श्रीमानतुङ्गाचार्यविरचितम् भक्तामरस्तोत्रम् (श्री आदिनाथस्तोत्रम्)
भक्तामर-प्रणतमौलि -मणिप्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो - वितानम्।
सम्यक् प्रणम्य जिन-पाद - युगं युगादा-
वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्॥१॥
यः संस्तुतः सकल -वाङ्मय - तत्त्व-बोधा-
दुद्भूत-बुद्धि - पटुभिः सुर - लोक-नाथैः।
स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय - चित्त - हरैरुदारैः,
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥२॥ (युग्मं)
अर्थ (श्लोक 1 से 2): भगवान् ऋषभदेव के चरण युगल में जब देवगण भक्ति पूर्वक नमस्कार करते हैं तब उनके मुकुट में जड़ित मणियाँ प्रभु के चरणों की दिव्य कान्ति से और अधिक देदीप्यमान हो जाती है। भगवान् के चरणों का स्पर्श ही प्राणियों के पापों का नाश करने वाला है, तथा जो उन चरण युगल का आलम्बन (सहारा) लेते हैं वे संसार समुद्र से पार हो जाते हैं। इस युग के प्रारम्भ में धर्म का प्रवर्तन करने वाले प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के चरण-युगल में विधिवत् प्रणाम करके स्तुति करूँगा। सम्पूर्ण वाङ्मय (शास्त्रों) का ज्ञान प्राप्त करने से जिनकी बुद्धि अत्यन्त प्रखर हो गई हैं ऐसे देवेन्द्रों ने तीनों लोकों के प्राणियों के चित्त को आनन्दित करने वाले सुन्दर स्तोत्रों के द्वारा प्रभु आदिनाथ की स्तुति की है, उन प्रथम जिनेन्द्र की मैं (मानतुङ्ग आचार्य अल्पबुद्धि वाला सामान्य व्यक्ति) भी स्तुति करने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
आचार्य का लाघव प्रदर्शन
बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ !
स्तोतुं समुद्यत - मतिर्विगत - त्रपोऽहम्।
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-
मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥३॥
अर्थ: हे देवों द्वारा पूजित जिनेश्वर जिस प्रकार जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रबिम्ब को पकड़ना असम्भव होते हुए भी नासमझ बालक उसे पकड़ने का प्रयास करता है। उसी प्रकार मैं अत्यन्त अल्पबुद्धि होते हुए भी आप जैसे महामहिम की स्तुति करने का प्रयास कर रहा हूँ। क्या मेरी यह धृष्टता नहीं है?
वक्तुं गुणान् गुण-समुद्र! शशाङ्क-कान्तान् ,
कस्ते क्षमः सुरगुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या ।
कल्पान्त -काल - पवनोद्धत- नक्र- चक्रं,
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥४॥
अर्थ: हे गुणसमुद्र ! जिनेश्वर क्या चन्द्रमा के समान (स्वच्छ एवं आनन्द रूप) आपके अनन्त गुणों का वर्णन करने में देवगुरु (बृहस्पति) के समान बुद्धिमान भी समर्थ हो सकता? अर्थात् नहीं हो सकता। जैसे प्रलय काल के तूफानी पवन से उछाल मारते भयानक मगरमच्छ आदि से क्षुब्ध महासमुद्र को क्या कोई मानव अपनी भुजाओं से तैर कर पार कर सकता है? अर्थात् कोई नहीं।
सोऽहं तथापि तव भक्ति - वशान्मुनीश !
