पञ्चस्तोत्र संग्रह, संस्कृत टीका एवं हिन्दी अनुवाद सहित | Panchastotra Sangrah

पञ्चस्तोत्र संग्रह, संस्कृत टीका एवं हिन्दी अनुवाद सहित

संस्कृत टीका: श्रीचन्द्रकीर्ति
हिन्दी अनुवाद: डॉ॰ पं॰ पन्नालाल जैन साहित्याचार्य
प्रकाशक: जैन विद्यापीठ, सागर (म॰ प्र॰)
संस्करण: २०१७ (आवृत्ति ११००)

जिनेन्द्र भगवान् की स्तुति के पाँच संस्कृत स्तोत्र: भक्तामर, कल्याणमन्दिर, एकीभाव, विषापहार और जिनचतुर्विंशतिका, मूलपाठ, अन्वयार्थ, संस्कृत टीका और भावार्थ सहित।

Panchastotra Sangrah: five Sanskrit stotras (Bhaktamar, Kalyanmandir, Ekibhav, Vishapahar, Jinchaturvimshatika) with anvayarth, Sanskrit tika and Hindi bhavarth by Dr. Pt. Pannalal Jain Sahityacharya.


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):


:open_book: मूल श्लोक और श्लोक अर्थ, अधिकार अनुसार पढ़ें:

हर श्लोक अलग, उसके नीचे उसका अर्थ, इसी ग्रन्थ के PDF से ज्यों का त्यों (स्कैन से टंकित, मिलान बाकी)।

श्रीमानतुङ्गाचार्यविरचितम् भक्तामरस्तोत्रम् (श्री आदिनाथस्तोत्रम्)

भक्तामर-प्रणतमौलि -मणिप्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो - वितानम्।
सम्यक् प्रणम्य जिन-पाद - युगं युगादा-
वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्॥१॥

यः संस्तुतः सकल -वाङ्मय - तत्त्व-बोधा-
दुद्भूत-बुद्धि - पटुभिः सुर - लोक-नाथैः।
स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय - चित्त - हरैरुदारैः,
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥२॥ (युग्मं)

अर्थ (श्लोक 1 से 2): भगवान् ऋषभदेव के चरण युगल में जब देवगण भक्ति पूर्वक नमस्कार करते हैं तब उनके मुकुट में जड़ित मणियाँ प्रभु के चरणों की दिव्य कान्ति से और अधिक देदीप्यमान हो जाती है। भगवान् के चरणों का स्पर्श ही प्राणियों के पापों का नाश करने वाला है, तथा जो उन चरण युगल का आलम्बन (सहारा) लेते हैं वे संसार समुद्र से पार हो जाते हैं। इस युग के प्रारम्भ में धर्म का प्रवर्तन करने वाले प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के चरण-युगल में विधिवत् प्रणाम करके स्तुति करूँगा। सम्पूर्ण वाङ्मय (शास्त्रों) का ज्ञान प्राप्त करने से जिनकी बुद्धि अत्यन्त प्रखर हो गई हैं ऐसे देवेन्द्रों ने तीनों लोकों के प्राणियों के चित्त को आनन्दित करने वाले सुन्दर स्तोत्रों के द्वारा प्रभु आदिनाथ की स्तुति की है, उन प्रथम जिनेन्द्र की मैं (मानतुङ्ग आचार्य अल्पबुद्धि वाला सामान्य व्यक्ति) भी स्तुति करने का प्रयत्न कर रहा हूँ।


आचार्य का लाघव प्रदर्शन


बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ !
स्तोतुं समुद्यत - मतिर्विगत - त्रपोऽहम्।
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-
मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥३॥

अर्थ: हे देवों द्वारा पूजित जिनेश्वर जिस प्रकार जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रबिम्ब को पकड़ना असम्भव होते हुए भी नासमझ बालक उसे पकड़ने का प्रयास करता है। उसी प्रकार मैं अत्यन्त अल्पबुद्धि होते हुए भी आप जैसे महामहिम की स्तुति करने का प्रयास कर रहा हूँ। क्या मेरी यह धृष्टता नहीं है?


वक्तुं गुणान् गुण-समुद्र! शशाङ्क-कान्तान् ,
कस्ते क्षमः सुरगुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या ।
कल्पान्त -काल - पवनोद्धत- नक्र- चक्रं,
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥४॥

अर्थ: हे गुणसमुद्र ! जिनेश्वर क्या चन्द्रमा के समान (स्वच्छ एवं आनन्द रूप) आपके अनन्त गुणों का वर्णन करने में देवगुरु (बृहस्पति) के समान बुद्धिमान भी समर्थ हो सकता? अर्थात् नहीं हो सकता। जैसे प्रलय काल के तूफानी पवन से उछाल मारते भयानक मगरमच्छ आदि से क्षुब्ध महासमुद्र को क्या कोई मानव अपनी भुजाओं से तैर कर पार कर सकता है? अर्थात् कोई नहीं।


सोऽहं तथापि तव भक्ति - वशान्मुनीश !
कर्तुं स्तवं विगत - शक्ति - रपि प्रवृत्तः।
प्रीत्यात्म - वीर्य - मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम्
नाभ्येति किं निज-शिशोः परिपालनार्थम्॥५॥

अर्थ: हे मुनिजनों के आराध्य देव! यद्यपि आपके अनन्त गुणों का वर्णन करने की शक्ति मुझमें नहीं है, फिर भी आपकी भक्ति के वशीभूत हुआ, मैं स्तुति करने के लिए तत्पर हो रहा हूँ। सभी जानते हैं कि हिरणी कितनी ही शक्ति रहित क्यों न हो, किन्तु अपने बच्चे की रक्षा के लिए वात्सल्य भाव के वशीभूत आक्रमण करते हुए सिंह का मुकाबला करने के लिए सामने डट जाती है। (उसी प्रकार मैं भी भक्तिवश हुआ अपनी शक्ति का विचार किये बिना स्तुति करने के लिए तत्पर हो रहा हूँ)।


अल्प-श्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम,
त्वद्-भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम्।
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति,
तच्चाम्र - चारु - कलिका - निकरैक-हेतु ॥६॥

अर्थ: हे प्रभो जिस प्रकार वसन्त ऋतु में आम की मँजरियाँ खाकर कोयल मधुर स्वर में बोलती है, उसी प्रकार आपकी भक्ति का बल पाकर मैं भी स्तुति करने को वाचाल हो रहा हूँ। अन्यथा मैं तो अल्पज्ञ हूँ और विद्वानों के सामने उपहास का पात्र हूँ।


त्वत्संस्तवेन भव - सन्तति - सन्निबद्धं,
पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् ।
आक्रान्त - लोक - मलि-नील-मशेष-माशु,
सूर्यांशु- भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥७॥

अर्थ: जिस प्रकार समस्त संसार को आच्छादित करने वाला भौंरे के समान काला नीला सघन अन्धकार सूर्य की किरण निकलते ही छिन्न-भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार हे आदिदेव! आपकी भक्ति में लीन होने वाले प्राणियों के अनेक जन्मों के संचित पाप-कर्म तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं।


मत्वेति नाथ ! तव संस्तवनं मयेद -
मारभ्यते तनु - धियाऽपि तव प्रभावात् ।
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी - दलेषु ,
मुक्ता - फल - द्युति-मुपैति ननूद - बिन्दुः ॥८॥

अर्थ: हे नाथ! जिस तरह कमलिनी के पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूँदें मोती की तरह सुन्दर दिखकर लोगों के चित्त को हरती है, उसी तरह मुझ अल्पज्ञ के द्वारा की हुई स्तुति भी आपके प्रभाव से सज्जनों के चित्त को हरेगी।


आस्तां तव स्तवन-मस्त - समस्त - दोषं,
त्वत्सङ्कथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति ।
दूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभैव,
पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि ॥९॥

अर्थ: प्रभो! आपके निर्दोष स्तवन में तो अनन्त शक्ति है ही, पर आपकी पवित्र चर्चा में भी जीवों के पाप नष्ट करने की सामर्थ्य है। जैसे कि सूर्य के दूर रहने पर भी उसकी उज्ज्वल किरणों में कमलों को विकसित करने की सामर्थ्य रहती है।


नात्यद्भुतं भुवन-भूषण ! भूत - नाथ!
भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त - मभिष्टुवन्तः ।
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा,
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥१०॥

अर्थ: हे स्वामिन्! जिस तरह उत्तम मालिक अपने नौकर को सम्पत्ति देकर अपने समान बना लेता है, उसी तरह आप भी अपने भक्तों को अपने समान शुद्ध बना लेते हैं।


परम दर्शनीय परमात्म प्रभु


दृष्ट्वा भवन्त - मनिमेष - विलोकनीयं,
नान्यत्र - तोष - मुपयाति जनस्य चक्षुः।
पीत्वा पयः शशिकर - द्युति -दुग्ध-सिन्धोः,
क्षारं जलं जलनिधे रसितुं क इच्छेत्?॥११॥

अर्थ: हे भगवन्! जिस तरह क्षीर समुद्र के निर्मल जल को पीने वाला मनुष्य अन्य समुद्र के खारे पानी को पीने की इच्छा नहीं करता उसी तरह आपके सुन्दर रूप को देखने वाले मनुष्य किसी दूसरे सुन्दर पदार्थ को नहीं देखना चाहते। आप सबसे अधिक सुन्दर हैं।


यैः शान्त-राग-रुचिभिः परमाणुभिस्त्वम्,
निर्मापितस् - त्रिभुवनैक - ललाम -भूत !
तावन्त एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां,
यत्ते समान-मपरं न हि रूप-मस्ति॥१२॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! जिन परमाणुओं से आपकी रचना हुई है, मालूम होता है कि वे परमाणु उतने ही थे। यदि उससे अधिक होते तो आपके समान दूसरा रूप भी होना चाहिए था, पर दूसरा रूप है नहीं इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि वे उतने ही थे। भगवन्! आप अद्वितीय सुन्दर हैं।


मुख निर्दोषी चन्द्रवत्


वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग - नेत्र - हारि,
निःशेष - निर्जित - जगत्-त्रितयोपमानम् ।
बिम्बं कलङ्क - मलिनं क्व निशाकरस्य,
यद्वासरे भवति पाण्डु-पलाश-कल्पम्॥१३॥

अर्थ: नाथ! जो लोग आपके मुख को चन्द्रमा की उपमा देते हैं वे गलती करते हैं। क्योंकि आपके मुख की शोभा कभी नष्ट नहीं होती और चन्द्रमा की शोभा दिन में नष्ट हो जाती है, इसके अतिरिक्त वह कलंकी है और आपका मुख कलंक रहित है।


सम्पूर्ण-मण्डल - शशाङ्क - कलाकलाप-
शुभ्रा गुणास् - त्रिभुवनं तव लङ्घयन्ति।
ये संश्रितास् - त्रिजगदीश्वरनाथ - मेकम्,
कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम्॥१४॥

अर्थ: हे भगवन्! जिस प्रकार किसी राजाधिराज के आश्रित रहने वाले पुरुष को इच्छानुसार जहाँ तहाँ घूमते रहते कोई नहीं रोक सकता उसी प्रकार आपके आश्रित रहने वाले कीर्ति आदि गुणों को तीनों लोकों में कोई नहीं रोक सकता। आपके गुण सब जगह फैले हुए हैं।


चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग -नाभिर्-
नीतं मनागपि मनो न विकार - मार्गम् ।
कल्पान्त -काल - मरुता चलिताचलेन,
किं मन्दराद्रि-शिखरं चलितं कदाचित्॥१५॥

अर्थ: हे नाथ! जिस तरह प्रलयकाल की प्रचण्ड पवन के द्वारा मेरु पर्वत नहीं हिलाया जा सकता, उसी तरह देवाङ्गनाओं के हावभावों द्वारा आपका मन सुमेरु भी नहीं हिलाया जा सकता। आपका धैर्य अतुल है और आपने मन को अपने वश कर लिया है।


प्रभु आप अनोखे दीपक हो


निर्धूम - वर्ति - रपवर्जित-तैल - पूरः,
कृत्स्नं जगत्त्रय - मिदं प्रकटी-करोषि।
गम्यो न जातु मरुतां चलिता-चलानाम्,
दीपोऽपरस्त्व-मसि नाथ! जगत्प्रकाशः॥१६॥

अर्थ: हे नाथ! आप समस्त संसार को प्रकाशित करने वाले अनोखे दीपक हैं क्योंकि अन्य दीपकों की बत्ती से धुआँ निकलता रहता है पर आपकी वर्ति-मार्ग निर्धूम-पाप रहित है। अन्य दीपक तेल की सहायता से प्रकाश फैलाते हैं पर आप बिना किसी की सहायता के ही प्रकाश-ज्ञान फैलाते हैं। अन्य दीपक हवा से नष्ट हो जाते हैं पर आप अविनाशी हैं। तथा अन्य दीपक थोड़ी सी जगह को प्रकाशित करते हैं पर आप समस्त लोक को प्रकाशित करते हैं।


नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः,
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज् - जगन्ति।
नाम्भोधरोदर -निरुद्ध - महा - प्रभावः,
सूर्यातिशायि - महिमासि मुनीन्द्र ! लोके॥१७॥

अर्थ: हे प्रभो ! आपकी महिमा सूर्य से भी अधिक है, क्योंकि सूर्य सन्ध्या के समय अस्त हो जाता है, पर आप कभी अस्त नहीं होते। सूर्य को राहु ग्रस लेता है, पर आपको वह आजतक भी नहीं ग्रस सका है। सूर्य दिन में क्रम क्रम से सिर्फ मध्यलोक को प्रकाशित करता है, पर आप एकसाथ समस्त लोक को प्रकाशित करते हैं और सूर्य के तेज को मेघ रोक लेते हैं, पर आपके ज्ञान तेज को कोई नहीं रोक सकता।


नित्योदयं दलित - मोह - महान्धकारं,
गम्यं न राहु -वदनस्य न वारिदानाम्।
विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्पकान्ति,
विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशाङ्क - बिम्बम्॥१८॥

अर्थ: हे भगवन्! आपका मुखकमल अपूर्व चन्द्रमा है क्योंकि यह चन्द्रमा दिन में अस्त हो जाता है पर आपका मुखचन्द्र हमेशा उदित रहता है। चन्द्रमा सिर्फ अन्धकार को नष्ट करता है पर आपका मुखचन्द्र मोहरूपी अन्धकार को भी नष्ट कर देता है। चन्द्रमा राहु के द्वारा ग्रसा जाता है पर आपके मुखचन्द्र को राहु नहीं ग्रस सकता। चन्द्रमा को बादल छिपा लेते हैं पर आपके मुखचन्द्र को बादल नहीं छिपा सकते। चन्द्रमा की कान्ति कृष्ण पक्ष में घट जाती है और आपके मुख चन्द्र की कांति हमेशा बढ़ती ही रहती है और चन्द्रमा सिर्फ मध्यलोक को प्रकाशित करता है पर आपका मुखचन्द्र तीनों लोकों को प्रकाशित करता है।


किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,
युष्मन्मुखेन्दु - दलितेषु तमःसु नाथ!
निष्पन्न -शालि-वन -शालिनि जीव-लोके,
कार्यं कियज्जल-धरै-र्जलभार-नम्रैः॥१९॥

अर्थ: हे प्रभो! जिस तरह संसार में धान्य के पक जाने पर बादलों से कोई लाभ नहीं होता उसी तरह आपके मुखचन्द्र के द्वारा अन्धकार नष्ट हो जाने पर दिन में सूर्य से और रात में चन्द्रमा से कोई लाभ नहीं है।


ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरि - हरादिषु नायकेषु।
तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं,
नैवं तु काच-शकले किरणाकुलेऽपि॥२०॥

अर्थ: हे प्रभो ! लोक अलोक को जानने वाले निर्मल ज्ञान जिस तरह आप में शोभा को प्राप्त होता है उस तरह ब्रह्मा, विष्णु, महादेव आदि देवों में नहीं होता। तेज की शोभा महामणियों में ही होती है न कि कांच के टुकड़े में भी।


मन्ये वरं हरि - हरा - दय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः,
कश्चिन्मनो हरति नाथ! भवान्तरेऽपि॥२१॥

अर्थ: इस श्लोक में व्याजोक्ति अलंकार से विपरीत कथन किया गया है। श्लोक का अविरुद्ध अर्थ यह है कि हे प्रभो! संसार में आप ही सर्वश्रेष्ठ देव हैं। आपके दर्शन से चित्त को इतना सन्तोष होता है कि वह मरने के बाद भी किसी दूसरे देव के दर्शन नहीं करना चाहता। हरि-हर आदि देव रागी-द्वेषी हैं उनके दर्शन से चित्त सन्तुष्ट नहीं होता। इसीलिए वह आप जैसे देवों के दर्शनों की इच्छा रखता है।


स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं,
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशुजालम् ॥२२॥

अर्थ: हे नाथ! जिस तरह सूर्य को पूर्व दिशा के सिवाय अन्य दिशाएँ प्रकट नहीं कर पातीं, उसी तरह आपको आपकी माता के सिवाय अन्य माता पैदा नहीं कर सकीं। आप भाग्यशालिनी माता के अद्वितीय भाग्यशाली पुत्र हैं।


त्वामा-मनन्ति मुनयः परमं पुमान्स्-
मादित्य - वर्ण - ममलं तमसः पुरस्तात्।
त्वामेव सम्य - गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,
नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्थाः॥२३॥

अर्थ: सांख्य मतवाले कमलपत्र की तरह निर्लेप, शुद्ध, ज्ञानरूप पुरुष को मानते हैं और अन्त में प्रकृतिजन्य विकारों को छोड़कर पुरुष की प्राप्ति को मोक्ष मानते हैं। आचार्य मानतुंग ने अपनी व्यापक दृष्टि से भगवान् को ही परम पुरुष बतलाया है और साथ में यह भी कहा है कि आपको अच्छी तरह प्राप्तकर जानकर ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। जो आप से दूर रहते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता।


त्वा - मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
ब्रह्माण-मीश्वर - मनंत - मनङ्ग - केतुम्।
योगीश्वरं विदित - योग - मनेक-मेकं,
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्तः॥२४॥

अर्थ: भगवन् आपकी आत्मा का कभी नाश नहीं होता इसलिए सत्पुरुष आपको ‘अव्यय’ अविनाशी कहते हैं। आपका ज्ञान तीनों लोकों में फैला हुआ है इसलिए आपको विभु व्यापक कहते हैं। आपके स्वरूप को कोई चिन्तन नहीं कर सकता इसलिए आपको अचिन्त्य चिन्तन के अयोग्य कहते हैं। आपके गुणों की संख्या नहीं है इसलिए आपको ‘असंख्य’ गणना रहित कहते हैं। आप युग के आदि में हुए अथवा चौबीस तीर्थंकरों में आदि हैं, इसलिए आपको आद्य प्रथम कहते हैं। आप सब कर्मों से रहित हैं अथवा अनन्त गुणों से बढ़े हुए हैं इसलिए आपको ब्रह्मा कहते हैं। आप कृतकृत्य हैं इसलिए आपको ‘ईश्वर’ कहते हैं। आप सामान्य स्वरूप की अपेक्षा अन्तरहित हैं इसलिए आपको ‘अनन्त’ कहते हैं। आप काम को नष्ट करने के लिए केतुग्रह की तरह हैं इसलिए आपको ‘अनङ्गकेतु’ कहते हैं। आप योगियों मुनियों के स्वामी हैं इसलिए आपको ‘योगीश्वर’ कहते हैं। आप योग ध्यान वगैरह को जानने वाले हैं इसलिए आपको ‘विदितयोग’ कहते हैं। आप पर्यायों की अपेक्षा अनेकरूप हैं इसलिए आपको ‘अनेक’ कहते हैं। आप सामान्यस्वरूप की अपेक्षा एक हैं इसलिए आपको एक कहते हैं। आप केवलज्ञान रूप हैं इसलिए आपको ‘ज्ञानस्वरूप’ कहते हैं। तथा आप कर्ममल से रहित हैं इसलिए आपको ‘अमल’ कहते हैं।


बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित - बुद्धि - बोधात्,
त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय - शङ्करत्वात् ।
धातासि धीर ! शिव - मार्ग-विधेर्विधानाद्,
व्यक्तं त्वमेव भगवन्! पुरुषोत्तमोऽसि॥२५॥

अर्थ: संसार में बुद्ध, शंकर, ब्रह्मा और नारायण नाम से प्रसिद्ध अन्य देव हैं। आचार्य कहते हैं कि हे भगवन्! केवलज्ञान सहित होने के कारण आप ही सच्चे बुद्ध हैं किन्तु जो सर्वथा क्षणिकवादी अथवा केवलज्ञान से रहित हैं वह बुद्ध, बुद्ध नहीं कहला सकता। तीनों लोकों के सुख या शान्ति के करने से आप ही सच्चे शंकर हैं। जो संसार का संहार करने वाला है और काम से पीड़ित होकर पार्वती को हमेशा साथ रखता है वह शंकर, शंकर नहीं हो सकता। आप ने ही रत्नत्रय रूप धर्म का उपदेश देकर मोक्षमार्ग की सृष्टि की है। इसलिए आप ही सच्चे ब्रह्मा हैं। जो हिंसक वेदों का उपदेश देता था और तिलोत्तमा के मोह में फँसकर तप से भ्रष्ट हुआ था वह ब्रह्मा, ब्रह्मा नहीं कहा जा सकता। इसीतरह पुरुषोत्तम कृष्ण नारायण भी तुम्हीं हो क्योंकि आप सब पुरुषों में उत्तम श्रेष्ठ हो।


तुभ्यं नमस् - त्रिभुवनार्ति - हराय नाथ!
तुभ्यं नमः क्षिति - तलामल - भूषणाय।
तुभ्यं नमस् - त्रिजगतः परमेश्वराय,
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥२६॥

अर्थ: हे भगवन्! आप तीनों लोकों की विपत्ति हरने वाले हो, महीतल के निर्मल आभूषण हो, त्रिभुवन के स्वामी हो और संसार समुद्र के शोषक हो इसलिए आपको नमस्कार हो।


को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्,
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश !
दोषैरुपात्त - विविधा-श्रय-जातगर्वैः,
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥२७॥

अर्थ: गुणों को संसार में अन्य स्थान नहीं मिला इसलिए वे लाचार हो आपकी शरण में आ गये। परन्तु दोषों को अन्य स्थान की कमी नहीं थी, इसलिए वे स्वप्न में भी आपके पास नहीं आये। व्यवहार में भी देखा जाता है कि जिसकी अन्यत्र इज्जत नहीं होती वह लाचार हो किसी एक के पास ही रहता है, पर जिसकी हर जगह इज्जत होती है वह किसी एक के आश्रित नहीं रहता। श्लोक का तात्पर्य इतना ही है कि आप गुणवान हैं, आपमें दोष बिल्कुल ही नहीं हैं।


अशोक वृक्ष प्रातिहार्य


उच्चै - रशोक - तरु - संश्रितमुन्मयूख -
माभाति रूप-ममलं भवतो नितान्तम्।
स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानम्,
बिम्बं रवेरिव पयोधर - पार्श्ववर्ति ॥२८॥

अर्थ: हे प्रभो ! ऊँचे और हरे भरे अशोक वृक्ष के नीचे आपका सुवर्ण सा उज्ज्वल रूप उस भाँति भला मालूम होता है जिस भाँति काले काले मेघ के नीचे सूर्य का मण्डल। यह ‘अशोक वृक्ष’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


सिंहासन प्रातिहार्य


सिंहासने मणि - मयूख - शिखा - विचित्रे,
विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम्।
बिम्बं वियद् - विलस - दंशुलता - वितानं।
तुङ्गोदयाद्रि - शिरसीव सहस्र-रश्मेः ॥२९॥

अर्थ: हे प्रभो ! उदयाचल की चोटी पर सूर्य का बिम्ब जैसा भला मालूम होता है वैसा ही रत्नों के सिंहासन पर आपका मनोहर शरीर भला मालूम होता है। यह ‘सिंहासन’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


चँवर प्रातिहार्य


कुन्दावदात -चल -चामर - चारु - शोभं,
विभ्राजते तव वपुः कलधौत - कान्तम्।
उद्यच्छशाङ्क - शुचिनिर्झर - वारि - धार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥३०॥

अर्थ: हे प्रभो ! जिस पर देवों के द्वारा सफेद चँवर ढोले जा रहे हैं ऐसा आपका सुवर्णमय शरीर उतना सुहावना मालूम होता है जितना कि झरने के सफेद जल से शोभित मेरुपर्वत का सोने का शिखर। यह ‘चँवर’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


छत्रत्रय प्रातिहार्य


छत्र - त्रयं तव विभाति शशाङ्क - कान्त-
मुच्चैः स्थितं स्थगित-भानुकर-प्रतापम्।
मुक्ता-फल -प्रकर -जाल - विवृद्ध-शोभं,
प्रख्यापयत् त्रिजगतः परमेश्वरत्वम्॥३१॥

अर्थ: भगवान् आपके शिर पर जो तीन छत्र फिर रहे हैं वे मानों यह प्रकट कर रहें हैं कि आप तीन लोक के स्वामी हैं। यह ‘छत्रत्रय’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


देव-दुन्दुभि प्रातिहार्य


गम्भीर - तार - रव - पूरित - दिग्विभागस्-
त्रैलोक्यलोक-शुभ - सङ्गम - भूति - दक्षः।
सद्धर्म- राज-जय - घोषण- घोषकः सन्,
खे दुंदुभि-र्ध्वनति ते यशसः प्रवादी॥३२॥

अर्थ: हे प्रभो! आकाशों में जो दुन्दुभि बाजा बज रहा है वह मानों आपकी जय बोलता हुआ आपका सुयश प्रकट कर रहा है। यह ‘देव दुन्दुभि’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य


मन्दार - सुन्दर - नमेरु - सुपारिजात-
सन्तानकादि - कुसुमोत्कर - वृष्टि - रुद्धा।
गन्धोद - बिन्दु - शुभ-मन्द - मरुत्प्रपाता,
दिव्या दिवः पतति ते वचसां ततिर्वा॥३३॥

अर्थ: हे नाथ! सुगन्धित जल और मन्द हवा के साथ आकाश से जो कल्पवृक्ष के फूलों की वर्षा होती है वह आपके मनोहर वचनावली की तरह शोभित होती है। यह ‘पुष्पवृष्टि’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


भामण्डल प्रातिहार्य


शुम्भत्-प्रभा - वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,
लोकत्रये द्युतिमतां द्युति - माक्षिपन्ती।
प्रोद्यद् - दिवाकर - निरन्तर - भूरि - संख्या,
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोम-सौम्याम्॥३४॥

अर्थ: हे प्रभो! यद्यपि आपकी प्रभा सूर्य से भी अधिक तेजस्विनी है तथापि वह सन्ताप देने वाली नहीं है। चन्द्र प्रभा की तरह शीतल भी है। यह ‘भामण्डल’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


दिव्यध्वनि प्रातिहार्य


स्वर्गापवर्ग - गम - मार्ग - विमार्गणेष्टः,
सद्धर्म-तत्त्व - कथनैक-पटुस् - त्रिलोक्याः।
दिव्य - ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ - सर्व-
भाषा-स्वभाव-परिणाम-गुणैः प्रयोज्यः॥३५॥

अर्थ: हे स्वामिन्! आपकी वाणी स्वर्ग और मोक्ष का रास्ता बताने वाली है, सब जीवों को हित का उपदेश देने में समर्थ है और सब भाषाओं में बदल जाती है अर्थात् जो जिस भाषा का जानकार है आपकी दिव्यध्वनि उसके कानों के पास पहुँचकर उसी रूप हो जाती है। यह ‘दिव्यध्वनि’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


विहार में स्वर्ण कमलों की रचना


उन्निद्र - हेम - नव - पङ्कज - पुञ्ज - कान्ति-,
पर्युल् - लसन् - नख - मयूख - शिखाभिरामौ ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्तः,
पद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति॥३६॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! जब आप धर्मोपदेश देने के लिए आर्य क्षेत्रों में बिहार करते हैं तब देव लोग आपके चरणों के नीचे कमलों की रचना करते जाते हैं।


इत्थं यथा तव विभूतिरभूज् - जिनेन्द्र !
धर्मोपदेशन - विधौ न तथा परस्य।
यादृक् प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा,
तादृक् कुतो ग्रह-गणस्य विकासिनोऽपि॥३७॥

अर्थ: हे प्रभो ! धर्मोपदेश के विषय में समवसरणादि रूप जैसी विभूति आपको प्राप्त हुई थी वैसी विभूति अन्य देवाताओं को प्राप्त नहीं हुई थी। सो ठीक ही है, क्या कभी सूर्य जैसी कान्ति शुक्र आदि ग्रहों से भी प्राप्त हो सकती है? अर्थात् नहीं हो सकती है।


श्च्योतन् - मदाविल - विलोल -कपोल-मूल-
मत्त- भ्रमद् - भ्रमर - नाद -विवृद्ध-कोपम्।
ऐरावताभमिभ - मुद्धत - मापतन्तं
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥३८॥

अर्थ: हे प्रभो जो मनुष्य आपकी शरण लेते हैं उन्हें मदोन्मत्त हाथी भी नहीं डरा सकता।


भिन्नेभ -कुम्भ -गल -दुज्ज्वल-शोणिताक्त-
मुक्ता - फल-प्रकर-भूषित - भूमि - भागः।
बद्ध - क्रमः क्रम - गतं हरिणाधिपोऽपि,
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥३९॥

अर्थ: हे प्रभो! जो आपके चरणों की शरण लेता है सिंह भी उनका शिकार नहीं कर पाता।


कल्पान्त - काल-पवनोद्धत - वह्नि - कल्पं,
दावानलं ज्वलित -मुज्ज्वल - मुत्स्फुलिङ्गम्।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख - मापतन्तं,
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥४०॥

अर्थ: हे भगवन्! आपके नाम का स्मरण करने से भयंकर दावानल की बाधा नष्ट हो जाती है।


रक्तेक्षणं समद - कोकिल - कण्ठ - नीलं,
क्रोधोद्धतं फणिन - मुत्फण - मापतन्तम्।
आक्रामति क्रम - युगेण निरस्त-शङ्कस्,
त्वन्नाम -नाग - दमनी हृदि यस्य पुंसः॥४१॥

अर्थ: हे प्रभो! जो आपके नाम का स्मरण करता है, भयंकर सांप भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।


वलात् - तुरङ्ग - गज - गर्जित - भीमनाद-
माजौ बलं बलवता - मपि भूपतीनाम्।
उद्यद् - दिवाकर - मयूख - शिखापविद्धं,
त्वत्कीर्तनात्तम - इवाशु भिदामुपैति॥४२॥

अर्थ: हे नाथ! जिस तरह सूर्य की किरणों से अन्धकार नष्ट हो जाता है उसी तरह आपका यशोगान करने से बड़े बड़े राजाओं की सेनाएँ भी युद्ध में नष्ट हो जाती हैं, हार जाती हैं।


शरणागत की युद्ध में विजय


कुन्ताग्र - भिन्न -गज - शोणित - वारिवाह-
वेगावतार - तरणातुर - योध - भीमे।
युद्धे जयं विजित - दुर्जय - जेय - पक्षास्,
त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥४३॥

अर्थ: हे भगवन्! जो आपके चरणों का सहारा लेते हैं वे भयंकर से भयंकर भी युद्ध में निश्चित विजय पाते हैं।


अम्भोनिधौ क्षुभित - भीषण - नक्र - चक्र-
पाठीन-पीठ - भय - दोल्बण - वाडवाग्नौ।
रङ्गत्तरङ्ग - शिखर - स्थित - यान - पात्रास्,
त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद् व्रजन्ति ॥४४॥

अर्थ: हे भगवन्! जो आपका स्मरण करते हैं वे तूफान के समय भी समुद्र में निडर होकर यात्रा करते हैं।


उद्भूत - भीषण-जलोदर - भार - भुग्नाः,
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशाः।
त्वत्पाद - पङ्कज - रजोऽमृत - दिग्ध-देहा,
मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपाः ॥४५॥

अर्थ: हे नाथ! जो आपके चरणों का ध्यान करता है उसका भयंकर जलोदर रोग दूर हो जाता है।


आपाद - कण्ठमुरु - शृङ्खल - वेष्टिताङ्गा,
गाढम् बृहन् - निगड - कोटिनिघृष्ट - जङ्घाः ।
त्वन्-नाम-मन्त्र-मनिशम् मनुजाः स्मरन्तः,
सद्यः स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥४६॥

अर्थ: हे भगवन्! जो निरन्तर आपके नाम का जाप करता है उनके बेड़ी आदि बन्धन अपने आप छूट जाते हैं।


मत्तद्विपेन्द्र - मृगराज - दवानलाहि-
संग्राम - वारिधि - महोदर -बन्ध-नोत्थम्।
तस्याशु नाश - मुपयाति भयं भियेव,
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमान-धीते॥४७॥

अर्थ: हे प्रभो ! आपका स्तवन करने से सब तरह के भय नष्ट हो जाते हैं।


स्तुति का फल


स्तोत्रस्रजं तव जिनेन्द्र ! गुणैर्निबद्धां,
भक्त्या मया विविध-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।
धत्ते जनो य इह कण्ठगतामजस्रं,
तं ‘मानतुङ्ग’-मवशा समुपैति लक्ष्मीः॥४८॥

अर्थ: हे नाथ ! जो मनुष्य निरन्तर आपके इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे हर एक तरह की लक्ष्मी प्राप्त होती है।

कल्याणमन्दिरस्तोत्रम्

कल्याण - मन्दिर - मुदार - मवद्य भेदि,
भीताभय - प्रदमनिन्दित - मङ्घ्रि-पद्मम्।
संसार - सागर - निमज्जदशेष - जन्तु-,
पोतायमान - मभिनम्य जिनेश्वरस्य॥१॥

यस्य स्वयं सुरगुरु - र्गरिमाम्बु-राशेः।
स्तोत्रं सुविस्तृत-मति-र्न विभु-र्विधातुम्॥
तीर्थेश्वरस्य कमठ-स्मय - धूमकेतोस्-।
तस्याह-मेष किल संस्तवनं करिष्ये॥२॥

अर्थ (श्लोक 1 से 2): जिनेन्द्र ! भगवान् के चरण कमलों को नमस्कार कर मैं उन पार्श्वनाथ स्वामी की स्तुति करता हूँ, जो गुरुता के समुद्र थे और कमठ का मान मर्दन करने वाले थे तथा बृहस्पति भी जिनकी स्तुति करने के लिए समर्थ नहीं हो सका था।


लघुता अभिव्यक्ति


सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप-
मस्मादृशाः कथमधीश भवन्त्यधीशाः ।
धृष्टोऽपि कौशिक-शिशुर्यदि वा दिवान्धो,
रूपं प्ररूपयति किं किल घर्म-रश्मेः?॥३॥

अर्थ: हे प्रभो ! जिस तरह उल्लू का बालक सूर्य के रूप का वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि जब तक सूर्य रहता है तब तक वह अन्धा रहता है, इसी तरह मैं आपके सामान्य स्वरूप का भी वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि मैं भी मिथ्याज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धा होकर आपके दर्शन से वञ्चित रहा हूँ।


अनिर्वचनीय गुणमहिमा


मोह - क्षयादनुभवन् - नपि नाथ! मर्त्यो,
नूनं गुणान् गणयितुं न तव क्षमेत।
कल्पान्त-वान्त-पयसः प्रकटोऽपि यस्मान्,
मीयेत केन जलधेर्ननु रत्नराशिः॥४॥

अर्थ: हे प्रभो! जिसतरह प्रलयकाल में पानी न होने से साफ साफ दिखने वाले समुद्र के रत्नों को कोई नहीं गिन पाता उसी तरह मिथ्यात्व के अभाव से साफ साफ दिखने वाले आपके गुणों को कोई नहीं गिन सकता, क्योंकि वे अनन्तानन्त हैं।


अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ ! जडा-शयोऽपि,
कर्तुं स्तवं लसदसंख्य - गुणाकरस्य।
बालोऽपि किं न निजबाह्रयुगं वितत्य,
विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशेः॥५॥

अर्थ: हे नाथ! जैसे बालक शक्ति न रहते हुए भी समुद्र का विस्तार वर्णन करने के लिए तैयार रहता है वैसे ही मैं भी आपकी स्तुति करने के लिए तैयार हूँ।


ये योगिना-मपि न यान्ति, गुणास्तवेश!,
वक्तुं कथं भवति तेषु ममाव-काशः?।
जाता तदेव-मसमीक्षित - कारितेयं,
जल्पन्ति वा निज-गिरा ननु पक्षिणोऽपि॥६॥

अर्थ: हे प्रभो! आपका स्तवन प्रारम्भ करने के पहले मैंने इस बात का विचार नहीं किया कि आपके जिन गुणों का वर्णन बड़े-बड़े योगी भी नहीं कर सकते हैं उनका वर्णन मैं कैसे करूँगा? इसलिए हमारी यह प्रवृत्ति बिना विचारे हुई है।


प्रभु नाम


आस्ता-मचिन्त्य-महिमा जिन ! संस्तवस्ते,
नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति।
तीव्रातपोपहत - पान्थजनान् निदाघे-
प्रीणाति पद्मसरसः सरसोऽनिलोऽपि॥७॥

अर्थ: हे देव! आपके स्तवन की तो अचिन्त्य महिमा है ही, पर आपका नाम मात्र भी जीवों को संसार के दुःखों से बचा लेता है। जैसे ग्रीष्मऋतु में घाम से पीड़ित मनुष्यों को कमलयुक्त सरोवर तो सुख पहुँचाते ही हैं, पर उन सरोवरों की शीतल हवा भी सुख पहुँचाती है ।


हृद्-वर्तिनि त्वयि विभो! शिथिली-भवन्ति,
जन्तोः क्षणेन निबिडा अपि कर्मबन्धाः।
सद्यो भुजङ्गम-मया इव मध्यभाग-,
मभ्यागते वन-शिखण्डिनि चन्दनस्य॥८॥

अर्थ: हे भगवन्! जिस तरह मयूर के आते ही चन्दन वृक्ष में लिपटे हुए साँप ढीले पड़ जाते हैं उसी तरह जीवों के हृदय में आपके आने पर उनके कर्मबन्धन ढीले पड़ जाते हैं ।


मुच्यन्त एव मनुजाः सहसा जिनेन्द्र!
रौद्रैरुपद्रव - शतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि।
गो-स्वामिनि स्फुरित - तेजसि दृष्टमात्रेः,
चौरै-रिवाशु पशवः प्रपलायमानैः॥९॥

अर्थ: हे नाथ! जिस तरह तेजस्वी मालिक के दिखते ही चोर चुराई हुई गायों को छोड़कर शीघ्र ही भाग जाते हैं उसीतरह आपके दर्शन होते ही अनेक भयंकर उपद्रव मनुष्यों को छोड़कर भाग जाते हैं।


भवसिन्धु तारक जिन


त्वं तारको जिन! कथं भविनां त एव,
त्वामुद् - वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्तः।
यद्वा दृतिस्तरति यज्जल-मेष नून-,
मन्तर्गतस्य मरुतः स किलानुभावः॥१०॥

