदीरणाए परिग्गहं जायदे सण्णा ॥५५॥

अर्थ: बहिरंगमें भोगोपभोगके साधनभूत उपकरणोंके देखनेसे, उनका उपयोग करनेसे, उनमें मूर्च्छाभाव रखनेसे तथा अन्तरंगमें लोभकर्मकी उदीरणा होने पर परिग्रहसंज्ञा उत्पन्न होती है ॥५५॥


मार्गणाप्ररूपणा


जाहि य जासु व जीवा मग्गिज्जंते जहा तहा दिट्ठा ।
ताओ चोद्दस जाणे सुदणाणे मग्गणाओ त्ति ॥५६॥

गइ इंदियं च काए जोए वेए कसाय णाणे य ।
संजम दंसण लेस्सा भव्वा सम्मत्त सण्णि आहारे ॥५७॥

अर्थ (गाथा 56 से 57): जिन-प्रवचन-दृष्ट जीव जिन भावोंके द्वारा, अथवा जिन पर्यायोंमें अनुमार्गण किये जाते हैं, उन्हें मार्गणा कहते हैं। जीवोंका अन्वेषण करनेवाली ऐसी मार्गणाएँ श्रुतज्ञानमें चौदह कही गई हैं, ऐसा जानना चाहिए। वे चौदह मार्गणाएँ इस प्रकार हैं- १, गतिमार्गणा, २ इन्द्रियमार्गणा, ३ कायमार्गणा, ४ योगमार्गणा, ५ वेदमार्गणा, ६ कषायमार्गणा, ७ ज्ञानमार्गणा, ८ संयममार्गणा, ९ दर्शनमार्गणा, १० लेश्यामार्गणा, ११ भव्यमार्गणा, १२ सम्यक्त्वमार्गणा, १३ संज्ञिमार्गणा और १४ आहारमार्गणा ॥५६-५७॥


मणुया य अपज्जत्ता वेउव्वियमिस्सऽहारया दोण्णि ।
सुहुमो सासणमिस्सो उवसमसम्मो य संतग अट्ठ ॥५८॥

अर्थ: अपर्याप्त मनुष्य, वैक्रियिकमिश्रयोग, दोनों आहारक अर्थात् आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोग, सूक्ष्मसाम्परायचारित्र, सासादनसम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और उपशमसम्यक्त्व ये आठ सान्तर मार्गणा होती हैं ॥५८॥ इनमेंसे गतिमार्गणामें एक, योगमार्गणामें तीन, संयममार्गणामें सूक्ष्मसाम्परायचारित्र तथा सम्यक्त्वमार्गणामें अन्तिम तीन, इस प्रकार आठ सान्तर मार्गणाएँ जानना चाहिए ।


गइकम्मविणिव्वत्ता जा चेट्ठा सा गई मुणेयव्वा ।
जीवा हु चाउरंगं गच्छंति हु सा गई होई ॥५६॥

अर्थ: गतिनामा नामकर्मसे उत्पन्न होनेवाली जो चेष्टा या क्रिया होती है उसे गति जानना चाहिए। अथवा जिसके द्वारा जीव नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव इन चारों गतियोंमें गमन करते हैं, वह गति कहलाती है ॥५६॥


ण रमंति जदो णिच्चं दव्वे खेत्ते य काल भावे य ।
अण्णोण्णं पि य णिच्चं तम्हा ते णारया भणिया ॥६०॥

अर्थ: यतः तत्स्थानवर्ती द्रव्यमें, क्षेत्रमें, कालमें और भावमें जो जीव रमते नहीं हैं, तथा परस्परमें भी जो कभी भी प्रीतिको प्राप्त नहीं होते हैं, अतएव वे नारक या नारकी कहे जाते हैं ॥६०॥


तिरियंति कुडिलभावं विगयसुसण्णा णिकट्ठमण्णाणा ।
अच्चंतपावबहुला तम्हा ते तिरिक्खिया भणिया ॥६१॥

अर्थ: यतः जो सदा कुटिलभावका आचरण करते हैं, उत्कट संज्ञाओंके धारक हैं, निकृष्ट एवं अज्ञानी हैं, अत्यन्त पाप-बहुल हैं, अतः वे तिर्यञ्च कहे जाते हैं ॥६१॥


मणंति जदो णिच्चं मणेण णिउणा जदो दु जे जीवा ।
मणुउक्कडा य जम्हा तम्हा ते माणुसा भणिया ॥६२॥

अर्थ: यतः जो मनके द्वारा नित्य ही हेय-उपादेय, तत्त्व-अतत्त्व और धर्म-अधर्मका विचार करते हैं, कार्य करनेमें निपुण हैं, मनसे उत्कृष्ट हैं, अर्थात् उत्कृष्ट मनके धारक हैं, और युगके आदिमें मनुओंसे उत्पन्न हुए हैं, अतएव वे मनुष्य कहलाते हैं ॥६२॥


कीडंति जदो णिच्चं गुणेहिं अट्ठेहिं दिव्वभावेहिं ।
भासंतदिव्वकाया तम्हा ते वण्णिया देवा ॥६३॥

अर्थ: जो दिव्यभाव-युक्त अणिमादि आठ गुणोंसे नित्य क्रीड़ा करते रहते हैं और जिनका प्रकाशमान दिव्य शरीर है, वे देव कहे गये हैं ॥६३॥


जाइ-जरा-मरण-भया संजोय-विजोय-दुक्ख-सण्णाओ ।
रोगादिया य जिस्से ण होंति सा होइ सिद्धिगई ॥६४॥

अर्थ: जहाँ पर जन्म, जरा, मरण, भय, संयोग, वियोग, दुःख, संज्ञा और रोगादिक नहीं होते हैं, वह सिद्धगति कहलाती है ॥६४॥


अहमिंदा जह देवा अविसेसं अहमहं ति मण्णंता ।
ईसंति एकमेकं इंदा इव इंदियं जाणे ॥६५॥

अर्थ: जिस प्रकार अहमिन्द्रदेव बिना किसी विशेषताके ‘मैं इन्द्र हूँ, मैं इन्द्र हूँ’ इस प्रकार मानते हुए ऐश्वर्यका स्वतन्त्ररूपसे अनुभव करते हैं उसी प्रकार इन्द्रियोंको जानना चाहिए। अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय अपने-अपने विषयके सेवन करनेमें स्वतन्त्र है ॥६५॥


जवणालिया-मसूरी-चंदद्ध-अहुमुत्तफुलतुल्लाइं ।
इंदियसंठाणाई फासं पुण णेगसंठाणं ॥६६॥

अर्थ: श्रोत्रेन्द्रियका आकार यव-नालीके समान, चक्षुरिन्द्रियका मसूरके समान, रसनेन्द्रियका अर्ध-चन्द्रके समान और घ्राणेन्द्रियका अतिमुक्तक पुष्प अर्थात् कदम्बके फूलके समान है। किन्तु स्पर्शनेन्द्रिय अनेक आकारवाली है ॥६६॥


एइंदियस्स फुसणं एकं चिय होइ सेसजीवाणं ।
एयाहिया य तत्तो जिब्हाघाणक्खिसोत्ताईं ॥६७॥

अर्थ: एकेन्द्रिय जीवके एक स्पर्शन-इन्द्रिय ही होती है। शेष जीवोंके क्रमसे जिह्वा, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये एक-एक इन्द्रिय अधिक होती हैं ॥६७॥


पुट्ठं सुणेइ सद्दं अपुट्ठं पुण वि पस्सदे रूवं ।
फासं रसं च गंधं बद्धं पुट्ठं वियाणेइ ॥६८॥

अर्थ: श्रोत्रेन्द्रिय स्पृष्ट शब्दको सुनती है। चक्षुरिन्द्रिय अस्पृष्ट रूपको देखती है। स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय और घ्राणेन्द्रिय क्रमशः बद्ध और स्पृष्ट, स्पर्श, रस और गन्धको जानती हैं ॥६८॥


जाणइ पासइ भुंजइ सेवह फरसिंदिएण एक्केण ।
कुणइ य तस्सामित्तं थावर एइंदियो तेण ॥६९॥

अर्थ: स्थावरजीव एक स्पर्शनेन्द्रियके द्वारा ही अपने विषयको जानता है, देखता है, भोगता है, सेवन करता है और उसका स्वामित्व करता है इसलिए वह एकेन्द्रिय कहलाता है ॥६९॥


चुल्ला वराड संखा अक्खुण्ड अरिट्ठगा य गंडोला ।
कुक्खिकिमी सिप्पिआई णेया बेइंदिया जीवा ॥७०॥

अर्थ: चुल्लक अर्थात् छोटी कौड़ी, बड़ी कौड़ी, शंख, अक्ष, अरिष्टक, गंडोला, कुक्षि-कृमि अर्थात् पेटके कीड़े और सीप आदि द्वीन्द्रिय जीव जानना चाहिए ॥७०॥


कुंथु पिपीलय मंकुण विच्छिय जूंविंदगोव गोम्ही य ।
उत्तिंगमट्टियाई णेया तेइंदिया जीवा ॥७१॥

अर्थ: कुंथु (चींटी) पिपीलक (चींटा) मत्कुण (खटमल) बिच्छू, जूँ, इन्द्रगोप, (बीर-बहूटी) गोम्ही (कनखजूरा), उत्तिंग (अन्नकीट) और मृद्-मक्षी दीमक आदि त्रीन्द्रिय जीव जानना चाहिए ॥७१॥


दंसमसगो य मक्खिय गोमच्छिय भमर कीड मकडया ।
सलह पयंगाईया णेया चउरिंदिया जीवा ॥७२॥

अर्थ: दंश-मशक (डांस, मच्छर) मक्खी, मधुमक्खी, भ्रमर, कीट, मकड़ी, शलभ, पतंग आदि चतुरिन्द्रिय जीव जानना चाहिए ॥७२॥


अंडज पोदज जरजा रसजा संसेदिमा य सम्मुच्छा ।
उब्भिंदिमोववादिय णेया पंचेंदिया जीवा ॥७३॥

अर्थ: अंडज, पोतज, जरायुज, रसज, स्वेदज, सम्मूर्च्छिम, उद्भेदिम, और औपपादिक जीवोंको पंचेन्द्रिय जानना चाहिए ॥७३॥


ण य इंदियकरणजुआ अवगहाईहिं गाहया अत्थे ।
णेव य इंदियसुक्खा अणिंदियाणंतणाणसुहा ॥७४॥

अर्थ: जो इन्द्रियोंके व्यापारसे युक्त नहीं हैं, अवग्रहादिके द्वारा भी पदार्थोंके ग्राहक नहीं हैं और जिनके इन्द्रिय-सुख भी नहीं हैं, ऐसे अतीन्द्रिय अनन्त ज्ञान और सुखवाले जीवोंको इन्द्रियातीत सिद्ध जानना चाहिये ॥७४॥


अप्पप्पवुत्तिसंचियपुग्गलपिंडं वियाण काओ त्ति ।
सो जिणमयम्हि भणिओ पुढवीकायाइयो छह्ढा ॥७५॥

अर्थ: योगरूप आत्माकी प्रवृत्तिसे संचयको प्राप्त हुए औदारिकादिरूप पुद्गलपिंडको काय जानना चाहिये । वह काय जिनमतमें पृथिवीकाय आदिके भेदसे छह प्रकारका कहा गया है ॥७५॥


जह भारवहो पुरिसो वहइ भरं गिण्हिऊण काउडियं ।
एमेव वहइ जीवो कम्मभरं कायकाउडियं ॥७६॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई भारको ढोनेवाला पुरुष कावडिकाको लेकर भारको वहन करता है, इसी प्रकार यह जीव कायरूपी कावडिकाको ग्रहण करके कर्मरूपी भारको वहन करता है ॥७६॥


पृथिवीकायिक जीवोंके भेद


पुढवी य सक्करा वालुया य उवले सिलाइ छत्तीस ।
पुढवीमया हु जीवा णिद्दिट्ठा जिणवरिंदेहिं ॥७७॥

अर्थ: पृथिवी, शर्करा, वालुका, उपल, शिला आदिके भेदसे छत्तीस प्रकारके पृथिवीमय अर्थात् पृथिवीकायिक जीव जिनवरेन्दोंने निर्दिष्ट किये हैं ॥७७॥


जलकायिक जीवोंके भेद


ओसा य हिमिय महिया हरदणु सुद्धोदयं घणुदयं च ।
एदे दु आउकाया जीवा जिणसासणे दिट्ठा ॥७८॥

अर्थ: ओस, हिमिका (बर्फ), महिका (कुहरा), हरदणु, (हरे तृण आदिके ऊपर अवस्थित जलबिन्दु) शुद्धोदक (चन्द्रकान्त, मणिसे उत्पन्न शुद्ध जल) घनोदक (स्थूल सघन जल) इत्यादि आकायिक (जलकायिक) जीव जिनशासनमें कहे गये हैं ॥७८॥


अग्निकायिक जीवोंके भेद


इंगाल जाल अच्ची मुम्मुर सुद्धागणी य अगणी य ।
अण्णेवि एवमाई तेउकाया समुद्दिठ्ठा ॥७९॥

अर्थ: अंगार, ज्वाला, अर्चि (अग्निकिरण), मुर्मुर (निर्धूम और ऊपर राखसे ढँकी हुई अग्नि) शुद्ध-अग्नि (बिजली और सूर्यकान्तमणिसे उत्पन्न अग्नि) और धूमवाली अग्नि इत्यादि अन्य अनेक प्रकारके तेजस्कायिक जीव कहे गये हैं ॥७६॥


वाउब्भामो उक्कलि मंडलि गुंजा महाघण तणू य ।
एदे दु वाउकाया जीवा जिणसासणे दिट्ठा ॥८०॥

अर्थ: सामान्य वायु, बद्धभ्राम (ऊर्ध्व भ्रमणशील) वायु, उत्कलिका (अधोभ्रमणशील और तिर्यक् बहनेवाली), मण्डलिका (गोलरूपसे बहनेवाली वायु), गुंजा (गुंजायमान वायु), महावात (वृक्षादिकको गिरा देनेवाली वायु), घनवात और तनुवात इत्यादिक अनेक प्रकारके वायुकायिक जीव जिनशासनमें कहे गये हैं ॥८०॥


मूलगपोरवीया कंदा तह खंध बीय बीयरुहा ।
सम्मुच्छिमा य भणिया पत्तेयाणंतकाया य ॥८१॥

अर्थ: मूलबीज, अग्रबीज, पर्वबीज, कन्दबीज, स्कन्धबीज, बीजरुह और सम्मूर्च्छिम, ये नाना प्रकारके प्रत्येक और अनन्तकाय (साधारण) वनस्पतिकायिक जीव कहे गये हैं ॥८१॥


साहारणमाहारो साहारण आणपाणगहणं च ।
साहारणजीवाणं साहारणलक्खणं भणियं ॥८२॥

अर्थ: साधारण अर्थात् अनन्तकायिक वनस्पति जीवोंका साधारण अर्थात् समान ही आहार होता है और साधारण ही श्वास-उच्छ्वासका ग्रहण होता है, इस प्रकार साधारण जीवोंका साधारण लक्षण कहा गया है ॥८२॥


जत्थेक मरइ जीवो तत्थ दु मरणं हवे अणंताणं ।
चक्कमइ जत्थ एको तत्थक्कमणं अणंताणं ॥८३॥

अर्थ: साधारण जीवोंमें जहाँ एक मरता है, वहाँ उसी समय अनन्त जीवोंका मरण होता है और जहाँ एक जन्म धारण करता है, वहाँ अनन्त जीवोंका जन्म होता है ॥८३॥


एयणिओयसरीरे जीवा दव्वप्पमाणदो दिट्ठा ।
सिद्धेहि अणंतगुणा सव्वेण विदीदकालेण ॥८४॥

अर्थ: एक निगोदिया जीवके शरीरमें द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा सिद्धोंसे और सर्वव्यतीत कालसे अनन्तगुणित जीव सर्वदर्शियोंके द्वारा देखे गये हैं ॥८४॥


अत्थि अणंता जीवा जेहिं ण पत्तो तसत्तपरिणामो ।
भावकलंकसुपउरा णिगोयवासं ण मुंचंति ॥८५॥

अर्थ: नित्य निगोदमें ऐसे अनन्तानन्त जीव हैं, जिन्होंने त्रस जीवोंकी पर्याय आजतक भी नहीं पाई है और जो प्रचुर कलंकित भावोंसे युक्त होनेके कारण निगोदवासको कभी भी नहीं छोड़ते ॥८५॥


विहिं तिहिं चउहिं पंचहिं सहिया जे इंदिएहिं लोयम्हि ।
ते तसकाया जीवा णेया वीरोवएसेणं ॥८६॥

अर्थ: लोकमें जो दो इन्द्रियोंसे, तीन इन्द्रियोंसे, चार इन्द्रियोंसे और पाँच इन्द्रियोंसे सहित जीव दिखाई देते हैं, उन्हें वीर भगवान्‌के उपदेशसे त्रसकायिक जीव जानना चाहिए ॥८६॥


जह कंचणमग्गिमयं मुच्चइ किट्टेण कलियाए य ।
तह कायबंधमुक्का अकाइया झाणजोएण ॥८७॥

अर्थ: जिस प्रकार अग्निमें दिया गया सुवर्ण किट्टिका ( बहिरंगमल ) और कालिमा ( अन्तरंगमल ) इन दोनों प्रकारके मलोंसे रहित हो जाता है, उसी प्रकार ध्यानके योगसे शुद्ध हुए और कायके बन्धनसे मुक्त हुए जीव अकायिक जानना चाहिए ॥८७॥


मणसा वाया काएण वा वि जुत्तस्स विरियपरिणामो ।
जीवस्स प्पणिओगो जोगो त्ति जिणेहिं णिद्दिष्ट्ठो ॥८८॥

अर्थ: मन, वचन और कायसे युक्त जीवका जो वीर्य-परिणाम अथवा प्रदेश-परिस्पन्द रूप प्रणियोग होता है, उसे योग कहते हैं, ऐसा जिनेन्द्र भगवान्‌ने कहा है ॥८८॥


सब्भावो सच्चमणो जो जोगो सो दु सच्चमणजोगो ।
तव्विवरीओ मोसो जाणुभयं सच्चमोस त्ति ॥८९॥

अर्थ: सद्भाव अर्थात् समीचीन पदार्थके विषय करनेवाले मनको सत्य मन कहते हैं और उसके द्वारा जो योग होता है, उसे सत्यमनोयोग कहते हैं। इससे विपरीत योगको मृषामनोयोग कहते हैं। सत्य और मृषारूप योगको सत्यमृषामनोयोग कहते हैं ॥८९॥


ण य सच्चमोसजुत्तो जो हु मणो सो असच्चमोसमणो ।
जो जोगो तेण हवे असच्चमोसो दु मणजोगो ॥९०॥

अर्थ: जो मन न तो सत्य हो और न मृषा हो, उसे असत्यमृषामन कहते हैं । उस असत्यमृषामनके द्वारा जो योग होता है, उसे असत्यमृषामनोयोग कहते हैं ॥६०॥


दसविहसच्चे वयणे जो जोगो सो दु सच्चवचिजोगो ।
तव्विवरीओ मोसो जाणुभयं सच्चमोस त्ति ॥९१॥


जो णेव सच्चमोसो तं जाण असच्चमोसवचिजोगो ।
अमणाणं जा भासा सण्णीणामंतणीयादी ॥९२॥

अर्थ: दश प्रकारके सत्य वचनमें वचनवर्गणाके निमित्तसे जो योग होता है उसे सत्यवचनयोग कहते हैं । इससे विपरीत योगको मृषावचनयोग कहते हैं । सत्य और मृषा वचनरूप योगको उभयवचनयोग कहते हैं । जो वचनयोग न तो सत्यरूप हो और न मृषारूप ही हो, उसे असत्यमृषावचनयोग कहते हैं । असंज्ञी जीवोंकी जो अनक्षररूप भाषा है और संज्ञी जीवोंकी जो आमंत्रणी आदि भाषाएँ हैं, उन्हें अनुभय भाषा जानना चाहिए ॥६१-६२॥


‘पुरु महमुदारुरालं एयट्ठ’ तं बियाण तम्हि भवं ।
ओरालयि त्ति वुत्तं ओरालयिकायजोगो सो ॥९३॥

अर्थ: पुरु, महत्, उदार और उराल ये सब शब्द एकार्थ-वाचक हैं। उदार या स्थूलमें जो उत्पन्न हो, उसे औदारिक जानना चाहिए। (यहाँ पर भव-अर्थमें ठण् प्रत्यय हुआ है।) उदारमें होने वाला जो काययोग है, वह औदारिककाययोग कहलाता है। अर्थात् मनुष्य और तिर्यंचोंके स्थूल शरीरमें जो योग होता है, उसे औदारिककाययोग कहते हैं ॥६३॥


अंतोमुहुत्तमब्भं वियाण मिस्सं च अपरिपुण्णो त्ति ।
जो तेण संपओगो ओरालियमिस्सकायजोगो सो ॥९४॥

अर्थ: औदारिकशरीरकी उत्पत्ति प्रारम्भ होनेके प्रथम समयसे लगाकर अन्तर्मुहूर्त तक मध्यवर्ती कालमें जो अपरिपूर्ण शरीर है, उसे औदारिकमिश्र जानना चाहिए। उसके द्वारा होनेवाला जो संप्रयोग है, वह औदारिकमिश्र काययोग कहलाता है। अर्थात् शरीरपर्याप्ति पूर्ण होनेसे पूर्व कार्मणशरीरकी सहायतासे उत्पन्न होनेवाले औदारिककाययोगको औदारिकमिश्रकाययोग कहते हैं ॥६४॥


विविहगुणइड्ढिजुत्तं वेउव्वियमहव विकिरियं चेव ।
तिस्से भवं च गेयं वेउव्वियकायजोगो सो ॥९५॥

अर्थ: विविध गुण और ऋद्धियोंसे युक्त, अथवा विशिष्ट क्रियावाले शरीरको वैक्रियिक कहते हैं। उसमें उत्पन्न होनेवाला जो योग है, उसे वैक्रियिककाययोग जानना चाहिए ॥६५॥


अंतोमुहुत्तमज्झं वियाण मिस्सं च अपरिपुण्णो त्ति ।
जो तेण संपओगो वेउव्वियमिस्सकायजोगो सो ॥९६॥

अर्थ: वैक्रियिकशरीरकी उत्पत्ति प्रारम्भ होनेके प्रथम समयसे लगाकर शरीरपर्याप्ति पूर्ण होने तक अन्तर्मुहूर्तके मध्यवर्ती अपरिपूर्ण शरीरको वैक्रियिकमिश्रकाय कहते हैं। उसके द्वारा होनेवाला संप्रयोग वैक्रियिकमिश्रकाययोग कहलाता है। अर्थात् देव-नारकियोंके उत्पन्न होनेके प्रथम समयसे लेकर शरीरपर्याप्ति पूर्ण होने तक कार्मणशरीरकी सहायतासे उत्पन्न होनेवाले वैक्रियिककाययोगको वैक्रियिकमिश्रकाययोग कहते हैं ॥६६॥


आहरइ अणेण मुणी सुहुमे अठ्ठे सयस्स संदेहे ।
गत्ता केवलिपासं तम्हा आहारकायजोगो सो ॥९७॥

अर्थ: स्वयं सूक्ष्म अर्थमें सन्देह उत्पन्न होनेपर मुनि जिसके द्वारा केवलि-भगवान्के पास जाकर अपने सन्देहको दूर करता है, उसे आहारक काय कहते हैं। उसके द्वारा उत्पन्न होनेवाले योगको आहारककाययोग कहते हैं ॥६७॥


अंतोमुहुत्तमज्झं वियाण मिस्सं च अपरिपुण्णो त्ति ।
जो तेण संपओगो आहारयमिस्सकायजोगो सो ॥९८॥

अर्थ: आहारकशरीरकी उत्पत्ति प्रारम्भ होनेके प्रथम समयसे लगाकर शरीरपर्याप्ति पूर्ण होने तक अन्तर्मुहूर्तके मध्यवर्ती अपरिपूर्ण शरीरको आहारकमिश्रकाय कहते हैं। उसके द्वारा जो योग उत्पन्न होता है वह आहारकमिश्रकाययोग कहलाता है ॥६८॥


कम्मेय य कम्मइयं कम्मभवं तेण जो दु संजोगो ।
कम्मइयकायजोगो एय-विय-तियगेसु समएसु ॥९९॥

अर्थ: कर्मोंके समूहको, अथवा कार्मणशरीर नामकर्मके उदयसे उत्पन्न होनेवाले कायको कार्मण-काय कहते हैं और उसके द्वारा होनेवाले योगको कार्मणकाययोग कहते हैं। यह योग विग्रहगतिमें अथवा केवलिसमुद्घातमें एक, दो अथवा तीन समय तक होता है ॥६९॥


जेसिं ण संति जोगा सुहासुहा पुण्णपापसंजणया ।
ते होंति अजोगिज्जिणा अणोवमाणंतगुणकलिया ॥१००॥

अर्थ: जिनके पुण्य और पापके संजनक अर्थात् उत्पन्न करनेवाले शुभ और अशुभ योग नहीं होते हैं, वे अयोगिजिन कहलाते हैं, जो कि अनुपम और अनन्त गुणोंसे सहित होते हैं ॥१००॥


वेदस्सुदीरणाए बालत्तं पुण णियच्छदे बहुसो ।
इत्थी पुरिस णउंसय वेयंति तदो हवदि वेदो ॥१०१॥

अर्थ: वेदकर्मकी उदीरणा होनेपर यह जीव नाना प्रकारके बालभाव अर्थात् चांचल्यको प्राप्त होता है और स्त्रीभाव, पुरुषभाव एवं नपुंसक भावका वेदन करता है, अतएव वेदकर्मके उदयसे होनेवाले भावको वेद कहते हैं ॥१०१॥


तिव्वेद एव सव्वे वि जीवा दिट्ठा हु दव्व-भावदो ।
ते चेव हु विवरीया संभवंति जहाकमं सव्वे ॥१०२॥

अर्थ: द्रव्य और भावकी अपेक्षा सर्व ही जीव तीनों वेदवाले दिखाई देते हैं और इसी कारण वे सर्व ही यथाक्रमसे विपरीत वेदवाले भी सम्भव हैं ॥१०२॥


उदयादु णोकसायाण भाववेदो य होइ जंतूणं ।
जोणी य लिंगमाई णामोदय दव्ववेदो दु ॥१०३॥

अर्थ: नोकषायोंके उदयसे जीवोंके भाववेद होता है तथा योनि, लिंग आदि द्रव्यवेद नामकर्मके उदयसे होता है ॥१०३॥


इत्थी पुरिस णउंसय वेया खलु दव्व-भावदो होंति ।
ते चेव य विवरीया हवंति सव्वे जहाकमसो ॥१०४॥

अर्थ: स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद ये तीनों ही वेद निश्चयसे द्रव्य और भावकी अपेक्षा दो प्रकारके होते हैं और वे सर्व ही विभिन्न नोकषायोंके उदय होनेपर यथाक्रमसे विपरीत भी परिणत होते हैं ॥१०४॥


'छादयदि सयं दोसेण जदो छादयदि परं पि दोसेण ।
णियमेण सहावं तम्हा सा *वण्णिया इत्थी ॥१०५॥

अर्थ: जो मिथ्यात्व आदि दोषसे अपने आपको आच्छादित करे और मधुर-भाषणादिके द्वारा दूसरेको भी आच्छादित करे, वह निश्चयसे यतः आच्छादन स्वभाववाली है अतः ‘स्त्री’ इस नामसे वर्णित की गई है ॥१०५॥


२पुरु गुण भोगे सेदे करेदि लोयम्हि पुरुगुणं कम्मं ।
पुरु + उत्तमो य जम्हा तम्हा सो वण्णिओ पुरिसो२ ॥१०६॥

अर्थ: जो उत्तम गुण और उत्कृष्ट भोगमें शयन करता है, लोकमें उत्तम गुण और कर्मको करता है, अथवा यतः जो स्वयं उत्तम है, अतः वह ‘पुरुष’ इस नामसे वर्णित किया गया है ॥१०६॥ जो क्रोधादिक जीवके सुख-दुःखरूप बहुत प्रकारके धान्यको उत्पन्न करनेवाले कर्मरूप खेत को कर्षित करते हैं, अर्थात् जोतते हैं और जिनके लिए संसारकी चारों गतियाँ मर्यादा या मेंढ़-रूप हैं, इसलिए उन्हें कषाय कहते हैं ॥१०६॥


३णेवित्थी ण य पुरिसो णउंसओ उभयलिंगवदिरित्तो ।
इट्ठावग्गिसमाणो वेदणगरुओ कलुसचित्तो३ ॥१०७॥

अर्थ: जो भावसे न स्त्रीरूप है और न पुरुषरूप है, तथा द्रव्यकी अपेक्षा जो स्त्रीलिंग और पुरुषलिंगसे रहित है, ईंटोंको पकानेवाली अग्निके समान वेदकी प्रबल वेदनासे युक्त है, और सदा कलुषित-चित्त है, उसे नपुंसकवेद जानना चाहिए ॥१०७॥


४करिसतणेट्ठा१वग्गीसरिसपरिणामवेदणुम्मुक्का ।
अवगयवेदा जीवा सयसंभव×णंतवरसोक्खा४ ॥१०८॥

अर्थ: जो करीष अर्थात् कंडेकी अग्नि, तृणकी अग्नि और इष्टपाककी अग्निके समान क्रमशः स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेदरूप परिणामोंके वेदनसे उन्मुक्त हैं और अपनी आत्मामें उत्पन्न हुए श्रेष्ठ अनन्त सुखके धारक या भोक्ता हैं, वे जीव अपगतवेदी कहलाते हैं ॥१०८॥


५सुह-दुक्खं बहुसस्सं कम्मक्खित्तं कसेइ जीवस्स ।
संसारगदी +मेरं तेण कसाओ त्ति णं विंति५ ॥१०९॥


'सम्मत्त-देससंजम-संसुद्धीघाइकसई पढमाईं ।
तेसिं तु भवे नासे सद्धाई चउण्हं +उप्पत्ती ॥११०॥

अर्थ: प्रथमादि अर्थात् अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन कषाय क्रमशः सम्यक्त्व, देशसंयम, संकलसंयम और पूर्ण शुद्धिरूप यथाख्यातचारित्रका घात करते हैं। किन्तु उनके नाश होनेपर आत्मामें श्रद्धा अर्थात् सम्यक्त्व आदिक चारों गुणोंकी उत्पत्ति होती है ॥११०॥


²सिलमेय पुढविभेया धूलीराई य उदयराइसमा ।
‡णिर-तिरि-णर-देवत्तं उविंति जीवा हु कोहवसा ॥१११॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धी क्रोध शिलाभेदके समान है, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध पृथ्वीभेदके समान है, प्रत्याख्यानावरण क्रोध धूलिराजिके समान है और संज्वलनक्रोध उदक अर्थात् जलराजिके समान है। इन चारों जातिके क्रोधके वशसे जीव क्रमशः नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगतिको प्राप्त होते हैं ॥१११॥


³सेलसमो अट्ठिसमो दारुसमो तह य जाण वेत्तसमो ।
× णिर-तिरि-णर-देवत्तं उविंति जीवा हु माणवसा ॥११२॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धी मान शैल-समान है, अप्रत्याख्यानावरण मान अस्थि-समान है, प्रत्याख्यानावरण मान दारु अर्थात् काष्ठके समान है और संज्वलन मान वेत्र (बेंत) के समान है। इन चारों जातिके मानके वशसे जीव क्रमशः नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥११२॥


⁴बंसीमूलं मेसस्स सिंग गोमुत्तियं च खोरुप्पं ।
+णिर-तिरि-णर-देवत्तं उविंति जीवा हु मायवसा ॥११३॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धी माया बाँसकी जड़के समान है, अप्रत्याख्यानावरण माया मेढ़ाके सींगके समान है, प्रत्याख्यानावरण माया गोमूत्रके समान है और संज्वलन माया खुरपाके समान है। इन चारों ही जातिके मायाके वशसे जीव क्रमशः नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य और देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥११३॥


⁵किमिराय चकमल कद्दमो य तह चेय÷ जाण हारिद्दं ।
※णिर-तिरि-णर-देवत्तं उविंति जीवा हु लोहवसा ॥११४॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धीलोभ किरमिजी रंगके समान है, अप्रत्याख्यानावरणलोभ चक्र अर्थात् गाड़ीके पहियेके मलके समान है, प्रत्याख्यानावरणलोभ कर्दम अर्थात् कीचड़के समान है और संज्वलन लोभको हल्दीके रंगके समान जानना चाहिए । इन चारों ही जातिके लोभके वशसे जीव क्रमशः नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य और देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥११४॥


पढमो दंसणघाई विदिओ तह घाइ देसविरइं त्ति ।
तइओ संजमघाई चउत्थो जहक्खायघाइया ॥११५॥

अर्थ: प्रथम अनन्तानुबन्धी कषाय सम्यग्दर्शनका घात करती है, द्वितीय अप्रत्याख्यानावरण कषाय देशविरतिकी घातक है । तृतीय प्रत्याख्यानावरण कषाय सकलसंयमकी घातक है और चतुर्थ संज्वलन कषाय यथाख्यातचारित्रकी घातक है ॥११५॥


अप्पपरोभयवाहणबंधासंजमणिमित्तकोहाई ।
जेसिं णत्थि कसाया अमला अकसाइणो जीवा ॥११६॥

अर्थ: जिनके अपने आपको, परको और उभयको बाधा देने, बन्ध करने और असंयमके आचरणमें निमित्तभूत क्रोधादि कषाय नहीं हैं, तथा जो बाह्य और आभ्यन्तर मलसे रहित हैं, ऐसे जीवोंको अकषाय जानना चाहिए ॥११६॥


जाणइ त्तिकालसहिए दव्व-गुण-पज्जए बहुब्भेए ।
पच्चक्खं च परोक्खं अणेण णाणं त्ति णं विंति ॥११७॥

अर्थ: जिसके द्वारा जीव त्रिकाल-विषयक सर्व द्रव्य, उनके समस्त गुण और उनकी बहुत भेदवाली पर्यायोंको प्रत्यक्ष और परोक्ष रूपसे जानता है, उसे निश्चयसे ज्ञानी जन ज्ञान कहते हैं ॥११७॥


विस-जंत-कूड-पंजर-बंधादिसु अणुवदेसकरणेण ।
जा खलु पवत्तइ मई मइअण्णाणं त्ति णं विंति ॥११८॥

अर्थ: परोपदेशके बिना जो विष, यन्त्र, कूट, पंजर तथा बन्ध आदिके विषयमें बुद्धि प्रवृत्त होती है, उसे ज्ञानी जन मत्यज्ञान कहते हैं ॥११८॥


श्रुताज्ञानका स्वरूप


‘आभीयमासुरक्खा भारह-रामायणादि-उवएसा ।
तुच्छा असाहणीया सुयअण्णाणं त्ति णं* विंति’ ॥११९॥

अर्थ: चौरशास्त्र, हिंसाशास्त्र तथा महाभारत, रामायण आदिके तुच्छ और परमार्थ-शून्य होनेसे साधन करनेके अयोग्य उपदेशोंको ऋषिगण श्रुताज्ञान कहते हैं ॥११९॥


कुअवधि या विभंगज्ञानका स्वरूप


२विवरीयओहिणाणं खओवसमियं च कम्मबीजं च ।
वेभंगो त्ति य वुच्चइ समत्तणाणीहिं समयम्हि३ ॥१२०॥

अर्थ: जो क्षायोपशमिक अवधिज्ञान मिथ्यात्वसे संयुक्त होनेके कारण विपरीत स्वरूप है, और नवीन कर्मका बीज है, उसे समाप्त अर्थात् जिनका ज्ञान सम्पूर्णताको प्राप्त है ऐसे ज्ञानियोंके द्वारा उपदिष्ट आगममें कुअवधि या विभंगज्ञान कहा है ॥१२०॥


आभिनिबोधिक या मतिज्ञानका स्वरूप


३अहिमुहणियमियबोहणमाभिणिबोहियमणिंदि-इंदियजं ।
वहुउग्गहाइणा खलु कयछत्तीसा तिसयभेयं४ ॥१२१॥

अर्थ: अनिन्द्रिय अर्थात् मन और इन्द्रियोंकी सहायतासे उत्पन्न होनेवाले, अभिमुख और नियमित पदार्थके बोधको आभिनिबोधिक ज्ञान कहते हैं । उसके बहु आदिक बारह प्रकारके पदार्थोंकी और अवग्रह आदिकी अपेक्षा तीन सौ छत्तीस भेद होते हैं ॥१२१॥


श्रुतज्ञानका स्वरूप


४अत्थाओ अत्थंतरउवलंभे तं भणंति सुयणाणं ।
आहिणियोहियपुव्वं णियमेण य सद्दयं मूलं५ ॥१२२॥

अर्थ: मतिज्ञानसे जाने हुए पदार्थके अवलम्बनसे तत्सम्बन्धी दूसरे पदार्थका जो उपलब्ध अर्थात् ज्ञान होता है, उसे श्रुतज्ञान कहते हैं । यह ज्ञान नियमसे आभिनिबोधिकज्ञान-पूर्वक होता है । ( इसके अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक अथवा शब्दजन्य और लिंगजन्य, इस प्रकार दो भेद हैं) । उनमें अक्षरात्मक श्रुतज्ञानका मूल कारण शब्द-समूह है ॥१२२॥


अवधिज्ञानका स्वरूप


५अवहीयदि चि ओही सीमाणाणेत्ति वण्णियं समए ।
भव-गुणपच्चयविहियं तमोहिणाण त्ति †णं विंति’ ॥१२३॥

अर्थ: जो द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा अवधि अर्थात् सीमासे युक्त अपने विषयभूत पदार्थको जाने, उसे अवधिज्ञान कहते हैं, सीमासे युक्त जाननेके कारण परमागममें इसे सीमाज्ञान कहा है। यह भवप्रत्यय और गुणप्रत्ययके द्वारा उत्पन्न होता है, ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं ॥१२३॥


अवधिज्ञानके भेदोंका वर्णन


'अणुगो अणाणुगामी × तेत्तियमेत्तो य अप्पबहुगोऽयं ।
वड्ढंतहीयमाणो ओही जाणेहि छव्विहो ॥१२४॥

अर्थ: अनुगामी, अननुगामी, तावन्मात्र अर्थात् अवस्थित, अल्प-बहुत अर्थात् अनवस्थित, क्रमसे बढ़नेवाला अर्थात् वर्द्धमान और क्रमसे हीन होनेवाला अर्थात् हीयमान, इस प्रकार अवधिज्ञान छह भेदरूप जानना चाहिए ॥१२४॥


मनःपर्ययज्ञानका स्वरूप


२चिंतियमचिंतियं* वा अद्धं‡ चिंतिय अणेयभेयगयं ।
मणपज्जय त्ति णाणं जं जाणइ तं तु णरलोए३ ॥१२५॥

अर्थ: जो चिन्तित अर्थात् भूतकालमें विचारित, अचिन्तित अर्थात् अतीतमें अविचारित किन्तु भविष्यमें विचार्यमाण, और अर्धचिन्तित इत्यादि अनेक भेदरूप दूसरेके मनमें अवस्थित पदार्थको नरलोक अर्थात् पैंतालीस लाख योजनरूप मनुष्यक्षेत्रमें जानता है, वह मनःपर्ययज्ञान कहलाता है ॥१२५॥


केवलज्ञानका स्वरूप


३संपुण्णं तु समग्रं केवलमसपत्त१ सव्वभावगयं ।
लोयालोयवितिमिरं केवलणाणं मुणेयव्वं२ ॥१२६॥

अर्थ: जो जीवद्रव्यके शक्तिगत ज्ञानके सर्व अविभागप्रतिच्छेदोंके व्यक्त हो जानेसे सम्पूर्ण है, ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कर्मके सर्वथा क्षय हो जानेसे अप्रतिहतशक्ति है, अतएव समग्र है, जो केवल अर्थात् इन्द्रिय और मनकी सहायतासे रहित है, असपत्न अर्थात् प्रतिपक्षसे रहित है, युगपत् सर्व भावोंको जाननेवाला है, लोक और अलोकमें अज्ञानरूप तिमिर (अन्धकार) से रहित है, अर्थात् सर्व-व्यापक और सर्व-ज्ञायक है, उसे केवलज्ञान जानना चाहिए ॥१२६॥


संयममार्गणा, द्रव्यसंयमका स्वरूप


४वय-समिदि-कसायाणं दंडाणं इंदियाण पंचण्हं ।
धारण-पालण-णिग्गह-चाय-जओ संजमो भणिओ३ ॥१२७॥

अर्थ: अहिंसादि पाँच महाव्रतोंका धारण करना, ईर्यादि पाँच समितियोंका पालन करना, क्रोधादि चारों कषायोंका निग्रह करना, मन, वचन, कायरूप तीन दण्डोंका त्याग करना और पाँचों इन्द्रियोंका जीतना सो द्रव्यसंयम कहा गया है ॥१२७॥


सगवण्ण जीवहिंसा अट्ठावीसिंदियत्थदोसा य ।
तेहिंतो जो विरओ भावो सो संजमो भणिओ ॥१२८॥

अर्थ: पहले जीवसमासोंमें जो सत्तावन प्रकारके जीव बता आये हैं, उनकी हिंसासे उपरत होना, तथा अट्ठाईस प्रकारके इन्द्रिय-विषयोंके दोषोंसे विरत होना, सो भावसंयम कहा गया है ॥१२८॥


संगहियसयलसंजममेयममणुत्तरं दुरवगम्मं ।
जीवो समुव्वहंतो सामाइयसंजदो होइ ॥१२९॥

अर्थ: जिसमें सकल संयम संगृहीत हैं, ऐसे सर्व सावद्यके त्यागरूप एकमात्र अनुत्तर एवं दुरवगम्य अभेद-संयमको धारण करना सो सामायिकसंयम है, और उसे धारण करने वाला सामायिक-संयत कहलाता है ॥१२९॥


छेत्तूण य परियायं पोराणं जो ठवेइ अप्पाणं ।
पंचजमे धम्मे सो छेदोवट्ठावगो जीवो ॥१३०॥

अर्थ: सावद्य संस्कार रूप पूर्व पर्यायको छेद कर अहिंसादि पाँच प्रकारके यमरूप धर्ममें अपनी आत्माको स्थापित करना छेदोपस्थापनासंयम है, और उसका धारक जीव छेदोपस्थापक-संयत कहलाता है ॥१३०॥


पंचसमिदो तिगुत्तो परिहरइ सया वि जो हु सावज्जं ।
पंचजमेयजमो वा परिहारयसंजदो साहू ॥१३१॥

अर्थ: पाँच समिति और तीन गुप्तियोंसे युक्त होकर सदा ही सर्व सावद्य योगका परिहार करना तथा पाँच यमरूप भेद-संयम (छेदोपस्थापना) को, अथवा एक यमरूप अभेद-संयम (सामायिक) को धारण करना परिहार विशुद्धि संयम है, और उसका धारक साधु परिहार-विशुद्धिसंयत कहलाता है ॥१३१॥


अणुलोहं वेयंतो जीओ उवसामगो व खवगो वा ।
सो सुहुमसंपराओ जहक्खाएणूणओ किंचि ॥१३२॥

अर्थ: मोहकर्मका उपशमन या क्षपण करते हुए सूक्ष्म लोभका वेदन करना सूक्ष्मसाम्परायसंयम है और उसका धारक सूक्ष्मसाम्परायसंयत कहलाता है । यह संयम यथाख्यातसंयमसे कुछ ही कम होता है । (क्योंकि सूक्ष्मसाम्परायसंयम दशवें गुणस्थानमें होता है और यथाख्यातसंयम ग्यारहवें गुणस्थानसे प्रारम्भ होता है ) ॥१३२॥


यथाख्यातसंयमका स्वरूप


उवसंते खीणे वा असुहे कम्मम्हि मोहणीयम्हि ।
छदुमत्थो व जिणो वा जहक्खाओ संजओ साहू ॥१३३॥

अर्थ: अशुभ ( पाप ) रूप मोहनीय कर्मके उपशान्त अथवा क्षीण हो जानेपर जो वीतराग संयम होता है, उसे यथाख्यातसंयम कहते हैं। उसके धारक ग्यारहवें-बारहवें गुणस्थानवर्ती छद्मस्थ साधु और तेरहवें-चौदहवें गुणस्थानवर्ती केवली जिन यथाख्यातसंयत कहलाते हैं ॥१३३॥


संयमासंयमका सामान्य स्वरूप


जो ण विरदो दु भावो थावरवह-इंदियत्थदोसाओ ।
तसवहविरओ सोच्चिय संजमासंजमो दिट्ठो ॥१३४॥

अर्थ: भावोंसे स्थावर-वध और पाँचों इन्द्रियोंके विषय-सम्बन्धी दोषोंसे विरत नहीं होने, किन्तु त्रस-वधसे विरत होनेको संयमासंयम कहते हैं और उनका धारक जीव नियमसे संयमासंयमी कहा गया है ॥१३४॥


संयमासंयमका विशेष स्वरूप


पंच-तिय-चउविहेहिं अणु-गुण-सिक्खावएहिं संजुत्तो ।
वुच्चंति देसविरया सम्माइट्ठी झडियकम्मा ॥१३५॥

अर्थ: पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रतोंसे संयुक्त होना विशिष्ट संयमासंयम है। इसके धारक और असंख्यातगुणश्रेणीरूप निर्जराके द्वारा कर्मोंके झड़ानेवाले ऐसे सम्यग्दृष्टि जीव देशविरत या संयतासंयत कहलाते हैं ॥१३५॥


देशविरतके भेद


दंसण-वय-सामाइय पोसह सचित्त राइभत्ते य ।
बंभारंभपरिग्गह अणुमण उद्दिट्ठ देसविरदेदे ॥१३६॥

अर्थ: दार्शनिक, व्रतिक, सामायिकी, प्रोषधोपवासी, सचित्तविरत, रात्रिभुक्तिविरत, ब्रह्मचारी, आरम्भविरत, परिग्रहविरत, अनुमतिविरत और उद्दिष्टविरत ये देशविरतके ग्यारह भेद होते हैं ॥१३६॥


असंयमका स्वरूप


जीवा चउदसभेया इंदियविसया य अट्ठवीसं तु ।
जे तेसु णेय विरया असंजया ते मुणेयव्वा ॥१३७॥

अर्थ: जीव चौदह भेद रूप हैं और इन्द्रियोंके विषय अट्ठाईस हैं। जीवघातसे और इन्द्रिय-विषयोंसे विरत नहीं होनेको असंयम कहते हैं। जो इनसे विरत नहीं हैं, उन्हें असंयत जानना चाहिए ॥१३७॥


दर्शनमार्गणा, दर्शनका स्वरूप


'जं सामण्णं गहणं भावाणं णेव कट्टु आयारं ।
अविसेसिऊण अत्थे दंसणमिदि भण्णदे समए१ ॥१३८॥

अर्थ: सामान्य-विशेषात्मक पदार्थोंके आकारविशेषको अग्रहण कर केवल सत्तात्मक अंशका या स्वरूपमात्रका सामान्य ग्रहण होता है, उसे परमागममें दर्शन कहा गया है ॥१३८॥


चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शनका स्वरूप


२चक्खूणं जं पयासइ दीसइ तं चक्खुदंसणं विंति ।
सेसिंदियप्पयासो णायव्वो सो अचक्खु त्ति ॥१३९॥

अर्थ: चक्षुरिन्द्रियके द्वारा जो पदार्थका सामान्य अंश प्रकाशित होता है, अथवा दिखाई देता है, उसे चक्षुदर्शन कहते हैं। शेष चार इन्द्रियोंसे और मनसे जो सामान्य-प्रतिभास होता है, उसे अचक्षुदर्शन जानना चाहिए ॥१३९॥


अवधिदर्शनका स्वरूप


३परमाणुआदियाइं अंतिमखंध *त्ति मुत्तदव्वाइं ।
तं ओहिदंसणं पुण जं पस्सइ ताई पच्चक्खं ३ ॥१४०॥

अर्थ: सर्व-लघु परमाणुसे आदि लेकर सर्व-महान् अन्तिम स्कन्ध तक जितने मूर्त्त द्रव्य हैं, उन्हें जो प्रत्यक्ष देखता है, उसे अवधिदर्शन कहते हैं ॥१४०॥


केवलदर्शनका स्वरूप


४बहुविह बहुप्पयारा उज्जोवा परिमियम्हि खेत्तम्हि ।
लोयालोयवितिमिरो सो† केवलदंसणुज्जोवो ॥१४१॥

अर्थ: बहुत जातिके और बहुत प्रकारके चन्द्र-सूर्यादिके उद्योत (प्रकाश) तो परिमित क्षेत्रमें ही पाये जाते हैं, अर्थात् वे थोड़ेसे ही पदार्थोंको अल्प परिमाणमें प्रकाशित करते हैं। किन्तु जो केवलदर्शनरूप उद्योत है, वह लोकको और अलोकको भी प्रकाशित करता है, अर्थात् सर्व चराचर जगत्को स्पष्ट देखता है ॥१४१॥


लेश्यामार्गणा, लेश्याका स्वरूप


लिप्पइ अप्पीकीरइ एयाए णियय पुण्ण पावं च ।
जीवो त्ति होइ लेसा लेसागुणजाणयक्खाया५ ॥१४२॥

अर्थ: जिसके द्वारा जीव पुण्य और पापसे अपने आपको लिप्त करता है अर्थात् उनके आधीन होता है, ऐसी कषायानुरंजित योगकी प्रवृत्तिको लेश्याके गुण-स्वरूपादिके जाननेवाले गणधरोंने लेश्या कहा है ॥१४२॥


जह गेरुवेण कुड्डो लिप्पइ लेवेण आमपिट्ठेण ।
तह परिणामो लिप्पइ सुहासुहा य त्ति लेवेण ॥१४३॥

अर्थ: जिस प्रकार आमपिष्ट (दालकी पिट्ठी या तैलादि) से मिश्रित गेरू मिट्टीके लेप-द्वारा भित्ती (दीवाल) लीपी या रंगी जाती है, उसी प्रकार शुभ और अशुभ भावरूप लेपके द्वारा जो आत्माका परिणाम लिप्त किया जाता है उसे लेश्या कहते हैं ॥१४३॥


चंडो ण मुयद वेरं भंडणसीलो य धम्मदयरहिओ ।
दुट्ठो ण य एइ वसं लक्खणमेयं तु किण्हस्स ॥१४४॥

अर्थ: जो प्रचण्ड-स्वभावी हो, वैरको न छोड़े, भंडनशील या कलहस्वभावी हो, धर्म और दयासे रहित हो, दुष्ट हो, और जो किसीके भी वशमें न आवे, ये सब कृष्णलेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१४४॥


मंदो बुद्धिविहीणो णिव्विण्णाणी य विसयलोलो य ।
माणी माई य तहा आलस्सो चेव भेजो य ॥१४५॥

णिद्दावंचणबहुलो धण-धण्णे होइ तिव्वसण्णाओ ।
लक्खणमेयं भणियं समासाओ णीललेसस्स ॥१४६॥

अर्थ (गाथा 145 से 146): जो कार्य करनेमें मन्द-उद्यमी एवं स्वच्छन्द हो, बुद्धि-विहीन हो, कला और चातुर्यरूप विशेष ज्ञानसे रहित हो, इन्द्रियोंके विषयोंका लोलुपी हो, मानी हो, मायाचारी हो, आलसी हो, अभेद्य-स्वभावी हो, अर्थात् दूसरे लोग जिसके अभिप्रायको प्रयत्न करने पर भी न जान सकें, बहुत निद्रालु हो, पर-वंचनमें अतिदक्ष हो, और धन-धान्यके संग्रहादिमें तीव्र लालसावाला हो, ये सब संक्षेपसे नीललेश्यावालेके लक्षण कहे गये हैं ॥१४५-१४६॥


रूसइ णिंदइ अण्णे दसणबहुलो य सोय-भयबहुलो ।
असुवइ परिभवइ परं पसंसइ य अप्पयं बहुसो ॥१४७॥

ण य पत्तियइ परं सो अप्पाणं पिव परं पि मण्णंतो ।
तूसइ अइथुव्वंतो ण य जाणइ हाणि-वड्डीओ ॥१४८॥

मरणं पत्थेइ रणे देइ सु बहुयं पि थुव्वमाणो हु ।
ण गणइ कज्जाकज्जं लक्खणमेयं तु काउस्स ॥१४९॥

अर्थ (गाथा 147 से 149): जो दूसरोंके ऊपर रोष करता हो, दूसरोंकी निन्दा करता हो, दूषण-बहुल हो, शोक-बहुल हो, भय-बहुल हो, दूसरेसे ईर्ष्या करता हो, परका पराभव करता हो, नानाप्रकारसे अपनी प्रशंसा करता हो, परका विश्वास न करता हो, अपने समान दूसरेको भी मानता हो, स्तुति किये जाने पर अति सन्तुष्ट हो, अपनी हानि और वृद्धि [लाभ] को न जानता हो, रणमें मरणका इच्छुक हो, स्तुति या प्रशंसा किये जाने पर बहुत धनादिक देवे और कर्त्तव्य-अकर्त्तव्यको कुछ भी न गिनता हो; ये सब कापोतलेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१४७-१४९॥


जाणइ कज्जाकज्जं सेयासेयं च सव्वसमपासी ।
दय-दाणरदो य विदू लक्खणमेयं तु तेउस्स ॥१५०॥

अर्थ: जो अपने कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य और सेव्य-असेव्यको जानता हो, सबमें समदर्शी हो, दया और दानमें रत हो, मृदु-स्वभावी और ज्ञानी हो, ये सब तेजोलेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१५०॥


चाई भद्दो चोक्खो उज्जुकम्मो य खमइ बहुयं पि ।
साहुगुणपूयणिरओ लक्खणमेयं तु पउमस्स ॥१५१॥

अर्थ: जो त्यागी हो, भद्र (भला) हो, चोखा (सच्चा) हो, उत्तम कार्य करनेवाला हो, बहुत भी अपराध या हानि होने पर क्षमा कर दे, साधुजनोंके गुणोंकी पूजनमें निरत हो, ये सब पद्मलेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१५१॥


ण कुणइ पक्खवायं ण वि य णिदाणं समो य सव्वेसु ।
णत्थि य राओ दोसो णेहो वि हु सुक्कलेसस्स ॥१५२॥

अर्थ: जो पक्षपात न करता हो, और न निदान करता हो; सबमें समान व्यवहार करता हो, जिसे परमें राग न हो, द्वेष न हो और स्नेह भी न हो; ये सब शुक्ललेश्यावालेके लक्षण हैं ॥१५२॥


किण्हाइलेसरहिया संसारविणिग्गया अणंतसुहा ।
सिद्धिपुरीसंपत्ता अलेसिया ते मुणेयव्वा ॥१५३॥

अर्थ: जो कृष्णादि छहों लेश्याओंसे रहित हैं, पंच परिवर्त्तनरूप संसारसे विनिर्गत हैं, अनन्त-सुखी हैं, और आत्मोपलब्धिरूप सिद्धिपुरीको संप्राप्त हैं, ऐसे अयोगिकेवली और सिद्ध जीवोंको अलेश्य जानना चाहिए। ॥१५३॥


भव्यमार्गणा, भव्यसिद्धका स्वरूप


सिद्धत्तणस्स जोग्गा जे जीवा ते भवंत्ति भवसिद्धा।
ण उ मलविगमे णियमा ताणं कणकोवलाणमिव ॥१५४॥

अर्थ: जो जीव सिद्धत्व अर्थात् सर्व कर्मसे रहित मुक्तिरूप अवस्था पानेके योग्य हैं, वे भव्य-सिद्ध कहलाते हैं। किन्तु उनके कनकोपल (स्वर्ण-पाषाण) के समान मलका नाश होनेमें नियम नहीं है ॥१५४॥


भव्य और अभव्य जीवोंका निरूपण


संखेज्ज असंखेज्जा अणंतकालेण चवि ते णियमा।
सिज्झंति भव्वजीवा अभव्वजीवा ण सिज्झंति ॥१५५॥

भविया *सिद्धी जेसिं जीवाणं ते भवंत्ति भवसिद्धा।
तव्विवरीयाऽभव्वा संसाराओ ण सिज्झंति ॥१५६॥

अर्थ (गाथा 155 से 156): जो भव्य जीव हैं, वे नियमसे संख्यात, असंख्यात अथवा अनन्तकालके द्वारा सिद्धपद प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु अभव्य जीव कभी भी सिद्ध-पद प्राप्त नहीं कर पाते हैं। जिन जीवोंकी मुक्तिपद-प्राप्तिरूप सिद्धि होनेवाली है, अथवा जो उसकी प्राप्तिके योग्य हैं, उन्हें भव्यसिद्ध कहते हैं। जो इनसे विपरीत स्वरूपवाले हैं, वे अभव्य कहलाते हैं और वे कभी संसारसे छूटकर सिद्ध नहीं होते हैं ॥१५५-१५६॥


भव्यत्व और अभव्यत्वसे रहित जीवोंका वर्णन


ण य जे भव्वामव्वा मुत्तिसुहा होंति तीदसंसारा।
ते जीवा णाएव्वा णो भव्वा णो अभव्वा य ॥१५७॥

अर्थ: जो न भव्य हैं और न अभव्य हैं, किन्तु जिन्होंने मुक्ति-सुखको प्राप्त कर लिया है और अतीत-संसार हैं, अर्थात् पंचपरिवर्त्तनरूप संसारको पार कर चुके हैं, उन जीवोंको ‘नो भव्य नो अभव्य’ जानना चाहिए ॥१५७॥


सम्यक्त्वमार्गणा, जीव सम्यक्त्वको कब प्राप्त करता है, इस बातका निरूपण


'भव्वो पंचिंदिओ सण्णी जीवो पज्जत्तओ तहा ।
काललद्धाइ-संजुत्तो सम्मत्तं पडिवज्जए ॥१५८॥

अर्थ: जो भव्य हो, पंचेन्द्रिय हो, संज्ञी हो, पर्याप्तक हो, तथा काललब्धि आदिसे संयुक्त हो, ऐसा जीव सम्यक्त्वको प्राप्त करता है । [ यहाँ पर आदि पदसे वेदनाभिभव, जातिस्मरण आदि बाह्य कारण विवक्षित हैं । संस्कृत पञ्चसंग्रह ] ॥१५८॥


सम्यक्त्वका स्वरूप


छप्पंचणवविहाणं अत्थाणं जिणवरोवइट्ठाणं ।
आणाए अधिगमेण य सद्दहणं होइ सम्मत्तं ॥१५६॥

अर्थ: जिनवरोंके द्वारा उपदिष्ट छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय और नौ प्रकारके पदार्थोंका आज्ञा या अधिगमसे श्रद्धान करना सम्यक्त्व है ॥१५६॥


क्षायिकसम्यक्त्वका स्वरूप


खीणे दंसणमोहे जं सद्दहणं सुणिम्मलं होइ ।
तं खाइयसम्मत्तं णिच्चं कम्मक्खवणहेउं ॥१६०॥

वयणेहिं वि हेऊहि य इंदियमयजणणेहिं रूवेहिं ।
वीभच्छ-दुगुंछेहि य णो तेल्लोकेण चालिजा ॥१६१॥

एवं विउला बुद्धी ण य विभयमेदि किंचि दट्ठूणं ।
पहुविए सम्मत्ते खहए जीवस्स लद्धीए ॥१६२॥

अर्थ (गाथा 160 से 162): दर्शनमोहनीय कर्मके सर्वथा क्षय हो जाने पर जो निर्मल श्रद्धान होता है, उसे क्षायिक सम्यक्त्व कहते हैं । वह सम्यक्त्व नित्य है, अर्थात् होकरके फिर कभी छूटता नहीं है और सिद्धपद प्राप्त करने तक शेष कर्मोंके क्षपणका कारण है । यह क्षायिकसम्यक्त्व श्रद्धानको भ्रष्ट करनेवाले वचनोंसे, तर्कोंसे, इन्द्रियोंको भय उत्पन्न करनेवाले रूपों [आकारों] से तथा वीभत्स और जुगुप्सित पदार्थोंसे भी चलायमान नहीं होता । अधिक क्या कहा जाय, वह त्रैलोक्यके द्वारा भी चल-विचल नहीं होता । क्षायिकसम्यक्त्वके प्रस्थापन अर्थात् प्रारम्भ होने पर अथवा लब्धि अर्थात् प्राप्ति या निष्पापन होने पर क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवके ऐसी विशाल, गम्भीर एवं दृढ़ बुद्धि उत्पन्न हो जाती है कि वह कुछ (असंभव या अनहोनी घटनाएँ) देखकर भी विस्मय या क्षोभको प्राप्त नहीं होता ॥१६०-१६२॥


वेदकसम्यक्त्वका स्वरूप


बुद्धी सुहाणुबंधी सुहकम्मरओ सुए य संवेगो ।
तच्चत्थे सद्दहणं पियधम्मे तिव्वणिव्वेदो ॥१६३॥

इच्चेवमाइया जे वेदयमाणस्स होंति ते य गुणा ।
वेदयसम्मत्तमिणं सम्मत्तु दएण जीवस्स ॥१६४॥

अर्थ (गाथा 163 से 164): वेदकसम्यक्त्वके उत्पन्न होने पर जीवकी बुद्धि शुभानुबन्धी या सुखानुबन्धी हो जाती है, शुचि कर्ममें रति उत्पन्न होती है, श्रुतमें संवेग अर्थात् प्रीति पैदा होती है, तत्त्वार्थमें श्रद्धान, प्रिय धर्ममें अनुराग, एवं संसारसे तीव्र निर्वेद अर्थात् वैराग्य जागृत हो जाता है। इन गुणोंको आदि लेकर इस प्रकारके जितने गुण हैं, वे सब वेदकसम्यक्त्वी जीवके प्रगट हो जाते हैं। सम्यक्त्वप्रकृतिके उदयका वेदन करनेवाले जीवको वेदकसम्यक्त्वी जानना चाहिए ॥१६३-१६४॥


उपशमसम्यक्त्वका स्वरूप


देवे अणण्णभावो विसयविरागो य तच्चसद्दहणं ।
दिट्ठीसु असम्मोहो सम्मत्तमणूणयं जाणे ॥१६५॥

दंसणमोहस्सुदए उवसंते सच्चभावसद्दहणं ।
उवसमसम्मत्तमिणं पसण्णकलुसं जहा तोयं ॥१६६॥

अर्थ (गाथा 165 से 166): उपशमसम्यक्त्वके होने पर जीवके सत्यार्थ देवमें अनन्य भक्तिभाव, विषयोंसे विराग, तत्त्वोंका श्रद्धान और विविध मिथ्या दृष्टियों (मतों) में असममोह प्रगट होता है, इसे क्षायिक-सम्यक्त्वसे कुछ भी कम नहीं जानना चाहिए। जिस प्रकार पंकादि-जनित कालुष्यके प्रशान्त होने पर जल निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार दर्शनमोहके उदयके उपशान्त होनेपर जो सत्यार्थ श्रद्धान उत्पन्न होता है उसे उपशमसम्यक्त्व कहते हैं ॥१६५-१६६॥


तीनों सम्यक्त्वोंका गुणस्थानोंमें विभाजन


खाइयमसंजयम्हि वेदयसम्मत्तमप्पमत्तंते ।
उवसमसम्मत्तं पुण उवसंतंतेसु गायव्वं ॥१६७॥

अर्थ: क्षायिकसम्यक्त्व असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर उपरिम सर्व गुणस्थानोंमें होता है। वेदकसम्यक्त्व अप्रमत्तसंयतगुणस्थान तक होता है और उपशमसम्यक्त्व उपशान्तमोह गुणस्थानान्त जानना चाहिए ॥१६७॥


सासादनसम्यक्त्वका स्वरूप


ण य मिच्छत्तं पत्तो सम्मत्तादो य जो हु परिवडिओ ।
सो सासणो त्ति णेओ सादियपरिणामिओ भावो ॥१६८॥

अर्थ: उपशमसम्यक्त्वसे परिपतित होकर जीव जब तक मिथ्यात्वको प्राप्त नहीं हुआ है, तब तक उसे सासादनसम्यग्दृष्टि जानना चाहिए। इसके सादि पारिणामिक भाव होता है ॥१६८॥


सम्यग्मिथ्यात्वका स्वरूप


सद्दहणासद्दहणं जस्स य जीवेसु होइ तच्चेसु ।
विरयाविरएण समो सम्मामिच्छो त्ति णादव्वो¹ ॥१६६॥

अर्थ: जिसके उदयसे जीवोंके तत्त्वोंमें श्रद्धान और अश्रद्धान युगपत् प्रगट हो, उसे विरता-विरतके समान सम्यग्मिथ्यात्व जानना चाहिए ॥१६६॥


मिथ्यात्वका स्वरूप


²मिच्छादिट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहइ ।
सद्दहइ असब्भावं उवइट्ठं अणुवइट्ठं वा³ ॥१७०॥

अर्थ: मिथ्यात्वकर्मके उदयसे मिथ्यादृष्टि जीव जिन-उपदिष्ट प्रवचनका तो श्रद्धान करता नहीं, है, किन्तु कुदैवादिकके द्वारा उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असद्भावका श्रद्धान करता है ॥१७०॥


उपशमसम्यक्त्वकी उत्पत्ति के विषयमें सर्वोपशम और देशोपशमका नियम


³सम्मत्तपढमलंभो सयलोवसमा दु भव्वजीवाणं ।
णियमेण होइ अवरो सव्वोवसमा दु देसपसमा वा³ ॥१७१॥

अर्थ: भव्यजीवोंके प्रथम बार उपशमसम्यक्त्वका लाभ नियमतः दर्शनमोहनीयके सकलोपशमसे ही होता है । किन्तु अपर अर्थात् द्वितीयादि बार सर्वोपशम अथवा देशोपशमसे होता है ॥१७१॥


सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके पश्चात् मिथ्यात्व-प्राप्तिका नियम


⁴सम्मत्तादिमलंभस्साणंतरं णिच्छएण णायव्वो ।
मिच्छासंगो पडुछा अण्णस्स दु होइ भयणिज्जो⁵ ॥१७२॥

अर्थ: आदिम सम्यक्त्वके लाभके अनन्तर मिथ्यात्वका संगम निश्चयसे जानना चाहिए । किन्तु अन्य अर्थात् द्वितीयादि बार सम्यक्त्व-लाभके पश्चात् मिथ्यात्वका संगम भजनीय है, अर्थात् किसीके होता भी है और किसीके नहीं भी होता ॥१७२॥


संज्ञिमार्गणा, संज्ञी और असंज्ञीका स्वरूप


⁵सिक्खाकिरिओवएसा आलावगाही मणोवलंबेण ।
जो जीवो सो सण्णी तव्विवरीओ असण्णी य⁶ ॥१७३॥

अर्थ: जो जीव मनके अवलम्बनसे शिक्षा, क्रिया, उपदेश और आलापको ग्रहण करता है, उसे संज्ञी कहते हैं । जो इससे विपरीत है, अर्थात् शिक्षा आदिको ग्रहण नहीं कर सकता, उसे असंज्ञी कहते हैं ॥१७३॥


संज्ञी-असंज्ञीके स्वरूपका और भी स्पष्टीकरण

प्रथम अधिकार: जीवसमास (भाग 2/2)

मीमंसइ जो पुव्वं कज्जमकज्जं च तच्चमिदरं च ।
सिक्खइ णामेणेदि य समणो अमणो य विवरीओ ॥१७४॥

एवं कए मए पुण एवं होदि त्ति कज्जणिप्पत्ती ।
जो दु विचारइ जीवो सो सण्णी असण्णि इयरो य ॥१७५॥

अर्थ (गाथा 174 से 175): जो जीव किसी कार्यको करनेके पूर्व कर्त्तव्य और अकर्त्तव्यकी मीमांसा करे, तत्त्व और अतत्त्वका विचार करे, योग्यको सीखे और उसके नामसे पुकारने पर आवे, उसे समनस्क या संज्ञी कहते हैं। इससे विपरीत स्वरूपवालेको अमनस्क या असंज्ञी कहते हैं। जो जीव ऐसा विचार करता है कि मेरे इस प्रकारके कार्य करने पर इस प्रकारके कार्यकी निष्पत्ति होगी, वह संज्ञी है। जो ऐसा विचार नहीं करता है, वह असंज्ञी जानना चाहिए ॥१७४-१७५॥


आहारमार्गणा, आहारकका स्वरूप


आहारइ सरीराणं तिण्हं एक्कदरवग्गणाओ य ।
भासा मणस्स णिययं तम्हा आहारओ भणिओ ॥१७६॥

अर्थ: जो जीव औदारिक, वैक्रियिक और आहारक इन तीन शरीरोंमेंसे उदयको प्राप्त हुए किसी एक शरीरके योग्य शरीरवर्गणाको, तथा भाषावर्गणा और मनोवर्गणाको नियमसे ग्रहण करता है, वह आहारक कहा गया है ॥१७६॥


आहारक और अनाहारक जीवोंका विभाजन


विग्गहगइमावण्णा केवलिणो समुहदो अजोगी य ।
सिद्धा य अणाहारा सेसा आहारया जीवा ॥१७७॥

अर्थ: विग्रहगतिको प्राप्त हुए चारों गतिके जीव, प्रतर और लोकपूरण समुद्घातको प्राप्त सयोगिकेवली और अयोगिकेवली, तथा सिद्ध भगवान् ये सब अनाहारक होते हैं, अर्थात् औदारिकादि शरीरके योग्य पुद्गलपिंडको ग्रहण नहीं करते हैं। इनके अतिरिक्त शेष सब जीव आहारक होते हैं ॥१७७॥


उपयोगप्ररूपणा, उपयोगका स्वरूप और भेद-निरूपण


वत्थुणिमित्तो भावो जादो जीवस्स होदि उवओगो ।
उवओगो सो दुविहो सागारो चेव अणगारो ॥१७८॥

अर्थ: जीवका जो भाव वस्तुके ग्रहण करनेके लिए प्रवृत्त होता है, उसे उपयोग कहते हैं। वह साकार और अनाकारके भेदसे दो प्रकारका जानना चाहिए ॥१७८॥


‘¹मइसुदओहिमणेहिं जं सयविसयं विसेसविण्णाणं ।
अंतोमुहुत्तकालो उवओगो सो हु सागारो’ ॥१७९॥

अर्थ: मति, श्रुत, अवधि और मनः पर्ययज्ञानके द्वारा जो अपने-अपने विषयका विशेष विज्ञान होता है, उसे साकार-उपयोग कहते हैं। यह अन्तर्मुहूर्तकाल तक होता है ॥१७९॥


‘²इंदियमणोहिणा वा अत्थे अविसेसिऊण जं गहणं ।
अंतोमुहुत्तकालो उवओगो सो अणागारो’ ॥१८०॥

अर्थ: इन्द्रिय, मन और अवधिके द्वारा पदार्थों की विशेषताको ग्रहण न करके जो सामान्य अंशका ग्रहण होता है, उसे अनाकार-उपयोग कहते हैं। यह भी अन्तर्मुहूर्तकाल तक होता है ॥ १८० ॥


'केवलिणं सागारो अणगारो जुगवदेव उवओगो ।
सादी अणंतकालो पच्चक्खो सव्वभावगदो ॥१८१॥

अर्थ: केवलियोंके साकार और अनाकार उपयोग युगपत् ही होता है। उसका काल सादि और अनन्त है, अर्थात् उत्पन्न होनेके पश्चात् अनन्तकाल तक रहता है। वह प्रत्यक्ष है और सर्व भाव-गत है, अर्थात् चराचर जगद्-व्यापी समस्त पदार्थोंको जानता है ॥१८१॥


'⁴णिक्खेवे एयट्ठे णयप्पमाणे णिरुत्ति अणिओगे ।
मग्गइ वीसं मेए सो जाणइ जीवसव्भावं ॥१८२॥

अर्थ: जो ज्ञानी पुरुष निक्षेप, एकार्थ, नय, प्रमाण, निरुक्ति और अनुयोगमें उपर्युक्त बीस प्ररूपणा-रूप भेदोंका अन्वेषण करता है, वह जीवके सद्भाव अर्थात् यथार्थ स्वरूपको जानता है ॥१८२॥


किण्हा भमर-सवण्णा णीला पुण णील-गुलियसंकासा ।
काऊ कओद-वण्णा तेऊ तवणिज्ज-वण्णा हु ॥१८३॥

पम्हा पउमसवण्णा सुक्का पुण कासकुसुमसंकासा ।
वण्णंतरं च एदे हवंति परिमिदा अणंता वा ॥१८४॥

अर्थ (गाथा 183 से 184): कृष्णलेश्या भौंरेके समान वर्णवाली है, नीललेश्या नीलकी गोली, नीलमणि या मयूरकंठके समान वर्णवाली है। कापोतलेश्या कपोत ( कबूतर ) के समान वर्णवाली है। तेजोलेश्या तपे हुए सोनेके समान वर्णवाली है। पद्मलेश्या पद्म ( गुलाबी रंगके कमल ) के सदृश वर्णवाली है और शुक्ललेश्या कांसके फूलके समान श्वेतवर्णवाली है। इन छहों लेश्याओंके वर्णान्तर अर्थात् तारतम्यकी अपेक्षा मध्यवर्ती वर्णोंके भेद इन्द्रियों-द्वारा ग्रहण करनेकी दृष्टिसे संख्यात हैं, स्कन्धगत जातियोंकी अपेक्षा असंख्यात हैं और परमाणुगत भेदकी अपेक्षा अनन्त हैं ॥१८३-१८४॥


नरकोंमें लेश्याओंका निरूपण


१काऊ काऊ तह काउ-णील णीला य णील-किण्हा य ।
किण्हा य परमकिण्हा लेसा रयणादि-पुढवीसु ॥१८५॥

अर्थ: रत्नप्रभादि पृथिवियोंमें क्रमशः कापोत, कापोत, कापोत और नील, नील, नील और कृष्ण, कृष्ण, तथा परमकृष्ण लेश्या होती है ॥१८५॥


तिर्यंच और मनुष्योंमें लेश्याओंका निरूपण


२एइंदिय-वियलिंदिय-असण्णि-पंचिंदियाण पढमतियं ।
संखेदीदाऊणं सेसा सेसाण छप्पि लेसाओ ॥१८६॥

अर्थ: एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रियतिर्यंचोंमें प्रथम तीन अशुभ लेश्याएँ होती हैं। संख्यातीत आयुवालोंके अर्थात् असंख्यात वर्षकी आयुवाले भोगभूमियाँ मनुष्य और तिर्यंचोंके शेष तीन शुभ लेश्याएँ होती हैं। शेष अर्थात् संख्यात वर्षकी आयुवाले कर्मभूमियाँ मनुष्य और तिर्यंचोंके छहों लेश्याएँ होती हैं ॥१८६॥ ( इनकी अंकसंदृष्टि गाथाके नीचे दी है । )


गुणस्थानोंमें लेश्याओंका निरूपण


३पढमाइचउ छल्लेसा सुहाउ जाणे हु तिस्सु तिण्णेव ।
उवरिमगुणेसु सुक्का णिल्लेसो अंतिमो भणिओ ॥१८७॥

अर्थ: प्रथम गुणस्थानसे लेकर चौथे गुणस्थान तक छहों लेश्याएँ होती हैं। पाँचवेंसे लेकर सातवें तक तीन गुणस्थानोंमें तीन शुभ लेश्याएँ ही होती हैं। उपरिम गुणोंमें अर्थात् आठवेंसे लेकर तेरहवें गुणस्थान तक एक शुक्ललेश्या ही होती है। अन्तिम अयोगकेवली गुणस्थान निर्लेश्य अर्थात् लेश्या-रहित कहा गया है ॥१८७॥ ( इनकी अंकसंदृष्टि गाथाके नीचे दी है । )


देवोंमें लेश्याओंका निरूपण


‘तिण्हं दोण्हं दोण्हं छण्हं दुण्हं च तेरसण्हं च ।
एदो य चउदसण्हं लेसाण समासओ मुणह’ ॥१८८॥

तेऊ तेऊ तह तेउ-पम्म पम्मा य पम्म-सुक्का य ।
सुक्का परमसुक्का लेसा अवसेसदेवेसुं ॥१८९॥

अर्थ (गाथा 188 से 189): भवनादि तीन देवोंके अर्थात् भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषियोंके जघन्य तेजोलेश्या होती है। सौधर्म और ईशान इन दो कल्पवासी देवोंके मध्यम तेजोलेश्या होती है। सनत्कुमार और महेन्द्र इन दो कल्पवासी देवोंके उत्कृष्ट तेजोलेश्या और जघन्य पद्मलेश्या होती है। ब्रह्म ब्रह्मोत्तर, लान्तव, कापिष्ट, शुक्र, महाशुक्र इन छह कल्पवासी देवोंके मध्यम पद्मलेश्या होती है। शतार, सहस्रार इन दो कल्पवासी देवोंके उत्कृष्ट पद्मलेश्या और जघन्य शुक्ललेश्या होती है। आनत, प्राणत, आरण, अच्युत इन चार कल्पवासी देवोंके तथा नव ग्रैवेयकवासी कल्पातीत देवोंके, इन तेरहोंके मध्यम शुक्ललेश्या होती है। इससे ऊपर नव अनुदिश और पंच अनुत्तर इन चौदह कल्पातीत देवोंके परम अर्थात् उत्कृष्ट शुक्ललेश्या होती है ॥१८८-१८९॥


²पज्जत्तपजीवाणं सरीर-लेसा हवंति छम्मेया ।
सुक्का काऊ य तहा अपज्जत्ताणं तु बोधव्वं ॥१९०॥

अर्थ: पर्याप्तक जीवोंके शरीरकी लेश्या अर्थात् द्रव्य लेश्या छहों होती हैं। किन्तु अपर्याप्तकोंके शरीरलेश्या शुक्ल और कापोत जानना चाहिए ॥१९०॥


³विग्गहगइमावण्णा जीवाणं दव्वओ य सुक्का य ।
सरीरम्हि असंगहिए काऊ तह अपज्जत्तकाले य ॥१९१॥

अर्थ: विग्रहगतिको प्राप्त हुए चारों गतिके जीवोंके शरीरके ग्रहण नहीं करने अर्थात् जन्म नहीं लेनेतक द्रव्यसे शुक्ललेश्या होती है। पुनः जन्म लेनेके पश्चात् शरीरपर्याप्तिके पूर्ण नहीं होने तक अपर्याप्तकालमें कापोतलेश्या होती है ॥१९१॥


लेश्या-जनित भावोंका दृष्टान्त-द्वारा निरूपण


⁴णिम्मूल खंध साहा गुंछा चुणिऊण ⁺ कोइ पच्छिदाहं ’ ।
जह एदेसिं भावा तह वि य लेसा मुणेयव्वा³ ॥१९२॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई पुरुष किसी वृक्षके फलोंको जड़-मूलसे उखाड़कर, कोई स्कन्धसे काटकर, कोई गुच्छोंको तोड़कर, कोई फलोंको चुनकर और कोई गिरे हुए फलोंको बीन करके खाना चाहे, तो उनके भाव जैसे उत्तरोत्तर विशुद्ध हैं, उसी प्रकार कृष्णादि लेश्याओंके भाव भी क्रमशः उत्तरोत्तर विशुद्ध चाहिए ॥१९२॥


सम्यग्दृष्टि जीव मर कर कहाँ-कहाँ उत्पन्न नहीं होता


‘छसु हेट्ठिमासु पुढवीसु जोइस-वण-भवण-सव्वइत्थीसु ।
बारस मिच्छावादे सम्माइट्ठिस्स णत्थि उववादो’ ॥१९३॥

अर्थ: प्रथम पृथ्वीके बिना अधस्तन छहों पृथिवियोंमें; ज्योतिषी, व्यन्तर, भवनवासी देवोंमें, सर्वप्रकारकी स्त्रियोंमें अर्थात् तिर्यञ्चनी, मनुष्यनी और देवियोंमें, तथा बारह मिथ्यावादमें अर्थात् जिनमें केवल एक मिथ्यात्व ही गुणस्थान होता है, ऐसे एकेन्द्रिय विकलेन्द्रिय और असंज्ञिपञ्चेन्द्रियसम्बन्धी तिर्यञ्चोंके बारह जीवसमासोंमें सम्यग्दृष्टि जीवका उत्पाद नहीं है, अर्थात् वह मरकर इनमें उत्पन्न नहीं होता है ॥१६३॥


एक जीवके कौन-कौन सी मार्गणाएँ एक साथ नहीं होती हैं


"२मणपज्जव परिहारो उवसमसम्मत्त दोण्णि आहारा ।
एदेसु एक्कपयडे णत्थि त्ति असेसत्थं जाणे’ ॥१९४॥

अर्थ: मनःपर्ययज्ञान, परिहारविशुद्धिसंयम, प्रथमोपशमसम्यक्त्व और दोनों आहारक, अर्थात् आहारकशरीर और आहारकाङ्गोपांग; इन चारोंमेंसे किसी एकके होने पर शेष तीन मार्गणाएँ नहीं होतीं, ऐसा जानना चाहिए ॥१६४॥


संयमोंका गुणस्थानोंमें निरूपण


"३जा सामाइय छेदोऽणियट्ठि परिहारमप्पमत्तो त्ति ।
सुहुमो सुहुमसराओ उवसंताई जहक्खाय ॥१९५॥

अर्थ: छठे गुणस्थानसे लेकर नवें अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक सामायिक और छेदोपस्थापना संयम होता है । अप्रमत्तन्त अर्थात् छठें और सातवें गुणस्थानमें परिहारविशुद्धिसंयम होता है । सूक्ष्मसाम्परायसंयम सूक्ष्मसरागनामक दशवें गुणस्थानोंमें होता है, और यथाख्यातसंयम उपशान्तकषायादि अन्तिम चार गुणस्थानमें होता है ॥१६५॥


समुद्घातके भेद


"४वेयण कसाय वेउव्विय मारणंतिओ समुग्घाओ ।
*तेजाऽऽहारो छट्ठो सत्तमिओ केवलीणं च३ ॥१९६॥

अर्थ: १ वेदनासमुद्घात २ कषायसमुद्घात ३ वैक्रियिकसमुद्घात ४ मारणान्तिकसमुद्घात, ५ तैजससमुद्घात, छट्ठा आहारकसमुद्घात और सातवाँ केवलियोंके होनेवाला केवलिसमुद्घात ये सात प्रकारके समुद्घात होते हैं । (वेदनादि कारणोंसे मूल शरीरके साथ सम्बन्ध रखते हुए आत्मप्रदेशोंके बाहर निकलनेको समुद्घात कहते हैं ।)॥१६६॥


केवलिसमुद्घातका निरूपण


"५पढमे दंडं कुणइ य विदिए य कवाडयं तहा समए ।
तइए पयरं चेव य चउत्थए लोयपूरणयं ॥१९७॥


विवरं पंचमसम्ए जोई मंथाणयं तदो लट्ठे ।
सत्तमए य कवाडं संवरइ तदोऽट्ठमे दंडं ॥१९८॥

अर्थ: समुद्घातगतकेवली भगवान् प्रथम समयमें दंडरूप समुद्घात करते हैं। द्वितीय समयमें कपाटरूप समुद्घात करते हैं। तृतीय समयमें प्रतररूप और चौथे समयमें लोकपूरण समुद्घात करते हैं। पाँचवें समयमें वे सयोगिजिन लोकके विवर-गत आत्मप्रदेशोंका संवरण (संकोच) करते हैं। पुनः छठे समयमें मन्थान-(प्रतर-) गत आत्मप्रदेशोंका संवरण करते हैं। सातवें समयमें कपाट-गत आत्मप्रदेशोंका संवरण करते हैं और आठवें समयमें दंडसमुद्घात-गत आत्मप्रदेशोंका संवरण करते हैं ॥१६७-१६८॥


'दंडदुगे ओरालं कवाडजुगले य पयरसंवरणे ।
मिस्सोरालं भणियं कम्मइओ सेस तत्थ अणहारी ॥१९९॥

अर्थ: केवलिसमुद्घातके उक्त आठों समयोंमेंसे दण्ड-द्विक अर्थात् पहले और आठवें समयके दोनों दण्डसमुद्घातोंमें औदारिककाययोग होता है। कपाटयुगलमें अर्थात् विस्तार और संवरण-गत दोनों कपाटसमुद्घातोंमें तथा संवरण-गत प्रतरसमुद्घातमें यानी दूसरे, छठे और सातवें समयमें औदारिकमिश्रकाययोग होता है, ऐसा परमागममें कहा गया है। शेष समयोंमें अर्थात् तीसरे, चौथे और पांचवें समयमें कार्मणकाययोग होता है और उस समय केवली भगवान् अनाहारक रहते हैं ॥१६६॥


'छम्मासाउगसेसे उप्पण्णं जेसि केवलं णाणं ।
ते णियमा समुग्घायं सेसेसु हवंति भयणिज्जा ॥२००॥

अर्थ: जिनके छह मास आयुके शेष रहने पर केवलज्ञान उत्पन्न होता है, वे केवली नियमसे समुद्घात करते हैं। शेष केवलियोंमें समुद्घात भजनीय है, अर्थात् कोई करते भी हैं और कोई नहीं भी करते ॥२००॥


चत्तारि वि खेत्ताई आउयबंधेण होइ सम्मत्तं ।
अणुवय-महव्वयाई ण लहइ देवाउअं मोत्तुं ॥२०१॥

अर्थ: जीव चारों ही क्षेत्रों (गतियों) की आयुका बन्ध होनेपर सम्यक्त्वको प्राप्त कर सकता है । किन्तु अणुव्रत और महाव्रत देवायुको छोड़कर शेष आयुका बन्ध होने पर प्राप्त नहीं कर सकता ॥२०१॥


दंसणमोहक्खवणापट्ठवगो कम्मभूमिजादो हु ।
णियमा मणुसगदीए णिट्ठवगो चावि सव्वत्थ ॥२०२॥

अर्थ: मनुष्यगतिमें उत्पन्न हुआ कर्मभूमियाँ मनुष्य ही नियमसे दर्शनमोहनीयकर्मके क्षयका प्रस्थापक होता है अर्थात् प्रारम्भ करता है । किन्तु निष्ठापक सर्वत्र होता है। अर्थात् पूर्व-बद्ध आयुके वशसे किसी भी गतिमें उत्पन्न होकर उसकी निष्ठापना (पूर्णता) कर सकता है ॥२०२॥


क्षायिकसम्यग्दृष्टिके संसार-वासका नियम


खवणाए पट्ठवगो जम्मि भवे णियमदो तदो अण्णे ।
णादिक्कदि तिण्णि भवे दंसणमोहम्मि खीणम्मि ॥२०३॥

अर्थ: जो मनुष्य जिस भवमें दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रस्थापन करता है, वह दर्शनमोहके क्षीण होने पर नियमसे उससे अन्य तीन भवोंका अतिक्रमण नहीं करता है। अर्थात् दर्शनमोहके क्षीण हो जानेपर तीन भवमें नियमसे मुक्त हो जाता है ॥२०३॥


दर्शनमोहनीयका उपशम कौन करता है


दंसणमोह-उवसामगो दु चउसु वि गईसु बोद्धव्वो ।
पंचिंदिओ य सण्णी णियमा सो होइ पज्जत्तो ॥२०४॥

अर्थ: दर्शनमोहका उपशम करनेवाला जीव चारों ही गतियोंमें जानना चाहिए। किन्तु वह नियमसे पंचेन्द्रिय, संज्ञी और पर्याप्तक होता है। अर्थात् चारों ही गतिके संज्ञी, पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव उपशमसम्यक्त्व प्राप्त कर सकते हैं ॥२०४॥


विरह (अन्तर) कालका नियम


सम्मत्ते सत्त दिणा विरदाविरदे य चउदंसा होंति ।
विरदेसु य पण्णरसं विरहियकालो य बोद्धव्वो ॥२०५॥

अर्थ: उपशमसम्यक्त्वका विरहकाल सात दिन, उपशमसम्यक्त्व-सहित विरताविरतका विरह-काल चौदह दिन और उपशमसम्यक्त्व-सहित विरत अर्थात् प्रमत्त-अप्रमत्तसंयतका विरहकाल पन्द्रह दिन जानना चाहिए ॥२०५॥


नारकियोंके विरहकालका नियम


पणयालीस मुहुत्ता पक्खो मासो य विण्णि चउ मासा ।
छम्मास वरिसमेयं च अंतरं होइ पुढवीणं ॥२०६॥

अर्थ: रत्नप्रभादि सातों पृथिवियोंमें नारकियोंकी उत्पत्तिका अन्तरकाल क्रमशः पैंतालीस मुहूर्त, एक पक्ष, एक मास, दो मास, चार मास, छह मास और एक वर्ष होता है ॥२०६॥ इस प्रकार जीवसमास नामक प्रथम अधिकार समाप्त हुआ ।

द्वितीय अधिकार: प्रकृतिसमुत्कीर्तन

जीवसमासो समत्तो


पयडि-विबंधणमुक्कं पयडिसरूवं विसेसदेसयरं ।
पणविय वीरजिणिंदं पयडिसमुकित्तणं वुच्छं ॥१॥

अर्थ: कर्म-प्रकृतियोंके बन्धनसे विमुक्त, एवं प्रकृतियोंके स्वरूपका विशेषरूपसे उपदेश करनेवाले ऐसे श्रीवीर जिनेन्द्रको प्रणाम करके मैं प्रकृतिसमुत्कीर्त्तन नामक अधिकारको कहूँगा ॥१॥


पयडीओ दुविहाओ मूलपयडीओ उत्तरपयडीओ । तं जहा-

अर्थ: प्रकृतियाँ दो प्रकारकी होती हैं-मूलप्रकृतियाँ और उत्तरप्रकृतियाँ। उनका विशेष विवरण इस प्रकार है-


णाणस्स दंसणस्स य आवरणं वेयणीय मोहणियं ।
आउग णामागोदं तहंतरायं च मूलाओ ॥२॥

अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये कर्मोंकी आठ मूलप्रकृतियाँ हैं ॥२॥


पड पडिहारसिमज्झा हडि चित्त कुलाल भंडयारीणं ।
जह एदेसिं भावा तह वि य कम्माण सुणेयव्वा ॥३॥