कर्तुं स्तवं विगत - शक्ति - रपि प्रवृत्तः।
प्रीत्यात्म - वीर्य - मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम्
नाभ्येति किं निज-शिशोः परिपालनार्थम्॥५॥
अर्थ: हे मुनिजनों के आराध्य देव! यद्यपि आपके अनन्त गुणों का वर्णन करने की शक्ति मुझमें नहीं है, फिर भी आपकी भक्ति के वशीभूत हुआ, मैं स्तुति करने के लिए तत्पर हो रहा हूँ। सभी जानते हैं कि हिरणी कितनी ही शक्ति रहित क्यों न हो, किन्तु अपने बच्चे की रक्षा के लिए वात्सल्य भाव के वशीभूत आक्रमण करते हुए सिंह का मुकाबला करने के लिए सामने डट जाती है। (उसी प्रकार मैं भी भक्तिवश हुआ अपनी शक्ति का विचार किये बिना स्तुति करने के लिए तत्पर हो रहा हूँ)।
अल्प-श्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम,
त्वद्-भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम्।
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति,
तच्चाम्र - चारु - कलिका - निकरैक-हेतु ॥६॥
अर्थ: हे प्रभो जिस प्रकार वसन्त ऋतु में आम की मँजरियाँ खाकर कोयल मधुर स्वर में बोलती है, उसी प्रकार आपकी भक्ति का बल पाकर मैं भी स्तुति करने को वाचाल हो रहा हूँ। अन्यथा मैं तो अल्पज्ञ हूँ और विद्वानों के सामने उपहास का पात्र हूँ।
त्वत्संस्तवेन भव - सन्तति - सन्निबद्धं,
पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् ।
आक्रान्त - लोक - मलि-नील-मशेष-माशु,
सूर्यांशु- भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥७॥
अर्थ: जिस प्रकार समस्त संसार को आच्छादित करने वाला भौंरे के समान काला नीला सघन अन्धकार सूर्य की किरण निकलते ही छिन्न-भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार हे आदिदेव! आपकी भक्ति में लीन होने वाले प्राणियों के अनेक जन्मों के संचित पाप-कर्म तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं।
मत्वेति नाथ ! तव संस्तवनं मयेद -
मारभ्यते तनु - धियाऽपि तव प्रभावात् ।
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी - दलेषु ,
मुक्ता - फल - द्युति-मुपैति ननूद - बिन्दुः ॥८॥
अर्थ: हे नाथ! जिस तरह कमलिनी के पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूँदें मोती की तरह सुन्दर दिखकर लोगों के चित्त को हरती है, उसी तरह मुझ अल्पज्ञ के द्वारा की हुई स्तुति भी आपके प्रभाव से सज्जनों के चित्त को हरेगी।
आस्तां तव स्तवन-मस्त - समस्त - दोषं,
त्वत्सङ्कथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति ।
दूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभैव,
पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि ॥९॥
अर्थ: प्रभो! आपके निर्दोष स्तवन में तो अनन्त शक्ति है ही, पर आपकी पवित्र चर्चा में भी जीवों के पाप नष्ट करने की सामर्थ्य है। जैसे कि सूर्य के दूर रहने पर भी उसकी उज्ज्वल किरणों में कमलों को विकसित करने की सामर्थ्य रहती है।
नात्यद्भुतं भुवन-भूषण ! भूत - नाथ!
भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त - मभिष्टुवन्तः ।
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा,
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥१०॥
अर्थ: हे स्वामिन्! जिस तरह उत्तम मालिक अपने नौकर को सम्पत्ति देकर अपने समान बना लेता है, उसी तरह आप भी अपने भक्तों को अपने समान शुद्ध बना लेते हैं।
परम दर्शनीय परमात्म प्रभु
दृष्ट्वा भवन्त - मनिमेष - विलोकनीयं,
नान्यत्र - तोष - मुपयाति जनस्य चक्षुः।
पीत्वा पयः शशिकर - द्युति -दुग्ध-सिन्धोः,
क्षारं जलं जलनिधे रसितुं क इच्छेत्?॥११॥
अर्थ: हे भगवन्! जिस तरह क्षीर समुद्र के निर्मल जल को पीने वाला मनुष्य अन्य समुद्र के खारे पानी को पीने की इच्छा नहीं करता उसी तरह आपके सुन्दर रूप को देखने वाले मनुष्य किसी दूसरे सुन्दर पदार्थ को नहीं देखना चाहते। आप सबसे अधिक सुन्दर हैं।
यैः शान्त-राग-रुचिभिः परमाणुभिस्त्वम्,
निर्मापितस् - त्रिभुवनैक - ललाम -भूत !