अर्थ: हे प्रभो! जिस तरह भीतर भरी हुई वायु के प्रभाव से मसक पानी में तैरती है उसी तरह आपको हृदय में धारण करने वाले (मन से आपका चिन्तन करने वाले) पुरुष आपके ही प्रभाव से संसार-समुद्र से तिरते हैं।


मदन विजेता पार्श्वनाथ


यस्मिन् हर - प्रभृतयोऽपि हत-प्रभावाः,
सोऽपि त्वया रतिपतिः क्षपितः क्षणेन।
विध्यापिता हुतभुजः पयसाथ येन,
पीतं न किं तदपि दुर्धर-वाडवेन॥११॥

अर्थ: जिस काम ने हरि-हर-ब्रह्मा आदि महापुरुषों को पराजित कर दिया था उस काम को भी आपने पराजित कर दिया यह आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि जो जल संसार की समस्त अग्नि को नष्ट करता है उस जल को भी बड़वानल नामक समुद्र की अग्नि नष्ट कर डालती है।


स्वामिन्! - ननल्प - गरिमाणमपि प्रपन्नाः,
त्वां जन्तवः कथमहो हृदये दधानाः।
जन्मोदधिं लघु तरन्त्यति - लाघवेन,
चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभावः॥१२॥

अर्थ: श्लोक में आये हुए ‘अनल्पगरिमाणम्’ पद के ‘अधिक वजनदार’और ‘‘अत्यन्त गौरव से युक्त श्रेष्ठ’’ इस तरह दो अर्थ होते हैं। उनमें से आचार्य ने प्रथम अर्थ को लेकर उस विरोध को बतलाते हुए आश्चर्य प्रकट किया है और दूसरे अर्थ को लेकर उस विरोध का परिहार किया है।


क्रोधस्त्वया यदि विभो! प्रथमं निरस्तो,
ध्वस्तास्तदा वद कथं किल कर्मचौराः।
प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके,
नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी॥१३॥

अर्थ: लोक में ऐसा देखा जाता है कि क्रोधी मनुष्य ही शत्रुओं को जीतते हैं, पर भगवन् आपने क्रोध को तो नवमें गुणस्थान में ही जीत लिया था। फिर क्रोध के अभाव में चौदहवें गुणस्थान तक कर्मरूपी शत्रुओं को कैसे जीता? आचार्य ने इस लोकविरुद्ध बात पर पहले आश्चर्य प्रकट किया, पर जब बाद में उन्हें ख्याल आता है कि ठण्डा तुषार बड़े-बड़े वनों को क्षणभर में जला देता है अर्थात् क्षमा से भी शत्रु जीते जा सकते हैं, तब वे अपने आश्चर्य का स्वयं समाधान कर लेते हैं।


त्वां योगिनो जिन! सदा परमात्मरूप,
मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुज - कोशदेशे॥
पूतस्य निर्मल-रुचेर्यदि वा किमन्य,
दक्षस्य सम्भव-पदं ननु कर्णिकायाः॥१४॥

अर्थ: बड़े बड़े योगीश्वर ध्यान करते समय अपने हृदय कमल में आपको खोजते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि जैसे कमल बीज की उत्पत्ति कमल कर्णिका में ही होती है उसी तरह शुद्धात्म स्वरूप आपका सद्भाव भी हृदय कमल की कर्णिका में ही होगा। श्लोक में आये हुए अक्ष शब्द के ‘कमलबीज कमलगटा’ और आत्मा (अक्ष्णोति- जानातीत्यक्षः = आत्मा) इस तरह दो अर्थ होते हैं।


ध्यानाज्जिनेश! भवतो भविनः क्षणेन,
देहं विहाय परमात्म-दशां व्रजन्ति॥
तीव्रानलादुपल-भावमपास्य लोके,
चामीकरत्वमचिरादिव धातु-भेदाः॥१५॥

अर्थ: जो जीव आपका ध्यान करते हैं वे थोड़े ही समय में शरीर छोड़कर मुक्त हो जाते हैं।


अन्तः सदैव जिन! यस्य विभाव्यसे त्वम्,
भव्यैः कथं तदपि नाशयसे शरीरम्?।
एतत्स्वरूपमथ मध्य-विवर्तिनो हि,
यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावाः॥१६॥

अर्थ: लोक में रीति प्रचलित है कि जो जहाँ रहता है अथवा जहाँ जिसका ध्यान सम्मान आदि किया जाता है वह उस जगह का विनाश नहीं करता। पर भगवन्! आप भव्य जीवों के जिस शरीर में हमेशा सन्मान पूर्वक ध्याये जाते हैं आप उन्हें उसी तरह विग्रह (शरीर) को नष्ट करने का उपदेश देते हैं। आचार्य को पहले इस लोकविरुद्ध बात पर भारी आश्चर्य होता है पर जब उनकी दृष्टि विग्रह शब्द के द्वेष अर्थ पर जाती है तब उनका आश्चर्य दूर हो जाता है। श्लोक में आये हुए विग्रह शब्द के दो अर्थ हैं एक ‘शरीर’ और दूसरा ‘द्वेष’ इसी तरह ‘मध्यविवर्तिन:’ शब्द के भी दो अर्थ हैं एक “बीच में रहने वाला” और दूसरा “रागद्वेष से रहित समताभावी”।


परमात्म स्वरूप का अनुभव


आत्मा मनीषिभि-रयं त्वदभेद-बुद्ध्या
ध्यातो जिनेन्द्र! भवतीह भवत्प्रभावः।
पानीय - मप्यमृत - मित्यनुचिन्त्यमानं,
किन्नाम नो विष-विकार-मपाकरोति॥१७॥

अर्थ: जो पुरुष अपने आपको आपसे अभिन्न अनुभव करता है अर्थात् जो सोचता है कि-‘‘भगवन्! जैसी विशुद्ध आत्मा आपकी है निश्चय नय से हमारी आत्मा भी वैसी ही आपके समान विशुद्ध है किन्तु वर्तमान में कर्मोदय से अशुद्ध हो रही है। यदि मैं भी आपके रास्ते पर चलने का प्रयत्न करूँ तो मेरी आत्मा भी शुद्ध हो जायेगी’’। ऐसा सोचकर जो शुद्ध होने का प्रयत्न करता है वह आपके ही समान शुद्ध हो जाता है। जैसे कि यह अमृत है, इस प्रकार निरन्तर चिन्तन किया गया पानी मन्त्रादि के संयोग से अमृतरूप हो जाता है और विष के विकार को दूर करने लगता है।


सर्वमान्य वीतराग जिन


त्वामेव वीत - तमसं परवादिनोऽपि,
नूनं विभो! हरिहरादिधिया प्रपन्नाः।
किं काच-कामलिभिरीश! सितोऽपि शङ्खो,
नो गृह्यते विविध-वर्ण-विपर्ययेण॥१८॥

अर्थ: हे भगवन्! जिस तरह पीले चश्मावाला अथवा पीलिया रोग वाला मनुष्य सफेद शंख को पीला समझकर ग्रहण करता है उसीतरह मिथ्यात्व के उदय से अन्य मतावलम्बी पुरुष आपको विष्णु, महेश्वर आदि मानकर पूजते हैं।


अशोक प्रातिहार्य


धर्मोपदेश - समये सविधानु - भावा-,
दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोकः।
अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि।
किं वा विबोध-मुपयाति न जीवलोकः॥१९॥

अर्थ: इस श्लोक में अशोक शब्द के दो अर्थ हैं एक अशोक वृक्ष और दूसरा शोक रहित। इसी तरह विबोध शब्द के भी दो अर्थ हैं एक विशेष ज्ञान और दूसरा हरा भरा तथा प्रफुल्लित होना। हे भगवन् ! जब आपके पास मे रहने वाला वृक्ष भी अशोक हो जाता है तब आपके पास रहने वाला मनुष्य अशोक अर्थात् शोक रहित हो जावे इसमें क्या आश्चर्य है? यह ‘अशोक वृक्ष’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


पुष्प वृष्टि प्रातिहार्य


चित्रं विभो! कथमवाङ्मुख - वृत्तमेव।
विष्वक् पतत्य-विरला सुर-पुष्प-वृष्टिः॥
त्वद्गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश!
गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि॥२०॥

अर्थ: इस श्लोक में सुमनस् शब्द के दो अर्थ हैं-एक फूल और दूसरा विद्वान् या देव। इसी तरह बन्धन शब्द के भी दो अर्थ हैं-एक फूलों का बन्धन डंठल और दूसरा कर्मों के प्रकृति आदि चार तरह के बन्ध। हे भगवन्! जो आपके पास रहता है उसके कर्मों के बन्धन नीचे चले जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं। इसलिए तो आपके ऊपर जो फूलों की वर्षा होती है उनमें फूलों के बन्धन नीचे होते हैं और पांखुरी ऊपर। यह ‘पुष्पवृष्टि’ प्रातिहार्य वर्णन है।


दिव्यध्वनि प्रातिहार्य


स्थाने गभीर - हृदयोदधि - सम्भवायाः,
पीयूषतां तव गिरः समुदीरयन्ति।
पीत्वा यतः परम - सम्मद - सङ्ग - भाजो,
भव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरा-मरत्वम्॥२१॥

अर्थ: लोक में प्रचलित है कि अमृत गहरे समुद्र से निकला था और उसका पान करने से देव लोग अत्यन्त आनन्दित होते हुए अजर=बुढ़ापा रहित तथा अमर=मृत्युरहित हो गये थे। भगवन्! आपकी वाणी भी आपके गंभीर हृदयरूपी समुद्र से पैदा हुई है और उसके सेवन करने से लोक परम सुखी हो अजर-अमर हो जाते हैं-मुक्त हो जाते हैं ऐसी हालत में लोग यदि यह कहें कि आपकी वाणी अमृत है तो ठीक ही कहते हैं। यह ‘दिव्यध्वनि’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


चँवर प्रातिहार्य


स्वामिन्! सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो,
मन्ये वदन्ति शुचयः सुरचामरौघाः।
येऽस्मै नतिं विदधते मुनिपुङ्गवाय,
ते नून मूर्ध्वगतयः खलु शुद्धभावाः॥२२॥

अर्थ: हे भगवन्! जब देवलोग आप पर चँवर ढोरते हैं तब वे चँवर पहले नीचे की ओर झुकते हैं और बाद में ऊपर को जाते हैं, सो मानों लोगों से यह कहते हैं कि भगवान् को झुककर नमस्कार करने वाले पुरुष हमारे समान ही ऊपर को जाते हैं अर्थात् स्वर्ग मोक्ष को पाते हैं। यह ‘चँवर’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


सिंहासन प्रातिहार्य


श्यामं गभीर - गिर - मुज्ज्वल - हेमरत्न-
सिंहासनस्थमिह भव्य - शिखण्डिनस्त्वाम्।
आलोकयन्ति रभसेन नदन्त - मुच्चैश्-,
चामीकराद्रि-शिरसीव नवाम्बुवाहम्॥२३॥

अर्थ: हे प्रभो! जिस तरह सुवर्णमय मेरुपर्वत उमड़ते-घुमड़ते हुए गर्जना करने वाले काले मेघ को देखकर मयूरों को बहुत ही आनन्द होता है उसी तरह दिव्यध्वनि करते हुए तथा सोने के सिंहासन पर विराजमान श्यामवर्ण वाले आपके दर्शन कर भव्य जीवों को अत्यन्त आनन्द होता है। उनका मन मयूर की तरह नाचने लगता है। यह ‘सिंहासन’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


भामण्डल प्रातिहार्य


उद्गच्छता तव शिति - द्युति - मण्डलेन,
लुप्तच्छदच्छवि - रशोक - तरुर्बभूव।
सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग!,
नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि॥२४॥

अर्थ: हे भगवन्! आपकी श्यामल कान्ति के संसर्ग से अशोक वृक्ष की लालिमा दब गई सो ठीक ही है, वीतराग (ललाई रहित, दूसरे पक्ष में स्नेहरहित) के सामीप्य से कौन सचेतन-प्राणी वीतराग (ललाई रहित, दूसरे पक्ष में स्नेह रहित) नहीं हो जाता? अर्थात् सभी हो जाते हैं। इस श्लोक में रागपद दो अर्थ वाला है-अनुराग-प्रेम-स्नेह और दूसरा लालिमा-ललाई। यह ‘भामण्डल’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


दुन्दुभि प्रातिहार्य


भो भोः प्रमाद-मवधूय भजध्वमेन-,
मागत्य निर्वृतिपुरीं प्रति सार्थवाहम्।
एतन् निवेदयति देव! जगत्त्रयाय,
मन्ये नदन्नभिनभः सुर दुन्दुभिस्ते॥२५॥

अर्थ: हे प्रभो! आकाश में जो देवों का नगाड़ा बज रहा है वह मानों तीन लोक के जीवों को चिल्ला-चिल्ला कर सचेत कर रहा है कि जो मोक्षनगरी की यात्रा के लिए जाना चाहते हैं वे प्रमाद छोड़कर भगवान् पार्श्वनाथ की सेवा करें। यह ‘दुन्दुभि’ प्रातिहार्य का वर्णन है।


छत्रत्रय प्रातिहार्य


उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!
तारान्वितो विधुरयं विहताधिकारः।
मुक्ता - कलाप - कलितोल्लसितातपत्र-,
व्याजात्त्रिधा धृततनुर्ध्रुवमभ्युपेतः॥२६॥

अर्थ: हे प्रभो! जब आपने अपनी कांति वा ज्ञान से तीनों लोकों को प्रकाशित कर दिया तब मानों चन्द्रमा का प्रकाश करने रूप अधिकार छीन लिया गया। इसलिए वह तीन छत्र का वेष धरकर आपकी सेवा में अपना अधिकार वापस चाहने के लिए उपस्थित हुआ है। छत्रों में जो मोती लगे हुए हैं वे मानों चन्द्रमा के परिवारस्वरूप तारागण हैं। यह ‘छत्रत्रय’ प्रतिहार्य का वर्णन है।


समवसरण में तीन प्रकोट


स्वेन प्रपूरित - जगत्त्रयपिण्डितेन,
कान्ति - प्रताप-यशसामिव सञ्चयेन।
माणिक्य हेम-रजत - प्रविनिर्मितेन,
सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि॥२७॥

अर्थ: हे भगवन्! समवसरण भूमि में जो आपके चारों ओर माणिक्य सुवर्ण और चाँदी के बने हुए तीन कोट हैं वे मानों आपकी कांति प्रताप और यश का वह समूह है जो कि तीनों जगत् में फैला हुआ है।


इन्द्रों द्वारा वन्दनीय


दिव्यस्रजो जिन! नमत्त्रिदशाधि पाना-
मुत्सृज्य रत्नरचितानपि मौलिबन्धान्।
पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वा परत्र,
त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव॥२८॥

अर्थ: श्लोक में आये हुए सुमनस् शब्द के दो अर्थ हैं-एक पुष्प और दूसरा विद्वान् पुरुष। हे भगवन्! नमस्कार करते समय देवों के मुकुटों में लगी हुई फूलों की मालाएँ जो आपके चरणों में गिर जाती हैं सो मानों वे पुष्पमालाएँ आपसे इतना अधिक प्रेम करती हैं कि उनके पीछे देवों के रत्नों से बने हुए मुकुटों को भी छोड़ देती हैं। सुमनस=फूलों का (दूसरे पक्ष में-विद्वानों का) आप में अगाध प्रेम होना उचित ही है। श्लोक का तात्पर्य यह है कि आपके लिए बड़े इन्द्र भी नमस्कार करते हैं।


त्वं नाथ! जन्मजलधेर्विपराङ्मुखोऽपि,
यत्तारयस्यसुमतो निजपृष्ठलग्नान्।
युक्तं हि पार्थिवनृपस्य सतस्तवैव,
चित्रं विभो! यदसि कर्मविपाकशन्यः॥२९॥

अर्थ: जिस तरह घड़ा पानी में अधोमुख होकर अपनी पीठ पर स्थित लोगों को नदी आदि से पार कर देता है, उसी तरह आप यद्यपि राग न होने से संसार-समुद्र से पराङ्मुख रहते हैं तथापि अपने अनुयायियों को उससे पार लगा देते हैं-मोक्ष प्राप्त करा देते हैं। पर जब घड़ा अग्नि से पकाया हुआ हो तभी पानी में तैर कर दूसरों को पार करता है। कच्चा घड़ा पानी में गल कर घुल जाता है, किन्तु आप पाक रहित हो यह आश्चर्य की बात है। उसका परिहार यह है कि आप कर्मों के उदय से रहित हैं। श्लोक में आये हुए विपाक शब्द के दो अर्थ हैं-अग्नि से किसी कोमल मिट्टी की वस्तु का कठोर होना और कर्मों का उदय आना।


विरोधाभास गुण स्तुति


विश्वेश्वरोऽपि जनपालक! दुर्गतस्त्वम्,
किं वाक्षरप्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश!।
अज्ञान - वत्यपि सदैव कथञ्चिदेव,
ज्ञानं त्वयि स्फुरति विश्वविकासहेतुः॥३०॥

अर्थ: इस श्लोक में विरोधाभास अलंकार है। विरोधाभास अलंकार में शब्द के सुनते समय तो विरोध मालूम होता है पर अर्थ विचारने पर बाद में उसका परिहार हो जाता है। जहाँ इस अलंकार का मूल श्लेष होता है वहाँ बहुत ही अधिक चमत्कार पैदा हो जाता है। देखिये-भगवन् ! आप विश्वेश्वर होकर भी दुर्गत हैं। यह पूरा विरोध है। भला, जो (जगत् का ईश्वर है वह दरिद्र कैसे हो सक्ता है? विश्वेश्वर होकर भी दुर्गत=कठिनाई से जाने जा सकते हैं। इसी तरह आप अक्षर प्रकृति-अक्षर स्वभाव वाले होकर भी अलिपि लिखे नहीं जा सकते यह विरोध है। जो क ख आदि अक्षरों जैसा है वह लिखा क्यों न जायेगा?) परन्तु दोनों शब्दों का श्लेष विरोध को दूर कर देता है। आप अक्षर प्रकृति-अविनश्वर स्वभाववाले होकर भी अलिपि=आकार रहित हैं-निराकार हैं। इसी प्रकार अज्ञानवति अपि अज्ञान युक्त होने पर भी आपमें विश्वविकाशि ज्ञानं स्फुरति संसार के सब पदार्थों को जानने वाला ज्ञान स्फुरायमान होता है, यह विरोध है। जो अज्ञानयुक्त है उसमें पदार्थों का ज्ञान कैसा? पर इसका भी नीचे लिखे अनुसार परिहार हो जाता है-अज्ञान अवति अपि त्वयि-अज्ञानी मनुष्यों की रक्षा करने वाले आप में हमेशा केवलज्ञान जगमगाता रहता है।


उपसर्ग विजेता पार्श्वनाथ


प्राग्भार-सम्भृत-नभांसि रजांसि रोषा-,
दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि।
छायापि तैस्तव न नाथ! हता हताशो,
ग्रस्तस्त्वमीभिरयमेव परं दुरात्मा॥३१॥

अर्थ: जब भगवान् पार्श्वनाथ तपस्या कर रहे थे तब उनके पूर्वभव के वैरी कमठ के जीव ने उन पर धूल उड़ाकर भारी उपसर्ग किया था। लोक में यह देखा जाता है कि जो सूर्य पर धूल फेंकता है उससे सूर्य की जरा भी कान्ति नष्ट नहीं होती, पर वही धूली फेंकने वाले के ऊपर गिरती है। श्लोक में आये हुए रज शब्द के दो अर्थ हैं-एक धूलि, दूसरा कर्म। कमठ के जीव ने भगवान् पर उपसर्ग कर कर्मों का बन्ध किया था इस बात को कवि ने लोक-प्रचलित उक्त उदाहरण से स्पष्ट किया है।