अर्थ: पट (देव-मुखका आच्छादक वस्त्र) प्रतीहार (राजद्वार पर बैठा हुआ द्वारपाल) असि (मधु-लिप्त तलवार) मद्य (मदिरा) हडि (पैर फंसानेका खोड़ा) चित्रकार (चितेरा) कुम्भकार (बर्त्तन बनानेवाला कुम्भार) और भंडारी (कोषाध्यक्ष) इन आठोंके जैसे अपने-अपने कार्य करनेके भाव होते हैं, उस ही प्रकार क्रमशः कर्मोंके भी स्वभाव समझना चाहिए ॥३॥


'पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो तहेव तेणउदी ।
दोण्णि य पंच य भणिया पयडीओ उत्तरा होंति ॥४॥

अर्थ: ज्ञानावरणादि आठों मूल-प्रकृतियोंकी उत्तरप्रकृतियाँ क्रमसे पाँच, नौ, दो, अठ्ठाईस, चार, तेरानवे, दो और पाँच कही गई हैं ॥४॥


जं तं णाणावरणीयं कम्मं तं पंचविहं-आभिणिबोहियणाणावरणीयं सुद-
णाणावरणीयं ओहिणाणावरणीयं केवलणाणावरणीयं चेदि । जं दंसणावरणीयं कम्मं
तं णवविहं–णिद्दाणिद्दा पयलापयला थीणगिद्धी णिद्दा य पयला य । चक्खुदंसणा-
वरणीयं अचक्खुदंसणावरणीयं ओहिदंसणावरणीयं केवलदंसणावरणीयं चेदि । जं वेय-
णीयं कम्मं तं दुविहं-सादावेयणीयं असादावेयणीयं चेदि ।

अर्थ: जो ज्ञानावरणीय कर्म है, वह पाँच प्रकारका है-आभिनिबोधिकज्ञानावरणीय, श्रुतज्ञानावरणीय, अवधिज्ञानावरणीय, मनःपर्ययज्ञानावरणीय और केवलज्ञानावरणीय । जो दर्शनावरणीय कर्म है, वह नौ प्रकारका है-निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, निद्रा और प्रचला । तथा चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और केवलदर्शनावरणीय । जो वेदनीयकर्म है, वह दो प्रकारका है-सातावेदनीय और असातावेदनीय ।


जं मोहणीयं कम्मं तं दुविहं-दंसणमोहणीयं चारित्तमोहणीयं चेदि । जं
दंसणमोहणीयं कम्मं तं बंधादो एयविहं । संतकम्मं पुण तिविहं-मिच्छत्तं सम्मत्तं
सम्मामिच्छत्तं चेदि । जं चारित्तमोहणीयं कम्मं तं दुविहं–कसायवेयणीयं णोकसाय-
वेयणीयं चेदि । जं कसायवेयणीयं कम्मं तं सोलसविहं-अणंताणुबंधिकोह-माण-
माया-लोहा, अपच्चक्खाणावरणाकोह-माण-माया-लोहा, पच्चक्खाणावरणाकोह-माण-
माया-लोहा, संजलणकोह-माण-माया-लोहा चेदि । जं णोकसायवेयणीयं कम्मं तं
णवविहं-इत्थिवेदं पुरिसवेदं णउंसयवेदं हास रइ अरइ सोय भय दुगुंछा चेदि ।

अर्थ: जो मोहनीयकर्म है, वह दो प्रकारका है-दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय । जो दर्शनमोहनीयकर्म है, वह बन्धकी अपेक्षा एक प्रकारका है । किन्तु सत्कर्म ( सत्त्व ) की अपेक्षा तीन प्रकारका है-मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्व । जो चारित्रमोहनीयकर्म है, वह दो प्रकारका है-कषायवेदनीय और नोकषायवेदनीय । जो कषायवेदनीयकर्म है, वह सोलह प्रकारका है-अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ; अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ; प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ; और संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ । जो नोकषायवेदनीयकर्म है, वह नौ प्रकारका है-स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, और जुगुप्सा ।


जं आउकम्मं तं चउव्विहं-णिरियाउगं तिरियाउगं मणुयाउगं देवाउगं चेदि ।

अर्थ: जो आयुकर्म है, वह चार प्रकारका है-नरकायुष्क, तिर्यंचायुष्क, मनुष्यायुष्क और देवायुष्क ।


जं णामकम्मं तं वायालीसं पिंडापिंडपयडीओ । पिंडपयडीओ चउद्दस १४ । अपिंडपयडीओ अट्ठावीसं २८ । तं जहा-गइणामं जाइणामं सरीरणामं सरीरबंधण-
णामं सरीरसंघायणामं सरीरसंठाणणामं सरीरअंगोवंगणामं सरीरसंहणणणामं वण्णणामं
गंधणामं रसणामं फासणामं आणुपुव्वीणामं विहायगइणामं अगुरुलहुगणामं उवघाद-
णामं परघादणामं उस्सासणामं आदावणामं उज्जोवणामं तसणामं थावरणामं बादरणामं
सुहुमणामं पज्जत्तणामं अपज्जत्तणामं पत्तेयसरीरणामं साहारणसरीरणामं थिरणामं अथिर-
णामं सुहणामं असुहणामं सुभगणामं दुब्भगणामं सुस्सरणामं दुस्सरणामं आदेज्जणामं
अणादेज्जणामं जसकित्तिणामं अजसकित्तिणामं णिमिणणामं तित्थयरणामं चेदि ।

अर्थ: जो नामकर्म है, वह पिंड और अपिंड प्रकृतियोंके समुच्चयकी अपेक्षा ब्यालीस प्रकारका है । उनमें पिंडप्रकृतियाँ चौदह हैं और अपिंडप्रकृतियाँ अट्ठाईस हैं । उनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-गतिनाम, जातिनाम, शरीरनाम, शरीर-बन्धननाम शरीर-संघातनाम, शरीर-संस्थाननाम, शरीर-अंगोपांगनाम, शरीर-संहनननाम, वर्णनाम, गन्धनाम, रसनाम, स्पर्शनाम, आनुपूर्वीनाम, विहायोगतिनाम, अगुरुलघुनाम, उपघातनाम, परघातनाम, उच्छ्वासनाम, आतपनाम, उद्योतनाम, त्रसनाम, स्थावरनाम, बादरनाम, सूक्ष्मनाम, पर्याप्तनाम, अपर्याप्तनाम, प्रत्येकशरीर-नाम, साधारणशरीरनाम, स्थिरनाम, अस्थिरनाम, शुभनाम, अशुभनाम, सुभगनाम, दुर्भगनाम, सुस्वरनाम, दुःस्वरनाम, आदेयनाम, अनादेयनाम, यशःकीर्तिनाम, अपयशःकीर्तिनाम, निर्माणनाम और तीर्थंकरनाम ।


जं गइणामकम्मं तं चउव्विहं-णिरयगइणामं तिरियगइणामं मणुयगइणामं देवगइणामं चेदि । जं जाइणामकम्मं तं पंचविहं-एइंदियजाइणामं वेइंदियजाइणामं तेइंदियजाइणामं चउरिंदियजाइणामं पंचेंदियजाइणामं चेदि । जं सरीरणामकम्मं तं पंचविहं-ओरालियसरीरणामं वेउव्वियसरीरणामं आहारसरीरणामं तेयसरीरणामं कम्मइयसरीरणामं चेदि ।

अर्थ: इनमें जो गतिनामकर्म है, वह चार प्रकारका है-नरकगतिनाम, तिर्यंचगतिनाम, मनुष्यगतिनाम और देवगतिनाम । जो जातिनामकर्म है, वह पाँच प्रकारका है-एकेन्द्रियजातिनाम, द्वीन्द्रियजातिनाम, त्रीन्द्रियजातिनाम, चतुरिन्द्रियजातिनाम, और पंचेन्द्रियजातिनाम । जो शरीरनामकर्म है, वह पाँच प्रकारका है-औदारिकशरीरनाम, वैक्रियिकशरीरनाम, आहारकशरीरनाम, तैजसशरीरनाम और कार्मणशरीरनाम ।


जं सरीरबंधणणामकम्मं तं पंचविहं-ओरालियसरीरबंधणणामं वेउव्वियसरीरबंधण-
णामं आहारसरीरबंधणणामं तेयसशरीरबंधणणामं कम्मइयसरीरबंधणणामं चेदि¹ । जं
सरीरसंघायणामकम्मं तं पंचविहं-ओरालियसरीरसंघायणामं वेउव्वियसरीरसंघायणामं
आहारसरीरसंघायणामं तेयसशरीरसंघायणामं कम्मइयसरीरसंघायणामं चेदि ।

अर्थ: जो शरीर-बन्धननामकर्म है, वह पाँच प्रकारका है-औदारिकशरीरबन्धननाम, वैक्रियिकशरीरबन्धननाम, आहारकशरीरबन्धननाम, तैजसशरीरबन्धननाम और कार्मणशरीरबन्धननाम । जो शरीर-संघात नामकर्म है, वह पाँच प्रकारका है-औदारिकशरीरसंघातनाम, वैक्रियिकशरीरसंघातनाम, आहारकशरीरसंघातनाम, तैजसशरीरसंघातनाम और कार्मणशरीरसंघातनाम ।


जं सरीरसंठाणणामकम्मं तं छव्विहं-समचउरससरीरसंठाणणामं णिग्गोहपरि-
मंडलसरीरसंठाणणामं साइयसरीरसंठाणणामं खुज्जगसरीरसंठाणणामं वामणसरीर-
संठाणणामं हुंडसरीरसंठाणणामं चेदि³ । जं सरीरअंगोवंगणामकम्मं तं तिविहं-ओरा-
लियसरीरअंगोवंगणामं वेउव्वियसरीरअंगोवंगणामं आहारसरीरअंगोवंगणामं चेदि⁴ ।

अर्थ: जो शरीरसंस्थाननामकर्म है, वह छह प्रकारका है-समचतुरस्रशरीरसंस्थाननाम, न्यग्रोधपरिमंडलशरीरसंस्थाननाम, स्वातिशरीरसंस्थाननाम, कुब्जकशरीरसंस्थाननाम, वामनशरीरसंस्थाननाम और हुंडकशरीरसंस्थाननाम । जो शरीर-अंगोपांगनामकर्म है, वह तीन प्रकारका है-औदारिकशरीर-अंगोपांगनाम वैक्रियिकशरीर-अंगोपांगनाम और आहारकशरीर-अंगोपांगनाम ।


जं सरीरसंहणणणामकम्मं तं छव्विहं-वजरिसहणारायसरीरसंहणणणामं
वजणारायसरीरसंहणणणामं णारायसरीरसंहणणणामं अद्धणारायसरीरसंहणणणामं
खीलियसरीरसंहणणणामं असंपत्तसेपट्टकसरीरसंहणणणामं चेदि⁵ ।

अर्थ: जो शरीरसंहनननामकर्म है, वह छह प्रकारका है-वज्रऋषभनाराचशरीरसंहनननाम, वज्रनाराचशरीरसंहनननाम, नाराचशरीरसंहनननाम, अर्धनाराचशरीरसंहनननाम, कीलकशरीरसंहनननाम और असंप्राप्तासृपाटिकाशरीरसंहनननाम ।


जं वण्णणामकम्मं तं पंचविहं-किण्हवण्णणामं णीलवण्णणामं रत्तवण्णणामं
पीतवण्णणामं सुक्कवण्णणामं चेदि⁶ । जं गंधणामकम्मं तं दुविहं-सुरहिगंधणामं
दुरहिगंधणामं चेदि। जं रसणामकम्मं तं पंचविहं-तित्तणामं कडुयणामं कसाय-
णामं अंबिलणामं महुरणामं चेदि। जं फासणामकम्मं तं अट्ठविहं-कक्खडणामं
मदुयणामं गरुयणामं लहुयणामं णिद्धणामं लुक्खणामं सीयणामं उण्हणामं चेदि।

अर्थ: जो वर्णनामकर्म है, वह पाँच प्रकारका है-कृष्णवर्णनाम, नीलवर्णनाम, रक्तवर्णनाम, पीतवर्णनाम और शुक्लवर्णनाम। जो गन्धनामकर्म है, वह दो प्रकारका है-सुरभिगन्धनाम और दुरभिगन्धनाम। जो रसनामकर्म है, वह पाँच प्रकारका है-तिक्तनाम, कटुकनाम, कषायनाम, आम्लनाम और मधुरनाम। जो स्पर्शनामकर्म है, वह आठ प्रकारका है-कर्कशनाम, मृदुनाम, गुरुनाम, लघुनाम, स्निग्धनाम, रूक्षनाम, शीतनाम और उष्णनाम।


जं आणुपुव्वीणामकम्मं तं तं चउव्विहं-णिरयगइपाओग्गाणुपुव्वीणामं
तिरियगइपाओग्गाणुपुव्वीणामं मणुयगइपाओग्गाणुपुव्वीणामं देवगइपाओग्गाणुपुव्वी-
णामं चेदि। जं विहायगइणामकम्मं तं दुविहं-पसत्थविहायगइणामं अपसत्थ-
विहायगइणामं चेदि।

अर्थ: जो आनुपूर्वीनामकर्म है, वह चार प्रकारका है-नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वीनाम, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वीनाम, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वीनाम और देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वीनाम। जो विहायोगतिनामकर्म है, वह दो प्रकारका है-प्रशस्तविहायोगतिनाम और अप्रशस्तविहायोगतिनाम।


जं गोयकम्मं तं दुविहं-उच्चगोयं णीचगोयं चेदि। जं अंतरायकम्मं
तं पंचविहं-दाणंतराइयं लाहंतराइयं भोयंतराइयं उवभोयंतराइयं विरियंतराइयं चेदि।

अर्थ: जो गोत्रकर्म है, वह दो प्रकारका है-उच्चगोत्र और नीचगोत्र। जो अन्तरायकर्म है, वह पांच प्रकारका है-दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय।


बन्ध-योग्य प्रकृतियोंका निरूपण


पंच णव दोण्णि छव्वीसमवि य चउरो कमेण सत्तट्ठी ।
दोण्णि य पंच य भणिया एयाओ बंधपयडीओ ॥५॥

अर्थ: ज्ञानावरणीयकी पाँच, दर्शनावरणीयकी नौ, वेदनीयकी दो, मोहनीयकी छब्बीस, आयुकर्मकी चार, नामकर्मकी सड़सठ, गोत्रकर्मकी दो और अन्तरायकर्मकी पाँच; इस प्रकार एक सौ बीस ( १२० ) बंधने योग्य उत्तरप्रकृतियाँ कही गई हैं ॥५॥


बन्धके अयोग्य प्रकृतियोंका निरूपण


वण्ण-रस-गंध-फासा चउ चउ दुगि सत्त सम्ममिच्छत्तं ।
होंति अबंधा बंधण पण पण संधाय सम्मत्तं ॥६॥

अर्थ: चार वर्ण, चार रस, एक गन्ध, सात स्पर्श, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति, पाँच बन्धन और पाँच संघात; ये अट्ठाईस ( २८ ) प्रकृतियाँ बन्धके अयोग्य होती हैं ॥६॥


उदयके अयोग्य प्रकृतियोंका निरूपण


वण्ण-रस-गंध-फासा चउ चउ सत्तेक्कमणुदयपयडीओ ।
एए पुण सोलसयं बंधण-संघाय पंचेयं ॥७॥

अर्थ: चार वर्ण, चार रस, एक गन्ध, सात स्पर्श, पाँच बन्धन और पाँच संघात; ये छब्बीस प्रकृतियाँ उदयके अयोग्य हैं। शेष एक सौ बाईस ( १२२ ) प्रकृतियाँ उदयके योग्य होती हैं ॥७॥


उद्वेलना-योग्य प्रकृतियाँ


आहारय-वेउव्विय-णिर-णर-देवाण होंति जुगलाणि ।
सम्मत्तुच्चं मिस्सं एया उव्वेल्लणा-पयडी ॥८॥

अर्थ: आहारक-युगल ( आहारकशरीर, आहारक-अंगोपांग ) वैक्रियिक-युगल ( वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिक-अंगोपांग ) नरक-युगल ( नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी ) नर-युगल ( मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी ) देव-युगल ( देवगति, देवगत्यानुपूर्वी ) सम्यक्त्वप्रकृति, मिश्रप्रकृति ( सम्यग्मिथ्यात्व ) और उच्चगोत्र ये तेरह उद्वेलना प्रकृतियाँ हैं, अर्थात् इन प्रकृतियोंका उद्वेलनसंक्रमण होता है ॥८॥


ध्रुवबन्धी प्रकृतियाँ


आवरण विग्ध सव्वे कसाय मिच्छत्त णिमिण वण्णचदुं ।
भय णिंदाऽगुरु तेयाकम्मुवघायं धुवाउ सगदालं ॥६॥

अर्थ: ज्ञानावरणीय पाँच, दर्शनावरणीय पाँच, अन्तराय पाँच, कषाय सोलह, मिथ्यात्व, निर्माण वर्णचतुष्क ( वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श ) भय, जुगुप्सा, अगुरुलघु, तैजस, कार्मण और उपघात ये संतालीस ध्रुवबन्धी प्रकृतियाँ है; क्योंकि बन्ध-योग्य गुणस्थानमें इनका निरन्तर बन्ध होता है ॥६॥


अध्रुवबन्धी प्रकृतियाँ


परघादुस्सासाणं आयवउज्जोयमाउ चत्तारि ।
तित्थयराहारदुगं एगारह होंति सेसाओ ॥१०॥

अर्थ: परघात, उच्छ्वास, उद्योत, चारों आयु कर्म, तीर्थंकर, आहारकशरीर और आहारक-अंगोपांग ये ग्यारह शेष अर्थात् अध्रुवबन्धी प्रकृतियाँ हैं ॥१०॥


'साइयरं वेदतियं हस्सादिचउक्क पंच जाईयो ।
संठाणं संघडणं छ छक्क चउक आणुपुव्वी य ॥११॥

गइचउ दोण्णि सरीरं गोयं च य दोण्णि अंगवंगा य ।
दस जुवलाणि 'तसाई गयणगइदुगं विसट्ठि परिवत्ता ॥१२॥

अर्थ (गाथा 11 से 12): सातावेदनीय असातावेदनीय, तीनों वेद, हास्यादि-चतुष्क, पाँचों जातियाँ, छहों संस्थान, छहों संहनन, चारों आनुपूर्वीयाँ, चारों गतियाँ, औदारिक और वैक्रियिक ये दो शरीर, दोनों गोत्रकर्म, औदारिक और वैक्रियिक ये दो अंगोपांग, त्रसादि दश युगल और विहायोगति-युगल ये बासठ प्रकृतियाँ परिवर्त्तमान जानना चाहिए ॥११-१२॥

तृतीय अधिकार: कर्मस्तव

[मूलगा० १] १णमिऊण अणंतजिणे तिहुअणवरणाण-दंसणपईवे ।
बंधोदयसंतजुयं वोच्छामि *थवं †णिसामेहं ॥१॥

अर्थ: त्रिभुवनको प्रकाशित करनेके लिए उत्कृष्ट ज्ञान-दर्शनरूपी प्रदीपस्वरूप अनन्त जिनोंको नमस्कार करके कर्मोंके बन्ध, उदय और सत्त्वसे युक्त स्तवको कहूँगा, सो ( हे जिज्ञासु जनो, तुम लोग ) सुनो ॥१॥


२कंचण-रुप्पदवाणं एयत्तं जेम अणुप्पवेसो त्ति ।
अण्णोण्णपवेसाणं तह बंधं जीव-कम्माणं ॥२॥

३धण्णस्स × संगहो वा संतं जं पुव्वसंचियं कम्मं ।
४भुंजणकालो उदओ उदीरणाऽपक्कपाचणफलं च‡ ॥३॥

अर्थ (गाथा 2 से 3): जिस प्रकार कांचन (स्वर्ण) और रूपा (चाँदी) द्रव्यके प्रदेश परस्पर एक-दूसरेमें अनुप्रविष्ट होकर एकत्वको प्राप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार जीव और कर्मोंके परस्पर एक-दूसरेमें प्रविष्ट हुए प्रदेशोंके एकमेक होकर बंधनेको बन्ध कहते हैं। धान्यके संग्रहके समान जो पूर्व-संचित कर्म हैं, उनके आत्मामें अवस्थित रहनेको सत्त्व कहते हैं। कर्मोंके फल भोगनेके कालको उदय कहते हैं। तथा अपक्व कर्मों के पाचनको उदीरणा कहते हैं ॥२-३॥


गुणस्थानोंमें मूल प्रकृतियोंके बन्धका निरूपण


¹सत्तट्ठछक्कराणा मिस्सापुव्वाणियट्टिणो सत्त ।
छह सुहुमे तिण्णेगं बंधंति अबंधओऽजोओ ॥४॥

अर्थ: मिश्रगुणस्थानको छोड़कर अप्रमत्तगुणस्थान तकके छह गुणस्थानवर्ती जीव आयुकर्मके बिना सात कर्मोंको, अथवा आयुकर्म-सहित आठ कर्मोंको बाँधते हैं। मिश्र, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवाले जीव आयुकर्मके बिना शेष सात कर्मोंको बाँधते हैं। सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानवर्ती जीव आयु और मोहनीय कर्मके बिना छह कर्मोंको बाँधते हैं। ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें ये तीन गुणस्थानवर्ती जीव केवल एक वेदनीय कर्मको ही बाँधते हैं। अयोगिकेवली जिन किसी भी कर्मका बन्ध नहीं करते हैं ॥४॥


गुणस्थानोंमें मूलप्रकृतियोंके उदयका निरूपण


¹सुहुमं ति × अट्ठ वि कम्मा खीणुवसंता य सत्त मोहूणा ।
घाइचउक्केणूणा वेयंति य केवली वि चत्तारि ॥५॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान तकके जीव आठों ही कर्मोंका वेदन करते हैं। उपशान्तकषाय और क्षीणकषाय गुणस्थानवर्ती जीव मोहकर्मके बिना सात कर्मोंका वेदन करते हैं। तेरहवें और चौदहवें गुणस्थानवर्ती केवली भगवान् घातिचतुष्कके बिना चार कर्मोंका वेदन करते हैं ॥५॥


गुणस्थानोंमें मूलप्रकृतियोंकी उदीरणाका निरूपण


¹घाइतियं खीणंता तह मोहमुदीरयंति सुहुमंता ।
तइ आउ पमत्तंता णाम² गोयं सजोगंता ॥६॥

अर्थ: क्षीणकषायगुणस्थान तकके जीव ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन घातिया कर्मोंकी उदीरणा करते हैं। सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान तकके जीव मोहकर्मकी उदीरणा करते हैं। प्रमत्तसंयतगुणस्थान तकके जीव वेदनीय और आयुकर्मकी उदीरणा करते हैं। तथा सयोगिकेवली गुणस्थान तकके जीव नाम और गोत्रकर्मकी उदीरणा करते हैं ॥६॥


दशवें और बारहवें गुणस्थानमें उदीरणाका नियम


³सगुणा अद्धावलियासेसे सुहुमोदीरेइ पंचेव ।
अद्धावलियासेसे खीणो णाम-गोदे चेव उदीरेइ ॥७॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती जीव अपने गुणस्थानके कालमें आवलीमात्र शेष रह जानेपर नाम और गोत्रको छोड़कर शेष पाँचों ही कर्मोंकी उदीरणा करता है। क्षीणकषायगुणस्थानवर्ती जीव अपने गुणस्थानके कालमें आवलीमात्र शेष रह जानेपर नाम और गोत्र इन दो ही कर्मोंकी उदीरणा करता है ॥७॥


गुणस्थानोंमें मूलप्रकृतियोंके सत्त्वका निरूपण


'जा उवसंता संता अड सत्त य मोहवज्ज खीणिम्मि ।
जोयम्मि अजोयम्मि य चत्तारि अघाइकम्माणि ॥८॥

अर्थ: उपशान्तकषाय गुणस्थान तक आठों ही कर्मोंका सत्त्व रहता है। क्षीणकषायगुणस्थानमें मोहकर्मको छोड़कर शेष सात कर्मोंका सत्त्व रहता है। सयोगिकेवली और अयोगिकेवलीमें चार अघातिया कर्म विद्यमान रहते हैं ॥८॥


गुणस्थानोंमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियोंका निरूपण


[मूलगा० २] २मिच्छे सोलस पणुवीस सासणे अविरए य दह पयडी ।
चउ छक्कमेयककमसो विरयाविरयाइ बंधवोच्छिण्णा १॥६॥

[मूलगा० ३ ] दुअ तीस चउरपुव्वे पंचऽणियट्ठिम्हि† बंधवुच्छेओ ।
सोलस सुहुमसराए सायं सजोइ-जिणवरिंदे ॥१०॥

अर्थ (गाथा 9 से 10): मिथ्यात्वगुणस्थानमें सोलह, सासादनमें पच्चीस, अविरतमें दश, देशविरतमें चार, प्रमत्तविरतमें छह और अप्रमत्तविरतमें एक प्रकृति बन्धसे व्युच्छिन्न होती है। अपूर्वकरणमें क्रमसे दो, तीस और चार अर्थात् छत्तीस प्रकृतियाँ, तथा अनिवृत्तिकरणमें पाँच प्रकृतियोंका बन्धसे व्युच्छेद होता है। सूक्ष्मसाम्परायमें सोलह प्रकृतियाँ बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं और सयोगि-जिनवरेन्द्रके एक सातावेदनीय बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥६-१०॥


बन्धके विषयमें कुछ विशेष नियम


सव्वासिं‡ पयडीणं मिच्छादिट्ठी दु बंधओ भणिओ।
तित्थयराहारदुगं मुत्तूण य सेसपयडीणं ॥११॥

३सम्मत्तगुणनिमित्तं तित्थयरं संजमेण आहारं ।
बज्झंति सेसियाओ मिच्छत्तादीहिं हेऊहिं ॥१२॥

अर्थ (गाथा 11 से 12): मिथ्यादृष्टि जीव तीर्थंकर और आहारकद्विक, इन तीन प्रकृतियोंको छोड़ करके शेष सभी प्रकृतियोंका बन्ध करनेवाला कहा गया है। इसका कारण यह है कि तीर्थंकर प्रकृतिका सम्यक्त्वगुणके निमित्तसे और आहारकद्विकका संयमके निमित्तसे बन्ध होता है। किन्तु शेष एक सौ सत्तरह प्रकृतियाँ मिथ्यात्व आदि कारणोंसे बन्धको प्राप्त होती हैं। ॥११-१२॥


मिथ्यात्वगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


[मूलगा० ४] मिच्छं णउंसयवेयं णिरयाउ तह य चेव णिरयदुगं ।
इगि-वियलिंदियजाई हुंडमसंथत्तमायावं ॥१३॥

[मूलगा० ५] थावर सुहुमं च तहा साहारणयं तहेव अपज्जत्तं ।
एए सोलह पयडी मिच्छम्मि अ बंधवुच्छेओ ॥१४॥

अर्थ (गाथा 13 से 14): मिथ्यात्व, नपुंसकवेद, नरकायु तथा नरकद्विक (नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी) एकेन्द्रियजाति, विकलेन्द्रिय जातियाँ (द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति) हुंडकसंस्थान, असंप्राप्तासृपाटिकासंहनन, आताप, स्थावर, सूक्ष्म तथा साधारण और अपर्याप्त; ये सोलह प्रकृतियाँ मिथ्यात्वगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥१३-१४॥


सासादनगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


[मूलगा० ६] ¹थीणतियं इत्थी वि य अण तिरियाऊ तहेव तिरियदुगं ।
मज्झिमचउसंठाणं मज्झिमचउ चेव संघयणं ॥१५॥

[मूलगा० ७] उज्जोयमप्पसत्था विहायगइ दुब्भगं अणादेज्जं ।
दुस्सर णिच्चागोयं सासणसम्मदम्हि वोच्छिण्णा² ॥१६॥

अर्थ (गाथा 15 से 16): स्त्यानत्रिक (स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला) स्त्रीवेद, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, तिर्यग्वायु तथा तिर्यग्-द्विक (तिर्यग्गति-तिर्यग्गत्यानुपूर्वी) मध्यम चार संस्थान और मध्यम ही चार संहनन, उद्योत, अप्रशस्तविहायोगति, दुर्भाग, अनादेय, दुःस्वर और नीचगोत्र; ये पच्चीस प्रकृतियाँ सासादनसम्यक्त्वमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥१५-१६॥ सासादनमें बन्धसे व्युच्छिन्न २५ ।


अविरतसम्यग्दृष्टिगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


[मूलगा० ८] ²बिदियकसायचउक्कं मणुवाउ मणुयदुग विओरालं
तस्स य अंगोवंगं संघयणादी अविरदस्स³ ॥१७॥

अर्थ: द्वितीयकषायचतुष्क, अर्थात् अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ; मनुष्यायु, मनुष्यद्विक (मनुष्यगति-मनुष्यगत्यानुपूर्वी) औदारिकशरीर, औदारिक-अंगोपांग और प्रथम संहनन; ये दश प्रकृतियाँ अविरतसम्यग्दृष्टिके बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥१७॥ अविरतसम्यग्दृष्टिमें बन्धसे व्युच्छिन्न १० ।


देशविरतगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


[मूलगा० ९] ³तइयकसायचउक्कं विरयाविरयम्हि बंधवोच्छिण्णा ।

अर्थ: तृतीय कषायचतुष्क अर्थात् प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार प्रकृतियाँ विरताविरत गुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं । देशविरतमें बन्धसे व्युच्छिन्न ४ । असातावेदनीय, अरति, शोक, अस्थिर, अशुभ और अयशःकीर्ति; ये छह प्रकृतियाँ प्रमत्तविरत गुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥१८॥ प्रमत्तविरतमें बन्धसे व्युच्छिन्न ६ ।


प्रमत्तविरतगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


साइयरमइसोयं तह चेव य अस्थिरमसुहं च॑ ॥१९॥


अप्रमत्तविरतगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


देवाउअं च एयं पमत्तइयरम्हि णायव्वो’ ॥१९॥

अर्थ: अप्रमत्तविरतनामक सातवें गुणस्थानमें एक देवायु ही बन्धसे व्युच्छिन्न होती है, ऐसा जानना चाहिए ॥१९॥


अपूर्वकरणगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


[मूलगा० ११] ‘णिद्दा पयला य तहा अपुव्वपढमम्हि बंधवुच्छेओ ।
देवदुगं पंचिंदिय ओरालियवज्ज चदुसरीरं च’ ॥२०॥

[मूलगा० १२] समचउरस वेउव्विय आहारयअंगुवंगणामं च ।
वण्णचउक्कं च तहा अगुरुलहुयं च चत्तारि’ ॥२१॥

[मूलगा० १३] तसचउ पसत्थमेव य विहाइगइ थिर सुहं च णायव्वा ।
सुहयं णिम्माणमेव य तित्थयरमेव दुहावि पण्णत्ता ।

[मूलगा० १४] २तित्थयरमेव तीस अपुव्वछट्ठम्भाए बंधवोच्छिण्णा ।
हास रइ भय दुगुंछा अपुव्वचरिमम्हि बंधवोच्छिण्णा’ ॥२३॥

अर्थ (गाथा 20 से 23): अपूर्वकरणके प्रथम भागमें निद्रा और प्रचला, ये दो प्रकृतियाँ बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं। अपूर्वकरणके छठे भागमें देवद्विक ( देवगति-देवगत्यानुपूर्वी ) पंचेन्द्रियजाति, औदारिक-शरीरको छोड़कर शेष चार शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिक-अंगोपांग, आहारक-अंगोपांग, वर्णचतुष्क ( वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श ) अगुरुलघुचतुष्क ( अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास ) त्रसचतुष्क, ( त्रस, बादर, प्रत्येकशरीर, पर्याप्त, ) प्रशस्तविहायोगति, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण और तीर्थंकर, ये तीस प्रकृतियाँ बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं। अपूर्वकरणके अन्तिम सातवें भागमें हास्य, रति, भय और जुगुप्सा; ये चार प्रकृतियाँ बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥२०-२३॥


अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


[मूलगा० १५] ३पुरिसं चउसंजलणं पंच य पयडी य पंचभागम्हि ।
अणियट्टी-अद्धाए जहाकमं बंधवुच्छेओ’ ॥२४॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणकालके पाँचों भागोंमें यथाक्रमसे पुरुषवेद, संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभ; ये पाँच प्रकृतियाँ बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥२४॥ स्त्यानत्रिक ( स्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला ) तथा आहारकद्विक ये पाँच प्रकृतियाँ प्रमत्तविरतमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं। प्रमत्तविरतमें उदय-व्युच्छिन्न ५।


सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


[मूलगा० १६] णाणंतरायदसयं दंसणचत्तारि उच्च जसकित्ती ।
एए सोलह पयडी सुहुमकसायम्हि वोच्छेओ ॥२५॥

अर्थ: ज्ञानावरणीयकी पाँच, अन्तरायकी पाँच, दर्शनावरणकी चार ( चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन ) उच्चगोत्र और यशःकीर्ति; ये सोलह प्रकृतियाँ सूक्ष्मकषायमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥२५॥ नोकषायषट्क अर्थात् हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा; ये छह प्रकृतियाँ अपूर्वकरणगुणस्थानमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं। अपूर्वकरणमें उदय-व्युच्छिन्न ६।


सयोगिकेवलीके बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृति


[मूलगा० १७] उवसंत खीण चत्ता जोगिम्हि य सायबंधवोच्छेओ।
णायव्वो पयडीणं बंधस्संतो अणंतो य ॥२६॥

अर्थ: उपशान्तमोह और क्षीणमोहगुणस्थानमें कोई प्रकृति बन्धसे व्युच्छिन्न नहीं होती है, अतएव उन्हें छोड़कर सयोगीजिनके एक सातावेदनीय ही बन्धसे व्युच्छिन्न होती है। (अयोगिकेवलीके न कोई प्रकृति बँधती है और न व्युच्छिन्न ही होती है।) इस प्रकार गुणस्थानोंमें बन्धका अन्त अर्थात् व्युच्छेद और अनन्त अर्थात् बन्ध जानना चाहिए ॥२६॥ सूक्ष्मकषायगुणस्थानमें एक संज्वलनलोभ प्रकृति ही उदयसे व्युच्छिन्न होती है। सूक्ष्मसाम्परायमें उदय-व्युच्छिन्न १।


गुणस्थानोंमें उदयसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियोंकी संख्याका निरूपण


[मूलगा० १८] पण णव इगि सत्तरसं अड पंच चउर छक्क छच्चेव ।
इगि दुग सोलह तीसं बारह उदयए अजोयंता ॥२७॥

अर्थ: पहले मिथ्यात्वगुणस्थानसे लेकर चौदहवें अयोगिकेवली तक क्रमसे पाँच, नौ, एक, सत्तरह, आठ, पाँच, चार, छह, छह, एक, दो, सोलह, तीस और बारह प्रकृतियाँ उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥२७॥ निद्रा और प्रचला ये दो प्रकृतियाँ क्षीणकषायके द्विचरम समयमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं । क्षीणमोहके द्विचरमसमयमें उदय-व्युच्छिन्न २ ।


कुछ विशेष प्रकृतियोंके उदय-विषयक नियम


मिस्सं उदेइ मिस्से अविरयसम्माइचउसु सम्मत्तं ।
तित्थयराहारदुअं कमेण जोए पमत्ते य ॥२८॥

अर्थ: मिश्रप्रकृतिका उदय तीसरे मिश्रगुणस्थानमें होता है। सम्यक्त्वप्रकृतिका उदय चौथे अविरतसम्यक्त्व आदि चार गुणस्थानोंमें होता है। तीर्थङ्करप्रकृतिका उदय तेरहवें सयोगिकेवली गुणस्थानमें और आहारकद्विकका उदय छठे प्रमत्तसंयतगुणस्थानमें होता है ॥२८॥


'णिरयाणुपुव्वि उदओ णासाए जण्ण णिरयउप्पत्ती ।
सव्वाणुपुव्वि-उदओ ण होइ मिस्से जदो ण मरणं से ॥२६॥

अर्थ: यतः सासादनसम्यग्दृष्टिकी नरकमें उत्पत्ति नहीं होती, अतः सासादनगुणस्थानमें नरकगत्यानुपूर्वीका उदय नहीं होता। सभी आनुपूर्व्योंका उदय मिश्रगुणस्थानमें नहीं होता है; क्योंकि, सम्यग्मिथ्यादृष्टिका मरण नहीं होता। (अतएव मिथ्यात्व और अविरतसम्यक्त्वगुणस्थानमें चारोंका और सासादनगुणस्थानमें तीन आनुपूर्व्योंका उदय होता है ।) ॥२६॥


[मूलगा० १६] १मिच्छत्तं आयावं सुहुममपज्जत्तया य तह चेव ।
साहारणं च पंच य मिच्छम्हि य उदयवुच्छेओ ॥३०॥

अर्थ: मिथ्यात्व, आताप, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण; ये पाँच प्रकृतियाँ मिथ्यात्वगुणस्थानमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३०॥


[मूलगा०२०] अण एइंदियजाई वियलिंदियजाइमेव थावरयं ।
एए णव पयडीओ सासणसम्मम्हि उदयवोच्छेओ ॥३१॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धीचतुष्क, एकेन्द्रियजाति, तीनों विकलेन्द्रिय जातियाँ, तथा स्थावर; ये नौ प्रकृतियों सासादनसम्यक्त्वमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३१॥


[मूलगा०२१] सम्मामिच्छत्तेयं सम्मामिच्छम्हि उदयवोच्छिण्णो ।
विदयकसायचउक्कं तह चेव य णिरय-देवाऊ ॥३२॥

अर्थ: सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थानमें एक सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति ही उदयसे व्युच्छिन्न होती है ।


[मूलगा०२२] मणुय-तिरियाणुपुव्वी वेउव्वियछक्क दुब्भगं चेव ।
अणादिज्जं च तहा अजसकित्ती अविरयम्हि ॥३३॥

अर्थ (गाथा 32 से 33): द्वितीयकषायचतुष्क, नरकायु, देवायु, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकषट्क ( वैक्रियिक-शरीर, वैक्रियिक-अंगोपांग, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी ) दुर्भग, अनादेय और अयशःकीर्त्ति, इस प्रकार सत्रह प्रकृतियाँ अविरतसम्यक्त्वगुणस्थानमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३२-३३॥


[मूलगा०२३] तदियकसायचउक्कं तिरियाऊ तह य चेव तिरियगदी ।
उज्जोअ णिच्छगोदं विरयाविरयम्हि उदयवुच्छेओ ॥३४॥

अर्थ: तृतीयकषायचतुष्क, तिर्यंचायु, तिर्यंचगति, उद्योत और नीचगोत्र, ये आठ प्रकृतियाँ विरताविरतगुणस्थानमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३४॥


[मूलगा०२४] थीणतियं चेव तहा आहारदुगं पमत्तविरयम्हि ।
सम्मतं संघयणं अंतिमंतियमप्पमत्तम्हि ॥३५॥

अर्थ: सम्यक्त्वप्रकृति और अन्तिम तीन संहनन, ये चार प्रकृतियाँ अप्रमत्तविरतगुणस्थानमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३५॥ अप्रमत्तविरतमें उदय-व्युच्छिन्न ४।


[मूलगा०२५] तह णोकसायछक्कं अपुव्वकरणे य उदयवोच्छिण्णं ।
वेयतियं कोह-माण-मायासंजलण अणियट्ठिम्हि ॥३६॥

अर्थ: तीनों वेद, तथा संज्वलन क्रोध, मान, माया; ये छह प्रकृतियाँ अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३६॥ अनिवृत्तिकरणमें उदय-व्युच्छिन्न ६।


[मूलगा०२६] संजलणलोहमेयं सुहुमकसायम्हि उदयवोच्छिण्णा ।
तह वज्जयणारायं णारायं चेव उवसंते ॥३७॥

अर्थ: वज्रनाराचसंहनन और नाराचसंहनन ये दो प्रकृतियाँ उपशान्तमोहगुणस्थानमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३७॥ उपशान्तमोहमें उदय-व्युच्छिन्न २ ।


[मूलगा० २७] १णिद्दा पयला य तहा खीणदुचरिमम्हि उदयवोच्छिण्णा ।
२णाणंतरायदसं दंसणचत्तारि चरिमम्हि’ ॥३८॥

अर्थ: ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच और दर्शनावरणकी चक्षुदर्शनावरणादि चार; ये चौदह प्रकृतियाँ क्षीणमोहके अन्तिम समयमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३८॥ क्षीणमोहके चरमसमयमें उदय-व्युच्छिन्न १४ ।


[मूलगा० २८] ३अण्णयरवेयणीयं ओरालियतयणामकम्मं च ।
छच्चेव य संठाणं ओरालय-अंगोवंगं च २ ॥३६॥

[मूलगा० २६] आदी वि य संघयणं वण्णचउक्कं च दो विहायगई ।
अगुरुलहुयचउक्कं पत्तेय थिराथिरं चेव ३ ॥४०॥

[मूलगा० ३०] सुह-सुस्सरजुयला वि य णिमिणं च तह णी णायव्वा ।
एए तीस पयडी सजोगचरिमम्हि वोच्छिण्णा ४ ॥४१॥

अर्थ (गाथा 39 से 41): साता-असातावेदनीयमेंसे कोई एक वेदनीय, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, छहों संस्थान, औदारिक-अंगोपांग, आदिका वज्रवृषभनाराचसंहनन, वर्णचतुष्क, प्रशस्त और अप्रशस्त विहायोगति, अगुरुलघुचतुष्क, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ-युगल, सुस्वर-युगल, तथा निर्माण; ये तीस प्रकृतियाँ सयोगिकेवलीके चरमसमयमें उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३६-४१॥ सयोगिकेवलीमें उदय-व्युच्छिन्न ३० ।


‘अण्णयरवेयणीयं मणुयाऊ मणुयगई य बोहव्वा ।
पंचिंदियजाई वि य तस सुभगादेज्ज पज्जत्तं’ ॥४२॥

वाय रजसकित्ती वि य तित्थयरं उच्चगोदयं चेव ।
एए + बारह पयडी अजोइम्हि × उदयवोच्छिण्णा२ ॥४३॥

अर्थ (गाथा 42 से 43): मार्गदर्शन :- कोई एक वेदनीय, मनुष्यायु, मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, सुभग, आदेय, पर्याप्त, बादर, यशःकीर्ति, तीर्थंकर और उच्चगोत्र; ये बारह प्रकृतियाँ अयोगि-जिनके चरम समयमें उदयसे व्युच्छिन्न होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥४२-४३॥


२उदयस्सुदीरणस्स य सामित्तादो ण विज्जइ विसेसो ।
मोत्तूण तिण्णि ठाणं पमत्त जोई अजोई य३ ॥४४॥

अर्थ: स्वामित्वकी अपेक्षा उदय और उदीरणामें प्रमत्तविरत, सयोगिकेवली और अयोगिकेवली; इन तीन गुणस्थानोंको छोड़कर कोई विशेष (अन्तर) नहीं है ॥४४॥


४तीसं बारस उदयं केवलिणं मेलणं च काऊण ।
सायासायं च तहा मणुआउगमवणियं किच्चा ५ ॥४५॥

सेसं उगुदालीसं जोगीसु उदीरणा य बोहव्वा ।
अवणिय तिण्णि य पयडी पमत्तउदयम्हि पक्खित्ता६ ॥४६॥

तह चेय अट्ठ पयडी पमत्तविरदे उदीरणा होंति ।
‘णत्थि त्ति अजोगजिणे उदीरणा इत्ति णायव्वा’ ॥४७॥

अर्थ (गाथा 45 से 47): सयोगिकेवलीके उदयमें आनेवाली तीस और अयोगिकेवलीके उदयमें आनेवाली बारह; इन दोनोंको मिला करके, तथा सातावेदनीय, असातावेदनीय और मनुष्यायु, इन तीनको घटा करके जो उनतालीस प्रकृतियाँ शेष रहीं वे प्रकृतियाँ सयोगिकेवलीके जानना चाहिए। जो सातावेदनीय आदि तीन प्रकृतियाँ घटाई हैं, उन्हें प्रमत्तविरतके उदयमें आनेवाली पाँच प्रकृतियोंमें प्रक्षेप करना चाहिए। इस प्रकार प्रमत्तविरतमें आठ प्रकृतियोंकी उदीरणा होती है। अयोगिजिनके किसी भी प्रकृतिकी उदीरणा नहीं होती है, ऐसा नियम जानना चाहिए ॥४५-४७॥


पण णव इगि सत्तरसं अट्ठट्ठ य चउरलक्क छच्चेव ।
इगि दुय सोलगुदालं उदीरणा होंति जोअंता ॥४८॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानसे लेकर सयोगिकेवली पर्यन्त क्रमसे पाँच, नौ, एक, सत्तरह, आठ, आठ, चार, छह, छह, एक, दो, सोलह और उनतालीस प्रकृतियोंकी उदीरणा होती है ॥४८॥ उदीरणा-योग्य एक सौ बाईस प्रकृतियोंमेंसे सम्यक्त्वप्रकृति, सम्यग्मिथ्यात्व, तीर्थंकर और आहारकद्विकके बिना मिथ्यात्वगुणस्थानमें एक सौ सत्तरह प्रकृतियोंकी उदीरणा होती है । यहाँ पर उदीरणाके अयोग्य पाँच, और सर्व अनुदीर्ण प्रकृतियाँ इकतीस हैं । मिथ्यात्व आदि पाँच प्रकृतियोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । सासादनमें नरकानुपूर्वीके बिना उदीरणा-योग्य प्रकृतियाँ एक सौ ग्यारह हैं, उदीरणाके अयोग्य ग्यारह और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ सैंतीस हैं । यहाँ पर अनन्तानुबन्धी-चतुष्क आदि नौ प्रकृतियोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । मिश्रमें तिर्यञ्च, मनुष्य और देव-आनुपूर्वीके बिना तथा सम्यग्मिथ्यात्वके साथ उदीरणाके योग्य प्रकृतियाँ सौ हैं । उदीरणाके अयोग्य बाईस और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ अड़तालीस हैं । यहाँ पर एक सम्यग्मिथ्यात्वकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । अविरतमें उदीरणाके योग्य एक सौ चार हैं, क्योंकि यहाँ सभी आनुपूर्वियोंकी और सम्यक्त्वप्रकृतिकी उदीरणा होने लगती है । उदीरणाके अयोग्य अठारह और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ बयालीस हैं। यहाँ पर अप्रत्याख्यानावरण-चतुष्क आदि सत्तरह प्रकृतियोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । देशविरतमें सत्तासी प्रकृतियोंकी उदीरणा होती है, उदीरणाके अयोग्य पैंतीस हैं, अनुदीर्ण प्रकृतियाँ इकसठ हैं और प्रत्याख्यानावरण-चतुष्क आदि आठ प्रकृतियोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है। प्रमत्तविरतमें आहारकद्विकके साथ उदीरणा-योग्य प्रकृतियाँ इक्यासी हैं, उदीरणाके अयोग्य इकतालीस हैं अनुदीर्ण प्रकृतियाँ सड़सठ हैं । सातावेदनीय, असातावेदनीय और मनुष्यायुकी उदीरणा छठे गुणस्थान तक ही होती है आगे नहीं होती, ऐसा बतला आये हैं, अतएव इस गुणस्थानमें स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, आहारक-शरीर, आहारक-अंगोपांग, सातावेदनीय, असातावेदनीय और मनुष्यायु; इन आठ प्रकृतियोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । अप्रमत्तविरतमें उदीरणाके योग्य तिहत्तर, उदीरणाके अयोग्य उनंचास और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ पिछहत्तर हैं। यहाँ पर सम्यक्त्वप्रकृति आदि चार प्रकृतियाँ उदीरणासे व्युच्छिन्न होती हैं । अपूर्वकरणमें उदीरणाके योग्य उनहत्तर, उदीरणाके अयोग्य तिरेपन, और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ उन्यासी हैं। यहाँ पर हास्यादि छह नोकषायोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । अनिवृत्तिकरणमें उदीरणाके योग्य तिरेसठ, उदीरणाके अयोग्य उनसठ और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ पचासी हैं। यहाँ पर तीनों वेद और संज्वलन क्रोध, मान, मायाकषाय, इन छह प्रकृतियोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । सूक्ष्मसाम्परायमें उदीरणाके योग्य सत्तावन, उदीरणाके अयोग्य पैंसठ और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ इक्यानवे हैं। यहाँ पर एकमात्र संज्वलनलोभकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । उपशान्तकषायमें उदीरणा-योग्य छप्पन, उदीरणाके अयोग्य छयासठ और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ छानवे हैं। यहाँ पर वज्रनाराचादि दो संहननोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है। क्षीणकषायके उपान्त्य समय तक चौबन प्रकृतियोंकी उदीरणा होती है, अतः वहाँ पर उदीरणाके अयोग्य अड़सठ और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ चौरानवे जानना चाहिए। यहाँ पर निद्रा और प्रचला इन दो प्रकृतियोंकी उदीरणाव्युच्छित्ति होती है । इसी गुणस्थानके अन्तिम समयमें उदीरणाके योग्य बावन, उदीरणाके अयोग्य सत्तर और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ छियानवे हैं। अन्तिम समयमें ज्ञानावरणकी पाँच, दर्शनावरणकी चार और अन्तरायकी पाँच; इन चौदह प्रकृतियोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । सयोगिकेवली गुणस्थानमें तीर्थङ्करप्रकृतिको मिलानेसे उदीरणाके योग्य उनतालीस, उदीरणाके अयोग्य तेरासी और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ एक सौ नौ हैं । अतः अयोगिकेवली गुणस्थानमें किसी भी प्रकृतिकी उदीरणा नहीं होती, अतः वहाँ पर उदयसे व्युच्छिन्न होनेवाली बारह प्रकृतियोंमेंसे नौकी उदीरणा सयोगिकेवली गुणस्थानमें ही होती है। शेष तीन (साता-असाता वेदनीय और मनुष्यायु) की उदीरणा छठे गुणस्थानमें होती है, यह पहले बतला आये हैं । इस प्रकार तेरहवें गुणस्थानमें उनतालीस प्रकृतियोंकी उदीरणा-व्युच्छित्ति होती है । अयोगिकेवलीके उदीरणा और उदीरणा-व्युच्छित्तिके योग्य कोई भी प्रकृति शेष नहीं रही है। अतएव उदीरणाके अयोग्य एक सौ बाईस और अनुदीर्ण प्रकृतियाँ एक सौ अड़तालीस जानना चाहिए। ( देखो संग्रह-संख्या १२ )
इस प्रकार उदीरणासे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियोंका वर्णन समाप्त हुआ।


गुणस्थानोंमें प्रकृतियोंके क्षयका क्रम


अण मिच्छ मिस्स सम्मं अविरयसम्माइ-अपमत्ता ।
सुर-णिरय-तिरिय-आउ णिययभवे चेय खीयंति ॥४९॥


सोलह अट्ठक्केक्के छक्केक्के चेय खीणमणियट्टी ।
एवं सुहुमपराए खीणकसाए य सोलसयं ॥५०॥

वावत्तरि दुचरिमे तेरह चरिमे अजोइणो खीणा ।
अडयालं पयडिसयं णिव्वुय-जिणं पणमित्थं वन्दे ॥५१॥

अर्थ (गाथा 46 से 51): अनन्तानुबन्धी-चतुष्क, मिथ्यात्व, मिश्र और सम्यक्त्वप्रकृति, ये सात प्रकृतियाँ अविरत-सम्यक्त्वसे लेकर अप्रमत्तपर्यन्त क्षयको प्राप्त होती हैं। तथा देवायु, नरकायु और तिर्यञ्चायु अपने-अपने भवमें ही क्षयको प्राप्त होती हैं। अनिवृत्तिकरणके नौ भागोंमें क्रमसे सोलह, आठ, एक, एक, छह, और एक, एक, एक, एक प्रकृति क्षयको प्राप्त होती है। सूक्ष्मसाम्परायमें एक प्रकृति और क्षीणकषायमें सोलह प्रकृतियाँ क्षय होती हैं । अयोगिकेवलीके द्विचरम समयमें बहत्तर और चरम समयमें तेरह प्रकृतियाँ क्षीण होती हैं। इस प्रकार एक सौ अड़तालीस प्रकृतियोंका क्षय करके निर्वाणको प्राप्त हुए जिन भगवान्की मैं वन्दना करता हूँ ॥४६-५१॥


कुछ विशेष प्रकृतियोंका सत्त्व-असत्त्व-विषयक नियम


तित्थयराहारदुगं सासणसम्मेम्मि णत्थि संतेण ।
मिस्सम्मि य तित्थयरं सत्तं खलु णत्थि णियमेण ॥५२॥

अर्थ: तीर्थङ्कर और आहारकद्विक इन तीन प्रकृतियोंका सत्त्व निश्चयसे सासादन-सम्यक्त्व-गुणस्थानमें नहीं होता है। तथा तीर्थङ्कर प्रकृतिका सत्त्व नियमसे मिश्रगुणस्थानमें नहीं होता है ॥५२॥


अनिवृत्तिकरणके नौ भागोंमें सत्त्वसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


[मूलगा०४१] 'थींणतियं चेव तहा णिरयदुअं चेव तह य तिरियदुयं ।
इगि-वियलिंदियजाई आयाउज्जोवथावरयं ॥५३॥

[मूलगा०४२] साहारण सुहुमं चिय सोलस पयडी य होंति णायव्वा ।
।१६।
विदियकसायचउक्कं’ तइयकसायं च अट्ठे ऽए² ॥५४॥
।८।

[मूलगा०४३] ²एय णंउंसयवेयं इत्थीवेयं तहेव एगं च ।
छण्णोकसायछक्कं पुरिसं कोधं च माणो य³ ॥५५॥

अर्थ (गाथा 53 से 55): अनिवृत्तिकरणके प्रथम भागमें स्त्यानत्रिक, नरकद्विक, तिर्यग्द्विक, एकेन्द्रियजाति, तीन विकलेन्द्रियजातियाँ, आतप, उद्योत, स्थावर, साधारण और सूक्ष्म; ये सोलह प्रकृतियाँ सत्त्वसे व्युच्छिन्न होती हैं, ऐसा जानना चाहिए । अनिवृत्तिकरणके द्वितीय भागमें द्वितीय अप्रत्याख्यानावरणकषाय-चतुष्क और तृतीय प्रत्याख्यानावरणकषायचतुष्क; ये आठ प्रकृतियाँ सत्त्वसे व्युच्छिन्न होती हैं । तृतीय भागमें एक नपुंसकवेद, चतुर्थभागमें एक स्त्रीवेद, पंचम भागमें छह नोकषाय, छठे भागमें पुरुषवेद, सातवें भागमें संज्वलन क्रोध, आठवें भागमें संज्वलन मान और अनिवृत्तिकरणके नवें भागमें जाकर संज्वलन माया सत्त्वसे व्युच्छिन्न होती है ॥५३-५५॥


[मूलगा०४४] मायं चियाणियट्टिभागंगंतूणसत्तवोच्छिण्णा ।
१।१।६।१।१।१।१


सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें सत्त्वसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृति


‘लोभं च य संजलणं सुहुमकसायम्हि वोच्छिण्णा’ ॥५६॥

अर्थ: सूक्ष्मकषायमें एक संज्वलनलोभप्रकृति सत्त्वसे व्युच्छिन्न होती है ॥५६॥


क्षीणकषायगुणस्थानमें सत्त्वसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


खीणकसायदुचरिमे णिद्दा पयला य हणइ छदुमत्थो ।
णाणंतरायदसं दसण चत्तारि चरिमम्हि ॥५७॥

अर्थ: क्षीणकषायके द्विचरम समयमें छद्मस्थ वीतरागसंयत निद्रा और प्रचला; इन दो प्रकृतियोंका क्षय करता है । तथा चरम समयमें ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच और दर्शनावरणकी चक्षुदर्शनावरणादि चार; इन चौदह प्रकृतियोंका घात करता है ॥५७॥


अयोगिकेवलीके द्विचरम समयमें सत्त्वसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


देवदुअ पणसरीरं पंच सरीरस्स बंधणं चेव ।
पंचेव य संघायं संठाणं तह य छक्कं च ॥५८॥

तिण्णि य अंगोवंगं संघयणं तह य होइ छक्कं च ।
पंचेव य वण्ण-रसं दो गंधं अट्ठ फासं च ॥५९॥

अगुरुलहुयचउक्कं विहायगइ-दुग थिराथिरं चेव ।
सुह-सुस्सरजुवला वि य एत्तेयं दुब्भगं अजसं ॥६०॥

आणादेज्जं णिमिणं च य अपज्जत्तं तह य णीचगोदं च ।
अण्णयरवेयणीयं अजोगिदुच्चरिमम्हि वोच्छिण्णा ॥६१॥

अर्थ (गाथा 58 से 61): देवद्विक, पाँचों शरीर, पाँचों शरीरोंके पाँच बन्धन, पाँच संघात, तथा छह संस्थान, तीन अंगोपांग, तथा छह संहनन, पाँच वर्ण, पाँच रस, दो गन्ध, आठ स्पर्श, अगुरुलघुचतुष्क, विहायोगतिद्विक, स्थिर-अस्थिर शुभ-युगल, सुस्वर-युगल, प्रत्येकशरीर, दुर्भग, अयशःकीर्ति, अनादेय, निर्माण, अपर्याप्त, तथा नीचगोत्र और कोई एक वेदनीय; ये बहत्तर प्रकृतियाँ अयोगिकेवलीके द्विचरम समयमें सत्त्वसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥५८-६१॥


अयोगिकेवलीके चरम समयमें सत्त्वसे व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियाँ


[मूलगा०५०] १अण्णयरवेयणीयं मणुयाऊ मणुअदुअं च बोद्धव्वा ।
पंचिंदियजाई वि य तस सुभगादेज्ज पज्जत्तं ॥६२॥

[मूलगा०५१] वायर जसकित्ती वि य तित्थयरं उच्चगोयं चेव ।
एए तेरस पयडी अजोइचरमम्हि संतोच्छिण्णा२ ॥६३॥

अर्थ (गाथा 62 से 63): कोई एक वेदनीय, मनुष्यायु, मनुष्यद्विक, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, सुभग, आदेय, पर्याप्त, बादर, यशःकीर्ति, तीर्थङ्कर और उच्चगोत्र; ये तेरह प्रकृतियाँ अयोगिके चरम समयमें सत्त्वसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥६२-६३॥


अन्तिम मंगल-कामना


[मूलगा०५२] सो मे तिहुअणमहिओ सिद्धो बुद्धो णिरंजणो णिच्चो ।
दिसउ वरणाण-दंसण-चरित्तसुद्धिं समाहिं च३ ॥६४॥

अर्थ: सर्व कर्म-प्रकृतियोंसे रहित, ऐसे वे शुद्ध, बुद्ध, निरंजन और नित्य सिद्ध भगवान् मुझे उत्कृष्ट ज्ञान, दर्शन, चारित्रकी शुद्धि और समाधिको देवें ॥६४॥


कर्मस्तव-चूलिका


छिञ्जइ पढमं बंधो किं उदओ किं अथवा वि जुगवं ।
किं सोदएण बंधो किं वा अण्णोदएण उभएणं ॥६५॥

संतर णिरंतरो वा किं वा बंधो हवेज्ज उभयं वा ।
एवं णवविहपण्हं कमसो वोच्छामि एयं तु ॥६६॥

अर्थ (गाथा 65 से 66): गुणस्थानोंमें पहले जो बन्ध-उदयादि व्युच्छित्ति बतलाई गई है, उनमेंसे क्या बन्ध प्रथम व्युच्छिन्न होता है १, क्या उदयकी पहले व्युच्छित्ति होती है २, अथवा क्या वे दोनों ही एक साथ व्युच्छिन्न होते हैं ३, क्या स्वोदयसे बन्ध होता है ४, क्या परोदयसे बन्ध होता है ५, अथवा क्या उभयके उदयसे बन्ध होता है ६, क्या बन्ध सान्तर होता है ७, अथवा निरन्तर होता है ८, अथवा क्या उभयरूप होता है (६) ? ये नौ प्रकारके प्रश्न हैं । अब मैं क्रमसे इनका उत्तर कहूँगा ॥६५-६६॥


देवाउ अजसकित्ती वेउव्वाहार-देवजुगुलाहं ।
पुव्वं उदओ णस्सइ पच्छा बंधो वि अट्ठण्हं ॥६७॥

अर्थ: देवायु, अयशःकीर्त्ति, वैक्रियिक-युगल, आहारक-युगल और देव-युगल, इन आठ प्रकृतियोंका पहले उदय नष्ट होता है, पीछे बन्ध व्युच्छिन्न होता है ॥६७॥


हस्स रइ भय दुगुंछा सुहुमं साहारणं अपज्जत्तं ।
जाइ-चउक्कं थावर सव्वे व कसाय अंत-लोहूणा ॥६८॥

पुंवेदो मिच्छत्तं णराणुपुव्वी य आयवं चेव ।
इगितीसं पयडीणं जुगवं बंधुदयणासो त्ति ॥६९॥

अर्थ (गाथा 68 से 69): हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, सूक्ष्म, साधारण, अपर्याप्त, एकेन्द्रियादि चार जातियाँ, स्थावर, अन्तिम संज्वलनलोभके बिना सभी (१५) कषाय, पुरुषवेद, मिथ्यात्व, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और आतप; इन इकतीस प्रकृतियोंके बन्ध और उदयका नाश एक साथ होता है ॥६८-६९॥


एक्कासी पयडीणं णाणावरणाइयाण सेसाणं ।
पुव्वं बंधो छिज्जइ पच्छा उदओ त्ति णियमेण ॥७०॥

अर्थ: शेष बची ज्ञानावरणादि कर्मोंकी इक्यासी प्रकृतियोंकी नियमसे पहले बन्ध-व्युच्छित्ति होती है और पीछे उदय-व्युच्छित्ति होती है ॥७०॥


तित्थयराहारदुअं वेउव्वियछक्क णिरय-देवाऊ ।
एयारह पयडीओ बज्झंति परस्स उदयंहि ॥७१॥

अर्थ: तीर्थङ्कर, आहारक-द्विक, वैक्रियिकषट्क, नरकायु और देवायु; ये ग्यारह प्रकृतियाँ परके उदयमें बँधती हैं ॥७१॥


णाणंतरायदसयं दंसणचउ तेय कम्म णिमिणं च ।
थिर-सुहजुयले य तहा वण्णचउ अगुरु मिच्छत्तं ॥७२॥
सत्तावियवीसाए पयडीणं सोदया दु बंधो त्ति ।

अर्थ: ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच, दर्शनावरणकी चक्षुदर्शनावरणादि चार, तैजस-शरीर, कार्मणशरीर, निर्माण, स्थिर-युगल, शुभ-युगल, तथा वर्णचतुष्क, अगुरुलघु और मिथ्यात्व; इन सत्ताईस प्रकृतियोंका स्वोदयसे बन्ध होता है ॥७२॥


सपरोदया दु बंधो हवेज्ज वासीदि सेसाणं ॥७३॥

अर्थ: शेष रही ब्यासी प्रकृतियोंका बन्ध स्वोदयसे भी होता है और परोदयसे भी होता है ॥७३॥


'तित्थयराहारदुअं चउ आउ धुवा य वेह† चउवण्णं‡ ।
एयाणं सव्वाणं पयडीणं णिरंतरो बंधो ॥७४॥

अर्थ: तीर्थङ्कर, आहारकद्विक, चारों आयु, ओर ध्रुवबन्धी सैंतालीस प्रकृतियों, इन सब चौवन प्रकृतियोंका निरन्तर बन्ध होता है ॥७४॥


*संठाणं संघयणं अंतिमदसयं च साइ उज्जोगं ।
इगि विगलिंदिय थावर संढित्थी अरइ सोय अयसं च ॥७५॥

दुब्भग दुस्सरमसुभं सुहुमं साहारणं अपज्जत्तं ।
णिरयदुअमणादेयं असायामथिरं विहायमपसत्थं ॥७६॥
चउतीसं पयडीणं बंधो णियमेण संतरो भणिओ ।

अर्थ (गाथा 75 से 76): अन्तिम पाँच संस्थान, अन्तिम पाँच संहनन, सातावेदनीय, उद्योत, एकेन्द्रियजाति, तीन विकलेन्द्रियजातियाँ, स्थावर, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, अरति, शोक, अयशःकीर्ति, दुर्भग, दुःस्वर, अशुभ, सूक्ष्म, साधारण, अपर्याप्त, नरकद्विक, अनादेय, असातावेदनीय, अस्थिर और अप्रशस्तविहायोगति; इन चौंतीस प्रकृतियोंका नियमसे सान्तर बन्ध कहा गया है ॥७५-७६॥


वत्तीस सेसियाणं बंधो समयम्मि उभओ वि ॥७७॥

अर्थ: शेष बची बत्तीस प्रकृतियोंका बन्ध परमागममें उभयरूप अर्थात् सान्तर और निरन्तर कहा गया है ॥७७॥

चतुर्थ अधिकार: शतक (भाग 1/3)

सयलससिसोमवयणं णिम्मलगत्तं पसत्थणाणधरं ।
पणमिय सिरसा वीरं सुयणाणादो पदं वोच्छं ॥१॥

अर्थ: सम्पूर्ण चन्द्रके समान सौम्य मुख, निर्मल गात्र और प्रशस्त ज्ञानके धारक श्रीवीरभगवान् को मस्तक नवा करके प्रणामकर मैं श्रुतज्ञानसे पदका उद्धार करके कहूँगा ॥१॥


¹णाणोदहिनिस्संदं विण्णाणतिसाहिघायजणणत्थं ।
भवियाण + अमियभूयं जिणवयणारसायणं इणमो ॥२॥

अर्थ: यह जिनवचनरूप रसायन श्रुतज्ञानरूप समुद्रका निष्यन्द (निचोड़ या साररूप बिन्दु) है, तथापि भव्य जीवोंकी विशिष्ट ज्ञानकी प्राप्तिरूप तृषा-पिपासाको शान्त करनेके लिए अमृतके समान है ॥२॥


सुणह इह जीवगुणसण्णिएसु ठाणेसु सारजुत्ताओ ।
वोच्छं कदिवइयाओ गाहाओ दिट्ठिवादाओ ॥३॥

अर्थ: जीवसमास और गुणस्थान-सम्बन्धी सार-युक्त कुछ गाथाओंको दृष्टिवादसे उद्धार करके मैं कहूँगा, सो हे भव्यजीवो ! तुम लोग सावधान होकर सुनो ॥३॥


उवओगा जोगविही जेसु य ठाणेसु जेत्तिया अत्थि ।
जं पच्चओ बंधो हवइ जहा जेसु ठाणेसु ॥४॥

बंध-उदय उदीरणविधी च तिण्हं पि तेसि संजोगो ।
बंध-विहाणो य तहा किंचि समासं पवक्खामि ॥५॥

अर्थ (गाथा 4 से 5): जिन जीवसमास या गुणस्थानोंमें जितने योग और उपयोग होते हैं, जिन-जिन स्थानोंमें जिन-जिन प्रत्ययोंके निमित्तसे जिस प्रकार बन्ध होता है; तथा बन्ध, उदय और उदीरणाके जितने विकल्प संभव हैं और उन तीनोंके संयोगरूप जितने भेद हो सकते हैं, उन्हें तथा बन्धके चारों भेदोंका मैं संक्षेपसे कुछ व्याख्यान करूँगा ॥४-५॥


एइंदिएसु चत्तारि हुंति विगलंदिएसु छच्चेव ।
पंचिंदिएसु एवं चत्तारि हवंति ठाणाणि ॥६॥

तिरियगईए चोदस हवंति सेसासु जाण दो दो दु ।
मग्गणठाणस्सेवं गेयाणि समासठाणाणि ॥७॥

अर्थ (गाथा 6 से 7): जीवसमासके सर्व स्थान चौदह हैं, उनमेंसे एकेन्द्रियोंमें चार स्थान होते हैं। विकलेन्द्रियोंमें छह् स्थान होते हैं और पंचेन्द्रियोंमें चार स्थान होते हैं। तिर्यंचगतिमें चौदह जीवसमास होते हैं। शेष तीन गतियोंमें दो-दो ही जीवसमास जानना चाहिए। इस प्रकार सर्व मार्गणास्थानोंमें भी जीवसमासस्थानोंको लगा लेना चाहिए ॥६-७॥


णिरय-णर-देवगईसुं सण्णी पज्जत्तया अपुण्णा य ।
एइंदियाइं चउदस तिरियगईए हवंति सव्वे वि ॥८॥

एइंदिएसु वायर-सुहुमा चउरो अपुण्ण पुण्णा य ।
पज्जत्तियरा वियल† सयल‡ सण्णी असण्णिदरा पुण्णिदरा ॥९॥

पंचसु थावरकाए वायरसुहुमा अपुण्णा पुण्णा य
वियले पज्जत्तियरा सयले सण्णियर पुण्णिदरा ॥१०॥

अर्थ (गाथा 8 से 10): नरक, मनुष्य और देव इन तीन गतियोंमें संज्ञि-पर्याप्तक और संज्ञि-अपर्याप्तक ये दो-दो जीवसमास होते हैं। तिर्यग्गतिमें एकेन्द्रियको आदि लेकर संज्ञिपंचेन्द्रिय तकके जीवोंकी अपेक्षा सर्व ही चौदह जीवसमास होते हैं (१) । इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा एकेन्द्रियोंमें बादर-पर्याप्त, बादर-अपर्याप्त, सूक्ष्म-पर्याप्त और सूक्ष्म-अपर्याप्त ये चार जीवसमास होते हैं। विकलेन्द्रियोंमें द्वीन्द्रिय-पर्याप्त, द्वीन्द्रिय-अपर्याप्त; त्रीन्द्रिय-पर्याप्त, त्रीन्द्रिय-अपर्याप्त; चतुरिन्द्रिय-पर्याप्त और चतुरिन्द्रिय-अपर्याप्त ये छह जीवसमास होते हैं। पंचेन्द्रियोंमें असंज्ञि-पर्याप्त, असंज्ञि-अपर्याप्त; संज्ञि-पर्याप्त और संज्ञि-अपर्याप्त ये चार जीवसमास होते हैं (२) । कायमार्गणाकी अपेक्षा पाँचों स्थावरकायोंमेंसे प्रत्येकमें बादर-सूक्ष्म और पर्याप्त-अपर्याप्त; ये चार-चार जीवसमास होते हैं। त्रसजीवोंमेंसे विकलत्रयोंमें प्रत्येकके पर्याप्त और अपर्याप्त ये दो-दो जीवसमास होते हैं। तथा सकलेन्द्रियोंमें संज्ञी, असंज्ञी तथा उनके पर्याप्त और अपर्याप्त ऐसे दो-दो मिलकर चार जीवसमास होते हैं (३) ॥८-१०॥


तिय वचि चउ मणजोए सण्णी पज्जत्तओ दु णायव्वो ।
असच्चमोसवचिए पंच वि बेइंदियाइ पज्जत्ता ॥११॥

ओरालमिस्स-कम्मे सत्ताऽपुण्णा य सण्णिपज्जत्तो ।
ओरालकायजोए पज्जत्ता सत्त णायव्वा ॥१२॥

वेउव्वहारदुगे सण्णी पज्जत्तओ सुणेयव्वो ।
वेउव्वमिस्सजोए सणिण-अपज्जत्तओ होइ ॥१३॥

अर्थ (गाथा 11 से 13): योगमार्गणाकी अपेक्षा असत्यमृषावचनयोगको छोड़कर शेष तीन वचनयोगोंमें और चारों मनोयोगोंमें एक संज्ञिपर्याप्तक जीवसमास जानना चाहिए। असत्यमृषावचनयोगमें द्वीन्द्रियादि पाँच पर्याप्तक जीवसमास होते हैं। औदारिकमिश्रकाययोग और कार्मणकाययोगमें सातों अपर्याप्तक तथा संज्ञिपर्याप्तक ये आठ जीवसमास होते हैं। औदारिककाययोगमें सातों पर्याप्तक जीवसमास जानना चाहिए। वैक्रियिककाययोग, आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोगमें एक संज्ञिपर्याप्तक जीवसमास जानना चाहिए। वैक्रियिकमिश्रकाययोगमें एक संज्ञिपर्याप्तक जीवसमास होता है ॥११-१३॥


इत्थि-पुरिसेसु णेया सण्णि असण्णी अपुण्ण पुण्णा य ।
संढे कोहाईसु य जीवसमासा हवंति सव्वे वि ॥१४॥

अर्थ: वेदमार्गणाकी अपेक्षा स्त्रीवेद और पुरुषवेदमें संज्ञी, असंज्ञी, पर्याप्तक और अपर्याप्तक ये चार जीवसमास होते हैं। नपुंसकवेदमें तथा कषायमार्गणाकी अपेक्षा क्रोधादि चारों कषायोंमें सर्वे ही जीवसमास होते हैं ॥१४॥


मइ-सुय-अण्णाणेसु य चउदस जीवा सुओहिमइणाणे ।
सण्णी पुण्णापुण्णा विहंग-मण-केवलेसु संपुण्णो ॥१५॥

अर्थ: ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा मत्यज्ञान और श्रुताज्ञानमें चौदह ही जीवसमास होते हैं। मति, श्रुत और अवधिज्ञानमें संज्ञिपर्याप्त और अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते हैं। विभंगावधि, मनःपर्यय और केवलज्ञानमें एक संज्ञिपर्याप्तक जीवसमास होता है ॥१५॥


सामाइयाइ-छस्सु य सण्णी पज्जत्तओ मुणेयव्वो ।
अस्संजमे अचक्खू चउदस जीवा हवंति णायव्वा ॥१६॥

चक्खूदंसणे छद्धा जीवा चउरिंदियाइ ओहम्मि ।
सण्णी पज्जत्तियरा केवलदंसे य सण्णि-संपुण्णो ॥१७॥

अर्थ (गाथा 16 से 17): संयममार्गणाकी अपेक्षा सामायिक आदि पाँच संयम और देशसंयम, इन छहोंमें एक संज्ञिपर्याप्तक जीवसमास जानना चाहिए। असंयम और दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा अचक्षुदर्शनमें चौदह ही जीवसमास जानना चाहिए। चक्षुदर्शनमें चतुरिन्द्रियादि छह जीवसमास होते हैं। अवधिदर्शनमें संज्ञिपर्याप्तक और अपर्याप्तक ये दो जीवसमास होते हैं। केवलदर्शनमें एक संज्ञिपर्याप्तक जीवसमास होता है ॥१६-१७॥


किण्हाइतिए चउदस तेआइतिए य सण्णि दुविहा वि ।
भव्वाभव्वे चउदस उवसमसम्माइ सण्णि-दुविहो* वि ॥१८॥

सासणसम्मे सत्त अपज्जत्ता होंति सण्णि-पज्जत्तो ।
मिस्से सण्णी पुण्णो मिच्छे सव्वे वि बोद्धव्वा ॥१९॥

अर्थ (गाथा 18 से 19): लेश्यामार्गणाकी अपेक्षा कृष्णादि तीनों अशुभलेश्याओंमें चौदह-चौदह जीवसमास होते हैं। तेज आदि तीनों शुभलेश्याओंमें संज्ञिपर्याप्तक और अपर्याप्तक ये दो जीवसमास होते हैं। भव्यमार्गणाकी अपेक्षा भव्य और अभव्यके चौदह ही जीवसमास होते हैं। सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा औपशमिकसम्यक्त्व आदि तीनों सम्यग्दर्शनोंमें संज्ञिपर्याप्तक और अपर्याप्तक ये दो-दो जीवसमास होते हैं। सासादनसम्यक्त्वमें विग्रहगतिकी अपेक्षा सातों अपर्याप्तक और संज्ञिपर्याप्तक ये आठ जीवसमास होते हैं। मिश्र अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्वमें एक संज्ञिपर्याप्तक जीवसमास होता है। मिथ्यात्वमें सर्व ही जीवसमास जानना चाहिए ॥१८-१९॥


सण्णिम्मि सण्णि-दुविहो इयरे ते वज्ज बारसाहारे ।
चउदस जीवा इयरे सत्त अपुण्णा य सण्णि-संपुण्णा ॥२०॥

अर्थ: संज्ञिमार्गणाकी अपेक्षा संज्ञिपंचेन्द्रियोंमें संज्ञिपर्याप्तक और अपर्याप्तक ये दो जीवसमास होते हैं। असंज्ञिपंचेन्द्रियोंमें संज्ञिपंचेन्द्रिय-सम्बन्धी दो जीवसमास छोड़कर शेष बारह जीव-समास होते हैं। आहारमार्गणाकी अपेक्षा आहारक जीवोंमें चौदह ही जीवसमास होते हैं। अनाहारकोंमें सातों अपर्याप्तक और एक संज्ञिपर्याप्तक ये आठ जीवसमास होते हैं ॥२०॥ इस प्रकार चौदह मार्गणाओंमें जीवसमासोंका वर्णन समाप्त हुआ।


छट्ठो त्ति पढमसण्णा सकज्ज सेसा य कारणवेक्खा ।
पुव्वो पढमणियट्टी सुहुमो त्ति कमेण सेसाओ३ ॥२१॥

अर्थ: ग्यारह जीवसमासोंमें तीन-तीन उपयोग होते हैं। दो जीवसमासोंमें चार-चार उपयोग होते हैं। एक जीवसमासमें बारह ही उपयोग होते हैं। इस प्रकार जीवसमासोंमें यह उपयोग-विधि जानना चाहिए ॥२१॥


'मइ-सुअ-अण्णाणाई अचक्खु एयारसेसु तिण्णेव ।
चक्खुसहि या ते चिय चउरक्खे असण्णि-पज्जत्ते ॥२२॥

मइ-सुय-ओहिदुगाई सण्णि-अपज्जत्तएसु उवओगा ।
सव्वे वि सण्णि-पुण्णे उवओगा जीवठाणेसु ॥२३॥

अर्थ (गाथा 22 से 23): एकेन्द्रियोंके बादर, सूक्ष्म, पर्याप्तक और अपर्याप्तक ये चार; द्वीन्द्रिय और त्रीन्द्रिय-सम्बन्धी पर्याप्तापर्याप्तक चार; चतुरिन्द्रिय, असंज्ञि और संज्ञी अपर्याप्तक ये तीन; इस प्रकार इन ग्यारह जीवसमासोंमें मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान और अचक्षुदर्शन; ये तीन-तीन उपयोग होते हैं। चतुरिन्द्रिय और असंज्ञिपंचेन्द्रियपर्याप्तक इन दो जीवसमासोंमें चक्षुदर्शनसहित उपर्युक्त तीन उपयोग, इस प्रकार चार-चार उपयोग होते हैं। मिथ्यादृष्टि संज्ञिपंचेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवोंमें उपर्युक्त चार, तथा सम्यग्दृष्टि संज्ञि अपर्याप्तकोंमें मति, श्रुत और अवधिद्विक ये चार उपयोग होते हैं। संज्ञिपंचेन्द्रिय पर्याप्तकमें सर्व ही अर्थात् बारह ही उपयोग होते हैं। इस प्रकार चौदह जीवसमासोंमें उपयोगोंका वर्णन किया गया ॥२२-२३॥


मार्गणास्थानोंमें उपयोगोंका निरूपण


'केवलदुय मणवज्जं णिरि तिरि देवेसु होंति सेसा दु ।
मणुए बारह गेया उवओगा मग्गणस्सेवं ॥२४॥

अर्थ: गतिमार्गणाकी अपेक्षा नरक, तिर्यञ्च और देवगतिमें केवलद्विक और मनःपर्ययज्ञान इन तीनको छोड़कर शेष नौ-नौ उपयोग होते हैं। मनुष्यगतिमें बारह ही उपयोग होते हैं। शेष मार्गणाओंमें उपयोग इस प्रकार जानना चाहिए॥२४॥


वि-ति-इंदियजीवे अचक्खु मइ सुअ अणाण उवओगा ।
चउरक्खे ते चक्खुजुत्ता सव्वे वि पंचक्खे ॥२५॥

अर्थ: इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय और त्रीन्द्रिय जीवोंमें अचक्षुदर्शन, मत्यज्ञान और श्रुताज्ञान ये तीन-तीन उपयोग होते हैं। चतुरिन्द्रियजीवोंमें चक्षुदर्शनसहित उक्त तीनों उपयोग, इस प्रकार चार उपयोग होते हैं। पंचेन्द्रियोंमें सर्व ही उपयोग होते हैं ॥२५॥


पंचसु थावरकाए अचक्खु मइ सुअ अणाण उवओगा ।
पढमंते मण-वचिए तसकाए उरालएसु सव्वे वि ॥२६॥

मज्झिमल्ले मण-वचिए सव्वे वि हुवंति केवलदुगुणा ।
ओरालमिस्स-कम्मे मणपज्ज-विहंग-चक्खुहीणा ते ॥२७॥

वेउव्वे मणपअव-केवलजुगलगुणा दु ते चेव ।
तम्मिस्से केवलदुग-मणपज्ज-विहंग-चक्खूणा ॥२८॥

केवलदुय-मणपज्जव-अण्णाणतिएहिं होंति ते ऊणा ।
आहारजुयलजोए पुरिसे ते केवलदुगुणा ॥२९॥

केवलदुग-मणीहीणा इत्थी-संढम्मि ते दु सव्वे वि ।
केवलदुगपरिहीणा कोहादिसु होंति णायव्वा ॥३०॥

अर्थ (गाथा 26 से 30): कायमार्गणाकी अपेक्षा पाँचों स्थावरकायोंमें अचक्षुदर्शन, मत्यज्ञान और श्रुताज्ञान ये तीन-तीन उपयोग होते हैं । त्रसकायमें सर्व ही उपयोग होते हैं । योगमार्गणाकी अपेक्षा प्रथम और अन्तिम मनोयोग तथा वचनयोगमें और औदारिककाययोगमें सर्व ही उपयोग होते हैं । मध्यके दोनों मनोयोग और वचनयोगमें केवलद्विकको छोड़कर शेष सर्व उपयोग होते हैं । औदारिकमिश्रकाययोग और कार्मणकाययोगमें मनःपर्ययज्ञान, विभंगायधि और चक्षुदर्शन; इन तीनको छोड़कर शेष नौ उपयोग होते हैं । वैक्रियिककाययोगमें मनःपर्ययज्ञान और केवलद्विकको छोड़कर शेष नौ उपयोग होते हैं । वैक्रियिकमिश्रकाययोगमें केवलद्विक, मनःपर्ययज्ञान, विभंगावधि और चक्षुदर्शन इन पाँचको छोड़कर शेष सात उपयोग होते हैं । आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोगमें केवलद्विक, मनःपर्ययज्ञान और अज्ञानत्रिक, इन छहको छोड़कर शेष छह उपयोग होते हैं । वेदमार्गणाकी अपेक्षा पुरुषवेदमें केवलद्विकको छोड़कर शेष दश उपयोग होते हैं । स्त्रीवेद और नपुंसकवेदमें केवलद्विक और मनःपर्ययज्ञान; इन तीनको छोड़कर शेष सर्व उपयोग होते हैं । कषायमार्गणाकी अपेक्षा क्रोधादि चारों कषायोंमें केवलद्विकको छोड़कर शेष दश-दश उपयोग जानना चाहिए ॥२६-३०॥


अण्णाणतिए होंति य अण्णाणतियं अचक्खु-चक्खूणि ।
सण्णाण-पढमचउरे अण्णाणतिगूण केवलदुगूणा ॥३१॥

केवलणाणम्मि तहा केवलदुगमेव होइ णायव्वं ।
सामाइय-छेय-सुहुमे अण्णाणतिगूण केवलदुगूणा ॥३२॥

दंसण-णाणाइटियं देसे परिहारसंजमे य तहा ।
पंच य सण्णाणाइं दंसणचउरं च जहखाए ॥३३॥

असंजमम्मि णेया मणपज्जव-केवलजुगलएहिं हीणा ते ।
दंसण-आइद्दुगे खलु केवलजुगलेण ऊणिया सव्वे ॥३४॥

ओहीदंसे केवलदुग अण्णाणतिऊणिया सव्वे ।
केवलदंसे णेयं केवलदुगमेव होइ णियमेण ॥३५॥

अर्थ (गाथा 31 से 35): ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा तीनों अज्ञानोंमें तीनों अज्ञान और चक्षुदर्शन वा अचक्षुदर्शन ये पाँच-पाँच उपयोग होते हैं। प्रथमके चारों सद्ज्ञानोंमें तीन अज्ञान और केवलद्विकके विना शेष सात-सात उपयोग होते हैं। केवलज्ञानमें केवलज्ञान और केवलदर्शन ये दो उपयोग जानना चाहिए। संयममार्गणाकी अपेक्षा सामायिक, छेदोपस्थापना और सूक्ष्मसाम्परायसंयममें अज्ञान-त्रिक और केवलद्विकके बिना शेष सात-सात उपयोग होते हैं। परिहारसंयम तथा देशसंयममें आदिके तीन दर्शन और तीन सद्ज्ञान इस प्रकार छह-छह उपयोग होते हैं। यथाख्यातसंयममें पाँचों सद्ज्ञान और चारों दर्शन इस प्रकार नौ उपयोग होते हैं। असंयममें मनःपर्ययज्ञान और केवलद्विकके बिना शेष नौ उपयोग होते हैं। दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा आदिके दो दर्शनोंमें केवलद्विकके विना शेष दश-दश उपयोग होते हैं। अवधिदर्शनमें केवलद्विक और अज्ञानत्रिकके बिना शेष सात उपयोग होते हैं। केवलदर्शनमें नियमसे केवलज्ञान और केवलदर्शन ये दो उपयोग होते हैं ॥३१-३५॥


किण्हाइतिए णेया मण-केवलजुगलएहिं ऊणा ते।
तेऊ पम्मे भविए केवलदुयवज्जिया दु ते चेव ॥३६॥

सुक्काए सव्वे वि य मिच्छा सासण अभविय जीवेसु ।
अण्णाणतियमचक्खू चक्खूणि हवंति णायव्वा ॥३७॥

दंसण-णाणाइतियं उवसमसम्मम्मि होइ बोद्धव्वं ।
मिस्से ते चिय × मिस्सा अण्णाणतिगूणया खइए ॥३८॥

वेदयसम्में केवलदुअ-अण्णाणतियऊणिया सव्वे ।
केवलदुएण रहिया ते चेव हवंति सण्णिम्मि ॥३९॥

मइ-सुअअण्णाणाई अचक्खु-चक्खूणि होंति इयरम्मि ।
आहारे ते सव्वे विहंग-मण-चक्खु-ऊणिया इयरे ॥४०॥

अर्थ (गाथा 36 से 40): लेश्यामार्गणाकी अपेक्षा कृष्णादि तीनों अशुभलेश्याओंमें मनःपर्ययज्ञान और केवलद्विकके बिना शेष नौ-नौ उपयोग होते हैं। तेजोलेश्या, पद्मलेश्या और भव्यमार्गणाकी अपेक्षा भव्यजीवोंमें केवलद्विकके बिना शेष दश-दश उपयोग होते हैं। शुक्ललेश्यामें सर्व ही उपयोग होते हैं। अभव्यजीवोंमें तथा सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा मिथ्यात्व और सासादनसम्यक्त्वमें तीनों अज्ञान, चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शन ये पाँच-पाँच उपयोग होते हैं, ऐसा जानना चाहिए। औपशामिकसम्यक्त्वमें आदिके तीन दर्शन और तीन सद्ज्ञान ये छह उपयोग होते हैं। सम्यग्मिथ्यात्वमें वे ही छह मिश्रित उपयोग होते हैं। क्षायिकसम्यक्त्वमें अज्ञानत्रिकके बिना शेष नौ उपयोग होते हैं। वेदकसम्यक्त्वमें केवलद्विक और अज्ञानत्रिकके बिना शेष सात उपयोग होते हैं। संज्ञिमार्गणाकी अपेक्षा संज्ञी जीवोंमें केवलद्विकके बिना शेष दश उपयोग होते हैं। असंज्ञी जीवोंमें मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान, चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शन ये चार उपयोग होते हैं। आहारमार्गणाकी अपेक्षा आहारक जीवोंमें सर्व ही उपयोग होते हैं। अनाहारक जीवोंमें विभंगावधि, मनःपर्ययज्ञान और चक्षुदर्शनके बिना शेष नौ उपयोग होते हैं ॥३६-४०॥ इस प्रकार मार्गणाओंमें उपयोगोंका वर्णन समाप्त हुआ।


[मूलगा०७] १णवसु चउक्के एक्के जोगा† एक्को य दोण्णि चोद्दस ते ।
तब्भवगएसु एदे भवंतराएसु कम्मइओ ॥४१॥

अर्थ: नौ जीवसमासोंमें एक योग होता है, चार जीवसमासोंमें दो योग होते हैं और एक जीवसमासमें चौदह योग होते हैं । तद्भवगत अर्थात् अपने वर्तमान भवके शरीरमें विद्यमान जीवोंमें ये योग जानना चाहिए । किन्तु भवान्तरगत अर्थात् विग्रहगतिवाले जीवोंके केवल एक कार्मणकाययोग होता है ॥४१॥


‘छसु पुण्णेसु* उरालं सत्त अपज्जत्तएसु तम्मिसं ।
भासा असच्चमोसा चदुसु’ वेइंदियाइपुण्णेसु’ ॥४२॥

सण्णि-अपज्जत्तेसु’ वेउव्वियमिस्सकायजोगो दु ।
सण्णी-संपुण्णेसुं चउदस जोया मुणेयव्वा ॥४३॥

अर्थ (गाथा 42 से 43): सूक्ष्म एकेन्द्रिय, और बादर एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञिपंचेन्द्रिय इन छह पर्याप्तक जीवसमासोंमेंसे आदिके दो जीवसमासोंमें केवल एक औदारिककाययोग होता है; और शेष चार पर्याप्तक जीवसमासोंमें औदारिककाययोग और असत्यमृषावचनयोग ये दो योग होते हैं। सातों अपर्याप्तक जीवसमासोंमें यथासंभव औदारिकमिश्रकाययोग, वैक्रियिकमिश्रकाययोग और आहारकमिश्रकाययोग होता है। असत्यमृषावचनयोग द्वीन्द्रियादि चार पर्याप्तक जीवसमासोंमें होता है। संज्ञिपंचेन्द्रिय-अपर्याप्तक जीवोंमें वैक्रियिकमिश्रकाययोग भी होता है। संज्ञिपंचेन्द्रिय-पर्याप्तक जीवोंमें कार्मणकाययोगको छोड़कर शेष चौदह योग जानना चाहिए॥४२-४३॥