तावन्त एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां,
यत्ते समान-मपरं न हि रूप-मस्ति॥१२॥
अर्थ: हे जिनेन्द्र ! जिन परमाणुओं से आपकी रचना हुई है, मालूम होता है कि वे परमाणु उतने ही थे। यदि उससे अधिक होते तो आपके समान दूसरा रूप भी होना चाहिए था, पर दूसरा रूप है नहीं इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि वे उतने ही थे। भगवन्! आप अद्वितीय सुन्दर हैं।
मुख निर्दोषी चन्द्रवत्
वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग - नेत्र - हारि,
निःशेष - निर्जित - जगत्-त्रितयोपमानम् ।
बिम्बं कलङ्क - मलिनं क्व निशाकरस्य,
यद्वासरे भवति पाण्डु-पलाश-कल्पम्॥१३॥
अर्थ: नाथ! जो लोग आपके मुख को चन्द्रमा की उपमा देते हैं वे गलती करते हैं। क्योंकि आपके मुख की शोभा कभी नष्ट नहीं होती और चन्द्रमा की शोभा दिन में नष्ट हो जाती है, इसके अतिरिक्त वह कलंकी है और आपका मुख कलंक रहित है।
सम्पूर्ण-मण्डल - शशाङ्क - कलाकलाप-
शुभ्रा गुणास् - त्रिभुवनं तव लङ्घयन्ति।
ये संश्रितास् - त्रिजगदीश्वरनाथ - मेकम्,
कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम्॥१४॥
अर्थ: हे भगवन्! जिस प्रकार किसी राजाधिराज के आश्रित रहने वाले पुरुष को इच्छानुसार जहाँ तहाँ घूमते रहते कोई नहीं रोक सकता उसी प्रकार आपके आश्रित रहने वाले कीर्ति आदि गुणों को तीनों लोकों में कोई नहीं रोक सकता। आपके गुण सब जगह फैले हुए हैं।
चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग -नाभिर्-
नीतं मनागपि मनो न विकार - मार्गम् ।
कल्पान्त -काल - मरुता चलिताचलेन,
किं मन्दराद्रि-शिखरं चलितं कदाचित्॥१५॥
अर्थ: हे नाथ! जिस तरह प्रलयकाल की प्रचण्ड पवन के द्वारा मेरु पर्वत नहीं हिलाया जा सकता, उसी तरह देवाङ्गनाओं के हावभावों द्वारा आपका मन सुमेरु भी नहीं हिलाया जा सकता। आपका धैर्य अतुल है और आपने मन को अपने वश कर लिया है।
प्रभु आप अनोखे दीपक हो
निर्धूम - वर्ति - रपवर्जित-तैल - पूरः,
कृत्स्नं जगत्त्रय - मिदं प्रकटी-करोषि।
गम्यो न जातु मरुतां चलिता-चलानाम्,
दीपोऽपरस्त्व-मसि नाथ! जगत्प्रकाशः॥१६॥
अर्थ: हे नाथ! आप समस्त संसार को प्रकाशित करने वाले अनोखे दीपक हैं क्योंकि अन्य दीपकों की बत्ती से धुआँ निकलता रहता है पर आपकी वर्ति-मार्ग निर्धूम-पाप रहित है। अन्य दीपक तेल की सहायता से प्रकाश फैलाते हैं पर आप बिना किसी की सहायता के ही प्रकाश-ज्ञान फैलाते हैं। अन्य दीपक हवा से नष्ट हो जाते हैं पर आप अविनाशी हैं। तथा अन्य दीपक थोड़ी सी जगह को प्रकाशित करते हैं पर आप समस्त लोक को प्रकाशित करते हैं।
नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः,
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज् - जगन्ति।
नाम्भोधरोदर -निरुद्ध - महा - प्रभावः,
सूर्यातिशायि - महिमासि मुनीन्द्र ! लोके॥१७॥
अर्थ: हे प्रभो ! आपकी महिमा सूर्य से भी अधिक है, क्योंकि सूर्य सन्ध्या के समय अस्त हो जाता है, पर आप कभी अस्त नहीं होते। सूर्य को राहु ग्रस लेता है, पर आपको वह आजतक भी नहीं ग्रस सका है। सूर्य दिन में क्रम क्रम से सिर्फ मध्यलोक को प्रकाशित करता है, पर आप एकसाथ समस्त लोक को प्रकाशित करते हैं और सूर्य के तेज को मेघ रोक लेते हैं, पर आपके ज्ञान तेज को कोई नहीं रोक सकता।