यद्गर्जदूर्जित - घनौघ - मदभ्रभीम्,
भ्रश्यत्तडिन्मुसल - मांसल - घोरधारम्॥
दैत्येन मुक्तमथ दुस्तरवारि दध्रे,
तेनैव तस्य जिन! दुस्तरवारिकृत्यम्॥३२॥

अर्थ: हे भगवन् ! आप पर मूसलधार पानी वर्षाकर कमठ के जीव ने जो उपसर्ग किया था उससे आपका क्या बिगड़ा? परंतु उसी ने अपने लिए ‘दुस्तरवारिकृत्यं’ दुष्ट तलवार का कार्य अर्थात् घाव कर लिया-ऐसे कर्मों का बन्ध किया जो तलवार के घाव के समान दुःखदायी हुए थे। श्लोक में ‘दुस्तरवारि’ शब्द दो बार आया है उनमें से पहले का अर्थ कठिनाई से तरने योग्य जल है और दूसरे का अर्थ दुष्ट तरवारि-तलवार है।


भूत पिशाचों के द्वारा उपसर्ग


ध्वस्तोर्ध्व-केश-विकृताकृति-मर्त्य-मुण्ड-
प्रालम्बभृद्भयद - वक्त्र - विनिर्यदग्निः।
प्रेतव्रजः प्रति भवन्तमपीरितो यः,
सोऽस्याभवत्प्रतिभवं भवदुःखहेतुः॥३३॥

अर्थ: हे भगवन्! कमठ के जीव ने आपको तपस्या से विचलित करने के लिए जो पिशाच दौड़ाये थे उनसे आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं हुआ परंतु उस पिशाच को ही भारी कर्म-बंध हुआ जिससे उसे अनेक भवों में दुःख उठाने पड़े।


धन्यास्त एव भुवनाधिप! ये त्रिसन्ध्य-
माराधयन्ति विधिवद् विधुतान्य-कृत्याः।
भक्त्योल्लसत्पुलक - पक्ष्मल - देह - देशाः,
पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाजः॥३४॥

अर्थ: हे भगवन्! संसार में उन्हीं का जन्म सफल है जो भक्तिपूर्वक आपके चरणों की आराधना करते हैं।


अस्मिन्नपार - भव - वारि - निधौ मुनीश!,
मन्ये न मे श्रवण - गोचरतां गतोऽसि।
आकर्णिते तु तव गोत्र - पवित्र - मन्त्रे,
किं वा विपद्-विषधरी सविधं समेति॥३५॥

अर्थ: हे प्रभो! जो मैं संसार में अनेक दुःख उठा रहा हूँ उससे विश्वास होता है कि मैंने कभी भी आपका पवित्र नाम नहीं सुना।


जन्मान्तरेऽपि तव पादयुगं न देव!,
मन्ये मया महितमीहित - दान - दक्षम्।
तेनेह जन्मनि मुनीश! पराभवानां,
जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम्॥३६॥

अर्थ: हे भगवन्! जो मैं तरह तरह के तिरस्कारों का पात्र हो रहा हूँ उससे स्पष्ट पता चलता है कि मैंने आपके चरणों की पूजा नहीं की। क्योंकि आपके चरणों के पुजारियों का कभी किसी जगह भी तिरस्कार नहीं होता।


नूनं न मोह - तिमिरावृतलोचनेन,
पूर्वं विभो! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि।
मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनर्थाः,
प्रोद्यत्प्रबन्ध - गतयः कथमन्यथैते॥३७॥

अर्थ: भगवन्! मैंने मिथ्यात्व के उदय से अन्धे होकर कभी भी आपके दर्शन नहीं किये। यदि दर्शन किये होते तो आज ये दुःख मुझे दुःखी कैसे करते? क्योंकि आपके दर्शन करने वालों को कभी कोई भी अनर्थ दुःख नहीं पहुँचा सकते।


आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि,
नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या।
जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दुःखपात्रं,
यस्मात् क्रियाः प्रतिफलन्ति न भावशून्याः॥३८॥

अर्थ: इससे पहले तीन श्लोकों में कहा गया था कि हे भगवन् ! मैंने ‘‘आपका नाम नहीं सुना’’ ‘‘चरणों की पूजा नहीं की’’ और ‘‘दर्शन नहीं किये’’ इसलिए मैं दुःख उठा रहा हूँ। अब इस श्लोक में पक्षान्तर रूपसे कहते हैं कि मैंने आपका नाम भी सुना, पूजा भी की और दर्शन भी किये, फिर भी दुःख मेरा पिण्ड नहीं छोड़ते उसका कारण सिर्फ यही मालूम होता है कि मैंने भक्तिपूर्वक आपका ध्यान नहीं किया। केवल आडम्बर रूप से ही उन कामों को किया है न कि भावपूर्वक भी। यदि भाव से करता तो कभी दुःख नहीं उठाने पड़ते।


त्वं नाथ! दुःखि-जन-वत्सल! हे शरण्य!
कारुण्य-पुण्य-वसते! वशिनां वरेण्य!।
भक्त्या नते मयि महेश! दयां विधाय,
दुःखाङ्कुरोद्दलन-तत्परतां विधेहि॥३९॥

अर्थ: आप शरणागत प्रतिपालक है, दयालु हैं और समर्थ भी हैं। इसलिए आपसे विनम्र प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरे दुःखों को दूर करने के लिए तत्पर होइये।


निःसंख्य - सार - शरणं शरणं शरण्य-,
मासाद्य सादित - रिपुः प्रथिता वदानम्!
त्वत्पाद - पङ्कजमपि प्रणिधान - वन्ध्यो,
वन्ध्योऽस्मि चेद्भुवन-पावन! हा हतोऽस्मि॥४०॥

अर्थ: हे भगवन्! आपके पवित्र और दयालु चरणों को पाकर भी जो मैं उनका ध्यान नहीं कर रहा हूँ उससे मेरा जन्म निष्फल जा रहा है और मैं कर्मों के द्वारा दुःखी किया जा रहा हूँ।


देवेन्द्रवंद्य! विदिताखिल - वस्तुसार!
संसारतारक! विभो! भुवनाधिनाथ!।
त्रायस्व देव! करुणा-ह्रद! मां पुनीहि,
सीदन्त-मद्य भयद-व्यसनाम्वुराशेः॥४१॥

अर्थ: हे भगवन्! आप हरएक तरह से समर्थ हैं इसलिए आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे इस दुःख-समुद्र में डूबने से बचाइये और हमेशा के लिए कर्म-मैल से रहित कर दीजिये।


यद्यस्ति नाथ! भवदङ्घ्रि - सरोरुहाणां,
भक्तेः फलं किमपि सन्तत - सञ्चितायाः।
तन्मे त्वदेक-शरणस्य शरण्य! भूयाः,
स्वामी! त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि॥४२॥

अर्थ: हे भगवन्! स्तुति कर मैं आपसे अन्य किसी फलकी चाह नहीं रखता। सिर्फ यह चाहता हूँ कि आप ही मेरे हमेशा स्वामी रहें। अर्थात् जब तक मुझे मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ है तब तक आप ही मेरे स्वामी रहें। ‘‘तुम होहु भवभव स्वामि मेरे, मैं सदा सेवक रहूँ’’।


भक्ति की विधि


इत्थं समाहित - धियो विधिवज्जनेन्द्र !
सान्द्रोल्लसत्पुलक-कञ्चुकिताङ्ग - भागाः।
त्वद्विम्ब - निर्मल-मुखाम्बुज - बद्धलक्ष्याः,
ये संस्तवं तव विभो! रचयन्ति भव्याः॥४३॥


भक्ति का फल स्वर्ग मोक्षसंपद


जननयनकुमुदचन्द्र! प्रभास्वराः स्वर्गसम्पदो भुक्त्वा।
ते विगलित-मल-निचया अचिरात् मोक्षं प्रपद्यन्ते ॥४४॥

अर्थ: हे भगवन्! जो भक्ति से गद्गद चित्त हो आपकी स्तुति करते हैं वे स्वर्ग के सुख भोग बहुत जल्दी आठ कर्मों का नाश कर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। “स्वर्गन के सुख भोगकर, पावे मोक्ष निदान।”

श्रीमद्वादिराजसूरि कृत एकीभावस्तोत्रम्

एकीभावं गत इव मया यः स्वयं कर्मबन्धो
घोरं दुःखं भवभवगतो दुर्निवारः करोति।
तस्याप्यस्य त्वयि जिनरवे भक्तिरुन्मुक्तये चेत्
जेतुं शक्यो भवति न तया कोऽपरस्तापहेतुः॥१॥

अर्थ: हे भगवन्! जब आपकी भक्ति से भव भव में दुःख देने वाला कर्मबन्ध भी दूर हो जाता है अर्थात् मोक्ष प्राप्त हो जाता है तब उससे दूसरे शारीरिक सन्ताप के कारण दूर हो जावें इसमें आश्चर्य ही क्या है।


ज्योतीरूपं दुरितनिवहध्वान्तविध्वन्सहेतुं
त्वामेवाहुर्जिनवर! चिरं तत्त्व-विद्याभियुक्ताः।
चेतोवासे भवसि च मम स्फारमुद्भासमान-
स्तस्मिन्नंहः कथमिव तमो वस्तुतो वस्तुमीष्टे॥२॥

अर्थ: हे भगवन्! जो आपका ध्यान करता है, उसके सब पाप उस तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह कि दीपक के प्रकाश से अन्धकार।


आनन्दाश्रु-स्नपितवदनं गद्गदं चाभिजल्पन्
यश्चायेत त्वयि दृढमनाः स्तोत्रमन्त्रैर्भवन्तम्।
तस्याभ्यस्तादपि च सुचिरं देहवल्मीकमध्यान्-
निष्कास्यन्ते विविध-विषमव्याधयः काद्रवेयाः॥३॥

अर्थ: हे भगवन्! जो मनुष्य शुद्ध चित्त से आपकी स्तुति करता है उसके समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं।


प्रागेवेह त्रिदिवभवनादेष्यता भव्यपुण्यात्-
पृथ्वीचक्रं कनकमयतां देव! निन्येत्वयेदम्।
ध्यानद्वारं ममरुचिकरं स्वान्तगेहं प्रविष्टस्-
तत्किं चित्रं जिन! वपुरिदं यत्सुवर्णी-करोषि॥४॥

अर्थ: “यह कथा प्रसिद्ध है कि इस स्तोत्र के बनाने वाले वादिराज मुनि को कोढ़ हो गया था, उनका सारा शरीर कोढ़ से गल रहा था। उन्होंने ज्यों ही एकीभाव स्तोत्र रचकर पढ़ना शुरू किया त्यों ही उनका कोढ़ कम होने लगा और जब तक उन्होंने इस श्लोक को बनाकर पूर्ण किया तब तक उनका सब कोढ़ दूर हो गया और शरीर सोने की तरह चमकने लगा।’’ इसी बात को मुनिराज ने लक्ष्य कर कहा है कि-जब आप स्वर्गलोक से भूलोक पर आने के लिए छह माह बाकी थे तभी आपके प्रभाव से यह समस्त पृथ्वी सोने जैसी सुन्दर हो गई थी। फिर अब तो आप हमारे मन मन्दिर में प्रविष्ट हो चुके हैं। इसलिए यदि यह शरीर सुन्दर अथवा सुवर्ण का हो जावे तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है। सुवर्ण शब्द के दो अर्थ हैं-एक सुन्दर और दूसरा सोना।


लोकस्यैकस्त्वमसि भगवन्! निर्निमित्तेन बन्धुस्-
त्वय्येवासौ सकलविषया शक्तिरप्रत्यनीका।
भक्तिस्फीतां चिरमधिवसन्मामिकां चित्तशय्यां
मय्युत्पन्नं कथमिव ततः क्लेशयूथं सहेथाः॥५॥

अर्थ: भगवान् आप भाई की तरह स्वार्थ रहित होकर संसार का कल्याण करते हैं और आप में कल्याण करने की शक्ति भी मौजूद है। इतना सब कुछ होने पर भी मैं बहुत समय से आपका ध्यान कर रहा हूँ। फिर भी क्या आप हमारे दुःखों को देखते हुए भी नष्ट नहीं करेंगे? अवश्य करेंगे।


नयकथारूपी अमृतवापी


जन्माटव्यां कथमपि मया देव! दीर्घं भ्रमित्वा,
प्राप्तैवेयं तव नयकथा स्फारपीयूषवापी।
तस्या मध्ये हिमकर-हिमव्यूहशीतेनितान्तं,
निर्मग्नं मां न जहति कथं दुःख-दावोपतापाः ॥६॥

अर्थ: हे भगवन्! जो मनुष्य आपके नयवाद को अच्छी तरह समझकर उसके अनुसार प्रवृत्ति करता है उसके सब दुःख उस तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह कि बावड़ी के ठण्डे जल में डूबे हुए मनुष्य को दावानल की गर्मी।


कल्याणकारक : प्रभु स्पर्श


पादन्‍यासादपि च पुनतो यात्रया ते त्रिलोकीं,
हेमाभासो भवति सुरभिः श्रीनिवासश्च पद्मः ।
सर्वाङ्गेण स्पृशति भगवंस्त्वय्यशेषं मनो मे,
श्रेयः किं तत्स्वयमहरहर्यन्नमामभ्युपैति॥७॥

अर्थ: कवि लोग कमल को ‘लक्ष्मी का घर है’ ऐसा वर्णन करते हैं। कमल सुगन्धित भी होता है और कोई कोई पीला कमल सुवर्ण के समान सुन्दर भी। जब केवली भगवान् का विहार होता है तब देवलोग उनके चरणोंके नीचे कमल बना देते हैं। यहाँ कवि का यह विश्वास है कि कमल को जो सोने जैसा सुन्दर रूप, सुगन्धि और लक्ष्मी का घर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है सो वह आपके चरणों के निक्षेप मात्र से ही हुआ है। भगवन्! जब आपके चरण-निक्षेप में इतनी शक्ति है तब आप तो हमारे हृदय-कमल को सब तरफ से छू रहे हैं। ऐसी हालत में मुझे तरह तरह के कल्याण प्राप्त हों तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। श्लोक का सारांश यह है कि जो आपका ध्यान करता है उसे सब कल्याण प्राप्त होते हैं।


वचनरूपी अमृत


पश्यन्तं त्वद्वचनममृतं भक्तिपात्र्या पिबन्तं,
कर्मारण्यात्-पुरुष-मसमानन्दधाम प्रविष्टम्।
त्वां दुर्वारस्मरमदहरं त्वत्प्रसादैक भूमिं-,
क्रूराकाराः कथमिव रुजाकण्टका निर्लुठन्ति॥८॥

अर्थ: हे भगवन्! जो आपका दर्शन करते हैं वे और अमृत के समान सुख देने वाले आपके उपदेश को सुनते हैं उनके सब कर्म नष्ट हो जाते हैं, वे सुखमय मोक्षस्थान को पा लेते हैं और उन्हें रोग रूपी कांटे नहीं सताते। ठीक भी है-जो कटीली झाड़ियों से भरे हुए जङ्गल में प्यास से पीड़ित हो जहाँ तहाँ घूमता है उसे ही कांटे लगते हैं, पर जो ठण्डा पानी पीता हुआ अच्छे घरमें निवास करता है उसे कांटे क्यों लगेंगे।


अपूर्व शक्ति प्रदाता


पाषाणात्मा तदितरसमः केवलं रत्नमूर्ति-
र्मानस्तम्भो भवति च परस्तादृशो रत्नवर्गः।
दृष्टि-प्राप्तो हरति स कथं मानरोगं नराणां,
प्रत्यासत्तिर्यदि न भवतस्तस्य तच्छक्तिहेतुः ॥९॥

अर्थ: समवसरण की चारों दिशाओं में चार रत्नमयी स्तम्भ होते हैं उन्हें मानस्तम्भ कहते हैं। उन्हें देखते ही दर्शकों का अभिमान नष्ट हो जाता है। आचार्य कहते हैं कि मानस्तम्भ अन्य स्तम्भों की तरह ही पत्थर का बना हुआ है। यदि उसमें यह विशेषता मानी जावे कि वह रत्नों का बना होता है तो वह भी ठीक नहीं क्योंकि अन्य रत्नों की राशि भी तो रत्नों से बनी रहती है। फिर वह निगाह के सामने आते ही मनुष्यों के मान क्यों हर लेता है? भगवन्! उसका कारण सिर्फ आपकी समीपता ही है। आपके समीप में रह कर ही वह मानहरण रूप विशाल कार्य को कर लेता है। लोक में भी देखा जाता है कि महापुरुषों के साथ होने से लघु मनुष्य भी भारी काम कर लेते हैं।


सर्वोपकारी शक्ति


हृद्यः प्राप्तो मरुदपि भवन्मूर्तिशैलोपवाही,
सद्यः पुंसां निरवधिरुजा धूलिबन्धं धुनोति।
ध्यानाहूतो हृदयकमलं यस्य तु त्वं प्रविष्टस्-
तस्याशक्यः क इह भुवने देव! लोकोपकारः॥१०॥

अर्थ: हे भगवन्! जब आपके शरीर के पास बहने वाली हवा भी मनुष्यों के रोगों को दूर कर देती है तब आप साक्षात् जिसके हृदय में मौजूद हैं उसके सब रोग नष्ट होकर उसे तरह तरह के कल्याण प्राप्त हों इसमें क्या आश्चर्य है?।


जानासि त्वं मम भव-भवे यच्च यादृक्च दुःखं,
जातं यस्य स्मरणमपि मे शस्त्रवन्निष्पिनष्टि।
त्वं सर्वेशः सकृप इति च त्वामुपेतोऽस्मि भक्त्या,
यत्कर्तव्यं तदिह विषये देव एव प्रमाणम्॥११॥

अर्थ: हे भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं इसलिए हमारे भव-भव के दुःखों को जानते हैं, आप सबके ईश्वर हैं इसलिए आप में हमारे दुःख दूर करने की सामर्थ्य है और आप दया सहित हैं, इसलिए आपको हमारे दुःखों पर दया भी आती है, यह सब विचारकर मैं आपकी शरण में आया हूँ। शरण में आये हुए सेवक के प्रति स्वामी का क्या कर्त्तव्य है आप ही सोच लीजिये अर्थात् हमारे दुःखों को दूर कर दीजिये।


प्रापद्दैवं तव नुतिपदैर्जीवकेनोपदिष्टैः,
पापाचारी मरणसमये सारमेयोऽपि सौख्यम्।
कः सन्देहो यदुपलभते वासवश्रीप्रभुत्वं,
जल्पन् जाप्यैर्मणिभिरमलैस्त्वन्नमस्कारचक्रम्॥१२॥