ओरालाहारदुए वज्जिय सेसा दु णिरय-देवेसु ।
वेउव्वआहारदुगूणा तिरिए मणुए वेउव्वदुगहीणा ॥४४॥

अर्थ: गतिमार्गणाकी अपेक्षा नारकी और देवोंमें औदारिकद्विक अर्थात् औदारिककाययोग, औदारिकमिश्रकाययोग और आहारकद्विक अर्थात् अहार्ककाययोग, आहारकमिश्रकाययोग इन चार योगोंको छोड़कर शेष ग्यारह-ग्यारह योग होते हैं। तिर्यञ्चोंमें वैक्रियिकद्विक अर्थात् वैक्रियिककाययोग और वैक्रियिकमिश्रकाययोग तथा आहारकद्विक, इन चार योगोंको छोड़कर शेष ग्यारह योग होते हैं। मनुष्योंमें वैक्रियिकद्विकको छोड़कर शेष तेरह योग होते हैं ॥४४॥


कम्मोरालदुगाइँ जोगा एइंदियम्मि वियलेसु ।
वयंतजोयसहिया ते चिय पंचिंदिए सव्वे ॥४५॥

अर्थ: इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा एकेन्द्रियोंमें कार्मणकाययोग और औदारिकद्विक ये तीन योग होते हैं। विकलेन्द्रियोंमें अन्तिम वचनयोग अर्थात् असत्यमृषावचनयोग-सहित उपर्युक्त तीन योग, इस प्रकार चार योग होते हैं। पंचेन्द्रियोंमें सर्व योग होते हैं ॥४५॥


कम्मोरालदुगाइँ थावरकाएसु होंति पंचेसु ।
तसकाएसु य सव्वे सगो सगो होइ जोएसु ॥४६॥

अर्थ: कायमार्गणाकी अपेक्षा पाँचों स्थावरकायिकोंमें कार्मणकाययोग और औदारिकद्विक ये तीन योग होते हैं, तथा त्रसकायिकजीवोंमें सभी योग होते हैं। योगमार्गणाकी अपेक्षा स्व-स्वयोग-वाले जीवोंके स्व-स्वयोग होता है। अर्थात् सत्यमनोयोगियोंके सत्यमनोयोग, असत्यमनोयोगियोंके असत्यमनोयोग इत्यादि ॥४६॥


पुरिसे सव्वे जोगा इत्थी-संडेम्मि आहारदुगूणा ।
कोहाईसु य सव्वे मइ-सुय-ओहीसु होंति सव्वे वि ॥४७॥

मइ-सुअअण्णाणेसुं आहारदुगूणया दु ते सव्वे ।
अपुण्णजोगरहिया आहारदुगूणया य विभंगे ॥४८॥

केवलजुयले मण-वचि पढमंतोरालजुगलकम्मक्खा ।
मण-सुहुमे परिहारे देसे ओराल मण-वचि-चउक्का ॥४९॥

अर्थ (गाथा 47 से 49): वेदमार्गणाकी अपेक्षा पुरुषवेदियोंके सभी योग होते हैं। स्त्रीवेदी और नपुंसकवेदी जीवोंके आहारकद्विकको छोड़कर शेष तेरह योग होते हैं। कषायमार्गणाकी अपेक्षा क्रोधादि चारों कषायवाले जीवोंके सभी योग पाये जाते हैं। ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा मति, श्रुत और अवधिज्ञानी जीवोंके सर्व ही योग होते हैं। मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोंके आहारकद्विकको छोड़कर शेष तेरह-तेरह योग होते हैं। विभंगज्ञानियोंके अपर्याप्तकाल-सम्बन्धी औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र और कार्मणकाययोग ये तीन योग तथा आहारकद्विक इनके बिना शेष दश योग होते हैं। केवल-युगल अर्थात् केवलज्ञान और केवलदर्शनवाले जीवोंके प्रथम और अन्तिम मनोयोग एवं वचन-योग, तथा औदारिकयुगल और कार्मणकाययोग ये सात-सात योग होते हैं। मनःपर्ययज्ञान, सूक्ष्मसाम्परायसंयम, परिहारविशुद्धिसंयम और संयमासंयमवाले जीवोंके मनोयोगचतुष्क, वचनयोगचतुष्क और औदारिककाययोग ये नौ-नौ योग होते हैं ॥४७-४९॥


आहारदुगोराला मण-वचि-चउरा य सामाइय-छेदे ।
कम्मोरालदुगाइ मण-वचि-चउरा य जहखाए ॥५०॥

अर्थ: संयममार्गणाकी अपेक्षा सामायिकसंयम और छेदोपस्थापनासंयमवाले जीवोंके चारों मनोयोग, चारों वचनयोग, आहारकद्विक और औदारिककाययोग ये ग्यारह-ग्यारह योग होते हैं। यथाख्यातसंयमवाले जीवोंके चारों मनोयोग, चारों वचनयोग, औदारिकद्विक और कार्मण-काययोग ये ग्यारह योग होते हैं ॥५०॥


किण्हाइ-तिआऽसंजम अभव्व जीवेसु आहारदुगूणा ।
तेआइतिआऽचक्खू ओही भव्वेसु होंति सव्वे वि ॥५१॥

चक्खुदंसणे जोगा मिस्सतिगं वज्ज होंति सेसा दु ।
उवसम-मिच्छा-सादे आहारदुगूणया णेया ॥५२॥

वेदय-खहए सव्वे मिस्से मिस्सतिगाहारदुगहीणा ।
सण्णियजीवे णेया सव्वे जोया जिणेहिं णिद्दिट्ठा ॥५३॥

इयरे कम्मोरालियदुगवयर्णतल्लया होंति ।
आहारे कम्मृणा अणहारे कम्मए व जोगो दु ॥५४॥

अर्थ (गाथा 51 से 54): लेश्यामार्गणाकी अपेक्षा कृष्णादि तीन लेश्यावालोंके, तथा असंयमी और अभव्य जीवोंके आहारकद्विकको छोड़कर शेष तेरह-तेरह योग होते हैं। तेजोलेश्यादि तीन लेश्यावालोंके, अचक्षुदर्शनी, अवधिदर्शनी और भव्यजीवोंमें सर्व ही योग पाये जाते हैं । चक्षुदर्शनी जीवोंमें अपर्याप्तकाल-सम्बन्धी तीनों मिश्रयोगोंको छोड़कर शेष बारह योग पाये जाते हैं । सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा उपशमसम्यग्दृष्टि, मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंके आहारकद्विकको छोड़कर शेष तेरह-तेरह योग जानना चाहिए । वेदकसम्यग्दृष्टि और क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवोंमें सभी योग पाये जाते हैं । मिश्र अर्थात् सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंमें अपर्याप्तकाल-सम्बन्धी मिश्रत्रिक और आहारकद्विकको छोड़कर शेष दश योग पाये जाते हैं । संज्ञिमार्गणाकी अपेक्षा संज्ञी जीवोंमें सभी योग जानना चाहिए, ऐसा जिन भगवान्ने उपदेश दिया है । असंज्ञी जीवोंमें कार्मणकाययोग, औदारिकद्विक और अन्तिम वचनयोग ये चार योग होते हैं । आहारमार्गणाकी अपेक्षा आहारक जीवोंमें कार्मणकाययोगको छोड़कर शेष चौदह योग पाये जाते हैं । अनाहारक जीवोंमें एकमात्र कार्मणकाययोग ही पाया जाता है ॥५१-५४॥


[मूलगा० ८] उवओगा जोगविही मग्गण-जीवेसु वण्णिया एदे ।
एत्तो गुणेहिं सह परिणदाणि *ठाणाणि मे सुणह ॥५५॥

[मूलगा० ६] *मिच्छा सासण मिस्सो अविरदसम्मो य देसविरदो य ।
णव संजए य एवं चउदस गुणणाम †ठाणाणि ॥५६॥

अर्थ (गाथा 55 से 56): इस प्रकार मार्गणा और जीवसमासोंमें यह उपयोग और योगविधिका वर्णन किया है। अब इससे आगे गुणोंसे परिणत इन स्थानोंको कहता हूँ सो सुनो। मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरतसम्यक्त्व और देशविरत, तथा इससे आगे संयतोंके नौ गुणस्थान इस प्रकार सार्थक नामवाले चौदह गुणस्थान होते हैं ॥५५-५६॥


मार्गणाओंमें गुणस्थानोंका निरूपण


[मूलगा० १०] ‘सुर-णारएसु चत्तारि होंति तिरिएसु जाण पंचेव ।
मणुयगईए वि तहा चोद्दस गुणणामधेयाणि’ ॥५७॥

२मिच्छाई चत्तारि य सुर-णिरए पंच होंति तिरिएसु ।
मणुयगईए वि तहा चोद्दस गुणणामधेयाणि ॥५८॥

अर्थ (गाथा 57 से 58): गतिमार्गणाकी अपेक्षा देव और नरकगतिमें मिथ्यात्वको आदि लेकर चार गुणस्थान होते हैं। तिर्यंचोंमें मिथ्यात्व आदि पाँच गुणस्थान होते हैं। तथा मनुष्यगतिमें चौदह ही गुणस्थान होते हैं ॥५७-५८॥


मिच्छा सादा दोण्णि य इगि-वियले होंति ताणि णायव्वा ।
पंचिंदियम्मि चोद्दस बादरहरिएसु दोण्णि पढमाणि ॥५६॥

तेउ-वाऊकाए मिच्छं तसकाए चोद्दस हवंति ।
मण-वचि-पढमंतेसुं ओराले चेव जोगंता ॥६०॥

खीणंता मज्झिल्ले मिच्छाइ चयारि वेउव्वे ।
तम्मिस्से मिस्सूणा हारदुगे पमत्त एगो दु ॥६१॥

ओरालमिस्स-कम्मे मिच्छा सासण अजइ सजोगा य ।
कोहाइतिय तिवेदे मिच्छाई णवय दस लोहे ॥६२॥

अर्थ (गाथा 59 से 62): इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीवोंमें मिथ्यात्व और सासादन ये दो गुणस्थान होते हैं। यहाँ यह विशेष ज्ञातव्य है कि उक्त जीवोंमें सासादनगुणस्थान निवृत्त्यपर्याप्तक-दशामें ही संभव है, अन्यत्र नहीं। पंचेन्द्रियोंमें चौदह ही गुणस्थान होते हैं। कायमार्गणाकी अपेक्षा पृथिवीकायिक, जलकायिक और वनस्पतिकायिक जीवोंमें आदिके दो गुणस्थान होते हैं। तेजस्कायिक और वायुकायिक जीवोंमें मिथ्यात्व गुणस्थान होता है और त्रसकायिक जीवोंमें चौदह ही गुणस्थान होते हैं। योगमार्गणाकी अपेक्षा प्रथम और अन्तिम मनोयोग और वचनयोगमें तथा औदारिककाययोगमें सयोगिकेवली तकके तेरह गुणस्थान होते हैं। मध्यके दोनों मनोयोगों और वचनयोगोंमें क्षीणकषायतकके बारह गुणस्थान होते हैं। वैक्रियिककाययोगमें मिथ्यात्व आदि चार गुणस्थान होते हैं। वैक्रियिकमिश्रकाययोगमें मिश्रगुणस्थानको छोड़कर आदिके तीन गुणस्थान होते हैं। आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोगमें एक प्रमत्तसंयत गुणस्थान होता है। औदारिकमिश्रकाययोग और कार्मणकाययोगमें मिथ्यात्व, सासादन, असंयत और सयोगकेवली ये चार-चार गुणस्थान होते हैं। वेदमार्गणाकी अपेक्षा तीनों वेदोंमें तथा कषायमार्गणाकी अपेक्षा क्रोधादि तीन कषायोंमें मिथ्यात्व आदि नौ गुणस्थान होते हैं। लोभकषायमें आदिके दश गुणस्थान होते हैं ॥५६-६२॥


पढमा दोण्णणण्णाणे णाणतिए णव दु अविरयाई ।
सत्त पमत्ताइ मणे केवलजुयलम्मि अंतिमा दोण्णि ॥६३॥

अर्थ: ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा अज्ञानत्रिक अर्थात् कुमति, कुश्रुत और विभंगज्ञानवाले जीवोंके आदिके दो गुणस्थान होते हैं। ज्ञानत्रिक अर्थात् मति, श्रुत और अवधिज्ञानवाले जीवोंमें असंयत-सम्यग्दृष्टिको आदि लेकर नौ गुणस्थान होते हैं। मनःपर्ययज्ञानवाले जीवोंके प्रमत्तसंयतको आदि लेकर सात गुणस्थान होते हैं। केवलयुगल अर्थात् केवलज्ञान और केवलदर्शनवाले जीवोंके अन्तिम दो गुणस्थान होते हैं ॥६३॥


सामाइय-छेदेसुं पमत्तयाईणि होंति चत्तारि ।
जहखाए संताई सुहुमे देसम्मि सुहुम देसा य ॥६४॥

असंजमम्मि चउरो मिच्छाइ दुवालस हवंति ।
चक्खू अचक्खू य तहा परिहारे दो पमत्ताई ॥६५॥

अर्थ (गाथा 60 से 65): ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा मतिज्ञानी और श्रुतज्ञानी जीवोंमें आहारकद्विकके बिना शेष पचपन-पचपन बन्ध-प्रत्यय जानना चाहिए। विभंगज्ञानियोंमें मिश्रत्रिक अर्थात् औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र और कार्मणकाययोग, तथा आहारकद्विक; इन पाँचको छोड़कर शेष बावन बन्ध-प्रत्यय जानना चाहिए। मतिज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिद्विक अर्थात् अवधिज्ञानी और अवधिदर्शनी जीवोंमें अनन्तानुबन्धचतुष्क और मिथ्यात्वपंचक; इन नौके बिना शेष अड़तालीस-अड़तालीस बन्ध-प्रत्यय होते हैं। मनःपर्ययज्ञानियोंमें हास्यादिषट्क, पुरुषवेद, संज्वलनचतुष्क, मनोयोगचतुष्क, वचनयोगचतुष्क और औदारिककाययोग; ये बीस बन्ध-प्रत्यय होते हैं। केवलिद्विक अर्थात् केवलज्ञानी और केवलदर्शनी जीवोंमें आदि और अन्तके दो-दो मनोयोग और वचनयोग, तथा औदारिकद्विक और कार्मणकाययोग; इस प्रकार सात-सात बन्ध-प्रत्यय होते हैं। संयममार्गणाकी अपेक्षा सामायिक और छेदोपस्थापनासंयमी जीवोंमें संज्वलनचतुष्क, नौ नोकषाय, मनोयोगचतुष्क, वचनयोगचतुष्क, औदारिककाययोग और आहारकद्विक, ये चौबीस-चौबीस बन्ध-प्रत्यय होते हैं। परिहारविशुद्धसंयमी जीवोंमें उक्त चौबीसमेंसे आहारकद्विकके सिवाय शेष बाईस बन्ध-प्रत्यय होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायसंयमियोंमें मनोयोगचतुष्क, वचनयोगचतुष्क, औदारिककाययोग और सूक्ष्मलोभ, ये दश बन्ध-प्रत्यय होते हैं। यथाख्यातसंयमियोंमें मनोयोगचतुष्क, वचनयोगचतुष्क, औदारिकद्विक और कार्मणकाययोग, ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं। असंयमी जीवोंमें आहारकद्विकके बिना शेष पचपन बन्ध-प्रत्यय जानना चाहिए। देशसंयमी जीवोंमें अनन्तानुबन्धिचतुष्क, अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क, मिथ्यात्वपंचक, त्रसबध, वैक्रियिकयुगल, आहारकयुगल, औदारिकमिश्र और कार्मणकाययोग, इन बीसके बिना शेष सैंतीस बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥६०-६५॥


अजयाई खीणंता ओहीदंसे हवंति णव चेव ।
किण्हाइतिए चउरो मिच्छाई तेर सुक्काए ॥६६॥

अर्थ: लेश्यामार्गणाकी अपेक्षा तेज-त्रिक अर्थात् तेज, पद्म और शुक्ललेश्यावाले जीवोंमें, दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा चक्षुयुगल अर्थात् चक्षुदर्शनी और अचक्षुदर्शनी जीवोंमें तथा भव्यमार्गणाकी अपेक्षा भव्योमें सभी बन्ध-प्रत्यय होते हैं। कृष्णादि तीन लेश्यावालोंमें, तथा अभव्योंमें आहारकद्विकके बिना पचपन बन्ध-प्रत्यय जानना चाहिए ॥६६॥


तेऊ पम्मासु तहा मिच्छाई अप्पमत्तंता ।
खीर्णंता भव्वम्मि य अभव्वे मिच्छत्तमेयं तु ॥६७॥

अर्थ (गाथा 64 से 67): संयममार्गणाकी अपेक्षा सामायिक और छेदोपस्थापना संयमवाले जीवोंके प्रमत्तसंयत आदि चार गुणस्थान होते हैं। यथाख्यातसंयमवाले जीवोंके उपशान्तकषाय आदि चार गुणस्थान होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायसंयमवालोंके एक सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान और देशसंयमवालोंके एक देशविरतगुणस्थान होता है। असंयमी जीवोंके मिथ्यात्व आदि चार गुणस्थान होते हैं। परिहार विशुद्धिसंयमवालोंके प्रमत्तसंयत आदि दो गुणस्थान होते हैं। दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा चक्षुदर्शनी और अचक्षुदर्शनी जीवोंके मिथ्यात्व आदि बारह गुणस्थान होते हैं। अवधिदर्शनी जीवोंके असंयतसम्यग्दृष्टिको आदि लेकर क्षीणकषायतकके नौ गुणस्थान होते हैं। लेश्यामार्गणाकी अपेक्षा कृष्णादि तीन लेश्यावाले जीवोंके मिथ्यात्वादि चार गुणस्थान होते हैं। शुक्ललेश्यावालोंके मिथ्यात्वादि तेरह गुणस्थान होते हैं। तथा तेज और पद्मलेश्यावालोंके मिथ्यात्वको आदि लेकर अप्रमत्तसंयतान्त सात गुणस्थान होते हैं। भव्यमार्गणाकी अपेक्षा भव्यजीवोंके क्षीणकषायान्त बारह गुणस्थान होते हैं। अभव्य जीवोंके तो एकमात्र मिथ्यात्वगुणस्थान होता है ॥६४-६७॥


अट्ठेयारह चउरो अविरयाईणि होंति ठाणाणि ।
उवसम-खय-मिस्सम्मि य मिच्छाइतियम्मि एय तण्णामं ॥६८॥

अर्थ (गाथा 67 से 68): सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा उपशमसम्यक्त्वी जीवोंके अविरतसम्यक्त्व आदि आठ गुणस्थान होते हैं। क्षायिकसम्यक्त्वी जीवोंके अविरतसम्यक्त्व आदि ग्यारह गुणस्थान होते हैं। क्षायोपशमसम्यक्त्वी जीवोंके अविरतसम्यक्त्व आदि चार गुणस्थान होते हैं। मिथ्यात्वादित्रिकमें तत्तन्नामक एक एक ही गुणस्थान होता है अर्थात् मिथ्यादृष्टियोंके पहला मिथ्यात्वगुणस्थान, सासादनसम्यग्दृष्टियोंके सासादननामक दूसरा गुणस्थान और सम्यग्मिथ्यादृष्टियोंके सम्यग्मिथ्यात्व नामक तीसरा गुणस्थान होता है ॥६८॥ सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा औपशमिकसम्यक्त्वी जीवोंमें अनन्तानुबन्धिचतुष्क, मिथ्यात्वपंचक, और आहारकद्विक इन ग्यारहके बिना शेष छयालीस बन्ध-प्रत्यय होते हैं। वेदकसम्यक्त्वी और क्षायिकसम्यक्त्वी जीवोंमें आहारकयुगलसे युक्त उपर्युक्त छयालीस अर्थात् अड़तालीस-अड़तालीस बन्ध-प्रत्यय होते हैं। सासादनसम्यग्दृष्टियोंमें मिथ्यात्वपंचक और आहारकद्विक, इन सातके बिना शेष पचास बन्ध-प्रत्यय होते हैं। मिथ्यादृष्टियोंमें आहारकद्विकके बिना शेष पचपन प्रत्यय होते हैं। मिश्र अर्थात् सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंमें अनन्तानुबन्धिचतुष्क, मिथ्यात्वपंचक, तीनों मिश्रयोग (औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र और कार्मण) तथा आहारकद्विक, इन चौदहके बिना शेष तैंतालीस बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥६७-६८॥


मिच्छाई खीणांता सण्णिम्मि हवंति बार† ठाणाणि ।
असण्णियम्मि जीवे दोण्णि य मिच्छाइ बोहव्वा ॥६९॥

अर्थ: संज्ञिमार्गणाकी अपेक्षा संज्ञी जीवोंके मिथ्यात्वादि क्षीणकषायान्त बारह गुणस्थान होते हैं। असंज्ञी जीवोंमें मिथ्यात्वादि दो गुणस्थान जानना चाहिए ॥६९॥ संज्ञिमार्गणाकी अपेक्षा असंज्ञी जीवोंमें मिथ्यात्व आदि चार मूलप्रत्ययोंमेंसे योगसम्बन्धी अन्तिम वचनयोग, औदारिकद्विकयोग और कार्मणकाययोग, इन चारको छोड़कर शेष चार मनोयोग, आदिके तीन वचनयोग, वैक्रियिकद्विक और आहारकद्विक इन ग्यारह योगोंके बिना अवशिष्ट बन्ध-प्रत्यय होते हैं। संज्ञी जीवोंमें सर्व ही बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥६९॥


मिच्छाइ-सजोगंता आहारे होंति तह अणाहारे ।
मिच्छा साद अविरदा अजोग* जोई य णायव्वा ॥७०॥

अर्थ: आहारमार्गणाकी अपेक्षा आहारक जीवोंके मिथ्यात्वादि सयोगिकेवल्यन्त तेरह गुणस्थान होते हैं। तथा अनाहारक जीवोंके मिथ्यात्व, सासादन, अविरतसम्यक्त्व, सयोगिकेवली और अयोगिकेवली ये पाँच गुणस्थान जानना चाहिए ॥७०॥


[मूलगा०११] १दोण्हं पंच य छह्चेव दोसु एक्कम्मि होंति वामिस्सा ।
सत्तवओगा सत्तसु दो चेव य दोसु ठाणेसु३ ॥७१॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि और सासादन इन दो गुणस्थानोंमें तीनों अज्ञान और चक्षुदर्शन तथा अचक्षुदर्शन ये पाँच-पाँच उपयोग होते हैं। अविरत और देशविरत इन दो गुणस्थानोंमें आदिके तीनों ज्ञान और आदिके तीनों दर्शन इस प्रकार छह-छह उपयोग होते हैं। एक तीसरे सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थानमें उक्त छहों मिश्रित उपयोग होते हैं। अर्थात् मत्यज्ञान मतिज्ञानसे मिश्रित होता है, इसी प्रकार शेष भी मिश्रित उपयोग जानना चाहिए। प्रमत्तविरतसे लेकर क्षीणकषायान्त सात गुणस्थानोंमें आदिके चार ज्ञान और आदिके तीन दर्शन इस प्रकार सात-सात उपयोग होते हैं। सयोगिकेवली और अयोगिकेवली इन दो गुणस्थानोंमें केवलज्ञान और केवलदर्शन ये दो उपयोग होते हैं ॥७१॥


२अण्णाणतियं‡ दोसुं† सम्मामिच्छे तमेव मिस्सं तु ।
णाणाइतियं जुयले सत्तसु मणपज्जएण तं चेव ॥७२॥

दंसणाइदुअं दोसुं दससु तं ओहिदसणजुत्तं ।
केवलदंसण-णाणा उवओगा दोसु य गुणेसु ॥७३॥

अर्थ (गाथा 72 से 73): आदिके दो गुणस्थानोंमें तीनों अज्ञान होते हैं। सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थानमें तीनों अज्ञान तीनों सद्-ज्ञानोंसे मिश्रित होते हैं। चौथे और पाँचवें इन दो गुणस्थानोंमें मति, [श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञानोपयोग होते हैं। छठेसे लेकर बारहवें गुणस्थान तक सात गुणस्थानोंमें मनःपर्ययज्ञानके साथ उक्त तीनों ज्ञानोपयोग होते हैं। आदिके दो गुणस्थानोंमें आदिके दो दर्शनोपयोग होते हैं। तीसरेसे लेकर बारहवें तक दश गुणस्थानोंमें अवधिदर्शनसे युक्त आदिके दोनों दर्शनोपयोग होते हैं। तेरहवें और चौदहवें इन दो गुणस्थानोंमें केवलज्ञान और केवलदर्शन ये दो-दो उपयोग होते हैं ॥७२-७३॥


[मूलगा० १२] ‘तिसु तेरेगे दस णव सत्तसु इकम्हि हुंति एक्कारा ।
इकम्हि सत्त जोगा अजोगठाणं हवइ सुण्णं’ ॥७४॥

अर्थ: मिथ्यात्व, सासादन और अविरतसम्यक्त्व इन तीन गुणस्थानोंमें तेरह-तेरह योग होते हैं। एक सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थानमें दश योग होते हैं। छठे गुणस्थानको छोड़कर पाँचवेंसे बारहवें तक सात गुणस्थानोंमें नौ-नौ योग होते हैं। एक प्रमत्तसंयत नामक छठे गुणस्थानमें ग्यारह योग होते हैं। एक सयोगिकेवली नामक तेरहवें गुणस्थानमें सात योग होते हैं और अयोगिकेवली नामक एक चौदहवाँ गुणस्थान योग-रहित होता है ॥७४॥


आहारदुगूणा तिसु वेउव्वोरल मण-वचि चउक्का ।
मिस्से वेउव्वूणा सत्तसु आहारदुगजुया छड्डे ॥७५॥

भासा-मणजोआणं असच्चमोसा य सच्चजोगा य ।
ओरालजुयल-कम्मा सत्तेदे होंति जोगिम्मि ॥७६॥

अर्थ (गाथा 75 से 76): पहले, दूसरे और चौथे इन तीन गुणस्थानोंमें आहारकद्विकके बिना शेष तेरह योग होते हैं। तीसरे मिश्रगुणस्थानमें चारों मनोयोग, चारों वचनयोग, औदारिककाययोग और वैक्रियिककाययोग ये दश योग होते हैं। इन दश योगोंमेंसे वैक्रियिककाययोगको छोड़कर शेष नौ योग छठे गुणस्थानके सिवाय शेष सात गुणस्थानोंमें होते हैं। छठे गुणस्थानमें आहारकद्विकयुक्त उपर्युक्त नौ योग अर्थात् ग्यारह योग होते हैं। सयोगिकेवलीमें भाषा और मनोयोगके असत्य-मृषा और सत्ययोगरूप चार भेद, तथा औदारिकद्विक और कार्मणकाययोग ये तीन; इस प्रकार कुल सात योग होते हैं ॥७५-७६॥


मिच्छासंजम हुंति कसाय-जोगा य बंधहेऊ ते ।
पंच दुवालस भेया कमेण पणुवीस पण्णरसं ॥७७॥

अर्थ: मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और योग ये चार कर्मबन्धके मूल कारण हैं। इनके उत्तर भेद क्रमसे पाँच, बारह, पच्चीस और पन्द्रह हैं। इस प्रकार सब मिलकर कर्म-बन्धके सत्तावन उत्तर-प्रत्यय होते हैं। (प्रत्यय, हेतु और कारण ये तीनों पर्यायवाची नाम हैं।) ॥७७॥


चउपच्चइओ बंधो पढमे अणंतरतिए तिपच्चइओ ।
मिस्सय विदिओ उवारिमदुगं च देसेकदेसम्हि ॥७८॥

उवरिल्लपंचया पुण दुपच्चया जोयपच्चया तिण्णि ।
सामण्णपच्चया खलु अट्ठण्हं होंति कम्माणं ॥७९॥

अर्थ (गाथा 78 से 79): प्रथम गुणस्थानमें उपर्युक्त चारों प्रत्ययोंसे कर्म-बन्ध होता है। तदनन्तर तीन गुणस्थानोंमें मिथ्यात्वको छोड़कर शेष तीन कारणोंसे कर्म-बन्ध होता है। देशविरत नामक पाँचवें गुणस्थानमें दूसरा असंयमप्रत्यय मिश्र अर्थात् आधा और उपरिम दो प्रत्यय कर्म-बन्धके कारण हैं। तदनन्तर ऊपरके पाँच गुणस्थानोंमें कषाय और योग इन दो कारणोंसे कर्म-बन्ध होता है। ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें इन तीन गुणस्थानोंमें केवल योगप्रत्ययसे कर्म-बन्ध होता है। इस प्रकार आठों कर्मोंके बन्धके कारण ये सामान्य प्रत्यय होते हैं ॥७८-७९॥


पणवण्णा पण्णासा तेयाल छयाल सत्ततीसा य ।
चउवीस दु बावीसा सोलस ऊण जाव णव सत्ता ॥८०॥

अर्थ: मिथ्यात्व गुणस्थानमें पचपन उत्तर प्रत्ययोंसे कर्म-बन्ध होता है। सासादनमें पचास उत्तर प्रत्ययोंसे कर्म-बन्ध होता है। मिश्रमें तैंतालीस उत्तर प्रत्यय होते हैं। अविरतमें छयालीस उत्तर प्रत्यय होते हैं। देशविरतमें सैंतीस उत्तर प्रत्यय होते हैं। प्रमत्तविरतमें चौबीस उत्तर प्रत्यय होते हैं। अप्रमत्तविरतमें बाईस उत्तर प्रत्यय होते हैं। अपूर्वकरणमें बाईस उत्तर प्रत्यय होते हैं। अनिवृत्तिकरणमें सोलह और आगे एक-एक कम करते हुए दश तक उत्तर प्रत्यय होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायमें दश उत्तर प्रत्यय होते हैं। उपशान्तकषाय और क्षीणकषायमें नौ-नौ उत्तर प्रत्यय होते हैं। सयोगिकेवलीमें सात उत्तर प्रत्यय होते हैं। अयोगिकेवलीमें कर्म-बन्धका कारणभूत कोई भी मूल या उत्तर प्रत्यय नहीं होता है ॥८०॥


आहारदुअ-विहीणा मिच्छेण अपुण्णजोअ अणहीणा ते ।
अपज्जत्तजोअ सहिते ऊण तसवह बिदिय अपुण्णजोअ वेउव्वा ॥८१॥

ते एयारह जोआ छव्वे संजलण णोकसाया य ।
आहारदुगूणा दुसु कमसो अणियट्टिए इमे भेया ॥८२॥

छक्कं हस्साईणं णपुंसित्थी पुरिसवेय संजलणा ।
बादर सुहुमो लोहो सुहुमे सेसेसु सए सए जोया ॥८३॥

अर्थ (गाथा 81 से 83): मिथ्यात्व गुणस्थानमें आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोग ये दो प्रत्यय नहीं होते हैं । सासादनमें उक्त आहारकद्विक और पाँचों मिथ्यात्व ये सात प्रत्यय नहीं होते हैं । मिश्रगुणस्थानमें अपर्याप्तकालसम्बन्धी औदारिकमिश्रकाययोग, वैक्रियिकमिश्रकाययोग और कार्मणकाययोग ये तीन योग, अनन्तानुबन्धी कषायचतुष्क और उपर्युक्त सात इस प्रकार चौदह प्रत्यय नहीं होते हैं । अविरतसम्यक्त्व गुणस्थानमें उक्त चौदह प्रत्ययोंमेंसे अपर्याप्तकालसम्बन्धी तीन प्रत्यय होते हैं, शेष ग्यारह प्रत्यय नहीं होते हैं। देशविरतमें त्रसवध; द्वितीय अप्रत्याख्यानावरण-कषायचतुष्क, अपर्याप्तकाल-सम्बन्धी तीनों योग, वैक्रियिककाययोग तथा उपर्युक्त ग्यारह प्रत्यय (मिथ्यात्वपञ्चक, अनन्तानुबन्धिचतुष्क और आहारकद्विक) इस प्रकार बीस प्रत्यय नहीं होते हैं। छठ्ठे गुणस्थानमें चारों मनोयोग, चारों वचनयोग, औदारिककाययोग और आहारकद्विक ये ग्यारह योग, संज्वलनचतुष्क और नौ नोकषाय इस प्रकार चौबीस प्रत्यय होते हैं। (शेष तेवीस प्रत्यय नहीं होते हैं।) इन चौबीसमेंसे सातवें और आठवें इन दो गुणस्थानोंमें आहारकद्विकके बिना शेष बाईस प्रत्यय होते हैं। अनिवृत्तिकरणके सात भागोंमें बन्ध-प्रत्ययोंके भेद इस प्रकार होते हैं-प्रथम भागमें अपूर्वकरणके बाईस प्रत्ययोंमेंसे हास्यादि-षट्कके बिना सोलह प्रत्यय होते हैं। द्वितीय भागमें नपुंसकवेदके बिना पन्द्रह, तृतीय भागमें स्त्रीवेदके बिना चौदह, चतुर्थ भागमें पुरुषवेदके बिना तेरह, पंचम भागमें संज्वलनक्रोधके बिना बारह, षष्ठ भागमें संज्वलन-मानके बिना ग्यारह और सप्तम भागमें संज्वलनमायाके बिना बादरलोभ-सहित दश उत्तर प्रत्यय होते हैं। दशवें गुणस्थानमें चारों मनोयोग, चारों वचनयोग, औदारिककाययोग और सूक्ष्मसंज्वलन लोभ ये दश उत्तर प्रत्यय होते हैं। शेष अर्थात् ग्यारहवें और बारहवें गुणस्थानमें सूक्ष्मसंज्वलन लोभके बिना शेष नौ नौ प्रत्यय होते हैं। तेरहवें गुणस्थानमें प्रथम और अन्तिम दो-दो मनोयोग और वचनयोग, तथा औदारिकद्विक और कार्मण काययोग ये सात प्रत्यय होते हैं ॥८१-८३॥


'ओरालिय-आहारदुगुणा हेऊ हवंति सुर-णिरए ।
आहारग-वेउव्वदुगुणा सव्वे वि तिरिएसु ॥८४॥

वेउव्वजुयलहीणा मणुए पणवण्ण पच्चया होंति ।
गइचउरएसु एवं सेसासु वि ते मुणेयव्वा ॥८५॥

अर्थ (गाथा 84 से 85): गतिमार्गणाकी अपेक्षा नरकगतिमें औदारिकद्विक, आहारकद्विक, स्त्रीवेद और पुरुषवेद इन छहके बिना शेष इकावन बन्ध-प्रत्यय होते हैं। देवगतिमें उक्त छहमेंसे स्त्रीवेद और पुरुषवेद निकालकर और नपुंसकवेद मिलाकर पाँचके बिना शेष बावन बन्ध-प्रत्यय होते हैं। तिर्यंचगतिमें वैक्रियिकद्विक और आहारकद्विक इन चारके बिना शेष सभी अर्थात् तिरेपन बन्ध-प्रत्यय होते हैं। मनुष्यगतिमें वैक्रियिकद्विकके बिना शेष पचपन बन्ध-प्रत्यय होते हैं। इस प्रकार चारों गतियोंमें बन्ध-प्रत्ययोंका निरूपण किया। इसी प्रकारसे शेष मार्गणाओंमें भी उन्हें जान लेना चाहिए ॥८४-८५॥


मिच्छत्ताइचउद्दय बारह-जोगूणिगिंदिए मोत्तुं ।
कम्मोरालदुअं खलु वयणंतजुओ दु ते वियले ॥८६॥

अर्थ: इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा एकेन्द्रियोंमें मिथ्यात्व आदि चार मूलप्रत्ययोंमेंसे औदारिक-द्विक तथा कार्मणकाययोगके बिना शेष बारह योगोंको, एवं रसनादि चार इन्द्रिय और मन-सम्बन्धी पाँच अविरति तथा स्त्री और पुरुष इन दो वेदोंको छोड़कर बाकीके अड़तीस बन्ध-प्रत्यय जानना चाहिए। विकलेन्द्रियोंमें अन्तिम वचनयोग-सहित वे सर्व प्रत्यय होते हैं ॥६॥


इत्थि-णउंसयवेदे आहारदुगूणया होंति ।
कोहाइकसाएसु कोहाइ इयर-दुवालस-विहीणा ॥८७॥

अर्थ (गाथा 87 से 89): कायमार्गणाकी अपेक्षा त्रसकायिक जीवोंमें और पंचेन्द्रियोंमें सर्व ही बन्ध-प्रत्यय होते हैं। स्थावरकायिक जीवोंमें एकेन्द्रियोंके समान अड़तीस बन्ध-प्रत्यय जानना चाहिए। योगमार्गणाकी अपेक्षा आहारकद्विकके बिना बाकीके तेरह योगोंमें निज-निज योगको छोड़कर शेष चौदह योगोंसे रहित तेतालीस-तेतालीस प्रत्यय होते हैं। आहारकद्विकमें चारों संज्वलन, तथा नपुंसक और स्त्रीवेदको छोड़कर शेष सात नोकषाय और स्वकीय योग इस प्रकार बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं। वेदमार्गणाकी अपेक्षा पुरुषवेदी जीवोंमें सभी बन्ध-प्रत्यय जानना चाहिए। स्त्रीवेदी और नपुंसकवेदी जीवोंमें आहारकद्विकको छोड़कर शेष सर्व प्रत्यय होते हैं। कषायमार्गणाकी अपेक्षा विवक्षित क्रोधादि कषायोंमें अपने चारके सिवाय अन्य बारह कषायोंके घट जानेसे शेष पैंतालीस-पैंतालीस बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥८७-८९॥


मइ-सुअअण्णाणेसुं आहारदुगूणया मुणेयव्वा ।
मिस्सतियाहारदुअं वज्जित्ता सेसया दु वेभंगे ॥९०॥


मइ-सुअ-ओहिदुगेसुं अणचदु-मिच्छत्तपंचहि विहीणा ।
हस्साइ छक्क पुरिसो संजलण मण-वचि चउर उरालं ॥९१॥


मणपज्जवे केवलदुवे मण-वचि पढमंत कम्म उरालदुगं ।
संजलण णोकसाया मण-वचि ओराल आहारदुगं ॥९२॥


सामाइय-छेएसुं आहारदुगूणया दु परिहारे ।
मण-वचि अद्धोरालं सुहुमे संजलण लोहंते ॥९३॥


कम्मोरालदुगाईं मण-वचि चउरा य होंति अहखाए ।
असंजमम्मि सव्वे आहारदुगूणया णेया ॥९४॥


अण मिच्छ विदिय तसवह बेउव्वआहारजुयलाईं
ओरालमिसकम्मा तेहिं विहीणा दु होंति देसम्मि ॥९५॥


तेज-तिय चक्खुजुयले सव्वे हेऊ हवंति भव्वे य ।
किण्हाइतियाऽभव्वे आहारदुगूणया णेया ॥९६॥


अणमिच्छाहारदुगूणा सव्वे उवसमे णेया ।
आहारजुयलजुत्ता वेदय-खइएम्मि ते होंति ॥९७॥


मिच्छाहारदुगूणा साए मिच्छम्मि आहारदुगूणा ।
अण-मिच्छ-मिस्स जोगा हारदुगूणा हवंति मिस्सम्मि ॥९८॥


मिच्छाइचउक्केयारजोगूणा असण्णिणो मोत्तुं ।
भासंतोरालदुअं कम्मं सण्णिम्मि सव्वे वि ॥९९॥


आहारे कम्मृणा इयरे कम्मूण जोयरहिया ते ।
एवं तु मग्गणासुं उत्तरहेऊ जिणेहिं णिद्दिद्वा ॥१००॥

अर्थ: आहारमार्गणाकी अपेक्षा आहारक जीवोंमें कार्मणकाययोगको छोड़कर शेष छप्पन बन्ध-प्रत्यय होते हैं। अनाहारक जीवोंमें कार्मणकाययोगके बिना शेष चौदह योग नहीं पाये जाते हैं, अतएव उनके घट जानेसे तेतालीस बन्ध-प्रत्यय होते हैं। इस प्रकार जिनेन्द्रदेवने मार्गणाओंमें बन्धके उत्तर-प्रत्ययोंका निर्देश किया है ॥१००॥


'दस अट्ठारस दसयं सत्तर णव सोलसं च दोण्हं पि ।
अट्ठ य चउदस पणयं सत्त तिए दु ति दु एगेगं ॥१०१॥

अर्थ: मिथ्यात्व गुणस्थानमें जघन्यसे दश और उत्कर्षसे अट्ठारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं। सासादनगुणस्थानमें जघन्यसे दश और उत्कर्षसे सत्तरह, मिश्रगुणस्थानमें जघन्यसे नौ और उत्कर्षसे सोलह, अविरतसम्यक्त्वगुणस्थानमें भी जघन्यसे नौ और उत्कर्षसे सोलह बन्ध-प्रत्यय होते हैं। देशविरतगुणस्थानमें जघन्यसे आठ और उत्कर्षसे चौदह, प्रमत्तविरत आदि तीन गुणस्थानोंमें जघन्यसे पाँच-पाँच और उत्कर्षसे सात-सात बन्ध-प्रत्यय होते हैं। अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें जघन्यसे दो और उत्कर्षसे तीन बन्ध-प्रत्यय होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें जघन्य और उत्कर्षसे दो ही बन्ध-प्रत्यय होते हैं। उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगिकेवली इन तीनों गुणस्थानोंमें जघन्य और उत्कर्षसे एक-एक ही बन्ध-प्रत्यय होता है ॥१०१॥


'एय वियकायजोगे तिय चउ जोयम्मि पंच छज्जोए ।
छप्पंच दस य वीसा †पणरस छक्केय कायगुणकारा ॥१०२॥

अर्थ: कायवधसम्बन्धी एकसंयोगी भंगोंका गुणकार छह, द्विसंयोगी भंगोंका गुणकार पन्द्रह, त्रिसंयोगी बीस, चतुःसंयोगी पन्द्रह, पंचसंयोगी छह और षट्संयोगी कायगुणकार एक जानना चाहिए ॥१०२॥


आवलिय मेत्तकालं अणंतबंधीण होइ णो उदओ ।
अंतोमुहुत्त मरणं मिच्छतं दंसणा पत्ते ॥१०३॥

मिच्छत्तक्खं काओ कोहाई तिण्ण वेद एगो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो दस होंति हेऊ* ते ॥१०४॥

अर्थ (गाथा 103 से 104): जो अनन्तानुबन्धीका विसंयोजक सम्यग्दृष्टि जीव सम्यक्त्वको छोड़कर मिथ्यात्वगुणस्थानको प्राप्त होता है, उसके एक आवलीमात्रकाल तक अनन्तानुबन्धी कषायोंका उदय नहीं होता है। तथा सम्यक्त्वको छोड़कर मिथ्यात्वको प्राप्त होनेवाले जीवका अन्तर्मुहूर्तकाल तक मरण भी नहीं होता है इस नियमके अनुसार मिथ्यादृष्टिके एक समयमें पाँच मिथ्यात्वोंमें-से एक मिथ्यात्व, पाँच इन्द्रियोंमेंसे एक इन्द्रिय, छह कायोँमें-से एक काय, अनन्तानुबन्धीके बिना शेष कषायोंमेंसे क्रोधादि तीन कषाय, तीन वेदोंमेंसे कोई एक वेद, हास्यादि दो युगलोंमेंसे कोई एक युगल और आहारकद्विक तथा अपर्याप्तकाल-सम्बन्धी तीन मिश्रयोग, इन पाँचके बिना शेष दश योगोंमेंसे कोई एक योग इस प्रकार जघन्यसे दश बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१०३-१०४॥


मिच्छत्तक्क दुकाया कोहाई तिण्णि वेय एगो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो एयारसं हेऊ ॥१०५॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानमें मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, और योग एक; ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१०५॥


मिच्छत्तक्कं काओ कोहाइचउक्क वेय एगो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो एयारसं हेऊ ॥१०६॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१०६॥


मिच्छत्तक्कं काओ कोहाई तिण्णि वेय एगो य ।
हस्साइजुयं एयं भयदुय एयं च जोगो ते ॥१०७॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-जुगुप्सामेंसे एक, और योग एक; ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१०७॥


मिच्छत्तक्खतिकाया कोहाई तिण्णि एय वेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो बारह हवंति ते हेऊ ॥१०८॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्वगुणस्थानमें मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; इस प्रकार बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१०८॥


मिच्छत्तक्खदुकाया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो बारह हवंति ते हेऊ ॥१०६॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, योग एक, इस प्रकार बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१०६॥


मिच्छत्तक्खदुकाया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुय एयं च जोगो य ॥११०॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; इस प्रकार बारह बन्धप्रत्यय होते हैं ॥११०॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+२+३+१+२+१+१=१२।


मिच्छत्तक्खं काओ कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एवं भयदुय एयं च जोगो य ॥१११॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक, और योग एक; इस प्रकार बारह बन्धप्रत्यय होते हैं ॥१११॥ इसकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+१+४+१+२+१+१=१२।


मिच्छत्तक्खं काओ कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एवं भयजुयलं एयजोगो य ॥११२॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल एक और योग एक; इस प्रकार बारह बन्धप्रत्यय होते हैं ॥११२॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+१+३+१+२+२+१=१२।


मिच्छत्तक्खं चउकाया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो तेरह हवंति ते हेऊ ॥११३॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्वगुणस्थानमें मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; इस प्रकार तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥११३॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+४+३+१+२+१=१३।


मिच्छत्तक्खतिकायो कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो तेरह हवंति ते हेऊ ॥११४॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; इस प्रकार तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥११४॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+३+४+१+२+१=१३।


मिच्छत्तक्खतिकायो कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एयं भयदुय एयं च जोगो थ ॥११५॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; इस प्रकार तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥११५॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+३+३+१+२+१+१=१३।


मिच्छत्तक्खलुदुकाया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एवं भयदुय एयं च जोगो च ॥११६॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; इस प्रकार तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥११६॥ इनकी अंक संदृष्टि इस प्रकार है-१+१+२+४+१+२+१+१=१३।


मिच्छत्तक्खदुकाया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साई दुयमेयं भयजुयलं होंति जोगो य ॥११७॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक, इस प्रकार तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥११७॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+२+३+१+२+२+१=१३।


मिच्छत्तक्खं कायो कोहाइचउक एथवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं होंति जोगो य ॥११८॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय चार; वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और एक योग, इस प्रकार तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥११८॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+१+४+१+२+२+१=१३।


मिच्छत्तस्स पंचकाया कोहाइ तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो चउदह हवंति ते हेऊ ॥११९॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व गुणस्थानमें मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; इस प्रकार चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥११९॥


मिच्छत्तं चउकाया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो चउदस हवंति ते हेऊ ॥१२०॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक, इस प्रकार चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१२०॥


मिच्छत्तं चउकाया कोहाइ तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुयं एयं च एय जोगो य ॥१२१॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और एक योग; इस प्रकार चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१२१॥


मिच्छत्तक्खं तिकाया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुयं एयं च एयजोगो य ॥१२२॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और एक योग, इस प्रकार चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१२२॥


मिच्छत्तक्खतिकाया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइजुयं एयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१२३॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और एक योग; इस प्रकार चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१२३॥


मिच्छत्तक्खं दुकाया कोहाइचउक्क एक्कवेदो य ।
हस्सादिदुयं एयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१२४॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और एक योग; इस प्रकार चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१२४॥


मिच्छिंदिय छक्काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिजुयलमेयं जोगो पण्णरस पच्चया होंति ॥१२५॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्वगुणस्थानमें मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; इस प्रकार पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते ह ॥१२५॥


मिच्छक्क पंचकाया कोहाइचउक एयवेदो य ।
हस्सादिजुयलमेयं जोगो पण्णरस पउचया होंति ॥१२६॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, और योग एक; इस प्रकार पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१२६॥


मिच्छक्क पंचकाया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिजुयं एवं भयदुयं एवं च एयजोगो य ॥१२७॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक, और योग एक; इस प्रकार पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१२७॥


मिच्छत्तखं चउकाया कोहाइचउक एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एवं भयदुयं एवं च एयजोगो य ॥१२८॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; इस प्रकार पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१२८॥


मिच्छत्तखं चउकाया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एवं भयजुयलं एयजोगो य ॥१२९॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और एक योग; इस प्रकार पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१२९॥


मिच्छत्तक्ख तिकाया कोहाइचउक एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयजुयलं एयजोगो य ॥१३०॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और एक योग; इस प्रकार पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३०॥


मिच्छिंदिय छक्काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्सादिजुयं एवं जोगो सोलस हवंति ते हेऊ ॥१३१॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व गुणस्थानमें मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय चार, एक वेद, हास्यादि युगल एक और योग एक; इस प्रकार सोलह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३१॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+६+४+१+२+१ = १६।


मिच्छिंदिय छक्काया कोहाई तिण्णि एथवेदो य ।
हस्सादिदुयं एवं भयदुय एवं च सोलसं जोगो ॥१३२॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगलमेंसे एक और योग एक, इस प्रकार सोलह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३२॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+६+३+१+२+१+१= १६।


मिच्छक्ख.पंचकाया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयदुय एवं च.सोलसं जोगो ॥१३३॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; इस प्रकार सोलह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३३॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१+१+५+४+१+२+१+१ = १६।


मिच्छक्खं पंचकाया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सइजुयलमेयं भयजुयलं सोलसं जोगो ॥१३४॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; इस प्रकार सोलह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३४॥


मिच्छक्खं चउकाया कोहाइचउक एयवेदो य ।
हस्सइजुयलमेयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१३५॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और एक योग; इस प्रकार सोलह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३५॥


मिच्छिंदिय छक्काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एयं भयदुय एयं च सत्तरस जोगो ॥१३६॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व गुणस्थानमें मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; इस प्रकार सत्तरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३६॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१ + १ + ६ + ४ + १ + २ + १ + १ = १७ ।


मिच्छिंदिय छक्काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं भयजुयलं सत्तरस जोगो ॥१३७॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; इस प्रकार सत्तरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३७॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१ + १ + ६ + ३ + १ + २ + २ + १ = १७ ।


मिच्छक्खं पंचकाया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं भयजुयलं सत्तरस जोगो ॥१३८॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; इस प्रकार सत्तरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३८॥ इनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१ + १ + ५ + ४ + १ + २ + २ + १ = १७ ।


मिच्छिंदिय छक्काया कोहाइचउक एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयजुगलं अट्ठारस जोगो ॥१३९॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व गुणस्थानमें मिथ्यात्व एक, इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; इस प्रकार अठारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१३९॥


वेउव्वमिस्सजोगं पडुच्च वेदो णउंसओ णत्थि ।
उववज्जइ णो णिरए सासणसम्मो त्ति वयणाओ ॥१४०॥

अर्थ: वैक्रियिकमिश्रकाययोगकी अपेक्षा नपुंसकवेद संभव नहीं है; क्योंकि सासादनसम्यग्दृष्टि जीव नरकगतिमें उत्पन्न नहीं होता है, ऐसा आगमका वचन है ॥१४०॥


इंदियमेओ काओ कोहाइचउक एयवेदो य ।
हसाइजुयलमेयं जोगो दस पच्चया सादे ॥१४१॥

अर्थ: सासादन गुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये दश बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१४१॥


इंदिय दोण्णि य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो एक्कारसा सादे ॥१४२॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; इस प्रकार ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१४२॥


इंदियमेओ काओ कोहाइचउक एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुय एयं च जोगो य ॥१४३॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; इस प्रकार ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१४३॥


इंदिय तिण्णि य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो वारस हवंति ते हेऊ ॥१४४॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; इस प्रकार बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१४४॥


इंदिय दोण्णि य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुयं एयं च जोगो य ॥१४५॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक, ये बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१४५॥


इंदियमेओ काओ कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१४६॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-युगल और योग एक; ये बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१४६॥


इंदिय चउरो काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं जोगो तेरस हवंति ते हेऊ ॥१४७॥

अर्थ: अथवा सासादनगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक, ये तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१४७॥


इंदिय तिण्णि य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुयं एयं च जोगो य ॥१४८॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-द्विकमेंसे एक और योग एक; ये तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१४८॥


इंदिय दोण्णि य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१४६॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-युगल और योग एक; ये तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१४६॥


इंदिय पंच य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो चउदस हवंति ते हेऊ ॥१५०॥

अर्थ: अथवा सासादनगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५०॥


इंदिय चउरो काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हसाइदुयं एयं भयदुयं एयं च एयजोगो य ॥१५१॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमें से एक और योग एक; ये चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५१॥


इंदिय तिण्णि य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१५२॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और एक योग; ये चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५२॥


इंदिय छक्क य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो पण्णरस पच्चया सादे ॥१५३॥

अर्थ: अथवा सासादनगुणस्थानमें इन्द्रियमें एक, काय छह, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५३॥


इंदिय पंचय काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्सादिजुयलमेयं भयजुयं एयं च जोगो य ॥१५४॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमें से एक और योग एक; ये पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५४॥


इंदिय चउरो काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं एगजोगो य ॥१५५॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; ये पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५५॥


इंदिय छक्क य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुयं एयं च सोलसं जोगो ॥१५६॥

अर्थ: अथवा सासादनगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; ये सोलह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५६॥


इंदिय पंच य काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्सादिजुयलमेयं भयजुयलं सोलसं जोगो ॥१५७॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; ये सोलह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५७॥


इंदिय छक्कय काया कोहाइचउक्क एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं सत्तरस जोगो ॥१५८॥

अर्थ: अथवा सासादनगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय चार, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; ये सत्तरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५८॥


इंदियमेओ काओ कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइजुयलमेयं जोगो णव होंति† पच्चया मिस्से ॥१५६॥

अर्थ: मिश्रगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय एक, अनन्तानुबन्धीके बिना अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन-सम्बन्धी क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, और योग एक; ये नौ बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१५६॥


इंदिय दोण्णि य काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिजुयलमेयं जोगो दस पच्चया मिस्से ॥१६०॥

अर्थ: अथवा मिश्रगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, और योग एक, ये दश बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६०॥


इंदियमेओ काओ कोहाई तिण्णि एयवेदो थ ।
हस्सादिदुयं एयं भयदुय एयं च एयजोगो य ॥१६१॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; ये दशबन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६१॥


इंदिय तिण्णि य काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिजुयलमेयं जोगो एक्कार† पच्चया मिस्से ॥१६२॥

अर्थ: अथवा मिश्रगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६२॥


इंदिय दोण्णि य काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सदिदुयं एयं भयदुय एयं च एयजोगो य ॥१६३॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक, और योग एक; ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६३॥


इंदियमेओ काओ कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एयं भयजुगलं एयजोगो य ॥१६४॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विक और योग एक; ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६४॥


इंदिय चउरो काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एयं जोगो बारस हवंति ते हेऊ ॥१६५॥

अर्थ: अथवा मिश्रगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, और योग एक, ये बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६५॥


इंदिय तिण्णि वि काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुयं एयं च बारसं जोगो ॥१६६॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; ये बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६६॥


इंदिय दोण्णि य काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१६७॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; ये बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६७॥


इंदिय पंच वि काया कोहाई तिण्णि एय वेदो य ।
हस्साइजुयं एयं जोगो तेरस हवंति ते हेऊ ॥१६८॥

अर्थ: अथवा मिश्रगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक, ये तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६८॥


इंदिय चउरो काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुय एयं च एयजोगो य ॥१६६॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय तीन, एक वेद, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; ये तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६६॥


इंदिय तिण्णि य काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं तेरसं जोगो ॥१७०॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-युगल और योग एक; ये तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१७०॥

चतुर्थ अधिकार: शतक (भाग 2/3)

इंदिय छक्कय कया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं जोगो चउदस हवंति ते हेऊ ॥१७१॥

अर्थ: अथवा मिश्रगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, और योग एक; ये चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१७१॥


इंदिय पंचय काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुयं एयं च एयजोगो य ॥१७२॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; ये चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१७२॥


इंदिय चउरो काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयजुयलं चउदसं जोगो ॥१७३॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-युगल और योग एक, ये चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१७३॥


इंदिय छह य काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयदुयं एवं च पण्णरस जोगो ॥१७४॥

अर्थ: अथवा मिश्रगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक; ये पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१७४॥


इंदिय पंचय काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयजुयलं पण्णरस जोगो ॥१७५॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-युगल और योग एक; ये पन्द्रह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१७५॥


इंदिय छक्क य काया कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयजुयलं सोलसं जोगो ॥१७६॥

अर्थ: अथवा मिश्रगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय छह, क्रोधादि कषाय तीन, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; ये सोलह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१७६॥


अपज्जत्तं विसेसा मिस्से भणिदस्स पहुच्च दसजोगं ।
ते चेव य अजईए अपुण्णजोगाहिया णेया ॥१७७॥

अर्थ: मिश्रगुणस्थानमें दशयोगोंकी अपेक्षा जो बन्ध-प्रत्यय और विकल्प अर्थात् भङ्ग कहे हैं, असंयतगुणस्थानमें अपर्याप्तकाल-सम्बन्धी औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र और कार्मणकाययोगसे अधिक वे ही बन्ध-प्रत्यय और भंग जानना चाहिए ॥१७७॥


ओरालमिस्सजोगं पडुच्च पुरिसो तहा भवे एको ।
वेउव्वमिस्सकम्मे पडुच्च इत्थी ण होइ त्ति ॥१७८॥

सम्माइट्ठी णिर-तिरि-जोइस-वण-भवण-इत्थि-षंढेसु ।
जीवो बद्धायुयं मोत्तु णो उववज्जइ त्ति वयणाओ ॥१७९॥

अर्थ (गाथा 178 से 179): असंयतगुणस्थानमें औदारिकमिश्रकाययोगकी अपेक्षा एक पुरुषवेद ही होता है । तथा वैक्रियिकमिश्र और कार्मणकाययोगकी अपेक्षा स्त्रीवेद नहीं होता है । ( किन्तु देवोंकी अपेक्षा पुरुष वेद और नारकियोंकी अपेक्षा नपुंसक वेद होता है । ) क्योंकि, बद्धायुष्कको छोड़कर सम्यग्दृष्टि जीव नारकी, तिर्यञ्च, ज्योतिष्क, व्यन्तर, भवनवासी, स्त्री और नपुंसक जीवोंसे उत्पन्न नहीं होता है, ऐसा आगमका वचन है ॥१७८-१७९॥


त्रिभिर्द्वाभ्यां तथैकेन वेदेनास्य प्रताडना ।
भङ्गानां दशभिर्योगैर्द्वाभ्यामेकेन च क्रमात् ॥१८०॥

अर्थ: अब देशसंयतगुणस्थानमें सम्भव उत्तरप्रत्यय-सम्बन्धी भङ्गोंका निरूपण करते हैं- देशसंयतगुणस्थानमें संभव भङ्गोंको निकालनेके लिए एक संयोगीका गुणकार पांच, द्विसंयोगीका गुणकार दश, त्रिसंयोगीका गुणकार दश, चतुःसंयोगीका गुणकार पाँच और पंचसंयोगीका गुणकार एक है ॥१८०॥


इंदियमेओ काओ कोहाई तिण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं जोगो अट्ठ य हवंति ते देसे ॥१८१॥

अर्थ: देशसंयतमें इन्द्रिय एक, काय एक, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन-सम्बन्धी क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये आठ बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१८१॥


इंदिय दोण्णि य काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं जोगो णव होंति ते देसे ॥१८२॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये नौ बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१८२॥


इंदियमेओ काओ कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयदुय एवं च एयजोगो य ॥१८३॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-द्विकमेंसे एक और योग एक; ये नौ बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१८३॥


इंदिय-तिण्णि य काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं जोगो दस होंति ते देसे ॥१८४॥

अर्थ: अथवा देशसंयतमें इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये दश बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१८४॥


इंदिय दोण्णि य काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्सादिदुयं एयं भयदुयं एयं च एयजोगो य ॥१८५॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-द्विकमेंसे एक और योग एक; ये दशबन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१८५॥


इंदियमेओ काओ कोहाई दुण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१८६॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय एक, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-द्विक और योग एक; ये दश बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१८६॥


इंदिय चउरो काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं जोगो एक्कारसं देसे ॥१८७॥

अर्थ: अथवा देशसंयतमें इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१८७॥


इंदिय तिण्णि य काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुयं एयं च एयजोगो य ॥१८८॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक भय-द्विकमेंसे एक और योग एक; ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१८८॥


इंदिय दोण्णि य काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१८९॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय दो, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादियुगल एक, भयद्विक और योग एक; ये ग्यारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१८९॥


इंदिय पंच वि काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं जोगो वारस हवंति ते हेऊ ॥१९०॥

अर्थ: अथवा देशसंयतमें इन्द्रिय एक, काय पाँच क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक और योग एक; ये बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६०॥


इंदिय चउरो काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयदुय एवं च जोगो य ॥१९१॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-द्विकमेंसे एक और योग एक; ये बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६१॥


इंदिय तिण्णि य काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एवं भयजुयलं एयजोगो य ॥१९२॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय तीन, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; ये बारह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६२॥


इंदिय पंच वि काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयदुयं एयं च तेरसं जोगो ॥१९३॥

अर्थ: अथवा देशसंयतमें इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भयद्विकमेंसे एक और योग एक, ये तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६३॥


इंदिय चउरो काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं एगजोगो य ॥१९४॥

अर्थ: अथवा इन्द्रिय एक, काय चार, क्रोधादि कषाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भययुगल और योग एक; ये तेरह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६४॥


इंदिय पंच वि काया कोहाई दोण्णि एयवेदो य ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं एयजोगो य ॥१९५॥

अर्थ: अथवा देशसंयतगुणस्थानमें इन्द्रिय एक, काय पाँच, क्रोधादि कपाय दो, वेद एक, हास्यादि युगल एक, भय-युगल और योग एक; ये चौदह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६५॥


'आहारजुयलजोगं पहुच्च पुरिसो हवेज्ज णो इयरा ।
अपसत्थवेदउदया जायइ णाहारलद्धि वयणाओ ॥१९६॥

अर्थ: प्रमत्तसंयत गुणस्थानमें आहारककाययोगद्विककी अपेक्षा केवल एक पुरुषवेद होता है, इतर दोनों वेद नहीं होते हैं। क्योंकि, ‘अप्रशस्तवेदके उदयमें आहारकऋद्धि नहीं उत्पन्न होती है’ ऐसा आगमका वचन है ॥१६६॥


संजलणं य एयदरं एयदरं चेव तिण्णि वेदाणं ।
हस्साइदुयं एयं जोगो पंच हवंति ते हेऊ ॥१९७॥

अर्थ: प्रमत्तसंयतमें कोई एक संज्वलन कषाय, तीन वेदोंमें से कोई एक वेद, हास्यादि एक युगल और कोई एक योग, इस प्रकार पाँच बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६७॥


संजलण य एयदरं एयदरं चेव तिण्णि वेदाणं ।
हस्साइदुयं एयं भयदुय एयं च इक्क जोगो य ॥१९८॥

अर्थ: कोई एक संज्वलनकषाय, तीन वेदोंमेंसे कोई एक वेद, हास्यादि एक युगल, भयद्विकमेंसे कोई एक और एक योग; ये छह बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६८॥


संजलयण य एयदरं एयदरं चेव तिण्णि वेदाणं ।
हस्साइदुयं एयं भयजुयलं सत्त जोगो त्ति ॥१६६॥

अर्थ: कोई एक संज्वलन कषाय, तीन वेदोंमेंसे कोई एक वेद, हास्यादि एक युगल, भययुगल और एक योग, इस प्रकार सात बन्ध-प्रत्यय होते हैं ॥१६६॥


जे पच्चया वियप्पा भणिया णियमा पमत्तविरदम्मि ।
ते अप्पमत्तऽपुव्वे आहारदुगूणया णेया ॥२००॥

अर्थ: प्रमत्तविरतगुणस्थानमें जो बन्ध-प्रत्यय और उनके भंग कहे हैं, नियमसे वे ही अप्रमत्तविरत और अपूर्वकरणमें आहारकद्विकके बिना जानना चाहिए ॥२००॥


संजलण-तिवेदाणं णवजोगाणं च होइ एयदरं ।
संढूणदुवेदाणं एयदरं पुरिसवेदो य ॥२०१॥

अर्थ: नवें गुणस्थानके सवेद भागमें चारों संज्वलन, तीनों वेद और नव योग, इनमेंसे कोई एक-एक, इस प्रकार तीन बन्ध-प्रत्यय होते हैं। अथवा नपुंसक वेदको छोड़कर शेष दो वेदोंमेंसे कोई एक वेद, अथवा केवल पुरुषवेद होता है ॥२०१॥


चउसंजलणणवण्णं जोगाणं होइ एगदरं दो ते ।
कोहूणमाणवज्जं मायारहियाण एगदरगं वा ॥२०२॥

अर्थ: नवें गुणस्थानके अवेद भागमें चारों संज्वलनमेंसे कोई एक कषाय, तथा नव योगोंमेंसे कोई एक योग; ये दो बन्ध-प्रत्यय होते हैं । अथवा क्रोधको छोड़कर शेष तीनमेंसे, मानको छोड़कर शेष दोमेंसे एक और मायाको छोड़कर केवल लोभ-संज्वलन इस प्रकार एक कषाय होती है ॥२०२॥


सुहुमम्मि सुहुमलोहं णवण्ह जोगाण तिसु एयदरं ।
जोगम्मि य सत्तण्हं भणिया तिविहा वि पच्चय-वियप्पा ॥२०३॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें एक सूक्ष्म लोभकषाय और नव योगोंमेंसे कोई एक योग ये दो बन्ध-प्रत्यय होते हैं। उपशान्तकषाय और क्षीणकषाय गुणस्थानमें नौ योगोंमेंसे कोई एक योगरूप एक ही बन्ध-प्रत्यय होता है। सयोगिकेवली गुणस्थानमें सात योगोंमेंसे कोई एक योगरूप एक ही बन्ध-प्रत्यय होता है। इस प्रकार इन गुणस्थानोंमें तीन प्रकारके प्रत्यय-विकल्प कहे गये हैं ॥२०३॥


पडिणीयमंतराए उवघाए तप्पदोस णिण्हवणे ।
आवरणदुअं भूओ बंधइ अच्चासणाए य ॥२०४॥

अर्थ: ज्ञान-दर्शन और उनके साधनोंमें प्रतिकूल आचरण, अन्तराय, उपघात, प्रदोष और निह्नव करनेसे, तथा असातना करनेसे यह जीव आवरणद्विक अर्थात् ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मका प्रचुरतासे बन्ध करता है ॥२०४॥


[मूलगा० १६] १भूयाणुकंप-वय-जोग उजओ* खंति दाण-गुरुभत्तो ।
बंधइ सायं भूओ विवरीओ बंधए इयरं २॥२०५॥

अर्थ: प्राणियों पर अनुकम्पा करनेसे, व्रत-धारण करनेमें उद्यमी रहनेसे तथा उनके धारण करनेसे, क्षमा धारण करनेसे, दान देनेसे, तथा गुरुजनोंकी भक्ति करनेसे सातावेदनीय कर्मका तीव्र बन्ध होता है। और इनसे विपरीत आचरण करनेसे असातावेदनीय कर्मका तीव्र बन्ध होता है ॥२०५॥


[मूलगा० १७]¹अरहंत-सिद्ध-चेइय-तव-सुद-गुरु-धम्म-संघपडिणीओ ।
बंधइ दंसणमोहं अणंतसंसारिओ जेण¹ ॥२०६॥

अर्थ: अरहंत, सिद्ध, चैत्य, तप, श्रुत, गुरु, धर्म और संघके अवर्णवाद करनेसे, जीव दर्शनमोह कर्मका बन्ध करता है, जिससे कि वह अनन्तसंसारी बनता है ॥२०६॥


[मूलगा० १८]²तिव्वकसाओ बहुमोहपरिणओ रायदोससंसत्तो ।
बंधइ चरित्तमोहं दुविहं पि चरित्तगुणघादी³ ॥२०७॥

अर्थ: तीव्रकषायी, बहुमोहसे परिणत और राग-द्वेषसे संयुक्त जीव चारित्रगुणके घात करनेवाले दोनों ही प्रकारके चारित्रमोहनीयकर्मका बन्ध करता है ॥२०७॥


मिच्छादिट्ठी महारंभ-परिग्गहो तिव्वलोह णिस्सीलो ।
णिरयाउयं णिवंधइ पावमई रुद्दपरिणामो ॥२०८॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि, महारम्भी, महापरिग्रही, तीव्रलोभी, निःशीलो, रौद्रपरिणामी और पापबुद्धि जीव नरकायुका बन्ध करता है ॥२०८॥


उम्मग्गदेसओ सम्मग्गणासओ गूढहिययमाइल्लो ।
सढसीलो य ससल्लो तिरियाउ णिबंधए जीवो ॥२०६॥

अर्थ: उन्मार्गका उपदेशक, सन्मार्गका नाशक, गूढ़हृदयी, महामायावी, परन्तु मुखसे मीठे वचन बोलनेवाला, शठशील और शल्ययुक्त जीव तिर्यंगायुका बन्ध करता है ॥२०६॥


[मूलगा० २१] पयडीए तणुकसाओ दाणरओ सील-संजमविहूणो ।
मज्झिमगुणेहिं जुत्तो मणुयाउ णिबंधए जीवो ॥२१०॥

अर्थ: जो प्रकृतिसे ही मन्दकषायी है, दान देनेमें निरत है, शील-संयमसे रहित होकरके भी मनुष्योचित मध्यम गुणोंसे युक्त है, ऐसा जीव मनुष्यायुका बन्ध करता है ॥२१०॥


[मूलगा० २२] अणुवय-महव्वएहि य बालतवाकामणिज्जराए य ।
देवाउयं णिवंधइ सम्माइट्ठी य जो जीवो ॥२११॥

अर्थ: अणुव्रतों, शीलव्रतों और महाव्रतोंके धारण करनेसे, बालतप और अकामनिर्जराके करनेसे जीव देवायुका बन्ध करता है । तथा जो जीव सम्यग्दृष्टि है, वह भी देवायुका बन्ध करता है ॥२११॥


मण-वयण-कायवंको माइल्लो गारवेहिं पडिबद्धो ।
असुहं बंधइ णामं तप्पडिवक्खेहिं सुहणामं ॥२१२॥

अर्थ: जिसके मन-वचन-कायकी प्रवृत्ति वक्र हो, जो मायावी हो और तीनों गारवोंका धारक हो, ऐसा जीव अशुभ नामकर्मका बन्ध करता है और इनसे विपरीत कर्म करनेसे शुभ नामकर्मका बन्ध होता है ॥२१२॥


अरहंताइसु भत्तो सुत्तरूई पयण्णमाण गुणपेही ।
बंधइ उच्चागोयं विवरीओ बंधए इयरं ॥२१३॥

अर्थ: जो अरहंत आदिकी भक्ति करनेवाला है, आगमका अभ्यासी है और उच्च जाति, कुलादिका धारक होने पर भी जो अहंकारसे रहित है ऐसा जीव उच्चगोत्रकर्मका बन्ध करता है । तथा इससे विपरीत आचरण करनेवाला नीचगोत्रका बन्ध करता है ॥२१३॥


[मूलगा० २५]'पाणबहाइम्हि* रओ जिणपूआ‡-मोक्खमग्ग-विग्धयरो ।
अज्जेइ अंतरायं ण लहइ हियx-इच्छियं जेणं ॥२१४॥

अर्थ: प्राणियोंकी हिंसादिमें रत रहनेवाला और जिन-पूजनादि मोक्षमार्गके साधनोंमें विघ्न करनेवाला जीव अन्तराय कर्मका उपार्जन करता है, जिससे कि वह हृदय-इच्छित वस्तुको नहीं प्राप्त कर पाता है ॥२१४॥


२अंतरायस्स कोहाई पच्चुहकरणं तहा ।
आसवम्मि वि जे हेऊ ते वि कजोवचारओ ॥२१५॥

अर्थ: जो दूसरेपर क्रोधादि करता है और दूसरोंके दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्यमें विघ्न-बाधाएँ उपस्थित करता है, मिथ्यात्वादि का सेवन करता है ऐसा जीव भी अन्तराय-कर्मको उत्पन्न करता है । इस प्रकार कर्मोंके आस्रवके सम्बन्धमें जो हेतु या प्रत्यय बतलाये गये हैं, वे सब कारणमें कार्यके उपचारसे कर्म-बन्धके भी कारण जानना चाहिए ॥२१५॥


पडिणीयाइ हेऊ जे अणुभागं पडुच्च ते भणिया ।
णियमा पदेसबंधं पडुच्च वभिचारिणो सव्वे ॥२१६॥

अर्थ: ज्ञानावरणादि कर्मोंके जो प्रत्यनीक आदि आस्रव हेतु बतलाये गये हैं, वे सब अनुभागबन्धकी अपेक्षा कहे गये जानना चाहिए; क्योंकि प्रदेशबन्धकी अपेक्षा वे सब नियमसे व्यभिचारी देखे जाते हैं ॥२१६॥


बंधट्ठाणा चउरो तिण्णि य उदयस्स होंति ठाणानि ।
पंच य उदीरणाए संजोगं अउ परं वोच्छं ॥२१७॥

अर्थ: बन्धस्थान चार होते हैं । उदयके स्थान तीन होते हैं, किन्तु उदीरणाके स्थान पाँच होते हैं । इनके वर्णन करनेके पश्चात् इनके संयोगी स्थानोंको कहेंगे ॥२१७॥


[मूलगा० २६] छसु ठाणेसु सत्तट्ठविहं बंधंति तिसु य सत्तविहं ।
छव्विहमेओ तिण्णेयविहं तु अबंधओ एओ ॥२१८॥

अर्थ: छह गुणस्थानोंमें जीव सात या आठ प्रकारके कर्मोंका बन्ध करते हैं । तीन गुणस्थानोंमें सात प्रकारके कर्मोंका बन्ध करते हैं । एक गुणस्थानमें छह प्रकारके कर्मोंका बन्ध करते हैं। तीन गुणस्थानोंमें एक कर्मका बन्ध करते हैं और एक गुणस्थान अबन्धक है अर्थात् उसमें किसी भी कर्मका बन्ध नहीं होता ॥२१८॥


‘छप्पढमा बंधंति य मिस्सूणा सत्तकम्म अट्ठ’ वा ।
आऊणा सत्तेव य मिस्सापुव्वानियट्टिणो णेया ॥२१९॥

मोहाऊणं हीणा सुहुमो बंधेइ कम्म छव्वेव ।
वेयणियमेय तिण्णि य बंधंति अबंधओऽजोगो ॥२२०॥

अर्थ (गाथा 219 से 220): मिश्र गुणस्थानको छोड़कर पहलेके छह गुणस्थानवर्ती जीव आयुके बिना सात कर्मोंका, अथवा आयु-सहित आठ कर्मोंका बन्ध करते हैं । मिश्र, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण; इन तीन गुणस्थानोंके जीव आयुकर्मके बिना सात कर्मोंका बन्ध करनेवाले जानना चाहिए । सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानवर्ती जीव मोह और आयुके बिना शेष छह कर्मोंका बन्ध करते हैं । ग्यारहवें बारहवें और तेरहवें गुणस्थानवर्ती जीव एक वेदनीय कर्मका ही बन्ध करते हैं । अयोगिकेवली भगवान् अबन्धक कहे गये हैं ॥२१९-२२०॥


[मूलगा० २७] “अट्ठविह-सत्त-छ-बंधगा वि वेयंति अट्ठयं णियमा ।
*उवसंतखीणमोहा मोहूणाणि य जिणा अघाईणि” ॥२२१॥

अर्थ: आठ, सात और छह प्रकारके कर्म-बन्ध करनेवाले जीव नियमसे आठों ही कर्मोंका वेदन करते हैं। उपशान्तमोही और क्षीणमोही जीव मोहकर्मके बिना शेष सात कर्मोंका वेदन करते हैं। सयोगी और अयोगी जिन चार अघातिया कर्मोंका वेदन करते हैं ॥२२१॥


घाईणं छद्मत्था उदीरगा राहिणो य मोहस्स ।
तहयाउयं पमत्ता X जोगंता + णाम-गोयाणं ॥२२२॥

अर्थ: छद्मस्थ अर्थात् बारहवें गुणस्थान तकके जीव घातिया कर्मोंकी उदीरणा करते हैं। किन्तु मोहकर्मकी उदीरणा करनेवाले रागी अर्थात् सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान तकके ही जीव माने गये हैं। तृतीय वेदनीय कर्म और आयुकर्मकी उदीरणा प्रमत्तगुणस्थान तकके जीव करते हैं। तथा नाम और गोत्रकर्मकी उदीरणा सयोगिकेवली गुणस्थान तकके जीव करते हैं ॥२२२॥


[मूलगा० २८] १मिच्छादिट्ठिप्पभिई अट्ठ उदीरंति जा पमत्तो त्ति ।
अद्धावलियासेसे मिस्सृणा सत्त आऊणा ॥२२३॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर प्रमत्तसंयत गुणस्थान तकके जीव आठों ही कर्मोंकी उदीरणा करते हैं । किन्तु अपने-अपने आयुकालमें आवलीमात्र शेष रहने पर मिश्रगुणस्थानवर्ती जीव आयुकर्मके बिना शेष सात कर्मोंकी उदीरणा करते हैं । मिश्रगुणस्थानवर्ती जीव आठों ही कर्मोंकी उदीरणा करते हैं क्योंकि आयुके अन्तर्मुहूर्त शेष रह जाने पर सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थान छूट जाता है अर्थात् वह जीव अन्य गुणस्थानको प्राप्त हो जाता है ॥२२३॥


[मूलगा० २९] वेयणियाउअवज्जे छ उदीरेंति जा चउरि ।
अद्धावलियासेसे सुहुमोदीरेइ पंचेव ॥२२४॥

अर्थ: अप्रमत्तसंयतसे आदि लेकर चार गुणस्थानवर्ती जीव वेदनीय और आयुकर्मको छोड़कर शेष छह कर्मोंकी उदीरणा करते हैं । सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानके कालमें आवलीमात्र कालके शेष रह जाने पर सूक्ष्मसाम्परायसंयत वेदनीय, आयु और मोहकर्मको छोड़कर शेष पाँच कर्मोंकी उदीरणा करते हैं ॥२२४॥


[मूलगा० ३०] वेयणियाउयमोहे वज्जिय उदीरंति दोण्णि पंचेव ।
अद्धावलियासेसे णामं गोयं च अकसाई ॥२२५॥

अर्थ: उपशान्तकषाय और क्षीणकषाय, ये दो गुणस्थानवर्ती जीव वेदनीय, आयु और मोहको छोड़कर शेष पांचों ही कर्मोंकी उदीरणा करते हैं । किन्तु अकषायी अर्थात् क्षीणकषायी जीव क्षीणकषाय गुणस्थानके कालमें आवलीमात्र कालके शेष रहने पर नाम और गोत्र इन दो कर्मोंकी उदीरणा करते हैं ॥२२५॥


[मूलगा० ३१] उदीरेइ णाम-गोदे छकम्म विवज्जिए सजोगी दु ।
वट्टंतो दु अजोगी ण किंचि कम्मं उदीरेइ ॥२२६॥

अर्थ: सयोगिकेवली जिन शेष छह कर्मोंको छोड़कर नाम और गोत्र इन दो ही कर्मोंकी उदीरणा करते हैं । चार अघातिया कर्मोंके उदयमें वर्तमान भी अयोगी जिन योगके अभाव होनेसे किसी भी कर्मकी उदीरणा नहीं करते हैं ॥२२६॥ सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानवर्ती जीव छह अथवा पाँच प्रकारके कर्मोंकी उदीरणा करते हुए भी मोह और आयुके बिना शेष छह प्रकारके कर्मोंका बन्ध करते हैं । तथा वही सूक्ष्मसाम्परायसंयत आठों ही कर्मोंका अनुभवन करते हुए शुक्लध्यानमें मोहकर्मको जलाता है ॥२२६॥


[मूलगा० ३२] अट्ठविहमणुदीरंतो अणुहवइ चउव्विहं गुणविसालो ।
इरियावहं ण बंधइ आसण्णपुरकडो दिट्ठो ॥२२७॥

अर्थ: गुणविशाल अर्थात् चौरासी लाख उत्तर गुणोंका स्वामी अयोगी जिन आठों कर्मोंमेंसे किसी भी कर्मकी उदीरणा नहीं करते हुए भी चारों ही अघातिया कर्मोंका वेदन करते हैं। तथा योगका अभाव होनेसे वे ईर्यापथका भी बन्ध नहीं करते हैं, क्योंकि उनका मोक्ष अतिसन्निकट है ॥२२७॥


[मूलगा० ३३] 'इरियावहमाउत्ता चत्तारि वि सत्त चेव वेयंति ।
उदीरंति दोण्णि पंच य संसारभद्दम्हि भयणिज्जं ॥२२८॥

अर्थ: ईर्यापथ आस्रवसे संयुक्त उपशान्तमोही और क्षीणमोही जीव मोहकर्मको छोड़कर शेष सात कर्मोंका वेदन करते हैं और आठों कर्मोंकी उदीरणा करते हैं । तथा सयोगिकेवली जिन चार अघातिया कर्मोंका वेदन करते हैं और नाम या गोत्र इन दो कर्मोंकी उदीरणा करते हैं । किन्तु ईर्यापथ आस्रवसे संयुक्त उपशान्तकषायी जीव संसारगत दशामें भजनीय है अर्थात् कोई प्राप्त हुई बोधिका विनाश कर देता है और कोई नहीं भी करता है ॥२२८॥


[मूलगा० ३४] ‘छप्पंचमुदीरंतो बंधइ सो छव्विहं तणुकसाओ ।
अट्ठविहमणुभवंतो सुक्कज्झाणे दहइ कम्मं’ ॥२२९॥


[मूलगा० ३५] ‘अट्ठविहं वेयंता छव्विहमुदीरंति सत्त बंधंति ।
अणियट्टी य णियट्टी अप्पमत्तो य तिण्णेदे’ ॥२३०॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणसंयत, अपूर्वकरणसंयत और अप्रमत्तसंयत, ये तीनों ही गुणस्थानवर्ती जीव आठों ही कर्मोंका वेदन करते हुए आयु और वेदनीयको छोड़कर शेष सात कर्मोंका बन्ध करते हैं ॥२३०॥


[मूलगा० ३६] ‘बंधंति य वेयंति य उदीरंति य अट्ठ अट्ठ अवसेसा ।
सत्तविहबंधगा पुण अट्ठण्हमुदीरणे भज्जा’ ॥२३१॥

अर्थ: ऊपर कहे गये जीवोंके अतिरिक्त अवशिष्ट गुणस्थानवाले जो जीव हैं वे अर्थात् मिथ्यादृष्टिसे लेकर प्रमत्तसंयत तकके जीव आठों ही कर्मोंका बन्ध करते हैं, आठों ही कर्मोंका वेदन करते हैं और आठों ही कर्मोंकी उदीरणा करते हैं। किन्तु आयुकर्मको छोड़कर शेष सात प्रकारके कर्मोंका बन्ध करनेवाले जीव आठों कर्मोंकी उदीरणामें भजनीय हैं। अर्थात् अपनी अपनी आयुमें आवली काल शेष रहनेके पूर्व तक तो वे आठों ही कर्मोंकी उदीरणा करते हैं और आवली मात्र कालके शेष रह जानेके अनन्तर सात प्रकारके कर्मोंकी उदीरणा करते हैं ॥२३१॥


'सादि अणादि य धुवद्धुवो य पयदिट्ठाणं च भुजगारो ।
अप्पयरमवट्ठिदं च हि सामित्तेणावि णव होंति ॥२३२॥

अर्थ: सादिबन्ध, अनादिबन्ध, ध्रुवबन्ध, अध्रुवबन्ध, प्रकृतिस्थानबन्ध, भुजाकारबन्ध, अल्पतरबन्ध, अवस्थितबन्ध और स्वामित्वकी अपेक्षा बन्ध, इस प्रकार बन्धके नौ भेद होते हैं ॥२३२॥


'साइ अबंधा बंधइ अणाइबंधो य जीवकम्माणं ।
धुवबंधो य अभव्वे बंध-विणासेण अद्धुवो होज् ॥२३३॥

अप्पं बंधिय कम्मं बहुयं बंधेइ होइ भुयगारो ।
विवरीओ अप्पयरो अवट्ठिओ तेत्तियं त्ति बंधंतो ॥२३४॥

अर्थ (गाथा 233 से 234): विवक्षित कर्मप्रकृतिके अबन्ध अर्थात् बन्धविच्छेद हो जाने पर पुनः जो उसका बन्ध होता है, उसे सादिबन्ध कहते हैं। जीव और कर्मके अनादिकालीन बन्धको अनादिबन्ध कहते हैं। अभव्यके बन्धको ध्रुवबन्ध कहते हैं। एक बार बन्धका विनाश होकर पुनः होनेवाले बन्धको अध्रुवबन्ध कहते हैं। अथवा भव्यके बन्धको अध्रुवबन्ध कहते हैं। (एक जीवमें एक समय बँधनेवाली प्रकृतियोंके समूहको प्रकृतिस्थानबन्ध कहते हैं।) अल्प कर्म-बन्धको करके अधिक कर्मके बन्ध करनेको भुजाकारबन्ध कहते हैं। अधिक कर्म-बन्धको करके अल्प कर्मके बन्ध करनेको अल्पतर बन्ध कहते हैं। पहले समयमें जितना कर्म-बन्ध किया है, दूसरे समयमें उतना ही कर्म-बन्ध होनेको अवस्थितबन्ध कहते हैं। (इन विवक्षित कर्मप्रकृतियोंका इस गुणस्थानवर्ती जीव बन्ध करता है, इस प्रकारसे कर्मबन्धके स्वामित्व-विशेषके निरूपणको स्वामित्वकी अपेक्षा बन्ध कहते हैं।) ॥२३३-२३४॥


साइ अणाइ य धुव अद्धुवो य बंधो दु कम्मछक्कस्स ।
तहए साइयसेसा अणाइ धुवसेसओ आऊ ॥२३५॥

अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, नाम, गोत्र और अन्तराय; इन छह कर्मोंका सादिबन्ध भी होता है, अनादिबन्ध भी होता है, ध्रुवबन्ध भी होता है और अध्रुवबन्ध भी होता है, अर्थात् चारों प्रकारका बन्ध होता है । तीसरे वेदनीय कर्मका सादिबन्धको छोड़कर शेष तीन प्रकारका बन्ध होता है । आयु कर्मका अनादिबन्ध और ध्रुवबन्धके सिवाय शेष दो प्रकारका बन्ध होता है ॥२३५॥


[मूलगा० ३८]‘उत्तरपयडीसु तहा धुवियाणं बंधचउवियप्पो दु ।
सादीय अद्धुवियाओ सेसा परियत्तमाणीओ’ ॥२३६॥

अर्थ: उत्तरप्रकृतियोंमें जो संतालीस ध्रुवबन्धी प्रकृतियाँ हैं, उनका चारों प्रकारका बन्ध होता है । तथा शेष बची जो तेहत्तर परिवर्तमान प्रकृतियाँ हैं, उनका सादिबन्ध और अध्रुवबन्ध होता है ॥२३६॥


'णाणावरणा
पणदंसण विग्धं सव्वे कसाय मिच्छत्त णिमिण वण्णचउं ।
भयणिंदागुरुतेयाकम्मुवघायं धुवाउ सग्दालं* ॥२३७॥

अर्थ: पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, पांच अन्तराय, सभी अर्थात् सोलह कषाय, मिथ्यात्व, निर्माण, वर्णादि चार, भय, जुगुप्सा, अगुरुलघु, तैजसशरीर, कार्मणशरीर और उपघात; ये सैंतालीस ध्रुवबन्धी प्रकृतियाँ हैं, अर्थात् बन्ध-व्युच्छित्तिके पूर्व इनका निरन्तर बन्ध होता रहता है ॥२३७॥


'परघादुस्सासाणं आयावुज्जोवमाउ चत्तारि ।
तित्थयराहारदुयं एक्कारस होंति सेसाओ ॥२३८॥

अर्थ: परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत, चारों आयु, तीर्थंकर और आहारकद्विक, ये ग्यारह निष्प्रतिपक्ष अध्रुवबन्धी प्रकृतियाँ हैं ॥२३८॥


सादियरं वेयावि य हस्साइचउक्क पंच जाईओ ।
संठाणं संहणणं छक्कक्कं आणुपुब्वीओ । ॥२३९॥

गइ चउ दोय सरीरं गोयं च य दोण्णि अंगवंगा य ।
दह जुयलाण तसाइं गयणगइदुअं विसट्ठिपरिवत्ता ॥२४०॥

अर्थ (गाथा 239 से 240): सातावेदनीय, असातावेदनीय, तीनों वेद, हास्यादि चार, जातियाँ पाँच, संस्थान छह, संहनन छह, आनुपूर्वी चार, गति चार, औदारिक और वैक्रियिक ये दो शरीर, तथा इन दोनोंके दो अंगोपांग, दो गोत्र, त्रसादि दश युगल और दो विहायोगति, ये बासठ सप्रतिपक्ष अध्रुवबन्धी प्रकृतियाँ हैं ॥२३९-२४०॥


[मूलगा० ३६] चत्तारि पयट्ठाणाणि तिण्णि भुजगार अप्पयराणि ।
मूलपयडीसु एवं अवट्ठिओ चउसु णायव्वो ॥२४१॥

अर्थ: मूल प्रकृतियोंके प्रकृतिस्थान चार हैं, भुजाकार तीन हैं, अल्पतर तीन हैं, और अवस्थितबन्ध चार जानना चाहिए ॥२४१॥


तिण्णि दस अट्ठ ठाणाणि दंसणावरणा-मोह-णामाणं ।
एत्थेव य भुजयारा सेसेसुवेयं हवइ ठाणं ॥२४२॥

अर्थ: दर्शनावरण, मोहनीय और नामकर्मके क्रमशः तीन, दश और आठ प्रकृतिबन्धस्थान हैं । इनमें यथासम्भव भुजाकार बन्ध होते हैं । उक्त कर्मोंके सिवाय शेष पाँच कर्मोंके एक एक ही बन्धस्थान होता है ॥२४२॥