नित्योदयं दलित - मोह - महान्धकारं,
गम्यं न राहु -वदनस्य न वारिदानाम्।
विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्पकान्ति,
विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशाङ्क - बिम्बम्॥१८॥
अर्थ: हे भगवन्! आपका मुखकमल अपूर्व चन्द्रमा है क्योंकि यह चन्द्रमा दिन में अस्त हो जाता है पर आपका मुखचन्द्र हमेशा उदित रहता है। चन्द्रमा सिर्फ अन्धकार को नष्ट करता है पर आपका मुखचन्द्र मोहरूपी अन्धकार को भी नष्ट कर देता है। चन्द्रमा राहु के द्वारा ग्रसा जाता है पर आपके मुखचन्द्र को राहु नहीं ग्रस सकता। चन्द्रमा को बादल छिपा लेते हैं पर आपके मुखचन्द्र को बादल नहीं छिपा सकते। चन्द्रमा की कान्ति कृष्ण पक्ष में घट जाती है और आपके मुख चन्द्र की कांति हमेशा बढ़ती ही रहती है और चन्द्रमा सिर्फ मध्यलोक को प्रकाशित करता है पर आपका मुखचन्द्र तीनों लोकों को प्रकाशित करता है।
किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,
युष्मन्मुखेन्दु - दलितेषु तमःसु नाथ!
निष्पन्न -शालि-वन -शालिनि जीव-लोके,
कार्यं कियज्जल-धरै-र्जलभार-नम्रैः॥१९॥
अर्थ: हे प्रभो! जिस तरह संसार में धान्य के पक जाने पर बादलों से कोई लाभ नहीं होता उसी तरह आपके मुखचन्द्र के द्वारा अन्धकार नष्ट हो जाने पर दिन में सूर्य से और रात में चन्द्रमा से कोई लाभ नहीं है।
ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरि - हरादिषु नायकेषु।
तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं,
नैवं तु काच-शकले किरणाकुलेऽपि॥२०॥
अर्थ: हे प्रभो ! लोक अलोक को जानने वाले निर्मल ज्ञान जिस तरह आप में शोभा को प्राप्त होता है उस तरह ब्रह्मा, विष्णु, महादेव आदि देवों में नहीं होता। तेज की शोभा महामणियों में ही होती है न कि कांच के टुकड़े में भी।
मन्ये वरं हरि - हरा - दय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः,
कश्चिन्मनो हरति नाथ! भवान्तरेऽपि॥२१॥
अर्थ: इस श्लोक में व्याजोक्ति अलंकार से विपरीत कथन किया गया है। श्लोक का अविरुद्ध अर्थ यह है कि हे प्रभो! संसार में आप ही सर्वश्रेष्ठ देव हैं। आपके दर्शन से चित्त को इतना सन्तोष होता है कि वह मरने के बाद भी किसी दूसरे देव के दर्शन नहीं करना चाहता। हरि-हर आदि देव रागी-द्वेषी हैं उनके दर्शन से चित्त सन्तुष्ट नहीं होता। इसीलिए वह आप जैसे देवों के दर्शनों की इच्छा रखता है।
स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं,
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशुजालम् ॥२२॥
अर्थ: हे नाथ! जिस तरह सूर्य को पूर्व दिशा के सिवाय अन्य दिशाएँ प्रकट नहीं कर पातीं, उसी तरह आपको आपकी माता के सिवाय अन्य माता पैदा नहीं कर सकीं। आप भाग्यशालिनी माता के अद्वितीय भाग्यशाली पुत्र हैं।
त्वामा-मनन्ति मुनयः परमं पुमान्स्-
मादित्य - वर्ण - ममलं तमसः पुरस्तात्।
त्वामेव सम्य - गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,
नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्थाः॥२३॥