अर्थ: जीवन्धर राजपुरी नगरी के राजा सत्यन्धर के पुत्र थे। इनके उत्पन्न होने के दिन ही प्रधानमन्त्री काष्ठांगार ने कपट से राजा सत्यन्धर को मार डाला था और इनकी माता विजया दण्डकवन में तपस्वियों के आश्रम में चली गई थी इसलिए इनका पालनपोषण राजपुरी नगरी के श्रेष्ठ वैश्य गन्धोत्कट के घर हुआ था। वह इन्हें अपना पुत्र समझकर बड़े लाड़-प्यार से इनका पालन करता था। जब ये बड़े हुए तब इनका गरुड़ वेग विद्याधर की पुत्री गन्धर्वदत्ता के साथ विवाह हो गया। एक दिन ये अपने मित्रों के साथ बसन्तऋतु की शोभा देखने के लिए वन में जा रहे थे कि वहाँ अचानक इनकी दृष्टि एक कराहते हुए कुत्ते पर पड़ी। उस कुत्ते को कुछ ब्राह्मणों ने साकल्य-हवन सामग्री को जूठा कर देने के अपराध में बुरी तरह पीटकर घायल कर दिया था। जीवन्धरकुमार के लिए जब कुत्ते के जीवित रखने की आशा न रही तब उन्होंने उसे णमोकार मन्त्र सुनाना प्रारम्भ किया। कुत्ते की होनहार अच्छी थी, इसलिए वह मन्त्र के प्रभाव से मरकर चन्द्रोदय पर्वत पर यक्ष जाति के देवों का इन्द्र हुआ उसका नाम सुदर्शन था। प्रस्तुत कहानी का यह भाव है कि आपकी स्तुति के थोड़े से अक्षरों का मृत्यु समय श्रवण करने मात्र से जब महापापी कुत्ता भी देव हो सकता है तब जो निरन्तर भावपूर्वक आपका स्तवन करेगा, मणियों की माला से आपके नाम की जाप करेगा, वह यदि स्वर्ग में इन्द्र हो जावे तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?।


शुद्धे ज्ञाने शुचिनि चरिते सत्यपि त्वय्यनीचा,
भक्तिर्नो चेदनवधि-सुखावाप्तिका कुञ्चिकेयम्।
शक्योद्घाटं भवति हि कथं मुक्ति-कामस्य पुंसो-
मुक्तिद्वारं परिदृढ-महामोह-मुद्रा-कवाटम्॥१३॥

अर्थ: भगवन्! आपकी भक्ति ही तो सम्यग्दर्शन है जो कि अनन्त सुखों का कारण है और मुक्तिमन्दिर के द्वार पर लगे हुए मिथ्यात्व रूपी ताले को खोलने के लिए कुंजी-चाबी की तरह है। जब-तक यह भक्तिरूप सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं होता तब तक ज्ञान और चारित्र के रहते हुए भी मोक्ष प्राप्त नहीं किया जा सकता।


आपकी मोक्षमार्ग प्रदर्शक : भारती


प्रच्छन्नः खल्वय-मघ-मयै-रन्धकारैः समन्तात्-
पन्था मुक्तेः स्थपुटित-पदः क्लेश-गर्तैरगाधैः।
तत्कस्तेन व्रजति सुखतो देव! तत्त्वावभासी,
यद्यग्रेऽग्रे न भवति भवद्-भारतीरत्न-दीपः॥१४॥

अर्थ: जिस मार्ग में खूब अँधेरा हो और गहरे गड्ढों से जहाँ ऊँची नीची जमीन हो उस मार्ग में जैसे कोई दीपक की सहायता के बिना सुखपूर्वक नहीं जा सकता इसी तरह मुक्ति के दुर्गम मार्ग में भी आपकी दिव्य ध्वनि रूपी दीपक की सहायता के बिना कोई सुख से नहीं जा सकता। श्लोक का सार यह है कि मोक्ष की प्राप्ति आपके उपदेश से ही हो सकती है।


आत्मज्योति - र्निधि - रनवधि - द्रष्टुरानन्दहेतुः
कर्मक्षोणीपटलपिहितो योऽनवाप्यः परेषाम् ।
हस्ते कुर्वन्त्यनतिचिरतस्तं भवद्भक्तिभाजः
स्तोत्रैर्बन्ध-प्रकृति-परुषोद्दाम-धात्री-खनित्रैः ॥१५॥

अर्थ: जैसे जमीन में गढ़ा हुआ धन कुदाली के बिना प्राप्त नहीं हो सकता, उसी तरह कर्मरूपी परदे के भीतर छुपा हुआ आत्मज्ञान आपके स्तोत्रों के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। जब आपकी स्तुति से कर्मों का पटल क्षीण होगा, तभी आत्मज्ञान प्राप्त हो सकता है, अन्य प्रकार से नहीं।


प्रत्युत्पन्ना नय-हिमगिरेरायता चामृताब्धेः,
या देव त्वत्पद-कमलयोः सङ्गता भक्ति-गङ्गा।
चेतस्तस्यां मम रुचि-वशादाप्लुतं क्षालितांहः
कल्मषं यद् भवति किमिदं देव! सन्देहभूमिः॥१६॥

अर्थ: गंगा नदी हिमालय पर्वत से प्रकट हुई है और समुद्र पर्यन्त लम्बी है तथा अन्य मत के पुराणों में प्रचलित है कि वह विष्णु के चरणों में भी आकर मिली थी। गंगा नदी में स्नान करने से मनुष्य शुद्ध हो जाता है-उसके सब पाप धुल जाते हैं यह भी अन्य मत में प्रसिद्ध है। कवि ने इस अन्य मत प्रसिद्ध बात को यहाँ रूपक अलंकार से वर्णन किया है। भगवन्! मेरी जो आपमें भक्ति पैदा हुई है वह आपके सुन्दर अनेकांतरूप नय को देखकर ही हुई है और वह भक्ति तब तक रहेगी जब तक अमृत-मोक्ष की प्राप्ति न हो जायेगी तथा वह भक्ति हमेशा आपके चरण-कमलों में रहती है। इस तरह नयरूप हिमालय से निकली और मोक्षरूप समुद्र तक लम्बी तथा आपके चरणों में आश्रय पाने वाली भक्तिरूप गंगा नदी में नहाने वाला मेरा मन सब पापरूप मैल को धोकर यदि शुद्ध हो जावे तो इसमें क्या सन्देह है? श्लोक का सार यह है कि चित्त की शुद्धि आपकी भक्ति से ही होती है।


अभिमत फल प्रदाता


प्रादुर्भूत-स्थिर- पद -सुखं! त्वामनुध्यायतो मे
त्वय्येवाहं स इति मतिरुत्पद्यते निर्विकल्पा।
मिथ्यैवेयं तदपि तनुते तृप्ति-मभ्रेषरूपाम्
दोषात्मानोऽप्यभिमतफलास्त्वत्प्रसादाद् भवन्ति॥१७॥

अर्थ: भगवन्! जब मैं आपका ध्यान करता हूँ तब मै अपने आपको भूल जाता हूँ और यह समझने लगता हूँ कि आप जिस रूप हैं उसी रूप मैं भी हूँ (द्रव्य दृष्टि से) आपमें और मुझमें कुछ भी अन्तर नहीं है। यद्यपि मेरी यह समझ (पर्यायदृष्टि से) झूठ है। क्योंकि आप अविनाशी सुख को प्राप्त हैं और मैं संसार में जन्म मरण के दुःख उठा रहा हूँ। फिर भी वह मुझे आत्मा के स्वभाव का बोधकर अविनाशी सन्तोष प्राप्त करा देती है। अर्थात् मुझे यह जानकर सन्तोष होता है कि मैं भी आपके ही समान अनंत-सुखरूप हूँ। भले ही वर्तमान में दुःख उठा रहा हूँ, किन्तु कारण मिलने पर एक दिन आप जैसा हो सकता हूँ। आपके ध्यान के पहले मुझे अपने असली स्वरूप का पता नहीं था, इसलिए निरन्तर दुखी रहता था। प्रभो! मेरी वह सदोष बुद्धि भी मुझे जो इच्छित फल दे सकी यह आपका ही प्रसाद है।


मिथ्यावादं मल - मपनुदन् - सप्तभङ्गीतरङ्गैः-
वागम्भोधिर्भुवनमखिलं देव ! पर्येति यस्ते ।
तस्यावृत्तिं सपदि विबुधाश्चेतसैवाचलेन,
व्यातन्वन्तः सुचिर-ममृता-सेवया तृप्नुवन्ति ॥१८॥

अर्थ: लोक में प्रसिद्ध है कि एक बार देवों ने मन्दरगिरि को मथानी और शेषनाग को मन्थन नेत्र-कढ़निया बनाकर समुद्र को मथा था। उससे चौदह रत्न निकले थे। उनमें अमृत भी एक रत्न था। देवलोग उस अमृत को पीकर हमेशा के लिए सन्तृप्त हो गये थे। कवि ने इस श्लोक के विबुध, आवृत्ति और अमृत शब्द के श्लेष तथा वचन-समुद्र और चित्त-अचल के रूपक से इसी प्रसिद्ध बात को निरूपण किया है। विबुध के दो अर्थ हैं-देव और विद्वान्। आवृत्ति के दो अर्थ हैं-मन्थन और बारबार अभ्यास। इसी तरह अमृत शब्द के भी दो अर्थ हैं-सुधा और मोक्ष हे भगवन्! जिस तरह देव लोग मन्दरगिरि के द्वारा समुद्र को मथकर अमृतपान करने से सन्तुष्ट हो गये थे, उसी तरह विद्वान् भी अपने मनसे आपके उपदेश का बारबार अभ्यास कर मुक्त हो हमेशा के लिए सन्तुष्ट हो जाते हैं-अनन्त सुख सहित हो जाते हैं।


सर्वांग सुन्दर : प्रभु हमारे


आहार्य्येभ्यः स्पृहयति परं यः स्वभावादहृद्यः,
शस्त्र-ग्राही भवति सततं वैरिणा यश्च शक्यः।
सर्वाङ्गेषु त्वमसि सुभगस्त्वं न शक्यः परेषां,
तत्किं भूषावसनकुसुमैः किञ्च शस्त्रैरुदस्तैः ॥१९॥

अर्थ: संसार के अन्य देवी-देवता, तरह-तरह के आभूषण और कपड़े वगैरह पहिनते हैं तथा कई प्रकार के तीक्ष्ण त्रिशूल, गदा, कृपाण आदि हथियार धारण करते हैं उसका कारण है कि वे स्वभाव से कुरूप हैं और उन्हें शत्रु से भय बना रहता है। पर आपका जन्म से ही अतिशय रूप होता है। आप अत्यन्त सुन्दर हैं और अनन्त बल से सहित तथा द्वेष आदि से रहित होनेके कारण आपको शत्रुओं का डर नहीं है इसलिए आप न गहना पहनते हैं न कपड़े धारण करते हैं और न हथियार ही लिए हैं। श्लोक का सार यह है कि आप वीतराग-रागद्वेष से रहित हैं।


इन्द्रः सेवां तव सुकुरुतां किं तया श्लाघनं ते,
तस्यैवेयं भवलयकरी श्लाघ्यता-मातनोति।
त्वं निस्तारी जनन-जलधेः सिद्धिकान्तापतिस्त्वं,
त्वं लोकानां प्रभुरिति तव श्लाघ्यते स्तोत्रमित्थम् ॥२०॥

अर्थ: भगवन् ! कई मनुष्य आपकी स्तुति करते हैं कि-‘‘आप इन्द्रों के द्वारा सेवनीय हैं’’ सो उनकी यह स्तुति ठीक नहीं है। क्योंकि तुच्छ जीव तो महापुरुषों की सेवा करते ही हैं उसका वर्णन करने से महापुरुषों की प्रशंसा नहीं होती। बल्कि सेवा करने वालों की प्रशंसा होती है कि वे किसी महापुरुष के सेवक हैं। हाँ! इस प्रकार आपका स्तवन किया जा सकता है कि आप जीवों को संसार-समुद्र से तारने वाले हैं, मुक्ति स्त्री के स्वामी है और तीनों लोकों के प्रभु हैं।


वृत्तिर्वाचामपर - सदृशी न त्वमन्येन तुल्यः,
स्तुत्युद्गाराः कथमिव ततः त्वय्यमी नः क्रमन्ते ।
मैवं भूवंस्तदपि भगवन्-भक्ति-पीयूष-पुष्टास्-
ते भव्यानामभिमत-फलाः पारिजाता भवन्ति ॥२१॥

अर्थ: भगवन् ! जब आपके वचन अनुपम हैं और आप स्वयं भी उपमारहित हैं तब ‘‘आपके वचन दीपक के समान हैं, अथवा आप अमुक पदार्थ के समान हैं’’ इस प्रकार की स्तुति आपके विषय में कैसे लागू हो सकती है। परन्तु भक्तिमार्ग में इस बात का विचार नहीं किया जाता। भक्ति के कारण भव्यों के वे मिथ्या उद्गार भी कल्पवृक्ष की तरह मनोवाञ्छित फल देते हैं।


कोपावेशो न तव न तव क्वापि देव! प्रसादो,
व्याप्तं चेतस्तव हि परमोपेक्षयैवानपेक्षम्।
आज्ञावश्यं तदपि भुवनं सन्निधि-वैर-हारी,
क्वैवंभूतं भुवन-तिलक! प्राभवं त्वत्परेषु॥२२॥

अर्थ: भगवन्! आप राग द्वेष दोनों से रहित हैं, आपका चित्त बिलकुल निरपेक्ष है, फिर भी संसार आपकी आज्ञा में चलता है और आपकी समीपता सबके वैर को दूर कर देती है। आप जैसा यह विलक्षण प्रभुत्व संसार के दूसरे प्रभुओं में नहीं पाया जाता। आप अनोखे स्वामी हो।


देव! स्तोतुं त्रिदिवगणिका-मण्डलीगीत-कीर्तिं,
तोतूर्ति त्वां सकल-विषय-ज्ञान-मूर्ति जनो यः।
तस्य क्षेमं न पदमटतो जातु जोहूर्त्ति पन्था-
स्तत्त्वग्रन्थ-स्मरण-विषये नैष मोमूर्त्ति मर्त्यः॥२३॥

अर्थ: हे भगवन्! जो आपकी स्तुति करने के लिए तत्पर होता है उसकी स्वर्ग-मोक्ष यात्रा में कोई बाधा नहीं आती और वह तात्त्विक ग्रन्थों का महान् पण्डित बन जाता है।


चित्ते कुर्वन् निरवधिसुखज्ञानदृग्वीर्यरूपं,
देव! त्वां यः समय - नियमादादरेण स्तवीति।
श्रेयोमार्गं स खलु सुकृति तावता पूरयित्वा,
कल्याणानां भवति विषयः पञ्चधापञ्चितानाम्॥२४॥

अर्थ: जो मनुष्य अनन्त चतुष्टय से शोभायमान आपकी हृदय से स्तुति करता है वह तीर्थंकर होकर गर्भ आदि पाँच कल्याणकों का पात्र होता है।


भक्ति-प्रह्वमहेन्द्र-पूजित-पद! त्वत्कीर्तने न क्षमाः-
सूक्ष्म-ज्ञान-दृशोऽपि संयमभृतः के हन्त मन्दा वयम्।
अस्माभिः स्तवनच्छलेन तु परस्त्वय्यादरस्तन्यते,
स्वात्माधीनसुखैषिणां स खलु नः कल्याण-कल्पद्रुमः॥२५॥

अर्थ: हे भगवन्! जब बड़े-बड़े मुनि भी आपकी स्तुति नहीं कर सकते तब हम मूर्ख कैसे कर सकेंगे? हम तो सिर्फ भक्ति से आप में आदर प्रदर्शित करते हैं और हमारा यह निश्चय भी है कि वह आदर ही हम लोगों के लिए आत्मिक सुख देने के लिए कल्पवृक्ष होगा।


[वादिराजमनु शाब्दिक-लोको, वादिराजमनु तार्किकसिंहः ।
वादिराजमनु काव्यकृतस्ते वादिराजमनु भव्य-सहायः॥]

अर्थ: एकीभाव स्तोत्र के रचयिता वादिराज आचार्य सबसे श्रेष्ठ वैयाकरण, नैयायिक, कवि और सहृदय पुरुष थे।

महाकवि धनञ्जयप्रणीतम् विषापहारस्तोत्रम्

स्वात्मस्थितः सर्वगतः समस्तव्यापारवेदी विनिवृत्तसङ्गः ।
प्रवृद्धकालोप्यजरो वरेण्यः पायादपायात्पुरुषः पुराणः ॥१॥

अर्थ: श्लोक में विरोधाभास अलंकार है। इस अलंकार में सुनते समय विरोध मालूम होता है पर बाद में अर्थ का विचार करने से उसका परिहार हो जाता है। देखिये-जो अपने स्वरूप में स्थित होगा वह सर्वव्यापक कैसे होगा? यह विरोध है, पर उसका परिहार यह है कि पुराण पुरुष आत्म प्रदेशों की अपेक्षा अपने स्वरूप में ही स्थित हैं पर उनका ज्ञान सब जगह के पदार्थों को जानता है। इसलिए ज्ञान की अपेक्षा सर्वगत हैं। जो सम्पूर्ण व्यापारों का जानने वाला है वह परिग्रह रहित कैसे हो सकता है? यह विरोध है। उसका परिहार यह है कि आप सर्व पदार्थों के स्वाभाविक अथवा वैभाविक परिवर्तनों को जानते हुये भी कर्मों के सम्बन्ध से रहित हैं। इसी तरह दीर्घायु से सहित होकर भी बुढ़ापे से रहित हैं यह विरोध है। उसका परिहार इस तरह है कि महापुरुषों के शरीर में वृद्धावस्था का विकार नहीं होता अथवा शुद्ध आत्मस्वरूप की अपेक्षा वे कभी भी जीर्ण नहीं होते। इस तरह श्लोक में विघ्न-बाधाओं से अपनी रक्षा करने के लिए पुराण-पुरुष से प्रार्थना की गई है।


परैरचिन्त्यं युगभारमेकः स्तोतुं वहन्योगिभिरप्यशक्यः।
स्तुत्योऽद्य मेऽसौ वृषभो न भानोः किमप्रवेशे विशति प्रदीपः ॥२॥

अर्थ: भगवन्! यहाँ जब भोगभूमि के बाद कर्मभूमि का समय प्रारम्भ हुआ था उस समय की सब व्यवस्था आप अकेले ही कर गये थे। इस तरह आप की विलक्षण शक्ति को देखकर योगी भी कह उठे थे कि मैं आपकी स्तुति नहीं कर सकता। पर मैं आज आपकी स्तुति कर रहा हूँ, इसका कारण मेरा अभिमान नहीं है, पर मैं सोचता हूँ कि जिस गुफा में सूर्य का प्रवेश नहीं हो पाता उस गुफा में भी दीपक प्रवेश कर लेता है। यह ठीक है कि दीपक सूर्य की भाँति गुफा के सब पदार्थों को प्रकाशित नहीं कर सकता, उसी तरह मैं भी योगियों की तरह आपकी पूर्ण स्तुति नहीं कर सकूँगा, फिर भी मुझ में जितनी सामर्थ्य है उससे बाज क्यों आऊँ?