णव छक चउक्कं च हि दंसणावरस्स होंति ठाणाणि ।
भुजयारप्पयरा दो अवट्ठिया होंति तिण्णेव ॥२४३॥

अर्थ: दर्शनावरण कर्मके तीन बन्धस्थान हैं-नौ प्रकृतिरूप, स्यानगृद्धित्रिकके बिना छह प्रकृतिकरूप और निद्रा-प्रचलाके बिना चार प्रकृतिरूप । इनमें दो भुजाकार, दो अल्पतर और तीन अवस्थित बन्ध होते हैं ॥२४३॥


चउ छक्कं बंधंतो छण्णव बंधेइ होंति भुजयारा ।
बिवरीया अप्पयरा णवइ हु अवट्ठिया णेया ॥२४४॥

अर्थ: उपशमश्रेणीसे उतरनेवाला जीव अपूर्वकरणके द्वितीय भागमें चार प्रकृतिक स्थानका बन्ध करके प्रथम भागमें उतरकर छह-प्रकृतिक स्थानका बन्ध करने लगता है, यह प्रथम भुजाकार हुआ । पुनः और भी नीचे उतर कर मिथ्यादृष्टि होकर, अथवा प्रथमोपशमसम्यक्त्वसे सासादनसम्यग्दृष्टि होकर नौ प्रकृतिकस्थानका बन्ध करने लगता है, यह दूसरा भुजाकार हुआ । इस प्रकार दर्शनावरणके दो भुजाकार बन्ध होते हैं। इससे विपरीत क्रममें अर्थात् क्रमशः ऊपरके गुणस्थानोंमें चढ़ने पर दो अल्पतर बन्ध होते हैं-नौ प्रकृतिक स्थानको बाँधकर छह प्रकृतिक स्थानके बाँधनेपर पहला अल्पतर बन्ध होता है। तथा छहको बाँधकर चारके बाँधने पर दूसरा अल्पतर बन्ध होता है। अवस्थित बन्ध तीन होते हैं-नौका बन्ध कर पुनः नौके बाँधने पर पहला, छहका बन्धकर पुनः छहके बाँधने पर दूसरा और चारका बन्धकर पुनः चारके बाँधने पर तीसरा ॥२४४॥


मिच्छा सासण णवयं मिस्साइ-अपुव्वपढमभायंता ।
थीणातिगूणं णिद्दादुगूण बंधंति सुहुमंता ॥२४५॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीव नौ प्रकृतिक स्थानका बन्ध करते हैं । मिश्रगुणस्थानको आदि लेकर अपूर्वकरणके प्रथम भाग तकके जीव स्त्यानगृद्धित्रिकके बिना छह प्रकृतिक स्थानका बन्ध करते हैं। अपूर्वकरणके द्वितीय भागसे लेकर सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान तकके जीव निद्राद्विकके बिना चार प्रकृतिक स्थानका बन्ध करते हैं ॥२४५॥


दस बंधट्ठाणाणि मोहस्स हवंति वीस भुजायारा ।
एयारप्पयराणि य अवट्ठिया होंति तेत्तीसा ॥२४६॥

अर्थ: मोहकर्मके बन्धस्थान दश होते हैं । तथा भुजाकार बीस, अल्पतर ग्यारह और अवस्थित बन्ध तेतीस होते हैं ॥२४६॥


बावीसमेकवीसं सत्तरस तेरसेव णव पंच ।
चउ तिय दुयं च एक्कं बंधट्ठाणाणि मोहस्स’ ॥२४७॥

अर्थ: बाईस, इक्कीस, सत्रह, तेरह, नौ, पाँच, चार, तीन, दो और एक प्रकृतिकरूप मोहके दश बन्धस्थान होते हैं ॥२४७॥


मिच्छम्मि य बावीसा मिच्छा सोलस कसाय वेओ य ।
हस्साइजुयलेक्कंणिद्दा भएण’ विदिए दु मिच्छ-संहूणा ॥२४८॥

अर्थ: मिथ्यात्व गुणस्थानमें बाईस प्रकृतिक स्थानका बन्ध होता है । वे बाईस प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-मिथ्यात्व, सोलह कषाय, तीन वेदोंमेंसे एक वेद, हास्यादि दो युगलोंमेंसे एक युगल और भय-जुगुप्सा । दूसरे गुणस्थानमें मिथ्यात्वको छोड़कर शेष इक्कीस प्रकृतिरूप स्थानका बन्ध होता है। यहाँ नपुंसक वेदका भी बन्ध नहीं होता है, अतएव दो वेदोंमेंसे किसी एक वेदको ही लेना चाहिए ॥२४८॥


पढमचउक्केणित्थी-रहिया मिस्से अविरयसंम्मे य ।
विदिएणूणा देसे छट्ठे तहऊण सत्तमेट्ठे य ॥२४६॥

अर्थ: मिश्र और अविरतसम्यक्त्व गुणस्थानमें प्रथम चतुष्क अर्थात् अनन्तानुबन्धी चतुष्कके बिना सत्तरह प्रकृतियोंका बन्ध होता है । यहाँ पर स्त्रीवेदका बन्ध नहीं होता, केवल एक पुरुष- वेदका ही बन्ध होता है । देशविरत गुणस्थानमें द्वितीय चतुष्क अर्थात् अप्रत्याख्यानावरण चौकड़ीके बिना शेष तेरह प्रकृतियोंका बन्ध होता है । छठे, सातवें और आठवें गुणस्थानमें तृतीय चतुष्क अर्थात् प्रत्याख्यानावरण चौकड़ीके बिना नौ प्रकृतियोंका बन्ध होता है ॥२४६॥


'अरई सोएणूणा परम्मि पुंवेय संजलणा ।
एगेणूणा एवं दह ठाणा मोहबंधम्मि ॥२५०॥

अर्थ: प्रमत्तविरतमें अरति और शोक युगलकी बन्धव्युच्छित्ति हो जानेसे सातवें और आठवें गुणस्थानमें उनका बन्ध नहीं होता, अतएव उनमें एक-एक ही भंग होता है। इससे परे नवें गुणस्थानमें पुरुषवेद और संज्वलनचतुष्क, इन पाँचका बन्ध होता है, तथा पुरुषवेद आदि एक- एक प्रकृतिके बन्ध कम होते जानेसे चार, तीन, दो और एक प्रकृतिका भी बन्ध होता है। इस प्रकार सर्व मिलाकर मोहनीय कर्मके दश बन्धस्थान होते हैं ॥२५॥


'छव्वावीसे चउ इगिवीसे सत्तरस तेर दो दो दु ।
णवबंधए वि एवं एगेगमदो परं भंगा ॥२५१॥

अर्थ: बाईस प्रकृतिक बन्धस्थानमें छह भंग होते हैं, इक्कीस प्रकृतिक बन्धस्थानमें चार भंग होते हैं। सत्तरह, तेरह और नौ प्रकृतिक बन्धस्थानमें दो-दो भंग होते हैं। इससे परवर्ती पाँच, चार, तीन, दो और एक प्रकृतिक बन्धस्थानोंमें एक-एक ही भंग होता है ॥२६॥


'एकाई पणयंतं ओदरमाणो दुगाइणवयंतं ।
बंधंतो बंधेइ सत्तरसं वा सुरेसु उववण्णो ॥२५२॥

अर्थ: उपशमश्रेणीसे उतरनेवाला अनिवृत्तिकरणसंयत एकको आदि लेकर पाँच प्रकृतिपर्यन्त स्थानोंका बन्ध करता हुआ दो को आदि लेकर नौ प्रकृतिपर्यन्त स्थानोंका बन्ध करता है, अथवा देवोंमें उत्पन्न होता हुआ सत्रह प्रकृतिक स्थानका बन्ध करता है ॥२५२॥ नौ आदि स्थानोंका बन्ध करता हुआ जीव अधस्तन सर्व स्थानोंका बन्ध करता है ॥२५२॥


'णवगाई बंधंतो सव्वे हेड्ठाणि बंधदे जीवो ।


बावीसं बंधंतो सत्तरस तेरस णवाणि बंधेइ ॥२५३॥

सत्तरसं बंधंतो बंधइ तेरह णवाणि अप्पयरो ।
तेरहविहबंधतो बंधइ णवयं तमेव पणयं वा ॥२५४॥

तं बंधंतो चउरो बंधइ तं चिय तियं दुयं तमेक्कं च ।
उवरदबंधो हेड्ठा इक्कं सत्तरस सुरेसु अवत्तव्वा ॥२५५॥

अर्थ (गाथा 252 से 255): बाईस प्रकृतिक बन्धस्थानका बाँधनेवाला जीव ऊपरके गुणस्थानोंमें चढ़कर सत्रह, तेरह और नौ प्रकृतिक स्थानोंका बन्ध करता है। सत्रह प्रकृतिक स्थानका बन्ध करनेवाला जीव ऊपरके गुणस्थानोंमें चढ़कर तेरह और नौ प्रकृतिक स्थानोंका बन्ध करता है। तेरह प्रकृतिक स्थानका बन्ध करनेवाला नौ प्रकृतिक स्थानको बाँधता है। नौ प्रकृतिक स्थानका बन्ध करनेवाला पाँच प्रकृतिक स्थानका बन्ध करता है। पाँच प्रकृतिक स्थानका बन्धक चार प्रकृतिक स्थानका बन्ध करता है। चार प्रकृतिक स्थानका बन्धक तीन प्रकृतिक स्थानका बन्ध करता है। तीन प्रकृतिक स्थानका बन्धक दो प्रकृतिक स्थानका बन्ध करता है और दो प्रकृतिक स्थानका बन्धक एक प्रकृतिक स्थानका बन्ध करता है। इस प्रकार सर्व मिलकर ग्यारह अल्पतर बन्धस्थान हो जाते हैं। उपरत बन्धवाला नीचे उतरकर एकका और देवोंमें उत्पन्न होकर सत्रहका बन्ध करता है। ये दो अवक्तव्य बन्ध हैं ॥२५२ १/२-२५५॥


¹उवसंतकसाओ हेट्ठा ओदरिय अहवा सुहुमुवसामो हेट्ठा ओदरिय अणियट्टी होऊण एयं बंधइ ।
अहवा सुहुमुवसामओ कालं काऊण देवेसुप्पण्णो सत्तरसं बंधइ । अवत्तव्वभुजयारा-१। भुजयार-अप्प-
यरावत्तव्वसमालेण अवट्ठिया होंति ३३ ।

अर्थ: मोहकर्मके बन्धसे रहित एकादशम गुणस्थानवर्ती उपशान्तकषाय संयत नीचे उतरकर अथवा सूक्ष्मसाम्पराय-उपशामक नीचे उतरकर अनिवृत्तिकरण संयत होकर एक प्रकृतिक स्थानका बन्ध करता है। अथवा सूक्ष्मसाम्पराय-उपशामक मरण कर देवोंमें उत्पन्न होने पर सत्रह प्रकृतिक स्थानका बन्ध करता है। इस प्रकार दो अवक्तव्य भुजाकार बन्धस्थान होते हैं। इस प्रकार भुजाकार बीस, अल्पतर ग्यारह और अवक्तव्य दो; ये सर्व मिलाकर तैतीस अवस्थित बन्धस्थान होते हैं।


'अट्ठ य बंधट्ठाणा बावीस हवंति णामभुजयारा ।
इगिवीसं अप्पयरा अवट्ठिया होंति छाचाला ॥२५६॥

अर्थ: नामकर्मके प्रकृति-बन्धस्थान आठ होते हैं। भुजाकार बाईस, अल्पतर इक्कीस और अवस्थित बन्धस्थान छियालीस होते हैं ॥२५६॥


२तेवीसं पणुवीसं छव्वीसं अट्ठवीसमुगुतीसं ।
तीसेकतीसमेयं बंधट्ठाणानि णामस्स ॥२५७॥

अर्थ (गाथा 256 से 257): तेईस, पच्चीस, छब्बीस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस, इकतीस और एक प्रकृतिक इस प्रकार ये आठ नामकर्मके बन्धस्थान होते हैं ॥२५७॥ तीसको आदि लेकर तेईस तकके स्थानोंको बाँधनेपर, तथा इकतीसको बाँधकर तीस, उनतीस और एक प्रकृतिको बाँधनेपर अल्पतर बन्धस्थान होते हैं। अट्ठाईस और उनतीसको बाँधनेवाला नियमसे एक यशस्कीर्तिको बाँधता है। इस प्रकार भी अल्पतर बन्धस्थान होते हैं। अब अवक्तव्यबन्धस्थानोंको कहते हैं–उपरतबन्धवाला जीव नीचे उतरकर एक प्रकृतिको बाँधता है। अथवा मरकर देवोंमें उत्पन्न हो तीस और उनतीस प्रकृतियोंको बाँधता है। इस प्रकार अवक्तव्यबन्धस्थान प्राप्त होते हैं ॥२५६-२५७॥ तीस या उनतीस प्रकृतियोंको बाँधता है। इस प्रकार अवक्तव्यभुजाकार तीन होते हैं, जिनकी संदृष्टि मूलमें दी है। भुजाकार २२ अल्पतर २१ अवक्तव्य ३ ये सर्व मिलकर ४६ अवस्थित बन्धस्थान होते हैं।


जसकित्ती बंधंतो अडवीसाई हु एक्कतीसंता ।
तेवीसाई बंधइ तीसंता हवंति भुजयारा ॥२५८॥

अर्थ: उपशम श्रेणीसे उतरने वाला अपूर्वकरणसंयत एक यशस्कीर्त्तिका बन्ध करता हुआ अट्ठाईसको आदि लेकर इकतीस तकके स्थानोंको बाँधता है। इसी प्रकार तेईस आदि स्थानोंका बन्ध करनेवाला जीव पच्चीस आदि लेकर तीस तकके स्थानोंका बन्ध करता है। तथा अट्ठाईस आदि स्थानोंको बाँधता हुआ जीव उनतीसको आदि लेकर इकतीस तकके स्थानोंका बन्ध करता है। इस प्रकार नामकर्मके बाईस भुजाकार बन्धस्थान होते हैं ॥२५८॥


इगितीसंता बंधइ बंधंतो अट्ठवीसाई ।
तीसाइं तेवीसंता तह तीसुगुतीसमेक्कमिगितीसं ॥२५९॥


इक्कं बंधइ णियमा अडवीसुगुतीस बंधंतो ।
उवरदबंधो हेठ्ठा एक्कं देवेसु तीसुगुतीसा ॥२६०॥


'इगि पंच तिण्णि पंच य बंधट्ठाणाणि होंति णामस्स ।
णिरयगइ-तिरिय-मणुय-देवगईसंजुया हुंति ॥२६१॥

अर्थ: नरकगतिसंयुक्त नामकर्मका एक बन्धस्थान है। तिर्यग्गतिसंयुक्त नामकर्मके पाँच बन्धस्थान हैं। मनुष्यगतिसंयुक्त नामकर्मके तीन बन्धस्थान हैं और देवगतिसंयुक्त नामकर्मके पाँच बन्धस्थान होते हैं ॥२६१॥


“अट्ठावीसं णिरए तेवीसं पंचवीस छव्वीसं ।
उणतीसं तीसं च हि तिरियगई संजुया पंच ॥२६२॥”

अर्थ: नरकगतिके साथ बँधनेवाला नामकर्मका अट्ठाईस प्रकृतिक एक बन्धस्थान है। तेईस, पच्चीस, छब्बीस, उनतीस और तीस: ये पाँच बन्धस्थान तिर्यग्गतिसंयुक्त बँधते हैं ॥२६२॥


पणवीसं उगुतीसं तीसं चिय※ तिण्णि होंति मणुयगई ।
†देवगईए चउरो एक्कत्तीसाइ णिरयगई एयं ॥२६३॥

अर्थ: मनुष्यगतिके साथ नामकर्मके पच्चीस, उनतीस और तीस प्रकृतिक तीन स्थान होते हैं। देवगतिके साथ इकतीस आदि चार स्थान होते हैं। तथा एक प्रकृतिक स्थान गतिरहित है ॥२६३॥


'णिरयदुगं पंचिंदिय वेउव्विय तेउणाम कम्मं च ।
वेउव्वियमंगवंगं वण्णचउक्कं तहा हुंडं ॥२६४॥

अगुरुलहुयचउक्कं तसचउ असुहं च अप्पसत्थगई ।
अत्थिर दुब्भग दुस्सर अणादेज्जं चेव णिमिणं च ॥२६५॥

अजसकित्ती य तहा अट्ठावीसं हवंति णायव्वा ।
णिरयगईसंजुत्तं मिच्छादिट्ठी दु बंधंति ॥२६६॥

अर्थ (गाथा 264 से 266): नरकद्विक (नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी), पञ्चेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वैक्रियिकशरीर-अंगोपांग, वर्णचतुष्क (रूप, रस, गन्ध स्पर्शनामकर्म) हुण्डकसंस्थान, अगुरुलघुचतुष्क (अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास) त्रसचतुष्क (त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर), अशुभ, अप्रशस्तगति, अस्थिर, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, निर्माण और अयशःकीर्ति; ये अट्ठाईस प्रकृतियाँ अट्ठाईसप्रकृतिकस्थानकी जानना चाहिए। मिथ्यादृष्टि मनुष्य या तिर्यञ्च उक्त प्रकृतियोंको नरकगतिसंयुक्त बाँधते हैं ॥२६४-२६६॥


'तत्थ य पढमं तीसं तिरियदुगोरालतेज कम्मं च ।
पंचिंदियजाई वि य छस्संठाणणमेक्कयरं ॥२६७॥

ओरालियंगवंगं छस्संघयणणमेक्कयरं ।
वण्णचउक्कं च तहा अगुरुलहुगं च चत्तारि ॥२६८॥

उज्जोवं तसचउक्कं थिराइछज्जुयलमेक्कयरं णिमिणं च ।
बंधइ मिच्छादिट्ठी एयदरं दो विहायगई ॥२६९॥

अर्थ (गाथा 267 से 269): तिर्यग्-द्विक ( तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी ) औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, पञ्चेन्द्रियजाति, छह संस्थानोंमेंसे कोई एक, औदारिकशरीर-अङ्गोपाङ्ग, छह संहननोंमेंसे कोई एक, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, उद्योत, त्रसचतुष्क, स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, सुभग-दुर्भग, सुस्वर-दुःस्वर, आदेय-अनादेय और यशःकीर्ति-अपयशःकीर्ति इन स्थिरादि छह युगलोंमेंसे कोई एक-एक, निर्माण और दो विहायोगतियोंमेंसे कोई एक; इन प्रथम प्रकार वाली तीस प्रकृतियोंको तिर्यञ्चोंमें उत्पन्न होनेवाला नारकी मिथ्यादृष्टि जीव बाँधता है ॥२६७-२६९॥


एमेव विदियतीसं णवरि असंपत्तहुंडसंठाणं ।
अवणेज्जो एक्कयरं सासणसम्मो य बंधेई ॥२७०॥

अर्थ: इसी प्रकार द्वितीय तीस प्रकृतिक बन्धस्थान होता है । विशेषता केवल यह है कि उसमें प्रथम तीसमेंसे असंप्राप्तासृपाटिकासंहनन और हुण्डकसंस्थान इन दोको निकाल देना चाहिए । अर्थात् छह संस्थान और छह संहननके स्थान पर पाँच संस्थान और पाँच संहननमेंसे कोई एक-एकका ग्रहण करना चाहिए । इस द्वितीय तीस प्रकृतिक स्थानको सासादनसम्यग्दृष्टि जीव बाँधता है ॥२७०॥


तह य तदीयं तीसं तिरियदुगोराल तेज कम्मं च ।
ओरालयंगवंगं हुंडमसंपत्त वण्णचउं ॥२७१॥

अगुरुलहुचउक्कं तसचउ उज्जोवमप्पसत्थगई ।
थिर-सुभ-जसजुयलाणं तिण्णेयदरं अणादेज्जं ॥२७२॥

दुब्भग दुस्सर णिमिणं वियलिंदियजाइ इक्कदरमेव ।
एयाओ पयडीओ मिच्छादिट्ठी दु बंधंति ॥२७३॥

अर्थ (गाथा 271 से 273): इसी प्रकार तीसप्रकृतिक तृतीय बन्धस्थान है। उसकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-तिर्यग्द्विक, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, औदारिकशरीर-अंगोपांग, हुंडकसंस्थान, असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, त्रसचतुष्क, उद्योत, अप्रशस्तविहायोगति, स्थिर, शुभ और यशस्कीर्ति; इन तीन युगलोंमेंसे कोई एक-एक; अनादेय, दुर्भग, दुःस्वर, निर्माण और विकलेन्द्रियजातियोंमेंसे कोई एक; इन प्रकृतियोंको तिर्यञ्चगतिमें जानेवाला मिथ्यादृष्टि मनुष्य या तिर्यंच ही बाँधता है ॥२७१-२७३॥


जह तिण्हं तीसाणं तह चेव य तिण्णि ऊणतीसं तु ।
णवरि विसेसो जाणे उज्जोवं णत्थि सव्वत्थ ॥२७४॥

अर्थ: जिस प्रकारसे तीन प्रकारके तीसप्रकृतिक बन्धस्थानोंका निरूपण किया है, उसी प्रकारसे तीन प्रकारके उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थान भी होते हैं। केवल विशेषता यह ज्ञातव्य है कि उन सभीमें उद्योतप्रकृति नहीं होती है ॥२७४॥


तत्थ इमं छव्वीसं तिरियदुगोराल तेज कम्मं च ।
एइंदिय वण्णचउं अगुरुलहुयचउक्कं होइ हुंडं च ॥२७५॥

आयावुज्जोयाणमेकयरं थावर बादरयं ।
पज्जत्तं पत्तेयं थिराथिराणं च एकयरं ॥२७६॥

एकयरं च सुहासुह दुब्भग-जसजुयल एकयरं ।
णिमिणं अणादेज्जं चेव तह मिच्छादिट्ठी दु बंधंति ॥२७७॥

अर्थ (गाथा 275 से 277): छब्बीस प्रकृतिक बन्धस्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-तिर्यग्द्विक, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, एकेन्द्रियजाति, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, हुंडकसंस्थान, आतप और उद्योतमेंसे कोई एक, स्थावर, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर-अस्थिरमेंसे कोई एक, शुभ-अशुभमेंसे कोई एक, दुर्भग और यशःकीर्तियुगलमेंसे कोई एक, निर्माण और अनादेय इन छब्बीस प्रकृतियोंको एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न होनेवाले मिथ्यादृष्टि देव बाँधते हैं ॥२७५-२७७॥


जह छव्वीसं ठाणं तह चेव य होइ पढमपणुवीसं ।
णवरि विसेसो जाणे उज्जोवादावरहियं तु ॥२७८॥

बादर सुहुमेकयरं साहारण पत्तेयं च एकयरं ।
संजुत्तं तह चेव य मिच्छादिट्ठी दु बंधंति ॥२७९॥

अर्थ (गाथा 278 से 279): जिस प्रकार छब्बीस प्रकृतिक स्थान है, उस ही प्रकार प्रथम पचीस प्रकृतिक स्थान जानना चाहिए । विशेषता केवल यह जानना चाहिए कि वह उद्योत और आतप इन दो प्रकृतियोंसे रहित है । इस स्थानको बादर-सूक्ष्ममेंसे किसी एकसे संयुक्त तथा साधारण-प्रत्येकशरीरमेंसे किसी एकसे संयुक्त मिथ्यादृष्टि जीव बाँधते हैं ॥२७८-२७९॥


बिदियपणवीसठाणं तिरियदुगोराल तेजकम्मं च ।
वियलिंदिय-पंचिंदिय एक्कयरं हुंडसंठाणं ॥२८०॥

ओरालयंगवंगं वण्णचउक्कं तहा अपज्जत्तं ।
अगुरुलहुगुवघादं तस वायरयं असंपत्तं ॥२८१॥

पत्तेयमथिरमसुभं दुहगं णादेज्ज अजस णिमिणं च ।
बंधइ मिच्छादिट्ठी अपज्जत्तयसंजुयं एयं ॥२८२॥

अर्थ (गाथा 280 से 282): द्वितीय पच्चीस प्रकृतिक स्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-तिर्यग्द्विक, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, विकलत्रय और पञ्चेन्द्रियजातिमेंसे कोई एक, हुण्डकसंस्थान, औदारिकशरीर-अंगोपांग, वर्णचतुष्क, अपर्याप्त, अगुरुलघु, उपघात, त्रस, बादर, सृपाटिकासंहनन, प्रत्येक, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयशःकीर्ति और निर्माण । इस द्वितीय पच्चीस प्रकृतिक अपर्याप्त-संयुक्त स्थानको तिर्यञ्च या मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीव बाँधता है ॥२८०-२८२॥


तत्थ इमं तेवीसं तिरियदुगोराल तेजकम्मं च ।
एइंदिय वण्णचउगं अगुरुलहुगं च उवघादं ॥२८३॥

थावर अस्थिरं असुहं दुभग अणादेज्ज अजस णिमिणं च ।
हुंडं च अपजत्तं बायर-सुहुमाण एक्कयरं ॥२८४॥

साहारणपत्तेयं एक्कयरं बंधओ तहा मिच्छो ।
एए बंधट्ठाणा तिरियगईसंजुया भणिया ॥२८५॥

अर्थ (गाथा 283 से 285): तेईस प्रकृतिक बन्धस्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-तिर्यग्द्विक, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, एकेन्द्रियजाति, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, स्थावर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयशःकीर्ति, निर्माण, हुण्डकसंस्थान, अपर्याप्त, बादर-सूक्ष्ममेंसे कोई एक और साधारण-प्रत्येकमेंसे कोई एक । इस तेईस प्रकृतिक स्थानको तिर्यञ्च या मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीव बाँधता है । इस प्रकार तिर्यग्गतिसंयुक्त बँधनेवाले उपर्युक्त बन्धस्थान कहे ॥२८३-२८५॥


तथ्थ य तीसं ठाणं मणुयदुगोराल तेज कम्मं च ।
ओरालिंयंगवंगं समचउरं वज्ररिसहं च ॥२८६॥

तसचउ वण्णचउक्कं अगुरुलहुयं च होंति चत्तारि ।
थिराथिर-सुहासुहाणं एक्कयरं सुहयमादेज्जं ॥२८७॥

सुस्सरजसजुयलेक्कं पसत्थगइ णिमिणं च तित्थयरं ।
पंचिंदियं च तीसं अविरदसम्मो दु बंधेइ ॥२८८॥

अर्थ (गाथा 286 से 288): उनमें तीस प्रकृतिक स्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-मनुष्यद्विक ( मनुष्यगति-मनुष्यगत्यानुपूर्वी ) औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, औदारिकशरीर-अङ्गोपाङ्ग, समचतुरस्र-संस्थान, वज्रवृषभनाराचसंहनन, त्रसचतुष्क, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, स्थिर-अस्थिर और शुभ-अशुभमेंसे कोई एक-एक, सुभग, आदेय, सुस्वर और यशःकीर्तियुगलमेंसे एक, प्रशस्त- विहायोगति, निर्माण, तीर्थङ्कर और पंचेन्द्रियजाति । इस तीस प्रकृतिक स्थानको वैमानिक देव या रत्नप्रभादि तीन पृथिवियोंका नारकी अविरतसम्यग्दृष्टि जीव बाँधता है ॥२८६-२८८॥


जह तीसं तह चेव य उणतीसं तु जाण पढमा दु ।
तित्थयरं वजित्ता अविरदसम्मो दु बंधेई ॥२८६॥

अर्थ: जिस प्रकार तीस प्रकृतिक बन्धस्थान बतलाया गया है, उसी प्रकार प्रथम उनतीस प्रकृतिक स्थान भी जानना चाहिए । इसमें केवल तीर्थङ्कर प्रकृतिको छोड़ देते हैं । इस स्थानका भी अविरत सम्यग्दृष्टि देव या नारकी जीव बन्ध करता है ॥२८६॥


जह पढमं उणतीसं तह चेव य विदिय*उणतीसं तु ।
णवरिविसेसो सुस्सर-सुभगादेज्ज जुयलाणमेकयरं ॥२६०॥

हुंडमसंपत्तं पि य वज्जिय सेसाणमेकयरं च ।
विहायगइजुयलमेकयरं सासणसम्मो दु बंधंति ॥२६१॥

अर्थ (गाथा 290 से 291): जिस प्रकार प्रथम उनतीस प्रकृतिक स्थान कहा गया है, उसी प्रकार द्वितीय उनतीस प्रकृतिक स्थान भी जानना चाहिए। विशेषता केवल यह है कि सुस्वर, सुभग और आदेय, इन तीन युगलोंमेंसे कोई एक-एक; तथा हुण्डकसंस्थान और असंप्राप्तासृपाटिकासंहननको छोड़कर शेषमेंसे कोई एक-एक और विहायोगतियुगलमेंसे कोई एक प्रकृति संयुक्त द्वितीय उनतीस प्रकृतिक स्थानको मनुष्यगतिमें उत्पन्न होनेवाले चारों गतियोंके सासादनसम्यग्दृष्टि जीव बाँधते हैं ॥२६०-२६१॥


एवं तइउणतीसं णवरि असंपत्त हुंडसहियं च ।
बंधइ मिच्छादिट्ठी सत्तण्हं जुयलाणमेययरं ॥२६२॥

अर्थ: इसी प्रकार तृतीय उनतीस प्रकृतिक स्थान भी जानना चाहिए। विशेषता केवल यह है कि वह सृपाटिकासंहनन और हुण्डकसंस्थान सहित है। तथा सात युगलोंमेंसे किसी एक प्रकृतिके साथ उसे चारों गतिके मिथ्यादृष्टि जीव बाँधते हैं ॥२६२॥


'तत्थ इमं पणुवीसं मणुयदुगं उराल तेज कम्मं च ।
ओरालियगवंगं हुडमंसंपत्त वण्णचउक्के ॥२९३॥


अगुरुगलहुगुवघादं तस बादर पत्तेयं अपज्जत्तं ।
अत्थिरमसुहं दुब्भगमणादेज्जं अजसणिमिणं च ॥२९४॥


पंचिंदियसंजुत्तं पणुवीसं बंधओ तहा मिच्छो’ ।
मणुसगई-संजुत्ताणि तिण्णि ठाणाणि भणियाणि ॥२९५॥

अर्थ: पच्चीस प्रकृतिक स्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-मनुष्यद्विक, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, औदारिकशरीर-अंगोपांग, हुण्डकसंस्थान, सृपाटिकासंहनन, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, त्रस, बादर, प्रत्येक, अपर्याप्त, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयशःकीर्ति, निर्माण और पंचेन्द्रियजाति। पंचेन्द्रियजातिसंयुक्त इस पच्चीस प्रकृतिक स्थानको तिर्यञ्च या मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीव बाँधता है। इस प्रकार मनुष्यगतिसंयुक्त उक्त तीन स्थान कहे गये हैं ॥२६३-२६५॥


देवदुयं पंचिंदिय वेउव्विय आहार-तेज-कम्मं च ।
समचउरं वेउव्विय आहारय अंगवंगं च ॥२९६॥


तसचउ वण्णचउक्कं अगुरुलहुयं च चत्तारि ।
थिर सुभ सुभगं सुस्सर पसत्थगइ जस य आदेज्जं ॥२९७॥


णिमिणं चि य तित्थयरं एकत्तीसं वि होंति णेयाणि ।
बंधइ पमत्त-इयरो अपुव्वकरणो य णियमेणं ॥२९८॥

अर्थ: देवद्विक (देवगति-देवगत्यानुपूर्वी), पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, आहारकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीर-अंगोपांग, आहारकशरीर-अंगोपांग, त्रसचतुष्क, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, प्रशस्त विहायोगति, यशःकीर्त्ति, आदेय, निर्माण और तीर्थंकर; ये इकतीस प्रकृतिक स्थानकी प्रकृतियाँ जानना चाहिए। इस स्थानको अप्रमत्तसंयत या अपूर्वकरणसंयत ही नियमसे बाँधते हैं ॥२६६-२६८॥


एमेव होइ तीसं णवरि हु तित्थयरवज्जियं णियमा ।
बंधइ पमत्त-इयरो अपुव्वकरणो य णायव्वो ॥२९९॥

अर्थ: इसी प्रकार-इकतीस प्रकृतिक स्थानके समान-तीस प्रकृतिक स्थान भी जानना चाहिए। विशेषतः केवल यह है कि इसमें तीर्थंकर प्रकृति छूट जाती है। इस तीस प्रकृतिक स्थानको भी अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणसंयत ही नियमसे बाँधते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥२६९॥


आहारदुयं अवणिय एक्कत्तीसम्हि पढमउणतीसं ।
बंधइ अपुव्वकरणो अप्पमत्तो य णियमेणं ॥३००॥

अर्थ: इकतीस प्रकृतिक स्थानमेंसे आहारकद्विक (आहारकशरीर-आहारक अंगोपांग) को निकाल देने पर प्रथम उनतीस प्रकृतिक स्थान हो जाता है। इस स्थानको अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरण-संयत नियमसे बाँधते हैं ॥३००॥


एवं विदिउणुतीसं णवरि य थिर सुभ जसं च एक्कयरं ।
बंधइ पमत्तविरदो अविरदो देसविरदो य ॥३०१॥

अर्थ: इसी प्रकार द्वितीय उनतीस प्रकृतिक स्थान जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि यहाँ पर स्थिर, शुभ और यशःकीर्ति; इन तीन युगलोंमेंसे किसी एक-एक प्रकृतिका बन्ध होता है । इस द्वितीय उनतीस प्रकृतिक स्थानको प्रमत्तविरत, देशविरत और अविरतसम्यग्दृष्टि जीव बाँधते हैं ॥३०१॥


‘तित्थयराहादुगं एक्कत्तीसम्हि अवणिए पढमं ।
अट्ठावीसं बंधइ अपुव्वकरणो य अप्पमत्तो य’ ॥३०२॥

अर्थ: इकतीसप्रकृतिक स्थानमेंसे तीर्थङ्कर और आहारकद्विक, इन तीन प्रकृतियोंके निकाल देनेपर शेष रहीं अट्ठाईस प्रकृतियोंको अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणसंयत बाँधते हैं। यह प्रथम अट्ठाईसप्रकृतिक स्थान है ॥३०२॥


२विदियं अट्ठावीसं विदिउगुतीसं च तित्थयरहीणं ।
मिच्छादिपमत्तंता य बंधगा होंति णायव्वा२ ॥३०३॥

अर्थ: द्वितीय उनतीस प्रकृतिक स्थानमेंसे तीर्थङ्कर प्रकृतिके कम कर देनेपर द्वितीय अट्ठाईस प्रकृतिक स्थान हो जाता है। इस स्थानके बन्धक मिथ्यादृष्टिसे लेकर प्रमत्तसंयत गुणस्थान तकके जीव होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३०३॥


४बंधंति जसं एगं अपुव्व अणियट्टि सुहुमा य ।
तेरे णव चउ पणयं बंध-वियप्पा हवंति णामस्स३ ॥३०४॥

अर्थ: यशस्कीर्तिरूप एक प्रकृतिक स्थानको अपूर्वकरणसंयत, अनिवृत्तिकरणसंयत और सूक्ष्मसाम्परायसंयत बाँधते हैं। (इस प्रकार देवगतिसंयुक्त सर्व भंग (१+१+१+८+१+८=२०) होते हैं। तथा नामकर्मके ऊपर बतलाये गये सर्व बन्धविकल्प (तिर्यञ्चगति-सम्बन्धी ६३०८ + मनुष्यगतिके ४६१७ + देवगतिसम्बन्धी २० = १३९४५) तेरह हजार नौ सौ पैंतालीस होते हैं ॥३०४॥


[मूलगा०४१] 'सव्वासिं पयडीणं मिच्छादिट्ठी दु बंधगो भणिओ ।
तित्थयराहारदुगं मोत्तूणं सेसपयडीणं ’ ॥३०५॥

[मूलगा०४२] २सम्मत्तगुणणिमित्तं’ तित्थयरं संजमेण आहारा ।
बज्झंति सेसियाओ मिच्छत्ताईहिं हेऊहिं ३ ॥३०६॥

अर्थ (गाथा 305 से 306): तीर्थङ्कर और आहारकद्विक, इन तीन प्रकृतियोंको छोड़कर शेष सर्व प्रकृतियोंका बन्धक मिथ्यादृष्टि जीव कहा गया है। इसलिए मिथ्यात्वगुणस्थानमें ११७ प्रकृतियोंका बन्ध होता है। सम्यक्त्वगुणके निमित्तसे तीर्थङ्कर प्रकृतिका और संयमगुणके निमित्तसे आहारकद्विकका बन्ध होता है। शेष एक सौ सत्तरह प्रकृतियाँ मिथ्यात्व, अविरति आदि हेतुओंसे बँधती हैं॥३०५-३०६॥


३सोलस मिच्छत्तंता आसादंता य पंचवीसं तु ।
तित्थयराउवसेसा अविरय-अंता दु मिस्सस्स’ ॥३०७॥

अर्थ: मिथ्यात्व गुणस्थानके अन्त तक वक्ष्यमाण सोलह प्रकृतियाँ बँधती हैं। पच्चीस प्रकृतियाँ सासादनगुणस्थानके अन्त तक बँधती है। अविरतगुणस्थानके अन्त तक जिनका बन्ध होता है, ऐसी तीर्थङ्कर और आयुद्विकके बिना चौहत्तर प्रकृतियाँ मिश्रगुणस्थानके अन्त तक तक बँधती हैं ॥३०७॥


मिच्छं णउंसयवेयं णिरयाऊ तह य चेय णिरयदुगं ।
इगि-वियलिंदियजाई हुंडमसंपत्तमादावं ॥३०८॥
थावर सुहुमं च तहा साहारण तहेव अपज्जत्तं ।
एवं सोलह पयडी मिच्छत्तम्हि य बंधवोच्छेओ ॥३०६॥

अर्थ (गाथा 308 से 309): मिथ्यात्व, नपुंसकवेद, नरकायु तथा नरकद्विक, एकेन्द्रियजाति, विकलेन्द्रियजातित्रिक, हुण्डकसंस्थान, सृपाटिकासंहनन, आतप, स्थावर, सूक्ष्म, साधारण और अपर्याप्त ये सोलह प्रकृतियाँ मिथ्यात्वगुणस्थानके अन्तमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३०८-३०६॥


थीणातिगं इत्थी विय अण तिरियाऊ तहेव तिरियदुगं ।
मज्झिमचउसंठाणं मज्झिमचउ चेव संघयणं ॥३१०॥
उज्जोयमप्पसत्थं विहायगइ दुब्भगं अणादेज्जं ।
दुस्सर णीचागोदं सासणसम्मम्हि वोच्छिण्णा ॥३११॥

अर्थ (गाथा 310 से 311): स्त्यानत्रिक (स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला) स्त्रीवेद, अनन्तानुबन्धी चतुष्क, तिर्यंचायु, तिर्यग्द्विक, मध्यम चार संस्थान, मध्यम चार संहनन, उद्योत, अप्रशस्तविहायोगति, दुर्भग, अनादेय, दुःस्वर और नीचगोत्र, ये पच्चीस प्रकृतियाँ सासादनगुणस्थानके अन्तमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३१०-३११॥


[मूलगा० ४४] अविरयअंता दसयं विरयाविरयंतिया दु चत्तारि ।
छच्चेव पमत्तंता एगा पुण अप्पमत्तंता ॥३१२॥

अर्थ: अविरतगुणस्थानके अन्तमें दश प्रकृतियाँ बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं। विरताविरतके अन्तमें चार प्रकृतियाँ और प्रमत्तविरतके अन्तमें छह प्रकृतियाँ बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं। अप्रमत्तविरतके अन्तमें एक प्रकृति बन्धसे व्युच्छिन्न होती है ॥३१२॥


विदियकसायचउक्कं मणुयाऊ मणुयदुगय उरालं ।
तस्स य अंगोवंगं संधयणाइं अविरयस्स ॥३१३॥

तइयकसायचउक्कं विरयाविरयम्हि बंधवोच्छिण्णो ।
साइयरमरइ सोयं तह चेव य अधिरमसुहं च ॥३१४॥

अजसकित्ती य तहा पमत्तविरयम्हि बंधवोच्छेदो ।
देवाउयं च एयं पमत्तइयरम्हि णायव्वो ॥३१५॥

अर्थ (गाथा 313 से 315): द्वितीय अप्रत्याख्यानावरणकषायचतुष्क, मनुष्यायु, मनुष्यद्विक, औदारिकशरीर, औदारिक-अङ्गोपाङ्ग और वज्रवृषभनाराचसंहनन; ये दश प्रकृतियाँ अविरतगुणस्थानके अन्तमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं। तृतीय प्रत्याख्यानावरणकषायचतुष्क, विरताविरतगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती है। असातावेदनीय, अरति, शोक, अस्थिर, अशुभ और अयशःकीर्त्ति ये छह प्रकृतियाँ प्रमत्तविरतगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं। एक देवायुप्रकृति अप्रमत्तविरतगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती है ॥३१३-३१५॥


[मूलगा० ४५] दो तीस चत्तारि य भागा भागेसु संखसण्णाओ।
चत्तारि समयसंखा अपुव्वकरणंतिया होंति ॥३१६॥

अर्थ: अपूर्वकरणगुणस्थानके संख्यात अर्थात् सात भाग होते हैं। उनमेंसे प्रथम भागमें दो प्रकृतियाँ, छठे भागमें तीस प्रकृतियाँ और सातवें भागमें चार प्रकृतियाँ बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं। इस प्रकार बन्धव्युच्छित्तिकी अपेक्षा अपूर्वकरणके तीन भाग प्रधान हैं। शेष चार भाग अपूर्वकरणगुणस्थानके समय अर्थात् काल बतलानेके लिए निरूपण किये गये हैं ॥३१६॥


णिद्दा पयला य तहा अपुव्वपढमम्हि बंधवोच्छेओ।
देवदुगं पंचिंदिय ओरालय वज्ज चउसरीरं च ॥३१७॥

समचउरं वेउव्विय आहारय अंगवंगणामं च ।
वण्णचउक्कं च तहा अगुरुलहुगं च चत्तारि ॥३१८॥

तसचउ पसत्थमेव य विहायगइ थिर सुहं च णायव्वं ।
सुभगं सुस्सरमेवं य आदेज्जं चेव णिमिणं च ॥३१९॥

तित्थयरमेव तीसं अपुव्वछब्भाग बंधवोच्छिण्णा।
हस्स रइ भय दुगुंछा अपुव्वचरिमम्हि वोच्छिण्णा ॥३२०॥

अर्थ (गाथा 317 से 320): निद्रा और प्रचला, ये दो प्रकृतियाँ अपूर्वकरणके प्रथम भागमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं। देवद्विक, पञ्चेन्द्रिय जाति, औदारिकशरीरको छोड़कर शेष चार शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिक-अङ्गोपाङ्ग, आहारक-अङ्गोपाङ्ग, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, त्रसचतुष्क, प्रशस्त-विहायोगति, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण और तीर्थङ्कर, ये तीस प्रकृतियाँ अपूर्वकरणके छठवें भागमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं। हास्य, रति, भय और जुगुप्सा, ये चार प्रकृतियाँ अपूर्वकरणके चरम समयमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३१७-३२०॥


[मूलगा० ४६] संखेज्जदिमे सेसे आढत्ता※ वायरस्स चरिमंतो।
पंचसु एक्केक्कंता सुहुमंता सोलसा होंति ॥३२१॥

अर्थ: बादरसाम्पराय अर्थात् अनिवृत्तिकरणके संख्यातवें भागके शेष रह जानेपर वहाँसे लगाकर चरम समयके अन्ततक होनेवाले पाँच भागोंमें एक-एक प्रकृति क्रमशः बन्धसे व्युच्छिन्न होती है। शेष सोलह प्रकृतियाँ सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानके अन्तमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३२१॥


'पुरिसं चउसंजलणं पंच य पयडी य पंचभायम्मि ।
अणियट्टी-अद्धाए जहाकमं बंधवुच्छेओ ॥३२२॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरण कालके पाँच भागोंमें पुरुषवेद और चार संज्वलनकषाय, ये पाँच प्रकृतियाँ यथाक्रमसे एक-एक करके बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३२२॥


२णाणंतरायदसयं दंसणचत्तारि उच्च जसकित्ती ।
एए सोलह पयडी सुहुमकसायम्मि वोच्छेओ ॥३२३॥

अर्थ: ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच, दर्शनावरणकी चार, उच्चगोत्र और यशःकीर्ति ये सोलह प्रकृतियाँ सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानके अन्तिम समयमें बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥३२३॥


३सायंतो जोयंत्तो एत्तो पाएण णत्थि बंधो त्ति ।
णायव्वो पयडीणं बंधो संतो अणंतो य४ ॥३२४॥

अर्थ: योगके अन्ततक सातावेदनीयकर्मका बन्ध होता है, अर्थात् ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें गुणस्थानमें एक सातावेदनीयकर्म ही बँधता है। तेरहवें गुणस्थानके अन्तमें उसकी भी बन्धसे व्युच्छित्ति हो जाती है। इससे आगे चौदहवें गुणस्थानमें योगका अभाव हो जानेसे फिर किसी भी कर्मका बन्ध नहीं होता है। इस प्रकार चौदह गुणस्थानोंमें प्रकृतियोंका सान्त अर्थात् बन्धव्युच्छित्ति और अनन्त अर्थात् बन्ध जानना चाहिए ॥३२४॥ (देखो संदृष्टि संख्या १४)


[मूलगा० ४८] गइयादिएसु एवं तप्पाओगाणमोघसिद्धाणं ।
सामित्तं णायव्वं पयडीणं णाण (ठाण) मासेज्ज ॥३२५॥

अर्थ: इसी प्रकार गति, इन्द्रिय आदि चौदह मार्गणाओंमें उन उनके योग्य ओघसिद्ध प्रकृतियोंका स्वामित्व ऊपर बतलाये गये गुणस्थानों या बन्धस्थानोंके आश्रयसे लगा लेना चाहिए ॥३२५॥


एगिंदिय विगलिंदिय वेउव्वियछक्कणिरयदेवाऊ ।
आहारदुगादावं थावर सुहुमं अपुन्न साहरणं ॥३२६॥

तेहि विणा णेरइया बंधंति य सव्वबंधपयडीओ ।
ताओ वि तित्थयरूणा मिच्छादिट्ठी दु णियमेण ॥३२७॥

मिच्छं णउंसयवेदं हुंडमसंपत्तसंघयणं ।
एयाणि विणा ताओ सासणसम्मा दु णेरइया ॥३२८॥

आसाय छिण्णपयडी णराउरहिया उ ताओ मिस्सा दु ।
तित्थयरणराउजुया अविरयसम्मा दु णेरइया ॥३२९॥

अर्थ (गाथा 326 से 329): एकेन्द्रियजाति, विकलेन्द्रियजातित्रिक, वैक्रियिकषट्क (वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिक अङ्गोपाङ्ग, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी) नरकायु, देवायु, आहारकद्विक, आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण; इन उन्नीस प्रकृतियोंके बिना नारकी जीव शेष सर्व प्रकृतियोंका अर्थात् १०१ का बन्ध करते हैं। उनमें भी मिथ्यादृष्टि नारकी तीर्थङ्कर प्रकृतिके बिना १०० प्रकृतियोंका नियमसे बन्ध करते हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि नारकी मिथ्यात्व, नपुंसकवेद, हुण्डकसंस्थान और सृपाटिकासंहनन, इन चारके बिना ९६ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। सासादनगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली २५ प्रकृतियों और मनुष्यायु इन २६ के बिना शेष ७० प्रकृतियोंका सम्यग्मिथ्यादृष्टि बन्ध करते हैं। अविरतसम्यग्दृष्टि नारकी तीर्थङ्कर और मनुष्यायुके साथ उक्त ७० प्रकृतियोंका अर्थात् ७२ का बन्ध करते हैं ॥३२६-३२९॥ (देखो संदृष्टिसंख्या १५) सासादनमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली २५ प्रकृतियाँ नारकसामान्यके भी गुणस्थानवत् जानना। इसी प्रकार पहली, दूसरी और तीसरी पृथिवीके नारकियोंके चारों ही गुणस्थानोंकी बन्धरचना जानना चाहिए। इसी प्रकार चौथी पाँचवीं और छठी पृथिवीके नारकियोंकी बन्ध रचना है। उनके चारों ही गुणस्थानोंमें वे ही बन्धादि-सम्बन्धी प्रकृतियाँ हैं। विशेषता केवल यह है कि उन पृथिवियोंका असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी तीर्थङ्कर प्रकृतिका बन्ध नहीं करता है। उन पृथिवियोंके चारों गुणस्थानोंमें बन्ध-योग्य प्रकृतियाँ क्रमशः १००, ६६, ७० और ७१ हैं।


सामण्णणिरयपयडी तित्थयर-णराउ-रहियाओ ।
बंधंति तमतमाए णेरइया संकिलिट्ठभावेण ॥३३०॥

णरदुयउच्चूणाओ ताओ तत्थेव मिच्छदिट्ठीया ।
तिरियाउ मिच्छ संढय हुंडासंपत्तरहियपयडीओ ॥३३१॥

ताओ तत्थ य णिरया सासणसम्मा दु बंधंति ।
तिरियाउऊण-सासण-वोच्छिण्णपडिविहीणाओ ॥३३२॥
णरदुयउच्चजुयाओ मिस्सा अजई वि बंधंति ।

अर्थ (गाथा 330 से 332): तमस्तमा अर्थात् महातमःप्रभा पृथिवीके नारकी संक्लिष्ट भाव होनेसे तीर्थङ्कर और मनुष्यायुके बिना नारकसामान्यके बँधनेवाली शेष ६६ प्रकृतियोंको बाँधते हैं। उसी पृथिवीके मिथ्यादृष्टि नारकी मनुष्यद्विक और उच्चगोत्रके बिना शेष ६६ प्रकृतियोंको बाँधते हैं। तथा वहींके सासादनसम्यग्दृष्टि नारकी तिर्यंचायु, मिथ्यात्व, नपुंसकवेद, हुंडकसंस्थान और स्फाटिकासंहनन; इन पाँच प्रकृतियोंके बिना शेष ६१ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। वहाँके मिश्र और असंयतगुणस्थानवर्ती नारकी तिर्यंचायुके बिना तथा सासादनमें व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियोंके बिना, तथा मनुष्यद्विक और उच्चगोत्र सहित शेष ७० प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥३३०-३३२॥


तित्थयराहारदुगुणाओ बंधंति बंधपयडीओ ॥३३३॥
तिरिया तिरियगईए मिच्छादिट्ठी वि इत्तिया चेव ।

ताओ मिच्छादिट्ठी-वोच्छिण्णपयडिविहीणाओ ॥३३४॥
सासणसम्माइट्ठी तिरिया बंधंति णियमेण ।

आसायणिण्णपयडी मणुसोरालदुग आइसंघयणं ॥३३५॥
णरदेवाऊ-रहिया मिस्सा बंधंति ताओ तिरिया हु ।

ताओ देवाउजुआ अजई तिरिया दु बंधंति ॥३३६॥
बिदियकसाएहिं विणा ताओ तिरिया उ देसजई ।

अर्थ (गाथा 333 से 336): तिर्यंचगतिमें मिथ्यादृष्टि तिर्यंच तीर्थंकर और आहारकद्विकके बिना शेष उतनी ही अर्थात् ११७ बन्धप्रकृतियोंको बाँधते हैं। उनमेंसे मिथ्यात्व गुणस्थानमें व्युच्छिन्न होनेवाली १६ प्रकृतियोंके बिना शेष १०१ प्रकृतियोंको सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच नियमसे बाँधते हैं। सासादनमें व्युच्छिन्न होनेवाली २५ प्रकृतियोंके, तथा मनुष्यद्विक, औदारिकद्विक, आदि संहनन, मनुष्यायु और देवायुके बिना शेष रहीं ६६ प्रकृतियोंको मिश्रगुणस्थानवर्ती तिर्यंच बाँधते हैं। उनमें एक देवायुको मिलाकर ७० प्रकृतियोंको असंयतगुणस्थानवर्ती तिर्यंच बाँधते हैं। द्वितीय अप्रत्याख्यानावरणकषायचतुष्कके बिना शेष ६६ प्रकृतियोंको देशव्रती तिर्यंच बाँधते हैं ॥३३३-३३६दे॥


एवं तिरियपंचिंदिय पुण्णा बंधंति ताओ पयडीओ ॥३३७॥

तित्थयराहारदुयं वेउव्वियछक्कणिरयदेवाऊ ॥३३८॥
तेहिं विणा बंधाओ तिरियपंचिंदियअपज्जत्ता ।

अर्थ (गाथा 337 से 338): इसी प्रकार तिर्यञ्च पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव भी ऊपर बतलाई गईं सामान्य तिर्यञ्चोंवाली उन्हीं प्रकृतियोंको बाँधते हैं। इसी प्रकार पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चनी भी नियमसे उन्हीं प्रकृतियोंको बाँधती हैं। तिर्यञ्च पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव तीर्थंकर, आहारकद्विक वैक्रियिकषट्क नरकायु और देवायुके बिना शेष १०६ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥३३६-३३८॥


मणुयगईए सव्वा तित्थयराहारहीणया मिच्छा ॥३३९॥
मिच्छम्मि च्छिण्णपयडी-ऊणाओ आसाय ।

आसायच्छिण्णपयडीमणुसोरालदुय आइसंघयणं ॥३४०॥
णर-देवाउरहिया मिस्सा बंधंति ताओ मणुयाऊ ।

तित्थयर-सुराउजुआ ताओ बंधंति अजइमणुया दु ॥३४१॥
बिदियकसाएहिं विणा ताओ मणुया दु देसजई ।

पमत्तादिसु ओघो जि होइ मणुया दु पजत्ता ॥३४२॥
तह मणुय-मणुसिणीओ अपुण्णतिरिया* व णरअपज्जत्ता ।

अर्थ (गाथा 336 से 342): मनुष्यगतिमें सभी अर्थात् १२० प्रकृतियाँ बँधती हैं। उनमेंसे मिथ्यादृष्टि मनुष्य तीर्थंकर और आहारकद्विकसे हीन शेष ११७ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि मनुष्य मिथ्यात्वमें विच्छिन्न होनेवाली १६ प्रकृतियोंसे हीन शेष १०१ का बन्ध करते हैं। मिश्रगुणस्थानवर्ती मनुष्य सासादनमें विच्छिन्न होनेवाली २५ प्रकृतियोंसे, तथा मनुष्यद्विक, औदारिकद्विक, आदिसंहनन, मनुष्यायु और देवायुसे रहित शेष ६६ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्य तीर्थंकर और देवायु सहित उक्त प्रकृतियोंका अर्थात् ७१ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। देशसंयत मनुष्य द्वितीय कषायचतुष्कके बिना शेष ६५ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। प्रमत्तादि ऊपरके गुणस्थानवर्ती मनुष्योंमें ओघके समान प्रकृतियोंका बन्ध जानना चाहिए। सामान्य मनुष्योंके समान पर्याप्त मनुष्य और मनुष्यनियां प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। तथा अपर्याप्त तिर्यञ्चके समान अपर्याप्त मनुष्य १०६ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥३३६३-३४२३॥


सुहुमाहार अपुण्णवेउव्वियछक्कणिरयदेवाऊ ॥३४३॥
साहारण-वियलिंदियरहिया बंधंति देवाओ ।

तित्थयरूणे मिच्छा सासाणसम्मो दु थावरादावं ॥३४४॥
इगिजाइहुंडसंघयमिच्छासंपत्तरहियाओ ।

आसायच्छिण्णपयडीणराउ ताउ मिस्सा दु ॥३४५॥
तित्थयरणराउजुया अजई देवा दु बंधंति ।

अर्थ (गाथा 343 से 345): सूक्ष्म, आहारकद्विक, अपर्याप्त, वैक्रियिकषट्क, नरकायु, देवायु, साधारण और विकलेन्द्रिय-त्रिक; इन सोलहके बिना शेष १०४ प्रकृतियोंको सामान्यतया देव बाँधते हैं। उनमें मिथ्यादृष्टि देव तीर्थंकरके बिना १०३ प्रकृतियोंको बाँधते हैं। सासादन सम्यग्दृष्टि देव स्थावर, आतप, एकेन्द्रियजाति, हुंडकसंस्थान, नपुंसकवेद, मिथ्यात्व और सृपाटिका संहनन; इन सातसे रहित शेष ९६ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। मिश्रगुणस्थानवर्ती देव सासादनगुणस्थानमें विच्छिन्न होनेवाली २५ और मनुष्यायु इन २६ से रहित शेष ७० प्रकृतियोंको बाँधते हैं। असंयत देव तीर्थंकर और मनुष्यायु सहित उक्त प्रकृतियोंका अर्थात् ७२ का बन्ध करते हैं ॥३४२३-३४५३॥


तिकायदेव-देवी सोहम्मीसाण देवियाणं च ॥३४६॥
मिच्छाइँतिसु ओघो अजई तित्थयररहियाओ ।

सामण्णदेवभंगो सोहम्मीसाणकप्पदेवाणं ॥३४७॥
एत्तो उवरिल्लाणं देवाण जहागमं वोच्छं ।

अर्थ (गाथा 346 से 347): भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी, इन तीन कायके देव और देवियोंके; तथा सौधर्म और ईशान कल्पोत्पन्न देवियोंके मिथ्यात्वादि तीन गुणस्थानोंमें प्रकृतियोंका बन्ध ओघके समान क्रमशः १०३, ९६ और ७० जानना चाहिए। असंयतगुणस्थानवर्ती उक्त देव और देवियाँ तीर्थंकररहित ७१ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। सौधर्म-ईशान-कल्पवासी देवोंके प्रकृतियोंका बन्ध सामान्य देवोंके समान जानना चाहिए। अब इससे ऊपरके कल्पवासी देवोंके बन्धादिका आगमके अनुसार कहता हूँ ॥३४५३-३४७३॥

चतुर्थ अधिकार: शतक (भाग 3/3)

तइकप्पाईं जाव दु सहसारंता देवा जा ॥३४८॥

देवगईपयडीओ एक्कखादावथावरूणाओ ।
मिच्छा तित्थयरूणा हुंडा संपत्तमिच्छसंढूणा ॥३४९॥

सासणसम्मा देवा ताओ बंधंति णियमेण ।
आसाय*च्छिण्णपयडीणराउरहियाउ ताउ मिस्सा दु ॥३५०॥

अर्थ (गाथा 347 से 350): तृतीय कल्पसे लेकर सहस्रारकल्प तकके देव एकेन्द्रियजाति, आतप और स्थावरके विना देवगति-सम्बन्धी शेष १०१ प्रकृतियोंको बाँधते हैं। उक्त कल्पोंके मिथ्यादृष्टिदेव उक्त १०१ मेंसे तीर्थंकरके बिना १०० प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। इन्हीं कल्पोंके सासादनसम्यग्दृष्टि देव हुंडकसंस्थान, सृपाटिकासंहनन, मिथ्यात्व और नपुंसकवेदके विना शेष ६६ प्रकृतियोंका नियमसे बन्ध करते हैं। उक्त कल्पोंके मिश्रगुणस्थानवर्ती देव सासादनमें विच्छिन्न होनेवाली २५ तथा मनुष्यायुके बिना शेष ७० प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। तथा उन्हीं कल्पोंके असंयतसम्यग्दृष्टि देव तीर्थंकरप्रकृति और मनुष्यायुके सहित ७० अर्थात् कुल ७२ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥३४७३/२-३५०३/२॥ (देखो संग्रहिसंख्या २१)


तित्थयर-णराउजुया अजई बंधंति देवाओ ।
आणदकप्पप्पहुई उवरिमगेवज्जयं तु जावं ति ॥३५१॥

तत्थुप्पण्णा देवा सत्ताणउदिं च बंधंति ।
देवगईपयडीओ तिरियाउ-तिरियजुयल एंदी ॥३५२॥

थावर-आदाउज्जोअं बंधंति ते णियमा ।
मिच्छा तित्थयरूणा हुंडासंपत्तमिच्छसंढूणा ॥३५३॥

सासणसम्मा देवा ताओ बंधंति णियमेण ।
तिरियाउ तिरियदुयं तह उज्जोअं च मोत्तूणं ॥३५४॥
आसायाच्छिण्णपयडी णराउरहियाउ मिस्सा दु ।
।७०।

तित्थयर-णराउजुया अजई देवा य बंधंति ॥३५५॥
।७१।
अणुदिस-अणुत्तरवासी देवा ता चेव णियमेण ।
।७२।

अर्थ (गाथा 351 से 355): आनतकल्पसे लेकर उपरिम ग्रैवेयक तक उनमें उत्पन्न होनेवाले देव ९७ प्रकृतियोंको बाँधते हैं। अर्थात् देवगतिमें बन्धयोग्य जो १०४ प्रकृतियाँ बतलाई गई हैं उनमेंसे तिर्यगायु, तिर्यग्द्विक, एकेन्द्रियजाति, स्थावर, आतप और उद्योतके बिना शेष ९७ प्रकृतियोंका उक्त देव नियमसे बन्ध करते हैं। उक्त कल्पोंके मिथ्यादृष्टि देव तीर्थङ्करके बिना ९६ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि देव हुण्डकसंस्थान, सृपाटिकासंहनन, मिथ्यात्व और नपुंसकवेदके बिना ६२ प्रकृतियोंको नियमसे बाँधते हैं। उक्त कल्पोंके मिश्र गुणस्थानवर्ती देव तिर्यगायु, तिर्यद्विक तथा उद्योतको छोड़कर सासादनमें विच्छिन्न होनेवाली शेष प्रकृतियोंके बिना तथा मनुष्यायुके बिना ७० प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। उन्हीं कल्पोंके असंयतसम्यग्दृष्टि देव तीर्थङ्कर और मनुष्यायु सहित उक्त प्रकृतियोंका अर्थात् ७२ का बन्ध करते हैं। नव अनुदिश और पंच अनुत्तरवासी देव यतः सम्यग्दृष्टि ही होते हैं, अतः वे नियमसे उन्हीं ७२ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥३५०३-३५५३॥ (देखो संदृष्टि संख्या २२)


इंगि-विगलिंदियजीवे तिरियंपंचिंदिय अपुण्णमंगमिव ॥३५६॥
मिच्छे तेत्तियमेत्तं णउत्तरसयं तु णायव्वं ।
।१०६।

मिच्छेवोच्छिण्णेहिं ऊणाओ ताओ आसाया णिरयाउ ॥३५७॥
णेरयदुयं मोत्तु पंचिंदियम्मि ओघमिव ।
।६६।

अर्थ (गाथा 356 से 357): एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीवोंमें प्रकृतियोंका बन्ध तिर्यञ्चपंचेन्द्रियअपर्याप्त जीवोंके बन्धके समान तीर्थङ्कर, आहारकद्विक, देवायु, नरकायु और वैक्रियिकषट्कके बिना १०६ का होता है । उनके अपर्याप्त अवस्थाकी अपेक्षा दो गुणस्थान माने गये हैं, सो उक्त जीवोंके मिथ्यात्व-गुणस्थानमें तो उतनी ही १०६ प्रकृतियोंका बन्ध जानना चाहिए। सासादनगुणस्थानवर्ती एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीव नरकायु और नरकद्विकको छोड़कर मिथ्यात्वमें विच्छिन्न होनेवाली शेष १३ के बिना ६६ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। पंचेन्द्रिय जीवोंमें प्रकृतियोंका बन्ध ओघके समान जानना चाहिए ॥३५५१/२-३५७१/२॥ (देखो संदृष्टि संख्या २३ )


भूदयवणप्फदीसुं मिच्छा सासण इंगिदिभंगमिव ॥३५८॥
णरदुग-णराउ-उच्चूण तेउ-वाउइगिंदियपयडीओ ।

अर्थ: पृथिवीकायिक, जलकायिक और वनस्पतिकायिक जीवोंमें मिथ्यात्व और सासादनगुणस्थान-सम्बन्धी प्रकृतियोंका बन्ध एकेन्द्रिय जीवोंके बन्धके समान जानना चाहिए । तेजस्कायिक और वायुकायिक जीवोंके एक ही गुणस्थान होता है । तथा वे मनुष्यद्विक, मनुष्यायु और उच्चगोत्रके बिना एकेन्द्रियसम्बन्धी शेष अर्थात् १०५ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥३५८॥


तस-मण-वचि ओरालाहारे जह संभवं हवे ओघो ॥३५९॥

अर्थ: त्रसकायिकोंमें, तथा मनोयोगियोंमें, वचनयोगियोंमें, औदारिककाययोगियोंमें और आहारककाययोगियोंमें यथासम्भव ओघके समान बन्धविधान जानना चाहिए ॥३५९॥


णिरयदुग-आहारजुयलणिरि-देवाउहिं हीणाओ ।
ओरालमिस्सजोए बंधाओ होंति णायव्वं ॥३६०॥

तित्थयर-सुरचदूणा ताओ बंधंति मिच्छदिट्ठी य ।
णिरयाऊ णिरयदुयं मोत्तु’ वोच्छिण्णमिच्छपयडीहिं ॥३६१॥

तिरिय-मणुयाउगेहि य रहियाओ ताउ आसाय ।
आसाय छिण्णपयडीऊणे तिरियाउयं मोत्तु’ ॥३६२॥

अर्थ (गाथा 360 से 362): औदारिक मिश्रकाययोगमें नरकद्विक, आहारकयुगल, नरकायु और देवायुके विना बन्धयोग्य शेष ११४ प्रकृतियाँ जानना चाहिए। उनमेंसे तीर्थङ्कर और सुरचतुष्क (देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिक-अङ्गोपांग) इन पाँचके विना मिथ्यादृष्टि १०६ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। औदारिकमिश्रकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि नरकायु और नरकद्विकको छोड़कर मिथ्यात्वमें विच्छिन्न होनेवाली १३ प्रकृतियोंके विना तथा तिर्यंचायु और मनुष्यायुके विना शेष ६४ प्रकृतियोंको बाँधते हैं। औदारिकमिश्रकाययोगी अविरतसम्यग्दृष्टि तिर्यंचायुको छोड़कर सासादनमें विच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियोंके विना तथा तीर्थङ्कर और सुरचतुष्कसहित ७५ प्रकृतियोंको बाँधते हैं ॥३६०-३६२३॥ (देखो संदृष्टि सं० २५)


तित्थयर-सुरचदुजुया ताओ अजई दु बंधंति ।
वेउव्वे सुरभंगो सुरपयडी तिरिय-णरऊणा ॥३६३॥

तम्मिस्से तित्थयरूणाओ बंधंति ताउ मिच्छा दु ।
इगिजिणथावरादवहुंडासंपत्तमच्छसंढूणा ॥३६४॥

सासणसम्माइट्ठी ताओ बंधंति पयडीओ ।
तिरियाउयं च मोत्तु’ सासणवोच्छिण्ण बंधवोच्छिण्णा ।॥३६५॥

अर्थ (गाथा 362 से 365): वैक्रियिककाययोगमें देवसामान्यके समान बन्धरचना जानना चाहिए। उनमें १०४ प्रकृतियोंका बन्ध होता है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगमें तिर्यंचायु और मनुष्यायुके बिना शेष १०२ देवगतिसम्बन्धी प्रकृतियाँ बँधती हैं। उनमेंसे तीर्थङ्करके बिना शेष १०१ प्रकृतियाँ मिथ्यात्वगुणस्थानमें बँधती हैं। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि एकेन्द्रियजाति, स्थावर, आतप, हुंडकसंस्थान, सृपाटिकासंहनन, मिथ्यात्व और नपुंसकवेद इन सातके बिना शेष ९४ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। उक्त योगवाले असंयतसम्यग्दृष्टि जीव तिर्यंचायुको छोड़कर सासादनमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली २४ प्रकृतियोंके बिना, तथा तीर्थङ्करसहित ७१ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥३६२ १/२-३६५ १/२॥ (देखो संदृष्टि सं० २६)


बंधपयडीहिं रहिया तित्थयरजुया ताउ बंधंति अजई दु ।


णिरयदुगाहारजुयलचउरो आऊहिं बंधपयडीहिं ॥३६६॥
कम्मइयकायजोईरहिया बंधंति णियमेण ।

सुरचदुतित्थयरूणा ताओ बंधंति मिच्छादिट्ठी दु ॥३६७॥

अर्थ (गाथा 365 से 367): कार्मणकाययोगी जीव नरकद्विक, आहारकयुगल और चारों आयुकर्मोंके बिना शेष ११२ प्रकृतियोंको नियमसे बाँधते हैं। उनमें भी कार्मणकाययोगी मिथ्यादृष्टि जीव सुरचतुष्क और तीर्थङ्करके बिना १०७ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥३६५ १/२-३६७॥


एत्थ मिच्छादिट्ठिवुच्छिण्णपयडीणं मज्झे णिरयाउग-णिरयदुगं तिण्णि पयडीओ मुत्तूण सेसाओ तेरस पयडीओ अवणिय सेसाओ चउणउदिएपयडीओ सासणसम्माइट्ठिणो बंधंति ९४।

अर्थ: यहाँपर मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें विच्छिन्न होनेवाली १६ प्रकृतियोंमेंसे नरकायु और नरकद्विक, इन तीन प्रकृतियोंको छोड़कर शेष तेरह प्रकृतियोंको निकालकर बाकी बची चौरानवे प्रकृतियोंको कार्मणकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि बाँधते हैं।


जोगिम्मि ओघभंगो सासणवोच्छिण्ण-बंधपयडीहिं ।
सुरचउ-तित्थयरजुया रहिया बंधंति अजई दु ॥३६८॥

अर्थ: कार्मेणकाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टि जीव (तिर्यंचायुके बिना) सासादनमें विच्छिन्न होनेवाली २४ प्रकृतियोंसे रहित, तथा सुरचतुष्क और तीर्थङ्कर सहित ७५ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। कार्मेणकाययोगी सयोगिकेवलियोंमें बन्धरचना ओघके समान जानना चाहिए ॥३६८॥


अणियट्टिं मिच्छाई वेदे बावीस बंधयं जाव ।
तत्तो परं अवेदे ओघो भणिओ सजोगो त्ति ॥३६९॥

अर्थ: तीनों वेदोंमें मिथ्यात्वगुणस्थानसे लेकर अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें बाईस प्रकृतियोंके बन्ध होने तक ओघके समान बन्ध-रचना जानना चाहिए। अवेदियोंमें उससे आगे इक्कीस प्रकृतियोंके बन्धस्थानसे लगाकर सयोगिकेवली पर्यन्त ओघके समान बन्ध-रचना कही है ॥३६९॥


कोहाइकसाएसुं अकसाइंसु य हवे मिच्छांई ।
इगिवीसादी जाव ओघो संतादि जोगंता ॥३७०॥

अर्थ: क्रोधादि चारों कषायोंमें मिथ्यात्वको आदि लेकर क्रमशः अनिवृत्तिकरणके इक्कीस, बीस, उन्नीस और अठारह प्रकृतियोंके बँधनेतक ओघके समान बन्धरचना जानना चाहिए । तथा अकषायी जीवोंमें उपशान्तमोहगुणस्थानसे लेकर सयोगिकेवली पर्यन्त ओघके समान बन्धरचना कही है ॥३७०॥


णाणेसु संजमेसु य दंसणठाणेसु होइ णायव्वो ।
जिह संभवं* च ओघो मिच्छाइगुणेसु जोयंते । ॥३७१॥

अर्थ: ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा आठों ज्ञानोंमें, संयममार्गणाकी अपेक्षा सातों स्थानोंमें तथा दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा चारों दर्शनोंमें मिथ्यात्वगुणस्थानको आदि लेकर यथासंभव अयोगिकेवली गुणस्थान तक ओघके समान बन्धादि जानना चाहिए ॥३७१॥


तित्थयरुणा ताओ मिच्छादिट्ठी दु बंधंति ॥३७२॥

मिच्छे वोच्छिण्णूणा ताओ बंधंति आसाणा ।
आसायणच्छिण्णपयडी सुराउ-मणुयाउगेहिं ऊणाओ ॥३७३॥

सम्मामिच्छाइट्ठी ताओ बंधंति णियमेण ।
देव-मणुयाउ-तित्थयरजुया ताओ अजई दु णायव्वा ॥३७४॥

अर्थ (गाथा 372 से 374): कृष्ण, नील और कापोत; इन तीन लेश्याओंमें आहारकद्विकके बिना शेष ११८ प्रकृतियाँ बन्ध-योग्य हैं। उनमेंसे उक्त तीनों अशुभ लेश्यावाले मिथ्यादृष्टि जीव तीर्थङ्करके बिना शेष ११७ प्रकृतियाँ बाँधते हैं। मिथ्यात्वमें व्युच्छिन्न होनेवाली १६ प्रकृतियोंके बिना शेष १०१ को सासादनगुणस्थानवर्ती बाँधते हैं। उक्त तीनों अशुभलेश्यावाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सासादनमें व्युच्छिन्न होनेवाली २५ और देवायु तथा मनुष्यायु ये दो; इन २७ के बिना शेष ७४ प्रकृतियोंको नियमसे बाँधते हैं। उक्त तीनों अशुभलेश्यावाले असंयतसम्यग्दृष्टि जीव देवायु, मनुष्यायु और तीर्थङ्करसहित उक्त ७४ को अर्थात् ७७ प्रकृतियोंको बाँधते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३७२-३७४॥


वियलिंदिय-णिरयाऊ णिरयदुगापुण्ण-सुहुम-साहरणा ।
रहियाउ ताउ बंधा तेजाए होंति णायव्वा ॥३७५॥

तित्थयराहारदुगूणाउ च बंधंति ताउ मिच्छा दु ।
इगिजाइ थावरादवहुंडासंपत्तमिल्लसंघडणा ॥३७६॥

सासणसम्माइट्ठी ताओ बंधंति णियमेण ।
मिस्साइ ओघभंगो अपमत्तेसु णायव्वो ॥३७७॥

अर्थ (गाथा 375 से 377): तेजोलेश्यामें विकलेन्द्रियत्रिक, नरकायु, नरकद्विक, अपर्याप्त, सूक्ष्म और साधारण, इन नौके बिना शेष १११ प्रकृतियाँ बन्धयोग्य हैं, ऐसा जानना चाहिए। उनमेंसे तेजोलेश्यावाले मिथ्यादृष्टिजीव तीर्थङ्कर और आहारकद्विकके बिना १०८ का बन्ध करते हैं। उक्त लेश्यावाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीव एकेन्द्रियजाति, स्थावर, आतप, हुंडकसंस्थान, सृपाटिकासंहनन, मिथ्यात्व और नपुंसकवेद; इन सातके बिना शेष १०१ प्रकृतियोंका नियमसे बन्ध करते हैं। मिश्रसे लगाकर अप्रमत्तसंयतगुणस्थान तकके तेजोलेश्यावाले जीवोंकी बन्ध-रचना ओघके समान जानना चाहिए ॥३७५-३७७॥


इगि-विगल-थावरादव-सुहुमापज्जत्तसाहरणे ।
णिरयाउ-णिरयदुगूणाउ बंधा हवंति पम्हाए ॥३७८॥

तित्थयराहारजुयलरहियाओ जाओ पयडीओ ।
पंचुत्तरसयमेत्ता ताओ बंधंति मिच्छा दु ॥३७९॥

आसाया पुण ताओ हुंडासंपत्तमिक्कुसंड्हूणा ।
मिस्साइ ओघभंगो अपमत्तंतेसु णायव्वो ॥३८०॥

अर्थ (गाथा 378 से 380): पद्मलेश्यामें एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रियत्रिक, स्थावर, आतप, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, नरकायु और नरकद्विक, इन बारहके बिना शेष १०८ प्रकृतियाँ बन्ध-योग्य हैं। उनमेंसे पद्मलेश्यावाले मिथ्यादृष्टि जीव तीर्थङ्कर और आहारकयुगल, इन तीनसे रहित जो १०५ प्रकृतियाँ शेष रहती हैं, उन्हें बाँधते हैं। उक्त लेश्यावाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीव हुंडकसंस्थान, सृपाटिकासंहनन, मिथ्यात्व और नपुंसकवेद, इन चारके बिना शेष १०१ का बन्ध करते हैं। मिश्रगुणस्थानको आदि लेकर अप्रमत्तसंयत तकके पद्मलेश्यावाले जीवोंमें बन्ध-रचना ओघके समान जानना चाहिए ॥३७८-३८०॥


इगि-विगल-थावरादव-उज्जोवापुण्ण-सुहुम-साहरणा ।
णिरि-तिरियाऊ णिरि तिरिदुगुणाउ बंधा हवंति सुक्काए ॥३८१॥

तित्थयराहारदुगुणाओ बंधंति मिच्छदिट्ठी दु ।
आसाणा पुण ताओ हुंडासंपत्त-मिच्छ-संडूणा ॥३८२॥

तिरियाउ तिरियजुयलं उज्जोवं च इय साय-पयडीहिं ।
देव-मणुसाउगेहि य रहियाओ ताओ मिस्सा दु ॥३८३॥

तित्थयर-सुर-णराऊ सहिया बंधंति ताओ अजई दु ।
जाव य सजोगकेवलि विरयाविरयाइ ताव ओघो त्ति ॥३८४॥

अर्थ (गाथा 381 से 384): शुक्ललेश्यामें एकेन्द्रियजाति, विकलेन्द्रियत्रिक, स्थावर, आतप, उद्योत, अपर्याप्त, सूक्ष्म, साधारण, मनुष्यायु, तिर्यगायु, मनुष्यद्विक और तिर्यग्द्विक; इन सोलहके बिना शेष १०४ प्रकृतियाँ बन्ध-योग्य हैं। उनमेंसे शुक्ललेश्यावाले मिथ्यादृष्टि जीव तीर्थङ्कर और आहारकद्विकके बिना शेष १०१ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। उक्त लेश्यावाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीव हुंडकसंस्थान, सृपाटिकासंहनन, मिथ्यात्व और नपुंसकवेदके बिना शेष ६७ प्रकृतियोंको बाँधते हैं। शुक्ललेश्यावाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव तिर्यगायु, तिर्यग्द्विक और उद्योत; इन चारको छोड़कर सासादनमें व्युच्छिन्न होनेवाली शेष २१ प्रकृतियोंसे तथा देवायु और मनुष्यायुसे रहित शेष ७४ प्रकृतियोंको बाँधते हैं। शुक्ललेश्यावाले असंयतसम्यग्दृष्टि जीव तीर्थङ्कर, देवायु और नरकायु, इन तीनके साथ उक्त ७४ का अर्थात् ७७ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। पाँचवें विरताविरतगुणस्थानसे लेकर सयोगिकेवली तकके शुक्ललेश्यावाले जीवोंकी बन्धरचना ओघके समान जानना चाहिए ॥३८१-३८४॥


वेदय-खइए भव्वामव्वे जहसंभवं ओघो ।
उवससमअजई जीवा सत्तत्तरि सुर-णराउरहिआओ ॥३८५॥

बिदियचदु-मणुसोराळियदुगाइसंघयणऊणिया पयडी ।
विरयाविरयाजीवा ताओ बंधंति णियमेण ॥३८६॥

तइयचउकेण रहिया पमत्तविरया य ताओ बंधंति ।
असुहाजसाथिरारइ-असायसोऊण आहारे* सहिया ॥३८७॥

बंधंति अप्पमत्ता अपुव्वकरणाइ ओधभंगो य ।
सासणसम्मइत्तिए णियणियठाणम्मि ओघो दु ॥३८८॥

अर्थ (गाथा 385 से 388): भव्य और अभव्यजीवोंमें तथा वेदक और क्षायिक सम्यक्त्वी जीवोंमें यथासंभव ओघके समान प्रकृतियोंका बन्ध जानना चाहिए। अभव्योंके एक पहिला ही गुणस्थान होता है और भव्योंके सभी गुणस्थान होते हैं। वेदकसम्यक्त्वी जीवोंके चौथेसे लेकर सातवें तकके चार और क्षायिकसम्यक्त्वी जीवोंके चौथेसे लेकर चौदहवें तकके ग्यारह गुणस्थान होते हैं। उपशमसम्यक्त्वी अविरती जीव देवायु और मनुष्यायुसे रहित सत्तहत्तर अर्थात् पचहत्तर प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। विरताविरत उपशमसम्यक्त्वी जीव द्वितीय कषायचतुष्क, मनुष्यद्विक, औदारिकद्विक और आदिम संहनन, इन नौके विना शेष ६६ प्रकृतियोंको नियमसे बाँधते हैं। प्रमत्तविरत उपशमसम्यक्त्वी तृतीय कषायचतुष्कसे रहित शेष ६२ प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं। अप्रमत्तविरत उपशमसम्यक्त्वी अशुभ, अयशःकीर्ति, अस्थिर, अरति, असातावेदनीय और शोक इन छह प्रकृतियोंके विना तथा आहारकद्विकसहित ५८ प्रकृतियोंको बाँधते हैं। अपूर्वकरणसे आदि लेकर उपशान्तमोह तकके उपशमसम्यक्त्वी जीवोंके ओघके समान बन्धरचना जानना चाहिए। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवोंकी बन्धरचना उन-उन गुणस्थानोंमें वर्णित सामान्य बन्धरचनाके समान जानना चाहिए ॥३८५-३८८॥


सण्णि-असण्णि-आहारीसुं जह संभवो ओघो।
भणिओ अणहारीसु जिणेहिं कम्मइयभंगो ॥३८६॥

अर्थ: संज्ञी, असंज्ञी और आहारक जीवोंमें प्रकृतियोंका बन्ध यथासंभव ओघके समान जानना चाहिए। अनाहारक जीवोंमें प्रकृतियोंका बन्ध जिनेन्द्रभगवान्ने कार्मणकाययोगियोंके समान कहा है ॥३८६॥


'उक्कस्समणुकस्सो जहण्णमजहण्णओ य ठिदिबंधो ।
सादि अणादि य धुवाधुव सामित्तेण सहिया णव होंति ॥३९०॥

अर्थ: उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य, अजघन्य, सादि, अनादि, ध्रुव, अध्रुव और स्वामित्वके साथ स्थितिबन्ध नौ प्रकारका है ॥३६०॥


तिण्हं खलु पढमाणं उक्कस्सं अंतराइयस्सेव ।
तीसं कोडाकोडी सायराणामेव ठिदी ॥३९१॥


[मूलगा० ५०] मोहस्स सत्तरी खलु वीसं णामस्स चेव गोदस्स ।
तेतीसमाउगाणं उवमाउ सायराणं तु+ ॥३९२॥

अर्थ: आदिके तीन कर्मोंका अर्थात्-ज्ञानावरण, दर्शनावरण और वेदनीयकर्मका तथा अन्तरायका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम है। मोहनीयकर्मका सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरोपम, नाम और गोत्रकर्मका बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम और आयुकर्मका तेतीस सागरोपम है ॥३६१-३६२॥


'वस्ससयं आबाहा कोडाकोडी ठिदस्स जलहीणं ।
सत्तण्हं कम्माणं आउस्स दु पुव्वकोदितइअंसो ॥३९३॥


२तेरासिएण णेया उक्कस्सा होंति सव्वपयडीणं ।
अंतोमुहुत्तवाहा अहवा पुण सव्वकम्माणं ॥३९४॥

अर्थ: बँधा हुआ कर्म जितने कालतक फल देना प्रारम्भ नहीं करता, उतने कालको अबाधाकाल कहते हैं। कौन कर्म कितने समय तक फल नहीं देता, इसका एक निश्चित नियम है। आगे उसीका निरूपण करते हैं- एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थितिवन्धकी आबाधा सौ वर्ष प्रमाण होती है। इस नियम के अनुसार सातों मूल कर्मोंकी, तथा उनकी उत्तरप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट आबाधा त्रैराशिकसे जान लेना चाहिए। आयुकर्मकी उत्कृष्ट आबाधा पूर्वकोटी वर्षका त्रिभाग है। सर्व कर्मोंकी जघन्य आबाधा अन्तर्मुहूर्त काल-प्रमाण है ॥३६३-३६४॥


आबाधूणट्ठिदी कम्मणिसेओ होइ सत्तकम्माणं ।
ठिदिमेव णिया सव्वा कम्मणिसेओ य आउस्स ॥३९५॥

अर्थ: आयुके बिना शेष सात कर्मोंकी बँधी हुई स्थितिमेंसे आबाधाकालके घटा देनेसे जो स्थिति शेष रहती है, वह कर्मनिषेककाल है। आयुकर्मका कर्मनिषेककाल उसकी अपनी सर्व स्थिति ही जाननी चाहिए ॥३६५॥


'आवरणमंतराए पण णव पणयं असाथवेयणियं ।
तीसं कोडाकोडी सायरणामाणमुक्कस्सं ॥३९६॥

अर्थ: ज्ञानावरणकी ५, दर्शनावरणकी ६, अन्तरायकी ५ और असातावेदनीय इन बीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम होता है ॥३६६॥


'मणुसदुग इत्थिवेदं सायं पण्णरस कोडिकोडीओ ।
मिच्छत्तस्स य सत्तरि चरित्तमोहस्स चत्तालं ॥३९७॥

अर्थ: मनुष्यद्विक, स्त्रीवेद, सातावेदनीय, इन चार प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध पन्द्रह कोड़ाकोड़ी सागरोपम है। मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध सत्तर कोड़ाकोड़ी और चारित्रमोहनीयका चालीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम होता है ॥३६७॥


२णिरयाउग-देवाउगठिदि-उक्कस्सं च होइ तेत्तीसं ।
मणुयाउय-तिरियाउय-उक्कस्सं तिणि पल्लाणि ॥३९८॥

अर्थ: नरकायु और देवायुका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध तेतीस सागरोपम है। मनुष्यायु और तिर्यगायुका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध तीन पल्योपम है ॥३६८॥


३भयरइदुगुंछा विय णउंसयं सोय णीचगोयं च ।
णिरयगइ-तिरियदोण्णि य तेसिं च तहाणुपुव्वी य ॥३९९॥

दुब्भग दुस्सरमजसं णिमिणं च य वीस कोडकोडीओ ।
सायरसंखाणियमो ठिदि-उक्कस्सं वियाणाहि ॥४००॥

अर्थ (गाथा 396 से 402): भय, अरति, जुगुप्सा, नपुंसकवेद, शोक, नीचगोत्र, नरकगति, तिर्यग्गति, नरकानुपूर्वी तिर्यगानुपूर्वी, एकेन्द्रियजाति, पञ्चेन्द्रियजाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, औदारिकशरीर, औदारिक-अंगोपांग, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिक-अंगोपांग, हुंडकसंस्थान, स्फाटिकासंहनन, वर्ण-चतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, आतप, उद्योत, अप्रशस्तविहायोगति, स्थावर, त्रसचतुष्क, अस्थिर, अशुभ, अनादेय, दुर्भग, दुःस्वर, अयशःकीर्ति और निर्माण; इन तेतालीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध बीस कौड़ाकौड़ी सागरोपम जानना चाहिए ॥३९६-४०२॥


'हास-रइ-पुरिसवेयं देवगइदुयं पसत्थसंठाणं ।
आदी वि य संधयणं पसत्थगहसुस्सरं सुभगं ॥४०३॥
थिर सुह जस आदेज्जं उच्चागोदं ठिदी य उक्कस्सं ।
दस सागरोवमाणं पुण्णाओ कोडकोडीओ ॥४०४॥

अर्थ (गाथा 403 से 404): हास्य, रति, पुरुषवेद, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, प्रशस्त अर्थात् समचतुरस्रसंस्थान, आदि-का अर्थात् वज्रवृषभनाराचसंहनन, प्रशस्तविहायोगति, सुस्वर, सुभग, स्थिर, शुभ, यशःकीर्ति, आदेय और उच्चगोत्र; इन पन्द्रह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध दश कोड़ाकोड़ीसागरोपम होता है ॥४०३-४०४॥


२बितिचउरिंदिय सुहुमं साधारणामयं अपज्जत्तं ।
अट्ठारस कोडकोडी ठिदिउक्कस्सं समुद्दिट्ठं ॥४०५॥

अर्थ: द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रियजाति, सूक्ष्म, साधारण और अपर्याप्त नाम; इन छह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अठारह कोड़ाकोड़ी सागरोपम कहा गया है ॥४०५॥


'संठाणं संघयणं विदियं तदियं य बारस चोद्दसयं च ।
सोलस कोडाकोडी चउत्थसंठाणं-संघयणं ॥४०६॥

२पंचमयं संठाणं संघयणं तह य होइ पंचमयं ।
अट्ठारस कोडकोडी ठिदि-उक्कस्सं समुद्दिष्टं ॥४०७॥

अर्थ (गाथा 406 से 407): दूसरे संस्थान और संहननका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध बारह कोड़ाकोड़ी सागरोपम है। तीसरे संस्थान और संहननका चौदह, चौथे संस्थान और संहननका सोलह तथा पाँचवें संस्थान और संहननका अट्ठारह कोड़ाकोड़ी सागरोपम उत्कृष्टस्थितिबन्ध कहा गया है ॥४०६-४०७॥


३अंतोकोडाकोडी ठिदी दु आहारदुगय तित्थयरं ।
सव्वांसि पयडीणं ठिदि-उक्कस्सं वियाणाहि ॥४०८॥

अर्थ: आहारकद्विक और तीर्थङ्करप्रकृतिका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अन्तःकोड़ाकोड़ी सागरोपम है। इस प्रकार सर्व कर्मप्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध जानना चाहिए ॥४०८॥


[मूलगा०५१] ४बारस य वेयणीए णामे गोदे य अट्ठ य मुहुत्ता ।
भिण्णमुहुत्तं तु ठिदी जहण्णयं सेसपंचण्हं※ ॥४०९॥

अर्थ: वेदनीयकर्मका जघन्य स्थितिबन्ध बारह मुहूर्त, नाम और गोत्रका आठ मुहूर्त तथा शेष पाँच कर्मोंका भिन्नमुहूर्त्त है। (यहाँ भिन्नमुहूर्त्तसे अभिप्राय अन्तर्मुहूर्त्तका है) ॥४०९॥


'आवरण-अंतराए पण चउ पणयं तह लोहसंजलणं ।
ठिदिबंधो दु जहण्णो भिण्णमुहुत्तं वियाणाहि ॥४१०॥

"बारस मुहुत्त सायं अट्ठ मुहुत्तं तु उच्च-जसकित्ती !
बे मास मास पक्खं कोहं माणं च मायं च ॥४११॥

अर्थ (गाथा 410 से 411): ज्ञानावरणकी पाँच, दर्शनावरणकी चार, अन्तरायकी पाँच, तथा संज्वलनलोभ इन पन्द्रह प्रकृतियोंका जघन्य स्थितिबन्ध भिन्नमुहूर्त जानना चाहिए। सातावेदनीयका बारह मुहूर्त, उच्चगोत्र और यशःकीर्तिका आठ मुहूर्त जघन्य स्थितिबन्ध कहा गया है। संज्वलनक्रोधका जघन्य स्थितिबन्ध दो मास, संज्वलनमानका एक मास और संज्वलन मायाका एक पक्ष जघन्य स्थितिबन्ध है ॥४१०-४११॥


३पुरिसस्स अट्ठवासं आउदुगं भिण्णमेव य मुहुत्तं ।
देवाउय-णिरयाउय वाससहस्सा दस जहण्णा ॥४१२॥

अर्थ: पुरुषवेदका जघन्य स्थितिबन्ध आठ वर्ष, मनुष्यायु और तिर्यंचायुका अन्तर्मुहूर्त; तथा देवायु और नरकायुका दश हजार वर्ष है ॥४१२॥


४पंच य णिद्दावरणं साइयरं वेयणीय मिच्छत्तं ।
बारस अट्ठ य णियमा कसाय तह णोकसाया य ॥४१३॥

तिण्णि य सत्त य चदु दुग सायर उवमस्स सत्त भागा दु ।
ऊणा असंखभागे पल्लस्स जहण्णठिदिबंधो ॥४१४॥

अर्थ (गाथा 413 से 414): द्वितीय आवरण अर्थात् दर्शनावरणकी पाँच निद्राएँ और असातावेदनीय; इन छह प्रकृतियोंका जघन्य स्थितिबन्ध एक सागरोपमके सात भागोंमेंसे पल्यके असंख्यातवें भाग हीन तीन भागप्रमाण है । मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिबन्ध सागरोपमके सात भागोंमेंसे पल्यासंख्यातभागहीन सात भागप्रमाण है । संज्वलन कषायचतुष्कको छोड़कर शेष बारहकषायोंका जघन्य स्थितिबन्ध सागरोपमके सात भागोंमेंसे पल्यासंख्यातभाग हीन चार भागप्रमाण है । तथा शेष आठ नोकषायोंका जघन्य स्थितिबन्ध सागरोपमके सात भागोंमेंसे पल्यासंख्यातभागहीन दो भागप्रमाण है ॥४१३-४१४॥ ( इनकी अंकसंदृष्टि मूलमें दी है । )


'तिरियगइ मणुयदोण्णि य पंच य जाई सरीरणामतियं ।
संठाणं संहयणं छहक्क ओरालियंगवंगो य ॥४१५॥

वण्ण-रस-गंध-फासं अगुरुलहुयादि होंति चत्तारि ।
आदाउज्जोवं खलु विहायगई वि य तहा दोण्णि ॥४१६॥

तस-थावरादिजुयलं णव णिमिणं अजसकित्ति णिच्चं च ।
सागर वि-सत्तभागा पल्लासंखेज्जभागूणा ॥४१७॥

अर्थ (गाथा 415 से 417): तिर्यंगतिद्विक, मनुष्यगतिद्विक एकेन्द्रियादि पाँच जातियाँ, औदारिक, तैजस, कार्मण ये तीन शरीर, छह संस्थान, छह संहनन, औदारिक अङ्गोपाङ्ग, वर्ण, रस, गन्ध, स्पर्श, अगुरुलघु आदि चार, आतप, उद्योत, प्रशस्त और अप्रशस्त दोनों विहायोगतियाँ, त्रस-स्थावरादि नौ युगल, निर्माण, अयशःकीर्त्ति और नीचगोत्र; इन अट्ठावन प्रकृतियोंका जघन्य स्थितिबन्ध सागरोपमके सात भागोंमेंसे पल्यासंख्यातभागहीन दो भागप्रमाण है ॥४१५-४१७॥


१उदधिसहस्सस्स+ तहा वि-सत्तभागा जहण्णठिदिबंधो ।
वेउव्वियछक्कस्स य पल्लासंखेज्जभागूणा ॥४१८॥

अर्थ: वैक्रियिकषट्क ( वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिक-अङ्गोपाङ्ग, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी ) का जघन्य स्थितिबन्ध सागरोपमसहस्रका पल्यासंख्यातभागहीन दो सात भाग २/७ प्रमाण है ॥४१८॥ वैक्रियिकषट्कका ज० स्थितिबन्ध २०००/७ अर्थात् २८५ ५/७ सागरोपम है ।


२आहारयं सरीरं अंगोवंगं च णाम तित्थयरं ।
अंतोकोडाकोडी जहण्णबंधो ठिदी होइ ॥४१९॥

अर्थ: आहारकशरीर, आहारक-अङ्गोपाङ्ग और तीर्थंकरनामकर्मका जघन्य स्थितिबन्ध अन्तः-कोडाकोडीसागरोपम है ॥४१९॥


[मूलगा० ५२] मूलट्ठिदिअजहण्णो सत्तण्हं बंधचदुवियप्पो य ।
सेसतिए दुवियप्पो आउचउक्के य दुवियप्पो ॥४२०॥

अर्थ: आयुकर्मको छोड़कर शेष सात मूलप्रकृतियोंका अजघन्य स्थितिबन्ध सादि, अनादि, ध्रुव और अध्रुव; इन चारों ही प्रकारोंका होता है। उक्त सातों कर्मोंके शेषत्रिक अर्थात् उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट और जघन्य स्थितिबन्ध सादि और अध्रुव ऐसे दो प्रकारके होते हैं। आयुकर्मके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य; ये चारों ही प्रकारके स्थितिबन्ध भी सादि और अध्रुव ये दो प्रकारके होते हैं ॥४२०॥


[मूलगा० ५३] ‘अट्ठारसपयडीणं अजहण्णो बंधचउवियप्पो दु ।
सादियअधुवबंधो सेसत्तिए होइ बोहव्वो’ ॥४२१॥

अर्थ: आगे कही जानेवाली अट्ठारह प्रकृतियोंका अजघन्य बन्ध सादि आदि चारों प्रकारका होता है। उनके शेषत्रिक अर्थात् उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट और जघन्य स्थितिबन्ध सादि और अध्रुव होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥४२१॥


णाणंतरायदसयं दिट्ठियावरणस्स होंति चत्तारि ।
संजलणं च अट्ठारस चदुधा अजहण्णबंधो सो ॥४२२॥

अर्थ: ज्ञानावरण और अन्तरायकी दस, दर्शनावरणकी चार, तथा संज्वलन चार; इन अट्ठारह प्रकृतियोंका जो अजघन्यबन्ध है वह चार प्रकारका होता है ॥४२२॥


[मूलगा०५४] १’उक्कस्समणुकस्सं जहण्णमजहण्णओ य ठिदिबंधो ।
साइयअद्धुवबंधो पयडीणं होइ सेसाणं’ ॥४२३॥

अर्थ: ऊपर कही गई अट्ठारह प्रकृतियोंके सिवाय शेष जो १०२ बन्धप्रकृतियां हैं उनका उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य स्थितिबन्ध सादि और अध्रुव होता है ॥४२३॥


[मूलगा०५५] २सव्वाओ वि ठिदीओ सुहासुहाणं पि होंति असुहाओ ।
माणुस-तिरिक्ख-देवाउगं च मोत्तूण सेसाणं२ ॥४२४॥

अर्थ: मनुष्यायु, तिर्यंचायु और देवायु, इन तीनको छोड़कर शेष जितनी भी शुभ और अशुभ प्रकृतियाँ हैं, उन सबकी स्थितियाँ अशुभ ही होती हैं ॥४२४॥


[मूलगा० ५६] ‘सव्वट्ठिदीणमुक्कस्सो दु उक्कस्ससंकिलेसेण ।
विपरीओ दु जहण्णो आउगतिगं वज्ज सेसाणं’ ॥४२५॥

अर्थ: आयुत्रिकको छोड़कर शेष सर्व प्रकृतियोंकी स्थितियोंका उत्कृष्ट बन्ध उत्कृष्ट संक्लेशसे होता है और उनका जघन्य स्थितिबन्ध विपरीत अर्थात् संक्लेशके कम होनेसे होता है ॥४२५॥ यहाँपर आयुत्रिकसे अभिप्राय नरकायुके बिना शेष तीन आयुकर्मोंसे है !