अर्थ: सांख्य मतवाले कमलपत्र की तरह निर्लेप, शुद्ध, ज्ञानरूप पुरुष को मानते हैं और अन्त में प्रकृतिजन्य विकारों को छोड़कर पुरुष की प्राप्ति को मोक्ष मानते हैं। आचार्य मानतुंग ने अपनी व्यापक दृष्टि से भगवान् को ही परम पुरुष बतलाया है और साथ में यह भी कहा है कि आपको अच्छी तरह प्राप्तकर जानकर ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। जो आप से दूर रहते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता।
त्वा - मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
ब्रह्माण-मीश्वर - मनंत - मनङ्ग - केतुम्।
योगीश्वरं विदित - योग - मनेक-मेकं,
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्तः॥२४॥
अर्थ: भगवन् आपकी आत्मा का कभी नाश नहीं होता इसलिए सत्पुरुष आपको ‘अव्यय’ अविनाशी कहते हैं। आपका ज्ञान तीनों लोकों में फैला हुआ है इसलिए आपको विभु व्यापक कहते हैं। आपके स्वरूप को कोई चिन्तन नहीं कर सकता इसलिए आपको अचिन्त्य चिन्तन के अयोग्य कहते हैं। आपके गुणों की संख्या नहीं है इसलिए आपको ‘असंख्य’ गणना रहित कहते हैं। आप युग के आदि में हुए अथवा चौबीस तीर्थंकरों में आदि हैं, इसलिए आपको आद्य प्रथम कहते हैं। आप सब कर्मों से रहित हैं अथवा अनन्त गुणों से बढ़े हुए हैं इसलिए आपको ब्रह्मा कहते हैं। आप कृतकृत्य हैं इसलिए आपको ‘ईश्वर’ कहते हैं। आप सामान्य स्वरूप की अपेक्षा अन्तरहित हैं इसलिए आपको ‘अनन्त’ कहते हैं। आप काम को नष्ट करने के लिए केतुग्रह की तरह हैं इसलिए आपको ‘अनङ्गकेतु’ कहते हैं। आप योगियों मुनियों के स्वामी हैं इसलिए आपको ‘योगीश्वर’ कहते हैं। आप योग ध्यान वगैरह को जानने वाले हैं इसलिए आपको ‘विदितयोग’ कहते हैं। आप पर्यायों की अपेक्षा अनेकरूप हैं इसलिए आपको ‘अनेक’ कहते हैं। आप सामान्यस्वरूप की अपेक्षा एक हैं इसलिए आपको एक कहते हैं। आप केवलज्ञान रूप हैं इसलिए आपको ‘ज्ञानस्वरूप’ कहते हैं। तथा आप कर्ममल से रहित हैं इसलिए आपको ‘अमल’ कहते हैं।
बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित - बुद्धि - बोधात्,
त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय - शङ्करत्वात् ।
धातासि धीर ! शिव - मार्ग-विधेर्विधानाद्,
व्यक्तं त्वमेव भगवन्! पुरुषोत्तमोऽसि॥२५॥
अर्थ: संसार में बुद्ध, शंकर, ब्रह्मा और नारायण नाम से प्रसिद्ध अन्य देव हैं। आचार्य कहते हैं कि हे भगवन्! केवलज्ञान सहित होने के कारण आप ही सच्चे बुद्ध हैं किन्तु जो सर्वथा क्षणिकवादी अथवा केवलज्ञान से रहित हैं वह बुद्ध, बुद्ध नहीं कहला सकता। तीनों लोकों के सुख या शान्ति के करने से आप ही सच्चे शंकर हैं। जो संसार का संहार करने वाला है और काम से पीड़ित होकर पार्वती को हमेशा साथ रखता है वह शंकर, शंकर नहीं हो सकता। आप ने ही रत्नत्रय रूप धर्म का उपदेश देकर मोक्षमार्ग की सृष्टि की है। इसलिए आप ही सच्चे ब्रह्मा हैं। जो हिंसक वेदों का उपदेश देता था और तिलोत्तमा के मोह में फँसकर तप से भ्रष्ट हुआ था वह ब्रह्मा, ब्रह्मा नहीं कहा जा सकता। इसीतरह पुरुषोत्तम कृष्ण नारायण भी तुम्हीं हो क्योंकि आप सब पुरुषों में उत्तम श्रेष्ठ हो।
तुभ्यं नमस् - त्रिभुवनार्ति - हराय नाथ!