तत्याज शक्रः शकनाभिमानं नाहं त्यजामि स्तवनानुबन्धम्।
स्वल्पेन बोधेन ततोऽधिकार्थं वातायनेनेव निरूपयामि॥३॥

अर्थ: जिस तरह छोटे से झरोखे में झाँककर उससे कई गुणी वस्तुओं का वर्णन किया जाता है उसी तरह मैं भी अपने अल्प ज्ञान से जानकर आपके गुणों का वर्णन कर रहा हूँ। मुझे अपनी इस अनोखी सूझ पर हर्ष और विश्वास दोनों हैं। इसलिए मैं इन्द्र की तरह अपनी शक्ति को नहीं छिपाता।


त्वं विश्वदृश्वा सकलैरदृश्यो विद्वानशेषं निखिलैरवेद्यः।
वक्तुं कियान्कीदृश इत्यशक्यः स्तुतिस्ततोऽशक्तिकथा तवास्तु॥४॥

अर्थ: आप सबको देखते हैं पर आपको देखने की किसी में शक्ति नहीं है। आप सबको जानते हैं पर आपको जानने की किसी में शक्ति नहीं है। आप कैसे और कितने परिमाण वाले हैं यह भी कहने की किसी में शक्ति नहीं है। इस तरह आपकी स्तुति मानो अपनी अशक्ति की चर्चा करना ही है। इससे पहले के श्लोक में कवि ने कहा था कि आपकी स्तुति से इन्द्र ने अभिमान छोड़ दिया था पर मैं नहीं छोडूंगा अर्थात् मुझमें स्तुति करने की शक्ति है पर जब वे स्तुति करना प्रारम्भ करते हैं और प्रारम्भ में ही उन्हें कहना पड़ता है कि सबमें आपको देखने की, जानने की अथवा कहने की शक्ति नहीं है जिसका तात्पर्य अर्थ यह होता है कि मुझमें भी उसकी शक्ति नहीं है, तब उन्हें भी अन्त में स्वीकार करना पड़ता है कि इन्द्र ने जो शक्ति का अभिमान छोड़ा था वह ठीक ही किया था और मेरे द्वारा की गई यह स्तुति भी मेरी अशक्ति की कथा ही हो।


निःस्वार्थ बालवैद्य


व्यापीडितं बालमिवात्मदोषै- रुल्लाघतां लोकमवापिपस्त्वं।
हिताहितान्वेषणमान्द्यभाजः सर्वस्य जन्तोरसि बालवैद्यः॥५॥

अर्थ: जिस तरह बालकों की चिकित्सा करने वाला वैद्य, अपनी भूल से पैदा किये हुए वात, पित्त, कफ आदि दोषों से पीड़ित बालकों के अच्छे बुरे का ज्ञान करा कर उन्हें नीरोग बना देता है और अपने ‘बाल वैद्य’ इस नाम को सार्थक बना लेता है उसी तरह आप भी हित और अहित के निर्णय करने में असमर्थ बाल अर्थात् अज्ञानी जीवों के हित, अहित का बोध कराकर संसार के दुःखों से छुड़ाकर स्वस्थ बना देते हैं। इस तरह आपका भी ‘बाल वैद्य’ अर्थात् ‘अज्ञानियों के वैद्य’ यह नाम सार्थक सिद्ध होता है।


दाता न हर्ता दिवसं विवस्वानद्यश्व इत्यच्युत! दर्शिताशः।
सव्याजमेवं गमयत्यशक्तः क्षणेन दत्सेऽभिमतं नताय॥६॥

अर्थ: लोग सूर्योदय होते ही हाथ जोड़ शिर झुकाकर “नमो नारायण” कहते हुए सूर्य को नमस्कार करते हैं और उससे इच्छित वरदान मांगते हैं, पर वह “आज दूँगा-कल दूँगा” इस तरह आशा दिखाता हुआ दिन बिता देता है, किसी को कुछ लेता देता नहीं है-असमर्थ जो ठहरा। पर आप नम्र मनुष्य को उसकी इच्छित वस्तु क्षणभर में दे देते हैं। इस तरह आप सूर्य से बहुत बढ़कर हैं।


उपैति भक्त्या सुमुखः सुखानि त्वयि स्वभावाद्विमुखश्च दुःखं।
सदावदातद्युतिरेकरूपस्तयोस्त्वमादर्श इवावभासि॥७॥

अर्थ: जिस प्रकार दर्पण के सामने मुँह करने वाला पुरुष दर्पण में अपना सुन्दर चेहरा देखकर सुखी होता है और पीठ देकर खड़ा हुआ पुरुष अपना चेहरा न देख सकने से दुःखी होता है-उनके सुख दुःख में दर्पण कारण नहीं है। दर्पण तो उन दोनों के लिए हमेशा एकरूप ही है, पर वे दो मनुष्य अपनी अनुकूल और प्रतिकूल क्रिया से अपने आप सुखी दुःखी होते हैं, उसी प्रकार जो मनुष्य आपके विषय में सुमुख होता है अर्थात् आपको पूज्य दृष्टि से देखता है-आपकी भक्ति करता है वह शुभ कर्मों का बन्ध होने अथवा अशुभ कर्मों की निर्जरा होने से स्वयं सुखी होता है और जो आपके विषय में विमुख रहता है अर्थात् आपको पूज्य नहीं समझता और न आपकी भक्ति ही करता है वह अशुभ कर्मों का बन्ध होने से दुःख पाता है। उनके सुख दुःख में आप कारण नहीं है। आप तो हमेशा दोनों के लिए रागद्वेष रहित और चैतन्य चमत्कार मय एकरूप ही हैं।


सर्वव्यापी


अगाधताब्धेः स यतः पयोधिर्मेरोश्च तुङ्गा प्रकृतिः स यत्र।
द्यावापृथिव्योः पृथुता तथैव व्यापत्वदीया भुवनान्तराणि॥८॥

अर्थ: अगाधता शब्द के दो अर्थ हैं-समुद्र वगैरह में पानी की गहराई और मनुष्य हृदय में रहने वाले धैर्य की अधिकता। तुंगा प्रकृति शब्द भी द्व्यर्थक है। पहाड़ वगैरह की ऊँचाई और मन में दीनता का न होना। इसी तरह पृथुता, विशालता के भी दो अर्थ हैं। जमीन आकाश वगैरह के प्रदेशों का फैलाव और मनमें सबको अपनाने के भाव, सबके प्रति प्रेममयी भावना। भगवन् ! समुद्र की गम्भीरता समुद्र के ही पास है, मेरु पर्वत की ऊँचाई मेरु के ही पास है और आकाश पृथ्वी की विस्तारता भी उन्हीं के पास है परन्तु आपकी अगाधता-धैर्यवृत्ति, ऊँचाई-अदैन्यवृत्ति और पृथुता-उदारवृत्ति सारे संसार में फैली हुई है। इसलिए जो कहा करते हैं कि आपकी गम्भीरता समुद्र के समान है, उन्नत प्रकृति मेरु की तरह है और विशालता आकाश पृथिवी के सदृश है वे भूल करते हैं।


तवानवस्था परमार्थतत्त्वं त्वया न गीतः पुनरागमश्च।
दृष्टं विहाय त्वमदृष्टमैषीर्विरुद्धवृत्तोऽपि समञ्जसस्त्वम्॥९॥

अर्थ: जब आपका सिद्धान्त है कि सब पदार्थ परिवर्तनशील हैं-सभी में उत्पाद व्यय ध्रौव्य होता है तब सिद्धों में भी परिवर्तन अवश्य होगा, किन्तु आप उनके पुनरागमन को-संसार में वापस आने को स्वीकार नहीं करते, यह विरुद्ध बात है। जो मनुष्य प्रत्यक्ष सामने रखी हुई वस्तु को छोड़कर अप्रत्यक्ष-परभव में प्राप्त होने वाली वस्तु के पीछे पड़ता है, लोक में वह अच्छा नहीं कहलाता, परन्तु, आप वर्तमान के सुखों को छोड़कर भविष्य के सुख प्राप्त करने की इच्छा से उद्योग करते हैं यह भी विरुद्ध बात है। पर जब इन दोनों बातों का तत्त्व दृष्टि से विचार करते हैं तब वे दोनों ठीक मालूम होने लगती हैं जिससे आपकी प्रवृत्ति उचित ही रही आती है। यद्यपि पर्यायदृष्टि से सब पदार्थों में परिवर्तन होता है-सिद्धों में भी होता है तथापि द्रव्यदृष्टि से सब पदार्थ अपरिवर्तनरूप भी हैं। संसार में आने का कारण कर्मबन्ध है और वह कर्मबन्ध सिद्ध अवस्था में जड़मूल से नष्ट हो जाता है इसलिए सिद्ध जीव फिर कभी लौटकर संसार में वापिस नहीं आते, यह आपका सिद्धान्त उचित ही है। इसी तरह आपने वर्तमान के क्षणभंगुर-इन्द्रियजनित सुखों से मोह छोड़कर सच्चे आत्मसुख को प्राप्त करने का उपदेश दिया है। वह सच्चा सुख तब तक प्राप्त नहीं हो सकता जब तक कि यह प्राणी इन्द्रियजनित सुख में लगा रहता है। इसलिए प्रत्यक्ष के अल्प सुख को छोड़कर वीतरागता प्राप्त करने से परभव में सच्चा सुख प्राप्त होता हो उसे कौन प्राप्त न करना चाहेगा? इस श्लोक में विरोधाभास अलंकार है।


काम विजयी


स्मरः सुदग्धो भवतैव तस्मिन् उद्धूलितात्मा यदि नाम शम्भुः।
अशेत वृन्दोपहतोऽपि विष्णुः किं गृह्यते येन भवानजागः॥१०॥

अर्थ: हे भगवन्! जगद्विजयी काम को आपने ही भस्म किया था। लोग जो कहा करते हैं कि महादेव ने भस्म किया था वह ठीक नहीं, क्योंकि बाद में महादेव ने पार्वती की तपस्या से प्रसन्न हो उसके साथ विवाह कर लिया था और काम में इतने आसक्त हुए कि अपना आधा शरीर स्त्रीरूप कर लिया था। इसी तरह विष्णु ने भी वृन्दा-लक्ष्मी के वशीभूत हो तरह तरह की कामचेष्टाएँ की थीं, पर आप हमेशा ही आत्मव्रत में लीन रहे तथा काम को इस तरह पछाड़ा कि वह फिर पनप नहीं सका।


स नीरजाः स्यादपरोऽघवान्वा तद्दोषकीर्त्यैव न ते गुणित्वं।
स्वतोऽम्बुराशेर्महिमा न देव! स्तोकापवादेन जलाशयस्य॥११॥

अर्थ: हे भगवन्! दूसरे के दोष बतलाकर हम आपका गुणीपना सिद्ध नहीं करना चाहते क्योंकि आप स्वभाव से ही गुणी हैं। सरोवर को छोटा कह देने मात्र से समुद्र की विशालता सिद्ध नहीं होती किन्तु विशालता उसका स्वभाव है इसलिए वह विशाल-बड़ा कहलाता है।


कर्मस्थितिं जन्तुरनेक भूमिं नयत्यमुं सा च परस्परस्य।
त्वं नेतृभावं हि तयोर्भवाब्धौ जिनेन्द्र नौनाविकयोरिवाख्यः॥१२॥

अर्थ: सिद्धान्त ग्रन्थों में कहा गया है कि यह जीव अपने भले बुरे भावों से जिन कर्मों को बाँधता है वे कर्म तब तक उसका साथ नहीं छोड़ते जब तक फल देकर खिर नहीं जाते। इस बीच में जीव जन्म-मरण कर अनेक स्थानों में पैदा हो जाता है। इसी अपेक्षा से कहा गया है कि जीव कर्मों को अनेक जगह ले जाता है और जीव का जन्म-मरणकर जहाँ तहाँ पैदा होना आयु आदि कर्मों की सहायता के बिना नहीं होता। इसलिए कहा गया है कि कर्म ही जीवको चारों गतियों में जहाँ तहाँ ले जाते हैं। हे भगवन्! आपने इन दोनों में परस्पर का नेतृत्व उस तरह कहा है जिस तरह कि समुद्र में पड़े हुए जहाज और खेवटिया में हुआ करता है।


अज्ञ चेष्टा


सुखाय दुःखानि गुणाय दोषान् धर्माय पापानि समाचरन्ति।
तैलाय बालाः सिकतासमूहं निपीडयन्ति स्फुटमत्वदीयाः ॥१३॥

अर्थ: हे भगवन्! जो आपके शासन में नहीं चलते उन्हें धार्मिक तत्त्वों का सच्चा ज्ञान नहीं हो पाता इसलिए वे अज्ञानियों की तरह उल्टे आचरण करते हैं। वे किसी स्त्री, राज्य या स्वर्ग आदि को प्राप्त कर सुखी होने की इच्छा से तरह-तरह के कायक्लेश कर दुःख उठाते हैं पर सकाम तपस्या का कोई फल नहीं होता इसलिए वे अन्त में भी दुःखी ही रहते हैं। ‘‘हमें शील-शांति आदि गुणों का विकास हो’’ ऐसी इच्छा रखते हुए भी रति-लम्पटी, क्रोधी आदि देवों की उपासना करते हैं पर उन देवों की शीलघातक और क्रोधयुक्त क्रियाओं का उनपर बुरा असर पड़ता है जिससे उनमें गुणों का विकास न होकर दोषों का ही विकास हो जाता है। इसी प्रकार यज्ञादि धर्म करने की इच्छा से पशुहिंसा आदि पाप करते हैं जिससे उल्टा पापबन्ध ही होता है। हे प्रभो! यह बिलकुल स्पष्ट है कि उनकी क्रियायें उन बालकों जैसी हैं जो कि तैल पाने की इच्छा से बालु के पुञ्ज को कोल्हू में पेलते हैं।


विष हरता


विषापहारं मणिमौषधानि मन्त्रं समुद्दिश्य रसायनं च।
भ्राम्यन्त्यहो न त्वमिति स्मरन्ति पर्यायनामानि तवैव तानि॥१४॥

अर्थ: हे भगवन्! जो मनुष्य शुद्ध हृदय से आपका स्मरण करते हैं उनके विष वगैरह का विकार अपने आप दूर हो जाता है। कहा जाता है कि एक समय स्तोत्र के रचयिता धनञ्जय कवि के लड़के को साँप ने डँस लिया तब वे अन्य उपचार न कर उसे सीधे जिनमन्दिर में ले गये और वहाँ विषापहार स्तोत्र रचकर भगवान् के सामने पढ़ने लगे। उनकी सच्ची भक्ति के प्रभाव से पुत्र का विष दूर होने लगा और वे “विषापहारं मणिमौषधानि” इस श्लोक को पढ़कर पूरा करते हैं त्यों ही पुत्र उठकर बैठ जाता है-उसका विष विकार बिलकुल दूर हो जाता है। कवि ने स्तोत्र को पूरा किया और इसके पाठ से विष विकार दूर हुआ था इसलिए इसका नाम विषापाहार स्तोत्र प्रचलित किया।


चित्ते न किञ्चित्कृतवानसि त्वं देवः कृतश्चेतसि येन सर्वम्।
हस्ते कृतं तेन जगद्विचित्रं सुखेन जीवत्यपि चित्तबाह्यः॥१५॥

अर्थ: यह बात प्रसिद्ध है-यदि मोहन के शरीर पर पाँच हजार के आभूषण हैं तो वह मोहन, जिस कुर्सी पर बैठेगा उस कुर्सी पर भी पांच हजार के आभूषण कहलाते हैं। यदि उसके शरीर पर कुछ भी नहीं है तो कुर्सी पर भी कुछ नहीं कहलाता। पर यहाँ विचित्र ही बात है। आपके चित्त में कुछ भी नहीं है पर जो मनुष्य आपको अपने चित्त में विराजमान करता है उसके हाथ में सब कुछ आ जाता है। इस विरोध का परिहार यह है-यद्यपि आपके पास किसी को देने के लिए कुछ भी नहीं है और रागभाव न होने से आप मन में भी ऐसा विचार नहीं करते कि मैं अमुक मनुष्य के लिए अमुक वस्तु दूँ। फिर भी भक्त जीव अपनी शुभ भावनाओं से शुभ कर्मों का बन्ध कर उनके उदय-काल में सब कुछ पा लेते हैं। अथवा जो यथार्थ में आपको अपने हृदय में धारण कर लेता है वह आपके समान ही निःस्पृह हो जाता है-उसकी सब इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं। वह सोचता है कि मुझे और कुछ नहीं चाहिये। मैं आज आपको अपने चित्त में धारण कर सका मानों तीनों लोकों की सम्पत्तियाँ हमारे हाथ में आ गईं। दूसरा विरोध यह है कि आप चित्त-चेतन से बाह्य होकर भी जीवित रहते हैं। अभी, जो चेतन से रहित हो जाता है वह मृत कहलाने लगता है, पर यहाँ उससे विरुद्ध बात है। विरोध का परिहार यह है-कि आप चित्तबाह्य-अर्थात् मन से चिन्तवन करने के अयोग्य होते हुए भी अनन्त सुख से हमेशा जीवित रहते हैं- आप अजर अमर हैं। तात्पर्य यह हैं कि आपमें अनन्त सुख है तथा आप इतने अधिक प्रभावशाली हैं कि भव्यजीव आपका मन से चिन्तवन भी नहीं कर पाते।


त्रिकालज्ञ


त्रिकालतत्त्वं त्वमवैस्त्रिलोकी स्वामीति संख्यानियतेरमीषाम्।
बोधाधिपत्यं प्रतिनाभविष्यत् तेऽन्येऽपि चेद्व्याप्स्यदमूनपीदम्॥१६॥

अर्थ: हे प्रभो ! आप तीन काल तथा तीन लोक की बात को जानते हैं इसलिए आपका ज्ञान भी उतना ही है ऐसा नहीं है। किन्तु आपके ज्ञान का साम्राज्य सब ओर अनन्त है। जितने पदार्थ हैं उनको तो ज्ञान जानता ही है। यदि इनके सिवाय और भी होते तो ज्ञान उन्हें भी अवश्य ही जानता।


शुभकारी सेवा


नाकस्य पत्युः परिकर्म रम्यं नागम्यरूपस्य तवोपकारि।
तस्यैव हेतुः स्वसुखस्य भानोरुद्विभ्रतश्छत्रमिवादरेण ॥१७॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई सूर्य के लिए छत्ता लगावे तो उससे सूर्य का कुछ भी उपकार नहीं होता क्योंकि वह सूर्य छत्ता लगाने-वाले से बहुत ऊपर है परन्तु छत्ता लगाने वाले को अवश्य ही छाया का सुख होता है। उसी प्रकार इन्द्र जो आपकी सेवा करता था, उससे आपका क्या भला होता था? उल्टा शुभास्रव होने से उसी का भला होता था।


क्वोपेक्षकस्त्वं क्व सुखोपदेशः स चेत्किमिच्छाप्रतिकूलवादः ।
क्वासौ क्व वा सर्वजगत्प्रियत्वं तन्नो यथातथ्यमवेविचं ते ॥१८॥

अर्थ: हे भगवन् ! जब आप राग द्वेष से रहित हैं तब किसी को सुखका उपदेश कैसे देते हैं? यदि सुखका उपदेश देते हैं तो इच्छा के बिना कैसे उपदेश देते हैं? यदि इच्छा के बिना उपदेश देते हैं तो जगत् के सब जीवों को प्यारे कैसे हैं? इस तरह आपकी सब बातें परस्पर में विरुद्ध हैं। दर असल में आपकी असलियत को कोई नहीं जान सकता।


तुङ्गात्फलं यत्तदकिञ्चनाच्च प्राप्यं समृद्धान्न धनेश्वरादेः ।
निरम्भसोऽप्युच्चतमादिवाद्रेर्नैकापि निर्याति धुनी पयोधेः ॥१९॥

अर्थ: पहाड़ के पास पानी की एक बूँद भी नहीं है। परन्तु उसकी प्रकृति अत्यन्त उन्नत है इसलिए उससे कई नदियाँ निकलती हैं, परन्तु समुद्र से जो कि पानी से लबालव भरा रहता है एक भी नदी नहीं निकलती। इसका कारण है-समुद्र में ऊँचाई का अभाव। भगवन्! मैं जानता हूँ कि आपके पास कुछ भी नहीं है। परन्तु आपका हृदय पर्वत की तरह उन्नत है-दीन नहीं है, इसलिए आपसे हमें जो चीज मिल सकती है वह अन्य धनाढ्यों से नहीं मिल सकती क्योंकि समुद्र के समान वे भी ऊँचे नहीं हैं अर्थात् कृपण हैं।


त्रैलोक्यसेवानियमाय दण्डं दध्रे यदिन्द्रो विनयेन तस्य।
तत्प्रातिहार्यं भवतः कुतस्त्यं तत्कर्मयोगाद्यदि वा तवास्तु॥२०॥