[मूलगा० ५७] २सव्वुकस्सठिदीणं मिच्छादिट्ठी दु बंधगो भणिओ ।
आहारय-तित्थयरं देवाउगं च विमोत्तूणं२ ॥४२६॥

[मूलगा० ५८] ३देवाउगं पमत्तो+ आहारयमप्पमत्तविरदो दु ।
तित्थयरं च मणुस्सो अविरयसम्मो समइहे३ ॥४२७॥

अर्थ (गाथा 426 से 427): आहारकद्विक, तीर्थङ्कर और देवायुको छोड़कर शेष सर्व प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिका बन्धक मिथ्यादृष्टि जीव कहा गया है । देवायुका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध प्रमत्तसंयत, आहारकद्विककी उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अप्रमत्तसंयत और तीर्थङ्करप्रकृतिका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अविरत सम्यग्दृष्टि मनुष्य करता है ॥४२६-४२७॥


‘पण्णरसण्हं ठिदि-उक्कस्सं बंधंति मणुय-तेरिच्छा ।
छण्हं सुर-णेरइया ईसाणंता सुरा तिण्हं’ ॥४२८॥

अर्थ: (वक्ष्यमाण) पन्द्रह प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिको मनुष्य और तिर्यञ्च बाँधते हैं, छह प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिको देव-नारकी बाँधते हैं और तीन प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिको ईशान स्वर्ग तकके देव बाँधते हैं ॥४२८॥


देवाउगं वज्जेविय आउयतिय सुहुमणामऽपज्जत्तं ।
साहारण वियलिंदिय वेउव्वियछक्क पण्णरसं ॥४२९॥

तिरियगई ओरालं तस्स य तह अंगोवंगणामं च ।
तिरियगइआणुपुव्वी असंपत्तं चेव उज्जोवं ॥४३०॥

छण्हं सुर-णेरइया ठिदिमुक्कस्सं ॐकरिंति पयडीणं ।
एइंदिय आयावं थावरणामं सुरा तिण्णि ॥४३१॥

अर्थ (गाथा 429 से 431): देवायुको छोड़कर शेष तीन आयु, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, विकलेन्द्रियत्रिक और वैक्रियिकषट्क, इन पन्द्रह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध मनुष्य और संज्ञी पंचेन्द्रियतिर्यञ्च करते हैं । तिर्यंचगति, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, औदारिकशरीर, तथा उसके अंगोपाङ्गनामकर्म, सृपाटिकासंहनन और उद्योत; इन छह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध देव और नारकी करते हैं । एकेन्द्रिय, आतप और स्थावरनामकर्म; इन तीन प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ईशानकल्प तकके देव और देवी करते हैं ॥४२९-४३१॥


सेसाणं चउगइया ठिदि-उक्कस्सं करिंति पयडीणं ।
उक्कस्ससंकिलेसेण ईसिमहमज्झिमेणावि ॥४३२॥

अर्थ: ऊपर कही हुई प्रकृतियोंके सिवाय जितनी भी शेष बानवै प्रकृतियाँ हैं, उनका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध चारों गतिके जीव उत्कृष्ट संक्लेशसे, अथवा ईषन्मध्यम संक्लेशसे करते हैं ॥४३२॥


आहारय-तित्थयरं णियट्टि अणियट्टि पुरिस संजलणं ।
बंधइ सुहुमसराओ सायजसुच्चावरणं विग्धं ॥४३३॥

अर्थ: आहारकद्विक और तीर्थङ्करनामकर्म; इन तीन प्रकृतियोंकी जघन्य स्थितिको अपूर्वकरण-क्षपक; पुरुषवेद और संज्वलनचतुष्क इन पाँचकी जघन्य स्थितिको अनिवृत्तिकरण-क्षपक; तथा पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, पाँच अन्तराय, सातावेदनीय, यशःकीर्ति और उच्चगोत्र; इन सत्रह प्रकृतियोंकी जघन्य स्थितिको सूक्ष्मसाम्पराय-क्षपक बाँधते हैं ॥४३३॥


[मूलगा० ६२] ‘छण्हमसण्णी ठिदिं कुणइ जहण्णमाउमाणमण्णयरो ।
सेसाणं पज्जत्तो वायर एगंदियविसुद्धो’ ॥४३४॥

अर्थ: वैक्रियिकषट्कका जघन्य स्थितिबन्ध असंज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च करता है। देवायु और नरकायुका जघन्य स्थितिबन्ध कोई एक संज्ञी या असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव करता है। मनुष्य और तिर्यंचायुका जघन्य स्थितिबन्ध कर्मभूमिया मनुष्य या तिर्यञ्च करते हैं। शेष ८५ प्रकृतियोंका जघन्य स्थितिबन्ध सर्वविशुद्ध, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीव करता है ॥४३४॥


णिरयदुयस्स असण्णी पंचिंदियपुण्णओ ठिदिजहण्णं ।
जीवो करेइ जुत्तो तजोग्गो संकिलेसेण ॥४३५॥

तिस्से हवेज्ज हेऊ सो चेव य कुणइ सुरचउक्कस्स ।
णवरि विसेसो जाणे सव्वविसुद्धीए जुत्तो दु ॥४३६॥

पंचिंदिओ असण्णी सण्णी वा कुणइ मंदठिदिबंधं ।
णिरयाउस्स य मिच्छो सव्वविसुद्धो दु पज्जत्तो ॥४३७॥

देवाउस्स य एवं तप्पाओग्गेण संकिलेसेण ।
जुत्तो णवरि य जीवो जहण्णबंधट्ठिदिं कुणइ ॥४३८॥

मणुय-तिरियाउयस्स हि तिरिक्ख-मणुसाण कम्मभूमीणं ।
ठिदिबंधो दु जहण्णो तज्जोग्गासंकिलेसेण ॥४३९॥

सेसाणं थयडीणं जहण्णबंधट्ठिदिं कुणइ ।
एइंदियपज्जत्तो सव्वविसुद्धो दु वायरो जीवो ॥४४०॥

अर्थ (गाथा 435 से 440): नरकद्विक अर्थात् नरकगति और नरकगत्यानुपूर्वीका जघन्यस्थितिबन्ध तद्-योग्य संक्लेशसे युक्त असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक तिर्यञ्च जीव करता है। जो जीव नरकद्विकका जघन्य स्थितिबन्ध करता है, वही जीव ही सुरचतुष्क ( देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिक-अङ्गोपाङ्ग ) का भी जघन्य स्थितिबन्ध करता है। केवल इतनी बात विशेष जानना चाहिए कि सुरचतुष्कका बन्धक तद्-योग्य सर्वविशुद्धिसे युक्त होता है। नरकायुका जघन्य स्थितिबन्ध संक्लेशपरिणतिसे युक्त मिथ्यादृष्टि पर्याप्त असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय अथवा सर्वविशुद्ध संज्ञी-पञ्चेन्द्रिय करता है। देवायुका जघन्य स्थितिबन्ध भी नरकायुके बन्धकके समान पर्याप्त, मिथ्यादृष्टि असंज्ञी अथवा संज्ञी जीव करता है। केवल इतनी विशेषता ज्ञातव्य है कि यदि वह बन्धक असंज्ञी हो तो सर्वविशुद्ध और यदि संज्ञी हो, तो तद्-योग्य संक्लेशसे युक्त होना चाहिए। मनुष्यायु और तिर्यंगायुका जघन्य स्थितिबन्ध तद्-योग्य संक्लेशसे युक्त कर्मभूमिके तिर्यञ्च और मनुष्योंके होता है। शेष बचीं ८५ प्रकृतियोंके जघन्य स्थितिवन्धको बादर, पर्याप्तक, सर्वविशुद्ध एकेन्द्रिय जीव करता है॥४३५-४४०॥


सादि अणादिय अट्ठ य पसत्थिदरपरूवणा जहा सण्णा ।
पच्चय-विवाय देसा सामित्तेणाह अणुभागो ॥४४१॥

अर्थ: अनुभागबन्धके चौदह भेद हैं-वे इस प्रकार हैं-१ सादि-अनुभागबन्ध, २ अनादि-अनुभागबन्ध, ३ ध्रुव-अनुभागबन्ध, ४ अध्रुव-अनुभागबन्ध, ५ जघन्य-अनुभागबन्ध, ६ अजघन्य-अनुभागबन्ध, ७ उत्कृष्ट-अनुभागबन्ध, ८ अनुत्कृष्ट-अनुभागबन्ध, ९ प्रशस्तप्रकृति-अनुभागबन्ध, १० अप्रशस्तप्रकृति-अनुभागबन्ध, ११ देशघाति-सर्वघातिसंज्ञानुभागबन्ध, १२ प्रत्ययानुभागबन्ध, १३ विपाकानुभागबन्ध और १४ स्वामित्वेन सह अनुभागबन्ध। इन चौदह भेदोंकी अपेक्षा अनुभागबन्धका वर्णन किया जायगा ॥४४१॥


धाईणं अजहण्णो अणुकस्सो बेयणीय-णामाणं ।
अजहण्णमणुकस्सो गोए अणुभागवंधम्मि ॥४४२॥

साइ अणाइ धुव अधुवो बंधो दु मूलपयडीणं ।
संसारिए दुवियप्पो आउचउक्के वि एमेव ॥४४३॥

अर्थ (गाथा 442 से 443): मूल प्रकृतियोंमें जो चार घातिया कर्म हैं, उनका अजघन्यानुभागबन्ध सादि, अनादि, ध्रुव और अध्रुव इन चारों ही प्रकारोंका होता है। वेदनीय और नामकर्मका अनुत्कृष्टानुभागबन्ध भी चारों प्रकारका होता है। तथा गोत्रकर्मका अजघन्यानुभागबन्ध और अनुत्कृष्टानुभागबन्ध भी चारों प्रकारका होता है। शेषत्रिक अर्थात् घातिया कर्मोंके अजघन्यानुभागबन्धके शेष जो जघन्य, उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट अनुभागबन्ध हैं, वे दो प्रकारके होते हैं-सादि अनुभागबन्ध और अध्रुव-अनुभागबन्ध । वेदनीय और नामकर्मके शेषत्रिक अर्थात् उत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य-अनुभागबन्ध भी सादि और अध्रुवके भेदसे दो प्रकारके होते हैं । गोत्रकर्मके जघन्य और उत्कृष्ट अनुभागबन्ध भी सादि और अध्रुवरूप दो-दो प्रकारके होते हैं । आयुकर्मके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य; ये चारों ही प्रकारके अनुभागबन्ध सादि और अध्रुव ये दो ही प्रकारके होते हैं ॥४४२-४४३॥


[मूलगा०६५] ‘अट्ठण्हमणुक्कस्सो तेयालाणमजहण्णओ बंधो ।
णेओ दु चउवियप्पो सेसतिए होइ दुवियप्पो’ ॥४४४॥

अर्थ: वक्ष्यमाण आठ उत्तरप्रकृतियोंका अनुत्कृष्ट अनुभागबन्ध, तथा तेतालीस उत्तरप्रकृतियोंका अजघन्य अनुभागबन्ध सादि आदि चारों प्रकारका जानना चाहिए । शेषत्रिक अर्थात् आठ प्रकृतियोंके जघन्य, अजघन्य और उत्कृष्ट, तथा तेतालीस प्रकृतियोंके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट और जघन्य अनुभागबन्ध सादि और अध्रुव ऐसे दो-दो प्रकारके होते हैं ॥४४४॥


२तेजा कम्मसरीरं वण्णचउक्कं पसत्थमगुरुलहू ।
णिमिणं च जाण अट्ठसु चदुव्वियप्पो अणुक्कस्सो ॥४४५॥

णाणंतरायदसयं दंसणणव मिच्छ सोलस कसाया ।
उवघाय भय दुगुंछा वण्णचउक्कं च अप्पसत्थं च ॥४४६॥

तेयालं पयडीणं उक्कस्साईसु जाण दुवियप्पो ।
बंधो दु चउवियप्पो अजहण्णो साइयाईया ॥४४७॥

अर्थ (गाथा 445 से 447): तैजसशरीर, कार्मणशरीर, प्रशस्त वर्णचतुष्क, अगुरुलघु और निर्माण; इन आठ प्रकृतियोंका अनुत्कृष्ट अनुभागबन्ध चारों प्रकारका जानना चाहिए। ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच, दर्शनावरणकी नौ, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, उपघात, भय, जुगुप्सा और अप्रशस्त वर्णचतुष्क; इन तेतालीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट और जघन्य अनुभागबन्ध सादि और अध्रुव दो प्रकारका है। तथा इन्हींका अजघन्य अनुभागबन्ध सादि आदि चारों प्रकारका होता है ॥४४५-४४७॥


[मूलगा०६६] उक्कसमणुक्कस्सं जहण्णमजहण्णगो दु अणुभागो ।
सादिय अद्धुवबंधो पयडीणं होइ सेसाणं ॥४४८॥

अर्थ: शेष ७३ प्रकृतियोंका उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य अनुभागबन्ध सादि और अध्रुव ऐसे दो प्रकारका होता है ॥४४८॥


पच्चंति मूलपयडी णूणं समुहेण सव्वजीवाणं ।
समुहेण परमुहेण य मोहाउविवज्जिदा सेसा ॥४४९॥

अर्थ: मूल प्रकृतियाँ नियमसे सर्व जीवोंके स्वमुख द्वारा ही पचती हैं, अर्थात् स्वोदय द्वारा ही विपाकको प्राप्त होती हैं। किन्तु मोह और आयुकर्मको छोड़कर शेष उत्तरप्रकृतियाँ स्वमुखसे भी विपाकको प्राप्त होती हैं और परमुखसे भी विपाकको प्राप्त होती हैं अर्थात् फल देती हैं ॥४४९॥


पच्चइ णो मणुयाऊ णिरयाउमुहेण समयणिद्दिट्ठं ।
तह चरियमोहणीयं दंसणमोहेण संजुत्तं ॥४५०॥

अर्थ: भुज्यमान मनुष्यायु नरकायुमुखसे विपाकको प्राप्त नहीं होती है, ऐसा परमागममें कहा गया है । अर्थात् कोई भी विवक्षित आयु किसी भी अन्य आयुके रूपसे फल नहीं देती है । तथा चारित्रमोहनीयकर्म भी दर्शनमोहनीयके मुखसे अर्थात् दर्शनमोहके रूपसे फल नहीं देता है । इसी प्रकार दर्शनमोहनीयकर्म भी चारित्रमोहनीयके मुखसे फल नहीं देता है ॥४५०॥


सुहपयडीण विसोही तिव्वं असुहाण संकिलेसेण ।
विवरीए दु जहण्णो अणुभाओ सव्वपयडीणं ॥४५१॥

अर्थ: सातावेदनीय आदिक शुभप्रकृतियोंका अनुभागबन्ध विशुद्ध परिणामोंसे तीव्र अर्थात् उत्कृष्ट होता है । असातावेदनीय आदिक अशुभ प्रकृतियोंका अनुभाग बन्ध संक्लेश परिणामोंसे उत्कृष्ट होता है । तथा इससे विपरीत परिणामोंमें सर्व प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध होता है । अर्थात् शुभ प्रकृतियोंका संक्लेशसे और अशुभप्रकृतियोंका विशुद्धिसे जघन्य अनुभागबन्ध होता है ॥४५१॥


बायालं पि पसत्था विसोहिगुण उक्कडस्स तिव्वाओ ।
वासीय अप्पसत्था मिच्छक्कड संकिलिट्ठस्स ॥४५२॥

अर्थ: जो ब्यालीस प्रशस्त प्रकृतियाँ हैं । उनका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध विशुद्धिगुणकी उत्कटतावाले जीवके होता है । तथा ब्यासी जो अप्रशस्त प्रकृतियाँ हैं, उनका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध उत्कृष्ट संक्लेशवाले मिथ्यादृष्टि जीवके होता है ॥४५२॥


सायं तिण्णेवाउंग मणुयदुगं देवदुव य जाणाहि ।
पंचसरीरं पंचिंदियं च संठाणमइयं ॥४५३॥

तिण्णि य अंगोवंगं पसत्थविहायगइ आहसंघयणं ।
वण्णचउक्कं अगुरुय परघादुस्सासउज्जोयं ॥४५४॥

आदाव तसचउक्कं थिर सुह सुभगं च सुस्सरं णिमिणं ।
आदेज्जं जसकित्ती तित्थयरं उच्च *बादाले ॥४५५॥

अर्थ (गाथा 453 से 455): सातावेदनीय, नरकायुके बिना शेष तीन आयु, मनुष्यद्विक, देवद्विक, पाँच शरीर, पंचेन्द्रियजाति, आदिका समचतुरस्रसंस्थान, तीनों अंगोपांग, प्रशस्त विहायोगति, आदिका वज्रवृषभनाराचसंहनन, प्रशस्तवर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, उद्योत, आतप, त्रसचतुष्क, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, निर्माण, आदेय, यशस्कीर्ति, तीर्थंकर और उच्चगोत्र; ये ब्यालीस प्रशस्त, शुभ या पुण्यप्रकृतियाँ हैं ॥४५३-४५५॥


'णाणंतरायदसयं दंसणणव मोहणीय छब्बीसं ।
णिरयगइ तिरियदोण्णि य तेसिं तह आणुपुव्वीयं ॥४५६॥

संठाणं पंचेव य संघयणं चेव होंति पंचेव ।
वण्णचउक्कं अपसत्थविहायगई य उवघायं ॥४५७॥

एइंदिय-णिरयाऊ तिण्णि य वियलिंदियं असायं च ।
अप्पज्जत्तं थावर सुहुमं साहारणं णाम ॥४५८॥

दुब्भग दुस्सरमजसं अणाइज्जं चेव अथिरमसुहं च ।
णीचागोदं च तहा वासीदी अप्पसत्थं तु ॥४५९॥

अर्थ (गाथा 456 से 459): ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच, दर्शनावरणकी नौ, मोहनीयकी छब्बीस, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, आदिके बिना शेष पाँचों संस्थान, आदिके बिना शेष पाँचों संहनन, अप्रशस्त वर्णचतुष्क, अप्रशस्त विहायोगति, उपघात, एकेन्द्रियजाति, नरकायु, तीन विकलेन्द्रिय जातियाँ, असातावेदनीय, अपर्याप्त, स्थावर, सूक्ष्म, साधारण, दुर्भग, दुःस्वर, अयशःकीर्त्ति, अनादेय, अस्थिर, अशुभ और नीचगोत्र; ये व्यासी अप्रशस्त, अशुभ या पापप्रकृतियाँ हैं ॥ ४५६-४५९॥


[मूलगा०६६]¹ आदाओ उज्जोयं माणुस-तिरियाउगं पसत्थासु।
मिच्छस्स होंति तिव्वा सम्माइट्टीसु सेसाओ ॥४६०॥

अर्थ: प्रशस्तप्रकृतियोंमें जो आतप, उद्योत, मनुष्यायु और तिर्यंचायु, ये चार प्रकृतियाँ हैं, उनका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध मिथ्यादृष्टि जीवके होता है। शेष अड़तीस जो पुण्यप्रकृतियाँ हैं, उनका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध सम्यग्दृष्टि जीवोंके होता है ॥४६०॥


²मणुयदुयं ओरालियदुगं च तह चेव आइसंघयणं ।
णिरय-सुरा सद्दिट्ठी करिंति तिव्वं विसुद्धीए ॥४६१॥

अर्थ: मनुष्यद्विक, औदारिकद्विक और आदिका संहनन; इन पाँचों प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध विशुद्धिसे युक्त सम्यग्दृष्टि देव और नारकी करते हैं ॥४६१॥


[मूलगा०७०] ³देवाउमप्पमत्तो वायालाओ पसत्थाओ ।
तत्तो सेसा पयडी तिव्वं खवया करिंति बत्तीसं ॥४६२॥

अर्थ: देवायुके उत्कृष्ट अनुभागबन्धको अप्रमत्तसंयत करता है। उक्त दशके बिना ब्यालीस प्रकृतियोंमें शेष बचीं जो बत्तीस प्रकृतियाँ हैं उनका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध क्षपकश्रेणिवाले जीव करते हैं ।॥४६२॥


तिरि-णर मिच्छेयारह सुरमिच्छो तिण्णि जयइ पयडीओ ।
उज्जोयं तमतमगा सुर-णेरइया हवे तिण्णि ॥४६३॥

अर्थ: आगे कही जानेवाली ग्यारह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध मिथ्यादृष्टि मनुष्य और तिर्यंच करते हैं । वद्यमाण तीन प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध मिथ्यादृष्टि देव करते हैं। तमतमक अर्थात् महातमःप्रभानामक सातवीं पृथिवीके उपशमसम्यक्त्वके अभिमुख मिथ्यादृष्टि नारकी उद्योतप्रकृतिका तीव्र अनुभागबन्ध करते हैं । वद्यमाण तीन प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध मिथ्यादृष्टि देव और नारकी करते हैं ॥४६३॥


तिण्णेवाउयसुहुमं साहारण-वि-ति-चउरिदियं अपज्जत्तं ।
णिरयदुयं बंधंति य तिरिय-मणुया मिच्छभावा य ॥४६४॥

अर्थ: देवायुके बिना शेष तीन आयु, सूक्ष्म, साधारण, अपर्याप्त, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रियजाति, और नरकद्विक, इन ग्यारह प्रकृतियोंके उत्कृष्ट अनुभागको मिथ्यात्वभावसे युक्त मनुष्य और तिर्यंच बाँधते हैं। एकेन्द्रियजाति, आतप और स्थावरनामकर्म, इन तीन प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध मिथ्यादृष्टि देवमें होता है। तिर्यग्गतिद्विक और स्पाटिकासंहनन, इन तीन प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध मिथ्यादृष्टि देव और नारकियोंके होता है ॥४६४-४६५॥


एइंदियआयावं थावरणामं च देवमिच्छम्मि ।
सुर-णिरयाणं मिच्छे तिरियगडद्गं असंपत्तं ॥४६५॥


[मूलगा०७२] सेसाणं चउगइया तिव्वाणुभागं करंति पयडीणं ।
मिच्छादिट्ठी नियमा तिव्वकसाउक्कडा जीवा ॥४६६॥

अर्थ: शेष बची प्रकृतियोंके तीव्र अनुभागबन्धको तीव्र कषायसे उत्कट चारों गतिवाले मिथ्यादृष्टि जीव नियमसे करते हैं ॥४६६॥


[मूलगा०७३] चोद्दस सराय-चरिमे पंचऽनियट्टी णियट्ठि एयारं ।
सोलस मंदणुभायं संजमगुणपत्थिओ जयइ १ ॥४६७॥

अर्थ: वक्ष्यमाण चौदह प्रकृतियोंका मन्द ( जघन्य ) अनुभागबन्ध सराग अर्थात् सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानके अन्तिम समयमें वर्तमान संयतके होता है । पाँच प्रकृतियोंका अनिवृत्तिकरणके चरम समयवर्ती क्षपक, ग्यारहका चरम समयवर्ती अपूर्वकरण क्षपक और सोलह प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध संयमगुणस्थानको अनन्तर समयमें प्राप्त होनेवाला जीव करता है ॥४६७॥


१णाणंतरायदसयं विदियावरणस्स होंति चत्तारि ।
एए चोद्दस पयडी सरायचरिमम्हि णायव्वा ॥४६८॥

२पुरिसं चउसंजलणं पंचऽणियट्टिम्मि होंति भायम्हि ।
सय-सय चरिमस्स समये जहण्णबंधो य णायव्वो ॥४६६॥

३हास रइ भय दुगुंछा णिद्दा पयला य होइ उच्चघायं ।
वण्णचउक्क पसत्थं अउव्वकरणे जहण्णाणि ॥४७०॥

४पढमकसायचउक्कं दंसणतिय मिच्छदंसणं मिच्छे ।
विदियकसायचउक्कं अविरयसम्मो मुणेयव्वो ॥४७१॥

'तइयकसायचउक्कं विरियाविरयम्हि जाण णियमेण ।
*मंदो अणुभागो सो संजमगुणपत्थिओ जयइ ॥४७२॥

अर्थ (गाथा 468 से 472): ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच और दर्शनावरणकी चार; इन चौदह प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानके अन्तिम समयमें जानना चाहिए। पुरुषवेद और संज्वलनचतुष्क इन पाँच प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध अनिवृत्तिकरणमें अपने-अपने बन्धविच्छेद होनेके समय जानना चाहिए। हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, निद्रा, प्रचला, उपघात और प्रशस्त वर्णचतुष्क; इन ग्यारह प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध अपूर्वकरणगुणस्थानमें अपने-अपने बन्धविच्छेदके समय होता है। प्रथम अर्थात् अनन्तानुबन्धिकषायचतुष्क, दर्शन-त्रिक (निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धि) और मिथ्यादर्शन; इन आठ प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध संयम धारण करनेके अभिमुख चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टिके होता है। द्वितीय अर्थात् अप्रत्याख्यानावरणकषाय चतुष्कका जघन्य अनुभागबन्ध संयम धारण करनेके उन्मुख चरमसमयवर्ती अविरत सम्यग्दृष्टिके जानना चाहिए। तृतीय अर्थात् प्रत्याख्यानावरणकषायचतुष्कका जघन्य अनुभागबन्ध संयमगुण धारण करनेके लिए प्रस्थान करनेवाले चरमसमयवर्ती देशसंयतके नियमसे होता है, ऐसा जानना चाहिए ॥४६८-४७२॥


[मूलगा०७४] ²आहारमप्पमत्तो पमत्तसुद्धो दु अरइ-सोयाणं ।
सोलस मणुय-तिरिया-सुर-णिरया तमतमा तिण्णि’ ॥४७३॥

अर्थ: अनन्तर समयमें प्रमत्तभावको प्राप्त होनेके अभिमुख ऐसा अप्रमत्तसंयत आहारकद्विकके जघन्य अनुभागको बाँधता है। प्रमत्तशुद्ध अर्थात् अनन्तर समयमें अप्रमत्तभावको प्राप्त होनेवाला प्रमत्तसंयत अरति और शोकके जघन्य अनुभागका बन्ध करता है। वक्ष्यमाण सोलह-प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध मनुष्य और तिर्यञ्च करते हैं। तीन प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध देव और नारकी करते हैं, तथा तीन प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध तमतमक अर्थात् सप्तम पृथिवीके नारकी करते हैं ॥४७३॥


बि-ति-चउरिंदिय-सुहुमं साहारण णामकम्म अपज्जत्तं ।
तह वेउव्वियछक्कं आउचउक्कं दुगइ मिच्छे ॥४७४॥

ओरालिय उज्जोवं अगोवंगं च देव-णेरइया ।
तिरियदुयं णिच्चं पि य तमतमा जाण तिण्णेदे ॥४७५॥

अर्थ (गाथा 474 से 475): द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रियजाति; सूक्ष्म, साधारण और अपर्याप्तनामकर्म; तथा वैक्रियिकषट्क और आयुचतुष्क; इन सोलह प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागको मिथ्यात्वगुणस्थानवर्ती मनुष्य और तिर्यञ्च, इन दो गतियोंके जीव बाँधते हैं। औदारिकशरीर, औदारिक-अंगोपांग और उद्योत, इन तीन प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागको देव और नारकी बाँधते हैं। तिर्यग्गति-तिर्यग्गत्यानुपूर्वी और नीचगोत्र, इन तीन प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागको तमतमक नारकी बाँधते हैं; ऐसा जानना चाहिए ॥४७४-४७५॥


एइंदिय थावरयं मंदणुभागं करिंति तिग्गइया ।
परियत्तमाणमज्झिमपरिणामा णारया वज्जे ॥४७६॥

अर्थ: नारकियोंको छोड़कर शेष तीन गतिके परिवर्तनमान मध्यम परिणामी जीव एकेन्द्रियजाति और स्थावरनामकर्मके जघन्य अनुभागका बन्ध करते हैं ॥४७६॥


आसोधम्मादावं तित्थयरं जयइ अविरयमणुस्सो ।
चउगइउक्कडमिच्छो पण्णरस दुवे विसोधीए ॥४७७॥

अर्थ: भवनत्रिकसे लेकर सौधर्म-ईशानकल्प तकके संक्लेश परिणामी देव आतपप्रकृतिके जघन्य अनुभागका बन्ध करते हैं। नरकजानेके सन्मुख अविरत सम्यक्त्वी मनुष्य तीर्थंकर प्रकृतिका जघन्य अनुभाग बन्ध करता है। (वक्ष्यमाण) पन्द्रह प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागका बन्ध चतुर्गतिके उत्कट संक्लेशवाले मिथ्यादृष्टि जीव करते हैं। तथा (वक्ष्यमाण) दोप्रकृतियोंके जघन्य अनुभागको विशुद्ध परिणामवाले चतुर्गतिके जीव बाँधते हैं ॥४७७॥


तेजाकम्मसरीरं पंचिंदिय तसचउक्क णिमिणं च ।
अगुरुलहुगुस्सासं परघायं चेव वण्णचउं ॥४७८॥

इत्थि-णउंसयवेयं अणुभायजहण्णयं च चउगइया ।
मिच्छादिट्ठी बंधइ तिव्वविसोधीए संजुत्तो ॥४७६॥

अर्थ (गाथा 478 से 479): तैजसशरीर, कार्मणशरीर, पंचेन्द्रियजाति, त्रसचतुष्क, निर्माण, अगुरुलघु, उच्छ्वास, परघात, तथा वर्णचतुष्क, इन पन्द्रह प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागको चतुर्गतिके तीव्र संक्लेश परिणामीमिथ्यादृष्टि जीव बाँधते हैं। स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके जघन्य अनुभागको तीव्रविशुद्धिसे संयुक्त चतुर्गतिके मिथ्यादृष्टि जीव बाँधते हैं ॥४७८-४७६॥


[मूलगा० ७७] सम्माइट्ठी मिच्छो व अट्ठ परियत्तमज्झिमो जयइ ।
परियत्तमाणमज्झिममिच्छाइट्ठी दु तेवीसं’ ४८०॥

अर्थ: परिवर्त्तमान मध्यमपरिणामी सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टि जीव (वक्ष्यमाण) आठ प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागका बन्ध करते हैं तथा परिवर्त्तमान मध्यमपरिणामी मिथ्यादृष्टि जीव (वक्ष्यमाण) तेईस प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागका बन्ध करते हैं ॥४८०॥


'सायासायं दोण्णि वि थिराथिरं सुहासुहं च जसकित्ती ।
अजसकित्ती य तहा सम्माइट्ठी य मिच्छो वा ॥४८१॥

संठाणं संघयणं छक्केक्क तह दो विहाय मणुयदुगं ।
आदेज्जाणादेज्जं सरदुगं च हि दुब्भग-सुभगं तहा उच्चं ॥४८२॥

अर्थ (गाथा 481 से 482): सातावेदनीय-असातावेदनीय, स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ और यशःकीर्त्ति-अयशःकीर्त्ति, इन आठ प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागको सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टि बाँधते हैं। छह संस्थान, छह संहनन, विहायोगतिद्विक, मनुष्यगतिद्विक, आदेय-अनादेय, सुस्वर-दुःस्वर, सुभग-दुर्भग तथा उच्चगोत्र इन तेईस प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागको मिथ्यादृष्टि बाँधते हैं ॥४८१-४८२॥


[मूलगा० ७८] २केवलणाणावरर्ण दंसणछक्कं च मोहबारसयं ।
ता सव्वधाइसंण्णा मिस्स मिच्छत्तमेयवीसादिमं २॥४८३॥

अर्थ: केवलज्ञानावरण, दर्शनावरणषट्क, मोहनीयकी बारह, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व; इन इक्कीस प्रकृतियोंकी सर्वघातिसंज्ञा है ॥४८३॥


[मूलगा०७९] ‘णाणावरिचउक्कं दंसणतिगमंतराइगे पंच ।
ता होंति देसघाई सम्मं संजलण णोकसाया य’ ॥४८४॥

अर्थ: ज्ञानावरणकी चार, दर्शनावरणकी तीन, अन्तरायकी पाँच, सम्यक्त्वप्रकृति, संज्वलनचतुष्क और नव नोकषाय; ये छब्बीस देशघाती प्रकृतियाँ हैं ॥४८४॥


[मूलगा०८०] २अवसेसा पयडीओ अघादिया घादियाण पडिभागा ।
ता एव पुण्ण पावा सेसा पावा मुणेयव्वा३ ॥४८५॥

अर्थ: उपर्युक्त सर्वघाती और देशघातीके सिवाय अवशिष्ट जितनी भी चार कर्मोंकी १०१ प्रकृतियाँ हैं, उन्हें अघातिया जानना चाहिए। वे स्वयं तो आत्मगुणोंके घातनेमें असमर्थ हैं, किन्तु घातिया प्रकृतियोंकी प्रतिभागी हैं। अर्थात् उनके सहयोगसे आत्मगुणघातनेमें समर्थ होती हैं। इन १०१ अघातिया प्रकृतियोंमें ही पुण्य और पापरूप विभाग है। शेष ४७ प्रकृतियोंको तो पापरूप ही जानना चाहिए ॥४८५॥


'आवरण देसघायंतराय संजलण पुरिस सत्तरसं ।
चउविहभावपरिणया तिभावसेसा सयं तु सत्तहियं२ ॥४८६॥

अर्थ: मतिज्ञानावरणादि चार, चक्षुदर्शनावरणादि तीन, अन्तरायकी पाँच, संज्वलनचतुष्क और पुरुषवेद; ये सत्तरह प्रकृतियाँ लता, दारु, अस्थि और शैलरूप चार प्रकारके भावोंसे परिणत हैं। अर्थात् इनका अनुभागबन्ध, एकस्थानीय, द्विस्थानीय, त्रिस्थानीय और चतुःस्थानीय होता है। शेष १०७ प्रकृतियाँ दारु, अस्थि और शैलरूप तीन प्रकारके भावोंसे परिणत होती हैं। उनका एकस्थानीय अनुभागबन्ध नहीं होता है ॥४८६॥ तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध सम्यक्त्वगुणके निमित्तसे होता है। आहारकद्विकका बन्ध संयमके निमित्तसे होता है। शेष ११७ प्रकृतियाँ मिथ्यात्व आदि हेतुओंसे बन्धको प्राप्त होती हैं ॥४८६॥ इस प्रकार बन्धके प्रधान हेतुओंका निरूपण किया ।


२सुहपयडीणं भावा गुड-खंड-सियामयाण खलु सरिसा ।
इयरा दु णिंब-कंजीर-विस-हालाहलेण अहमाई ॥४८७॥

अर्थ: शुभ या पुण्यप्रकृतियोंके भाव अर्थात् अनुभाग गुड़, खाँड़, शक्कर और अमृतके तुल्य उत्तरोत्तर मिष्ट होते हैं। इनसे भिन्न जो पापप्रकृतियाँ हैं, उनका अनुभाग निम्ब, कांजीर, विष और हालाहलके समान निश्चयसे उत्तरोत्तर कटुक जानना चाहिए ॥४८७॥


३’सायं चउपच्चइयो मिच्छो सोलह दुपच्चया पणुतीसं ।
सेसा तिपच्चया खलु तित्थयराहार वज्जा दु’ ॥४८८॥

अर्थ: सातावेदनीय चतुर्थ-प्रत्ययक है अर्थात् उसका अनुभागबन्ध चौथे योग-प्रत्ययसे होता है। मिथ्यात्वगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली सोलह प्रकृतियाँ मिथ्यात्वप्रत्ययक हैं। दूसरे गुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली पच्चीस और चौथेमें बन्धसे व्युच्छिन्न होनेवाली दश; ये पैंतीस प्रकृतियाँ द्विप्रत्ययक हैं, क्योंकि उनका पहले गुणस्थानमें मिथ्यात्वकी प्रधानतासे और दूसरेसे चौथे तक असंयमकी प्रधानतासे बन्ध होता है। तीर्थङ्कर और आहारकद्विकको छोड़कर शेष सर्वप्रकृतियाँ त्रिप्रत्ययक हैं, क्योंकि उनका बन्ध पहले गुणस्थानमें मिथ्यात्वकी प्रधानतासे, दूसरेसे चौथे तक असंयमकी प्रधानतासे और आगे कषायकी प्रधानतासे होता है ॥४८८॥ मोहनीय और आयुके सिवाय शेष छह कर्मोंका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सादि आदि चारों प्रकारका होता है। इन ही छह कर्मोंके शेषत्रिक अर्थात् उत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध सादि और अध्रुव रूप दो प्रकारके होते हैं। मोहनीय और आयुकर्मके उत्कृष्टादि चारों प्रकारका प्रदेशबन्ध सादि और अध्रुव रूप दो प्रकारका होता है ॥४८८॥


सम्मत्तगुणणिमित्तं तित्थयरं संजमेण आहारं ।
बज्झंति सेसियाओ मिच्छत्ताईहिं हेऊहिं ॥४८९॥


पण्णरसं छ तिय छ पंच दोण्णि पंच य हवंति अट्ठेव ।
सरीरादिय फासंता य पयडीओ आणुपुव्वीए ॥४९०॥


अगुरुलहुगुवघाया परघाया आदवुज्जोव णिमिणणामं च ।
पत्तेय-थिर-सुहेदरणामाणि य पुग्गलविवागा ॥४९१॥


आऊणि भवविवागी खेत्तविवागी उ आणुपुव्वी य ।
अवसेसा पयडीओ जीवविवागी मुणेयव्वा ॥४९२॥

अर्थ: शरीर नामकर्मसे आदि लेकर स्पर्श नामकर्म तककी प्रकृतियाँ आनुपूर्वीसे शरीर ५, बन्धन ५ और संघात ५ इस प्रकार १५; संस्थान ६, अङ्गोपाङ्ग ३, संहनन ६, वर्ण ५, गन्ध २, रस ५ और स्पर्श आठ; तथा अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, निर्माण, प्रत्येकशरीर, साधारणशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ और अशुभ; ये सर्व ६२ प्रकृतियाँ पुद्गलविपाकी हैं। आयुकर्मकी चारों प्रकृतियाँ भवविपाकी हैं। चारों आनुपूर्वीप्रकृतियाँ क्षेत्रविपाकी हैं। शेष ७८ प्रकृतियाँ जीवविपाकी जानना चाहिए ॥४६०-४६२॥


वेयणीय-गोथ-धाई णभगइ गइ जाइ आण तित्थयरं ।
तस-जस-बादर-पुण्णा सुस्सर-आदेज्ज-सुभगजुगलाई ॥४९३॥

अर्थ: वेदनीयकी २, गोत्रकी २, घातिकर्मोंकी ४७, विहायोगति २, गति ४, जाति ५, श्वासोच्छ्वास १, तीर्थंकर १, तथा त्रस, यशःकीर्ति, बादर, पर्याप्त, सुस्वर, आदेय और सुभग, इन सात युगलोंकी १४ प्रकृतियाँ; इस प्रकार सर्व मिलाकर ७८ प्रकृतियाँ जीवविपाकी हैं ॥४६३॥ पुद्गलविपाकी ६२, जीवविपाकी ७८, भवविपाकी ४ और क्षेत्रविपाकी ४ सब मिलाकर १४८ प्रकृतियाँ हो जाती हैं। इस प्रकार अनुभागबन्ध समाप्त हुआ।


एयक्खेत्तोगाढं सव्वपदेसेहिं कम्मणो जोग्गं ।
बंधइ जहुत्तहेउं सादियमहऽणादियं चावि ॥४९४॥

अर्थ: एकक्षेत्रावगाही, कर्मरूप परिणमनके योग्य, सादि, अथवा अनादि, तथा ‘च’ शब्दसे सूचित उभयरूप जो पुद्गलद्रव्य है, उसे यह जीव यथोक्त मिथ्यात्व आदि हेतुओंसे अपने सर्व प्रदेशोंके द्वारा बाँधता है। इसे ही प्रदेशबन्ध कहते हैं ॥४६४॥


पंचरस-पंचवण्णेहिं परिणयदुगंध चदुहिं फासेहिं ।
दवियमणंतपदेसं जीवेहि अणंतगुणहीणं ॥४९५॥

अर्थ: पाँच रस, पाँच वर्ण, दो गन्ध और शीतादि अन्तिम चार स्पर्शोंसे परिणत, सिद्धजीवोंसे अनन्तगुणित हीन, तथा अभव्यजीवोंसे अनन्तगुणित अनन्तप्रदेशी पुद्गलद्रव्यको यह जीव एक समयमें ग्रहण करता है ॥४९५॥


[मूलगा०८८] 'आउगभागो थोवो णामागोदे समो तदो अधिओ ।
आवरण अंतराए सरिसो अधिगो य मोहे वि ॥४९६॥

[मूलगा०८९] सव्वुक्कस्सिट्ठेणीए अधिक्को हु कारणं किंचि तस्स ।
सुह-दुक्खकारणत्ता ठिदिविसेसेण सेसाणं ॥४९७॥

अर्थ (गाथा 496 से 497): एक समयमें जो पुद्गलद्रव्य आत्मप्रदेशोंके साथ सम्बद्ध होता है, उसका विभाग आठों कर्मोंमें होता है। उसमेंसे आयुकर्मका भाग सबसे थोड़ा है। नाम और गोत्रकर्मका भाग यद्यपि आपसमें समान है, तथापि आयुकर्मके भागसे अधिक है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय, इन तीन घातिया कर्मोंका भाग यद्यपि परस्पर समान है, तथापि नाम और गोत्रकर्मके भागसे अधिक है। ज्ञानावरणादि कर्मोंके भागसे मोहनीय कर्मका भाग अधिक है। मोहनीयकर्मके भागसे भी वेदनीयकर्मका भाग अधिक है। वेदनीयकर्म सुख-दुःखका कारण है, इसलिए उसका भाग सर्वोपरि अर्थात् सबसे अधिक है। शेष कर्मोंके विभाग उनकी स्थिति-विशेषके अनुसार जानना चाहिए ॥४९६-४९७॥


छण्हं पि अणुक्कस्सो पदेसबंधो दु चउव्विहो होइ ।
सेसतिए दुवियप्पो मोहाउयाणं च सव्वत्थ ॥४९८॥


तीसण्हमणुक्कस्सो उत्तरपयडीसु चउविहो बंधो ।
सेसतिए दुवियप्पो सेसासु वि होइ दुवियप्पो ॥४९९॥

अर्थ: उत्तर प्रकृतियोंमेंसे (वक्ष्यमाण) तीस प्रकृतियोंका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सादि आदि चारों प्रकारका होता है । उन्हींका शेषत्रिक अर्थात् उत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध सादि और अध्रुवरूप दो प्रकारका होता है । उक्त प्रकृतियोंके अतिरिक्त शेष ९० प्रकृतियोंके उत्कृष्ट आदि चारों प्रकारके प्रदेशबन्ध सादि और अध्रुवरूप दो प्रकारके होते हैं ॥४६६॥


णाणंतरायदयं दंसणछक्कं च मोहचउदसयं ।
तीसण्हमणुक्कस्सो पदेसबंधो चउवियप्पो ॥५००॥

अंतिमए छ दंसणछक्कं थीणत्तिगं वज्ज मोहचउदसयं ।
अण वज्ज बारह कसाया भय दुगुंछा य ॥५०१॥

अर्थ (गाथा 500 से 501): ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच, दर्शनावरणकी छह और मोहकी चौदह; इन तीस प्रकृतियोंका अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध चारों प्रकारका होता है। यहाँपर जो दर्शनावरणकी छह प्रकृतियाँ कहीं हैं सो स्त्यानगृद्धित्रिकको छोड़कर अन्तिम छहका ग्रहण करना चाहिए । तथा मोहकी जो चौदह प्रकृतियाँ कही हैं, उनमें अनन्तानुबन्धी कषायचतुष्कको छोड़कर शेष बारह कषाय और भय तथा जुगुप्सा, ये चौदह प्रकृतियाँ ग्रहण की गई हैं ॥५००-५०१॥


[मूलगा०६२] ‘आउक्कस्स पदेसस्स छच्च मोहेस्स णव य अण्णसिं ।
सेसाणि तणुकसाओ बंधइ उक्कस्सजोगेण’ ॥५०२॥

अर्थ: आयु कर्मका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध मिश्रगुणस्थानको छोड़कर प्रारम्भके छह गुणस्थानोंमें होता है। तथा मोहकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध प्रारम्भके नौ गुणस्थानोंमें होता है। शेष छह कर्मोंके उत्कृष्ट प्रदेशबन्धको उत्कृष्ट योगसे संयुक्त सूक्ष्मसाम्परायसंयत बाँधता है ॥५०२॥


[मूलगा० ६३] सुहुमणिगोयअपज्जत्तयस्स पढमे जहण्णगे जोगे ।
सत्तण्हं पि जहण्णो आउगबंधे वि आउस्स ॥५०३॥

अर्थ: सुहुमनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्त जीवके अपनी पर्यायके प्रथम समयमें जघन्य योगमें वर्तमान होनेपर आयुके बिना शेष सात कर्मोंका जघन्य प्रदेशबन्ध होता है। तथा त्रिभागके समय आयुबन्ध करनेके प्रथम समयमें उसी जीवके आयुकर्मका जघन्य प्रदेशबन्ध होता है ॥५०३॥


[मूलगा०६४] सत्तरस सुहुमसराए पंच णियट्टी य सम्मओ णवयं ।
‘अजदी विदियकसाए देसजदी तदियए जयइ’ १ ॥५०४॥

अर्थ: ( वध्यमाण ) सत्तरह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें होता है । पाँच प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें होता है । नौ प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्यग्दृष्टि करता है । अप्रत्याख्यानावरणकषाय चतुष्कका अविरतसम्यग्दृष्टि और प्रत्याख्यानावरणकषायचतुष्कका देशविरत गुणस्थानवाला उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है ॥५०४


२णाणंतरायदसयं दंसणचत्तारि साय जसकित्ती ।
उच्चागोदुक्कस्सं छविहबंधो तणुकसाई ॥५०५॥

उक्कस्सपदेसत्तं कुणइ अणियट्टिबायरो चेव ।
पंचण्हं पयडीणं णियमा पुंवेदसंजलणा ॥५०६॥

३छण्णोकसाय पयला णिद्दा वि य तह य होइ तित्थयरं ।
उक्कस्सपदेसत्तं कुणइ य णव सम्मओ णेयं ॥५०७॥

अर्थ (गाथा 505 से 507): ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच, दर्शनावरणकी चार, सातावेदनीय, यशःकीर्त्ति और उच्चगोत्र; इन सत्तरह प्रकृतियोंके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, सादि, अनादि, ध्रुव और अध्रुवरूप छह प्रकारके प्रदेशबन्धको सूक्ष्मसाम्परायसंयत करता है। पुरुषवेद और चार संज्वलनकषाय; इन पाँच प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध नियमसे अनिवृत्ति बादरसाम्परायसंयत करता है। हास्यादि छह नोकषाय, निद्रा, प्रचला और तीर्थंकर; इन नौ प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्यग्दृष्टि करता है, ऐसा जानना चाहिए ॥५०५-५०७॥


तेरह बहुप्पएसो सम्मो मिच्छो व कुणइ पयडीओ ।
आहारमप्पमत्तो सेस पएसेसुक्कडो मिच्छो ॥५०८॥

अर्थ: (वक्ष्यमाण) तेरह प्रकृतियोंका उत्कृष्टप्रदेशबन्ध सम्यग्दृष्टि अथवा मिथ्यादृष्टि जीव करता है। आहारकद्विकका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध अप्रमत्तसंयत करता है। शेष ६६ प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध उत्कृष्ट योगवाला मिथ्यादृष्टि जीव करता है ॥५०८॥


सादेदर दो आउ देवगइचउक्क आइसंठाणं ।
आदेज्ज सुभग सुस्सर पसत्थगह आइसंघयणं ॥५०६॥

अर्थ: असातावेदनीय, दो आयु, देवगतिचतुष्क, आदिका संस्थान, आदेय, सुभग, सुस्वर, प्रशस्तविहायोगति और प्रथम संहनन; इन तेरह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध सम्यक्त्वी जीव भी करते हैं और मिथ्यात्वी जीव भी करते हैं ॥५०६॥ यहाँपर दो आयुसे देवायु और मनुष्यायुका अभिप्राय है।


उक्कस्सजोगसण्णी पज्जत्तो पयदिबंधमप्पयरं ।
कुणइ पदेसुक्कस्सं जहण्णयं जाण तिवरीयं ॥५१०॥

अर्थ: जो जीव उत्कृष्ट योगसे युक्त है, संज्ञी, पर्याप्तक है और प्रकृतियोंका अल्पतर बन्ध करनेवाला है, वही जीव उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है । जघन्य प्रदेशबन्धमें इससे विपरीत जानना चाहिए । अर्थात् जो जघन्ययोगसे युक्त हो, असंज्ञी और अपर्याप्त हो, तथा प्रकृतियोंका अधिकतर बन्ध करनेवाला हो, वह जघन्य प्रदेशबन्धको करता है ॥५१०॥


[मूलगा०६७] १घोलणजोगमसण्णी बंधइ चदु दोण्णिमप्पमत्तो दु ।
पंचासंजदसम्मो सुहुमणिगोदो भवे सेसां ॥५११॥

अर्थ: घोटमानयोगोंका धारक असंज्ञी जीव ( वक्ष्यमाण ) चार प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशबन्धको करता है । अप्रमत्तसंयत दो प्रकृतियोंके और असंयत सम्यग्दृष्टि पाँच प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशबन्धको करता है । शेष १०६ प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशबन्धको चरम भवस्थ तथा तीन विग्रहोंमेंसे प्रथम विग्रहमें अवस्थित सूक्ष्मनिगोदिया जीव करता है ॥५११॥


णिरयाउग देवाउग णिरयदुगं चेव जाण चत्तारि ।
आहारदुगं चेव य देवचउक्कं च तित्थयरं ॥५१२॥

अर्थ: नरकायु, देवायु और नरकद्विक ये उपर्युक्त चार प्रकृतियाँ जानना चाहिए । दो प्रकृतियोंसे आहारकद्विकका, तथा पाँच प्रकृतियोंसे देवचतुष्क और तीर्थंकर प्रकृतिका ग्रहण करना चाहिए ॥५१२॥


जोगा पयडि-पदेसा ठिदि-अणुभागं कसायदो कुणइ ।
काल-भव-खेत्तपेही उदओ सविवाग-अविवागो ५१३॥

अर्थ: जीव प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्धको योगसे, तथा स्थितिबन्ध और अनुभागबन्धको कषायसे करता है। काल, भव और क्षेत्रका निमित्त पाकर कर्मोंका उदय होता है। वह दो प्रकारका है-सविपाक उदय और अविपाक-उदय ॥५१३॥


'पयडी एत्थ सहावो तस्स अणासो ठिदी होज्ज ।
तस्स य रसोऽणुभाओ एत्तियमेत्तो पदेसो दु ॥५१४॥

२एक्कम्मि मधुरपयडी तस्स अणासो ठिदो होज्ज ।
तस्स य रसोऽणुभाओ कम्माणं एवमेवो त्ति ॥५१५॥

अर्थ (गाथा 514 से 515): प्रकृति नाम स्वभाव का है, उस स्वभावका जितने काल तक विनाश नहीं होता, उतने काल का नाम स्थिति है । कर्मके रस या फलको अनुभाग कहते हैं । इतने प्रदेश अमुक कर्मके हैं, इस प्रकारके विभागको प्रदेशबन्ध कहते हैं । जैसे किसी एक वस्तुमें मधुरताका होना उसकी प्रकृति है । उस मधुरताका नियत कालतक उसमें बना रहना स्थिति है । उसके मधुररसका आस्वादन अनुभाग है और नियत मात्रामें उस मधुरताके परमाणुओंका होना प्रदेशबन्ध है । इसी प्रकारसे कर्मोंके भी प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्धको जानना चाहिए ॥५१४-५१५


सेढिअसंखेज्जदिमे जोगट्ठाणाणि होंति सव्वाणि ।
तेसिमसंखेज्जगुणो पयडीणं संगहो सव्वो ॥५१६॥

तासिमसंखेज्जगुणा ठिदी-विसेसा हवंति पयडीणं ।
ठिदिअज्झवसाणट्ठाणाणि असंखगुणियाणि तत्तो दु ॥५१७॥

तेसिमसंखेज्जगुणा अणुभागा होंति बंधठाणाणि ।
एत्तो अणंतगुणिया कम्मपएसा मुणेयव्वा ॥५१८॥

अविभागपलिच्छेदा अणंतगुणिया हवंति एत्तो दु ।
सुयपवरदिट्ठिवादे विसुद्धाओ परिकहेंति ॥५१९॥

अर्थ (गाथा 516 से 519): सर्व योगस्थान जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भाग-प्रमाण हैं । योगस्थानोंसे असंख्यात-गुणित मतिज्ञानावरणादि सर्व कर्म-प्रकृतियोंका संग्रह अर्थात् समुदाय या प्रमाण जानना चाहिए । प्रकृतियोंके संग्रहसे प्रकृतियोंकी स्थितियोंके भेद असंख्यात-गुणित हैं । स्थिति-भेदोंसे उनके बन्धके कारणभूत स्थितिबन्धाध्यवसायस्थान असंख्यात-गुणित होते हैं । स्थितिबन्धाध्यवसाय-स्थानोंसे अनुभागबन्धाध्यवसायस्थान असंख्यात-गुणित होते हैं । अनुभागबन्धाध्यवसायस्थानोंसे अनन्तगुणित कर्म-प्रदेश जानना चाहिए । कर्मप्रदेशोंसे उनके अविभागप्रतिच्छेद अनन्तगुणित होते हैं । इस प्रकार द्वादशांग श्रुतमें प्रवर अर्थात् सर्वश्रेष्ठ जो दृष्टिवाद है, उसमें कुशल एवं विशुद्धमतिवाले आचार्य कहते हैं ॥५१६-५१९॥


एसो बंधसमासो पिंडक्खेवेण वण्णिओ किंचि ।
कम्मप्पवादसुयसायरस्स णिस्सन्दमेत्तो दु ॥५२०॥

अर्थ: यह बन्धसमास अर्थात् प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश, इन चारों प्रकारके बन्धोंका संक्षेपसे कुछ कथन मैंने पिण्डरूपसे एकत्रित करके वर्णन किया है, जो कि कर्मप्रवाद नामक श्रुतसागरका निस्यन्द-मात्र अर्थात् सार-स्वरूप है ॥५२०॥


बंधविहाणसमासो रहओ अप्पसुयमंदमदिणा दु ।
तं बंधमोक्खकुसला पूरेदूणं परिकहंतु ॥५२१॥

अर्थ: इस बन्ध-विधान-समासको अल्पश्रुत और मन्दमति मैंने रचा है, सो इसे बन्ध और मोक्ष तत्त्वके जाननेमें जो कुशल आचार्य हैं, वे छूटे हुए अर्थको पूरा करके उसका व्याख्यान करें ॥५२१॥


[मूलगा०१०५] इय कम्मपयडिपगदं संखेवुद्दिट्ठणिच्छिदमहत्थं ।
जो उवजुंजइ बहुसो सो णाहिदि बंधमोक्खट्ठं ॥५२२॥

अर्थ: इसप्रकार शब्द-रचनाकी अपेक्षा संक्षेपसे कहे गये, किन्तु अर्थके प्रमाणकी अपेक्षा महान् इस प्रकृत कर्मप्रकृति अधिकारका बार-बार उपयोगपूर्वक अध्ययन, मनन एवं चिन्तन करता है, वह बन्ध और मोक्ष तत्त्वके अर्थको जान लेता है । अथवा कर्म-बन्धसे मुक्त होकर मोक्षरूप अर्थको प्राप्त कर लेता है ॥५२२॥

पञ्चम अधिकार: सप्ततिका (भाग 1/4)

सप्ततिका


'णमिऊण जिणिंदाणं वरकेवललद्धिसुक्खपत्ताणं ।
वोच्छं सत्तरिभंगं उवइट्ठं वीरणाहेण ॥१॥

अर्थ: उत्कृष्ट केवलज्ञानरूप लब्धिको तथा अतीन्द्रिय सुखको प्राप्त हुए जिनेन्द्रदेवोंको नमस्कार करके मैं श्री वीरनाथसे उपदिष्ट सप्ततिकासम्बन्धी भंगोंको कहूँगा ॥१॥


[मूलगा० १] ‘सिद्धपदेहि महत्थं बंधोदय-संत-पयदिठाणाणि ।
वोच्छं सुण संखेवेण णिस्संदं दिट्ठिवादादो’ ॥२॥

अर्थ: मैं संक्षेपसे बन्धप्रकृतिस्थान, उदयप्रकृतिस्थान और सत्त्वप्रकृतिस्थानोंको कहूँगा, सो हे भव्यो, तुम सुनो । यह संक्षेप कथन भी सिद्धपदोंके द्वारा कहा जानेसे महान् अर्थवाला है और दृष्टिवाद नामक बारहवें अङ्गका निस्यन्द अर्थात् निचोड़ या साररूप है ॥२॥


‘कदि बंधंतो वेयदि कइया कदि पयदिठाणकम्मंसा ।
मुलुत्तरपयडीसु य भंगवियप्पा दु बोद्धव्वा’ ॥३॥

अर्थ: कितनी प्रकृतियोंका बन्ध करता हुआ जीव कितनी प्रकृतियोंका वेदन करता है ? तथा कितनी प्रकृतियोंका बन्ध और वेदन करनेवाले जीवके कितनी प्रकृतियोंका सत्त्व रहता है ? इस प्रकार मूल और उत्तर प्रकृतियोंमें सम्भव भङ्गोंके भेद जानना चाहिए ॥३॥


अट्ठविह-सत्त-छव्बंधगेसु अट्ठेव उदयकम्मंसा ।
एयविहे तिवियप्पो एयवियप्पो अबंधम्मि ॥४॥

अर्थ: आठ, सात और छह प्रकृतिक बन्धस्थानवाले जीवोंमें आठ प्रकृतिक उदयस्थान और आठ प्रकृतिक सत्त्वस्थान पाया जाता है। एक प्रकृतिक बन्धस्थानवाले जीवके तीन विकल्प होते हैं-१ एक प्रकृतिकबन्ध स्थान, सात प्रकृतिक उदयस्थान और आठ प्रकृतिक सत्त्वस्थान; २ एक प्रकृतिक बन्धस्थान, सात प्रकृतिक उदयस्थान और सात प्रकृतिक सत्त्वस्थान; तथा ३ एक प्रकृतिक बन्धस्थान, चार प्रकृतिक उदयस्थान और चार प्रकृतिक सत्त्वस्थान। अबन्धस्थानमें चार प्रकृतिक उदयस्थान और चार प्रकृतिक सत्त्वस्थानरूप एक ही विकल्प होता है ॥४॥


[मूलगा० ४] सत्तट्ठ बंध अट्ठोदयंस तेरससु जीवठाणेसु ।
एक्कम्मि पंच भंगा दो भंगा होंति केवलिणो ॥५॥

अर्थ (गाथा 4 से 5): आदिके तेरह जीवसमासोंमें सात प्रकृतिक बन्धस्थान, आठ प्रकृतिक उदयस्थान और आठ प्रकृतिक सत्त्वस्थान; तथा आठ प्रकृतिक सत्त्वस्थान; तथा आठ प्रकृतिक बन्धस्थान, आठ प्रकृतिक उदयस्थान और आठ प्रकृतिक सत्त्वस्थान; ये दो भंग होते हैं। एक संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवसमासमें पाँच भंग होते हैं-१ आठके बन्धमें आठका उदय और आठका सत्त्व; २ सातके बन्धमें आठका उदय और आठका सत्त्व; ३ छहके बन्धमें आठका उदय और आठका सत्त्व; ४ एकके बन्धमें सातका उदय और आठका सत्त्व; ५ एकके बन्धमें सातका उदय और सातका सत्त्व । केवलीके दो भंग होते हैं-एकके बन्धमें चारका उदय और चारका सत्त्व; तथा अबन्धमें भी चारका उदय और चारका सत्त्व ॥५॥
इनकी अङ्कसंदृष्टि मूलमें दी है।


[मूलगा०५] अट्ठसु एयवियप्पो छसु वि गुणसण्णिदेसु दुवियप्पो ।
पत्तेयं पत्तेयं बंधोदयसंतकम्माणं ॥६॥

अर्थ: अन्तिम आठ गुणस्थानोंमें कर्मोंके बन्ध, उदय और सत्त्वस्थानोंका पृथक्-पृथक् एक-एक भंग होता है। तथा मिश्रगुणस्थानको छोड़कर प्रारम्भके छह गुणस्थानोंमें दो-दो भंग होते हैं॥६॥


१मूलपयडीसु एवं अत्थोगाढेण जिह विही भणिया ।
उत्तरपयडीसु एवं जहाविहिं जाण वोच्छामि ॥७॥

अर्थ: इस प्रकार अर्थके अवगाहन द्वारा मूल प्रकृतियोंमें जिस विधिसे बन्ध, उदय और सत्त्वके भंगोंका प्रतिपादन किया है, उसी विधिसे उत्तर प्रकृतियोंमें भी कहता हूँ, सो हे भव्य, तुम जानो ॥७॥


[मूलगा०६] २बंधोदय-कम्मंसा णाणावरवंतराइए पंच ।
बंधोवरमे वि तहा उदयंसा होंति पंचेव ॥८॥

अर्थ: ज्ञानावरण और अन्तराय कर्मकी पाँच-पाँच प्रकृतियोंका बन्ध दशवें गुणस्थान तक होता है, अतएव वहाँ तक उनका पाँच प्रकृतिक उदय और पाँच प्रकृतिक सत्त्वरूप एक-एक भंग पाया जाता है। दशवें गुणस्थानके अन्तिम समयमें उनके बन्धका अभाव हो जानेपर भी ग्यारहवें और बारहवें गुणस्थानमें उक्त दोनों कर्मोंका पाँच-पाँच प्रकृतिक उदय और पाँच-पाँच प्रकृतिक सत्त्वरूप एक-एक भंग पाया जाता है ॥८॥


णव छक्कं चत्तारि य तिण्णि य ठाणाणि दंसणावरणे ।
बंधे संते उदये दोण्णि य चत्तारि पंच वा होंति ॥९॥

अर्थ: दर्शनावरणके बन्ध और सत्त्वकी अपेक्षा नौ प्रकृतिक, छह प्रकृतिक और चार प्रकृतिक; ये तीन स्थान होते हैं। उदयकी अपेक्षा चार प्रकृतिक और पाँच प्रकृतिक; ये दो स्थान होते हैं ॥९॥


णव सव्वाओ छक्कं थीणतिगूणाइ दंसणावरणे ।
णिद्दा-पयलाहीणा चत्तारि य बंध-संताणं ॥१०॥

णेत्ताइंदंसणाणि य चत्तारि उदिंति दंसणावरणे ।
णिद्दादिपंचयस्स हि अण्णयरुदएण पंच वा जीवे ॥११॥

मिच्छम्मि सासणम्मि य सम्मे य णव होंति बंध-संतेहिं ।
तिन्हं पि णव संता मिस्साइ-अपुव्वपढमभायंते ॥१२॥

चउबंधयम्मि दुविहाऽऽपुव्वऽणियट्टीसु सुहुम-उवसमए ।
णव संता अणियट्टी-खवए सुहुमखवगम्मि छव्वेव ॥१३॥

अर्थ (गाथा 10 से 13): दर्शनावरण कर्मके नौ प्रकृतिक बन्ध और सत्त्वस्थानमें सभी प्रकृतियोंका बन्ध और सत्त्व होता है । छह प्रकृतिक स्थानमें स्त्यानगृद्धित्रिकके बिना शेष छहका बन्ध और सत्त्व होता है । तथा चार प्रकृतिक स्थानमें निद्रा और प्रचलाके बिना शेष चारका बन्ध और सत्त्व होता है । दर्शनावरण कर्मके चार प्रकृतिक उदयस्थानमें चक्षुर्दर्शनावरणादि चार प्रकृतियोंका उदय पाया जाता है । तथा पाँच प्रकृतिक उदयस्थानमें निद्रा आदि पाँच प्रकृतियोंमेंसे किसी एक प्रकृतिके उदयके साथ उक्त चार प्रकृतियोंका उदय पाया जाता है । मिथ्यात्व और सासादन गुणस्थानमें दर्शनावरण कर्मका नौ प्रकृतिक बन्ध और नौ प्रकृतिक सत्त्व रहता है । मिश्र गुणस्थानसे लेकर अपूर्वकरणके प्रथम भाग पर्यन्त छह प्रकृतिक बन्ध और नौ प्रकृतिक सत्त्व रहता है । अपूर्वकरणके दूसरे भागसे लेकर उपशामक और क्षपक दोनों प्रकारके अपूर्वकरण-अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें, तथा उपशामक सूक्ष्मसाम्परायमें चार प्रकृतिक बन्ध और नौ प्रकृतिक सत्त्व रहता है । अनिवृत्तिकरण क्षपक और सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकके चार प्रकृतिक बन्ध और छह प्रकृतिक सत्त्व रहता है ॥१०-१३॥


[मूलगा०८] ‘उवरयबंधे संते संता णव होंति छह खीणम्मि ।
खीणंते संतुदया चउ तेसु चयारि पंच वा उदयं’ ॥१४॥

अर्थ: उपरतबन्ध अर्थात् दर्शनावरणके बन्धका अभाव हो जाने पर उपशान्त मोहमें नौ प्रकृतिक सत्त्व होता है। क्षीणमोहके उपान्त्य समय तक छह प्रकृतिक सत्त्व और क्षीणमोहके अन्तिम समयमें चार प्रकृतिक सत्त्व और चार प्रकृतिक उदय रहता है। इससे पूर्ववर्ती गुणस्थानोंमें जाग्रत अवस्थामें चार प्रकृतिक और निद्रित दशामें पाँच प्रकृतिक उदय रहता है ॥१४॥


‘गोदेसु सत्त भंगा अट्ठ य भंगा हवंति वेयणिए ।
पण णव णव पण संखा आउचउक्के वि कमसो’ दु ॥१५॥

अर्थ: गोत्र कर्मके सात भंग होते हैं। तथा वेदनीय कर्मके आठ भंग होते हैं। आयु कर्मकी चारों प्रकृतियोंके क्रमसे पाँच नौ, नौ और पाँच भंग होते हैं ॥१५॥


उच्चुच्चमुच्च णीचं उच्चं च णीच णीचं च।
बंधं उदयम्मि चउसु वि संतुदयं सव्वणीचं च ॥१६॥

अर्थ: पंक्तिरचनाके क्रमसे प्रथम स्थानमें उच्चगोत्रका बन्ध और उच्चगोत्रका उदय लिखना। द्वितीय स्थानमें उच्चगोत्रका बन्ध और नीचगोत्रका उदय लिखना। तृतीय स्थानमें नीचगोत्रका बन्ध और उच्चगोत्रका उदय लिखना। चतुर्थस्थानमें नीचगोत्रका बन्ध और नीचगोत्रका उदय लिखना। इन चारों ही स्थानोंमें उच्च और नीच दोनों ही गोत्रोंका सत्त्व लिखना चाहिए। पाँचवें स्थानमें नीचगोत्रका बन्ध, नीचगोत्रका उदय और नीचगोत्रका सत्त्व लिखना चाहिए। इस प्रकार लिखनेपर गोत्रकर्मके पाँच भंग हो जाते हैं। इनकी संदृष्टि मूलमें दी है ॥१६॥


मिच्छम्मि पंच भंगा सासणसम्मम्मि आइमचउक्कं।
आइदुवं तीसुवरिं पंचसु एको तहा पढमो ॥१७॥

अर्थ: उक्त पाँच भंगोंमेंसे मिथ्यात्वगुणस्थानमें पाँचों ही भंग होते हैं । सासादनसम्यक्त्वगुणस्थानमें आदिके चार भंग होते हैं। मिश्र, अविरत और देशविरत, इन तीन गुणस्थानोंमें आदिके दो-दो भंग होते हैं । प्रमत्तसंयतादि पाँच गुणस्थानोंमें आदिका एक ही प्रथम भंग होता है ॥१७॥


बंधेण विणा पढमो उवसंताई अजोयदुच्चरिमम्हि ।
चरिमम्हि अजोयस्स उच्चं उदएण संतेण ॥१८॥

अर्थ: उपशान्तकषायगुणस्थानसे आदि लेकर अयोगिकेवली गुणस्थानके द्विचरम समय तक गोत्रकर्मके बन्धके बिना प्रथम भंग होता है। अयोगिकेवलीके चरम समयमें उदय और सत्त्वकी अपेक्षा एक उच्चगोत्र ही पाया जाता है ॥१८॥


वेदणीए गोदम्मि व पढमा भंगा हवंति चत्तारि ।
मिच्छादिपमत्तंते ते खलु सत्तसु वि आदिमा दोण्णि ॥१९॥

आइद्वयं णिब्बंधं दुचरिमसमयम्हि होइ य अजोगे ।
उदयं संतमसायं सायं पुणुवरिमसमयम्हि ॥२०॥

अर्थ (गाथा 19 से 20): गोत्रकर्मके समान वेदनीयकर्मके भी आदिके चार भंग होते हैं और वे निश्चयसे मिथ्यात्वगुणस्थानसे लेकर प्रमत्तसंयत गुणस्थान तक होते हैं। अप्रमत्तसंयतको आदि लेकर ऊपरके सात गुणस्थानोंमें आदिके दो भंग होते हैं। अयोगिकेवलीके द्विचरम समय तक वेदनीयके बन्ध विना असाताका उदय, दोनोंका सत्त्व, तथा साताका उदय, दोनोंका सत्त्व ये आदिके दो भंग होते हैं। पुनः अयोगिजिनके अन्तिम समयमें असाताका उदय, असाताका सत्त्व और साताका उदय, साताका सत्त्व, ये दो भंग होते हैं ॥१९-२०॥


णिरयाउस्स य उदए तिरिय-मणुयाउणऽबंध बंधे य ।
णिरयाउयं च संतं णिरयाई दोण्णि संताणि ॥२१॥

अर्थ: नवीन आयुके अबन्धकालमें नरकायुका उदय और नरकायुका सत्त्वरूप एक भंग होता है । तिर्यगायु या मनुष्यायुके बन्ध हो जाने पर नरकायुका उदय और नरकायुके सत्त्वके साथ तिर्यगायु और मनुष्यायुका सत्त्व पाया जाता है ॥२१॥


तिरियाउयस्स उदयए चउण्हमाउणऽबंध बंधे य ।
तिरियाउयं च संतं तिरियाई दोण्णि संताणि ॥२२॥

अर्थ: तिर्यंचायुके उदयमें और चारों आयुकर्मोंके अबन्धकालमें, तथा बन्धकालमें क्रमश: तिर्यंचायुकी सत्ता, और तिर्यंचायुके साथ नरकादि चारों आयुकर्मोंमेंसे एक-एक आयुकी सत्ता, इस प्रकार दो आयुकर्मोंकी सत्ता पायी जाती है ॥२२॥


मणुयाउस्स य उदए चउण्हमाऊणऽबंध बंधे य ।
मणुयाउयं च संतं मणुयाई दोण्णि संताणि ॥२३॥

अर्थ: मनुष्यायुके उदयमें और चारों आयुकर्मोंके अबन्धकालमें तथा बन्धकालमें क्रमशः मनुष्यायुकी सत्ता, एवं मनुष्यायुकी सत्ताके साथ नरकादि शेष चारों आयुकर्मोंमेंसे एक-एक आयुकी सत्ता; इस प्रकार दो आयुकर्मोंकी सत्ता पायी जाती है ॥२३॥


देवाउस्स य उदये तिरिय-मणुयाउणऽबंध बंधे य ।
देवाउयं च संतं देवाई दोण्णि संताणि ॥२४॥

अर्थ: देवायुके उदयमें और तिर्यग्आयु तथा मनुष्यायुके अबन्ध और बन्धकालमें क्रमशः देवायुकी सत्ता और देवायु-मनुष्यायु तथा देवायु-तिर्यगायुकी सत्ता पायी जाती है ॥२४॥


[मूलगा० १०] ‘बावीसमेकवीसं सत्तरस तेरसेव नव पंच ।
चउ-तिय-दुगं च एवं बंधट्ठाणाहि मोहस्स’ ॥२५॥

अर्थ: बाईसप्रकृतिक, इक्कीसप्रकृतिक, सत्रहप्रकृतिक, तेरहप्रकृतिक, नौप्रकृतिक, पाँचप्रकृतिक, चारप्रकृतिक, तीनप्रकृतिक, दोप्रकृतिक और एकप्रकृतिक; इस प्रकार मोहनीयकर्मके दश बन्धस्थान होते हैं ॥२५॥


मिच्छम्मि य बावीसा मिच्छा सोलह कसाय वेदो य ।
हस्सजुयलेक्कणिहाणेण विदिए दु मिच्छ-संढूणा ॥२६॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानमें मिथ्यात्व, सोलह कषाय, तीन वेदोंमेंसे कोई एक वेद, हास्य-रति और अरति-शोक इन दो युगलोंमेंसे कोई एक युगल, तथा भय और जुगुप्सा, इन बाईस प्रकृतियोंका बन्ध होता है। दूसरे गुणस्थानमें मिथ्यात्व और नपुंसकवेदके बिना शेष इक्कीस प्रकृतियोंका बन्ध होता है ॥२६॥


पढमचउक्केणित्थीरहिया मिस्से अविरयसम्मे य ।
बिदिएणूणा देसे छट्ठे तइऊण सत्तअट्ठे य ॥२७॥

अर्थ: प्रथम कषाय अनन्तानुबन्धिचतुष्क और स्त्रीवेदके बिना शेष सत्रह प्रकृतियोंका बन्ध मिश्र और अविरतसम्यक्त्व गुणस्थानमें होता है। द्वितीय कषायचतुष्कके बिना शेष तेरह प्रकृतियोंका बन्ध देशविरत गुणस्थानमें होता है। तृतीय कषायचतुष्कके बिना शेष नौ प्रकृतियोंका बन्ध छठे, सातवें और आठवें गुणस्थानमें होता है ॥२७॥


अरइ-सोएणूणा परम्मि पुंवेय-संजलणा ।
एगेगुणा एवं दह ठाणा मोहबंधम्मि ॥२८॥

अर्थ: अरति और शोकका बन्ध छठे गुणस्थान तक ही होता है। हास्य-रति और भय-जुगुप्साका बन्ध आठवें गुणस्थान तक होता है ! अतएव नवें गुणस्थानके प्रथम भागमें पुरुषवेद और संज्वलनचतुष्क, इन पाँच प्रकृतियोंका बन्ध होता है। नवें गुणस्थानके आगेके चार भागोंमें क्रमसे पुरुषवेद आदि एक-एक प्रकृतिका बन्ध कम होता जाता है, अतः चार, तीन, दो और एक प्रकृतिक स्थानोंका बन्ध उन भागोंमें होता है। इस प्रकार मोहनीय कर्मके बन्धके विषयमें उक्त दश स्थान होते हैं ॥२८॥


छव्वावीसे चउ इगिवीसे सत्तरस तेर दो दोसु ।
णवबंधए वि दोण्णि य एगेगमदो परं भंगा ॥२९॥

अर्थ: बाईसप्रकृतिक बन्धस्थानके छह भंग होते हैं। इक्कीसप्रकृतिक बन्धस्थानके चार भङ्ग होते हैं। सत्तरह और तेरह प्रकृतिक बन्धस्थानके दो दो भङ्ग होते हैं। नौप्रकृतिक बन्धस्थानके भी दो भङ्ग होते हैं। इससे परवर्ती पाँचप्रकृतिक आदि शेष बन्धस्थानोंका एक एक भङ्ग होता है ॥२९॥


[मूलगा० १२] 'एक्कं च दो व चत्तारि तदो एयाधिया दसुक्कस्सं ।
ओघेण मोहणिज्जे उदयट्ठाणानि णव होंति ॥३०॥

अर्थ: ओघकी अपेक्षा मोहनीय कर्मके उदयस्थान नौ होते हैं। गाथामें उनका निर्देश पश्चादानुपूर्वीसे किया गया है, किन्तु कथनकी सुविधासे उन्हें इस प्रकार जानना चाहिए-दशप्रकृतिक, नौप्रकृतिक, आठप्रकृतिक, सातप्रकृतिक, छहप्रकृतिक, पाँचप्रकृतिक, चारप्रकृतिक, दोप्रकृतिक और एकप्रकृतिक; इस प्रकार मोहकर्मके सर्व उदयस्थान नौ होते हैं ॥३०॥


"मिच्छा कोहचउक्कं अण्णदरं तिवेद एक्कयरं ।
हस्सादिजुगस्सेयं भयणिंदा होंति दस उदया ॥३१॥

"मिच्छत्तण कोहाई विदियं तदियं च हापणं कमसो ।
भयजुगलेगं दोण्णि य हरसाई वेदेकविरहिएसु

अर्थ (गाथा 31 से 32): मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धी आदि चारों जातिकी सोलह कषायोंमेंसे कोई एक क्रोधादि-चतुष्क, तीन वेदोंमेंसे कोई एक वेद, हास्य-रति और अरति-शोक, इन दो युगलोंमेंसे कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा, इन दश प्रकृतियोंका उदय एक जीवमें एक साथ मिथ्यात्वगुणस्थानमें होता है । इस दशप्रकृतिक उदयस्थानमेंसे मिथ्यात्वके कम कर देने पर शेष नौ प्रकृतियोंका उदय दूसरे गुणस्थानमें होता है । नौप्रकृतिक उदयस्थानमेंसे अनन्तानुबन्धी क्रोधादि एक कषायके कम कर देने पर शेष आठ प्रकृतियोंका उदय तीसरे और चौथे गुणस्थानमें होता है । पुनः क्रमसे दूसरी और तीसरी कषायके कम कर देने पर सात प्रकृतियोंका उदय पाँचवें गुणस्थानमें और छह प्रकृतियोंका उदय छठे सातवें और आठवें गुणस्थानमें होता है । पुनः भययुगलमेंसे एकके कम कर देने पर पाँच प्रकृतियोंका और दोनोंके कम कर देने पर चार प्रकृतियोंका उदय भी छठे, सातवें और आठवें गुणस्थानोंमें होता है । पुनः हास्ययुगलके कम कर देने पर पुरुषवेद और कोई एक संज्वलन कषाय इन दो प्रकृतियोंका उदय नवें गुणस्थानके सवेद भाग तक होता है । पुनः पुरुषवेदके भी कम कर देने पर एकप्रकृतिक उदयस्थान नवें गुणस्थानके अवेद भागसे लेकर दशवें गुणस्थानके अन्तिम समय तक होता है ॥३१-३२॥ इस प्रकार दशप्रकृतिक उदयस्थानमेंसे क्रमशः मिथ्यात्व आदिके कम करने पर शेष नौ, आठ आदि प्रकृतिक उदयस्थान हो जाते हैं । उनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-१०।६।८।७।६।५।४।२।१।


‘अट्ठ य सत्त य छक्कय चउ तिय दुय एय अहियवीसा य ।
तेरे वारेयारं एत्तो पंचादि एगूणं’ ॥३३॥

अर्थ: अट्ठाईस, सत्ताइस, छब्बीस, तेईस, बाईस, इक्कीस, तेरह, बारह, ग्यारह, पाँच, चार, तीन, दो और एक प्रकृतिक, इस प्रकार मोहकर्मकी प्रकृतियोंके पन्द्रह सत्त्वस्थान होते हैं ॥३३॥ इन सत्त्वस्थानोंकी अङ्कसंदृष्टि इस प्रकार है-२८, २७, २६, २४, २३, २२, २१, १३, १२, ११, ५, ४, ३, २, १ ।


संतस्स पयडिट्ठाणाणि ताणि मोहस्स होंति पण्णरसं ।
बंधोदय-संते पुणु भंगवियप्पा बहुं जाणे ॥३४॥

अर्थ: उक्त बन्धस्थान, उदयस्थान और सत्तास्थानोंकी अपेक्षा मोहकर्मके भङ्गोंके बहुतसे विकल्प होते हैं, उन्हें जानना चाहिए ॥३४॥


'मोहे संता सव्वा वीसा पुण सत्त-छहिदि संजुत्ता ।
उव्विल्लियमम्मि सम्मे सम्मामिच्छे य अट्ठवीसाओ ॥३५॥

खविए अणकोहाई मिच्छे मिस्से य सम्म अड्कसाए ।
संडित्थि हस्सछक्के पुरिसे संजलणकोहाई ॥३६॥

अर्थ (गाथा 35 से 36): अट्ठाईस प्रकृतिक सत्तास्थानमें मोहकर्मकी सभी प्रकृतियोंकी सत्ता होती है। पुनः अट्ठाईस प्रकृतिक सत्तास्थानमेंसे सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना होनेपर सत्ताईसप्रकृतिक सत्तास्थान होता है। पुनः सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना करनेपर सादिमिथ्यादृष्टिके अथवा अनादिमिथ्यादृष्टिके छब्बीस प्रकृतिक सत्तास्थान होता है। पुनः अट्ठाईस प्रकृतिक सत्तास्थानोंमेंसे अनन्तानुबन्धी क्रोधादि चतुष्कके क्षपित अर्थात् विसंयोजित कर देनेपर चौबीसप्रकृतिक सत्तास्थान होता है। पुनः मिथ्यात्वके क्षय करनेपर तेईसप्रकृतिक सम्यग्मिथ्यात्वके क्षय करनेपर बाईसप्रकृतिक और सम्यक्त्वप्रकृतिके क्षय कर देनेपर इक्कीसप्रकृतिक सत्तास्थान होता है। तदनन्तर आठ मध्यमकषायोंके क्षय होनेपर तेरहप्रकृतिक सत्तास्थान होता है। पुनः नपुंसकवेदके क्षय होनेपर बारह प्रकृतिक, स्त्रीवेदके क्षय होनेपर ग्यारहप्रकृतिक और हास्यादि छह प्रकृतियोंके क्षय होनेपर पाँच प्रकृतिक सत्तास्थान होता है। पुनः पुरुषवेदके क्षय होनेपर चार प्रकृतिक सत्तास्थान होता है। तदनन्तर संज्वलन क्रोधके क्षय होनेपर तीनप्रकृतिक, संज्वलनमानके क्षय होनेपर दोप्रकृतिक और संज्वलन मायाके क्षय होनेपर एकप्रकृतिक सत्तास्थान होता है ॥३५-३६॥ तथा उपर्युक्त बन्धस्थानोंके भय-रहित निन्दा अर्थात् जुगुप्सा-रहित और दोनोंसे रहित, इस प्रकार तीन-तीन अन्य भी उदयस्थान एक-एकके ऊपर जानना चाहिए ॥३६॥