तुभ्यं नमः क्षिति - तलामल - भूषणाय।
तुभ्यं नमस् - त्रिजगतः परमेश्वराय,
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥२६॥
अर्थ: हे भगवन्! आप तीनों लोकों की विपत्ति हरने वाले हो, महीतल के निर्मल आभूषण हो, त्रिभुवन के स्वामी हो और संसार समुद्र के शोषक हो इसलिए आपको नमस्कार हो।
को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्,
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश !
दोषैरुपात्त - विविधा-श्रय-जातगर्वैः,
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥२७॥
अर्थ: गुणों को संसार में अन्य स्थान नहीं मिला इसलिए वे लाचार हो आपकी शरण में आ गये। परन्तु दोषों को अन्य स्थान की कमी नहीं थी, इसलिए वे स्वप्न में भी आपके पास नहीं आये। व्यवहार में भी देखा जाता है कि जिसकी अन्यत्र इज्जत नहीं होती वह लाचार हो किसी एक के पास ही रहता है, पर जिसकी हर जगह इज्जत होती है वह किसी एक के आश्रित नहीं रहता। श्लोक का तात्पर्य इतना ही है कि आप गुणवान हैं, आपमें दोष बिल्कुल ही नहीं हैं।
अशोक वृक्ष प्रातिहार्य
उच्चै - रशोक - तरु - संश्रितमुन्मयूख -
माभाति रूप-ममलं भवतो नितान्तम्।
स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानम्,
बिम्बं रवेरिव पयोधर - पार्श्ववर्ति ॥२८॥
अर्थ: हे प्रभो ! ऊँचे और हरे भरे अशोक वृक्ष के नीचे आपका सुवर्ण सा उज्ज्वल रूप उस भाँति भला मालूम होता है जिस भाँति काले काले मेघ के नीचे सूर्य का मण्डल। यह ‘अशोक वृक्ष’ प्रातिहार्य का वर्णन है।
सिंहासन प्रातिहार्य
सिंहासने मणि - मयूख - शिखा - विचित्रे,
विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम्।
बिम्बं वियद् - विलस - दंशुलता - वितानं।
तुङ्गोदयाद्रि - शिरसीव सहस्र-रश्मेः ॥२९॥
अर्थ: हे प्रभो ! उदयाचल की चोटी पर सूर्य का बिम्ब जैसा भला मालूम होता है वैसा ही रत्नों के सिंहासन पर आपका मनोहर शरीर भला मालूम होता है। यह ‘सिंहासन’ प्रातिहार्य का वर्णन है।
चँवर प्रातिहार्य
कुन्दावदात -चल -चामर - चारु - शोभं,
विभ्राजते तव वपुः कलधौत - कान्तम्।
उद्यच्छशाङ्क - शुचिनिर्झर - वारि - धार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥३०॥
अर्थ: हे प्रभो ! जिस पर देवों के द्वारा सफेद चँवर ढोले जा रहे हैं ऐसा आपका सुवर्णमय शरीर उतना सुहावना मालूम होता है जितना कि झरने के सफेद जल से शोभित मेरुपर्वत का सोने का शिखर। यह ‘चँवर’ प्रातिहार्य का वर्णन है।
छत्रत्रय प्रातिहार्य
छत्र - त्रयं तव विभाति शशाङ्क - कान्त-
मुच्चैः स्थितं स्थगित-भानुकर-प्रतापम्।
मुक्ता-फल -प्रकर -जाल - विवृद्ध-शोभं,
प्रख्यापयत् त्रिजगतः परमेश्वरत्वम्॥३१॥
अर्थ: भगवान् आपके शिर पर जो तीन छत्र फिर रहे हैं वे मानों यह प्रकट कर रहें हैं कि आप तीन लोक के स्वामी हैं। यह ‘छत्रत्रय’ प्रातिहार्य का वर्णन है।
देव-दुन्दुभि प्रातिहार्य
गम्भीर - तार - रव - पूरित - दिग्विभागस्-
त्रैलोक्यलोक-शुभ - सङ्गम - भूति - दक्षः।
सद्धर्म- राज-जय - घोषण- घोषकः सन्,
खे दुंदुभि-र्ध्वनति ते यशसः प्रवादी॥३२॥
अर्थ: हे प्रभो! आकाशों में जो दुन्दुभि बाजा बज रहा है वह मानों आपकी जय बोलता हुआ आपका सुयश प्रकट कर रहा है। यह ‘देव दुन्दुभि’ प्रातिहार्य का वर्णन है।
पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य
मन्दार - सुन्दर - नमेरु - सुपारिजात-
सन्तानकादि - कुसुमोत्कर - वृष्टि - रुद्धा।
गन्धोद - बिन्दु - शुभ-मन्द - मरुत्प्रपाता,
दिव्या दिवः पतति ते वचसां ततिर्वा॥३३॥
अर्थ: हे नाथ! सुगन्धित जल और मन्द हवा के साथ आकाश से जो कल्पवृक्ष के फूलों की वर्षा होती है वह आपके मनोहर वचनावली की तरह शोभित होती है। यह ‘पुष्पवृष्टि’ प्रातिहार्य का वर्णन है।
भामण्डल प्रातिहार्य
शुम्भत्-प्रभा - वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,
लोकत्रये द्युतिमतां द्युति - माक्षिपन्ती।
प्रोद्यद् - दिवाकर - निरन्तर - भूरि - संख्या,
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोम-सौम्याम्॥३४॥
अर्थ: हे प्रभो! यद्यपि आपकी प्रभा सूर्य से भी अधिक तेजस्विनी है तथापि वह सन्ताप देने वाली नहीं है। चन्द्र प्रभा की तरह शीतल भी है। यह ‘भामण्डल’ प्रातिहार्य का वर्णन है।
दिव्यध्वनि प्रातिहार्य
स्वर्गापवर्ग - गम - मार्ग - विमार्गणेष्टः,
सद्धर्म-तत्त्व - कथनैक-पटुस् - त्रिलोक्याः।
दिव्य - ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ - सर्व-
भाषा-स्वभाव-परिणाम-गुणैः प्रयोज्यः॥३५॥
अर्थ: हे स्वामिन्! आपकी वाणी स्वर्ग और मोक्ष का रास्ता बताने वाली है, सब जीवों को हित का उपदेश देने में समर्थ है और सब भाषाओं में बदल जाती है अर्थात् जो जिस भाषा का जानकार है आपकी दिव्यध्वनि उसके कानों के पास पहुँचकर उसी रूप हो जाती है। यह ‘दिव्यध्वनि’ प्रातिहार्य का वर्णन है।
विहार में स्वर्ण कमलों की रचना
उन्निद्र - हेम - नव - पङ्कज - पुञ्ज - कान्ति-,
पर्युल् - लसन् - नख - मयूख - शिखाभिरामौ ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्तः,
पद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति॥३६॥
अर्थ: हे जिनेन्द्र ! जब आप धर्मोपदेश देने के लिए आर्य क्षेत्रों में बिहार करते हैं तब देव लोग आपके चरणों के नीचे कमलों की रचना करते जाते हैं।
इत्थं यथा तव विभूतिरभूज् - जिनेन्द्र !
धर्मोपदेशन - विधौ न तथा परस्य।
यादृक् प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा,
तादृक् कुतो ग्रह-गणस्य विकासिनोऽपि॥३७॥
अर्थ: हे प्रभो ! धर्मोपदेश के विषय में समवसरणादि रूप जैसी विभूति आपको प्राप्त हुई थी वैसी विभूति अन्य देवाताओं को प्राप्त नहीं हुई थी। सो ठीक ही है, क्या कभी सूर्य जैसी कान्ति शुक्र आदि ग्रहों से भी प्राप्त हो सकती है? अर्थात् नहीं हो सकती है।
श्च्योतन् - मदाविल - विलोल -कपोल-मूल-
मत्त- भ्रमद् - भ्रमर - नाद -विवृद्ध-कोपम्।
ऐरावताभमिभ - मुद्धत - मापतन्तं
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥३८॥
अर्थ: हे प्रभो जो मनुष्य आपकी शरण लेते हैं उन्हें मदोन्मत्त हाथी भी नहीं डरा सकता।
भिन्नेभ -कुम्भ -गल -दुज्ज्वल-शोणिताक्त-
मुक्ता - फल-प्रकर-भूषित - भूमि - भागः।
बद्ध - क्रमः क्रम - गतं हरिणाधिपोऽपि,
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥३९॥