अर्थ: जब भगवान् ऋषभनाथ भोगभूमि के बाद कर्मभूमि की व्यवस्था करने के लिए तैयार हुए तब इन्द्र ने आकर भगवान् की इच्छानुसार सब व्यवस्था करने के लिए दण्ड धारण किया था। अर्थात् प्रतीहार पद स्वीकार किया था। जो किसी काम की व्यवस्था करने के लिए दण्ड धारण किया करता है उसे प्रतीहार कहते हैं। जैसे कि आजकल लाठी धारण किये हुये बालन्टियर-स्वयंसेवक। प्रतीहार के कार्य अथवा भाव को संस्कृत में प्रातिहार्य कहते हैं। हे प्रभो! जब इन्द्र ने सब व्यवस्था की थी तब सच्चा ‘प्रातिहार्य’ प्रतिहारपना इन्द्र के ही हो सकता है, आपके कैसे हो सकता है? क्योंकि आपने प्रतीहारका काम थोड़े ही किया था। फिर भी यदि आपके प्रातिहार्य होता ही है ऐसा कहना है तो उपचार से कहा जा सकता है। क्योंकि आप इन्द्र के उस काम में प्रेरक थे। अथवा श्लोक का ऐसा भी भाव हो सकता है-“तीनलोक के जीव भगवान् की सेवा करो” इस नियम को प्रचलित करने के लिए इन्द्र ने हाथ में दण्ड लिया था, इसलिए प्रातिहार्य इन्द्र के ही बन सकता है, आपके नहीं। अथवा आपके भी हो सकता है क्योंकि आपसे ही इन्द्र की उस क्रिया के कर्मकारक का सम्बन्ध होता था। यहाँ एक और भी गुप्त अर्थ है, वह इस प्रकार है-लोक में प्रातिहार्य पदका अर्थ आभूषण प्रसिद्ध है। भगवान् के भी अशोक वृक्ष आदि आठ प्रातिहार्य आभूषण होते हैं। यहाँ कवि, प्रातिहार्य पदके श्लेष से पहले यह बतलाना चाहते हैं कि संसार के अन्य देवों की तरह आपके शरीर पर प्रातिहार्य नहीं हैं। इन्द्र के प्रातिहार्य-प्रतीहारपना हो पर आपके प्रातिहार्य आभूषण कहाँ से आये? फिर उपचार पक्ष का आश्रय लेकर कहते हैं कि आपके भी प्रातिहार्य हो सकते हैं। उसका कारण है तत्कर्मयोगात् अर्थात् आभूषणों के कार्य-सौंदर्य वृद्धि के साथ सम्बन्ध होना।


सम द्रष्टा


श्रिया परं पश्यति साधु निःस्वः श्रीमान्न कश्चित्कृपणं त्वदन्यः।
यथा प्रकाशस्थितमन्धकारस्थायीक्षतेऽसौ न तथा तमःस्थम्॥२१॥

अर्थ: हे प्रभो! संसार के श्रीमान् निर्धन पुरुषों को बुरी निगाह से देखते हैं, पर आप श्रीमान् होते हुए भी ज्ञानादि सम्पत्ति से रहित मनुष्यों को बुरी निगाह से नहीं देखते। उन्हें भी अपनाकर हितका उपदेश दे सुखी करते हैं। इस तरह आप संसार के अन्य श्रीमानों से भिन्न ही श्रीमान् हैं। दोनों की श्री-लक्ष्मी में भेद जो ठहरा। उनके पास रुपया चांदी सोना वगैरह जड़ लक्ष्मी है पर आपके पास अनन्त ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य-अनन्त चतुष्टय रूप लक्ष्मी है।


स्ववृद्धि निःश्वासनमेषभाजि प्रत्यक्षमात्मानुभवेऽपि मूढः।
किं चाखिलज्ञेयविवर्तिबोध-स्वरूपमध्यक्षमवैति लोकः॥२२॥

अर्थ: भगवन्! जो मनुष्य अपने आपके स्थूल पदार्थों को भी जानने के लिए समर्थ नहीं है वह ज्ञानस्वरूप तथा आत्मा में विराजमान आपको कैसे जान सकता है? अर्थात् नहीं जान सकता।


स्वरूप अनभिज्ञ अज्ञानी


तस्यात्मजस्तस्य पितेति देव! त्वां येऽवगायन्ति कुलं प्रकाश्य।
तेऽद्यापि नन्वाश्मनमित्यवश्यं पाणौ कृतं हेम पुनस्त्यजन्ति॥२३॥

अर्थ: एक तो सुवर्ण हाथ नहीं लगता, यदि किसी तरह लग भी जावे तो उसे यह सोचकर कि इसकी उत्पत्ति पत्थरों से हुई है, फिर अलग कर देना मूर्खता है। इसी तरह आपका श्रद्धान व ज्ञान सबको नहीं होता। यदि किसी को हो भी जावे तो वह आपको मनुष्य कुल में पैदा बतलाकर फिर भी छोड़ देता है, यह सबसे बढ़कर मूर्खता है। सुवर्ण यदि शुद्ध है तो फिर वह पत्थर से तो क्या दुनियाँ के किसी हल्के से हल्के पदार्थ से उत्पन्न हुआ हो तो बाजार में उसकी कीमत पूरी ही लगेगी और मैल सहित है-अशुद्ध है तो किसी अच्छे पदार्थ से भी उत्पन्न होने पर भी उसकी पूरी कीमत नहीं लग सकती। इसी प्रकार जो आत्मा शुद्ध है, कर्ममल से रहित है, भले ही वह उस पर्याय में नीच कुल में पैदा हुआ हो, पूज्य कहलाता है और यदि वही आत्मा उच्च कुल में पैदा होकर भी अशुद्ध है-मलिन है तो उसे कोई पूछता भी नहीं है।


मोहविजयी भगवन्


दत्तस्त्रिलोक्यां पटहोभिभूताः सुरासुरास्तस्य महान् स लाभः।
मोहस्य मोहस्त्वयि को विरोद्धुम् मूलस्य नाशो बलवद्विरोधः॥२४॥

अर्थ: हे भगवन्! जिस मोह ने संसार के सब जीवों को अपने वश कर लिया उस मोहको भी आपने जीत लिया है अर्थात् आप मोहरहित-रागद्वेषशून्य हैं।


अभिमान रहित भगवन्


मार्गस्त्वयैको ददृशे विमुक्तेः चतुर्गतीनां गहनं परेण।
सर्वं मया दृष्टमिति स्मयेन त्वं मा कदाचित् भुजमालुलोकः॥२५॥

अर्थ: घमण्डियों का स्वभाव होता है कि वे अपने को बड़ा समझकर बार-बार अपनी भुजाओं की तरफ देखते हैं, पर आपने घमण्ड से कभी अपनी भुजा की तरफ नहीं देखा। उसका कारण यह है कि आप सोचते थे कि मैंने तो सिर्फ एक मोक्ष का ही रास्ता देखा है और अन्य देवी देवता चारों गतियों के रास्तों से परिचित हैं इसलिए मैं उनके सामने अल्पज्ञ हूँ। अल्पज्ञ का बहुज्ञानियों के सामने अभिमान कैसा? श्लोक का तात्पर्य यह है कि आप अभिमान से रहित हैं और निश्चित ही मोक्ष को प्राप्त होने वाले हैं, परन्तु अन्य देवता अपने अपने कार्यों के अनुसार नरक आदि चारों गतियों में घूमा करते हैं।


विरोधी रहित अविनाशी


स्वर्भानुरर्कस्य हविर्भुजोऽम्भः कल्पान्तवातोऽम्बुनिधेर्विघातः।
संसारभोगस्य वियोगभावो विपक्षपूर्वाभ्युदयास्त्वदन्ये ॥२६॥

अर्थ: हे प्रभो! संसार के सब पदार्थ अनित्य हैं, सिर्फ आप ही सामान्य स्वरूप की अपेक्षा नित्य हैं अर्थात् आप जन्म मरण से रहित हैं और आपकी यह विशुद्धता भी कभी नष्ट नहीं होती।


अजानतस्त्वां नमतः फलं यत् तज्जानतोऽन्यं न तु देवतेति।
हरिन्मणिं काचधिया दधानः तं तस्य बुद्ध्या वहतो न रिक्तः ॥२७॥

अर्थ: हे भगवन्! जो आपको नमस्कार करता है पर आपके स्वरूप को नहीं जानता, उसे भी जो पुण्यबंध होता है वह किसी दूसरे को देवता मानने वाले पुरुष को नहीं होता। जिस तरह कोई अजान मनुष्य हरित मणिको पहन कर उसे काँच समझता है तो वह दूसरे की निगाह में जो मणि को मणि समझकर पहन रहा है निर्धन नहीं कहलाता। वे दोनों एक जैसी सम्पत्ति के अधिकारी कहे जाते हैं। श्रद्धा और विवेक के साथ प्राप्त हुआ अल्पज्ञान भी प्रशंसनीय है।


प्रशस्तवाचश्चतुराः कषायैः दग्धस्य देवव्यवहारमाहुः।
गतस्य दीपस्य हि नन्दितत्वं दृष्टं कपालस्य च मङ्गलत्वम् ॥२८॥

अर्थ: हे भगवन्! लौकिक मनुष्य रागी द्वेषी जीवों के भी देव शब्द का व्यवहार करते हैं सो सिर्फ लोकव्यवहार से ही किसी बात की सत्यता नहीं होती। क्योंकि लोक में कितनी ही बातों का उल्टा व्यवहार होता है। जैसे कि जब दीपक बुझ जाता है तब लोग कहते हैं कि दीपक बढ़ गया। और जब घड़ा फूट जाता है तब लोग कहने लगते हैं कि घड़े का कल्याण हो गया।


नानार्थमेकार्थमदस्त्वदुक्तं हितं वचस्ते निशम्य वक्तुः।
निर्दोषतां के न विभावयन्ति ज्वरेण मुक्तः सुगमः स्वरेण ॥२९॥

अर्थ: आपके वचन नानार्थ होकर भी एकार्थ हैं। यह प्रारम्भ में विरोध मालूम होता है पर अन्त में उसका इस प्रकार परिहार हो जाता है कि आपके वचन स्याद्वाद सिद्धान्त से अनेक अर्थों का प्रतिपादन करने वाले हैं, फिर भी एक ही प्रयोजन को सिद्ध करते हैं अर्थात् पूर्वापर विरोध से रहित हैं। हे भगवन्! आपके हितकारी वचनों को सुनकर यह स्पष्ट मालूम हो जाता है कि आप निर्दोष हैं क्योंकि सदोष पुरुष वैसे वचन नहीं बोल सकता जैसे कि किसी की अच्छी आवाज सुनकर साफ मालूम हो जाता है कि वह ज्वर से मुक्त है क्योंकि ज्वर से पीड़ित मनुष्य का स्वर अच्छा नहीं होता।


न क्वापि वाञ्छा ववृते च वाक्ते काले क्वचित्कोऽपि तथा नियोगः।
न पूरयाम्यम्बुधिमित्युदंशुः स्वयं हि शीतद्युतिरभ्युदेति ॥३०॥

अर्थ: जिस प्रकार चन्द्रमा यह इच्छा रख कर उदित नहीं होता कि मैं समुद्र को लहरों से भर दूँ पर उसका वैसा स्वभाव ही है कि चन्द्रमा का उदय होने पर समुद्र में लहरें उठने लगती हैं, इसीप्रकार आपके यह इच्छा नहीं है कि मैं कुछ बोलूँ पर वैसा स्वभाव होने से आपके वचन प्रकट होने लगते हैं।


गुणा गभीराः परमाः प्रसन्ना बहुप्रकारा बहवस्तवेति।
दृष्टोऽयमन्तः स्तवनेन तेषां गुणो गुणानां किमतः परोऽस्ति ॥३१॥

अर्थ: हे भगवन्! आपके निर्मल गुण संख्या रहित और अनुपम है।


सर्वसिद्धि प्रदायी उपासना


स्तुत्या परं नाभिमतं हि भक्त्या स्मृत्या प्रणत्या च ततो भजामि।
स्मरामि देवं प्रणमामि नित्यं केनाप्युपायेन फलं हि साध्यम् ॥३२॥

अर्थ: हे भगवन्! आपकी स्तुति से, भक्ति से, स्मृति-ध्यान से और प्रणति से जीवों को इच्छित फलों की प्राप्ति होती है इसलिए मैं प्रतिदिन आपकी स्तुति करता हूँ, भक्ति करता हूँ, ध्यान करता हूँ और नमस्कार करता हूँ। क्योंकि मुझे जैसे बने तैसे अपना कार्य सिद्ध करना है।


पुण्य के प्रधान कारण


ततस्त्रिलोकीनगराधिदेवं नित्यं परं ज्योतिरनन्तशक्तिम्।
अपुण्यपापं परपुण्यहेतुं नमाम्यहं वन्द्यमवन्दितारम् ॥३३॥

अर्थ: हे भगवन्! आप तीन लोक के स्वामी हैं, आपका कभी विनाश नहीं होता, सर्वोत्कृष्ट हैं, केवल ज्ञानरूप ज्योति से प्रकाशमान हैं, आपमें अनन्त बल है, आप स्वयं पुण्य पाप से रहित हैं, पर अपने भक्तजनों के पुण्यबन्ध में निमित्त कारण हैं, आप किसी को नमस्कार नहीं करते पर सब लोग आपको नमस्कार करते हैं। आपकी इस विचित्रता से मुग्ध हो मैं भी आपके लिए नमस्कार करता हूँ।


सदा स्मरणीय


अशब्दमस्पर्शमरूपगन्धं त्वां नीरसं तद्विषयावबोधम्।
सर्वस्य मातारममेयमन्यैर् जिनेन्द्रमस्मार्यमनुस्मरामि॥३४॥

अर्थ: हे भगवन्! आप रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द से रहित हैं-अमूर्तिक हैं, फिर भी उन्हें जानते हैं। आप सबको जानते हैं पर आपको कोई नहीं जान पाता। यद्यपि आपका मन से भी कोई स्मरण नहीं कर सकता तथापि मैं अपने बाल साहस से आपका क्षण-क्षण में स्मरण करता हूँ।


अगाधमन्यैर्मनसाप्यलंघ्यं निष्किञ्चनं प्रार्थितमर्थवद्भिः।
विश्वस्य पारं तमदृष्टपारं पतिं जिनानां शरणं व्रजामि॥३५॥

अर्थ: हे भगवन्! आप बहुत ही गम्भीर-धैर्यवान् हैं। आपका कोई मनसे भी चिन्तन नहीं कर सकता। यद्यपि आपके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है, तो भी धनिक लोग (अथवा याचकवर्ग) आपसे याचना करते हैं, आप सबके पार को जानते हैं, पर आपके पार को कोई नहीं जान सकता और आप जगत के जीवों के पति-रक्षक हैं ऐसा सोचकर मैं भी आपकी शरण में आया हूँ।


स्वाभाविक गुणों से उन्नत


त्रैलोक्यदीक्षागुरवे नमस्ते यो वर्धमानोऽपि निजोन्नतोऽभूत्।
प्राग्गण्डशैलः पुनरद्रिकल्पः पश्चान्नमेरुः कुलपर्वतोऽभूत्॥३६॥

अर्थ: हे प्रभो! आप तीन लोक के जीवों के दीक्षागुरु हैं इसलिए आपको नमस्कार हो। इस श्लोक के द्वितीय पाद में विरोधाभास अलंकार है। वह इस तरह कि आप अभी वर्धमान हैं अर्थात् क्रम से बढ़ रहे हैं फिर भी निजोन्नत-अपने आप उन्नत हुये थे। जो चीज अभी बढ़ रही है वह पहले उससे छोटी ही होती है न कि बड़ी, पर यहाँ इससे विपरीत बात है। विरोध का परिहार इस प्रकार है कि आप वर्धमान-अन्तिम तीर्थंकर होकर भी स्वयमेव उन्नत थे, न कि क्रम क्रम से उन्नत हुए थे, क्योंकि मेरु पर्वत आज जितना उन्नत है उतना उन्नत हमेशा से ही था न कि क्रम-क्रम से उन्नत हुआ है। यहाँ वर्धमान पद श्लिष्ट है।


काल विजयी


स्वयं प्रकाशस्य दिवा निशा वा न बाध्यता यस्य न बाधकत्वम्।
न लाघवं गौरवमेकरूपं वन्दे विभुं कालकलामतीतम्॥३७॥

अर्थ: स्वयं प्रकाशमान पदार्थ के पास जिस प्रकार रात और दिन का व्यवहार नहीं होता: क्योंकि प्रकाश के अभाव को रात कहते हैं और रात के अभाव को दिन कहते हैं। जो हमेशा प्रकाशमान रहता है उसके पास अन्धकार न होने से रात का व्यवहार नहीं होता और जब रात का व्यवहार नहीं है तब उसके अभाव में होने वाला दिन का व्यवहार भी नहीं होता, उसी प्रकार आप में भी बाध्यता और बाधक का व्यवहार नहीं है। आप किसी को बाधा नहीं पहुँचाते, इसलिए आप में बाधकत्व नहीं और कोई आपको भी बाधा नहीं पहुँचा सकता इसलिए आप बाध्य नहीं हैं। जिसमें बाध्य का व्यवहार नहीं उसमें बाधक का भी व्यवहार नहीं होता और जिसमें बाधक का व्यवहार नहीं उसमें बाध्य का भी व्यवहार नहीं हो सकता, क्योंकि ये दोनों धर्म परस्पर में सापेक्ष हैं। उसी प्रकार आपमें न लाघव ही है और न गुरुत्व ही। दोनों सापेक्ष धर्मों से रहित हैं। आप अगुरुलघुरूप हैं। हे भगवन् ! आप समय की मर्यादा से भी रहित हैं अर्थात् अनन्तकाल तक ऐसे ही रहे आवेंगे।


अयाचित फल प्रदाता


इति स्तुतिं देव! विधाय दैन्याद् वरं न याचे त्वमुपेक्षकोऽसि।
छायातरुं संश्रयतः स्वतः स्यात् कश्छायया याचितयात्मलाभः॥३८॥

अर्थ: हे भगवन्! मैं सर्प से डसे हुए मृत प्रायः लड़के को आपके सामने लाया हूँ इसलिए स्तुति कर चुकने के बाद मैं आपसे यह वरदान नहीं माँगता कि आप मेरे लड़के को स्वस्थ कर दें, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप रागद्वेष से रहित हैं इसलिए न किसी को कुछ देते हैं और न किसी से कुछ छीनते भी हैं। स्तुति करने वाले को तो फल की प्राप्ति स्वयं ही हो जाती है। जैसे-जो मनुष्य वृक्ष के नीचे पहुँचेगा उसे छाया स्वयं प्राप्त हो जाती है। छाया की याचना करने से कोई लाभ नहीं होता।


सद्बुद्धि प्रदाता श्रेष्ठ गुरु


अथास्ति दित्सा यदि वोपरोधस्त्वय्येव सक्तां दिश भक्तिबुद्धिम्।
करिष्यते देव तथा कृपां मे कोवात्मपोष्ये सुमुखो न सूरिः॥३९॥

अर्थ: हे नाथ ! यदि आपकी कुछ देने की इच्छा है तो मैं आपसे यही चाहता हूँ कि मेरी भक्ति आपमें ही रहे। मेरा विश्वास है कि आप मुझ पर उतनी कृपा अवश्य करेंगे। क्योंकि विद्वान् पुरुष अपने आश्रित रहने वाले शिष्य की इच्छाओं को पूर्ण ही करते हैं।


भक्ति का वैशिष्ट्य


वितरति विहिता यथाकथञ्चिज्जिन विनताय मनीषितानि भक्तिः।
त्वयि नुतिविषया पुनर्विशेषाद्दिशति सुखानि यशो धनं जयं च॥४०॥