तिण्णेगे एगेगं दो मिस्से चदुसु पण णियट्ठीए ।
तिण्णि य थूलेकारं सुहुमे चत्तारि तिण्णि उवसंते’ ॥३७॥

अर्थ: मोहनीयकर्मके बाईस आदिक पाँच बन्धस्थानोंमें दश आदिक पाँच उदयस्थान होते हैं । शेष बन्धस्थानोंमेंसे पाँचप्रकृतिक बन्धस्थानमें दोप्रकृतिक उदयस्थान होता है । चारप्रकृतिक बन्धस्थानमें दोप्रकृतिक उदयस्थान होता है । इससे आगेके तीन, दो और एक प्रकृतिक बन्धस्थानमें एकप्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए । दशवें गुणस्थानमें जहाँ मोहकी किसी प्रकृतिका बन्ध नहीं होता, वहाँपर एकप्रकृतिक उदयस्थान होता है ॥३७॥ इनकी अंकसंदृष्टि मूलमें दी है ।


'अणरहिओ पढमिल्लो तइओ दो मिस्स-सम्मदहिया दु ।
दंसणजुत्ते सेसे अण्णो भंगो हवेज्ज दस एदे ॥३८॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानमें मोहनीयकर्मका बाईस प्रकृतिक प्रथम बन्धस्थान अनन्तानुबन्धीके उदयसे रहित भी होता है; क्योंकि अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करनेवाला वेदकसम्यग्दृष्टि यदि मिथ्यात्वकर्मके उदयसे मिथ्यात्वगुणस्थानको प्राप्त हो, तो एक आवलीकालपर्यन्त उसके अनन्तानुबन्धीका उदय नहीं होता है, ऐसा नियम है । अतएव बाईस प्रकृतिक बन्धस्थानमें दश प्रकृतिक उदयस्थानके अतिरिक्त नौप्रकृतिक भी उदयस्थान होता है । इक्कीस प्रकृतिक दूसरे बन्धस्थानमें मिथ्यात्वके बिना शेष नौ प्रकृतियोंके उदयवाला स्थान होता है । सत्रह प्रकृतियोंके बन्धवाले तीसरे और चौथे गुणस्थानमें मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीके बिना शेष आठप्रकृतिक उदयस्थान तथा तीसरेमें मिश्रप्रकृतिका और चौथेमें सम्यक्त्वप्रकृतिका उदय बढ़ जानेसे नौ प्रकृतिक उदयस्थान भी होता है । सम्यक्त्वसहित शेष गुणस्थानोंमें अर्थात् पाँचवें, छठे और सातवेंमें उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोंके सम्यक्त्वप्रकृतिके उदयसे रहित एक-एक भङ्ग और भी होता है । अतएव वक्ष्यमाण प्रकारसे दश भङ्ग उदयस्थानसम्बन्धी जानना चाहिए ॥३८॥


'भयरहिया णिंदूणा जुगळूणा हुंति तिण्णि तिण्णेव ।
अण्णे वि तेसिमुदया एक्केक्कस्सोवरिं जाण ॥३९॥


'दस बावीसे णव इगिवीसे सत्तादि उदय-कम्मंसा ।
छादी णव सत्तरसे तेरे पंचादि अट्ठेव ॥४०॥

चत्तारि-आदिणवबंधएसु उक्कस्स सत्तमुदयंसा ।
चत्तालभिमेसुदया बंधट्ठाणेसु पंचसु वि ॥४१॥

अर्थ (गाथा 40 से 41): बाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें सातको आदि लेकर दश तकके उदयस्थान होते हैं। इक्कीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें सातको आदि लेकर नौ तकके उदयस्थान होते हैं। सत्तरहप्रकृतिक बन्धस्थानमें छहको आदि लेकर नौ तकके उदयस्थान होते हैं। और तेरहप्रकृतिक बन्धस्थानमें पाँचको आदि लेकर आठ तकके उदयस्थान होते हैं। नौ प्रकृतियोंका बन्ध करने वाले जीवोंके चार प्रकृतिक उदयस्थानको आदि लेकर उत्कर्षसे सातप्रकृतिक तकके उदयस्थान होते हैं। इस प्रकार इन पाँच बन्धस्थानों मोहप्रकृतियोंके उदयस्थान चालीस होते हैं ॥४०-४१॥


जुगवेदकसाएहिं दुय-तिय-चउहिं भवंति संगुणिंया ।
चउवीस वियप्पा ते उदया सव्वे वि पत्तेयं ॥४२॥

अर्थ: हास्यादि दो युगल, तीन वेद और चार कषाय इनके परस्पर संगुणित करने पर चौबीस भङ्ग होते हैं। इनसे उपर्युक्त चालीस भङ्गोंको गुणित कर देने पर उदयस्थानोंके सर्व भङ्गोंका योग आ जाता है ॥४२॥ इस प्रकार पाँच बन्धस्थानोंके चालीस उदयस्थानोंको चौबीस भङ्गोंसे गुणा करने पर (४० x २४=९६०) सर्व उदयस्थान विकल्प नौ सौ साठ उपलब्ध होते हैं।


वेदाहया कसाया भवंति भंगा दुवारदुगउदए ।
चउ-तिय-दुग एगेगं पंचसु एगोदएसु तदो ॥४३॥

अर्थ: द्विक-उदयमें अर्थात् अनिवृत्तिकरणके पाँच प्रकृतिक और चार प्रकृतिक बन्धस्थानमें जहाँ पर तीनों वेदोंमेंसे किसी एक वेद और चारों कषायोंमेंसे किसी एक कषायका उदय होता है, वहाँ पर तीनों वेदों और चारों कषायोंके परस्पर बारह बारह भङ्ग होते हैं । एक प्रकृतिके उदय वाले पाँचप्रकृतिक बन्धस्थानमें पर्याप्तावस्था अथवा अनिवृत्तिकरणके चरम समयमें, तीन, दो, एक प्रकृतिक बन्धस्थानमें और किसी भी प्रकृतिका बन्ध नहीं करनेवाले ऐसे अबन्धकस्थानमें क्रमसे चार, तीन, दो, एक और एक भङ्ग होते हैं ॥४३॥


‘दसगादि-उदयठाणानि भणियाणि मोहणीयस्स ।
पंचूणयं सहस्सं उदयवियप्पा हवंति ते चेव ॥४४॥’

अर्थ: मोहनीयकर्मके दशप्रकृतियोंको आदि लेकर एक प्रकृति पर्यन्त जो दश उदयस्थान कहे गये हैं उनके उदयस्थान-सम्बन्धी सर्व विकल्प पाँच कम एक हजार अर्थात् ९६५ होते हैं ॥४४॥


'पुव्वुत्ता जे उदया संगुणिया तेसिं उदयपयडीहिं ।
चउवीसा आदीहिं य सगेहिं भंगेहिं होंति पदबंधा ॥४५॥

अर्थ: जो पहले दशप्रकृतिक आदि उदयस्थान कहे गये हैं, उन्हें पहले उदय होनेवाली प्रकृतियोंसे गुणित करे । पुनः चौबीस आदि स्व-स्व भंगोंसे गुणित करनेपर सर्वपदबन्ध अर्थात् भंग आ जाते हैं । उनका परिमाण ६६७१ है ॥४५॥


णवपंचणउदिसया उदयवियप्पेहिं मोहिया जीवा ।
ऊणसरि-एयत्तरिपयबंधसएहिं विण्णेया ॥४६॥

अर्थ: सर्व संसारी जीव नौ सौ पंचानवे उदय-विकल्पोंसे तथा उनहत्तर सौ इकहत्तर अर्थात् छह हजार नौ सौ इकहत्तर भंगरुप पदबन्धोंसे मोहित हो रहे हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥४६॥


'पढमे विदिए तीसु वि पंचाई बंधउवरदे कमसो ।
कमसो तिणि य एगं पंचय छह सत्त चत्तारि ॥४७॥

अर्थ: प्रथम बन्धस्थानमें, द्वितीय बन्धस्थानमें, तदनन्तर क्रमशः तीन बन्धस्थानोंमें, पुनः पंच आदि एक पर्यन्त बन्धस्थानोंमें और उपरतबन्धमें क्रमसे तीन, एक, पाँच, छह, सात और चार सत्त्वस्थान होते हैं ॥४७॥


[मूलगा० १७] *आहतियं बावीसे इगवीसे अट्ठवीस कम्मंसा ।
सत्तरस तेरस णव बंधए अड-चउ-तिग-दुगेगहियवीसां ॥४८॥

अर्थ: बाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें आदिके तीन सत्त्वस्थान होते हैं। इक्कीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें अट्ठाईस प्रकृतिक एक सत्त्वस्थान होता है। सत्रह प्रकृतिक, तेरह प्रकृतिक और नवप्रकृतिक बन्धस्थानमें अट्ठाईस, चौबीस, तेईस, बाईस और इक्कीस प्रकृतिक पाँच-पाँच सत्त्वस्थान होते हैं ॥४८॥


[मूलगा० ४८] ‘पंचविहे अड-चउ-एगहियवीसा तेर-बारसेगारं ।
चउविहबंधे संता पंचहिया होंति ते चेव’ ॥४९॥

अर्थ: पाँच प्रकृतिक बन्धस्थानमें अट्ठाईस, चौबीस, इक्कीस, तेरह, बारह और ग्यारह ये छह सत्त्वस्थान होते हैं। चार प्रकृतिक बन्धस्थानमें पाँच प्रकृतिक सत्त्वस्थानसे अधिक वे ही छह अर्थात् सात सत्त्वस्थान होते हैं ॥४९॥


सेसेसु अबंधम्मि य संता अट्ठ-चउर-एगहियवीसा ।
ते पुण अहिया णेया कमसो चउ-तिय-दुगेगेण ॥५०॥

अर्थ: शेष तीन, दो और एक बन्धस्थानमें और अबन्धक स्थानमें क्रमशः चार, तीन, दो और एक प्रकृतिक सत्त्वस्थानसे अधिक अट्ठाईस, चौबीस और इक्कीस प्रकृतिक ये चार-चार सत्त्वस्थान होते हैं ॥५०॥ होता है, उसके अनन्तानुबन्धि-चतुष्क और मिथ्यात्व, इन पाँचके क्षय हो जाने पर तेईसप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है । पुनः उसीके सम्यग्मिथ्यात्वका क्षय हो जाने पर बाईसप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है । यह बाईसप्रकृतिक सत्त्वस्थान कृतकृत्य वेदकसम्यग्दृष्टि जीव की अपेक्षा चारों ही गतियोंमें सम्भव है । इसी प्रकार आठप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए भी सम्यग्मिथ्यादृष्टि और अविरतसम्यग्दृष्टि जीवोंके क्रमशः पूर्वोक्त तीन और पाँच सत्त्वस्थान होते हैं । नौ प्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए भी इसी प्रकार जानना चाहिए । किन्तु अविरतोंमें नौप्रकृतिक उदयस्थान वेदकसम्यग्दृष्टियोंके ही होता है और वेदकसम्यग्दृष्टियोंके अट्ठाईस, चौबीस, तेईस और बाईस प्रकृतिक चार सत्त्वस्थान पाये जाते हैं, अतः यहाँ पर भी उक्त चार सत्तास्थान होते हैं । सम्यग्मिथ्यादृष्टिके सत्तरहप्रकृतिक बन्धस्थान, सात, आठ और नौप्रकृतिक तीन उदयस्थान तथा अट्ठाईस, सत्ताईस और चौबीस प्रकृतिक तीन सत्तास्थान होते हैं । अविरतसम्यग्दृष्टियोंमें उपशमसम्यग्दृष्टिके सत्तरहप्रकृतिक एक बन्धस्थान, छह, सात और आठ प्रकृतिक तीन उदयस्थान, तथा अट्ठाईस और चौबीस प्रकृतिक दो सत्तास्थान होते हैं । क्षायिकसम्यग्दृष्टिके सत्तरह प्रकृतिक एक बन्धस्थान, छह, सात और आठ प्रकृतिक तीन उदयस्थान, तथा इक्कीसप्रकृतिक एक सत्तास्थान होता है । वेदकसम्यग्दृष्टिके सत्तरहप्रकृतिक एक बन्धस्थान सात, आठ और नौ प्रकृतिक तीन उदयस्थान, तथा अट्ठाईस, चौबीस, तेईस और बाईस प्रकृतिक चार सत्तास्थान होते हैं । तेरहप्रकृतिक बन्धस्थानमें अट्ठाईस, चौबीस, तेईस, बाईस और इक्कीस प्रकृतिक पाँच सत्त्वस्थान होते हैं । तेरह प्रकृतियोंका बन्ध देशविरतोंके होता है । वे दो प्रकारके होते हैं-एक तिर्यंच, दूसरे मनुष्य । इनमें जो तिर्यंच देशविरत हैं, उनके चारों ही उदयस्थानोंमें अट्ठाईस और चौबीस प्रकृतिक दो सत्त्वस्थान होते हैं । इनमेंसे अट्ठाईसप्रकृतिक सत्त्वस्थान तो उपशमसम्यग्दृष्टि और वेदकसम्यग्दृष्टि इन दोनों प्रकारके देशविरत तिर्यंचोंके होता है । उसमें भी जो प्रथमोपशमसम्यक्त्वको उत्पन्न करनेके समय ही देशविरतिको प्राप्त करता है, उसी देशविरतके उपशमसम्यक्त्वके रहते हुए अट्ठाईसप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है । जो देशविरत मनुष्य हैं उनके पाँच प्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए अट्ठाईस, चौबीस और इक्कीस प्रकृतिक तीन सत्त्वस्थान होते हैं । छहप्रकृतिक और सातप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए प्रत्येकमें अट्ठाईस, चौबीस, तेईस और इक्कीस प्रकृतिक पाँच सत्त्वस्थान होते हैं । तथा आठप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए अट्ठाईस, चौबीस, तेईस और बाईस प्रकृतिक चार सत्त्वस्थान होते हैं । नौ प्रकृतिक बन्धस्थान प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत जीवोंके होता है । इनके चार, पाँच, छह और सात प्रकृतिक चार उदयस्थान होते हैं । इनमेंसे चार प्रकृतिक उदयस्थानके साथ दोनों गुणस्थानोंमें अट्ठाईस, चौबीस और इक्कीस प्रकृतिक तीन ही सत्त्वस्थान होते हैं; क्योंकि यह उदयस्थान उपशमसम्यग्दृष्टि और क्षायिकसम्यग्दृष्टिके ही होता है । पाँच और छह प्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए पाँच-पाँच सत्त्वस्थान होते हैं, क्योंकि ये उदयस्थान तीनों प्रकारके सम्यग्दृष्टि जीवोंके सम्भव हैं । किन्तु सातप्रकृतिक उदयस्थान वेदकसम्यग्दृष्टि जीवके ही होता है । अतएव यहाँ इक्कीसप्रकृतिक सत्त्वस्थानसम्भव नहीं है; शेष चार ही सत्त्वस्थान होते हैं । पाँच प्रकृतिक बन्धस्थानमें द्विकप्रकृतिक एक उदयस्थान और अट्ठाईस, चौबीस, इक्कीस, तेरह, बारह और ग्यारह ये छह सत्तास्थान होते हैं । इनमेंसे उपशमश्रेणीकी अपेक्षा आदिके तीन सत्तास्थान पाये जाते हैं । तथा क्षपकश्रेणीकी अपेक्षा इक्कीस, तेरह, बारह और ग्यारह ये चार सत्तास्थान होते हैं । जिस अनिवृत्तिबादरसंयतने आठ मध्यम कषायोंका क्षय नहीं किया, उसके इक्कीसप्रकृतिक सत्तास्थान होता है । उसीके आठ कषायोंका क्षय होने पर तेरह प्रकृतिक सत्तास्थान होता है । पुनः नपुंसकवेदका क्षय होने पर बारहप्रकृतिक सत्तास्थान होता


[मूलगा० २०] ‘दस णव पण्णरसाइ बंधोदयसंतपयदिठाणाणि ।
भणियाणि मोहणिज्जे इत्तो णामं परं वोच्छं’ ॥५१॥

अर्थ: इस प्रकार मोहनीयकर्मके दश बन्धस्थान, नौ उदयस्थान और पन्द्रह सत्त्वस्थान कहे। अब इससे आगे नामकर्मके बन्धस्थान, उदयस्थान और सत्त्वस्थानोंको कहेंगे ॥५१॥


[मूलगा० २१] ‘तेवीसं पणुवीसं छव्वीसं अट्ठवीसमुगुत्तीसं ।
तीसकतीसमेगं बंधट्ठाणाणि णामस्स’ ॥५२॥

अर्थ: नाम कर्मके तेईस, पच्चीस, छव्वीस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस, इकतीस और एक प्रकृतिक, इस प्रकार ये आठ बन्धस्थान होते हैं ॥५२॥


१इगि पंच तिण्णि पंचय बंधट्ठाणा हवंति णामस्स ।
णिरयगइ तिरिय मणुया देवगईसंजुआ होंति ॥५३॥

अर्थ: नरकगतिसंयुक्त नामकर्मका एक बन्धस्थान है। तिर्यंचगतिसंयुक्त नामकर्मके पाँच बन्धस्थान हैं। मनुष्यगतिसंयुक्त नामकर्मके तीन बन्धस्थान हैं और देवगतिसंयुक्त नामकर्मके पाँच बन्धस्थान होते हैं ॥५३॥


अट्ठावीसं णिरए तेवीसं पंचवीस छब्बीसं ।
उणतीसं तीसं च हि तिरियगईसंजुआ पंच ॥५४॥

अर्थ: नरकगतिके साथ बँधनेवाला नामकर्मका अट्ठाईसप्रकृतिक एक बन्धस्थान है। तेईस, पच्चीस, छब्बीस, उनतीस और तीस प्रकृतिक पाँच बन्धस्थान तिर्यंचगति-संयुक्त बँधते हैं ॥५४॥


पणुवीसं उणतीसं तीसं च तिण्णि हुंति मणुयगई ।
२देवगईए चउरो एकत्तीसादि णिग्गदी एयं ॥५५॥

अर्थ: मनुष्यगतिके साथ नामकर्मके पच्चीस, उनतीस और तीस प्रकृतिक तीन स्थान बँधते हैं। देवगतिके साथ इकतीस प्रकृतिक स्थानको आदि लेकर चार स्थान बँधते हैं। एकप्रकृतिक स्थान गति-रहित बँधता है ॥५५॥


णिरयदुगं पंचिंदिय वेउव्विय तेउ कम्म णामं च ।
वेउव्वियंगवंगं वण्णचउक्कं तहा हुंडं ॥५६॥

अगुरुलहुअचउक्कं तसचउ असुहं च अप्पसत्थगई ।
अत्थिर दुब्भग दुस्सर अणाइजं चेव णिमिणं च ॥५७॥

अज्जसकित्ती य तहा अट्ठावीसा हवंति णायव्वा ।
णिरयगईसंजुत्तं मिच्छादिट्ठी दु बंधंति ॥५८॥

अर्थ (गाथा 56 से 58): अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें नरकद्विक (नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी) पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वैक्रियिकशरीर-अंगोपांग, वर्णचतुष्क, (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श नामकर्म) हुण्डकसंस्थान, अगुरुलघुचतुष्क (अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास), त्रस चतुष्क (त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर) अशुभ, अप्रशस्तविहायोगति, अस्थिर, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, निर्माण और अयशः कीर्ति; ये अट्ठाईस प्रकृतियाँ जानना चाहिए। इन प्रकृतियोंका नरकगतिसंयुक्त बन्ध मिथ्यादृष्टि मनुष्य या तिर्यञ्च करते हैं ॥५६-५८॥


तत्थ य पढमं तीसं तिरियदुगोराल तेज कम्मं च ।
पंचिंदियजाई वि य छस्संठाणाणमेयदरं ॥५९॥

ओरालयंगवंगं छस्संठाणाणमेयदरं ।
वण्णचउक्कं च तहा अगुरुलहुयं च चत्तारि ॥६०॥

उज्जोउ तसचउक्कं थिराइछज्जुयलाणमेयदर णिमिणं ।
बंधइ मिच्छादिट्ठी एयदरं दो विहायगदी ॥६१॥

अर्थ (गाथा 59 से 61): तिर्यग्द्विक ( तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी ), औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, पंचेन्द्रियजाति, छह संस्थानोंमेंसे कोई एक, औदारिकशरीर-अंगोपांग, छह संहननोंमेंसे कोई एक, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, उद्योत, त्रसचतुष्क, (स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, सुभग-दुर्भग, सुस्वर-दुःस्वर, आदेय-अनादेय और यशःकीर्त्ति-अयशःकीर्ति इन) स्थिरादि छह युगलोंमेंसे कोई एक-एक, निर्माण, दो विहायोगतियोंमेंसे कोई एक, इन प्रथम प्रकारवाली तीस प्रकृतियोंको नारकी मिथ्यादृष्टि जीव बाँधता है ॥५९-६१॥


'एमेव विदियतीसं णवरि असंपत्त हुंडसंठाणं ।
अवणिज्जेत्ता एयदरं सासणसम्मो दु बंधेइ ॥६२॥

अर्थ: इसी प्रकार द्वितीय तीसप्रकृतिक बन्धस्थान होता है । विशेषता केवल यह है कि उसमें प्रथम तीसमेंसे असम्प्राप्तसृपाटिकासंहनन और हुंडकसंस्थान इन दोको निकाल देना चाहिए ! अर्थात् छह संस्थान और छह संहननके स्थानपर पाँच संस्थान और पाँच संहननमेंसे कोई एकको ग्रहण करना चाहिए। इस द्वितीय तीसप्रकृतिक स्थानको सासादन सम्यग्दृष्टि जीव बाँधता है ॥६२॥


तह य तदीयं तीसं तिरियदुगोराल तेज कम्मं च ।
ओरालियंगवंगं हुंडमसंपत्त वण्णचउं ॥६३॥

अगुरुयलहुयचउक्कं तसचउउओवमप्पसत्थगई ।
थिर-सुह-जसजुगलाणं तिण्णेयदरं अणादेज्जं ॥६४॥

दुब्भग-दुस्सर-णिमिणं वियलिंदियजाइ एयदरमेव ।
एयाओ पयडीओ मिच्छादिट्ठी दु बंधंति ॥६५॥

अर्थ (गाथा 63 से 65): इसी प्रकार तीसप्रकृतिक तृतीय बन्धस्थान है। उसकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-तिर्यग्द्विक, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, औदारिकशरीर-अंगोपांग हुंडकसंस्थान, असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, त्रसचतुष्क, उद्योत, अप्रशस्तविहायोगति, स्थिर, शुभ और यशःकीर्ति; इन तीन युगलोंमेंसे कोई एक एक; अनादेय, दुर्भग, दुःस्वर, निर्माण और विकलेन्द्रियजातियोंमेंसे कोई एक, इन प्रकृतियोंको मिथ्यादृष्टि मनुष्य या तिर्यंच ही बाँधते हैं ॥६३-६५॥


जह तिण्हं तीसाणं तह चेव य तिण्णि ऊणतीसं तु ।
णवरि विसेसो जाणे उज्जोवं णत्थि सव्वत्थ ॥६६॥

अर्थ: जिस प्रकारसे तीन प्रकारके तीसप्रकृतिक बन्धस्थानोंका निरूपण किया है, उसी प्रकारसे तीन प्रकारके उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थान भी होते हैं। केवल विशेषता यह है कि उन सभीमें उद्योतप्रकृति नहीं होती है ॥६६॥ इन तीनों ही प्रकारके उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थानोंके भंग पूर्वोक्त ४६०८ और २४ ही होते हैं ।


तत्थ इमं छव्वीसं तिरियदुगोराल तेय कम्मं च ।
एगिंदिय वण्णचउ अगुरुलहुयचउक्कं होई हुंडं च ॥६७॥

आदावुजोवाणमेयदर थावर बादरयं ।
पज्जत्तं पत्तेयं थिराथिराणं च एयदरं ॥६८॥

एयदरं च सुहासुह दुब्भग जसजुयलमेयदर णिमिणं ।
अणादिज्जं चेव तहा मिच्छादिट्ठी दु बंधंति ॥६९॥

अर्थ (गाथा 67 से 69): छब्बीसप्रकृतिक बन्धस्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-तिर्यग्द्विक, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, एकेन्द्रियजाति, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, हुंडकसंस्थान, आतप, और उद्योतमेंसे कोई एक, स्थावर, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर-अस्थिरमेंसे कोई एक, शुभ-अशुभमेंसे कोई एक, दुर्भाग और यशःकीर्तियुगलमेंसे कोई एक, निर्माण और अनादेय, इन छब्बीस प्रकृतियोंको एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न होनेवाले मिथ्यादृष्टि देव बाँधते हैं ॥६७-६९॥ यहाँपर एकेन्द्रियमें अंगोपांगनामकर्मका उदय नहीं होता है, क्योंकि उनके हस्त, पाद आदि आठ अंगोंका अभाव है। उनके संस्थान भी एक हुंडक ही होता है। अतः आतप उद्योत, स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ और यशःकीर्ति-अयशःकीर्ति युगलोंको परस्पर गुणा करनेपर (२ x २ x २ x २ = १६) सोलह भंग होते हैं।


१जह* छव्वीसं ठाणं तह चेव य होइ पढमपणुवीसं ।
णवरि विसेसो जाणे उज्जोवादावरहियं तु ॥७०॥

बादर सुहुमेकदरं साहारणपत्तेयं च एकदरं ।
संजुत्तं तह चेव य मिच्छाद्दिट्ठी दु बंधंति ॥७१॥

अर्थ (गाथा 70 से 71): जिस प्रकार छब्बीसप्रकृतिक स्थान है, उस ही प्रकार प्रथम पचीसप्रकृतिक स्थान जानना चाहिए। विशेषता केवल यह है कि वह उद्योत और आतप, इन दो प्रकृतियोंसे रहित होता है। इस स्थानको बादर-सूक्ष्मोंमेंसे किसी एकसे संयुक्त, तथा साधारण-प्रत्येकशरीरमेंसे किसी एकसे संयुक्त मिथ्यादृष्टि जीव बाँधते हैं ॥७०-७१॥


३बिदियपणुवीसट्ठाणं तिरियदुगोराल तेय कम्मं च ।
वियलिंदिय-पंचिंदिय एथदरं हुंडसंठाणं ॥७२॥

ओरालियंगवंगं वण्णचउक्कं तहा अपज्जत्तं ।
अगुरुलहुगुवघायं तस वायरयं असंपत्तं ॥७३॥

पत्तेयमथिरमसुहं दुभगमणादेज्ज अजस णिमिणं च ।
बंधइ मिच्छाद्दिट्ठी अपज्जत्तसंजुयं एयं ॥७४॥

अर्थ (गाथा 72 से 74): द्वितीय पच्चीसप्रकृतिक स्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-तिर्यग्द्विक औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, विकलत्रय और पंचेन्द्रियजातिमेंसे कोई एक, हुंडकसंस्थान, औदारिकशरीर-अङ्गोपाङ्ग, वर्णचतुष्क, अपर्याप्त, अगुरुलघु, उपघात, त्रस, बादर सृपाटिकासंहनन, प्रत्येक, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयशःकीर्ति और निर्माण, इस द्वितीय पच्चीसप्रकृतिक अपर्याप्तसंयुक्त स्थानको मिथ्यादृष्टि जीव बाँधता है ॥७२-७४॥


तत्थ इमं तेवीसं तिरियदुगोराल तेज कम्मं च ।
एइंदियवण्णचउं अगुरुलहुत्थं च उवघायं ॥७५॥

थावरमथिरं असुहं दुभग अणादेज्ज अजस णिमिणं च ।
हुंडं च अपज्जत्तं वायर-सुहुमाणमेयदरं ॥७६॥

सादारण-पत्तेयं एयदर बंधगो तहा मिच्छो ।
एए बंधट्ठाणा तिरियगईसंजुया भणिया ॥७७॥

अर्थ (गाथा 75 से 77): तेईसप्रकृतिक बन्धस्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-तिर्यग्द्विक, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, एकेन्द्रियजाति, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, स्थावर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयशःकीर्ति, निर्माण, हुंडकसंस्थान, अपर्याप्त, बादर-सूक्ष्ममेंसे कोई एक और साधारण-प्रत्येकमेंसे कोई एक । इस तेईसप्रकृतिक स्थानको मिथ्यादृष्टि जीव बाँधता है । इस प्रकार तिर्यग्गतिसंयुक्त बँधनेवाले उपर्युक्त बन्धस्थान कहे ॥७५-७७॥


'तत्थ य तीसट्ठाणा मणुयदुगोराल तेय कम्मं च ।
ओरालियंगवंगं समचउरं वजरिसभं च ॥७८॥

तसचउ वण्णचउक्कं अगुरुलहुयं च हुंति चत्तारि ।
थिरमथिर-सुहासुहाणं एयदरं सुभगमादेज्जं ॥७९॥

सुस्सर-जसजुयलेकं पसत्थगई णिमिणयं च तित्थयरं ।
पंचिंदियपज्जत्तो असंजओ देव णरओ बंधे ॥८०॥

अर्थ (गाथा 78 से 80): उनमेंसे तीसप्रकृतिक स्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-मनुष्यद्विक (मनुष्यगति-मनुष्यगत्यानुपूर्वी) औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, औदारिकशरीर-अङ्गोपाङ्ग, समचतुरस्रसंस्थान, वज्रवृषभनाराचसंहनन, त्रसचतुष्क, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, स्थिर, अस्थिर और शुभ-अशुभमेंसे कोई एक एक, सुभग, आदेय, सुस्वर और यशःकीर्तियुगलमेंसे एक, प्रशस्तविहायोगति, निर्माण, तीर्थङ्कर और पंचेन्द्रियजाति । इस तीसप्रकृतिक स्थानको अविरतसम्यग्दृष्टि बाँधता है ॥७८-८०॥


जह तीसँ तह चेव य ऊणत्तीसं तु जाण पढमं तु ।
तित्थयर वज्जित्ता अविरदसम्मो दु बंधेइ॥८१॥

अर्थ: जिस प्रकार तीसप्रकृतिक बन्धस्थान बतलाया गया है, उसी प्रकार प्रथम उनतीस प्रकृतिक स्थान भी जानना चाहिए। इसमें केवल तीर्थङ्करप्रकृतिको छोड़ देते हैं। इस स्थानको अविरतसम्यग्दृष्टि जीव बाँधता है ॥८१॥


जह पढमं उणतीसं तह चेव य विदियऊणतीसं तु ।
णवरि विसेसो सुस्सर सुभगादेअजुयलाणेमयदरं ॥८२॥

हुंडमसंपत्तं पिव वज्जिय सेसाणमेकयरयं च ।
विहायगइजुयलमेयदरं सासणसम्मा दु बंधंति ॥८३॥

अर्थ (गाथा 82 से 83): जिस प्रकार प्रथम उनतीसप्रकृतिक स्थान कहा गया है, उसी प्रकार द्वितीय उनतीसप्रकृतिक स्थान भी जानना चाहिए। विशेषता केवल यह है कि सुस्वर, सुभग और आदेय, इन तीन युगलोंमेंसे कोई एक एक, तथा हुंडक संस्थान, और सृपाटिका संहननको छोड़कर शेषमेंसे कोई एक एक और विहायोगति-युगलमेंसे कोई एक प्रकृति-संयुक्त द्वितीय उनतीस प्रकृतिकस्थानको सासादनसम्यग्दृष्टि जीव बाँधते हैं ॥८२-८३॥


एवं तहय उगुत्तीसं णवरि असंपत्त हुंडसहियं च ।
बंधइ मिच्छादिट्ठी छण्हं जुयलाणमेगदरं ॥८४॥

अर्थ: इसी प्रकार तृतीय उनतीसप्रकृतिक स्थान भी जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि यह सृपाटिकासंहनन और हुण्डकसंस्थान सहित है । तथा सात युगलोंमेंसे किसी एक प्रकृतिके साथ उसे मिथ्यादृष्टि जीव बाँधता है ॥८४॥


एत्थ इमं पणुवीसं मणुयदुगोराल तेज कम्मं च ।
ओरालियंगवंगं हुंडमसंपत्त वण्णचउं ॥८५॥

अगुरुलहुगुवघायं तसवायर पत्तेय अपजत्तं ।
अथिरमसुहं दुब्भग अणादेज्ज अजस णिमिणं च ॥८६॥

पंचिंदियसंजुत्तं पणुवीसं बंधगो तहा मिच्छो ।
मणुयगइसंजुत्ताणि तिण्णि ठाणाणि भणियाणि ॥८७॥

अर्थ (गाथा 85 से 87): पचीसप्रकृतिक स्थानकी प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-मनुष्यद्विक, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, औदारिकशरीर-अङ्गोपाङ्ग, हुण्डकसंस्थान, सृपाटिकासंहनन, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, त्रस, बादर, प्रत्येक, अपर्याप्त, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयशःकीर्ति, निर्माण और पंचेन्द्रियजाति । पंचेन्द्रियजातिसंयुक्त इस पचीसप्रकृतिक स्थानको मिथ्यादृष्टि जीव बाँधता है । इस प्रकार मनुष्यगतिसंयुक्त तीन स्थान कहे गये हैं ॥८५-८७॥


देवदुयं पंचेन्दिय वेउव्वियाहार तेय कम्मं च ।
समचउरं वेउव्विय आहारय-अंगवंगणामं च ॥८८॥

तसचउ वण्णचउक्कं अगुरुलहुयं च होंति चत्तारि ।
थिर सुह सुभग सुस्सर पसत्थविहाय जस य आदेज्जं ॥८९॥

णिमिणं चिय तित्थयरं एकत्तीसं होंति णेयाणि ।
बंधइ पमत्त इयरो अपुव्वकरणो य णियमेण ॥९०॥

अर्थ (गाथा 88 से 90): देवद्विक (देवगति-देवगत्यानुपूर्वी) पञ्चेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, आहारकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीर-अङ्गोपाङ्ग, आहारकशरीर-अङ्गोपाङ्ग, त्रसचतुष्क, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, प्रशस्तविहायोगति, यशस्कीर्ति, आदेय, निर्माण और तीर्थङ्कर, ये इकतीसप्रकृतिक स्थानकी प्रकृतियाँ जानना चाहिए। इस स्थानको प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत या अपूर्वकरणसंयत नियमसे बाँधते हैं ॥८८-९०॥


एमेव होइ तीसं णवरि हु तित्थयरवज्जियं णियमा ।
बंधइ पमत्त इयरो अपुव्वकरणो य णायव्वो ॥९१॥

अर्थ: इसी प्रकार इकतीसप्रकृतिक स्थानके समान तीसप्रकृतिक स्थान भी जानना चाहिए। विशेषता केवल यह है कि इसमेंवस्तीर्थंकरप्रकवार्कंक्षा जुत्तितिहोत्तोसंगह छातीप्रकृतिक स्थानको भी प्रमत्त, अप्रमत्त और अपूर्वकरण संयत नियमसे बाँधते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥६१॥


आहारदुयं अवणिय एक्कत्तीसम्हि पढममुगुतीसं ।
बंधइ अपुव्वकरणो अप्पमत्तो य णियमेण ॥६२॥

अर्थ: इकतीसप्रकृतिक स्थानोंमेंसे आहारकद्विक (आहारकशरीर-आहारक-अङ्गोपांग) के निकाल देने पर प्रथम उनतीसप्रकृतिक स्थान हो जाता है। इस स्थानको अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणसंयत नियमसे बाँधते हैं ॥६२॥


एवं विदिउगुतीसं णवरि य थिर सुह जसं च एयदलं ।
बंधइ पमत्तविरदो अविरयं चेव देसविरदो य ॥६३॥

अर्थ: इसी प्रकार द्वितीय उनतीसप्रकृतिक स्थान जानना चाहिए। विशेषता केवल यह है कि यहाँ पर स्थिर, शुभ और यशःकीर्ति; इन तीन युगलोंमेंसे किसी एक एक प्रकृतिका बन्ध होता है। इस द्वितीय उनतीसप्रकृतिक स्थानको प्रमत्तविरत देशविरत और अविरत सम्यग्दृष्टि जीव बाँधते हैं ॥६३॥


तित्थयराहारदुयं एक्त्तीसम्हि अवणिदे पढमं ।
अट्ठावीसं बंधइ अपुव्वकरणो य अप्पमत्तो य ॥९४॥

अर्थ: इकतीसप्रकृतिक स्थानमेंसे तीर्थङ्कर और आहारकद्विक इन तीन प्रकृतियोंके निकाल देने पर शेष रहीं अट्ठाईसप्रकृतियोंको अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणसंयत बाँधता है। यह प्रथम अट्ठाईस प्रकृतिक स्थान है ॥६४॥


विदियं अट्ठावीसं विदिउगुत्तीसं च तित्थयरहीणं ।
मिच्छाइपमत्तंता बंधगा होंति णायव्वा ॥९५॥

अर्थ: द्वितीय उनतीसप्रकृतिक स्थानमेंसे तीर्थङ्करप्रकृतिके कम कर देने पर द्वितीय अट्ठाईस प्रकृतिक स्थान हो जाता है। इस स्थानके बन्धक मिथ्यादृष्टिसे लेकर प्रमत्तसंयत गुणस्थान तकके जीव होते हैं ऐसा जानना चाहिए ॥६५॥


बंधंति जसं एयं अपुव्वकरण अणियट्टि सुहुमा य ।
तेरे णव चउ पणयं बंधवियप्पा हवंति णामस्स ॥९६॥

अर्थ: यशःकीर्तिरूप एकप्रकृतिक स्थानको अपूर्वकरणसंयत, अनिवृत्तिकरणसंयत और सूक्ष्मसाम्परायसंयत बाँधते हैं। (इस प्रकार देवगतिसंयुक्त सर्व भंग १+१+१+८+१+८=२० होते हैं।) तथा नामकर्मके ऊपर बतलाये गये सर्व बन्धविकल्प (तिर्यग्गति-सम्बन्धी ६३०८ + मनुष्यगति-सम्बन्धी ४६१७ + देवगति-सम्बन्धी २० = १३६४५) तेरह हजार नौ सौ पैंतालीस होते हैं ॥६६॥


[मूलगा०२२] १इगिवीसं चउवीसं एत्तो इगितीसयं ति एयहरियं ।
उदयट्ठाणाणि तहा णव अट्ठ य होंति णामस्स ॥९७॥

अर्थ: इक्कीसप्रकृतिक, चौबीसप्रकृतिक और इससे आगे एक अधिक करते हुए इकतीसप्रकृतिक तक, तथा नौप्रकृतिक और आठप्रकृतिक, ये नामकर्मके ग्यारह उदयस्थान होते हैं ॥६७॥


२इगिवीसं पणुवीसं सत्तावीसहट्ठवीसमुगतीसं ।
एए उदयट्ठाणा णिरयगइसंजुया पंच ॥९८॥

अर्थ: इक्कीस, पचीस, सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक, ये पाँच उदयस्थान नरकगतिसंयुक्त होते हैं ॥६८॥


३तत्थिगिवीसं ठाणा णिरयदुयं तेय कम्म वण्णचदुं ।
अगुरुलहु पंचिंदिय तस बायरं च पज्जत्तं ॥९९॥

थिर अधिरं च सुहासुह दुभग अणादेज्ज अजस णिमिणं च ।
विग्गहगईहिं एदे एयं च दो व समयाणि ॥१००॥

अर्थ (गाथा 99 से 100): नरकद्विक, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, बादर, पर्याप्त, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयशःकीर्त्ति, और निर्माण, इन इक्कीस प्रकृतियोंवाला यह उदयस्थान नरकगतिको जानेवाले जीवके विग्रहगतिमें एक या दो समय तक होता है ॥९९-१००॥


एमेव य पणुवीसं णवरि विसेसो सरीरगहियस्स ।
णिरयाणुपुव्वि अवणय वेउव्वियदुगं च उवघादं ॥१०१॥

हुंडं पत्तेयं पिय* पक्खित्ते जाव सरीरणिप्फत्ती ।
अंतोमुहुत्तकालो जहण्णमुक्कस्सयं च भवे ॥१०२॥

अर्थ (गाथा 101 से 102): इसी प्रकार पचीसप्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए। विशेषता केवल यह है कि वैक्रियिकशरीरको ग्रहण करनेवाले नारकीके उपर्युक्त इक्कीस प्रकृतियोंमेंसे नरकानुपूर्वीको घटाकरके उनमें वैक्रियिकद्विक, उपघात, हुण्डकसंस्थान और प्रत्येकशरीर, इन पाँच प्रकृतियोंके मिला देनेपर पचीसप्रकृतिक उदयस्थान होता है। यह उदयस्थान जब तक शरीरपर्याप्तिकी पूर्णता नहीं नहीं हो जाती है, तब तक रहता है। इस उदयस्थानका जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है ॥१०१-१०२॥


एमेव सत्तवीसं सरीरपज्जत्तिणिद्विए णवरि ।
परघायमप्पसत्थ-विहायगई चेव पक्खित्ते ॥१०३॥

अर्थ: इसी प्रकार पच्चीस प्रकृतिक उदयस्थानके समान ही सत्ताईस प्रकृतिक उदयस्थान भी जानना चाहिए । विशेष बात यह है कि शरीरपर्याप्तिके पूर्ण होनेपर पच्चीस प्रकृतिक उदयस्थानमें परघात और अप्रशस्तविहायोगति ये दो प्रकृतियाँ और मिलाना चाहिए ॥१०३॥


'एमेव अट्ठवीसं आणपाणपज्जत्तिणिद्विए णवरि ।
उस्सासं पक्खित्ते कालो अंतोमुहुत्तं तु ॥१०४॥

अर्थ: इसी प्रकार अट्ठाईस प्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए । विशेष बात यह है कि श्वासोच्छ्वास पर्याप्तिके पूर्ण होनेपर सत्ताईसप्रकृतिक उदयस्थानमें उच्छ्वासप्रकृतिके मिलानेपर अट्ठाईस प्रकृतिक उदयस्थान होता है । इस उदयस्थानका काल भी अन्तर्मुहूर्त है ॥१०४॥


²एमेव य उगुतीसं भासापज्जत्तिणिद्विए णवरि ।
दुस्सरसहियजहण्णं दसवाससहस्स किंचूणं ॥१०५॥

तेतीस सायरोवम किंचिदूणुक्कस्सयं हवइ कालो ।
णिरयगईए सव्वे उदयवियप्पा य पंचेव ॥१०६॥

अर्थ (गाथा 105 से 106): इसी प्रकार उनतीसप्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए। विशेष बात यह है कि भाषा-पर्याप्तिके पूर्ण होनेपर अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थानमें दुःस्वर प्रकृतिके मिलानेपर उनतीसप्रकृतिक उदयस्थान होता है। इस उदयस्थानका जघन्यकाल कुछ कम दश हजार वर्ष है और उत्कृष्टकाल कुछ कम तेतीस सागरोपम है। इस प्रकार नरकगतिमें नामकर्मके उदयस्थानसम्बन्धी सर्व-विकल्प पाँच ही होते हैं ॥१०५-१०६॥


१इगिवीसं चउवीसं एत्तो इगितीसयं ति एगधियं ।
णव चेव उदयठाणा तिरियगईसंजुया होंति ॥१०७॥

अर्थ: इक्कीसप्रकृतिक, चौबीसप्रकृतिक और इससे आगे एक-एक अधिक करते हुए इकतीस प्रकृतिक उदयस्थान तक नौ उदयस्थान तिर्यग्गति-संयुक्त होते हैं ॥१०७॥


२पंचैव’ उदयठाणा सामण्णेइंदियस्स बोहव्वा ।
इगि चउ पण छ सत्त य अधिया वीसा य णायव्वा ॥१०८॥

अर्थ: सामान्य एकेन्द्रिय जीवके इक्कीस, चौबीस, पचीस, छब्बीस और सत्ताईस प्रकृतिक पाँच उदयस्थान जानना चाहिए ॥१०८॥


३आधाउज्जोयाणं अणुदय एइंदियस्स ठाणाणि ।
सत्तावीसेण विणा सेसाणि हवंति चत्तारि ॥१०९॥

अर्थ: आतप और उद्योतके उदयसे रहित एकेन्द्रियजीवके सत्ताईस प्रकृतिक उदयस्थानके बिना शेष चार उदयस्थान होते हैं ॥१०६॥ उनकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है-२१, २४, २५, २६ ।


'आयावुज्जोयाणं अणुदय एईंदियस्स इगिवीसं ।
तिरियदुग तेय कम्मं अगुरुलहुगं च वण्णचदुं ॥११०॥

जस-वायर-पज्जत्ता तिण्हं जुयलाणमिकयर णिमिणं च ।
थिर-अथिर-सुहासुह-दुब्भगणादेज्जं च थावरयं ॥१११॥

एईंदियस्स जाई विग्गहगइ पंच्चेव भंगा य ।
कालो जहण्ण इदरो इक्कं दो तिण्णि समयाणि ॥११२॥

अर्थ (गाथा 110 से 112): आतप और उद्योतके उदयसे रहित सामान्य एकेन्द्रियजीवके यह वक्ष्यमाण इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थान होता है। वे इक्कीस प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-तिर्यञ्चत्रिक, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, अगुरुलघु, वर्णचतुष्क; यशःकीर्त्ति-अयशःकीर्ति, बादर-सूक्ष्म पर्याप्त-अपर्याप्त इन तीन युगलोंमेंसे कोई एक-एक; निर्माण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, स्थावर और एकेन्द्रियजाति। यह इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थान विग्रहगतिमें कार्मणकाययोगकी दशामें होता है। इसका जघन्य काल एक समय, मध्यमकाल दो समय और उत्कृष्टकाल तीन समय है। इस स्थानके भङ्ग पाँच होते हैं ॥११०-११२॥


¹एमेव य चउवीसं णवरि विसेसो सरीरगहियस्स ।
अवणीय आणुपुव्वी ओरालय हुंड उवघायं ॥११३॥

पक्खित्ते पत्तेयं साहारणसरीरमेकयरं च ।
णव चेव उदयभंगा कालो अंतोमुहुत्तं तु ॥११४॥

अर्थ (गाथा 113 से 114): इसी प्रकार इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थानके समान चौबीसप्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए । विशेष बात यह है कि विग्रहगतिके समाप्त हो जानेपर जब जीव तिर्यञ्चके शरीरको ग्रहण करता है, उस समयसे लगाकर शरीरपर्याप्तिके पूर्ण होने तक चौबीसप्रकृतिक उदयस्थान होता है । अतएव उन इक्कीस प्रकृतियोंमेंसे तिर्यंचानुपूर्वी घटाकर औदारिकशरीर, हुण्डकसंस्थान, उपघात और प्रत्येक-साधारणयुगलमेंसे कोई एक, इन चार प्रकृतियोंके मिला देनेपर यह चौबीसप्रकृतिक उदयस्थान होता है । इस उदयस्थानके नौ भङ्ग होते हैं और इसका काल अन्तर्मुहूर्त है ॥११३-११४॥


³एमेव य पणुवीसं सरीरपज्जत्तए अपज्जत्तं ।
अवणीय पक्खिवियव्वं परघायं पंच भंगाओ ॥११५॥

अर्थ: इसी प्रकार पचीसप्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए । परन्तु परघातका उदय शरीरपर्याप्तिके पूर्ण होने तक नहीं होता, अतएव शरीरपर्याप्तिके पूर्ण होनेके पश्चात् अपर्याप्तप्रकृतिको घटा करके परघातप्रकृतिको जोड़ना चाहिए । इस उदयस्थानमें पाँच भङ्ग होते हैं ॥११५॥


एमेव य छव्वीसं आणप्पाणस्स सासुसासंमि ।
पक्खित्ते पण भंगा कालो य सगट्ठिदी ऊणा ॥११६॥

अर्थ: इसी प्रकार छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थान आनापान पर्याप्तिके प्रारम्भ होने पर उच्छ्वास प्रकृतिके मिला देनेसे होता है। इस उदयस्थानके भङ्ग पाँच होते हैं और इसका उत्कृष्ट काल कुछ कम स्वोत्कृष्ट स्थिति-प्रमाण है ॥११६॥


आयावुज्जोवुदयं जस्सेयंतस्स णत्थि पणुवीसं ।
सेसा उदयट्ठाणा चत्तारि हवंति णायव्वा ॥११७॥

अर्थ: जिस एकेन्द्रिय जीवके आतप और उद्योतका उदय होता है, उसके पच्चीसप्रकृतिक उदयस्थान नहीं होता है, शेष इक्कीस, चौबीस, छब्बीस और सत्ताईसप्रकृतिक चार उदयस्थान जानना चाहिए ॥११७॥


'आयावुज्जोउदये इगि-चउवीसं तहेव णवरिं तु ।
अवणीय साहारणयं सुहुममपज्जत्तभंगाओ ॥११८॥

अर्थ: आतप और उद्योतके उदयवाले एकेन्द्रियजीवोंके तथैव पूर्वोक्त इक्कीसप्रकृतिक और चौबीसप्रकृतिक उदयस्थान होते हैं । विशेष बात केवल यह है कि उनमेंसे साधारण, सूक्ष्म और अपर्याप्त-सम्बन्धी भंगोंको निकाल देना चाहिए ॥११८॥


'एमेव य छव्वीसं सरीरपज्जत्तयस्स जीवस्स ।
परघाउज्जोयाणं इकयरं चेव चउ भंगा ॥११९॥

अर्थ: इसी प्रकार शरीरपर्याप्तिसे युक्त एकेन्द्रियजीवके परघात और आतप-उद्योत इन दोनोंमेंसे किसी एकके मिलानेपर छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थान होता है। और इस स्थानके चार भंग होते हैं ॥११९॥


'एयमेव सत्तवीसं आणापज्जत्तयस्स उस्सासं ।
पक्खित्ते चउभंगा सव्वे भंगा य बत्तीसा* ॥१२०॥

अर्थ: इसी प्रकार श्वासोच्छ्वासपर्याप्तिसे पर्याप्त जीवके उच्छ्वासप्रकृतिके मिला देनेपर सत्ताईस प्रकृतिक उदयस्थान होता है। यहाँपर भी चार भंग होते हैं। इस प्रकार एकेन्द्रिय जीवके सर्व भंग बत्तीस होते हैं ॥१२०॥


वियलिंदियसामण्णे उदयट्ठाणाणि होंति छच्चेव ।
इगिवीसं छव्वीसं अट्ठावीसाइगाईणि ॥१२१॥

अर्थ: विकलेन्द्रिसामान्यमें इक्कीस, छब्बीस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक छह उदयस्थान होते हैं ॥१२१॥


उज्जोयरहियवियले इगित्तीसूणाणि पंच ठाणाणि ।
उज्जोयसहियवियले अट्ठावीसूणगा पंच ॥१२२॥

अर्थ: उद्योतप्रकृतिके उदयसे रहित विकलेन्द्रियोंमें इकतीसप्रकृतिक उदयस्थानके बिना शेष पाँच उदयस्थान होते हैं । तथा उद्योतप्रकृतिके उदयसे सहित विकलेन्द्रियोंमें अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थानके बिना शेष पाँच उदयस्थान होते हैं ॥१२२॥


उज्जोयउदयरहियवेइंदियट्ठाण पंच इगिवीसं ।
तिरियदुयं वेइंदिय तेजा कम्मं च वण्णचउं ॥१२३॥

अगुरुलहु तस बायर थिर सुह जुगलं तह अणादेज्जं ।
दुब्भगजसजुयलेक्कं पज्जत्तिदरेक्कणिमिणं च ॥१२४॥

विग्गहगईहिं एए एक्कं वा दोण्णि चेव समयाणि ।
एत्थ वियप्पा जाणसु तिण्णेव य होंति बोद्धव्वा ॥१२५॥

अर्थ (गाथा 123 से 125): उद्योतप्रकृतिके उदयसे रहित द्वीन्द्रियजीवोंके जो पाँच उदयस्थान होते हैं, उनमेंसे इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थान इस प्रकार है-तिर्यग्द्विक, द्वीन्द्रियजाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, त्रस, बादर, स्थिरयुगल, शुभयुगल, अनादेय, दुर्भग, यशःकीर्तियुगलमेंसे एक, पर्याप्तयुगलमेंसे एक और निर्माण । यह इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थान विग्रहगतिमें एक या दो समय तक उदयको प्राप्त होता है। इस उदयस्थानके यहाँपर तीन ही विकल्प या भंग होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१२३-१२५॥


एमेव य छव्वीसं सरीरगहियस्स आणुपुव्वी य ।
अवणिय पक्खिवियव्वं ओरालिय-हुंड-संपत्तं ॥१२६॥

ओरालियंगवंगं पत्तेयसरीरयं च उवघायं ।
अंतोमुहुत्तकालं भंगा वि हवंति तिण्णेव ॥१२७॥

अर्थ (गाथा 126 से 127): इसी प्रकार छव्वीसप्रकृतिक उदयस्थान शरीरको ग्रहण करनेवाले द्वीन्द्रियजीवके जानना चाहिए । उसके उक्त इक्कीस प्रकृतियोंमेंसे आनुपूर्वीको निकाल करके औदारिकशरीर, हुंडकसंस्थान सृपाटिकासंहनन, औदारिक-अंगोपांग, प्रत्येकशरीर और उपघात, ये छह प्रकृतियाँ जोड़ना चाहिए । इस उदयस्थानका काल अन्तर्मुहूर्त है और भंग भी तीन ही होते हैं ॥१२६-१२७॥ यहाँ पर भंग इक्कीसप्रकृतिकस्थानके समान जानना चाहिए ।


एमेव अट्ठवीसं सरीरपज्जत्तए अपज्जत्तं ।
अवणीय परघायं पि य असुहगईसहिय दो भंगा ॥१२८॥

अर्थ: इसी प्रकार अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थान उसी जीवके शरीरपर्याप्तिके पूर्ण होनेपर अपर्याप्तको निकाल करके परघात और अप्रशस्तविहायोगति इन दोको मिलाने पर होता है । यहाँपर भंग दो होते हैं ॥१२८॥


एमेवू णतीसं आणापज्जत्तस्स उस्सासं ।
पक्खित्ते तह चेव य भंगा दो होंति णायव्वा ॥१२६॥

अर्थ: इसी प्रकार उनतीसप्रकृतिक उदयस्थान उसी जीवके श्वासोच्छ्वासपर्याप्तिके पूर्ण होनेपर उच्छ्वासप्रकृतिके मिलानेसे होता है । यहाँपर भी भंग दो ही होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१२६॥


एमेव होइ तीसं भासापज्जत्तयस्स णवरिं तु ।
सहिए दुस्सरणामं भंगा वि य होंति दो चेव ॥१३०॥

अर्थ: इसी प्रकार तीसप्रकृतिक उदयस्थान उसी जीवके भाषापर्याप्तिके पूर्ण होनेपर दुःस्वरप्रकृतिके मिलानेसे होता है। यहाँपर भी भंग दो ही होते हैं ॥१३०॥


'उज्जोवउदयसहिए बेइंदिय एकवीस छव्वीसं ।
पुण्णापुण्णा तहा इक्केक्का भंगा य पुणरुत्ता ॥१३१॥

अर्थ: उद्योतप्रकृतिके उदयसे सहित द्वीन्द्रियजीवके पूर्वोक्त ही इक्कीस और छब्बीस प्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए। यहाँपर भी भङ्ग दो दो होते हैं, जो कि पुनरुक्त हैं ॥१३१॥


'छव्वीसाए उवरिं सरीरपज्जत्तयस्स परघायं ।
उज्जोवं असुहगई पक्खित्त गुत्तीस दो भंगा ॥१३२॥

अर्थ: शरीरपर्याप्तिको पूर्ण करनेवाले द्वीन्द्रियजीवके छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थानके परघात, उद्योत और अप्रशस्तविहायोगति, इन तीन प्रकृतियोंके मिलानेपर उनतीसप्रकृतिक उदयस्थान हो जाता है। यहाँपर भी दो भंग होते हैं ॥१३२॥


'एमेव होइ तीसं आणापज्जत्तयस्स उस्सासं ।
पक्खित्ते तह चेव य भंगा वि हवंति दो चेव ॥१३३॥

अर्थ: इसी प्रकार श्वासोच्छ्वास पर्याप्तिको सम्पन्न करनेवाले द्वीन्द्रियके उनतीसप्रकृतिक उदयस्थानमें उच्छ्वासप्रकृतिके मिलाने पर तीसप्रकृतिक उदयस्थान हो जाता है। यहाँ पर भी भङ्ग दो ही होते हैं ॥१३३॥


'एमेव एक्कतीसं भासापज्जत्तयस्स णवरिं तु ।
दुस्सर संपक्खित्ते दो चेव हवंति भंगा दु ॥१३४॥

अर्थ: इसी प्रकार भाषापर्याप्तिको पूर्ण करनेवाले द्वीन्द्रियजीवके तीसप्रकृतिक उदयस्थानमें दुःस्वरप्रकृतिके प्रक्षेप करने पर इकतीसप्रकृतिक उदयस्थान हो जाता है। यहाँ पर भी भंग दो ही होते हैं ॥१३४॥


बेइंदियस्स एवं अट्ठारस होंति सव्वभंगा दु ।
एवं वि-ति-चउरिंदियभंगा सव्वे वि चउवण्णा ॥१३५॥

अर्थ: इस प्रकार द्वीन्द्रिय जीवके सर्व भङ्ग अट्ठारह होते हैं। त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवोंके भी अट्ठारह-अट्ठारह भंग जानना चाहिए। इस प्रकार द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रियके सर्व भंग चौवन होते हैं ॥१३५॥


तीसेक्कतीसकालो जहण्णमंतोमुहुत्तयं होइ ।
उक्कस्सं पुण नियमा उक्कस्सठिदी य किंचूणा ॥१३६॥

अर्थ: विकलेन्द्रियोंके तीसप्रकृतिक और इकतीसप्रकृतिक उदयस्थानोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल नियमसे कुछ कम अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है ॥१३६॥


पंचिंदियतिरियाणं सामण्णे उदयठाण छव्वेव ।
इगिवीसं छव्वीसं अट्ठावीसादि जाव इगितीसं ॥१३७॥

अर्थ: सामान्य पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चके इक्कीस, छब्बीस और अट्ठाईसको आदि लेकर इकतीस प्रकृतिक तकके छह उदयस्थान होते हैं ॥१३७॥ इन उदयस्थानोंकी अङ्कदृष्टि इस प्रकार है-२१, २६, २८, २९, ३०, ३१ ।


उज्जोवरहियसयले एकत्तीसूणगाणि ठाणाणि ।
उज्जोवसहियसयले अट्ठावीसूणगा पंच ॥१३८॥

अर्थ: उद्योतप्रकृतिके उदयसे रहित सकल अर्थात् पंचेन्द्रिय जीवके इकतीसप्रकृतिक स्थानके बिना शेष पाँच उदयस्थान होते हैं। तथा उद्योतप्रकृतिके उदयसे सहित पंचेन्द्रिय जीवके अट्ठाईसप्रकृतिक स्थानके बिना शेष पाँच उदयस्थान होते हैं ॥१३८॥ उद्योतके उदयसे रहित पंचेन्द्रियमें २१, २६, २८, २९, ३० ये पाँच उदयस्थान होते हैं। उद्योतके उदयसे सहित पंचेन्द्रियमें २१, २६, २९, ३०, ३१ ये पाँच उदयस्थान होते हैं।


उज्जोवरहियसयले तत्थ इमं एकवीससंठाणं ।
तिरियदुगं पंचिंदिय तेया कम्मं च वण्णचदुं ॥१३९॥

अगुरुलहुयं तस बायर थिरमथिर सुहासुहं च णिमिणं च ।
सुभगं जस पज्जत्त’ आदिज्जं चेव चउजुयलं ॥१४०॥

एक्कयरं वेयंति य विग्गहगईहिं एय-वियसमयं च ।
एत्थ वियप्पा णियमा णव चेव य होंति णायव्वा ॥१४१॥

अर्थ (गाथा 139 से 141): उद्योत-रहित पंचेन्द्रियके इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थान इस प्रकार है-तिर्यञ्चद्विक, पंचेन्द्रियजाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, त्रस, बादर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ; निर्माण और सुभग, यशःकीर्ति, पर्याप्त और आदेय इन चार युगलोंमेंसे कोई एक एक, इन इक्कीस प्रकृतियोंका उदय विग्रहगतिमें एक या दो समय तक रहता है। यहाँ पर नियमसे नौ ही भङ्ग होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१३९-१४१॥


एमेव य छव्वीसं णवरि विसेसो सरीरगहियस्स ।
अवणीय आणुपुव्वी पक्खिवियव्वं तथोरिलं ॥१४२॥

तस्स य अंगोवंगं छस्संठाणामेयदरयं च ।
छच्चेव य संघयणा एक्कयरं चेव उपघायं ॥१४३॥

पत्तेयसरीरजुयं भंगा वि य तह य होंति णायव्वा ।
तिण्णि सयाणि य णियमा एयारस ऊणिया होंति ॥१४४॥

अर्थ (गाथा 142 से 144): इसीप्रकार छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए। विशेष बात यह है कि शरीरपर्याप्तिको ग्रहण करनेवाले जीवके आनुपूर्वीको निकाल करके औदारिकशरीर, औदारिक-अङ्गोपांग, छह संस्थानोंमेंसे कोई एक संस्थान, छह संहननोंमेंसे कोई एक संहनन, उपघात और प्रत्येकशरीर इन छह प्रकृतियोंके मिला देने पर छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थान होता है, ऐसा जानना चाहिए। यहाँ पर नियमसे ग्यारह कम तीन सौ अर्थात् दोसौ नवासी भङ्ग होते हैं ॥१४२-१४४॥ यहाँ पर्याप्तप्रकृतिके उदयमें छह संस्थान, छह संहनन, तथा शुभ, आदेय और यशःकीर्त्ति इन तीनों युगलोंके परस्पर गुणा करने पर (६ x ६ x २ x २ x २ = २८८) दो सौ अठासी भङ्ग होते हैं । तथा अपर्याप्तप्रकृतिके उदयमें हुंडक संस्थान, सृपाटिका संहनन, दुर्भग, अनादेय और अयशःकीर्त्तिका ही उदय होता है, इसलिए एक ही भंग होता है । इस प्रकार २८८ + १ = २८९ भङ्ग छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थानमें होते हैं।


एमेवट्ठावीसं सरीरपज्जत्तगे अपज्जत्तं ।
अवणिय पक्खिविदव्वं एक्कयरं दो विहायगई ॥१४५॥

परघायं चेव तहा भंगवियप्पा तहा य णायव्वा ।
पंचेव सया णियमा छावत्तरि उत्तरा होंति ॥१४६॥

अर्थ (गाथा 145 से 146): इसी प्रकार अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थान उसी जीवके शरीरपर्याप्तिके पूर्ण होने पर अपर्याप्तप्रकृतिको निकाल करके दो विहायोगतियोंमेंसे कोई एक और परघात प्रकृतिके मिलाने पर होता है। तथा यहाँ पर भङ्ग-विकल्प पाँच सौ छिहत्तर होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१४५-१४६॥ छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थानमें जो पर्याप्त-सम्बन्धी २८८ भङ्ग बतलाये हैं उन्हें यहाँ पर बढ़े हुए विहायोगति-युगलसे गुणा कर देने पर (२८८ x २ =) ५७६ भङ्ग हो जाते हैं।


एमेऊणत्तीसं आणापज्जत्तयस्स उस्सासं ।
पक्खित्ते तह भंगा पुव्वुत्ता चेव णादव्वा ॥१४७॥

अर्थ: इसी प्रकार उनतीसप्रकृतिक उदयस्थान उसी जीवके आनापानपर्याप्तिके पूर्ण होने पर उच्छ्वासप्रकृतिके मिला देने होता है। यहाँ पर भङ्ग पूर्वोक्त पाँच सौ छिहत्तर (५७६) ही जानना चाहिए ॥१४७॥


एमेव होइ तीसं भासापज्जत्तयस्स सरजुयलं ।
एक्कयरं पक्खित्ते भंगा पुव्वुत्तदुगुणा दु ॥१४८॥

अर्थ: इसी प्रकार तीसप्रकृतिक उदयस्थान उसी जीवके भाषापर्याप्तिके पूर्ण होने पर स्वरयुगलमेंसे किसी एकके मिलाने पर होता है। यहाँ पर भङ्ग पूर्वोक्त भङ्गोंसे दुगुण अर्थात् ११५२ होते हैं ॥१४८॥


उज्जोवसहियसयले इगि-छव्वीसं हवंदि पुव्वुत्तं ।
भंगा वि तह य सव्वे पुणरुत्ता होंति णायव्वा ॥१४९॥

अर्थ: उद्योतप्रकृतिके उदयसे सहित सकलपंचेन्द्रियजीवके इक्कीस और छव्वीसप्रकृतिक उदयस्थान पूर्वोक्त अर्थात् उद्योतके उदयसे रहित पंचेन्द्रियजीवके समान ही होते हैं। तथा भंग भी उन्हींके समान होते हैं। वे सब भंग पुनरुक्त जानना चाहिए ॥१४६॥


एमेव ऊणतीसं सरीरपज्जत्तयस्स परघायं ।
उज्जोवं गइदुगाण एयदं चेव सहियं तु ॥१५०॥

एत्थ वि भंग-वियप्पा छच्चेव सया हवंति ऊणा य ।
चउवीसेण दु णियमा कालो अंतोमुहुत्तं तु ॥१५१॥

अर्थ (गाथा 150 से 151): इसी प्रकार उनतीसप्रकृतिक उदयस्थान उसी जीवके शरीरपर्याप्तिसे युक्त होनेपर परघात, उद्योत और विहायोगतियुगलमेंसे किसी एकके मिला देनेपर होता है। यहाँपर भी भंग-विकल्प चौबीससे कम छह सौ अर्थात् ५७६ होते हैं। इस उदयस्थानका काल नियमसे अन्तर्मुहूर्त है ॥१५०-१५१॥


एमेव होइ तीसं आणापज्जत्तयस्स उस्सासं ।
पक्खित्ते भंगा वि य सरिसा एऊणतीसेण ॥१५२॥

अर्थ: इसी प्रकार तीसप्रकृतिक उदयस्थान उसी जीवके आनापानपर्याप्तिके पूर्ण होनेपर उच्छ्वासप्रकृतिके मिलानेसे होता है। इस उदयस्थानके भी भंग उनतीसप्रकृतिक उदयस्थानके सदृश ५७६ होते हैं ॥१५२॥


'एमेव एकतीसं भासापज्जत्तयस्स सरजुयलं ।
एक्कयरं पक्खित्ते भंगा पुव्वुत्तदुगुणा दु ॥१५३॥

अर्थ: इसी प्रकार इकतीस प्रकृतिकउदयस्थान उसी जीवके भाषापर्याप्तिके पूर्ण होनेपर स्वर-युगल-मेंसे किसी एकके मिलानेपर होता है। यहाँपर भंग पहले कहे गये भंगोंसे दुगुने अर्थात् ११५२ होते हैं ॥१५३॥


२तीसेकतीसकालो जहण्णमंतोमुहुत्तयं होइ ।
अंतोमुहुत्तऊणं उक्कस्सं तिण्णि पल्लाणि ॥१५४॥

अर्थ: तीसप्रकृतिक उदयस्थानका जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। इकतीसप्रकृतिक उदयस्थानका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त कम तीन पल्य है ॥१५४॥


४सव्वेसिं तिरियाणं भंगवियप्पा हवंति णायव्वा ।
पंचेव सहस्साई ऊणाई हवंति चदुदुगुणा ॥१५५॥

अर्थ: एकेन्द्रियसे लेकर पंचेन्द्रिय तकके सर्व तिर्यंचोंके उदयस्थान-सम्बन्धी सर्व भंगोंके विकल्प चारद्विक अर्थात् आठ कम पाँच हजार होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१५५॥


मणुयगईसंजुत्ता उदये ठाणानि होंति दस चेव ।
चउवीसं वज्जित्ता सेसाणि हवंति णायव्वा ॥१५६॥

अर्थ: नामकर्मके जितने उदयस्थान हैं, उनमेंसे चौबीसप्रकृतिक उदयस्थानको छोड़कर शेष दश उदयस्थान मनुष्यगति-संयुक्त होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१५६॥


पंचिंदियतिरिएसुं उज्जोधूणेसु जाणि भणियाणि ।
ओघणरेसु वि ताणि य हवंति पंच उदयठाणाणि ॥१५७॥

अर्थ: उद्योतप्रकृतिके उदयसे रहित पंचेन्द्रियतिर्यंचोंमें जो पाँच उदयस्थान बतलाये गये हैं, सामान्यमनुष्योंमें वे ही पाँच उदयस्थान होते हैं ॥१५७॥


'तिरियदुवे मणुयदुयं भणणीयं होति सव्वभंगा हु ।
सत्तावीस सयाणि य अट्ठाणउदी य रहियाणि ॥१५८॥

अर्थ: उदयस्थानोंकी प्रकृतियोंमें तिर्यग्द्विकके स्थानपर मनुष्यद्विकको कहना चाहिए । यहाँपर भी सर्व भंग अट्ठानवेसे रहित सत्ताईस सौ अर्थात् छब्बीस सौ दो ( २६०२ ) होते हैं ॥१५८॥


तित्थयराहाररहियपयडी मणुसस्स पंच ठाणाणि ।
इगिवीसं छव्वीसं अट्ठावीसं ऊणतीस तीसा य ॥१५९॥

अर्थ: तीर्थंकर और आहारकद्विक इन तीन प्रकृतियोंके उदयसे रहित मनुष्यके इक्कीस, छब्बीस, अट्ठाईस, उनतीस और तीस प्रकृतिक पाँच पाँच उदयस्थान होते हैं ॥१५९॥


³तत्थ इमं इगिवीसं ठाणं णियमेण होइ णायव्वं ।
मणुयदुयं पंचिंदिय तेया कम्मं च वण्णचउं ॥१६०॥

अगुरुलहु तस बायर थिरमथिर सुहासुहं च णिमिणं च ।
सुभगं जस पज्जत्तं आदेज्जं चेव चउजुयलं ॥१६१॥

एययरं वहंति य विग्गहगईहिं एग-दुगसमयं ।
एत्थ वियप्पा णियमा णव चेव हवंति णायव्वा ॥१६२॥

अर्थ (गाथा 160 से 162): उनमेंसे इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थानमें नियमसे ये प्रकृतियाँ जानना चाहिए-मनुष्यद्विक, पंचेन्द्रियजाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, त्रस, बादर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, निर्माण; तथा सुभग, यशःकीर्ति, पर्याप्त और आदेय इन चार युगलोंमेंसे कोई एक-एक । इन इक्कीस प्रकृतियोंका विग्रहगतिमें एक या दो समयतक मनुष्यसामान्य वेदन करते हैं । यहाँपर भंग नियमसे नौ ही होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१६०-१६२॥ पर्याप्तप्रकृतिके उदयमें ८ भङ्ग और अपर्याप्तके उदयमें १ भङ्ग; इस प्रकार सर्व ९ भङ्ग होते हैं ।

पञ्चम अधिकार: सप्ततिका (भाग 2/4)

'एमेव य छव्वीसं णवरि विसेसो सरीरगहियस्स ।
अवणीय आणुपुव्वी पक्खिवियव्वं तथोरालं ॥१६३॥
तस्स य अंगोवंगं छस्संठाणाणमेकदरयं च ।
छच्चेव य संघयणा एययरं चेव उवघायं ॥१६४॥
पत्तेयसरीरजुयं भंगा वि य तस्स होंति णायव्वा ।
तिण्णि य सयाणि णियमा एयारस ऊणिया होंति ॥१६५॥

अर्थ (गाथा 163 से 165): इसी प्रकार छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए । विशेष बात यह है कि शरीरपर्याप्तिको ग्रहण करनेवाले मनुष्यके मनुष्यानुपूवीको निकाल करके औदारिकशरीर, औदारिकअंगोपांग, छह संस्थानोंमेंसे कोई एक संस्थान, छह संहननोंमेंसे कोई एक संहनन, उपघात और प्रत्येकशरीर, इन छह प्रकृतियोंको और मिला देना चाहिए । इस उदयस्थानके भङ्ग भी ग्यारहसे कम तीन सौ अर्थात् दो सौ नवासी होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१६३-१६५॥ पर्याप्तके उदयमें २८८, अपर्याप्तके उदयमें १ इस प्रकार कुल २८९ भङ्ग होते हैं । कायमार्गणाकी अपेक्षा पाँचों स्थावरकायिकोंमें एकेन्द्रियोंके समान उदयस्थान होते हैं । त्रसकायिक जीवोंमें विकलेन्द्रिय और सकेलेन्द्रिय जीवोंके समान नामकर्मके उदयस्थान जानना चाहिए ॥१६५॥


एमेव अट्ठावीसं सरीरपज्जत्तगे अपज्जत्त’ ।
अवणीय पक्खिवियव्वं एययरं दो विहायगई ॥१६६॥
परघायं चेव तहा भंगवियप्पा तहेव णायव्वा ।
पंचेव सया णियमा छावत्तरि उत्तरा होंति ॥१६७॥

अर्थ (गाथा 166 से 167): इसी प्रकार अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए । विशेष बात यह है कि उक्त जीवके शरीरपर्याप्तिके पूर्ण हो जानेपर अपर्याप्त प्रकृतिको निकाल करके दोनों विहायोगतियोंमेंसे कोई एक और परघात; ये दो प्रकृतियाँ मिलाना चाहिए । इस उदयस्थानमें भङ्ग-विकल्प तथैव अर्थात् तिर्यञ्चसम्बन्धी अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थानके समान नियमसे पाँच सौ छिहत्तर होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१६६-१६७॥ योगमार्गणाकी अपेक्षा सत्य, असत्य, उभय, अनुभय, इन चार मनोयोगोंमें तथा सत्य, असत्य, उभय, इन तीन वचनयोगोंमें पंचेन्द्रियसज्ञी पर्याप्तकके समान उनतीस, तीस और इकतीसप्रकृतिक तीन उदयस्थान जानना चाहिए। असत्यमृषावचनयोगमें त्रसपर्याप्तकोंके समान उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक तीन उदयस्थान होते हैं ॥१६६॥


एमेवऊणत्तीसं आणापज्जत्तयस्स उस्सासं ।
पक्खित्ते तह भंगा पुव्वुत्ता चेव णायव्वा ॥१६८॥

अर्थ (गाथा 167 से 168): इसी प्रकार उनतीसप्रकृतिक उदयस्थान शरीर-पर्याप्तिसे सम्पन्न मनुष्यके उच्छ्वास प्रकृतिके मिला देने पर होता है । तथा यहाँ पर भङ्ग भी पूर्वोक्त ५७६ ही जानना चाहिए ॥१६८॥ औदारिककाययोगमें त्रसपर्याप्तक जीवोंके समान पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक सात उदयस्थान होते हैं। औदारिकमिश्रकाययोगमें सातों अपर्याप्तक जीवसमासोंके समान चौबीस, छब्बीस और सत्ताईस प्रकृतिक उदयस्थान होते हैं। कार्मणकाययोगमें विग्रहगति-सम्बन्धी इक्कीसप्रकृतिक एक उदयस्थान जानना चाहिए। वैक्रियिककाययोग और वैक्रियिकमिश्रकाययोगमें देव और नारकियोंके उदयस्थानोंके समान उदयस्थान जानना चाहिए ॥१६७-१६८॥


एमेव होइ तीसं भासापज्जत्तयस्स सरजुयलं ।
एययरं पक्खित्ते भंगा पुव्वुत्तदुगुणा दु ॥१६९॥

अर्थ: इसी प्रकार तीसप्रकृतिक उदयस्थान भाषा-पर्याप्तिसे युक्त मनुष्यके स्वर-युगलोंमेंसे किसी एकके मिलाने पर होता है। यहाँ पर भङ्ग पूर्वोक्त भङ्गोंसे दूने अर्थात् ११५२ होते हैं ॥१६९॥


आहारसरीरुदयं जस्स य ठाणाणि तस्स चत्तारि ।
पणुवीस सत्तवीसं अट्ठावीसं च उगुत्तीसं ॥१७०॥

अर्थ: अब आहारक शरीरके उदयवाले जीवोंके उदयस्थानोंका निरूपण करते हैं- जिस जीवके आहारकशरीरका उदय होता है उसके पचीस, सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस; ये चार उदयस्थान होते हैं ॥१७०॥ आहारकशरीरके उदयवाले विशेष मनुष्यमें २५, २७, २८, २९ ये चार उदयस्थान होते हैं।


तत्थ इमं पणुवीसं मणुसगई तेय कम्म आहारं ।
तस्स य अंगोवंगं वण्णचउक्कं च उवघायं ॥१७१॥

अगुरुलहु पंचिंदिय-थिराथिर सुहासुहं च आदेज्जं ।
तसचउ समचउरं सुहयं जस णिमिण भंग एगो दु ॥१७२॥

अर्थ (गाथा 171 से 172): उनमेंसे पचीसप्रकृतिक उदयस्थान इस प्रकार है-मनुष्यगति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, आहारकशरीर, आहारक-अङ्गोपांग, वर्णचतुष्क, उपघात, अगुरुलहु, पञ्चेन्द्रियजाति, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, आदेय, त्रस-चतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, सुभग, यशस्कीर्त्ति और निर्माण । इस उदयस्थानमें भङ्ग एक ही होता है ॥१७१-१७२॥


एमेव सत्तवीसं सरीरपज्जत्तयस्स परघायं ।
पक्खिविय पसत्थगई भंगो वि य एत्थ एगो दु ॥१७३॥

अर्थ: इसी प्रकार सत्ताईसप्रकृतिक उदयस्थान शरीर-पर्याप्तिसे पर्याप्त मनुष्यके परघात और प्रशस्त विहायोगति इन दो प्रकृतियोंके मिलाने पर होता है। यहाँ पर भी भङ्ग एक ही होता है ॥१७३॥


एमेवट्ठावीसं आणापज्जत्तयस्स उस्सासं ।
पक्खित्ते तह चेव य भंगो वि य एत्थ एगो दु ॥१७४॥

अर्थ: इसी प्रकार अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थान आनापानपर्याप्तिसे पर्याप्त मनुष्यके उच्छ्वास प्रकृतिके मिलाने पर होता है। यहाँ पर भी भङ्ग एक ही होता है ॥१७४॥


एमेऊणत्तीसं भासापज्जत्तयस्स सुस्सरयं ।
पक्खित्तिय एयभंगो सव्वे भंगा दु चत्तारि ॥१७५॥

अर्थ: इसी प्रकार उनतीस प्रकृतिक उदयस्थान भाषापर्याप्तिसे संयुक्त मनुष्यके सुस्वर प्रकृतिके मिला देनेपर होता है। यहाँपर भी एक ही भङ्ग होता है। इस प्रकार आहारकप्रकृतिके उदयवाले जीवके चारों उदयस्थानोंके सर्व भङ्ग चार ही होते हैं ॥१७५॥


तित्थयर सह सजोई एकत्तीसं तु जाण मणुयगई ।
पंचिंदिय ओरालं तेया कम्मं च वण्णचउं ॥१७६॥

समचउरं ओरालिंय अंगोवंगं च वज्जरिसहं च ।
अगुरुलघुचदु तसचदु थिराथिरं तह पसत्थगदी ॥१७७॥

सुभमसुभ सुहय सुस्सर जस णिमिणादेज्ज तित्थयरं ।
वासपुधत्तं जहण्णं उक्कस्सं पुव्वकोडिदेसूर्ण ॥१७८॥

अर्थ (गाथा 176 से 178): तीर्थंकरप्रकृतिके उदयके साथ सयोगिकेवलीके इकतीसप्रकृतिक उदयस्थान इस प्रकार जानना चाहिए-मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिक-अङ्गोपांग, वज्रवृषभनाराचसंहनन, अगुरुलघुचतुष्क (अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास) त्रसचतुष्क (त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर) स्थिर, अस्थिर, प्रशस्तविहायोगति, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, यशःकीर्त्ति, निर्माण, आदेय और तीर्थङ्करप्रकृति । इस उदयस्थानका जघन्यकाल वर्षपृथक्त्व और उत्कृष्ट काल देशोन (अन्तर्मुहूर्त अधिक आठ वर्षसे कम) पूर्वकोटी वर्षप्रमाण है ॥१७६-१७८॥


णवं अजोइठ्ठाणं पँचिंदिय सुभग तस य वायरयं ।
पज्जत्तय मणुसगई आएज्ज जसं च तित्थयरं ॥१७९॥

अर्थ: मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, सुभग, त्रस, बादर, पर्याप्त, आदेय, यशःकीर्ति और तीर्थङ्कर, इन नौ प्रकृतियोंवाला उदयस्थान अयोगि तीर्थङ्करके होता है ॥१७९॥


तित्थयरं वज्जित्ता ताओ चेव हवंति अट्ठ पयडीओ ।
सव्वे केवलिभंगा तिण्णेव य होंति णायव्वा ॥१८०॥

अर्थ: नौ प्रकृतिक उदयस्थानमेंसे तीर्थङ्करप्रकृतिको छोड़कर शेष जो पूर्वोक्त आठ प्रकृतियाँ अवशिष्ट रहती हैं, उन आठ प्रकृतियोंवाला उदयस्थान सामान्य अयोगिकेवलीके होता है। यहाँ पर भी भङ्ग एक ही है। इस प्रकार केवलीके सर्व भङ्ग तीन ही होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१८०॥


मणुयगइसव्वभंगा दो चेव सहस्सरयं च छच्च सया ।
णव चेय समधिरेया णायव्वा होंति णियमेण ॥१८१॥

अर्थ: मनुष्यगतिके सर्व भङ्ग नियमसे दो हजार छहसौ नौ (२६०६) होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥१८१॥


शेषाः ५६ सहैतैस्ते पूर्वोदिताः २६०६ । एतावन्तः २६६२ सर्वे भङ्गाः ॥१८२॥

अर्थ: इक्कीस, पचीस, सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक ये पाँच उदयस्थान देवगति-संयुक्त होते हैं ॥१८२॥


तत्थिगिवीसं ठाणं देवदुयं तेय कम्म वण्णचउं ।
अगुरुलहु पंचिंदिय तस वायरयं अपज्जत्तं ॥१८३॥

थिरमथिरं सुभमसुभं सुहयं आदेज्जयं च जसणिमिणं ।
विग्गहमईहिं एए एकं वा दो व समयाणि ॥१८४॥

अर्थ (गाथा 183 से 184): देवगति-सम्बन्धी उदयस्थानोंमेंसे इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थान इस प्रकार है-देवद्विक, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, बादर, अपर्याप्त, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, आदेय, यशःकीर्त्ति और निर्माण । इन इक्कीस प्रकृतियोंका उदय विग्रहगतिमें एक या दो समय तक होता है ॥१८३-१८४॥ इस इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थानमें भङ्ग १ है ।


एमेव य पणुवीसं णवरि विसेसो सरीरगहियस्स ।
देवाणुपुव्वि अवणिय वेउव्वदुगं च उवघायं ॥१८५॥
समचउरं पत्तेयं पक्खित्ते जा सरीरणिप्फत्ती ।
अंतोमुहुत्तकालं जहण्णमुक्कस्सयं च भवे ॥१८६॥

अर्थ (गाथा 185 से 186): इसी प्रकार पच्चीसप्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए । विशेष बात यह है कि शरीरपर्याप्तिको ग्रहण करनेवाले देवके देवानुपूर्वीको निकाल करके वैक्रियिकद्विक, उपघात, समचतुरस्र संस्थान और प्रत्येकशरीर, इन पाँच प्रकृतियोंको मिलाना चाहिए । जब तक शरीरपर्याप्ति पूर्ण नहीं होती है, तब तक यह उदयस्थान रहता है। इसका जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है ॥१८५-१८६॥


एमेव सत्तवीसं सरीरपज्जत्तिणिट्ठिए णवरि ।
परघाय विहायगई पसत्थयं चेव पक्खित्ते ॥१८७॥

अर्थ: इसी प्रकार सत्ताईसप्रकृतिक उदयस्थान उक्त देवके शरीरपर्याप्तिके निष्पन्न होनेपर होता है । विशेष बात यह है कि परघात और प्रशस्तविहायोगति और मिलाना चाहिए ॥१८७॥ सत्ताईसप्रकृतिक उदयस्थानमें भङ्ग १ है ।


एमेवट्ठावीसं आणापज्जत्तिणिट्ठिए णवरि ।
उस्सासं पक्खित्ते कालो अंतोमुहुत्तं तु ॥१८८॥

अर्थ: इसी प्रकार अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थान उक्त देवके आनापानपर्याप्तिके पूर्ण होनेपर और उच्छ्वासप्रकृतिके मिलानेपर होता है। इस उदयस्थानका काल अन्तर्मुहूर्त है ॥१८८॥ अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थानमें भङ्ग १ है।


एमेव य उगुत्तीसं भासापज्जत्तिणिट्ठिए णवरि ।
सुस्सरसहिय जहण्णं दसवाससहस्स किंचूणं ॥१८९॥

तेतीससायरोवम किंचूणुक्कस्सयं हवइ कालो ।
देवगईए संव्वे उदयवियप्पा वि पंचेव ॥१९०॥

अर्थ (गाथा 189 से 190): इसी प्रकार उनतीसप्रकृतिक उदयस्थान उक्त देवके भाषापर्याप्तिके सम्पन्न होने और सुस्वर प्रकृतिके मिलानेपर होता है। इस उदयस्थानका जघन्यकाल कुछ कम दश हजार वर्ष और उत्कृष्टकाल कुछ कम तेतीस सागरोपम है। इस उदयस्थानमें भी एक ही भङ्ग होता है। इस प्रकार देवगतिमें नामकर्मके उदयस्थान-सम्बन्धी सर्व भङ्ग पाँच ही होते हैं ॥१८९-१९०॥


छावत्तरि अट्ठारह सयाणि णामोदयाणि होंति चउगइया ।
।१८७६।
गइचउरएसु भणियं इंदियमादीसु उवरि वोच्छामि ॥१९१॥

अर्थ: चारों गति-सम्बन्धी नामकर्मके उदयस्थानोंके भङ्ग छहत्तर सौ ग्यारह (७६११) होते हैं । अर्थात् नरकगतिसम्बन्धी ५, देवगतिसम्बन्धी ५, तिर्यग्गतिसम्बन्धी ४६६२ और मनुष्यगति सम्बन्धी २६०६ इन सबको जोड़नेपर उक्त भङ्ग आ जाते हैं । इस प्रकार चारों गतियोंमें नामकर्मके उदयस्थानोंका निरूपण करके अब आगे इन्द्रिय आदि मार्गणाओंमें उनका वर्णन करते हैं ॥१६१॥


पंचैव उदयट्ठाणा सामण्णेइंदियस्स णायव्वा ।
इगि चउ पण छ सत्त य अधिया वीसा य होइ णायव्वा ॥१६२॥
अवसेससव्वभंगा जाणिन्तु जहाकमं णेया ।

अर्थ: इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा सामान्य एकेन्द्रिय जीवोंके इक्कीस, चौबीस, पचीस, छव्वीस और सत्ताईसप्रकृतिक पाँच उदयस्थान होते हैं, ऐसा जानना चाहिए । एकेन्द्रियसम्बन्धी इन सर्व उदयस्थानोंके सर्व भङ्ग पूर्वोक्त प्रकार यथाक्रमसे जानना चाहिए ॥१६२॥


इगिवीसं छब्बीसं अट्ठावीसादि जाव इगितीसं ॥१६३ ॥
वियलेंदियतियगस्सेवं उदयट्ठाणाणि छच्चेव ।

अर्थ: तीनों विकलेन्द्रियोंके इक्कीस, छब्बीस और अट्ठाईससे लेकर इकतीस तकके चार इस प्रकार छह उदयस्थान होते हैं ॥१६३॥


चउवीसं वज्जित्ता उदयट्ठाणा दसेव पंचक्खे ॥१६४॥

अर्थ: पंचेन्द्रियोंमें चौबीसप्रकृतिक उदयस्थानको छोड़कर शेष दशस्थान होते हैं ॥१६४॥


काएसु पंचकेसु य उदयट्ठाणाणिगिंदिभंगमिव ।
तसकाएसु णेया विगला सयलिंदियाण भंगमिव ॥१६५॥


चउ-तिय मण-वचिए पँचिदियसण्णिपज्जत्तमंगमिव ।
असच्चमोसवचिए तसपज्जत्तयउदयट्ठाणमंगमिव ॥१९६॥


ओरालियकायजोगे तसपज्जत्तमंगमिव ।
ओरालियमिस्सकम्मे उदयट्ठाणाणि जाणिदव्वाणि ॥१९७॥


सत्तेव य अपज्जत्ता सण्णियपज्जत्तमंगमिव ।
वेउव्वियकायदुगे देवाणं णारयाण मंगमिव ॥१९८॥


आहारदुगे णियमा पमत्त इव सव्वट्ठाणाणि ।
थी-पुरिसवेयगेसु य पंचिंदिय-उदयठाणभंगमिव ॥१९९॥

णउंसए पुण एवं वेदे ओघविगप्पा य होंति णायव्वा ।
उदयट्ठाण कसाए ओघभंगमिव होइ णायव्वं ॥२००॥

अर्थ (गाथा 199 से 200): आहारककाययोग और अहारकमिश्रकाययोगमें प्रमत्तगुणस्थानके समान उदयस्थान जानना चाहिए । अर्थात् आहारककाययोगमें सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक तीन उदयस्थान होते हैं । तथा आहारकमिश्रकाययोगमें पच्चीसप्रकृतिक एक उदयस्थान होता है । वेदमार्गणाकी अपेक्षा स्त्रीवेद और पुरुषवेदमें पंचेन्द्रियोंके समान उदयस्थान जानना चाहिए । अर्थात् इक्कीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक आठ-आठ उदयस्थान होते हैं । नपुंसक वेदमें इसी प्रकार ओघविकल्प जानना चाहिए । अर्थात् इक्कीस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक नौ उदयस्थान होते हैं कषायमार्गणाकी अपेक्षा चारों कषायोंमें ओघके समान इक्कीस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस और तीस प्रकृतिक और आठ उदयस्थान जानना चाहिए ॥१९९-२००॥