अर्थ: हे प्रभो! जो आपके चरणों की शरण लेता है सिंह भी उनका शिकार नहीं कर पाता।
कल्पान्त - काल-पवनोद्धत - वह्नि - कल्पं,
दावानलं ज्वलित -मुज्ज्वल - मुत्स्फुलिङ्गम्।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख - मापतन्तं,
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥४०॥
अर्थ: हे भगवन्! आपके नाम का स्मरण करने से भयंकर दावानल की बाधा नष्ट हो जाती है।
रक्तेक्षणं समद - कोकिल - कण्ठ - नीलं,
क्रोधोद्धतं फणिन - मुत्फण - मापतन्तम्।
आक्रामति क्रम - युगेण निरस्त-शङ्कस्,
त्वन्नाम -नाग - दमनी हृदि यस्य पुंसः॥४१॥
अर्थ: हे प्रभो! जो आपके नाम का स्मरण करता है, भयंकर सांप भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
वलात् - तुरङ्ग - गज - गर्जित - भीमनाद-
माजौ बलं बलवता - मपि भूपतीनाम्।
उद्यद् - दिवाकर - मयूख - शिखापविद्धं,
त्वत्कीर्तनात्तम - इवाशु भिदामुपैति॥४२॥
अर्थ: हे नाथ! जिस तरह सूर्य की किरणों से अन्धकार नष्ट हो जाता है उसी तरह आपका यशोगान करने से बड़े बड़े राजाओं की सेनाएँ भी युद्ध में नष्ट हो जाती हैं, हार जाती हैं।
शरणागत की युद्ध में विजय
कुन्ताग्र - भिन्न -गज - शोणित - वारिवाह-
वेगावतार - तरणातुर - योध - भीमे।
युद्धे जयं विजित - दुर्जय - जेय - पक्षास्,
त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥४३॥
अर्थ: हे भगवन्! जो आपके चरणों का सहारा लेते हैं वे भयंकर से भयंकर भी युद्ध में निश्चित विजय पाते हैं।
अम्भोनिधौ क्षुभित - भीषण - नक्र - चक्र-
पाठीन-पीठ - भय - दोल्बण - वाडवाग्नौ।
रङ्गत्तरङ्ग - शिखर - स्थित - यान - पात्रास्,
त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद् व्रजन्ति ॥४४॥
अर्थ: हे भगवन्! जो आपका स्मरण करते हैं वे तूफान के समय भी समुद्र में निडर होकर यात्रा करते हैं।
उद्भूत - भीषण-जलोदर - भार - भुग्नाः,
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशाः।
त्वत्पाद - पङ्कज - रजोऽमृत - दिग्ध-देहा,
मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपाः ॥४५॥
अर्थ: हे नाथ! जो आपके चरणों का ध्यान करता है उसका भयंकर जलोदर रोग दूर हो जाता है।
आपाद - कण्ठमुरु - शृङ्खल - वेष्टिताङ्गा,
गाढम् बृहन् - निगड - कोटिनिघृष्ट - जङ्घाः ।
त्वन्-नाम-मन्त्र-मनिशम् मनुजाः स्मरन्तः,
सद्यः स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥४६॥
अर्थ: हे भगवन्! जो निरन्तर आपके नाम का जाप करता है उनके बेड़ी आदि बन्धन अपने आप छूट जाते हैं।
मत्तद्विपेन्द्र - मृगराज - दवानलाहि-
संग्राम - वारिधि - महोदर -बन्ध-नोत्थम्।
तस्याशु नाश - मुपयाति भयं भियेव,
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमान-धीते॥४७॥
अर्थ: हे प्रभो ! आपका स्तवन करने से सब तरह के भय नष्ट हो जाते हैं।
स्तुति का फल
स्तोत्रस्रजं तव जिनेन्द्र ! गुणैर्निबद्धां,
भक्त्या मया विविध-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।
धत्ते जनो य इह कण्ठगतामजस्रं,
तं ‘मानतुङ्ग’-मवशा समुपैति लक्ष्मीः॥४८॥
अर्थ: हे नाथ ! जो मनुष्य निरन्तर आपके इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे हर एक तरह की लक्ष्मी प्राप्त होती है।