अर्थ: हे भगवन् ! आपकी भक्ति से सुख, यश, धन तथा विजय आदि की प्राप्ति होती है ।

श्री भूपालकवि प्रणीता जिनचतुर्विंशतिका

श्रीलीलायतनं महीकुलगृहं कीर्तिप्रमोदास्पदं,
वाग्देवीरतिकेतनं जयरमाक्रीडानिधानं महत्।
सः स्यात्सर्वमहोत्सवैकभवनं यः प्रार्थितार्थप्रदं,
प्रातः पश्यति कल्पपादपदलच्छायं जिनाङ्घ्रिद्वयम् ॥१॥

अर्थ: जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल के समय जिनेन्द्र भगवान् के दर्शन करता है वह बहुत ही सम्पत्तिशाली होता है, पृथ्वी उसके वश में रहती है, उसकी कीर्ति सब ओर फैल जाती है, वह हमेशा प्रसन्न रहता है, उसे अनेक विद्याएँ प्राप्त हो जाती हैं, युद्ध में उसकी विजय होती है, अधिक क्या कहें उसे सब उत्सव प्राप्त होते हैं।


शान्तं वपुः श्रवणहारि वचश्चरित्रं,
सर्वोपकारि तव देव! ततः श्रुतज्ञाः।
संसारमारवमहास्थलरुन्दसान्द्र -
छायामहीरुह! भवन्तमुपाश्रयन्ते॥२॥

अर्थ: मरुस्थल प्रदेशों में छाया वाले वृक्ष बहुत कम होते हैं इसलिए मार्ग में रास्तागीरों को बहुत तकलीफ होती है। वे थके हुए रास्तागीर जब किसी छायादार वृक्ष को पाते हैं तब बड़े खुशी होते हैं और उसकी सघन शीतल छाया में बैठकर अपना सब परिश्रम भूल जाते हैं। इसी तरह संसार रूप मरुस्थल में आप जैसे छायादार वृक्षों की बहुत कमी है, इसलिए मोक्ष-नगर को जाने वाले पथिक रास्ता में बहुत तकलीफ उठाते हैं। पर जब उन्हें आप जैसे छायादार वृक्ष की प्राप्ति हो जाती है तब वे बहुत ही खुश होते हैं और आपके आश्रय में बैठकर अपने सब दुःख भूल जाते हैं।


स्वामिन्नद्य विनिर्गतोऽस्मि जननीगर्भान्धकूपोदरा-
दद्योद्घाटितदृष्टिरस्मि फलवज्जन्मास्मि चाद्य स्फुटम्।
त्वामद्राक्षमहं यदक्षयपदानन्दाय लोकत्रयी-
नेत्रेन्दीवरकाननेन्दुममृतस्यन्दिप्रभाचन्द्रिकम् ॥३॥

अर्थ: हे भगवन् ! आज आपके दर्शन कर मैं समझता हूँ कि आज ही पैदा हुआ हूँ। क्योंकि मेरा अब तक का समय आपके दर्शन के बिना व्यर्थ ही गया। आज ही मेरी दृष्टि खुली है, आपके पहले मानो मैं देखते हुए भी अन्धा था और आज ही मेरा जन्म सफल हुआ है।


निःशेषत्रिदशेन्द्रशेखर शिखा रत्नप्रदीपावली-
सान्द्रीभूतमृगेन्द्रविष्टरतटी माणिक्यदीपावलिः।
क्वेयंश्रीः क्व च निःस्पृहत्वमिदमित्यूहातिगस्त्वादृशः
सर्वज्ञानदृशश्चरित्रमहिमा लोकेश! लोकोत्तरः॥४॥

अर्थ: हे भगवन् ! आप समवसरण रूप लक्ष्मी से सहित होने पर भी उसमें स्पृहा से रहित हैं इससे मालूम होता है आपका चरित्र ऐसा क्यों है? इस तर्क का विषय नहीं है।


राज्यं शासनकारिनाकपति यत्त्यक्तं तृणावज्ञया,
हेलानिर्दलितत्रिलोकमहिमा यन्मोहमल्लो जितः।
लोकालोकमपि स्वबोधमुकुर स्यान्तः कृतं यत्त्वया।
सैषाश्चर्यपरम्परा जिनवर क्वान्यत्र सम्भाव्यते॥५॥

अर्थ: हे भगवन् आपने विशाल राज्य को तृण के समान तुच्छ समझ कर छोड़ दिया, आपने त्रिलोक-विजयी मोहमल्ल को जीत लिया और आपने लोक अलोक का ज्ञान प्राप्त कर लिया। यह विशेषता आपको छोड़कर अन्य मत सम्बन्धी देवों में नहीं हो सकती।


दानं ज्ञानधनाय दत्तमसकृत्पात्राय सद्वृत्तये,
चीर्णान्युग्रतपांसि तेन सुचिरं पूजाश्च बह्व्यः कृताः।
शीलानां निचयः सहामलगुणैः सर्वः समासादितो
दृष्टस्त्वं जिन येन दृष्टिसुभगः श्रद्धापरेण क्षणम्॥६॥

अर्थ: हे भगवन् जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक आपके दर्शन करता है उसे पात्र दान करने, तप आचरने, पूजा करने तथा शीलव्रत धारण करने का फल लगता है।


प्रज्ञापारमितः स एव भगवान्पारं स एव श्रुत-,
स्कन्धाब्धेर्गुणरत्नभूषण इति श्लाघ्यः स एव ध्रुवं।
नीयन्ते जिन येन कर्णहृदयालङ्कारतां त्वद्गुणाः,
संसाराहिविषापहारमणयस्त्रैलोक्यचूड़ामणेः ॥७॥

अर्थ: हे भगवन्! जो आपके गुणों को सुनकर हृदय में धारण करता है वही बुद्धिमान्, ऐश्वर्यवान्, ज्ञानवान् और गुणरूपी रत्नों से भूषित होता है।


जयति दिविजवृन्दान्दोलितैरिन्दुरोचि-
र्निचयरुचिभिरुच्चैश्चामरैर्वीज्यमानः ।
जिनपतिरनुरज्यन्मुक्तिसाम्राज्यलक्ष्मी-
युवतिनवकटाक्षक्षेपलीलां दधानैः॥८॥

अर्थ: हे भगवन्! आपके दोनों ओर देवगण जो सफेद चँवर ढोर रहे हैं वे चँवर आप में आसक्त हुई मुक्ति की राज्यलक्ष्मीरूप स्त्री के सफेद कटाक्षों की तरह शोभायमान होते हैं। उन चँवरों से आप संसार में सर्वश्रेष्ठ मालूम होते हैं।


देवः श्वेतातपत्रत्रयचमररुहाशोकभाश्चक्रभाषा-
पुष्पौघासारसिंहासनसुरपटहैरष्टभिः प्रातिहार्यैः।
साश्चर्यैर्भ्राजमानः सुरमनुजसभाम्भोजिनी भानुमाली
पायान्नः पादपीठीकृतसकलजगत्पालमौलिर्जिनेन्द्रः॥९॥

अर्थ: जो आठ प्रातिहार्यों से शोभायमान हैं, जो मनुष्य और देवों की सभा को हर्षित करते हैं तथा जिनके चरणों में जगत् के सब राजा अपना मस्तक झुकाते हैं वे जिनेन्द्रदेव हमारी रक्षा करें।


नृत्यत्स्वर्दन्तिदन्ताम्बुरुहवननटन्नाकनारीनिकायः ,
सद्यस्त्रैलोक्ययात्रोत्सवकरनिनदातोद्यमाद्यत्त्रिलिम्पः ।
हस्ताम्भोजातलीलाविनिहितसुमनोदामरम्यामरस्त्री-
काम्यः कल्याणपूजा विधिषु विजयते देव देवागमस्ते॥१०॥

अर्थ: हे भगवन् आपके कल्याणकों में जो देवों का आगमन होता है वह संसार में सबसे उत्कृष्ट है -उसकी जय होवे।


चक्षुष्मानहमेव देव भुवने, नेत्रामृतस्यन्दिनं
त्वद्वक्त्रेन्दुमतिप्रसादसुभगैस्तेजोभिरुद्भासितम् ।
तेनालोकयता मयानतिचिराच्चक्षुः कृतार्थीकृतं
द्रष्टव्यावधिवीक्षणव्यतिकरव्याजृम्भमाणोत्सवम् ॥११॥

अर्थ: हे भगवन्! जिन्होंने आपके दर्शन किये हैं संसार में उन्हीं के नेत्र सफल हैं-वे ही नेत्रवान् कहलाते हैं।


कन्तोः सकान्तमपि मल्लमवैति कश्चि-
न्मुग्धो मुकुन्दमरविन्दजमिन्दुमौलिम् ।
मोघीकृतत्रिदशयोषिदपाङ्गपात -
स्तस्य त्वमेव विजयी जिनराज! मल्लः॥१२॥

अर्थ: हे भगवन्! कोई अज्ञानी जीव कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने काम को जीता था, कोई कहते हैं कि ब्रह्मा ने जीता था और कोई कहते हैं कि महादेव ने जीता था, पर उनका यह कहना मिथ्या है, क्योंकि वे तीनों ही देवता देव अवस्था में भी स्त्रियों से सहित थे। जो काम को जीत लेता है-काम विकार से रहित होता है उसे स्त्री रखने की क्या आवश्यकता? परन्तु आपके ऊपर मनुष्य स्त्रियों की क्या बात, देवांगनाएँ भी अपना असर नहीं डाल सकीं, इसलिए कामदेव के सच्चे विजेता आप ही हैं।


किसलयितमनल्पं त्वद्विलोकाभिलाषात्-
कुसुमितमतिसान्द्रं त्वत्समीपप्रयाणात्।
मम फलितममन्दं त्वन्मुखेन्दोरिदानीम्
नयनपथमवाप्ताद्देव पुण्यद्रुमेण ॥१३॥

अर्थ: हे भगवन्! आपके दर्शन करने की इच्छा से पुण्यरूपी वृक्ष लहलहा उठा था। आपके पास जाने से उसमें फूल लग जाते हैं और आपका साक्षात् दर्शन पा लेने पर उसमें फल लग जाते हैं। आपका दर्शन अत्यन्त पुण्य का कारण है।


त्रिभुवनवनपुष्यत्पुष्पकोदण्डदर्प -
प्रसरदवनवाम्भोमुक्तिसूक्तिप्रसूतिः ।
स जयति जिनराजव्रातजीमूतसङ्घः
शतमखशिखिनृत्यारम्भनिर्वन्धबन्धुः ॥१४॥

अर्थ: जिनका उपदेश, काम अग्नि को नष्ट करने के लिए जलधारा के समान है और जिनके सामने स्वर्ग का इन्द्र मनोहर नृत्य करता है वे जिनेन्द्र देव संसार में सबसे श्रेष्ठ हैं।


भूपालस्वर्गपालप्रमुखनरसुरश्रेणिनेत्रालिमाला -
लीलाचैत्यस्य चैत्यालयमखिलजगत्कौमुदीन्दोर्जिनस्य ।
उत्तंसीभूतसेवाञ्जलिपुटनलिनीकुड्मलस्त्रिः परीत्य
श्रीपादच्छाययापस्थितभवदवथुः संश्रितोस्मीव मुक्तिम्॥१५॥

अर्थ: हे भगवन् आपके मन्दिर की तीन परिक्रमा देकर जब आपके चरणों के समीप हाथ जोड़कर बैठता हूँ तब मुझे जो आनंद होता है उससे मैं समझने लगता हूँ कि मैं अब मुक्ति को ही प्राप्त हो गया हूँ।


देव त्वदङ्घ्रिनखमण्डलदर्पणेस्मि-
न्नर्घ्ये निसर्गरुचिरे चिरदृष्टवक्त्रः।
श्रीकीर्तिकान्तिधृतिसङ्गमकारणानि
भव्यो न कानि लभते शुभमङ्गलानि ॥१६॥

अर्थ: हे भगवन्! जो भव्य आपके नखमण्डलरूपी दर्पण में अपना मुँह देखता है अर्थात् आपके चरणों में नमस्कार करता है वह हर एक तरह के मंगलों को प्राप्त होता है। लोक में दर्पण में मुँह देखना मंगल का कारण माना जाता है।


जयति सुरनरेन्द्रश्री सुधानिर्झरिण्याः
कुलधरणिधरोयं जैनचैत्याभिरामः।
प्रविपुलफलधर्मानोकहाग्रप्रवाल -
प्रसरशिखरशुम्भत्केतनः श्रीनिकेतः॥१७॥

अर्थ: हे भगवन्! आपका वह मन्दिर संसार में सबसे उत्कृष्ट है जिसमें भक्तिपूर्वक जाने से देवेन्द्र तथा राजा-महाराजाओं की सम्पत्ति प्राप्त होती है जिस पर मनोहर पताका फहरा रही है और जो लक्ष्मी का घर है।


विनमदमरकान्ताकुन्तलाक्रान्तकान्ति-
स्फुरितनखमयूखद्योतिताशान्तरालः ।
दिविजमनुजराजव्रातपूज्यक्रमाब्जो
जयति विजितकर्मारातिजालो जिनेन्द्रः ॥१८॥

अर्थ: जिनके चरणों के नखों की कांति से दशों दिशाएँ प्रकाशमान है, जिनके चरणों की देवेन्द्र और नरेन्द्र पूजा करते हैं तथा जिन्होंने कर्मों का क्षय कर दिया है, ऐसे जिनेन्द्रदेव ही सबसे उत्कृष्ट है।


सुप्तोत्थितेन सुमुखेन सुमङ्गलाय,
दृष्टव्यमस्ति यदि मङ्गलमेव वस्तु।
अन्येन किं तदिह नाथ तवैव वक्त्रं,
त्रैलोक्यमङ्गलनिकेतनमीक्षणीयम् ॥१९॥

अर्थ: यदि सोकर उठने के बाद नियम से किसी मंगल वस्तु को देखना चाहिए ऐसा नियम है तो जिनेन्द्र भगवान् के मुख को ही देखिये क्योंकि वह सब मंगलों का घर है।


त्वं धर्मोदयतापसाश्रमशुकस्त्वं काव्यबन्धक्रम-
क्रीडानन्दनकोकिलस्त्वमुचितः श्रीमल्लिकाषट्पदः।
त्वं पुन्नागकथारविन्दसरसी - हंसस्त्वमुत्तंसकैः
कैर्भूपाल! न धार्यसे गुणमणिस्रङ्मालिभिर्मौलिभिः॥२०॥

अर्थ: हे भगवन्! जिस प्रकार तोता तपोवन की शोभा बढ़ाता है उसी प्रकार आप भी धर्म के उदय की शोभा बढ़ाते हैं। जिस प्रकार कोयल अपनी मीठी आवाज से नन्दन वन की शोभा बढ़ा देनी है उसी प्रकार आप भी अपने चरित्र से काव्यरचना की शोभा बढ़ा देते हैं अर्थात् जिस काव्यरचना में आपका चरित्र लिखा जाता है बहुत सुन्दर हो जाती है। जिस प्रकार भौंरा मालती के फूलों का रसास्वाद करता है उसी प्रकार आप भी अनन्तचतुष्टयरूपी लक्ष्मी का रसास्वाद करते हैं। जिस प्रकार हंस कमलों के वन की शोभा बढ़ाता है उसी तरह आप भी श्रेष्ठ पुरुषों की कथाओं की शोभा बढ़ाते हैं और जिस प्रकार अपने आपको अलंकृत करने वाले पुरुष मालाओं से शोभायमान मुकुटों को अपने शिर पर धारण करते हैं उसी प्रकार अपने आपको उत्तम बनाने वाले मनुष्य आपको अपने मस्तक से धारण करते हैं अर्थात् शिर झुकाकर प्रणाम करते हैं।


शिवसुखमजरश्रीसङ्गमं चाभिलष्य
स्वमभिनियमयन्ति क्लेशपाशेन केचित्।
वयमिह तु वचस्ते भूपतेर्भावयन्त-
स्तदुभयमपि शश्वल्लीलया निर्विशामः॥२१॥

अर्थ: हे प्रभो! जो मनुष्य आपके सिद्धान्तों से परिचित नहीं हैं-वे स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के लिए तरह तरह के नियम करते हैं-कठिन तपस्याओं के क्लेश उठाते हैं फिर भी उन्हें प्राप्त नहीं कर पाते, पर हम लोग आपके उपदेश का रहस्य समझकर अनायास ही उन दोनों को प्राप्त कर लेते हैं। आपके वचनों की महिमा अपार है।


देवेन्द्रास्तव मज्जनानि विदधुर्देवाङ्गना मङ्गला-
न्यापेठुः शरदिन्दुनिर्मलयशो गन्धर्वदेवा जगुः।
शेषाश्चापि यथानियोगमखिलाः सेवां सुराश्चक्रिरे
तत्किं देव वयं विदध्म इति नश्चित्तं तु दोलायते॥२२॥

अर्थ: हे प्रभो! करने योग्य जो सेवाएँ थीं उन्हें सब देव-देवियाँ कर चुकीं, अब हम लोग आपकी कौन सी सेवा करें? इस तरह हमारा चित्त निरन्तर विचारों के हिंडोले में झूलता रहता है।


देव त्वज्जननाभिषेकसमये रोमाञ्चसत्कञ्चुकै-
र्देवेन्द्रैर्यदनर्ति नर्त्तनविधौ लब्धप्रभावैः स्फुटम्।
किञ्चान्यत्सुरसुन्दरीकुचतटप्रान्तावनद्धोत्तम -
प्रेङ्खद्वल्लकिनादझङ्कृतमहो तत्केन संवर्ण्यते॥२३॥

अर्थ: हे भगवन्! जन्माभिषेक के समय इन्द्र ने जो नृत्य किया था और देवांगनाओं ने वीणा बजाई थी उसका वर्णन कोई नहीं कर सकता।


देव त्वत्प्रतिबिम्बमम्बुजदलस्मेरेक्षणं पश्यतां
यत्रास्माकमहो महोत्सवरसो दृष्टेरियान्वर्तते।
साक्षात्तत्र भवन्तमीक्षितवतां कल्याणकाले तदा
देवानामनिमेषलोचनतया वृत्तः सः किं वर्ण्यते ॥२४॥

अर्थ: हे भगवन्! जब हमें आपकी जड़ प्रतिमा के दर्शन करने से इतना अपार आनंद होता है तब कल्याणकों के समय आपके दर्शन करने वाले देवों को जो आनन्द होता होगा उसका कौन वर्णन कर सकता है?।


दृष्टं धाम रसायनस्य महतां दृष्टं निधीनां पदं
दृष्टं सिद्धरसस्य सद्म सदनं दृष्टं च चिन्तामणेः।
किं दृष्टेरथवानुषङ्गिकफलैरेभिर्मयाद्य ध्रुवं
दृष्टं मुक्तिविवाहमङ्गलगृहं दृष्टे जिनश्रीगृहे ॥२५॥

अर्थ: हे भगवन्! आपका दर्शन, रसायन, निधि, सिद्ध-रस और चिन्तामणि की तरह उपकारी तो है ही परन्तु मुक्ति प्राप्ति का भी कारण है।


दृष्टस्त्वं जिनराजचन्द्र! विकसद्भूपेन्द्रनेत्रोत्पले
स्नातं त्वन्नुतिचन्द्रिकाम्भसि भवद्विद्वच्चकोरोत्सवे।
नीतश्चाद्य निदाघजः क्लमभरः शान्तिं मया गम्यते
देव! त्वद्गतचेतसैव भवतो भूयात्पुनर्दर्शनम् ॥२६॥

अर्थ: हे भगवन्! मैंने आपके दर्शन किये और स्तुति भी की तथा मन का समस्त सन्ताप भी दूर किया। अब मैं जाता हूँ, पर मेरा चित्त आपमें ही लग रहा है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि मुझे आपके दर्शन फिर भी प्राप्त होवें।