मइ-सुय-अण्णाणेसु य मिच्छा-सासणट्ठाणभंगमिव ।
अवसेसं णाणाणं सण्णिपज्जत्तभंगमिव जाणिज्जो ॥२०१॥

अर्थ: ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा कुमति और कुश्रुतज्ञानमें मिथ्यात्व और सासादन गुणस्थानके समान इक्कीस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक नौ उदयस्थान होते हैं । शेष छह ज्ञानोंके उदयस्थान संज्ञी पर्याप्तक पंचेन्द्रियोंके समान जानना चाहिए ॥२०१॥


असंजमे तहा ठाणं गेयं मिच्छाइचउसु गुणट्ठाणमिव ।
दसविरए य भंगा णेया तससंजमे चेव ॥२०२॥
अवसेससंजमट्ठाणं पमत्ताइगुणट्ठाणमिव ।

अर्थ: संयममार्गणाकी अपेक्षा असंयममें मिथ्यात्व आदि चार गुणस्थानोंके समान उदयस्थान जानना चाहिए। अर्थात् असंयममें इक्कीस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक नौ उदयस्थान होते हैं। त्रससंयम अर्थात् देशसंयममें देशविरत गुणस्थानके समान तीस और इकतीस प्रकृतिक दो उदयस्थान होते हैं। अवशेष संयमोंके उदयस्थान प्रमत्तादिगुणस्थानोंके उदयस्थानके समान जानना चाहिए ॥२०२॥


अचक्खुस्स ओघभंगो चक्खुस्स य चउ-पंचिंदियसमं गेयं ॥२०३॥

अर्थ: दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा अचक्षुदर्शनके उदयस्थान ओघके समान और चक्षुदर्शनके उदयस्थान चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रियजीवोंके समान जानना चाहिए ॥२०३॥


ओधिय केवलदंसे ओधिय-केवलणाणमिव ।
तेजपउमासुक्के सण्णी पंचिंदियभंगमिव ॥२०४॥

अर्थ: अवधिदर्शनमें अवधिज्ञानियोंके समान और केवलदर्शनमें केवलज्ञानियोंके समान उदयस्थान होते हैं। लेश्यामार्गणाकी अपेक्षा तेज, पद्म और शुक्ललेश्यामें संज्ञी पंचेन्द्रियजीवके समान उदयस्थान जानना चाहिए ॥२०४॥


भविएसु ओघभंगो अभविए मिच्छाइट्ठिभंगमिव ।
मिच्छा-सासण-मिस्से सय-सयगुणठाणभंगमिव ॥२०५॥

उवसमसम्मत्तादी सय-सयगुणमिव हवंति त्ति ।
सण्णिस्स ओघभंगो असण्णि मिच्छोघभंगमिव ॥२०६॥

आहार ओघभंगो अणाहारे चउसु ठाण कम्ममिव ।
अवसेसविहिविसेसा जाणित्तु जहाकमं णेया ॥२०७॥

अर्थ (गाथा 205 से 207): भव्यमार्गणाकी अपेक्षा भव्यजीवोंमें ओघके समान सभी उदयस्थान जानना चाहिए। अभव्योंमें मिथ्यादृष्टिके समान नौ और आठ प्रकृतिक उदयस्थानोंको छोड़कर शेष नौ उदयस्थान होते हैं। सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा मिथ्यात्व, सासादनसम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वमें अपने-अपने गुणस्थानोंके समान उदयस्थान जानना चाहिए। तथा उपशमसम्यक्त्व आदिमें भी अपने-अपने संभव गुणस्थानोंके समान उदयस्थान होते हैं। संज्ञिमार्गणाकी अपेक्षा संज्ञीके ओघके समान सभी उदयस्थान होते हैं। असंज्ञीके मिथ्यात्वगुणस्थानके समान भंग जानना चाहिए। आहारमार्गणाकी अपेक्षा आहारकोंके ओघके समान भङ्ग जानना चाहिए। अनाहारकोंमें कार्मणकाययोगके समान चार उदयस्थान जानना चाहिए। इसके अतिरिक्त जो अवशिष्ट विधिविशेष है, वह आगमके अनुसार यथाक्रमसे जान लेना चाहिए ॥२०५-२०७॥


ति-दु-इगिणउदिं णउदिं अड-चउ-दुगाहियमसीदिमसीदिं च ।
उणसीदिं अट्ठत्तरि सत्तत्तरि दस य णव संता ॥२०८॥

अर्थ: नामकर्मके तेरानवै, बानवै, इक्यानवै, नब्बे, अठासी, चौरासी, बियासी, अस्सी, उन्यासी, अट्ठहत्तर, सतहत्तर, दश और नौ प्रकृतिक तेरह सत्त्वस्थान होते हैं ॥२०८॥


गइआदियित्तिथंते सव्वपयडीउ संत तेणउदिं ।
वजित्ता तित्थयरं वाणउदिं होंति संताणि ॥२०९॥

अर्थ: गतिनामकर्मको आदि लेकरके तीर्थंकर प्रकृतिपर्यन्त नामकर्मकी जो तेरानवै प्रकृतियाँ हैं, उन सबका जहाँ सत्त्व पाया जावे, वह तेरानवै प्रकृतिकसत्त्वस्थान है इसमेंसे तीर्थंकरप्रकृतिको छोड़ देनेपर बानवैप्रकृतिक सत्त्वस्थान हो जाता है ॥२०९॥
९३ तेरानवैप्रकृतिक सत्त्वस्थान सर्वप्रकृतियाँ। तीर्थंकर बिना ९२।


तेणउदीसंतादो आहारदुअं वज्जिदूण इगिणउदी ।
आहारय-तित्थयरं वज्जित्ता वा हवंति णउदिसंताणि ॥२१०॥

अर्थ: तेरानवैप्रकृतिक सत्त्वस्थानमेंसे आहारकशरीर और आहारक-अंगोपांग, इन दोके निकाल देनेपर इक्यानवैप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है। तथा उसी तेरानवैप्रकृतिक सत्त्वस्थानमें से तीर्थंकर और आहारकद्विक; इन तीन प्रकृतियोंके निकाल देनेपर नव्बैप्रकृतिक सत्त्वस्थान हो जाता है ॥२१०॥
आहारकद्विक बिना ९१। तीर्थंकर और आहारकद्विक बिना ९०।


णउदीसंतेसु तहा देवदुगुव्विल्लिदे य अडसीदिं ।
णिरयचदुं उव्वेल्लिदे य चउरासी दीय संतपयडीओ ॥२११॥

अर्थ: नव्बैप्रकृतिक सत्त्वस्थानमें से देवद्विक अर्थात् देवगति और देवगत्यानुपूर्वी इन दो प्रकृतियोंके उद्वेलन करनेपर अठासीप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है। तथा इसी अठासीप्रकृतिक सत्त्वस्थानमें से नरकचतुष्क अर्थात् नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिक-अंगोपांग, इन चार प्रकृतियोंकी उद्वेलना करनेपर चौरासीप्रकृतिक सत्त्वस्थान हो जाता है ॥२११॥
देवद्विक बिना ८८। नरकचतुष्क बिना ८४।


मणुयदुयं उव्वेल्लिए वासीदी चेव संतपयडीओ ।
तेणउदीसंताओ तेरसमवण्णिज्ज णवमखवगाई ॥२१२॥

अर्थ: चौरासीप्रकृतिक सत्त्वस्थानमेंसे मनुष्यद्विक अर्थात् मनुष्यगति और मनुष्यगत्यानुपूर्वी इन दो प्रकृतियोंकी उद्वेलना करनेपर बियासीप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है । तेरानबैप्रकृतियोंके सत्त्वस्थानमेंसे तिर्यंचद्विक, मनुष्यद्विक, एकेन्द्रियजाति, स्थावर, आतप, उद्योत, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रियजाति, सूक्ष्म और साधारण इन तेरह प्रकृतियोंके निकाल देनेपर अस्सीप्रकृतिक सत्त्वस्थान नवमगुणस्थानवर्ती क्षपक आदि उपरिम पाँच गुणस्थानवर्ती जीवोंके होता है ॥२१२॥ ८४ मेंसे मनुष्यद्विकके बिना ८२ । ९३ मेंसे तेरहके बिना ८० ।


आसीदि होइ संता थिय-इगि-णउदी य ऊणिया चेव ।
तेरसमवणीय सेसं णवासी अट्ठसत्तरा य सत्तत्तरिया ॥२१३॥

अर्थ: बानवैप्रकृतिक सत्त्वस्थानमेंसे उपर्युक्त तेरह प्रकृतियोंके निकाल देनेपर उन्यासीप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है । इक्यानवैप्रकृतिक सत्त्वस्थानमेंसे उन्हीं तेरह प्रकृतियोंके कम कर देनेपर अठहत्तरप्रकृतिक सत्त्वस्थान हो जाता है । नब्बैप्रकृतिक सत्त्वस्थानमें से उन्हीं तेरह प्रकृतियोंके कम कर देनेपर सतहत्तरप्रकृतिक सत्त्वस्थान हो जाता है ॥२१३॥ ९२मेंसे १३ के बिना ७९ । ९१ मेंसे १३ के बिना ७८ । ९० मेंसे १३ के बिना ७७ ये तीनों सत्त्वस्थान अनिवृत्तिक्षपकादि पाँच गुणस्थानोंमें होते हैं ।


इगि-वियलिंदियजाई णिरिय-तिरिक्खगइ आयउज्जोवं ।
थावर सुहुमं च तहा साहारण-णिरय-तिरियाणुपुव्वी य ॥२१४॥

एए तेरह पयडी पंचसु अणियट्ठिखवगाई ।
अजोगिचरमसमए दस णव ठाणाणि होंति पायव्वा ॥२१५॥

अर्थ (गाथा 214 से 215): एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रियजाति, नरकगति, तिर्यंचगति, आतप; उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म, साधारण, नरकानुपूर्वी और तिर्यंचानुपूर्वी, इन तेरह प्रकृतियोंका विनाश अनिवृत्तिकरण क्षपक करता है । अतएव अनिवृत्तिक्षपकसे आदि लेकर अयोगिकेवलीके द्विचरम-समयपर्यन्त अस्सी आदि चार सत्त्वस्थान होते हैं । दश और नव प्रकृतिक सत्त्वस्थान अयोगिकेवलीके चरम समयमें जानना चाहिए ॥२१४-२१५॥


'मणुयदुयं पंचिंदिय तस वायर सुहय पज्जत्तं ।
आएज्जं जसकित्ती तित्थयरं होंति दस एया ॥२१६॥

अर्थ: दशप्रकृतिक सत्त्वस्थानमें मनुष्यद्विक, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, बादर, सुभग, पर्याप्त, आदेय, यशःकीर्त्ति और तीर्थंकर, ये दश प्रकृतियाँ होती हैं । (इनमेंसे तीर्थङ्करप्रकृतिके विना शेष नौ प्रकृतियाँ नौप्रकृतिक सत्त्वस्थानमें पाई जाती हैं) ॥२१६॥


अट्ठसु असंजयाइसु चत्तारि हवंति आदिसंताणि ।
तेणउदीरहियाइं मिच्छे छव्वेव पढमसंताणि ॥२१७॥

अर्थ: आदिके चार सत्त्वस्थान असंयतसम्यग्दृष्टि नामक चौथे गुणस्थानसे लेकर आठ गुणस्थानोंमें पाये जाते हैं । तेरानवैप्रकृतिक सत्त्वस्थानके बिना प्रारम्भके छह सत्त्वस्थान मिथ्यात्व गुणस्थानमें होते हैं ॥२१७॥ अविरतादि उपशान्तान्त आठ गुणस्थानोंमें ९३, ९२, ९१, ६०, प्रकृतिक सत्त्वस्थान हैं । मिथ्यात्वमें ९२, ९१, ६०, ८८, ८४, ८२ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होते हैं ।


णउदीसंता सादे षाणउदी णउदि होंति मिस्सम्मि ।
षाणउदि णउदि संता अड चदु दु अधियमसीदि तिरिएसु ॥२१८॥

बाणउदि एगणउदी णउदी णिरए सुरेसु पढमचदुं ।
वासीदी हीणाई मणुएसु हवंति सव्वाणि ॥२१९॥

अर्थ (गाथा 218 से 219): सासादनगुणस्थानमें नब्बेप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है। मिश्रगुणस्थानमें बानवै और नब्बे प्रकृतिक दो सत्त्वस्थान होते हैं। तिर्यञ्चोंमें बानवै, नब्बे, अट्ठासी, चौरासी और बियासी प्रकृतिक पाँच सत्त्वस्थान होते हैं। नारकियोंमें बानवै, इक्यानवै और नब्बे प्रकृतिक तीन सत्त्वस्थान होते हैं। देवोंमें आदिके चार सत्त्वस्थान होते हैं। मनुष्योंमें बियासीके बिना शेष सर्व सत्त्वस्थान होते हैं ॥२१८-२१६॥


[मूलगा०२४] अट्ठेगारस तेरस बंधोदयसंतपयडिट्ठाणानि ।
ओघेणादेसेण य एत्तो जिह संभवं †विसज्जे ॥२२०॥

अर्थ: नामकर्मके बन्धस्थान आठ हैं, उदयस्थान ग्यारह हैं और सत्त्वस्थान तेरह हैं। इनका ओघ और आदेशकी अपेक्षा जहाँ जो स्थान संभव हैं, उनका कथन करते हैं ॥२२०॥


[मूलगा०२५] ¹णव पंचोदयसंता तेवीसे पंचबीस छव्वीसे ।
अट्ठ चउरट्ठवीसे णव सत्तगुत्तीस तीसम्मि ॥२२१॥

अर्थ: नामकर्मके तेईस, पच्चीस और छब्बीस प्रकृतिक तीन बन्धस्थानोंमें नौ उदयस्थान, और पाँच सत्त्वस्थान होते हैं। अट्ठाईसप्रकृतिक सत्त्वस्थानमें आठ उदयस्थान और चार सत्त्वस्थान होते हैं। उनतीस और तीस प्रकृतिक दो बन्धस्थानोंमें नौ उदयस्थान और सात सत्त्वस्थान होते हैं ॥२२१॥


तिय पण छब्बीसेसु वि उवरिम दो वज्जिदूण णव उदया ।
पण संता बाणउदी णउदी अड-चउर वासीदिं ॥२२२॥

अर्थ: तेईस, पच्चीस और छब्बीसप्रकृतिक बन्धस्थानोंमें उपरिम दो बन्धस्थानोंको छोड़कर आदिके नौ उदयस्थान होते हैं। तथा बानवे, नब्बे, अठासी, चौरासी और बियासीप्रकृतिक पाँच सत्त्वस्थान होते हैं ॥२२२॥


बासीदिं वजित्ता चउसंता होंति पुव्वभणिया दु।
तह सत्तावीसुदए बंधट्ठाणानि ते तिण्णि ॥२२३॥

अर्थ: तथा सत्ताईसप्रकृतिक उदयस्थानमें बन्धस्थान तो ये पूर्वोक्त तीन ही होते हैं, किन्तु सत्त्वस्थान पूर्वोक्तोंमेंसे बियासीको छोड़कर शेष चार होते हैं ॥२२३॥


उवरिमदुयचउवीस य वज्जिय अट्ठुदय अट्ठवीसम्हि ।
चउ संता बाणउदी इगिणउदि णउदि अट्ठसीदी य ॥२२४॥

अर्थ: अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें चौबीसप्रकृतिक और अन्तिम दो उदयस्थानोंको छोड़कर आठ उदयस्थान तथा बानवै, इक्यानवै, नब्बै और अठासीप्रकृतिक चार सत्त्वस्थान होते हैं ॥२२४॥


'अट्ठ चउरट्ठवीसे य कमसोदयसंतबंधठाणा दु ।
सामण्णेण य भणिया विसेसदो एत्थ कायव्वो ॥२२५॥

छव्वीसिगिवीसुदया बाणउदी णउदि अट्ठवीसे य ।
खाइयसम्मत्ताणं पुण कुरुवेसुप्पज्जमाणाणं ॥२२६॥

अर्थ (गाथा 225 से 226): अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें क्रमशः आठ उदयस्थानों और चार सत्त्वस्थानोंका सामान्यसे वर्णन किया । अब यहाँपर जो कुछ विशेषता है, उसका वर्णन करना चाहिए । वह विशेषता यह है कि अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें इक्कीस और छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थान तथा बानवै और नव्वेप्रकृतिक सत्त्वस्थान देवकुरु और उत्तरकुरुमें उत्पन्न होनेवाले क्षायिक-सम्यक्त्वी मनुष्योंके ही संभव हैं ॥२२५-२२६॥


'पण सत्तावीसउदया बाणउदी संतमट्ठवीसे य ।
आहारयमुदयंते पमत्तविरदे चेव हवे ॥२२७॥

अर्थ: अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें पच्चीस और सत्ताईसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए बानवैप्रकृतिक सत्त्वस्थान आहारकशरीरके उदयवाले प्रमत्तविरत साधुके ही होता है ॥२२७॥ बन्धस्थान २८ में तथा उदयस्थान २५, २७ में सत्त्वस्थान ९२ ही होता है।


उगुतीस अट्ठवीसा वाणउदि णउदि अट्ठवीसे य ।
आहारसंतकम्मे अविरयसम्मे पमत्तिदरे ॥२२८॥

अर्थ: अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें उनतीस और अट्ठाईसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए बानवै और नब्बेप्रकृतिक सत्त्वस्थान आहारकप्रकृतिके सत्त्ववाले अविरतसम्यक्त्वी और संयतके होते हैं ॥२२८॥ बन्धस्थान २८ में तथा उदयस्थान २९ और २८ में सत्त्वस्थान ९२ और ९० होते हैं।


बाणउदि-णउदिसंता तीसुदयं अट्ठवीसबंधेसु ।
मिच्छाट्ठि पायव्वा विरयाविरयंतजीवेसु ॥२२९॥

अर्थ: अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानोंमें तथा तीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए बानवै और नब्बेप्रकृतिक सत्त्वस्थान मिथ्यादृष्टिको आदि लेकर संयतासंयतगुणस्थान तकके जीवोंमें पाये जाते हैं ॥२२९॥


तह अट्ठवीसबंधे तीसुदए संतमेकणउदी य ।
तित्थयरसंतयाणं वि-तिखितिदुसुप्पज्जमाणाणं ॥२३०॥

अर्थ: अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें तथा तीसप्रकृतिक उदयस्थानमें इक्यानबैप्रकृतिक सत्त्वस्थान तीर्थंकरप्रकृतिकी सत्तासे युक्त और दूसरी-तीसरी नरकभूमिमें उत्पन्न होनेवाले जीवोंके होता है ॥२३०॥ बन्धस्थान २८ में तथा उदयस्थान ३० में सत्त्वस्थान ९१ होता है।


अडसीदिं पुण संता तीसुदए अट्ठवीसबंधेसु ।
सामित्तं जाणिज्जो तिरिय-मणुए मिच्छजीवाणं ॥२३१॥

अर्थ: अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें तीसप्रकृतिक उदयस्थानमें और अठासीप्रकृतिक सत्त्वस्थानका स्वामित्व मिथ्यादृष्टि तिर्यंच और मनुष्योंके जानना चाहिए ॥२३१॥ बन्धस्थान २८ में उदयस्थान ३० में और सत्त्वस्थान ८८ में यह विशेषता कही।


बाणउदिणउदिसंता इगितीसुदयट्ठवीसबंधेसु ।
मिच्छाइसु णायव्वा विरयाविरयंतजीवेसु ॥२३२॥

अर्थ: अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें इकतीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए बानवै और नब्बवै प्रकृतिक सत्त्वस्थान मिथ्यादृष्ट्यादि विरताविरतान्त जीवोंके जानना चाहिए ॥२३२॥


'अडसीदिं पुण संता इंगितीसुदयट्ठवीसबंधेसु ।
सामित्तं जाणिज्जो तेरिच्छियमिच्छजीवाणं ॥२३३॥

अर्थ: अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें इकतीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए अठासीप्रकृतिक सत्त्वस्थानका स्वामित्व तिर्यञ्च मिथ्यादृष्टि जीवोंके जानना चाहिए ॥२३३॥


²उगुतीस तीसबंधे चरिमे दो वज्जिदूण णवउदये ।
तिगणउदादी णियमा संतट्ठाणाणि सत्तेव ॥२३४॥

अर्थ: उनतीस और तीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें अन्तिम दो स्थानोंको छोड़कर शेष नौ उदयस्थानोंके रहते हुए नियमसे तेरानवे आदिक सात सत्त्वस्थान होते हैं ॥२३४॥


³णव सत्तोदयसंता उगुतीसे तीसबंधठाणेसु ।
सामण्णेण य भणिया विसेसदो एत्थ वत्तव्वो ॥२३५॥

अर्थ: इस प्रकार उनतीस और तीसप्रकृतिक बन्धस्थानोंमें नौ उदयस्थान और सात सत्तास्थान सामान्यसे कहे। अब उनमें जो कुछ विशेष वक्तव्य है, उसे कहते हैं ॥२३५॥


उगुतीसबंधगेसु य उदये इगिवीससंततिगिणउदी ।
तित्थयरबंधसंजुयमणुयाणं विग्गहे होइ ॥२३६॥

अर्थ: उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें इक्कीसप्रकृतिक उदयके रहते हुए तेरानवे और इक्यानबैप्रकृतिक सत्तास्थान तीर्थङ्करप्रकृतिके बन्धसंयुक्त मनुष्योंके विग्रहगतिमें होता है ॥२३६॥ बन्धस्थान २९में उदयस्थान २१ के रहते हुए सत्तास्थान ९३।९१ होते हैं।


'ते चेव य बंधुदया णाणउदी णउदि संतठाणाणि ।
चउगदिगदेसु जाणे विग्गहमुक्केसु होंति त्ति ॥२३७॥

अर्थ: उन्हीं पूर्वोक्त उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थान और इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए बानवै और नब्बे प्रकृतिक सत्तास्थान विग्रहविमुक्त चारों गतियोंके जीवोंके होते हैं ऐसा जानना चाहिए ॥२३७॥ बन्धस्थान २९ और उदयस्थान २१ के रहते ९२ व ९० सत्तास्थान विग्रहविमुक्त चातुर्गतिक जीवोंके होता है ।


'ते चेव बंधुदया अड-चउसीदी य विग्गहे भणिया ।
मणुय-तिरिएसु णियमा बासीदी होदि तिरियम्हि ॥२३८॥

अर्थ: उन्हीं उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थान और इक्कीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए अठासी और चौरासीप्रकृतिक सत्तास्थान विग्रहगतिको प्राप्त तिर्यञ्च और मनुष्योंमें कहे गये हैं। किन्तु बियासीप्रकृतिक सत्तास्थान नियमसे तिर्यञ्चमें ही पाया जाता है ॥२३८॥ बन्धस्थान २६ और उदयस्थान २१ में सत्तास्थान ८८, ८४ मनुष्य-तिर्यञ्चोंके होता है । किन्तु ८२ सत्तास्थान तिर्यञ्चोंके ही होता है ।


³बंधं तं चेव उदयं चउवीसं णउदि होंति बाणउदी ।
एइंदियअपज्जत्ते अड चउ बासीदि संता दु ॥२३९॥

अर्थ: उसी उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें चौबीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए बानवै, नब्बे, अठासी, चौरासी और बियासीप्रकृतिक पाँच सत्तास्थान एकेन्द्रिय अपर्याप्तके होते हैं ॥२३९॥ एकेन्द्रिय अपर्याप्तमें बन्धस्थान २६ उदयस्थान २४ और सत्तास्थान ९२, ९०, ८८, ८४, ८२ होते हैं।


⁴बंधं तं चेव उदयं पणुवीसं संत सत्त हेडिमया ।
जह संभवेण जाणे चउगहपउत्तमिदराणं ॥२४०॥

अर्थ: उसी उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें पच्चीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए अधस्तन सात सत्तास्थान यथासंभव चारों गतियोंके अपर्याप्त जीवोंके जानना चाहिए ॥२४०॥


'तीसादो एगूणं छव्वीसं अंतिमा दु उदयट्ठू ।
संता सत्तादिल्ला ऊणत्तीसाण बंधंति ॥२४१॥

अर्थ: तीसप्रकृतिक अन्तिम उदयस्थानको आदि लेकर एक-एक कम करते हुए छब्बीसप्रकृतिक उदयस्थान तकके स्थानवाले और आदिके सात सत्तास्थानवाले जीव उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थान को बाँधते हैं ॥२४१॥


'बा चउ अट्ठासीदि य णउदी बाणउदि संतठाणाणि ।
उणतीसं बंधंति य तिरि एक्कीस उदए दु ॥२४२॥

अर्थ: इकतीस प्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए बियासी, चौरासी, अट्ठासी, नब्बे और बानबैप्रकृतिक सत्त्वास्थानवाले तिर्यञ्च उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थानको बाँधते हैं ॥२४२॥ बन्धस्थान २६ में उदयस्थान ३१ के रहते हुए सत्त्वास्थान ६२, ६०, ८८, ८४, ८२ होते हैं। इस प्रकार उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थानको आधार बनाकर उदयस्थान और सत्त्वास्थानोंका वर्णन समाप्त हुआ।


जे ऊणतीसबंधे भणिया खलु उदय-संतठाणाणि ।
ते तीसबंधठाणे णियमा होंति त्ति बोहव्वा ॥२४३॥

अर्थ: उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें जो-जो उदयस्थान और सत्तास्थान पहले कहे गये हैं, वे ही नियमसे तीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥२४३॥


बंधं तं चेवुदयं पणुवीसं संत सत्त ठाणानि ।
ति इगि णउदि देव-णिरए तिरिए बासीदि संता दु ॥२४४॥

बाणउदि णउदिसंता चउमइजीवेसु अट्ठ चउसीदि ।
तिरिय-मणुएसु जाणे सव्वे सत्तेव सत्ता दु ॥२४५॥

अर्थ (गाथा 244 से 245): तीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें पचीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए आदिके सात सत्तास्थान होते हैं। उनमेंसे देव और नारकियोंके तेरानवै और इक्यानवैप्रकृतिक दो सत्तास्थान होते हैं, तिर्यञ्चोंमें बियासीप्रकृतिक सत्तास्थान होता है, चारों गतियोंके जीवोंके बानवै और नब्बेप्रकृतिक स्थान होते हैं, तथा तिर्यञ्च और मनुष्योंमें अठासी और चौरासीप्रकृतिक सत्तास्थान होते हैं। इस प्रकार तीसप्रकृतिक बन्धस्थान और पचीसप्रकृतिक उदयस्थानमें आदिके सातों ही सत्तास्थान जानना चाहिए ॥२४४-२४५॥ बन्धस्थान ३० और उदयस्थान २५ में सत्तास्थान ९३, ९२, ९१, ९०, ८८, ८४ और ८२ होते हैं। इस सत्तास्थानोंका विभाग इस प्रकार है-देव-नारकोंमें ९३, ९१, तिर्यञ्चोंमें ८२, चातुर्गतिक जीवोंमें ९२, ९० और मनुष्य-तिर्यञ्चोंमें ८८, ८४ प्रकृतिक सत्तास्थान होते हैं।


तं चेव य बंधुदयं छव्वीसं णउदि होइ बाणउदी ।
अड चउरासीदि तिरिय-मणुए तिरिए बासीदि संता दु ॥२४६॥

अर्थ: उसी तीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें छव्वीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए बानवै, नव्बै, अठासी और चौरासीप्रकृतिक सत्तास्थान तिर्यञ्च और मनुष्योंमें पाये जाते हैं। किन्तु बियासी प्रकृतिक सत्तास्थान तिर्यञ्चोंमें ही पाया जाता है ॥२४६॥


इगि पण सत्तावीसं अट्ठावीसूणतीस उदया दु ।
तीसण्हं बंधम्मि य सत्ता आदिल्लया सत्ता ॥२४७॥

अर्थ: तीस प्रकृतिक बन्धस्थानमें इक्कीस, पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीसप्रकृतिक उदयस्थानोंके रहते हुए आदिके सात सत्तास्थान होते हैं ॥२४७॥


चउछव्वीसिगितीसय-तीस-उदयम्मि तीस-बंधम्मि ।
तेणउदिगिणउदीओ वज्जित्ता पंच संता दु ॥२४८॥

अर्थ: उसी तीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें चौबीस, छब्बीस, तीस और इकतीसप्रकृतिक उदयस्थानके रहते हुए तेरानवै और इक्यानवैप्रकृतिक दो स्थानोंको छोड़कर शेष पाँच सत्तास्थान पाये जाते हैं ॥२४८॥


एगेगं इगितीसे एगेगुदयट्ठ संतम्मि ।
उवरयबंधे चउ दस वेदयदि संतठाणानि ॥२४६॥

अर्थ: इकतीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें एक उदयस्थान और एक सत्तास्थान होता है । एकप्रकृतिक बन्धस्थानमें एक उदयस्थान और आठ सत्तास्थान होते हैं । उपरतबन्धमें चार उदयस्थान और दश सत्तास्थान होते हैं ।


इगितीसबंधगेसु य तीसूदओ संतम्मि य तेणउदिं ।
एयविहबंधगेसु य उदओ वि य तीस अट्ठ संता य ॥२५०॥

आदी वि य चउठाणा उवरिम दो वज्जिऊण चउ हेट्ठा ।
संतट्ठाणा णियमा उवसम-खवगेसु बोद्धव्वा ॥२५१॥

अर्थ (गाथा 250 से 251): इकतीसप्रकृतिक बन्धस्थानवाले जीवोंमें तीसप्रकृतिक एक उदयस्थानका उदय, तथा सत्तामें तेरानवे प्रकृतिक एक सत्तास्थान रहता है। एकप्रकृतिक बन्धस्थानवाले जीवोंमें तीसप्रकृतिक एक उदयस्थान और आठ सत्तास्थान होते हैं। जो इस प्रकार हैं-आदि के चार सत्तास्थान और उपरिम दो को छोड़कर अधस्तन चार सत्तास्थान। ये सत्तास्थान नियमसे उपशामकोंमें और क्षपकोंमें जानना चाहिए ॥२५०-२५१॥ अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणसंयतोंके बन्धस्थान ३१ में उदयस्थान ३० के रहते हुए ९३ प्रकृतिक सत्तास्थान होता है। एक प्रकृतिक बन्धस्थानमें उदयस्थान ३० के रहते हुए उपशामकोंमें ९३, ९२, ९१ और ९० प्रकृतिक चार सत्तास्थान तथा क्षपकोंमें ८०, ७९, ७८ और ७७ प्रकृतिक चार सत्तास्थान होते हैं।


उवरयबंधे इगितीस तीस णव अट्ठ उदयठाणाणि ।
छा उवरिं चउ हेट्ठा संतट्ठाणाणि दस एदे ॥२५२॥

अर्थ: उपरत बन्धस्थानमें इकतीस, तीस, नौ और आठ प्रकृतिक चार उदयस्थान, तथा उपरिम छह और अधस्तन चार; इस प्रकार दश सत्तास्थान होते हैं ॥२५२॥ उपरतबन्धमें उदयस्थान ३१, ३०, ९, ८, तथा सत्तास्थान ९३, ९२, ९१, ९०, ८०, ७६, ७८, ७७, १०, ९ होते हैं। इस प्रकार नामकर्मके बन्धस्थानोंमें उदयस्थानोंके साथ सत्तास्थानोंकी प्ररूपणा समाप्त हुई।


[मूलगा० २७] 'तिवियप्पपयदिठाणा जीव-गुणसण्णिदेसु ठाणेसु ।
भंगा पडिजियव्वा जत्थ जहा पयदिसंभवो हवइ ॥२५३॥

अर्थ: बन्ध, उदय और सत्ताकी अपेक्षा तीन प्रकारके जो प्रकृतिस्थान हैं, उनकी अपेक्षा जीव-समास और गुणस्थानोंमें जहाँ जितनी प्रकृतियाँ संभव हों, वहाँ उतने भङ्ग घटित करना चाहिए ॥२५३॥


[मूलगा० २८] ‘तेरससु जीवसंखेवएसु णाणंतराय-तिवियप्पो ।
एक्कम्हि ति-दु-वियप्पो करणं पीडि एत्थ अवियप्पो’ ॥२५४॥

अर्थ: आदिके तेरह जीवसमासोंमें ज्ञानावरण और अन्तरायके तीन विकल्प होते हैं। संज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त नामक एक चौदहवें जीवसमासमें तीन और दो विकल्प होते हैं। किन्तु करण अर्थात् उपशान्त और क्षीणकषायगुणस्थानमें बन्धका कोई विकल्प नहीं है ॥२५४॥


'तेरे णव चउ पणयं णव संता एत्थम्मि तेरह वियप्पा ।
वेयणीयाउगोदे विभज मोहं परं वोच्छं ॥२५५॥

अर्थ: प्रारम्भके तेरह जीव-समासोंमें दर्शनावरणकर्मके नौ प्रकृतिक बन्धस्थान, चार अथवा पाँच प्रकृतिक उदयस्थान और नौ प्रकृतिक सत्तास्थानरूप दो भंग होते हैं । एक चौदहवें संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक नामक जीवसमासमें तेरह विकल्प होते हैं। वेदनीय, आयु और गोत्रकर्म-सम्बन्धी स्थानोंके भंगोंका स्वयं विभाग करना चाहिए। तदनन्तर क्रम-प्राप्त मोहनीयकर्मके स्थानसम्बन्धी भंगोंका मैं वर्णन करूँगा ॥२५॥


बासट्ठि वेयणीए आउस्स हवंति तियधिगसयं तु ।
गोदस्स य सगदालं जीवसमासेसु णेयव्वा ॥२५६॥

अर्थ: जीवसमासोंमें वेदनीयकर्मके बन्धादित्रिकके भंग बासठ होते हैं, आयुकर्मके तीन अधिक सौ अर्थात् एक सौ तीन भंग होते हैं और गोत्रकर्मके सैंतालीस भंग जानना चाहिए ॥२५६॥ वेदनीयके भंग ६२, आयुके १०३ और गोत्रके ४७ होते हैं ।


चोद्दस जीवे पढमा चउ चउभंगा भवंति वेयणिए ।
छच्चेव केवलीणं सव्वे वावट्ठि भंगा हु ॥२५७॥

अर्थ: चौदह जीवसमासोंमेंसे प्रत्येक जीवसमासमें वेदनीयकर्मके त्रिसंयोगी प्रथम चार-चार भंग होते हैं। चौदहवें जीवसमासके अन्तर्गत केवलीके छह भंग होते हैं। इस प्रकार सर्व मिलकर वेदनीयकर्मके बासठ भंग हो जाते हैं ॥२५७॥


'एयार जीवठाणे पणवण्णा चेव होंति भंगा य ।
पज्जत्तासण्णीसु य णव दस सण्णी अपज्जत्ते ॥२५८॥

२सण्णी पज्जत्तस्स य अट्ठावीसा हवंति आउस्स ।
तिगधियसयं तु सव्वे केवलिभंगेण संजुत्तं ॥२५९॥

३सुर-णिरएसु पंच य तिरिय-मणुएसु हवंति णव भंगा ।
बंधंते बंधेसु वि चउसु वि आउस्स कमसो दु ॥२६०॥

अर्थ (गाथा 258 से 260): एकेन्द्रिय सूक्ष्म, एकेन्द्रिय बादर, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय इन पाँचके पर्याप्त और अपर्याप्त-सम्बन्धी दश, तथा एक असंज्ञी अपर्याप्त, इन ग्यारह जीवसमासोंमें आयुकर्मके त्रि-संयोगी भङ्ग पचपन होते हैं । पर्याप्त असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवसमासमें नौ भङ्ग होते हैं । अपर्याप्त संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवसमासमें दश भङ्ग होते हैं । तथा पर्याप्त संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवसमासमें अट्ठाईस भङ्ग होते हैं । ये सब केवलिसम्बन्धी एक भङ्गसे संयुक्त होकर एकसौ तीन भङ्ग आयु-कर्मके होते हैं । संज्ञी पंचेन्द्रियके अट्ठाईस भङ्ग इस प्रकार हैं-आयु-कर्मके ये भङ्ग चारों गतियोंमें आयु बंधने और नहीं बँधनेकी अपेक्षा क्रमसे देवोंमें पाँच, नारकियोंमें पाँच, तिर्यञ्चोंमें नौ और मनुष्योंमें नौ होते हैं ॥२५८-२६०॥


उच्चं णीचं णीचं णीचं बंधुदयसंतजुयलं च ।
सव्वं णीचं च तहा पुह भंगा होंति तिण्णेवं ॥२६१॥

अर्थ: उच्चगोत्रका बन्ध, नीचगोत्रका उदय और दोनोंका सत्तारूप प्रथम भङ्ग है । नीचगोत्रका बन्ध, नीचगोत्रका उदय और दोनोंका सत्तारूप द्वितीय भङ्ग है । तथा सर्वनीच अर्थात् नीचगोत्र का बन्ध, नीचगोत्रका उदय और नीचगोत्रका सत्तारूप तृतीय भङ्ग है । इस प्रकार गोत्रकर्मके पृथक्-पृथक् ये तीन भङ्ग होते हैं ॥२६१॥


तेरस जीवसमासेसु एगुणताला हवंति भंगा हु ।
पढमा छ सण्णिपज्जत्तयस्स दो केवलीणं च ॥२६२॥

अर्थ: संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तको छोड़कर शेष तेरह जीवसमासोंमें उक्त तीन-तीन भङ्ग होते हैं । अतएव तेरहको तीनसे गुणित करनेपर तेरह जीवसमासोंके उनतालीस भङ्ग हो जाते हैं । संज्ञी-पंचेन्द्रिय पर्याप्तकके प्रारम्भके छह भङ्ग होते हैं । केवलीके अन्तिम दो भङ्ग होते हैं ॥२६२॥


सव्वे वि मिलिएसु य भंगवियप्पा हवंति गोयस्स ।
सत्तुत्तरतालीसं एत्तो मोहं परं वोच्छं ॥२६३॥

अर्थ: ऊपर जो तेरह जीवसमासके उनतालीस संज्ञीपंचेन्द्रिय पर्याप्तकके छह और केवलीके दो भङ्ग बतलाये हैं, वे सब मिलकर गोत्रकर्मके सैंतालीस भङ्ग होते हैं । अब इससे आगे मोहकर्मके भङ्ग कहेंगे ॥२६३॥


[मूलगा०३०] अट्ठसु पंचसु एगे एय दुय दसय मोहबंधगए ।
तिउ चउ णव उदयगदे तिय तिय पण्णारस संतम्मि¹ ॥२६४॥

अर्थ: आठ, पाँच और एक जीवसमासमें मोहकर्मके क्रमशः एक, दो और दश बन्धस्थान; तीन, चार और नौ उदयस्थान; एवं तीन-तीन और पन्द्रह सत्त्वस्थान होते हैं ॥२६४॥


¹सत्त अपज्जत्तेसु य पज्जत्ते सुहुम तह य अट्ठसु य ।
वावीसं बंधोदय-संता पुण तिण्णि पढमिल्ला ॥२६५॥

अर्थ: सातों अपर्याप्तक, तथा सूक्ष्म पर्याप्तक, इन आठों जीवसमासोंमें बाईसप्रकृतिक बन्धस्थान के साथ आदिके तीन उदयस्थान और तीन सत्तास्थान होते हैं ॥२६५॥ आठ जीवसमासोंमेंसे प्रत्येकमें बन्धस्थान २२ में उदयस्थान १०, ९, ८ प्रकृतिक और सत्तास्थान २८, २७, २६, प्रकृतिक तीन-तीन होते हैं।


²पञ्चसु पज्जत्तेसु य पज्जत्तयसण्णिणामगं वज्जं† ।
हेट्ठिमx दो चउ तिण्णि य बंधोदयसंतठाणाणि ॥२६६॥

अर्थ: पर्याप्त संज्ञीनामक जीवसमासको छोड़कर शेष पाँच पर्याप्तक जीवसमासोंमें अधस्तन दो बन्धस्थान, चार उदयस्थान और तीन सत्तास्थान होते हैं ॥२६६॥ पाँच पर्याप्तक जीवसमासोंमें बन्धस्थान २२, २१ प्रकृतिक दो; उदयस्थान १०, ९, ८, ७ प्रकृतिक चार और सत्तास्थान २८, २७, २६ प्रकृतिक तीन होते हैं।


⁴दस णव पण्णरसाइ बंधोदयसंतपयडिठाणाणि ।
सण्णिपज्जत्तयाणं संपुण्ण चि+ बोधव्व ॥२६७॥

अर्थ: संज्ञी पर्याप्तक जीवोंके बन्धस्थान दश, उदयस्थान नौ और सत्त्वस्थान पन्द्रह होते हैं। अर्थात् इस चौदहवें जीवसमासमें सम्पूर्ण बन्धस्थान, उदयस्थान और सत्तास्थान जानना चाहिए ॥२६७॥


[मूलगा०३१] ‘सत्तेव अपज्जत्ता सामी सुहुमो य बायरो चेव ।
वियलिंदिया य तिणि दु तहा असण्णी य सण्णी य’ ॥२६८॥

[मूलगा०३२] २पणय दुय पणय पणयं चदु पण बंधुदय संत पणयं च ।
पण छक्क पणय छक्क पणय अट्ठट्ठमेयारं२ ॥२६९॥

अर्थ (गाथा 268 से 269): पाँच बन्धस्थान, दो उदयस्थान और पाँच सत्तास्थानके स्वामी सातों ही अपर्याप्तक जीवसमास हैं। पाँच बन्धस्थान, चार उदयस्थान और पाँच सत्तास्थानके स्वामी सूक्ष्म एकेन्द्रियपर्याप्तक हैं। पाँच बन्धस्थान, पाँच उदयस्थान और पाँच सत्तास्थानके स्वामी बादर एकेन्द्रियपर्याप्तक हैं। पाँच बन्धस्थान, छह उदयस्थान और पाँच सत्तास्थानके स्वामी तीनों विकलेन्द्रिय हैं। छह बन्धस्थान, छह उदयस्थान और पाँच सत्तास्थानके स्वामी असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक हैं। तथा आठ बन्धस्थान, आठ उदयस्थान और ग्यारह सत्तास्थानके स्वामी संज्ञीपंचेन्द्रियपर्याप्तक जीव हैं ॥२६८-२६९॥


सत्तेव थ पज्जत्ते तेवीसं पंचवीस छव्वीसं ।
उणत्तीसं तीसं बंधवियप्पा हवंति त्ति ॥२७०॥

अर्थ: सातों ही अपर्याप्तक जीवसमासोंमें तेईस, पच्चीस, छब्बीस, उनतीस और तीसप्रकृतिक पाँच बन्धस्थान होते हैं ॥२७०॥


सुहुम-अपज्जत्तणं उदओ इगिवीसयं तु बोहव्वो ।
बादरपज्जत्तेदरउदओ चउवीसमेव जाणाहि ॥२७१॥

अर्थ: सूक्ष्म अपर्याप्तकोंके इक्कीसप्रकृतिक एक उदयस्थान जानना चाहिए। बादर अपर्याप्तकोंके चौबीसप्रकृतिक एक ही उदयस्थान जानो ॥२७१॥


सेस-अपज्जत्ताणं उदओ दो चेव होंति णायव्वा ।
इगिवीसं छव्वीसं एत्तो सत्तं भणिस्सामो ॥२७२॥

अर्थ: शेष अपर्याप्त जीवसमासोंके इक्कीस और छब्बीसप्रकृतिक दो ही उदयस्थान होते हैं, ऐसा जानना चाहिए। अब इससे आगे सातों अपर्याप्तक जीवसमासोंके सत्तास्थान कहेंगे॥२७२॥


तेसु य संतट्ठाणा बाणउदी णवदिमेव जाणाहि ।
अडसीदी चेव तहा चउ बासीदी य संतया होंति ॥२७३॥

अर्थ: उन्हीं सातों अपर्याप्तक जीवसमासोंमें बानवै, नब्बे, अट्ठासी, चौरासी और बियासीप्रकृतिक पाँच सत्तास्थान होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥२७३॥


ते चिय बंधट्ठाणा संता वि तहेव सुहुमपज्जत्ते ।
चत्तारि उदयठाणा इगि चउ पणवीस छव्वीसा ॥२७४॥

अर्थ: सूक्ष्मपर्याप्तक जीवसमासमें वे ही पूर्वोक्त पाँच बन्धस्थान और पाँच सत्त्वस्थान होते हैं। किन्तु उदयस्थान इक्कीस, चौबीस, पच्चीस और छब्बीस प्रकृतिक चार होते हैं ॥२७४॥


वायर पज्जत्तेसु वि ते चेव य होंति बंध-संतठाणाणि ।
इगिवीसं ठाणादी सत्तावीसं ति ते उदया ॥२७५॥

अर्थ: बादर पर्याप्त जीवसमासमें वे ही पूर्वोक्त पाँच बन्धस्थान और पाँच सत्त्वस्थान होते हैं। किन्तु उदयस्थान इक्कीस प्रकृतिकसे लेकर सत्ताईस प्रकृतिक तकके पाँच होते हैं ॥२७५॥


बियलिंदिएसु तेच्चिय पुव्वुत्ता बंध-संतठाणानि ।
तीसिगितीसुणत्तीसा इगिछव्वीसट्ठवीसुदया ॥२७६॥

अर्थ: विकलेन्द्रिय जीवसमासोंमें वे ही पूर्वोक्त पाँच बन्धस्थान और पाँच सत्तास्थान होते हैं। किन्तु उदयस्थान इक्कीस, छब्बीस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक छह होते हैं ॥२७६॥


पज्जत्तासण्णीसु वि बंधा तेवीसमाइ तीसंता ।
तेसिं चिय संतुदया सरिसा वियलिंदियाणं तु ॥२७७॥

अर्थ: पर्याप्त असंज्ञी जीवोंमें तेईसप्रकृतिकको आदि लेकर तीसप्रकृतिक पर्यन्तके छह बन्धस्थान होते हैं। तथा उनके उदयस्थान और सत्तास्थान विकलेन्द्रियोंके सदृश ही जानना चाहिए ॥२७७॥


सव्वे वि बंधठाणा सण्णी पज्जत्तयस्स बोहव्वा ।
चउवीस णवय अट्ठ य वज्जित्ता उदय पज्जत्ते ॥२७८॥

तस्स दु संतट्ठाणा उवरिम दो वज्जिदूण हेडिल्ला ।
दोण्हं पि केवलीणं तीसिगितीसट्ठ णव उदया ॥२७६॥

णव दस सत्तत्तरियं अट्ठत्तरियं च संतठाणानि ।
उणासीदि असीदी बोहव्वा होंति केवलिणो ॥२८०॥

अर्थ (गाथा 278 से 280): पर्याप्त संज्ञी जीवोंमें सर्व ही बन्धस्थान जानना चाहिए। उदयस्थान चौबीस, नौ और आठ प्रकृतिक तीनको छोड़कर शेष आठ होते हैं। उसके सत्तास्थान उपरिभ दोको छोड़कर अधस्तन ग्यारह होते हैं। तेरहवें और चौदहवें गुणस्थानवर्ती दोनों ही केवलियोंके तीस, इकतीस, नौ और आठ प्रकृतिक चार उदयस्थान होते हैं। उन्हीं केवलियोंके सत्तास्थान अस्सी, उन्यासी, अठहत्तर, सतहत्तर दश और नौप्रकृतिक छह होते हैं ॥२७८-२८०॥


[मूलगा०३३] ‘णाणावरणे विग्घे बंधोदयसंत पंचठाणाणि ।
मिच्छाइ-दसगुणेसुं खीणुवसंतेसु पंच संतुदया’ ॥२८१॥

अर्थ: मिथ्यात्व आदि दश गुणस्थानोंमें ज्ञानावरण और अन्तरायकर्मके पाँचप्रकृतिक बन्धस्थान, पाँचप्रकृतिक उदयस्थान और पाँचप्रकृतिक सत्तास्थान होते हैं। इन दोनों ही कर्मोंके बन्धसे रहित उपशान्तमोह और क्षीणमोह नामक ग्यारहवें-बारहवें गुणस्थानमें पाँचप्रकृतिक उदयस्थान और पाँच प्रकृतिक सत्तास्थान होता है ॥२८१॥


[मूलगा०३४] १णय छक्कं चत्तारि य तिण्णि य ठाणाणि दंसणावणे ।
बंधे संते उदये दोण्णि य चत्तारि पंच वा होंति ॥२८२॥

अर्थ: दर्शनावरण कर्मके बन्धस्थान और सत्त्वस्थान तीन तीन होते हैं-नौ प्रकृतिक, छह प्रकृतिक और चार प्रकृतिक । उदयस्थान दो होते हैं-पाँच प्रकृतिक और चार प्रकृतिक ॥२८॥


२णव सव्वाओ छक्कं थीणतियं रहिय दंसणावरणे ।
णिद्दापयलाहीणा चत्तारि य बंध-संताणि ॥२८३॥

अर्थ: नौ प्रकृतिक बन्ध और सत्त्वस्थानमें दर्शनावरणकी सर्व प्रकृतियाँ होती हैं । छह प्रकृतिक-स्थान स्त्यानगृद्धित्रिकसे रहित होता है । तथा चार प्रकृतिकस्थान निद्रा और प्रचलासे हीन जानना चाहिए ॥२९॥


३णेत्ताइदंसणाणि य चत्तारि उदिंति दंसणावरणे ।
णिद्दाई पंचस्स हि अण्णयरूदेण पंच वा जीवे ॥२८४॥

अर्थ: दर्शनावरणकर्मकी चक्षुर्दर्शनावरणादि चारों प्रकृतियोंका उदय उनकी उदयव्युच्छित्ति होने तक बराबर बना रहता है। तथा जीवके सुप्त दशामें पाँचों निद्राओंमेंसे किसी एक प्रकृतिका उदय रहता है। इस प्रकार जागृत दशामें चार प्रकृतिक उदयस्थान और सुप्त दशामें पाँच प्रकृतिक उदयस्थान जानना चाहिए ॥२८४॥


मिच्छम्मि सासणम्मि य णव होंति बंध-संतेहिं ।
छव्वंधे णव संता मिच्छाइ-अपुव्वपढमभायंते ॥२८५॥

अर्थ: मिथ्यात्व और सासादन गुणस्थानमें नौ प्रकृतिक बन्धस्थान और नौ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होते हैं। मिश्र गुणस्थानको आदि लेकर अपूर्वकरणके प्रथम भागपर्यन्त छहप्रकृतिक बन्धस्थान और नौप्रकृतिक सत्त्वस्थान होते हैं ॥२८५॥


चउबंधयम्मि दुविहापुव्वणियट्टीसु सुहुमउवसमे ।
णव संता अणियट्ठी-खवए सुहुमसंपरायम्मि छव्वेव ॥२८६॥

अर्थ: दोनों प्रकारके अर्थात् उपशामक और क्षपक अपूर्वकरण तथा अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें, उपशामक सूक्ष्मसाम्परायमें चारप्रकृतिक बन्धस्थान और नौप्रकृतिक सत्त्वस्थान होते हैं। अनिवृत्तिकरण क्षपक और सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकमैं चारप्रकृतिक बन्धस्थान और छहप्रकृतिक सत्त्वस्थान होते हैं ॥२८६॥


उवरयबंधे संते संता णव होंति छच्च खीणम्मि ।
खीणंते संतुदया चउ तेसु चयारि पंच वा उदयं ॥२८७॥

अर्थ: उपरतबन्धमें अर्थात् दर्शनावरण कर्मकी बन्धव्युच्छित्ति हो जाने पर उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थानमें नौप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है और क्षीणकषायमें छहप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है तथा इन दोनों ही गुणस्थानोंमें चार या पाँच प्रकृतिक उदयस्थान होते हैं । क्षीणकषायके चरम समयमें चारप्रकृतिक उदयस्थान और चारप्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है ॥२८७॥


[मूलगा० ३६] ‘वायाल तेरसुत्तरसदं च पणुवीसयं वियाणाहि ।
वेदणियाउयगोदे मिच्छाइ-अजोगिणं भंगा’ ॥२८८॥

अर्थ: मिथ्यात्व गुणस्थानसे लेकर अयोगि गुणस्थानपर्यन्त वेदनीयकर्मके बन्धादि स्थानसम्बन्धी भंग ब्यालीस, आयुकर्मके एकसौ तेरह और गोत्रकर्मके पच्चीस जानना चाहिए ॥२८८॥ वेदनीयके ४२, आयुकर्मके ११३ और गोत्रकर्मके २५ भङ्ग होते हैं।


२मिच्छाइपमत्तंता चउ चउ भंगा य वेयणीयस्स ।
उवरिमसत्तट्ठाणे दो दो य हवंति आदिल्ला ॥२८६॥

अर्थ: मिथ्यात्व गुणस्थानसे लेकर प्रमत्तसंयतगुणस्थान तक वेदनीय कर्मके चार चार भंग होते हैं। इससे उपरिम सात गुणस्थानोंमें आदिके दो दो भंग होते हैं ॥२८९॥


चउचरिमा अजोगियस्स सव्वे भंगा दु वेयणीयस्स ।
बायालं आणिज्जो एत्तो आउस्स वोच्छामि ॥२९०॥

अर्थ: अयोगिकेवलीके अन्तिम चार भंग होते हैं। इसप्रकार वेदनीयकर्मके सर्व भंग ब्यालीस जानना चाहिए। अब इससे आगे आयुकर्मके भंग कहेंगे ॥२६०॥


अट्ठ छब्बीसं सोलस वीसं छ त्ति त्ति चउसु दो दो दु ।
एगेगं तिसु भंगा मिच्छादिज्जा अजोगंता ॥२९१॥

अर्थ: मिथ्यात्वसे लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक भंग क्रमसे अट्ठाईस, छब्बीस, सोलह, बीस, छह, तीन, तीन, दो, दो, दो, दो, एक, एक और एक होते हैं ॥२६१॥


णिरियाउस्स य उदए तिरिय-मणुयाउणऽबंध बंधे य ।
णिरियाउयं च संतं णिरियाई दोण्णि संताणि ॥२९२॥

अर्थ: नवीन आयुके अबन्धकालमें नरकायुका उदय और नरकायुका सत्त्वरूप एक भंग होता है। तिर्यंचायु या मनुष्यायुके बन्ध हो जाने पर नरकायुका उदय और नरकायुके सत्त्वके साथ तिर्यंचायु और मनुष्यायु इन दोका सत्त्व पाया जाता है। इस प्रकार नरकायुके पाँच भंग हो जाते हैं ॥२६२॥


तिरियाउस्स य उदये चउण्हमाऊणऽबंध बंधे य ।
तिरियाउयं च संतं तिरियाई दोण्णि संताणि ॥२९३॥

अर्थ: तिर्यंचायुके उदयमें और चारों आयुकोंके अबन्धकालमें, तथा बन्धकालमें क्रमशः तिर्यंगायुका सत्त्व और तिर्यंचायुके साथ चारों आयुकर्मोंमेंसे एक एक आयुका सत्त्व; इस प्रकार दो आयुकर्मोंका सत्त्व पाया जाता है । इस प्रकार तिर्यंचायुके नौ भंग हो जाते हैं ॥२६३॥


मणुयाउस्स य उदए चउण्हमाऊणऽबंध बंधे य ।
मणुयाउयं च संतं मणुयाई दोण्णि संताणि ॥२९४॥

अर्थ: मनुष्यायुके उदयमें और चारों आयुकर्मोंके अबन्धकाल तथा बन्धकालमें क्रमशः मनुष्यायुका सत्त्व, एवं मनुष्यायुके सत्त्वके साथ चारों आयुकर्मोंमेंसे एक एक आयुका सत्त्व, इस प्रकार दो आयुकर्मोंका सत्त्व पाया जाता है। इस प्रकार मनुष्यायुके नौ भंग हो जाते हैं ॥२६४॥


देवाउस्स य उदए तिरिय-मणुयाऊणऽबंध बंधे य ।
देवाउयं च संतं देवाई दोण्णि संताणि ॥२९५॥

अर्थ: देवायुके उदयमें और तिर्यंचायु तथा मनुष्यायुके अबन्ध और बन्धकालमें क्रमशः देवायुका सत्त्व, और देवायु-मनुष्यायु तथा देवायु और तिर्यंचायुका सत्त्व पाया जाता है। इस प्रकार देवायुके पाँच भंग हो जाते हैं ॥२६५॥


मर्त्यायुरेव नान्यानि भङ्गानामष्टकं ततः ।
विहाय विंशतिः प्रोक्ता भङ्गास्तस्य मनीषिभिः ॥२९६॥ इति ।

अर्थ: इस मिथ्यात्वगुणस्थानमें नरकायुके ५, तिर्यञ्चायुके ६, मनुष्यायुके ६, और देवायुके ५ ये सब मिलकर २८ भंग हो जाते हैं। सासादन गुणस्थानवर्ती जीव नरकोंमें नहीं जाता है, इसलिए नरकायुका बन्ध, तिर्यञ्चायुका उदय और दोनोंका सत्त्वरूप भंग; तथा नरकायुका बन्ध, मनुष्यायुका उदय और दोनोंका सत्त्वरूप भंग इन दोनों भंगोंको छोड़ करके मिथ्यात्वगुणस्थानवाले शेष २६ भंग सासादनगुणस्थानमें पाये जाते हैं। सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव किसी भी आयुका बन्ध नहीं करता है, अतएव उसके बन्धकालवाले १२ भंग कम हो जानेसे उपरतबन्धकालसम्बन्धी १६ भंग होते हैं। सम्यग्दृष्टि जीव यदि मनुष्यगति या तिर्यञ्चगतिमें हो, तो वह देवायुका ही बन्ध करता है, शेष तीनका नहीं। यदि वह देवगति या नरकगतिका हो, तो केवल मनुष्यायु का ही बन्ध करता है, शेष तीनका नहीं। अतएव २८ भंगोंमेंसे ८ भंग कमा देने पर २० भंग चौथे गुणस्थानमें होते हैं। जो आठ भंग कम किये जाते हैं, वे इस प्रकार हैं-(१) तिर्यञ्चायुका बन्ध, नरकायुका उदय और दोनोंका सत्त्व, (२) नरकायुका बन्ध, तिर्यञ्चायुका उदय, दोनोंका सत्त्व, (३) तिर्यञ्चायुका बन्ध, तिर्यञ्चायुका उदय, दोनोंका सत्त्व, (४) मनुष्यायुका बन्ध, तिर्यञ्चायुका उदय, दोनोंका सत्त्व, (५) नरकायुका बन्ध, मनुष्यायुका उदय, दोनोंका सत्त्व, (६) तिर्य- गायुकका बन्ध, मनुष्यायुका उदय, दोनोंका सत्त्व; (७) मनुष्यायुका बन्ध, मनुष्यायुका उदय, दोनोंका सत्त्व; ८ तिर्यंगायुका बन्ध, देवायुका उदय, दोनोंका सत्त्व । ये आठ भंग छोड़ करके शेष २० भंग असंयतसम्यग्दृष्टिके होते हैं। अब संयतासंयतके छह भंगोंका स्पष्टीकरण करते हैं-(१) तिर्यंचायुका उदय, तिर्यंचायुका सत्त्व; (२) देवायुका बन्ध, तिर्यंचायुका उदय और देवायु-तिर्यंचायुका सत्त्व, (३) तिर्यंचायुका उदय और देवायु-तिर्यंचायुका सत्त्व, (४) मनुष्यायुका उदय और मनुष्यायुका सत्त्व (५) देवायुका बन्ध, मनुष्यायुका उदय और देवायु-मनुष्यायुका सत्त्व, (६) मनुष्यायुका उदय और मनुष्यायु-देवायुका सत्त्व, ये छह भंग संयतासंयतके होते हैं। अब प्रमत्तसंयतके भंग कहते हैं-(१) मनुष्यायुका उदय और मनुष्यायुका सत्त्व, (२) देवायुका बन्ध, मनुष्यायुका उदय और दोनोंका सत्त्व, (३) मनुष्यायुका उदय और मनुष्यायु-देवायुका सत्त्व; इस प्रकार तीन भंग प्रमत्तगुणस्थानमें होते हैं। ये ही तीन भंग अप्रमत्तगुणस्थानमें भी होते हैं ! अपूर्वकरणसे लेकर उपशान्तमोह तक चारों उपशामक और तीनों क्षपकोंमें (१) मनुष्यायुका उदय और मनुष्यायुका सत्त्व; तथा उपशामकोंकी अपेक्षा (२) मनुष्यायुका उदय और मनुष्यायु-देवायुका सत्त्व, ये दो दो भंग चारों गुणस्थानोंमें पृथक् पृथक् होते हैं। उन सबका योग ८ होता है। क्षीणमोह, सयोगिकेवली और अयोगिकेवली इन तीनों गुणस्थानोंमें मनुष्यायुका उदय और मनुष्यायुका सत्त्वरूप एक ही भंग होता है। इस प्रकार सर्व मिलकर (२८+२६+१६+२०+६+३+३+२+२+२+२+१+१+१=११३) आयुकर्मके एक सौ तेरह भंग होते हैं।


'मिच्छाई देसंता पण चदु दो दोण्णि भंगा हु ।
अट्ठसु एगेगमदो गोदे पणुवीस दो चरिमे ॥२९७॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानसे लेकर देशसंयतगुणस्थान तक क्रमसे पाँच, चार, दो, दो और दो भंग होते हैं। तदनन्तर आठ गुणस्थानोंमें एक एक भंग होता है। चरम अर्थात् अयोगिकेवलीके दो भंग होते हैं। इस प्रकार गोत्रकर्मके सर्व भंग पचीस होते हैं ॥२६६॥


उच्चुच्चमुच्चणीचं णीचं उच्चं च णीचणीचं च।
बंधं उदयम्मि चउसु वि संतं दुयं सव्वणीचं च ॥२९८॥

अर्थ: उच्चगोत्रका बन्ध, उच्चगोत्रका उदय, दोनों गोत्रकर्मोंका सत्त्व, उच्चगोत्रका बन्ध, नीचगोत्र का उदय और दोनों गोत्रोंका सत्त्व; नीचगोत्रका बन्ध, उच्चगोत्रका उदय और दोनों गोत्रोंका सत्त्व; नीचगोत्रका बन्ध, नीचगोत्रका उदय और दोनों गोत्रोंका सत्त्व; तथा नीच गोत्रका बन्ध, नीच गोत्रका उदय और नीच गोत्रका सत्त्व, ये पाँच भंग गोत्र कर्मके होते हैं ॥२६७॥ गोत्रकर्मके उक्त पाँचों भंग मिथ्यात्व गुणस्थानमें पाये जाते हैं। सासादनगुणस्थानमें आदिके चार भंग होते हैं। तीसरे, चौथे और पाँचवें गुणस्थानमें आदिके दो दो भङ्ग होते हैं। इससे उपरितन पाँच गुणस्थानोंमें पहला एक ही भङ्ग होता है ॥२९८॥ मिथ्यात्व आदि दश गुणस्थानोंमें भङ्ग इस प्रकार हैं- ५।४।२।२।२।१।१।१।१।१।


मिच्छम्मि पंच भंगा सासणसम्मम्मि आदिमचउक्कं।
आदिदुगंतेसुवरिं पंचसु एगो तहा पढमो ॥२९९॥

अर्थ: उपशान्तमोह गुणस्थानसे लेकर अयोगिकेवलीके द्विचरम समय तक बन्धके बिना प्रथम भङ्ग होता है। अयोगिकेवलीके अन्तिम समयमें उच्चगोत्रका उदय और उच्चगोत्रका सत्त्वरूप एक भङ्ग होता है ॥२९९॥


[मूलगा० ३७] ३गुणठाणएसु अट्ठसु एगेगं बंधपयडिट्ठाणाणि ।
पंचणियट्टिट्ठाणे बंधोवरमो परं तत्तो ॥३००॥

अर्थ: आदिके आठ गुणस्थानोंमें मोहकर्मका एक एक बन्धस्थान होता है। अनिवृत्तिकरणमें पाँच बन्धस्थान होते हैं। उससे परवर्ती गुणस्थानोंमें मोहकर्मका बन्ध नहीं होता है ॥३००॥


मिच्छाइ-अपुव्वंताणेगेगं चेव मोहबंधाणि ।
पंचणियट्ठिट्ठाणे पंचेव य होंति भंगा हु ॥३०१॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टिगुणस्थानसे लेकर अपूर्वकरण तकके आठ गुणस्थानोंमें मोहनीयकर्मका एक एक बन्धस्थान होता है। अनिवृत्तिकरण नामक नवें गुणस्थानमें पाँच बन्धस्थान होते हैं और वहाँ पर बन्धस्थान-सम्बन्धी पाँच ही भङ्ग होते हैं ॥३०१॥


छब्बीवीसे चउ इंगिवीसे सत्तरस तेर दो दो दु ।
णव-बंधए वि दोण्णि य एगेगमदो परं भंगा ॥३०२॥

अर्थ: बाईसप्रकृतिक बन्धस्थानमें छह् भङ्ग होते हैं। इक्कीसप्रकृतिक बन्धस्थानमें चार भङ्ग होते हैं। सत्तरह और तेरहप्रकृतिक बन्धस्थानोंमें दो दो भङ्ग होते हैं। नौप्रकृतिक बन्धस्थानमें भी दो ही भङ्ग होते हैं। इससे आगेके बन्धस्थानोंमें एक एक ही भङ्ग होता है ॥३०२॥


एक्कं च दो व चत्तारि तदो एयाहिया दसुक्कस्सं ।
ओघेण मोहणिज्जे उदयट्ठाणाणि णव होंति ॥३०३॥

अर्थ: ओघकी अपेक्षा मोहनीयकर्मके उदयस्थान नौ होते हैं- (कथनकी सुलभतासे उन्हें यहाँ विपरीत क्रमसे कहते हैं-) वे एकप्रकृतिक, दोप्रकृतिक, चारप्रकृतिक और उससे आगे एक एक अधिक करते हुए उत्कर्षसे दश प्रकृतिक तक जानना चाहिए ॥३०३॥


मिच्छा मोहचउक्कं अण्णयरं वा तिवेदमेकयरं ।
हस्सादिजुगस्सेयं भयणिंदा होंति दस उदया ॥३०४॥

अर्थ: मोहकर्मके दशप्रकृतिक उदयस्थानमें एक मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धी आदि चारों जातिकी कषायोंमेंसे क्रोधादि कोई चार कषाय, तीनों वेदोंमेंसे कोई एक वेद, हास्यादि दो युगलोंमेंसे कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा, ये दश प्रकृतियाँ होती हैं ॥३०४॥


आवलियमित्तकालं मिच्छत्तं दंसणाहिसंपत्तो ।
मोहम्मि य अणहीणो पढमे पुण णवोदओ होज्ज ॥३०५॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना करके सम्यग्दर्शनको प्राप्त हुआ जीव यदि मिथ्यात्व कर्मके उदयसे मिथ्यात्व गुणस्थानको प्राप्त हो जावे, तो एक आबलीप्रमाण काल तक उसके अनन्तानुबन्धी कषायका उदय सम्भव नहीं है, अतएव मिथ्यात्वगुणस्थानमें नौप्रकृतिक उदयस्थान भी होता है ॥३०५॥ इस प्रकार मिथ्यात्वगुणस्थानमें दश और नौप्रकृतिक दो उदयस्थान होते हैं ।


मिच्छत्तूण कोहाई विदि-तदिएहिं ते दु दसरहिया ।
सासणसम्माई खलु एगे दुग एग तीसु णायाव्वा ॥३०६॥

अर्थ: ऊपर जो दशप्रकृतिक उदयस्थान बतलाया गया है, उसमेंसे मिथ्यात्वके बिना शेष नौ प्रकृतियोंका उदय सासादनगुणस्थानमें होता है । अनन्तानुबन्धी क्रोधादि कषायके बिना शेष आठ प्रकृतियोंका उदय मिश्र और अविरतगुणस्थानमें होता है । दूसरी अप्रत्याख्यानकषायके बिना शेष सात प्रकृतियोंका उदय देशविरतगुणस्थानमें होता है । तीसरी प्रत्याख्यानकषायके बिना शेष छह प्रकृतियोंका उदय तीन गुणस्थानोंमें अर्थात् प्रमत्त, अप्रमत्त और अपूर्वकरणमें जानना चाहिए ॥३०६॥ सासादनादि गुणस्थानोंमें क्रमशः ६, ८, ८, ७, ६, ६, ६ प्रकृतियोंका उदय होता है ।


इदि मोहुदया मिस्से सम्मामिच्छेण संजुया होंति ।
अवरे सम्मत्तजुया वेदयसम्मत्तसहिया जे ॥३०७॥

अर्थ: इस प्रकार सासादनादि गुणस्थानोंमें जो मोहप्रकृतियोंका उदय बतलाया गया है, उनमेंसे मिश्रगुणस्थानमें उदय होनेवाली आठप्रकृतियोंमें सम्यग्मिथ्यात्वके संयुक्त कर देनेपर नौ-प्रकृतियोंका उदय होता है। वेदकसम्यक्त्वसे सहित जो चतुर्थादि चारगुणस्थान हैं, उनमें सम्यक्त्वप्रकृतिका भी उदय होता है। अतएव उनमें एक-एक उदयस्थान और भी जानना चाहिए ॥३०७॥


ते सव्वे भयरहिया दुगुंछहीणा दु उभयहीणा दु ।
अण्णे वि य एदेसिं एक्केक्कस्सोवरिं तिण्णि ॥३०८॥

अर्थ: ऊपर जो दश, नौ आदिक जितने भी सर्व उदयस्थान बतलाये हैं, वे भय-रहित भी होते हैं, जुगुप्सा-रहित भी होते हैं और दोनोंसे रहित भी होते हैं। इसलिए ऊपर कहे गये एक-एक स्थानके ऊपर ये तीन-तीन उदयस्थान और भी होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३०८॥


[मूलगा०३८] ‘सत्तादि दस दु मिच्छे सासादण मिस्से सत्तादि णवुक्कस्सं ।
छादी अविरदसम्मे देसे पंचादि अट्ठेव’ ॥३०९॥

[मूलगा०३९] विरए खओवसमिए चउरादि सत्त उक्कस्सं छ णियट्टिम्हि ।
अणियट्टिभायरे पुण एक्को वा दो व उदयंसा ॥३१०॥

[मूलगा०४०] एगं सुहुमसरागो वेदेदि अवेदया भवे सेसा ।
भंगाणं च पमाणं पुव्वुद्दिट्ठेण णादव्वं ॥३११॥

अर्थ (गाथा 306 से 311): मिथ्यात्वगुणस्थानमें सातको आदि लेकर दश तकके चार उदयस्थान होते हैं। सासादन और मिश्रमें सातसे लेकर नौ तकके तीन उदयस्थान होते हैं। अविरतसम्यक्त्वमें छहसे लेकर नौ तकके चार उदयस्थान होते हैं। देशविरतमें पाँचसे लेकर आठ तकके चार उदयस्थान होते हैं। क्षायोपशमिकसम्यक्त्वी प्रमत्त और अप्रमत्तविरतके चारसे लेकर सात तकके चार उदयस्थान होते हैं। अपूर्वकरणमें चारसे लेकर छह तकके तीन उदयस्थान होते हैं। अनिवृत्तिबादरसाम्परायमें दो और एकप्रकृतिक दो उदयस्थान होते हैं। सूक्ष्मसाम्पराय एकप्रकृतिक स्थानका ही वेदन करता है। शेष उपरिम गुणस्थानवर्ती जीव मोहकर्मके अवेदक होते हैं। इन उदयस्थानोंके भङ्गोंका प्रमाण पूर्वोद्दिष्ट क्रमसे जानना चाहिए ॥३०६-३११॥


[मूलगा०४१] एक य छक्केगारं एगारेगारसेव णव तिण्णि ।
एदे चउवीसगदा बारस दुग पंच एगम्मि ॥३१२॥

अर्थ: दशप्रकृतिक उदयस्थान एक है, नौप्रकृतिक उदयस्थान छह हैं; आठ, सात और छहप्रकृतिक उदयस्थान ग्यारह-ग्यारह हैं, पाँचप्रकृतिक उदयस्थान नौ हैं, चारप्रकृतिक उदयस्थान तीन हैं। इन सबको चौबीससे गुणा करनेपर उन-उन उदयस्थानोंके भङ्गोंका प्रमाण आ जाता है। दोप्रकृतिक उदयस्थानके बारह भङ्ग हैं और एकप्रकृतिक उदयस्थानमें पाँच भङ्ग होते हैं ॥३१२॥


बारसपणसट्ठाएं उदयवियप्पेहिं मोहिया जीवा ।
चुलसीदिं सत्तत्तरि पयबंदसदेहिं विण्णेया ॥३१३॥

अर्थ: ये सर्व संसारी जीव बारह सौ पैंसठ (१२६५) उदयविकल्पोंसे और चौरासी सौ सतहत्तर (८४७७) पदवृन्दोंसे मोहित हो रहे हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३१३॥


जुगवेदकसाएहिं दुग-तिग-चउहिं भवंति संगुणिया ।
चउवीस वियप्पा ते दसादि उदया य सत्तेव ॥३१४॥

अर्थ: हास्यादियुग्मको वेदत्रिक और कषायचतुष्कसे गुणा करने पर चौबीस विकल्प हो जाते हैं। दश आदि सात उदयस्थान चौबीस चौबीस विकल्परूप होते हैं ॥३१४॥


'१मिच्छे अट्ठ चउ चउ दुसु तदो चउसु हवंति अट्ठेव ।
चत्तारि अपुव्वे वि य उदयट्ठाणाणि मोहम्मि ॥३१५॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानमें मोहके आठ उदयस्थान हैं । दूसरे और तीसरे इन दो गुणस्थानोंमें चार चार उदयस्थान हैं । चतुर्थ आदि चार गुणस्थानोंमें आठ आठ उदयस्थान हैं। अपूर्वकरणमें चार उदयस्थान हैं ॥३१५॥


'२चउवीसेण विगुणीया मिच्छाउदयपयडीओ ।
उदयवियप्पा होंति हु ते पयबंघा य णियमेण ॥३१६॥

'३सासण मिस्सेऽपुव्वे उदयवियप्पा हवंति छण्णउदी ।
अण्णे पंचसु दुगुणा अणियट्ठि सुहुमे सत्तरसं ॥३१७॥

अर्थ (गाथा 316 से 317): मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानोंमें जो मोहकर्मकी उदय-प्रकृतियाँ हैं, अर्थात् उदयस्थानोंकी संख्या है, उसे चौबीससे गुणा करने पर उदयस्थानके विकल्पोंका प्रमाण आ जाता है । वे उदयस्थानोंके विकल्प या पदवृन्द नियमसे सासादन, मिश्र और अपूर्वकरणमें छ्यानवै छ्यानवै होते हैं। तथा शेष पाँच गुणस्थानोंमें इनसे दुगुने अर्थात् एकसौ बानवे एक सौ बानवै होते हैं। अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्परायमें सत्तरह होते हैं ॥३१६-३१७॥


उदयट्ठाणे संखा उदयवियप्पा हवंति ते चेव ।
तेरस चेव सयाणि दु पंचत्तीसा य हीणाणि ॥३१८॥

अर्थ: यह जो उदयस्थानोंकी संख्या है, उन सबका योग पैंतीस कम तेरह सौ अर्थात् बारहसौ पैंसठ होता है, सो ये सब उदयस्थानके विकल्प जानना चाहिए ॥३१८॥


अडसट्ठी बत्तीस बत्तीसं सट्ठि होंति बावण्णा ।
चउदालं चउदालं वीसमपुव्वे य उदयपयडीओ ॥३१९॥

ताओ चउवीसगुणा पयबंधा होंति मोहम्मि ।
अणियट्टीसुहुमाणं बारस पंचयदुगेगसंगुणिगा ॥३२०॥

अर्थ (गाथा 319 से 320): मिथ्यात्वगुणस्थानमें उदयस्थानोंकी प्रकृतियाँ अड़सठ हैं, सासादनमें बत्तीस हैं, मिश्रमें बत्तीस हैं, अविरतमें साठ हैं, देशविरतमें बावन हैं, प्रमत्तविरतमें चवालीस हैं, अप्रमत्तविरतमें चवालीस हैं, अपूर्वकरणमें बीस हैं, इन उदयप्रकृतियोंको चौबीससे गुणा करने पर आठ गुणस्थानोंमें मोहकर्मके पदवृन्दोंकी संख्याका प्रमाण आ जाता है। अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्परायकी उदयप्रकृतियाँ बारह और पाँच हैं, उनके पदवृन्द क्रमशः दो और एकसे गुणित जानना चाहिए ॥३१९-३२०॥


चउसट्ठी अट्ठसया अडसट्ठी होंति सत्तसया ।
बत्तीसा सोलसया जुत्ता मिच्छम्मि उभओ वि ॥३२१॥

अर्थ: मिथ्यात्वमें आठ सौ चौंसठ (८६४) और सात सौ अड़सठ (७६८) ये दोनों मिलकरके सोलह सौ बत्तीस ( १६३२ ) पदवृन्द होते हैं ॥३२१॥


अट्ठट्ठी सत्तसया सासण-मिस्साण होंति पयबंधा ।
अविरयम्मि चोद्दह सयाणि चत्तालसहियाणि ॥३२२॥

अर्थ: सासादन और मिश्रमें पदवृन्द सात सौ अड़सठ, सात सौ अड़सठ होते हैं। अविरत-सम्यक्त्वमें चौदह सौ चालीस पदवृन्द होते हैं ॥३२२॥


अडयाला बारसया देसेऽपुव्वम्मि चउसयाऽसीया ।
छप्पण्णं च सहस्सं पमत्तइयराण णायव्वं ॥३२३॥

अर्थ: देशविरतमें बारह सौ अड़तालीस, तथा अपूर्वकरणमें चार सौ अस्सी पदवृन्द होते हैं । प्रमत्तविरत और अप्रमत्तविरतमें एक हजार छप्पन एक हजार छप्पन पदवृन्द जानना चाहिए ॥३२३॥ देशविरतमें १२४८, प्रमत्तमें १०५६, अप्रमत्तमें १०५६ और अपूर्वकरणमें ४८० पदवृन्द होते हैं । इन आठों गुणस्थानोंके पदवृन्दोंका प्रमाण ८४४८ होता है ।

पञ्चम अधिकार: सप्ततिका (भाग 3/4)

संजलणा वेदगुणा बारस भंगा दुगोदया होंति ।
अविसेहा दुअंकसे सुहुमे य पगेव णायव्वो ॥३२४॥

उदयादो सत्तरसं खलु पयडीओ हवंति उगुतीसं ।
अणियट्टी तह सुहुमे दुगेगपयडीहिं संगुणिया ॥३२५॥

अर्थ (गाथा 324 से 325): अनिवृत्तिकरणके सवेदभागमें एक संज्वलन और एक वेद; इन दो प्रकृतियोंके उदयस्थानके संज्वलन और वेदगुणित बारह भङ्ग अर्थात् चौबीस पदवृन्द होते हैं । अवेदभागमें एकप्रकृतिक उदयवाले चार भङ्ग होते हैं । तथा सूक्ष्मसाम्परायमें एकप्रकृतिक उदयवाला एक ही भङ्ग जानना चाहिए । अनिवृत्तिकरण सवेदभागमें उदयकी अपेक्षा द्विक उदयवाली बारह और अवेदभागमें एक उदयवाली चार; तथा सूक्ष्मसाम्परायमें एक, इस प्रकार सब मिलकर उदयकी अपेक्षा सत्तरह प्रकृतियाँ होती हैं । इनमेंसे सवेदभागकी दोप्रकृतियोंको बारहसे गुणा करनेपर चौबीस पदवृन्द होते हैं । तथा अवेदभागकी चारको और सूक्ष्मसाम्परायकी एकप्रकृतिको एक-एकसे गुणा करनेपर पाँच पदवृन्द होते हैं । ये दोनों मिलकर दोनों गुणस्थानोंके उनतीस पदवृन्द हो जाते हैं ॥३२४-३२५॥ इस प्रकार अनिवृत्तिकरणमें द्विक उदयवाले १२, एक उदयवाले ४, सूक्ष्मसाम्परायमें १ ये सर्व १७ उदयस्थान होते हैं । तथा द्विक उदयवाले बारह भङ्गोंकी प्रकृतियाँ २४ हैं । एक उदयवाली प्रकृतियाँ ४ हैं । सूक्ष्मसाम्परायमें उदयप्रकृति १ हैं । इस प्रकार दोनों गुणस्थानोंके उदय पदवृन्द २९ होते हैं ।


'उदयपयडिसंखेज्जा ते चेव हवंति पयबंधा ।
अट्ठसहस्सा चउरो सयाणि सत्तत्तरी य मोहम्मि ॥३२६॥

अर्थ: इस प्रकार उदयप्रकृतियोंकी जितनी संख्या हैं, वे सब पदवृन्द जानना चाहिए । मोहकर्मके सर्व गुणस्थानसम्बन्धी पदवृन्द आठ हजार चारसौ सतहत्तर होते हैं ॥३२६॥ मोहकर्मके सर्वपदवृन्द ८४७७ हैं ।


जे जत्थ गुणे उद‌या जाओ य हवंति तत्थ पयडीओ ।
जोगोवओगलेसादि एहिं जिह जोगंते गुणिज्जाहिं ॥३२७॥

अर्थ: जिस गुणस्थानमें जितने उदयस्थान और उनकी जितनी प्रकृतियाँ होती हैं, उन्हें उन गुणस्थानोंमें यथासम्भव योग, उपयोग और लेश्यादिकसे गुणा करना चाहिए ॥३२७॥


दुसु तेरे दस तेरस णव एयारस हवंति णव छासु ।
सत्त सजोगे जोगा अजोगिठाणं हवे सुण्णं ॥३२८॥

अर्थ: पहले दो गुणस्थानोंमें तेरह तेरह योग होते हैं। तीसरेमें दश योग होते हैं। चौथेमें तेरह योग होते हैं। पाँचवेंमें नौ और छठेमें ग्यारह योग होते हैं। इससे आगे सातवेंसे बारहवें तक छह गुणस्थानोंमें नौ नौ योग होते हैं। सयोगिकेवलीके सात योग होते हैं। अयोगिकेवलीके कोई योग नहीं होता है ॥३२८॥


मिच्छादिट्ठिस्सोदयभंगा अट्ठेव होंति जिणभणिया ।
ते दसजोगे गुणिया भंगमसीदी य पज्जत्ते ॥३२६॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टिके अनन्तानुबन्धीके उदयसहित दश आदि चार उदयस्थान और अनन्तानुबन्धीके उदयसे रहित नौ आदि चार उदयस्थान इस प्रकार आठ उदयस्थान जिन भगवानने कहे हैं। उन्हें पर्याप्त दशामें सम्भव दश योगोंसे गुणित करने पर उदयस्थान-सम्बन्धी अस्सी भङ्ग हो जाते हैं ॥३२६॥


तस्सेव अपज्जत्ते उदयवियप्पाणि होंति चत्तारि ।
ते तिण्णि-मिस्सजोगेहिं गुणिया वारसा होंति ॥३३०॥

अर्थ: उसी अपर्याप्त मिथ्यादृष्टिके उदयस्थान-सम्बन्धी विकल्प चार ही होते हैं। उन्हें अपर्याप्तकालमें सम्भव तीन मिश्रयोगोंसे गुणा करने पर बारह भङ्ग होते हैं ॥३३०॥


आसादे चउभंगा बारसजोगाहया य अडयाला ।
मिस्सम्हि य चउभंगा दसजोगहया य चत्तालं ॥३३१॥

अर्थ: सासादन गुणस्थानमें नौ आदिक चार उदयस्थान होते हैं। उन्हें पर्याप्तकालमें संभव बारह योगोंसे गुणा करने पर अड़तालीस भङ्ग हो जाते हैं। मिश्र गुणस्थानमें सम्भव चार उदयस्थानोंको दश योगोंसे गुणा करने पर चालीस भङ्ग होते हैं ॥३३१॥


अट्ठेवोदयभंगा अविरयसम्मस्स होंति णायव्वा ।
मिस्सतिगं वजित्ता दह जोगहया असीदी य ॥३३२॥

अर्थ: अविरतसम्यक्त्वीके उदयस्थानके विकल्प आठ ही होते हैं। उन्हें अपर्याप्तकालमें संभव तीन मिश्रयोगोंको छोड़कर शेष दश योगोंसे गुणा करने पर अस्सी भंग चौथे गुणस्थानमें जानना चाहिए ॥३३२॥


विरयाविरए वि णियमा †उदयवियप्पा दु होंति अट्ठेव ।
णवजोगेहि य गुणिया भंगा बावत्तरी होंति ॥३३३॥

अर्थ: विरताविरतमें उदयस्थान-सम्बन्धी विकल्प नियमसे आठ ही होते हैं। उन्हें नौ योगोंसे गुणा करने पर बहत्तर भंग होते हैं ॥३३॥


अट्ठ य पमत्तभंगा जोगा एगारसा य तस्सेव ।
तेहि हया अडसीया भंगवियप्पा वि ते होंति ॥३३४॥

अर्थ: प्रमत्तगुणस्थानमें उदयस्थानके विकल्प आठ होते हैं। उन्हें इस गुणस्थानमें सम्भव ग्यारह योगोंसे गुणा कर देने पर अट्ठासी भङ्ग होते हैं ॥३४॥


अट्ठेवोदयभंगा पमत्तिदरस्स चावि बोद्धव्वा ।
णवजोगेहि हदा ते भंगा बावत्तरी होंति ॥३३५॥

अर्थ: अप्रमत्तविरतके उदयस्थानके भेद आठ ही जानना चाहिए। उन्हें नौ योगोंसे गुणित करने पर बहत्तर भङ्ग हो जाते हैं ॥३५॥


चउभंगापुव्वस्स य णवजोगहया हवंति छत्तीसा ।
एदे चउवीसह्दा ठाणवियप्पा य पुव्वुत्ता ॥३३६॥

अर्थ: अपूर्वकरणमें उदयस्थान चार होते हैं। उन्हें नौ योगोंसे गुणित करने पर छत्तीस भङ्ग होते हैं। इन पूर्वोक्त योग-भङ्गोंको चौबीससे गुणा करनेपर सर्व उदयस्थान-सम्बन्धी भङ्ग प्राप्त हो जाते हैं ॥१३६॥ वैक्रियिकमिश्रकाययोग और कार्मणकाययोग इन दोनों योगोंको चौथे गुणस्थानमें संभव आठों उदयस्थानोंसे गुणाकर पुनः सोलह भङ्गोंसे गुणा करनेपर असंयतगुणस्थानके भङ्ग उत्पन्न होते हैं ॥३३६॥


‘चउवीसेण य गुणिया सव्वट्ठाणाणि एत्तिया होंति ।
वारसयसहस्साईं’ छस्सद्वाहत्तराईं’ च ॥३३७॥

अर्थ: उक्त चौबीसस्थानोंके जो पूर्वोक्त स्थानोंके भंग बतलाये हैं, उन्हें चौबीससे गुणा करने पर बारह हजार छह सौ बहत्तर सर्व भंग होते हैं ॥१३७॥


चउसट्ठि होंति भंगा वेउव्वियमिस्ससासणे णियमा ।
वेउव्वियमिस्सस्स य णत्थि पुहत्तेण चउवीसा ॥३३८॥

अर्थ: वैक्रियिकमिश्रकाययोग-संयुक्त सासादनमें नियमसे चौसठ ही भङ्ग होते हैं, इसलिए वैक्रियिकमिश्रके चौबीस गुणकाररूप भङ्ग पृथक् नहीं बतलाये गये हैं ॥३३८॥


वेउव्वमिस्सकम्मे वे जोगे गुणिय अट्ठभंगेहिं ।
सोलसभंगेहिं पुणो गुणिदे दु हवंति अजदिभंगा दु ॥३३६॥


तेणेव होंति णेया ओरालियमिस्सजोगभंगा हु ।
उदयट्ठेण य गुणिए भंगवियप्पा य होंति सव्वेवि ॥३४०॥

अर्थ: उसी प्रकारसे औदारिकमिश्रकाययोगसम्बन्धी भङ्गोंको जानना चाहिए। अर्थात् चौथे गुणस्थानमें औदारिकमिश्रकाययोगके साथ स्त्री और नपुंसक इन दो वेदोंका उदय संभव नहीं है, इसलिए इस गुणस्थानमें संभव आठ उदयस्थानोंको प्रकृति-परिवर्तनसे उत्पन्न होनेवाले आठ ही भङ्गोंसे गुणा करनेपर सर्व भङ्ग-विकल्प आ जाते हैं ॥३४०॥


वेसयछप्पण्णा य वेउव्वियमिस्स-कम्मजोगाणं ।
चउसट्ठि चेव भंगा तस्स य ओरालमिस्सए होंति ॥३४१॥

अर्थ: चौथे गुणस्थानमें वैक्रियिकमिश्रकाययोग और कार्मणकाययोगसम्बन्धी दो सौ छप्पन भङ्ग होते हैं, तथा उसी गुणस्थानवर्तीके औदारिकमिश्रकाययोगमें चौसठ भङ्ग होते हैं ॥३४१॥


सत्तरस उदयभंगा अणियट्टिय चेव होंति णायव्वा ।
णव-जोगेहि य गुणिदे सदतेवण्णं च भंगा हु ॥३४२॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानसम्बन्धी उदयस्थानोंके विकल्प सत्तरह होते हैं, उन्हें इन गुणस्थानोंमें सम्भव नौ योगोंसे गुणित करनेपर एक सौ तिरेपन भङ्ग होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३४२॥


'तेरस चेव सहस्सा वे चेव सया हवंति णव चेव ।
उदयविअप्पे जाणसु जोगं पडि मोहणीयस्स ॥३४३॥

अर्थ: इस प्रकार योगकी अपेक्षा मोहनीय कर्मके सर्व उदयस्थान-विकल्प तेरह हजार दो सौ नौ (१३२०६) होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३४३॥


छत्तीसं ति-यत्तीसं सट्ठी बावन्नमेव चोद्दालं ।
चोद्दालं वीसं पि य मिच्छादि-णियट्टिपयडीओ ॥३४४॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिकरणगुणस्थान तक मोहकर्मकी उदयप्रकृतियाँ क्रमशः छत्तीस; तीन वार बत्तीस, साठ, बावन, चवालीस, चालीस और बीस होती हैं ॥३४४॥


दस णव अड सत्तूदया मिच्छादिट्ठिस्स होंति णायव्वा ।
सग-सग-उदएहिं गया भंगवियप्पा वि होंति छत्तीस ॥३४५॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टिके दश, नौ, आठ और सातप्रकृतिक उदयस्थान होते हैं, ऐसा जानना चाहिए । इनमेंसे अनन्तानुबन्धीके उदयसहित मिथ्यादृष्टिके अपने-अपने उदयस्थानगत प्रकृतियोंके भङ्ग-विकल्प छत्तीस होते हैं ॥३४५॥


अणुदय सव्वे भंगा बत्तीसा चेव होंति णायव्वा ।
उभओ वि मेलिदेसु य मिच्छे अट्ठुत्तरा सट्ठी ॥३४६॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धीके उदयसे रहित मिथ्यादृष्टिके उदयस्थानगत प्रकृतियोंके सर्वभंगविकल्प बत्तीस होते हैं, ऐसा जानना चाहिए । दोनों उदय-भंगोंको मिला देनेपर मिथ्यादृष्टिके अड़सठ भंग हो जाते हैं ॥३४६॥


पुणरवि दसजोगहदा अड्ढासट्ठी हवंति णायव्वा ।
मिच्छादिट्ठिस्सेदे छस्सयमसीदि य भंगा दु ॥३४७॥

अर्थ: इन उपर्युक्त अड़सठ उदयस्थानसम्बन्धी भङ्गोंको पर्याप्त दशामें सम्भव चार मनोयोग, चार वचनयोग, औदारिककाययोग और वैक्रियिककाययोग इन दश योगोंसे गुणा करने पर पर्याप्त मिथ्यादृष्टिके छह सौ अस्सी भङ्ग हो जाते हैं ॥३४७॥


ते चेव य छत्तीसे मिस्सेण तिगेण संगुणेयव्वा ।
मार्गदर्शन :- आचार्य श्री सुविधे मेलिदे अट्ठासीदा होंति सत्तसया ॥३४८॥

अर्थ: उन्हीं पूर्वोक्त भङ्गोंको अपर्याप्तकाल भावी मिश्रयोगत्रिकसे अर्थात् औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र और कार्मणकाययोगसे गुणा करना चाहिए । इस प्रकारसे प्राप्त हुए एक सौ आठ भङ्गोंको उपर्युक्त छह सौ आठमें मिला देनेपर मिथ्यात्वगुणस्थानके सर्व पदवृन्दसम्बन्धी भङ्ग सात सौ अठासी हो जाते हैं ॥३४८॥


बत्तीसोदयभंगा सासणसम्मम्मि होंति णियमेण ।
चउरासीदिविमिस्सा तिण्णि सया बारसजोगहया ॥३४६॥

अर्थ: सासादनगुणस्थानमें नियमसे उदयस्थान-सम्बन्धी भङ्ग बत्तीस होते हैं । उन्हें बारह योगोंसे गुणा करने पर तीन सौ चौरासी पदवृन्द-भङ्ग हो जाते हैं ॥३४६॥ मिश्रमें उदयसम्बन्धी प्रकृतियाँ बत्तीस होती हैं। उन्हें दश योगोंसे गुणा करने पर तीन सौ बीस भंग तीसरे गुणस्थानमें जानना चाहिए।


मिस्सस्स वि बत्तीसा दसजोगहया विसुत्तरा तिण्णिसया ।
अविरयसम्मे सट्ठी दसजोगहया य छव्व सया ॥३५०॥

अर्थ: अविरतसम्यक्त्व गुणस्थानमें उदयसम्बन्धी प्रकृतियाँ साठ होती हैं। उन्हें दश योगोंसे गुणा करने पर छह सौ पदवृंद-भंग होते हैं ॥३५०॥


बावण्ण देसविरदे भंगवियप्पा य होंति उदयगया ।
णव ओगेहि य गुणिया चउसयमडसट्ठि णायव्वा ॥३५१॥

अर्थ: देशविरतमें उदयगत भङ्ग-विकल्प बावन होते हैं। उन्हें नौ योगोंसे गुणा कर देने पर चार सौ अड़सठ पद वृन्द-भंग होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३५१॥


चउदालं तु पमत्ते भंगवियप्पा वि होंति बोधव्वा ।
एक्कारसजोगहया चउसीदा होंति चत्तसया ॥३५२॥

अर्थ: प्रमत्तगुणस्थानमें उदयस्थानसम्बन्धी भंग-विकल्प चवालीस होते हैं, ऐसा जानना चाहिए। उन्हें यहाँ सम्भव चार मनोयोग, चार वचनयोग, औदारिककाययोग, आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोग, इन ग्यारह योगोंसे गुणा करने पर चार सौ चौरासी पदवृन्दभङ्ग प्राप्त होते हैं ॥३५२॥


पमत्तेदरेसुदया चउदाला चेव होंति जिणवुत्ता ।
तिण्णि सया छण्णउया भंगवियप्पा वि हुंति णवगुणिदा ॥३५३॥

अर्थ: अप्रमत्तविरतमें उदयस्थान-सम्बन्धी भङ्ग-विकल्प जिनभगवानने चवालीस ही कहे हैं। उन्हें नौयोगोंसे गुणा करने पर तीन सौ छ्यानबै पदवृन्द-भङ्ग होते हैं ॥३५३॥


सुण्णजुयट्ठारसयं अपुव्वकरणम्मि वीस णवगुणिदा ।
मिच्छादि-अपुव्वंता चउवीसहदा हवंति सव्वे वि ॥३५४॥

अर्थ: अपूर्वकरणमें उदयप्रकृतियाँ बीस होती हैं। उन्हें नौ योगोंसे गुणा करने पर शून्ययुक्त अट्ठारह अर्थात् एक सौ अस्सी पदवृन्दभङ्ग होते हैं। इस प्रकार मिथ्यात्व गुणस्थानसे लेकर अपूर्वकरण तक बतलाये हुए उक्त सर्व पद-वृन्द-भङ्गोंको प्रकृतियोंके परिवर्तनसे उत्पन्न चौबीस भङ्गोंसे गुणा करना चाहिए ॥३५४॥


'चउवीसेण विगुणिदे एत्तियमेत्ता हवंति ते सव्वे ।
असिदिं चेव सहस्सा अडसट्ठि सदा असीदी य ॥३५५॥

अर्थ: चौबीससे गुणा करने पर वे सर्व पदवृन्द भङ्ग छ्यासी-हजार आठ सौ अस्सी (८६८८०) होते हैं ॥३५५॥


'बत्तीसं आसादे वेउव्वियमिस्स सोलसेण हया ।
पंचसयाणि य णियमा बारससंजुत्तया य तहा ॥३५६॥

अर्थ: सासादन गुणस्थानमें सर्व प्रकृतियाँ बत्तीस हैं। उन्हें वैक्रियिकमिश्रकाययोग-सम्बन्धी सोलह भंगोंसे गुणा करने पर नियमसे पाँचसौ बारह भंग प्राप्त होते हैं ॥३५६॥


'अविरथसम्मे सट्ठी भंगा बे-जोगेण संगुणिया !
पुणरवि सोलह-गुणिया । भंगवियप्पा हवंति णायव्वा ॥३५७॥

अर्थ: अविरतसम्यक्त्व गुणस्थानमें जो पहले उदयस्थान-सम्बन्धी साठ भंग बतलाये हैं, उन्हें वैक्रियिकमिश्र और कार्मणकाय इन दो योगोंसे गुणित करना चाहिए। पुनरपि उदयप्रकृतियोंके परिवर्तनसे सम्भव सोलह भंगोंसे गुणित करने पर जो संख्या उत्पन्न हो, उतने अर्थात् उन्नीस सौ बीस (१९२०) भंग-विकल्प जानना चाहिए ॥३५७॥


तेसिं सट्ठि वियप्पा अट्ठवियप्पेण संगुणिया ।
तस्सोरा लियमिस्से चउसदसीदी य भंगया जाण ॥३५८॥
एदे पुण पुव्वुत्ता पक्खित्ते हुंति भंगा दु ।

अर्थ: उसी अविरतसम्यक्त्वी जीवके औदारिकमिश्रकाययोगमें चारसौ अस्सी भंग और जानना चाहिए। जो कि पूर्वोक्त साठ उदयविकल्पोंको आठ भंगोंसे गुणा करनेपर प्राप्त होते हैं। इन भंगोंको पूर्वोक्त १६२० भंगोंमें प्रक्षेप करनेपर सर्व अपर्याप्त-दशागत भंगोंका प्रमाण २४०० आ जाता है ॥३५८॥


बारसभंगे विगुणे उवरिमभंगा वि पंच पक्खिविय ।
णवजोगेहि य गुणिदे इंगिसट्ठा विगसया होंति ॥३५६॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणके संवेदभागमें दो उदयप्रकृतियोंसे गुणित बारह अर्थात् चौबीस भंग होते हैं। अवेदभागमें एक उदयप्रकृतिविकल्प चार होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायमें एक सूक्ष्मलोभ होता है। इन पाँचको उपर्युक्त चौबीसमें प्रक्षेप करनेपर उनतीस होते हैं। उन्हें नौ योगोंसे गुणित करनेपर दो सौ इकसठ भंग हो जाते हैं ॥३५६॥


णउदी चेव सहस्सा तेवण्णं चेव होंति बोधव्वा ।
पयसंखा णायव्वा जोगं पडि मोहणीयस्स ॥३६०॥

अर्थ: मोहनीयकर्मके योगोंकी अपेक्षा सर्वपदद्वन्द्वोंके भंगी संख्या नब्बे हजार तिरेपन होती है, ऐसा जानना चाहिए ॥३६०॥


'मिच्छादिय-देसंता पण पण छ छक छच्च उवओगा ।
विरयादिय-खीणंता उवओगा सत्त दुसु दोण्णि ॥३६१॥

अर्थ: उपयोगके मूलमें दो भेद हैं-ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग। ज्ञानोपयोगके आठ और दर्शनोपयोगके चार भेद होते हैं। उनमेंसे, मिथ्यादृष्टिगुणस्थानसे लेकर देशसंयतगुणस्थान तक क्रमशः पाँच, पाँच, छह, छह और छह उपयोग होते हैं। प्रमत्तविरतसे लेकर क्षीणकषायगुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानमें सात सात उपयोग होते हैं। अन्तिम दो गुणस्थानोंमें दो दो उपयोग होते हैं ॥३६१॥


३सग-सगमंगेहि य ते उवओगा संगुणं च काऊण ।
चउवीसेण य गुणिए छावत्तरिसयमसीदी य ॥३६२॥

अर्थ: इन उपर्युक्त उपयोगोंको अपने अपने गुणस्थानसम्बन्धी भंगोंसे गुणा करके पुनः चौबीससे गुणा करनेपर छिहत्तरसौ अस्सी सर्व भंगोंका प्रमाण आ जाता है ॥३६२॥


अणियट्टिसुदए भंगा सत्तरस चेव होंति णायव्वा ।
सत्तुवओगे गुणिया सय दस णव चेव भंगा हु ॥३६३॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें उदयसम्बन्धी भंग सत्तरह होते हैं। उन्हें सात उपयोगोंसे गुणा करने पर एकसौ उन्नीस भङ्ग होते हैं ऐसा जानना चाहिए ॥३६३॥


सत्तत्तरि चेव सया णवणउदी चेव होंति वोहव्वा ।
उदयवियप्पे जाणसु उवओगे मोहणीयस्स ॥३६४॥

अर्थ: इस प्रकार मोहनीयकर्मके उपयोगकी अपेक्षा सर्व उदयविकल्प सतहत्तरसौ निन्यानबै (७७६६) होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३६४॥


मिच्छादि-अपुव्वंता पयडिवियप्पा हवंति णायव्वा ।
उवओगेण य गुणिया चउवीसगुणा थ पुणरवि य ॥३६५॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानसे लेकर अपूर्वकरण तक जितने प्रकृतिविकल्प होते हैं, उन्हें पहले उपयोगसे गुणित करे। पुनरपि चौबीससे गुणा करे ॥३६५॥


अट्ठसहस्सा एयसदसट्ठी मिच्छम्हि हवंति णायव्वा ।
तिण्णि सहस्सा अट्ठसदचत्ताला सासणे भंगा ॥३६६॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानमें आठ हजार एक सौ साठ भंग (८१६०) होते हैं। सासादनमें तीन हजार आठ सौ चालीस (३८४०) भंग होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३६६॥


सम्मामिच्छे भंगा अट्ठुत्तरछस्सदा चउसहस्सा ।
छच्च सया सत्ताला अट्ठ सहस्सं तु अजदीए ॥३६७॥

अर्थ: सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थानमें चार हजार छह सौ आठ (४६०८) भंग होते हैं। अविरतसम्यक्त्वगुणस्थानमें आठ हजार छह सौ चालीस (८६४०) भंग होते हैं ॥३६७॥


देसे सहस्स सत्तय चउसय अट्ठुत्तरा असीदी य ।
तिण्णि सया बाणउदी सत्त सहस्सा पमत्ते दु ॥३६८॥

अर्थ: देशविरतगुणस्थानमें सात हजार चार सौ अठासी (७४८८) भंग होते हैं प्रमत्तविरतमें सात हजार तीनसौ बानवै (७३९२) भङ्ग होते हैं ॥३६८॥


अह+ अप्पमत्तभंगा तावदिया होंति णायव्वा ।
तिग तिग छहसुण्णगदा भंगवियप्पा अपुव्वे य ॥३६९॥

अर्थ: इससे आगे सातवें अप्रमत्तगुणस्थानमें भी उतने ही अर्थात् सात हजार तीनसौ बानवै (७३९२) भङ्ग जानना चाहिए । अपूर्वकरणमें तीन, तीन, छह और शून्य अर्थात् तीन हजार तीन सौ साठ (३३६०) भङ्ग होते हैं ॥३६९॥ उक्त आठों गुणस्थानोंके भङ्गोंका जोड़ ५०८८० होता है ।


१अणियट्ठिम्मि वियप्पा दोण्णि सया तिगधिया मुणेयव्वा ।
सव्वेसु मेलिदेसु य उवओगवियप्पया णेया ॥३७०॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्परायमें तीन अधिक दो सौ अर्थात् २०३ भङ्ग जानना चाहिए । इन सर्व भङ्गोंके मिला देने पर उपयोग-विकल्पोंका प्रमाण निकल आता है ऐसा जानना चाहिए ॥३७०॥ अनिवृत्तिकरणके सवेदभागमें उदयप्रकृतियाँ २४ होती हैं और अवेद भागमें ४ होती हैं । सूक्ष्मसाम्परायमें उदयप्रकृति १ है । ये सब मिलकर २६ हो जाती हैं । उन्हें सात उपयोगसे गुणा करने पर २०३ भङ्ग दोनों गुणस्थानोंके आ जाते हैं ।


२इक्कावणसहस्सा तेसीदी चेव होंति बोधव्वौ ।
पयसंखा णायव्वा उवओगे मोहणीयस्स१ ॥३७१॥

अर्थ: इस प्रकार उपयोगकी अपेक्षा मोहनीयकर्मके पदद्वन्द्व-भङ्गोंका प्रमाण इकावन हजार तेरासी (५१०८३) होता है, ऐसा जानना चाहिए ॥३७१॥


'मिच्छादि-अप्पमत्तंतयाण लेसा जिणेहिं णिद्दिट्ठा ।
छ छक्क छक्क छ चिय तिग तिण्णि य होंति लेसाओ ॥३७२॥

तस्सुवरि सुक्कलेसा मिच्छादि-अपुव्वंतया लेसा ।
चउवीसेण य गुणिदे भंगेहिं गुणिज्ज पच्छा दु ॥३७३॥

अर्थ (गाथा 372 से 373): मिथ्यात्व गुणस्थानसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक जिनेन्द्रदेवने लेश्याएँ क्रमशः इस प्रकारसे निर्दिष्ट की हैं-छह, छह, छह, छह, तीन, तीन और तीन । अर्थात् चौथे गुणस्थान तक छहों लेश्याएँ होती हैं। पाँचवेंसे सातवें तक तीनों शुभ लेश्याएँ होती हैं। इससे ऊपरके गुणस्थानोंमें केवल एक शुक्ललेश्या होती है। (चौदहवाँ गुणस्थान लेश्यारहित होता है।) इनमेंसे मिथ्यात्वसे लेकर अपूर्वकरण गुणस्थान तक की लेश्याओंसे अपने अपने गुणस्थानोंके मोहसम्बन्धी उदयस्थानोंकी संख्यासे गुणा करे। पीछे चौबीस भङ्गोंसे गुणा करे ॥३७२-३७३॥


मिच्छादिट्ठी भंगा एक्कारस सया य होंति बावण्णा ।
सासणसम्मे भंगा छावत्तरि पंचसदिगा य ॥३७४॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टिगुणस्थानके लेश्या-सम्बन्धी मोहके उदयस्थानोंके भङ्ग ग्यारहसौ बावन (११५२) होते हैं । सासादनसम्यक्त्वमें पाँचसौ छिहत्तर भंग (५७६) होते हैं ॥३७४॥


सम्मामिच्छे जाणे तावदिया चेव होंति भंगा हु ।
एकारस चेव सया बावण्णासंजया सम्मे ॥३७५॥

अर्थ: सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थानमें उतने ही भङ्ग जानना चाहिए अर्थात् ५७६ भङ्ग होते हैं । असंयतसम्यक्त्वगुणस्थानमें ग्यारहसौ बावन (११५२) भङ्ग होते हैं ॥३७५॥


विरयाविरए भंगा छावत्तरि होंति पंचसदिगा य ।
विरए दोसु वि जाणे तावदिया चेव भंगा हु ॥३७६॥

अर्थ: विरताविरतगुणस्थानमें पाँचसौ छिहत्तर (५७६) भङ्ग होते हैं। दोनों विरत अर्थात् प्रमत्त और अप्रमत्तविरतमें भी उतने ही अर्थात् पाँच सौ छिहत्तर, पाँचसौ छिहत्तर भङ्ग जानना चाहिए ॥३७६॥


अण्णउदिं च वियप्पा अट्ठवकरणस्स होंति णायव्वा ।
पंचेव सहस्साईं वेसदअसिदी य भंगा हु ॥३७७॥

अर्थ: अपूर्वकरणमें छाननबै (६६) भङ्ग होते हैं। इस प्रकार आठों गुणस्थानोंके लेश्याकी अपेक्षा उदयस्थानके विकल्प पाँच हजार दो सौ अस्सी (५२८०) होते हैं ॥३७७॥


अणियट्टिय सत्तरसं पक्खिवियव्वा हवंति पुव्वुत्ता ।
तेहिं जुआ सव्वे वि य भंगवियप्पा हवंति णायव्वा ॥३७८॥

अर्थ: इन उपर्युक्त भङ्गोंमें अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्परायके पूर्वोक्त सत्तरह भङ्ग और प्रक्षेप करना चाहिए। इस प्रकार इनसे युक्त होने पर जो आठों गुणस्थानोंके उदयविकल्प हैं, वे सर्व मिलकर लेश्याकी अपेक्षा मोहके उदयविकल्प हो जाते हैं ॥३७८॥


'बावण्णं चेव सया सत्ताणउदी य होंति बोद्धव्वा ।
उदयवियप्पे जाणसु लेसं पडि मोहणीयस्स ॥३७९॥

अर्थ: मोहनीयकर्मके लेश्याओंकी अपेक्षा सर्व उदयविकल्प बावन सौ सत्तानबै (५२९७) होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३७९॥


मिच्छादिट्ठिप्पहुदि जाव अपुव्वंतलेसकप्पा दु ।
पयडिट्ठाणेहिं हया चउवीसगुणा य होंति पदबंधा ॥३८०॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर अपूर्वकरण गुणस्थान तक जो लेश्याके विकल्प बतलाये गये हैं उन्हें पहले उस उस गुणस्थानके उदयस्थानोंकी प्रकृतियोंसे गुणा करे । पीछे चौबीससे गुणा करने पर विवक्षित गुणस्थानके पदवृन्द प्राप्त हो जाते हैं ॥३८०॥


मिच्छादिट्ठी-भंगा सत्तसया णवसहस्स वाणउदी ।
सासणसम्मे जाणसु छायालसदा य अट्ठधिया ॥३८१॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टिगुणस्थानके सर्व भंग नौ हजार सात सौ बानबैं (६७६२) होते हैं। सासादन-सम्यक्त्वमें आठ अधिक छयालीस सौ अर्थात् चार हजार छह सौ आठ (४६०८) भंग होते हैं ॥३८१॥


सम्मामिच्छे जाणसु तावदिया चेव होंति भंगा हु ।
अट्ठेव सहस्साइं छस्सय चाला अविरदे य ॥३८२॥

अर्थ: सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थानमें भी इतने ही अर्थात् चार हजार छह सौ आठ (४६०८) जानना चाहिए । अविरतसम्यक्त्वमें आठ हजार छह सौ चालीस (८६४० ) भंग होते हैं ॥३८२॥


विरयाविरए जाणसु चोद्दाला सत्तसय तिय सहस्सा ।
विरदे य होंति णेया एकत्तीस सय अडसट्ठी ॥३८३॥

अर्थ: विरताविरतमें तीन हजार सात सौ चवालीस ( ३७४४ ) भंग होते हैं । प्रमत्तविरतमें इकतीससौ अडसठ अर्थात् तीन हजार एक सौ अडसठ ( ३१६८ ) भंग होते हैं ॥३८३॥


अथ अप्पमत्तविरदे तावदिया चेव होंति णायव्वा ।
जाणसु अपुव्वविरदे चउसदमसिदी य भंगा हु ॥३८४॥

अर्थ: अप्रमत्तविरतमें भी इतने ही भंग होते हैं अर्थात् तीन हजार एक सौ अड़सठ ( ३१६८ ) भंग जानना चाहिए। अपूर्वकरणमें चार सौ अस्सी ( ४८० ) भंग होते हैं ॥३८४॥


ऊणत्तीसं भंगा अणियट्टी-सुहुमगाण बोधव्वा ।
सव्वे वि मेलिदेसु य सव्ववियप्पा वि एत्तिया होंति ॥३८५॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्परायके उनतीस भंग जानना चाहिए । इन सर्वभंगोंके मिला देनेपर जो सर्वविकल्पोंका प्रमाण होता है वह इतना ( वक्ष्यमाण ) है ॥३८५॥


‘अट्ठत्तीससहस्सा वे चेव सया हवंति सगतीसा ।
पदसंख्या णायव्वा लेसं पडि मोहणीयस्स’ ॥३८६॥

अर्थ: मोहनीयकर्मके लेश्याकी अपेक्षा सर्व पदवृन्दोंकी संख्या अड़तीस हजार दो सौ सैंतीस ( ३८२३७ ) होती है, ऐसा जानना चाहिए ॥३८६॥ संयमकी प्राप्तिकी अपेक्षा मोहनीय कर्मके उदयविकल्प तेरह सौ सतहत्तर (१३७७) होते हैं ऐसा जानना चाहिए ॥३८६॥


तिण्णेव सहस्साईं सत्तेव सया हवंति छप्पण्णा ।
उदयवियप्पे जाणसु बेदं पडि मोहणीयस्स ॥३८७॥

अर्थ: वेदकी अपेक्षा मोहनीयकर्मके उदयविकल्प तीन हजार सात सौ छप्पन (३७५६) होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३८७॥


‘पणवीससहस्साई’ तिण्णेव सया हवंति अडसट्ठी ।
पयसंखा णायव्वा वेदं पडि मोहणीयस्स ॥३८८॥

अर्थ: वेदकी अपेक्षा मोहनीयकर्मके पदवृन्दोंकी संख्या पच्चीस हजार तीन सौ अडसठ होती है, ऐसा जानना चाहिए ॥३८८॥


'तेरस सयाणि सयरिं सच्चेव तहा हवंति णेया दु ।
उदयवियप्पे जाणसु संजमलंभेण मोहस्स ॥३८९॥


'सत्तेव सहस्साई तिण्णेव सया हवंति तेवण्णा ।
पयसंखा णायव्वा संजमलंभेण मोहस्स ॥३९०॥

अर्थ: संयमकी प्राप्तिकी अपेक्षा मोहनीयकर्मके पदवृन्दोंकी संख्या सात हजार तीन सौ तिरेपन (७३५३) होती है, ऐसा जानना चाहिए ॥३९०॥


'दो चेव सहस्साईं पंचेव सया हवंति तीसहिया ।
उदयवियप्पे जाणसु सम्मत्तगुणेण मोहस्स ॥३९१॥

अर्थ: सम्यक्त्वगुणकी अपेक्षा मोहनीयकर्मके उदय-विकल्प दो हजार पाँच सौ तीस ( २५३० ) होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥३६१॥


'पण्णरस सहस्साई चत्तारि सया हवंति अट्ठरसा ।
पयसंखा णायव्वा सम्मत्तगुणेण मोहस्स ॥३९२॥

अर्थ: मोहनीयकर्मके सम्यक्त्वगुणकी अपेक्षा पदवृन्दकी संख्या पन्द्रह हजार चार सौ अठारह (१५४१८) होती है, ऐसा जानना चाहिए ॥३६२॥


[मूलगा० ४३] तिण्णेगे एगेणं दो मिस्से पंच-चदु णियट्ठीए तिण्णि ।
दस बादरम्हि सुहुमे चचारि य तिण्णि उवसंते ॥३९३॥

अर्थ: मोहकर्मके सत्त्वस्थान मिथ्यात्वमें तीन, सासादनमें एक, मिश्रमें दो अविरत आदि चार गुणस्थानोंमें पाँच-पाँच, अपूर्वकरणमें तीन, अनिवृत्तिबादरमें दश, सूक्ष्मसाम्परायमें चार और उपशान्तमोहमें तीन होते हैं ॥३६३॥


अट्ठ य सत्त य छक्क य वीसधिया होइ मिच्छदिट्ठिस्स ।
अट्ठावीसा सासण अट्ठ चउव्वीसया मिस्से ॥३९४॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानमें मिथ्यादृष्टि जीवके अट्ठाईस, सत्ताईस और छब्बीसप्रकृतिक तीन सत्त्वस्थान होते हैं । सासादनमें अट्ठाईसप्रकृतिक एक सत्त्वस्थान होता है । मिश्रमें अट्ठाईस और चौबीसप्रकृतिक दो सत्त्वस्थान होते हैं ॥३६४॥


असंयदमादिं किच्चा अपमत्तन्तं पंच ठाणाणि ।
अट्ठ य चदु तिय दुगेगाहियवीस मोहसंताणि ॥३९५॥

अर्थ: मिथ्यात्वमें २८, २७, २६, सासादनमें २८, मिश्रमें २८, २४ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होते हैं । असंयतको आदि करके अप्रमत्त-पर्यन्त चार गुणस्थानोंमें अट्ठाईस, चौबीस, तेईस, बाईस और इक्कीसप्रकृतिक पाँच-पाँच सत्त्वस्थान होते हैं ॥३६५॥


अपुव्वम्मि संतद्वाणा अट्ठ चउरेय अहिय वीसाणि ।
अणियट्टिबादरस्स य दस चेव य होंति ठाणाणि ॥३९६॥


अट्ठचउरेयतीसं तिय दुय एगधिय दस चेव ।
पण चउ तिग दो वेवाणियट्टिए होंति दस एदे ॥३९७॥

अर्थ: अपूर्वकरण गुणस्थानमें अट्ठाईस, चौबीस और इक्कीसप्रकृतिक तीन सत्त्वस्थान होते हैं। अनिवृत्तिबादरसंयतके दश सत्त्वस्थान होते हैं ॥३६६॥ अपूर्वकरणमें २८, २४, २१ प्रकृतिक तीन सत्त्वस्थान होते हैं। अनिवृत्तिबादरसंयतके अट्ठाईस, चौबीस, इक्कीस, तेरह, बारह, ग्यारह, पाँच, चार, तीन और दो प्रकृतिक दश सत्त्वस्थान होते हैं ॥३६७॥ अनिवृत्तिकरणमें २८, २४, २१, १३, १२, ११, ५, ४, ३, २ प्रकृतिक दश सत्त्वस्थान


सुहुमम्मि होंति ठाणे अट्ठ चदुरेय वीसमधियमेयं च ।
उवसंतवीयराए अट्ठचदुरेयवीससंतट्ठाणाणि ॥३९८॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें अट्ठाईस, चौबीस, इक्कीस और एक प्रकृतिक चार सत्त्वस्थान होते हैं। उपशान्तकषायवीतराग छद्मस्थके अट्ठाईस, चौबीस और इक्कीस प्रकृतिक तीन सत्त्वस्थान होते हैं ॥३६८॥ सूक्ष्मसाम्परायमें २८, २४, २१, १ प्रकृतिक चार तथा उपशान्तमोहमें २८, २४, २१ प्रकृतिक तीन सत्त्वस्थान होते हैं। इस प्रकार मोहनीयकर्मके सत्त्वस्थानोंकी प्ररूपणा समाप्त हुई।


[मूलगा०५४] १छण्णव छव्सिय सत्तय एगदुगं तिय तियट्ठ चउं ।
दुअ दुअ चउदुय पण चउ चदुरेग चदुपणगेग चउं ॥३९९॥


[मूलगा०५५] २एगेगमट्ठ एगेगमट्ठ छदुमत्थ-केवलिजिणाणं ।
पुण चदुरेग चउक्के दो चउ दो छह ठाणाणि ॥४००॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानमें नामकर्मके बन्धस्थान छह, उदयस्थान नौ, और सत्त्वस्थान छह होते हैं। सासादनमें बन्धस्थान तीन, उदयस्थान सात और सत्त्वस्थान एक होता है। मिश्रमें बन्धस्थान दो, उदयस्थान तीन और सत्त्वस्थान दो होते हैं। अविरतमें बन्धस्थान तीन, उदयस्थान आठ और सत्त्वस्थान चार होते हैं। देशविरतमें बन्धस्थान दो, उदयस्थान दो और सत्त्वस्थान चार होते हैं। प्रमत्तविरतमें बन्धस्थान दो, उदयस्थान पाँच और सत्त्वस्थान चार होते हैं। अप्रमत्तविरतमें बन्धस्थान चार, उदयस्थान एक और सत्त्वस्थान चार होते हैं। अपूर्व- करणमें बन्धस्थान पाँच, उदयस्थान एक और सत्त्वस्थान चार होते हैं। अनिवृत्तिकरणमें बन्धस्थान एक, उदयस्थान एक और सत्त्वस्थान आठ होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायमें बन्धस्थान एक, उदयस्थान एक और सत्त्वस्थान आठ होते हैं। दोनों छद्मस्थ जिनोंके अर्थात् उपशान्तमोह और क्षीणमोह वीतराग संयतोंके एक एक उदयस्थान और चार चार सत्त्वस्थान होते हैं। केवली जिनोंके अर्थात् सयोगिकेवली और अयोगिकेवलीके क्रमशः दो दो उदयस्थान और चार तथा छह सत्त्वस्थान होते हैं ॥३६६-४००॥


णामस्स य बंधोदयसंताणि गुणं पडुच्च य विभज्ज ।
तिगजोएण य एत्थ दु भणियव्वं अत्थजुत्तीए ॥४०१॥

अर्थ: नामकर्मके बन्धस्थान, उदयस्थान और सत्त्वस्थान गुणस्थानोंकी अपेक्षा विभाग करके त्रिसंयोगी भङ्गरूपसे अर्थयुक्तिके द्वारा यहाँ पर कहे जाते हैं ॥४०१॥


'तेवीसमादि कातुं तीसंता होंति बंधमिच्छम्हि ।
उवरिम दो वज्जित्ता उदद्या णव चेव होंति णायव्वा ॥४०२॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानमें तेईस प्रकृतिकको आदि करके तीस प्रकृतिक तकके छह बन्धस्थान होते हैं। तथा उपरिम दोको छोड़कर शेष नौ उदयस्थान होते हैं ॥४०२॥


तस्स य संतट्ठाणा तेणउदिं वज्जिदूण छाउवरिं ।
सासणसम्मे बंधा अट्ठावीसादि-तीसंता ॥४०३॥

अर्थ: मिथ्यात्वगुणस्थानमें तेरानवैको छोड़कर उपरिम छह सत्त्वस्थान होते हैं। सासादनमें बन्धस्थान अट्ठाईस, उनतीस और तीस प्रकृतिक तीन होते हैं ॥४०३॥ मिथ्यात्वमें सत्त्वस्थान ९२, ९१, ९०, ८८, ८४, ८२ प्रकृतिक छह होते हैं। सासादनमें बन्धस्थान २८, २९, ३० प्रकृतिक तीन होते हैं।


तस्स य उदयट्ठाणाणि होंति इगिवीसमादिएकतीसंता ।
वज्जिय अट्ठावीसं सत्तावीसं च संत णउदीयं ॥४०४॥

अर्थ: सासादनमें उदयस्थान सत्ताईस और अट्ठाईसको छोड़कर इक्कीसको आदि लेकर इकतीस प्रकृतिक तकके सात होते हैं। सत्त्वस्थान नब्बे प्रकृतिक एक होता है ॥४०४॥ सासादनमें उदयस्थान २१, २४, २५, २६, २९, ३०, ३१ प्रकृतिक सात हैं। तीर्थंकर प्रकृति और आहारकद्विककी सत्तावाला जीव सासादनगुणस्थानको प्राप्त नहीं होता है, इसलिए यहाँ पर सत्त्वस्थान ९० प्रकृतिक एक ही होता है।


²मिस्सम्मि ऊणतीसं अट्ठावीसा हवंति बंधाणि ।
इगितीसूणत्तीसं तीसं च य उदयठाणाणि ॥४०५॥

अर्थ: मिश्रगुणस्थानमें बन्धस्थान अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक दो होते हैं। तथा उदयस्थान उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक तीन होते हैं ॥४०५॥ मिश्रमें बन्धस्थान २८, २९ प्रकृतिक दो और उदयस्थान २९, ३०, ३१ प्रकृतिक तीन हैं।


³तस्सेव संतकम्मा बाणउदिं णउदिमेव जाणाहि ।
अविरयसम्मे बंधा अट्ठवीसुगुत्तीस-तीसाणि ॥४०६॥

अर्थ: उसी मिश्र गुणस्थानमें बानवै और नब्बै प्रकृतिक दो ही सत्त्वस्थान जानना चाहिए। अविरत सम्यक्त्वगुणस्थानमें बन्धस्थान अट्ठाईस, उनतीस और तीस प्रकृतिक तीन होते हैं ॥४०६॥ प्रमत्तविरतके बन्धस्थान अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक दो तथा गुणस्थान पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस और तीस प्रकृतिक पाँच होते हैं ॥४०६॥


तस्सेव होंति उदया उवरिम दो वज्जिदूण हेद्विल्ला ।
चउवीसं वज्जित्ता हिद्विमचउरेव संताणि ॥४०७॥

अर्थ: उसी असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानमें उदयस्थान उपरिम दो और अधस्तन चौबीसको छोड़कर शेष आठ होते हैं। तथा उसीके सत्त्वस्थान अधस्तन चार होते हैं ॥४०७॥


विरदाविरदे जाणे उणतीसट्ठवीसबंधाणि ।
तीसेकतीसमुदया हेद्विमचत्तारि संताणि ॥४०८॥

अर्थ: विरताविरत गुणस्थानमें अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक दो बन्धस्थान जानना चाहिए। तीस और इकतीस प्रकृतिक दो उदयस्थान तथा अधस्तन चार सत्त्वस्थान होते हैं ॥४०८॥


उगुतीसट्ठावीसा पमत्तविरयस्स बंधठाणाणि ।
पणुवीस सत्तवीसा अडवीसुगुतीस तीसुदया ॥४०९॥


'तस्स य संतट्ठाणा हेट्ठा चउरेव णिद्दिट्ठा ।
इगिबंधं वज्जित्ता हेट्ठिमचउ अप्पमत्तस्स ॥४१०॥

अर्थ: उसी प्रमत्तविरतके सत्त्वस्थान अधस्तन चारों ही कहे गये हैं। अप्रमत्तविरतके एकप्रकृतिक बन्धस्थानको छोड़कर अधस्तन चार बन्धस्थान होते हैं ॥४१०॥


'तीसं चेव उदयं ति-दु-इगि-णउदी य णउदिसंताणि ।
जाणिज्ज अप्पमत्ते बंधोदयसंतकम्माणिं ॥४११॥

अर्थ: उसी अप्रमत्तसंयतमें तीसप्रकृतिक एक उदयस्थान होता है, तथा तेरानबै, बानबै, इक्यानबै और नब्बैप्रकृतिक चार सत्त्वस्थान जानना चाहिए ॥४११॥


उवरिमपंचट्ठाणे अपुव्वकरणस्स बंधंतो ।
उदयं तीसट्ठाणं हेट्ठिम चत्तारि संतठाणानि ॥४१२॥

अर्थ: उपरिम पाँच बन्धस्थानोंको बाँधनेवाले अपूर्वकरणसंयतके तीसप्रकृतिक एक उदयस्थान और अधस्तन चार सत्त्वस्थान होते हैं ॥४१२॥


अणियट्टिस्स दुबंधं जसकित्ती उदय तीसगं चेव ।
ति-दु-इगि-णउदिं णउदिं णव अड सत्तऽधियसत्तरिमसीदं ॥४१३॥

एदाणि चेव सुहुमस्स होंति बंधोदयाणि संताणि ।
उवसंते तीसुदए हेडिमचत्तारि संताणि ॥४१४॥

अर्थ (गाथा 413 से 414): अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें एक यशःकीर्त्तिका बन्ध होता है । तीसप्रकृतिक एक उदयस्थान है । तेरानबै, बानबै, इक्यानबै, नब्बै, अस्सी, उन्यासी, अठहत्तर और सतहत्तरप्रकृतिक आठ सत्त्वस्थान होते हैं । ये ही बन्ध, उदय और सत्त्वस्थान सूक्ष्मसाम्परायसंयतके भी होते हैं । उपरतबन्धवाले उपशान्तमोहमें तीसप्रकृतिक उदयस्थान और अधस्तन चार सत्त्वस्थान होते हैं ॥४१३-४१४॥


तह खीणेसु वि उदयं उवरिमदुगमुज्झिऊण चउसंता ।
तीसेकतीसमुदयं होंति सजोगिम्मि णियमेण ॥४१५॥

अर्थ: क्षीणकषाय-गुणस्थानमें उदयस्थान तीसप्रकृतिक एक ही है । तथा उपरिम दोको छोड़कर चार सत्त्वस्थान होते हैं । सयोगकेवलीमें नियमसे तीस और एकतीसप्रकृतिक दो उदयस्थान होते हैं ॥४१५॥


तस्स य संतट्ठाणा उवरिम दो वज्जिदूण चउ हेड्ठा ।
णव अट्ठ व य उदयाऽजोगिम्हि हवंति णेयाणि ॥४१६॥

अर्थ: उन्हीं सयोगिकेवलीके उपरिम दो छोड़कर अधस्तन चार सत्त्वस्थान होते हैं। अयोगिकेवलीके नौ और आठप्रकृतिक दो उदयस्थान होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥४१६॥


णव दस सत्तरियं अट्ठत्तरियं च ऊणसीदी य ।
आसीदिं चाजोगे संतट्ठाणानि जाणेज्जो ॥४१७॥

अर्थ: अयोगिकेवलीके अस्सी, उन्यासी अट्ठहत्तर, सतहत्तर, दश और नौप्रकृतिक छह सत्त्वस्थान जानना चाहिए ॥४१७॥


[मूलगा०४६]¹दो छक्कट्ट चउक्कं णिरयादिसु पयडिबंधठाणानि ।
पण णव दसयं पणयं ति-पंच-वारे चउक्कं च¹ ॥४१८॥

अर्थ: नरक आदि गतियोंमें नामकर्मके प्रकृतिक बन्धस्थान क्रमशः दो, छह, आठ और चार होते हैं। उदयस्थान क्रमशः पाँच, नौ, दश और पाँच होते हैं। तथा सत्त्वस्थान क्रमशः तीन, पाँच, बारह और चार होते हैं ॥४१८॥


²णिरए तीसगुतीसं बंधट्ठाणानि होंति णायव्वा ।
इगि-पण-सत्तट्ठऽधिया वीसा उगुतीसमैयुदया ॥४१९॥

³संतट्ठाणानि पुणो होंति तिण्णेव णिरयवासम्मि ।
वाणउदिमादियाणं णउदिट्ठाणंतियाणि सया ॥४२०॥

अर्थ (गाथा 419 से 420): नरकगतिमें उनतीस और तीस प्रकृतिक दो बन्धस्थान जानना चाहिए। इक्कीस, पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक पाँच उदयस्थान होते हैं। तथा नरकावासमें बानब्वेको आदि लेकर नब्बे तकके तीन सत्त्वस्थान सदा होते हैं ॥४१६-४२०॥


'तिरियगई तेवीसं पणुवीस छव्वीसमट्ठवीसा य ।
तीसूण तीस बंधा उवरिम दो वज्ज णव उदया ॥४२१॥

बाणउदि णउदिमट्ठसीदिमेव संताणि चदु दु सीदी य ।
तिरिएसु जाण संता मणुएसुवि सव्वबंधा तो॥४२२॥

अर्थ (गाथा 421 से 422): तिर्यञ्चगतिमें तेईस, पच्चीस, छब्बीस, अट्ठाईस उनतीस और तीस प्रकृतिक छह बन्धस्थान होते हैं। उदयस्थान उपरिम दोको छोड़कर शेष नौ होते हैं। तथा सत्त्वस्थान बानबै, नब्बे अठासी और बियासी प्रकृतिक पाँच होते हैं। ऐसा जानना चाहिए। मनुष्यगतिमें पूर्वमें बतलाये हुए सब बन्धस्थान होते हैं ॥४२१-४२२॥


'चउवीसं वज्जुदया सव्वाई हवंति संतठाणानि ।
वासीदं वज्जित्ता एत्तो देवेसु वोच्छामि ॥४२३॥

अर्थ: मनुष्यगतिमें चौबीस प्रकृतिक उदयस्थान को छोड़कर शेष सर्वउदयस्थान होते हैं। तथा बियासीको छोड़कर शेष सर्वसत्त्वस्थान होते हैं। अब इससे आगे देवोंमें बन्धादिस्थानोंको कहेंगे ॥४२३॥


पणुवीसं छव्वीसं ऊणत्तीसं च तीसबंधाणि ।
इगिवीसं पणुवीसं अडसत्तावीसमुगुतीसं ॥४२४॥

एए उदयट्ठाणा संतट्ठाणाणि आदिचत्तारि ।
देवगईए जाणे एत्तो पुण इंदिएसु वोच्छामि ॥४२५॥

अर्थ (गाथा 424 से 425): देवगतिमें बन्धस्थान पच्चीस, छब्बीस, उनतीस और तीस प्रकृतिक चार होते हैं। उदयस्थान इक्कीस, पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक पाँच होते हैं। तथा सत्त्वस्थान आदिके चार जानना चाहिए। अब इससे आगे इन्द्रियमार्गणामें बन्धादिस्थानोंका निरूपण करेंगे ॥४२४-४२५॥


[मूलगा० ४७] इगि-वियलिंदिय-सयले पण पंचय अट्ठ बंधठाणाणि ।
पण छक्क दस य उदए पण पण तेरे दु संतम्मि ॥४२६॥

अर्थ: एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और सकलेन्द्रिय जीवोंके क्रमशः पाँच, पाँच और आठ बन्धस्थान; पाँच, छह् और दश उदयस्थान; तथा पाँच, पाँच और तेरह सत्त्वस्थान होते हैं ॥४२६॥


तेवीसं पणुवीसं छव्वीसं ऊणतीस तीसं च ।
बंधा हवंति एदे उदया आदी य पंचेव ॥४२७॥

तेसिं संतवियप्पा वाणउदी णउदिमेव जाणाहि ।
अड-चदु-वासीदी वि य एत्तो वियलिंदिए वोच्छं ॥४२८॥

अर्थ (गाथा 427 से 428): एकेन्द्रिय जीवोंके तेईस; पचीस, छब्बीस, उनतीस और तीस प्रकृतिक पाँच बन्धस्थान होते हैं। इक्कीस, चौबीस, पचीस, छब्बीस और २७ प्रकृतिक आदिके पाँच उदयस्थान होते हैं। तथा उनके बानबे, नब्बे, अठासी, चौरासी और बियासी प्रकृतिक पाँच सत्त्वस्थान जानना चाहिए। अब इससे आगे विकलेन्द्रियोंके बन्धादिस्थानोंको कहेंगे ॥४२७-४२८॥


'वियलिंदिएसु तीसु वि बंधा एइंदियाण सरिसा ते ।
संता तहेव उदया तीसिगितीसूण तीसाणि ॥४२६॥

इगि छव्वीसं च तहा अट्ठावीसाणि होंति वियलेसु ।
'पंचिंदिएसु बंधा सव्वे वि हवंति बोद्धव्वा ॥४३०॥

अर्थ (गाथा 429 से 430): तीनों ही विकलेन्द्रियों में एकेन्द्रियोंके समान वे ही पाँच बन्धस्थान होते हैं। तथा सत्त्वस्थान भी एकेन्द्रियोंके समान वे ही पाँच होते हैं। उदयस्थान इक्कीस, छब्बीस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक छह होते हैं। पंचेन्द्रियोंमें सभी बन्धस्थान होते हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥४२६-४३०॥


छउवीसं वज्जुदया सव्वे संता हवंति णायव्वा ।
कायादिमग्गणासु य णेया बंधुदयसंताणि ॥४३१॥

अर्थ: पंचेन्द्रिय जीवोंमें चौबीसको छोड़ कर शेष सर्व उदयस्थान तथा सर्व ही सत्त्वस्थान होते हैं, ऐसा जानना चाहिए। इसी प्रकार काय आदि मार्गणाओंमें भी बन्ध, उदय और सत्त्वस्थान लगा लेना चाहिए ॥४३१॥


पंचसु थावरकाए बंधा पढमिल्लया हवे पंच ।
अट्ठावीसं वज्जिय उदया आदिल्लया पंच ॥४३२॥

अर्थ: कायमार्गणाकी अपेक्षा पाँचों ही स्थावरकायिकोंमें प्रारम्भके पाँच बन्धस्थान होते हैं। तथा अट्ठाईसको छोड़कर आदिके पाँच उदयस्थान होते हैं ॥४३२॥


बाणउदि णउदिसंता अड चदु दुअधियमसीदि वियले ते ।
बंधा संता उदया अड णव छिगिवीस तीस इगित्तीसा ॥४३३॥

अर्थ: पाँचों स्थावरकायिकोंमें बानवै, नब्बे, अट्ठासी, चौरासी और बियासीप्रकृतिक पाँच सत्त्वस्थान होते हैं। विकलेन्द्रिय त्रसकायिकोंमें वे ही अर्थात् स्थावरकायिकोंवाले बन्धस्थान और सत्त्वस्थान होते हैं। किन्तु उदयस्थान इक्कीस, छब्बीस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक छह होते हैं ॥४३३॥


चउवीसं वज्जुदया बंधा संता तसेसु सव्वे वि ।
मण-वचि-चउरे बंधा सव्वे उणतीस आई य ति-उदया ॥४३४॥

अर्थ: सकलेन्द्रिय त्रसकायिकोंमें चौबीसप्रकृतिक स्थानको छोड़कर शेष सर्व बन्धस्थान और उदयस्थान; तथा सर्व ही सत्तास्थान होते हैं। योगमार्गणाकी अपेक्षा मनोयोगियों और वचनयोगियोंके बन्धस्थान तो सर्व ही होते हैं; किन्तु उदयस्थान उनतीसको आदि लेकर तीन ही होते हैं ॥४३४॥


वासीदिं दो उवरिं वज्जित्ता संतठाणाणि ।
बंधा सव्वोराले उदया पणुवीस आइ सत्तेव ॥४३५॥

अर्थ: मनोयोगियों और वचनयोगियोंके सत्तास्थान बियासी और दो उपरिमस्थानोंको छोड़कर शेष दश होते हैं। औदारिककाययोगियोंके बन्धस्थान सर्व होते हैं। किन्तु उदयस्थान पच्चीसको आदि लेकर सात ही होते हैं ॥४३५॥


दो उवरिं वज्जित्ता संता सव्वेवि मिस्सम्मि ।
तेवीसं तीसंता बंधा उदया छव्वीस चउवीसा ॥४३६॥

अर्थ: औदारिककाययोगियोंके उपरिम दो स्थानोंको छोड़कर शेष सर्व सत्तास्थान होते हैं। औदारिकमिश्रकाययोगियोंके तेईससे लेकर तीस तकके बन्धस्थान; तथा छब्बीस और सत्ताईस ये दो उदयस्थान होते हैं। इनके सत्तास्थान औदारिककाययोगियोंके समान जानना चाहिए ॥४३६॥


पणुवीसाई पंच य बंधा वेउव्विए भणिया ।
संता पदमा चउरो उदया सत्तट्ठवीस उणतीसा ॥४३७॥

अर्थ: वैक्रियिककाययोगियोंके पचीसको आदि लेकर पाँच बन्धस्थान; सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस ये तीन उदयस्थान; तथा आदिके चार सत्तास्थान कहे गये हैं ॥४३७॥


तीसुणतीसा बंधा तम्मिस्से पंचवीसमेवुदयं ।
संता पदमा चउरो बंधाहारेऽट्ठवीस उणतीसा ॥४३८॥

अर्थ: वैक्रियिकमिश्रकाययोगियोंमें तीस और उनतीस ये दो बन्धस्थान, पचीसप्रकृतिक एक उदयस्थान; तथा प्रारम्भके चार सत्तास्थान होते हैं। आहारककाययोगियोंके अट्ठाईस और उनतीस ये दो बन्धस्थान होते हैं ॥४३८॥


संतादिल्ला चउरो उदया सत्तट्ठवीस उणतीसा ।
तम्मिस्से ते बंधा उदयं पणुवीस संत पढम चदुं ॥४३६॥

अर्थ: आहारककाययोगियोंके उदयस्थान सत्ताईस और अट्ठाईस ये दो तथा सत्तास्थान आदिके चार होते हैं। आहारकमिश्रकाययोगियोंमें बन्धस्थान अट्ठाईस और उनतीस ये दो; उदयस्थान पच्चीस प्रकृतिक एक और सत्तास्थान प्रारम्भके चार होते हैं ॥४३६॥


कम्मइए तीसंता बंधा इगिवीसमेव उदयं तु ।
दो उवरिं वज्जित्ता संता हिट्ठिल्लया सव्वे ॥४४०॥

अर्थ: कार्मणकाययोगियोंमें आदिसे लेकर तीस तकके बन्धस्थान; इक्कीस प्रकृतिक एक उदयस्थान और अन्तिम दोको छोड़कर नीचेके सर्व सत्तास्थान होते हैं ॥४४०॥


ते चिय संता वेदे बंधा सव्वे हवंति उदया य ।
इगिवीस पंचवीसाई इगीतीसंतिया णेया ॥४४१॥

अर्थ: वेदमार्गणाकी अपेक्षा तीनों वेदोंवालोंके सत्तास्थान तो कार्मणकाययोगियोंके समान वे ही ग्यारह; और बन्धस्थान सर्व ही होते हैं। उदयस्थान इक्कीस और पचीसको आदि लेकर इकतीस तकके प्रकृतिक आठ हैं।


कोहादिचउसु बंधा सव्वे संता हवंति ते चेव ।
उवरिं दो वज्जित्ता उदया सव्वे मुणेयव्वा ॥४४२॥

अर्थ: कषायमार्गणाकी अपेक्षा क्रोधादि चारों कषायवालोंके सभी बन्धस्थान होते हैं। तथा सभी सत्तास्थान होते हैं। उदयस्थान उपरिम दोको छोड़कर शेष नौ जानना चाहिए ॥४४२॥


मइ-सुय-अण्णाणेसुं बंधा तेवीसाइ-तीसंतिया मुणेयव्वा ।
दुणउदि आइ छह संता ते उदया हवंति वेमंगे* ॥४४३॥

अर्थ: ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा मति और श्रुत-अज्ञानियोंमें बन्धस्थान तेईसको आदि लेकर तीस तकके छह जानना चाहिए। उदयस्थान कषायमार्गणाके समान वे ही नौ होते हैं। सत्तास्थान बानवेको आदि लेकर छह होते हैं। अब विभङ्गज्ञानियोंके स्थानोंका वर्णन करते हैं ॥४४३॥ मति-श्रुताज्ञानियोंके बन्धस्थान २३, २५, २६, २८, २९, ३० ये छह; उदयस्थान २१, २४, २५, २६, २७, २८, २९, ३०, ३१ ये नौ तथा सत्त्वस्थान ९२, ९१, ९०, ८८, ८४ और ८२ ये छह होते हैं।


ते चिय बंधा संता उदया अडवीस तीस इगितीसा ।
मइ-सुय-ओहीजुयले बंधा अडवीस आदि पंचेव ॥४४४॥

अर्थ: विभंगज्ञानियोंके मतिश्रुताज्ञानियोंके समान वे ही बन्धस्थान और सत्त्वस्थान जानना चाहिए। किन्तु उदयस्थान अठाईस, तीस और इकतीस ये तीन ही होते हैं। मति, श्रुत और अवधिज्ञानियोंके दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा अवधिदर्शनियोंके बन्धस्थान अट्ठाईस आदि पाँच होते हैं ॥४४४॥ विभंगज्ञानियोंके बन्धस्थान २३, २५, २६, २८, २९, ३० ये छह; उदयस्थान २८, ३०, ३१ ये तीन; तथा सत्तास्थान ९२, ९१, ९०, ८८, ८४ और ८२ ये छह होते हैं। मति, श्रुत और अवधि-युगलवालोंके बन्धस्थान २८, २९, ३०, ३१ और १ ये पाँच होते हैं।


चउवीसं दो उवरिं वजित्ता उदय अट्ठेव ।
चउ आइल्ला संता ऊवरिं दो वज्जिऊण चउ हेट्ठा ॥४४५॥

अर्थ: उन्हीं उपर्युक्त जीवोंके चौबीस तथा दो अन्तिम स्थानोंको छोड़कर शेष आठ उदयस्थान होते हैं। तथा सत्तास्थान आदिके चार और अन्तिम दोको छोड़कर अधस्तन चार, ये आठ होते हैं ॥४४५॥ मति, श्रुत और अवधि-युगलवालोंके उदयस्थान २१, २४, २६, २७, २८, २९, ३०, ३१ ये आठ तथा सत्तास्थान ९३, ९२, ९१, ९०, ८०, ७६, ७५ और ७७ ये आठ होते हैं।


बंधा संता तेचिय मणपज्जे तीसमेव उदयं तु ।
केवलजुयले उदया चदु उवरि छव्व संत उवरिल्ला ॥४४६॥

अर्थ: मनःपर्ययज्ञानियोंके बन्धस्थान और सत्तास्थान तो मति-श्रुतादि ज्ञानियोंके समान वे ही पूर्वोक्त जानना चाहिए । किन्तु उदयस्थान केवल तीस प्रकृतिक ही होता है । केवलज्ञानियों और केवलदर्शनियोंके ( बन्धस्थान कोई नहीं होता । ) उदयस्थान उपरिम चार तथा सत्तास्थान उपरिम छह होते हैं ॥४४६॥


सामाइय-छेदेसुं बंधा अडवीसमाइ पंचेव ।
पणुवीस सत्तवीसा उदया अडवीस तीस उणतीसा ॥४४७॥

अर्थ: संयममार्गणाकी अपेक्षा सामायिक और छेदोपस्थापना संयतोंके बन्धस्थान अट्ठाईस आदि पाँच होते हैं । उदयस्थान पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस और तीस; ये पाँच होते हैं ॥४४७॥


पढमा चउरो संता उवरिम दो वज्जिदूण चउ हेट्ठा ।
संता चउरो पढमा परिहारे तीसमेव उदयं तु ॥४४८॥

अर्थ: उन्हीं दोनों संयतोंके सत्त्वस्थान प्रारम्भके चार, उपरिम दोको छोड़कर अधस्तन चार, ये आठ होते हैं । परिहारविशुद्धिसंयतोंके तीस प्रकृतिक एक उदयस्थान और प्रारम्भके चार सत्तास्थान होते हैं ॥४४८॥


अडवीसा उगतीसा तीसिगितीसा य बंध चत्तारि ।
जसकित्ती वि य बंधा सुहुमे उदयं तु तीस हवे ॥४४६॥

अर्थ: उन्हीं परिहारविशुद्धि संयतोंके बन्धस्थान अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक ये चार होते हैं। सूक्ष्मसाम्पराय संयतोंके यशस्कीर्ति प्रकृतिक एक ही बन्धस्थान और एक ही उदयस्थान होता है ॥४४९॥


संताइल्ला चउरो उबरिम दो वज्जिदूण चउ हेड्ठा ।
जहक्खायम्मि वि चउरो तीसिगितीसा णव अट्ठ उदयाय ॥४५०॥

अर्थ: उन्हीं सूक्ष्मसाम्पराय संयतोंके सत्तास्थान आदिके चार तथा उपरिम दोको छोड़कर अधस्तन चार; ये आठ होते हैं। यथाख्यात संयतोंके तीस, इकतीस, नौ और आठ प्रकृतिक चार उदयस्थान होते हैं ॥४५०॥


चउहेट्ठा छाउवरिं संतट्ठाणानि दस य णेयाणि ।
तससंजमम्मि णेया संतट्ठाणानि चउ हेड्ठा ॥४५१॥

अर्थ: उन्हीं यथाख्यात संयतोंके चार अधस्तन और छह उपरितन; ये दश सत्तास्थान जानना चाहिए। त्रस-संयमवालोंके अर्थात् देशसंयतोंके चार अधस्तन सत्तास्थान जानना चाहिए ॥४५१॥


अडवीसा उणतीसा बंधा उदया य तीस इंगितीसा ।
अडसीदिं वज्जित्ता पढमा सत्ता असंजमे संता ॥४५२॥

अर्थ: उन्हीं देशसंयतोंके अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक दो बन्धस्थान; तथा तीस और इकतीस प्रकृतिक दो उदयस्थान होते हैं। असंयतोंके अठासीको छोड़कर प्रथमके सात सत्तास्थान होते हैं ॥४५२॥


तीसंता छव्वंधा उवरिम दो वज्जिदूण णव उदया ।
चक्खुम्मि सव्वबंधा उदया उणतीस तीस इंगितीसा ॥४५३॥

अर्थ: उन्हीं असंयतोंके आदिसे लेकर तीस तकके छह बन्धस्थान और उपरिम दोको छोड़कर नौ उदयस्थान होते हैं। दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा चक्षुदर्शनियोंके बन्धस्थान तो सभी होते हैं; किन्तु उदयस्थान उनतीस तीस और इकतीस प्रकृतिक तीन ही होते हैं ॥४५३॥


उवरिम दो वज्जित्ता संता इयरम्मि होंति णायव्वा ।
बंधा संता तेत्तिय उवरिम दो वज्जिदूण णव उदया ॥४५४॥

अर्थ: चक्षुदर्शनियोंके उपरिम दो सत्तास्थान छोड़कर शेष ग्यारह सत्तास्थान होते हैं। इतर अर्थात् अचक्षुदर्शनियोंमें वे ही अर्थात् चक्षुदर्शनवालोंके बतलाये गये बन्धस्थान और सत्तास्थान होते हैं। तथा उपरिम दो को छोड़कर शेष नौ उदयस्थान होते हैं ॥४५४॥


किण्हादिए बंधा तेवीसाई हवंति तीसंता ।
सत्ता सत्ताइल्ला उवरिम-दोवज्जिया णव उदया ॥४५५॥

अर्थ: लेश्यामार्गणाकी अपेक्षा कृष्ण आदि तीन लेश्याओंमें तेईसको आदि लेकर तीस तकके छह बन्धस्थान, उपरिम दो को छोड़कर शेष नौ उदयस्थान; तथा आदिके सात सत्तास्थान होते हैं ॥४५५॥


तेउ पम्मा बंधा अडवीसउणतीस तीस इगितीसा ।
इगि पणुवीसा उदया सत्तावीसाइ जाव इगितीसं ॥४५६॥

अर्थ: तेज और पद्मलेश्यामें अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीस प्रकृतिक ये चार बन्धस्थान; तथा इक्कीस, पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस, और इकतीस प्रकृतिक ये सात उदयस्थान होते हैं ॥४५६॥


संता चउरो पढमा सुक्काए होंति तेच्चिय विवाया ।
संता चउरो पढमा उवरिम दो वज्जिदूण चउ हेड्ठा ॥४५७॥

अर्थ: तेज और पद्मलेश्यामें प्रथमके चार सत्तास्थान होते हैं। शुक्ललेश्यामें विपाक अर्थात् उदयस्थान तो वे ही होते हैं, जो कि तेज-पद्मलेश्यामें बतलाये गये हैं। किन्तु सत्तास्थान आदिके चार तथा उपरिम दो को छोड़कर अधस्तन चार, इस प्रकार आठ होते हैं ॥४५७॥


अडवीसाई बंधा णिल्लेसे उदय उबरिमं जुयलं ।
उवरिं छव्विय संता भव्वे बंधा हवंति सव्वे वि ॥४५८॥

अर्थ: शुक्ललेश्यामें अट्ठाईसको आदि लेकर पाँच बन्धस्थान होते हैं। लेश्यासे रहित अयोगिकेवलिके उपरिम दो उदयस्थान; तथा उपरिम छह सत्तास्थान होते हैं। भव्यमार्गणाकी अपेक्षा भव्यजीवोंके सभी बन्धस्थान होते हैं ॥४५८॥


दो उबरिं वज्जित्ता संतुदया होंति सव्वे वि ।
अभव्वे तीसंता बंधा उदया य उबरि दो वज्जं ॥४५६॥

अर्थ: भव्योंके उपरिम दो को छोड़कर शेष नौ उदयस्थान; तथा उपरिम दो को छोड़कर शेष ग्यारह सत्तास्थान होते हैं। अभव्योंके तीस तकके छह बन्धस्थान; तथा उपरिम दो को छोड़कर शेष नौ उदयस्थान होते हैं ॥४५६॥


संता णउदाइ चदुं णो भव्वा चदु छाय उवरि उदय संता ।
उवसमसम्मत्ते बंधा अडवीसाई हवंति पंचेव ॥४६०॥

अर्थ: अभव्योंके नब्बे आदि चार सत्तास्थान होते है । नोभव्य-नोअभव्य जीवोंके उपरिम चार उदयस्थान और उपरिम छह सत्तास्थान होते हैं । सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा उपशमसम्यक्त्वमें अट्ठाईसको आदि लेकर पाँच बन्धस्थान होते हैं ॥४६०॥


उदया इगि पणुवीसा उणतीसा तीस होंति इगितीसा ।
संता चउरो पढमा वेदियसम्मम्मि संत ते चेव ॥४६१॥

अर्थ: उपशमसम्यक्त्वमें इक्कीस, पच्चीस, उनतीस, तीस, इकतीस ये पाँच उदयस्थान और आदिके चार सत्तास्थान होते हैं । वेदकसम्यक्त्वमें भी ये ही आदिके चार सत्तास्थान होते हैं ॥४६१॥


अडवीसा उणतीसा तीसिगितीसा हवंति बंधा य ।
चउवीसं दो उवरि’ वजित्ता उदयठाणाणि ॥४६२॥

अर्थ: उसी वेदकसम्यक्त्वमें अट्ठाईस, उनतीस, तीस और इकतीसप्रकृतिक चार बन्धस्थान; तथा चौबीस और उपरि दो स्थानोंको छोड़कर शेष आठ उदयस्थान होते हैं ॥४६२॥


चउरो हेट्ठा छाउवरि॑ खाइए संता हवंति णायव्वा ।
चउवीसं वज्जुदया अडवीसाई हवंति बंधा य ॥४६३॥

अर्थ: क्षायिकसम्यक्त्वमें चार अधस्तन और छह उपरिम ये दश सत्तास्थान होते हैं, ऐसा जानना चाहिए । उदयस्थान चौबीसको छोड़करके शेष सर्व, तथा बन्धस्थान अट्ठाईसको आदि लेकरके शेष सर्व होते हैं ॥४६३॥


अडवीसाई तिण्णि य बंधा सादम्मि संत णउदीया ।
इगिवीसाई सत्त य उदया अड सत्तवीस वज्जित्ता ॥४६४॥

अर्थ: सासादनसम्यक्त्वमें अट्ठाईसको आदि लेकर तीन बन्धस्थान; नब्बेप्रकृतिक एक सत्तास्थान; तथा सत्ताईस और अट्ठाईसको छोड़कर इक्कीस आदि सात उदयस्थान होते हैं ॥४६४॥


अट्ठावीसउणतीसा बंधा मिस्सम्मि णउदि वाणउदी ।
संता तीसिगितीसा उणतीसा होंति उदया य ॥४६५॥

अर्थ: मिश्र अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्वमें अट्ठाईस, उनतीसप्रकृतिक दो बन्धस्थान; बानबै और नब्बैप्रकृतिक दो सत्तास्थान; तथा उनतीस, तीस और इकतीसप्रकृतिक तीन उदयस्थान होते हैं ॥४६५॥


तीसंता छव्वंधा उवरिम दो वज्जिदूण णव उदया ।
मिच्छे पढमा संता तेणउदिं वज्जिऊण छहच्चेव ॥४६६॥

अर्थ: मिथ्यात्वमें तीसप्रकृतिक स्थान तकके छह बन्धस्थान; उपरिम दो को छोड़कर शेष नौ उदयस्थान; तथा तेरानबेको छोड़कर प्रारम्भके छह सत्तास्थान होते हैं ॥४६६॥


सण्णिम्मि सव्वबंधा उवरिम दो वज्जिऊण संता दु ।
चउवीसं दो उवरिं वज्जित्ता होंति उदया य ॥४६७॥

अर्थ: संज्ञिमार्गणाकी अपेक्षा संज्ञी जीवोंमें सर्व बन्धस्थान होते हैं । उपरिम दोको छोड़कर शेष ग्यारह सत्तास्थान; तथा चौबीस और उपरिम दोको छोड़कर शेष आठ उदयस्थान होते हैं ॥४६७॥


इगिवीसं छव्वीसं अट्ठवीसुणतीस तीस इगितीसा ।
उदया असण्णिजीवे बंधा तीसंतिया छह ॥४६८॥

अर्थ: असंज्ञी जीवोंमें इक्कीस, छब्बीस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस, इकतीस प्रकृतिक छह उदयस्थान और तीस तकके प्रारम्भिक छह बन्धस्थान होते हैं ॥४६८॥


पंचाइल्ला संता तम्मि य चत्ता ति-इक्कणउदीओ ।
उदया चउ उबरिल्ला उवरि संता य णोभए भणिया ॥४६६॥

अर्थ: उन्हीं असंज्ञियोंमें तेरानवै और इक्यानवैको छोड़कर आदिके पाँच सत्तास्थान होते हैं। नोभय अर्थात् नैव संज्ञी नैव असंज्ञी ऐसे केवलियोंके ऊपरके चार उदयस्थान और ऊपरके ही छह सत्तास्थान कहे गये हैं ॥४६६॥


सव्वे बंधाहारे सव्वे संता य दो उवरि मुत्ता ।
इगिवीसं दो उवरिं मुत्तुं उदया हवंति सव्वे वि ॥४७०॥

अर्थ: आहारकमार्गणाकी अपेक्षा आहारक जीवोंके सभी बन्धस्थान, तथा उपरिम दोको छोड़कर शेष सभी सत्तास्थान होते हैं। इसी प्रकार इक्कीस और उपरिम दोको छोड़कर शेष सर्व ही उदयस्थान होते हैं ॥४७०॥ आहारकोंमें २३, २५, २६, २८, २९, ३०, ३१, १ ये आठ बन्धस्थान, २४, २५, २६, २७, २८, २९, ३०, ३१ ये आठ उदयस्थान; और ६३, ६२, ६१, ६०, ८८, ८४, ८२, ८०, ७६, ७८, ७७ ये ग्यारह सत्तास्थान होते हैं ।


छब्बंधा तीसंता इयरे संता य होंति सव्वे वि ।
इगिवीसं चउ उवरिं पंचेवुदया जिणेहिं णिट्ठिट्ठा ॥४७१॥

अर्थ: इतर अर्थात् अनाहारक जीवोंके तीस तक के छह बन्धस्थान और सर्व ही सत्तास्थान होते हैं । तथा उन्हींसे इक्कीस और चार उपरिम ये पाँच ही उदयस्थान जिनेन्द्रोंने कहे हैं ॥४७१॥ अनाहारकोंके २३, २५, २६, २८, २९, ३० ये छह बन्धस्थान; २१, ३०, ३१, ६, ८ ये पाँच उदयस्थान और ६३, ६२, ६१, ६०, ८८, ८४, ८२, ८०, ७६, ७८, ७७, १०, ६ ये तेरह सत्तास्थान होते हैं ।


[मूलगा० ४८] इय कम्मपयडिठाणाणि सुट्ठु बंधुदय-संतकम्माणं ।
गदिआदिएसु अट्ठहिं चउप्पयारेण णेयाणि ॥४७२॥

अर्थ: इस प्रकार कर्म-प्रकृतियोंके बन्ध, उदय और सत्तासम्बन्धी स्थानोंको अति सावधानीके साथ गति आदि मार्गणाओंकी अपेक्षा आठ अनुयोग-द्वारोंमें चार प्रकारसे लगाकर जानना चाहिए ॥४७२॥


[मूलगा०४६]‘उदयस्सुदीरणस्स य सामित्तादो ण विज्जदि विसेसो ।
मोत्तूण य इगिदालं सेसाणं सव्वपयडीणं’ ॥४७३॥

अर्थ: वक्ष्यमाण इकतालीस प्रकृतियोंको छोड़कर शेष सर्व प्रकृतियोंके उदय और उदीरणामें स्वामित्वकी अपेक्षा कोई विशेषता नहीं है ॥४७३॥


णाणंतरायदसयं दंसण णव वेयणीय मिच्छत्तं ।
सम्मतं लोभवेदाउगाणि णव णाम उच्चं च ॥४७४॥

अर्थ: ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच, दर्शनावरणकी नौ, वेदनीयकी दो, मिथ्यात्व, सम्यक्त्व मोहनीय, संज्वलन, लोभ, तीन वेद, चार आयु, नामकर्मकी नौ और उच्चगोत्र; इन इकतालीस प्रकृतियोंके उदय और उदीरणामें स्वामित्वकी अपेक्षा विशेषता बतलाई गई है ॥४७४॥


मणुयगई पंचिंदिय तस बायरणाम सुहयमादिज्जं ।
पज्जत्तं जसकित्ती तित्थयरं णाम णव होंति ॥४७५॥

अर्थ: मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रियजाति, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यशःकीर्त्ति और तीर्थंकर ये नौ नामकर्मकी प्रकृतियाँ हैं ॥४७५॥


तित्थयराहारविरहिआउ अज्जेदि सव्वपयडीओ ।
मिच्छत्तवेदओ सासणो य उगुवीस सेसाओ ॥४७६॥

छायालासेसमिस्सो अविरयसम्मो तिदालपरिसेसा ।
तेवण्ण देसविरदो विरदो सत्तवण्ण सेसाओ ॥४७७॥

अर्थ (गाथा 476 से 477): मिथ्यात्वका वेदन करनेवाला अर्थात् मिथ्यादृष्टि जीव तीर्थङ्करप्रकृति और आहारकद्विक; इन तीन प्रकृतियोंके बिना शेष सर्व प्रकृतियोंका उपार्जन अर्थात् बन्ध करता है । सासादनसम्यग्दृष्टि उन्नीसके बिना शेष सर्व प्रकृतियोंका बन्ध करता है। मिश्रगुणस्थानवर्ती छियालीसके बिना, अविरतसम्यग्दृष्टि तेतालीसके बिना, देशविरत तिरेपनके बिना और प्रमत्तविरत सत्तावनके बिना शेष सर्व प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥४७६-४७७॥


सत्तरसदियसदं खलु मिच्छादिट्ठी दु बंधओ भणिओ ।
एगुत्तरसयपयडी सासणसम्मो दु बंधंति ॥४७८॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि जीव नियमसे सत्तरह अधिक सौ अर्थात् एक सौ सत्तरह प्रकृतियोंका बन्धक कहा गया है। सासादनसम्यग्दृष्टि जीव एक अधिक सौ अर्थात् एक सौ एक प्रकृतियोंका बन्ध करते हैं ॥४७८॥


चउहत्तरि सत्तत्तरि मिस्सो य असंजदो तहा चेव ।
सत्तट्ठि देसविरदो तेसट्ठिं बंधगो पमत्तो दु ॥४७९॥

अर्थ: मिश्र गुणस्थानवर्ती चौहत्तर प्रकृतियोंका बन्धक है। असंयतसम्यग्दृष्टि सतहत्तरका बन्धक है। देशविरत सड़सठका तथा प्रमत्तविरत तिरेपन प्रकृतियोंका बन्धक होता है ॥४७६॥


उगुसट्ठिमप्पमत्तो बंधइ देवाउगं च इयरो वि ।
अट्ठावण्णमपुव्वो छप्पण्णं चावि छव्वीसं ॥४८०॥

अर्थ: अप्रमत्तसंयत उनसठ प्रकृतियोंको बाँधता है, तथा देवायुको भी बाँधता है। अपूर्वकरणसंयत अट्ठावन, छप्पन और छब्बीस प्रकृतियोंको भी बाँधता है ॥४८०॥


[मूलगा०५४]¹बावीसा एगूणं बंधइ अट्ठारसं च अणियट्टी ।
सतरस सुहुमसराओ सायम्मोहो सजोई दु ॥४८१॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणसंयत बाईसका और उसमेंसे एक-एक कम करते हुए इक्कीस, बीस, उन्नीस और अट्ठारह प्रकृतियोंका बन्ध करता है। सूक्ष्मसाम्परायसंयत सत्तरह प्रकृतियोंका बन्ध करता है। तथा मोहरहित ग्यारहवें-बारहवें गुणस्थानवर्ती जीव और सयोगिकेवली जिन एक सातावेदनीयका बन्ध करते हैं ॥४८१॥


[मूलगा० ५५] एसो दु बंधसामित्तोघो गदिआदिएसु बोहव्वो ।
ओघाओ साहेज्जो अत्थ जहा पयदिसंभवो होइ ॥४८२॥

अर्थ: यह ओघ-प्ररूपित अर्थात् गुणस्थानोंकी अपेक्षासे कहा गया बन्धस्वामित्व गति आदि मार्गणाओंमें भी जहाँ जितनी प्रकृतियाँ संभव हों वहाँपर ओघके समान सिद्ध कर लेना चाहिए ॥४८२॥


[मूलगा०५६]‘तित्थयर देव-णिरयाउगं च तीसु वि गदीसु बोहव्वं ।
अवसेसा पयडीओ हवंति सव्वासु वि गदीसु’ ॥४८३-९१०॥

अर्थ: तीर्थंकर नामकर्म, देवायु और नरकायु; इन तीन प्रकृतियोंका सत्त्व तीन तीन ही गतियोंमें जानना चाहिए । इसके सिवाय शेष सर्व प्रकृतियाँ सर्व गतियोंमें पाई जाती हैं ॥४८३॥


२देवेसु य णिरयाऊ देवाऊ णत्थि चेव णिरएसु ।
तित्थयरं तिरएसु य सेसाओ होंति चउसु वि गदीसु ॥४८४॥

अर्थ: देवोंमें नरकायु और नारकियोंमें देवायु नहीं पाई जाती है। इसी प्रकार तिर्यंचोंमें तीर्थंकर प्रकृति नहीं पाई जाती है। शेष सर्व प्रकृतियाँ चारों ही गतियोंमें पाई जाती हैं ॥४८४॥


[मूलगा०५७] ३पढमकसायचउक्कं दंसणतियं सत्तया दु उवसंता ।
अविरयसम्मत्तादी जाव णियट्टि त्ति णायव्वा४ ॥४८५-९१३॥

अर्थ: प्रथम कषाय-चतुष्क और दर्शनत्रिक; ये सातों ही प्रकृतियाँ अविरतसम्यक्त्व गुणस्थानसे लेकर निवृत्ति अर्थात् अपूर्वकरण गुणस्थान तक उपशान्त हो जाती हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥४८५॥


[मूलगा०५८] २सत्तट्ठ णव य पण्णरस सोलस अट्ठारस वीस बावीसा ।
चउवीसं पणवीसं छव्वीसं बायरे जाणे ३ ॥४८६॥

अर्थ: बादर अर्थात् अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें क्रमशः सात, आठ, नौ, पन्द्रह, सोलह, अट्ठारह, बीस, बाईस, चौबीस, पच्चीस और छब्बीस प्रकृतियोंका उपशमन जानना चाहिए ॥४८६॥


अण मिच्छ मिस्स सम्मं संढित्थी हस्सछक्क पुंवेदो ।
वि ति कोहाई दो दो कमसो संता य संजलणा ॥४८७॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरण बादरसम्परायगुणस्थानके संख्यात भागों तक तो अनन्तानुबन्धिचतुष्क, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति; इन सातका उपशम रहता है। तदनन्तर नपुंसकवेदका उपशम करता है, तदनन्तर स्त्रीवेदका उपशम करता है। तदनन्तर हास्यषट्क (हास्य, रति, अरति, शोक, भय, और जुगुप्सा) का उपशम करता है। तदनन्तर पुरुषवेदका उपशम करता है। तदनन्तर अप्रत्याख्यानावरण क्रोध और प्रत्याख्यानावरण क्रोध, इन प्रकृतियोंका उपशम करता है। तदनन्तर दोनों मध्यम मानकषायोंका उपशम करता है। तदनन्तर दोनों मध्यम मायाकषायोंका उपशम करता है। तदनन्तर दोनों मध्यम लोभकषायोंका उपशम करता है। तदनन्तर संज्वलन क्रोधका उपशम करता है। तदनन्तर संज्वलन मानका उपशम करता है। तदनन्तर संज्वलन मायाका उपशम करता है। तदनन्तर संज्वलन बादरलोभका उपशम करता हुआ दशवें गुणस्थानमें प्रवेश करता है। पुनः दशवें गुणस्थानके अन्तमें सूक्ष्म लोभका भी उपशम करके ग्यारहवें गुणस्थानमें प्रवेश करता है। इस प्रकार सातसे लेकर छब्बीस प्रकृतियोंका उपशम अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें होता है ॥४८७॥


सत्तावीस सुहुमे अट्ठावीसं च मोहपयडीओ ।
उवसंतवीयराए उवसंता होंति णायव्वा ॥४८८॥

अर्थ: दशवें सूक्ष्मसाम्परायमें मोहकी सत्ताईस प्रकृतियोंका उपशम रहता है, तथा उपशान्त कषाय वीतरागछद्मस्थ नामक ग्यारहवें गुणस्थानमें मोहकर्मकी अट्ठाईस ही प्रकृतियाँ उपशान्त रहती हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥४८८॥


[मूलगा०६०] ‘पढमकसायचउक्कं एत्तो मिच्छत्त मिस्स सम्मत्तं ।
अविरदसम्मे देसे विरदपमत्ते य खीयंति’ ॥४८९॥

[मूलगा०६१] २अणियट्टिबायरे थीणगिद्धितिग णिरय-तिरियनामाओ ।
संखेज्जदिमे सेसे तप्पओगा य खीयंति’ ॥४९०॥

अर्थ (गाथा 489 से 490): प्रथम अनन्तानुबन्धिकषायचतुष्क, पुनः मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति, ये सात प्रकृतियाँ अविरतसम्यक्त्व, देशविरत, प्रमत्तविरत, अप्रमत्तविरत इन चार गुणस्थानोंमें क्षयको प्राप्त होती हैं। अनिवृत्तिकरण कालके संख्यात बहुभागोंके व्यतीत हो जानेपर और संख्यातवें भागके शेष रह जानेपर स्त्यानगृद्धित्रिक, तथा नरकगति और तिर्यंचगति प्रायोग्य अर्थात् तत्सम्बन्धी तेरह, इस प्रकार सोलह प्रकृतियाँ क्षयको प्राप्त होती हैं ॥४८९-४९०॥


थींणतियं णिरयदुयं तिरियदुयं पढमजाइचउक्कं ।
साहारणं च सुहुमं आयावुज्जोव थावरयं ॥४९१॥

अर्थ: स्त्यानत्रिक अर्थात् स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा और प्रचला-प्रचला; नरकद्विक ( नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी ) तिर्यंचद्विक ( तिर्यंगति-तिर्यंगत्यानुपूर्वी ) एकेन्द्रिय आदि चार जातियाँ, साधारण, सूक्ष्म, आतप, उद्योत और स्थावर इन सोलह प्रकृतियोंका नवें गुणस्थानमें क्षय होता है ॥४९१॥


[मूलगा० ६२] एत्तो हणदि कसायट्ठयं च पच्छा णउंसयं इत्थी ।
तो णोकसायछक्कं पुरिसवेदम्मि संछुहइ ॥४९२॥

[मूलगा० ६३] पुरिसं कोहे कोहं माणे माणं च छुहइ मायाए ।
मायं च छुहइ लोहे लोहं सुहुमम्हि तो हणइ ॥४९३॥

[मूलगा० ६४] खीणकसायदुचरिमे णिद्दा पयला य हणइ छदुमत्थो ।
णाणंतरायदसयं दंसणचत्तारि चरिमम्हि ॥४९४॥

अर्थ (गाथा 492 से 494): तदनन्तर वह अनिवृत्तिकरणसंयत आठ मध्यम कषायोंका क्षय करता है । तत्पश्चात् नपुंसकवेदका क्षय करता है । तदनन्तर स्त्रीवेदका क्षय करता है । तदनन्तर नोकषायषट्कको पुरुषवेदमें संक्रान्त करता है । तदनन्तर पुरुषवेदको संज्वलनक्रोधमें संक्रान्त करता है । तदनन्तर संज्वलनक्रोधको संज्वलनमानमें संक्रान्त करता है । तदनन्तर संज्वलनमानको संज्वलनमायामें संक्रान्त करता है । तदनन्तर संज्वलनमायाको संज्वलनलोभमें संक्रान्त करता है और सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें संज्वलनलोभका क्षय करता है । पुनः बारहवें गुणस्थानमें पहुँचकर वह क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ बन जाता है और अपने गुणस्थानके द्विचरम समयमें निद्रा और प्रचलाका क्षय करता है । पुनः चरम समयमें ज्ञानावरणकी पाँच, अन्तरायकी पाँच और दर्शनावरणकी चार इन चौदह प्रकृतियोंका क्षय करता है ॥४९२-४९४॥


[मूलगा० ६५] देवगइसहगयाओ दुचरिमभवसिद्धियम्हि खीयंति ।
सविवागेदरमणुयगहणाम णीचं पि एत्थेव ॥४९५॥

अर्थ: अयोगिकेवली चौदहवें गुणस्थानके द्विचरम भवसिद्धकालमें देवगति सहगत अर्थात् देवगतिके साथ नियमसे बँधनेवाली दश प्रकृतियोंका, मनुष्यगति-सम्बन्धी जीवविपाकी और पुद्गलविपाकी प्रकृतियोंका, अयोगि अवस्थामें जिनका उदय नहीं आता है, ऐसी नामकर्मकी अविपाकी प्रकृतियोंका तथा नीचगोत्रका क्षय करते हैं ॥४९५॥


'सरजुयल मपज्जत्तदुब्भगणादेज्ज दो विहायगई ।
एयदरवेदणीयं उस्सासो अजस जीवपागाओ ॥४६६॥

अर्थ: स्वर-युगल ( सुस्वर-दुःस्वर ), अपर्याप्त, दुर्भग, अनादेय, विहायोगतिद्विक, कोई एक वेदनीयकर्म, उच्छ्वास और अयशस्कीर्ति; ये दश जीवविपाकी प्रकृतियाँ चौदहवें गुणस्थानके उपान्त्य समयमें क्षयको प्राप्त होती हैं ॥४६६॥


पण्णरसं छ तिय छ पंच दोण्णि पंचय हवंति अट्ठेव ।
देहादिय फासंता पुग्गलपागाउ सुहजुयलं ॥४६७॥

पत्तेयागुरुणिमिणं परघादुवघादथिरजुयलं ।
देवगईए तासिं देव-दुगं णीचगोयं च ॥४६८॥

बावत्तरि पयडीओ दुचरिमसमयम्मि खीणायो ।
अंते तस्स दु बादर तस सुभगादेज्जपज्जत्तं ॥४६९॥

अण्णयरवेयणीयं मणुयाउं मणुयजुयल तित्थयरं ।
पंचिंदियजसमुच्चं सोऽजोगो वंदणिज्जो सो ॥५००॥

अर्थ (गाथा 497 से 500): पाँच शरीर, पाँच बन्धन और पाँच संघात; ये पन्द्रह प्रकृतियाँ; छह संहनन, तीन अंगोपांग, छह संस्थान, पाँच वर्ण, दो गन्ध, पाँच रस और आठ स्पर्श; ये शरीरनाम कर्मसे लेकर स्पर्श नाम कर्म तककी पचास प्रकृतियाँ; तथा शुभ-युगल, प्रत्येकशरीर, अगुरुलघु, निर्माण, परघात, उपघात और स्थिर-युगल; ये नौ, दोनों मिलाकर उनसठ पुद्गलविपाकी प्रकृतियाँ हैं। देवगतिके साथ नियमसे बँधनेवाली दश प्रकृतियाँ, देवगतित्रिक और नीच गोत्र इस प्रकार (१० + ५६ + २ + १ = ७२) ये बहत्तर प्रकृतियाँ अयोगिकेवलीके द्विचरम समयमें क्षय होती हैं। उन्हींके अन्तिम समयमें बादर, त्रस, सुभग, आदेय, पर्याप्त, कोई एक वेदनीयकर्म, मनुष्यायु, मनुष्यगति-युगल, तीर्थंकर, पंचेन्द्रिय जाति, यशःकीर्ति और उच्चगोत्र, ये तेरह प्रकृतियाँ क्षयको प्राप्त होती हैं। इस प्रकार सर्व कर्म-प्रकृतियोंका क्षय करनेवाले वे अयोगिजिन हम आप सबके वन्दनीय हैं ॥४६७-५००॥


[मूलगा० ६६] अण्णयरवेयणीयं मणुयाउ उच्चगोय णामणवं ।
वेदेदि अजोगिजिणो उकस्स जहण्णमेयारं ॥५०१॥

अर्थ: कोई एक वेदनीय, मनुष्यायु, उच्चगोत्र और नामकर्मकी नौ प्रकृतियाँ, इस प्रकार इन बारह प्रकृतियोंका अयोगिजिन उत्कृष्ट रूपसे वेदन करते हैं। तथा जघन्य रूपसे तीर्थङ्कर प्रकृतिके बिना ग्यारह प्रकृतियोंका वेदन करते हैं। क्योंकि सभी अयोगिजिनोंके तीर्थङ्करप्रकृतिका उदय नहीं पाया जाता है ॥५०१॥


मणुयगई पंचिंदिय तस बायरणाम सुभगमादिज्जं ।
पज्जत्तं जसकित्ती तित्थयरं णाम णव होंति ॥५०२॥

अर्थ: मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, बादर, सुभग, आदेय, पर्याप्त, यशःकीर्ति और तीर्थंकर-प्रकृति नामकर्मकी इन नौ प्रकृतियोंका उदय अयोगिजिनके होता है ॥५०२॥


मणुयाणुपुव्विसहिया तेरस भवसिद्धियस्स चरमंते ।
संतस्स दु उक्कस्सं जहण्णयं बारसा होंति ॥५०३॥

अर्थ: भव्यसिद्ध अयोगिजिनके चरम समयमें उत्कृष्ट रूपसे मनुष्यानुपूर्वी-सहित तेरह प्रकृतियों का और जघन्य रूपसे तीर्थङ्करप्रकृतिके बिना बारह प्रकृतियोंका सत्त्व पाया जाता है ॥५०३॥


मणुयगइसहगयाओ भव-खेत्तविवाइ जीववागा य ।
वेदणियण्णदरुच्चं चरिमे भवसिद्धियस्स खीयंति ॥५०४॥

अर्थ: मनुष्यगतिके साथ नियमसे उदय होनेवाली भवविपाकी, क्षेत्रविपाकी और जीवविपाकी प्रकृतियाँ, कोई एक वेदनीय और उच्चगोत्र, इन सबका क्षय भव्यसिद्धिक अयोगिजिनके अन्तिम समयमें होता है ॥५०४॥

पञ्चम अधिकार: सप्ततिका (भाग 4/4)

[मूलगा०७०] अह सुद्धियसयलजयसिहर अरयणिरुवम सहावसिद्धिसुखं ।
अणिहणमव्वाबाहं तिरयणसारं अणुहवंति ॥५०५॥

अर्थ: कर्मोंका क्षय करनेके अनन्तर वे जीव सकल जगत्के शिखर पर सुस्थित होकर रज (मल) से रहित, निरुपम अनन्त, अव्याबाध और स्वाभाविक आत्मसिद्धिसे प्राप्त और त्रिभुवनमें साररूप आत्मिक-सुखका अनुभव करते हैं ॥५०५॥


[मूलगा०७१] दुराधिगम-णिउण-परमट्ठ-रुद्दर-बहुमंगदिट्ठिवादाओ ।
अत्था अणुसरियव्वा बंधोदयसंतकम्माणं ॥५०६॥

अर्थ: दुरधिगम, सूक्ष्मबुद्धिके द्वारा गम्य, परम तत्त्वका प्रतिपादक, रुचिर (आह्लाद-कारक) और अनेक भेद-युक्त दृष्टिवादसे कर्मोंके बन्ध, उदय और सत्त्वका विशेष अर्थ जानना चाहिए ॥५०६॥


जो एत्थ अपडिपुण्णो अत्थो अप्पागमेण रइओ त्ति ।
पं खमिऊण बहुसुया पूरेऊणं परिकहिंतु ॥५०७॥

अर्थ: मुझ अल्प आगम-ज्ञानीने इस प्रकरणमें जो अपरिपूर्ण अर्थ रचा हो, उसे बहुश्रुत ज्ञानी आचार्य मुझे क्षमा करके और छूटे हुए अर्थकी पूर्ति करके जिज्ञासु जनोंको प्रस्तुत प्रकरणका व्याख्यान करें ॥५०७॥